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मुसलिमों की बात करें, तो इस समुदाय में सजायाफ्ता कैदियों का अनुपात 15.8 फीसदी है, जो आबादी में उन की भागीदारी से थोड़ा सा ज्यादा है.

लेकिन विचाराधीन कैदियों में उन का हिस्सा कहीं ज्यादा 20.9 फीसदी है. सारे दोषसिद्ध अपराधियों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की आबादी क्रमश: 20.9 फीसदी और 13.7 फीसदी है, जिसे काफी ज्यादा कहा जा सकता है.

अगर भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों की बात करें, तो विचाराधीन कैदियों को उन के कुसूरवार साबित होने से पहले तक बेकुसूर माना जाता है, लेकिन जेल में बंद किए जाने के दौरान उन पर अकसर मानसिक और शारीरिक जुल्म किए जाते हैं और उन्हें जेल में होने वाली हिंसा का सामना करना पड़ता है.

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इन में से कई तो पारिवारिक, आसपड़ोस और समुदाय के रिश्तों के साथसाथ अकसर अपनी आजीविका भी गंवा देते हैं. इस से भी ज्यादा बड़ी बात यह है कि जेल में बिताया गया समय उन के माथे पर कलंक लगा देता है. यहां तक कि उन के परिवार, सगेसंबंधियों और समुदाय को भी उन की बिना किसी गलती के शर्मिंदगी  झेलनी पड़ती है.

विचाराधीन कैदियों की पहुंच कानूनी प्रतिनिधियों तक काफी कम होती है. कई विचाराधीन कैदी तो काफी गरीब परिवार से होते हैं, जो मामूली अपराधों के आरोपी हैं. अपने अधिकारों की जानकारी न होने और कानूनी मदद तक पहुंच नहीं होने के चलते उन्हें काफी समय तक जेलों में बंद रहना पड़ रहा है.

पैसे और मजबूत सपोर्ट सिस्टम की कमी और जेल परिसर में वकीलों से बातचीत करने की ज्यादा क्षमता न होने के चलते अदालत में अपना बचाव करने की उन की ताकत कम हो जाती है.

ये हालात सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले के बावजूद हैं, जिस में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि संविधान का अनुच्छेद 21 बंदियों को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार देता है.

साल 2005 से प्रभाव में आने वाले अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के अनुच्छेद 436 (ए) के प्रावधानों के बावजूद विचाराधीन कैदियों को अकसर अपनी जिंदगी के कई साल सलाखों के पीछे गुजारने पर मजबूर होना पड़ रहा है.

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इस अनुच्छेद के मुताबिक, अगर किसी विचाराधीन कैदी को उस पर लगे आरोपों के लिए तय अधिकतम कारावास की सजा के आधे समय के लिए जेल में बंद रखा जा चुका है, तो उसे निजी मुचलके पर जमानत के साथ या बिना जमानत के रिहा किया जा सकता है.

यह अनुच्छेद उन आरोपियों पर लागू नहीं होता, जिन्हें मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है. लेकिन जैसा कि प्रिजन स्टैटिस्टिक्स, 2014 दिखाता है, किसी अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता के तहत आरोपित 39 फीसदी विचाराधीन कैदियों को आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा नहीं दी जा सकती थी.

जेलों में अफसरों की 33 फीसदी सीटें खाली पड़ी हैं और सुपरवाइजिंग अफसरों की 36 फीसदी रिक्तियां नहीं भरी गई हैं. मुलाजिमों की भीषण कमी के मामले में दिल्ली की तिहाड़ जेल देश में तीसरे नंबर पर है. इस जेल के भीतर बहाल मुलाजिमों की तादाद जरूरत से तकरीबन 50 फीसदी कम है.

औरत कैदी, मासूम बच्चे

भारत की जेलों में विचाराधीन कैदियों में एक बड़ा तबका औरतों का भी है. वे औरतें जेलों में अकेली नहीं हैं. उन के साथ उन के बच्चे भी इस यातना के बीच पलबढ़ रहे हैं. बात सिर्फ जेल में बंद होने भर की नहीं होती.

पहली नजर में छोटी उम्र के बच्चों का कुसूर सिर्फ इतना है कि उन्हें पता ही नहीं कि उन की मां कुसूरवार है भी या नहीं. इन जेलों में बंद औरतों की सेहत का मुद्दा भी किसी अस्पृश्य विषय की तरह सा लगने लगता है. आखिर वे ‘विचाराधीन’ जो हैं.

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सुबह के 9 बज रहे हैं. नन्हेमुन्ने बच्चों की यह जमात यूनीफौर्म पहने जगदलपुर केंद्रीय कारागार से कतार में निकल रही है. अपनेअपने बस्ते पीठ पर टांगे हुए पास के ही सरकारी स्कूल की तरफ इन का रुख है. वैसे तो ये जेल के बाशिंदे हैं, लेकिन ये यहां सजा नहीं काट रहे हैं. चूंकि ये छोटे हैं, इसलिए ये अपनी माताओं के साथ जेल में रह रहे हैं.

अफसर बताते हैं कि इन में से कुछ बच्चों का जन्म जेल में ही हुआ है. यहां 97 औरत कैदी हैं, जिन में से महज 29 विचाराधीन हैं, जबकि बाकी वे हैं जो सजायाफ्ता हैं या फिर विशेष सुरक्षा अधिनियम के तहत बंद हैं.

