सबे की उस पुरानी सड़क पररामू जनरल स्टोरसिर्फ एक दुकान का नाम नहीं था, बल्कि यह लोगों की एक आदत बन चुका था. सुबह की पहली चाय से ले कर रात के आखिरी दूध तक, हर जरूरत का एक ही ठिकाना. किराना, दूध, छोटीमोटी दवा, कौस्मैटिक्स, आलूप्याज, लहसुन से कौपी, पैंसिलपैन तक सभी कुछ यहां मिलता था. तीनों भाई, बूढ़े पिता और बीच में खड़ा रामू... तेज आवाज, तेज हिसाब और उस से भी तेज दिमाग. पर उस का दिल उतना बड़ा नहीं था, जितनी उस की दुकान. वह मनमाने दाम लगाता.
खराब सामान लौटाने से साफ मना कर देता. कंपनी के मुफ्त औफर दबा जाता और जब कोई कहता, ‘‘भैया,

यह तो गलत है,’’ तो रामू ठंडी मुसकान के साथ जवाब देता, ‘‘नहीं लेना तो
मत लो.’’
लोग चुप रह जाते. मजबूरी थी. कसबे में और औप्शन था भी तो नहीं.
समय धीरेधीरे करवट ले रहा था और बदलाव की बयार गांवकसबे में भी आई. स्मार्टफोन हर हाथ में गया. अब लोग गांवकसबे में इंटरनैट इस्तेमाल करने लगे थे.
स्मार्ट फोन और हर किसी का बैंक में खाता होने से क्रडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, पेटीएम का इस्तेमाल सीख रहे थे कसबे के लोग.
इंटरनैट ने गांव और शहर के
बीच की दूरी मिटा दी. लोग अब
घर बैठे सामान मंगाने लगे... एमेजौन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकेट, मिंत्रा, मीशो सबकुछ सस्ता, साफ दाम और खराब हो तो बिना बहस सामान की वापसी.
पहलेपहल रामू हंसा, ‘‘मोबाइल से राशन आएगा? अरे, यह भी कोई
बात हुई...’’
लेकिन यह हंसी धीरेधीरे सूख गई. दुकान की भीड़ कम होने लगी. पुराने ग्राहक दिखना बंद हो गए. रोज का हिसाब घटने लगा.
पिता की आंखों में चिंता उतर आई. एक रात उन्होंने धीमे से कहा, ‘‘बेटा, कारोबार में पैसा नहीं, भरोसा कमाया जाता है. हम ने देर कर दी शायद.’’
रामू चुप रहा. उस ने पहली बार महसूस किया कि शायद गलती उस की भी थी.
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी... और फिर कसबे में एक और नाम गूंज... ‘ब्लिंकेट’... मिनटों में सब्जी, दूध, दाल, आटा... घर बैठे...
अब लोग घर से निकलना भी कम करने लगे. एक दिन रामू की दुकान का शटर हमेशा के लिए गिर गया.
कुछ महीनों बाद वही रामू, पीठ पर बैग लटकाए, डिलीवरी की यूनिफार्म में, दरवाजे खटखटाता दिखाई दिया, ‘‘ब्लिंकेट डिलीवरी.’’

दरवाजा खुला. सामने वही बुजुर्ग अम्मां थीं, जिन की खराब दाल उस ने कभी बदलने से मना कर दिया था.
अम्मां ने उसे पहचान लिया. एक पल को दोनों की आंखें मिलीं. रामू की आंखें ?ाक गईं.
अम्मां ने सामान लिया और धीरे से बोलीं, ‘‘बेटा, जिंदगी सिखा देती है ?’’
रामू की आवाज भर्रा गई, ‘‘हां, अम्मां, अब सम? आया है.’’
सीढि़यां उतरते हुए रामू की आंखों में नमी थी. उसे याद आया कि कैसे लोग उस से हाथ जोड़ कर कहते थे, ‘‘भैया, बदल दीजिए,’’ और वह कठोर बना रहता था.
आज वही हाथ, दरवाजे की घंटी दबाने से पहले हलका सा कांप रहे थे.
घर लौट कर रामू ने पिता के पास बैठते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, अगर फिर कभी दुकान खोली, तो सब से पहले भरोसा बेचेंगे.’’
पिता की बूढ़ी आंखों में आंसू थे. उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘‘अब तू बड़ा हो गया है बेटा.’’
कभी ग्राहक रामू के सामने खड़े होते थे, आज वह ग्राहकों के दरवाजे पर खड़ा था.
यह समय का मजाक नहीं था. यह समय का आईना था, जिस में रामू पहली बार खुद को साफ देख पा रहा था

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