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Hindi Story : रिजैक्शन

Hindi Story : कितना खुश और जोश में था वीर अपनी सगाई में. उम्र के इस दौर में, जब जोबन उछाह भर रहा हो, यह होना भी था. कभी उस ने लड़कियों के लिए खास उत्सुकता नहीं दिखाई थी.

दरअसल, उसे जैसे इस के लिए समय ही नहीं मिला था या समय ने उसे इस लायक रख छोड़ा था कि उस की इस में कोई दिलचस्पी ही नहीं रही थी.

मां की मौत तो बचपन में ही हो गई थी. तब वीर चौथी क्लास में था. पापा ने दूसरी शादी की और उसे होस्टल में भेज दिया गया. शायद पापा के मन में यह भाव या डर रहा हो कि उन की दूसरी पत्नी पता नहीं अपने इस सौतेले बेटे के साथ कैसा बरताव करेगी. इस तरह वह अचानक ही प्यार जैसे भावों से दूर अपनी एकाकी जिंदगी काटते रह गया था.

ऐसी बात नहीं थी कि वीर बिलकुल ही अकेला था. एक तो वह शुरू से ही शांत स्वभाव का रहा था, मां की मौत के बाद वह और भी चुप रहने लगा था. रहीसही कसर उस के होस्टल के सख्त अनुशासन और कायदेकानूनों ने पूरी कर दी थी.

होस्टल में लड़कों के कई ग्रुप थे. उन से भी वीर का कोई खास लगाव नहीं था. वह बस पढ़ाई और खेल तक ही सिमटा रहा. वैसे भी पढ़ाई में वह बहुत तेज था और सभी उसे किताबी कीड़ा ही मान कर चलते रहे.

दरअसल, जब भी वीर छुट्टियों में घर आता, तो यहां भी उसे कुछ खास लगाव हो नहीं पाया. आगे चल कर उस की दूसरी मां से भाईबहन हुए, तब तो ये दूरियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं. यह अलग बात है कि अब वे उस के प्रति अपनेपन का भाव रखने लगे थे. सौतेली मां खासतौर पर उस के खानपान का खास खयाल रखती थीं, ताकि गांव में कोई कुछ आरोप न लगा दे.

यह इत्तिफाक की बात थी कि 12वीं जमात पास करने के बाद वीर इंजीनियरिंग डिप्लोमा में चुन लिया गया था. यहां भी उस ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की बढि़या से पढ़ाई की और एक सरकारी नौकरी में लग गया. उस के पापा ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार उस से खुश था.

लेकिन वीर में एक यही कमी रह गई थी कि वह अपने डिप्रैशन से बाहर निकल नहीं पाया था. वह हमेशा खोयाखोया सा रहता था या खुद को उदास पाता. पापा ने इस के लिए उसे डाक्टर को दिखाया भी था.

डाक्टर ने कहा था कि चिंता की कोई बात नहीं है. यह समय के साथ ठीक हो जाएगा. शादी के बाद तो वीर बिलकुल ठीक हो जाएगा, इसलिए पापा ने उस की शादी की बात चलानी शुरू कर दी थी. कई जगह देखने के बाद बक्सर में एक जगह उस का रिश्ता तय हो गया था.

जैसा कि आमतौर पर नया चलन है, वीर की सगाई भी धूमधाम से कर दी गई. एक रिसौर्ट में दोनों परिवार अपने रिश्तेदारों के साथ जमा हुए और धूमधाम से सगाई की रस्म पूरी की गई थी. बिलकुल शादी जैसी धूमधाम. पहली बार वह किसी लड़की के करीब और साथसाथ बैठा था, उस से खुल कर बातें की थीं.

आज के इस जमाने में शादी का मतलब जब छोटेछोटे लड़के जानते हैं, तो वीर की तो बात ही अलग थी. फिर रूपा का तो कहना ही क्या. पहले उस ने उस के कंधे से सिर टिकाया, हाथों में हाथ लिया और बातें करने लगी. उसे भी यह सबकुछ अच्छा लग रहा था.

रूपा के सुखदुख की कहानियों में वीर दिलचस्पी लेते हुए पहली बार उसे महसूस हुआ कि सिर्फ वही दुखी नहीं है, बल्कि दूसरे लोग भी दुखी हैं और उन्हें भी किसी सहारे की जरूरत होती है. जब वह रूपा जैसी कोई लड़की हो, तो उसे सहारा देना उस का फर्ज बनता है. उस की तर्जनी में पड़ी सगाई की वह सोने की भारी अंगूठी जैसे उसे इस का अहसास भी दिलाती थी.

अकसर रूपा ही उसे फोन करती थी खासकर रात में तो यह उस का नियमित शगल था और फिर वे दोनों दुनियाजहान की बात करते थे. अपने मन को वीर ने पहली बार किसी अनजान के सामने खोला था.

रूपा को ले कर वीर के मन में अनेक भाव उपजते और एक अनकहे जोश और उछाह से वह भर उठता था. जिंदगी के रंगीन सपने उस के सामने पूरे से होने लगते थे.

आरा से बक्सर की दूरी कुछ खास नहीं है और जैसे ही वीर का डुमरांव ब्लौक में ट्रांसफर हुआ, तो यह दूरी और घट गई थी. अपने घर तो वह कभी रहा ही नहीं. जहां उस की नौकरी होती, वहीं उसे क्वार्टर भी मिल जाता था. यहां डुमरांव में रहते हुए वह एकाध बार बक्सर गया, तो उस ने रूपा को वहीं बुला कर बातें भी कर आता था.

दरअसल, यह रूपा की ही जिद थी कि वीर उस से मिले, तो उसे भी इस मेलजोल में कुछ गलत नहीं लगा था और इस के बाद तो जब भी उसे समय मिलता, अपनी मोटरसाइकिल उठा कर बक्सर चला आता था.

यहां वे किसी रैस्टोरैंट या पार्क में घंटों बैठ कर बातें करते, खातेपीते और घूमते थे और यह बात दोनों के ही परिवार में पता चल गई थी.

छोटे शहरों में ऐसी बातें छिपती भी कहां हैं. वीर के पापा और दूसरी मां ने उसे आगाह भी किया था कि शादी से पहले इस तरह मिलनाजुलना ठीक नहीं है, जिसे उस ने हंसी में उड़ा दिया था.

वीर ने इस बात की चर्चा रूपा से करते हुए पूछा था, ‘‘क्या तुम्हारे पापा भी हमारे मिलनेजुलने को गलत मानते हैं?’’

रूपा हंस कर बोली थी, ‘‘गलत, अरे वे तो इसे बहुत अच्छा मानते हैं कि इसी बहाने हम एकदूसरे को जानसम झ रहे हैं. जब भविष्य में शादी होनी ही है, तो अभी मिलनेजुलने पर रोकटोक क्यों करें.

‘‘हां, मां जरूर इसे ठीक नहीं मानती हैं, मगर पापा का कहना है कि वे दोनों एक हद में रहें, तो मिलनेजुलने में क्या बुराई है.’’

इस बीच वीर ने रूपा को कितने ही सस्तेमहंगे उपहार खरीद कर दे डाले थे. होटलरैस्टोरैंट में हजारों रुपए का बिल वह हंसतेहंसते भर जाता था कि अपनी मंगेतर के लिए इतना भी न कर सका, तो उस का नौकरी करना बेकार है.

मगर इस बीच वीर के साथ एक घटना हो गई. वीर के औफिस में कोई बड़े लैवल का खरीद घोटाला हुआ था, जिस में उस का नाम भी घसीट लिया गया था.

डिपार्टमैंटल इंक्वायरी में पटना के बड़े अफसर आए और उस से कड़ी पूछताछ की. चूंकि उस के कई जगह पर दस्तखत थे, सुबूत उसे ही कुसूरवार ठहराते थे.

साथी मुलाजिमों ने बड़े अफसरों से अलग चुगली कर रखी थी कि अपनी मंगेतर के यहां कोई अकसर जाएगा और पार्टियां करतेफिरते, महंगेमहंगे गिफ्ट भेंट में देगा, तो क्या यह तनख्वाह से मुमकिन है? उस के लिए तो कोई भी गलत रास्ता ही अख्तियार करेगा न. तनख्वाह के पैसे पर कौन फालतू के खर्च करता है?

एक साथी मुलाजिम ने तो हद कर दी, जब उस ने वीर को ‘मैंटल’ बता दिया. और इसी के साथ वह सस्पैंड कर दिया गया था.

ज्यों ही यह खबर फैली तो वाकई वीर की दिमागी हालत गड़बड़ा गई थी. उस के पापा आए और फिर उन्होंने ही उसे संभाला था. उसे साथ घर ला कर अपनी देखरेख में रखा. उस के भाईबहन भी उस का खयाल रखते और उसे खुश रखने की पूरी कोशिश करते और हंसाते थे.

पापा ने वीर को पटना में एक साइकियाट्रिस्ट को भी दिखाया और कुछ इलाज कराया. फिर वे उस के सस्पैंशन के मामले में पड़े कि क्या हो सकता है. इस के लिए वे वकीलों और बड़े अफसरों से भी मिले.

अगले 3 महीने वीर के लिए भारी पड़े थे. आखिरकार घोटाले का भेद खुला, तो उस में 2 मुलाजिमों की भागीदारी देखने को मिली.

दरअसल, वे दोनों जैसे ही जानते कि वीर बक्सर जाने की हड़बड़ी में है. उस से जाते समय कुछ दस्तावेजों पर दस्तखत ले लेते थे. अपने जाने की हड़बड़ी में वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता था. इस तरह उन लोगों ने लाखों रुपए की हेराफेरी कर ली थी.

मगर यह भी सच है कि विभागीय खर्चे किसी एक के दस्तखत करने से नहीं होते. उस में 3 और मुलाजिम फंसे थे और उन लोगों ने भागदौड़ कर सही बात पता कर ली थी. उन लोगों की वजह से असली कुसूरवार पकड़े गए.

मगर वीर की जिंदगी में जैसे एक और तूफान इंतजार कर रहा था. रूपा के घर में उस के सस्पैंशन वाली बात का पता चल चुका था. उस से भी बड़ी बात यह कि उस के पापा ने इस रिश्ते के लिए इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें एक बड़ा घराना मिल चुका था.

वीर ने रूपा को कई बार फोन किया. वह बक्सर आया और एक रैस्टोरैंट में रूपा को मिलने भी बुलाया. वह चुपचाप आई और एक कोने में बैठ गई.

‘‘कैसे हो तुम?’’ वीर ने पूछा.

रूपा ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘बहुत बुरा हुआ तुम्हारे साथ.’’

‘‘वह तो जो हुआ, सो हुआ,’’ वीर ने अपनी उंगली में पहनी सगाई की अंगूठी को घुमाते और देखते हुए नाराजगी दिखाई, ‘‘मगर, तुम ने भी नाता तोड़ लिया.’’

‘‘ऐसा न कहो. दरअसल, मेरे पापा को कुछ लोगों ने बहका दिया था कि लड़के में कुछ दिमागी परेशानी है, इसलिए वहां रिश्ता करना सही नहीं है. मगर, मैं तो एकदम से अड़ गई कि मु झे तुम्हारे साथ ही शादी करनी है.’’

थोड़ी देर तक मानमनुहार की बात चलती रही. चाय और नाश्ते का दौर चला. इस बीच रूपा अचानक बोली, ‘‘अरे हां, मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गई. हम ने तुम्हें जो सगाई की अंगूठी पहनाई थी, उस के बारे में शक है कि उस में ज्यादा मिलावट तो नहीं है, इसलिए मां ने कहा है कि तुम से वह अंगूठी एक दिन के लिए ले लूं. उस की किसी दूसरे सुनार से जांच करवाने पर तसल्ली मिल जाएगी, इसलिए तुम वह अंगूठी मुझे दे दो.’’

‘‘यह क्या बात हुई. अब जैसी भी है, यह सगाई की अंगूठी है और मैं इसे अपनी उंगली से नहीं निकाल सकता. एक यही तो अंगूठी है, जिस की वजह से मु झे अपने तनाव को कम करने में मदद मिली थी. जब भी इसे देखता, तो तुम्हारी याद आती और मेरी हिम्मत बढ़ जाती थी.’’

‘‘सचमुच इस अंगूठी से मु झे भी बहुत ताकत मिलती है. मगर, एकाध दिन की ही तो बात है…’’ रूपा अपनी उंगली में फंसी सगाई की अंगूठी से खेलते हुए बोली, ‘‘यह हमारे पहले प्यार की निशानी है, तो ही ऐसा लगेगा.

मगर हमें थोड़ा प्रैक्टिकल हो कर भी सोचना चाहिए.

‘‘कोई हमें जानबू झ कर ठगे, यह भी तो कोई अच्छी बात नहीं है न, इसलिए अभी इसे दे दो. अगली बार आना, तो इसे ले लेना. आखिर मैं इसे ले कर क्या करूंगी?’’

वीर ने सगाई वाली अंगूठी रूपा को दे दी.

अगली बार जब वीर आया, तो तय जगह पर आने के लिए उस ने रूपा को फोन किया था. वह तो नहीं आई, मगर उस के पापा वहां आ गए. वह उन के सम्मान में उठ खड़ा हुआ.

‘‘ऐसा है बाबू कि रूपा की तबीयत थोड़ी खराब है, इसलिए वह नहीं आई…’’ थोड़ी देर ठहर कर वे उसे गौर से देखते हुए बोले, ‘‘और हां, अब हमें तुम्हारे साथ रूपा की शादी करने में कुछ दिक्कत महसूस हो रही है. यह लो सगाई की वह अंगूठी, जो तुम ने रूपा को पहनाई थी.’’

यह सुनते ही वीर को धरती घूमती नजर आई. वह बोला, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं. 4 महीने पहले हमारी सगाई हुई थी. 2 महीने बाद शादी होना तय था. और आप कुछ दूसरी ही बात कर रहे हैं,’’ वह अपनी उखड़ती हुई सांसों को काबू में करते हुए बोला, ‘‘इतने दिनों में हम एकदूसरे को बहुत जाननेसम झने और प्यार करने लगे हैं. और आप कहते हैं कि यह रिश्ता टूटेगा. ऐसा कैसे हो सकता है. रूपा इसे बरदाश्त नहीं कर पाएगी.’’

‘‘वह ऐसा है बाबू कि हमें काफीकुछ प्रैक्टिकल हो कर सोचना पड़ता है. तुम्हारे पापा औसत दर्जे के किसान ठहरे. घर में सौतेली मां और भाईबहन हैं. तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती.

‘‘ऐसे में तुम्हारे छोटे से घर में रूपा का निबाह नहीं होगा. यह सब जानते हुए हम रूपा की शादी तुम्हारे साथ नहीं कर सकते. उसे भी यह रिश्ता मंजूर नहीं है.’’

रूपा के पापा अपनी रौ में बोले जा रहे थे. बिना यह जानेसम झे कि वीर के दिल पर क्या बीत रही होगी, ‘‘और रही बात रूपा की, तो उसे एक और अच्छा लड़का मिल गया है. बैंगलुरु में सौफ्टवेयर इंजीनियर है. तो रूपा को भी सब से अलग बैंगलुरु में अकेले रहने का चाव पूरा होगा.

‘‘लड़के के पिता की 30 बीघा की खेती है. उस के पिता अमीर किसान हैं और वह एकलौता लड़का है. एक बड़ी बहन है, जिस की शादी हो चुकी है. ऐसे में उसे और क्या चाहिए? इसलिए उस की तो बात ही मत करो.’’

‘‘यह आप से किस ने कह दिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती. ठीक है कि असमय मां के गुजर जाने के बाद मैं डिप्रैशन में आ गया था. पापा ने मु झे होस्टल में डाल दिया था. लेकिन होस्टल में रह कर पढ़ाई करना कोई गुनाह तो नहीं…’’ वीर अपनेआप को काबू में करता हुआ सा बोला, ‘‘और रही बात मेरी सौतेली मां और भाईबहनों की, तो यह आप की गलतफहमी है. वे मु झे सगी मां जैसा प्यार करती हैं. उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया.

‘‘और आप को भी थोड़ा सोचसम झ कर किसी के बारे में बोलना चाहिए. आखिर में वे सौतेली ही सही, पर मेरी मां हैं. उन्होंने मुझ में और अपने बेटों में कभी कोई फर्क नहीं किया.’’

‘‘वह सब तो ठीक है बाबू. मगर हम जानबू झ कर मक्खी नहीं निगल सकते न. मैं ने अपने शहर में ऐसे अनेक केस देखे हैं, जिस से घरपरिवार बिखर गया है, इसलिए तुम अपने पापा को बता देना.’’

‘‘मैं बताऊंगा कि आप बताएंगे…’’ वीर गुस्से में आ गया था, ‘‘आप को किसी की भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है. मेरे परिवार को जब यह पता चलेगा, तो उस पर क्या बीतेगी?’’

‘‘अब तुम से बात क्या करना…’’ रूपा के पापा जाते हुए बोले, ‘‘ठीक है, मैं ही तुम्हारे पापा को बता दूंगा.’’

वीर पर जैसे बिजली सी गिरी थी. क्या ऐसे भी रिश्ता तोड़ा जाता है? मगर सबकुछ अपनी आंखों से देखने और कानों से सुनने के बाद अब बाकी क्या रहा था.

वीर के पापा ने सारी जानकारी लेने के बाद थोड़ी भागदौड़ की, उस के ठीक होने के कागजात तक उन्हें दिखाए, मगर रूपा का परिवार टस से मस नहीं हुआ. तब उन्होंने कहा कि जब उन की बेटी के लिए दूसरे लड़के मिल सकते हैं, तो उन्हें भी अपने बेटे के लिए दूसरी लड़कियां मिल जाएंगी.