इन औरत कैदियों के साथ रह रहे 12 बच्चे, अब जेल प्रशासन की ही जिम्मेदारी हैं. इन के रहने, खानेपीने, पढ़ाईलिखाई और सेहत का इंतजाम जेल प्रशासन को ही करना पड़ता है.

जेल के अफसर कहते हैं कि जिन बच्चों की उम्र 6 साल से ऊपर है, उन्हें सरकारी स्कूल के छात्रावास में रखा गया है, जबकि छोटे बच्चे अपनी माताओं के साथ औरतों के वार्ड में ही रह रहे हैं.शशिकला पिछले 6 महीनों से जगदलपुर की जेल में बंद है. उस पर अपने ही पति की हत्या का मामला चल रहा है. लेकिन इस दौरान उस को किसी भी तरह की न्यायिक मदद नहीं मिल पाई है.

इस की वजह वह बताती है कि उस का इस दुनिया में कोई नहीं है. उस की कोई औलाद भी नहीं है. उस से जेल में मिलने भी कोई नहीं आता है. उस का कहना है कि वह अब तक अपने लिए कोई वकील तक नहीं कर पाई है.

आंकड़ों के अनुसार 1,603 औरतें अपने बच्चों के साथ जेलों में हैं. इन के बच्चों की तादाद 1,933 है.

जामिया मिल्लिया इसलामिया यूनिवर्सिटी के ‘सरोजनी नायडू फौर वुमन स्टडीज’ की कानून विशेषज्ञ तरन्नुम सिद्दीकी कहती हैं कि औरतों में तालीम की कमी उन के जेल जाने की सब से बड़ी वजह है. वे मर्दवादी सोच को ही औरतों के खिलाफ दर्ज मामलों की अहम वजह मानती हैं.

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उन का कहना है कि पुलिस में औरतों की तादाद काफी कम है. पुलिस कई बार अपनी इस सोच की वजह से औरतों को उठा कर जेलों में डाल देती है और वहां उन का शोषण भी किया जाता है.

हालांकि, सैंट्रल जेलों के हालात थोड़े बेहतर हैं, लेकिन कई जेलें ऐसी हैं जहां औरत कैदियों को खराब हालत में रखा गया है, जिस से सेहत को ले कर उन्हें काफी सारी परेशानियां  झेलनी पड़ती हैं. कई जेलों में तो उन्हें दूसरी रोजमर्रा की चीजें भी नहीं मिल पाती हैं. उपजेलों या जिला जेलों में बंद ऐसे कैदियों का हाल ज्यादा खराब है.

देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली की जेलें सब से ज्यादा भरी हुई हैं और इन में जेल सिक्योरिटी वालों और सीनियर सुपरवाइजरी मुलाजिमों की भारी किल्लत है. उत्तर प्रदेश, बिहार और  झारखंड जैसे राज्यों की जेलों में सिक्योरिटी वालों के नाम पर सब से कम लोग तैनात हैं. यहां जेलरों, जेल सिक्योरिटी और सुपरवाइजर लैवल पर 65 फीसदी से ज्यादा रिक्तियां हैं.

जेल मुलाजिमों की भारी कमी और जेलों पर क्षमता से ज्यादा बो झ, जेलों के भीतर बड़े पैमाने पर हिंसा और दूसरी आपराधिक गतिविधियों जैसी कई

वजहें कैदियों का फरार होना बनती हैं. अलगअलग घटनाओं में साल 2015 में पंजाब में 32 कैदी जेलों से फरार हो गए, जबकि राजस्थान में ऐसे मामलों की तादाद बढ़ कर 18 हो गई. महाराष्ट्र में 18 कैदी फरार होने में कामयाब रहे.

साल 2015 में हर रोज औसतन 4 कैदियों की मौत हुई. कुलमिला कर 1,584 कैदियों की जेल में मौत हो गई. इन में 1,469 मौतें स्वाभाविक थीं, जबकि बाकी मौतों के पीछे अस्वाभाविक वजह का हाथ माना गया.

अस्वाभाविक मौतों में दोतिहाई यानी 77 खुदकुशी के मामले थे, जबकि 11 की हत्याएं साथी कैदियों द्वारा कर दी गईं. इन में से 9 दिल्ली की जेलों में थे. साल 2001 से साल 2010 के बीच 12,727 लोगों की जेलों के भीतर मौत होने की जानकारी है.

अगर कोई पेशेवर सरगना या कोई सफेदपोश अपराधी जेल के अफसर की मुट्ठी गरम करने को तैयार है, तो वह जेल परिसर के भीतर मोबाइल, शराब और हथियार तक रख सकता है, जबकि दूसरी तरफ सामाजिक व माली तौर पर पिछड़े हुए विचाराधीन कैदियों को सरकारी तंत्र द्वारा उन की बुनियादी गरिमा से भी वंचित रखा जा सकता है, इसलिए इस में कोई हैरानी की बात नहीं कि जेल महकमा देश के उन कुछ निर्वाचित प्रतिनिधियों की पसंद रहा है, जिन के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

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मजबूत ह्विसिल ब्लोवर प्रोटैक्शन ऐक्ट की गैरमौजूदगी और जेलों पर जरूरत से ज्यादा बो झ और मुलाजिमों की भारी कमी के चलते भारतीय जेलें राजनीतिक रसूख वाले अपराधियों के लिए एक आरामगाह और कमजोर विचाराधीन कैदियों के लिए नरक के समान बनी रहेंगी. मीडिया में कभीकभार  मचने वाले शोरशराबे का इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

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