Cheating Story in Hindi. थाने में केबिन के बाहर अपनी साली कमला को बैठे देख कर मुझे यह समझाने में जरा भी समय नहीं लगा कि इस का पति सुरेश फिर से किसी केस में फंस गया है. पर इस बार तो वह अपनी सब से छोटी साली यानी मेरी पत्नी और कमला की छोटी बहिन के होटल में लगा था. हम सब उसे बेटी समान समजहते हैं. क्या उस ने उसे भी नहीं छोड़ा? वह किस मिट्टी का बना है?
मैं अभी इन सवालों के जवाब खोज ही रहा था कि कमला धीरेधीरे चलती हुई मेरे पास आ गई. मैं ने उस से केबिन के भीतर आने को कहा. वह चुपचाप मेरे सामने आ कर बैठ गई. उस के चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे वह अभी रो देगी. मैं ने उसे पीने के लिए पानी दिया.
मैं ने ही बात शुरू की, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ? सब ठीक तो है न?’’
यह सुन कर कमला फूटफूट कर रोने लगी. मैं ने उसे नहीं रोका और न ही मुझे उस पर तरस आया. वह सुरेश की धोखेबाजी, उस के कांइयांपन और उस की बेईमानी में बराबर की हिस्सेदार जो है.
थोड़ी देर बाद कमला का रोना बंद हुआ, तो उस ने सुबकते हुए कहा, ‘‘वे थाने में बंद हैं…’’
‘‘किस थाने में?’’ ‘‘इसी थाने में…’’
‘‘अच्छा, आप रोना बंद करें. मैं पता करता हूं.’’
मैं ने अभी टैलीफोन उठाया ही था कि इंस्पैक्टर सलीम ने अंदर आने की इजाजत मांगी. मैं ने उसे अंदर आने के लिए कहा. वह रोजनामचा ले कर हाजिर हुआ था. उस में सुरेश की गिरफ्तारी के बारे में लिखा गया था. सुरेश की साली के पति तेजा सिंह की शिकायत पर उस की गिरफ्तारी हुई थी.
सुरेश और तेजा सिंह मेरे साढ़ू हैं. सुरेश के खिलाफ 5 लाख रुपए की चोरी और एक लाख रुपए की गड़बड़ की शिकायत की गई थी. यह भी लिखा गया था कि रात में ही जब ड्यूटी इंस्पैक्टर ने सुरेश के घर पर छापा मारा, तो सवा 3 लाख रुपए नकद मिले, जिसे थाने की तिजोरी में रखा गया है.
पूछताछ के बाद सुरेश इन रुपयों का हिसाबकिताब न दे पाया, जिस से यह मान लिया गया कि ये रुपए चोरी के हैं. इस दौरान कमला भी वहां पर थी.
पुलिस टीम ने रुपए हासिल करने के बाद सुरेश व कमला के दस्तखत भी लिए. स्टेटमैंट रोजनामचा के साथ थी.
सब पढ़ने के बाद मैं समझ गया कि सुरेश अपराधी है और उस के बचने की उम्मीद न के बराबर है.
‘‘रात में ड्यूटी इंस्पैक्टर कौन था?’’ मैं ने इंस्पैक्टर सलीम से पूछा. ‘‘सर, इंस्पैक्टर रवि…’’
‘‘उस से कहो, मुझ से अभी बात करे,’’ मैं ने कहा. ‘‘जी सर,’’ कह कर इंस्पैक्टर सलीम चला गया.
‘‘कमला, ये सवा 3 लाख रुपए कहां से आए? देखो,झूठ मत बोलना… वैसे भी सुरेश के बचने की उम्मीद बिलकुल नहीं है. अगर सच बोलोगी, तो शायद कोई बचने का रास्ता निकल आए…’’
कमला ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया. थोड़ी देर बाद जब उस का रोना बंद हुआ, तो उस ने कहा, ‘‘मैं ने कितनी बार उन से कहा कि ऐसे गलत काम मत करो, लेकिन वे मेरी बात सुनते ही नहीं…’’ कमला फिर सुबकने लगी.
‘‘देखो कमला, तुम मेरी पत्नी की छोटी बहिन हो, इस नाते मैं तुम्हें भी जानता हूं और सुरेश को भी. उस ने तुम्हें भी बहुत सब्जबाग दिखाए हैं. तुम सब भूल गईं क्या?
‘‘याद करो, डीडीए फ्लैट के बारे में… तुम्हें साइट पर ले जा कर दिखाया करता था कि तीसरी मंजिल पर तुम्हारा फ्लैट है. पता नहीं, कहां से और किस का एलौटमैंट लैटर दिखा दिया और तुम झांसे में आ गईं.
