News Story In Hindi: जहाज बना आग का गोला

News Story In Hindi: 20 जून, 2025 की शाम. विजय और अनामिका आज 2 नाइट के लिए द्वारका के रैडिसन ब्लू होटल में रुके हुए थे. अनामिका के जन्मदिन पर तो विजय के साथ खतरनाक प्रैंक खेला गया था, जिस में अनामिका के दोस्तों ने उस की धुलाई कर दी थी. तब भी विजय अनामिका के साथ होटल में रात बिताना चाहता था, पर ऐसा हो नहीं पाया था.

फिलहाल तो विजय और अनामिका अपने रूम में थे. अनामिका अभीअभी नहा कर बाहर आई थी. गीले खुले बाल उस की खूबसूरती को बढ़ा रहे थे. सफेद रंग की शौर्ट ढीली टीशर्ट के अंदर उस ने कुछ नहीं पहना था. नीचे हलके गुलाबी रंग का पाजामा था.

विजय बालकनी में खड़ा था.

उसे बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई, तो वह कमरे में आ गया. अनामिका को इस सैक्सी रूप में देख कर उस का मन मचल गया.

अनामिका समझ गई कि अब विजय के दिल में खुराफात ने जन्म ले लिया है, तो वह वहीं से बोली, ‘‘कोई भी फालतू की हरकत मत करना. मैं दोबारा नहाने के मूड में नहीं हूं. मुझ से दूर ही रहना.’’

‘‘पर यह तो सरासर चीटिंग है. तुम अकेलेअकेले नहा ली और अब मुझे करीब आने से मना कर रही हो. अब कहीं कली खिल रही हो तो भंवरा तो उस का रस चूसने के लिए आएगा ही न,’’ विजय ने इतना कहा और अनामिका को अपनी बांहों में जकड़ लिया.

अनामिका कुछ देर के लिए छटपटाई, पर विजय की मजबूत गिरफ्त से छूट न सकी.

विजय ने अनामिका को अपनी गोद में उठा लिया और बिस्तर पर पटक दिया. अनामिका समझ गई कि अब विजय नहीं मानेगा, तो उस ने भी ज्यादा नानुकर नहीं की.

थोड़ी देर में ही वे दोनों बिस्तर में थे और एकदूसरे के जिस्म से खेल रहे थे. रात के 9 बजे तक उन्होंने एकदूसरे का 2 बार बिस्तर पर साथ दिया और निढाल हो कर पड़ गए.

विजय की आंखों में शरारत थी, तो अनामिका बारबार उसे घड़ी दिखा रही थी कि डिनर का टाइम होने वाला है.

विजय ने कहा, ‘‘हम दोनों शानदार डिनर करेंगे, पर उस से पहले एकसाथ शावर लेंगे.’’

अनामिका समझ गई कि अभी भी विजय उस के जिस्म से खेलना चाहता है. वह जल्दी से उठ कर वाशरूम की तरफ भागी, पर दरवाजा बंद करने से पहले ही विजय भी उस के साथ वाशरूम में जा घुसा.

वे दोनों आधा घंटे के बाद वाशरूम से निकले. फिर 15 मिनट के बाद दोनों रैस्टोरैंट में बैठे थे. अभी डिनर सर्व नहीं हुआ था कि अनामिका का मोबाइल फोन बज उठा.

उधर से किसी लड़की की आवाज आई, ‘नमस्ते दीदी.’

अनामिका वह आवाज नहीं पहचान पाई. उस ने कहा, ‘‘नमस्ते. पर आप हैं कौन? मैं ने आप को पहचाना नहीं?’’

‘अरे दीदी, मैं डाक बाबू की बेटी देविका बोल रही हूं,’ उधर से दोबारा आवाज आई.

‘‘अरे देविका. अब पहचान लिया. कैसी हो? अपनी दीदी को कैसे याद कर लिया?’’ अनामिका ने कहा.

‘दीदी, मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बोल रही हूं. अभी उतरी हूं. आप मुझे अपना पता बता दो. मुझे आप के पास आना है,’ देविका ने कहा.

‘‘पर देविका, अभी तो मैं अपने दोस्त के साथ होटल में हूं…’’ अनामिका ने इतना कहा, तो तभी विजय ने धीरे से कहा कि देविका को यहीं बुला लो. इतनी रात को कहां जाएगी. मैं होटल के मैनेजर से बात कर लूंगा. वह मेरे दोस्त का खास दोस्त है. वह कुछ न कुछ इंतजाम कर देगा.

अनामिका देविका से बोली, ‘‘तुम ऐसा करो कि मैट्रो ट्रेन से द्वारका सैक्टर 13 आ जाओ. यहां से हम तुम्हें ले लेंगे.’’

‘पर दीदी, मैं अकेली कैसे आऊंगी?’ देविका ने झिझकते हुए कहा.

‘‘बड़ा आसान है. किसी भी पुलिस वाले से पूछ लेना. वे लोग सही तरीका बता देंगे द्वारका आने का. वैसे, तुम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से पहले राजीव चौक की मैट्रो लेना और वहां से द्वारका सैक्टर 21 वाली मैट्रो में बैठ जाना. वहां तुम्हें हम मिल जाएंगे,’’ अनामिका ने समझाया.

‘ठीक है दीदी, मैं कोशिश करती हूं,’ देविका ने कहा.

‘‘कहीं भी किसी तरह की कोई दिक्कत हो, तो तुम फोन कर लेना. और हां, जब तुम उत्तम नगर पहुंच जाओ, तो मुझे फोन कर लेना. हम द्वारका सैक्टर 13 के मैट्रो स्टेशन पर तुम्हें लेने आ जाएंगे,’’ अनामिका ने देविका का हौसला बढ़ाया.

फोन काटने पर विजय ने अनामिका से पूछा, ‘‘यह देविका है कौन? पहले तो कभी तुम्हारे मुंह से इस का जिक्र नहीं सुना.’’

‘‘यह हमारे पड़ोस के डाक बाबू की बेटी है. अब यह अचानक दिल्ली क्यों आई है, यह तो मुझे भी नहीं पता,’’ अनामिका ने थोड़ा चिंतित होते हुए कहा.

रात के 11 बजे विजय, अनामिका और देविका होटल के कमरे में थे. दरमियाने कद की सांवले रंग की देविका फ्रैश हो चुकी थी. डिनर वह ट्रेन में ही कर चुकी थी, तो उस ने कहा, ‘‘दीदी, मुझे तो बड़ी तेज नींद आ रही है. कहां सोना है?’’

अनामिका बोली, ‘‘तुम सोफे पर सो जाओ.’’

‘‘आप कहां सोएंगी?’’ देविका ने पूरे कमरे पर नजर दौड़ाते हुए कहा. वहां डबल बैड के अलावा और कुछ नहीं था.

‘‘मैं और विजय इस डबल बैड पर सोएंगे,’’ अनामिका ने कहा.

यह सुन कर देविका हैरान रह गई. उसे पता था कि अनामिका दीदी ने अभी शादी नहीं की है, फिर शादी से पहले वे किसी लड़के के साथ एक ही बिस्तर पर सोएंगी…

पर फिलहाल देविका को गहरी नींद आ रही थी, तो वह सोफे पर सो गई.

देर रात हो गई थी, तो विजय और अनामिका भी सो गए.

अगली सुबह विजय, अनामिका और देविका रैस्टोरैंट में नाश्ता करने बैठे थे. वहां कई विदेशी भी बैठे हुए थे. देविका बड़े होटल का माहौल देख कर हैरान थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि विजय और अनामिका शादी से पहले ही शादीशुदा जोड़े की तरह क्यों रह रहे हैं.

‘‘दीदी, मुझे तो दिल्ली का माहौल बिलकुल भी समझ नहीं आया. आप का और इन साहब का रिश्ता क्या है, जो शादी से पहले ही…’’ देविका ने अपने मन की बात रखी.

यह सुन कर अनामिका हंस दी और बोली, ‘‘इन साहब का नाम विजय है और ये मेरे बौयफ्रैंड हैं. हम दोनों यहां होटल में मेरा जन्मदिन मनाने आए हैं.’’

‘‘लेकिन तुम यहां अचानक दिल्ली में कैसे?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘विजय साहब, मुझे मुंबई से एक सिंगिंग कंपीटिशन में गाने के लिए बुलाया है. मेरा सिलैक्शन हो गया है. मेरे साथ कोई एक और जना वहां जा सकता है, तो मैं ने दीदी का नाम लिखवा दिया. ये पढ़ीलिखी हैं और मुंबई में मेरा साथ देंगी,’’ देविका ने कहा.

‘‘अरे, तुम ने पहले क्यों नहीं बताया… बधाई हो. कब जाना है वहां?’’ अनामिका खुश हो कर बोली.

‘‘दीदी, परसों चलेंगे. आप हवाईजहाज की टिकट करवा देना. वे लोग हम दोनों का हवाईजहाज से आनेजाने और वहां रहनेखाने का पूरा इंतजाम करेंगे,’’ देविका ने बताया.

‘‘ठीक है. मैं तुम्हारे साथ चलूंगी,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘हवाईजहाज से… दिमाग तो नहीं खराब हो गया है. 12 जून का हादसा भूल गई. ट्रेन की टिकट करा लो,’’ विजय ने कहा.

‘‘12 जून को क्या हुआ था?’’ देविका ने पूछा.

‘‘अरे, तुम्हें पता ही नहीं…’’ विजय हैरान था.

‘‘गांव में रहने की वजह से ज्यादा तो नहीं पता. आप ही बता दो कि ऐसा क्या हुआ था, जो आप इतना बौखला गए,’’ देविका बोली.

विजय ने बताया, ‘‘गुजरात के अहमदाबाद में गुरुवार, 12 जून को एयर इंडिया का एक हवाईजहाज क्रैश हो गया. यह बोइंग हवाईजहाज अहमदाबाद से लंदन जा रहा था और उड़ान भरने के 2 मिनट बाद ही एयरपोर्ट से सटे मेघानीनगर इलाके में हादसे का शिकार हुआ.

‘‘इस हवाईजहाज में 12 क्रू मैंबरों (2 पायलट भी) और 230 सवारियों समेत कुल 242 लोग सवार थे. इस हवाईजहाज में गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके विजय रुपाणी भी सवार थे.’’

‘‘ओह, यह तो बहुत बड़ी अनहोनी हो गई,’’ देविका के मुंह से निकला.

‘‘खबरों के मुताबिक, हवाईजहाज में उस समय 169 भारतीय, 53 ब्रिटिश, 7 पुर्तगाली और एक कनाडाई नागरिक सवार थे. हवाईजहाज का एक हिस्सा मेघानीनगर में बने रैजिडैंट डाक्टर्स के होस्टल पर जा कर गिरा और वहीं अटक गया. इस के बाद होस्टल में अफरातफरी मच गई.

‘‘हवाईजहाज का हिस्सा टकराने से बिल्डिंग में आग लग गई और पूरी इमारत खंडहर में बदल चुकी है. इमारत में मौजूद कई लोग घायल हुए, जिन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. कुछ की तो जान भी चली गई,’’ विजय ने आगे बताया.

