Social Issue. सरकारी स्कूलों की बदहाली दिखाने निकले कौकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के कार्यकर्ताओं के सामने खड़े हुए प्रतिबंध, विरोध और एफआईआर के सवाल. पर सरकारी स्कूल किसी मंत्री, विधायक या अफसर की निजी जागीर नहीं होते. वे जनता के पैसे से चलते हैं और उन में पढ़ने वाले बच्चे भी किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं, इसलिए जब कोई संगठन सरकारी स्कूलों के हालात देखने और उन की कमियों को जनता के सामने लाने निकालता है.
तो पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वह संगठन स्कूल में क्यों गया? पहला सवाल यह होना चाहिए कि आखिर सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी क्यों है कि उन्हें देखने और दिखाने को ले कर सरकार और सामाजिक संगठनों के बीच टकराव सा पैदा हो गया है?
राजस्थान में कौकरोच जनता पार्टी के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने इसी सवाल को बहस के केंद्र में ला दिया है. अभियान की घोषणा के बाद सरकारी स्कूलों की इमारतों, बुनियादी सुविधाओं, बच्चों की पढ़ाई और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल सोशल मीडिया पर सामने आने लगे.
इसी बीच 16 अगस्त 2026 को राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय की ओर से सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, आडियो रिकौर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग को ले कर निर्देश जारी किए गए.
आदेश के मुताबिक बिना पहले से ली गई इजाजत के बैगर कोई बाहरी शख्स स्कूल में एंट्री नहीं कर सकता और स्कूल परिसर में फोटो या वीडियो बनाने जैसी गतिविधियों के लिए भी इजाजत लेना जरूरी है.
सरकार का मानना है कि इन निर्देशों का मकसद किसी राजनीतिक अभियान को रोकना नहीं, बल्कि स्कूलों में पढ़ने वाले नाबालिग बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और निजता सुनिश्चित करना है. यानी मातापिता के स्थान पर स्कूल की जिम्मेदारी का सिद्धांत भी इसी संदर्भ में सामने रखा गया है. बच्चों की तसवीरें, वीडियो, आवाज और निजी जानकारी बिना इजाजत सार्वजनिक न हो, यह चिंता निश्चित रूप से गंभीर है.
किसी सामाजिक अभियान या मीडिया संगठन को भी यह हक नहीं मिल सकता कि वह बच्चों को अपनी प्रचार सामग्री का हिस्सा बना दे. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. असली सवाल यहीं से शुरू होता है.
बच्चों की निजता या स्कूलों की ट्रांसपेरेंसी
बच्चों की निजता की हिफाजत जरूरी है, लेकिन क्या बच्चों की निजता और सरकारी स्कूलों की ट्रांसपेरेंसी को एकदूसरे के सामने खड़ा किया जा सकता है? क्या किसी बच्चे का चेहरा दिखाए बिना स्कूल की जर्जर इमारत की तसवीर नहीं
ली जा सकती? क्या छात्र की पहचान छिपा कर खराब शौचालय, टूटी खिड़की, पानी की समस्या या खाली पड़ी क्लास की हकीकत सामने नहीं लाई जा सकती? क्या किसी विद्यार्थी की निजी जानकारी सार्वजनिक किए बिना सरकारी स्कूल की व्यवस्थागत कमियों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते?
बिलकुल उठाए जा सकते हैं. यही वजह है कि सरकारी आदेश को ले कर राजनीतिक बहस पैदा हुई है. सीजेपी का आरोप है कि ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के जरिए सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने लाने की कोशिश की जा रही थी और उसी दौरान बाहरी लोगों के प्रवेश और रिकौर्डिंग को ले कर कड़े निर्देश जारी कर दिए गए.
सरकार का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा और निजता सर्वोच्च प्राथमिकता है. दोनों पक्षों के इन दावों के बीच असली सवाल ट्रांसपेरेंसी का है.
सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा केवल शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी नहीं है. वह उस समाज का बच्चा है जिस के टैक्स और सार्वजनिक धन से स्कूल की इमारत बनी है, शिक्षकों का वेतन आता है, किताबें खरीदी जाती हैं और योजनाएं चलती हैं. अगर स्कूल में पीने का पानी नहीं है, शौचालय खराब है, भवन जर्जर है, शिक्षक कम हैं या बच्चों को जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तो समाज को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि समस्या कहां है और उस के समाधान की जिम्मेदारी किस की है.
