Village Superstition Story. उस गांव में 40 घर थे. सभी परिवार खेती और पशुपालन करते थे. इन घरों में पढ़ाईलिखाई की बेहद कमी थी. दूरदूर तक कोई स्कूल नहीं था. यहां के सभी लोग भूतप्रेत, जिन और टोनेटोटके में पूरी तरह यकीन रखते थे.
इसी गांव का नहनू एक दिन शाम ढलने के बाद अपने खेतों से घर लौट रहा था. अंधेरा काफी बढ़ चुका था. गांव को आने वाली पगडंडी में वह सरपट चला जा रहा था. पगडंडी के खत्म होते ही चौड़ा रास्ता आ जाता था, जिस में दोनों ओर सरकंडों के झुरमुट खड़े थे.
नहनू ने अपनी जेब से बीड़ीमाचिस निकाली और सुलगाने लगा. जैसे ही उस ने तीली जलाई, सरकंडों से ‘होंहों’ की आवाज आने लगी. नहनू डर कर चुपचाप खड़ा हो गया.
थोड़ी देर बाद नहनू ने देखा कि सरकंडों के पीछे से एक काली सी परछाईं रास्ते में आ कर खड़ी है. स्याह काली दिखने वाली वह परछाईं नहनू की तरफ बढ़ने लगी.
अभी भी उस परछाईं के मुंह से ‘होंहों’ की आवाज निकल रही थी.
नहनू सहम गया. उस ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘कौन है वहां?’’
परछाईं ने कहा, ‘‘मुझे उजाले से सख्त नफरत है. तू ने मेरे सामने उजाला क्यों किया?’’ कहतेकहते परछाईं ने नजदीक आ कर नहनू को अपने हाथों में उठा लिया और उसे जोरजोर से जमीन पर पटकने लगी.
काफी देर तक यही सिलसिला चलता रहा. इस में नहून का एक पैर और कुछ पसलियां टूट गईं.
नहनू हाथ जोड़ कर उस से जान बख्शने की भीख मांगने लगा.
परछाईं थोड़ी दूर जा खड़ी हुई. अब भी उस के मुंह से ‘होंहों’ की आवाज निकल रही थी.
परछाईं ऊपर से नीचे तक बिलकुल नंगी थी. शरीर एकदम काला था. उस ने नहनू को चेतावनी दी, ‘‘मैं एक जिन हूं. मुझे उजाले से सख्त नफरत है. जो भी इस गांव में अपने घर में उजाला करेगा, उसे मैं मार डालूंगा.’’
इतना कह कर वह जिन सरकंडों के झुरमुट में घुस गया.
बेचारा नहनू डर से कांप रहा था. अपनी टूटी टांग को घसीटता हुआ वह गांव की ओर भाग लिया.
गांव में जिस ने भी सुना, नहनू के घर की तरफ दौड़ पड़ा.
गांव में एक 70 साला हरजी बाबा था, जो झाड़फूंक करता था. लोगों के मुताबिक, उस के सिर पर भैरों आते थे. हर दीवाली और दशहरे को उस के घर झाड़फूंक कराने वालों का तांता लग जाता था.
बाबा को नहनू के घर बुलाया गया. उस ने आते ही एक लोटे में पानी मंगवाया. अपनी उंगलियां उस ने लोटे में डालीं और कुछ बुदबुदाने लगा.
लोटे से पानी ले कर उस ने नहनू के ऊपर छिड़का, बाकी पानी को उस ने नहनू के घर के दरवाजे पर छिड़क दिया.
वहां खड़े सभी लोगों के चेहरों पर डर साफ देखा जा सकता था.
आखिरकार गांव के एक आदमी ने बाबा से पूछा, ‘‘माजरा क्या है?’’
बाबा ने घर में चारों ओर नजर दौड़ाई और कहने लगा, ‘‘नहनू, आज तू बच गया. जब तुझे जिन पटक रहा था, मुझे तो तभी पता लग गया था. उसी समय मैं ने भैरों को वहां भेज दिया था, तभी तेरी जान बची है.’’
