Hindi Short Story. हरि ने मुख्यमंत्री के बड़े से सरकारी घर पर एक नजर डाली, जहां सैकड़ों लोग हाथों में अर्जी लिए खड़े थे.
‘‘सिपाही भैया, आज मुख्यमंत्री जनता दरबार में आएंगे न?’’ एक बुढि़या ने अपनी धुंधली ऐनक और पोपला मुंह पोंछते हुए पूछा. ‘‘पता नहीं,’’ सिपाही से जवाब मिला.
हरि पिछले 3 दिन से इस जनता दरबार में आ रहा था, पर मुख्यमंत्री के पास जनता के लिए समय नहीं था. कतार में घंटों तपने के बाद वह अपनी बीमार बहिन को ले कर लौट जाता था.
हरि ने गमछे से मुंह पोंछा और पैबंदों से भरी छतरी की अधूरी छाया में लेटी कराहती हुई बड़ी बहिन की ओर देखा.
‘‘पानी पीओगी?’’ हरि ने पूछा. बहिन ने सिर हिला कर हामी भरी और हरि प्लास्टिक की मटमैली बोतल का गरम पानी उसे पिलाने लगा.
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‘‘बेटा, यह कौन है?’’ पास बैठी बुढि़या ने फटीमैली धोती के पल्ले से सिर ढकते हुए पूछा.
‘‘मेरी दीदी हैं.’’ ‘‘बीमार हैं?’’ ‘‘बहुत, इसीलिए तो मदद की आस ले कर यहां आया हूं. हमारा गांव यहां से 5 सौ किलोमीटर दूर है.’’
‘‘मैं भी बड़ी दूर से अकेली आई हूं. रेल के डब्बे में दरवाजे के पास 2 दिन बैठ कर यहां तक आ पाई हूं. 2 दिन से कुछ खाने को भी नहीं मिला है.’’
‘‘मेरे पास सत्तू है. आओ, खा लें. मैं भी भूखा हूं.’’ वे दोनों सत्तू बांटने लगे और अपने दुखदर्द भी.
‘‘मेरे बेटेबहू मुझे रोटी तक नहीं देते. मारपीट कर घर से निकाल दिया है. पंचायत वाले विधवा पैंशन भी नहीं दे रहे हैं. रिश्वत मांग रहे हैं. मैं गरीब हूं, रिश्वत कहां से दूं? अब मुझसे मजदूरी नहीं होती. भूख बरदाश्त नहीं होती. बस, जब तक जिंदा हूं, भटक रही हूं.’’
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