Hindi Kahani: रज्जो – क्या था सुरेंद्र और माधवी का प्लान

Hindi Kahani: रज्जो रसोईघर का काम निबटा कर निकली, तो रात के 10 बज रहे थे. वह अपने कमरे में जाने से पहले सुरेंद्र के कमरे में पहुंची. वह उस समय बिस्तर पर आंखें बंद किए लेटा था.

‘‘साहबजी, मैं कमरे पर सोने जा रही हूं. कुछ लाना है तो बताइए?’’ रज्जो ने सुरेंद्र की ओर देखते हुए पूछा.

सुरेंद्र ने आंखें खोलीं और अपने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रज्जो, आज सिर में बहुत दर्द हो रहा है.’’

‘‘मैं आप के माथे पर बाम लगा कर दबा देती हूं,’’ रज्जो ने कहा और अलमारी में रखी बाम की शीशी ले आई. वह सुरेंद्र के माथे पर बाम लगा कर सिर दबाने लगी.

कुछ देर बाद रज्जो ने पूछा, ‘‘अब कुछ आराम पड़ा?’’

‘‘बहुत आराम हुआ है रज्जो, तेरे हाथों में तो जादू है,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने अपना सिर रज्जो की गोद में रख दिया.

रज्जो सिर दबाने लगी. वह महसूस कर रही थी कि एक हाथ उस की कमर पर रेंग रहा है. उस ने सुरेंद्र की ओर देखा. सुरेंद्र बोला, ‘‘रज्जो, यहां रहते हुए तू किसी बात की चिंता मत करना. तुझे किसी चीज की कमी नहीं रहेगी. जब कभी जितने रुपए की जरूरत पड़े, तो बता देना.’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘आज तेरी मैडम लखनऊ गई हैं. वहां जरूरी मीटिंग है. 4 दिन बाद वापस आएंगी,’’ कह कर सुरेंद्र ने उसे अपनी ओर खींच लिया.

रज्जो समझ गई कि सुरेंद्र की क्या इच्छा है. वह बोली, ‘‘नहीं साहबजी, ऐसा न करो. मुझे तो मां काका ने आप की सेवा करने के लिए भेजा है.’’

‘‘रज्जो, यह भी तो सेवा ही है. पता नहीं, आज क्यों मैं अपनेआप पर काबू नहीं रख पा रहा हूं?’’ सुरेंद्र ने रज्जो की ओर देखते हुए कहा.

‘‘साहबजी, अगर मैडम को पता चल गया तो?’’ रज्जो घबरा कर बोली.

‘‘उस की चिंता मत करो. वह कुछ नहीं कहेगी.’’

रज्जो मना नहीं कर सकी और न चाहते हुए भी सुरेंद्र की बांहों समा गई.

कुछ देर बाद जब रज्जो अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटी, तो उस की आंखों से नींद भाग चुकी थी. उस की आंखों के सामने मांकाका, 2 छोटी बहनों व भाई के चेहरे नाचने लगे.

यहां से 3 सौ किलोमीटर दूर रज्जो का गांव चमनपुर है. काका राजमिस्त्री का काम करता है. महीने में 10-15 दिन मजदूरी पर जाता है, क्योंकि रोजाना काम नहीं मिलता.

रज्जो तो 5 साल पहले 10वीं जमात पास कर के स्कूल छोड़ चुकी थी. उस की 2 छोटी बहनें व भाई पढ़ रहे थे. मां ने उस का नाम रजनी रखा था, पर पता नहीं, कब वह रजनी से रज्जो बन गई.

एक दिन गांव की प्रधान गोमती देवी ने मां को बुला कर कहा था, ‘मुझे पता चला है कि तेरी बेटी रज्जो तेरी तरह बहुत बढि़या खाना बनाती है. तू उसे सुबह से शाम तक के लिए मेरे घर भेज दे.’

‘ठीक है प्रधानजी, मैं रज्जो को भेज दूंगी,’ मां ने कहा था.

2 दिन बाद रज्जो ने गोमती प्रधान के घर की रसोई संभाल ली थी. एक दिन एक बड़ी सी कार गोमती प्रधान के घर के सामने रुकी. कार से सुरेंद्र व उस की पत्नी माधवी मैडम उतरे. कार पर लाल बत्ती लगी थी. गोमती प्रधान की दूर की रिश्तेदारी में माधवी मैडम बहन लगती थीं.

दोपहर का खाना खा कर सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को बुला कर कहा, ‘तुम बहुत अच्छा खाना बनाती हो. हमें तुम जैसी लड़की की जरूरत है. क्या तुम हमारे साथ चलोगी? जैसे तुम यहां खाना बनाती हो, वैसा ही तुम्हें वहां भी रसोई में काम करना है.’

रज्जो चुप रही.

गोमती प्रधान बोल उठी थीं. ‘यह क्या कहेगी? इस के मांकाका को कहना पड़ेगा.’

कुछ देर बाद ही रज्जो के मांकाका वहां आ गए थे.

गोमती प्रधान बोलीं, ‘रामदीन, यह मेरी बहन है. सरकार में एक मंत्री की तरह हैं. इस को रज्जो के हाथ का बना खाना बहुत पसंद आया, तो ये लोग इसे अपने घर ले जाना चाहते हैं रसोई के काम के लिए.’

‘रामदीन, बेटी रज्जो को भेज कर बिलकुल चिंता न करना. हम इसे पूरा लाड़प्यार देंगे. रुपएपैसे हर महीने या जब तुम चाहोगे भेज देंगे,’ माधवी मैडम ने कहा था.

‘साहबजी, आप जैसे बड़े आदमी के यहां पहुंच कर तो इस की किस्मत ही खुल जाएगी. यह आप की सेवा खूब मन लगा कर करेगी. यह कभी शिकायत का मौका नहीं देगी,’ काका ने कहा था.

सुरेंद्र ने जेब से कुछ नोट निकाले और काका को देते हुए कहा, ‘लो, फिलहाल ये पैसे रख लो. हम लोग हर तरह  से तुम्हारी मदद करेंगे. यहां से लखनऊ तक कोई भी सरकारी या गैरसरकारी काम हो, पूरा करा देंगे. अपनी सरकार है, तो फिर चिंता किस बात की.’

रज्जो उसी दिन सुरेंद्र व माधवी के साथ इस कसबे में आ गई थी.

सुरेंद्र की बहुत बड़ी कोठी थी, जिस में कई कमरे थे. एक कमरा उसे भी दे दिया गया था. माधवी मैडम ने उस को कई सूट खरीद कर दिए थे. उसे एक मोबाइल फोन भी दिया था, ताकि वह अपने घरपरिवार से बात कर सके.

रज्जो को पता चला था कि सुरेंद्र की काफी जमीनजायदाद है. एक ही बेटा है, जो बेंगलुरु में पढ़ाई कर रहा है. माधवी मैडम बहुत बिजी रहती हैं. कभी पार्टी मीटिंग में, तो कभी इधरउधर दूसरे शहरों में और कभी लखनऊ में. इन्हीं विचारों में डूबतेतैरते रज्जो को नींद आ गई थी.

अगले दिन सुरेंद्र ने रज्जो को कमरे में बुला कर कुछ गोलियां देते हुए कहा, ‘‘रज्जो, ये गोलियां तुझे खानी हैं. रात जो हुआ है, उस से तेरी सेहत को नुकसान नहीं होगा.’’ ‘‘जी…’’ रज्जो ने वे गोलियां देखीं. वह जान गई कि ये तो पेट गिराने वाली गोलियां हैं.

‘‘और हां रज्जो, कल अपने घर ये रुपए मनीऔर्डर से भेज देना,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने 5 हजार रुपए रज्जो को दिए.

‘‘इतने रुपए साहबजी…?’’ रज्जो ने रुपए लेते हुए कहा.

‘‘अरे रज्जो, ये रुपए तो कुछ भी नहीं हैं. तू हम लोगों की सेवा कर रही है न, इसलिए मैं तेरी मदद करना चाहता हूं.’’

रज्जो सिर झुका कर चुप रही.

सुरेंद्र ने ज्जो का चेहरा हाथ से ऊपर उठाते हुए कहा, ‘‘तुझे कभी अपने गांव जाना हो, तो बता देना. ड्राइवर और गाड़ी भेज दूंगा.’’

सुन कर रज्जो बहुत खुश हुई.

‘‘रज्जो, तू मुझे इतनी अच्छी लगती है कि अगर मैडम की जगह मैं मंत्री होता, तो तुझे अपना पीए बना लेता,’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘रहने दो साहबजी, मुझे ऐेसे सपने न दिखाओ, जो मैं रोटी बनाना ही भूल जाऊं.’’

‘‘रज्जो, तू नहीं जानती कि मैं तेरे लिए क्या करना चाहता हूं,’’ सुरेंद्र ने कहा.

खुशी के चलते रज्जो की आंखों की चमक बढ़ गई.

4 दिन बाद माधवी मैडम घर लौटीं. इस बीच हर रात को सुरेंद्र रज्जो को अपने कमरे में बुला लेता और रज्जो भी पहुंच जाती, उसे खुश करने के लिए.

अगले दिन रज्जो एक कमरे के बराबर से निकल रही थी, तो सुरेंद्र व माधवी की बातचीत की आवाज आ रही थी. वह रुक कर सुनने लगी.

‘‘कैसी लगी रज्जो?’’ माधवी ने पूछा.

‘‘ठीक है, बढि़या खाना बनाती है,’’ सुरेंद्र का जवाब था.

‘‘मैं रसोई की नहीं, बैडरूम की बात कर रही हूं. मैं जानती हूं कि रज्जो ने इन रातों में कोई नाराजगी का मौका नहीं दिया होगा.’’

‘‘तुम्हें क्या रज्जो ने कुछ बताया है?’’

‘‘उस ने कुछ नहीं बताया. मैं उस के चेहरे व आंखों से सच जान चुकी हूं.

‘‘खैर, मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. तुम कहा करते थे कि मैं बाहर चली जाती हूं, तो अकेले रात नहीं कटती, इसलिए ही तो रज्जो को इतनी दूर से यहां लाई हूं, ताकि जल्दी से वापस घर न जा सके.’’

‘‘तुम बहुत समझदार हो माधवी…’’ सुरेंद्र ने कहा, ‘‘लखनऊ में तुम्हारे नेताजी के क्या हाल हैं? वह तो बस तुम्हारा पक्का आशिक है, इसलिए ही तो उस ने तुम्हें लाल बत्ती दिला दी है.’’

‘‘इस लाल बत्ती के चलते हम लोगों का कितना रोब है. पुलिस या प्रशासन में भला किस अफसर की इतनी हिम्मत है, जो हमारे किसी भी ठीक या गलत काम को मना कर दे.’’

‘‘नेताजी का बस चले तो वह तुम्हें लखनऊ में ही हमेशा के लिए बुला लें.’’

‘‘अगले हफ्ते नेताजी जनपद में आ रहे हैं. रात को हमारे यहां खाना होगा. मैं ने सोचा है कि नेताजी की सेवा में रात को रज्जो को उन के पास भेज दूंगी.

‘‘जब नेताजी हमारा इतना खयाल रखते हैं, तो हमारा भी तो फर्ज बनता है कि नेताजी को खुश रखें. अगले महीने रज्जो को लखनऊ ले जाऊंगी, वहां 2-3 दूसरे नेता हैं, उन को भी खुश करना है,’’ माधवी ने कहा.

सुनते ही रज्जो के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. वह चुपचाप रसोई में जा पहुंची. उस ने तो साहब को ही खुश करना चाहा था, पर ये लोग तो उसे नेताओं के पास भेजने की सोच बैठे हैं. वह ऐसा नहीं करेगी. 1-2 दिन बाद ही वह अपने गांव चली जाएगी.

तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. वह बोली, ‘‘हैलो…’’

‘‘हां रज्जो बेटी, कैसी है तू?’’ उधर से काका की आवाज सुनाई दी.

काका की आवाज सुन कर रज्जो का दिल भर आया. उस के मुंह से आवाज नहीं निकली और वह सुबकने लगी.

‘‘क्या हुआ बेटी? बता न? लगता है कि तू वहां बहुत दुखी है. पहले तो तू साहब व मैडम की बहुत तारीफ किया करती थी. फिर क्या हो गया, जो तू रो रही है?’’

‘‘काका, मैं गांव आना चाहती हूं.’’

‘‘ठीक है रज्जो, मेरा 2 दिन का काम और है. उस के बाद मैं तुझे लेने आ जाऊंगा. मैं जानता हूं कि मैडम व साहब बहुत अच्छे लोग हैं. तुझे भेजने को मना नहीं करेंगे. तू हमारी चिंता न करना. यहां सब ठीक है. तेरी मां, भाईबहनें सब मजे में हैं,’’ काका ने कहा.

रज्जो चुप रही. अगले दिन सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को कमरे में बुलाया. सुरेंद्र ने कहा, ‘‘रज्जो, 4-5 दिन बाद लखनऊ से बहुत बड़े नेताजी आ रहे हैं. यह हमारा सौभाग्य है कि वे हमारे यहां खाना खाएंगे और रात को आराम भी यहीं करेंगे.’’

‘‘जी…’’ रज्जो के मुंह से निकला.

‘‘रात को तुम्हें नेताजी की सेवा करनी है. उन को खुश करना है. देखना रज्जो, अगर नेताजी खुश हो गए तो…’’ माधवी की बात बीच में ही अधूरी रह गई.

रज्जो एकदम बोल उठी, ‘‘नहीं मैडमजी, यह मुझ से नहीं होगा. यह गलत काम मैं नहीं करूंगी.’’

‘‘और मेरे पीठ पीछे साहबजी के साथ रात को जो करती रही, क्या वह गलत काम नहीं था?’’

रज्जो सिर झुकाए बैठी रही, उस से कोई जवाब नहीं बन पा रहा था.

‘‘रज्जो, तू हमारी बात मान जा. तू मना मत कर,’’ सुरेंद्र बोला.

‘‘साहबजी, ये नेताजी आएंगे, इन को खुश करना है. फिर कुछ नेताओं को खुश करने के लिए मुझे मैडमजी लखनऊ ले कर जाएंगी. मैं ने आप लोगों की बातें सुन ली हैं. मैं अब यह गलत काम नहीं करूंगी. मैं अपने घर जाना चाहती हूं. 2 दिन बाद मेरे काका आ रहे हैं,’ रज्जो ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा.

‘‘अगर हम तुझे गांव न जाने दें तो…?’’ माधवी ने कहा.

‘‘तो मैं थाने जा कर पुलिस को और अखबार के दफ्तर में जा कर बता दूंगी कि आप लोग मुझ से जबरदस्ती गलत काम कराना चाहते हैं,’’ रज्जो ने कड़े शब्दों में कहा.

रज्जो के बदले तेवर देख कर सुरेंद्र ने कहा, ‘‘ठीक है रज्जो, हम तुझ से कोई काम जबरदस्ती नहीं कराएंगे. तू अपने काका के साथ गांव जा सकती है,’’ यह कह कर सुरेंद्र ने माधवी की ओर देखा. उसी रात सुरेंद्र ने रज्जो की गला दबा कर हत्या कर दी और ड्राइवर से कह कर रज्जो की लाश को नदी में फिंकवा दिया. दिन निकलने पर इंस्पैक्टर को फोन कर के कोठी पर बुला लिया.

‘‘कहिए हुजूर, कैसे याद किया?’’ इंस्पैक्टर ने आते ही कहा.

‘‘हमारी नौकरानी रजनी उर्फ रज्जो घर से एक लाख रुपए व कुछ जेवरात चुरा कर भाग गई है.’’

‘‘सरकार, भाग कर जाएगी कहां वह? हम जल्द ही उसे पकड़ लेंगे,’’ इंस्पैक्टर ने कहा और कुछ देर बाद चला गया.

दोपहर बाद रज्जो का काका रामदीन आया. सुरेंद्र ने उसे देखते ही कहा, ‘‘अरे ओ रामदीन, तेरी रज्जो तो बहुत गलत लड़की निकली. उस ने हम लोगों से धोखा किया है. वह हमारे एक लाख रुपए व जेवरात ले कर कल रात कहीं भाग गई है.’’

‘‘नहीं हुजूर, ऐसा नहीं हो सकता. मेरी रज्जो ऐसा नहीं कर सकती,’’ घबरा कर रामदीन बोला.

‘‘ऐसा ही हुआ है. वह यहां से चोरी कर के भाग गई है. जब वह गांव में अपने घर पहुंचे तो बता देना. थाने  मेंरिपोर्ट लिखा दी है. पुलिस तेरे घर भी पहुंचेगी.

‘‘अगर तू ने रज्जो के बारे में न बताया, तो पुलिस तुम सब को उठा कर जेल भेज देगी.

‘‘और सुन, तू चुपचाप यहां से भाग जा. अगर पुलिस को पता चल गया कि तू यहां आया है, तो पकड़ लिया जाएगा.’’

यह सुन कर रामदीन की आंखों में आंसू आ गए. रज्जो के लिए उस के दिल में नफरत बढ़ने लगी. वह रोता हुआ बोला, ‘‘रज्जो, यह तू ने अच्छा नहीं  किया. हम ने तो तुझे यहां सेवा करने के लिए भेजा था और तू चोर बन गई.’’

रामदीन रोतेरोते थके कदमों से कोठी से बाहर निकल गया.

Hindi Story: हमसफर – क्या रेहान अपनी पत्नी की जान बचा पाया?

Hindi Story: रेहान ने तेल टैंकर की साइड वाली सीढ़ी से झुकते हुए अपने 2 साल के मासूम बेटे रेहम को गट्ठर की तरह खींच कर टैंकर की छत पर रख दिया, जिसे उस की बीवी रुखसार ने उठा रखा था. फिर रुखसार को बाजुओं में उठा कर सीढ़ी तक पहुंचाया, जो 7 महीने के पेट से थी.

रुखसार ने सीढ़ी के डंडे को कस कर पकड़ा और ऊपर चढ़ने लगी कि अचानक उस का पैर फिसल गया. गनीमत यह रही कि उस के दोनों हाथ सीढ़ी के डंडों पर मजबूती से जमे हुए थे और रेहान वहां से हटा नहीं था, वरना वह सीधे जमीन पर आ गिरती. फिर भी पेट पर कुछ चोट आ ही गई.

लौकडाउन में जब से कुछ ढील मिली थी, तब से मजदूरों का पलायन जोरों पर था. रेहान और उस के बीवीबच्चे दिल्ली के सीलमपुर इलाके में सिलाई का काम करते थे. कोरोना महामारी के चलते पिछले 2 महीने से काम बंद था. एक महीना अपनी कमाई से गुजरबसर हुआ, तो दूसरे महीने का खर्च फैक्टरी मालिक ने उठाया. उस के बाद फैक्टरी मालिक ने भी हाथ खड़े कर दिए.

रमजान का महीना चल रहा था और ईद का त्योहार सिर पर था, इसलिए घर जाना जरूरी भी था. कोई रास्ता न देख कर उन्होंने अपना बोरियाबिस्तर समेटा और गांव के लिए निकल पड़े. रास्ते में 4-5 मजदूर और साथ हो लिए.

वे सब सीलमपुर इलाके से पैदल चल कर नोएडा पहुंचे. वहां से आगे जाने के लिए कोई सवारी नहीं थी. मजदूरों ने एक तेल टैंकर के ड्राइवर से गुजारिश की, तो वह ले जाने को तैयार हुआ.

ड्राइवर ने बताया कि वह बरेली तक जा रहा है, वहां तक उन्हें छोड़ देगा. फिर कुल 8 मजदूर टैंकर की छत पर बैठे और खड़ी धूप से नजरें मिलाते हुए अपनी मंजिल की तरफ चल पड़े.

मुरादाबाद के एक चौराहे पर सत्तू पीने के लिए ड्राइवर ने टैंकर रोका. रेहान, उस की बीवी रुखसार और बच्चे रेहम को छोड़ कर बाकी सभी मजदूर सत्तू पीने के लिए उतर गए. वे दोनों मियांबीवी मन मसोस कर टैंकर की छत पर ही बैठे रहे.