मगर वीर के दिल में तो रूपा घर कर गई थी. उस ने उस से मिलने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रहा था. यह तो तय था कि रूपा की भी इस सगाई को तोड़ने में रजामंदी थी, तभी तो उस ने बहाने से वीर की सगाई की अंगूठी वापस ले ली थी. फिर भी उस का दिल इस सच को मानने को तैयार नहीं होता था.

जब वीर पहली बार रूपा से एकांत में मिला था, तब वह उसे निहारती रह गई थी.

‘‘तुम्हारे इस सांवलेसलोने रूप पर तो लड़कियां मरमिट जाएंगी. मैं कितनी खुशकिस्मत हूं कि तुम मु झे मिले हो,’’ रूपा वीर के सीने पर अपना सिर रख कर उस की बांहों की मछलियों से खेलती हुई कह रही थी, ‘‘तुम्हारे जैसा बांका जवान तो मु झे पूरी दुनिया में नहीं मिलने वाला. अच्छीभली सरकारी नौकरी है तुम्हारी. छुट्टियों में हम आराम से एकाध साल में एकाध महीने के लिए बाहर घूमने जा सकते हैं.’’

रूपा का दूधिया रंग और मासूम चेहरा वीर के आगे घूम जाता था. लेकिन आज उसी रूपा ने वीर को अपने मन से दूध में गिरी मक्खी के समान निकाल फेंका था. मन के किसी कोने में यह बात भी उठती कि आज जब उस का रिजैक्शन हुआ, तब उसे अहसास हो रहा है कि इस रिजैक्शन से लड़कियों के दिल पर भी क्या गुजरती होगी.

वीर को अब भी यकीन नहीं होता था कि उस की सगाई टूट गई है. उस के साथी सामने तो कुछ कहते नहीं थे, पर पीठ पीछे हंसते थे. सचमुच अविश्वास की एक फांस तो लग ही गई थी कि कहीं कुछ तो गलत है ही उस में, जिस से उस की सगाई टूट गई है.

समय का चक्र नहीं रुकता और वीर के पापा भागदौड़ में लगे थे. सौतेली मां ने अपने भाइयों से कह कर उस के लिए अनेक जगह से रिश्ते की बात चला रखी थी. कुछ रिश्तों के प्रस्ताव उस के पास आ चुके थे और चुनाव अब उसे करना था, मगर रहरह कर उसे रूपा की याद आती, तो वह बेचैन हो जाता था.

फिर भी समय ने तो वीर को यह सिखा ही दिया था कि अब पिछला सब भूल कर आगे की ओर बढ़ जाना है. यही सब के फायदे में है.

Family Story : सवेरा

Family Story : उस गांव में पंडित बालकृष्ण अपने पुरखों द्वारा बनाए गए मंदिर में भगवान की पूजा में लीन रहते थे. रोजीरोटी के लिए 8 बीघा जमीन थी. बालकृष्ण बड़े ही सीधेसादे और विद्वान थे. उन की पत्नी गायत्री भी सीधीसादी, सुशील, पढ़ीलिखी और सुंदर औरत थीं. बालकृष्ण का ब्याह हुए 2 साल हो गए थे, फिर भी उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था.

बालकृष्ण के पिता दीनदयाल काफी कट्टरपंथी थे. जातपांत और ऊंचनीच मानने के चलते उन्होंने छोटी जाति के लोगों को कभी मंदिर में घुसने नहीं दिया था.

गणेश पूजा के समय गांव के हर जाति के परिवार से बिना भेदभाव के चंदा लिया गया. बालकृष्ण ने सोचा कि इस पैसे द्वारा खरीदे गए प्रसाद और दूसरी चीजों का इस्तेमाल उस पूजा में लगे लोग नहीं करेंगे, पर उन्हें यह देख कर हैरानी हुई कि उन लोगों ने पूजा खत्म होने पर चंदे के पैसों से ही हलवापूरी बनाई और खुद खाई. उसी समय जब एक छोटी जाति का लड़का प्रसाद लेने आया, तो सभी ने उसे दुत्कार कर भगा दिया.

गांव के हरिजनों के लिए शासन सरकारी जमीन पर मकान बनवा रहा था. एक हरिजन जब इस सुविधा का फायदा उठाने के लिए पटवारी साहब और ग्राम पंचायत के सचिव से मिलने गया, तो बालकृष्ण उत्सुकता से पास ही खड़े हो कर बातचीत सुनने लगे.

हरिजन से 2,000 रुपए लेते हुए उस ने सचिव को देखा, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ. इस के बाद इन रुपयों को उन्होंने पटवारी, सचिव और सरपंच को आपस में बांटते देखा, तो वे भौंचक्का रह गए. 101 रुपए उन के पुजारी पिता को भी बाद में दिए गए.

उन्होंने पिताजी से पूछा भी कि हरिजनों के अशुद्ध रुपए क्यों ले लिए, तो उन्होंने उसे बड़े प्यार से समझाया, ‘‘बेटा, लक्ष्मी कभी अशुद्ध नहीं होती.’’

बालकृष्ण के लिए यह एक अबूझ पहेली थी कि जब निचली जाति के लोगों से खेतों में काम करवा कर फसल तैयार करवाने में कोई हर्ज नहीं है, तो उन के द्वारा छुए गए अनाज को खाने में क्या हर्ज है?

बालकृष्ण जब गांव के बड़े लोगों जैसे पटवारी, ग्रामसेवक, सचिव और सरपंच को निचली जाति के लोगों से रुपए लेते देखते थे, तो यह समझ नहीं पाते थे कि क्या इसी पैसे से खरीदी गई चीजें अशुद्ध नहीं होतीं?

मंदिर में होने वाले किसी भी काजप्रयोजन के समय इन लोगों को अपनेअपने घर से एक बंधाबंधाया पैसा देने का आदेश दे दिया जाता था. उस से पूरे हो रहे उस काजप्रयोजन को देखना और उस का प्रसाद लेना इन के लिए बड़ा कुसूर माना जाता था.

बालकृष्ण ने जबजब इस तरह के सवालों के जवाब चाहे, तबतब उन से कहा गया कि ऐसा शास्त्रों में लिखा है और बहुत पहले से होता आ रहा है. इन बातों से धीरेधीरे बालकृष्ण के मन में ऊंचनीच और भेदभाव को मानने वाले इस समाज से घिन होती जा रही थी.

बालकृष्ण जातपांत के जबरदस्त खिलाफ थे. पिता दीनदयाल की मौत के बाद उन्होंने अछूत लोगों को गले लगा लिया और सभी भेदभाव भुला कर मंदिर के दरवाजे सभी के लिए खोल दिए. वे अछूतों को दया, क्षमा, परोपकार, अहिंसा की सीख देने लगे.

मंदिर में रोज पूजा के बाद बालकृष्ण छोटी जाति के लोगों को नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने और अंधविश्वास व दूसरे गलत रिवाजों को छोड़ने की सीख देते थे. साथ ही साथ नौजवानों को रोजगार के कई उपाय बताते थे.

इस से गरीब लोगों में एक नई जागरूकता आने लगी थी. वे अब अपनी माली हालत को सुधारने के लिए सचेत होने लगे थे. इस का नतीजा यह हुआ कि उन गरीबों के खून को चूसने वालों की आंखों में बालकृष्ण चुभने लगे.

बालकृष्ण अपने खेतों में सब्जी और अनाज उगाते थे और उन्हें बेचने के लिए मंडी जाते थे. एक दिन उन के विरोधी श्रीधर और महेंद्र सिंह मंडी में ही उन्हें मिल गए. इन लोगों ने बालकृष्ण से मीठीमीठी बातचीत की और ठंडाई पीने का मनौव्वल किया.

बालकृष्ण ने इन लोगों की बात मान ली. ठंडाई पीते समय श्रीधर और महेंद्र सिंह के होंठों पर शैतानी मुसकराहट फैल गई, क्योंकि अपने इस दुश्मन को मिटाने का अच्छा मौका उन्हें मिल गया था.

गांव वापस आते समय रास्ते में बालकृष्ण की तबीयत खराब हो गई. घर पहुंचने पर उन के अपने लोगों ने दवा की, लेकिन बालकृष्ण बच नहीं सके.

बालकृष्ण की मौत से गांव में कुहराम छा गया. गायत्री के लिए सारी दुनिया नीरस हो चुकी थी.

इधर बालकृष्ण के रिश्तेदारों ने पैसों के लालच में गायत्री के सती होने की खबर उड़ा दी. यह खबर जंगल की आग की तरह आसपास के गांवों में फैल गई. सती माता को देखने के लिए अनगिनत लोग आ रहे थे. मंदिर में अगरबत्ती, प्रसाद और रुपयों का ढेर लग गया था.

बालकृष्ण के रिश्तेदार इन सब को बटोरने में लगे हुए थे. कारोबारी लोग 10 रुपए की चीज 50 रुपए में बेच रहे थे. गांव में इतनी भीड़ इकट्ठी हो गई थी कि लोगों को पीने का पानी भी नहीं मिल पा रहा था.

गांव के स्कूल में छोटी जाति का एक मास्टर था, जिस का नाम मदनलाल था. बालकृष्ण से उस की गाढ़ी दोस्ती थी. अपने दोस्त की मौत से उस के मन को गहरा धक्का लगा था. वह भी मंदिर में गया, लेकिन कुछ लोगों ने उसे मंदिर में घुसने नहीं दिया.

तब मदनलाल को शक हो गया. उस ने कलक्टर से मदद करने की गुहार लगाई और फिर गायत्री को सती होने से रोक दिया. अंधविश्वासी लोग इस काम में बाधा खड़ी करने के चलते मदनलाल की खिंचाई कर रहे थे.

गायत्री निराशा के सागर में गोते लगा रही थीं. उन के सीधेपन का फायदा उठा कर बालकृष्ण के रिश्तेदार अपना मतलब साध रहे थे. जो लोग कल तक बालकृष्ण के खिलाफ थे, वे अब गायत्री के आसपास मंडरा रहे थे. कोई पैसों का लोभी था, तो कोई गायत्री की सुंदरता का. मदनलाल ने मौका पा कर गायत्री को दिलासा दिया और बालकृष्ण के अधूरे काम को पूरा करने की सलाह दी.

मदनलाल की मदद से गायत्री ने गांव में ‘बालकृष्ण स्मृति केंद्र’ खोला. वहां औरतोंमर्दों को पढ़ायालिखाया जाता था और कुटीर उद्योगों के बारे में भी बताया जाता था. पढ़ेलिखें लोगों को रोजगार के लिए बैंक से कर्ज दिलवाया जाता था.

गायत्री भी गांव के बड़े लोगों की आंखों में खटकने लगीं, क्योंकि अब गांव में बेगार करने वालों का टोटा पड़ने लगा था. वे लोग गायत्री को समझाने लगे कि निचली जाति के लोगों को सिर पर बैठाने से उस की हालत अपने पति जैसी ही होगी. गायत्री ने इन बातों की कोई परवाह नहीं की.

एक दिन एकांत पा कर कुछ लोग मंदिर में घुस गए और गायत्री के साथ मारपीट करने लगे. बाद में उन लोगों ने गायत्री को ‘पागल’ करार दिया और मंदिर से निकाल दिया. मदनलाल ने बीचबचाव किया और कानून की मदद से गायत्री को अपना हक वापस दिलवाया.

इस से गांव के बड़े लोग मदनलाल के दुश्मन हो गए. इन लोगों ने बड़े अफसरों को घूस दे कर मदनलाल
की बदली गांव से दूर एक स्कूल में करवा दी.

मदनलाल ने ऐसी बिगड़ी हालत में गायत्री को अकेला छोड़ना मुनासिब नहीं समझा. वह कुछ दिनों की छुट्टी ले कर अपने विरोधियों को सबक सिखाने की कोशिश करने लगा.

मदनलाल ने गायत्री की बहुत मदद की, इसलिए गायत्री उस की अहसानमंद हो गई.

मदनलाल अभी अनब्याहा था. दोनों की नजदीकी धीरेधीरे प्रेम में बदल गई. इन का प्रेम साफसुथरा था, फिर भी दोनों अपने प्रेम को किसी के सामने खुलासा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे.

गायत्री विधवा विवाह करने से हिचक रही थीं. मदनलाल डर रहा था कि एक ब्राह्मण विधवा के साथ एक छोटी जाति के आदमी के ब्याह से कहीं बखेड़ा न खड़ा हो.

मदनलाल से गायत्री की नजदीकी के चलते समाज के रूढि़वादी लोग बिदकने लगे थे. इन लोगों का कहना था कि ‘पराए मर्द के साथ विधवा का रहना केरबेर की तरह होता है. केला अपने पत्तों को बेर के कांटों से बचा नहीं पाता है’.

इन सारी बातों के बावजूद गायत्री और मदनलाल की नजदीकी बढ़ती ही गई. इस से वे लोग कुढ़ने लगे, जो गायत्री की सुंदरता पर मोहित थे. गायत्री के रिश्तेदार भी उस के खिलाफ आग उगल रहे थे.

आखिरकार मंदिर के अहाते में ब्राह्मण जाति की पंचायत बुलाई गई. पंचों ने मदनलाल को बहुत कोसा.

हालांकि मदनलाल ने अपनी सफाई में बहुतकुछ कहा. लेकिन कई लोगों ने गायत्री के खिलाफ झूठी गवाही दी. तब गायत्री को यकीन हो गया कि पंचायत का फैसला उस के खिलाफ ही होगा.

उन्होंने मन ही मन पक्का निश्चय किया और पंचों के सामने आ कर बोलीं, ‘‘तुम लोग मुझे जाति से बाहर क्या निकालोगे, मैं खुद तुम जैसे घटिया और पाखंडी लोगों की जाति में रहना नहीं चाहती हूं. मैं मदनलाल को अपना पति मान रही हूं.’’

गायत्री की यह हिम्मत देख कर सभी हैरान रह गए. खुद मदनलाल भी भौंचक्का था. उस ने कांपते हाथों से गायत्री की सूनी मांग में सिंदूर भर दिया.

यह देख कर पंचों के चेहरे लटक गए. उन सभी के सामने गायत्री ने मदनलाल से कहा, ‘‘आज हमारी शादीशुदा जिंदगी का पहला सवेरा है. आओ, आज से हम एक नई पहल शुरू करें.’’

लेखक – जी. शर्मा

Hindi Story : नसीब

Hindi Story : पूरे महल्ले में यही सुगबुगाहट थी कि करीम की बेटी खुशबू का निकाह है, वह भी उस की बाप की उम्र के हमीदुल्ला मास्टर के साथ.

जब खुशबू को यह बात पता चली थी कि उस की शादी एक 50 साल के बूढ़े के साथ तय हो गई है, उस दिन वह पूरी रात रोई थी, लेकिन उस के बाद वह खामोश ही रही. वह सम झ चुकी थी कि बूढ़ा शौहर ही उस का नसीब है.

इस के बाद खुशबू एक जिंदा लाश में बदल गई थी, जो केवल देख और सुन सकती थी, लेकिन बोल नहीं सकती थी.

लेकिन इस रिश्ते का विरोध उस की अम्मी ने उस के अब्बू से किया था, मगर खुशबू ने खुद ही अम्मी को चुप करा दिया था.

खुशबू के अब्बू फलों का ठेला लगाते थे, जिसे बेच कर उन्हें मुश्किल से दो वक्त का खाना मिल पाता था, जिस के चलते खुशबू भी पड़ोस की शाहीन खाला के यहां से कढ़ाई करने के लिए साड़ी वगैरह ले आती थी, जिस से उसे भी कुछ पैसे मिल जाते थे और वह अपनी जरूरतें उन्हीं से पूरी कर लेती थी.

लेकिन इधर कुछ दिनों से खुशबू के अब्बू की तबीयत ठीक नहीं थी. सही से इलाज न होने के चलते वे धीरेधीरे बिस्तर से लग गए और फिर तो भूखों मरने की नौबत आ गई.

यह सब देख कर खुशबू की अम्मी आसपास के घरों में चौकाबरतन करने लगी थीं, जिस से अब्बू की दवा और जैसेतैसे घर का खर्च चलने लगा था.

खुशबू खूबसूरत ही नहीं, जहीन भी थी. उस ने घर पर रह कर ही अपनी सहेली गुलशन की मदद से हिंदी में भी पढ़नालिखना सीख लिया था. सभी उस की तारीफ करते नहीं थकते थे.

पहले तो खुशबू के अम्मीअब्बू को लगता था कि उन की बेटी को कोई न कोई रिश्तेदार अपना ही लेगा. अम्मी ने खाला के यहां उस के रिश्ते की बात चलाई थी, लेकिन उस की खाला ने अम्मी से साफ इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें ऐसी बहू चाहिए थी, जो ढेर सारा दहेज ले कर आए.

अब्बू ने भी खुशबू के रिश्ते के लिए कई जगह कोशिश की थी, लेकिन उन के हालात को देख कर सब ने इनकार कर दिया था. आसपड़ोस और उस के ददिहाल वाले रमजान में हर रोजाइफ्तारी भिजवा कर सवाब कमाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

ऐसे ही एक बार ईद पर जब खुशबू के चाचा और बड़े अब्बू 5,000 रुपए फितरा व जकात निकाल कर उस के घर देने पहुंचे थे, तो अम्मी का गुस्सा फट पड़ा था और अम्मी ने जम कर चाचा और बड़े अब्बू को खरीखोटी सुनाई थी और रुपए भी उन के मुंह पर फेंक दिए थे.

अम्मी का गुस्सा देख कर खुशबू के चाचा और बड़े अब्बू चुपचाप वहां से चले गए थे.

खुशबू ने अम्मी को पहली बार इतने गुस्से में देखा था. लेकिन वह जानती थी कि अम्मी को मेहनतमजदूरी करना मंजूर है, लेकिन ऐसी मदद उन को नागवार थी.

