Romantic Story In Hindi: सजा – क्या सुमित के साथ अंकिता ने खत्म किया अपना रिश्ता

Romantic Story In Hindi: वेटर को कौफी लाने का और्डर देने के बाद सुमित ने अंकिता से अचानक पूछा, ‘‘मेरे साथ 3-4 दिन के लिए मनाली घूमने चलोगी?’’ ‘‘तुम पहले कभी मनाली गए हो?’’

‘‘नहीं.’’ ‘‘तो उस खूबसूरत जगह पहली बार अपनी पत्नी के साथ जाना.’’

‘‘तब तो तुम ही मेरी पत्नी बनने को राजी हो जाओ, क्योंकि मैं वहां तुम्हारे साथ ही जाना चाहता हूं.’’ ‘‘यार, एकदम से जज्बाती हो कर शादी करने का फैसला किसी को नहीं करना चाहिए.’’

सुमित उस का हाथ पकड़ कर उत्साहित लहजे में बोला, ‘‘देखो, तुम्हारा साथ मुझे इतनी खुशी देता है कि वक्त के गुजरने का पता ही नहीं चलता. यह गारंटी मेरी रही कि हम शादी कर के बहुत खुश रहेेंगे.’’ उस के उत्साह से प्रभावित हुए बिना अंकिता संजीदा लहजे में बोली, ‘‘शादी के लिए ‘हां’ या ‘न’ करने से पहले मैं तुम्हें आज अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में कुछ बातें बताना चाहती हूं, सुमित.’’

सुमित आत्मविश्वास से भरी आवाज में बोला, ‘‘तुम जो बताओगी, उस से मेरे फैसले पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है.’’ ‘‘फिर भी तुम मेरी बात सुनो. जब मैं 15 साल की थी, तब मेरे मम्मीपापा के बीच तलाक हो गया था. दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर होने के कारण उन के बीच रातदिन झगड़े होते थे.

‘‘तलाक के 2 साल बाद पापा ने दूसरी शादी कर ली. ढेर सारी दौलत कमाने की इच्छुक मेरी मां ने अपना ब्यूटी पार्लर खोल लिया. आज वे इतनी अमीर हो गई हैं कि समाज की परवा किए बिना हर 2-3 साल बाद अपना प्रेमी बदल लेती हैं. हमारे जानकार लोग उन दोनों को इज्जत की नजरों से नहीं देखते हैं.’’ अंकिता उस की प्रतिक्रिया जानने के लिए रुकी हुई है, यह देख कर सुमित ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘मैं मानता हूं कि हर इंसान को अपने हिसाब से अपनी जिंदगी के फैसले करने का अधिकार होना ही चाहिए. तलाक लेने के बजाय रातदिन लड़ कर अपनीअपनी जिंदगी बरबाद करने का भी तो उन दोनों के लिए कोई औचित्य नहीं था. खुश रहने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना, वह सब को स्वीकार करना चाहिए.’’

‘‘क्या तुम सचमुच ऐसी सोच रखते हो या मुझे खुश करने के लिए ऐसा बोल रहे हो?’’ ‘‘झूठ बोलना मेरी आदत नहीं है, अंकिता.’’

‘‘गुड, तो फिर शादी की बात आगे बढ़ाते हुए कौफी पीने के बाद मैं तुम्हें अपनी मम्मी से मिलाने ले चलती हूं.’’ ‘‘मैं उन्हें इंटरव्यू देने के लिए बिलकुल तैयार हूं,’’ सुमित बोला तो उस की आंखों में उभरे प्रसन्नता के भाव पढ़ कर अंकिता खुद को मुसकराने से नहीं रोक पाई.

आधे घंटे बाद अंकिता सुमित को ले कर अपनी मां सीमा के ब्यूटी पार्लर में पहुंच गई.

आकर्षक व्यक्तित्व वाली सीमा सुमित से गले लग कर मिली और पूछा, ‘‘क्या तुम इस बात से हैरान नजर आ रहे हो कि हम मांबेटी की शक्लें आपस में बहुत मिलती हैं?’’ ‘‘आप ने मेरी हैरानी का बिलकुल ठीक कारण ढूंढ़ा है,’’ सुमित ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘हम दोनों की अक्ल भी एक ही ढंग से काम करती है.’’ ‘‘वह कैसे?’’

‘‘हम दोनों ही ‘जीओ और जीने दो’ के सिद्धांत में विश्वास रखती हैं. उन लोगों से संबंध रखना हमें बिलकुल पसंद नहीं जो हमारी जिंदगी में टैंशन पैदा करने की फिराक में रहते हों.’’ ‘‘मम्मी, अब सुमित से भी इस के बारे में कुछ पूछ लो, क्योंकि यह मुझ से शादी करना चाहता है,’’ अंकिता ने अपनी बातूनी मां को टोकना उचित समझा था.

‘‘रियली, दिस इज गुड न्यूज,’’ सीमा ने एक बार फिर सुमित को गले से लगा कर खुश रहने का आशीर्वाद दिया और फिर अपनी बेटी से पूछा, ‘‘क्या तुम ने सुमित को अपने पापा से मिलवाया है?’’ ‘‘अभी नहीं.’’

