Judgment:  पिछले तकरीबन 10 साल से भारत की संस्कृति को धार्मिक आधार पर पेंट करने की लगातार कोशिशे की जाती रही. इतिहास को भी इसी नजरिए से देखा जाने लगा. राजनीति ने समाज में गहरी सांप्रदायिक सीमाएं खड़ी कर दीं. हिंदूमुसलिम वाली सोच ने भारत की असली गंगाजमुनी तहजीब को धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. संविधान की सैकुलर स्पिरिट पर लगातार चोट पहुंचाई गई लेकिन यह इतनी जल्दी मरने वाला नहीं. सकुलरिज्म भारत की असली पहचान है. यह सिर्फ समाज की मुख्यधारा में ही रचाबसा नहीं है, बल्कि अदालतों में भी समाया हुआ है. अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने यह बात साबित कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट में हजरत मुहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मामले में याचिका दायर की गई. इस पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी शख्स को सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के बजाय पहले कानून के तय रास्ते पर चलना चाहिए.

अब ऊपरीतौर पर देखा जाए तो मामला आईने की तरह सीधा दिखता है कि किसी हिंदू ने मुसलिम की धार्मिक भावना आहत करने के लिए उन के नबी के खिलाफ ऐसी अपमानजनक टिप्पड़ी की होगी. इस पर किसी मुसलिम का खून खौला होगा और वह सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया होगा जहां किसी हिंदू जज ने कहा होगा कि इस मामले को ले कर पहले पुलिस के पास जाओ.

लेकिन इस मामले में सबकुछ आम नैरेटिव के बिलकुल उलट है. हजरत मुहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पड़ी किसी हिंदू ने नहीं बल्कि नाजिया इलाही खान नाम की एक मुसलिम सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ने की थी. मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाने वाले वकील का नाम रजत कुमार है और इस याचिका पर फैसला देने वाले जस्टिस का नाम अहसानुद्दीन अमानुल्लाह है.

सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘अगर कोई अपराध हुआ है तो सब से पहले पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराइए. सिस्टम पर भरोसा रखिए. सुप्रीम कोर्ट भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है. हम सब से ऊपर हैं, लेकिन हर मामले में पहला दरवाजा नहीं हो सकते. संवेदनशील मामलों को बेवजह सनसनीखेज नहीं बनाया जाना चाहिए. अगर पुलिस और निचली अदालतें अपना काम नहीं करतीं, तब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है, लेकिन कानून की तय प्रक्रिया को छोड़ कर सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचना उचित नहीं है.’’

यह घटना भारतीय समाज और सिस्टम के अंदर गहराई तक समाए सैकुलरिज्म का ही एक उदाहरण है. धर्म की लड़ाई तो सदियों से चल रही है और जब तक दुनिया में धर्म रहेंगे तब तक यह नफरत चलती रहेगी, लेकिन सैकुलरिज्म इस नफरत के बीच भाईचारे का पुल कायम करने की कोशिश करता है. सैकुलरिज्म यह साबित करता है की धर्म से ऊपर हमेशा इनसानियत होती है. Judgment

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