ऐसे ही एक दिन जब अब्बू की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी, तब अम्मी ने सब रिश्तेदारों के पास जा कर 500 रुपए उधार मांगे थे, लेकिन किसी के पास से एक रुपया भी नहीं निकला था, जबकि सभी के अच्छेखासे कारोबार चल रहे थे.

तब खुशबू के अब्बू के एक दोस्त रमेश चाचा ने खुद ही घर पहुंच कर अम्मी को रुपए दिए थे और आगे किसी चीज की जरूरत पड़ने पर बेझिझक कहने के लिए बोल कर गए थे.

खुशबू की अम्मी अकसर कहा करती थीं, ‘‘खुशबू के लिए कोई ऐसा लड़का ही मिल जाए, जो मजदूरी करता हो, कम से कम वह दो वक्त की रोटी तो उसे खिला सकेगा.’’

पिछले दिनों महल्ले में ही शहरुद्दीन के एक रिश्तेदार हमीदुल्ला मास्टर आए हुए थे, जो अच्छेखासे पैसे वाले थे. उन का चूडि़यों का थोक का कारोबार था. एक दिन वे महल्ले के लोगों के साथ बैठ कर बातें कर रहे थे.

‘‘मास्टर साहब, और बताइए कि घर के हालचाल कैसे हैं?’’ मोबिन मियां ने मास्टर साहब से पूछा.

‘‘क्या बताएं मोबिन मियां, औरत के बिना घर कोई घर होता है. जब से रजिया का इंतकाल हुआ है, तब से सबकुछ बदल गया है. घर तो जैसे काटने को दौड़ता है,’’ हमीदुल्ला मास्टर मायूस हो कर बोले.

‘‘मास्टर साहब, आप करीम की लड़की खुशबू से निकाह कर लें,’’ वहां बैठे साजिद ने सलाह दी.

‘‘हां, बेचारा करीम बहुत ही गरीब है और फिर वह आएदिन बीमार ही रहता है. एक ही लड़की है, वह भी जवान हो गई है. उस के पास तो देने के लिए कुछ है भी नहीं और फिर बिना दहेज के उस की शादी होने से रही.

‘‘अगर साबिहा भाभी चौकाबरतन न करने जाएं, तो दो वक्त का खाना भी नसीब न हो,’’ मास्टर साहब कुछ बोलते, इस से पहले ही वहां बैठे नबीरुल ने अपनी बात रखी.

‘‘आप का भी घर बस जाएगा और बेचारे करीम और साबिहा के सिर का बो झ भी हट जाएगा,’’ मोबिन मियां ने भी मास्टर साहब से कहा.

‘‘आप लोगों के भी तो लड़के जवान होंगे, आप लोग करीम की बेटी को बहू बना कर क्यों नहीं ले आते?’’ मास्टर साहब धीरे से बोले.

‘‘आप अगर निकाह कर लेंगे, तो बेचारी खुशबू की जिंदगी सुधर जाएगी. बचपन तो गरीबी में कट गया, कम से कम जवानी में तो अच्छा खा और पहन लेगी,’’ नबीरुल ने मास्टर साहब की बात अनसुनी कर उन पर दबाव डालते हुए कहा.

‘‘अच्छा, ठीक है. लेकिन क्या वह लड़की निकाह के लिए राजी हो जाएगी?’’ मास्टर साहब ने सवाल किया. ‘‘अरे, मास्टर साहब, गरीब की लड़की की जबान कहां होती है. बस, आप हां करें, बाकी हम पर छोड़ दें,’’ मोबिन मियां ने कहा.

‘‘चलिए, तो फिर लड़की भी दिखा दीजिए. आए हैं तो रिश्ते की बात भी कर ली जाए,’’ मास्टर साहब बोले.
इस के बाद वे सभी करीम के घर की ओर चल दिए.

‘‘हमीदुल्ला मास्टर तुम्हारी लड़की से निकाह करना चाहते हैं. उन की बीवी का इंतकाल… और रोटीपानी के लिए भी परेशानी होती है, इसलिए वे दोबारा घर बसाना चाहते हैं,’’ करीम के घर पहुंचते ही मोबिन मियां ने कहा.

‘‘आप को कोई एतराज तो नहीं है?’’ हमीदुल्ला मास्टर ने करीम से पूछा.

‘‘मु झे क्या एतराज हो सकता है. आप चाहें तो आज ही खुशबू से निकाह कर अपने साथ ले जाएं,’’ करीम धीरे से बोला.

‘‘ठीक है, आने वाली 15 तारीख को 8-10 लोगों को ला कर निकाह पढ़वा कर ले जाऊंगा तुम्हारी लड़की को. और हां, इस में जो भी खर्च आएगा, वह मैं आप को घर पहुंचते ही भिजवा दूंगा,’’ हमीदुल्ला मास्टर करीम से बोले.

‘‘मास्टर साहब, आप परेशान न हों. निकाह का सारा इंतजाम मैं करवा दूंगा,’’ मोबिन मियां ने मास्टर साहब से कहा.

‘‘और खाने का इंतजाम मैं कर दूंगा,’’ नबीरुल बोले.

जल्द ही निकाह का दिन भी आ गया. खुशबू अपने अम्मीअब्बू को देख रही थी, जिन के चेहरों पर न खुशी दिखाई दे रही थी और न गम, बस यही लग रहा था कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहे थे.

खुशबू दुलहन बनी बैठी थी, लेकिन शादी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा था. सहेलियां भी उस से किसी तरह की छेड़छाड़ या फिर किसी तरह का मजाक करने की हिम्मत नहीं कर रही थीं.

‘‘बरात आ गई,’’ गाडि़यों की आवाज सुन कर खुशबू की एक सहेली नजमा बोली और बाकी सभी सहेलियां बरात देखने के लिए उस के कमरे से बाहर चली गईं.

खुशबू ने एक बार फिर एक नजर आईने पर डाल कर खुद को देखा. वह बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. लेकिन क्या फायदा ऐसी खूबसूरती का, जो उसे एक अच्छा शौहर न दिला सके.

बाहर 2 गाडि़यां करीम के दरवाजे पर आ कर रुकीं और गाड़ी से शेरवानी पहने हमीदुल्ला मास्टर और 4-5 लोग बाहर आए. उन के साथ मौलाना साहब भी थे, जिन्हें शायद मास्टर साहब निकाह पढ़वाने के लिए लाए थे.

बरात आने की खबर मिलते ही आसपड़ोस की औरतें और बच्चे अपनेअपने घरों से बाहर आ गए. सब को यही उत्सुकता थी कि क्या खुशबू इस निकाह से राजी है भी या नहीं?

‘‘आइए मास्टर साहब, आप लोग उधर चलिए,’’ मोबिन मियां ने सलाम कर मास्टर साहब से एक ओर इशारा करते हुए चलने की गुजारिश की.

‘‘अरे, रुकिए तो मोबिन मियां, अभी दूल्हे मियां और उन के दोस्तों को तो आने दीजिए,’’ मास्टर साहब हंसते हुए बोले.

‘‘मैं कुछ सम झा नहीं,’’ मोबिन मियां ने हैरानी से मास्टर साहब से पूछा.

मास्टर साहब कुछ बोलते, इस से पहले ही एक और कार वहां आ कर रुकी. कार फूलों से सजी हुई थी और उस में से सेहरा पहने हुए एक नौजवान गाड़ी से बाहर आया और उस के साथ 4 दोस्त और बाहर निकले.

‘‘दूल्हे मियां आ गए. चलिए, मोबिन मियां, अब कहां चलना है?’’ मास्टर साहब हंसते हुए बोले.

‘‘यह सब क्या है?’’ मोबिन मियां ने पूछना चाहा. वहां खड़े बाकी लोग भी हैरान थे कि यह क्या माजरा है.

‘‘यह मेरा बेटा समीर है और मैं अपनी शादी की नहीं, बल्कि अपने बेटे की शादी की बात कर रहा था. आप लोगों को क्या लगा कि इस बुढ़ापे में मैं अपनी शादी करता? मु झे बहू चाहिए थी, जो मेरे परिवार को सही से चला सके. दहेज का न मु झे लालच है और न ही मेरे बेटे को,’’ मास्टर साहब बोले.

उधर नौजवान दूल्हे को देख कर चारों ओर हलचल मच गई थी कि खुशबू का दूल्हा कोई बूढ़ा नहीं, बल्कि एक बांका जवान है.

आसपड़ोस के लोग तो खुश हुए, पर बहुत से दुखी नजर आ रहे थे कि इस गरीब की बेटी की तो किस्मत ही खुल गई, क्योंकि लड़का बड़ा ही हैंडसम था.

जब यह बात खुशबू को पता चली, तो खुशी से उस की आंखों में आंसू आ गए. उस ने देखा कि उस की अम्मी और अब्बू के चेहरे भी खुशी से खिल उठे थे.

Funny Story : भैयाजी का चुनावी कन्फैशन

Funny Story : मेरे मोबाइल फोन पर उन के मैसेज बारबार आ रहे थे कि मेरा वोट मेरी आवाज है. मैं अपनी आवाज को किसी के पास बिकने न दूं. पर दूसरी ओर भैयाजी बराबर कह रहे थे कि रे लल्लू, मेरा वोट केवल और केवल उन की आवाज है. वे मेरी आवाज खरीदने के बाद ही संसद में अपनी आवाज उठाने लायक हो पाएंगे. मैं ने उन के मैसेज को इग्नोर कर इस बार भी मान लिया कि मेरा वोट उन की ही आवाज है.

वैसे दोस्तो, मेरे पास बेचने को अब मेरी आवाज बोले तो मेरा वोट ही बचा है. बाकी तो मेरा सबकुछ बिक चुका है, देश की संपत्तियों की तरह. सो, चुनाव के दिनों में उसे बेच कर कुछ दिन मैं भी हलकीफुलकी मस्ती कर लेता हूं.

अब के फिर चुनाव के ‘ड्राई डे’ को भी मुझे तर रखने वाले भैयाजी को वोट डालने के बाद मैं उन के घर गया उन का धन्यवाद करने. धन्य हों ऐसे भैयाजी, जो ‘ड्राई डे’ को भी अपने वोटरों को ड्राई नहीं रहने देते. उन को तर रखने का इंतजाम वे पहले ही कर देते हैं.

ऐसे भैयाजी जनता को बहुत सत्कर्मों के बाद मिलते हैं. हम ने पिछले जन्म में पता नहीं ऐसे क्या सत्कर्म किए थे, जो इस जन्म में हमें ऐसे ही खानदानी भैयाजी मिले.

भैयाजी के ‘ड्राई डे’ का कर्ज उतारने मैं उन के घर गया, तो वे अंधेरे कमरे में बैठे थे. राजमुजरा या राजमुद्रा में, वे ही जानें. पहले तो मैं ने सोचा कि चुनाव की थकान निकाल रहे होंगे. चुनाव के दिनों में तो जो नेता लोहे का भी हो तो वह भी थकान से चूरचूर हो जाए.

अपने भैयाजी तो ठहरे हाड़मांस के. इतने दिनों तक न जागे, न नींद आई. सोएसोए भी जागते रहते, जागतेजागते ही सोए रहते. जितना नेता चुनाव के दिनों में दिनरात एक करते हैं, इतना जो कोई साधारण से साधारण जीव स्वर्ग पाने के लिए करे तो उसे मोक्ष प्राप्त करने से कोई न रोक पाए.

मैं ने उन के कमरे की दीवारों से आंखकान लगाए, तो भीतर अपने भैयाजी की आवाज सुनाई दी, भैयाजी दिखाई दिए. उन के चारों ओर मच्छर गुनगुना रहे थे. उन्होंने अपने आगे संविधान रखा था और खुद संविधान के आगे घुटने टेके क्षमायाचना की मुद्रा में.

तब पहली बार पता चला कि नेता भी किसी के आगे घुटने टेकते हैं, वरना मैं तो सोचता था कि नेता सभी को अपने आगे घुटने टिकवाते हैं.

भैयाजी हाथ जोड़े संविधान के आगे घुटने टेके कह रहे थे, ‘हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने अपने मौसेरे भाइयों को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख न होती, तो मैं अपने मौसेरे भाइयों को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी न कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

‘चुनाव के दिनों में जो मैं ने दिवंगत नेताओं को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख न होती, तो मैं अपने दिवंगत नेताओं को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी न कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

‘हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने जनता को लुभाने, रिझाने व पटाने के लिए उन को झूठे आश्वासन दिए, तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए मैं दिल की गहराइयों से जनता से माफी मांगता हूं. ये मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख न होती, तो मैं भोलीभाली जनता को जो मैं ने इस चुनाव में झाठी गारंटियां दीं, कभी न देता. इस अपराध के लिए झूठे आश्वासन हेतु मुझे माफ करें.

‘हे संविधान, झूठ बोलना हर पार्टी के, हर किस्म के नेता के अधिकार क्षेत्र में आता है. जनता से झूठ बोलना उस का मौलिक अधिकार है. जनता को छलना, दलना उस का पहला फर्ज है. पर चुनाव के दिनों में स्वयंमेव हर नेता को झूठ बोलने का विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता है.

‘इस महापर्व में नेता के हजार झूठ भी माफी लायक होते हैं. दरअसल, इन दिनों उसे खुद पता नहीं होता कि वह जो बोल रहा है, क्या बोल रहा है. चुनाव के दिनों में जो मन में आए, बोलना उस का धर्म होता है, क्योंकि इन दिनों वह केवल और केवल अपने प्रचारी धर्म का पालन कर रहा होता है. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के मेरा झूठ मुझे माफ करे.

‘हे संविधान, तुम मुझे समाज में जातिगत, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रदूषण को फैलाने के दोष से दोषमुक्त करना.

मैं मानता हूं कि प्रदूषणों में सब से खतरनाक प्रदूषण जातिगत प्रदूषण होता है. पर क्या करूं, इन प्रदूषणों को समाज में फैलाने पर ही कोई अच्छा नेता बन पाता है.

‘समाज में जातिगत, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाए बिना स्वस्थ राजनीति हो ही नहीं सकती. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के लिए जाति, धर्म मुझे माफ करे.

‘हे संविधान… हे संविधान…’  

Family Story : नरगिस

लेखक – मनोज शर्मा, Family Story : घर की दहलीज पर चांदनी हाथ बांधे खड़ी थी. सामने आतेजाते लोगों में अपनी शाम ढूंढ़ रही थी. कोई दूर से देख लेता तो एक पल के लिए दिल मचल जाता, पर उसे वापस लौटते देखते ही सारी उम्मीदें टूट जातीं.

लौकडाउन से पहले ही आखिरी बार कोई आया था शायद…वह बंगाली, जिस के पास पूरे पैसे तक नहीं थे, फिर अगली बार रुपए देने का वादा कर के सिर्फ 50 का नोट ही थमा गया था.

उस रोज ही नहीं, बल्कि उस से पहले से ही लगने लगा था कि अब इस धंधे में भी चांदनी जैसी अधेड़ औरतों के लिए कुछ नहीं रखा, पर उम्र के इस पड़ाव पर कहां जाएं? उम्र का एकतिहाई हिस्सा तो यहीं निकल गया. सारी जवानी, सारे सपने इसी धंधे में खाक हो चुके हैं. अब तो यही नरक उस का घर है.

कभी जब चांदनी कुछ खूबसूरत थी, सबकुछ जन्नत लगता था. हर कोई उस की गदराई जवानी पर मचल जाता था. पैसे की चाह में सब की रात रंगीन करना कितना अच्छा लगता था.

पर, अब तो जिंदगी जहन्नुम बन चुकी है. लौकडाउन में पहले कुछ दिन बीते, फिर हफ्ते और अब तो महीने. यहां कई दिनों से फांके हैं. कैसे जी रही है, चांदनी खुद ही जानती है. सरकार कुछ नहीं करती इस के लिए. न अनाज का दाना है अब और न ही फूटी कौड़ी. कोई फटकता तक नहीं है अब.

जब चांदनी नईनई आई थी, तब बात ही अलग थी. 12 साल पहले, पर ठीक से याद नहीं. वे भी क्या दिन थे, जब दर्जनों ड्रैस और हर ड्रैस एक से बढ़ कर एक फूलों से सजी. कभी गुलाबी, कभी सुनहरी और कभी लाल. कभी रेशमी साड़ी या मखमली लाल चमकीला गाउन.

रोजरोज भोजन में 3 किस्म की तरकारी, ताजा मांस, बासमती पुलाव, पूरीनान. क्या स्वाद था, क्या खुश थी. घर पर पैसा पहुंचता था, तो वहां भी चांदनी की तूती बोलती थी. नएनए कपड़े, साजोसामान के क्या कहने थे. बस राजकुमारी सी फीलिंग रहती थी.

हर ग्राहक की पहली पसंद उन दिनों चांदनी ही थी और दाम भी मनचाहा. जितना मांगो उतना ही. और कई बार तो डबल भी. हर शिफ्ट में लोग उस का ही साथ मांगते थे. सोने तक नहीं देते थे रातभर. और वह बूढ़ा तो सबकुछ नोच डालता था और फिर निढाल हो कर पड़ जाता था. वे कालेज के लड़के तो शनिवार की शाम ही आते थे, पर मौका पाते ही चिपट जाते थे. हां, पर एक बात तो थी, अगर शरीर चाटते थे तो पैसा भी मिलता था और फिर कुछ घंटों में ही हजारों रुपए.

आज देह भी काम की नहीं रही और एक धेला तक साथ में नहीं. शक्ल ही बदल गई, जैसे कोई पहचानता ही न हो. बूढ़ा बंगाली या गुटका खाता वह ट्रक ड्राइवर या 2-4 और उसी किस्म के लोग, बस वही दोचार दिनों में. सब मुफ्तखोर हैं. मुफ्त में सब चाहते हैं. अब यहां कुछ भी नहीं बचा. यह तो जिंदगी का उसूल है कि जब तक किसी से कोई गर्ज हो, फायदा हो, तभी तक उस से वास्ता रखते हैं, वरना किसी की क्या जरूरत.