सीमा मुड़ कर फौरन सुमित को समझाने लगी, ‘‘जब तुम इस के पापा से मिलो, तो उन के बेढंगे सवालों का बुरा मत मानना. उन्हें करीबी लोगों की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करने की गंदी आदत है, क्योंकि वे समझते हैं कि उन से ज्यादा समझदार कोई और हो ही नहीं सकता.’’ ‘‘मौम, सुमित यहां आप की शिकायतें सुनने नहीं आया है. आप उस के बारे में कोई सवाल क्यों नहीं पूछ रही हैं?’’ अंकिता ने एक बार फिर अपनी मां को विषय परिवर्तन करने की सलाह दी.

‘‘ओकेओके माई डियर सुमित, मुझे तो तुम से एक ही सवाल पूछना है. क्या तुम अंकिता के लिए अच्छे और विश्वसनीय जीवनसाथी साबित होंगे?’’ ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि शादी के बाद हम बहुत खुश रहेंगे,’’ सुमित ने बेझिझक जवाब दिया.

‘‘मैं नहीं चाहती कि अंकिता मेरी तरह जीवनसाथी का चुनाव करने में गलती करे. मेरी सलाह तो यही है कि तुम दोनों शादी करने का फैसला जल्दबाजी में मत करना. एकदूसरे को अच्छी तरह से समझने के बाद अगर तुम दोनों शादी करने का फैसला करते हो, तो सुखी विवाहित जीवन के लिए मेरा आशीर्वाद तुम दोनों को जरूर मिलेगा.’’

‘‘थैंक यू, आंटी. मैं तो बस, अंकिता की ‘हां’ का इंतजार कर रहा हूं.’’ ‘‘गुड, प्लीज डोंट माइंड, पर इस वक्त मैं जरा जल्दी में हूं. मैं ने एक खास क्लाइंट को उस का ब्राइडल मेकअप करने के लिए अपौइंटमैंट दे रखा है. तुम दोनों से फुरसत से मिलने का कार्यक्रम मैं जल्दी बनाती हूं,’’ सीमा ने बारीबारी दोनों को प्यार से गले लगाया और फिर तेज चाल से चलती हुई पार्लर के अंदरूनी हिस्से में चली गई.

बाहर आ कर सुमित सीमा से हुई मुलाकात के बारे में चर्चा करना चाहता था, पर अंकिता ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘मैं लगे हाथ अपने पापा को भी तुम्हारे बारे में बताने जा रही हूं. मेरे फोन का स्पीकर औन है. हमारे बीच कैसे संबंध हैं, यह समझने के लिए तुम हमारी बातें ध्यान से सुनो, प्लीज.’’ अंकिता ने अपने पापा को सुमित का परिचय देने के बाद जब उस के साथ शादी करने की इच्छा के बारे में बताया, तो उन्होंने गंभीर लहजे में कहा, ‘‘तुम सुमित को कल शाम घर ले आओ.’’

‘‘जरा सोचसमझ कर हमें घर आने का न्योता दो, पापा. आप मेरी जिंदगी में दिलचस्पी ले रहे हैं, यह देख कर आप की दूसरी वाइफ नाराज तो नहीं होंगी न?’’ अंकिता के व्यंग्य से तिलमिलाए उस के पापा ने भी तीखे लहजे में कहा, ‘‘तुम बिलकुल अपनी मां जैसी बददिमाग हो गई हो और उसी के जैसे वाहियात लहजे में बातें भी करती हो. पिता होने के नाते मैं तुम से दूर नहीं हो सकता, वरना तुम्हारा बात करने का ढंग मुझे बिलकुल पसंद नहीं है.’’

‘‘आप दूर जाने की बात मत करिए, क्योंकि आप की सैकंड वाइफ ने आप को मुझ से पहले ही बहुत दूर कर दिया है.’’ ‘‘देखो, यह चेतावनी मैं तुम्हें अभी दे रहा हूं कि कल शाम तुम उस के साथ तमीज से पेश…’’

‘‘मैं कल आप के घर नहीं आ रही हूं. सुमित को किसी और दिन आप के औफिस ले आऊंगी.’’ ‘‘तुम बहुत ज्यादा जिद्दी और बददिमाग होती जा रही हो.’’

‘‘थैंक यू एेंड बाय पापा,’’ चिढ़े अंदाज में ऐसा कह कर अंकिता ने फोन काट दिया था.

अपने मूड को ठीक करने के लिए अंकिता ने पहले कुछ गहरी सांसें लीं और फिर सुमित से पूछा, ‘‘अब बताओ कि तुम्हें मेरे मातापिता कैसे लगे? क्या राय बनाई है तुम ने उन दोनों के बारे में?’’ ‘‘अंकिता, मुझे उन दोनों के बारे में कोई भी राय बनाने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है. तुम्हें उन से जुड़ कर रहना ही है और मैं उन के साथ हमेशा इज्जत से पेश आता रहूंगा,’’ सुमित ने उसे अपनी राय बता दी.

