Tragic Love Story : इस देश की ट्रेनें समय का मोल नहीं मानतीं. ट्रेनों के शरीर लोहेलक्कड़ के बने होते हैं, उन्हें हाड़मांस के बने आदमी की हड़बड़ाहट की कोई कद्र नहीं. मौसम और मर्ज कोई भी हो, वे अपनी गति से कोई समझौता नहीं कर सकतीं.

हाजीपुर रेलवे स्टेशन से ट्रेन खुलने का समय था शाम 6 बज कर 40 मिनट. वह 7 बजे तक भी खुल जाती थी, तो लोग संतोष की सांस लेते थे. उस सवारी गाड़ी का कोई नाम नहीं था, अदद नंबर दे कर रेलवे ऐसी गाडि़यों को छोड़ देता है.

किसी को यदि पूछताछ खिड़की पर पूछना हो, तो एक ही नाम काफी था. हाजीपुर से बरौनी जाने वाली सतबजिया गाड़ी. कह नहीं सकते कि यह नाम किस ने दिया था. चाहे जिस ने भी दिया हो था मुफीद.

जैसे हरेकचोर किंतु बदसूरत पौधे से ठीक 10 बजे रक्तवर्णी फूल अपनी अलसाई हुई कोंढ़ी से निकल कर फुला जाता है, सतबजिया ट्रेन 1-2 बार हिली और फिर दौड़ पड़ी. सर्दी की रात दिन ढलते ही अपना कब्जा जमा लेती है.

सतबजिया ट्रेन में खिड़की वाली सीट पर बैठे गुरुचरण को लगा जैसे हलफा उस की हड्डियों तक पैबस्त हो रही हो. उस ने खिड़की का किवाड़ जोर लगा कर खींचा. कमबख्त कमजोर आदमी दिल से चाहे जितना निस्सन हो, उस की देह की औकात छिपी हुई नहीं  रहती. सामने वाली सीट पर बैठा नौजवान उठा, उस ने जोर लगा कर खिड़की बंद कर दी.

ट्रेन में सवारियों की कमी नहीं थी, लेकिन गुरुचरण का अकेलापन उस का उदास चेहरा उतारे नहीं उतार पा रहा था। वह जिन यादों को संभालने में बारबार गश खा रहा था, वही यादें उस के माथे पर बायमत पराछुत की  तरह खेलतीकूदती रहती थीं.

गुरुचरण अब ऐसी यादों से बेचैन नहीं होता. भूतकाल के दुखों को जितना उत्पात मचाना था, उन्होंने मचाया. भविष्य के संकटों की आशंकाएं उसे ऐसे उद्वेलित कर जाती थीं कि वह हिम्मत ही हार जाता था. उस की समूची देह हिल जाती थी.

गुरुचरण ने गौर किया, देह सिर्फ उसी की नहीं हिल रही थी. ट्रेन अकेली नहीं दौड़ती, उस की बोगियों में बैठे लोगों का वजूद अकारण ही डोलता रहता है. गुरुचरण अपने वजूद की लड़ाई लड़ कर भले हार नहीं मान रहा हो, असल तो यह था कि उस जैसी मुर्दनी देहों के साथ एकसाथ कई जिंदगियां घिसट रही थीं.

गुरुचरण ने कंधे से गमछा उतारा और कान और माथे को बांधा, सीट पर दोनों पांव समेट कर उकड़ू बैठ गया. एकपलिया की खादी का गाढ़ापन उसे ठंड से राहत देने की आश्वस्ति ले कर आपादमस्तक पसर गया.

गुरुचरण की देह स्थिर हुई. कुछ लोग उतरने लगे. गाड़ी विदुपुर स्टेशन पर थमी थी. उस ने अपनी कलाई उठा कर बोगी की रोशनी में घड़ी देखी, साढ़े 7 बजे थे.

ट्रेन की रफ्तार कोई बुरी नहीं थी. शाहपुर पटोरी रेलवे स्टेशन पर 8 बजे तो उस का तय समय ही था. 10 मिनट आगेपीछे कोई खास माने नहीं रखता. लेकिन ट्रेन जब आधे घंटे तक न चली, तो गुरुचरण का मन बेचैन हो उठा. इस बार उस की देह तो नहीं हिली, मन ही कांपने लगा.

शाहपुर पटोरी रेलवे स्टेशन पर उस ने साइकिल रखी थी, ट्रेन से उतर कर चकसलेम मुसहरी जाने में 20 मिनट से कम नहीं लगता था.

