Sarju Maharaj Tapasya Case. सरजू महाराज. नाम से ही साफ है कि यह शख्स महाराज की उपाधि महज साधु होने की वजह से लटकाए हुए है, किसी रियासत के महाराज होने की वजह से नहीं.

यह दीगर बात है कि इस की लाइफ स्टाइल किसी महाराज से कम नहीं है. गोरखनाथ संप्रदाय के इस घुमक्कड़ साधु को भी अपनी बिरादरी के दूसरे साधुओं जैसे पेट भरने के लिए पसीना नहीं बहाना पड़ता. इस पर किसी का हुक्म नहीं चलता.

बीते दिनों सरजू महाराज एकाएक  मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग के पास जा पहुंचे. वे आयोग के किसी पदाधिकारी, सदस्य या मुलाजिम को आशीर्वाद देने नहीं, बल्कि तपस्या भंग होने की शिकायत को ले कर इंसाफ मांगने पहुंचे थे.

त्रेता युग से ले कर कलियुग तक तपस्याएं धड़ल्ले से होती रही हैं. तपस्या की अहमियत उस के पूरा होने में नहीं, बल्कि भंग होने में ज्यादा है. आमतौर पर यह श्रेय सुंदरियों को ज्यादा जाता है. वे कम कपड़ों में सजधज कर खुशबूदार इत्र लगा कर तपस्वियों के सामने नाचगा कर रि?ाती थीं और अकसर कामयाब रहती थीं.

इस से यह साबित हो जाता था कि तपस्या करने वाला ऋषि या मुनि भी आम मर्दों सरीखा कमजोरियों का पुतला होता था, जो इंद्रियों को जीतने की कोशिश में इंद्रिय कमजोरी के चलते तपस्या भंग करवा बैठता?था. इस खेल में उस के ब्रह्मचर्य के भी चिथड़े उड़ जाते थे.

यही हाल सरजू महाराज का हुआ. वे इंदौर के नजदीक महू के दलौरा गांव में घूमते हुए जा पहुंचे और आव देखा न ताव वहीं धूनी रमा कर तपस्या करने बैठ गए.

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