Social Issue. बिहार विधानसभा का साल 2027-27 बजट सत्र वैसे तो अलगअलग विभागों के जमाखर्च, कामकाज और सालाना रिपोर्ट के लिए आयोजित था, मगर इस सत्र में सब से दिलचस्प चर्चा इस पर हुई कि सांप को पालतू मानें या जंगली?

आमतौर पर हम सांप को जंगली ही मान कर चलते आए हैं. हालांकि, कभीकभार यह घरों में भी निकल आता है, जिस से अफरातफरी मच जाती है. 10 फरवरी को विधानसभा के पहले सत्र की कार्यवाही की शुरुआत में ही भाजपा विधायक जीबेश मिश्रा ने यह सवाल पूछ सनसनी फैला दी कि ‘महोदय, विभाग के मंत्री यह बताएं कि सांप पालतू है या फालतू है या जंगली जानवर?’

बिहार सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के मंत्री प्रमोद कुमार ने जैसे ही कहा कि सांप जंगली जानवर की श्रेणी में आता है, जीबेश मिश्रा ने अगला सवाल दाग दिया, ‘तो फिर सर्पदंश से मरने वाले लोगों को उतना मुआवजा क्यों नहीं मिलता, जितना वन्य प्राणियों से मौत की स्थिति में मिलता है? अभी बिहार में वन्य प्राणियों की वजह से मरने वालों को वन विभाग 10 लाख रुपए का मुआवजा देता है, जबकि सर्पदंश से मरने वालों के लिए आपदा प्रबंधन विभाग की तरफ से सिर्फ 4 लाख रुपए का मुआवजा मिलता है?’

उन के इस जरूरी सवाल पर सदन हैरान रह गया कि उन्हें इस विषय में कोई विशेष जानकारी नहीं थी. हालांकि, जीबेश मिश्रा के इस पूरक सवाल से यह साफ हो गया कि उन के इस सवाल का मकसद बिहार में सर्पदंश के शिकार लोगों को 10 लाख रुपए का मुआवजा दिलाना था. उन की इस बात का विधानसभा में कई सदस्यों ने समर्थन किया.

जीबेश मिश्रा ने अपनी बात के समर्थन में सदन को यह भी जानकारी दी कि 3 मार्च, 2020 को बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत सुशील कुमार मोदी ने इसी सदन में स्वीकार किया था कि वे सांप को वन्य प्राणी की श्रेणी में रखते हुए सर्पदंश का शिकार लोगों को 10 लाख रुपए का मुआवजा दिलवाएंगे. तब सुशील मोदी के पास पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की जिम्मेदारी भी थी. मगर इस के बावजूद सरकार ने इस मांग को पूरा नहीं किया है.

बात यहीं पर नहीं रुकी. जब बिहार विधानसभा में यह मुद्दा कई बार उठा तो विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने 17 फरवरी को अपने कक्ष में संबंधित विधायकों, मंत्री और विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की एक बैठक बुलाई. वहां उन्होंने सभी विधायकों की तरफ से इस मामले को अतिरिक्त मुख्य सचिव आनंद किशोर के सामने रखा और कहा कि पहले के मंत्री के आश्वासन को पूरा किया जाना चाहिए. हालांकि, आनंद किशोर ने साफतौर पर इसे पूरा कराने का भरोसा नहीं दिलाया, वे सिर्फ यही कहते रहे कि वे इस मामले को दिखवाएंगे.

कुलमिला कर यह सवाल कि सांप जंगली जानवर है या नहीं और अगर है तो सर्पदंश के शिकार लोगों को वन्य प्राणी की वजह से हुई मौत के बराबर मुआवजा क्यों नहीं मिलता, बड़ा मुद्दा बन गया है. पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के आश्वासन को लागू कराने को अभियान बना लिया गया है. वे इस अभियान में कितने सफल होंगे, यह देखने की बात होगी.

क्यों सर्पदंश के शिकार लोगों को मुआवजा नहीं देता वन विभाग?