उस का जवाब सुन अंकिता खुश हो कर बोली, ‘‘तुम तो शायद दुनिया के सब से ज्यादा समझदार इंसान निकलोगे. मुझे विश्वास होने लगा है कि हम शादी कर के खुश रह सकेंगे, पर…’’ ‘‘पर क्या?’’

‘‘पर फिर भी मैं चाहूंगी कि तुम अपना फाइनल जवाब मुझे कल दो.’’ ‘‘ओके, कल कब और कहां मिलोगी?’’

‘‘करने को बहुत सी बातें होंगी, इसलिए नेहरू पार्क में मिलते हैं.’’ ‘‘ओके.’’

अगले दिन रविवार को दोनों नेहरू पार्क में मिले. सुमित की आंखों में तनाव के भाव पढ़ कर अंकिता ने मजाकिया लहजे में कहा, ‘‘यार, इतनी ज्यादा टैंशन लेने की जरूरत नहीं है. तुम मुझ से शादी नहीं कर सकते हो, अपना यह फैसला बताने से तुम घबराओ मत.’’ उस के मजाक को नजरअंदाज करते हुए सुमित गंभीर लहजे में बोला, ‘‘कल रात को किसी लड़की ने मुझे फोन कर राजीव के बारे में बताया है.’’

‘‘यह तो उस ने अच्छा काम किया, नहीं तो आज मैं खुद ही तुम्हें उस के बारे में बताने वाली थी,’’ अंकिता ने बिना विचलित हुए जवाब दिया. ‘‘क्या तुम उस के बहुत ज्यादा करीब थी?’’

‘‘हां.’’ ‘‘तुम दोनों एकदूसरे से दूर क्यों हो गए?’’

‘‘उस का दिल मुझ से भर गया… उस के जीवन में दूसरी लड़की आ गई थी.’’ ‘‘क्या तुम उस के साथ शिमला घूमने गई थी?’’

‘‘हां.’’ ‘‘क्या तुम वहां उस के साथ एक ही कमरे में रुकी थी?’’

उस की आंखों में देखते हुए अंकिता ने दृढ़ लहजे में जवाब दिया, ‘‘रुके तो हम अलगअलग कमरों में थे, पर मैं ने 2 रातें उस के कमरे में ही गुजारी थीं.’’ उस का जवाब सुन कर सुमित को एकदम झटका लगा. अपने आंतरिक तनाव से परेशान हो वह दोनों हाथों से अपनी कनपटियां मसलने लगा.

‘‘मैं तुम से इस वक्त झूठ नहीं बोलूंगी सुमित, क्योंकि तुम से… अपने भावी जीवनसाथी से अपने अतीत को छिपा कर रखना बहुत गलत होगा.’’ ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या कहूं. मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. तुम से शादी करना चाहता हूं, पर…पर…’’

‘‘मैं अच्छी तरह से समझ सकती हूं कि तुम्हारे मन में इस वक्त क्या चल रहा है, सुमित. अच्छा यही रहेगा कि इस मामले में तुम पहले मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं खुद नहीं चाहती हूं कि तुम जल्दबाजी में मुझ से शादी करने का फैसला करो.’’ बहुत दुखी और परेशान नजर आ रहे सुमित ने अपना सारा ध्यान अंकिता पर केंद्रित कर दिया.

अंकिता ने उस की आंखों में देखते हुए गंभीर लहजे में बोलना शुरू किया, ‘‘राजीव मुझ से बहुत प्रेम करने का दम भरता था और मैं उस के ऊपर आंख मूंद कर विश्वास करती थी. इसीलिए जब उस ने जोर डाला तो मैं न उस के साथ शिमला जाने से इनकार कर सकी और न ही कमरे में रात गुजारने से. ‘‘मैं ने फैसला कर रखा है कि उस धोखेबाज इंसान को न पहचान पाने की अपनी गलती के लिए घुटघुट कर जीने की सजा खुद को बिलकुल नहीं दूंगी. अब तुम ही बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए?

‘‘क्या मैं आजीवन अपराधबोध का शिकार बन कर जीऊं? तुम्हारे प्रेम का जवाब प्रेम से न दूं? तुम से शादी हो जाए, तो हमेशा डरतीकांपती रहूं कि कहीं से राजीव और मेरे अतीत के नजदीकी रिश्तों के बारे में तुम्हें पता न लग जाए? ‘‘मैं चाहती हूं कि तुम भावुक हो कर शादी के लिए ‘हां’ मत कहो. तुम्हें राजीव के बारे में पता है… मेरे मातापिता के तलाक, उन की जीवनशैली और उन के मेरे तनाव भरे रिश्तों की जानकारी अब तुम्हें है.

इन सब बातों को जान कर तुम्हारे मन में मेरी इज्जत कम हो गई हो या मेरी छवि बिगड़ गई हो, तो मेरे साथ सात फेरे लेने का फैसला बदल दो.’’ अंकिता की सारी बातें सुन कर सुमित जब खामोश बैठा रहा, तो अंकिता उठ कर खड़ी हो गई और बुझे स्वर में बोली, ‘‘तुम अपना फाइनल फैसला मुझे बाद में फोन कर के बता देना. अभी मैं चलती हूं.’’