फिर बाबा थोड़ी देर के लिए चुप हो गया.
उस आदमी ने फिर पूछा, ‘‘बाबा, आज तो यह घटना नहनू के साथ हुई है, कल किसी और के साथ भी हो सकती है. इस का कोई इलाज तो होगा?’’
‘‘उस ने नहनू से कह तो दिया कि उसे उजाले से नफरत है. इस जिन का इस योनि में अभी समय बाकी है. जब तक इस का समय पूरा नहीं हो जाता, इस को भगाने का कोई तरीका नहीं है.
‘‘अब सभी को थोड़ी सावधानी बरतनी होगी. अंधेरा होते ही कोई घर से बाहर न निकले. अपने घर में रात को दीया मत जलाओ. चूल्हे का काम दिन में ही कर लिया करो. अगर जिन से कभी तुम्हारा सामना हो जाए, तो उस से बिना बात किए दूसरी जगह चले जाओ.
‘‘जिन इनसान को तभी परेशान करता है, जब उस की बात न मानी जाए. वह अगर किसी रात तुम्हारे घर में भी घुस आए, तो उस से बात मत करना. वह जो भी खाए, खाने दो. वह जो भी करे, करने दो. फिर वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ेगा,’’ हरजी बाबा ने सभी को सावधान करते हुए अपनेअपने घर जाने का इशारा किया.
60-70 के दशक में गांवों में भूतप्रेत या जिन के किस्से आम थे. तरहतरह की गलतफहमियां और अंधविश्वास की जड़ें मजबूती से लोगों के दिमाग में बस गई थीं. कई लोग तो यहां तक कहते थे कि अगर किसी भूत या जिन का दिल किसी औरत पर आ जाए, तो वह आम इनसानों की तरह उस के साथ रहता है.
इस बात को और मजबूत करते हुए कई लोग कहते थे कि फलां गांव में तो एक औरत से भूत के बच्चे भी पैदा हो गए थे.
भादोें का महीना था. दिन में बारिश भी खूब हुई थी. गांव में जगहजगह पानी भर गया था. घनघोर अंधेरी रात में झुंगुरों की आवाज ने माहौल को और भी डरावना बना रखा था. काली रात ऐसी लग रही थी मानो निगल जाएगी.
ऐसे में गांव के आखिरी छोर पर राजंती अपने कच्चे घर में किवाड़ बंद कर के सोने की कोशिश कर रही थी. उस का पति धरमू आज भैंस लेने मेले में गया था. रात को वह रास्ते में अपने एक रिश्तेदार के पास ही रुक गया था.
बादलों की गड़गड़ाहट से राजंती मन ही मन घबरा रही थी. वह अभी सोई भी नहीं थी कि कहीं से ‘छपछप’ की आवाजें आने लगीं. उस ने सोचा कि कोई कुत्ता या दूसरा जानवर रास्ते में भरे पानी से हो कर जा रहा होगा.
थोड़ी ही देर बाद उस के दरवाजे पर ‘खटखट’ की आवाज आई. राजंती ने सोचा कि शायद मेले से उस का पति लौट आया है. खड़ी हो कर उस ने किवाड़ खोल दिए. देखा तो सामने लंबे कद की एक भयानक सी दिखने वाली परछाईं खड़ी थी.
राजंती को समझाते देर न लगी कि वह जिन है. वह चुपचाप सहमी सी खड़ी रही. जिन के मुंह से ‘होंहों’ की आवाज आने लगी. डर के मारे राजंती थरथर कांप रही थी.
थोड़ी देर बाद जिन बोला, ‘‘मेरे लिए दूधघी लाओ.’’
राजंती बिना देर किए दूध और घी निकाल लाई. जिन तेजी से दूधघी खाने लगा. खाने के बाद वह राजंती की तरफ बढ़ा. उस ने दोनों हाथों से राजंती को बांहों में कस कर पकड़ लिया.
राजंती डर के मारे बेहोश हो गई. काफी रात बीत जाने के बाद राजंती को होश आया. उस का शरीर दर्द से फटा जा रहा था. उस का अंगअंग दुख रहा था.
