Social Story: जब किसी औद्योगिक हादसे की खबर टैलीविजन या डिजिटल प्लेटफार्म पर ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बन कर उभरती है, तब कुछ पल के लिए पूरा देश सिहर उठता है. मीडिया के कैमरे धुएं, आग और एंबुलैंसों की तसवीरें दिखाते हैं. एंकर मारे गए लोगों की तादाद गिनाते हैं. फिर धीरेधीरे खबर ठंडी पड़ जाती है.


छत्तीसगढ़ के भिलाई क्षेत्र के आयरन प्लांट रियल इस्पात फैक्टरी में हुए भीषण ब्लास्ट की खबर भी इसी तरह आई और चली गई. पर इस खबर के भीतर जो सच छिपा है, वह सिर्फ एक औद्योगिक हादसा नहीं, बल्कि बिहार, खासकर गया जिले के सब से वंचित समुदायों की जिंदगी और मौत की कहानी है.


जैसे ही खबर फ्लैश हुई, स्वाभाविक जिज्ञासा के साथ एक गहरा डर भी मन में उभरा कि मारे गए मजदूर आखिर हैं कहां के? सालों से एक पैटर्न बन चुका है कि देश के अलगअलग हिस्सों में होने वाले औद्योगिक हादसों, खदान हादसों, फैक्टरियों में ब्लास्ट और फर्नेस में ?ालसने वाली खबरों के पीछे ज्यादातर चेहरे बिहार के होते हैं खासकर वे जिले, जहां से पलायन जिंदगी की कड़वी हकीकत बन चुका है, जैसे गया, औरंगाबाद, नवादा, जमुई, खगडि़या, सहरसा वगैरह.


मुसहरों पर टूटा कहर पहले दिन खबर में मजदूरों की पहचान नहीं थी, लेकिन अगले ही दिन अखबार में छपी तसवीरों और नामों ने डर को सच में बदल दिया. मारे गए सभी 6 मजदूर गया जिले के थे. जो जिंदा थे, वे भी मौत और जिंदगी के बीच ?ाल रहे थे. इस हादसे में मारे गए सभी 6 मजदूर मुसहर जाति से थे. बिहार की सब से गरीब और सब से हाशिए पर धकेली गई जाति. 4 घायलों में से 2 मुसहर थे और 2 मुसलिम.


यह आंकड़ा अपनेआप में बहुतकुछ कह जाता है. यह बताता है कि देश की औद्योगिक प्रगति का बो?ा किन कंधों पर लादा जा रहा है. जिन लोगों के पास न जमीन है, न स्थायी घर, न सामाजिक सिक्योरिटी, वही लोग सब से खतरनाक कामों में ?ांक दिए जाते हैं. बिहार के 90 फीसदी से ज्यादा मुसहर भूमिहीन हैं. उन के पास खेत नहीं हैं, मकान नहीं हैं और अकसर सरकारी जमीन पर ?ांपड़ी बना कर रहना ही उन की मजबूरी होती है और जब सरकार इन्हें गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर बुलडोजर चलाती है, तब उन के पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.


हाल के सालों में बिहार में बुलडोजर की राजनीति ने जिस तरह से गरीबों और दलितों को निशाना बनाया है, उस ने मुसहर समुदाय को और ज्यादा असुरक्षित बना दिया है. जिन के पास पहले से कुछ नहीं था, उन से वह भी छीन लिया गया. नतीजा यह हुआ कि गांव में रहने की आखिरी जमीन भी खिसक गई. ऐसे में परिवार के मर्द ही नहीं, बल्कि किशोर और कभीकभी बच्चे भी काम की तलाश में बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं.


गया, जिसे अब सरकारी कागजों में गयाजी कहा जाने लगा है, वहां ऐसे हालात कोई नई बात नहीं हैं. अपने निजी अनुभव से कहा जा सकता है कि यहां मजदूरी के लिए पलायन बचपन से ही शुरू हो जाता है. इस हादसे में मारे गए लोगों में से कम से कम 3 लोग 18 से 20 साल से ज्यादा के नहीं लगते. यह सवाल बेहद गंभीर है. अगर ये मजदूर नाबालिग थे या 18 साल के आसपास थे, तो यह सिर्फ श्रम शोषण नहीं, बल्कि सीधे सीधे मानव तस्करी का मामला बनता है.