‘‘इस के बाद सरकार ने क्या कदम उठाए?’’ देविका ने पूछा.

‘‘इस हादसे के तुरंत बाद इमरजैंसी रिस्पौंस टीम की तैनाती मौके पर कर दी गई थी. दमकल, बीएसएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने पहले दुर्घटनास्थल पर आग बुझाने का काम किया और हवाईजहाज के मलबे को हटाया गया. क्रैश प्लेन बोइंग का 787-8 ड्रीमलाइनर था, जो तकरीबन 11 साल पुराना बताया गया.’’

‘‘फिर तो बहुत सारे लोग मर गए होंगे,’’ देविका ने चिंता जताई.

विजय ने कहा, ‘‘इस हादसे के बाद अहमदाबाद पहुंचे गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘‘सवा लाख लिटर ईंधन होने के चलते तापमान इतना ज्यादा था कि किसी को बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं थी.’’

‘‘क्या कोई भी जिंदा नहीं बचा?’’ देविका ने पूछा.

‘‘बस एक आदमी ही जिंदा बच पाया. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर जीएस मलिक ने फोन पर बताया कि एक शख्स विश्वास कुमार रमेश जिंदा बचा है, जो बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर हवाईजहाज की सीट 11ए पर था.’’

‘‘जिस होस्टल पर वह हवाईजहाज गिरा था, क्या वहां भी लोग मरे?’’ देविका ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘जो पहली सूचना मिली थी, उस के मुताबिक, बीजे मैडिकल कालेज और सिविल अस्पताल की डीन मीनाक्षी पारिख ने बताया कि इस हादसे में 4 छात्रों और छात्रों के 4 परिजनों की मौत हुई थी,’’ विजय बोला.
‘‘वहां तो बड़ा ही भयावह मंजर रहा होगा,’’ देविका ने कहा.

‘‘मैं ने बीबीसी पर खबर पढ़ी थी. उस के मुताबिक, सब से पहले छत को हवाईजहाज के पंख ने चीर दिया, उस के बाद फ्यूसलेज (हवाईजहाज का मुख्य हिस्सा) गिरा. जब मुख्य हिस्सा गिरा, तो उस से सब से ज्यादा नुकसान हुआ.

‘‘इस अफरातफरी में छात्र जान बचाने के लिए इमारत से कूदने लगे. यहां तक कि इमारत के दूसरे और तीसरे माले से भी. बाद में छात्रों ने बताया कि होस्टल की एकमात्र सीढ़ी का रास्ता मलबे की वजह से बंद हो गया था.’’

‘‘उफ, बड़ा ही भयावह मंजर रहा होगा,’’ देविका अपने दिल पर हाथ रख कर बोली.

‘‘अरे, सोचो न कि लोग इतनी बुरी तरह से जल गए कि उन के शवों की पहचान डीएनए टैस्ट के जरीए शुरू की गई. हवाईजहाज के हादसों में कोई नहीं बचता है. मैं इसलिए तो बोल रहा हूं कि तुम दोनों रेल से मुंबई चली जाओ,’’ विजय ने अपनी बात रखी.

‘‘यह क्या बात हुई… एक हादसे के बाद क्या लोग हवाईजहाज में बैठना छोड़ तो नहीं देंगे,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘लेकिन रेल से जाने में क्या बुराई है?’’ विजय ने अपनी बात रखी.

‘‘बात रेल या बस से जाने की नहीं है. हादसा तो घर से बाहर निकलते ही हो सकता है. इस हादसे में उन होस्टल वालों का क्या कुसूर था, जो कैंटीन में बैठे खाना खा रहे थे? वे तो हवाईजहाज से सफर भी नहीं कर रहे थे,’’ अनामिका बोली.

थोड़ा रुक कर अनामिका ने दोबारा कहा, ‘‘तुम जानते हो कि रेल हादसों में भी लोग अपनी जान गंवा देते हैं. एक खबर के मुताबिक, 2023-24 में 40 रेल हादसों में कम से कम 313 लोगों की मौत हुई थी. ऐसा ही कुछ सड़क हादसों में भी होता है. देशभर में हर घंटे 53 सड़क हादसे हो रहे हैं और हर 4 मिनट में एक मौत होती है.’’

‘‘अरे, विजय साहब… इतना भी मत डरिए. मुझे और दीदी को हवाईजहाज से मुंबई जाने दीजिए. मेरी जैसी गांवदेहात की लड़की को दोबारा हवाईजहाज में बैठने का मौका कब मिलेगा, कोई नहीं जानता. फिर कौन सा हम अपने खर्च पर जा रही हैं. इतना भी अनहोनी से मत डरिए. चलो, अब नाश्ता करते हैं, मुजे बहुत तेज भूख लगी है,’’ देविका ने कहा. यह बात सुन कर उन तीनों के चेहरों पर मुसकान खिल उठी. News Story In Hindi

Family Story In Hindi: झूठी शान

Family Story In Hindi: अपने फ्लैट की बालकनी में दीपा खड़ी दिखाई दी. वह वहीं से आवाज देती हाथ के इशारे से बुला रही थी, ‘‘दीदी, ओ दीदी. कहां जा रही हो? आओ न… बगल से आने की सीढ़ी है.’’

रेखा चंद पलों तक दीपा को देखती रह गई. पहले से उस का रंग साफ हो गया था. जिस्म पर मांस भी चढ़ आया था. गाल भर आए थे. बाल भी ढंग से संवार रखे थे. कत्थई रंग की साड़ी और नीले ब्लाउज में वह खिल रही थी.

पहले दीपा गंवारों की तरह रहती थी. बातें भी बेवकूफों की तरह करती थी. चेहरा हमेशा तना रहता. अपने को ‘किराएदार’ समझ कर दुखी रहती. कभीकभार ऐंठ कर कह भी देती, ‘‘भाड़ा दे कर रहती हूं मुफ्त में नहीं…’’ तब वह रेखा के मकान में ही किराएदार की हैसियत से रहती थी.

तब रेखा ने दीपा को मकान देने से पहले सोचा था कि दोनों सहेलियों की तरह रहेंगी. उस ने कभी मकान मालकिन होने का रोब भी नहीं गांठा था. पर न जाने क्यों दीपा हमेशा दबीदबी रहती थी. अपने पति रमेश को डब्बा थमा कर कारखाने भेजती और कमरे में कैद हो जाती, टैलीविजन से दिल बहलाती.

कभीकभी दीपा सुनाती, ‘‘मेरा अपना मकान होता तो उसे सलीके से सजाती, कीमती साजसामान रखती.’’
रेखा कह देती, ‘‘हम ने तो मकान बनाने में ही इतने रुपए खर्च कर दिए कि नया और कीमती सामान खरीद ही नहीं पाए. प्रशांत की नौकरी से मकान बन गया, यही काफी है. अब आधा हिस्सा भाड़े पर उठा दिया है कि हाथ तंग न रहे.’’

भाड़े का नाम सुनते ही दीपा भड़क उठती. मुंह टेढ़ा कर लेती. तब रेखा कहती, ‘‘दीपा, मैं ने तुम्हें भाड़े के लिए नहीं, साथ हंसनेबोलने और अकेलापन दूर करने के लिए रखा है. प्रशांत दफ्तर जाते हैं तो मैं अकेली घर में रहती हूं. कोई दूसरा तो है नहीं कि गपशप मारूंगी. तुम्हारे पति भी दिन में काम पर जाते हैं. क्यों नहीं आ जाती मेरे पास… या अपने दरवाजे खुले रखो, मैं ही आ बैठूंगी.’’

‘‘मैं बंद कमरे में किसी दूसरे को ले कर पड़ी तो नहीं रहती न दीदी. कामकाज से थकी रहती हूं बस, आंख लग जाती है.’’

‘‘हंसनेबोलने से भी थकान दूर हो जाती है.’’

‘‘तुम अपने को बड़ी गुणी और तेज समझती हो दीदी… यही मुझे अच्छा नहीं लगता,’’ दीपा की बातों से रेखा झुंझला जाती.

‘‘दीपा, तुम्हें अगर मैं अच्छी नहीं लगती और तुम सहेली बन कर नहीं रह सकती तो कहीं और मकान ढूंढ़ लो.’’

तब दीपा ऐंठ कर बोलती, ‘‘दिखाने लगी न मालिकाना रुख.’’

फिर कुछ महीने बाद दीपा दूसरे मकान में चली गई. उस की जगह सुधा आ गई. वह बातबात में हंसनेहंसाने वाली और सलीकेदार औरत थी.

रेखा सुधा के साथ सीढि़यां चढ़ कर ऊपर आई. दीपा ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘आप कौन?’’ उस ने सुधा के बारे में जानना चाहा.

सुधा बोली, ‘‘मैं दीदी की किराएदारिन हूं. बड़ा सुखचैन है इन के यहां…’’

‘‘सुखचैन?’’ दीपा हंस पड़ी, ‘‘यहां जैसा तो नहीं होगा. यहां कंपनी की बिजली और पानी है. वहां की तरह बारबार बिजली गायब नहीं हो जाती कि अंधेरे में रहो और गरमी सहो. फिर वहां तो कुएं का पानी पीना पड़ता है.’’

रेखा को दीपा की बात तीर सी लगी. उसे महसूस हुआ जैसे दीपा ने शायद उसे जलील करने के लिए बुलाया है. सच ही उस का मकान कंपनी के इलाके से बाहर था, इसलिए सरकारी बिजली लेनी पड़ी थी, जो आतीजाती रहती थी.

दीपा ने दोनों को सोफे पर बैठाया. पहले सोफा नहीं था. शायद फ्लैट में आने के बाद नया ले लिया था.

फिर दीपा दूसरे कमरे में गई और 2 गिलासों में फ्रिज का ठंडा पानी ले आई. 2 प्लेटों में बिसकुट और नमकीन भी थी.

‘‘दीदी, चाय बनाऊं या कौफी? कहो तो शरबत…?’’

‘‘नहींनहीं… यही काफी?है,’’ रेखा जल्दी से बोली.

‘‘मेरी बचत की न सोचो दीदी, भले ही खुद बचत कर के कोठी बना लो,’’ दीपा हंस कर बोली. रेखा भला क्या बोलती, वह सुधा की ओर देखने लगी.

पानी पीते हुए रेखा पूछ बैठी, ‘‘दीपा, क्या कंपनी की ओर से यह फ्लैट मिला है?’’

‘‘नहीं, भाड़े पर लिया है. इन के एक दोस्त को मिला था. पर उस का अपना मकान है, बस्ती में. वह फ्लैट में आना नहीं चाहता था, सो हमें भाड़े पर दे दिया. 1 लाख रुपए ‘पगड़ी’ दे कर 5,000 देने पड़ते हैं हर महीने.