अंधेरी रात में अपने घर का रास्ता भी अनजाना जैसा हो जाता है, मीलभर की दूरी कोसों में बदल जाती है. अपना घर भी देर तक इंतजार नहीं करता, किवाड़ में अंदर से सिटकनी पड़ जाती है और ताला जड़ दिया जाता है.

मजबूरी है. ऐसा न हुआ, तो दिनभर हुलकहुलक कर देखने वाले बबुआन टोले के लड़के ढुक जाने का अवसर जाया न करेंगे. कल तक तो उन की निगाह में दुर्गी ही थी, अब तो दुर्गी की बेटी शनिचरी की भी उम्र 13 बरस होने को आई.

गरीब की बेटियों की देह भी देखतेदेखते जुआने लगती है, जैसे गनौरे पर अनेरे जन्मी मकई की डीभियां फनफना कर उठ जाती हैं, उन में मोचे लग जाते हैं और वे मोचे किसी की परवाह किए बगैर ढेसराने भी लगते हैं.

दुर्गी ही नहीं, गुरुचरण की बूढ़ी मां भी जानती है कि शनिचरी गुरुचरण की बेटी है. ऐसी बातें पीठ के घाव की तरह होती हैं. घाव दिखते नहीं हैं, जरा सा ताप लगे कि कचकारे की तरह भीतरबाहर बरक उठते हैं. फिर मामला संभाले नहीं संभलता. जीवनभर का आघात एकबार डेब कर नरेटी दबा देता है.

गुरुचरण अब अलबलाने लगा. उस ने फिर घड़ी देखी. मुआ समय ससर जाता है और आदमी भजन गाते हुए घड़ीघंट डोलाता रह जाता है.

उस के मुंह से चिंता की कोई बेचैन सी उबासी निकली, ‘‘8 तो यहीं बज गए.’’

सामने की सीट पर बैठा नौजवान उस की बेचैनी का हामी भले नहीं था, लेकिन ट्रेन की अकर्मण्यता का उस ने भी विरोध जताया, ‘‘इसे इसी तरह बुखार लग जाता है. कभीकभी तो यह बैलगाड़ी से भी टपा देती है.’’

गाड़ी में बहुत भीड़ नहीं थी, लेकिन हर किसी को घर पहुंचने की जल्दबाजी थी. गुरुचरण बेचैनी को दबा न सका. देर रात को घर का किवाड़ खुलवाना कठिन था. बूढ़ी मां दमे की मरीज थी. पिछले ही साल गुरुचरण के पिता ने दमे के कारण दम  तोड़ दिया था.

5-6 बरस पहले गुरुचरण के छोटे भाई शिवचरण की मौत फेफड़े के कैंसर से हो गई थी. शिवचरण निर्दोष था, ऐसे तो निर्दोष समूचा चकसलेम मुसहरी टोला ही था. लेकिन गरीब मुसहरों का सब से बड़ा कुसूर है कि वे पेट और अन्न की साजिशों से नावाकिफ रह जाते हैं.

गुरुचरण ने इस साजिश को पहचान ही लिया, तो क्या हुआ. शाहपुर उंडी की किसी तंबाकू फैक्टरी में मजदूरी नहीं की, उन फैक्टरियों को आबादी वाले इलाके से हटाने के लिए यूनियन भी बनाई, पर हुआ क्या.

हुआ यह कि उसे गलत केस में फंसा कर सालभर जेल में खटवाया गया. इधर उस के परिवार को रोजीरोटी के लिए कोई और रास्ता नहीं सू झा. गरीब आदमी का समूचा परिवार खटता है, तब भी पेट की गहराई की सही पैमाइश नहीं कर पाता.

गुरुचरण के मातापिता और भाई उन्हीं तंबाकू फैक्टरियों में देह घसीटते रहे, जिन के विरोध के कारण गुरुचरण को जेल में जाना पड़ा था. बीमारी लग गई. गुरुचरण का छोटा भाई शिवचरण कलेजे के कैंसर से मर गया और पिता दमे से. अब किस की बारी है, कह नहीं सकते. पर मां दमे से हांफती रहती है.

चकसलेम मुसहरी टोले का कोई भी मुसहर सांस की किसी न किसी बीमारी से पीडि़त था, लेकिन ऐसा कोई घर नहीं था, जिस के लोग तंबाकू फैक्टरियों में काम न करते हों. जीने की खातिर मरने को हर कोई तैयार था.