तभी वहां मनोज की साइकिल रुकते देख रुखसार का चेहरा खिल उठा. उस ने चहकते हुए कहा, ‘‘अरे, वह देखो मनोज भैया.’’

रेहान ने मनोज को देख कर बस की छत से हांक लगाते हुए कहा, ‘‘ओ मनोज भाई. अरे, कहां रह गए थे. 2 दिन से अभी यहीं लटके हैं…’’

मनोज भी वहीं काम करता था, जहां रेहान करता था. लौकडाउन लगते ही मनोज के सेठ ने उस का हिसाब कर दिया, जिस में मनोज को 5,000 रुपए मिले. उन रुपए में से 3,500 रुपए की उस ने साइकिल खरीदी और इन लोगों से 2 दिन पहले ही अपने घर के लिए 1,100 किलोमीटर के लंबे सफर पर निकल पड़ा था.

मनोज ने गमछे से मुंह पोंछते हुए रेहान के सवाल का मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘हां भाई. यह कोई हवाईजहाज थोड़ी है, साइकिल है साइकिल, जिसे खून जला कर चलाना पड़ता है. उतरो नीचे, सत्तू पीया जाए.’’

रेहान बोला, ‘‘न भाई, रहने दो, तुम पीयो, हम लोग ऐसे ही ठीक हैं.’’

मनोज रेहान की मजबूरी समझता था. उस ने कहा, ‘‘अरे, क्या खाक ठीक है. उतरो नीचे.’’

रेहान बोला, ‘‘पर, रेहम और रुखसार…’’

‘‘उन के लिए ऊपर ही पहुंचा देते हैं. पहले तुम तो नीचे उतरो.’’

रेहान टैंकर की छत से नीचे उतर आया.

मनोज ने सत्तू वाले से 4 गिलास सत्तू बनाने के लिए कहा.

रेहान बोला, ‘‘अरे, रेहम पूरा गिलास थोड़ी ही पी पाएगा. 3 गिलास ही रहने दो. वह अपनी अम्मी में से पी लेगा.’’

सत्तू वाले ने 2 गिलास उन लोगों की  तरफ बढ़ाए.

मनोज बोला, ‘‘चलो, ऊपर रुखसार को बढ़ाओ. रेहम के गिलास में से जो बचेगा, वह उस की अम्मी पी लेगी. बेचारी, एक तो बच्चे को दूध पिलाती है, ऊपर से पेट में बच्चा भी पल रहा है. कायदे से तो अकेले उस के लिए  ही 3 गिलास चाहिए, लेकिन क्या  किया जाए…

बहरहाल, सत्तू पीने के बाद मनोज बोला, ‘‘इस हालत में रुखसार को ले जाना और वह भी टैंकर की छत पर बैठा कर, बिलकुल ठीक नहीं.’’

रेहान बोला, ‘‘क्या करें भाई, दिल्ली में भी तो मरना ही था. खानेपीने के लाले पड़ रहे थे. अगर ईद का त्योहार न होता, तो कुछ दिन और रुक कर देखते. अब निकल गए हैं, आगे जो रब की मरजी.’’

अभी इन दोनों में बातचीत चल ही रही थी कि पुलिस वाले वहां आ धमके. 10-12 मजदूरों को इकट्ठा देखते ही उन की पुलिसिया ट्रेनिंग उफान मारने लगी और वे लगे ताबड़तोड़ लाठियां भांजने.

फिर क्या था, सब से पहले मनोज साइकिल पर सवार हो कर भाग खड़ा हुआ, फिर टैंकर के ड्राइवरखलासी भी भागे और छत पर बैठने वाले मुसाफिर भी.

आगेआगे मनोज की साइकिल और पीछे से घबराया हुआ टैंकर का ड्राइवर. उसे कुछ सुझाई नहीं दिया. मनोज रोड के दाएं से बाएं की तरफ मुड़ा ही था कि टैंकर उस पर चढ़ बैठा.

टैंकर की छत से रुखसार और रेहान ने मनोज को सड़क पर गिर कर तड़पते हुए देख लिया और चिल्लाने लगे. लेकिन ड्राइवर कहां रुकने वाला था. वह अपनी जान बचा कर भागता चला गया.

ये दोनों शौहरबीवी भी कहां मानने वाले थे, वे तब तक चिल्लाते रहे, जब तक ड्राइवर ने टैंकर रोक कर उन्हें उतार नहीं दिया.

फिर यह कुछ कहसुन पाते, इस के पहले ही टैंकर नौ दो ग्यारह हो गया.

रेहान और रुखसार अपने बच्चे और सामान से भरे 2 बैग समेत हादसे की जगह की तरफ दौड़ने लगे. तभी एक पुलिस की गाड़ी उन के पास आ कर रुकी और माजरा पूछा. फिर उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाया और हादसे की तरफ चल पड़े.

जब तक वे लोग वहां पहुंचे, तब तक मनोज मर चुका था. रुखसार रोने लगी. उस की चीखें सुन कर अगलबगल में खड़े लोग भी आंखें पोंछने लगे. ऐसा लग रहा था कि मरने वाला मनोज उस का सगा भाई है.

फिर शुरू हुई लाश को ठिकाने लगाने की लंबी प्रक्रिया. अनजान जगह और अनजान लोग. साथ में मासूम बच्चा और भूखप्यास की जबरदस्त शिद्दत. लाश को कोई हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं.

फिर भी दोनों शौहरबीवी ने हार नहीं मानी और पुलिस वालों, आनेजाने वालों और गांव वालों से चंदा और मदद ले कर मनोज का अंतिम संस्कार कर दोस्ती और इनसानियत का हक अदा किया.

अब इन के पैसे और हिम्मत दोनों ही जवाब दे चुके थे. इस बीच रुखसार अपने पेट में उठ रहे मीठेमीठे दर्द को दबाती रही. अब वहां से घर जाने की समस्या और भी गंभीर लगने लगी. चंद पैसे पास बचे थे, उन से बेटे के लिए दूध और बिसकुट खरीदा और रोते हुए रेहम को चुप कराया.

रात हो चुकी थी. गांव वालों ने कोरोना के डर से उन्हें पनाह देने से इनकार कर दिया. कहां जाएं? किस से मदद मांगें? आखिर थकहार कर वे बेचारे एक पेड़ के नीचे सो गए.

अगली सुबह एक और मुसीबत साथ ले कर आई. रुखसार दर्द से कराहने लगी. सलवार खून से सन गई. पैरों में खड़े होने की ताकत नहीं रही. उसे लगने लगा कि पेट में पल रहे बच्चे को नुकसान हो चुका है.

रुखसार की बोली लड़खड़ाने लगी. रेहान समझ रहा था कि रुखसार कहना कुछ चाह रही है और जबान से कुछ और निकल रहा है.

बड़ी मुश्किल से किसी तरह सरकारी अस्पताल पहुंचे. वहां डाक्टरों ने बाहरी के नाम पर उन्हें टरकाना चाहा, लेकिन रेहान उन के पैरों पर गिर कर रहम की भीख मांगने लगा. डाक्टरों ने सैकड़ों तरह के सवालजवाब और जांचपड़ताल के बाद रुखसार को कोरोना पौजिटिव ठहराया.

रुखसार की हालत बिगड़ती जा रही थी. डाक्टरों ने 4 यूनिट खून का इंतजाम करने के लिए कहा. रेहान समझ गया कि कुदरत की यही आखिरी आजमाइश है, जिस में वे खरा नहीं उतर सकता. उस ने डाक्टरों से कहा कि वे उस के बदन से खून का एकएक कतरा निचोड़ लें और उस की रुखसार को बचा लें. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

रुखसार ने दाएं हाथ में शौहर का हाथ थामा और बाएं हाथ में रेहम का. वह रेहम की मासूम सूरत को एकटक निहारने लगी. ऐसा लग रहा था कि वह अपने लख्ते जिगर को जीभर कर निगाहों में बसा लेना चाहती थी.

उधर रेहान अपनी हमसफर को जीभर के देख लेना चाहता था जो बीच सफर में ही उस का साथ छोड़ कर जा रही थी. रेहम अभी भी अपनी मां के जिस्म में दूध तलाश कर रहा था.

रेहान रुखसार की पथराई आंखों की तपिश बरदाश्त नहीं कर सका और गश खा कर वहीं गिर पड़ा. लेकिन इन सब बातों से बेखबर रेहम अपनी मां का दूध हुमड़हुमड़ कर खींच रहा था.

Hindi Story : बदल गया जीने का नजरिया

Hindi Story: सुरेश भी अकसर बिना किसी बात के उस से चिड़चिड़ा कर बोल पड़ता था. कभीकभार तो मीना के ऊपर उस का इतना गुस्सा फूटता कि अगर चाय का कप हाथ में होता तो उसे दीवार पर दे मारता. ऐसे ही कभी खाने की थाली उठा कर फेंक देता. इस तरह गुस्से में जो सामान हाथ लगता, वह उसे उठा कर फेंकना शुरू कर देता. इस से आएदिन घर में कोई न कोई नुकसान तो होता ही, साथ ही घर का माहौल भी खराब होता.

ऐसे में मीना को सब से ज्यादा फिक्र अपने 2 मासूम बच्चों की होती. वह अकसर सोचती कि इन सब बातों का इन मासूमों पर क्या असर होगा? यही सब सोच कर वह अंदर ही अंदर घुटते हुए चुपचाप सबकुछ सहन करती रहती.

मीना अपनेआप पर हमेशा कंट्रोल रखती कि घर में झगड़ा न बढ़े, पर ऐसा कम ही हो पाता था. आजकल सुरेश भी औफिस से ज्यादा लेट आने लगा था.

जब भी मीना लेट आने की वजह पूछती तो उस का वही रटारटाया जवाब मिलता, ‘‘औफिस में बहुत काम था, इसलिए आने में देरी हो गई.’’

एक दिन मीना की सहेली सोनिया उस से मिलने आई. तब मीना का मूड बहुत खराब था. सोनिया के सामने वह झूठमूठ की मुसकराहट ले आई थी, इस के बावजूद सोनिया ने मीना के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफसाफ पढ़ ली थीं.

मीना ने सोनिया को कुछ भी नहीं बताया और अपनेआप को उस के सामने सामान्य बनाए रखने की कोशिश करती रही थी. कभी उस का मन कहता कि वह सोनिया को अपनी समस्या बता दे, लेकिन फिर उस का मन कहता कि घर की बात बाहर नहीं जानी चाहिए. हो सकता है, सोनिया उस की समस्या सुन कर खिल्ली उड़ाए या फिर इधरउधर कहती फिरे.

अगले दिन जब मीना बस से कहीं जा रही थी कि तभी उस की नजर उस बस में चिपके एक इश्तिहार पर अटक गई. उस इश्तिहार में किसी बाबा द्वारा हर समस्या जैसे सौतन से छुटकारा, गृहक्लेश, व्यापार में घाटे से उबरने का उपाय, कोई ऊपरी चक्कर, प्रेमविवाह, किसी को वश में करने का हल गारंटी के साथ दिया गया था.

बाबा का इश्तिहार पढ़ते ही मीना के मन में अपने गृहक्लेश से छुटकारा पाने की उम्मीद जाग गई थी. उस ने जल्दी से अपना मोबाइल फोन निकाला और बाबा के उस इश्तिहार में दिया गया एक नंबर सेव कर लिया.

घर पहुंचते ही मीना ने बाबा को फोन किया और फिर उस ने अपनी सारी समस्याएं उन के सामने उड़ेल कर रख दीं.

दूसरी तरफ से बाबा की जगह उन का कोई चेला बात कर रहा था. उस ने कहा कि आप दरबार में आ जाइए, सब ठीक हो जाएगा. उस ने यह भी कहा कि बाबा के दरबार से कोई भी निराश नहीं लौटता है. उस ने उसी समय मीना को एक अपौइंटमैंट नंबर भी दे दिया था. मीना अब बिलकुल भी देर नहीं करना चाहती थी. वह सुरेश को पहले जैसा खुश देखना चाहती थी.

जब दूसरे दिन मीना बाबा के पास पहुंची और अपनी सारी समस्याएं उन्हें बताईं, तब बाबा ने बुदबुदाते हुए कहा, ‘‘आप के पति पर किसी ने कुछ करवा दिया है.’’

मीना हैरान होते हुए बाबा से पूछ बैठी, ‘‘पर, किस ने क्या करवा दिया है? हमारी तो किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं है… बाबाजी, ठीकठीक बताइए… क्या बात है?’’

इस पर बाबा दोबारा बोले, ‘‘आप के पति का किसी पराई औरत के साथ चक्कर है और उस औरत ने ही शर्तिया आप के पति पर कुछ करवाया है. आप के पति को उस से छुटकारा पाना होगा.’’

बाबा की बातों से मीना के मन में अचानक सुरेश की चिड़चिड़ाहट की वजह समझ आ गई.

मीना बोली, ‘‘बाबाजी, आप ही कोई उपाय बताएं… ठीक तो हो जाएंगे न

मेरे पति?’’

मीना की उलझन के जवाब में बाबा ने कहा, ‘‘ठीक तो हो जाएंगे, लेकिन इस के लिए पूजा करानी होगी और उस के बाद मैं एक तावीज बना कर दूंगा. वह तावीज रात को पानी में भिगो कर रखना होगा और अगली सुबह मरीज को बिना बताए चाय में वह पानी मिला कर

मरीज को पिलाना होगा. यह सब तकरीबन 2 महीने तक करना होगा.

‘‘मैं एक भभूत भी दूंगा जिसे उस औरत को खिलाना होगा, जिस ने आप के पति को अपने वश में कर रखा है.’’

बाबा की बातों से मीना का दिल बैठ गया था. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि सुरेश उस के साथ बेवफाई कर सकता है.

इसी बीच बाबा ने एक कागज पर उर्दू में कुछ लिख कर उस का तावीज बना कर भभूत के साथ मीना को दिया और कहा, ‘‘मरीज को बिना बताए ही तावीज का पानी उसे पिलाना है और यह भभूत उस औरत को खिलानी है. अगर उस औरत को एक बार भी भभूत खिला दी गई तो वह हमेशा के लिए तेरे पति को छोड़ कर चली जाएगी.’’

मीना ये सब बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी. वह सुरेश को फिर से पहले की तरह वापस पाना चाहती थी. उसे बाबा पर पूरा भरोसा था कि वे उस के पति को एकदम ठीक कर देंगे.

उस रात मीना बिस्तर पर करवटें बदलती रही. उस की नींद छूमंतर

हो चुकी थी. उस को बारबार यही खयाल आता, ‘कहीं उस औरत के चक्कर में सुरेश ने मुझे छोड़ दिया तो मैं क्या करूंगी? कैसे रह पाऊंगी उस के बगैर?’

यह सब सोचसोच कर उस का दिल बैठा जा रहा था. फिर वह अपनेआप को मन ही मन मजबूत करती और सोचती कि वह भी हार नहीं मानने वाली.

इस के बाद मीना यह सोचने लग गई कि तावीज का पानी तो वह सुरेश को पिला देगी, पर उस औरत को ढूंढ़ कर उसे भभूत कैसे खिलाएगी? वह तो उस औरत को जानती तक नहीं है. यह काम उसे बहुत मुश्किल लग रहा था.

सुबह उठते ही मीना ने सब से पहले सुरेश के लिए चाय बनाई और उस में तावीज वाला पानी डाल दिया.

इस के बाद मीना सोफे पर पसर गई. बैठेबैठे वह फिर सोचने लगी कि उस औरत को कैसे ढूंढ़े, जबकि उस ने तो आज तक ऐसी किसी औरत की कल्पना तक नहीं की है?

मीना ने आज जानबूझ कर सुरेश का लंच बौक्स उस के बैग में नहीं रखा था, जिस से लंच बौक्स देने का बहाना बना कर वह उस के औफिस जा सके और उस की जासूसी कर सके.

सुरेश के औफिस जाने के बाद मीना भी उस के औफिस के लिए निकल पड़ी.

औफिस में जा कर मीना सब से पहले चपरासी से मिली और घुमाफिरा कर सुरेश के बारे में पूछने लगी.

चपरासी ने बताया, ‘‘सुरेश सर तो बहुत भले इनसान हैं. वे और उन की सैक्रेटरी रीता पूरे समय काम में लगे रहते हैं.’’

जब मीना ने चपरासी से सुरेश से मिलवाने को कहा, तब उस ने मीना को अंदर जाने से रोकते हुए कहा, ‘‘अभी सर और रीता मैडम कुछ जरूरी काम कर रहे हैं. आप कुछ देर बाद मिलने जाइएगा.’’

मीना को दाल में काला नजर आने लगा. अब तो उस का पूरा शक सैक्रेटरी रीता पर ही जाने लगा. उसे रीता पर गुस्सा भी आ रहा था लेकिन अपने गुस्से पर काबू करते हुए वह कुछ देर के लिए रुक गई.

कुछ देर बाद जब सैक्रेटरी रीता बाहर निकली तब मीना उसे बेमन से ‘हाय’ करते हुए सुरेश के केबिन में घुस गई.

वापसी में जब मीना दोबारा रीता से मिली तो उस ने कुछ दिनों बाद अपने छोटे बेटे के जन्मदिन पर रीता को भी न्योता दे डाला.

जब रीता उस के घर आई तो मीना ने उस के खाने में भभूत मिला दी. इस काम को कामयाबी से अंजाम दे कर मीना बहुत खुश थी.

अगली शाम को जब सुरेश दफ्तर

से लौटा तो एकदम शांत था, वह रोज की तरह आते ही न चीखाचिल्लाया

और न ही मीना से कोई चुभने वाली बात की. मीना बहुत खुश थी कि बाबा के तावीज ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. उस रात सुरेश ने मीना से बहुत सी प्यार भरी बातें की थीं और उसे अपनी बांहों में भी भर लिया था.

मीना मन ही मन बाबा का शुक्रिया अदा करने लगी. वह यही सोच रही थी कि अब कुछ दिन बाद सुरेश को उस कुलटा औरत से छुटकारा मिल जाएगा और उन की जिंदगी फिर से खुशहाल हो जाएगी.

सुरेश के स्वभाव में दिनोंदिन और भी बदलाव आता चला गया. अब उस ने बच्चों के साथ खेलना और समय देना भी शुरू कर दिया था. मीना यह सब देख कर मन ही मन बहुत खुश होती. उसे बाबा द्वारा बताए गए उपाय किसी चमत्कार से कम नहीं लगे थे.

अब मीना बाबा के पास जा कर उन का शुक्रिया अदा करना चाहती थी. कुछ दिनों बाद ही वह बाबा के लिए मिठाई और फल ले कर उन के आश्रम पहुंच गई.

जब बाबा को इस बात का पता चला तो वे बहुत खुश हुए और उन्होंने मीना से कहा, ‘‘बेटी, तुम्हारे पति को अभी कुछ और दिनों तक तावीज का पानी पिलाना पड़ेगा, वरना कुछ दिन में इस का असर खत्म हो जाएगा और वह फिर से पहले जैसा हो जाएगा.’’

मीना यह बात सुन कर अंदर तक सहम गई. उस ने बाबा के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘बाबा, आप जो कहेंगे, मैं वहीं करूंगी और जब तक कहेंगे तब तक करती रहूंगी, चाहे मुझे इस के लिए कितने ही रुपए क्यों न खर्च करने पड़ें.’’

इस पर बाबा ने उसे भरोसा देते हुए कहा, ‘‘चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा. मेरे यहां से कभी कोई निराश हो कर नहीं गया है.’’

बाबा की बातें सुन कर मीना ने राहत की सांस ली. बाबा कागज के एक पुरजे पर उर्दू में कुछ मंत्र लिख कर तावीज बनाने में लगे थे कि तभी मीना के पति सुरेश का औफिस से फोन आ गया, ‘क्या कर रही हो? जरा गोलू से बात कराना.’