यही वह जगह है जहां ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान और सरकार के बीच असली टकराव दिखाई देता है.
आदेश का समय भी बना सवाल
16 अगस्त का आदेश इसलिए भी चर्चा में आया, क्योंकि इस का समय सीजेपी के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान से जुड़ गया. अभियान के समर्थकों ने इसे सरकारी स्कूलों की निगरानी रोकने की कोशिश के रूप में देखा. दूसरी ओर सरकार ने इसे बच्चों की सुरक्षा और स्कूल परिसर की गरिमा से जुड़ा प्रशासनिक फैसला बताया.
यहीं राजनीति ने भी अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. सीजेपी की ओर से सरकार पर सवाल उठाए गए और शिक्षा व्यवस्था की असली हालात सामने लाने की बात कही गई.
दूसरी ओर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की ओर से अभियान और स्कूलों में बिना अनुमति पहुंचने को ले कर विरोधात्मक बयान सामने आए. सरकार की तरफ से यह तर्क रखा गया कि स्कूल कोई सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल नहीं हैं और नाबालिग बच्चों के बीच किसी भी बाहरी व्यक्ति की गतिविधि नियमों के दायरे में होनी चाहिए.
बात का एक हिस्सा सही है. स्कूल में अनुशासन होना चाहिए. बच्चों की निजता सुरक्षित रहनी चाहिए. शिक्षकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए. लेकिन सत्ता के सामने दूसरा सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा होता है. अगर नियम बच्चों की सुरक्षा के लिए हैं तो उन का इस्तेमाल स्कूल की कमियों को छिपाने के लिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि कैमरा किसी बच्चे की निजता में घुस सकता है, लेकिन कैमरा किसी सरकारी स्कूल की टूटी दीवार, खराब शौचालय या खाली कक्षा को भी दिखा सकता है, इसलिए कैमरे को पूरी तरह समस्या मान लेना भी सही नहीं है.
स्कूल किस के हैं
यह सवाल जितना सरल है, उतना ही असहज भी. सरकारी स्कूल किस के हैं? सरकार के? शिक्षा विभाग के? मंत्री के? अधिकारी के? नहीं. वे जनता के हैं.
सरकार उन का संचालन करती है, लेकिन वे जनता की सार्वजनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, इसलिए जनता से यह कहना कि स्कूल के भीतर क्या हो रहा है, यह जानने की जरूरत नहीं, लोकतांत्रिक जवाबदेही की भावना से मेल नहीं खाता.
हां, स्कूल में प्रवेश के नियम होने चाहिए. विजिटर रजिस्टर होना चाहिए. बाहरी आदमी की पहचान दर्ज होनी चाहिए. बच्चों की तसवीर और निजी जानकारी के लिए सुरक्षा प्रोटोकौल होना चाहिए. लेकिन इस के साथ यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि पत्रकार, सामाजिक संगठन और नागरिक समूह जब किसी सार्वजनिक हित के मुद्दे की जांच करना चाहें तो उन के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध अनुमति प्रक्रिया उपलब्ध हो.
अगर अनुमति मांगने वाला आदमी लंबे समय तक अनुमति का इंतजार करता रहे तो निगरानी का अधिकार केवल कागज पर रह जाएगा. और अगर अनुमति देने या रोकने का पूरा अधिकार उसी स्थानीय व्यवस्था के हाथ में हो जिस की जांच की जानी है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
यही वह बिंदु है जहां सीजेपी समर्थकों और सरकार के आलोचकों का सवाल मजबूत होता है. उन का कहना है कि अगर सरकार को अपने स्कूलों की व्यवस्था पर पूरा भरोसा है तो उसे स्वतंत्र सामाजिक निगरानी से घबराने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिस में स्कूल की कमियों और उपलब्धियों दोनों को निष्पक्ष रूप से सामने आने दिया जाए.
जब स्कूल देखने पहुंची टीम और हो गया विवाद
इस पूरे विवाद ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब जयपुर के बगरू क्षेत्र के रामपुराकंवरपुरा गांव में सीजेपी की टीम के स्कूल दौरे को ले कर विवाद सामने आया. उन की ओर से कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और वाहनों में तोड़फोड़ के आरोप लगाए गए. मामले में पुलिस कार्रवाई और एफआईआर की बात सामने आई.