गुरुचरण हारने को इतना हारा था कि अब उस ने यूनियनबाजी छोड़ दी थी और हाजीपुर की किसी कपड़ा दुकान में नौकरी करता था. हर रोज सुबह 7 बजे की ट्रेन से जाता था और हाजीपुर में घर के लिए शाम की सतबजिया ट्रेन पकड़ता था.

सुबहसुबह जाने की जल्दबाजी और रात में लौटने की. घर में बूढ़ी मां और उस की भावज दुर्गी. दोनों बेवा औरतें.

दुर्गी की बेटी शनिचरी भले गुरुचरण की बेटी थी, पर पिता के रूप में उस के साथ शिवचरण ही का नाम जुड़ा था.

दुर्गी गुरुचरण की बड़ी बहन की ननद थी, गुरुचरण से उसे प्यार हो गया था. प्यार में ऐसा फंदा होता है

कि कोई ऊंचनीच सिर्फ दुनिया का ढकोसला लगता है. देह दुनियादारी जरा देर से सम झती है, तब तक तो अंधेर हो चुका होता है.

गुरुचरण और दुर्गी के बीच के हंसीमजाक को लोगों ने हलके में लिया और दुर्गी का पांव भारी हो गया. उधर दुर्गी को ले कर हरसैन पड़ा था, इधर गुरुचरण जेल में. लाज बचानी थी, शिवचरण को दुर्गी से शादी के लिए तैयार किया गया.

दुर्गी को न प्रेमी मिला, न पति, शनिचरी को पिता का नाम मिल गया शिवचरण मां झी, लेकिन शिवचरण सालभर में ही कूच कर गया.

अब दुर्गी शाहपुर मंडी की किसी तंबाकू फैक्टरी में भले मजदूरी नहीं करने जाती हो, अपनी बेटी के असली पिता को अपने पति की तरह देखना उस के लिए किसी पाप से कम नहीं था. वह गुरुचरण से सामने हो कर बात भी नहीं कर सकती थी. भावज और भैंसुर का रिश्ता औरतों को परदानशीं होने को पाबंद करता है. औरतें चिलमन से  झांक सकती हैं, चिलमन उठा कर देख नहीं सकतीं. पाप पतिया लगता है.

विदुपुर से गाड़ी चली, तब तक गुरुचरण की आंखों में अपने अतीत का समूचा सिनेमा चल गया. उस की रीलें अनेक बार उल झीं, पर टूटीं नहीं. गुरुचरण के लिए अब ऐसी रीलों की कोई अहमियत नहीं. लेकिन निर्दोष दुर्गी की दुर्गति गुरुचरण को रहरह कर किसी अवसाद से भर देती थी.

गुरुचरण जितने सालों से उदास था, दुर्गी की उदासी भी उतनी ही पुरानी थी. दोनों की उदासी का कारण भी अलगअलग नहीं था, लेकिन उन्हें एकसाथ हो कर उदासी बांटने का भी अधिकार नहीं था.

शाहपुर पटोरी रेलवे स्टेशन पर गाड़ी थमी, तो गुरुचरण ने फिर घड़ी देखी. 10 बजने वाले थे. जाड़े की रात के 10 बजना गरमी की रात में आधी रात होने के बराबर होता है. गुरुचरण ने हाथ में  झोला उठाया और कालेज के रास्ते तिरेकोनी रास्ता टपता चला गया.

गुरुचरण ने दरवाजे पर किवाड़ ढकढकाया और बोला, ‘‘शनिचरी… माई… माई…’’  कोई जवाब नहीं मिला.

गुरुचरण को ठंड की रात में देर से लौटने पर यही अंदेशा रहता था. उस के इंतजार में कोई देर तक बैठा तो नहीं रहेगा.

गुरुचरण ने फिर दस्तक दी. आहट हुई, तो सम झ गया कि कोई घर में उठा. गुरुचरण ठहर गया. किवाड़ खुला, तो गुरुचरण ने टौर्च जला दी. देखा, दुर्गी थी.

बरसों बाद गुरुचरण और दुर्गी की निगाहें एकदूसरे से मिलीं, पर लिपट न सकीं. दोनों की आंखों के पास कहने को बहुतकुछ था, लेकिन वे आंखें अबोली ही रह गईं.

