पंडित राम प्रसाद ढोंग और छुआछूत को मानने वाले थे. उन की नईनई शादी हुई थी. पंडिताइन को नई सोच पर यकीन था. वे ऊंचनीच और छुआछूत का जरा भी फर्क नहीं मानती थीं.
एक दिन तीखी धूप में तपते हुए पंडितजी बाहर से आए. उन्होंने पंडिताइन से पानी मांगा.
पंडिताइन ने देखा कि रसोई में बालटी, घड़े वगैरह सभी खाली थे. कुएं से पानी लाने में देर होती, इसलिए वे पड़ोस से पानी मांग लाईं.
प्यास लगने की वजह से पंडितजी का बुरा हाल था. ठंडा पानी पी कर उन्होंने राहत की सांस ली और प्यार से पंडिताइन से पूछा, ‘‘बहुत ही शीतल जल है... कहां से लाई हो?’’ ‘‘बगल के कुम्हार के घर से,’’ पंडिताइन ने कहा.
यह सुनते ही पंडितजी आगबबूला हो गए और चिल्लाए, ‘‘कुम्हार के घर से... तुम ने मेरा धर्म बिगाड़ दिया. क्या मेरी बिरादरी वाले सभी मर गए थे, जो कुम्हार का छुआ हुआ पानी मुझे पिला दिया... रामरामराम...’’
पंडिताइन ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘गलती हो गई महाराज. मैं आगे से खयाल रखूंगी.’’ बात यहीं आईगई हो गई.
अगले दिन नहाधो कर पंडितजी ने अपने धुले हुए कपड़े मांगे. ‘‘मगर मैं ने तो सारे कपड़े जला दिए,’’ पंडिताइन बोलीं.
‘‘कपड़े जला दिए... पागल हो गई हो क्या?’’ पंडितजी ने गुस्से से कहा.
‘‘क्या करती महाराज...’’ पंडिताइन ने समझाया, ‘‘वे कपड़े मुसलिम दर्जी ने सिले थे और उन्हें धोबी ने अपने हाथों से धोया था... फिर मैं जानबूझ कर आप का धर्म कैसे बिगाड़ती?’’
पंडितजी झल्लाए और बोले, ‘‘तुम ने सबकुछ चौपट कर दिया. खैर, खाना लगाओ.’’
पंडिताइन ने थाली में नमक के साथ सूखी रोटियां रख दीं.
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