मीना थोड़ा हड़बड़ा कर बोली, ‘‘कुछ नहीं.’’मीना को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह सुरेश से क्या कहे कि वह कहां है और इस समय वह उस की गोलू से बात नहीं करा सकती. इसी बीच उस की नजर दीवार पर टंगे जीवन अस्पताल के कलैंडर पर पड़ी तो उस ने झट से कह दिया, ‘‘मैं अस्पताल में हूं. गोलू को घर छोड़ कर आई हूं.’’

सुरेश ने घबरा कर पूछा, ‘‘कौन से अस्पताल में?’’

मीना फिर हड़बड़ा कर कलैंडर में देखते हुए बोली, ‘‘जीवन अस्पताल.’’

मीना का इतना कहना था कि सुरेश का फोन कट गया.

थोड़ी देर बाद मीना बाबा के यहां से वापस लौट रही थी कि रास्ते में जीवन अस्पताल के सामने सुरेश को अपना स्कूटर लिए खड़ा देख वह बहुत ज्यादा घबरा गई.

उसे देख कर सुरेश एक ही सांस में कह गया, ‘‘तुम यहां कैसे? क्या हुआ मीना तुम्हें? सब ठीक तो है न?’’

सुरेश के मुंह से इतना सुन कर और अपने लिए इतनी फिक्र देख कर मीना भावुक हो उठी. उस वक्त उसे सुरेश की आंखों में अपने लिए अपार प्यार व फिक्र नजर आ रही थी.

इस के बाद तो मीना से झूठ नहीं बोला गया और उस ने सारी बातें ज्यों की त्यों सुरेश को बता दीं.

मीना की सारी बातें सुनते ही सुरेश ने हंसते हुए उस के गाल पर एक

हलकी सी चपत लगाई और फिर गले लगा लिया.

सुरेश मीना के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘तुम ने ऐसा कैसे समझ लिया. भला इतनी प्यारी पत्नी से कोई कैसे बेवफाई कर सकता है. लेकिन, तुम मुझे इतना ज्यादा प्यार करती हो कि मुझे पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हो, यह जान कर आज मुझे सचमुच बहुत अच्छा लग रहा है.

‘‘पर, तुम तो पढ़ीलिखी और इतनी समझदार हो कर भी इन बाबाओं के चक्कर में कैसे पड़ गईं, जबकि पहले तो तुम खुद बाबाओं के नाम से चिढ़ती थीं? अब तुम्हें क्या हो गया है?’’

सुरेश की बातों के जवाब में मीना एक लंबी सांस लेते हुए बोली, ‘‘लेकिन, कुछ भी हो… बाबा की वजह से

आप मुझे वापस मिले हो. अब मुझे पहले वाले सुरेश मिल गए हैं. अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

सुरेश ने प्यार से मीना का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘अच्छा चलो… घर चल कर बाकी बातें करते हैं.’’

घर पहुंच कर सुरेश ने मीना की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘तुम्हें पता है न कि बाबाजी ने कोई चमत्कार नहीं किया. मैं बदला हूं सिर्फ और सिर्फ अपने दोस्त के साथ हुए एक हादसे के चलते. तुम बेकार ही यह समझ रही हो कि यह बाबा का चमत्कार है.’’

सुरेश की बातों पर मीना हैरान हो कर उसे घूरते हुए बोली, ‘‘हादसा… कैसा हादसा?’’

सुरेश ने उसे उदास मन से बताया, ‘‘मेरे एक दोस्त की पत्नी ने खुदकुशी कर ली थी और बच्चों को भी खाने में जहर दे दिया था.

‘‘जब मैं ने अपने दोस्त से पूछा कि यह सब कैसे हो गया तो उस ने बताया कि वह आजकल बहुत बिजी रहने

लगा था और काम के बोझ के चलते चिड़चिड़ा हो गया था. वह बातबात पर अपनी पत्नी पर गुस्सा होता रहता था और अकसर मारपीट पर भी उतर आता था.

‘‘पहले तो उस की पत्नी कभी उस से उलझ भी जाती थी, लेकिन कुछ दिन बाद उस ने उस से बात करना ही बंद कर दिया था और वह गुमसुम रहने लगी थी.

‘‘यह सब बताते हुए मेरा दोस्त फूटफूट कर रोने लगा था. उस ने अपने ही हाथों अपना परिवार स्वाहा कर दिया था.’’

सुरेश ने एक लंबी सांस लेते हुए आगे कहा, ‘‘अपने दोस्त की इस घटना ने मुझे अंदर तक हिला दिया था. उसी समय मैं ने सोच लिया था कि अब मैं भी अपने इस तरह के बरताव को बदल

कर ही दम लूंगा. इस तरह मेरा जीने का नजरिया ही बदल गया.’’

सुरेश की बातें सुन कर मीना बोली, ‘‘आप ने तो अपने जीने का नजरिया खुद बदला और मैं समझती रही कि यह सब बाबा का चमत्कार है और इस सब के चलते मैं हजारों रुपए भी लुटा बैठी.’’

मीना के इस भोलेपन पर सुरेश ने हंसते हुए उसे अपनी बांहों में कस कर भर लिया.

Hindi Story: यह कैसा प्यार – प्यार में नाकामी का परिणाम

Hindi Story: ‘‘अब आप का बेटा खतरे से बाहर है,’’ डाक्टर ने कहा, ‘‘4-5 घंटे और आब्जर्वेशन में रखने के बाद उसे वार्ड में शिफ्ट कर देंगे. हां, ये कुछ दवाइयां हैं… एक्स्ट्रा आ गई हैं…इन्हें आप वापस कर सकते हैं.’’

24 घंटे के बाद डाक्टर की यह बात सुन कर मन को राहत सी मिली, वरना आई.सी.यू. के सामने चहलकदमी करते हुए किसी अनहोनी की आशंका से मैं और पत्नी दोनों ही परेशान थे. मैं ने दवाइयां उठाईं और अस्पताल के ही मेडिकल स्टोर में उन्हें वापस करने के लिए चल पड़ा.

दवाइयां वापस कर मैं जैसे ही मेडिकल स्टोर से बाहर निकला, एक अपरिचित सज्जन अपने एक साथी के साथ मिल गए और मुझे देखते ही बोले, ‘‘अब आप के बेटे की तबीयत कैसी है?’’

‘‘अब ठीक है, खतरे से बाहर है,’’ मैं ने कहा.

‘‘चलिए, यह तो बहुत अच्छी खबर है, वरना कल आप लोगों की परेशानी देखते नहीं बन रही थी. जवान बेटे की ऐसी दशा तो किसी दुश्मन की भी न हो.’’

यह सुन कर उन के दोस्त बोले, ‘‘क्या हुआ था बेटे को?’’

मैं ने इस विषय को टालने के लिए उस अपरिचित से ही प्रश्न कर दिया, ‘‘आप का यहां कौन भरती है?’’

‘‘बेटी है, आज सुबह ही उसे बेटा पैदा हुआ है.’’

‘‘बधाई हो,’’ कह कर मैं चल पड़ा.

अभी मैं कुछ ही कदम आगे चला था कि देखा मेडिकल स्टोर वाले ने मुझे 400 रुपए अधिक दे दिए हैं. उस ने शायद जल्दी में 500 के नोट को 100 का नोट समझ लिया था.

मैं उस के रुपए वापस लौटाने के लिए मुड़ा और पुन: मेडिकल स्टोर पर आ गया. वहां वे दोनों मेरी मौजूदगी से अनजान मेरे बेटे के बारे में बातें कर रहे थे.

‘‘क्या हुआ था उन के बेटे को?’’

‘‘अरे, नींद की गोलियां खा ली थीं. कुछ प्यारव्यार का चक्कर था. कल बिलकुल मरणासन्न हालत में उसे अस्पताल लाया गया था.’’

‘‘भैया, इस में तो मांबाप की गलती रहती है. नए जमाने के बच्चे हैं…जहां कहें शादी कर दो, अब मैं ने तो अपने सभी बच्चों की उन की इच्छा के अनुसार शादियां कर दीं. जिद करता तो इन्हीं की तरह भुगतता.’’

शायद उन की चर्चा कुछ और देर तक चलती पर उन दोनों में से किसी एक को मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया और वे चुप हो गए. मैं ने भी ज्यादा मिले पैसे मेडिकल स्टोर वाले को लौटाए और वहां से चल पड़ा पर मन अजीब सा कसैला हो गया. संतान के पीछे मांबाप को जो न सुनना पडे़ कम है. ये लोग मांबाप की गलती बता रहे हैं, हमें रूढि़वादी बता रहे हैं, पर इन्हें क्या पता कि मैं ने खुद अंतर्जातीय विवाह किया था.

मेरी पत्नी बंगाली है और मैं हिंदू कायस्थ. समाज और नातेरिश्तेदारों ने घोर विरोध किया तो रजिस्ट्रार आफिस में शादी कर के कुछ दिन घर वालों से अलग रहना पड़ा, फिर सबकुछ सामान्य हो गया. बच्चों से भी मैं ने हमेशा यही कहा कि तुम जहां कहोगे वहां मैं तुम्हारी शादी कर दूंगा, फिर भी मुझे रूढि़वादी पिता की संज्ञा दी जा रही है.

मेरा बेटा प्यार में असफल हो कर नींद की गोलियां खा कर आत्म- हत्या करने जा रहा था. आज के बच्चे यह कदम उठाते हुए न तो आगा- पीछा सोचते हैं और न मातापिता का ही उन्हें खयाल रहता है. हर काम में जल्दबाजी, प्यार करने में जल्दबाजी, प्यार में असफल होने पर जान देने की जल्दबाजी.

हमारे कुलदीपक ने 3 बार प्यार किया और हर बार इतनी गंभीरता से कि असफल होने पर तीनों ही बार जान देने की कोशिश की. पहला प्यार इसे तब हुआ था जब यह 11वीं में पढ़ता था. हुआ यों कि इस के गणित के अध्यापक की पत्नी की मृत्यु हो गई. तब उस अध्यापक ने प्रिंसिपल से अनुरोध कर के अपनी बेटी का सुरक्षा की दृष्टि से उसी कालिज में एडमिशन करवा लिया जिस में वह पढ़ाते थे, ताकि बेटी आंखों के सामने बनी रहे.

वह कालिज लड़कों का था. अकेली लड़की होने के नाते वह कालिज में पढ़ने वाले सभी लड़कों का केंद्रबिंदु थी, पर मेरा बेटा उस में कुछ अधिक ही दिलचस्पी लेने लगा.

वह लड़की मेरे बेटे पर आकर्षित थी कि नहीं यह तो वही जाने, पर मेरा बेटा अपने दिल का हाल लिखलिख कर उसे देने लगा और उसी में एक दिन वह पकड़ा भी गया. बात लड़की के पिता तक पहुंची…फिर प्रिंसिपल तक. मुझे बुलाया गया. सोचिए, कैसी शर्मनाक स्थिति रही होगी.

प्रिंसिपल ने चेतावनी देते हुए मुझ से कहा, ‘आप का बेटा पढ़ाई में अच्छा है और मैं नहीं चाहता कि एक होनहार छात्र का भविष्य बरबाद हो, अत: इसे समझा दीजिए कि भविष्य में ऐसी गलती न करे.’

घर आ कर मैं ने बेटे को डांटते हुए कहा, ‘मैं ने तुम्हें कालिज में पढ़ने  के लिए भेजा था कि प्यार करने के लिए? आज तुम ने अपनी हरकतों से मेरा सिर नीचा कर दिया.’

‘प्यार करने से किसी का सिर नीचा नहीं होता,’ बेटे का जवाब था, ‘मैं उस के साथ हर हाल में खुश रह लूंगा और जरूरत पड़ी तो उस के लिए समाज, आप लोगों को, यहां तक कि अपने जीवन का भी त्याग कर सकता हूं.’

मैं ने कहा, ‘बेटा, माना कि तुम उस के लिए सबकुछ कर सकते हो, पर क्या लड़की भी तुम से प्यार करती है?’

‘हां, करती है,’ बेटे का जवाब था.

मैं ने कहा, ‘ठीक है. चलो, उस के घर चलते हैं. अगर वह भी तुम से प्यार करती होगी तो मैं उस के पिता को मना कर तुम दोनों की मंगनी कर दूंगा, पर शर्त यह रहेगी कि तुम दोनों अपनी पढ़ाई पूरी करोगे तभी शादी होगी.’

बेटे की इच्छा रखने के लिए मैं लड़की के घर गया और उस के पिता को समझाने की कोशिश की तो वह बडे़ असहाय से दिखे, पर मान गए कि  अगर बच्चों की यही इच्छा है तो आप जैसा कहते हैं कर लेंगे.

लेकिन जब उन की बेटी को बुला कर यही बात पूछी गई तो वह क्रोध में तमतमा उठी, ‘किस ने कहा कि मैं इस से प्यार करती हूं… अपनी कल्पना से कैसे इस ने यह सोच लिया. आप लोग कृपा कर के मेरे घर से चले जाइए, वैसे ही व्यर्थ में मेरी काफी बदनामी हो चुकी है.’

मैं अपमानित हो कर बेटे को साथ ले कर वहां से चला आया और घर आते ही गुस्से में मैं ने उसे कस कर एक थप्पड़ मारा और बोला, ‘ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही भला है.’

रात के करीब 12 बजे होंगे, जब बेटे ने जा कर अपनी मां को जगाया और बोला, ‘मां, मैं मरना नहीं चाहता हूं. मुझे बचा लो.’

उस की मां ने नींद से जग कर देखा तो बेटे ने अपने हाथ की नस काटी हुई थी और उस से तेजी से खून बह रहा था. पत्नी ने रोतेरोते मुझे जगाया. हम लोग तुरंत उसे ले कर नर्सिंग होम गए. वहां पता चला कि हाथ की नस कटी नहीं थी. खैर, मरहम पट्टी कर के उसे घर भेज दिया गया.

पत्नी का सारा गुस्सा मुझ पर फूट पड़ा, ‘जवान बेटे को ऐसे मारते हैं क्या? आज उसे सही में कुछ हो जाता तो हम लोग क्या करते?’

खैर, अब हम दोनों बेटे के साथ साए की तरह बने रहते. मनोचिकित्सक को भी दिखाया. किसी तरह उस ने परीक्षा दी और 12वीं में 62 प्रतिशत अंक प्राप्त किए. अब समय आया इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की कोचिंग का. प्यार का भूत सिर पर से उतर चुका था. बेटा सामान्य हो गया था. पढ़ाई में मन लगा रहा था. हम लोग भी खुश थे कि इंजीनियरिंग में प्रवेश परीक्षाओं के पेपर ठीकठाक हो गए थे. तभी मेरे सुपुत्र दूसरा प्यार कर बैठे. हुआ यों कि पड़ोस में एक पुलिस के सब- इंस्पेक्टर ट्रांसफर हो कर किराएदार के रूप में रहने को आ गए. उन की 10वीं में पढ़ने वाली बेटी से कब मेरे बेटे के नयन मिल गए हमें पता नहीं चला.

कुल 3 हफ्ते के प्यार में बात यहां तक बढ़ गई कि एक दिन दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया, क्योंकि लड़की को देखने के लिए दूसरे दिन कुछ लोग आने वाले थे, पर उन का भागने का प्लान असफल रहा और वे पकड़े गए. लड़की के पिता ने बेटी की तो लानत- मलामत की ही दोचार पुलिसिया हाथ मेरे कुलदीपक को भी जड़ दिए और पकड़ कर मेरे पास ले आए.

‘समझा लीजिए अपने बेटे को. अगर अब यह मेरे घर के आसपास भी दिखा तो समझ लीजिए…बिना जुर्म के ही इसे ऐसा अंदर करूंगा कि इस की जिंदगी चौपट हो कर रह जाएगी.’

मैं कुछ बोला तो नहीं पर उसे बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखा. वह भी चुपचाप नजरें झुकाए अपने कमरे में चला गया.

रात को बेटी और दामाद अचानक आ गए. उन लोगों ने हमें सरप्राइज देने के लिए कोई सूचना न दी थी. थोड़ी देर तक इधरउधर की बातों के बाद मेरी बेटी बोली, ‘पापा, राहुल कहां है…सो गया क्या?’

राहुल की मां बोली, ‘शायद, अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा होगा. जा कर बुला लाती हूं.’

‘रहने दो मां, मैं ही जा रही हूं उसे बुलाने,’ बेटी ने कहा.

ऊपर जा कर जब उस ने उस के कमरे का दरवाजा धकेला तो वह खुल गया और राहुल अचकचा कर बोला, ‘दीदी, तुम कैसे अंदर आ गईं, सिटकनी तो बंद थी.’

बेटी ने बिना कुछ बोले राहुल के गाल पर कस कर चांटा मारा और राहुल को स्टूल से नीचे उतार कर रोने लगी. दरअसल, राहुल कमरा बंद कर पंखे से लटक कर अपनी जान देने जा रहा था.

‘मुझे मर जाने दो, दीदी. मेरी वजह से पापा को बारबार शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

‘तुम्हारे मरने से क्या उन का सिर गर्व से ऊंचा उठ जाएगा. अरे, अपना व्यवहार बदलो और जीवन में कुछ बन कर दिखाओ ताकि उन का सिर वास्तव में गर्व से ऊंचा हो सके.’

प्रवेश परीक्षाएं अच्छी हुई थीं.

इंजीनियरिंग कालिज में राहुल को प्रवेश मिल गया क्योंकि अच्छे नंबरों से उस ने परीक्षाएं पास की थीं. मित्रमंडली का समूह, जिन में लड़केलड़कियां सभी थे, अच्छा था. हम लोग निश्ंिचत हो चले थे. वह खुद भी जबतब अपने प्रेमप्रसंगों की खिल्ली उड़ाता था.

इंजीनियरिंग का तीसरा वर्ष शुरू होते ही उस मित्रमंडली में से एक लड़की से राहुल की अधिक मित्रता हो गई. वे दोनों अब अकसर ग्रुप के बाहर अकेले भी देखे जाते. मैं एकआध बार इन की पढ़ाई को ले कर सशंकित भी हुआ, पर लड़की बहुत प्यारी थी. वह हमेशा पढ़ाई और कैरियर की ही बात करती, साथ ही साथ मेरे बेटे को भी प्रोत्साहित करती और जबतब वे दोनों विदेश साथ जाने की बात करते थे.

विदेश जाने के लिए दोनों ने साथ मेहनत की, साथ परीक्षा दी, पर लड़की क्वालीफाई कर गई और राहुल नहीं कर सका. लड़की को 3 साल की पढ़ाई के लिए विदेश जाने की खबर से राहुल बहुत टूट गया. हालांकि लड़की ने उसे बहुत समझाया कि कोई बात नहीं, अगली बार क्वालीफाई कर लेना.

धीरेधीरे लड़की के विदेश जाने का समय नजदीक आने लगा और राहुल को उसे खोने का भय सताने लगा. वह बारबार उस से विवाह की जिद करने लगा. लड़की ने कहा, ‘देखो, राहुल, हम लोगों में बात हुई थी कि शादी हम पढ़ाई के बाद करेंगे, तो इस प्रकार हड़बड़ा कर शादी करने से क्या फायदा? 3 साल बीतते समय थोड़ी न लगेगा.’

राहुल जब उसे न समझा सका तो हम लोगों से कहने लगा कि विधि के पापा से बोलिए न. शादी नहीं तो उस के जाने के पहले मंगनी ही कर दें.

बच्चों के पीछे तो मातापिता को सबकुछ करना पड़ता है. मैं विधि के घर गया और उस के मातापिता से बात की तो वे बोले, ‘हम लोग तो खुद यही चाहते हैं.’

यह सुन कर विधि बोली, ‘पर मैं तो नहीं चाहती हूं…क्यों आप लोग मंगेतर या पत्नी का ठप्पा लगा कर मुझे भेजना चाहते हैं या आप लोगों को और राहुल को मुझ पर विश्वास नहीं है? और अगर ऐसा है तो मैं कहती हूं कि यह संबंध अभी ही खत्म हो जाने चाहिए, क्योंकि वास्तव में 3 साल की अवधि बहुत होती है. उस के बाद घटनाक्रम किस प्रकार बदले कोई कह नहीं सकता. क्या पता मेरी विदेश में नौकरी ही लग जाए और मैं वापस आ ही न सकूं. इसलिए मैं सब बंधनों से मुक्त रहना चाहती हूं.’

