Rajasthan: एक आदमी ने सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाई कि जयपुर के मोती डूंगरी मंदिर में गणेश चतुर्थी से पहले दिन सिंजारे की मेहंदी लगाने से कुंआरों की एक साल के भीतर शादी हो जाती है.
रील वायरल हुई और देखते ही देखते राजस्थान ही नहीं, बल्कि हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश आदि दूसरे राज्यों से भी कुंआरों की जबरदस्त भीड़ उमड़ पड़ी.
साढ़े 3 क्विंटल मेहंदी महज 3 घंटे में खत्म गई और कई किलोमीटर लंबी कतारें और ट्रैफिक जाम हो गया. प्रशासन को व्यवस्थाएं बनाए रखने में पसीने छूट गए और आखिर में मंदिर प्रबंधन से अनाउंस करवाया गया कि मेहंदी लगाना मंदिर की पुरानी परंपरा है, अफवाहों पर ध्यान नहीं दें.
मेहंदी या मन्नत के नाम पर शादी होने की अफवाह और लाखों की भीड़ में कई कुंआरों को ले कर तो खुद मांबाप आए. जिस जेनजी पीढ़ी से हम व्यवस्था बदलने की उम्मीद कर रहे हैं वह पीढ़ी शादी के लिए मन्नत की मेहंदी लगवाने निकल पड़ी, इसीलिए तो यह तांत्रिकसपेरों का देश है और यहां पीढ़ी दर पीढ़ी सपेरे ही पैदा होने हैं.
जो कुंआरे यहां पहुंचे, उन की सोशल प्रोफाइलिंग होनी चाहिए और लड़केलड़की के मांबाप को, जो वैज्ञानिक सोच रखते हैं और अपने बच्चों का बेहतर भविष्य चाहते हैं, इन अंधविश्वासों से बचना चाहिए.
इस भीड़ में मेरा एक दोस्त भी शामिल था. वह कहता है कि ऐसे लोगों के साथ अपने बच्चों की शादी की तो दस्त लगने पर अस्पताल ले जाने के बजाय ये लोग भोपा के पास झाड़फूंक करवाने ले कर जाएंगे और आप के बच्चों की अल्पायु में ही ‘टें’ बोल सकती है.
पाखंडियों की देन अजीब मान्यताएं
हमारे देश में अजीब तरह की अनगिनत कपोलकल्पित मान्यताएं प्रचलित हैं. लड़कियां अच्छा वर हासिल करने के लिए सोमवार के 16 व्रत रखती हैं. उन में से सावन के सोमवार वाले व्रत अलग.
जोधपुर में अप्रैल के महीने में एक ‘धींगा गवर’ का मेला भरता है जिस में लड़कियां लड़कों को छड़ी मारती हैं. ऐसी मनगढ़ंत कल्पित मान्यता है कि जिस कुंआरे लड़के को छड़ी लग जाती है, उस का ब्याह हो जाता है.
इस मेले में भी बड़ी संख्या में कुंआरे छड़ी खाने के लिए उमड़ आते हैं और व्यवस्थाएं संभालना मुश्किल हो जाता है.
कुंआरेपन का दर्द
कुंआरे लड़के बेचारे वैसे ही पीडि़त और वंचित की श्रेणी में आते हैं. वे न तो सरकार से मांग कर सकते हैं और न ही ब्याह करवाने के लिए कहीं धरना दे सकते हैं. उन के लिए ये टोटके ही आखिरी सहारा हैं.
वे बेचारे ये टोटके भी गुपचुप कर के निकल लेना चाहते हैं, पर मीडिया का क्या है? कुछ भी असामान्य घटना हुई नहीं कि पहुंच जाती है अपने कैमरे ले कर. अब बेचारे कुंआरे किसकिस कैमरे से बचें?
कुंआरा रह जाना भी एक बहूत बड़ा दर्द है और ब्याह के लिए टोटका की लाइन में लगना और दुनिया को इस का पता चल जाना उस से भी बड़ा दर्द है, इसलिए गुजारिश है कि कुंआरों की भावनाओं से नहीं खेलें.