पार्क के गेट की तरफ बढ़ रही अंकिता को जब सुमित ने पीछे से आवाज दे कर नहीं रोका, तो उस के तनमन में अजीब सी उदासी और मायूसी भरती चली गई थी. आंखों से बह रही अविरल अश्रुधारा को रोकने की नाकामयाब कोशिश करते हुए जब वह आटोरिकशा में बैठने जा रही थी, तभी सुमित ने पीछे से आ कर उस का हाथ पकड़ लिया. उस की फूली सांसें बता रही थीं कि वह दौड़ते हुए वहां

पहुंचा था. ‘‘तुम्हें मैं इतनी आसानी से जिंदगी से दूर नहीं होने दूंगा, मैडम,’’ सुमित ने उस का हाथ थाम कर भावुक लहजे में अपने दिल की बात कही.

‘‘मेरे अतीत के कारण तुम हमारी शादी होने के बाद दुखी रहो, यह मेरे लिए असहनीय बात होगी. सुमित, अच्छा यही रहेगा कि हम दोस्त…’’ उस के मुंह पर हाथ रख कर सुमित ने उसे आगे बोलने से रोका और कहा, ‘‘जब तुम चलतेचलते मेरी नजरों से ओझल हो गई, तो मेरा मन एकाएक गहरी उदासी से भर गया था…वह मेरे लिए एक महत्त्वपूर्ण फैसला करने की घड़ी थी…और मैं ने फैसला कर लिया है.

‘‘मेरा फैसला है कि मुझे अपनी बाकी की जिंदगी तुम्हारे ही साथ गुजारनी है.’’ ‘‘सुमित, भावुक हो कर जल्दबाजी में…’’

उस के कहे पर ध्यान दिए बिना बहुत खुश नजर आ रहा सुमित बोले जा रहा था, ‘‘मेरा यह अहम फैसला दिल से आया है, स्वीटहार्ट. अतीत में किसी और के साथ बने सैक्स संबंध को हमारे आज के प्यार से ज्यादा महत्त्व देने की मूढ़ता मैं नहीं दिखाऊंगा. विल यू मैरी मी?’’ ‘‘पर…’’

‘‘अब ज्यादा भाव मत खाओ और फटाफट ‘हां’ कर दो, माई लव,’’ सुमित ने अपनी बांहें फैला दीं. ‘‘हां, माई लव,’’ खुशी से कांप रही आवाज में अपनी रजामंदी प्रकट करने के बाद अंकिता सुमित की बांहों के मजबूत घेरे में कैद हो गई. Romantic Story In Hindi

Love Story In Hindi: एक सवाल – क्यों दूर हो गए आकाश और कोमल?

Love Story In Hindi, लेखिका- Bhawna Gaur

‘‘आकाश तुम अपनी सेहत का बिलकुल खयाल नहीं रखते हो. शादी के 10 साल बाद भी रिंकू मिंकू से ज्यादा मुझे तुम्हारा खयाल रखना पड़ता है,’’ जल्दीजल्दी टिफिन तैयार करती कोमल बोले जा रही थी और आकाश फोन आने पर बदहवास सा भागने लगा.

‘‘उफ, टिफिन तो लेते जाओ,’’ कहते हुए हाथों में टिफिन पकड़े कोमल उस के पीछे लगभग दौड़ ही पड़ी.

टिफिन लेते ही आकाश की गाड़ी धुआं उड़ाती चली गई.

कोमल को अब जा कर फुरसत से चाय पीने का मौका मिला. शादी के 5 साल तक उन के कोई संतान नहीं थी. तब सुबह की चाय कोमल और आकाश हमेशा साथ पीते थे. पड़ोस में रहने वाली शीला मौसी का जिक्र छिड़ते हुए कोमल उदास हो कर जब कभी बताती कि पता है आकाश, शीला मौसी के दोनों बेटे विदेश में बस गए हैं, पर वे अकेली रहते हुए भी शान से कहती हैं कि साथ नहीं रह सकते तो क्या हुआ. कुदरत ने उन्हें 2-2 बेटे तो दिए. यह बतातेबताते जब कोमल लगभग रोआंसी सी हो जाती. तब आकाश प्यार से उस का हाथ थाम कर कहता, ‘‘डाक्टर ने कहा है न कि जल्द ही हमारे घर भी प्यारा सा बच्चा आ जाएगा. तुम बिलकुल परेशान न हो.’’

यह सुन कोमल शीघ्र ही सहज हो जाती. आकाश का अपनत्वपूर्ण स्पर्श उसे एक नए आत्मविश्वास से भर देता.

कोमल की पड़ोसिन दिव्या रेडियो आर जे की नौकरी करती थी. उस की नन्ही बेटी मिन्नी कोमल को बड़ी प्यारी लगती. एक दिन कोमल दोपहर को बालकनी में खड़ी थी. दिव्या के घर पर नजर पड़ी तो देखा नन्ही मिन्नी अपना स्कूल बैग लिए दरवाजे के बाहर बैठी है. कोमल का दिल ममता से भर आया. अत: मिन्नी को घर बुला कर कुछ स्नैक्स खाने को दिए. फिर दिव्या को फोन किया तो पता चला कि अचानक किसी मीटिंग की वजह से उसे आज आने में देर हो जाएगी. तब कोमल ने उसे मिन्नी का ध्यान रखने का आश्वासन दिया.