अब तो कालेज के छोकरे चांदनी की सूरत देखते ही फूहड़ता से हंसने लगते हैं, पास आना तो दूर रहा. 100-50 में भी शायद अब कोई इस शरीर को सूंघे. आंखें यह सब सोचते हुए धरती में गढ़ गईं. चांदनी रेलिंग पर हथेली टिकाए सुनसान सड़क को देखती रहती है.

कितना बड़ा घर था, पर अब समय के साथसाथ इसे छोटा और अलहदा छोड़ दिया गया है. कभी यह बीच में होता था. जब सारी आंखें चांदनी को हरपल खोजती थीं, पर अब इसे काट कर या मरम्मत कर एक ओर कर दिया है, ताकि चांदनी जवान और पैसे वाले ग्राहकों के सामने न आ सके, शायद ही कभीकभार कोई आंखें इस ओर घूरती हैं.

और फिर गलती से यहां कोई पहुंच भी जाता है तो आधे पैसे तो दलाल ले जाता है. वह मुच्छड़ वरदी वाला या वह टकला वकील और छोटेमोटे व्यवसायी या दूरदराज से आए नौकरीपेशा लोग ही यहां आते हैं. इस शरीर की इतनी कम कीमत, यह सोच कर ही मन सहम जाता है.

टैलीविजन का स्विच औन करते हुए चांदनी खिड़की से बाहर सुनसान सड़क पर देखती है. 2-1 पियक्कड़ इस ओर घूर रहे हैं. जाने कभी आए हों यहां किसी रोज. अब तो याद भी नहीं.

आज चांदनी का उदास चेहरा और अलसाई सी आंखें उन्हें खींचने में पूरी तरह नाकाम हैं. शायद भूखा पेट किसी की हवस को पूरा करने में अब नाकाम है और शरीर का गोश्त भी ढल चुका है.

चांदनी ने चैनल बदलतेबदलते किसी न्यूज चैनल पर टीवी पर कोरोना के बढ़ते प्रकोप को देखा. मर्तबान से मुट्ठीभर चने निकाल कर धीरेधीरे चबाने लगी. कुछ ही देर में टैलीविजन बंद कर के वह पलंग पर लेट गई. उस की खुली आंखें छत पर घूमतेरेंगते पंखे की ओर कुछ देर देखती रहीं और फिर वह गहरी नींद में खो गई.

सुबह कमरे के बाहर से चौधरी के चीखने की सी आवाज सुनाई पड़ी. रात की चुप्पी कहीं खो गई और सुबह का शोर चल पड़ा.

जाने क्यों लगा, सींखचों से कोई कमरे में झांक रहा है. आवाज बढ़ने लगी और गहराती गई.

‘‘3 महीने हो गए भाड़ा दिए हुए…’’ चौधरी के स्वर कानों में पड़ने लगे, ‘‘तुम्हारे बाप का घर है? मुझे शाम तक भाड़ा चाहिए, कैसे भी दो.’’

वही पुरानी तसवीर, जो 10-12 बजे के आसपास 2-3 महीनों में अकसर उभरती है.

चांदनी ने सींखचों से झांक कर देखा चौधरी का रौद्र रूप. लंबातगड़ा गंजा आदमी, सफेद कमीज पर तहमद बांधे मूंछों पर ताव देता गुस्से में चीख रहा था. वह बारीबारी से हर बंद कमरे की ओर देख कर दांत पीसता और आंखें तरेरता.

उस के सामने कुरसी रख दी गई, पर वह खड़ा ही खड़ा सब को आतंकित करता रहा.

‘‘अरे चौधरी साहब, बैठ भी जाइए अब,’’ अमीना बानो ने कुरसी पर बैठने के लिए दोबारा इशारा किया.

एक बनावटी हंसी लिए अमीना कितने ही दिनों से चौधरी को फुसला रही है, ‘‘अच्छा बताइए, आप चाय लेंगे या कुछ और?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, केवल भाड़ा चाहिए.’’

8-9 साल की लड़की के कंधे को मसलते हुए अमीना ने चौधरी के लिए चाय बनवा कर लाने को बोला.

‘‘नहींनहीं, मैं यहां चाय पीने नहीं आया हूं. अपना भाड़ा लेने आया हूं.’’

छोटी लड़की झगड़ा देखते हुए तीसरे कमरे में घुस जाती है.

उसी कमरे के बाहर झड़ते पलस्तर की ओर देखते हुए चौधरी ने कहा, ‘‘घर को कबाड़खाना बना कर रख दिया है अमीना तुम लोगों ने… न साफसफाई, न लिपाईपुताई. देखो, हर तरफ बस कूड़ाकरकट और जर्जर होती दीवारें. सोचा था कि इस बार इस घर की मरम्मत करा दूंगा, पर यहां तो भाड़ा तक नहीं मिलता कभी टाइम से.

‘‘मैं 10 तारीख को फिर आऊंगा. मुझे भाड़ा चाहिए जैसे भी दो. घर से पैसा मंगवाओ या कहीं और से, मुझे
नहीं मालूम.’’

‘‘अरे चौधरी साहब, इन दिनों कोई नहीं आता यहां,’’ दूसरी कुरसी करीब सरका कर चौधरी को समझाने की कोशिश करते हुए अमीना ने कहा.

‘‘आप का भाड़ा क्यों नहीं देंगे… हाथ जोड़ कर देंगे. बहुत जल्दी सब ठीक हो जाएगा, टैंशन न लो आप. आप के चलते ही तो हम सब हैं यहां, वरना इस धरती पर हमारा कोई वजूद कहां.’’

सामने एक कमरे से एक जवान होती लड़की उठी. दरवाजा खोल कर अमीना के पास आई और ऊंघने लगी, ‘‘अम्मां क्या हुआ? कौन है ये बाबू? क्या कह रहे हैं?’’

इतना कह कर चौधरी की तरफ देख कर वह जबान पर जीभ फिरा कर हंसने लगी. उस लड़की की शक्लोसूरत पर अजीब सी मासूमियत है, पर उस की छाती पूरी भरी है, जिस पर इस अल्हड़ लड़की को खास गुमान है. उस के बदन पर एक टाइट मैक्सी है.

चेहरे पर गिरी जुल्फें उसे और खूबसूरत बना रही हैं. चौधरी की नजरें अमीना से हट कर उस ओर चली गईं और रहरह कर उस के गदराए बदन पर टिक जाती हैं.

अमीना की तरफ देखते हुए चौधरी बोला, ‘‘कौन है यह? नई आई है क्या? पहले तो इसे कभी नहीं देखा?’’

लड़की अपनी उंगलियों से बालों की लटों के गोले बनाती रही.

‘‘हां, यह कुछ दिन पहले ही यहां आई है. मुस्तफाबाद की जान है. अभी 17 की होगी, शायद दिसंबर में.’’

‘‘क्या नाम है तेरा?’’ लड़की को देखते हुए चौधरी बोला.

लड़की चुप रही, पर मुसकराती रही.

अमीना ने लड़की की कमर सहलाते हुए कहा, ‘‘बेटी, नाम बताओ अपना. ये चौधरी साहब हैं अपने. यह पूरा घर इन्हीं का है.’’

चौधरी किसी रसूखदार आदमी की तरह अपने गालों पर उंगली फिराने लगा.

लड़की गौर से देखती रही, कभी अमीना को तो कभी चौधरी को.

‘‘नरगिस है यह. नमस्ते तो करो साहब को.’’

लड़की हंसते हुए दोनों हथेलियां जोड़ कर सीने तक ले आई, पर चौधरी की आंखें अभी भी नरगिस के सीने पर थीं.

‘‘ओह नरगिस, कितना अच्छा नाम है,’’ एक भौंड़ी मुसकराहट लिए चौधरी बोला.

नरगिस अपनी तारीफ सुन कर चहकने लगी और अमीना की एक बांह पर लहर गई.

घड़ी में समय देखते हुए चौधरी कुछ सोचते हुए कुरसी से उठा. पहले इधरउधर देखा, पर जल्दी ही लौटने की बात कहता हुआ देहरी की ओर बढ़ने लगा.

अमीना ने कहा, ‘‘चाय की एक प्याली तो ले ही लेते?’’

मुंह पर मास्क लगाते हुए चौधरी ने नरगिस को भी मास्क लगाने की सलाह दी, ‘‘फिर आऊंगा. सब अपना खयाल रखना.’’

नरगिस के सीने पर नजर रखता और जबान पर होंठ फिराता हुआ चौधरी चला गया.

एकएक कर के कमरों की सांकलें खुलने लगीं. भूखेअलसाए चेहरे, जो अभी तक कमरों में बंद थे, बाहर दालान में इकट्ठा हो गए मानो किसी खास बात पर जिरह करनी हो.

‘‘कौन था? चौधरी?’’ एक अधेड़ उम्र की धंधे वाली ने अमीना से पूछा.

‘‘हां, चौधरी ही लग रहा था,’’ दूसरी ने बेमन से कहा.

‘‘और क्या हुआ तेरे सेठ का? कल भी नहीं आया क्या?’’ रोशनी की तरफ देखते हुए एक ने पूछा.

‘‘नहीं. लौकडाउन है न. फोन पर ही मजा लेता रहा, पर मैं ने भी पेटीएम से 500 रुपए झाड़ ही लिए.’’

‘‘अरे, यहां तो कोई ऐसा भी नहीं,’’ एक बोली और फिर वे एकदूसरे को देखते हुए बतियाने लगीं.

‘‘जैसे भी हो, अपनेअपने ग्राहकों को बुलाओ, नहीं तो चौधरी यहां से निकाल देगा,’’ अमीना ने नेता भाव से सब को इकट्ठा कर के कहा.

‘‘3 महीने हो गए हैं, एक धेला तक नहीं दे पाए उन को. वह महारानी कहां है? उसे यह सब दिखता नहीं क्या?’’ चांदनी के कमरे की तरफ देख कर अमीना ने आवाज दी, ‘‘चांदनी, ओ चांदनी.’’

चांदनी जैसे सपने से जाग गई हो.

एक बार तो दिल ने चाहा कि सांकल खोल कर सब की जबान पर लगाम लगा दे कि एक वक्त था, जब सारे उस की आमदनी पर जीते थे, पर आज मुश्किल घड़ी में ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं और यह चौधरी जब मूड करता था आ जाता था मुंह मारने, पर देखो तो आज कैसे सुर बदल गए हैं इस मरदूद के.

बाहर दालान में कुछ देर की बहस हुई. सब एकदूसरे को देखती रहीं, पर नतीजा कुछ नहीं निकला. सब को लगा कि अब नए सिरे से शुरुआत करनी होगी.

सुरैया पास ही खड़ी थी. चांदनी की रोंआसी सूरत देख और करीब आ गई. उस की ठुड्डी को सहलाते हुए बोली, ‘‘चांदनी दीदी, सब ठीक हो जाएगा.’’

सब अपनेअपने कमरे में लौट गईं. सुरैया न केवल शक्लोसूरत से खूबसूरत थी, बल्कि अच्छा गाती भी थी.

लौकडाउन से पहले सब से ज्यादा ग्राहक इसी के होते थे. कुछ तो केवल गायकी के फन को तराशने आते थे और 2-1 ने तो गाने के लिए बुलावा भी भेजा. जिस्म तो यहां सभी बेचती हैं, पर उस के सुर की बात ही अलग है. अगर वह यहां न आती और गायकी पर फोकस रखती तो जरूर ही नाम कमाती.

वह खाकी वरदी वाला रोज नई उम्मीद की किरण दे कर मुफ्त में सुरैया को नोच जाता है. बेचारी पढ़ीलिखी है. 10वीं तक स्कूल गई है, पर यहां आ कर सब एकसमान हो जाते हैं. आई तो यहां बाप के साथ कुछ बनने, पर इस खाकी वरदी वाले ने झूंठा झांसा दे कर इस धंधे में उतार दिया. अब खुद तो आता है 2-4 और भी आ जाते हैं. सुरैया न सही, मेरे जैसी अधेड़ ही मिल जाए.

सुरैया चांदनी का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई.

‘‘क्या हुआ? रो क्यों रही हो?’’ सुरैया ने चांदनी के बालों में उंगलियां फिराते हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं बस ऐसे ही. परसों देर रात तक तुम्हारे कमरे से आवाजें आ रही थीं,’’ चांदनी ने सुरैया से पूछा.

‘‘कब? अच्छा, परसों? वही वरदी वाला आया था. 3 और भी थे. मुंह पर मास्क बांधे थे. मैं ने जब पूछा कि दारोगा साहब कुछ बात बनी, मेरे गाने की तो वह हंसने लगा और मेरे सीने को छूने लगा. मैं ने उस से कुछ पैसे मांगे तो गाली देने लगा, पर एक धेला तक नहीं दिया…

‘‘उस का मुंह सूखे पान से भरा था. बीड़ी की राख फेंकते हुए बोला, ‘रानी, हो जाएगा सब. देखती नहीं कि अभी सब बंद है.’

‘‘और पीछे से उस ने आगोश में भर लिया. मैं ने कहा कि अच्छा दारोगा साहब थोड़े पैसे ही दे दो?’’

यह सुन कर उस का सारा नशा जाता रहा और गालीगलौज करने लगा.

‘‘चांदनी दीदी, आप ही बताओ कि अब कैसे चलेगा? सब मुफ्त में मजा चाहते हैं. कुत्ते कहीं के.’’

सुरैया बोलती रही, चांदनी सब ध्यान से सुनती रही.

‘‘पर, अब चारा भी क्या है. जब पेट की प्यास बुझाने को पैसा नहीं तो कोई क्या देह को दिखाए. वह रातभर के लिए अपने कमरे पर ले जाना चाहता था. बोलता था, ‘मेरी रानी, ऐश करवा दूंगा, चल तो बस एक बार.’

‘‘जब मैं ने मना किया तो मुझे घसीटने लगा. अमीना मैम ने समझाबुझा कर उसे चलता किया.’’

‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं मुझे?’’ चांदनी बोली.

‘‘चांदनी दीदी, अब क्या किसी को तंग करूं. तुम्हें मैं अपना मानती हूं, फिर यह सब देख कर तुम और ज्यादा दुखी होगी.’’

सुरैया की रोती आंखें चांदनी को देखती रहीं, कुछ देर तक वे दोनों चुप रहीं.

‘‘सुरैया एक काम करोगी मेरे लिए?’’

‘‘हांहां, कहो न?’’

‘‘नरगिस… जो अभी नई लड़की आई है न…’’

‘‘हां…’’

‘‘उसे यहां से कहीं दूर भेज दो, जहां वह जिस्मबाजारी न कर सके.’’

‘‘अभी तो वह बच्ची है. मैं उस में अपनी सूरत देखती हूं. इस जुम्मेरात जब अमीना बाई 1-2 घंटे के लिए बाहर जाए, तब किसी भी तरह उसे वापस भिजवा दो. तुम्हारा एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी या तुम 500-600 रुपए का इंतजाम कर दो, मैं ही उसे घर छोड़ आऊंगी सुरैया.’’

‘‘अरे दीदी, अभी सब बंद है. तुम कैसे जाओगी? और उस लड़की को भी तो समझाना होगा. वह तो अभी नासमझ है. देह ही निखरी है अभी, दिमाग से तो नादान ही है?’’

‘‘मैं जानती हूं, पर मौका पाते ही उसे भी समझा दिया जाएगा. वह चौधरी ही कहीं 1-2 दिन में… उस की नजर ही गंदी है. अब तो उस का वह छोकरा भी…’’

‘‘नहींनहीं दीदी, ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘सुनो, एक बात बताऊं. यहां पास ही कालेज है. उस में पढ़ने वाला एक शरीफ लड़का है. उस से फोन पर बात करती हूं. वह कोई पढ़ाई कर रहा है धंधे वाली औरतों की जिंदगी पर. शायद, वह कुछ मदद कर दे.

‘‘जैसे भी हो, हम सब तो यहां बरबाद हो गईं अब और किसी नई को यहां न खराब होने दें.’’

‘‘ठीक है दीदी. आज दोपहर जब सब सोए होंगे, तब बात करते हैं. अच्छा, मैं भी अब चलती हूं. तुम से बतिया कर सच में सुकून पाती हूं. बहुत उम्मीद है तुम से.’’

‘‘अरे दीदी, ये बिसकुट तो खाती जाओ.’’

‘‘नहींनहीं, बस.’’

कमरे में लौट कर मानो चांदनी सब भूल गई. काम हो जाए. हमारा तो अब कोई नहीं हो सकता, पर उस की तो पूरी जिंदगी बन जाएगी. वह लड़का जरूर कुछ करेगा.

आज ही उस लड़के का फोन भी आना है. मेरी जिंदगी पर कुछ लिख रहा है वह. हां, रिसर्च कर रहा है. ये लोग काफी पढ़ेलिखे हैं, जरूर हमारी कुछ न कुछ मदद करेंगे.

चांदनी का दिल कहता है कि वह लड़का नरगिस के लिए कुछ करेगा. क्या नाम था उस का…?

जो भी हो, इस जहन्नुम भरी जिंदगी से इस लड़की को भेजना ही पहला काम होगा. सरकार और ग्राहकों के भरोसे भी कब तक बैठे रह सकते हैं. कोई किसी का नहीं इस नरक में.

अभी लौट गई तो कोई अपना भी लेगा. नहीं तो यह भी दूसरी धंधे वालियों जैसी हो जाएगी. जरूर कुछ होगा. अच्छा होगा, यकीनन.

