Bihar Panchayat Election. बिहार में पंचायत चुनाव की घोषणा होते ही पूरे इलाके में चुनावी माहौल गरम हो गया. रामपुर पंचायत के गांव की गलियों से ले कर चौपाल तक हर जगह चुनाव की चर्चा होने लगी. हर उम्मीदवार जनता के बीच जा कर अपनेअपने वादे कर रहा था.

उसी पंचायत में एक राशन डीलर भी रहता था. सालों से वह सरकारी राशन की दुकान चलाता था. चुनाव आते ही उस ने मुखिया पद के लिए परचा दाखिल कर दिया. उसे यकीन था कि गांव के गरीब परिवार, जिन के राशनकार्ड उस के यहां जुड़े हुए थे, उसे अपना नेता चुनेंगे.

चुनाव से पहले उस राशन डीलर का बरताव बिलकुल अलग था. हर महीने वह राशन कार्डधारियों को फोन कर के या लोगों के जरीए बुलाता. दुकान पर बैठने के लिए कुरसियां लगवाता, मीठीमीठी बातें करता और कहता कि अगर आप लोगों का आशीर्वाद रहेगा तो गांव की तसवीर बदल दूंगा. गरीबों की सेवा ही मेरा धर्म है.

चुनाव प्रचार में उस राशन डीलर ने खूब पैसा खर्च किया. जगहजगह पोस्टर और बैनर लगवाए. गाडि़यों का काफिला चलता था. गांव में सभाएं होती थीं जहां बड़ेबड़े वादे किए जाते. लोगों को भरोसा दिलाया गया कि अगर वह मुखिया बन गया तो पंचायत के हर गरीब परिवार की जिंदगी बेहतर हो जाएगी.

लेकिन मतदान के बाद जब मतगणना हुई तो नतीजा उस राशन डीलर की उम्मीदों के बिलकुल उलट आया. जनता ने उसे नहीं बल्कि दूसरे उम्मीदवार को अपना मुखिया चुन लिया. हार का यह नतीजा उस के लिए बहुत बड़ा ?ाटका था. उसे सब से ज्यादा दुख इस बात का था कि जिन गरीबों के भरोसे वह जीत का सपना देख रहा था. उन्हीं लोगों ने उसे जिताने लायक वोट नहीं दिए.

हार के बाद उस राशन डीलर का बरताव पूरी तरह बदल गया. जो आदमी कभी गरीबों को इज्जत दे कर बुलाता था, अब वही उन से गलत बरताव करने लगा. लोगों का कहना था कि उस ने ब्लौक के कुछ मुलाजिमों से मिल कर अपने यहां से सैकड़ों गरीब राशनकार्ड वालों के नाम कटवा दिए. उन के राशनकार्ड 3 किलोमीटर दूर दूसरे गांव के एक राशन डीलर के यहां जोड़ दिए गए.

अब गांव के गरीब परिवारों की परेशानी शुरू हो गई. जेठ की कड़कड़ाती धूप हो या कड़ाके की ठंड बुजुर्ग, औरतें, अपंग और मजदूर हर महीने 3 किलोमीटर पैदल चल कर दूसरे गांव की राशन दुकान तक पहुंचते. लेकिन कई बार वहां पहुंचने पर दुकान बंद मिलती. कभी कहा जाता कि राशन अभी नहीं आया है, तो कभी अगले दिन आने को कहा जाता. कभी सर्वर डाउन होने का बहाना. कई परिवारों को 2-2 और 3-3 बार चक्कर लगाने पड़ते.

दि नभर मजदूरी करने वाले लोगों की मजदूरी छूट जाती. बुजुर्गों के पैर जवाब दे जाते. औरतें छोटे बच्चों को ले कर धूप और बारिश में पैदल चलने को मजबूर हो जातीं. गांव के बुजुर्ग रामदेव काका जब 3 किलोमीटर पैदल चल कर खाली हाथ लौटते तो रास्ते में राशन डीलर की दुकान के बाहर बैठ कर ठंडी सांस भरते.

राशन डीलर अपनी दुकान के बाहर खड़ा हो कर उन्हें देखता और कुटिल मुसकान के साथ मूंछों पर ताव देता. वह गरीबों की लाचारी में अपनी हार का बदला ढूंढ़ रहा था. कई गरीब परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया.

धीरेधीरे गांव में चर्चा होने लगी कि चुनाव हारने की नाराजगी गरीबों पर निकालना किसी भी जिम्मेदार इनसान को शोभा नहीं देता. लोगों ने सवाल उठाया कि क्या जनता को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने की सजा दी जा रही है?

लोकतंत्र में जनता जिसे चाहे उसे चुनने का अधिकार रखती है. हार और जीत चुनाव का हिस्सा है. लेकिन हार के बाद बदले की भावना रखना समाज और लोकतंत्र, दोनों के लिए खतरनाक है.

कुछ जागरूक गांव वालों ने इस मामले को अफसरों तक पहुंचाने का फैसला लिया. उन का कहना था कि सरकारी योजनाएं किसी शख्स की निजी संपत्ति नहीं होतीं. गरीबों का राशन उन का हक है किसी की कृपा नहीं. अगर किसी अफसर या जनप्रतिनिधि द्वारा हकों का गलत किया जाता है तो उस के खिलाफ आवाज उठाना हर नागरिक का फर्ज है. समय के साथ गांव के लोगों को एक बड़ी सीख मिली.

उन्होंने सम?ा लिया कि चुनाव के समय मीठी बातें करने वाला हर आदमी जनसेवक नहीं होता. सच्चा जनसेवक वही है, जो जीत और हार दोनों हालात में जनता की सेवा करता रहे बिना किसी भेदभाव और बिना किसी बदले की भावना के.

लेकिन वह राशन डीलर भूल गया था कि जुल्म की मीआद बहुत लंबी नही होती और वक्त हर नाइंसाफी का हिसाब जरूर करता है.    Bihar Panchayat Election

-बीरेंद्र कुमार खत्री

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