‘‘वे फ्लैट तैयार होने के बाद लोग वहां बसने भी लगे, पर तुम्हारे लिए वहां कोई फ्लैट नहीं था… यह तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो. फिर बाद में तुम भी उस की धोखेबाजियों में, उस की बेईमानियों में और उस के कांइयांपन में रंग गईं.
‘‘तुम उस के अपराधों में बराबर की हिस्सेदार रहीं… खैर, कोई बात नहीं. तुम साथ वाले केबिन में बैठो, मैं तुम्हें अभी बुलाता हूं.’’
कमला चली गई. मैं उस की और सुरेश की ड्रामेबाजी को बड़ी अच्छी तरह से जानता हूं. कई साल पहले ये दोनों चंद्र नगर में रहते थे. मैं और मेरी पत्नी भी वहां इन से मिलने गए हुए थे. मैं सेना से रिटायर हो कर अभी पुलिस सेवा में आया था. किसी ने बाहर से आवाज लगाई, तो कमला और सुरेश आवाज पहचान कर घबरा गए थे.
मैं ने देखा कि सुरेश तुरंत पलंग के नीचे घुस गया. कमला ने बिना दरवाजा खोले ही कहा कि वे घर पर नहीं हैं और पता नहीं कब आएंगे. आवाज देने वाला कुछ समय चुप खड़ा रहा, फिर चला गया और जातेजाते कहा कि ‘कहना गुलाटी आया था.’
कुछ देर बाद पता चला कि सुरेश लोगों की गाडि़यां फाइनैंस कराता था. गुलाटी ने सुरेश को गाड़ी की 2 किस्तें जमा करने के लिए दी थीं, जो वह खुद खा गया.
फाइनैंस वाले गुलाटी को तंग कर रहे थे और गुलाटी सुरेश के घर के चक्कर काट रहा था.
उस समय भी कमला सुरेश की हरकतों को बड़ी अच्छी तरह जानती थी. मुझे कहना चाहिए कि वह भी अपने पति के इस अपराध में बराबर की हिस्सेदार थी.
मुझे सुरेश का तो पता नहीं, पर कमला ऐसे मांबाप की औलाद है, जिन्होंने मेहनतमजदूरी कर के उसे अच्छी तरह पालापोसा, पढ़ायालिखाया, ब्याह का इंतजाम भी किया. फिर वह सुरेश के रंग में कैसे रंग गई?
मैं इस बात के लिए भी हैरान हूं कि लोग सुरेश को किस्तें देने के बजाय सीधे फाइनैंस कंपनी में क्यों जमा नहीं कराते?
सुरेश दिल्ली में कुछ दिनों के लिए किसी बहुत अच्छे पब्लिकेशन हाउस में भी काम करता था. अच्छी तनख्वाह थी. वह पब्लिकेशन हाउस पूरे देश के स्कूलों में किताबें सप्लाई करता था और सुरेश उस का सेल्स प्रतिनिधि था. तब मैं सेना में था और चेन्नई में पोस्टैड था.
उस समय सुरेश और कमला मेरे पास आए थे. तब सुरेश की दोनों जेबें नोटों से भरी रहती थीं. न चाहते हुए भी उन्होंने हमें न केवल चेन्नई, बल्कि बेंगलुरु और मैसूर भी घुमाया था.
मैं अपने खर्चे पर यह सब देखना चाहता था. तब सुरेश और कमला ने हमारी एक न सुनी थी. बाद में पता चला कि सुरेश अपने पब्लिकेशन हाउस में किसी से मिल कर गड़बड़ कर रहा था, जिस में उस के मालिक का लड़का भी शामिल था.
जब तक असली मालिक को पता चलता, तब तक वे दोनों पब्लिकेशन हाउस को लूट कर खा चुके थे. उस समय सुरेश भी शायद इसलिए बच गया कि मालिक का लड़का खुद इस में शामिल था.
एक बार जिस इनसान को बेईमानी, मक्कारी, धोखाधड़ी और बिना मेहनत किए पैसा बटोरने का चसका लग जाए, तो वह खुद का दुश्मन बन जाता है.
दोनों हाथों से नोट उड़ाने वाला सुरेश एकदम कंगाल हो गया था. परिवार की जिम्मेदारी बढ़ गई थी. वह 3-3 बेटियों का पिता बन गया था. उन के लालनपालन के लिए पैसा चाहिए था, चाहे वह किसी भी तरीके से कमाया गया हो.
सुरेश जहां भी गया, उस ने बेईमानी ही की. दीमक की तरह चाट कर सब को खोखला करता चला गया. जब तक पता चलता, वह उन की पहुंच से दूर चला गया होता. जो उसे पकड़ लेते, उन्हें उन का रुपया लौटा देता.