मैं और पत्नी अपना सा मुंह ले कर लौट आए. भारी मन से सारी बातें राहुल को बताईं…साथ में यह भी कहा कि वह ठीक कहती है. तुम लोगों का प्यार सच्चा होगा तो तुम लोग जरूर मिलोगे.

‘मैं सब समझ रहा हूं,’ राहुल बोला, ‘जब से उस के विदेश जाने की खबर आई है वह मुझे अपने से कमतर समझने लगी है. जाने दो, मैं कोई उस के पीछे मरा जाता हूं. बहुत लड़कियां मिलेंगी मुझे.’

परसों रात को विधि का प्लेन गया और परसों ही रात को राहुल ने नींद की गोलियां खा लीं. मैं और राहुल की मां एक शादी में गए हुए थे. कल शाम को लौट कर आए तो बेटे की यह हालत देखी. तुरंत अस्पताल ले कर आए. तभी कानों में शब्द सुनाई पड़े, ‘‘पापा, चाय पी लीजिए.’’

सामने देखा तो बेटी चाय का कप लिए खड़ी थी. मैं ने उस के हाथों से कप ले लिया.

बेटी बोली, ‘‘पापा, क्या सोच रहे हैं. राहुल अब ठीक है. इतना सोचेंगे तो खुद बीमार पड़ जाएंगे.’’

मैं ने चाय की चुस्की ली तो विचारों ने फिर पलटा खाया. यह कोई सिर्फ मेरे बेटे की ही बात नहीं है. आज की युवा पीढ़ी हो ही ऐसी गई है. हर कुछ जल्दी पाने की ललक और न पाने पर हताशा. समाचारपत्र उठा कर देखो तो ऐसी ही खबरों से पटा रहता है. प्यार शब्द भी इन लोगों के लिए एक मजाक बन कर रह गया है. अभी हमारे एक हिंदू परिचित हैं. उन की बेटी ने मुसलमान से शादी कर ली. दोनों ही पक्षों में काफी विरोध हुआ. अंतर्जातीय विवाह तो फिर भी पचने लगे हैं पर अंतर्धर्मीय नहीं. मैं ने अपने परिचित को समझाया.

‘जब बच्चों ने विवाह कर ही लिया है तब आप क्यों फालतू में सोचसोच कर हलकान हो रहे हैं. खुशीखुशी आशीर्वाद दे दीजिए.’

एक साल में उन के यहां बेटा भी पैदा हो गया. पर नाम को ले कर दोनों पतिपत्नी में जो तकरार शुरू हुई तो तलाक पर आ कर खत्म हुई. बात सिर्फ इतनी थी कि पिता बेटे का नाम अमन रखना चाहता था और मां शांतनु. दोनों के मातापिता ने समझाया…दोनों शब्दों का अर्थ एक होता है, चाहे जो नाम रखो, पर वे लोग न समझ पाए और आजकल बच्चा किस के पास रहे इस को ले कर दोनों के बीच मुकदमा चल रहा है.

‘‘नानू, नानू, यह आयुषी है,’’ मेरा 6 वर्षीय नाती एक प्यारी सी गोलमटोल लड़की से मेरा परिचय कराते हुए कहता है.

मैं अपने विचारों की दुनिया से बाहर आ कर थोड़ा सहज हो कर पूछता हूं, ‘‘आप की फ्रेंड है?’’

‘‘नो नानू, गर्लफे्रंड,’’ मेरा नाती कहता है.

मैं कहना चाहता हूं कि गर्लफ्रेंड के माने जानते हो? पर देखता हूं कि गर्लफ्रेंड कह कर परिचय देने पर उस बच्ची के गाल आरक्त हो उठे हैं और मैं खुद ही इस भूलभुलैया में फंस कर चुप रह जाता हूं.

Funny Story: अर्थशास्त्री की पहली ससुराली होली

Funny Story: तिवारीजी को होली के एक हफ्ते पहले से ही ससुराल आने का लगातार फोन आ रहा था. बारबार फोन आए भी क्यों न, आखिर टौकटाइम और डाटा फ्री जो है.

तिवारीजी के लिए खुशकिस्मती की बात यह थी कि शादी के बाद उन्हें पहली बार गांवमहल्ले की सालियों और सलहजों के साथ ससुराली होली खेलने का मौका मिल रहा था.

पेशे से शिक्षक तिवारीजी उच्च विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे. शिक्षक और विषय विशेषज्ञ होने के चलते उन का सारा हिसाबकिताब भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह संतुलित होता था. ससुराल जाने में आर्थिक समस्या लोकतांत्रिक मुद्दों की तरह आड़े आ रही थी.

महंगाई और जीएसटी की मार से जब पूरा देश जूझ रहा है, तो भला हमारे तिवारीजी कैसे महफूज रहते. कैशलैस तिवारीजी काफी होपलैस नजर आ रहे थे, क्योंकि फरवरी महीने की तनख्वाह इनकम टैक्स में जा चुकी थी और ऊपर से दुकानदार, धोबी, दूध वाले का बकाया उधार अलग.

तिवारीजी गजब धर्मसंकट में फंसे हुए थे. बड़ी, छोटी, मं?ाली हर साइज की सालियां बारबार फोन कर के न्योता दे रही थीं, साथ ही देशी घी की मिठाई और रंग, गुलाल, पिचकारी लेते आने का इमोशनल दबाव भी बनाया जा रहा था.

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लंदन बसने वाले को अरबों रुपए का सरकारी लोन मिल जाता है, पर ससुराल जाने वाले को 1,000 रुपए का कर्ज मिलना भी काफी मुश्किल है.

काफी मशक्कत के बाद ‘ससुराल से लौटते ही उधार चुका देने’ की शर्त पर एक दोस्त ने उन्हें 1,000 रुपए का उधार दे कर दोस्ती और इनसानियत की दोहरी जिम्मेदारी निभाई.

तिवारीजी मन ही मन सोच रहे थे, ‘सासससुर के पैर लगाई में आशीर्वाद के साथ शगुन के रूप में कुछ न कुछ नकद नारायण तो मिलेगा ही, उसी से उधार चुका दूंगा… कम से कम ससुराल जाने और आने में हुए खर्च में लगी पूंजी तो वसूल हो ही जाएगी’.

उस 1,000 रुपए में से संदेश मिठाई खरीदने के नाम पर तिवारीजी ने 500 रुपए अलग निकाल लिए. 300 रुपए किराया और बाकी बचे 200 रुपए में होली मना कर ससुराल जाने और वापसी की रूपरेखा तैयार कर ली.

‘खाली हाथ बिना संदेश मिठाई के भी कोई ससुराल जाता है भला, वह भी पहली बार, उस पर होली का मौका,’ यह सोच कर तिवारीजी मिठाई की दुकान पर पहुंच गए और मिठाई वाले से मिठाई का मोलभाव करने लगे.

‘‘रसगुल्ला 700, पेड़ा 750, चमचम 650, बरफी 700, काजू कतली 1,200, मुरब्बा 350, रसकदम 850 रुपए प्रति किलो…’’ दुकानदार भी सीडी की तरह बजते हुए अपनी मिठाइयों की कीमत बताने लगा.

तिवारीजी थोड़ा सकुचाते हुए बोले, ‘‘भैया, आप की दुकान में सब से सस्ती मिठाई कौन सी है?’’
हलवाई बोला, ‘‘जलेबी ले लो सरजी… डेढ़ सौ रुपए किलो लगेगी.’’

तिवारीजी उधेड़बुन में पड़ गए कि ‘महज 500 रुपए में क्या लूं? जलेबी तो ससुराल ले जा नहीं सकता… अगर रसगुल्ला भी लेता हूं, तो 3 पाव ही होंगे… काजू कतली आधा किलो भी नहीं आ पाएगी… देशी घी की दूसरी मिठाइयां भी ढाई सौ ग्राम से ज्यादा नहीं आ पाएंगी…’

‘‘क्या पैक कर दूं सर?’’ तिवारीजी मन में गुणाभाग कर ही रहे थे कि हलवाई के सवाल ने उन का सारा कैलकुलेशन बिगाड़ दिया.

‘‘नहीं कुछ… बस यों ही दाम का आइडिया ले रहा था…’’ बोलते हुए तिवारीजी दुकान से बाहर निकल आए.

तिवारीजी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. उन्हें कुछ सम?ा नहीं आ रहा था कि तभी एक फल का ठेला दिखाई दिया. फिर वहां पहुंच कर वे सभी फलों के दाम जानने लगे. अनार 200, नारंगी 80, सेब 240 रुपए किलो थे. ड्राई फ्रूट की कीमत पूछने की तिवारीजी में न ऊर्जा थी और न ही खरीदने की औकात.

काफी मोलभाव के बाद 2 किलो सेब तुलवाए और दुकानदार को 500 रुपए का नोट थमा दिया. दुकानदार ने तय कीमत काट कर 20 रुपए का नोट तिवारीजी को लौटा दिया.

तिवारीजी मन ही मन संतुष्ट थे, ‘चलो, संदेश मिठाई के बदले 2 किलो सेब से थैला भराभरा सा लगेगा… रही बात साली की, तो सेहत के नुकसान का हवाला देते हुए मिठाई और चर्म रोग, प्रदूषण, स्वच्छ भारत का हवाला देते हुए रंग पिचकारी नहीं लेने की बात कह दूंगा.

‘सेब भी अपने बजट में आ गए… और तो और, बीवीसाली के गुलाबी गालों को लालहरा करने के लिए गुलाल के 60 रुपए भी बच गए… अब होगी जानदारशानदार डिजिटल होली.’

ऐसा लग रहा था कि तिवारीजी का अर्थशास्त्र पढ़ना व पढ़ाना आज कामयाब हो गया. वे खुश मन से बसस्टैंड पहुंच कर ससुराल जाने वाली बस में सवार हो गए.

ससुराल में कदम रखते ही तिवारीजी को पता चला कि उन के ससुरजी सुबह ही सासू मां के साथ अपनी ससुराल होली मनाने निकल गए हैं. तिवारीजी को मानो 440 वोल्ट का झटका लग गया. शेयर बाजार की तरह उन का मनोबल और अर्थबल धड़ाम से नीचे गिर गया.

शगुन के रूप में पैसा वापसी का एकमात्र साधन सासससुर के वहां न होने से तिवारीजी के चेहरे का रंग लालपीला पड़ने लगा. दोस्त की उधार वापसी का उन का सारा गणित फेल जो हो चुका था.

तिवारीजी अगला कैलकुलेशन करने के लिए कुछ नया सोचते, इस से पहले एक साली ने उन के हाथ से गिफ्ट झपट लिया और दूसरी साली ने उन के ऊपर रंग का गुब्बारा मार कर ‘हैप्पी होली’ बोल कर उन का ध्यान भंग कर डाला.

Hindi Story: मरियम बनी मरजीना

Hindi Story: आज मरियम ने नहाते समय अपने बालों को अच्छी तरह धोया और बालों को खुला छोड़ने के बाद उस ने आसमानी रंग का सूट पहना. वह आईने में अपना चेहरा निहारने लगी.

सामने से आती हुई रोशनी जब मरियम के चेहरे पर पड़ी, तो उस के चेहरे की चमक और बढ़ गई. अपनी सूरत पर खुद ही फिदा हो गई थी मरियम.

भले ही मरियम की उम्र 30 साल की हो गई थी, मगर वह अब भी दिखने में एकदम जवान, सैक्सी और खूबसूरत थी.

मरियम का लंबा कद, गोरा रंग और तीखी नाक उसे एक अफगानी औरत का सा लुक देते थे. उस की छाती सुडौल और कसावट लिए हुए थी और पतली कमर वाली मरियम जब चलती थी, तो कसबे के लोग उस के उभरे हुए अंगों को आगेपीछे से ताड़ते नजर आते थे.

पर इतना होने के बाद भी मरियम की खूबसूरती भोगने वाला कोई नहीं था. वह रात को तनहा बिस्तर पर लेटती, तो अकेलेपन के चलते उसे देर तक नींद नहीं आती थी. उस का मन चाहता था कि कोई मर्द उसे अपनी बांहों में जकड़ ले और बेतहाशा चूमे, पर उसे करवटों से ही संतोष करना पड़ता था.

मरियम की जिंदगी में यह सुख आया जरूर था, पर ठहर न सका था. दरअसल, मरियम महज 20 साल की थी, तभी उसे पास के ही एक गांव के 30 साल के रईस नाम के लड़के के साथ ब्याह दिया गया था.

रईस सिर्फ नाम से ही रईस था, पैसों के नाम पर उस के पास ज्यादा कुछ न था. वह पास के शहर में मजदूरी करने जाता था, पर कभी भी उस का मन शहर में नहीं लगा. वह कभी दूसरे दिन तो कभी तीसरे दिन गांव वापस आ जाता था.

पहलेपहल तो मरियम ने रईस को दबी जबान में सम?ाने वाले लहजे में कहा कि माना कि उन दोनों का निकाह हुआ है और उसे मरियम से मुहब्बत है, पर शहर से इतनी जल्दी आना ठीक नहीं, क्योंकि आनेजाने में खर्चा होता है, उसे छुट्टी लेनी पड़ती है और फिर शहर के काम और मजदूरी का भी नुकसान होता है. इस के अलावा अम्मीअब्बू भी क्या कहते होंगे कि निकाह के बाद तो रईस एकदम जोरू का गुलाम ही हो गया है.

पर रईस पर मरियम की बातों का कोई असर नहीं होता था. वह मरियम को दोपहर में ही पकड़ लेता था और उस के नाजुक अंगों से तब तक खेलता था, जब तक उस का मन भर नहीं जाता था.

जिस्म की भूख पूरी हो जाने के बाद रईस हाथमुंह धो कर गांव घूमने निकल जाता था और फिर देर रात को ही वापस आता था. अम्मीअब्बू की डांट का तो उस पर कोई असर होता ही नहीं था.

बेचारी भोलीभाली मरियम तो सम?ाती थी कि रईस उस की मुहब्बत के चलते गांव में आता है, पर उसे तो आसपड़ोस की औरतों ने बताया था कि रईस का एक दूसरी औरत से चक्कर चल रहा है, इसलिए मरियम थोड़ा सचेत रहे. मरियम को भला रईस के खिलाफ कही गई बातों पर कब यकीन होने वाला था?

पर, उस दिन जब मरियम रईस की कमीज साफ करने से पहले जेबें टटोल रही थी, तब उसे कागजनुमा टुकड़ा मिला, जो असल में एक औरत की तसवीर थी. अब तो मरियम परेशान हो गई थी.

बड़ी बेशर्मी से रईस ने पूछताछ में कबूल भी कर लिया था कि गांव की एक औरत से उस का नाजायज रिश्ता है और ऐसा कहते हुए रईस के चेहरे पर मर्दाना ऐंठन थी.

रईस ने मरियम से यह भी कहा कि उस का यह रिश्ता कई सालों से है और वह उस औरत को किसी भी हाल में छोड़ नहीं पाएगा.

उस दिन तो मरियम ने यह बात बरदाश्त कर ली थी, पर समय बीतने के साथ रईस अपने नाजायज रिश्ते में कुछ ज्यादा ही बिजी रहने लगा और शहर की मजदूरी भी छोड़ दी. तब मरियम ने अम्मीअब्बू और रईस के सामने एतराज जताया.

रईस अपनी जोरू के इस तरह के विरोध के लिए तैयार नहीं था. उस ने गुस्से में मरियम को खूब मारा और बाद में ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोल कर उसे घर से निकाल दिया.

बेचारी मरियम उस समय पेट से हो चुकी थी. उस ने रईस और उस के अम्मीअब्बू से गुहार भी लगाई, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

अब मरियम के पास मायके वापस आने के अलावा कोई चारा नहीं था. मरियम के मायके में सिर्फ उस की अम्मी ही थीं. अब्बू की मौत तो पहले ही हो चुकी थी.

एक औरत के लिए उस के मायके के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं. मरियम के साथ भी ऐसा ही हुआ. वह अब अपने मायके में ही रहने लगी थी और समय आने पर उस ने एक बेटे को जन्म दिया.

घर का खर्चा बढ़ गया था. मरियम की मां सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थीं. मरियम भी उन का हाथ बंटाने लगी. अम्मी ने उसे सिलाई और रेशमी कपड़े पर महीन कढ़ाई के खूब गुर सिखाए. मरियम भी कढ़ाई के काम में खूब मन लगाती थी. रंगीन फूलबूटे तो ऐसा काढ़ती कि देखते ही बनते थे.

कामधाम थोड़ा ठीक चलने लगा तो अचानक ही मरियम की अम्मी का इंतकाल हो गया. बेचारी मरियम और उस का 5 साल का बेटा आदिल अब इस घर में अकेले रह गए थे.

‘‘न जाने कितने इम्तिहान बाकी हैं मेरे,’’ मरियम मन ही मन बुदबुदाती और आंसू ढुलकाती.

वह छोटा बच्चा ही मरियम की जिंदगी की एकमात्र उम्मीद था, जिस के सहारे वह समय काट देती, पर यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था.

धीरेधीरे मरियम की दूसरी शादी के लिए उस पर आसपास के लोगों और उम्रदराज मर्दों का दबाव बनने लगा, पर मरियम ने शादी की हर बात को सिरे से खारिज कर दिया था.

‘‘जब एक बार मेरे मर्द ने मुझ से बेवफाई की है, तो दूसरी बार ऐसा नहीं होगा, इस का क्या भरोसा है?’’ मरियम की आवाज में दर्द झलकता था.

घर का खर्च चलाने के लिए मरियम ने सिलाईकढ़ाई का काम शुरू कर दिया था. वह बाजार से थोक रेट वाली दुकान से कपड़ा खरीद कर लाती और उन पर रंगबिरंगे व सुनहरे धागों से कढ़ाई करती और ऐसा कर के उस ने कई मेजपोश, आईने के कवर और चुनरी तैयार कर ली थीं.

ये सारे सामान अगर बिक जाते, तो मरियम को कुछ पैसे जरूर मिल जाते और आमदनी का एक सिलसिला भी चल निकलता.

इस काम के लिए मरियम कसबे के एक दुकानदार रफीक के पास पहुंची.

रफीक के साथ उस गांव काएक पंडित भी बैठा था, जिसे कसबे के लोग ‘बड़े पंडितजी’ कहते थे.

बड़े पंडितजी थे बड़े एक नंबर के औरतखोर. कसबे की गरीब और जरूरतमंद औरतों को घूरना और नाजायज रिश्ते बनाना उन का पसंदीदा काम था.

रफीक से बड़े पंडितजी की अच्छी बनती थी. उस ने मरियम को बैठाया और उस के आने का सबब पूछने लगा. उस की नजरें बातोंबातों में ही मरियम के जिस्म को टटोलने लगी थीं.

मरियम के उभरे सीने को देख कर रफीक के मुंह में पानी आ गया था और वह मन ही मन मरियम के जिस्म को भोगने के सपने देखने लगा था.

रफीक समझ गया था कि मरियम एक जरूरतमंद औरत है और उसे अपने कब्जे में कर पाना बहुत आसान होगा, इसलिए उस ने मरियम से कहा, ‘‘आप चिंता बिलकुल मत करो. अपना बनाया हुआ सारा सामान हमारी दुकान पर छोड़ जाया करो. हम उसे बेच कर वाजिब दाम दे दिया करेंगे.’’

बड़े पंडितजी भी चुपचाप बैठे हुए मरियम के जिस्म के उतारचढ़ाव का मुआयना कर रहे थे.

रफीक की बात सुन कर मरियम मन ही मन बहुत खुश हो गई थी. उस ने रफीक को शुक्रिया कहा और घर आ कर कढ़ाई का काम और भी तेजी से करने लगी.

कुछ ही दिनों में मरियम ने बाजार से खरीदी हुई एक सादा चुनरी पर कढ़ाई कर के उसे और भी खूबसूरत बना दिया था.