यह घटना बताती है कि स्कूलों की बदहाली का सवाल अब केवल शिक्षा विभाग की फाइलों तक सीमित नहीं रहा. वह राजनीतिक टकराव का विषय बन चुका है.
जब तक सरकारी स्कूल की समस्या किसी फाइल में बंद रहती है, तब तक वह सिर्फ एक आंकड़ा होती है. लेकिन जब उस की तसवीर सामने आती है, अभिभावक सवाल पूछते हैं और कोई संगठन उस समस्या को ले कर अभियान खड़ा करता है, तब वह राजनीतिक सवाल बन जाती है. सीजेपी ने इसी सवाल को जनता के बीच पहुंचाने की कोशिश की है.
अगर सीजेपी के कार्यकर्ताओं ने किसी नियम का उल्लंघन किया था तो प्रशासन के पास उन्हें रोकने के लिए कानूनी रास्ता मौजूद था. पुलिस को बुलाया जा सकता था. शिकायत दर्ज की जा सकती थी. जांच हो सकती थी. पर किसी भी सामाजिक अभियान से जुड़े लोगों के साथ हिंसा लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकती.
किसी स्कूल की समस्या पर
बहस हो सकती है. किसी संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठ सकता है. लेकिन लाठी और भीड़ किसी समस्या का समाधान नहीं है.
सवाल पूछने वाले को अपराधी मत बनाइए
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं है. किसी स्कूल की हालत देखना अपराध नहीं है. किसी स्कूल में टीचर की कमी पर सवाल उठाना अपराध नहीं है. बच्चों के लिए पानी और शौचालय मांगना अपराध नहीं है. सरकारी भवन की हालत पर सवाल उठाना अपराध नहीं है.
अपराध तब होगा जब कोई कानून तोड़ेगा, बच्चों को नुकसान पहुंचाएगा, उन की निजता भंग करेगा या हिंसा करेगा. लेकिन सवाल पूछने और अपराध करने के बीच फर्क करना जरूरी है.
अगर सीजेपी के किसी कार्यकर्ता ने कानून तोड़ा है तो कानून अपना काम करे. लेकिन केवल इसलिए कि वह सरकार की आलोचना करता है, उसे शक की नजर से देखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत होगा.
गैरभाजपा राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए भी यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज सवाल सीजेपी का है, कल किसी और संगठन का हो सकता है. आज किसी सीजेपी कार्यकर्ता को स्कूल के गेट पर रोका जा रहा है,
कल किसी पत्रकार को रोका जा सकता है, किसी अभिभावक को रोका जा सकता है या किसी सामाजिक संगठन को.
इसलिए यह लड़ाई केवल एक संगठन की नहीं है. यह नागरिक अधिकारों और सरकारी जवाबदेही का सवाल है.
शिक्षा मंत्री के बयान और बढ़ती बहस
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने स्कूलों में बाहरी लोगों की गतिविधियों को ले कर विरोध जताया है और बच्चों की सुरक्षा तथा पढ़ाई में व्यवधान का मुद्दा उठाया है. मंत्री की चिंता को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. स्कूल में अनुशासन होना चाहिए. बच्चों की निजता सुरक्षित रहनी चाहिए. शिक्षकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए.
लेकिन मंत्री की जिम्मेदारी केवल यह बताना नहीं है कि कौन स्कूल में नहीं आ सकता. उन की जिम्मेदारी यह भी है कि जनता को बताया जाए कि स्कूलों में क्या हो रहा है. कितने स्कूलों में टीचर कम हैं? कितने भवन जर्जर हैं? कितने स्कूलों में पेयजल की समस्या है? कितने शौचालय खराब हैं? कितने स्कूलों में मरम्मत की जरूरत है? कितने स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर नहीं है?
इन सवालों का जवाब देना शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है. अगर विभाग ये आंकड़े सार्वजनिक कर दे तो सीजेपी का अभियान खुद तथ्यों की कसौटी पर आ जाएगा. तथ्य सामने होंगे तो राजनीतिक आरोपों की जगह तथ्य ले लेंगे. लेकिन अगर तथ्य सार्वजनिक नहीं होंगे तो सोशल मीडिया पर अफवाह और राजनीतिक आरोप दोनों बढ़ेंगे.
बच्चों की निजता जरूरी है, लेकिन बच्चों का भविष्य भी. यहां सरकार के तर्क को भी पूरी तरह खारिज करना गलत होगा.
