Family Relationship Story. सुरेंद्र की आंखें नम थीं. सैंट्रल जेल से छूटते ही वह भारी कदमों से स्टेशन की ओर चलने लगा.

‘गांव पहुंच कर अम्मांबाबा को क्या मुंह दिखाऊंगा? यहां भी मेरी वजह से भैयाभाभी को कितना अपमान सहना पड़ा? इस से अच्छा तो 3 साल की सजा की जगह फांसी मिल जाती,’ यह सोच कर सुरेंद्र रोने लगा.

अब सुरेंद्र के कदम तेजी से स्टेशन की तरफ बढ़ रहे थे. वहां पहुंच कर पता चला कि ट्रेन एक घंटा लेट है. टिकट ले कर वह प्लेटफार्म पर एक तरफ खाली बैंच पर बैठ गया. धीरेधीरे पुरानी यादें उसे घेरने लगी थीं.

4 साल पहले जोश, जुनून और कुछ करगुजरने की चाहत लिए सुरेंद्र इसी स्टेशन पर उतरा था, तब भैया और भाभी उसे लेने आए थे.

2 दिन की तनख्वाह कटवा कर भैया ने एक दिन की छुट्टी ली है, यह जान कर सुरेंद्र को दुख हुआ, तो उन्होंने समझाया, ‘पैसा कभी इनसान से बढ़ कर नहीं होता और तू तो मेरा अपना है... मेरा प्यारा भाई.’

दूसरे दिन सुरेंद्र का दाखिला कालेज में हो गया.

‘कहां गांव के गंवार लोग, घासफूस के घर, गोबरजानवर और कहां शहर की मौडर्न लाइफ...

‘काश, मैं यहां पहले ही आ गया होता,’ सोचते हुए सुरेंद्र कालेज से घर आ रहा था, तभी उस की नजर एक लड़की पर गई.

उस लड़की की खूबसूरती को देख वह तो मानो ठगा सा रह गया.

‘ऐ मिस्टर, क्या देखते हो? मेरी स्कूटी चल नहीं रही है... मदद करो,’ उस लड़की की मीठी आवाज सुरेंद्र के कानों में पड़ी.

वह लड़की कभी सैल्फ स्टार्ट बटन दबाती, तो कभी जोरजोर से किक मारती. उस के चेहरे पर पसीना भी झिलमिलाने लगा था.

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