3 महीने बाद…

‘‘ओह, कितना अच्छा लग रहा है आज 3 महीने बाद. नरगिस कैसी होगी? सुरैया, बात हुई कोई?’’

‘‘हां दीदी, कल रात हुई थी,’’ सुरैया चहकते हुए बोली.

चांदनी जैसे खुशी से झूम गई.

‘‘यह नया सूट कब लाई सुरैया? पहले तो कभी न देखा इस में.’’

‘‘दीदी, यह सूट उस पढ़ने वाले साहब ने दिया है. बहुत अच्छे हैं ये पढ़ने वाले लोग. हमारे जज्बात समझते हैं. कभी छुआ तक नहीं, पर हरमुमकिन मदद देते हैं. आप की बहुत तारीफ करता है वह.’’

‘‘कौन सा…?’’ चांदनी ने पूछा.

‘‘अरे वही, जिस ने नरगिस को यहां से उस के घर तक भिजवाया था. और न केवल भिजवाया था, बल्कि उस के घर वालों को अच्छे से समझाया भी था.’’

‘‘अच्छा…’’

‘‘हां, दीदी…’’

‘‘एक बात कहूं?’’

‘‘कहो न…’’

‘‘वे प्रोफैसर बन जाएंगे, कालेज में जल्दी ही.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘हां, वे बोलते हैं कि मेरे साथ घर बसाएंगे.’’

‘‘अरे वाह सुरैया, तेरा सपना अब पूरा हो जाएगा.’’

‘‘दीदी आप बहुत अच्छी हो, सब तुम्हारी बदौलत ही मुमकिन हुआ है. तुम सच में महान हो.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मैं इस लायक कहां.’’

‘‘दीदी, अगर उन की किताब छप गई न, तो वे तुम्हें भी तुम्हारे घर पर भिजवा देगा.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मेरा तो यही है सब स्वर्ग या नरक.’’

इस के बाद वे दोनों चहकते हुए घंटों तक बतियाती रहीं.

Short Story : मोम की गुड़िया

Short Story : जिंदगी में सबकुछ तयशुदा नहीं होता. कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है, जिस की आप ने ख्वाब में भी उम्मीद नहीं की होती है. हालांकि अब मैं उस बुरे ख्वाब से जाग गई हूं. राशिद ने मेरी तकदीर को बदलना चाहा था. मु झे मोम की गुडि़या समझ कर अपने सांचे में ढालना चाहा था.

यों तो राशिद मेरी जिंदगी में दबे पैर चला आया था. वह मेरी बड़ी खाला का बेटा था. पहली बार वह तरहतरह के सांचे में ढली मोमबत्तियां ले कर आया था और एक दिन मु झ से कहा था, ‘‘इनसान को मोम की तरह होना चाहिए. वक्त जब जिस सांचे में ढालना चाहे, इनसान को उसी आकार में ढल जाना चाहिए.’’

राशिद का मोमबत्ती बनाने का बहुत पुराना कारोबार था. हमारे शहर में भी राशिद की बनाई मोमबत्तियों की काफी मांग बढ़ गई थी. अब वह दिल्ली से कुछ नए सांचे ले कर आया, तो हमारे ही घर पर रुका.

राशिद ने मेरे सामने मोम पिघला कर सांचे से मोमबत्तियां बनाईं. तब मु झे भी अपना वजूद मोम की तरह पिघला महसूस हुआ. मैं सोचने लगी, ‘काश, मु झे भी कोई पसंदीदा सांचा मिल जाता, जिस में मैं मनमुताबिक ढल जाती.’

एक दिन तपती दोपहर में राशिद ने मेरे दोनों बाजुओं को अपने हाथों से ऐसे जकड़ लिया मानो मैं मोम हूं और वह जैसे चाहेगा, मुझे सांचे में ढाल देगा.

राशिद बड़ी मासूमियत भरे अंदाज में फुसफुसाया, ‘‘मैं तुम से बेहद मुहब्बत करता हूं.’’

वह मेरे जवाब के इंतजार में था और मैं सोच में पड़ गई. उस ने फिर फुसफुसाना शुरू किया, ‘‘जेबा, तुम्हारे बगैर सुबह सूनी, दोपहर वीरान और शाम उदास नजर आती है.’’

मैं इतना सुनते ही न जाने क्यों बेतहाशा हंसने लगी और हंसतेहंसते मेरी आंखें भर आईं. राशिद हैरान सा मेरी ओर देखने लगा.

मैं ने अपनी बांहें छुड़ा कर राशिद से कहा, ‘‘मर्द की फितरत अजीब होती है. जब तक वह किसी चीज को पा नहीं लेता, उस पर जान छिड़कता है. मगर उसे पा लेने के बाद वह उसे भूल जाता है. मर्द हमेशा उस पहाड़ की चोटी पर चढ़ना चाहता है, जिसे अभी तक किसी ने छुआ न हो, मगर चोटी पर चढ़ने के बाद वह आगे बढ़ जाता है दूसरी अजेय पहाड़ की चोटी को जीतने के लिए.’’

राशिद न तो स्कूली तालीम ज्यादा ले पाया था और न ही जिंदगी की पाठशाला में होनहार था, जबकि मैं जिंदगी की पाठशाला में काफीकुछ सीख चुकी थी.

मर्द के सामने पूरी तरह खुल जाना औरत की बेवकूफी होती है. उसे हमेशा राज का परदा सा बनाए रखना चाहिए. ऐसी औरत मर्द को ज्यादा अपनी तरफ खींचती है. यह बात जिंदगी की पाठशाला में मैं सीख चुकी थी.

2 साल पहले मैं 12वीं जमात पास करने के बाद घर बैठ गई थी. मेरा आगे पढ़ने का मन ही नहीं हुआ. दुनिया बेरौनक सी लगती थी. कहीं किसी काम में मन नहीं लगता था. जी चाहता था कि दुनिया से छिप कर किसी अंधेरी कोठरी में बैठ जाऊं, जहां मु झे कोई देख न पाए.

फिर पता नहीं क्यों मेरे दिल ने एक करवट सी ली. मैं ने एक दिन अम्मी से आगे पढ़ने की बात की. वे खुश हो गईं. औरत ही औरत के दर्द को पहचान पाती है. वे चाहती थीं कि मैं पढ़ने में मन लगाऊं और खुश रहूं. मैं भी अब खुशीखुशी स्कूल से कालेज में पहुंची. बीएससी में जीव विज्ञान मेरा पसंदीदा विषय रहा. इनसान के भीतर देखने की चाह ने इस विषय में मेरी और दिलचस्पी पैदा कर दी थी. अब विषय के साथसाथ और भी बहुतकुछ बदल गया था.

जमात बढ़ने के साथसाथ स्टूडैंट में भी काफीकुछ बढ़ोतरी हो जाती है. दिमाग के जाले साफ हो जाते हैं. पुराने दोस्त काफी पीछे रह जाते हैं. नया माहौल, नए दोस्त हवा में नई खुशबू सी घोल देते हैं.

एक दिन मैं बायोलौजी का प्रैक्टिकल कर के घर पहुंची, तो घर में कुछ ज्यादा ही चहलपहल नजर आई. बड़ी खाला, खालू और राशिद घर पर दिखाई दिए. खाला, खालू को सलाम कर मैं अंदर अपने कमरे में चली गई.

रात का खाना खाने के वक्त मैं ने एक बात नोट की कि राशिद मु झे एक अलग तरह की मुसकान से देख रहा था.

खाना खाने के बाद मौका मिलने पर राशिद मेरे पास आया और बोला, ‘‘जेबा, अब वक्त आ गया है तुम्हें मेरे सांचे में ढलना होगा. तुम्हें तो मालूम है कि मेरे पास कितने सांचे हैं. मैं जब जिस सांचे में चाहूं, मोम पिघला कर नई शक्ल दे देता हूं.’’

मैं राशिद की सोच से काफी आगे बढ़ चुकी थी. उसे जवाब देना मैं ने मुनासिब नहीं सम झा.

सुबह कालेज जाते वक्त अम्मी मेरे पास आईं. कुछ देर तक वे मु झे देखती रहीं, फिर धीरे से बोलीं, ‘‘जेबा, बाजी तेरा रिश्ता मांगने आई हैं. तेरे अब्बा तो खामोश हैं, तू ही कि बता क्या जवाब दूं?’’

मैं ने अम्मी की तरफ देखा. वे अजीब से हालात में थीं. एक तरफ उन की बहन थी, तो वहीं दूसरी तरफ बेटी.

मैं ने अब अपनी जबान खोलना वक्त का तकाजा सम झा. मैं ने कहा, ‘‘अम्मी, अब वक्त काफी आगे बढ़ चुका है और ये लोग पुराने वक्त पर ही ठहरे हुए हैं. आप खुद बताइए कि क्या राशिद मेरे लायक है? वैसे भी मु झे आगे पढ़ना है, काफी आगे जाना है. मेरे अपने सपने हैं, जो मु झे पूरे करने हैं.

‘‘मैं पिंजरे में बंद मजबूर बेसहारा पक्षी की तरह नहीं हूं, जिस का कोई भी मोलभाव कर ले. मैं खुले आसमान में उड़ने वाला वह पक्षी हूं, जो अपनी मंजिल खुद तय करता है.’’

मेरे इनकार के बाद मुझ पर मेरे ही घर में राशिद ने तेजाब का एक भरा हुआ मग फेंका था. वह तो मैं समय पर पलट गई थी और सारा तेजाब मेरी पीठ और हाथ पर ही गिर सका था.

घर में कुहराम मच गया था. अब्बा घर पर नहीं थे. अम्मी ही फौरन मुझे अस्पताल ले गई थीं. एक महीने के इलाज के बाद मैं बेहतर हो सकी थी. मैं अपने विचारों में, इरादों में पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गई थी.

राशिद को तो उस के किए की सजा मिली ही, मगर मैं ने भी अपनी जीने की इच्छा को जिंदा रखा और आज एक कामयाब टीचर के तौर पर अपने पैरों पर खड़ी हूं.

Hindi Story: एक थी मालती- बेटी हो तो ऐसी

Hindi Story: यकीन करना मुश्किल था कि 20 साल पहले मैं उस कमरे में रहता था. पर बात तो सच थी. साल 1990 से ले कर साल 1993 तक छपरा में पढ़ाई के दौरान मैं ने रहने के कई ठिकाने बदले, पर जो लगाव पंडित शिव शंकर के मकान से हुआ, वह बहुत हद तक आज भी कायम है.

वह खपरैल के छोटेछोटे 8-10 कमरों का लौज था. उन्हीं में से एक कमरे में मैं रहता था. किराया 70 रुपए से शुरू हो कर मेरे वहां से हटतेहटते 110 रुपए तक पहुंच गया था. यह बात दीगर है कि मैं ने कभी समय पर किराया दिया नहीं. पंडित का बस चले तो आज भी सूद समेत मुझ से कुछ उगाही कर लें.

एक बार तो पंडित ने मेरे कुछ दोस्तों से कह भी दिया था कि भाई उन से कहिए कि उलटा हम से 2 महीने का किराया ले लें और हमारा मकान खाली कर दें.

पंडित का होटल भी था, जहां 5 रुपए में भरपेट खाने का इंतजाम था. मेरा खाना भी अकसर वहीं होता था. पंडिताइन तकरीबन आधा दिन गोबर और मिट्टी में ही लगी रहतीं. कभी उपले बनातीं, कभी मिट्टी के बरतन.

जब खाने जाओ, झट से हाथ धोतीं और चावल परोसने लगतीं. सच कहूं, उस वक्त बिलकुल नफरत नहीं होती थी, बल्कि गोबर और मिट्टी की खुशबू से खाने में और स्वाद आ जाता.

उन की एक बेटी थी मालती. साल 1993 में उधर उस की शादी हुई, इधर मैं ने मकान खाली किया. वैसे, मालती से मेरा कोई खास नजदीकी रिश्ता नहीं था, मगर उस के जाने के बाद एक अजीब सा सूनापन नजर आ रहा था. मन उचट सा गया था, इसलिए मैं ने वहां से जाने का तय किया.

इस के पहले कि दूसरा ठिकाना खोजता, मेरी नौकरी लग गई और मैं ने छपरा को अलविदा कह दिया.

20 साल बाद छपरा में एक दिन मैं बारिश में बुरी तरह घिर गया और मेरी मोटरसाइकिल बंद हो गई. सोचा, क्यों न मोटरसाइकिल को पंडित के घर रख दें, कल फिर आ कर ले जाएंगे.

मैं मोटरसाइकिल को धकेलते और बारिश में भीगता हुआ वहां पहुंचा. पंडित का होटल अब मिठाई की दुकान में तबदील हो गया था.

पंडिताइन मुझे देखते ही पहचान गईं. वे चाय बनाने लगीं. मैं ने उन से कहा, ‘‘आप चाय बनाइए, तब तक मैं अपना कमरा देख कर आता हूं जहां मैं रहता था.’’

मैं पीछे लौज की ओर गया. सारे कमरे तकरीबन गिर चुके थे. अपने कमरे के दरवाजे को मैं प्यार से सहलाने लगा, तभी मेरी नजर एक चित्र पर गई. दिल का रेखाचित्र और बीच में इंगलिश का एम देख कर यादें ताजा हो गईं.

एक दिन मैं ने मालती से कहा था, ‘अबे ओ बौनी, नकचढ़ी, नाक से बोलने वाली लड़की, तेरा यह कमरा मैं तभी खाली करूंगा, जब तू ससुराल चली जाएगी.’

इस पर मालती बनावटी गुस्से में बोली थी, ‘यह मेरा मकान है. जब चाहें तब निकाल दें तुम्हें… यह लो…’ और उस ने खुरपी से दरवाजे पर दिल का रेखाचित्र बनाया और बीच में एम लिख दिया.

मालती का कद काफी छोटा था. लौज के सारे लड़के उसे बौनी कहते थे, मगर उस के पीछे. वे जानते थे कि मालती बड़ी गुस्सैल है, सुन लेगी तो खुरपी चला देगी.

पर, यह हिम्मत मैं ने की. एक दिन उस से कहा, ‘ऐ तीनफुटिया, जरा अपनी दुकान से चाय ला कर तो दे.’

उस ने भी पलट कर कहा था, ‘चाय नहीं, जहर ला कर दूंगी भालू…’

हमारे नहाने का कार्यक्रम खुले में होता था नल के नीचे और मालती ने बालों से भरा मेरा बदन देख लिया था, इसलिए वह मुझे भालू कहती थी.

मैं समझ गया कि उसे बुरा नहीं लगा था. कुछ मस्ती मैं कर रहा था, कुछ वह. फिर तो मस्ती का सिलसिला चल पड़ा.

पंडित के घर के पिछले हिस्से में लौज था. अगले हिस्से में वे रहते थे. बीच में एक पतली गली थी.

मालती हम लोगों के लिए अलार्म का काम भी करती थी. सुबहसुबह गाय ले कर उस गली से गुजरती तो जोर से आवाज लगाती थी, ‘कौनकौन जिंदा है? जो जिंदा है, वह उठ जाए. जो मर गया, उस का राम नाम सत्य.’

मैं जानता था कि मरने वाली बात वह मेरे लिए बोलती थी, क्योंकि मैं सुबह देर तक सोता था. खैर, उस के इसी डायलौग से मेरी नींद खुलती थी. फिर भी कभी अगर नींद नहीं खुलती तो मारटन टौफी चला कर मारती. उन दिनों बिहार में मारटन टौफी का खूब प्रचलन था.

पंडित की एक राशन की दुकान भी थी, जहां उन का बेटा यानी मालती का बड़ा भाई बैठता था. उस समय मैं महज 19 साल का था. इतनी समझ नहीं थी. मैं ने मालती की राशन की दुकान का भरपूर फायदा उठाया. जब कभी वह गली से गुजरती, मैं अपनेआप से ही जोरजोर से कहता, ‘यार, कोलगेट खत्म हो गया. पैसे भी नहीं हैं. मालती बहुत अच्छी लड़की है. उस से कह दो तो कोलगेट क्या पूरी दुकान ला कर दे दे…’

फिर क्या था. थोड़ी देर बाद दरवाजे पर कोलगेट पड़ा मिलता. फिर तो कभी साबुन, कभीकभी चीनी, कभी कुछ मैं अपनी जुगत से हासिल करने लगा.

एक दिन मालती गली में टकरा गई. वह बोली, ‘तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो, दिनरात जो तारीफ करते हो. क्या सचमुच मैं उतनी अच्छी और सुंदर हूं?’

मैं ने उस से मुसकरा कर कहा, ‘तुम तो बहुत सुंदर हो. सिर्फ थोड़ा कद छोटा है, नाक थोड़ी टेढ़ी है, दांत खुरपी जैसे हैं और गरदन कबूतर जैसी. बाकी कोई कमी नहीं. सर्वांग सुंदरी हो.’

वह लपकी, ‘तुम किसी दिन मेरी खुरपी से कटोगे. अब खा लेना मारटन टौफी…’

शरारतों का सिलसिला यों ही चलता रहा. एक दिन उस का रिश्ता आया. बाद में पता चला कि लड़के वालों ने उसे नापसंद कर दिया. यह मालती के लिए सदमे जैसा था. कई दिनों तक वह घर से नहीं निकली और जब निकली तो बदल चुकी थी. वह चंचल लड़की अब मूक गुडि़या बन चुकी थी.

एक दिन मैं ने उसे गली में घेर लिया और पूछा, ‘तू आजकल इतनी शांत कैसे हो गई?’

वह बोली, ‘तुम झूठे हो. कहते थे कि मालती सुंदर है, पर लड़के वाले रिजैक्ट कर के चले गए.’

मैं ने उसे समझाया, ‘धत पगली, वह लड़का ही तेरे लायक नहीं था. तेरे नसीब में तो कोई राजकुमार है.’