दरअसल, सच तो यह है कि केरल को छोड़ दें तो देश के किसी राज्य में सर्पदंश के शिकार लोगों को वन विभाग मुआवजा नहीं देता. केरल में भी इस मुआवजे की राशि सिर्फ एक लाख रुपए है. बिहार और केरल के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, ओडिशा और मणिपुर में सर्पदंश से मरने वाले लोगों के लिए मुआवजे का प्रावधान अलगअलग विभागों द्वारा है. हालांकि, मुआवजे की राशि 20,000 से अधिकतम 4 लाख तक ही है. यह जानकारी केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के एक हालिया दस्तावेज के आधार पर है.

बिहार सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने तय किया है कि वह वन्य प्राणियों में सिर्फ बाघ, तेंदुआ, हाथी, भालू, गौर, जंगली सूअर, लकड़बग्घा, सियार, भेडि़या, गैंडा, जंगली कुत्ता, मगरमच्छ और घडि़याल के द्वारा शारीरिक क्षति पहुंचाए जाने के हालात में ही मुआवजा देगी. विभाग इनसानों की मृत्यु या स्थायी अक्षमता की स्थिति में 10 लाख रुपए, गहरी चोट के हालात में 1.44 लाख रुपए और हलकी चोट के हालात में 24,000 रुपए का मुआवजा देता है.

यह प्रावधान पालतू पशुओं के मारे जाने पर भी है. अगर इन जानवरों की वजह से भैंस, गाय या बैल की मृत्यु होती है तो 24,000 मिलते हैं. भेड़बकरा की मौत पर 4,800 और बकरी की मृत्यु पर 7,200 रुपए के मुआवजे का प्रावधान है.

इस बात का जिक्र विभाग के मंत्री अरुण कुमार ने भी बिहार विधानसभा में किया है. मगर इस अभियान से जुड़े विधायक इस बात से संतुष्ट नहीं हैं और वे 13 जानवरों की इस सूची में सांप का नाम भी जुड़वाना चाहते हैं.

आखिर इस सूची में सांप का नाम क्यों नहीं है? इस सवाल पर विभाग का कोई अधिकारी बयान देने के लिए तैयार नहीं है. मगर अनौपचारिक बातचीत में वे कहते हैं, ‘‘सांप की स्थिति इन 13 जानवरों से बिलकुल अलग है. जिन 13 जानवरों की वजह से मौत की स्थिति में हम मुआवजा देते हैं, वे पूरी तरह जंगलों में रहते हैं. अगर वे किसी वजह से मानव बस्ती में जाते हैं और वहां किसी की मौत होती है, तो यह असामान्य स्थिति है, इसलिए हम मुआवजा देते हैं.

‘‘मगर सांप की स्थिति बिलकुल अलग है. वह मानवीय बस्तियों में भी रहता है और वहां हमारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं है. चूंकि बाढ़ के मौसम में ज्यादातर सर्पदंश के मामले आते हैं, इसलिए उन से मरने वालों को आपदा प्रबंधन विभाग मुआवजा देता है.’’

वे यह भी कहते हैं, ‘‘वन्य जीवों में शामिल होने के कारण सांप को मारना भी अपराध है और उस के हिसाब से सजा का प्रावधान है. मगर कोई सांप को मारता है, तो उस मामले में भी हम दखल नहीं देते. क्योंकि सामाजिक स्थितियां अलग हैं. इसलिए सांप को हम ने इस सूची से अलग रखा है.’’

वन विभाग से जुड़े एक्सपर्ट भी मानते हैं कि सांप को उस श्रेणी में नहीं रखना चाहिए, जिस में मृतकों को 10 लाख रुपए दिए जाने का प्रावधान है.

वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट औफ इंडिया के चीफ इकोलौजिस्ट समीर कुमार सिन्हा कहते हैं, ‘‘सांप की स्थिति बिलकुल अलग है. वह वन्य प्राणियों की सूची में तो है, मगर उस का हम से सामाजिक जुड़ाव भी है. इनसानों का सांप से भावनात्मक रिश्ता है. उसे पूजा भी जाता है. वह हमारी बस्तियों में रहता है. मेरे खयाल से इस रिश्ते को इसी रूप में रहने देना चाहिए.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘सर्पदंश का मामला वन विभाग से अधिक स्वास्थ्य विभाग का है. बिहार में बड़ी संख्या में सर्पदंश के शिकार लोगों की मौत सिर्फ इस वजह से हो जाती है कि उन्हें समय से इलाज नहीं मिलता. अस्पतालों में एंटी वेनम की उपलब्धता नहीं होती, इसलिए सर्पदंश की वजह से मौत के मामले में मुआवजा राशि बढ़ाने से ज्यादा जरूरी ग्रामीण अस्पतालों तक एंटी वेनम की निरंतर उपलब्धता है. मरने वालों को मुआवजा देने से ज्यादा जरूरी लोगों को बचाना है.’’