अपना काढ़ा हुआ सामान ले कर मरियम रफीक के पास गई. रफीक मरियम को देख कर फिर से खूब मीठी बातें करने लगा और बातोंबातों में मरियम के जिस्म को छूने की कोशिश भी कर लेता था.

रफीक की ऐसी हरकतों से मरियम परेशान तो महसूस कर रही थी, पर इस समय उस की मजबूरी थी, क्योंकि कसबे में रफीक की ही ऐसी दुकान थी, जो खूब चलती थी और फिर शहर में कई बड़े दुकानदारों से रफीक की अच्छी पहचान थी.

रफीक चाहे तो मरियम का धंधा चुटकियों में पनपा सकता है, ऐसा सोच कर मरियम खामोश थी, पर उस ने अपने जिस्म को समेटते हुए दुपट्टे को अपने जिस्म पर कस कर लपेट लिया था.

रफीक ने मरियम को एक हफ्ते के बाद आने को कहा, पर मरियम को तो यह एक हफ्ता बहुत लग रहा था, इसलिए वह 5वें दिन ही रफीक के पास पहुंच गई थी.

रफीक उस समय अपनी दुकान पर बैठा हुआ कुछ काम कर रहा था. पास ही बड़े पंडितजी भी बैठे हुए मोबाइल में रील देख रहे थे. मरियम को देख कर रफीक खुश हो गया. ऐसा लगा कि आज वह उस का पहले से इंतजार कर रहा था.

रफीक ने मरियम को एक स्टूल पर बिठाया. मरियम ने कुछ कहना चाहा, पर रफीक ने अनसुना कर दिया और दुकान के अंदर चला गया. वापसी में उस के हाथ में चाय के 2 गिलास थे.

‘‘लो, पहले तुम चाय पियो मरियम,’’ रफीक ने चाय आगे बढ़ाई.

पहले तो मरियम थोड़ा हिचकी, पर रफीक के बारबार कहने पर मरियम ने चाय ले ली और छोटेछोटे घूंट भरने लगी.

बड़े पंडितजी मरियम को चाय पीते देख रहे थे. चाय पीने के बाद मरियम बात शुरू करने जा ही रही थी कि उस का सिर भारी होने लगा और आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा.

मरियम अपनेआप पर काबू न रख सकी और बेहोश हो कर एक ओर लुढ़क गई. रफीक को तो इसी पल का इंतजार था. उस ने तुरंत अपनी दुकान का शटर अंदर से बंद कर लिया.

बेहोश मरियम को निहारते हुए रफीक ने मरियम की सलवार का नाड़ा खोल कर एक ओर फेंक दिया और फिर कुरता भी उतार फेंका.

रफीक मरियम के नंगे जिस्म को देख कर पागल हो उठा था. वह कभी मरियम के निढाल जिस्म को अपनी बांहों में कसता, तो कभी मरियम के अंगों पर अपने होंठ रगड़ने लगता.

रफीक पर हवस का भूत बहुत हावी हो चुका था और फिर जल्दी से उस ने अपने भी कपड़े उतार फेंके और फिर मरियम के कोमल जिस्म पर हावी हो गया.

उस दौरान बड़े पंडितजी अपने मोबाइल में यह सारा गंदा काम कैद करते रहे.

रफीक के हटने के बाद बड़े पंडितजी ने भी अपने कपड़े उतार फेंके और मरियम के जिस्म का मजा लेने लगे.

मरियम के साथ कई बार सैक्स करने के बाद उस के नंगे बदन को रफीक अपने मोबाइल में कैद करना नहीं भूला था.

जब मरियम को होश आया, तब रफीक उस के पैरों के पास बैठा हुआ था और अपने मोबाइल पर वही वीडियो देख रहा था. मरियम को सम?ाते देर नहीं लगी कि उस की इज्जत लुट चुकी है.

रफीक और बड़े पंडितजी की निगाहें मरियम को पहले से ही ठीक नहीं लग रही थीं, पर उस की मजबूरी और गरीबी उसे आज इस हाल में ले आई थी कि इन दोनों भेडि़यों ने उस के साथ मुंह काला कर के कहीं का नहीं छोड़ा था.

मरियम ने भारी मन से अपने कपड़े पहने. उस के मन में तूफान सा चल रहा था. उस की आबरू लुट चुकी थी. अब उसे दुनिया में सिर्फ खुदकुशी कर लेने के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था. दरिंदों ने इस तरह उस के जिस्म को नोचा था कि उस की हर नस दर्द हो रही थी.

‘पर, अगर मैं मर गई तो मेरे बच्चे का क्या होगा? वह किस के सहारे रहेगा?’ अपने 5 साल के बच्चे आदिल का खयाल आते ही मरियम ने तुरंत अपना फैसला बदल लिया. वह गुस्से में अपने घर पहुंची और बालटी भरभर कर नहाने लगी.

मरियम के मासूम बच्चे को भला क्या पता था कि उस की अम्मी पर क्या गुजरी है.

इस घटना को 3 दिन ही गुजरे थे कि मरियम के पास रफीक आया और अपने मोबाइल की तरफ इशारा कर के उस से आज फिर हमबिस्तर होने की मांग की और ऐसा न करने पर उसे पूरे कसबे में बदनाम कर देने की धमकी दे डाली. साथ ही, उस के धंधे को भी खत्म कर देने की बात कही.

मरियम आंसुओं में डूब गई, क्योंकि अब तो रफीक और बड़े पंडितजी उसे उस की वीडियो का डर दिखा कर न जाने कितने दिनों तक हमबिस्तरी की मांग करते रहेंगे… यह सोच कर वह परेशान हो उठी, पर अगले पल ही उसे उम्मीद की एक किरण दिखाई दी और वह उम्मीद की किरण थी कानून और पुलिस.

मरियम ने कोठरी में ताला लगाया और पुलिस चौकी पहुंच गई. वह पुलिस को आपबीती सुनाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी को गिरफ्तार करने की मांग करने लगी.

पुलिस वालों ने चटकारे ले कर मरियम की कहानी को एक नहीं, बल्कि कई बार सुना, पर रिपोर्ट नहीं लिखी. और तो और, मरियम से यह भी कहा कि वे कैसे भरोसा करें कि उस का रेप हुआ है और मरियम से सुबूत दिखाने को कहा गया.

बेचारी मरियम शर्म से गड़ गई और बिना कुछ कहे वापस आने लगी.

मरियम पुलिस चौकी से बाहर निकली, तो उसे पीछे से किसी ने आवाज दी. वह एक 35 साल का नौजवान था. उस नौजवान ने बताया कि वह इसी कसबे का एक दलित जाति का नौजवान घामू है, जो बचपन से ही फिल्मों में जाना चाहता था और शौक के चलते कसबे में होने वाले ड्रामा और नाटकों में भाग लिया करता था, पर बड़े पंडितजी को यह कतई मंजूर नहीं था कि कोई पिछड़ी जाति का ऊंची जाति के बनाए मंच पर आए और उन के साथ उठेबैठे, इसलिए बड़े पंडितजी ने घामू को बुला कर नाटक में भाग लेने से
मना किया.

पर घामू को तो ऐक्टिंग का शौक था और कसबे के लोग भी उसे पसंद करते थे, इसलिए उस ने ऐक्टिंग को जारी रखा. उस की इस बात से बड़े पंडितजी चिढ़ गए और अपने गुरगों द्वारा घामू की 16 साल की बहन को उठवा लिया, उस के साथ रेप किया और उस की वीडियो बना कर घामू की बहन को ब्लैकमेल करने लगे. बाद में परेशान हो कर घामू की बहन ने नदी में कूद कर अपनी जान दे दी.

मरियम और घामू चलते हुए पुलिस चौकी से काफी दूर निकल आए थे.

मरियम घामू की बात तो सुन रही थी, पर यह सम?ा नहीं पाई थी कि वह उसे यह सब क्यों बता रहा है?

घामू ने मरियम को आगे बताया कि उसे एक ऐसी औरत की तलाश है, जो थोड़ी सी हिम्मत दिखाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी के खिलाफ पुख्ता सुबूत जमा कर सके.

‘‘पर, मुझे तो सिलाईकढ़ाई और खाना बनाने के अलावा कुछ नहीं आता. ऐसे में बदला लेने जैसी बात तो मैं सोच भी नहीं सकती,’’ मरियम ने कहा,

जिस के बदले में घामू ने उसे अपना मोबाइल दिखाते हुए कहा कि मरियम, तुम बिलकुल मत घबराओ. वह उसे सबकुछ सिखा देगा, बस उसे एक नाटक खेलना होगा.

मरियम ने उन खतरनाक और गंदे किरदार वाले लोगों से किसी भी तरह का बदला लेने से इनकार कर दिया, तो घामू ने उस की हिम्मत बढ़ाते हुए कहा कि तब तो वे लोग उसे जिंदगीभर यों ही परेशान करते रहेंगे और उस के जिस्म से खिलवाड़ भी करते रहेंगे. यह बात मरियम की समझ में आ गई थी, इसलिए उस ने हां में सिर हिला दिया.

2-3 दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा. घामू ने मरियम से कहा, ‘‘देखो मरियम, तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है, क्योंकि उन के पास तुम्हारी वीडियो और फोटो हैं, इसलिए अब तुम्हें मोबाइल की कुछ तकनीक सीखनी होगी और तुम अब वह करो, जो मैं तुम्हें बताता हूं.’’

घामू ने मरियम को एक प्लान बताया, जिसे सुन कर मरियम की आंखें हैरत से फैलती चली गईं.

उस दिन दोपहर में जब मरियम बाजार से आ रही थी, तब रफीक ने उसे फिर से घेर लिया और आज उस की दुकान पर आ कर शाम को रंगीन बनाने की बात कहने लगा, जिस के बदले में मरियम ने सकुचाते हुए हां कर दी.

शाम को 7 बजे मरियम रफीक की दुकान पर पहुंच गई. रफीक ने मरियम के आते ही दुकान का शटर बंद कर दिया और मरियम को दुकान के अंदर बने एक कमरे में ले गया.

यह कमरा साफसुथरा था. वहां कोने में एक दीवान पड़ा हुआ था, जिस पर बड़े पंडितजी पहले से बैठे थे और शराब पी रहे थे.

रफीक ने मरियम को अपनी बांहों में भरना चाहा, तो वह तुरंत छिटक गई और बोल्ड अंदाज दिखाते हुए बोली कि आज वह उन लोगों को मरजीना वाला डांस दिखाएगी और फिर उन का मूड बनाएगी.

‘यह मरजीना वाला डांस कौन सा होता है भाई?’ वे दोनों एक आवाज में बोले, तो मरियम ने उन्हें बताया कि मरजीना वाला डांस यानी वह डांस, जो ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ नाम की फिल्म में मरजीना करती है.

ऐसा कहने के साथ ही मरियम ने अपना कुरता अपने बदन से अलग कर दिया, पर अंदर वह एक छोटी कुरती पहने हुए थी, जिसे देख कर रफीक और बड़े पंडितजी मूड में आ गए और पागल से होने लगे.

मरियम अपने साथ एक मिनी स्पीकर लाई थी और उस पर ‘महबूबा ओ महबूबा’ वाला गाना बजा दिया और अपनी कमर को सैक्सी अंदाज में लचकाने लगी. बीचबीच में वह किसी साकी की तरह उन दोनों को शराब भी पिला देती थी.

मरियम का सैक्सी डांस देख कर रफीक से रहा नहीं गया और उस ने मरियम को पकड़ लिया और कुछ कहने लगा, पर मरियम ने उसे पहले स्पीकर की ओर इशारा कर के गाना बंद करने को कहा और फिर अपना कुरता पहन कर वापस रफीक के सामने आ कर बैठ गई.

‘‘अब बताओ कि क्या कहना चाह रहे हो?’’ मरियम ने शांत लहजे में पूछा, तो रफीक और बड़े पंडितजी ने मरियम से कहा, ‘‘नाच बहुत हुआ, अब तुम हमारा बिस्तर गरम कर दो.’’

मरियम ने उन से पूछा, ‘‘तुम लोग किसी औरत की गंदी वीडियो क्यों बनाते हो?’’

‘‘अरे, तुम जैसी सैक्सी औरतों और लड़कियों को बेहोश कर के हम पहले तो उन का रेप करते हैं और उस के बाद उन की गंदी वीडियो अपने पास रख लेते हैं, जिस के बल पर हम बारबार उन औरतों का रेप करते हैं,’’ शराब के नशे में बड़े पंडितजी सबकुछ बोले जा रहे थे.

‘‘तो क्या मेरे अलावा और कोई भी आप के जाल में फंस चुकी है,’’ मरियम के इस सवाल के जवाब में रफीक ने कई लड़कियों के नाम गिना दिए.

‘‘लेकिन, सब से ज्यादा मजा उस नाटक करने वाले घामू की बहन के साथ आया था. बहुत कसावट भरी थी वह,’’ बड़े पंडितजी अपनी आंखों को सिकोड़ते हुए बोले.

मरियम अचानक उठी. उस ने अपना स्पीकर भी उठा लिया और उस के पीछे छिपे मोबाइल को उठा कर चल दी.

रफीक और बड़े पंडितजी उसे रोकने लगे, तो मरियम ने गुस्से से घूरते हुए कहा, ‘‘तुम लोगों के खिलाफ सारे सुबूत इस मोबाइल में आ चुके हैं. अब पुलिस ही तुम लोगों से बात करेगी,’’ और इस के बाद मरियम ने अंदर से बंद शटर को खोलने की कोशिश की, पर उस से भारी शटर नहीं खुला.

पर अचानक किसी ने बाहर से हाथ लगाते हुए शटर खोल दिया. वह और कोई नहीं, बल्कि घामू ही था और उस के साथ थी पुलिस और न्यूज चैनल के पत्रकार.

पुलिस ने पूरे हालात का जायजा लिया. मरियम ने रफीक और बड़े पंडितजी पर ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण का आरोप लगाते हुए चोरी से बनाए गए उस वीडियो को मीडिया और पुलिस को सौंप दिया, जिस में वे दोनों शराब के नशे में अपने गलत कामों की शेखी बघार रहे थे.

पुलिस को मीडिया के दबाव में उन दोनों को गिरफ्तार करना पड़ गया था.

घामू और मरियम का बदला पूरा हो गया था. भले ही मरियम के साथ हुए रेप की बात फैल गई थी, पर कम से कम रफीक और बड़े पंडितजी अब किसी और लड़की की जिंदगी तो बरबाद नहीं कर सकेंगे.

कुछ दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा, तो मरियम उसे देख कर सहज भाव से मुसकरा दी और उस का बेटा आदिल घामू के गले लग गया.

घामू ने मरियम से उस की तारीफ करते हुए कहा कि कितनी जल्दी उस ने डांस करना और मोबाइल से चोरी से वीडियो बनाना और दूसरी बातों को सीख लिया, जिस के बदले में मरियम के गोरे गालों पर शर्म की लाली दौड़ गई थी.

मरियम को मुसकराते देख फौरन ही घामू ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया, पर मरियम चुप थी.

घामू मरियम के चेहरे पर छाई खामोशी का मतलब नहीं सम?ा पा रहा था. उस ने बेसब्री से कहा, ‘‘तुम खामोश क्यों हो मरियम?’’

‘‘पगले इतना भी नहीं जानते कि औरत की खामोशी का मतलब ही उस का इकरार होता है,’’ शरमाते हुए मरियम ने कहा, तो घामू ने भी खुशी से मरियम के माथे को चूम लिया.

ठीक उसी समय आदिल ने मोबाइल से उन दोनों की तसवीर खींच ली.

Hindi Story : डांस बार पर्यटन

Hindi Story : जीवन बीमा निगम में काम करते हुए गुप्ताजी अब रिटायरमैंट के नजदीक थे. एक बेहतरीन मैनेजर के रूप में उन्होंने अपने सेवाकाल के पूरे 34 साल गुजार दिए थे. 2 बेटों की शादी कर अपनी बड़ी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी कर वे संतोष के भाव से अपनी नौकरी कर रहे थे. अब तक मशीन की तरह की दिनचर्या में खास रंगों की कमी, जिसे काफी हद तक बोरिंग लाइफ कहा जा सकता है, में ही उन के दिन कट रहे थे. न पर्यटन, न तीर्थाटन, बस किसी तरह उन्होंने इतने साल बिता दिए थे.

पूजापाठी धर्मपत्नी भी बाहर घूमने की इच्छा रखने वाली कभी न रही, तो पत्नी के साथ घर छोड़ कर साथ में कभी न घूमना तय हो पाया, न कभी देवालय दर्शन की योजना पूरी हो पाई.

औफिस के 3-4 नौजवान शिरडी के सांईं बाबा के दर्शन का प्रोग्राम बना रहे थे, तो गुप्ताजी से भी चलने के लिए पूछा गया. पहले तो उन्होंने आदतन मना कर दिया, पर शाम तक विचार करने और पत्नी से मोबाइल पर सलाह करने के बाद साथ चलने की रजामंदी दे दी.

सबकुछ तय होने के बाद 3-4 दिन का कार्यक्रम राजस्थान, गुजरात के रास्ते पड़ने वाली जगहों को बहुत कम समय देते हुए दिल्ली से एक गाड़ी में 5 लोग 2 दिन में शिरडी पहुंच गए.

आस्था का सैलाब भक्तों की भीड़ के साथ दर्शन करने के बाद पूरी तरह शांत हो चुका था. गुप्ताजी अपनेआप को बहुत हलका महसूस कर रहे थे. ऐसा कि जो उन्होंने कई सालों में महसूस नहीं किया था.

एक जगह भोजन करते हुए अब आगे के प्रोग्राम के लिए चर्चा होने लगी, तो गुप्ताजी हैरान हो कर बोले, ‘‘तो यहां से वापस घर लौटने का अभी कोई प्रोग्राम नहीं है न?’’

एक साथी मजाकिया अंदाज में बोला, ‘‘हम ने पुराने पाप तो धो लिए हैं, अब कुछ नए पाप कर लेते हैं.’’

एक जोर का ठहाका लगा और दूसरे साथी ने सु?ाया, ‘‘अब यहां से गोवा चलते हैं. खूब बीयर पिएंगे और बीच पर मस्ती करेंगे.’’

सब ने गुप्ताजी की तरफ देखा, जैसे वे सब तो तय कर ही चुके हैं, अब उन को भी अपनी रजामंदी दे देनी चाहिए.

गुप्ताजी 5 मिनट तक कुछ न बोले, तो एक साथी फिर से बोला, ‘‘क्या बात है गुप्ताजी, मन क्या कह रहा है? हमारे साथ चलिए गोवा. आप की बरसों की थकान वहां मसाज करा कर मिटा देंगे.’’

गुप्ताजी ने पूरा कौर चबाया, फिर धीरे से बोले, ‘‘हमारी जवानी में मनोरंजन के नाम पर सिर्फ सिनेमाघर में मूवी देखना होता था. उन मूवीज में कैबरे और बार में डांस देख कर मन बड़ा खुश हो जाता था. कब से मेरी इच्छा रूबरू ऐसा बार डांस देखने की है.’’

गुप्ताजी की यह बात सुन कर कुछ समय के लिए बाकी लोगों की चुप्पी आंखों ही आंखों में बात करती रही. किसी को भी गुप्ताजी की मनतरंग के ऐसे धमाके की कतई उम्मीद नहीं थी.

एक साथी बोला, ‘‘डांस बार तो मुंबई में थे, जो अब बंद हो चुके हैं. यह कैसे मुमकिन है…’’

सब से पहले एक और नौजवान साथी बोला, ‘‘पहली बार तो गुप्ताजी ने कोई इच्छा जाहिर की है. हम इसे पूरा करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं. मेरा एक दोस्त मुंबई के एक होटल में मैनेजर है. उस से बात करता हूं,’’

और उस ने तुरंत मुंबई फोन लगाया, तो छूटते ही सामने से जवाब आया, ‘अब कौन से डांस बार… वे तो कब के बंद हो चुके हैं…’

‘‘भाई, कैसे भी यह इंतजाम करना ही है. कहीं से भी पता करो, पर यह इंतजाम कराओ.’’