वह भोलीभाली मालती फिर से मेरी बातों का यकीन कर बैठी. अब फिर वह पहले की तरह चहकने लगी और कुछ दिनों बाद सचमुच उस की शादी तय हो गई.

उस ने मुझ से पूछा, ‘तुम मेरी शादी में आओगे न?’

मैं ने चिरपरिचित अंदाज में जवाब दिया, ‘चाहे धरती इधर की उधर हो जाए, मैं तेरी शादी जरूर अटैंड करूंगा.’

उस की शादी हो गई. संयोग देखिए, जिस दिन शादी थी, उसी दिन मेरा पटना में इम्तिहान था. मैं शादी अटैंड नहीं कर सका. मालती चली गई थी अपने साथ सारी ऊर्जा ले कर.

मालती के जाने के बाद कुछ खालीखाली सा लगने लगा था. समझ में नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है. कहां चली गई ऊर्जा. ऐसा कब तक चल सकता था? कुछ दिनों बाद मैं ने भी वह कमरा खाली कर दिया.

मैं अपनी यादों से लौट आया. पंडिताइन की चाय तैयार थी. मैं चाय पी ही रहा था कि पंडितजी भी आ गए.

बातोंबातों में मैं ने उन से पूछा, ‘‘मालती कैसी है? आजकल वे कहां रहती है?’

तब पंडिताइन ने डबडबाई आंखों से बताया, ‘‘मालती… वह अब इस दुनिया में नहीं है.’’

यह सुन कर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई. कांपती आवाज में मैं ने पूछा, ‘‘कब हुआ यह सब?’’

पंडिताइन ने आंखें पोंछते हुए कहा,  ‘‘शादी के 2 साल बाद ही. डिलीवरी के दौरान जच्चाबच्चा दोनों.’’

ओह… तब मैं ने सोचा कि कितना बदनसीब हूं मैं. एक लड़की, जो मुझे बेइंतिहा चाहती थी, न मैं उस की शादी में शामिल हो सका और न ही जनाजे में. और तो और उस की मौत की खबर भी मिली उस के मरने के इतने साल बाद. Hindi Story

Hindi Story: बिना शर्त-मिन्नी के बारे में क्या जान गई थी आभा

Hindi Story: महेश के कमरे से बाहर निकलते ही आभा के हृदय की धड़कन धीमी होने लगी. उस ने सोफे पर गरदन टिका कर आंखें बंद कर लीं.

आभा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि महेश आज उसे ऐसा उत्तर देगा जिस से उस के विश्वास का महल रेत का घरौंदा बन कर ढह जाएगा. महेश ने उस की गुडि़या सी लाड़ली बेटी मिन्नी के बारे में ऐसा कह कर उस के सपनों को चूरचूर कर दिया. पता नहीं वह कैसे सहन कर पाई उन शब्दों को जो अभीअभी महेश कह कर गया था.

वह काफी देर तक चिंतित बैठी रही. कुछ देर बाद दूसरे कमरे में गई जहां मिन्नी सो रही थी. मिन्नी को देखते ही उस के दिल में एक हूक सी उठी और रुलाई आ गई. नहीं, वह अपनी बेटी को अपने से अलग नहीं करेगी. मासूम भोली सी मिन्नी अभी 3 वर्ष की ही तो है. वह मिन्नी के बराबर में लेट गई और उसे अपने सीने से लगा लिया.

5 वर्ष पहले उस का विवाह प्रशांत से हुआ था. परिवार के नाम पर प्रशांत व उस की मां थी, जिसे वह मांजी कहती थी.

प्रशांत एक प्राइवेट कंपनी में प्रबंधक था.

वह स्वयं एक अन्य कंपनी में काम करती थी.

2 वर्षों बाद ही उन के घरपरिवार में एक प्यारी सी बेटी का जन्म हुआ. बेटी का मिन्नी नाम रखा मांजी ने. मांजी को तो जैसे कोई खिलौना मिल गया हो. मांजी और प्रशांत मिन्नी को बहुत प्यार करते थे.

एक दिन उस के हंसते, खुशियोंभरे जीवन पर बिजली गिर पड़ी थी. औफिस से घर लौटते हुए प्रशांत की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. सुन कर उसे लगा था मानो कोई भयंकर सपना देख लिया हो. पोस्टमार्टम के बाद जब प्रशांत का शव घर पर आया तो वह एक पत्थर की प्रतिमा की तरह निर्जीव हो गई थी.

मिन्नी अभी केवल 2 वर्ष की थी. उस की हंसीखुशी, सुखचैन मानो प्रशांत के साथ ही चला गया था. जब भी वह अपना शृंगारविहीन चेहरा शीशे में देखती तो उसे रुलाई आ जाती थी. कभीकभी तो वह अकेली देर तक रोती रहती.

उस के मां व बाबूजी आते रहते थे उस के दुख को कुछ कम करने के लिए. उस ने औफिस से लंबी छुट्टी ले ली थी.

एक दिन उस के बाबूजी ने उसे सम झाते हुए कहा था, ‘देख बेटी, जो दुख तु झे मिला है उस से बढ़ कर कोई दुख हो ही नहीं सकता. अब तो इस दुख को सहन करना ही होगा. यह तेरा ही नहीं, हमारा भी दुख है.’

वह चुपचाप सुनती रही.

‘बेटी, मिन्नी अभी बहुत छोटी है. तेरी आयु भी केवल 30 साल की है. अभी तो तेरे जीवन का सफर लंबा है. हम चाहते हैं कि फिर से तु झे कोई जीवनसाथी मिल जाए.’

‘नहीं, मु झे नहीं चाहिए कोई जीवनसाथी. अब तो मैं मिन्नी के सहारे ही अपना जीवन गुजार लूंगी. मैं इसे पढ़ालिखा कर किसी योग्य बना दूंगी. अगर मेरे जीवन में जीवनसाथी का सुख होता तो प्रशांत हमें छोड़ कर जाता ही क्यों?’ उस ने कहा था.

तब मां व बाबूजी ने उसे बहुत सम झाया था, पर उस ने दूसरी शादी करने से मना कर दिया था.

4 महीने बाद कंपनी ने उस का ट्रांस्फर देहरादून कर दिया था. वह बेटी मिन्नी के साथ देहरादून पहुंच गई थी.

देहरादून में उस की एक सहेली लीना थी. लीना का 4-5 कमरों का मकान था. लीना तो कहती थी कि उसे किराए का मकान लेने की क्या जरूरत है. यहीं उस के साथ रहे, जिस से उसे अकेलेपन का भी एहसास नहीं होगा. पर वह नहीं मानी थी.

उस ने हरिद्वार रोड पर 2 कमरों का एक फ्लैट किराए पर ले लिया था.

कुछ दिनों में उसे ऐसा लगने लगा था कि एक व्यक्ति उस में कुछ ज्यादा रुचि ले रहा है. वह व्यक्ति था महेश. कंपनी का सहायक प्रबंधक. महेश उसे किसी न किसी बहाने केबिन में बुलाता और उस से औफिस के काम के बारे में बातचीत करता.

एक दिन सुबह वह सो कर भी नहीं उठी थी कि मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. सुबहसुबह किस का फोन आ गया.

उस ने मोबाइल स्क्रीन पर पढ़ा – महेश.

महेश ने सुबहसुबह क्यों फोन किया? आखिर क्या कहना चाहता है वह? उस ने फोन एक तरफ रख दिया. आंखें बंद कर लेटी रही. फोन की घंटी बजती रही. दूसरी बार फिर फोन की घंटी बजी, तो उस ने  झुं झला कर फोन उठा कर कहा, ‘हैलो…’

‘आभाजी, आप सोच रही होंगी कि पता नहीं क्यों सुबहसुबह डिस्टर्ब कर रहा हूं जबकि हो सकता है आप सो रही हों. पर बात ही ऐसी है कि…’

‘ऐसी क्या बात है जो आप को इतनी सुबह फोन करने की जरूरत आ पड़ी. यह सब तो आप औफिस में भी…’

‘नहीं आभाजी, औफिस खुलने में अभी 3 घंटे हैं और मैं 3 घंटे प्रतीक्षा नहीं कर सकता.’

‘अच्छा, तो कहिए.’ वह सम झ नहीं पा रही थी कि वह कौन सी बात है जिसे कहने के लिए महेश 3 घंटे भी प्रतीक्षा नहीं कर पा रहा है.

‘जन्मदिन की शुभकामनाएं आप को व बेटी मिन्नी को. आप दोनों के जन्मदिन की तारीख भी एक ही है,’ उधर से महेश का स्वर सुनाई दिया.

चौंक उठी थी वह. अरे हां, आज तो उस का व बेटी मिन्नी का जन्मदिन है. वह तो भूल गई थी पर महेश को कैसे पता चला? हो सकता है औफिस की कंप्यूटर डिजाइनर संगीता ने बता दिया हो क्योंकि उस ने संगीता को ही बताया था कि उस की व मिन्नी के जन्म की तिथि एक ही है.

‘थैंक्स सर,’ उस ने कहा था.

‘केवल थैंक्स कहने से काम नहीं चलेगा, आज शाम की दावत मेरी तरफ से होगी. जिस रैस्टोरैंट में आप कहो, वहीं चलेंगे तीनों.’

‘तीनों कौन?’

‘आप, मिन्नी और मैं.’

सुन कर वह चुप हो गई थी. सम झ नहीं पा रही थी कि क्या उत्तर दे.

‘आभाजी, प्लीज मना न करना, वरना इस बेचारे का यह छोटा सा दिल टूट जाएगा,’ बहुत ही विनम्र शब्द सुनाई दिए थे महेश के.

वह मना न कर सकी. मुसकराते हुए उस ने कहा था, ‘ओके.’

शाम को वह मिन्नी के साथ रैस्टोरैंट में पहुंच गई थी जहां महेश उस की प्रतीक्षा कर रहा था. खाने के बाद जब वह घर वापस लौटी तो 10 बज रहे थे.

बिस्तर पर लेटते ही मिन्नी सो गई थी. पर उस की आंखों में नींद न थी. वह आज महेश के बारे में बहुतकुछ जान चुकी थी कि महेश के पापा एक व्यापारी हैं. वह अपने घरपरिवार में इकलौता है. मम्मीपापा उस की शादी के लिए बारबार कह रहे हैं. कई लड़कियों को वह नापसंद कर चुका है. उस ने मम्मीपापा से साफ कह दिया है कि वह जब भी शादी करेगा तो अपनी मरजी से करेगा.

वह सम झ नहीं पा रही थी कि महेश उस की ओर इतना आकर्षित क्यों हो रहा है. महेश युवा है, अविवाहित और सुंदर है. अच्छीखासी नौकरी है. उस के लिए लड़कियों की कमी नहीं. महेश कहीं इस दोस्ती की आड़ में उसे छलना तो नहीं चाहता? पर वह इतनी कमजोर नहीं है जो यों किसी के बहकावे में आ जाए. उस के अंदर एक मजबूत नारी है. वह कभी ऐसा कोई गलत काम नहीं करेगी जिस से आजीवन प्रायश्चित्त करना पड़े.

कमल उस का मकान मालिक था. उस का फ्लैट भी बराबर में ही था. वह एक सरकारी विभाग में कार्यरत था. परिवार के नाम पर कमल, मां और 5 वर्षीय बेटा राजू थे. कमल की पत्नी बहुत तेज व  झगड़ालू स्वभाव की थी. वह कभी भी आत्महत्या करने और कमल व मांजी को जेल पहुंचाने की धमकी भी दे देती थी. रोजाना घर में किसी न किसी बात पर क्लेश करती थी. कमल ने रोजाना के  झगड़ों से परेशान हो कर पत्नी से तलाक ले लिया था.

आभा मिन्नी को सुबह औफिस जाते समय एक महिला के घर छोड़ आती थी, जहां कुछ कामकाजी परिवार अपने छोटे बच्चों को छोड़ आते थे. शाम को औफिस से लौटते समय वह मिन्नी को वहां से ले आती थी.

एक दिन मांजी ने आभा के पास आ कर कहा था, ‘बेटी, तुम औफिस जाते समय मिन्नी को हमारे पास छोड़ जाया करो. वह राजू के साथ खेलेगी. दोनों का मन लगा रहेगा. हमारे होते हुए तुम किसी तरह की चिंता न करना, आभा.’

उस दिन के बाद वह मिन्नी को मांजी के पास छोड़ कर औफिस जाने लगी.

रविवार छुट्टी का दिन था. वह मिन्नी के साथ एक शौपिंग मौल में पहुंची. लौट कर बाहर सड़क पर खड़ी औटो की प्रतीक्षा कर रही थी, तभी एक बाइक उस के सामने रुकी, बाइक पर बैठे कमल ने कहा, ‘आभाजी, आइए बैठिए.’

वह चौंकी, ‘अरे आप? नहींनहीं, कोई बात नहीं, मैं चली जाऊंगी. थ्रीव्हीलर मिल जाएगा.’

‘क्यों, टूव्हीलर से काम नहीं चलेगा क्या? इस ओर मेरा एक मित्र रहता है. बस, उसी से मिल कर आ रहा हूं. यहां आप को देखा तो मैं सम झ गया कि आप किसी बस या औटो की प्रतीक्षा में हैं. आइए, आप जहां कहेंगी, मैं आप को छोड़ दूंगा.’

‘मु झे पलटन बाजार जाना है,’ उस ने बाइक पर बैठते हुए कहा.

‘ओके मैडम. घर पहुंच कर मां को मेरे लिए भी एक रस्क का पैकेट दे देना.’ उस ने रस्क के कई पैकेट खरीदे थे जो कमल ने देख लिए थे.

‘ठीक है,’ उस ने कहा था.

कमल उसे व मिन्नी को पलटन बाजार में छोड़ कर चला गया.

आभा कभीकभी मांजी व कमल के बारे में सोचती कि कितना अच्छा स्वभाव है दोनों का. हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचते हैं. दोनों ही बहुत मिलनसार व परोपकारी हैं.

अकसर मांजी राजू को साथ ले कर उस के पास आ जाती थीं. राजू और मिन्नी खेलते रहते. वह मांजी के साथ बातों में लगी रहती.

एक दिन मांजी ने कहा था, ‘आभा, हमारे साथ तो कुछ भी ठीक नहीं हुआ. ऐसी  झगड़ालू बहू घर में आ गई थी कि क्या बताऊं. बहू थी या जान का क्लेश. हमें तो तुम जैसी सुशील बहू चाहिए थी.’

वह कुछ नहीं बोली. बस, इधरउधर देखने लगी.

धीरेधीरे उस के व महेश के संबंधों की दूरी घटने लगी थी. महेश ने उस से कह दिया था कि वह जल्द ही उस के जीवन का हमसफर बन जाएगा. उसे भी लग रहा था कि उस ने महेश की ओर हाथ बढ़ा कर कुछ गलत नहीं किया है.

आज शाम जब वह रसोई में थी तो महेश का फोन आ गया था, ‘मैं कुछ देर बाद आ रहा हूं. कुछ जरूरी बात करनी है.’ ऐसी क्या जरूरी बात है जो महेश घर आ कर ही बताना चाहता है. उस ने जानना भी चाहा, परंतु महेश ने कह दिया था कि वहीं घर आ कर बताएगा.

एक घंटे बाद महेश उस के पास आ गया.

‘क्या लोगे? ठंडा या गरम?’ उस ने पूछा था.

‘कुछ नहीं.’

‘ऐसा कैसे हो सकता है? कोल्डडिं्रक्स ले लीजिए,’ कहते हुए वह रसोई की ओर चली गई. जब लौटी तो ट्रे में 2 गिलास कोल्डडिं्रक्स के साथ खाने का कुछ सामान था.

‘अब कहिए अपनी जरूरी बात,’ उस ने मुसकरा कर महेश की ओर देखते हुए कहा.

‘आज मम्मीपापा आए हैं दिल्ली से. मैं ने उन को सबकुछ बता दिया था. यह भी कह दिया था कि शादी करूंगा तो केवल आभा से. कल वे तुम से मिलने आ रहे हैं,’ महेश ने उस की ओर देखते हुए कहा था. उस के चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएं फैलने लगीं.

‘मम्मीपापा ने इस शादी की स्वीकृति तो दे दी है, परंतु एक शर्त रख दी है.’

वह चौंक उठी, ‘शर्त, कैसी शर्त?’

‘वे कहते हैं कि शादी के बाद मिन्नी किसी होस्टल में रहेगी या नानानानी के पास रहेगी.’

यह सुन कर मन ही मन तड़प उठी थी वह. उस ने कहा, ‘यह तो मम्मीपापा की शर्त है, आप का क्या कहना है?’

‘देखो आभा, मेरी बात को सम झने की कोशिश करो. मिन्नी को अच्छे स्कूल व होस्टल में भेज देंगे. हम उस से मिलते भी रहेंगे.’

‘नहीं, महेश ऐसा नहीं हो सकता. मैं मिन्नी के बिना और मिन्नी मेरे बिना नहीं रह सकती.’

‘ओह आभा, तुम सम झती क्यों नहीं.’

‘मु झे कुछ नहीं सम झना है. मैं एक मां हूं. मिन्नी मेरी बेटी है. आप ने यह कैसे कह दिया कि मिन्नी होस्टल में रह लेगी. मैं अपनी मिन्नी को अपने से दूर नहीं कर सकती.’

‘तब तो बहुत कठिन हो जाएगा, आभा. मम्मीपापा नहीं मानेंगे.’

‘कोई बात नहीं. आप अपने मम्मीपापा का कहना मानो. वैसे भी शर्तों के आधार पर जीवन में साथसाथ नहीं चला जा सकता,’ उस ने दुखी मन से कहा था.

‘सोच लेना, आभा, सारी रात है. कल मु झे जवाब दे देना.’