ये फरेब कब से हो रहा था, मुझे मालूम नहीं. मैं सेना से रिटायर हो कर दिल्ली पुलिस सेवा में आ गया था और पटपड़गंज की एक सोसाइटी में एक फ्लैट ले कर परिवार के साथ रह रहा था.
हमारे फ्लैट के नीचे वाले फ्लैट में एक कबाड़ी रहता था. सुरेश ने उस से जाने कब, क्या झांसा दे कर कैसे 2 लाख रुपए ऐंठ लिए थे और जगतपुरी में 25 गज जमीन ले कर अपना मकान बनवाना शुरू कर दिया था. मुझे और मेरी पत्नी को कानोंकान खबर नहीं हुई. हमें केवल यह पता चला कि वह मकान बनवा रहा है.
मेरी पत्नी ने कमला को फोन कर इस के लिए खुशी जताई. मुझे शक था और इस बाबत मैं ने अपनी पत्नी से भी बात की. उस ने कहा था कि यह मेरा पुलिसिया वहम है.
बात आईगई हो गई. लेकिन एक दिन जब मैं अपने दफ्तर के लिए तैयार हो रहा था, तो वह कबाड़ी मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. जब उस ने सारा किस्सा सुनाया, तो मुझे अफसोस होने लगा कि मैं सुरेश का रिश्तेदार हूं.
कबाड़ी बोला, ‘सर, मुझे पता नहीं था कि वह ऐसे करेगा. सोचा था कि आप का रिश्तेदार है, किसी तरह का धोखा नहीं करेगा. लेकिन…’ आगे उस ने क्या कहा, मैं सुन नहीं पाया.
मैं ने कबाड़ी से कहा, ‘देखिए भाई, रुपया आप ने मुझ से पूछ कर नहीं दिया था. मैं आप की कोई मदद नहीं कर सकता. बेहतर यही होगा कि आप खुद निबटें.’
वह कबाड़ी अपना सा मुंह ले कर लौट गया.
मैं अपने दफ्तर चला आया, पर सुबह की घटना मेरे जेहन में बनी रही. लोग कैसे धोखेबाजी, मक्कारी और बेईमानी से अपना घर बना लेते हैं. वे इस बात को क्यों नहीं समझ पाते कि इस तरह का कमाया गया रुपया बेकार जाता है. काश, वे समझ पाते कि रेत के टीलों पर घर नहीं बनाए जाते.
कबाड़ी ने जब ज्यादा दबिश दी, तो सुरेश और कमला मेरे पास दौड़ेदौड़े आए. रविवार का दिन था. मेरी छुट्टी थी. मेरी पत्नी की पंजाबी बाग वाली बहिन और उस का पति भी हम से मिलने के लिए आए हुए थे. वह अपनी बहिनों में सब से अमीर समझ जाती थी… अमीर थी भी.
कमला और सुरेश किसी भी तरह अपना मकान बचाना चाहते थे. उन का इरादा कोई और चक्कर चलाने का था. लिहाजा, उन्होंने पंजाबी बाग वाली बहिन और उस के पति के पैर पकड़ लिए और उन से पैसे दे कर इस मुसीबत से उबारने की गुहार लगाई.
वे दोनों कहते ही रह गए कि आप दोनों बड़े हो, इस तरह हमारे पैर नहीं पड़ना चाहिए. उन के पास रुपया है ही नहीं. होता तो वे जरूर दे देते. लेकिन उन दोनों की नौटंकी जारी रही.
मैं ने सुरेश से कहा, ‘तुम इन दोनों के पैर क्यों पकड़ रहे हो… तुम अपने छोटे भाई के पास क्यों नहीं जाते, जो इन की तरह ही अमीर हैं. कहो तो हम उन से बात करें?’
जब सुरेश के छोटे भाई से बात की गई, तो उन्होंने जो कहा, वह कहनेसुनने लायक नहीं था.
उन्होंने कहा, ‘ये दोनों ही ड्रामेबाज हैं. इन को मैं तो क्या, कोई भी रुपया नहीं देगा. आप भी मत देना.’
इस के बाद मुझे पता चला कि सुरेश ने अपने इस पंजाबी बाग वाले साढ़ू की मां को भी नहीं छोड़ा था.
कबाड़ी को पैसा लौटाने की कोई सूरत न देख कर सुरेश को वह मकान बेचना पड़ा, तब कहीं जा कर उसे छुटकारा मिला था.
इस के बाद मैं यादों के दायरे से बाहर निकल आया.