बच्चों की निजता महत्वपूर्ण है. किसी बच्चे का चेहरा बिना अनुमति सोशल मीडिया पर डालना गलत है. किसी बच्ची की निजी समस्या को वायरल करना गलत है. बच्चों के इंटरव्यू ले कर राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल करना गलत है. लेकिन बच्चों का भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
अगर बच्चा जर्जर भवन में पढ़ रहा है तो उस की सुरक्षा का क्या? अगर स्कूल में शिक्षक नहीं है तो उसकी शिक्षा की सुरक्षा कौन करेगा? अगर स्कूल में पानी नहीं है तो उस के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी कौन लेगा? अगर शौचालय नहीं है तो उस की गरिमा की रक्षा कौन करेगा? इसलिए बच्चों की निजता के नाम पर स्कूल की बुनियादी समस्याओं को छिपाना भी बच्चों के हित में नहीं हो सकता.
बच्चों की तस्वीर मत दिखाइए. लेकिन बच्चों की समस्या तो दिखाइए. यही संतुलन होना चाहिए.
सत्ता को एक काम करना चाहिए
सरकार चाहे तो इस पूरे विवाद को एक झटके में खत्म कर सकती है. राजस्थान के सभी सरकारी स्कूलों का सोशल आडिट कराइए. उस की रिपोर्ट सार्वजनिक कीजिए. स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं का औनलाइन डाटा सार्वजनिक कीजिए.
हर स्कूल के लिए शिकायत और निरीक्षण का ट्रांसपेरेंट सिस्टम बनाइए. पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के लिए समयबद्ध अनुमति प्रणाली बनाइए. बच्चों की निजता की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम बनाइए. और फिर सीजेपी से कहिए, आइए, हमारे स्कूल देखिए.
अगर सरकार यह कर देती है तो पूरा विवाद ही बदल जाएगा, क्योंकि तब सवाल यह नहीं रहेगा कि सीजेपी स्कूल में घुसी या नहीं. सवाल यह होगा कि सरकार ने स्कूल कितना ठीक किया. और यही असली इम्तिहान है.
एफआईआर से स्कूल ठीक नहीं होते
किसी कार्यकर्ता पर एफआईआर हो सकती है. किसी नेता पर मुकदमा हो सकता है. किसी संगठन पर आरोप लग सकते हैं. लेकिन इस से स्कूल नहीं सुधरता. स्कूल तब सुधरता है जब बजट खर्च होता है, टीचर होते हैं, भवन की मरम्मत होती है, पानी आता है, शौचालय साफ होते हैं और बच्चों को पढ़ने का सुरक्षित माहौल मिलता है.
इसलिए ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का जवाब एफआईआर नहीं होना चाहिए. इस का जवाब होना चाहिए, स्कूल ठीक कर दिया गया है.
यही जवाब सत्ता की ताकत दिखाएगा. यही जवाब जनता का भरोसा बढ़ाएगा. और यही जवाब सीजेपी जैसे अभियानों की जरूरत भी कम करेगा.
कैमरे से नहीं, सवाल से डरना चाहिए
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने सरकार के सामने एक असहज सवाल खड़ा किया है. क्या सरकारी स्कूलों की हालत को ले कर जनता की अपनी निगरानी की कोई जगह है?
सरकार इस सवाल का जवाब केवल राजनीतिक बयान से नहीं दे सकती. उसे व्यवस्था बनानी होगी. अगर सरकारी स्कूल सचमुच बेहतर हैं तो उन्हें दिखाने में डर कैसा? अगर स्कूलों में सभी सुविधाएं हैं तो सोशल आडिट से डर क्यों? अगर शिक्षा विभाग का निरीक्षण मजबूत है तो नागरिक निगरानी से परेशानी क्यों? अगर सीजेपी गलत दावे कर रही है तो सरकार तथ्य सामने क्यों नहीं रखती? और अगर कहीं स्कूल सचमुच बदहाल हैं, तो उसे स्वीकार कर ठीक करने में शर्म कैसी?
सत्ता का काम आलोचना को खत्म करना नहीं है. सत्ता का काम आलोचना की जरूरत खत्म करना है. जब स्कूल इतने अच्छे हो जाएं कि कोई भी सीजेपी कार्यकर्ता वहां जा कर कहे कि यह स्कूल सचमुच ठीक है, तब ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान अपने आप कमजोर पड़ जाएगा.