समीर सिन्हा की बातों में वजन है. यहां लगातार ऐसी खबरें आती हैं कि समय से एंटी वेनम का इंजैक्शन नहीं लगने की वजह से सर्पदंश के शिकार शख्स की मौत हो गई. पिछले साल जून महीने में भी गोपालगंज के एक नौजवान मुन्ना यादव की मौत इसी वजह से हो गई. उन्होंने सर्पदंश के बाद पंचदेवरी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया. वहां एंटी वेनम नहीं था. उसे वहां से 50 किलोमीटर दूर गोपालगंज के सदर अस्पताल भेज दिया गया. रास्ते में ही उस की मौत हो गई.

बिहार सरकार हर साल दावा करती है कि बाढ़ के दौरान हर प्रभावित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एंटी वेनम पहुंचा दिया गया है. मगर हर साल यह दावा फेल हो जाता है. स्नेक रैस्क्यूअर और वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट अभिषेक कहते हैं, ‘‘मसला सिर्फ एंटी वेनम का नहीं, जांच की सुविधा का भी है. सर्पदंश की ज्यादातर घटनाएं गांवदेहात के इलाकों में होती हैं और इन इलाकों के अस्पतालों में न एंटी वेनम होता है, न जांच की सुविधा.

‘‘सर्पदंश के बाद अमूमन 3 घंटे का समय होता है, किसी को बचाने के लिए. ऐसे में या तो लोग ओ?ा की शरण में जाते हैं या बड़े अस्पतालों की तरफ. महत्त्वपूर्ण समय इन्हीं चीजों के लिए भागदौड़ में बीत जाता है.’’

एक मामला सर्पदंश के आंकड़ों का भी है. जिस को ले कर बिहार में हमेशा भ्रम के हालात रहते हैं. राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग, जो इन मामलों में मुआवजा देता है, के मुताबिक राज्य में साल 2023-24 में सर्पदंश से मरने वाले 154 लोगों को मुआवजा दिया गया, जबकि बिहार सरकार के हैल्थ मैनेजमैंट सिस्टम के मुताबिक, अप्रैल, 2023 से मार्च, 2024 के बीच राज्य में 934 मौतें सांपों के काटने की वजह से हुईं.

इस दौरान सांपों के काटने के कारण सरकारी अस्पतालों में 17,859 मरीज इलाज के लिए आए. जुलाई, 2024 में सांसद राजीव प्रताप रूडी ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि बिहार में हर साल सांप काटने से 10,000 लोगों की मौत हो जाती है.

समीर सिन्हा कहते हैं, ‘‘इन आंकड़ों को देखें तो जाहिर है कि बिहार में सर्पदंश की वजह से मरने वाले लोगों की बड़ी आबादी वर्तमान मुआवजे 4 लाख से भी वंचित है. ज्यादातर लोग तो अस्पताल पहुंचते भी नहीं हैं, मगर जितने लोगों की मौत सरकारी अस्पतालों में होती है, उन्हें भी मुआवजा नहीं मिल पाता, इसलिए अगर ऐसे तमाम लोगों को भी आपदा प्रबंधन विभाग की तरफ से मुआवजा मिल जाए, तो यह बड़ा काम होगा.

‘‘अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसे वन विभाग की सूची में भी डाल दिया जाए. फिर भी एक बड़ी आबादी मुआवजे से वंचित ही रहेगी, इसलिए हमारी प्राथमिकता अभी अस्पतालों में एंटी वेनम की 24 घंटे उपलब्धता और सभी मृतकों को वर्तमान प्रावधान के तहत मुआवजा दिलाने की होनी चाहिए.’’ Social Issue

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