‘ठीक है, मैं पता करने की कोशिश करता हूं कि कहीं पर चोरीछिपे चल रहे हैं क्या…’ उधर से आवाज आई.

आधे घंटे बाद ही उस मैनेजर का फोन आया और उन्हें अंधेरी में एक बार का नाम बताते हुए वहां पहुंचने की जरूरी जानकारी दे दी गई.

दिल्ली का दल फटाफट पूरी ऊर्जा के साथ मुंबई पंहुच गया. ट्रैफिक की भीड़भाड़ को देखते हुए गाड़ी को छोड़ अंधेरी तक का सफर लोकल ट्रेन से किया गया.

अंधेरी स्टेशन के बाहर खड़ी टैक्सी को जब बार का नाम ले कर चलने के लिए कहा गया, तो 3 लोगों ने तो मना कर दिया, फिर चौथे टैक्सी वाले की जेब में चुपचाप 500 का नोट डाल कर उस से बार का नाम ले कर छोड़ने को कहा गया.

ड्राइवर बोला, ‘‘मैं चुपचाप थोड़ी दूरी पर छोड़ कर चला आऊंगा. वहां से अपनेआप चले जाना.’’

‘‘क्यों भाई, ऐसा क्या है वहां, जो तुम इतना बिदक रहे हो?’’ एक साथी ने टैक्सी ड्राइवर से पूछा.

‘‘भाई, तुम जगह ही ऐसी जा रहे हो. वहां पहुंचोगे तो पता चल जाएगा,’’ वह टैक्सी ड्राइवर बोला.

इतना सुनते ही सब लोग फुरती से गाड़ी में बैठे और तकरीबन 20 मिनट में टैक्सी ड्राइवर उन्हें बार से कुछ ही दूर उतार कर रफूचक्कर हो गया.

थोड़ी देर के बाद वे लोग उस दबेछिपे डांस बार को खोजने में कामयाब हो गए. आगे से बेकरी की दुकान से एक छोटा सा दरवाजा उन्हें एक बड़े से कमरे में ले आया, जहां उन का सामना 3 लंबेचौड़े बाउंसर से हुआ.

परखने के बाद उन्हें भीतर बने स्टेज के पास रखी गोल मेज के चारों तरफ रखी कुरसियों पर बैठा दिया गया. बीयर भी उन की मांग के मुताबिक परोस दी गई.

10 मिनट तक कोई हलचल नहीं हुई, फिर हिम्मत कर के एक नौजवान साथी बाउंसर से पूछने गया कि डांस कब और कैसे शुरू होगा.

बाउंसर ने पास आ कर धीरे से कहा, ‘‘वह देखो लड़कियां स्टेज पर आ कर खड़ी हो गई हैं. अब उन में से पसंद कर जिस भी लड़की को टिप दोगे, वह आप की पसंद के गाने पर डांस कर के दिखाएगी.’’

उस साथी ने लौट कर सब को बात बताई और गुप्ताजी की पसंद पूछी, जिन पर बीयर का नशा अब कुछकुछ चढ़ने लगा था. शादी के बाद यह उन का पहला सुरासेवन हो रहा था.

गुप्ताजी ने हौले से अपनी पसंद की लड़की की ओर इशारा किया, तो नौजवान साथी ने दौड़ कर 500 रुपए लड़की को थमाए और 1,000 के छुट्टे 10-20 रुपए के नोट में ले आया और टेबल पर जमा दिए.

‘तू चीज बड़ी है मस्तमस्त…’ गाने पर गुप्ताजी की पसंद वाली लड़की ने 5-6 मिनट तक अपने डांस से उन पांचों का मनोरंजन करने की कोशिश की. नोट भी खूब बरसाए, पर अभी मजा नहीं आया था.

फिर उस नौजवान साथी ने माहौल को गरमाने का भार अपने कंधे पर ले लिया. अपनी पैनी नजर से उस ने एक और लड़की को 500 के 2 नोट दिए और गुप्ताजी की ओर इशारा कर ‘टिपटिप बरसा पानी…’ गाने पर मदमस्त डांस करने को कहा. पैसे की मिठास ने बार डांसर को गाने की पहली बीट से ही जोश में ला दिया.

अपनी घनी जुल्फों को उस लड़की ने पूरी तरह खोल दिया और अगले 10 मिनट में मस्त हो कर वह ऐसे नाचने लगी कि गुप्ताजी भी सबकुछ भुला कर उस के साथ ठुमके लगाने लगे.

सभी लोग मजे ले रहे थे, पर एक साथी उस समूह में ऐसा था, जो सुरापान से परहेज रखता था और अब सब को लौटने के लिए कहने लगा. गुप्ताजी अभी और समय वहां बिताना चाहते थे, पर थोड़ी देर में बिल चुकता कर सब वहां से निकल गए.

गुप्ताजी नशे में चूर बारबार गा रहे थे, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जिंदगी में पहली बार इस तरह का मजा उन्होंने लिया था, जिस ने उन्हें अपनी बरसों से दबी फैंटेसी को पूरा होने से खुद को खुद से भुला दिया था.

वे बारबार अपने सफर के साथियों के गले लग कर बस एक ही लाइन दोहराते, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जैसे उस शाम के लिए वे बारबार धन्यवाद कह रहे हों.

रात की मस्ती होटल पहुंच कर पूरी हो गई. हावी हो रही थकान और नशे के सुरूर ने जल्दी सब को नींद के आगोश में ले लिया. अगली सुबह सब ने एकमत हो कर घर लौटने का फैसला कर लिया.

घर लौटे गुप्ताजी की चुस्ती और फुरती को देख कर घर वाले हैरान थे. सांईं बाबा की कृपा मान कर बाकी घर वाले भी जल्द ही शिरडी दर्शन जाने का विचार करने लग गए थे.

लेकिन असलियत तो गुप्ताजी ही जानते थे, जिन पर अभी तक डांस बार की लड़कियों की खुमारी नहीं
उतरी थी.

Short Story: मेरे हिस्से की कोशिश

Short Story : ट्रेन अभी लुधियाना पहुंची नहीं थी और मेरा मन पहले ही घबराने लगा था. वहां मेरा घर है, वही घर जहां जाने को मेरा मन सदा मचलता रहता था. मेरा वह घर जहां मेरा अधिकार आज भी सुरक्षित है, किसी ने मेरा बुरा नहीं किया. जो भी हुआ है मेरी ही इच्छा से हुआ है. जहां सब मुझे बांहें पसारे प्यार से स्वीकार करना चाहते हैं और अब उसी घर में मैं जाने से घबराता हूं. ऐसा लगता है हर तरफ से हंसी की आवाज आती है. शर्म आने लगती है मुझे. ऐसा लगता है मां की नजरें हर तरफ से मुझे घूर रही हैं. मन में उमड़घुमड़ रहे झंझावातों में उलझा मैं अतीत में विचरण करने लगता हूं.

‘वाह बेटा, वाह, तेरे पापा को तो नई पत्नी मिल ही गई, वे मुझे भूल गए, पर क्या तुझे भी मां याद नहीं रही. कितनी आसानी से किसी अजनबी को मां कहने लगा है तू.’

‘ऐसा नहीं है मुन्ना कि तू मेरे पास आता है तो मुझे किसी तरह की तकलीफ होती है. बच्चे, मैं तेरी बूआ हूं. मेरा खून है तू. मेरे भैयाभाभी की निशानी है तू. तू घर नहीं जाएगा तो अपने पिता से और दूर हो जाएगा. बेटा, अपने पापा के बारे में तो सोच. उन के दिल पर क्या बीतती होगी जब तू लुधियाना आ कर भी अपने घर नहीं जाता. दादी की सोच, जो हर पल द्वार ही निहारती रहती हैं कि कब उन का पोता आएगा और…’

‘ये दादी न होतीं तो कितना अच्छा होता न… इतनी लंबी उम्र भी किस काम की. न इंसान मर सकता है और न ही पूरी तरह जी पाता है… हमारे ही साथ ऐसा क्यों हो गया बूआ?’

बूआ की गोद में छिप कर मैं जारजार रो पड़ा था. बुरा लगा होगा न बूआ को, उन की मां को कोस रहा था मैं. पिछले 10 साल से दादी अधरंग से ग्रस्त बिस्तर पर पड़ी हैं और मेरी मां चलतीफिरती, हंसतीखेलती दादी की दिनरात सेवा करतीं. एक दिन सोईं तो फिर उठी ही नहीं. हैरान रह गए थे हम सब. ऐसा कैसे हो सकता है, अभी तो सोई थीं और अभी…

‘अरे, यमराज रास्ता भूल गया. मुझे ले जाना था इसे क्यों ले गया… मेरा कफन चुरा लिया तू ने बेटी. बड़ी ईमानदार थी, फिर मेरे ही साथ बेईमानी कर दी.’

विलाप करकर के दादी थक गई थीं. मांगने से मौत मिल जाती तो दादी कब की इस संसार से जा चुकी होतीं. बस, यही तो नहीं होता न. अपने चाहे से मरा नहीं न जाता. मरने वाला छूट जाता है और जो पीछे रह जाते हैं वे तिलतिल कर मरते हैं क्योंकि अपनी इच्छा से मर तो पाते नहीं और मरने वाले के बिना जीना उन्हें आता ही नहीं.

‘इस होली पर जब आओ तो अपने ही घर जाना अनुज. भैया, मुझ से नाराज हो रहे थे कि मैं ही तुम्हें समझाती नहीं हूं. बेटे, अपने पापा का तो सोच. भाभी गईं, अब तू भी घर न जाएगा तो उन का क्या होगा?’

‘पिताजी का क्या? नई पत्नी और एक पलीपलाई बेटी मिल गई है न उन्हें.’

‘चुप रह, अनुज,’ बूआ बोलीं, ‘ज्यादा बकबक की तो एक दूंगी तेरे मुंह पर. क्या तू ने भैया को इस शादी के लिए नहीं मनाया था? हम सब तो तेरी शादी कर के बहू लाने की सोच रहे थे. तब तू ने ही समझाया था न कि मेरी शादी कर के समस्या हल नहीं होगी. कम उम्र की लड़की कैसे इतनी समस्याओं से जूझ पाएगी, हर पल की मरीज दादी का खानापीना और…’

‘हां, मुझे याद है बूआ, मैं नहीं कहता कि जो हुआ मेरी मरजी से नहीं हुआ. मैं ने ही पापा को मनाया था कि वे मेरी जगह अपनी शादी कर लें. विभा आंटी से भी मैं ने ही बात की थी. लेकिन अब बदले हालात में मैं यह सब सहन नहीं कर पा रहा हूं. घर जाता हूं तो हर कोने में मां की मौजूदगी का एहसास होने से बहुत तकलीफ होती है. जिस घर में मैं इकलौती संतान था अब एक 18-20 साल की लड़की जो मेरी कानूनी बहन है, वही अधिकारसंपन्न दिखाई देती है. दादी को नई बहू मिल गई, पापा को नई पत्नी और उस लड़की को पिता.’

‘यह तो सोचने की बात है न मुन्ना. तुझे भी तो एक बहन मिली है न. विभा को तू मां न कह लेकिन कोई रिश्ता तो उस से बांध ले. जितनी मुश्किल तेरे लिए है इस रिश्ते को स्वीकारने की उतनी ही मुश्किल उन के लिए भी है. वे भी कोशिश कर रहे हैं, तू भी तो कर. उस बच्ची के सिर पर हाथ रखेगा तभी तुझे  बड़प्पन का एहसास होगा. तू क्या समझता है उन दोनों के लिए आसान है एक टूटे घर में आ कर उस की किरचें समेटना, जहां कणकण में सिर्फ तेरी मां बसी हैं. तेरा घर तो वहीं है. उन मांबेटी के बारे में जरा सोच.

‘तुम चैन से दिल्ली में रह कर अगर अपनी नौकरी कर रहे हो तो इसीलिए कि विभा घर संभाल रही है. तुम्हारे पिता का खानापीना देखती है, दादी को संभालती है. क्या वह तुम्हारे घर की नौकरानी है, जिस का मानसम्मान करना तुम्हें भारी लग रहा है.

‘6 महीने हो गए हैं भाभी को मरे और इन 6 महीनों में क्या विभा ने कोई प्रयास नहीं किया तुम्हारे समीप आने का? वह फोन पर बात करना चाहती है तो तुम चुप रहते हो. घर आने को कहती है तो तुम घर नहीं जाते. अब क्या करे वह? उस का दोष क्या है. बोलो?’ बहुत नाराज थीं बूआ. किसी का भी कोई दोष नहीं है. मैं दोष किसे दूं. दोष तो समय का है, जिस ने मेरी मां को छीन लिया.

मैं निश्ंिचत हूं कि मेरे पिता का घर उजड़ कर फिर बस गया है और उस के लिए समूल प्रयास भी मेरा ही था. सब व्यवस्थित हैं. मेरे दोस्त विनय की विधवा चाची हैं विभा आंटी. हम दोनों के ही प्रयास से यह संभव हो पाया है.

मां तो एक ही होती है न, उन्हें मैं मां नहीं मान पा रहा हूं. और वह लड़की अणिमा, जो कल तक मेरे मित्र की चचेरी बहन थी अब मेरी भी बहन है. उम्र भर बहन के लिए मां से झगड़ा करता रहा, बहन का जन्म मां की मौत के बाद होगा, कब सोचा था मैं ने.

लुधियाना आ गया. ऐसा लग रहा था मानो गाड़ी का समूल भार पटरी पर नहीं मेरे मन पर है. एक अपराधबोध का बोझ. क्या सचमुच मैं ने अपनी मां के साथ अन्याय किया है? घर आ गया मैं. कांपते हाथ से मैं ने दरवाजे की घंटी बजा दी. मां की जगह कोई और होगी, इसी भाव से समूल चेतना सुन्न होने लगी.

‘‘आ गया मुन्ना…बेटा, आ जा.’’

दादी का स्वर कानों में पड़ा. दरवाजा खुला था. पापा भी नहीं थे घर पर. दादी अकेली थीं. दादी ने पास बिठा कर प्यार किया और देर तक रोते रहे हम.

‘‘बड़ा निर्मोही है रे मुन्ना. घर की याद नहीं आती.’’

अब क्या उत्तर दूं मैं. चारों तरफ नजर घुमा कर देखा.

‘‘दादी, कहां गए हैं सब. पापा कहां हैं?’’

‘‘अणिमा कहीं चली गई है. विभा और तेरा बाप उसे ढूंढ़ने गए हैं.’’

‘‘कहीं चली गई. क्या मतलब?’’

‘‘इस घर में उस का मन नहीं लगता,’’ दादी बोलीं, ‘‘तू भी तो आता नहीं. यह घर उजड़ गया है मुन्ना. खुशी तो सारी की सारी तेरी मां अपने साथ ले गई. मुझे भी तो मौत नहीं न आती. सभी घुटेघुटे जी रहे हैं. कोई भी तो खुश नहीं है न. इस तरह नहीं जिया जाता मुन्ना.’’

चारों तरफ एक उदासी सी नजर आई मुझे. उठ कर सारा घर देख आया. मेरा कमरा वैसा का वैसा ही था जैसा पहले था. जाहिर था कि इस कमरे में कोई नहीं रहता. पापा को फोन किया.

‘‘पापा, कहां हैं आप? मैं घर आया और आप कहां चले गए?’’

‘‘अणिमा अपने घर चली आई है मुन्ना. वह वापस आना ही नहीं चाहती. विनय भी यहीं है.’’

‘‘पापा, आप घर आइए. मैं वहां पहुंचता हूं. मैं बात करता हूं उस से.’’

घटनाक्रम इतनी जल्दी बदल जाएगा किस ने सोचा था. मैं जो खुद अपने घर आना नहीं चाहता अब अपने से 8 साल छोटी लड़की से पूछने जा रहा हूं कि वह घर क्यों नहीं आती? कैसी विडंबना है न, जिस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है उसी सवाल का जवाब उस से पूछने जा रहा हूं.  जब मैं विनय और अणिमा के पास पहुंचा तब तक पापा घर के लिए निकल चुके थे. विभा आंटी भी पापा के साथ लौट चुकी थीं. अणिमा वहां विनय के साथ थी.

‘‘वह घर मेरा नहीं है विनय भैया. देखा न मेरी मां उस आदमी के साथ चली भी गईं. मेरी चिंता नहीं है उन्हें. अनुज की मां तो उसे मर कर छोड़ गईं, मेरी मां तो मुझे जिंदा ही छोड़ गईं. अब मां मुझे प्यार नहीं करतीं. अनुज घर नहीं आता तो क्या मेरा दोष है? उस के कमरे में मत जाओ, उस की चीजों को मत छेड़ो, मेरा घर कहां है, विनय भैया. घर तो मेरी मां को मिला है न, मुझे नहीं. मेरे अपने पिता का घर है न यह. मैं यहीं रहूंगी अपने घर में. नहीं जाऊंगी वहां.’’

दरवाजे की ओट में बस खड़ा का खड़ा रह गया मैं. इस की पीड़ा मेरी ही तो पीड़ा है न. काटो तो खून नहीं रहा मुझ में. किस शब्दकोष का सहारा ले कर इस लड़की को समझाऊं. गलत तो कहीं नहीं है न यह लड़की. सब को अपनी ही पीड़ा बड़ी लगती है. मैं सोच रहा था मेरा घर कहीं नहीं रहा और यह लड़की अणिमा भी तो सही कह रही है न.

‘‘आसान नहीं है पराए घर में जा कर रहना. वह उन का घर है, मेरा नहीं. मैं यहां रहूं तो अनुज के पापा को क्या समस्या है?’’

‘‘तुम अकेली कैसे रह सकती हो यहां?’’

‘‘क्यों नहीं रह सकती. यह मेरा कमरा है. यह मेरा सामान है.’’

‘‘वह घर भी तुम्हारा ही है, अणिमा.’’

विनय अपनी चचेरी बहन अणिमा को समझा रहा था और वह समझना नहीं चाह रही थी. जैसे किसी और में मां को देखना मेरे लिए मुश्किल है उसी तरह मेरे पिता को अपना पिता बना लेना इस के लिए भी आसान नहीं हो सकता. भारी कदमों से सामने चला आया मैं. कुछ कहतीकहती रुक गई अणिमा. कितनी बदलीबदली सी लग रही है वह. चेहरे की मासूमियत अब कहीं है ही नहीं. हालात इंसान को समय से पहले ही बड़ा बना देते हैं न. उस की सूजीसूजी आंखें बता रही हैं कि वह बहुत देर से रो रही है. मैं घर नहीं आता हूं तो क्या उस का गुस्सा पापा और दादी इस बच्ची पर उतारते हैं? ठीक ही तो किया इस ने जो घर ही छोड़ कर आ गई. इस की जगह मैं होता तो मैं भी यही करता. ‘‘ओह, आ गए तुम भी.’’

दांत पीस कर कहा अणिमा ने. मेरे लिए उस के मन में उमड़ताघुमड़ता जहर जबान पर न आ जाए तो क्या करे.

इस रिश्ते में तो कुछ भी सामान्य नहीं है. इस रिश्ते को बचाने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी. अणिमा मेरी बहन नहीं थी लेकिन इसे अपनी बहन मानना पड़ेगा मुझे. स्नेह दे कर अपना बनाना होगा मुझे. यही मेरी न हो पाई तो विभा आंटी भी मेरी मां कभी नहीं बन सकेंगी. कब तक वे भी इस घर और उस घर में सेतु का काम कर पाएंगी. पास आ कर अणिमा के सिर पर हाथ रखा मैं ने. झरझर बह चली उस की आंखें जैसे पूछ रही हों मुझ से, ‘अब और क्या करूं मैं?’

‘‘मैं राखी पर नहीं आया, वह मेरी भूल थी. अब आया हूं तो क्या तुम यहां छिपी रहोगी. तिलक नहीं लगाओगी मुझे?’’

विनय भीगी आंखों से मुझे देख रहा था, मानो कह रहा हो जहां तक उसे करना था उस ने किया, इस से आगे तो जो करना है मुझे ही करना है.  अणिमा को अपनी छाती से लगा लिया तो नन्ही सी बालिका की तरह जारजार रो पड़ी वह. उस की भावभंगिमा समझ पा रहा था मैं. अपने हिस्से की कोशिश तो वह कर चुकी है. अब बाकी तो मेरे हिस्से की कोशिश है.