दुर्गी परे हट गई. गुरुचरण अंदर आ गया, तो दुर्गी ने किवाड़ के पल्ले सटा कर सांकल चढ़ा दी.

दुर्गी फुसफुसाई, ‘‘शनिचरी को बेरिया टैम से बुखार है. ठंड लगी है. आप कुल्ला कीजिए, मैं खाना परोसती हूं.’’

गुरुचरण से कुछ बोलते न बना. उस ने देहरी पर  झोला रखा और आंगन में चापाकल की ओर बढ़ गया.

कहते हैं, काठ ठंड से बचा रह जाता है. काठ को काठ नहीं मार जाता. लोहा होता है, तो लोहछ जाता है, माने छिहुल जाता है. लोहे पर गरमी भी असर करती है और ठंड भी. आदमी अपना जी लोहे का करना चाहता है, तभी वह जरा सी धूप में धीप भी जाता है, जरा सी ठंड में बर्फ की तरह जमने भी लगता है.

गुरुचरण ने हवाई चप्पल से पांव निकाले और पीढ़े पर बैठ गया, उस की समूची देह उस के दोनों घुटनों में छिपी जा रही थी, किंतु उस ने अपनी दाढ़ी ठेहुने पर अड़ा दी. वह घिकुरी लगा कर बैठा हुआ था. बायां हाथ कलेजे के करीब गरमी तलाश रहा था.  दाएं हाथ पर रोटियां मुंह तक ले जाने का दायित्व था, इसीलिए वह लोहे को बर्फ बनाने वाली दर्दनाक शीतलहर से उऋ ण नहीं हो पा रहा था.

दुर्गी ने बोरसी की आग को खोर कर जगाया. कंडे की आग में कई हिस्से ऐसे थे, जिन में अभी भी धंधरा होने की जिद कायम थी.

दुर्गी ने चूल्हे के पुत्ते पर से डोमऊ बेना उठा लिया. घड़ी भर में कंडे का स्वाभिमान जाग गया, गोयठे की एक चिपड़ी तोड़ी और उस ने ऊपर से कंडे को ओढ़ा दिया. हौंकने लगी. दाल के कटोरे में गरम होने की सरसराहट हुई. बैगन की तरकारी और गेहूं की रोटियां छीपे में रखीं और छीपे को दाल के कटोरे के साथ आगे कर दिया.

दुर्गी जानती थी कि गुरुचरण दाल भले गरम की हुई खा ले, गरम तरकारी उस के हलक से नीचे ही नहीं उतरती.

गुरुचरण का चेहरा अकारण उदास था. किसी बोझ से उस का माथा  झुका जा रहा था. दुर्गी बरसों से गुरुचरण के घर में रह रही थी, गुरुचरण के चेहरे पर उसे किसी भारीपन का एहसास अनेक बार हुआ था. गुरुचरण सिर उठा कर भले दुर्गी को नहीं देखता था, लेकिन उस की निगाहों का भटकाव दुर्गी ने अनेक बार महसूस किया.

दुर्गी कायदे से गुरुचरण की पत्नी थी कि शिवचरण की, कह नहीं सकते. समाज की मर्यादा में तो गुरुचरण उस का भैंसुर ही रह गया था. दुर्गी के जी में कई बार कई बातें आईं, लेकिन हर बार उस के मुंह का बकार मुंह में बिला गया.

गुरुचरण अचा कर गमछे में हाथ पोंछ रहा था, तभी दुर्गी ने कह दिया, ‘‘कहने का हियाओ तो नहीं हो रहा, लेकिन आप को कोई और कहने वाला भी नहीं. कहना यह था कि साल  2 साल बाद शनिचरी का ब्याहगौना करना होगा, तब तो यह घर निर्वंश हो कर ठहर जाएगा.

‘‘बुढ़ापे के सहारे के लिए लोग बच्चे को जन्म देते हैं. यहां तो घर ही बां झ हो कर रह गया है. मैं अहिवात रहती, तो वह भी न रही. आप ब्याह कर लेते. कोई इस तरह जीवन खत्म नहीं कर लेता है.’’

गुरुचरण के पांव को घड़ी भर के लिए छान लग गया, लेकिन उस के कान पर जूं नहीं रेंगी. वह बिना कुछ कहे दालान में चला गया, बिछी हुई पुआल पर ओलर गया. हाथ और पांव की अंगुलियां काठ हुई जा रही थीं. उस का शरीर किसी लोहे की बर्फ की तरह सिकुड़ता चला गया.