‘‘बड़ा आराम है यहां. न कोई झिकझिक न कोई दबाव और न ही कोई ‘किराएदार’ कहने वाला. हम तो अपने रहनसहन को ऊंचा उठाने में लगे हुए हैं.’’

फिर वह ताना सा देती हुई बोली, ‘‘दीदी, हमारे ठाटबाट देख कर जलन तो तुम्हें हो ही रही होगी. तुम भी न जाने क्यों बस्ती में रहने पर तुली हो. अरे, अपना मकान है तो क्या हुआ ऐसा सुख तो नहीं है न वहां? देखो, चारों ओर कितना खुलाखुला है.’’

रेखा भी थोड़ी देर के लिए उदास दिल से सोचने लगी, ‘सच, अब तक मकान बनाने में रुपए फेंकती रही, कभी बढि़या सामान से घर भरने के लिए सोचा ही नहीं. सिर्फ टैलीविजन, पंखा, कुरसी, मेज होने से क्या होता है, फ्रिज, कूलर, सोफा वगैरह भी होना चाहिए.

‘पता नहीं क्यों, प्रशांत के सिर पर शानदार मकान बनाने का भूत सवार है. अब तो दूसरी मंजिल की तैयारी चल रही है.’

‘‘दीपा, अब मैं चलती हूं,’’ थोड़ी देर बाद रेखा बोली.

‘‘क्यों, सिरदर्द होने लगा है क्या?’’

‘‘नहीं, बाजार जाना है.’’

‘‘क्यों दीदी, तुम्हारे पति को कंपनी की ओर से कब तक फ्लैट मिलेगा?’’

‘‘अभी कुछ पता नहीं.’’

रेखा मन पर ढेर सारा बोझ ले कर बाहर आ गई. सुधा पर भी शायद असर हुआ था. वह बोली, ‘‘दीदी, मेरे पति को भी क्वार्टर मिलेगा तो चली जाऊंगी.’’

‘‘चली जाना, रोकूंगी नहीं.’’

‘‘बुरा तो नहीं मान गईं?’’

‘‘नहीं, जो सच है, उसे मानना ही होगा न.’’

रेखा का दिल दुखी सा हो गया. वह थोड़ी सी सब्जी ले कर घर लौट आई.

प्रशांत घर में ही था. वह मिस्तरी से ऊपरी मंजिल के बारे में बात कर रहा था.

‘‘क्या बात है रेखा? उदासउदास सी क्यों लग रही हो?’’ प्रशांत उस के पास आ खड़ा हुआ.

‘‘दीपा मिली थी… अरे वही, पहले वाली किराएदारिन.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘उस के ठाट देखते ही बनते हैं. क्या नहीं है उस के घर में? फ्लैट में रहती है. फ्रिज, कूलर, सोफा, अलमारी, मिक्सी सब है. अपने यहां क्या है? तुम तो सिर्फ घर बनाने में लगे हो.’’

प्रशांत हंस पड़ा, ‘‘रेखा, कहो तो काम बंद कर दूं और कल ही उठा लाऊं सब सामान. पर सोचता हूं कि पहले शानदार मकान पूरा हो जाए. इस से हमारी शान बढ़ेगी, दोस्तों और रिश्तेदारों में इज्जत होगी.’’

रेखा ने प्रशांत से बहस न की. वह महसूस करने लगी कि वह अपनी जगह सही है पर दीपा के ताने उसे अब भी कांटों से चुभ रहे थे.

रेखा यह भी सोच रही थी, ‘प्रशांत को जब कंपनी की ओर से फ्लैट या क्वार्टर मिलेगा तो उस में जा कर रहनसहन को ऊंचा उठाने की कोशिश करेगी.’

उस ने एक दिन प्रशांत से पूछा, ‘‘तुम्हें कब क्वार्टर मिलने वाला है?’’

‘‘क्या तुम यहां से भागना चाहती हो? दीपा ने शायद तुम्हें दुखी कर दिया है?’’ प्रशांत बोला.

अपनी कमजोरी पकड़ी जाती देख वह उठ कर पानी पीने लगी. फिर बोली, ‘‘कुएं का पानी कुछ खारा लगता है. साफ करा देना या ब्लीचिंग पाउडर डलवा देना.’’

‘‘4 महीने पहले ही तो कुआं साफ कराया था.’’

‘‘एक फ्रिज लेना ठीक रहेगा.’’

‘‘ले लेंगे. वैसे कुएं का पानी गरमी में ठंडा और जाड़े में गरम रहता है.’’

एक दिन सुधा बोली, ‘‘दीदी, एक अच्छी सी साड़ी खरीदनी है… बाजार चलो न.’’

सुधा की जिद पर रेखा तैयार होने लगी. उसे कीमती साड़ी में देख सुधा पूछ बैठी, ‘‘दीदी, हम किसी बरात में तो नहीं जा रहे हैं?’’

‘‘अरे दीपा मिल गई तो मुझे टोक देगी. साधारण साड़ी में देख फब्ती कसेगी. उस का ठिकाना नहीं कि कब क्या बोल दे.’’

दोनों चल पड़ीं. दीपा का फ्लैट निकट आता जा रहा था.

‘‘दीदी, दीपा के घर के सामने औरतों की भीड़ क्यों है? चलो देखें तो,’’ सुधा बोली. फिर दोनों उधर बढ़ गई.

कुछ औरतें एक सब्जी बेचने वाले को घेर कर खड़ी थीं. उन के बीच दीपा का चेहरा लाल हो रहा था.

रेखा और सुधा को देख कर दीपा झल्ला कर बोली, ‘‘अरे सब्जी वाले, मैं भाग तो नहीं रही हूं. सिर्फ 300 के लिए मेरी बेइज्जती पर उतर आए हो. तनख्वाह मिलते ही पूरा चुकता कर दूंगी.’’

‘‘आप तो हर महीने यही कहती हैं बहनजी. पर देती नहीं… उलटे उधार लेती जाती हैं,’’ सब्जी वाला भुनभुनाता हुआ चला गया. दूसरी औरतें भी हंसती हुई चली गईं.

दीपा रेखा और सुधा को ऊपर ले गई. उन के बैठते ही बोली, ‘‘देखा न दीदी, बेइज्जती कर गया वह. ठीक
ही कहा गया है कि छोटों के मुंह नहीं लगना चाहिए.’’

‘‘तुम कौन सी बड़ी हो? बड़ी होती तो उधार नहीं लेती,’’ रेखा की बात से दीपा तिलमिला उठी. वह बोली, ‘‘तंगी तो हर किसी को होती है. सरकार भी उधार लेतीदेती है.’’

फिर दीपा ट्रे में 2 गिलास ठंडा पानी ले आई और बोली, ‘‘उन को बिसकुट लाने के लिए बोला था, पर नहीं लाए. रुकोगी तो शरबत बना दूंगी.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें बाजार में आइसक्रीम खिलाऊंगी,’’ रेखा ने कहा तो दीपा साथ चलने को तैयार हो गई. उस ने भी कीमती साड़ी पहन ली.

दुकान में घुसते ही मालिक दीपा की ओर देख कर बोला, ‘‘बहनजी, हम उधार देने से रहे… पहले ही 2,000 चढ़े हैं.’’

दीपा का चेहरा लाल हो उठा.

रेखा बोल उठी, ‘‘भाई साहब, हम नकद लेने आई हैं.’’

दीपा बीचबीच में रेखा को देख लेती थी. उस से नजर मिलाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी.

आइसक्रीम खाते वक्त रेखा ने पूछ लिया, ‘‘क्यों दीपा, ज्यादा कर्ज तो नहीं चढ़ा लिया है, तू ने?’’

‘‘इस की परवाह मुझे नहीं. धीरेधीरे दूंगी. अपने को रुपयों की कमी नहीं. अभी हाथ तंग है. पिछले महीने मैं ने प्रेमलाल का उधार चुकता किया था.’’

‘‘प्रेमलाल को किसी प्यारेलाल से ले कर दिया होगा, यही हेराफेरी है न?’’ रेखा हंस पड़ी. दीपा का चेहरा देखते ही बनता था.

सुधा को भी हंसी आ गई, पर मुंह पर पल्लू रख लिया.

‘‘दीदी, इस में छिपाना क्या… तुम तो अपनी हो. एक बात कहूं?’’ दीपा बोली.

‘‘कहो,’’ रेखा ने कहा.

‘‘तुम मुझे 10,000 दे दो तो दूसरों के सारे कर्ज उतार दूं. उन लोगों से बातें तो नहीं सुननी पड़ेंगी. तुम्हारा कर्ज धीरेधीरे उतार दूंगी.’’

‘‘कहीं रुपए ले कर कीमती साड़ी खरीद लाई तो कर्जे रह जाएंगे. वैसे भी मैं मकान की दूसरी मंजिल बनाने में लगी हूं.’’

दीपा झुंझला गई, ‘‘तुम तो हमेशा मकान में ही रुपए लगाती रहती हो कि भाड़ा आता रहे. किसी की मदद करने से पहले भी तुम दूर रहती थीं. यह ठीक नहीं कि देखसुन कर भी बहाना बनाया जाए. अपना तो वह, जो दुख में साथ दे.’’

दीपा का साथ छूटते ही रेखा हंसने लगी. सुधा ने भी उस का साथ दिया.

घर में प्रशांत ने भी सुना तो हंस पड़ा. वह बोला, ‘‘रेखा, तुम्हारी बुनियाद मजबूत है और उन की खोखली.’’

मकान का काम पूरा हो गया तो रेखा ऊपरी मंजिल में रहने लगी. नीचे का हिस्सा किराए पर देने की सोच ही रही थी कि एक दिन दीपा आ गई.

रेखा ने पूछा, ‘‘कहो, कैसे आना हुआ?’’

‘‘तुम्हारे कुएं का पानी मीठा लग रहा है न, सो मेरा मन यहां आने को करने लगा है.’’ दीपा बोली.

‘‘मजाक मत करो.’’ रेखा बोली.

‘‘दीदी, तुम नीचे के 2 कमरे हमें ही किराए पर दे दो न… आधे में सुधा है ही. हम तीनों सहेलियों की तरह रह लेंगी. मजा भी आएगा.’’

‘‘बात क्या है, साफसाफ कहो?’’ रेखा ने पूछा.

‘‘फ्लैट मालिक हमें वह घर खाली करने को कह रहा है.’’

‘‘तुम्हारा दिल यहां नहीं लगेगा. फिर रहनसहन में भी फर्क आ जाएगा.’’

‘‘यह कहो न कि देने का मन नहीं. सोचती हूं कि तुम ही ठीक हो. तुम्हारा अपना मकान है, किसी का रोबदाब नहीं. भाड़े का झंझट नहीं… कहीं भाड़े का मकान खोजने की भागदौड़ नहीं.’’ दीपा बोली.

रेखा समझ न सकी कि क्या जवाब दे. वह उस की आदतें अच्छी तरह जानती थी.

प्रशांत ने ही हल ढूंढ़ निकाला. वह बोला, ‘‘4-5 महीने में मुझे कंपनी की ओर से क्वार्टर मिल जाएगा. तुम उसे ही ले लेना. इस से तुम्हारा रहनसहन भी ऊंचा रहेगा.’’

