Hindi Story. अमन दुबई की किसी कंपनी में इंजीनियर था. वह अपनी शादी के सिलसिले में भारत आया था. वह इस शादी से बेहद खुश था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की शादी इतनी खूबसूरत लड़की सविता से होगी. तकरीबन एक महीना हंसीखुशी के माहौल में गुजर गया.
सविता पति का सुख पा कर निहाल हो उठी. उस का अंगअंग खिल उठा. लेकिन उस की खुशी उस दिन से गायब हो गई, जब अमन ने दुबई वापस जाने की बात कही.
यह सुन कर सविता रोने लगी. उस ने सुबकते हुए कहा, ‘‘मैं आप के बगैर अकेली कैसे रह पाऊंगी? मुझे इस तरह छोड़ कर मत जाइए, वरना मैं पागल हो जाऊंगी.’’
‘‘ऐसा नहीं कहते सविता. मैं हमेशा के लिए तुम्हें छोड़ कर थोड़े ही जा रहा हूं. तुम क्या समझाती हो कि तुम्हें यहां छोड़ते हुए मुझे दर्द नहीं हो रहा है?
‘‘अरे पगली, मैं तो खुशहाल जिंदगी बिताने की खातिर पैसा कमाने दुबई जा रहा हूं. यहां मां तो हैं ही, मैं अपने भानजे प्रवीण को भी छोड़ कर जा रहा हूं. वह बहुत अच्छा लड़का है. वह यहीं पर रह कर अपनी डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करेगा और तुम्हारी देखभाल भी, ताकि तुम खुद को अकेला महसूस न करो.’’
यह सुन कर सविता अमन के सीने से लिपट गई.
कुछ ही दिनों के बाद अमन दुबई चला गया. उस के जाने के बाद सविता गुमसुम रहने लगी. वह पति के खयालों में खोई रहती.
सविता की सास अपना ज्यादातर समय मंदिर में गुजारतीं या पड़ोसियों से गपशप करती रहतीं.
अपनी मामी की मायूसी देख कर प्रवीण भी काफी दुखी था. उस की पीड़ा को वह अच्छी तरह से महसूस कर रहा था, क्योंकि वह भी शादीशुदा था.
प्रवीण की शादी एक साल पहले गांव की एक अनपढ़, गंवार लड़की से हुई थी, जिसे वह नापसंद करता था.
प्रवीण के दूर के रिश्ते के मामा अमन की इच्छा थी कि वह यहां अपनी पढ़ाई पूरी करे और अपनी मामी व इस घर की देखभाल भी करे.
समय की रफ्तार के साथसाथ सविता भी अब कुछ सहज हो गई थी. वह कभीकभार प्रवीण से हंसीमजाक कर लिया करती थी, लेकिन प्रवीण इस का दूसरा मतलब ही निकालता था.
प्रवीण यही सोचा करता, ‘काश, सविता जैसी खूबसूरत औरत से मेरी शादी हुई होती, तो कितना मजा आता.’
एक दिन प्रवीण का दिल बहुत ही बेचैन था. वह देह सुख की कामना कर रहा था. उस ने अलमारी से एक पतली सी किताब निकाली और उसे देखने लगा. भड़काऊ तसवीरें देख कर वह मस्ती में आ गया, लेकिन मामी की जवानी के आगे उसे वे तसवीरें फीकी लगने लगीं.
प्रवीण ने वह किताब बंद कर के मेज पर रख दी और कुछ सोचने लगा. अचानक उस ने सविता को आवाज लगाई, ‘‘मामी, जरा चाय तो बना देना. मेरे सिर में तेज दर्द हो रहा है.’’
‘‘अभी लाई,’’ सविता ने कहा.
थोड़ी देर बाद चाय से भरे प्याले को प्रवीण की ओर बढ़ाते हुए सविता ने कहा, ‘‘इतना क्यों पढ़ते हो कि सिर में दर्द हो जाए? गांव से अपनी बीवी को क्यों नहीं बुला लेते, जो तुम्हारे सिर के दर्द को पलभर में दूर कर देगी?’’
‘‘बीवी को बुला कर क्या होगा मामी? जब आप यहां हैं, तो मुझे क्या सोचना? आप के नाजुक हाथों के बने खाने का तो क्या कहना…’’
‘‘बस… बस, अब और ज्यादा तारीफ न करो,’’ सविता ने हंसते हुए कहा.
‘‘कैसे न करूं… जब आप चीज ही ऐसी हैं, तो तारीफ करना मेरा फर्ज बन जाता है. इस समय मेरे सिर में तेज दर्द हो रहा है,’’ माथे पर अपनी उंगलियों का दबाव डालते हुए प्रवीण ने कहा.
‘‘मैं तुम्हारा सिर दबा दूं?’’ सविता ने पूछा.
‘‘आप दबाएंगी मेरा सिर? नहींनहीं, दर्द अपनेआप ठीक हो जाएगा,’’ प्रवीण ने झिझकते हुए कहा.
