Film : उत्तराखंड के रहने वाले अक्षय बाफिला ने साल 2011 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देव डी’ के लिए साउंड रिकौर्डिस्ट के साथसाथ अमित त्रिवेदी के एसोसिएट के रूप में भी काम किया, फिर कई म्यूजिक अलबमों व ‘चितकबरे’, ‘हम तो चले लंदन’ समेत कुछ फिल्मों को अपने संगीत से संवारा.

इन दिनों अक्षय बाफिला फिल्म ‘हनीमूनाय नम:’ को ले कर चर्चा में हैं, जिसे संगीत से संवारने के साथ ही गीत भी गाए हैं और पहली बार मेन लीड किरदार भी निभाया है.

पेश हैं, अक्षय बाफिला से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की संगीत से जुड़ने की कोई खास वजह?

मेरे घर में संगीत का कोई माहौल ही नहीं है. हम तो पिथौरागढ़, उत्तराखंड के एक छोटे से कसबे के रहने वाले हैं.

वसंत का मौसम शुरू होने पर एक पतिपत्नी हमारे घर आ कर उत्तराखंड का एक लोक वाद्य यंत्र ‘हुडका’ बजाते हुए वसंत के गीत गाते थे. जब वे आते तो मैं उन के नजदीक बैठ कर ध्यान से सुनता था. उसी ने मेरे अंदर संगीत के प्रति ललक पैदा हुई थी.

फिर मैं ने ग्रेजुएशन भी संगीत में ही किया. मैं ने अल्मोड़ा भारतेंदु संगीत विद्यालय से संगीत में विशारद किया. बनारस घराने के पंडित सत्यनारायण मिश्राजी मेरे गुरु रहे हैं.

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उस के बाद में दिल्ली चला गया. वहां श्रीराम कला केंद्र में 2-3 साल तक संगीत की शिक्षा ग्रहण की. लेकिन पहली बार मेरे सामने सवाल आया कि अब क्या? संगीत में कोई अच्छी नौकरी मिलने की उम्मीद नहीं थी.

काफी सोचविचार करने के बाद मैं ने मुंबई की तरफ रुख किया. यहां मैं ने साउंड इंजीनियरिंग का कोर्स किया. इस के बाद मुझे संगीतकार अमित त्रिवेदी के स्टूडियो में ‘साउंड रिकौर्डिस्ट’ के रूप में नौकरी भी मिल गई और मुझे शान, सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल सहित कई बेहतरीन व बड़े गायकों को रिकौर्ड करने का अवसर मिला.

बतौर साउंड रिकौर्डिस्ट दूसरे गायकों के गीत रिकौर्ड करते समय आप के अंदर का गायक और संगीतकार सामने वाले गायक की गलतियों को भी पकड़ रहा होता है. उस समय आप क्या करते हैं?

मैं बिना गायक का नाम लिए आप को एक किस्सा सुनाता हूं. हर इनसान के दिमाग से यह बात निकल जानी चाहिए कि फलां सिंगर बहुत बड़े हैं, बहुत अच्छा गाते हैं, पर हम जैसा देखते या सोचते हैं, वैसा होता नहीं. मैं ने तो खुद अपने सामने अनुभव किया. एक बहुत बड़े सिंगर ने एक लाइन को एक नहीं कम से कम 50 बार रीटेक दे कर सही ढंग से गाया था. मतलब यह कि हर गाने को जिस ढंग से गाना है, वह मंजा हुआ सिंगर भी कई बार नहीं कर पाता.

क्या आप बता सकते हैं कि ‘की बोर्ड’ संस्कृति ने संगीत या गायकों को कितना फायदा या कितना नुकसान पहुंचाया है?

इन दिनों तो ‘की बोर्ड’ यानी म्यूजिक प्रोग्रामिंग से ही 90 फीसदी गाने बनते हैं. पहले हर गाने की रिकौर्डिंग के समय बहुत सारे म्यूजिशियन यानी ढोलक, सारंगी सहित हर वाद्य यंत्र बजाने वाला बैठता था, पूरा आर्कैस्ट्रा इकट्ठा होता था. एक गाने का माहौल बनता था. फिर पूरे तालमेल के साथ गाना रिकौर्ड होता था.

उस संगीत में इनसानी हाथों की छाप होती थी, पर अब तो यह हो रहा है कि ‘की बोर्ड’ पर बैठ कर मैं अकेले ही संगीत बना रहा हूं, अच्छा या खराब सारे फैसले मैं अकेले ही ले रहा हूं. मैं खुद ही गा भी रहा हूं, गायक की भी जरूरत नहीं. पर इस तरह के गाने में भाव नहीं होते हैं. ऐसे गाने जल्दी ही भुला दिए जाते हैं.

अब तो आप संगीतकार के साथसाथ एक्टर भी बन गए हैं. यह कैसे हुआ?

फिल्म ‘हनीमूनाय नम:’ को ले कर कुछ लोग सम?ाते हैं कि मैं ने आपदा में भी अवसर ढूंढ़ लिया, जबकि यह मेरा फैसला नहीं है. इस फिल्म के डायरैक्टर निशांत भारद्वाज से मेरा अच्छा परिचय रहा है. कोविड से कुछ दिन पहले उन्हें एक तमिल फिल्म के डायरैक्शन की जिम्मेदारी मिली थी, जिसे वे उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में फिल्माना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने मु?ो भी अपने साथ चलने के लिए कहा, पर 5-6 दिन की शूटिंग के बाद कोविड की वजह से लौकडाउन लग गया और शूटिंग रुक गई. लौकडाउन में थोड़ी सी छूट मिलते ही आधे से ज्यादा यूनिट वापस लौट गई.

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अचानक एक दिन निशांत भारद्वाज ने कहा कि उन्होंने बैठेबैठे एक कौमेडी फिल्म ‘हनीमूनाय नम:’ की स्क्रिप्ट लिख डाली है और अब वे इसे उत्तराखंड में फिल्माने के बाद ही वापस जाएंगे. उसी वक्त उन्होंने मुझे मुगाने की सिचुएशन बताई.

हम ने वहां पर गाने भी कंपोज किए और बेसिक सुविधाओं के साथ गाने रिकौर्ड किए. बाकी सारा काम मुंबई आ कर किया. अब सवाल था कि फिल्म में मेन लीड कौन निभाएगा. कोविड की वजह से मुंबई से कोई भी कलाकार उत्तराखंड पहुंचने के लिए तैयार नहीं हुआ. निशांतजी ने मुझसे कहा, तो मैं ने साफसाफ मना कर दिया कि मैं तो एक्टिंग की एबीसीडी भी नहीं जानता, लेकिन कोई दूसरा औप्शन न होने की वजह से मुझे उन की जिद के आगे झुकना पड़ा.

फिल्म ‘हनीमूनाय नम’ के बारे में कुछ बताएंगे?

यह एक ऐसी फिल्म है, जो समाज में फैली राजनीतिक मौकापरस्ती और जनता की सीधीसादी सोच को कौमेडी के साथ परोसती है. यह फिल्म हमारे समाज में मौजूद पारंपरिक रीतिरिवाजों और अंधविश्वास पर चोट करती है.

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