‘‘कितनी पगड़ी देनी होगी?’’ दीपा ने पूछा

ढाई लाख का रेट चल रहा है, ऊपर से भाड़े के 6,000 रुपए.’’

‘‘मैं पगड़ी तो नहीं दे सकूंगी. वैसे आप सब अपने हैं… और अपनों से क्या लेना. हां, भाड़े के दे दूंगी.’’

‘‘अगर रहनसहन ऊंचा बनाए रखना है तो खर्च से डर क्यों? क्वार्टर लेने के लिए लोग पगड़ी और भाड़ा ले कर पीछे घूमते रहते हैं,’’ प्रशांत मुसकराया.

फिर एक दिन पता चला कि दीपा पर ढेर सारा कर्ज है. उस ने कर्ज चुकाने के लिए फ्रिज, अलमारी और सोफा बेच दिया है.

एक बार रेखा सुधा के साथ दीपा के फ्लैट पर गई तो पता चला कि वह वहां से एक बस्ती में रहने चली गई है. वहां अब वह एक कमरे में ही रह रही है, 2,000 रुपए किराया दे कर.

रहनसहन ऊंचा करने के चक्कर में कर्जदार हो कर वह नीचे ही गिरी थी. Family Story In Hindi

Social Story In Hindi: जाति क्यों नहीं जाती

Social Story In Hindi, लेखक – शकील प्रेम

रघुराम छोटी जाति का था. उस का बेटा सिपाही भरती हुआ, तो उस ने भोज कराया, पर ऊंची जाति का जानकीदास भोज में नहीं आया. उसे निराशा हुई. इसी बीच जानकीदास और एक ठेकेदार गंगू में घर की बिजली का ठेका हुआ, पर जानकीदास ने उसे कम पैसे दिए. यह मामला डीएम तक गया. क्या मामला सुलझ पाया?

रघुराम के बेटे का सिपाही पद के लिए सिलैक्शन हुआ था. घर वाले बहुत खुश थे. उन्हें अपने होनहार लड़के पर गर्व था. दौड़ में वह पूरे राज्य में 9वें नंबर पर आया था. 2 दिन पहले लड़के का जौइनिंग लैटर भी आ चुका था. तब से रघुराम के परिवार में खुशी का माहौल था. यह अलग बात थी कि घूस देने में जमीन चली गई थी, लेकिन अब रघुराम को इस का कोई मलाल नहीं था.

गांव की जिस बस्ती में रघुराम रहता था, वहां के लिए यह बहुत बड़ी बात थी, क्योंकि उन लोगों की पूरी बस्ती में एक भी सरकारी नौकरी वाला नहीं था. पहली बार उन की जाति का कोई लड़का सिपाही बनने वाला था.

हालांकि, उसी गांव के कई दबंग परिवारों में बड़ीबड़ी नौकरियां थीं. कोई प्रोफैसर, तो कोई दारोगा. टीचर तो कई थे. कुछ रेलवे में भी थे, लेकिन इस दलित बस्ती में यह पहली सरकारी नौकरी थी.

रघुराम ने इस खुशी में भोज का आयोजन किया, जिस में उस ने बड़े लोगों को भी न्योता दिया. जानकीदास को भी न्योता दिया गया, लेकिन उस के घर से कोई नहीं आया, तो रघुराम को इस बात से बहुत दुख पहुंचा.

रघुराम अगले कई दिनों तक अपनी बस्ती के लोगों से कहता रहा, ‘‘अरे, ये बड़े लोग जब भी कोई काम कहते हैं हम बिना मोलभाव किए कर देते हैं, लेकिन आज मेरे बेटे की नौकरी से इन की छाती सुलग गई है.

‘‘अब देखते हैं, इन बड़े लोगों का काम कौन करता है? अब सब से पहले दिहाड़ी तय होगी, उस के बाद ही कोई काम होगा.’’

रघुराम ने पूरी बस्ती को चेता दिया था कि उन लोगों का कोई भी काम हो तो नहीं करना है. अगर करना ही पड़ जाए तो पहले मजदूरी तय कर के ही करना है. किसी से अब कोई लागलपेट नहीं रखना है.

रघुराम अपनी बस्ती में पहले से ही रोबदाब रखता था. अब तो वह एक सिपाही बेटे का बाप हो चुका था, इसलिए बस्ती पर उस का रोब सीधे डबल हो गया था.

एक महीने के बाद एक सुबह रघुराम हाथ में थैला लिए घर का सामान लेने पास की किराना की दुकान की ओर जा रहा था कि तभी उस के कानों में आवाज आई, ‘‘रघु चाचा…’’

रघुराम ने मुड़ कर देखा तो वह गंगू था जो उस की ओर साइकिल लिए चला आ रहा था.

‘‘चाचा, तुम से एक जरूरी काम है,’’ गंगू बोला.

‘‘इतना भी क्या जरूरी काम है? मैं दुकान से कुछ सामान लेने जा रहा हूं,’’ रघुराम बोला.

‘‘चाचा, तुम सामान ले कर आ जाओ, मैं तुम्हारे घर बैठा हूं,’’ गंगू ने कहा.

‘‘ठीक है, तू घर चल. मैं 10 मिनट में आ रहा हूं,’’ रघुराम बोला.

एक घंटे के बाद रघुराम हाथमुंह धो कर घर की चारपाई पर गंगू के साथ बैठा चाय पी रहा था.

‘‘हां गंगू, अब बोल कि तुझे क्या परेशानी है?’’ रघुराम ने पूछा.

‘‘चाचा, जानकीदास का जो नया मकान बना है न, मैं ने उस मकान में बिजली का ठेका लिया था, जो 20,000 रुपए में तय हुआ था. लेकिन अब काम पूरा हो गया तो जानकीदास ने 6,000 रुपए थमाए और बोला कि इस से ज्यादा की मेरी औकात नहीं है.’’

गंगू के मुंह से इतना सुनते ही रघुराम को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘मैं ने पहले ही तुम लोगों से कहा था कि इन ऊंचे लोगों का कोई भी काम मेरे बिना पूछे नहीं करना है, लेकिन अब मेरी सुनता कौन है. अब जाओ रोओ, मरो मैं क्या कर सकता हूं…

‘‘अगर तुम ने मुझे पहले बताया होता तो जानकीदास की इतनी मजाल नहीं होती…’’ रघुराम ने कहा.

गंगू ने कहा, ‘‘चाचा, मुझ से गलती हो गई. मुझे माफ कर दो और मेरा बकाया पैसा दिलवा दो. पूरा नहीं तो 6,000 रुपए और मिल जाएंगे, तो मेरा काम बन जाएगा.’’

‘‘ठीक है, पहले तू चाय पी ले, उस के बाद चल मेरे साथ,’’ रघुराम ने कुछ सोचते हुए कहा.

जानकीदास के घर पर रघु ने काफी हंगामा खड़ा किया.

जानकीदास बोला, ‘‘इस गंगू ने मेरे पूरे मकान का सत्यानाश कर दिया. जब इस को बिजली का काम आता ही नहीं तो क्यों जिम्मेदारी ली. बल्ब का बटन दबाओ तो पंखा चलता है. बाथरूम में भी ठीक से वायरिंग नहीं की. बाकी सारा काम भी उलटासीधा किया है. सब दोबारा करवाना पड़ेगा.’’

गंगू बोला, ‘‘नहीं रघु चाचा. यह सरासर ?ाठ है. मैं पिछले 5 साल से यही काम कर रहा हूं. गुजरात, दिल्ली और पंजाब तक में मैं ने काम किया है. पिछले महीने ही महाराष्ट्र से काम खत्म कर के आया हूं.

‘‘मैं गांव आया तो इन्होंने ही मु?ा से कहा कि बिजली की फिटिंग का काम बाकी है. चलो, तुम कर दो. 20,000 रुपए में ठेका हुआ. काम पूरा हो गया तो इन्होंने खुद ही कनैक्शन उलटासीधा कर दिया, ताकि मेरे काम में गलती निकाल कर पूरे पैसे न देने पड़ें.’’

रघुराम ने गंगू की ओर से जानकीदास पर अपनी सारी भड़ास निकाल दी. बात बनने के बजाय और बिगड़ गई. मामला बातचीत से शुरू हो कर हाथापाई तक पहुंच गया. किसी तरह मास्टरजी के बीचबचाव के बाद दोनों अलग हुए.

इस के बाद जानकीदास ने एक फूटी कौड़ी और देने से इनकार कर दिया और बोला, ‘‘तेरा बेटा सिपाही बना है तो इतना घमंड और अगर वह ससुरा कलक्टर बन गया होता तब तू न जाने क्या करता. जा, तुझे जो करना है कर ले, अब एक फूटी कौड़ी भी मैं इस गंगू को नहीं दूंगा.’’

रघुराम के लिए अब बात महज चंद रुपयों की नहीं रह गई थी, बल्कि उस की इज्जत का सवाल बन गया था. उसे अब हर हाल में जानकीदास को सबक सिखाना था.

रघुराम अपनी बस्ती के कुछ लोगों को ले कर थाने पहुंचा और हरिजन ऐक्ट में मारपीट का मामला दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन दारोगा को पहले ही खबर मिल चुकी थी. उस ने रघुराम को समझाया और किसी तरह उसे वापस घर भेज दिया.

घर पहुंच कर रघुराम को लगा कि दारोगा और जानकीदास की जाति एक होने की वजह से दारोगा ने उस की नहीं सुनी.

अगले दिन रघुराम अपने साथ कुछ लोगों को ले कर सीधे डीएम के यहां पहुंचा. डीएम से मुलाकात होने पर रघुराम ने कहा, ‘‘हमारे गांव के कुछ ऊंची जाति के लोगों ने हमारा जीना दूभर किया हुआ है. वे हम से छुआछूत करते हैं और काम करवा कर पूरा पैसा नहीं देते हैं. पैसा मांगने जाओ तो मारते हैं.’’

डीएम ने कहा, ‘‘कल हमारा उस तरफ का दौरा भी है, इसलिए हम कल 12 बजे तक तुम्हारे गांव आएंगे. तुम अभी जाओ.’’

रघुराम घर लौट आया, लेकिन उसे डीएम की बात पर रत्तीभर भी यकीन नहीं था. उसे लगा कि उस ने उसे बेवकूफ बना कर भगा दिया है.

अगले दिन रघुराम अपनी चारपाई पर बैठा बस्ती के कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था कि तभी गंगू हड़बड़ाता हुआ उस के दरवाजे पर पहुंचा और चिल्ला कर बोला, ‘‘डीएम साहब आए हैं. प्रधान के यहां बैठे हैं. तुम्हें बुला रहे है. दारोगा भी हैं साथ में और डीएम साहब ने जानकीदास को भी बुलाया है.’’

