‘‘बे टा, मैं तुम से कितने दिनों से कह रहा हूं कि अंदर कोठरी में पीतल के टूटेफूटे पुराने बरतन पड़े हैं, उन्हें कपड़े में बांध कर शहर ले जा और बेच आ.’’
‘‘दादाजी, ये सारे बरतन टूटफूट जाएंगे. मेरा तो कहना है कि इन बरतनों को यहीं गांव के ही लाला को बेच दो और उस के बदले में घर का छोटामोटा सामान खरीद लो.’’
‘‘अरे बेटा, यह लाला इतने सारे बरतनों का कुछ भी पैसा नहीं देगा. वह ठग है, पूरा ठग. मेरी मान, इन्हें शहर ले जा और बेच आ. वहां अच्छे पैसे मिल जाएंगे.’’
‘‘अच्छा दादाजी, मुझे जब भी समय मिलेगा, बेच आऊंगा.’’
‘‘अरे बेटा, फिर वही बात. इन बरतनों को कल ही ले जा न. कल कोई खास काम है क्या?’’
‘‘अच्छा दादाजी, ठीक है.’’
अगले दिन सुबहसवेरे उन बरतनों को एक कपड़े में बांध कर मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गया. स्टेशन तक के लिए मैं ने अपने छोटे भाई को भी अपने साथ ले लिया था.
टिकट खरीदने के बाद छोटा भाई बरतनों का गट्ठर गाड़ी में रख कर गांव लौट गया. डब्बे में काफी भीड़ थी, इसलिए मैं ने गट्ठर को वहीं दरवाजे के पास ही रख दिया. वैसे भी वहां से शहर की दूरी ज्यादा नहीं थी.
गाड़ी को स्टेशन से चले अभी 5 मिनट ही हुए थे कि एक टीटी टिकट चैक करने वहां आ गया. उस ने बालपैन को कान के ऊपरी हिस्से में टांग रखा था.
मैं ने कुरते की जेब से टिकट निकाल कर उसे दिखाया, तो वह आंखें तरेरते हुए बोला, ‘‘इन बरतनों का टिकट.’’
जब टीटी ने बरतनों की तरफ इशारा कर के मुझ से बरतनों का टिकट मांगा, तो मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.
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