राजंती समझ गई कि जिन ने उस के साथ मुंह काला किया है. रातभर वह सहमी सी अपने घर में बैठी रही. उस की आंखों से नींद कोसों दूर थी.
सुबह होते ही राजंती हरजी बाबा के पास गई. उस के कपड़ों में कालेकाले निशान बन गए थे. बाबा के पास पहले से ही काफी भीड़ थी. राजंती ने जिन के अपने घर आने की बात बताई, लेकिन अपने साथ किए गलत काम की बात उस ने छिपा ली.
बाबा ने कहा, ‘‘तू ने बहुत अच्छा किया राजंती, जो जिन को दूधघी खिला दिया और उस का विरोध नहीं किया, नहीं तो जाने क्या अनर्थ हो जाता.’’
उसी गांव का बसंता अपने जमाने का नामी पहलवान रह चुका था. अच्छा खाना और कसरत करना शुरू से उस का शौक था. 55 साल की उम्र में भी उस का शरीर 30 साल के जवान जैसा था.
बसंता ने कभी जिन की बातों पर यकीन नहीं किया. वह लोगों से कहता था, ‘यह बस मन का वहम है. अगर सचमुच जिन है भी, तो कभी मुझे मिला तो उस से कुश्ती जरूर लड़ूंगा. मैं किसी भूतजिन से नहीं डरता.’
और वाकई वह डरता भी नहीं था. कई बार अंधेरा होने के बाद वह गांव में 2-3 चक्कर लगा कर आता था. बीचबीच में लोगों से पूछता भी जाता था, ‘किसी के घर में अगर जिन आ गया हो, तो मुझे बताओ. मैं उसी की तलाश में घूम रहा हूं.’
पिछले 2 महीनों की अंधेरी रातों में जिन गांव की 10 औरतों की इज्जत लूट चुका था. लाजवश किसी भी औरत ने इस की चर्चा एकदूसरे से नहीं की. एक खास बात यह होती कि जिस भी औरत के साथ जिन सैक्स करता, उस के कपड़ों पर अजीब से काले धब्बे बन जाते थे.
उस दिन घनघोर काली अमावस्या की रात थी. सरवण और उस की पत्नी लाली ने दिनभर खलिहान में काम किया था. दोनों थके हुए थे. सरवण को बाहर बैठक में जल्दी ही नींद आ गई. लाली अंदर सो रही थी.
अचानक सरवण की नींद खुल गई. उस ने देखा कि काला जिन उस की बैठक में से होते हुए घर में घुस रहा है.
सरवण डर के मारे कांप रहा था, मगर चुपचाप बिस्तर में ही दुबका रहा.
अंदर पहुंच कर जिन वही ‘होंहों’ की डरावनी आवाज करने लगा. उस से लाली की नींद टूट गई.
लाली हड़बड़ा कर उठी. डर से वह कांप रही थी. इस सर्द रात में भी उसे पसीना आ गया. जिन ने लाली से भी दूधघी की फरमाइश की. लाली ने तुरंत घर में रखी दूध और घी की मटकी ला कर उस के सामने रख दी और एक ओर खड़ी हो गई.
खाने के बाद जिन ने वही किया, जो उस ने बाकी औरतों के साथ किया था. फिर वह तेजतेज कदमों से घर में से निकल कर बैठक में से हो कर बाहर जा रहा था. अचानक बैठक में रखी ओखली में उस का पैर फंस गया और वह धड़ाम से नीचे गिरा.
सरवण अधखुली आंखों से यह सब देख रहा था. उसे खटका हुआ. उस के दिमाग में हलचल हुई. जिन में तो दैवीय ताकत होती है, वह एक साधारण ओखली में फंस कर कैसे गिर सकता है.
सरवण बिजली की फुरती से उठा और सिरहाने रखी लाठी को उठाया. न जाने उस में उस समय बला की फुरती कहां से आ गई थी. उस ने आव देखा न ताव, जिन की खोपड़ी पर पूरी ताकत से लाठी दे मारी.
इस हमले से जिन संभल नहीं पाया और धड़ाम से गिर कर बेहोश हो गया. लाली भी भाग कर वहां आ गई और चीखने लगी.