दिव्या जब औफिस से आई तो अपनी बेटी का ध्यान रखने के लिए कोमल का आभार व्यक्त किया.

‘‘आगे से तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है. दोबारा कभी ऐसा हुआ तो मैं खुशी से मिन्नी को अपने पास बुला लूंगी.’’

कोमल के यह कहने पर दिव्या बोली, ‘‘धन्यवाद कोमल, लेकिन अब आगे से ऐसा कभी नहीं होगा, क्योंकि मैं ने एक प्ले स्कूल में बात कर ली है. अपने स्कूल से मिन्नी सीधे वहां पहुंच जाया करेगी. फिर शाम को औफिस से लौटते हुए मैं उसे ले आया करूंगी.’’

‘‘तो तुम्हें मिन्नी का मेरे साथ रहना पसंद नहीं,’’ कोमल उदास होते हुए बोली तो दिव्या प्यार से उस के कंधे पर हाथ रखती हुई बोली, ‘‘ऐसा बिलकुल नहीं है कोमल. तुम जब चाहो मिन्नी को अपने साथ ले जा सकती हो. लेकिन मेरा मानना है कि अपनी जरूरतों के लिए हमें स्वयं जिम्मेदारी लेनी चाहिए. मेरे पति के 3-3 फार्महाउस हैं. उन का ज्यादातर समय उन की देखरेख में ही बीत जाता है. मैं चाहूं तो नौकरी छोड़ कर आराम से घर पर रह सकती हूं, लेकिन मैं आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं. अपनी कमाई का जो सुख होता है मैं उसे खोना नहीं चाहती.’’

कोमल दिव्या की बातों से बड़ी प्रभावित हुई. उस के मन में भी अपनी कमाई का सुख पाने की इच्छा बलवती होने लगी. फिर उसे जल्द ही इस का मौका भी मिल गया.

दिव्या के औफिस में कोई सहकर्मी अचानक बीमार पड़ गई. दिव्या ने कोमल को अस्थाई तौर पर अपने औफिस में काम करने का प्रस्ताव दिया तो कोमल ने तुरंत स्वीकार लिया.

आत्मविश्वास से भरी कोमल की आवाज से दिव्या के बौस प्रभावित हुए. कुछ ही दिनों में कोमल की आवाज रेडियो पर लोकप्रिय होने लगी. कोमल को जल्द ही स्थाई तौर पर काम करने का प्रस्ताव मिला. वह बेहद खुश थी. आकाश से उसे प्रोत्साहन मिला तो वह रेडियो की दुनिया में अपनी पहचान बनाती चली गई. इसी बीच कोमल की खुशी का तब ठिकाना न रहा जब उसे पता चला कि वह मां बनने वाली है.

कोमल ने अपने परिवार को प्राथमिकता दी. जब उसे पता चला कि उसे जुड़वां बच्चे पैदा होने वाले हैं, तो विनम्रता के साथ अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया. वक्त के साथ 2 नन्हे राजकुमार उस के जीवन में आए, तो वह निहाल हो उठी.

2-2 बच्चों की एकसाथ देखभाल से कोमल थक कर चूर हो जाती. लेकिन आकाश बच्चों की देखभाल में उस की मदद करने के बजाय अपना ज्यादातर समय औफिस को देता था. वह जब कभी आकाश को अपने बच्चों की किलकारियां सुनाने की कोशिश करती, आकाश उसे उतना ही दूर भागता महसूस होता. वह जितना ज्यादा आकाश के करीब जाना चाहती आकाश उस से उतना ही दूर जाता रहा. वह समझ नहीं पाती कि जुड़वां बच्चे पैदा कर के आखिर उस ने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया कि आकाश उसे अपने से दूर करना चाहता है.

धीरेधीरे कोमल समझने लगी कि आकाश को अब उस का स्पर्श पसंद नहीं आता. अब आकाश जबतब औफिस के दौरे पर रहने लगा. अपने दोनों बच्चों की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी कोमल के कंधों पर आ पड़ी. कुछ ही दिन पहले तो उस ने अपने बच्चों का चौथा जन्मदिन मनाया था. आकाश उस दिन भी मेहमानों की तरह आखिर में आया था.

उस दिन कोमल ने कुछ लोगों को आकाश के बारे में कुछ कानाफूसी करते सुना. मगर उस ने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. लेकिन कुछ दिनों बाद एक ऐसी घटना घटी कि उस ने कोमल का नजरिया ही बदल दिया.

हुआ यह कि एक दिन अचानक दिव्या उस के लिए एक इन्विटेशन कार्ड ले कर आई. रेडियो स्टेशन के लोग पूर्व कर्मचारियों के लिए एक पार्टी रख रहे थे, जिस में कोमल भी आमंत्रित थी. आकाश औफिस के दौरे पर गया हुआ था. बच्चों को प्ले स्कूल में छोड़ कर कोमल अतिथि होटल में पार्टी में शामिल होने गई. वहां उस ने आकाश को एक लड़की के साथ जाते देखा, तो हैरान हो आकाश के पीछे भागी. उन दोनों ने रूम नं. 512 में जा कर कमरा बंद कर लिया. उस ने होटल की रिसैप्शनिस्ट से कह कर रजिस्टर में देखा तो रूम नं. 512 के आगे ‘मिस्टर ऐंड मिसेज आकाश’ लिखा नाम उसे मुंह चिढ़ा रहा था. कोमल को तो जैसे काटो तो खून नहीं. इसी बीच दिव्या उसे ढूंढ़ती हुई वहां आ कर उसे पार्टी में ले गई.