‘‘अपनेआप कैसे ठीक होगा? इधर आओ, मैं दबा देती हूं. अगर हम दोनों एकदूसरे की तकलीफ में साथ नहीं देंगे, तो और कौन देगा?’’ सविता ने अपनेपन से कहा.
सविता के हाथों की छुअन पा कर प्रवीण सिहर उठा. उस का रोमरोम खुशी से नाच उठा.
तभी सिर दबातेदबाते सविता की छाती अचानक प्रवीण के सिर से टकरा गई. अब तो वह बारबार अपने सिर को ऐसे झटके देने लगा, ताकि वह सविता की छाती से जा टकराए. लेकिन सविता ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया.
जब काफी देर हो गई, तो प्रवीण ने कहा, ‘‘अब बस भी कीजिए मामी, नहीं तो आप के हाथ भी दर्द करने लगेंगे.’’
सविता पीछे हट गई और मेज पर रखी चाय का प्याला उठा कर पलंग पर प्रवीण के पास ही बैठ गई. किताब के पन्ने पलटने पर जब सविता ने नंगी तसवीरें देखीं, तो वह गुस्से से बोली, ‘‘क्या तुम ऐसी गंदी तसवीरें देखते रहते हो?’’
प्रवीण ने झेंपते हुए पूछ लिया, ‘‘क्या आप को ये तसवीरें अच्छी नहीं लगतीं?’’
‘‘देखने से क्या फायदा?’’ सविता ने कहा.
‘‘फायदा तो इतना है कि मत पूछो. कम से कम दिल में उठ रहे सैलाब को तो शांत ही कर देती हैं.’’
‘‘ठीक है, तब तुम इन्हें ही घूरते रहो… मैं तो चली,’’ इतना कह कर वह उठ खड़ी हुई.
रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी, लेकिन सविता की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वह बारबार बिस्तर पर करवटें बदल रही थी. उस की आंखों के सामने बारबार वही नंगी तसवीरें घूम रही थीं. उस के तनबदन में आग लग गई थी. ऐसे समय में उसे अमन की बहुत याद आ रही थी.
सविता बिस्तर से उठ खड़ी हुई. उस ने 2 गिलास ठंडा पानी पीया, तब कहीं जा कर उसे कुछ राहत महसूस हुई.
अगले दिन कालेज से लौटते ही प्रवीण ने रसोईघर में काम कर रही मामी को पीछे से अपनी बांहों में जकड़ लिया और बोला, ‘‘अब तो मैं जल्दी ही डाक्टर बन जाऊंगा. इसी बात पर चाय हो जाए.’’
‘‘यह क्या करते हो… छोड़ो मुझे .. ऐसी हरकतें मुझे बिलकुल पसंद नहीं,’’ सविता ने गुस्से से कहा और दूर जा कर खड़ी हो गई.
प्रवीण अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए सोचने लगा, ‘लगता है, मामी दिल से तो मुझ पर मेहरबान हैं, लेकिन ऊपर से नखरे दिखा रही हैं. कोई बात नहीं, मैं इन्हें काबू में कर के ही रहूंगा.’
एक दिन सुबह के 8 बज गए, पर सविता की आहट न सुनाई दी. अपने कमरे से बाहर निकलते हुए प्रवीण ने चारों ओर देखा, पर वह कहीं भी दिखाई न दी. मां भी मंदिर गई हुई थीं.
तभी प्रवीण को ऊपर वाले कमरे से खांसने की आवाज सुनाई दी, तो वह सीढि़यां चढ़ते हुए बोला, ‘‘अरे, आप अभी तक सो रही हैं. तबीयत तो ठीक है न?’’
‘‘रातभर खांसतेखांसते मेरी छाती में दर्द हो गया है,’’ अपनी साड़ी को ठीक करते हुए सविता ने कहा.
‘‘तो आप ने मुझे क्यों नहीं जगा दिया? कम से कम कुछ दवा तो दे देता. कहां हो रहा है दर्द?’’ इतना कहते हुए वह सविता के करीब बैठ गया.
सविता ने झिझकते हुए अपनी छाती से आंचल को थोड़ा सा सरका दिया और बोली, ‘‘यहां दर्द है.’’
सविता की छाती पर हाथ रखते ही प्रवीण का मन बहकने लगा. उसे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि सविता इतनी आसानी से ऐसा करने देगी.
जैसे ही सविता ने प्रवीण को अपनी हद से बाहर जाते देखा, तो वह गरज उठी, ‘‘प्रवीण, यह क्या बदतमीजी है? तुम हद से आगे बढ़ रहे हो…’’
‘‘हद… अब मुझ से अपनी हद में नहीं रहा जाता. जब संगमरमर सा बदन मेरे सामने हो, तो मैं कैसे अपनी हद में रह सकता हूं?’’
यह सुन कर सविता गुस्से से भड़क उठी और उस के हाथों को झटका देते हुए गरज पड़ी, ‘‘प्रवीण, मेरी मजबूरियों का फायदा न उठाओ, वरना तुम्हें पछताना पड़ेगा.