उसे किसी अबू झ उदासी ने घेर रखा था, इस तरह कि हंसनेबोलने का उत्साह मर गया था. जेल जाकर लौटने का जीवन जैसे जीवन रह ही न गया था. लगता था कि गोवध का पाप लगा हो.

गुरुचरण जिन यादों से निकलना चाहता था, वही यादें उसे चहेट कर धर लेती थीं. रात ज्यादा हुई जा रही थी. उस ने मन फेर कर सोने की कोशिश की. आंखें लगी जा रही थीं, थकावट भरी देह में सोचनेसम झने की ताकत कम होने लगती है. लेकिन तभी गुरुचरण को कुछ अजीब सा महसूस हुआ. गुरुचरण की आंतें ऐंठ रही थीं, उस ने तलहथी 2-3 बार नीचे की ओर ससारी. दर्द कम होने लगा, तो आंखों की पपनियां भी चिपकने लगीं.

दिनभर काम करने के बाद घर पहुंचने की जल्दबाजी हर किसी को होती होगी पर गुरुचरण को नहीं होती. हर घर के साथ किसी का कोई सपना भी चलता है.

गुरुचरण का सपना सिर्फ दुर्गी ही थी. वही दुर्गी अब उस के घर में थी, गुरुचरण जिस के सपने देखता था पर उस सपने में ऐसी लुत्ती लगी कि वह जल कर खाक हो गया.

गुरुचरण का मुंह मलिन हो कर रह गया था, आंखें धंसी जा रही थीं. मानो कोई पीठ पर मन भर का बो झ उठा कर सीढि़यां चढ़ना चाह रहा हो, उस की जवान डांढ़  झुकी जा रही थी. जैसे छाते की कमानियां घोड़े के टूटने से बिखरने लगती हैं और उस का कपड़ा अपनी बखिया चुन से आजाद होना चाह रहा हो.

गुरुचरण को अपने जीवन में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी, पर देह से जान की संगत छुड़ाए कहां किस की छूटी, जो गुरुचरण की छूटती.

गुरुचरण सतबजिया ट्रेन में बैठा हुआ था. रोज की तरह उस के घुटनों ने उस के सिर को आश्रय दे रखा

था. चुक्केमुक्के बैठने से उसे तनिक आराम जरूर मिल रहा था, पर अंतडि़यां अभी भी ऐंठ रही थीं.

उस ने ओहार की तरह सिर से पांव तक एकपलिया चादर से अपना शरीर ढका था, पर तलवे में न जाने किधर से ठंडी हवा कोई सूई ले कर छेद कर रही थी. गुरुचरण ने एकपलिया के निचले सिरे को तलवों में दबाया, तो हवा ने चादर की कुछ लाज रखी.

न जाने कहां ट्रेन रुकी थी. कहीं भी सतबजिया ट्रेन को रोक कर मालगाडि़यां निकाल दी जाती थीं. हौर्न बजा जरूर था, लेकिन ट्रेन खुली नहीं.

बगल में बैठे किसी नौजवान ने अंदाजा लगाया, ‘‘लगता है, राजधानी को निकालेगा. सड़ा देता है इस गाड़ी को.’’

कौन बोला, पता नहीं, लेकिन गुरुचरण को यह तुकबंदी अच्छी लगी, ‘‘सड़ी सवारी, सतबजिया गाड़ी, चलत अगाड़ी, पहुंचत पिछाड़ी.’’

पास बैठे कुछ और यात्रियों ने भी थोड़ाबहुत हंस देना मुनासिब सम झा, पर गुरुचरण के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट उतरी और बिला गई.

न जाने ऐसी सवारी गाडि़यों की आवाजें भी अपने ही शोर में किस तरह गुम हो जाती हैं कि वे सुर भी संभाल नहीं पातीं.

ट्रेन जिस सुर में बोली, उस की नकल पास बैठे किसी नौजवान ने फिर उतार दी, ‘‘बां बां बां…’’ उसी नौजवान ने ट्रेन की आवाज का प्राकृतिक और सटीक विश्लेषण भी कर दिया, ‘‘लगता है, जैसे किसी ढांकर के सामने कोई गरम हो चुकी गाय ले कर खड़ा हो और ढांकर मुंह उठा कर कामदेव की आराधना कर रहा हो.’’