‘मेरा निर्णय तो सदा यही रहेगा कि जो मु झे मेरी बेटी से दूर करना चाहता है उस के साथ मैं सपने में भी नहीं रह सकती.’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा था.

कुछ देर बाद महेश उठ कर कमरे से बाहर निकल गया था.

विचारों में डूबतेतैरते आभा को नींद आ गई थी. सुबह आभा की आंख खुली तो सिर में दर्द हो रहा था और उठने को मन भी नहीं कर रहा था. रात की बातें याद आने लगीं. हृदय पर फिर से भारी बो झ पड़ने लगा. क्या महेश ऊपरी मन से मिन्नी को प्रेम व दुलार देता था? मिन्नी को बेटीबेटी कहना केवल दिखावा था. यदि वह पहले ही यह सब जान जाती तो महेश की ओर कदम ही न बढ़ाती. महेश भी तो मिन्नी को उस से दूर करना चाहता है.

नहीं, वह मिन्नी को कभी स्वयं से दूर नहीं करेगी. प्रशांत के जाने के बाद उस ने मिन्नी को पढ़ालिखा कर किसी योग्य बनाने का लक्ष्य बनाया था. पर जब महेश ने उस की ओर हाथ बढ़ाया तो वह स्वयं को रोक नहीं पाई थी.

दोपहर को आभा के मोबाइल की घंटी बजी. स्क्रीन पर महेश का नाम था. उस ने कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘आभा, आज आप औफिस नहीं आईं?’’ स्वर महेश का था.

‘‘हां, आज तबीयत ठीक नहीं है, औफिस नहीं आ पाऊंगी.’’

‘‘दवा ले लेना. मेरी जरूरत हो तो फोन कर देना. मैं डाक्टर के यहां ले चलूंगा.’’

‘‘ठीक है.’’

उधर से मोबाइल बंद हो गया. आभा मन ही मन तड़प कर रह गई. उस ने सोचा था कि शायद महेश यह कह देगा कि मिन्नी हमारे साथ ही रहेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. अब वह एक अंतिम निर्णय लेने पर विवश हो गई. ठीक है जब महेश को उस की बेटी मिन्नी की जरा भी चिंता नहीं है तो उसे क्या जरूरत है महेश के बारे में सोचने की.

दोपहर बाद मांजी आभा के पास आईं और बोलीं, ‘‘अरे बेटी, आज तुम औफिस नहीं गईं?’’

‘‘मांजी, आज तबीयत कुछ खराब थी, इसलिए औफिस से छुट्टी कर ली.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ? मु झे बता देती. मैं कमल से कह कर दवा मंगा देती. कहीं डाक्टर को दिखाना है तो मैं शाम को तेरे साथ चलूंगी.’’

‘‘नहींनहीं, मांजी. मामूली सा सिरदर्द था, अब तो ठीक भी हो गया है. आप चिंता न करें.’’

‘‘तू मेरी बेटी की तरह है. बेटी की चिंता मां को नहीं होगी तो फिर किसे होगी?’’ मांजी ने आभा की ओर देखते हुए कहा.

आभा मांजी की ओर देखती रह गई. ठीक ही तो कह रही हैं मांजी. बेटी की चिंता मां नहीं करेगी तो कौन करेगा. उस के चेहरे पर प्रसन्नता फैल गई. वह कुछ नहीं बोली.

‘‘बेटी, बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी, पर डर रही थी कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ,’’ मांजी बोलीं.

‘‘मांजी, आप कहिए. मां की बात का बेटी भी कहीं बुरा मानती है क्या?’’

‘‘बेटी, तुम तो हमारे छोटे से घरपरिवार के बारे में जानती हो. कमल में कोई ऐब नहीं है. उस की आयु भी ज्यादा नहीं है. जब भी उस से दूसरी शादी की बात करती हूं तो मना कर देता है. उसे डर है कि दूसरी लड़की भी तेज झगड़ालू आदत की आ गई तो यह घर घर न रहेगा.’’

आभा सम झ गई जो मांजी कहना चाहती हैं लेकिन वह चुप रही.

मांजी आगे बोलीं, ‘‘बेटी, जब से तुम हमारे यहां किराएदार बन कर आई हो, मैं तुम्हारा व्यवहार अच्छी तरह परख चुकी हूं. राजू और मिन्नी भी आपस में हिलमिल गए हैं. तुम्हारे औफिस जाने के बाद दोनों आपस में खूब खेलते हैं. मैं चाहती हूं कि तुम हमारे घर में बहू बन कर आ जाओ. राजू को बहन और मिन्नी को भाई मिल जाएगा. कमल भी ऐसा ही चाहता है. मैं बहुत आशाएं ले कर आई हूं, निराश न करना अपनी इस मांजी को.’’

सुनते ही आभा की आंखों के सामने महेश और कमल के चेहरे आ गए. कितना अंतर है दोनों में. महेश तो अपने मम्मीपापा के कहने में आ कर बेटी मिन्नी को उस से दूर करना चाहता है जबकि मांजी मिन्नी को अपने पास ही रखना चाहती हैं. इस में तो कमल की भी स्वीकृति है.

‘‘क्या सोच रही हो, बेटी? मु झे तुम्हारा उत्तर चाहिए. यदि तुम ने हमारे राजू को अपना बेटा बना लिया तो मेरी बहुत बड़ी चिंता दूर हो जाएगी,’’ मांजी ने आभा की ओर देखा.

आभा कुछ नहीं बोली. वह चुपचाप उठी, साड़ी का पल्लू सिर पर किया और मुड़ कर मांजी के चरण छू लिए.

मांजी को उत्तर मिल गया था. वे प्रसन्नता से गदगद हो कर बोलीं, ‘‘मु झे तुम से ऐसी ही आशा थी, बेटी. सदा सुखी रहो. तुम अपने मम्मीपापा को बुला लेना. उन से भी बात करनी है.’’

‘‘अच्छा मांजी.’’

‘‘और हां, आज रात का खाना हम सभी इकट्ठा खाएंगे.’’

‘‘खाना मैं बनाऊंगी, मांजी. मैं आप की और कमल की पसंद जानती हूं.’’

‘‘ठीक है, बेटी. अब मैं चलती हूं. कमल को भी यह खुशखबरी सुनाना चाहती हूं. उस से कह दूंगी कि औफिस से लौटते समय मिठाई का डब्बा लेता आए क्योंकि आज सभी का मुंह मीठा कराना है,’’ मांजी ने कहा और कमरे से बाहर निकल गईं.

अगले दिन सुबह जब आभा की नींद खुली तो 7 बज रहे थे. रात की बातें याद आते ही उस के चेहरे पर प्रसन्नता दौड़ने लगी. रात खाने की मेज पर कमल, मांजी, वह, राजू और मिन्नी बैठे थे. खाना खाते समय कमल व मांजी ने बहुत तारीफ की थी कि कितना स्वादिष्ठ खाना बनाया है. हंसी, मजाक व बातों के बीच पता भी न चला कि कब 2 घंटे व्यतीत हो गए. उसे बहुत अच्छा लगा था.

वह आंखें बंद किए अलसाई सी लेटी रही. बराबर में मिन्नी सो रही थी.

अगली सुबह आभा नाश्ता कर रही थी. तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने देखा कौल महेश की थी.

‘‘हैलो,’’ वह बोली.

‘‘अब कैसी हो, आभा?’’

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘मैं ने मम्मीपापा को मना लिया है. वे बहुत मुश्किल से तैयार हुए हैं. अब मिन्नी हमारे साथ रह सकती है.’’

‘‘आप को अपने मम्मीपापा को जबरदस्ती मनाने की जरूरत नहीं थी.’’

‘‘मैं कुछ सम झा नहीं?’’

‘‘सौरी महेश, आप ने थोड़ी सी देर कर दी. अब तो मैं अपनी मिन्नी के साथ काफी दूर निकल चुकी हूं. अब लौट कर नहीं आ पाऊंगी.’’

‘‘आभा, तुम क्या कह रही हो, मेरी सम झ में कुछ नहीं आ रहा है,’’ महेश का परेशान व चिंतित सा स्वर सुनाई दिया.

‘‘अभी आप इतना ही सम झ लीजिए कि मु झे बिना शर्त का रिश्ता यानी अपना घरपरिवार मिल गया है, जहां मिन्नी को ले कर कोई शर्त नहीं. मिन्नी भी साथ रहेगी. आप अविवाहित हैं, आप की शादी भी जल्द हो जाएगी. मैं आज औफिस आ रही हूं, बाकी बातें वहां आ कर सम झा दूंगी,’’ यह कह कर आभा ने मोबाइल बंद कर दिया और निश्चिंत हो कर नाश्ता करने लगी. Hindi Story

Hindi Story: अधूरी प्यास-नव्या पर लगा हवस का चसका

Hindi Story: चढ़ती हुई बेल… कैसी दीवानी होती है… नयानया जोबन, अल्हड़पन, बदहवास सी, बस अपनी मस्ती में सरसराती हुई छुईमुई सी हिलोरें लेती है… जिस का सहारा मिल गया, उसी से लिपट जाती है.ऐसा ही तो नव्या के साथ हो रहा था. अभीअभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा था मानो एक नशा सा चढ़ने लगा था. एक खुमारी सी…

आईने में खुद को कईकई बार देखना, उभरते अंगों को देख कर मुसकराना और अकेले में उभारों को हलके से छूना और मस्त हो जाना. नहीं संभाल पा रही थी वह अपनी भावनाओं को, अब तो बस वह समा जाना चाहती थी किसी की मजबूत बांहों में, जहां उस के हर अंग पर पा सके वह किसी का चुंबन और सैक्स की गहराई का मजा ले सके.‘‘नव्या, यह क्या तू हर समय आईने के सामने खड़ी रहती है… स्कूल नहीं जाना है क्या? इम्तिहान सिर पर हैं…’’

अचानक तनुजा की आवाज से नव्या चौंक गई.‘‘अरे मम्मी, जा रही हूं न. चोटी कर रही थी…’’ नव्या ने कहा और आईने में अपने उभारों को देख कर मुसकराती हुई यूनिफार्म की कमीज ठीक करने लगी.‘‘चल, जल्दी कर. तेरी फ्रैंड बुला रही है,’’ तनुजा ने लंच बौक्स उस के स्कूल बैग में रखते हुए कहा.‘‘ओके, बाय मम्मी. लव यू…’’ तनुजा को गाल पर किस करते हुए नव्या ने कहा और बैग उठा कर बाहर भाग गई.‘‘यह लड़की भी न, घोड़े पर सवार रहती है,’’ तनुजा बोली और काम में लग गई.

‘‘वाह यार, आज तो तू झकास लग रही है… फेशियल किया है क्या?’’ नव्या की फ्रैंड सुहानी ने उस के दमकते हुए चेहरे को देखते हुए कहा.‘‘नहीं तो, यह तो नैचुरल ग्लो है,’’ नव्या ने इतराते हुए कहा.‘‘आज तो देखना कि विपुल सर तुझे ही ताड़ेंगे. नजरें नहीं हटेंगी उन की तुझ पर से. क्या इरादा है नव्या मैडम…’’ सुहानी ने आंख मारते हुए कहा.‘‘अरे यार, अपने ऐसे नसीब कहां…

मैं तो कब से उन्हें लाइन दे रही हूं, लेकिन वे तो भाव ही नहीं देते. काश, एक बार नजरें इनायत कर लें इस बंदी पर तो लाइफ बन जाए यार,’’ नव्या ने आह भरते हुए कहा और दोनों हंस पड़ीं.‘‘अरे, देख तो यह सिम्मी किस के साथ आई है… चलचल देखते हैं कौन है यह बंदा…’’ स्कूल के सामने एक क्लासमेट को किसी लड़के की बाइक से उतरते देख कर सुहानी बोली.‘‘इस की तो…

चल देखते हैं,’’ नव्या ने खीजते हुए कहा.‘हाय सिम्मी…’ दोनों ने पास पहुंच कर एकसाथ कहा.‘‘हाय फ्रैंड्स, यह है मेरा कजिन वासु. और वासु, ये मेरी फ्रैंड्स हैं नव्या और सुहानी,’’ सिम्मी ने उन्हें आपस में मिलवाया.‘‘हैलो, प्रिटी गर्ल्स,’’ वासु ने सनग्लासेस को बालों पर चढ़ाते हुए कहा.‘‘हैलो,’’ नव्या ने कहा और दावत देती हुई निगाहों से उस की आंखों में देखा, जवाब में वासु ने भी पलकें झपका कर मानो उस का आमंत्रण कबूल किया.‘‘चलोचलो, क्लास शुरू हो जाएगी.

ओके वासु, बायबाय… ऐंड थैंक्यू, तुम नहीं आते तो आज मैं लेट हो जाती,’’ सिम्मी ने कहा.‘‘ओके, बायबाय,’’ वासु ने बाइक स्टार्ट करते हुए कहा और चला गया.नव्या उसे जाते हुए देख रही थी कि सुहानी उस को खींचते हुए स्कूल के अंदर ले गई.क्लास चल रही थी. सभी लड़कियां नोट्स लिखने में मगन थीं, लेकिन नव्या की आंखों के सामने वासु का चेहरा घूम रहा था.‘‘नव्या चौधरी…’’ तभी टीचर की आवाज से वह सहम गई. उसे लगा कि उस की चोरी पकड़ी गई है.‘‘जी मैडम,’’

नव्या अपनी जगह पर खड़े होते हुए बोली.‘‘ध्यान कहां है तुम्हारा? बताओ, क्या पढ़ा रही हूं मैं?’’ टीचर ने गुस्से से तमतमा कर कहा.‘‘मैडम… वह… ये… आप…’’ नव्या कुछ बता नहीं पाई.‘‘चुप रहो, मुझे पता है कि तुम्हारा ध्यान नहीं था. एग्जाम टाइम में यह हाल है, बैठो और अब फोकस करो,’’ टीचर ने हिदायत दी.‘‘जी मैडम,’’ कह कर नव्या बैठ गई. अगला पीरियड विपुल सर का था.

वे बिजनैस एडमिनिस्ट्रेशन पढ़ाते थे. नव्या अब उन के आने का बेसब्री से इंतजार करने लगी.‘‘नव्या, विपुल सर आने वाले हैं,’’ सुहानी ने चुटकी ली.‘‘हां यार, मुझे पता है,’’ बालों को झटकते हुए नव्या बोली.‘‘गुड मौर्निंग गर्ल्स…’’ विपुल सर की आवाज सुनते ही नव्या के कानों में सीटियां बजने लगीं. शरीर को एकदम टाइट कर के, पैर पर पैर चढ़ा कर वह ऐसे बैठी, जिस से स्कर्ट से उस की दूधिया और मांसल जांघें साफ नजर आ रही थीं.विपुल सर की निगाहें एक बार उन्हीं पर जा टिकीं, लेकिन जल्दी ही उन्होंने खुद पर काबू करते हुए पढ़ाना शुरू कर दिया.नव्या का बारबार पहलू बदलना, जांघों को हाईलाइट करना, विपुल सर को खुला आमंत्रण लगा. उन्होंने भी क्लास खत्म होने के बाद नव्या को बुलाया.

नव्या की तो धड़कनें आपे से बाहर हो गईं. वह सर के पास पहुंच कर बोली, ‘‘जी सर?’’‘‘नव्या, तुम्हें कोई प्रौब्लम तो नहीं आ रही है न? अगर कोई कंफ्यूजन हो तो तुम मेरे घर आ सकती हो. मैं तुम्हारे सारे डाउट क्लियर कर दूंगा. अगर तुम चाहो तो…’’ सर ने न्योता देने के अंदाज में कहा. नव्या तो यही चाहती थी. उस ने तपाक से कहा, ‘‘सर, मैं कब आप के घर आ सकती हूं?’’

‘‘आज शाम को ही, स्कूल के बाद.’’‘‘सर, आज तो मुश्किल होगी, क्योंकि मम्मी को बता कर नहीं आई हूं. कल शाम को आऊं क्या?’’ नव्या ने पूछा.‘‘देखो नव्या, ऐसा है कि डाउट जितनी जल्दी क्लियर हो जाए तो अच्छा है. आज मेरी वाइफ भी घर पर नहीं रहेगी तो अकेले में मैं तुम्हें बहुत अच्छे से समझा पाऊंगा. समझ गई न तुम…’’ विपुल सर ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

विपुल सर का हाथ लगते ही नव्या के तनबदन में जैसे चिनगारियां फूटने लगीं, सांसें तेज और गरम हो गईं, गाल दहकने लगे. अब तो जैसे उस का खुद पर काबू पाना मुश्किल हो गया.नव्या ने मन ही मन सोचा, ‘मम्मी को तो कुछ भी बहाना सुना दूंगी, लेकिन आज का यह मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी.’वह बोली, ‘‘ठीक है सर, मैं आज ही आती हूं आप के घर. सुहानी से बोल दूंगी कि वह मेरी मम्मी से कह दे कि वीक स्टूडैंट्स की ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’‘‘तो तुम मेरे साथ ही चलना.

मैं गाड़ी से अकेले ही तो जाता हूं,’’ विपुल सर ने कहा.‘‘ओके सर,’’ नव्या बोली.‘‘तो शाम को स्कूल के गेट से निकल कर जो पीसीओ है, वहां से मैं तुम्हें पिक करूंगा. ठीक है?’’ विपुल सर ने फिर नव्या का कंधा दबाया और हाथ को पीठ पर फेरते हुए कहा.नव्या का शरीर कड़क हो गया. मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘ओके सर.’’नव्या जल्दी से सुहानी के पास पहुंची और बोली, ‘‘सुन, विपुल सर ने आज मुझे डाउट क्लियर करने के लिए घर बुलाया है. तू मेरी मम्मी को बता देना कि वीक स्टूडैंट्स की ऐक्स्ट्रा क्लास है, तो मैं 2 घंटे लेट हो जाऊंगी.’’