थोड़ी देर में प्रधान के घर लोगों का मजमा लगा हुआ था. बाहर डीएम की गाड़ी के साथ 4-5 गाडि़यां और लगी हुई थीं. डीएम साहब सामने कुरसी पर बैठे थे. दारोगा और प्रधान दोनों चारपाई पर बैठे थे. सामने वाली चारपाई पर जानकीदास और कुछ और लोग थे.

रघुराम ने दारोगा की ओर देखे बिना सीधे डीएम साहब को नमस्कार किया और खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गया.

डीएम साहब की फटकार के बाद जानकीदास ने गंगू के बकाया पैसे दे दिए. डीएम साहब ने रघुराम से कहा, ‘‘अब से कोई भी मजदूरी रोके तो सीधे डीएम औफिस चले आना, सब को ठीक कर दूंगा. अब तो तुम्हें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए, फिर भी और कोई शिकायत है, तो अभी बता दो.’’

रघुराम ने कहा, ‘‘ये लोग हम से छुआछूत करते हैं. हमारे यहां भोज नहीं करते, क्योंकि हम निचली जाति के हैं. इस जानकीदास से पूछो. मेरे बेटे की नौकरी लगने की खुशी में मैं ने भोज किया था. जानकीदास को न्योता भेजा था, लेकिन यह नहीं आया, क्योंकि मैं छोटी जाति से हूं न.’’

डीएम साहब ने पूछा, ‘‘तुम किस जाति से हो?’’

रघुराम ने जवाब दिया, ‘‘मल्लाह.’’

डीएम ने फिर पूछा, ‘‘तुम्हारी बस्ती में और कौनकौन सी जातियां हैं?’’

रघुराम बोला, ‘‘हमारी बस्ती में केवल हमारी जाति के ही लोग रहते हैं. दूसरी छोटी जाति के लोगों का टोला अलग है.’’

डीएम ने बाल्मीकि टोले से एक आदमी को बुलाया और उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘जी हुजूर, मेरा नाम भुवन है,’’ उस आदमी ने हाथ जोड़ कर कहा.

डीएम साहब ने कहा, ‘‘भुवन, जाओ और अपने घर से एक थाली में खिचड़ी बनवा लाओ.’’

भुवन ने आदेश का पालन किया. थोड़ी देर में वह थाली हाथ में लिए हाजिर था, जो अब भी थोड़ी गरम थी. सब लोग इस नजारे को हैरत भरी निगाहों से देख रहे थे.

डीएम ने प्रधान के यहां से चम्मच मंगवाया और पहले खुद 2-3 चम्मच खिचड़ी खाई, फिर दारोगा को बोला
कि खाओ तो दारोगा ने भी 2 चम्मच खिचड़ी निगल ली. उस के बाद डीएम ने जानकीदास से कहा, ‘‘लो भई, तुम भी खाओ.’’

न चाहते हुए जानकीदास ने भी एक चम्मच खिचड़ी खा ही ली. अब बारी रघुराम की थी. डीएम ने थाली उस के आगे बढ़ा दी और बोले, ‘‘लो, तुम भी खाओ. भुवन ने बड़ी स्वाद खिचड़ी बनाई है.’’

भुवन ने कहा, ‘‘नहीं सरकार, मैं ने नहीं बनाई, बल्कि मेरी बीवी ने बनाई है. जल्दबाजी में शायद थोड़ी कच्ची रह गई है.’’

डीएम साहब ने कहा, ‘‘अरे नहीं भुवन, ऐसी खिचड़ी तो मैं ने जिंदगी में पहली बार खाई है. लाजवाब है.’’

डीएम साहब ने थाली रघुराम के सामने रख दी, लेकिन उसे तो जैसे सांप सूंघ गया था. उस के सामने खिचड़ी पड़ी रही, लेकिन उस ने उसे हाथ तक नहीं लगाया.

थोड़ी देर इंतजार करने के बाद डीएम साहब ने रघुराम के सामने से थाली उठा ली और प्रधान के यहां से थोड़ा अचार मंगा कर खुद ही बची हुई खिचड़ी डकार गए.

डीएम साहब जाने लगे तो उन्होंने जानकीदास से कहा, ‘‘जातिवाद हमारे समाज की काली सचाई है. जब तक तुम जैसे लोग अपने श्रेष्ठ होने का भरम पाले रखोगे, तब तक यह सामाजिक कलंक बना रहेगा, इसलिए जितनी जल्दी हो सके अपना जातीय दंभ छोड़ कर इनसान बन जाओ.’’

जातेजाते डीएम साहब ने रघुराम से भी कहा, ‘‘जातिवाद खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की एक दिमागी बीमारी भी है, जिस से पूरा समाज ग्रसित है. तुम दूसरों के बदलने की उम्मीद तब तक नहीं कर सकते, जब तक तुम खुद इस बीमारी से न निकल जाओ, इसलिए आज के बाद कभी भी किसी से भी जातिवाद या छुआछूत की शिकायत मत करना.

‘‘पहले तुम खुद इस बीमारी से नजात पा जाओ, उस के बाद ही किसी और से इस की उम्मीद करना. जब तक तुम्हारा बरताव तुम से नीचे के लोगों के प्रति जायज नहीं है, तब तक तुम्हें अपने से ऊपर के लोगों पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं है.’’

शर्मिंदा रघुराम नजरें नीची किए वहीं खड़ा रहा. Social Story In Hindi

Funny Story In Hindi: नाक के नीचे

Funny Story In Hindi: दुनिया में बहुत तरह की नाक होती हैं. लंबी नाक, मोटी नाक, पतली नाक वगैरह. नाक की बनावट भौगोलिक हालात और आबोहवा के असर के चलते भी अलगअलग होती है.

हमारे देश में बहुत सी बातें कहीं गई हैं, जो मुहावरों में देखीसुनी और पढ़ी जाती हैं. नाक का बाल होना. मतलब बहुत ही खास शख्स होना. नाकों चने चबवाना. मतलब बहुत ज्यादा परेशान करना. क्रिकेट और दूसरे खेलों में लोग देश की इज्जत बचाने की बात को नाक बचाना कह लेते हैं.

अजीब बात है कि जिस नाक को हम जिंदगीभर बहुत देर तक देख भी नहीं पाते, उस को ले कर जान दिए रहते हैं. दिनभर में एक बार अगर गलती से भी अपनी नाक को कभी ढंग से हम देख पाएं, तो शायद यह बहुत बड़ी बात होगी. ऐसा सब के साथ होता है.

कभी आप रोजमर्रा की जिंदगी से समय निकाल कर देखिएगा. आप अपनी नाक को एक मिनट भी ठीक से नहीं देख पाते. जिस नाक को हम अपनी दोनों आंखों की पुतलियों को बहुत सीधा कर के भी नहीं देख पाते, उसी नाक के लिए हम जिंदगीभर लड़ते रहते हैं.

यह आखिर है क्या? यकीनन हमारी खीझ. इसी को हम नाक कहते हैं. जब हम बेबस हो जाते हैं और अपनी खीझ को नहीं मिटा पाते हैं, तो नाक का सवाल बना लेते हैं. अपनों से, खासकर रिश्तेदारों से हम मनमुटाव कर लेते हैं. उन के जैसा मकान, उन के जैसी कार, उन के जितनी पगार, उन के जितना बैंक बैलेंस जब तक नहीं हो जाता, तब तक हम नाक उठा कर नहीं चल सकते. हमारे सामने भला उन की औकात ही क्या है?

इसी नाक के लिए आदमी तीन की जगह तेरह देने को तैयार हो जाता है. टैंडर मुझे मिलना चाहिए. नुकसान होगा तो होगा. बहुत कमाया है. इस बार घर से घाटा देंगे, लेकिन तुम को खत्म कर देंगे. बच्चू, तुम को यह टैंडर नहीं लेने देंगे. तुम को नाकों चने चबवा देंगे. हो किस फेर में. अपना माल खरीद के दाम पर बचेंगे, लेकिन तुम को नहीं बेचने देंगे.

लोग आन में कान कटाने को तैयार रहते हैं, लेकिन आन में कान नहीं कटता, बल्कि नाक कट जाती है और उन को पता भी नहीं चलता.

खापों में नाक बहुत ऊंची है. उन के फैसले नाक के लिए किए जाते हैं. वहां औनर किलिंग आम बात है. नाक के लिए जिंदा लोग टांग दिए जाते हैं, नहीं तो टंग जाते हैं. हुक्कापानी बंद होने का खतरा है. समाज से खदेड़े जाने का डर. रोटीपानी, दियासलाई न मिल पाने का दुख.

कहते हैं कि कुत्ते की नाक बहुत तेज होती है, लेकिन कुत्तों में नाक के लिए लड़ाई नहीं होती. कुत्ते नाक के लिए नहीं लड़ते. आदमी नाक के लिए लड़ता है. इतना लड़ता है कि लड़तेलड़ते वह आदमी से कब जानवर बन जाता है, उस को पता ही नहीं चलता. इस मामले में कुत्ते आदमी से ज्यादा समझदार हैं. कम से कम बेअक्ल हो कर अक्ल वालों को मात दे रहे हैं.

औरतों की नाक बहुत तेज होती है. वे गांवसमाज में सूंघ लेती हैं कि किस का किस से चक्कर चल रहा है. किस का पेट कितने महीने का है. किस के घर में बाप और बेटे की नहीं बन रही है. किस घर में सासबहू में अनबन है. गांवसमाज की औरतों के नाक के सूंघने की ताकत सब से ज्यादा होती है.

सत्तासीन या सरकार में बैठे लोग बड़ेबड़े घोटालों को अंजाम दे देते हैं और यह उसी नाक का कमाल है कि जिन प्रशासनिक अमलों की नाक के नीचे यह सब होता है, उन को कुछ पता ही नहीं होता है. Funny Story In Hindi

Story In Hindi: घुसपैठिए

Story In Hindi: सरहद पर पहुंचते ही सरगना ने कहा, ‘‘देखो, तुम सब घुसपैठिए हो. सामने हिंदुस्तान नाम की बहुत बड़ी सराय है. एक बार किसी तरह सीमा सुरक्षा बल से बच कर दाखिल हो जाएं, उस के बाद उस भीड़ भरे देश में कहीं भी समा जाओ. शासन और प्रशासन भ्रष्ट हैं ही. पैसा फेंको और अपने सारे कागजात बनवा लो.

राशनकार्ड, वोटरकार्ड और इस देश की नागरिकता हासिल.’’

एक घुसपैठिए ने पूछा, ‘‘आप तो कह रहे थे कि सरहद पार करवाने के लिए भारतीय सेना में हमारे कुछ मददगार हैं?’’

सरगना बोला, ‘‘हां हैं, लेकिन अभी उन की ड्यूटी नहीं है. मुझे दूसरी घुसपैठिया खेप भी भेजनी है. बहुत ज्यादा लोगों को एकसाथ नहीं भेज सकते. मेरा रोज का काम है. हर पड़ोसी देश से घुसपैठिए घुसते हैं.

कभी मीडिया वाले ज्यादा हल्ला मचाते हैं, तो कुछ सख्ती हो जाती है.’’