दिव्या के पुराने बौस कह रहे थे, ‘‘कोमल, तुम्हारी आवाज को लोग आज भी याद करते हैं. तुम जब चाहो वापस आ सकती हो. यू आर मोस्ट वैलकम.’’

कोमल अन्यमनस्क सी वहां बैठी थी. जैसेतैसे पार्टी से निकल कर वह घर पहुंची. घर पहुंचते ही वह फूटफूट कर रो पड़ी. उसे पलपल छले जाने का एहसास कचोटने लगा. आज पहली बार उसे अपने नारी होने पर दुख हुआ. उस ने आकाश को फोन किया पर उस का फोन बंद मिला.

आकाश अगले दिन आया. कोमल ने उस से दौरे के बारे पूछताछ की तो वह हड़बड़ा गया. कोमल ने अतिथि होटल का नाम लिया तो आकाश गुस्से में कोमल को भलाबुरा कहता हुआ घर से बाहर चला गया.

कोमल को अब समझ में आने लगा कि क्यों आकाश उस से दूर रहना चाहता है. उसे लगता था कि पिता बनने का जो गौरव वह आकाश को दे रही है उस के बाद आकाश उसे पलकों पर बैठा कर रखेगा, लेकिन आकाश ने तो उसे अपनी जिंदगी से ही निकला फेंका. उस ने आकाश से बात करने की कोशिश की, लेकिन आकाश उस की कोई बात सुनने को तैयार ही न हुआ. कोमल ने बहुत मिन्नतें कीं, अपने बच्चों की दुहाई भी दी, लड़ाईझगड़ा भी किया, लेकिन आकाश पर कोई असर न हुआ. उस ने दोटूक जवाब दिया कि वह उसे और बच्चों के खर्च देता रहेगा, लेकिन निजी जीवन में वह क्या करता है, इस से उसे मतलब नहीं होना चाहिए.

कोमल ने मायके वापस जाने की सोची, लेकिन फिर सोचने लगी कि जब उस के मासूम बच्चों पर दुनिया की जबानें तलवार की तरह बरसेंगी तो वह किसकिस का मुंह बंद करती फिरेगी. वह उदासी में डूब गई. अब दिनरात सोच में डूबी रहती. अपनेआप को इतना ज्यादा अपमानित उस ने कभी महसूस नहीं किया था.

अचानक कोमल को अपने बौस का ‘यू आर मोस्ट वैलकम’ कहा वाक्य याद आया तो वह उठ खड़ी हुई. उस ने फोन कर के फिर से औफिस आने की बौस से इजाजत मांगी, तो जवाब में यही सुनने को मिला कि ‘यू आर मोस्ट वैलकम.’

कोमल अपमान की दुनिया से निकलना चाहती थी. वह अपनी जिंदगी के फटतेबिखरते पन्नों को समेट रही थी.

दिल के किसी कोने में आज भी कोमल को यह उम्मीद है कि शायद कभी आकाश को अपनी गलती का एहसास होगा. लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या वह उसे माफ कर पाएगी? Love Story In Hindi

Romantic Story In Hindi: एक कागज मैला सा – क्या था उस मैले कागज का सच?

Romantic Story In Hindi, लेखक- डा. विनय वाईकर

वासंती की तबीयत आज सुबह से ही कुछ नासाज थी. न बुखार था, न जुकाम, न सिरदर्द, न जिस्म टूट रहा था, फिर भी कुछ ठीक नहीं लग रहा था. लगभग 10 बजे पति दफ्तर गए और बिटिया मेघा कालेज चली गई.

वासंती ने थोड़ा विश्राम किया, लेकिन शारीरिक परिस्थिति में कुछ परिवर्तन होते न देख उन्होंने कालेज में फोन किया और प्रिंसिपल से 1 दिन की छुट्टी मांग ली. हलका सा भोजन कर वे लेटने ही वाली थीं कि घंटी बजी. उन्होंने दरवाजा खोला. बाहर डाकिया खड़ा था. उस ने वासंती को एक मोटा सा लिफाफा दिया और दूसरे फ्लैट की ओर मुड़ गया.

वासंती ने दरवाजा बंद किया और धीमे कदमों से शयनकक्ष में आईं. लिफाफे पर उन्हीं का पता लिखा था और पीछे की ओर खत भेजने वाले ने अपना पता लिखा था :

‘हिंदी

आई सी 3480

कैप्टन अक्षय कुमार

द्वारा, 56 एपीओ’

वासंती हस्ताक्षर से अच्छी तरह परिचित थीं. अक्षरों को हलके से चूमते हुए उन्होंने अधीर हाथों से लिफाफा खोला. अंदर 3-4 मैले से मुड़े हुए पन्ने थे. पत्र काफी लंबा था. वे आराम से लेट गईं और पत्र पढ़ने लगीं.