‘‘वाह रे नव्या, तेरी तो लौटरी लग गई. विपुल सर के घर… डाउट क्लियर… मौजां ही मौजां…’’ सुहानी ने नव्या को छेड़ा. नव्या ने भी उसे आंख मार दी.स्कूल के बाद नव्या धड़कते दिल से गेट के बाहर निकली. कुछ दूर चलने पर ही विपुल सर की कार दिखाई दी. नव्या कार के नजदीक पहुंची, तो सर ने आगे का गेट खोल दिया. नव्या तुरंत गाड़ी में बैठ गई.‘‘तुम रिलैक्स हो न नव्या?’’ विपुल सर ने पूछा.‘‘जी सर…’’

नव्या ने बैग पीछे रखते हुए कहा.‘‘सो स्वीट,’’

विपुल सर ने कहा और उस की जांघों को सहला दिया. नव्या का शरीर कंपकंपा गया.‘‘मैं तुम्हें बहुत दिनों से नोटिस कर रहा था,’’ विपुल सर ने कहा.‘‘क्या सर?’’

नव्या ने डर के लहजे में पूछा.‘‘क्या तुम नहीं जानती?’’ विपुल सर ने सवाल किया.

‘‘जी सर, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं,’’ नव्या ने दिल खोला.

‘‘अच्छा… कितना अच्छा लगता हूं?’’ विपुल सर ने बात को आगे बढ़ाया.

‘‘सब से अच्छे, इतने अच्छे, इतने अच्छे कि ऐसा लगता है कि…’’

नव्या ने बात अधूरी छोड़ दी.‘‘कितने अच्छे, अब बता भी दो.

यहां तो कोई नहीं हम दोनों के अलावा,’’ विपुल सर ने सुलगती आग को हवा देना शुरू किया.‘‘सर…’’

कह कर नव्या ने उन की जांघों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया. विपुल सर ने नव्या का हाथ कस कर पकड़ लिया और कहा, ‘‘तुम्हारी बेचैनी मैं समझ रहा हूं. सब्र करो, बस घर पहुंचने ही वाले हैं, फिर तुम्हारे इस प्यारे से शरीर को बहुत प्यार करूंगा.’’

‘‘ओह सर, आई लव यू सर…’’ कहते हुए नव्या ने उन के गालों को चूम लिया.गाड़ी पार्क कर के विपुल सर नव्या को घर के भीतर ले आए.

दरवाजा बंद कर दिया और पलटते ही नव्या को बांहों में भर कर उस के होंठों को अपने होंठों में भर लिया. नव्या तो पहले ही बेकाबू हो चुकी थी. उसे तो बस आज अपने शरीर की भूख मिटानी थी, जो उसे भीतर ही भीतर खा रही थी. विपुल सर ने नव्या को गोद में उठा लिया और बैडरूम में ले जा कर बिस्तर पर लिटा दिया. नव्या बदहवास हो रही थी. उस ने विपुल सर को पकड़ कर अपने शरीर पर गिरा लिया और बेतहाशा चूमने लगी. विपुल सर के हाथ उस के उभारों पर थे, जिन्हें वह कस कर भींच रहे थे. नव्या को एक मीठामीठा दर्द हो रहा था. उस की सिसकारियां निकलने लगीं.

विपुल सर को तो कोरा बदन मिला था, सो वे भी उस का पूरा मजा लेना चाहते थे. उन्होंने नव्या की कमीज उतार दी. उस के बेदाग, गदराए उभार देखते ही वे पूरी तरह बहक गए. नव्या के अंगों से खेलते हुए उन्होंने कुछ ही देर में उस के सारे कपड़े उतार दिए.नव्या ने उन्हें कस कर पकड़ रखा था मानो वह तो यही चाहती थी. कुछ ही देर में नव्या की सिसकारियों से कमरा गूंज उठा.

नव्या का कुंआरापन भंग हो चुका था, लेकिन नव्या इस से बेफिक्र सैक्स के सागर में गोते लगा रही थी.थोड़ी देर में सबकुछ शांत हो गया.

नव्या कपड़े पहनने लगी. हालांकि, उसे बड़ा दर्द हो रहा था. विपुल सर ने जल्दी से दूसरी चादर बिछा दी और बोले, ‘‘नव्या, तुम ठीक हो न?’’‘‘जी सर.’’‘‘तो फिर अब क्या इरादा है?’’

‘‘क्या मतलब सर?’’‘‘अब दोबारा कब?’’‘‘जब आप कहें…’’‘‘कल?’’

‘‘आप की वाइफ…’’‘‘वह हफ्तेभर के लिए गई है.’’

‘‘फिर तो ठीक है.’’

‘‘चलो, तुम्हें बस स्टौप तक छोड़ दूं…’’

विपुल सर ने नव्या को सीने से कस कर लगाते हुए कहा.‘‘लव यू सर.’’‘‘लव यू टू, माय स्वीटी…’’ कहते हुए विपुल सर ने उस के होंठों को चूम लिया, फिर उसे बस स्टौप तक छोड़ आए.नव्या घर पहुंची, पर सैक्स से अभी उस का मन नहीं भरा था. उस का बस चलता तो वह घर आती ही नहीं. विपुल सर की वाइफ के न होने का वह भरपूर फायदा उठाना चाहती थी.‘‘बहुत थकी हुई लग रही है तू, ऐक्स्ट्रा क्लास के बारे में तू ने सुबह तो कुछ नहीं बताया था…’’ मम्मी ने कहा.‘‘मम्मी, ऐक्स्ट्रा क्लास अचानक ही अनाउंस हो गई.

अब रोज रहेगी. मैं रोज ही देर से आऊंगी,’’ नव्या ने लगे हाथ आगे का रास्ता साफ कर लिया.अगला पूरा हफ्ता नव्या और विपुल सर ने सैक्स का भरपूर मजा लिया.‘‘नव्या, कल मेरी वाइफ वापस आ रही है.’’‘‘ओह सर, फिर अब क्या करेंगे?’’‘‘यही मैं भी सोच रहा हूं.’’‘‘सर, कोई रास्ता तो निकालना होगा, अब तो मैं…’’‘‘जानता हूं, मेरी भी वही हालत है.’’‘‘तो फिर कुछ करिए न.’’

‘‘एक रास्ता है, अगर तुम तैयार हो जाओ तो…’’‘‘कौन सा रास्ता?’’‘‘मेरा एक दोस्त है. उस की वाइफ डिलीवरी के लिए मायके गई हुई है एक महीने के लिए, उस के घर इंतजाम हो सकता है, लेकिन…’’‘‘लेकिन, क्या सर?’’‘‘अब देखो नव्या, हम किसी से मदद लेना चाहते हैं, तो उसे कुछ देना भी होगा.’’‘‘क्या देना होगा?’’ नव्या ने बात समझते हुए कहा.‘‘कभीकभी वह भी तुम्हारे साथ…’’‘‘हां तो नो प्रौब्लम सर. आप के साथ के लिए इतना सैक्रिफाइस तो कर ही सकती हूं.’’‘‘तो फिर कल से गिरीश के घर.’’‘‘ओके सर,’’ दरअसल, नव्या को अब सैक्स का चसका लग चुका था.

उसे एक से ज्यादा मर्दों से संबंध बनाने से कोई परहेज नहीं था और इन शादीशुदा मर्दों को मुंह का जायका बदलने के लिए गरम और कम उम्र की चिडि़या मिल गई थी.अब तो नव्या का हर रोज सैक्स करने का सिलसिला चल निकला. स्कूल से अब कालेज में आ गई थी वह. अपनी अदाओं से नित नए मुरगे फंसाने का हुनर भी आ गया था.‘‘नव्या सुन, आज रोहित आ रहा है, उस की मीटिंग है यहां, शायद 2-4 दिन रुके. रमा बोल रही थी कि वह होटल में रुक जाएगा, लेकिन मैं ने कहा कि मौसी का घर होते हुए होटल में क्यों रुके, इसलिए मैं ने उसे यहीं बुला लिया है. ‘‘तू अपना कमरा उसे सोने के लिए दे देना.

तू मेरे साथ सो जाना. पापा बैठक में सोफे पर सो जाएंगे. ठीक है न?’’ तनुजा ने नव्या से कहा.‘‘अरे यार मम्मी, आप भी न…’’‘‘क्या आप भी, मौसेरा भाई है वह तेरा. 1-2 दिन एडजस्ट नहीं कर सकती क्या?’’‘‘ठीक है बाबा, कर लूंगी एडजस्ट.’’अगले दिन सुबह ही रोहित आ गया. काफी समय के बाद नव्या और रोहित मिले थे.‘‘और कैसी है रे तू छुटंकी?’’ रोहित ने हंसते हुए कहा.‘‘अब मैं छुटंकी कहां हूं, देख कितनी बड़ी हो गई…’’ नव्या ने तनते हुए कहा.‘‘हां, वह तो है,’’ रोहित ने उस के शरीर पर निगाह डालते हुए कहा. उस की नजरें नव्या के अंगों के उतारचढ़ाव से हटने को राजी नहीं थीं. बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू करते हुए वह बोला, ‘‘और बताओ, आजकल क्या चल रहा है?’’

‘‘सब एकदम बढि़या चल रहा है. तुम सुनाओ, कैसी मीटिंग है तुम्हारी?’’ नव्या ने हिलते हुए कहा.‘‘औफिशियल है. खाली समय में तुम जबलपुर घुमा देना. घुमाओगी या नहीं?’’ रोहित ने नव्या की आंखों में गहरे झांकते हुए कहा.‘‘बिलकुल घुमाएंगे जबलपुर, बदले में क्या दोगे?’’ नव्या ने पूछा.‘‘क्या चाहिए बोलो तो, जो बोलोगी मिल जाएगा,’’ रोहित ने आंख मारते हुए कहा.‘‘अरे, क्या लेनेदेने की बातें हो रही हैं… चल बेटा रोहित, फ्रैश हो ले. मैं नाश्ता लगाती हूं.

नव्या, जरा रोहित को अपना रूम तो दिखा दो,’’ तनुजा ने आ कर कहा.‘‘ओके मम्मी. चलो रोहित, आज से मेरा रूम तुम्हारा है, ऐश करो,’’ नव्या ने हंसते हुए कहा और रोहित को अपने कमरे तक ले आई.‘‘वैलकम इन माय रूम…’’‘‘थैंक्स डियर,’’ कह कर रोहित ने शेकहैंड की मुद्रा में हाथ बढ़ाया.‘‘मोस्ट वैलकम,’’ कह कर नव्या ने अपना हाथ उस के हाथ में दिया, जिसे रोहित ने चूम लिया. नव्या ने मुसकराते हुए उस की इस हरकत का स्वागत किया.नव्या रोहित के इरादे समझ चुकी थी.

उस के लिए तो यह एक बेहतरीन मौका था, घर में ही रात को रंगीन बनाने का.रोहित नाश्ता कर के मीटिंग अटैंड करने चला गया. नव्या भी कालेज चली गई. यह उस का बीए का दूसरा साल था, जहां उस की खुली जिंदगी जीने की चाहत को पंख मिल चुके थे. सैक्स संबंध, ऐयाशी, अमीर मर्दों से महंगे गिफ्ट्स लेना… सबकुछ बड़े मजे से चल रहा था.

शाम को रोहित घर पहुंचा. उस के दिमाग में भी कुछ चल रहा था. नव्या मौसेरी बहन थी, लेकिन उस की दावत देती आंखों ने रोहित का विवेक खत्म कर दिया था. उसे तो बस नव्या का भरा हुआ कसा तन चुंबक की तरह खींच रहा था.‘‘बेटा, कैसी रही तुम्हारी मीटिंग?’’ तनुजा ने पूछा.‘‘बढि़या रही मौसी,’’ रोहित बोला.‘‘चलो, हाथमुंह धो कर रिलैक्स हो जाओ,’’ तनुजा ने कहा.‘‘जी मौसी, नव्या कहां है?’’ रोहित ने पूछा.‘‘वह फ्रैंड की बर्थडे पार्टी में गई है.

आती ही होगी,’’ तनुजा ने बताया.‘‘ओके मौसी, मैं फ्रैश हो कर आता हूं,’’ कह कर रोहित कमरे में चला गया.थोड़ी ही देर में नव्या भी आ गई, ‘‘और जनाब, कैसी रही आप की आज की मीटिंग?’’‘‘बढि़या रही, तुम्हें बहुत ज्यादा मिस कर रहा था.’’‘‘मुझे? वाह…’’‘‘हां नव्या, मैं तुम्हें बहुत मिस कर रहा था. क्या जादू है तुम में, जब से देखा है बस…’’‘‘बस क्या?’’ नव्या इतराते हुए बोली.

‘‘तुम रात में कहां सोओगी?’’‘‘मम्मी के पास.’’‘‘यहीं आ जाना, कुछ देर बातें करेंगे…’’‘‘बातें?’’‘‘और भी बहुतकुछ, आओगी न?’’‘‘आऊंगी… चलो, अब डिनर कर लो. मम्मी बुला रही हैं.’’खाने की टेबल पर रोहित और नव्या की आंखोंआंखों में बातें हो रही थीं. तनुजा और नव्या के पापा सुकेश इन सब बातों से अनजान खाना खा रहे थे.रात को नव्या मम्मीपापा के सो जाने का इंतजार करने लगी.

जब वह पूरी तरह यकीन हो गया कि वे दोनों सो चुके हैं, तो आहिस्ता से रोहित के कमरे में जा पहुंची. उस ने नाइट गाउन पहन रखा था.‘‘हैलो, स्वीटहार्ट…’’ नव्या फुसफुसाते हुए बोली.‘‘वैलकम डियर, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा था. बहुत देर लगा दी तुम ने,’’ रोहित ने बेसब्री से कहा.‘‘तुम्हारे मौसाजी और मौसी के सोने का इंतजार कर रही थी… और कहो क्या इरादा है?’’

नव्या ने होंठ चबाते हुए कहा.‘‘तुम बोलो…’’‘‘अच्छा जी, अब वह सब भी मैं ही बोलूं…’’‘‘तो फिर?’’‘‘चलो, अब ये नाटक छोड़ो.’’‘‘सच में… छोड़ दूं नाटक, तो यह लो छोड़ दिया,’’ कह कर रोहित ने झटके से नव्या को अपनी बांहों में भर लिया.‘‘बहन हूं तुम्हारी…’’‘‘हां यार, लेकिन क्या करूं… यह दिल है कि मानता नहीं, इतनी हौट जो हो,’’ रोहित ने उसे गोद में उठा लिया. फिर शुरू हो गया हवस का गंदा खेल. रोहित और नव्या दोनों ने ही रिश्ते को दरकिनार कर जिस्मानी रिश्ते बना लिए.

बिस्तर पर नव्या के रंगढंग देख कर रोहित ने नव्या को लिवइन में रहने का प्रपोजल दे डाला.नव्या ने सोचा कि यह ऐक्सपीरियंस लेने में क्या जाता है… रोहित अच्छा कमाता है, कोई बुराई भी नहीं है. अगर उस के साथ लिवइन में रहूं, तो मम्मीपापा के बंधन से भी छुटकारा पा जाऊंगी और सैक्स भी ऐंजौय कर सकूंगी.3 दिनों में रोहित का औफिशियल काम भी खत्म हो गया.

नव्या और रोहित ने सब तैयारी कर ली. नव्या रोहित के साथ बालाघाट जाने के लिए पूरी तरह तैयार थी. दोनों ने फैसला किया कि कल घर वालों को अपने इरादों से वाकिफ करवा कर वे बालाघाट निकल जाएंगे.अगली सुबह घर में हंगामा मचा हुआ था. नव्या ने अपने फैसले को बहुत ही बेशर्मी से मातापिता को बता दिया.‘‘कुछ तो शर्म करो… हम दुनिया और समाज को क्या जवाब देंगे..

. क्या कहूंगी तेरी मौसी से… कुछ तो सोच, और तेरी उम्र तो देख, अभी तो पढ़नेलिखने के दिन हैं,’’ तनुजा भरी आंखों से बोली.‘‘मम्मी, अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है. मेरा फैसला नहीं बदलने वाला… और फिर यह मेरी जिंदगी है, मुझे पूरा हक है कि इसे मैं कैसे जीऊं.

मैं रोहित के साथ बालाघाट जा रही हूं. वहीं उस की पोस्टिंग है. अपने मांबाप को वह बता देगा,’’ नव्या ने तुनक कर कहा और कमरे में चली गई.‘‘तनुजा, अब कोई फायदा नहीं इसे समझाने का. बालिग हो चुकी है वह और इसी बात का फायदा उठा रही है. उस के कदम बहक चुके हैं. क्या पता बात कहां तक बढ़ चुकी है. हमतुम तो शायद वहां तक सोच भी न सकें, क्योंकि जिस बुलंदी से नव्या ने यह बताया है, उस से तो लगता है कि इन दोनों के जिस्मानी…’’

तनुजा के पति हताश स्वर में बोले.‘‘क्या यही दिन देखना बाकी था… हम तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. क्या इसी दिन के लिए नाजों से पाला था इस को… इतनी आज़ादी दी थी. यह कहां की हवा लग गई इसे कि आंखों की शर्म तक खत्म हो गई…‘‘और रोहित, वह भी… अरे,

अब उसे क्या कहें, जब अपना सिक्का ही खोटा निकला,’’ तनुजा लगातार रोते हुए बोली.नव्या और रोहित परिवार व समाज के गाल पर तमाचा मार कर चले गए. पीछे रह गए 2 परिवार और शर्मसार मातापिता. सैक्स और ऐयाशी की चाहत में बच्चों ने घर वालों को एक ऐसा नासूर दे दिया, जो हर पल कसकता रहेगा. Hindi Story

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