लेकिन अगर स्कूल की हालत खराब है और सवाल पूछने वालों को ही रोका जाता है तो सवाल और मजबूत होगा, क्योंकि लोकतंत्र में आवाज रोकने से सवाल खत्म नहीं होते, वे और दूर तक जाते हैं.
आखिर डर किस बात का है
सवाल आखिर वही है. अगर राजस्थान के सरकारी स्कूल शानदार हैं तो कैमरे से डर क्यों? अगर स्कूलों में सभी सुविधाएं हैं तो सोशल औडिट से डर क्यों? अगर सरकारी निरीक्षण व्यवस्था मजबूत है तो नागरिक निगरानी से परेशानी क्यों?
अगर सीजेपी गलत दावे कर रही है तो सरकार तथ्यों के साथ जवाब क्यों नहीं देती? और अगर स्कूल सचमुच बदहाल हैं तो उसे स्वीकार कर ठीक करने में शर्म कैसी?
सरकार के पास सत्ता है, संसाधन हैं, विभाग है, अधिकारी हैं और बजट है. उसे किसी सीजेपी कार्यकर्ता से बहस करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. उसे सिर्फ अपना काम दिखाना चाहिए.
विरोध करने वालों को दुश्मन सम झना आसान है. आरोप लगाने वालों पर एफआईआर करना भी आसान है. कैमरा रोकना आसान है. लेकिन स्कूल ठीक करना मुश्किल है.
स्कूल ठीक करने के लिए बजट चाहिए, टीचर चाहिए, निगरानी चाहिए, जवाबदेही चाहिए और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए. और शायद इसी वजह से इस पूरे विवाद का सब से बड़ा सवाल यही है कि क्या राजस्थान में बहस स्कूलों की हालत पर होगी या इस बात पर कि स्कूल की हालत दिखाने की इजाजत किसे है?
अगर बहस स्कूल की हालत पर होती है तो बच्चे जीतेंगे. अगर बहस केवल कैमरे और प्रवेश पर अटक जाती है तो राजनीति जीत जाएगी. और सरकार को यह तय करना है कि वह किस के साथ खड़ी होना चाहती है. बच्चों के साथ या व्यवस्था की चुप्पी के साथ?
कैमरा बंद किया जा सकता है. सोशल मीडिया की पोस्ट हटाई जा सकती है. एफआईआर दर्ज की जा सकती है, लेकिन एक सवाल को हमेशा के लिए बंद नहीं किया जा सकता.
स्कूल आखिर कब ठीक होंगे
यही वह सवाल है जिसे सीजेपी ने सड़क और सोशल मीडिया से उठा कर सत्ता के दरवाजे तक पहुंचा दिया है. और अब गेंद सरकार के पाले में है. अगर सरकार को लगता है कि सीजेपी का अभियान राजनीति है तो उसे राजनीति का जवाब राजनीति से देने के बजाय सरकारी स्कूलों की तसवीर बदल देनी चाहिए.
अगर सरकार को लगता है कि सीजेपी गलत तसवीर दिखा रही है तो वह सही तसवीर जनता के सामने रख सकती है. अगर उसे लगता है कि स्कूलों में सबकुछ ठीक है तो स्वतंत्र सामाजिक आडिट के लिए दरवाजे खोलने में उसे संकोच नहीं होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में सब से मजबूत सत्ता वह नहीं होती जो अपने आलोचकों को चुप करा दे. सब से मजबूत सत्ता वह होती है जो अपने आलोचकों को गलत साबित करने के लिए अपने काम को जनता के सामने रख सके.
आज सीजेपी स्कूल देखने निकली है, कल कोई दूसरा संगठन निकलेगा. उस के बाद कोई अभिभावक निकलेगा. फिर कोई पत्रकार निकलेगा. सवालों को रोका नहीं जा सकता. उन्हें केवल जवाब दिया जा सकता है. और सरकारी स्कूलों के मामले में वह जवाब भाषण नहीं, बदला हुआ स्कूल होना चाहिए.
बच्चों की तसवीर मत रोकिए, उन की बदहाली रोकिए. सवाल पूछने वालों को मत रोकिए, उन समस्याओं को रोकिए जिन के कारण सवाल पैदा होते हैं.
कैमरा बंद करने से सरकारी स्कूलों की दीवारें सीधी नहीं होतीं. दीवारें तब सीधी होती हैं, जब सत्ता सवालों से भागना बंद करती है और स्कूलों को सचमुच ठीक करना शुरू करती है. Social Issue




