Women Entrepreneurship. गजल अलध वह कामयाब लड़की है, जिसे लोग उस के नाम से नहीं, बल्कि उस की कंपनी के प्रोडक्ट्स के नाम मामाअर्थ से जानते हैं. बेबी केयर से शुरू हुआ यह सफर हैल्थ से होता ब्यूटी केयर तक यों ही नहीं पहुंचा, बल्कि इस के पीछे गजल की भीड़ का हिस्सा न बन कर अपनी अलग पहचान बनाने की धुन है.
2 सितंबर को 38 साल की हो रहीं गजल का जन्म गुरुग्राम के एक खातेपीते परिवार में हुआ था. उन के पिता कैलाश साहनी कारों के स्येयर पार्ट्स के विक्रेता थे.
पंजाब यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर एप्लीकेशन की बैचलर डिगरी लेने के बाद गजल ने आगे की पढ़ाई न्यूयौर्क एकेडमी औफ आर्ट में की. साल 2008 में गजल ने एक कंपनी में बतौर कार्पोरेट ट्रेनर की नौकरी की जहां उन्हें एक दिन के काम के एवज में 1,200 रुपए मिलते थे.
जल्द ही गजल को समझ आ गया कि अगर नाम और पैसा कमाना है, तो अपना खुद का बिजनैस करना ज्यादा बेहतर होगा. लिहाजा उन्होंने डाइट एक्सपर्ट डौट कौम नाम की वैबसाइट शुरू कर दी जो लोगों को उन के वजन और उम्र के हिसाब से डाइट प्लान बताती थी.
साल 2011 में विरुण अलध से शादी होने के बाद उन्हें एक बेटा हुआ, लेकिन वह स्किन एलर्जी से पीडि़त था. एक समझदार मां की तरह गजल भी चाहती थीं कि बेटे की स्किन एलर्जी दूर करने ऐसे प्रोडक्ट इस्तेमाल किए जाएं, जिन में कैमिकल न हों. जब ऐसे यानी कैमिकल फ्री प्रोडक्ट उन्हें नहीं मिले, तो उन्होंने 2016 में खुद की कंपनी बना डाली. जो शुरू में बेबी प्रोडक्ट्स ही बनाती थी लेकिन बाद में ब्यूटी और हैल्थ केयर के भी प्रोडक्ट बनाने लगी.
मामाअर्थ के प्रोडक्ट्स में कुछ तो बात थी जो वे ग्राहकों को इतने पसंद आए कि कंपनी लगातार तरक्की करती रही और आज उस का नैटवर्थ यानी कुल कारोबार 10,000 करोड़ रुपए से भी ज्यादा है.
भीड़ से अलग होने के माने
महज 10 साल में गजल ने जो कारनामा कर दिखाया वह बेहद गैरमामूली है जो उन्हें भीड़ से एक अलग पहचान देता है. अगर वह कार्पोरेट की अपनी नौकरी से ही संतुष्ट हो जातीं तो तय है कि वहीं कहीं जौब कर रही होतीं. लेकिन बेटे की एलर्जी के चलते उन्होंने कैमिकल फ्री प्रोडक्ट की जो मुहिम शरू की वह एक बहुत बड़ी मिसाल के तौर पर सामने है.
यानी भीड़ से अलग पहचान बनाने वाली लड़कियां कोई समझाता नहीं करती हैं. वे अलग हट कर न केवल सोचती हैं, बल्कि उस पर अमल भी करती हैं. उन की अपनी अलग सोच होती है और वे आने वाले कल के लिए सही रास्ता चुनती हैं. यह स्मार्ट लड़कियों की पहचान है. हर लड़की कामयाब होना चाहती है और जिंदगी में ऐसा कुछ कर दिखाना चाहती है, जिस की तारीफ दुनिया करे और उस की मिसाल दे.
भीड़ का मतलब रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और किसी भी पब्लिक प्लेस पर इकट्ठा हुजूम से नहीं होता. भीड़ का हिस्सा हो जाने का सीधा सा मतलब होता है न नया कुछ सोच पाना न लीक से हट कर कुछ कर पाना, जबकि यह जज्बा हर उस लड़की में होता है जो घर, समाज और धर्म के उसूलों के बोझ से दबी रहती है. लेकिन उन से बगावत करने की हिम्मत उस में नहीं होती.
जाहिर है यह अपने वजूद और ख्वाहिशों की बलि दे देने जैसा सम?ाता होता है. दूसरों के बनाए रास्तों पर चलना, जो है सो है, जैसी सोच और किस्मत में यही लिखा है तो हम क्या कर लेंगे जैसी बातें स्मार्ट बनने के रास्ते में बड़ी रुकावटें हैं. इन से नजात पाए बिना स्मार्ट बनना नामुमकिन है.