‘‘क्या मैं भीतर आ सकता हूं सर?’’ ‘‘हां, आओ इंस्पैक्टर रवि…’’
‘‘सर, आप के कहे मुताबिक मैं ने सुरेश की शिकायत करने वाले को समझौते के लिए मना तो लिया है, पर वह आप के सामने समझौते करना चाहता है,’’ इंस्पैक्टर रवि ने कहा.
‘‘ठीक है. आप सुरेश, कमला और शिकायत करने वाले तेजा सिंह को ले आओ. मैं आज ही यह केस निबटा देना चाहता हूं.’’
‘‘जी सर,’’ कह कर इंस्पैक्टर रवि चला गया. कुछ समय बाद वे तीनों मेरे सामने थे.
‘‘तेजा सिंहजी, हम दोनों आपस में रिश्तेदार होते हुए भी बहुत कम मिले हैं. क्या आप को सुरेश की हरकतों का पता नहीं था?’’ मैं ने उन से पूछा.
‘‘जी नहीं. अगर मुझे पता होता, तो मैं इसे रखता ही क्यों? दुख तो मुझे इस बात का है कि मेरी पत्नी को इस बात का पता था, पर उस ने भी मुझे नहीं बताया…’’ तेजा सिंह सांस लेने के लिए रुका, ‘‘सोचा था, अपना आदमी है और इस की सब से छोटी बेटी की शादी भी है. इस के हाथ चार पैसे आ जाएंगे, पर मुझे नहीं पता था कि यह इतना बड़ा डाकू है.
‘‘बेटी की शादी कर के न केवल इस ने अपना उल्लू सीधा किया, बल्कि उस डाके में से बहुत से रुपए बचा भी लिए, जो आप ने बरामद किए…’’
‘‘तेजा सिंहजी, आप अपनी पत्नी को दोषी न मानें. उस ने भी आप की तरह अपने इस जीजा के लिए अच्छा ही सोचा था, पर उसे क्या पता था कि वह अपनी बेटी समान साली के घर में ही सेंध लगाएगा… जिंदगी में इतनी ठोकरें खाने के बाद भी. पर सांप कभी अपना स्वभाव बदल सकता है भला. जब भी उसे मौका मिलेगा, वह काटेगा.
‘‘मैं समझता हूं, सुरेश इस से अलग नहीं है, इसलिए तेजा सिंहजी नुकसान तो हुआ है. जो वापस मिल रहा है, उसे ही ठीक समझ लेना चाहिए, नहीं तो…’’
‘‘ईमानदारी के काम में दुकानमकान कहां बनते हैं…’’ कमला ने कहा.
‘‘चुप रहो कमला. क्या तुम्हारे भाई और मांबाप के ईमानदारी से मकान नहीं बने? और फिर सुरेश ने कौन सी बेईमानी से मकानदुकान बना लिए? आज तक वह बेईमानी ही तो करता रहा है?
‘‘काश, तुम और सुरेश यह बात अपनी जिंदगी में समझ पाते, तो आज तुम दोनों मेरे सामने इस तरह खड़े न होते…’’ थोड़ी देर बाद मैं दोबारा बोला, ‘‘क्या तुम चाहती हो कि सुरेश को 2 साल के लिए जेल भेज दिया जाए? सारे सुबूत उस के खिलाफ हैं… बोलो?’’
‘‘नहीं,’’ कमला बोली. ‘‘तो फिर चुप रहो. हमें अपना काम करने दो. समझौता होने दो. तुम दोनों ने कभी सोचा है कि तेजा सिंह के सामने उन की पत्नी की क्या हालत होगी?
‘‘काश, तुम दोनों उस के मन के भीतर के इस दर्द को महसूस कर पाते, तो उस का कुछ दुख कम हो जाता. तुम दोनों को तो इस बात का भी दुख नहीं है कि अब जिंदगीभर तुम तेजा सिंह से आंख नहीं मिला पाओगे…’’
कमला चुपचाप खड़ी रही. मेरी बातों का उस के पास कोई माकूल जवाब नहीं था.
समझौता के बाद जब सब के दस्तखत हो गए, तो मैं ने कमला और सुरेश को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम दोनों आज तक रेत के टीलों पर रेत का ही घर बनाने की कोशिश कर रहे हो… यह बात तुम भी जानते हो और मैं भी कि रेत के टीलों पर घर नहीं बना करते. अगर इस बात को समझ कर चलोगे, तो मुमकिन है कि तुम दोनों की जिंदगी संवर जाएगी.’’
मेरी बात का दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया. मेरे लिए यह अंदाजा लगाना मुमकिन नहीं था कि उन पर मेरी बात का असर हुआ भी या नहीं. जो लोग स्वभाव से अपराधी हों, उन पर असर हो भी क्या सकता है? मैं केवल उन का जाना देखता रहा… चुपचाप.Cheating Story in Hindi