बच्चों को काम के नाम पर दूसरे राज्यों में ले जाना, उन्हें खतरनाक उद्योगों में ?ांक देना और उन की हिफाजत के कोई इंतजाम न करना, यह सब कानून प्रवर्तन एजेंसियों की आंखों के सामने हो रहा है.
यह कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है. रेलवे स्टेशनों से रोज सैकड़ों मजदूर ट्रेनों में भर कर जाते हैं. ठेकेदार खुलेआम दलाली करते हैं. फिर भी न श्रम विभाग की नींद टूटती है, न ही पुलिस की.


बिहार और खासकर गया जिले से मजदूरों को देश के हर कोने में ले जाया जाता है, जैसे छत्तीसगढ़, ?ारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब. जहां कहीं खदान है, फैक्टरी है, फर्नेस है, वहां बिहार का मजदूर मिलेगा और अकसर वहां के हालात बदतर होती हैं. सिक्योरिटी उपकरणों की कमी, लंबी शिफ्ट, न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान, रहने के लिए बदहाल ?ांपडि़यां, यह सब आम बात है.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में हुए इस हादसे से जुड़ी खबर बताती है कि घटना के समय मजदूरों ने सेफ्टी सूट तक नहीं पहना था. फर्नेस के आसपास काम कर रहे मजदूरों के लिए यह सीधा मौत को न्योता देने जैसा है. घेरे में प्रशासन इस पूरे मामले में राज्य के रोल पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. बिहार सरकार ने हाल ही में श्रम संसाधन विभाग का नाम बदल कर ‘श्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण विभाग’ कर दिया है.

नाम से यह संकेत मिलता है कि सरकार प्रवासी मजदूरों को ले कर संवेदनशील है, लेकिन सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से हकीकत बदल जाती है? अगर विभाग सच में प्रवासी मजदूरों के कल्याण को ले कर गंभीर है, तो उस कल्याण को कागजों से बाहर निकालना होगा. सब से पहला कदम यह होना चाहिए कि उन रेलवे स्टेशनों पर विभाग के स्थायी बूथ खोले जाएं, जहां से बड़ी तादाद में मजदूर पलायन करते हैं.

गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा जैसे स्टेशनों पर अगर श्रम विभाग की मौजूदगी होती, तो मजदूरों का रजिस्ट्रेशन हो सकता था. यह पता चल सकता था कि कौन कहां जा रहा है, किस ठेकेदार के साथ जा रहा है और किस तरह के काम में लगाया जा रहा है. इस से न सिर्फ मानव तस्करी पर रोक लगाई जा सकती थी, बल्कि हादसे के हालात में जिम्मेदारी तय करना भी आसान होता.


दूसरा, विभाग को सिर्फ स्रोत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, क्योंकि प्रवासी मजदूरों का कल्याण तभी मुमकिन है, जब राज्य गंतव्य स्थलों तक भी पहुंचे. छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बिहार के मजदूर भारी तादाद में काम करते हैं. वहां महकमों के अफसरों की तैनाती, श्रम शिविरों का निरीक्षण और स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल बेहद जरूरी है.

अभी हालात ये हैं कि बिहार का मजदूर दूसरे राज्य में मरता है, तो उस का शव बिहार लौटता है और उस के साथ लौटता है कुछ मुआवजे का चैक और बहुत सारा सन्नाटा. मुसहर समुदाय ऐतिहासिक रूप से सामाजिक अनदेखी का शिकार रहा है. पढ़ाईलिखाई, जमीन और संसाधनों से दूर रखे गए इस समुदाय के लिए औद्योगिक मजदूरी ही एकमात्र रास्ता बचता है.

लेकिन जब यही मजदूरी मौत में बदल जाती है, तब यह सवाल उठता है कि क्या विकास की कीमत हमेशा वही लोग चुकाएंगे, जिन की आवाज सब से कमजोर है? सुरक्षा की खुली पोल औद्योगिक सुरक्षा मानकों की बात करें तो यह हादसा देश की औद्योगिक व्यवस्था की पोल खोलता है. आयरन प्लांट जैसे खतरनाक उद्योगों में सिक्योरिटी स्टैंडर्ड का पालन कोई औप्शन नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए.