मेरी प्यारी मां,

प्रणाम.

काफी दिनों से मेरा पत्र न आने से आप मुझ से खफा अवश्य होंगी. लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि आज मेरा पत्र देखते ही आप ने उसे कलेजे से लगा कर धीरे से चूम कर कहा होगा, ‘अक्षय, मेरे बेटे…’

मां, यह लिखते समय मैं यों महसूस कर रहा हूं जैसे आप यहां मेरे पास हैं और मेरे गालों को हलके से चूम रही हैं. दरअसल, जब मैं छोटा था तो आप रोज मुझे सुलाते समय मेरे गालों को चूम कर कहा करती थीं, ‘कैसा पगला राजा बेटा है, मेरा बेटा. सो जा मुन्ने, आराम से सो… कल स्कूल जाना है…अक्षू बेटे को जल्दी उठना है…स्कूल जाना है…अब सो भी जा बेटे…’ और फिर मैं शीघ्र ही सपनों के देश में पहुंच जाता था.

दिनभर स्कूल में मस्ती, शाम को क्रिकेट और उस के बाद माहीम के तरणताल में भरपूर तैरने के बाद रात को जब मैं खाने की मेज पर बैठता तब आप मुझे डांट कर, दुलार कर किसी तरह खाना खिलाती थीं.

अरे, हां, याद आया. मां, कल मुझे सचमुच ही बहुत जल्दी उठना है. जल्दी यानी ठीक 2 बजे. हां मां, सच कह रहा हूं. सचमुच सुबह 2 बजे. काम ही कुछ ऐसा है कि उठना ही पड़ेगा. वैसे इस वक्त रात के साढ़े 10 बज रहे हैं और मुझे सो जाना चाहिए.

लेकिन मां, मुझे नींद ही नहीं आ रही है. लगभग 8 बजे से मैं करवटें बदल रहा हूं, लेकिन नींद कोसों दूर है. इस वक्त मैं बहुत उत्तेजित हूं मां, किसी से बातें करने को मन कर रहा है और यहां मैं अकेला हूं. नींद की प्रतीक्षा करते हुए, हृदय में यादों का बवंडर, अकेला, बिलकुल तनहा.

यादों के बवंडर में बचपन याद आया. आप आईं और आंखें नम हुईं. मैं उठा और अपना झोला खोला. नीचे ठूंसे हुए कुछ मैले से मुड़े हुए कागज निकाले, सिलवटें ठीक कीं, धीरे से झोले की आड़ ले कर टौर्च जलाई और लिखा, ‘मेरी प्यारी मां.’

मां, यहां पर रात को रोशनी करना मना है. अगर सावधानी न बरती जाए तो गोली चल जाती है. मां, मुझे मालूम है कि तुम्हें मैले, मुडे़ हुए कागज नहीं भाते. लेकिन क्या करूं, मजबूरी है. मां, आज आप कृपया मेरी भाषा पर न हंसें. जो भी मैं ने लिखा है, पढ़ लें. मैं आप जैसा हिंदी का प्राध्यापक तो हूं नहीं. मैं तो एक फौजी हूं, एक फौजी कप्तान. बौंबे इंजीनियर्स ग्रुप का. अक्षय कुमार, एक युवा कप्तान.

अरे हां, इस कप्तान शब्द से कुछ याद आया. 8वीं में उत्तीर्ण हो कर मैं 9वीं में दाखिल हुआ था. शाम का समय था. मैं क्रिकेट खेलने के लिए निकलने ही वाला था कि हैडमास्टरजी आ धमके.

उन्होंने मुझे रोका और आप से कहा, ‘वासंतीजी, कृपया अपने पुत्र को संभालिए, दिनभर शरारतें करता है, पढ़ता नहीं है. बहनजी, यह आप का बेटा है, एक प्राध्यापिका का बेटा, इसलिए मैं ने इस वर्ष इसे किसी तरह उत्तीर्ण किया है अन्यथा आप का लाड़ला फेल हो जाता. लेकिन अगले वर्ष मैं सहायता नहीं कर सकूंगा. क्षमा करें. आप जानें और आप का बेटा.’

यह सब सुन कर आप आगबबूला हो उठीं और मुझे डांटते हुए बोलीं, ‘अक्षय, शर्म करो, आखिर तुम क्या करना चाहते हो? नहीं पढ़ना चाहते तो मत पढ़ो. यहीं रहो और चौपाटी पर पानीपूरी की दुकान खोल लो. बेशर्म कहीं के.’ और आपे से बाहर हो कर आप ने मुझे पहली बार मारा था.

गालों पर आप की उंगलियों के निशान ले कर मैं चीखते हुए बाहर निकला था कि मुझे नहीं पढ़ना है. मुझे बंदूक चलानी है. फौज में जाना है. कप्तान बनना है.

