हरियाणा में बीजेपी ने 75 पार का सपना देखा था लेकिन महज 40 सीटों पर सिमट गई. जबकि 2014 में बीजेपी को 47 सीटें हासिल हुईं थी. यानी की बीजेपी को सात सीटों का नुकसान हुआ है. कांग्रेस को यहां बढ़त मिली है. कांग्रेस ने यहां 31 सीटें जीती हैं. इन सबके के बीच 11 महीने पहले बनी पार्टी जेजेपी ने दमदार प्रदर्शन करते हुए 10 सीटें जीती हैं. इस पार्टी के मुखिया हैं दुष्यंत चौटाला. इनेलो से निकाले जाने के बाद दुष्यंत चौटाला ने नई पार्टी जननायक जनता पार्टी बनाई और अब हरियाणा की राजनीति में दमदार एंट्री की है.

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हरियाणा विधानसभा चुनाव में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) को 11 सीटें मिलती दिख रही हैं. जेजेपी पिछले साल दिसंबर में जब आईएनएलडी (इंडियन नेशनल लोक दल) से निकलकर जेजेपी बनी तो पहले ही लिटमस टेस्ट में हरियाणा की जनता ने दिखा दिया था कि उसका रुख किधर है. जेजेपी ने अपनी ताकत का एहसास पहली बार तब कराया जब जींद विधानसभा के लिए इस वर्ष 28 जनवरी को उपचुनाव हुए.

बीजेपी, कांग्रेस, आईएनएलडी के साथ लड़ाई में दुष्यंत के छोटे भाई दिग्विजय ने जेजेपी कैंडिडेट के तौर पर 37,631 वोट हासिल किए जबकि 2014 में इस सीट पर जीत हासिल करने वाली आईएनएलडी को महज 3,454 वोटों से संतोष करना पड़ा. 2014 के विधानसभा चुनावों में आईएनएलडी को पूरे हरियाणा में 19 सीटें मिली थीं.

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हरियाणा की राजनीति में चौटाल परिवार सबसे मजबूत माना जाता है. पिछले साल इस परिवार में अनबन हो गई थी. जिसका अजय चौटाला की अपने पिता और आईएनएलडी के मुखिया ओमप्रकाश चौटाला और भाई अभय चौटाला के साथ अनबन हो गई. उसके बाद नवंबर 2018 में अजय चौटाला और हिसार से उनके सांसद पुत्र दुष्यंत चौटाला को आईएनएलडी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. उसके अगले ही महीने दिसंबर 2018 में दुष्यंत चौटाला ने जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) का गठन कर लिया. जेजेपी के बनने से आईएनएलडी को तगड़ा झटका लगा और उसके ज्यादातर पदाधिकारियों ने जेजेपी का रुख कर लिया.

इंडियन नेशनल लोकदल ने हरियाणा पर 2000 से 2004 के बीच आखिरी बार राज किया था और ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री बने थे. उस वक्त पार्टी को 90 में से 47 सीटें हासिल हुई थीं. 2005 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ 9 सीटें मिलीं. 2009 में कुछ राहत मिली और आईएनएलडी ने 31 सीटों पर जीत दर्ज की.

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आईएनएलडी प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले में 10 साल की सजा काटने के लिए तिहाड़ जेल में बंद हैं. चौटाला अगर जेल से छूट भी जाते हैं तो उनसे पार्टी में दोबारा जान फूंकने की उम्मीद नहीं के बराबर है क्योंकि वह 84 वर्ष के हो चुके हैं. अभय चौटाला अच्छे मैनेजर बताए जाते हैं, लेकिन वह अपने पिता की तरह जनता के बीच उतने लोकप्रिय नहीं हैं. इस चुनाव ने यह साबित कर दिया है.

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