Society . मूली की खेती कर रहे लालमन की खुशी का ठिकाना न था. उस के 3 बीघा खेत में मूली की बंपर पैदावार हुई थी. उस ने रात को नहर का पानी ला कर उखाड़ी हुई मूली साफ कर के अपने खलिहान में जमा कर ली. अगली सुबह एक बिचौलिया ट्रक ले कर आया. वह उस मूली, जो तकरीबन डेढ सौ किलोग्राम थी, की कीमत नकद दे गया.

10 रुपए  प्रति किलो कीमत पा कर लालमन खुशी से झूम उठा. बैठेबैठे ही उस को रुपया मिल गया था.

लालमन की बहन महानगर में रहती थी. वह वहां मजदूरी करती थी. उस ने लालमन को फोन कर के कहा कि महानगर में मूली 50 रुपए प्रति किलो मिल रही है. कुछ मूली उखाड़ कर रख देना. 2 दिन बाद गांव आ कर ले जाऊंगी.

यह सुनते ही लालमन की खुशी और सुकून दोनों काफूर हो गए. उस के पास मूली की रकम का न तो कोई कागज था न कोई पक्का बिल. वह किस सुबूत की बुनियाद पर बताता कि बिचौलिए ने उसे बेवकूफ बनाया है.

लालमन जैसे लाखों भोलेभाले किसान इसी तरह बिचौलियों के शिकार बन कर हर मौसम में नुकसान ?ोलते हैं. जहां एक ओर खेती का जबरदस्त बाजारीकरण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर खेती में जुड़े एक बड़े वर्ग को इस का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है.

आज उत्पादन और उपादान की संरचना में बदलाव आया है. खेती का ढांचा भी बदला है. आंकड़े बताते हैं कि आज भारत में 81 फीसदी किसान 2 हैक्टेयर से भी कम जोत पर खेती करते हैं. ऐसे ही छोटे किसान भारत की सारी खेती के  तकरीबन 55 फीसदी हिस्सेदार हैं.

किसानों को मिलने वाली माली मदद, सुविधा, योजना का फायदा इन तक कभी पहुंच ही नहीं पाता है. कारण यह कि सरकारी और गैरसरकारी कृषि केंद्रित संसथाओं के प्रमुख टारगेट बड़े किसान ही होते हैं. छोटा और सामान्य किसान इसी तरह अनेक तरह के धोखे ?ोल रहा है. बाजार भी जानबू?ा कर इन छोटे किसानों की समस्या और पुकार को नजरअंदाज कर देता है.

उत्तराखंड के एक किसान की खबर छपी थी. उस किसान ने 3 बीघा में बहुत मेहनत कर के कीवी का उत्पादन किया था। कीवी की बेल के नीचे खाली जगह पर हरी मिर्च भी उगाई थी. उसे ‘मौसम का खौफ’, ‘पहाड़ की सड़क टूट रही है’ जैसे तरहतरह के डर दिखा कर एक बिचौलिया 4 रुपए प्रति कीवी के हिसाब से 2,000 कीवी की तुड़वाई कर के हाथोंहाथ ले गया.

वह तो बाद में खुलासा हुआ कि खुदरा बाजार में उस प्रजाति का कीवी फल 20 से 25 रुपए का एक बिक रहा था. छोटा और मजबूर किसान हाथ मलता ही रह गया.

पहाड़ में एक घर से दूसरे घर की दूरी भी किलोमीटर में हो सकती है. इस कारण वह किसान किसी दूसरे कीवी किसान से संपर्क ही न कर सका कि फल की असली कीमत क्या चल रही है.

वह तो उस किसान के खेत में हरी मिर्च की पैदावार बढि़या हुई. उस ने खुदरा बाजार में 40 रुपए प्रति किलो के हिसाब से वह हरी मिर्च बेच कर कुछ कमाई कर ली, तो सीजन के 3 महीने उसे राशन पानी मिल गया वरना मुश्किल हो जाती.

पिछले कई सालों में भारत की खेतीबारी में अनेक खास बदलाव हुए हैं. इन पर नीति निर्धारकों और गैरसरकारी संगठनों किसी ने गौर नहीं किया है. लाखों की तादाद में छोटे किसान एकदम पारंपरिक खेती कर रहे हैं. वे बैलों की जोड़ी रखते हैं. बैलगाड़ी भी चलाते हैं. मौसम के हिसाब से फसल बोते हैं और खलिहान उन के पास हैं ही नहीं.

जो बहुत बड़े किसान है उन के पास सब्सिडी लेने, कर्ज लेने, बाजार को प्रभावित करने के बहुत सारे उपाय और उपकरण हैं,  मगर जो किसान एक मौसम में केवल 10 बोरी प्याज उगा रहा है, वह केवल ठगी का शिकार हो रहा है. उसे न कभी मुफ्त बीज मिला, न खाद मिली. खेतीबारी को और असरदार बनाने के लिए इस तरफ गौर करना बहुत जरूरी है. Society

लेखक : संदीप पांडे ‘शिष्य’

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