‘‘लेकिन अगर हम पकड़े गए तो?’’ घुसपैठिए ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं होगा. तुम्हें वापस भेज दिया जाएगा. वैसे ऐसा होगा नहीं. कब, किस समय सरहद पार करनी है, मुझे सारी जानकारी है. एक बार घुस गए तो बात खत्म.

‘‘हां, अगर वहां पहुंच कर पहचानपत्र बनवाने में कोई समस्या हो तो फोन करना. अपने एजेंट हैं. सब हो जाएगा. चिंता करने की जरूरत नहीं.’’

यह नजारा भारतबंगलादेश की सरहद का है. यह नजारा भारत और पाकिस्तान की सरहद का भी हो सकता है. भारतश्रीलंका, भारतनेपाल की सरहद का भी. नेपालियों को तो वैसे भी खुली छूट है. इस देश में कोई भी कहीं से भी आ कर बस सकता है. घुसपैठिया बन कर घुसता है, फिर मूल निवासी बन कर अपने लोगों को बुलाता है, बसाता है और बसनेबसाने का यह सिलसिला लगातार जारी रहता है.

अचानक सरगना ने इशारा किया और घुसपैठिए भारत की सरहद में दाखिल हो गए. यहां काम दिलाने, बसाने के लिए उन के धर्म, जाति, भाषा वाले पहले से ही थे. फिर दलाल तो हैं ही. उन की आमदनी का जरीया है. उन का धंधा है.

न जाने कितने पाकिस्तानी, बंगलादेशी, नेपाली, श्रीलंकाई भारत के मूल निवासी बन कर यहां की आबादी बढ़ा रहे हैं. मूल निवासी की भूख और बेकारी पहले से ही है. उन की अपनी समस्याएं तो हैं ही, उस पर ये घुसपैठिए जो पूरा बैलेंस बिगाड़ कर रख देते हैं.

शरणार्थी आ ही रहे हैं. जो नियम से चलते हैं. कानून का पालन करते हैं, सो आज सालों बाद भी शरणार्थी बने हुए हैं. उन का अपना निजी कुछ भी नहीं है. जो गैरकानूनी तरीका अपनाते हैं वे मूल निवासी बन जाते हैं.

17 लाख शरणार्थी अकेले जम्मू में हैं. घुसपैठिए भी अपने देश की भूख बेकारी से दुखी हो कर रोटी, छत
की तलाश में घुसते हैं, वरना किसे पड़ी है अपनी जमीन, अपना देश छोड़ कर जाने की.

पूर्वोत्तर के इस राज्य में लाखों घुसपैठिए यहां की नागरिकता ले कर पूरे का पूरा शहर बसा चुके थे. इन्हें
20 सालों से ज्यादा हो गए यहां रहते हुए. इस धरती पर उन्होंने मकान बनाया. खेतीबारी की. जमीन खरीद कर किसान बने. उन के बच्चे यहीं की आबोहवा में पल कर बड़े हुए. यहीं उन की शादी हुई. उन के बच्चे हुए.

नेताओं को यह बात मालूम थी. वे इन्हें अपने वोट बैंक के रूप में भुनाते रहे और यह भरोसा देते रहे कि उन की सरकार बनी तो उन्हें यहीं का निवासी माना जाएगा. हर पार्टी यही कहती और सरकार बनने के बाद चुप्पी साध लेती.

40 साल के आसपास हो चुके थे, जब अहमद खान पूर्वोत्तर के इस राज्य में बसे थे. जब वे आए थे तो अपने कुछ रिश्तेदारों और साथियों के साथ यहां आ कर मजदूरी करना शुरू किया था. धीरेधीरे अपनी मेहनत से उन्होंने जमीन खरीदी. मकान खरीदा.

उस समय यहां के स्थानीय निवासियों ने भी उन की मदद की. यहीं उन की शादी हुई, फिर उन के बच्चों की शादियां हुईं. अब भरापूरा परिवार था. बंगलादेश को तो वे भूल चुके थे. उन का वहां कोई था भी नहीं.

जो थे उन्हें खोने में 40 साल का समय बहुत होता है. इसी धरती को वे अपना मानते थे. इसी को सलाम करते थे.

अब जबकि राजनीति दलों का दलदल बन चुकी थी. केंद्र और राज्य सरकार से ज्यादा क्षेत्रीय भाषा, जाति की राजनीति होने लगी थी. आबादी बढ़ने से क्षेत्रीय लोग पिछड़े और गरीब रह गए थे. उन के पास न जमीन थी, न रोजगार. वे दिल्ली में बैठी सरकार को कोसते रहते थे कि दूर पड़े किनारे के राज्यों के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया.

यह कोसना उन्हें वहां के स्थानीय नेताओं ने सिखाया था. स्थानीय नेताओं के पास पड़ोसी देश से हासिल हथियार थे और बेरोजगार की फौज उन के पास थी. जो असंतुष्ट हो कर हथियार भी उठा चुके थे. जो हथियार उठाने की हिम्मत नहीं कर पाए, वे उन हथियारधारियों के समर्थन में थे. अपना विरोध वे अहिंसक तरीके से करते थे. नारा था भूमिपुत्र का.

भूमिपुत्र वे जो इस प्रांत, क्षेत्र का स्थायी निवासी है. भाषा, बोली, संस्कार, उस का है. जो उस जाति, धर्म से संबंधित है. यह ठीक वैसा ही नारा था जो आंध प्रदेश और महाराष्ट्र में उठता रहा है. बाहरियों को खदेड़ो. जो इसी देश के दूसरे क्षेत्रों से आए थे. रोजगार के लिए वे तो चले गए. मजदूर बन कर आए थे.

लेकिन अहमद खान जैसे लोग कहा जाएं? उन के पास तो यही जमीन, यही मकान, दुकान उन का मुल्क था. फिर उन्हें क्या पता था कि 40 साल बाद स्थानीय लोग ही जो कभी उन के मददगार थे, भाषा, भूमिपुत्र आंदोलन के नाम पर उन के दुश्मन बन जाएंगे.

हत्याओं, बम, धमाकों की खबर पूरे राज्य में फैल रही थी. दहशत का माहौल छाया हुआ था. अहमद खान खुद को बेवतन महसूस कर रहे थे. न जाने कब वे इस हिंसक आंदोलन की बलि चढ़ जाएं. वे करें तो क्या करें. जाएं तो कहां जाएं. उन के पास कोई रास्ता भी नहीं था. आखिर उन के पास संदेशा आ ही गया. वे उल्फा के कमांडर के सामने हाथ जोड़े खड़े थे.

कमांडर ने कहा, ‘‘यह धरती भूमिपुत्रों की है. खाली करो.’’

‘‘मैं 40 साल से यहां रह रहा हूं. यह धरती मेरी भी है. मैं भी भूमिपुत्र हुआ.’’

‘‘नहीं, न तो तुम असमिया हो, न तुम्हारे पूर्वज यहां के हैं. तुम्हारे रहने से हमारे हितों पर असर पड़ता है. यहां केवल यहां के लोग रहेंगे.’’

‘‘मैं नहीं जाऊंगा. पूरी जिंदगी यहीं गुजर गई.’’

‘‘नहीं जाओगे तो मरोगे,’’ कमांडर ने अपनी बात खत्म कर दी.

अहमद खान सोचते रहे कि उन का मुल्क कौन सा है? कुछ सालों में तो किसी भी देश की नागरिकता मिल जाती है, फिर उन्हें तो पूरे 40 साल हो गए. इस जगह के अलावा उन का कहीं कुछ भी नहीं है. वे अपना घरद्वार छोड़ कर जाएं तो कहां जाएं? क्या करेंगे? कहां रहेंगे?

टैलीविजन, रेडियो पर सरकार की तसल्ली आती रही कि सब ठीक हो जाएगा. डरने की कोई बात नहीं. आपसी बातचीत जारी है. पर सरकार की तसल्ली हर बार की तरह झूठी और खोखली रही.

एक रात भूमिपुत्र, विद्रोही अपने लावलश्कर के साथ उन की बस्ती में घुस आए. गोलियों, बमों की आवाजों के साथ चीखों की आवाज भी माहौल में गूंजने लगी.

अहमद खान अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए. उन्होंने तय कर लिया था कि जहां 40 साल, सुख, परिवार के साथ गुजारे. वहां मौत आती है तो मौत ही सही. कोई माने या न माने, वे भी इस भूमि के पुत्र हैं. वे कहीं नहीं जाएंगे.

माहौल में बारूद की गंध फैलने लगी. मकान धूंधूं कर जलने लगे. औरतों और बच्चों की चीखें गूंजने लगीं.

चारों ओर खून ही खून बहने लगा. तभी 2-3 गोलियां अहमद खान के सीने में लगीं. एक लंबी कराह के साथ उन्होंने दम तोड़ दिया. Story In Hindi

Long Hindi Story: वे दो अनमोल दिन – आखिरी भाग

Long Hindi Story, लेखक – शकील प्रेम

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था : विनय किराए की गाड़ी चलाता था. एक बार वह एक परिवार को मोतिहारी से पटना के रेलवे स्टेशन छोड़ने गया. उन में सुमन नाम की एक शादीशुदा औरत थी, जिस से परिवार वालों का रवैया बहुत गलत था. पटना रेलवे स्टेशन पर सुमन की ट्रेन छूट गई. उसे चेन्नई जाना था. फिर वह वापस विनय के साथ उस के घर चली गई, क्योंकि चेन्नई की गाड़ी 2 दिन बाद की थी. वहां सुमन और विनय में नजदीकियां बढ़ गईं. अब पढि़ए आगे…

घर पहुंच कर सभी ने साथ बैठ कर दोपहर का खाना खाया और खाना खाने के बाद विनय लता से बोला, ‘‘लता, तुम सुमन का खयाल रखना. मैं गाड़ी सर्विस करवाने जा रहा हूं. शाम तक वापस आ जाऊंगा.’’
विनय की बात सुन कर सुमन उदास हो गई. विनय भी सुमन की भावनाओं को समझ गया, लेकिन वह रुका नहीं.

शाम को 7 बजे विनय घर लौट आया. विनय को घर में देख कर सुमन के चेहरे पर ताजगी आ गई. सभी ने रात का खाना साथ खाया और काफी देर तक बातें करने के बाद सुमन को ले कर लता अपने कमरे में सोने चली गई और विनय अपने कमरे में बिस्तर पर लेट कर नींद आने का इंतजार करने लगा.

अगली सुबह नाश्ता करते वक्त विनय ने सुमन से कहा, ‘‘सुमन, तुम्हारी ट्रेन शाम 5 बजे की है, लेकिन हमें
10 बजे ही निकलना होगा. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

सुमन इस घर से अलग कहीं नहीं जाना चाहती थी. विनय का छोटा सा परिवार उसे अपने परिवार जैसा लगने लगा था. चेन्नई के नाम से ही सुमन को नफरत थी, लेकिन वह जाती भी कहां?

