Editorial . जब से अंगरेजों ने पढ़नेलिखने का मौका सभी लोगों को अपने म्यूनिसिपल स्कूलों में देना शुरू किया, पूजापाठी लोगों ने, जो कर्ज और जाति का मुगलों के जमाने में भी फायदा उठाते रहे थे, अंगरेजों को जम कर कोसना शुरू कर दिया. उन्होंने पूरी कोशिश की कि आम ओबीसी, एससीएसटी बच्चे पढ़ नहीं पाएं और अगर पढ़ें तो सिर्फ पूजापाठ का लैसन पढ़ें.
वे बहुत हद तक कामयाब भी रहे. स्कूलों को खोला गया पर सिर्फ ऊंची जातियों के गुरुओं को पैसा दिलवाने वाली मुफ्त वाली नौकरी देने के लिए, पढ़ाने की कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई.
2023-24 में 14 लाख सरकारी स्कूलों में से 12,594 तो ऐसे थे जिन में कोई स्टूडैंट नहीं था, पर टीचर थे. अब सरकारें धड़ाधड़ ऐसे स्कूलों को बंद कर रही हैं पर टीचर्स को हटाया नहीं जा रहा. उन्हें दूसरे स्कूलों में भेज दिया गया है और स्कूल की बिल्डिंग को किसी ऐरेगैरे के हाथों बेच दिया जाता है.
असल में बढ़ती जनसंख्या की वजह से ज्यादा बच्चे पढ़ना चाहते हैं पर सरकारी स्कूलों में जाति का भेदभाव मंडल कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद और राममंदिर के हल्ले के बाद बढ़ा दिया गया है पर पिछले दरवाजे से. यह दरवाजा है कि सरकारी स्कूलों को इतना बदहाल कर दो और वहां इस तरह का भेदभाव पैदा करो कि कोई पढ़ने आए ही नहीं. मांबाप चाहते हैं कि उन के बच्चे पढ़ें और कोई वजह नहीं कि तीसरी क्लास तक बच्चा आराम से लिखनापढ़ना न शुरू कर दे पर ये टीचर ओबीसी, एससीएसटी बच्चों को पढ़ाना ही नहीं चाहते.
आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें
डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन
सरस सलिल सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरस सलिल मैगजीन का सारा कंटेंट
- 1000 से ज्यादा सेक्सुअल हेल्थ टिप्स
- 5000 से ज्यादा अतरंगी कहानियां
- चटपटी फिल्मी और भोजपुरी गॉसिप
- 24 प्रिंट मैगजीन
डिजिटल
सरस सलिल सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरस सलिल मैगजीन का सारा कंटेंट
- 1000 से ज्यादा सेक्सुअल हेल्थ टिप्स
- 5000 से ज्यादा अतरंगी कहानियां
- चटपटी फिल्मी और भोजपुरी गॉसिप




