घड़ी की सूई की तरह छवि की जिंदगी हर क्षण आगे सरकती जा रही थी. पाना तो उस ने भी बहुतकुछ चाहा था जिंदगी से, लेकिन पाने के लिए कुछ खोना भी तो पड़ता है.