‘‘अपने घर चलो, अणिमा. यह घर भी तुम्हारा है, पगली. लेकिन उस घर में हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है. मैं तुम सब से दूर रहा वह मेरी गलती थी. अब आया हूं तो तुम तो दूर मत रहो.  ‘‘मां से सदा बहन मांगा करता था. कुछ खो कर कुछ पाना ही शायद मेरे हिस्से में लिखा था इस तरह. तो इसी तरह ही सही, अणिमा के आंसू पोंछ मैं ने उस का मस्तक चूम लिया. जिस ममत्व से वह मेरे गले लगी थी उस से यह आभास पूर्ण रूप से हो रहा था मुझे कि देर हुई है तो मेरी ही तरफ से हुई है. अणिमा तो शायद पहले ही दिन से मुझे अपना मान चुकी थी.

Short Story : एक दिन का बौयफ्रैंड

Short Story : ‘‘क्या तुम मेरे एक दिन के बौयफ्रैंड बनोगे?’’ उस लड़की के कहे ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे. मैं हक्काबक्का सा उस की तरफ देखने लगा. काली, लंबी जुल्फों और मुसकराते चेहरे के बीच चमकती उस की 2 आंखें मेरे दिल को धड़का गईं. एक अजनबी लड़की के मुंह से इस तरह का प्रस्ताव सुन कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

मैं अच्छे घर का होनहार लड़का हूं. प्यार और शादी को ले कर मेरे विचार बिलकुल स्पष्ट हैं. बहुत पहले एक बार प्यार में पड़ा था पर हमारी लव स्टोरी अधिक दिनों तक नहीं चल सकी. लड़की बेवफा निकली. वह न सिर्फ मुझे, बल्कि दुनिया छोड़ कर गई और मैं अकेला रह गया.

लाख चाह कर भी मैं उसे भुला नहीं सका. सोच लिया था कि अब अरेंज्ड मैरिज करूंगा. घर वाले जिसे पसंद करेंगे, उसे ही अपना जीवनसाथी मान लूंगा.

अगले महीने मेरी सगाई है. लड़की को मैं ने देखा नहीं है पर घर वालों को वह बहुत पसंद आई है. फिलहाल मैं अपने मामा के घर छुट्टियां बिताने आया हूं. मेरे घर पहुंचते ही सगाई की तैयारियां शुरू हो जाएंगी.

‘‘बोलो न, क्या तुम मेरे साथ..,’’ उस ने फिर अपना सवाल दोहराया.

‘‘मैं तो आप को जानता भी नहीं, फिर कैसे…’’ में उलझन में था.

‘‘जानते नहीं तभी तो एक दिन के लिए बना रही हूं, हमेशा के लिए नहीं,’’ लड़की ने अपनी बड़ीबड़ी आंखों को नचाया. ‘‘दरअसल,

2-4 महीनों में मेरी शादी हो जाएगी. मेरे घर

वाले बहुत रूढि़वादी हैं. बौयफ्रैंड तो दूर कभी मुझे किसी लड़के से दोस्ती भी नहीं करने दी. मैं ने अपनी जिंदगी से समझौता कर लिया है. घर

वाले मेरे लिए जिसे ढूंढ़ेंगे उस से आंखें बंद कर शादी कर लूंगी. मगर मेरी सहेलियां कहती हैं कि शादी का मजा तो लव मैरिज में है, किसी को बौयफ्रैंड बना कर जिंदगी ऐंजौय करने में है. मेरी सभी सहेलियों के बौयफ्रैंड हैं. केवल मेरा ही कोई नहीं है.

‘‘यह भी सच है कि मैं बहुत संवेदनशील लड़की हूं. किसी से प्यार करूंगी तो बहुत गहराई से करूंगी. इसी वजह से इन मामलों में फंसने से डर लगता है. मैं जानती हूं कि मैं तुम्हें आजकल की लड़कियों जैसी बिलकुल नहीं लग रही होऊंगी. बट बिलीव मी, ऐसी ही हूं मैं. फिलहाल मुझे यह महसूस करना है कि बौयफ्रैंड के होने से जिंदगी कैसा रुख बदलती है, कैसा लगता है सब कुछ, बस यही देखना है मुझे. क्या तुम इस में मेरी मदद नहीं कर सकते?’’

‘‘ओके, पर कहीं मेरे मन में तुम्हारे लिए फीलिंग्स आ गईं तो?’’

‘‘तो क्या है, वन नाइट स्टैंड की तरह हमें एक दिन के इस अफेयर को भूल जाना है. यह सोच कर ही मेरे साथ आना. बस एक दिन खूब मस्ती करेंगे, घूमेंगेफिरेंगे. बोलो क्या कहते हो? वैसे भी मैं तुम से 5 साल बड़ी हूं. मैं ने तुम्हारे ड्राइविंग लाइसैंस में तुम्हारी उम्र देख ली है. यह लो. रास्ते में तुम से गिर गया था. यही लौटाने आई थी. तुम्हें देखा तो लगा कि तुम एक शरीफ लड़के हो. मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे, इसीलिए यह प्रस्ताव रखा है.’’

मैं मुसकराया. एक अजीब सा उत्साह था मेरे मन में. चेहरे पर मुसकराहट की रेखा गहरी होती गई. मैं इनकार नहीं कर सका. तुरंत हामी भरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, परसों सुबह 8 बजे इसी जगह आ जाना. उस दिन मैं पूरी तरह तुम्हारा बौयफ्रैंड हूं.’’

‘‘ओके थैंक्यू,’’ कह कर मुसकराती हुई वह चली गई.

घर आ कर भी मैं सारा समय उस के बारे में सोचता रहा.

2 दिन बाद तय समय पर उसी जगह पहुंचा तो देखा वह बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी.

‘‘हाय डियर,’’ कहते हुए वह करीब आ गई.

‘‘हाय,’’ मैं थोड़ा सकुचाया.

मगर उस लड़की ने झट से मेरा हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘चलो, अब से तुम मेरे बौयफ्रैंड हुए. कोई हिचकिचाहट नहीं, खुल कर मिलो यार.’’

मैं ने खुद को समझाया, बस एक दिन. फिर कहां मैं, कहां यह. फिर हम 2 अजनबियों ने हमसफर बन कर उस एक दिन के खूबसूरत सफर की शुरुआत की. प्रिया नाम था उस का. मैं गाड़ी ड्राइव कर रहा था और वह मेरी बगल में बैठी थी. उस की जुल्फें हौलेहौले उस के कंधों पर लहरा रही थीं. भीनीभीनी सी उस की खुशबू मुझे आगोश में लेने लगी थी. एक अजीब सा एहसास था, जो मेरे जिस्म को महका रहा था. मैं एक गीत गुनगुनाने लगा. वह एकटक मुझे निहारती हुई बोली, ‘‘तुम तो बहुत अच्छा गाते हो.’’

‘‘हां थोड़ाबहुत गा लेता हूं… जब दिल को कोई अच्छा लगता है तो गीत खुद ब खुद होंठों पर आ जाता है.’’

मैं ने डायलौग मारा तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी. दूधिया चांदनी सी छिटक कर उस की हंसी मेरी सांसों को छूने लगी. यह क्या हो रहा है मुझे. मैं मन ही मन सोचने लगा.

तभी उस ने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया, ‘‘माई प्रिंस चार्मिंग, हम जा कहां रहे हैं?’’

‘‘जहां तुम कहो. वैसे मैं यहां की सब से रोमांटिक जगह जानता हूं, शायद तुम भी जाना चाहोगी,’’ मेरी आवाज में भी शोखी उतर आई थी.

‘‘श्योर, जहां तुम चाहो ले चलो. मैं ने तुम पर शतप्रतिशत विश्वास किया है.’’

‘‘पर इतने विश्वास की वजह?’’

‘‘किसीकिसी की आंखों में लिखा होता है कि वह शतप्रतिशत विश्वास के योग्य है. तभी तो पूरी दुनिया में एक तुम्हें ही चुना मैं ने अपना बौयफ्रैंड बनाने को.’’

‘‘देखो तुम मुझ से इमोशनली जुड़ने की कोशिश मत करो. बाद में दर्द होगा.’’

‘‘किसे? तुम्हें या मुझे?’’

‘‘शायद दोनों को.’’

‘‘नहीं, मैं प्रैक्टिकल हूं. मैं बस 1 दिन के लिए ही तुम से जुड़ रही हूं, क्योंकि मैं जानती हूं हमारे रिश्ते को सिर्फ इतने समय की ही मंजूरी मिली है.’’

‘‘हां, वह तो है. मैं अपने घर वालों के खिलाफ नहीं जा सकता.’’

‘‘अरे यार, खिलाफ जाने को किस ने कहा? मैं तो खुद पापा के वचन में बंधी हूं. उन के दोस्त के बेटे से शादी करने वाली हूं. 6-7 महीनों में वह इंडिया आ जाएगा और फिर चट मंगनी पट विवाह. हो सकता है मैं हमेशा के लिए पैरिस चली जाऊं,’’ उस ने सहजता से कहा.

‘‘तो क्या तुम भी ‘कुछकुछ होता है’ मूवी की सिमरन की तरह किसी अजनबी से शादी करने वाली हो, जिसे तुम ने कभी देखा भी नहीं है?’’ कहते हुए मैं ने उस की आंखों में झांका. वह हंसती हुई बोली, ‘‘हां, ऐसा ही कुछ है. पर चिंता न करो. मैं तुम्हें शाहरुख यानी राज की तरह अपनी जिंदगी में नहीं आने दूंगी. शादी तो मैं उसी से करूंगी जिस से पापा चाहते हैं.’’

‘‘तो फिर यह सब क्यों? मेरे इमोशंस के साथ क्यों खेल रही हो?’’

‘‘अरे यार, मैं कहां खेल रही हूं? फर्स्ट मीटिंग में ही मैं ने साफ कह दिया था कि हम केवल 1 दिन के रिश्ते में हैं.’’

‘‘हां वह तो है. ओके बाबा, आई ऐम सौरी. चलो आ गई हमारी मंजिल.’’

‘‘वैरी नाइस. बहुत सुंदर व्यू है,’’ कहते हुए उस के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

थोड़ा घूमने के बाद वह मेरे पास आती हुई बोली, ‘‘लो अब मुझे अपनी बांहों में भरो जैसे फिल्मों में करते हैं.’’

वह मेरे और करीब आ गई. उस की जुल्फें मेरे कंधों पर लहराने लगीं. लग रहा था जैसे मेरी पुरानी गर्लफ्रैंड बिंदु ही मेरे पास खड़ी है. अजीब सा आकर्षण महसूस होने लगा. मैं अलग हो गया, ‘‘नहीं, यह नहीं होगा मुझ से. किसी गैर लड़की को मैं करीब क्यों आने दूं?’’

‘‘क्यों, तुम्हें डर लग रहा है कि मैं यह वीडियो बना कर वायरल न कर दूं?’’ वह शरारत से खिलखिलाई. मैं ने मुंह बनाया, ‘‘बना लो. मुझे क्या करना है? वैसे भी मैं लड़का हूं. मेरी इज्जत थोड़े ही जा रही है.’’

‘‘वही तो मैं तुम्हें समझा रही हूं. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, तुम तो लड़के हो,’’ वह फिर से मुसकराई, ‘‘वैसे तुम आजकल के लड़कों जैसे बिलकुल नहीं.’’

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‘‘आजकल के लड़कों से क्या मतलब है? सब एकजैसे नहीं होते.’’

‘‘वही तो बात है. इसीलिए तो तुम्हें चुना है मैं ने, क्योंकि मुझे पता था तुम मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे वरना किसी और लड़के को ऐसा मौका मिलता तो उसे लगता जैसे लौटरी लग गई हो.’’

‘‘तुम मेरे बारे में इतनी श्योर कैसे हो कि वाकई मैं शरीफ ही हूं? तुम कैसे जानती हो कि मैं कैसा हूं और कैसा नहीं हूं?’’

‘‘तुम्हारी आंखों ने सब बता दिया मेरी जान, शराफत आंखों पर लिखी होती है. तुम नहीं जानते?’’

इस लड़की की बातें पलपल मेरे दिल को धड़काने लगी थीं. बहुत अलग सी थी वह. काफी देर तक हम इधरउधर घूमते रहे. बातें करते रहे.

एक बार फिर वह मेरे करीब आती हुई बोली, ‘‘अपनी गर्लफ्रैंड को हग भी नहीं करोगे?’’ वह मेरे सीने से लग गई. लगा जैसे वह पल वहीं ठहर गया हो. कुछ देर तक हम ऐसे ही खड़े रहे. मेरी बढ़ी हुई धड़कनें शायद वह भी महसूस कर रही थी. मैं ने भी उसे आगोश में ले लिया. उस पल को ऐसा लगा जैसे आकाश और धरती एकदूसरे से मिल गए हों. कुछ पल बाद उस ने खुद को अलग किया और दूर जा कर खड़ी हो गई.

‘‘बस, कुछ और हुआ तो हमारे कदम बहक जाएंगे. चलो वापस चलते हैं,’’ वह बोली. मैं अपनेआप को संभालता हुआ बिना कुछ कहे उस के पीछेपीछे चलने लगा. मेरी सांसें रुक रही थीं. गला सूख रहा था. गाड़ी में बैठ कर मैं ने पानी की पूरी बोतल खाली कर दी.

सहसा वह हंस पड़ी, ‘‘जनाब, ऐसा लग रहा था जैसे शराब की बोतल एक बार में ही हलक के नीचे उतार रहे हो.’’

उस के बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था कि मुझे हंसी आ गई. ‘‘सच, बहुत अच्छी हो तुम. मुझे डर है कहीं तुम से प्यार न हो जाए,’’ मैं ने कहा.

‘‘छोड़ो भी यार. मैं बड़ी हूं तुम से, इस तरह की बातें सोचना भी मत.’’

‘‘मगर मैं क्या करूं? मेरा दिल कुछ और कह रहा है और दिमाग कुछ और.’’

‘‘चलता है. तुम बस आज की सोचो और यह बताओ कि हम लंच कहां करने वाले हैं?’’

‘‘एक बेहतरीन जगह है मेरे दिमाग में. बिंदु के साथ आया था एक बार. चलो वहीं चलते हैं,’’ मैं ने वृंदावन रैस्टोरैंट की तरफ गाड़ी मोड़ते हुए कहा, ‘‘घर के खाने जैसा बढि़या स्वाद होता है यहां के खाने का और अरेंजमैंट देखो तो लगेगा ही नहीं कि रैस्टोरैंट आए हैं. गार्डन में बेंत की टेबलकुरसियां रखी हुई हैं.’’

रैस्टोरैंट पहुंच कर उत्साहित होती हुई प्रिया बोली, ‘‘सच कह रहे थे तुम. वाकई लग रहा है जैसे पार्क में बैठ कर खाना खाने वाले हैं हम… हर तरफ ग्रीनरी. सो नाइस. सजावटी पौधों के बीच बेंत की बनी डिजाइनर टेबलकुरसियों पर स्वादिष्ठ खाना, मन को बहुत सुकून देता होगा.

है न?’’

मैं खामोशी से उस का चेहरा निहारता रहा. लंच के बाद हम 2-1 जगह और गए. जी भर कर मस्ती की. अब तक हम दोनों एकदूसरे से खुल गए थे. बातें करने में भी मजा आ रहा था. दोनों ने ही एकदूसरे की कंपनी बहुत ऐंजौय की थी, एकदूसरे की पसंदनापसंद, घरपरिवार, स्कूलकालेज की कितनी ही बातें हुईं.

थोड़ीबहुत प्यार भरी बातें भी हुईं. धीरेधीरे शाम हो गई और उस के जाने का समय आ गया. मुझे लगा जैसे मेरी रूह मुझ से जुदा हो रही है, हमेशा के लिए.

‘‘कैसे रह पाऊंगा मैं तुम से मिले बिना? नहीं प्रिया, तुम्हें अपना नंबर देना होगा मुझे,’’ मैं ने व्यथित स्वर में कहा.

‘‘आर यू सीरियस?’’

‘‘यस आई ऐम सीरियस,’’ मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मुझे नहीं लगता कि अब मैं तुम्हें भूल सकूंगा. नो प्रिया, आई थिंक आई लाइक यू वैरी मच.’’

‘‘वह डील न भूलो मयंक,’’ प्रिया ने याद दिलाया.

‘‘मगर दोस्त बन कर तो रह सकते हैं न?’’

‘‘नो, मैं कमजोर पड़ गई तो? यह रिस्क मैं नहीं उठा सकती.’’

‘‘तो ठीक है. आई विल मैरी यू,’’ मैं ने जल्दी से कहा. उस से जुदा होने के खयाल से ही मेरी आंखें भर आई थीं. एक दिन में ही जाने कैसा बंधन जोड़ लिया था उस ने कि दिल कर रहा था हमेशा के लिए वह मेरी जिंदगी में आ जाए.

वह मुझ से दूर जाती हुई बोली, ‘‘गुडबाय मयंक, मैं शादी वहीं करूंगी जहां पापा चाहते हैं. तुम्हारा कोई चांस नहीं. भूल जाना मुझे.’’ वह चली गई और मैं पत्थर की मूर्त बना उसे जाते देखता रहा. दिल भर आया था मेरा. ड्राइविंग सीट पर अकेला बैठा अचानक फफकफफक कर रो पड़ा. लगा जैसे एक बार फिर से बिंदु मुझे अकेला छोड़ कर चली गई है. जाना ही था तो फिर जरूरत क्या थी मेरी जिंदगी में आने की. किसी तरह खुद को संभालता हुआ घर लौटा. दिन का चैन, रात की नींद सब लुट चुकी थी. जाने कहां से आई थी वह और कहां चली गई थी? पर एक दिन में मेरी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी. देवदास बन गया था मैं. इधर घर वाले मेरी सगाई की तैयारियों में लगे थे. वे मुझे उस लड़की से मिलवाने ले जाना चाहते थे, जिसे उन्होंने पसंद किया था. पर मैं ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘मैं शादी नहीं करूंगा,’’ मेरा इतना कहना था कि घर में कुहराम मच गया.

‘‘क्यों, कोई और पसंद आ गई?’’ मां ने अलग ले जा कर पूछा.

‘‘हां.’’ मैं ने सीधा जवाब दिया.

‘‘तो ठीक है, उसी से बात करते हैं. पता और फोन नंबर दो.’’

‘‘मेरे पास कुछ नहीं है.’’

‘‘कुछ नहीं, यह कैसा प्यार है?’’ मां ने कहा.

‘‘क्या पता मां, वह क्या चाहती थी? अपना दीवाना बना लिया और अपना कोई अतापता भी नहीं दिया.’’

फिर मैं ने उन्हें सारी कहानी सुनाई तो वे खामोश रह गईं. 6 माह बीत गए. आखिर घर वालों की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. लड़की वाले हमारे घर आए. मुझे जबरन लड़की के पास भेजा गया. उस कमरे में कोई और नहीं था. लड़की दूसरी तरफ चेहरा किए बैठी थी. मैं बहुत अजीब महसूस कर रहा था.

लड़की की तरफ देखे बगैर मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं आप को किसी भ्रम में नहीं रखना चाहता. दरअसल मैं किसी और से प्यार करने लगा हूं और अब उस के अलावा किसी से शादी का खयाल भी मुझे रास नहीं आ रहा. आई एम सौरी. आप इस रिश्ते के लिए न कह दीजिए.’’

‘‘सच में न कह दूं?’’ लड़की के स्वर मेरे कानों से टकराए तो मैं हैरान रह गया. यह तो प्रिया के स्वर थे. मैं ने लड़की की तरफ देखा तो दिल खुशी से झूम उठा. यह वाकई प्रिया ही थी.

‘‘तुम?’’

‘‘हां मैं, कोई शक?’’ वह मुसकराई.

‘‘पर वह सब क्या था प्रिया?’’