4 बजे तक विनय पटना स्टेशन पर पहुंच चुका था. सुमन और विनय ने स्टेशन के पास वाले एक रैस्टोरैंट में खाना खाया और प्लेटफार्म नंबर एक पर आ कर ट्रेन का इंतजार करने लगे.

विनय सम?ा ही नहीं पा रहा था कि वह अपनी सब से कीमती चीज को ऐसी जगह क्यों भेज रहा है, जहां वह नहीं जाना चाहती. समय पर गाड़ी प्लेटफार्म पर लग गई और रिजर्वेशन के हिसाब से विनय ने सुमन को उस की सीट पर बिठा दिया.

सुमन ने विनय से कहा, ‘‘विनय, तुम मुझे अपने घर ले गए. तुम ने मेरी टिकट करवाई और फिर मुझे ट्रेन तक छोड़ने आए. तुम्हारा यह सारा कर्ज मैं जल्द तुम्हें लौटा दूंगी.’’

विनय ने कहा, ‘‘यह कर्ज नहीं, बल्कि मेरा फर्ज है. तुम पहुंच कर मुझे फोन कर देना.’’

ट्रेन खिसकनी शुरू हुई, तो विनय ने सुमन से विदा ली और सुमन का चेहरा देखे बिना ट्रेन से नीचे उतर गया. इस बीच वह सुमन का फोन नंबर भी नहीं ले पाया. यह पल विनय के लिए बेहद मुश्किल था.

ट्रेन खिसकनी शुरू हुई, लेकिन विनय काफी देर तक प्लेटफार्म पर ही बैठा रहा और उन पलों को याद करता रहा, जब सुमन उस के साथ थी.

विनय ट्रेन के पूरी तरह आंखों से ओझल हो जाने का इंतजार करता रहा कि तभी ट्रेन रुक गई. विनय प्लेटफार्म की बैंच से उठा और सुमन की एक झलक देखने के लिए उस के डब्बे की ओर दौड़ पड़ा, तभी उस ने देखा कि सुमन अपना सूटकेस लिए ट्रेन से नीचे उतर रही थी.

नजदीक पहुंच कर विनय ने हैरानी भरी आवाज में सुमन से पूछा, ‘‘सुमन, क्या हुआ? तुम ट्रेन से उतर क्यों गई?’’

सुमन ने विनय की ओर देखा और बोली, ‘‘मुजे चेन्नई नहीं जाना, इसलिए मैं ने ट्रेन की चेन खींच दी. मुझे घर ले चलो.’’

सुमन के मुंह से ‘मुझे घर ले चलो’ सुन कर विनय ने उसे गले से लगा लिया और उस का सूटकेस हाथों में थाम कर स्टेशन से बाहर निकल आया.

रात के 11 बजे विनय घर पहुंच गया. सुमन को दोबारा घर मे देख कर लता बेहद खुश थी. वह बोली, ‘‘मुझे पूरा यकीन था कि सुमनजी की ट्रेन फिर मिस हो जाएगी.’’

सुमन पहले से शादीशुदा थी. उसे विनय से शादी करने से पहले भगीरथ से तलाक लेना पड़ता, लेकिन एक औरत के लिए पति से तलाक हासिल करना इतना भी आसान नहीं था.

सुमन पढ़ीलिखी थी और कानून के बारे में उसे थोड़ीबहुत जानकारी थी. बिना शादी के सुमन और विनय एक छत के नीचे साथ भी नहीं रह सकते थे.

धीरेधीरे 15 दिन बीत गए. इस बीच भगीरथ ने सुमन को कई बार फोन किया. भगीरथ ने सुमन को डरायाधमकाया, लेकिन सुमन चेन्नई जाने को राजी नहीं हुई.

विनय सुमन से प्यार करता था और सुमन भी विनय को चाहने लगी थी, लेकिन बिना शादी के घर में साथ रहना मुश्किल था. एक शादीशुदा जवान औरत का घर में रहना विनय की मां को भी पसंद नहीं आ रहा था. विनय के जानने वाले भी तरहतरह की बातें बनाने लगे थे.

एक दिन सुमन ने विनय से कहा, ‘‘विनय, मेरे पास कुछ गहने हैं और कुछ कैश भी है. मुझे मोतिहारी मार्केट में किराए पर एक दुकान दिलवा दो. मैं लेडी गारमैंट्स की दुकान खोलना चाहती हूं. दुकान के आसपास ही मुझे एक कमरे का फ्लैट भी दिलवा देना, मैं वहीं रह लूंगी.’’

विनय को सुमन का यह आइडिया अच्छा लगा, लेकिन वह सुमन के गहने बेच कर उस की मदद नहीं करना चाहता था.

विनय अगले ही दिन बैंक गया. लता की शादी के लिए विनय ने बैंक में 10 लाख की एफडी करवाई थी, वह पूरी रकम निकलवा ली और अगले हफ्ते में ही मोतिहारी के जानपुल रोड पर सुमन की दुकान खुल चुकी थी. पास में ही सुमन के रहने के लिए एक फ्लैट भी मिल गया था.

सुमन बेहद खुश थी, लेकिन अब वह पूरी तरह विनय की कर्जदार हो चुकी थी.

लेडी गारमैंट्स की दुकान का फैसला सुमन के लिए बेहद अच्छा साबित हुआ. आमदनी होने लगी. हर महीने दुकान और फ्लैट का किराया देने के बाद भी सुमन के पास काफी रुपया बच जाता, जिसे वह अपने बिजनैस में लगा देती.

सुमन ने तय किया था कि लता की शादी के वक्त तक वह विनय के 10 लाख रुपए लौटा देगी. सुमन की तरक्की को देख कर विनय भी बेहद खुश था.

रविवार को सुमन की दुकान बंद रहती और उस दिन विनय भी छुट्टी कर लेता. दोनों पूरे दिन साथ रहते. पढ़ाई से वक्त निकाल कर लता भी सुमन की दुकान पर उस का हाथ बंटाती और कई बार सुमन अपनी दुकान बंद करने के बाद विनय के घर पहुंच जाती. सभी रात का खाना साथ खाते और खाना खा लेने के बाद विनय सुमन को उस के फ्लैट पर छोड़ आता.

धीरेधीरे 6 महीने बीत गए. एक दिन सुबह विनय अपने बिस्तर से उठा ही था कि घर के दरवाजे पर ‘खटखट’ की तेज आवाज उस के कानों तक आई.

विनय की मां ने दरवाजा खोला, तो सामने पुलिस को खड़ा देख वे डर गईं. तभी विनय दरवाजे पर आ गया. सामने खड़े पुलिस वाले ने पूछा, ‘‘सुमन कहां है?’’

विनय ने कहा, ‘‘सुमन तो अपने फ्लैट पर होगी. आखिर बात क्या है?’’

पुलिस वाले ने उस से कहा, ‘‘तुम्हारे खिलाफ मोतिहारी थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई गई है. तुम्हें अभी मेरे साथ थाने चलना होगा और सुमन को भी फोन करो. उसे भी थाने चलना होगा.’’

थोड़ी देर में विनय और सुमन थाने में महिला दारोगा अंजलि के सामने बैठे थे.

अंजलि ने सुमन से सवाल किया, ‘‘क्या तुम शादीशुदा हो?’’

सुमन ने कहा, ‘‘जी, हां.’’

अंजलि ने उस से कहा, ‘‘तुम पिछले 6 महीने से अपने पति भगीरथ को धोखा दे कर इस आदमी के साथ फरार हो.’’

सुमन ने कहा, ‘‘नहीं, मैं अपनी मरजी से यहां हूं और यहीं मेरी दुकान भी है.’’

अंजलि ने कहा, ‘‘तुम्हारे पति भगीरथ ने तुम दोनों के खिलाफ थाने में एफआईआर लिखवाई है.’’

सुमन बोली, ‘‘मैडम, क्या आप मुझे यह बता सकती हैं कि भगीरथ ने जो रिपोर्ट दर्ज करवाई है, उस की बुनियाद क्या है?’’

‘‘एफआईआर के मुताबिक, तुम ने भगीरथ को धोखा दिया है. शादीशुदा होने के बावजूद तुम पिछले 6 महीने से पति को छोड़ कर इस आदमी के साथ यहां हो और भगीरथ के 5 लाख के गहने भी तुम चोरी कर के भागी हो.’’

‘‘हां, मैं शादीशुदा हूं और कानूनी रूप से भगीरथ मेरा पति है, लेकिन मैं भगीरथ के साथ न रहूं, यह कोई जुर्म तो नहीं है.

‘‘अगस्त, 2022 के सुप्रीम कोर्ट के एक जजमैंट के मुताबिक, शादीशुदा औरत अगर बिना तलाक के अपने पति से अलग रहती है, तो इस के लिए वह पूरी तरह आजाद है. ऐसे किसी औरत को कोई भी पति के साथ जबरदस्ती रहने को मजबूर नहीं कर सकता.

‘‘भगीरथ को मेरे अलग रहने से दिक्कत है, तो वह मुझे तलाक दे सकता है. मैं ने इस 6 महीने के दौरान भगीरथ से फोन पर तलाक की बात की, लेकिन वह ऐसा करने को राजी नहीं है. ऐसे में मैं क्या करूं बताइए?

‘‘मुझे भगीरथ के साथ नहीं रहना है और रही 5 लाख के गहनों की बात, तो ये गहने मेरे घर वालों ने मेरी शादी में मुझे दिए थे. इन गहनों पर भगीरथ का कोई हक नहीं है. अगर वह यह साबित कर दे कि मेरे पास जो गहने हैं, ये उस ने मुझे खरीद कर दिए हैं, तो मैं चोरी की सजा भुगतने को तैयार हूं.’’

सुमन की बात सुन कर थानेदार अंजलि समझ गई कि सुमन को कानून की अच्छी जानकारी है.

अंजलि ने कहा, ‘‘सुमन, विनय के साथ तुम्हारा क्या रिश्ता है? तुम पिछले 6 महीने से एक गैरमर्द के साथ हो… क्या यह सही है?’’

‘‘मैडम, विनय के साथ मेरा क्या रिश्ता है, यह बताने के लिए मुझे कोई भी कानून मजबूर नहीं कर सकता. मैं पिछले 6 महीने से अलग फ्लैट में रहती हूं और अगर मेरा विनय के साथ कोई रिश्ता है भी तो इस पर टिप्पणी करने का हक किसी को नहीं है.’’

अंजलि ने पूछा, ‘‘सुमन, कानून की बात छोड़ो. एक शादीशुदा औरत का किसी गैरमर्द के साथ रिलेशन बनाना क्या यह सामाजिक तौर पर सही है?’’

‘‘मैडम, हमारा समाज तो पुराने दकियानूसी रिवाजों पर चलता है. समाज औरत और मर्द को शादी के बंधन में बांध कर परंपरा की मुहर लगा देता है और शादी के बाद की जिम्मेदारियों और समस्याओं को दरकिनार कर देता है.