‘‘मैं ने तो अपनी छाती से आंचल को इसलिए सरकाया था कि एक डाक्टर को अपनी बीमारी बता रही हूं, लेकिन तुम तो पूरे हैवान निकले.
‘‘मुझे ऐसे आदमी का सहारा नहीं चाहिए, जो मेरी इज्जत पर ही नजर गड़ाए बैठा हो. मैं तुम से सख्त नफरत करती हूं. दूर हो जाओ मेरे सामने से.’’
‘‘अब दूर नहीं हो सकता. भले ही आप मुझ से नफरत करें, लेकिन मैं तो आप से बेहद मुहब्बत करता हूं, इसलिए आप बगैर किसी हिचकिचाहट के मेरी बांहों में समा जाइए, वरना मजबूर हो कर मुझे जबरदस्ती करनी पड़ेगी.’’
‘‘क्या तुम मुझ से जोरजबरदस्ती करोगे? ऐसा कहने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? दोबारा मुझे छू कर दिखाओ. तुम्हारे हाथ न तोड़ दिए, तो मेरा नाम भी सविता नहीं.’’
‘‘इन बेकार की धमकियों में क्या रखा है? देखती नहीं, मेरी बांहें तुम्हें कसने को कब से बेकरार हैं?’’ इतना कहते हुए प्रवीण धीरेधीरे सविता की ओर बढ़ने लगा.
‘‘खबरदार, जो एक कदम आगे बढ़ाया, नहीं तो मैं तुम्हारा मुंह नोच लूंगी, आंखें फोड़ दूंगी, ताकि तुम फिर कभी किसी पर बुरी नजर न डाल सको,’’ सविता ने बिफरते हुए कहा.
तब तक प्रवीण उसे अपनी बांहों में कस कर जमीन पर पटक चुका था.
प्रवीण पर हैवानियत का भूत पूरी तरह से सवार हो चुका था. वह उसे बुरी तरह से नोचखसोट रहा था.
अचानक सविता ने एक ऐसी लात चलाई, जो सीधे प्रवीण की नाक पर जा लगी. वह दर्द से बिलबिला उठा. उस की नाक से खून का फव्वारा फूट पड़ा.
यह देख प्रवीण गुस्से से बौखला उठा. इस से पहले कि वह सविता पर दोबारा झपटता, वह दौड़तीचिल्लाती हुई नीचे की ओर भागी.
प्रवीण भी उस के पीछे भागा. जब सविता ने यह देख लिया कि आज उस की इज्जत बचने वाली नहीं है, तो उस ने एक फैसला ले लिया.
सविता दौड़ती हुई रसोई में घुस गई. उस के पीछे प्रवीण भी वहीं जा पहुंचा. उस ने रसोई में घुसते ही सविता को अपनी बांहों में जकड़ लिया, लेकिन इस बार सविता ने उस की जरा भी खिलाफत नहीं की, बल्कि खिलखिलाते हुए कहा, ‘‘वाह प्रवीण वाह, शाबाश… आखिर तुम अपने इम्तिहान में कामयाब हो ही गए.’’
‘‘क्या?’’ प्रवीण ने हैरानी से पूछा.
‘‘हां, सचमुच. मैं भी तुम से उतनी ही मुहब्बत करती हूं, जितनी तुम मुझ से,’’ सविता ने उतावलेपन से कहा.
‘‘ओह मेरी प्यारी अच्छी मामी,’’ इतना कहते हुए प्रवीण ने फिर उसे अपनी बांहों में भर लिया.
‘‘इतनी बेसब्री भी ठीक नहीं. पहले दरवाजा तो बंद कर दो. हां, ताला भी लगा देना…’’
‘‘उस के बाद क्या होगा?’’ प्रवीण ने पूछा.
‘‘जाओ, मैं नहीं बताती. जैसे तुम कुछ जानते ही नहीं,’’ सविता ने कहा.
‘‘अच्छा, यह लो चाबी, मैं ने ताले को अच्छी तरह बंद कर दिया है,’’ प्रवीण ने कुछ देर बाद कहा.
‘‘लेकिन तुम ने वह सामने वाली खिड़की तो अभी तक बंद नहीं की. उसे भी बंद कर के परदा गिरा दो. मुझे रोशनी में शर्म आती है.’’
‘‘अच्छा, यह लो, खिड़की भी बंद किए देता हूं,’’ कहते हुए प्रवीण खिड़की की ओर बढ़ गया, तभी बगैर एक पल गंवाए सविता ने अपने हाथ में ली हुई चाबी को दरवाजे के नीचे से बाहर की ओर फेंक दिया और गैस सिलैंडर में लगे रबड़ के पाइप को झटके से खींच दिया.
पाइप खिंचते ही तेजी से गैस निकलनी शुरू हो गई. इतने में सविता ने पास रखी माचिस को उठा कर जला दिया. नतीजतन, एक जोर का धमाका हुआ और पलभर में ही दोनों की धज्जियां उड़ गईं.
-रवि प्रकाश गुगड़