इस बार हंसा कोई नहीं, पर देहराग की तासीर सम झी हर किसी ने. कामाग्नि की आतुर फूंक पर लहकना कौन नहीं चाहता. गुरुचरण फिर अंधेरी गुफा में उल झ गया. दुर्गी के आलिंगन का मोहपाश उसे फिर घेरने लगा, किंतु उस के उदास शरीर में लोहार की भांथी धुकधुका कर रह गई. गुरुचरण को पापपुण्य का डर नहीं, पर नास्तिक आदमी भी रिश्ते के रण की मर्यादा नहीं भूलता.

गाड़ी शाहपुर पटोरी रेलवे स्टेशन पर खड़ी हुई. गुरुचरण ने पायदान के डंडों के सहारे बहुत मुश्किल से स्वयं को उतारा. पता नहीं, यह कैसा दर्द था. 10-12 दिनों में दर्द की दवाएं भी हारती जा रही थीं, अब वे भी बेअसर हो रही थीं.

दुर्गी ने किवाड़ खोला. गुरुचरण दुरुक्खे से आंगन में साइकिल ले गया. उस ने पाये से साइकिल सटाई और दौड़ कर बिछावन पर ओलर गया, ‘‘आज मिजाज दब है. खाऊंगा नहीं.’’

दुर्गी उस के पीछेपीछे गई, ‘‘क्या हुआ है?’’

‘‘पेट दुखाता है,’’ गुरुचरण ने माथे से गमछा खोला और अपने पेट को इस तरह बांधा जैसे जुन्ने पर कटी हुई फसल बांधते हैं. उस का दर्द बहुत ज्यादा तेज हो रहा था. घर में गुरुचरण की मां भी थी और दुर्गी की बेटी शनिचरी भी. पर पूस की रात उन की सलगीकथरी के चारों ओर घाइ लगा कर बैठी थी. जरा सा मुंह उघारे कि वह हबक लेती. वे दोनों अपने बिछावन पर घिकुरी लगाए फोंक काटती रहीं.

दुर्गी ने बोरसी की चिनगी पर एक चिपड़ी तोड़ कर रखी और डोमऊ बेना से हौंकने लगी. आग में जान आ गई. मलसी भर तेल को उस पर चढ़ाया और लहसुन का एक पोट तलहथी पर रगड़ कर फेंटने लगी.

उस ने बारबार गुरुचरण की ओर देखा. वह गरम बालू पर पड़ी किसी चेल्हवा मछली की तरह कछमछा रहा था.

दुर्गी ने लत्ते हाथ से मलसी उठाई और गुरुचरण के पेट से गमछा खोल दिया,’’ लाइए, टघरा दूं. बाय उखड़ गया होगा, मु झे बैठाना आता है.’’

न जाने दुर्गी को कितनी कलाएं आती थीं, कितना ज्ञान था. गुरुचरण के पेट का दर्द किसी कोने में जा कर बैठ गया, इतना दर्द सहा जा सकता था.

दुर्गी ने स्नेहपूर्वक पूछा, ‘‘अब कैसा बु झा रहा है?’’

‘‘ठीक है, लेकिन तुम्हें मेरी देह को नहीं छूना था. भाभो और भैंसुर का परदा भी कोई चीज होती है.’’

दुर्गी ने कुछ न कहा, तेल से उस का पेट हंसोतती रही. गुरुचरण ने सिर उठाया, जमाने के बाद दुर्गी का चेहरा उस की आंखों के ओसारे में आ खड़ा हुआ. यादों के न जाने कितने दरीचे खुलखुल कर ऊधम मचाने लगे, दरीचों के पल्लों पर उठतीगिरती हलफों में सर्द रात की सोहबत न जाने कहां गुम हो रही थी.

दुर्गी ने कहा, ‘‘कमीज ससारिए, कलेजे में तेल लपेस दूं. आप को कुछ न हुआ है, ठंडी का असर है.’’

दुर्गी की उंगलियां गुरुचरण के कलेजे को हंसोती रहीं, गुरुचरण के कलेजे के बाल उन उंगलियों का स्पर्श बरसों बाद महसूस कर रहे थे.

अचानक दुर्गी की एक उंगली कलेजे पर पड़े किसी सख्त फोड़े पर रुक गई, ‘‘अब तो सुनबहिरी घाव जुआ गया है. निस्सन है. चिरबा क्यों नहीं लेते. भीतर में खराबी करता है. मेरे नाना को था, पक कर टनकने लगा, तब बु झाया. आखिर में डाक्टरबैद भी हार गया और वही घाव उन्हें ले गया.’’

‘‘मु झे भी ले जाए,’’ गुरुचरण बोल ही रहा था कि दुर्गी ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया, ‘‘कुभक्खा बोलने की आप की आदत नई नहीं है. इसी कुभक्खे के कारण हमारा प्यार अधूरा रह गया. हम मिल नहीं पाए.’’

गुरुचरण ने दुर्गी के चेहरे को गौर से देखा. उस की आंखों में कहीं से पानी का कोई बहाव उतर रहा था और उन पर गंदले सेमार की भांति पपनियां सट रही थीं.

दुर्गी ने नजर फेर ली और मलसी को बोरसी पर रख कर गरमाने लगी, ‘‘तेल सेरा गया है. धीपा हुआ करुआ तेल ठंडी में गुणकारी होता है.’’

‘‘दुर्गी…’’ बरसों बाद गुरुचरण के मुंह से दुर्गी ने अपनी पुकार सुनी, ‘‘तुम्हारी छाती पर भी तो मस्सा था और कांधे पर तिल.’’

दुर्गी चुप रही. गुरुचरण भी कुछ न बोला.

दुर्गी ने फिर तेल लिया और गुरुचरण की देह में लपेसने लगी. दुर्गी से रहा न गया, ‘‘न जाने आत्मा कब तक जलेगी. रोज भोर में आप का चेहरा आंखों में नाच जाता है. मरद जात का कलेजा कठोर होता है, औरत ही केले के पत्ते की तरह अपने कलेजे को हलरहलर डोलने के लिए छोड़ देती है.’’

न जाने किधर से हवा का एक पतला सा  झोंका उठा, गुरुचरण उठ कर बैठ गया. दुर्गी के उदास गालों पर उस ने हलके से छुआ, ‘‘हम एक ही घर में तो हैं दुर्गी. शरीर के मिलन के लिए पाबंदियां हैं, मन को कौन रोकेगा…’’

दुर्गी कलपने लगी, ‘‘न, हदरो नहीं, प्यारी. हम एकदूसरे को देख कर ही संतोष करेंगे.’’

दुर्गी ने बेचैन हो कर अपना मुंह गुरुचरण के कलेजे में छिपा लिया, गुरुचरण ने उसे पांजा में समेट लिया. पता नहीं, किस ने उन दोनों को बांध कर छोड़ दिया कि वे बंधन से न छूटे, न बंधन ने उन्हें मुक्त होने दिया. बोरसी की आग से उतारी हुई मलसी का तेल भी देर तक न सेराया.

गुरुचरण सुबह उठा और काम पर चला गया. उस दिन उस की आंतें बहुत नहीं ऐंठीं. उस ने मन ही मन कहा, ‘दुर्गी का तेल गुणकारी है. वास्तव में दवा ने जो न किया, वह चमत्कार तेल ने कर दिखाया.’

सतबजिया ट्रेन इस बार समय से खुली, हर दिन समय से खुलने और देर से पहुंचने का उस का अपना ही कीर्तिमान ध्वस्त हो गया. चकसलेम मुसहरी के कुत्ते लेकिन नहीं माने, गुरुचरण को पहचानने से मना कर दिया और भौंकते रहे.

दरवाजा खुला हुआ था, दुर्गी खड़ी थी. बोली, ‘‘कुत्तों के लगने की आवाज सुनी, तो मैं सम झ गई कि आप ही होंगे.’’

गुरुचरण ने बिना कुछ कहे साइकिल आंगन में रखी और चांपाकल पर हाथपांव धोने चला गया. दुर्गी ने बोरसी की आग खोरी और छीपे में भोजन ले कर पीढ़े पर बैठ गई, ‘‘आज मिजाज कैसा है?’’

गुरुचरण ने खुशी से जवाब दिया, ‘‘ठीक है.’’

दुर्गी ने मनुहार किया, ‘‘आज हम दोनों एक ही थाली में खाएं? कहते हैं, जूठनसखरियां खाने से प्यार बढ़ता है.’’

गुरुचरण ने बाएं हाथ को फैला कर दुर्गी को अपने पंजरे से लगा लिया. पता नहीं, होंठों के गीलेपन से लग कर सूखी रोटियों में मिसरी का मीठापन कैसे उतर आता है.

रात में रोज की तरह गुरुचरण आया, दुर्गी मोखे पर खड़ी थी. गुरुचरण असहज हो रहा था. उस के पांव डगमगा रहे थे, बहुत मुश्किल से उस के मुंह से आवाज निकली, ‘‘आज मिजाज बहुत दब है. समूचा दिन कोई काम न किया. दर्द से छटपटाता रह गया.’’

दुर्गी फिर बोरसी उठा लाई और तेल गरमाने लगी. गुरुचरण विलाप करने लगा, ‘‘अब नहीं, रे बाप. अब न जीऊंगा.’’

कमरे में गुरुचरण की मां और दुर्गी की बेटी शनिचरी सो रही थीं, गुरुचरण के रोने की आवाज सुनी, तो दौड़ी आईं.

दुर्गी ने गुरुचरण के सिरहाने तकिया दिया और तेल ले कर बैठ गई. कोठी की धंधारी पर मिट्टी तेल की ढिबरी का इंजोत कमजोर पड़ने लगा.

गुरुचरण ने बहुत कठिनाई से मुंह खोला, ‘‘दुर्गी, हम मिले भी तो कैसे मिले. ऐसे मिलने से तो न मिलना ही बेहतर. मु झे आज हाजीपुर में ही 2 बार खून की उलटी हुई थी. मिजाज अब भी घूम रहा है. लगता है, अंतडि़यां घेंटी में आ कर फंस गई हैं.’’

दुर्गी को काठ मार गया. गुरुचरण की मां ने उसे सम झाया, ‘‘दवाबीरो न करोगे, तो जुलुम हो जाएगा, बेटा. पटोरी की तमाखू मिलों से न जाने क्या निकलता है कि चकसलेम मुसहरी के घर के घर उजड़ते जा रहे हैं.’’

समूची रात गुरुचरण ऐंरता रह गया. रात में खाता क्या, देह पर दुर्गी की मालिश भी बेअसर रही. समूचा घर जागता रह गया.

गुरुचरण ने हाथ से इशारा किया, तो दुर्गी ने तेल की मालिश रोक दी. गुरुचरण ने करवट बदली, वह स्थिर होने की कोशिश कर रहा था.

उसे शांत हुआ देख, समूचे घर की सांसें लौट आईं. गुरुचरण की मां ने आसमान की ओर देखा, ‘‘भुरुकवा उगा है, भोर हुई.’’

गुरुचरण की मां और शनिचरी अपने बिछावन की ओर बढ़ी ही थीं कि गुरुचरण की देह फिर कांप उठी. दुर्गी ने गुरुचरण के चेहरे की ओर सिर  झुकाया, चीख पड़ी, ‘‘बाप रे, खून की उलटी.’’

गुरुचरण की मां और शनिचरी ने गुरुचरण को न जाने कितनी बार पुकारा, वह हिला तक नहीं.

गोतिया के लोग दिन रहते ही मंजिलमाटी कर आए. शाम में दुद्धी लगी लौहपात्र छुआ गया. पर दुर्गी दिनभर चुपचाप बैठी रह गई.

टोले के लोगों ने गुरुचरण की अकाल मौत का अनुमान कर लिया, ‘‘उसे भी कैंसर हुआ होगा,’’ पर दुर्गी को कुछ अनुमान न हुआ.

रात में भी गुरुचरण की मां और शनिचरी के आंसू रहरह कर उमड़ते रहे. दुर्गी एकदम नहीं रोई. चकसलेम मुसहरी के कुत्तों के भौंकने की आवाज बढ़ी, तो दुर्गी उठ खड़ी हुई, ‘‘कुत्ते लग रहे हैं. लगता है कि सतबजिया ट्रेन आ गई.’’

गुरुचरण की मां और शनिचरी से दुर्गी को सम झाया न गया कि अब गुरुचरण नहीं आएगा. वे भी दुर्गी के समीप मोखे पर जा कर बैठ गईं.

न जाने कितनी देर बाद दुर्गी की आंखों में पानी का एक जोरदार बहाव आया और उस में पपनियों का गंदला सेमार उपलाने लगा. दुर्गी ने अपने कलेजे में एक के बाद एक कई मुक्के मारे, वह चित्कार कर उठी.  Tragic Love Story

–अश्विनी कुमार आलोक

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