थोड़ी ही देर में आसपड़ोस के लोग वहां जमा हो गए. लाली अंदर से दीया जला कर ले आई. उस रोशनी में लोगों ने देखा कि जिन की खोपड़ी से खून की तेज धार निकल रही है.
लोगों ने ध्यान से देखा, तो चेहरा कुछ जानापहचाना सा लगा. उस के सारे शरीर पर कालिख पुती हुई थी. लोगों ने उस के ऊपर बालटी भर पानी डाला.
कालिख उतरने के बाद लोगों की हैरानी का ठिकाना नहीं रहा. सरवण के मुंह से निकला, ‘‘अरे, यह तो अपने ही गांव का बसंता है.’’
अब बसंता को धीरेधीरे होश आ रहा था. उस का सिर चकरा रहा था और वह दर्द के चलते कराह रहा था. लोगों ने उसे उठा कर गांव की चौपाल पर लिटा दिया. जब उसे पूरी तरह होश आ गया, तो लोगों ने उसे पीटना शुरू कर दिया. उसे पीटपीट कर अधमरा कर दिया. उस पिटाई में उस का एक हाथ और एक पैर भी टूट गया था.
बसंता लोगों से अपनी जिंदगी बख्शने की भीख मांग रहा था. बोलतेबोलते उस का गला सूखा जा रहा था. उस ने हाथ जोड़ कर पानी देने की मिन्नत की.
थोड़ी देर बाद बसंता के दोनों बेटे भी वहां आ गए. उन्होंने लोगों से कहा कि बसंता ने जो गुनाह किया है, उस की सजा के लिए इसे पुलिस के हवाले कर देना चाहिए. वहीं इसे अपने किए की सजा मिलेगी. गांव के लोग बसंता को सुबह पुलिस के हवाले करने पर राजी हो गए.
गांव के एक आदमी ने राय दी कि पहले इस से यह तो पूछो कि इस जुर्म में और कौनकौन इस के साथ शामिल हैं. सभी ने इस का समर्थन किया और बसंता से सख्ती से पूछने लगे.
बसंता कहने लगा, ‘‘मेरी पत्नी को मरे हुए 7 साल हो गए. दिमाग में गलत विचारों ने घर बना लिया था. मैं औरत के लिए तरस गया था. एक दिन मैं ने इस की चर्चा हरजी बाबा से की, तो उस ने ही मुझे यह रास्ता बताया. सारी योजना उसी की थी.
‘‘तय यह हुआ था कि डर की वजह से जब सब लोग अपने खलिहानों में नहीं जाएंगे, तो मैं अनाज की चोरी कर के उसे बेच दूंगा. उस का आधा हिस्सा हरजी लेगा.
‘‘मैं रोज तुम्हारे खलिहानों से अनाज चुरा कर बेच देता था और उस का आधा हिस्सा हरजी को पहुंचा देता था.
‘‘इसी डर की आड़ में मैं अपनी सैक्स की इच्छा पूरी कर लेता था. गांव में हरजी ने ही लोगों में डर फैलाने में अहम भूमिका निभाई थी. मैं उस के इशारों पर ही काम कर रहा था,’’ कहतेकहते बसंता फूटफूट कर रोने लगा.
दूसरे दिन गांव में पुलिस आई. उस ने बसंता के बाड़े की तलाशी ली. वहां से एक मटकी कालिख की मिली, जिसे बसंता जिन बनने से पहले अपने शरीर पर पोतता था. 5 हजार रुपए नकद और भूसे में कुछ अनाज की चुराई हुई बोरियां भी मिलीं.
पुलिस बसंता को पकड़ कर ले गई. उस पर मुकदमा चलाया गया. अपनी बदनामी के डर से गांव की किसी भी औरत ने अपने साथ हुए गलत काम की शिकायत नहीं की. इसलिए बसंता को सिर्फ चोरी के केस में 3 साल की सजा हो गई. हरजी को जुर्म में साथ देने की वजह से एक साल की सजा हुई. Village Superstition Story