बचें धर्म और सोशल मीडिया की भीड़ से
लड़कियां कहां मात खाती हैं, जिस के चलते भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाती हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ा जाए तो साफ नजर आता है कि 99 फीसदी से भी ज्यादा लड़कियां अपनी जिंदगी का सुनहरा वक्त धर्म और सोशल मीडिया पर बरबाद कर रही हैं. ये दोनों ही उन्हें पिछड़ा रखने की साजिशें हैं. एक बार जो लड़की इन के जाल में फसी तो फिर बाहर नहीं निकल पातीं.
ज्यादातर लड़कियां सोशल मीडिया पर नाचगाने की रील्स शेयर कर सोचती हैं कि उन्होंने नया ऐसा कुछ कर दिखाया है जो उन्हें अलग पहचान और मुकाम देगा, लेकिन हकीकत यह है कि उन्हें न तो कोई पहचानता और न ही इस से उन्हें कुछ हासिल होता. हां, फुजूल के इस काम में वक्त और पैसा तो बरबाद होता ही है, बतौर बोनस कैरियर बनने के पहले ही मिट जाता है.
अपनी आपबीती सुनाते हुए भोपाल की अर्चना यादव (बदला हुआ नाम) बताती है कि वह विदिशा से यहां नर्सिंग का कोर्स करने आई थी. पेरेंट्स ने इधरउधर से पैसे जुगाड़ कर उस की फीस भरी थी और रहने, खानेपीने का इंतजाम यह सोचते हुए किया था कि बेटी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी तो शादी भी अच्छे घर में हो जाएगी. लेकिन भोपाल आ कर अर्चना पढ़ाईलिखाई और कैरियर बनाने के अपने मकसद से भटक गई, क्योंकि उसे रील बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड करने का चसका लग गया.
शुरू में अच्छा रिस्पौंस मिला तो वह रोज रोज रील डालने लगी नतीजतन, वह फर्स्ट ईयर में ही फेल हो गई. अब अर्चना एक माल के कपड़ों के शोरूम में 15,000 रुपए महीने पर सेल्स गर्ल की नौकरी कर रही है. उस के सपने चूरचूर हो चुके हैं. अब वह सभी लड़कियों को नसीहत देते कहती है कि सोशल मीडिया की भीड़ से बच कर ही अपनी अलग पहचान और मुकाम बनाने का ख्वाब पूरा हो सकता है.
सोशल मीडिया से भी पहले लड़कियां धर्मकर्म की भीड़ का हिस्सा बन कर अपना आने वाला कल बरबाद कर रही हैं. कलश यात्राओं में शामिल हो कर वे सोचती हैं कि अब ऊपर वाले का छप्पर फटा और नाम और दाम मिले. लेकिन होता उलटा है कि इस से उन्हें एक सस्ती साड़ी और भंडारे के बेस्वाद खाने के अलावा कुछ और नहीं मिलता. यज्ञहवन और पूजापाठ कराने वाले बाबा लोग और आयोजक चढ़ावे की मोटी रकम समेट कर चलते बनते हैं और ये हाथ मलती रह जाती हैं.
ऐसे बनें स्मार्ट
स्मार्ट बनना कोई भारीभरकम काम नहीं है. इस के लिए बस अपने वक्त की कीमत समझते उसे तुक के कामों में लगाना आना चाहिए. बजाय सत्यनारायण की कथा और भागवत सुनने के या रील्स में कमर, कूल्हे और छातियां मटकाने जैसे फूहड़ काम करने के बजाय पढ़नालिखना चाहिए. गजल अलध की कहानी बहुत छोटे में इसी मकसद से बताई गई है कि लड़कियां उन से इंस्पायर हों. उन के जैसे बनने की कोशिश करें, उन से सीखें कि कामयाबी कोई ट्रे में रखी डिश नहीं होती जिसे गपाक से मुंह में भर लिया जाए.
कामयाबी और अलग पहचान मिलते हैं कुछ नया करने की जिद और जूनून से, लगातार मेहनत से, नया नया सोचने और करने से अपने फैसले खुद लेने से और अच्छा लिखतेपढ़ते रहने से. ऐसा करने की हिम्मत और हौसला हो तो ठीक वरना भीड़ आप का इंतजार कर रही है कि आओ और हमारा हिस्सा बन जाओ.Women Entrepreneurship




