Hindi Story. जून की तपिश भरी गरमी... उमस ही उमस, पसीना ही पसीना और शाम का समय. गठीला बदन, नाटा कद, दाढ़ीमूंछ बढ़ी हुई, सफेद बिखरे बाल, कुरते की बांह फटी हुई, पैर से चप्पल नदारद. रामचंद्र भागे जा रहे थे. उन को घर पहुंच कर भोजन बनाना था.
‘‘माचिस मिलेगी, चूल्हा जलाना है,’’ उन्होंने रामभजन की मां से कहा और मंड़ई में चले गए.
अंदर से बरतनों के गिरने की आवाज आई. लू के थपेड़े शांत हो रहे थे. चेहरे से आंच जैसी कोई चीज कम हो रही थी. कपड़े पसीने से तर हो गए. प्यास से गला सूखा जा रहा था, लेकिन रामचंद्र काम में लग गए. रहते तो वे इस मंड़ई में अकेले ही थे, पर भोजन तो अकेले को भी करना पड़ता है न.
रामचंद्र रिटायर हो चुके थे. वे किसी प्राइवेट फर्म में अफसर थे. वहां उन की अच्छीखासी तनख्वाह थी. रिटायरमैंट के समय काफी रुपया भी मिला था. सब अपने बेटों पर खर्च कर दिया. अब न तो पैसा है और न ही ताकत. इधरउधर से किसी तरह एक समय के भोजन के इंतजाम में दिन कट जाता है.
ऐसा नहीं था कि उन्होंने घर नहीं बनवाया था. बनवाया था बड़ा सा घर, पक्का घर. उन दिनों पूरे गांव में चर्चा हुई थी. लाखों रुपए खर्च किए थे.
तब रामचंद्र सोचा करते थे कि जवानी तो शहर में कटी, रिटायरमैंट के बाद इस घर के बरामदे में शाम को शान से बैठ कर अपने हमजोलियों के साथ चाय पी जाएगी.
वैसे रामचंद्र की पत्नी की टीबी की बीमारी से मौत हो चुकी थी. माली तंगी के चलते वे उन का ठीक से इलाज न करवा सके थे.
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