लेकिन अकसर ठेकेदारी प्रथा के चलते मजदूरों की जान सब से सस्ती सम?ा जाती है. परमानैंट मुलाजिमों के लिए सिक्योरिटी उपकरण, ट्रेनिंग और बीमा का इंतजाम होता है, जबकि ठेका मजदूरों को बिना किसी सिक्योरिटी के काम पर लगा दिया जाता है. जब हादसा होता है, तो जिम्मेदारी तय करने के बजाय जांच समितियां बना दी जाती हैं और कुछ दिनों बाद सबकुछ भुला दिया जाता है.


मीडिया का रोल भी यहां सवालों के घेरे में आता है. हादसे के पहले दिन तक मजदूरों की पहचान सामने नहीं आई थी. यह भी एक तरह की अनदेखी है. जब तक यह नहीं बताया जाता कि मरने वाले कौन थे, कहां से थे, किस सामाजिक बैकग्राउंड से थे, तब तक यह हादसा सिर्फ एक संख्या बन कर रह जाता है,
6 की मौत, 11 घायल.


पर जैसे ही पता चलता है कि ये सभी गया के मुसहर थे, तब इस खबर का सामाजिक मतलब बदल जाता है. तब यह सवाल उठता है कि क्यों हर बार यही समुदाय सब से ज्यादा मरता है?
जिम्मेदारी लेनी होगी इस पूरी व्यवस्था में केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी बनती है. प्रवासी मजदूरों के लिए बने कानून, जैसे अंतर्राज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी लैवल पर उन का पालन नहीं होता.


इन कानूनों को सख्ती से लागू किया जाता, तो ठेकेदारों की मनमानी पर रोक लग सकती थी. मजदूरों का रजिस्ट्रेशन, न्यूनतम मजदूरी, हैल्थ बीमा और दुर्घटना बीमा तय किया जा सकता था. लेकिन जब राज्य खुद गरीबों को गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर उन के घर गिरा देता है, तब उन से यह उम्मीद करना कि वे सिक्योर रहेंगे और इज्जत से काम पाएंगे, एक तरह का मजाक लगता है.

बिना जमीन, बिना घर और पढ़ाईलिखाई से दूर मुसहर के लिए औप्शन बेहद सीमित हैं. गांव में रोजगार नहीं, शहर में सिक्योरिटी नहीं. ऐसे में वह फर्नेस के सामने खड़ा होता है, पिघले लोहे के बीच काम करता है और किसी दिन उसी में ?ालस कर मर जाता है. यह हादसा हमें एक बार फिर चेतावनी देता है कि अगर प्रवासी मजदूरों को ले कर नीतिगत और ठोस बदलाव नहीं किए गए, तो यही ट्रैंड जारी रहेगा.

बिहार के मजदूर स्लैब के नीचे दब कर, खदानों में फंस कर और फर्नेस के पिघले लोहे में पिघल कर मरते रहेंगे और हम हर बार कुछ दिनों तक शोक जता कर फिर अगली खबर की ओर बढ़ जाएंगे. यह सरकार की नाकामी है, आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक तीनों लैवलों पर. जब तक यह नहीं मान लिया जाएगा कि प्रवासी मजदूरों की मौतें विकास की जरूरी कीमत नहीं, बल्कि नीतियों की नाकामी हैं, तब तक कुछ नहीं बदलेगा.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में मारे गए गया के मुसहर मजदूर सिर्फ 6 लोग नहीं थे, बल्कि वे उस भारत का चेहरा थे, जो चमकते उद्योगों के पीछे अंधेरे में काम करता है. अगर हम सच में एक अच्छे समाज की बात करते हैं, तो हमें यह पक्का करना होगा कि विकास की आग में सब से गरीब और वंचित न जलें वरना इतिहास हमें इसी सवाल के साथ याद रखेगा कि जब मजदूर पिघलते लोहे में ?ालस रहे थे, तब राज्य और समाज क्या कर रहे थे?                  

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