‘‘दरअसल, मैं अरेंज्ड नहीं, लव मैरिज करना चाहती थी. अत: पहले तुम से प्यार का इजहार कराया, फिर इस शादी के लिए रजामंदी दी. बताओ कैसा लगा मेरा सरप्राइज.’’

‘‘बहुत खूबसूरत,’’ मैं ने पल भर भी देर नहीं की कहने में और फिर उसे बांहों में भर लिया.

Hindi Story : चमत्कार – क्या पूरा हो पाया नेहा और मनीष का प्यार

Hindi Story : ड्राइंगरूम में बैठे पापा अखबार पढ़ रहे थे और उन के पास बैठी मम्मी टीवी देख रही थीं. मैं ने जरा ऊंची आवाज में दोनों को बताया, ‘‘आप दोनों से मिलने मनीष 2 घंटे के बाद आ रहा है.’’

‘‘किसलिए?’’ पापा ने आदतन फौरन माथे पर बल डाल लिए.

‘‘शादी की बात करने.’’

‘‘शादी की बात करने वह हमारे यहां क्यों आ रहा है?’’

‘‘क्या बेकार का सवाल पूछ रहे हैं आप?’’ मम्मी ने भी आदतन तीखे लहजे में पापा को झिड़का और फिर उत्तेजित लहजे में मुझ से पूछा, ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया है?’’

‘‘हां, मम्मी.’’

‘‘गुड…वेरी गुड,’’ मम्मी खुशी से उछल पड़ीं.

‘‘बट आई डोंट लाइक दैट बौय,’’ पापा ने चिढ़े लहजे में अपनी राय जाहिर की तो मम्मी फौरन उन से भिड़ने को तैयार हो गईं.

‘‘मनीष क्यों आप को पसंद नहीं है? क्या कमी है उस में?’’ मम्मी का लहजा फौरन आक्रामक हो उठा.

‘‘हमारी नेहा के सामने उस का व्यक्तित्व कुछ भी नहीं है. जंचता नहीं है वह हमारी बेटी के साथ.’’

‘‘मनीष कंप्यूटर इंजीनियर है. उस के पिताजी आप से कहीं ज्यादा ऊंची पोस्ट पर हैं. वह फ्लैट नहीं बल्कि कोठी में रहता है. मुझे तो वह हर तरह से नेहा के लिए उपयुक्त जीवनसाथी नजर आता है.’’

‘‘तुझे तो वह जंचेगा ही,’’ पापा गुस्से में बोले, ‘‘क्योंकि मैं जो उसे पसंद नहीं कर रहा हूं. मेरे खिलाफ बोलते हुए ही तो तू ने सारी जिंदगी गुजारी है.’’

‘‘पापा, आई लव मनीष. मुझे अपना जीवनसाथी चुनने…’’

मम्मी ने मुझे अपनी बात पूरी नहीं कहने दी और पापा से भिड़ना जारी रखा, ‘‘मैं ने आप के साथ जिंदगी गुजारी नहीं, बल्कि बरबाद की है. रातदिन की कलह, टोकाटाकी और बेइज्जती के सिवा कुछ नहीं मिला है मुझे पिछले 25 साल में.’’

‘‘इनसान जिस लायक होता है उसे वही मिलता है. बुद्धिहीन इनसान को जिंदगी भर जूते ही खाने को मिलेंगे.’’

‘‘आप के पास भी जहरीली जबान ही है, दिमाग नहीं. क्या यह समझदारी का लक्षण है कि बेटी शादी करने की अपनी इच्छा बता रही है और आप क्लेश करने पर उतारू हैं.’’

‘‘मैं अपनी बेटी के लिए मनीष से कहीं ज्यादा बेहतर लड़का ढूंढ़ सकता हूं.’’

‘‘पहली बात तो यह कि आज तक आप ने नेहा के लिए एक भी रिश्ता नहीं ढूंढ़ा है. दूसरी बात कि जब नेहा मनीष से प्रेम करती है तो शादी भी उसी से करेगी या नहीं?’’

‘‘यह प्रेमव्रेम कुछ नहीं होता. जो फैसला बड़े सोचसमझ और ऊंचनीच देख कर करते हैं, वही बेहतर होता है.’’

‘‘प्रेम के ऊपर आप नहीं तो और कौन लेक्चर देगा?’’ मम्मी ने तीखा व्यंग्य किया, ‘‘शादी के बाद भी आप प्रेम के क्षेत्र में रिसर्च जो करते रहे हैं.’’

‘‘मैं किसी भी औरत से हंसूंबोलूं, तो तुझे हमेशा चिढ़ ही हुई है. जिस आदमी की पत्नी लड़झगड़ कर महीने में 15 दिन मायके में पड़ी रहती थी वह अपने मनोरंजन के लिए दूसरी औरतों से दोस्ती करेगा ही.’’

‘‘मेरी गोद में नेहा न आ गई होती तो मैं ने आप से तलाक ले लिया होता,’’ अब मम्मी की आंखों में आंसू छलक आए थे.

‘‘बातबात पर पुलिस बुला कर पति को हथकडि़यां लगवा देने वाली पत्नी को तलाक देने की इच्छा किस इनसान के मन में पैदा नहीं होगी? मैं भी इस नेहा के सुखद भविष्य के कारण ही तुम से बंधा रहा, नहीं तो मैं ने तलाक जरूर…’’

‘‘अब आप दोनों चुप भी हो जाओ,’’ मैं इतनी जोर से चिल्लाई कि मम्मी और पापा जोर से चौंक कर सचमुच खामोश हो गए.

‘‘घर में आप का होने वाला दामाद कुछ ही देर में आ रहा है,’’ मैं ने उन दोनों को सख्त स्वर में चेतावनी दी, ‘‘अगर उसे आप दोनों ने आपस में गंदे ढंग से झगड़ने की हलकी सी झलक भी दिखाई, तो मुझ से बुरा कोई न होगा.’’

‘‘मैं बिलकुल चुप रहूंगी, गुडि़या. तू गुस्सा मत हो और अच्छी तरह से तैयार हो जा,’’ मम्मी एकदम से शांत नजर आने लगी थीं.

‘‘मैं भी बाजार से कुछ खानेपीने का सामान लाने को निकलता हूं,’’ नाखुश नजर आ रहे पापा मम्मी को गुस्से से घूरने के बाद बैडरूम की तरफ चले गए.

अपने कमरे में पहुंचने के बाद मेरी आंखों में आंसू भर आए थे. अपने मातापिता को बचपन से मैं बातबात पर यों ही लड़तेझगड़ते देखती आई हूं. अपनी- अपनी तीखी, कड़वी जबानों से दोनों ही एकदूसरे के दिलों को जख्मी करने का कोई मौका नहीं चूकते हैं.

वे दोनों ही मेरे भविष्य का निर्माण अपनेअपने ढंग से करना चाहते थे. अकसर उन के बीच झड़पें मुझे ले कर ही शुरू होतीं.

मम्मी चाहती थीं कि उन की सुंदर बेटी प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी बने. उन्होंने मुझे सदा अच्छा पहनाया, मुझे डांस और म्यूजिक की ट्रेनिंग दिलवाई. मेरी हर इच्छा को पूरी करने के लिए वे तैयार रहती थीं. वे खुद कमाती थीं, इसलिए मुझ पर पैसा खर्च करने में उन्हें कभी दिक्कत नहीं हुई.

पापा का जोर सदा इस बात पर रहता कि मेरा कैरियर बड़ा शानदार बने. वे मुझे डाक्टर या आई.ए.एस. अफसर बनाना चाहते थे. मेरे स्वास्थ्य की भी उन्हें फिक्र रहती. मैं खूब जूस और दूध पिऊं और नियमित रूप से व्यायाम करूं, ऐसी बातों पर उन का बड़ा जोर रहता.

वैसे सचाई यही है कि मेरी मम्मी के साथ ज्यादा अच्छी पटती रही क्योंकि पापा को खुश करना मेरे खुद के लिए टेंशन का काम बन जाता था. पापा की डांट से बचाने के लिए मम्मी मेरी ढाल हमेशा बन जाती थीं.

मुझे ले कर उन के बीच सैकड़ों बार झगड़ा हुआ होगा. जब एक बार  दोनों का मूड बिगड़ जाता तो अन्य क्षेत्रों में भी उन के बीच टकराव और तकरार का जन्म हो जाता. मम्मी ने 5-6 साल पहले ऐसे ही एक झगड़े में पुलिस बुला ली थी. मुझे वह सारी घटना अच्छी तरह से याद है. उस दिन डर कर मैं खूब रोई थी.

मैं न होती तो वे दोनों कब के अलग हो गए होते, ऐसी धमकियां मैं ने हजारों बार उन दोनों के मुंह से सुनी थीं. अब मनीष से शादी कर मैं सिंगापुर जाने वाली थी. मेरी गैरमौजूदगी में कहीं इन दोनों के बीच कोई अनहोनी न घट जाए, इस सोच के चलते मेरा मन कांपना शुरू हो गया था.

मनीष आया तो मम्मी ने प्यार से उसे गले लगा कर स्वागत किया था. पापा भी जब उस से मुसकरा कर मिले तो मैं ने मन ही मन बड़ी राहत महसूस की थी.

‘‘हम दोनों अगले हफ्ते शादी करना चाहते हैं क्योंकि 15 दिन बाद मुझे सिंगापुर में नई कंपनी जौइन करनी है. अभी शादी नहीं हुई तो मामला साल भर के लिए टल जाएगा,’’ मनीष ने उन्हें यह जानकारी दी, तो मम्मीपापा दोनों के चेहरों पर टेंशन नजर आने लगा था.

‘‘सप्ताह भर का समय तो बड़ा कम है, मनीष. हम सारी तैयारियां कैसे कर पाएंगे?’’ मम्मी चिंतित हो उठीं.

‘‘आंटी, शादी का फंक्शन छोटा ही करना पड़ेगा.’’

‘‘वह क्यों?’’ पापा के माथे में फौरन बल पड़े तो उन्हें शांत रखने को मैं ने उन का हाथ अपने हाथ में ले कर अर्थपूर्ण अंदाज में दबाया.

‘‘सच बात यह है कि मेरे मम्मीपापा इस रिश्ते से बहुत खुश नहीं हैं. मैं ने इसी वजह से कल रात ही उन्हें नेहा से शादी करने की बात तब बताई जब नई कंपनी से मुझे औफर लैटर मिल गया. उन दोनों की नाखुशी के चलते बड़ा फंक्शन करना संभव नहीं है न, अंकल.’’

‘‘मेरी बेटी लाखों में एक है, मनीष. उन्हें तो इस रिश्ते से खुश होना चाहिए.’’

‘‘आई नो, अंकल, पर वे दोनों आप दोनों जितने समझदार नहीं हैं जो अपनी संतान की खुशी को सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानें.’’

मनीष की इस बात को सुन कर मुझे अचानक इतनी जोर से हंसी आई कि मुझे ड्राइंगरूम से उठ कर रसोई में जाना ही उचित लगा था.

उस पूरे सप्ताह खूब भागदौड़ रही. मम्मी व पापा को इस भागदौड़ के दौरान जब भी फुरसत मिलती, वे आपस में जरूर उलझ पड़ते. मैं दोनों पर कई बार गुस्से से चिल्लाई, तो कई बार आंखों से आंसू भी बहाए. जो रिश्तेदार इकट्ठे हुए थे उन्होंने भी बारबार उन्हें लड़ाईझगड़े में ऊर्जा बरबाद न करने को समझाया, पर उन दोनों के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

हम ने फंक्शन ज्यादा बड़ा नहीं किया था, पर हर काम ठीक से पूरा हो गया. मेरी ससुराल में मेरे रंगरूप की खूब तारीफ हुई, तो मेरे सासससुर भी खुश नजर आने लगे थे.

हमारा हनीमून 3 दिन का रहा. मनाली के खुशगवार मौसम में अपने अब तक के जीवन के सब से बेहतरीन, मौजमस्ती भरे 3 दिन मनीष के संग बिता कर हम दिल्ली लौट आए.

वापस आने के 2 दिन बाद ही हम ने हवाईजहाज पकड़ा और सिंगापुर चले आए. अपने मम्मीपापा से विदा लेते हुए मैं रो रही थी.

‘‘आप दोनों एकदूसरे का ध्यान रखना, प्लीज. आप का लड़ाईझगड़ा अब भी चलता रहा, तो मेरा मन परदेस में बहुत दुखी रहेगा.’’

मैं ने बारबार उन से ऐसी विनती जरूर की, पर मन में भारी बेचैनी और चिंता समेटे ही मैं ने मम्मीपापा से विदा ली थी.

शुरुआत के दिनों में दिन में 2-2 बार फोन कर के मैं उन दोनों का हालचाल पूछ लेती.

‘‘हम ठीक हैं. तुम अपना हालचाल बताओ,’’ वे दोनों मुझे परेशान न करने के इरादे से यही जवाब देते, पर मेरा मन उन दोनों को ले कर लगातार चिंतित बना रहता था.

मनीष जब भी मुझे इस कारण उदास देखते, तो बेकार की चिंता न करने की सलाह देते. मैं खुद को बहुत समझाती, पर मन चिंता करना छोड़ ही नहीं पाता था.

बीतते समय के साथ मेरा मम्मीपापा को फोन करना सप्ताह में 1-2 बार का हो गया. मनीष की अपने बौस से ज्यादा अच्छी नहीं पट रही थी. इस कारण मुझे जो टेंशन होता, वही मैं फोन पर अपने मम्मीपापा से ज्यादा बांटता था.

मनीष ने कोशिश कर के अपना तबादला बैंकाक में करा लिया. वहां शिफ्ट होने से पहले उन्होंने 1 सप्ताह की छुट्टी ले ली. लगभग 6 महीने बाद इस कारण हमें इंडिया आने का मौका मिल गया था. सारा कार्यक्रम इतनी जल्दी बना कि अपने आने की सूचना मैं ने मम्मीपापा को न दे कर उन्हें ‘सरप्राइज’ देने का फैसला किया था.

मनीष और मैं एअरपोर्ट से टैक्सी ले कर सीधे पहले मेरे घर पहुंचे. 4 दिन बाद मेरे सासससुर की शादी की 30वीं वर्षगांठ थी, इसलिए पहले 3 दिन मुझे मायके में बिताने की स्वीकृति मनीष ने दे दी थी.

मनीष और मुझे अचानक सामने देख कर मेरे मम्मीपापा भौचक्के रह गए. मम्मी की चाल ने मुझे साफ बता दिया कि उन की कमर में तेज दर्द हो रहा है, पर फिर भी उन्होंने उठ कर मुझे गले से लगाया और खूब प्यार किया.

पापा की छाती से लग कर मैं अचानक ही आंसू बहाने लगी थी. उन को प्रसन्न अंदाज में मुसकराते देख मुझे इतनी राहत और खुशी महसूस हुई कि मेरी रुलाई फूट पड़ी थी.

‘‘आप दोनों को क्या हमारे आने की खबर थी?’’ कुछ संयत हो जाने के बाद मैं ने इधरउधर नजरें घुमाते हुए हैरान स्वर में सवाल किया.

‘‘नहीं तो. क्यों नहीं दी तू ने अपने आने की खबर?’’ मम्मी नकली नाराजगी दिखाते हुए मुसकराईं.

‘‘मुझे आप दोनों को ‘सरप्राइज’ देना था. वैसे पहले यह बताओ कि सारा घर फिर किस खुशी में इतना साफसुथरा… इतना सजाधजा नजर आ रहा है?’’

‘‘घर तो अब ऐसा ही रहता है, नेहा. हां, परदे पिछले महीने बदलवाए थे, सो इस कारण ड्राइंगरूम का रंग ज्यादा निखर आया है.’’

‘‘कमाल है, मम्मी. अपनी कमर दर्द की परेशानी के बावजूद आप इतनी मेहनत…’’

‘‘मेरी प्यारी गुडि़या, यह सारी जगमग तेरी मां की मेहनत का नतीजा नहीं है. आजकल साफसफाई का भूत मेरे सिर पर जरा ज्यादा चढ़ा रहता है,’’ पापा ने छाती चौड़ी कर मजाकिया अंदाज में अपनी तारीफ की तो हम तीनों खिलखिला कर हंस पड़े.

‘‘आप और घर की साफसफाई…आई कांट बिलीव यू, पापा.’’

‘‘अरे, अपनी मम्मी से पूछ ले.’’

मैं मम्मी की तरफ घूमी तो उन्होंने हंस कर कहा, ‘‘मैं ने अब इन्हें गृहकार्यों में अच्छी तरह से ट्रेंड कर दिया है, नेहा. कुछ देर में ये हम सब को देखना कितने स्वादिष्ठ गोभी और मूली के परांठे बना कर खिलाएंगे.’’

‘‘गोभी और मूली के परांठे पापा बनाएंगे?’’ मेरा मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘साफसफाई और किचन पापा ने संभाल लिया है, तो घर में आप क्या करती हो?’’ मैं ने आंखें मटकाते हुए मम्मी से सवाल पूछा.

‘‘आजकल जम कर ऐश कर रही हूं,’’ मम्मी ने जब अपने बालों को झटका दे कर बड़ी अदा से पीछे किया तो मैं ने नोट किया कि उन्होंने बाल छोटे करा लिए थे.

‘‘बाल कब कटवाए आप ने? बड़ा सूट कर रहा है आप पर यह नया स्टाइल,’’ मैं ने चारों तरफ घूम कर मम्मी के नए स्टाइल का निरीक्षण किया.

‘‘तेरे पापा को ही मुझे मेम बनाने का शौक चढ़ा और जबरदस्ती मेरे बाल कटवा दिए,’’ मम्मी ने अजीब सी शक्ल बना कर पापा की तरफ बड़े प्यार से देखा था.

‘‘चल, बाल तो मैं ने कटवा दिए, पर ज्यादा सुंदर दिखने को ब्यूटीपार्लर और जिम के चक्कर तो तुम अपनी इच्छा से ही लगा रही हो न,’’ पापा ने यह नई जानकारी दी, तो मैं ने मम्मी की तरफ और ज्यादा ध्यान से देखा.

उन्होंने अपना वजन सचमुच कम कर लिया था और उन के चेहरे पर भी अच्छाखासा नूर नजर आ रहा था.

‘‘आप दोनों 6 महीने में कितना ज्यादा बदल गए हो. मम्मी, आप सचमुच बहुत सुंदर दिख रही हो,’’ मैं ने प्यार से उन का गाल चूम लिया.

‘‘स्वीटहार्ट, तुम बेकार ही सिंगापुर में मम्मीपापा की चिंता करती रहती थीं. ये दोनों बहुत खुश नजर आ रहे हैं,’’ मनीष की इस बात को सुन कर मैं झेंप उठी थी.

‘‘हमारी फिक्र न किया करो तुम दोनों, परदेस में तुम तो हमारी गुडि़या का पूरापूरा ध्यान रखते हो न, मनीष?’’ पापा ने अपने दामाद के कंधे पर हाथ रख दोस्ताना अंदाज में सवाल पूछा.

‘‘रखता तो हूं… पर शायद उतना अच्छी तरह से नहीं जितना आप मम्मी का रखते हैं,’’ मनीष की यह बात सुन कर हम सब फिर से हंस पड़े.

‘‘कैसे हो गया यह चमत्कार,’’ मेरी हंसी थमी, तो मैं ने पापा और मम्मी का हाथ प्यार से पकड़ कर हैरान सी हो यह सवाल मानो खुद से ही पूछा था.

‘‘मुझे कारण पता है,’’ मनीष किसी स्कूली बच्चे की तरह हाथ उठा कर बोले तो हम तीनों बड़े ध्यान से उन का चेहरा ताकने लगे थे.

हमारे ध्यान का केंद्र अच्छी तरह बन जाने के बाद उन्होंने शरारती अंदाज में मुसकरातेशरमाते हुए कहा, ‘‘मेरी समझ से इस घर में दामाद के पैरों का पड़ना शुभ साबित हुआ है.’’

फिर हम चारों के सम्मिलित ठहाके से ड्राइंगरूम गूंज उठा.

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