‘‘शादियों के नाम पर औरतों के साथ जो भी हो, समाज इस की परवाह नहीं करता. शादी के बाद औरत के साथ बुरा बरताव हो या शादी के बाद एक औरत के इनसान होने की गरिमा तारतार हो, समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता.

‘‘ऐसे समाज में हर कदम पर औरतों के लिए कई लक्ष्मण रेखाएं खींची गई हैं. मर्दों के लिए कोई रुकावट नहीं. वह औरत पर जुल्म करे तो भी वह कुसूरवार नहीं, लेकिन औरत अगर अपना रास्ता खुद तय करे, तो समाज सामने खड़ा हो जाता है. समाज की साख डूबने लगती है.

‘‘मेरी जिंदगी में विनय की क्या अहमियत है, यह मैं जानती हूं. जब मैं दरदर की ठोकरें खा रही थी, तब समाज ने मेरा साथ नहीं दिया था, बल्कि यह विनय ही था जिस ने मुझ में एक इनसान को देखा और मेरे साथ इनसानियत का रिश्ता निभाया.

‘‘आज मेरे और विनय के बीच कौन सा रिलेशन है और यह रिलेशन सही है या गलत, यह तय करने का हक सिर्फ मुझे है, समाज को नहीं.’’

सुमन की बातों को सुनने के बाद थानेदार अंजलि अपनी कुरसी छोड़ कर उठ खड़ी हुई और सुमन के करीब जा कर उस के कंधों पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘सुमन, तुम बिलकुल सही हो. अब तुम दोनों जा सकते हो.’’ Long Hindi Story

Best Hindi Story: शक

Best Hindi Story: रोमा बचपन से ले कर जवानी तक कसबे में ही पलीबढ़ी थी. जब उस का ब्याह कमल से हुआ तब वह बेहद रोमांचित थी.

कमल एक होनहार नौजवान था. उस ने राजधानी दिल्ली में एक अच्छी नौकरी पा ली थी. शादी के बाद वह रोमा को अपने साथ दिल्ली ले गया.

रोमा को दिल्ली की यह नई जिंदगी अनोखी ही लगी. एक साल तो जैसे पलक ?ापकते ही गुजर गया.

कमल सुबह 7 बजे घर से निकल जाता था और शाम के 7 बजे के बाद ही वापस घर लौट कर आता था. रोमा का एक साल तो घर को सजाने और संभालने में ही बीत गया था. उस के बाद उसे अपनी दिनचर्या में बदलाव करने की इच्छा होने लगी थी.

वैसे, कमल उस से कभी भी कुछ नहीं कहता था. उस ने रोमा पर कभी भी कोई बंधन या दबाव नहीं डाला कि वह उस की मरजी से कुछ करे.

कमल जब 27 साल का था, तो रोमा महज 23 साल की थी. वह रोमा पर जबरदस्ती कोई विचार थोपना नहीं चाहता था.

रोमा को क्राफ्ट का काम बहुत अच्छी तरह आता था. कालेज में वह अपनी सहेलियों के लिए पर्स, हैंडबैग वगैरह तैयार कर के गिफ्ट में दिया करती थी.

रोमा अब अपनी इसी कला को निखारना चाहती थी. उस ने सब से पहले आसपास के क्लब वगैरह का बारीकी से मुआयना किया. जल्दी ही उस ने 1-2 जगह की सदस्यता भी ले ली. अब वह सब से खुल कर मिलनेजुलने लगी. औरों को भी रोमा का अच्छा बरताव बहुत पसंद आया था.

रोमा ने उन को अपनी क्राफ्ट कला के बारे में बताया. वह इस हुनर में बहुत अच्छी थी, ऐसा उस की बातों से साफ महसूस होता था.

रोमा एक समूह बना कर इस काम को आगे ले जाना चाहती थी. पर्स और हैंडबैग बनाने के नए तरीके सीखने के लिए सभी उतावली हो गईं. सीखनेसिखाने का मजा ही कुछ अलग था, इसलिए रोमा का समय शानदार तरीके से गुजरने लगा. कमल को भी खुशी हुई कि रोमा अपने समय का सही इस्तेमाल कर रही है.

इसी बीच कमल का प्रमोशन हो गया. कंपनी ने तनख्वाह बढ़ाई, तो एक कमरे का यह मकान छोड़ कर कुछ दूरी पर एक फ्लैट किराए पर ले लिया. यह 8 मंजिल की एक शानदार बिल्डिंग थी. तकरीबन सारे ही फ्लैट भरे हुए थे.

रोमा और कमल के पास कम सामान था, इसीलिए शिफ्ट करना बहुत आसान था. फटाफट सब हो गया. उन के ठीक सामने वाले फ्लैट में ताला लगा था. रोमा और कमल ने सोचा कि वे शायद कहीं बाहर गए होंगे.

2 दो दिन बाद घर सैट हो गया, इसलिए रोमा और कमल ने एक शानदार पार्टी दी. पार्टी में उस ने अपने समूह की सहेलियों को भी न्योता दिया.

फ्लैट के आसपास किसी से इतनी ज्यादा जानपहचान नहीं थी, इसलिए अभी उन में से किसी को नहीं बुलाया था. सामने वाले फ्लैट की कविता एक सुबह मिली थी. वह सिंगल थी. एयरलाइंस में नौकरी करती थी, इसलिए वह बाहर ही रहती थी. वह कम बोलती थी, इसलिए रोमा और कमल ने भी खुद को सीमित ही रखा.

इस बिल्डिंग में लिफ्ट भी थी. कुलमिला कर अच्छा था यह फ्लैट. सभी सहेलियों को रोमा ने अपने बनाए हैंडबैग गिफ्ट में दिए. रोमा सचमुच हैंडबैग बनाने में माहिर थी. खानापीना हुआ. मजा ही आ गया था.

कमल ने भी सब से मेलमुलाकात की. बहुत अच्छा लगा. पार्टी के बाद जब कमल और रोमा हंसतेहंसते बाहर निकल रहे थे, तो सीढ़ी चढ़ते हुए झरनाजी ने देख लिया. वे इन सब को शकभरी नजर से देखने लगीं. रोमा ने उन का चेहरा पढ़ लिया था.

हौलेहौले सब से जानपहचान होने लगी. अब रोमा को पता लगा कि झरनाजी इस बिल्डिंग में सब से पुरानी हैं और वे किराएदार नहीं हैं. वे इस चौथी मंजिल के एक फ्लैट की मालकिन हैं. बुजुर्ग हैं, इसलिए अपनी चलाती हैं.

झरनाजी रोमा और उस की सहेलियों की खूब जासूसी करती थीं. एक दिन तो लिफ्ट के लिए इंतजार करती रोमा और उस की सहेलियों को झरनाजी ने लिफ्ट में घुसने नहीं दिया. वे बोलीं, ‘‘मेरे पास बहुत सारा सामान है. जरा रुको. बाद में जाना.’’

मगर काफी देर बाद भी लिफ्ट आई ही नहीं. रोमा समझ गई कि झरनाजी लिफ्ट को रोके हुए हैं. खैर, तीसरी मंजिल पर जाना था. वे सब सीढि़यों से चली गईं.

रोमा झरनाजी की इस हरकत को भूल गई. दरअसल, रोमा को बहुत काम करना था. अब उन का समूह ‘एंजिल ग्रुप’ के नाम से हैंडबैग बना रहा था.

कुछ दिन बाद वे लोग झुग्गी बस्ती में जा कर हैंडबैग बनाने की वर्कशौप करने वाले थे. इसी सिलसिले में रोमा के घर पर अकसर बैठक होती थी.

झरनाजी की किटी में सदस्य कम हो रहे थे. रोमा उन के जाल में फंस ही नहीं रही थी, इसलिए झरनाजी उस से मन ही मन जलने लगी थीं.

एक दोपहर रोमा और उस की सभी सखियों की मीटिंग चल रही थी कि तभी घंटी बजी.

रोमा ने दरवाजा खोला. वह हैरान रह गई. महिला पुलिस का जत्था उस के फ्लैट के बाहर था.

‘‘हमें तलाशी लेनी है. शिकायत मिली है कि इस जगह गलतसलत काम हो रहा है,’’ एक पुलिस वाली ने धमकाते हुए कहा.

रोमा ने यह सुना तो उसे चक्कर से आने लगे. वह सदमे से एकदम खामोश हो गई.

महिला पुलिस ने रोमा के फ्लैट का मुआयना किया. वहां तो क्राफ्ट का सामान, होनहार और मेहनती औरतों के सिवा कुछ न मिला.

अब तक रोमा भी होश में आ चुकी थी. महिला पुलिस ने रोमा से माफी मांगी. तब तक कमल भी वहां पहुंच
गया था.

महिला पुलिस ने कमल से भी माफी मांगी, ‘‘ये सब तो इतनी मेहनती हैं. मगर इस फोन नंबर से हमें शिकायत मिली थी कि आप के फ्लैट में गलत काम किया जा रहा है. हम सचमुच शर्मिंदा हैं कि इतनी हुनरमंद महिलाओं पर छापा मारने आ गए.’’

इतना ही नहीं, महिला पुलिस ने रोमा के ‘एंजिल ग्रुप’ के बारे में जाना. उन सब के मोबाइल नंबर लिए. उन का काम देखा और सब ने मिल कर पूरे 50 हैंडबैग खरीद कर उसी समय उन को नकद भुगतान भी कर दिया.

यह सब देख कर कमल की खुशी का ठिकाना न था. रोमा ने तो अपने हुनर के दम पर नाम कर लिया था, वह भी इतनी जल्दी.

मेहनत की कमाई के इतने सारे रुपए देख कर रोमा की सभी सहेलियां भी खुशी से झूम उठीं. पुलिस की सभी महिला सदस्य उन की बारबार तारीफ करते हुए वापस लौट गईं.

अब कमल ने वह नंबर चैक किया, जिस नंबर से महिला पुलिस को शिकायत की गई थी. यह नंबर ?ारनाजी का था.

‘‘ओह, यानी झरनाजी की इतनी गिरी हुई हरकत,’’ कमल और रोमा हैरान थे.

कुछ देर बाद सभी सहेलियां चली गईं. शाम हो गई थी. कमल लौट कर दफ्तर नहीं गया. उस ने बाकी का सारा काम घर से ही किया.

रोमा का मन कुछ उदास था. वह सोच रही थी कि झरनाजी को आखिर ऐसा करने की क्या सूझा.

मगर कमल ने रोमा को दिलासा दिया और कहा, ‘‘इस में फायदा तो तुम को ही मिला. नाम का नाम हुआ, दाम भी हाथोंहाथ मिला. आगे का रास्ता भी बन गया.’’

‘‘ओह हां, सचमुच कमल. झरनाजी की चाल तो उलटी पड़ गई,’’ रोमा की आंखों में तो उस के हुनर का आत्मविश्वास झलक रहा था.

उधर झरनाजी शर्म के मारे बिल्डिंग में किसी को अपना मुंह तक नहीं दिखा पा रही थीं. Best Hindi Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें