Story. शाम का वक्त था और पार्क के सुनहरी साए लंबे हो रहे थे. हवा में एक अजीब सा उदास सुकून घुला हुआ था. कबीर वहीं एक बैंच के पास खड़ा था और उस के कदम जैसे जमीन में गड़े हुए थे.
कुछ ही फासले पर, जिंदगी का एक नया और चुभता हुआ मंजर सज रहा था. सिमरन, जिस की हंसी कभी कबीर की पूरी कायनात को रोशन करती थी, आज किसी और की बांहों में सिमटने के लिए दौड़ रही थी. उस के चेहरे की झूठी खुशी और फैली हुई बांहें बता रही थीं कि उस ने अपनी एक नई दुनिया चुन ली है. सामने खड़ा काले लिबास में सजा हुआ शख्स मुसकराते हुए उस का इस्तकबाल करने के लिए तैयार था.
कबीर ने अपने दिल पर हाथ रखा. दर्द तो था, मगर आंखों से आंसू सूख चुके थे. उस ने सोचा, ‘किसी दूसरे की छोड़ी हुई मोहब्बत से हमदर्दी तो की जा सकती है, लेकिन मोहब्बत नहीं.’
कबीर ने सिमरन को जाने दिया था, यह सोच कर कि शायद उस की खुशी इसी रास्ते पर है. वह खुद को सम झा चुका था कि अब वह उस के लिए सिर्फ एक अजनबी है.
मगर दिल के कोनों में एक कसक अभी भी बाकी थी. अचानक हवा का रुख बदला. कबीर ने मुड़ कर जाने का इरादा ही किया था कि उस के कदम ठिठक गए. उस के मन में एक सिहरन पैदा करने वाला खयाल आया, ‘लेकिन मोहब्बत नहीं, वह अपने महबूब की एक आवाज पर वापस पलट सकता है और फिर तुम्हारा क्या होगा?’
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