मंदिर प्रशासन को भी चाहिए था कि वह औनलाइन मेहंदी भेजने की व्यवस्था कर देता ताकि न तो देशवासियों को कुंआरेपने की भयावहता का पता चलता और न ही कुंआरों को कतारों में लगना पड़ता.
आप इस भीड़ को देख कर अंदाजा लगा सकते कि हमारे देश में कुंआरापन कितनी बड़ी और विकराल समस्या बन कर उभरा है.
यह सब बेहद खौफनाक
बस महज एक अफवाह पर ही डेढ़ लाख लोगो ने गणेश मंदिर को घेर लिया. आसपास का इलाका जाम कर दिया. 50-60 साल के बूढ़े आदमी भी मेहंदी लेने के लिए उतावले हो रहे थे. कई तो भीड़भाड़ व धक्कामुक्की में घायल भी हो गए.
लोग अजीब तरह से हिंसक थे, मानो चाह रहे थे कि किसी तरह मेहंदी का एकएक कण छू लें. एक लड़की को इन लोगो ने मेहंदी के लिए घेर कर लिंच कर उस से मेहंदी छीनना चाहा तो वह लड़की घायल हो कर गश खा कर वहीं गिर पड़ी. जैसे पूरे कुएं में ही भांग पड़ी हो, इस कदर लोग बहके हुए थे.
जयपुर के पुलिस कमिश्नर, आईपीएस अफसर और हजारों पुलिस के जवान मेहंदी बांट रहे थे. गणेश मंदिर के बाहर ऐसी भीड़ जमा हुई कि मंदिर प्रशासन की ओर से बांटने के लिए लाई गई साढ़े 3 क्विंटल मेहंदी भी कुछ ही पलों में खत्म हो गई.
बहुत सारे लोग कतारों में लगे रहे. मंदिर दर्शन कर के लौट जाने के बजाय आसपास की दुकानों से मेहंदी खरीद कर ले जाने के अलावा कोई औप्शन नहीं था.
यह सब देख कर न हंसी आती है और न ही हैरानी होती है, बल्कि डर लगता है और तरस आता है कि हम किस तरह भयानक अंधविश्वास में धकेले जा रहे हैं. यह सब बेहद खौफनाक है.
बड़ा सवाल
गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले मेहंदी वितरण में मेहंदी लेने से ब्याह हो जाता है और लाखों लोग मेहंदी लेने उमड़ पड़ते हैं. यह कितना धार्मिक अंधविश्वास और घोर पाखंड इस देश में एक खास कौम फैलाती आई है, यही मानसिक गुलामी है.
एक सोचीसम झी रणनीति के तहत कोई आप की अंधआस्था से खेल कर लाखोंकरोड़ों का बिजनैस कर गया और आप हाथ मलते रह गए. त्योहारों के नाम पर कैसे पूंजीवाद व्यापार और धार्मिक आस्था से समाज को मानसिक गुलाम बना कर कंट्रोल करती है, इस प्रकार की बारबार टैस्टिंग की जाती है ताकि पता चल सकें कि कहीं आप सुधर तो नहीं गए?
मंदिर के महंतों द्वारा फैलाई गई मनगढ़ंत मान्यता के अनुसार मोती डूंगरी गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले (सिंजारे के दिन) गणेशजी को अर्पित की जाने वाली मेहंदी के वितरण के पीछे जल्दी शादी होने और सुयोग्य वर या वधू मिलने की अगाध आस्था जुड़ी हुई है.
सवाल इस भीड़ में जमा हुए नौजवानों और मांबाप से भी है कि अगर ऐसा है तो देश में कुंआरों की आबादी बढ़ क्यों रही है? क्या हमारे बापदादाओं की शादी मेहंदी लेने के बाद ही मुमकिन हुई थी? उस दौर में तो कोई कुंआरा नहीं रहा, फिर आज शादी के लिए यह सब पाखंड क्यों करना पड़ रहा है? Rajasthan