ओह मां, ठंड के मारे लिखतेलिखते उंगलियां जाम हो गई हैं. यहां इतनी ठंड पड़ती है कि क्या बताऊं. अब इस मार्च के महीने में तो कुछ कम है लेकिन ठंड के मौसम में मुंह से शब्द बाहर निकलते ही जम कर बर्फ हो जाते हैं. मां, एक बार यहां आइए. हजार फुट की ऊंचाई पर तब आप को पता चलेगा कि ठंड किसे कहते हैं और बर्फ क्या होती है?

वैसे अब बर्फ काफी हद तक पिघल गई है. पहाड़ों के पत्थरों, दरख्तों की शाखाएं और यहांवहां हरी घास भी दिख रही है. नजदीक बहने वाली हिम नदी से पानी बहने की आवाज बर्फ की ऊपरी सतह के नीचे से आ रही है. हिम नदी पर अभी भी बर्फ की मोटी सतह है लेकिन उस के नीचे तेज बहता हुआ बर्फीला पानी है. परंतु बर्फ की ऊपरी सतह में कहींकहीं दरारें पड़ गई हैं और बर्फ पिघलने से छोटेबड़े छेद भी प्रकृति ने बना दिए हैं. दृश्य बड़ा ही मनोहारी है मां, लेकिन… लेकिन…

हिम नदी के उस छोर पर दुश्मन बैठा है. नदी का पाट बड़ा नहीं है किंतु दूसरे किनारे पर एक ऊंचा पहाड़ है. उस पर्वत के बीच से एक चोटी बाहर निकली है, तोते की चोंच जैसी. और चोंच में दुश्मन बैठा है. बिलकुल हमारे सिर पर, हमें हर क्षण घूरता हुआ. हमारी जरा सी आहट होते ही हमारी तरफ गोलियों की बौछार करता हुआ.

हमें आगे बढ़ना है. उस चोंच को तहसनहस करना है और दुश्मन का सफाया कर सामने वाली घाटी को दुश्मन के चंगुल से छुड़ा कर अपना तिरंगा वहां लहराना है. काम आसान नहीं है. हम यहां से एक गज भी आगे नहीं बढ़ सकते, दुश्मन के पास मशीनगनें तो हैं ही, शक्तिशाली तोपें भी हैं, जिन से वे हवाई जहाज को भगा सकते हैं अथवा मार गिरा सकते हैं.

परिस्थिति गंभीर है दुश्मन का सफाया करने के लिए, इस चोटी को बारूद से उड़ाने के लिए ब्रिगेड ने हमारी इंजीनियर्स कंपनी को यहां भेजा है. हम यहां लगभग 20 दिनों से बैठे हैं, लेकिन अभी तक कामयाबी हासिल नहीं हुई है. अलबत्ता, यहां आते ही हम ने कोशिश जरूर की थी.

15 दिन पहले मेरा वरिष्ठ अफसर मेजर दयाल, अपने साथ 8 जवानों को ले कर आधी रात को हिम नदी पर चल पड़ा. सब जवानों ने सफेद वरदी पहन रखी थी. जूते भी सफेद थे.

हिम नदी पूरी तरह बर्फीली थी. मेजर दयाल आधे रास्ते तक पहुंचा ही था कि ऊपर से फायरिंग शुरू हुई. सब ने बर्फ में छिप कर अपनी जान बचाई और उसी समय मेजर दयाल के अरदली सिपाही रामसिंह को फायरिंग की वजह मालूम हुई. मेजर की सफेद जरसी के गले के नीचे एक काला पट्टा था. रामसिंह ने अपनी जरसी साहब को दी और उन की खुद पहन ली. फिर दुश्मन को चकमा देने के लिए खुद एक रास्ते से और बाकी जवानों को दूसरे रास्ते से पीछे हटने को कहा. 2 घंटे बाद सब लौट आए, लेकिन सिपाही रामसिंह…

खैर, इन 20 दिनों में परिस्थिति काफी बदल गई है. बर्फ काफी पिघल गई है और हिम नदी की ऊपरी बर्फीली सतह में गड्ढे पड़ गए हैं. बर्फ की ऊपरी सतह और नीचे बहने वाले पानी के मध्य कुदरत ने काफी जगह बना दी है. इसी जगह का फायदा उठाते हुए बर्फ की सतह से नीचे, दुश्मन की नजरों से बच कर तेज बहते हुए बर्फीले पानी को चीर कर हमें दूसरे तट पर पहुंचना है, मां. पानी इतना ठंडा है कि अगर आदमी असावधानी से गिर पडे़ तो कुछ क्षणों में ही जम कर वह आइसक्रीम बन जाएगा.

लेकिन 3 दिन पहले ही हमें दिल्ली से बर्फीले पानी में तैरने के लिए विशिष्ट पोशाक मिली है. साथ में पानी में रह कर भी गीला न होने वाला गोलाबारूद, बंदूकें, टौर्च, प्लास्टिक के झोले और खाने की डब्बाबंद वस्तुएं भी मिली हैं.

मां, जिस क्षण की प्रतीक्षा हर फौजी को होती है वह क्षण आज मेरे जीवन में आया है. जिस क्षण के लिए हम फौज में भरती होते हैं, प्रशिक्षण पाते हैं, वेतन पाते हैं, वह क्षण अब मुझ से थोड़ी ही दूरी पर है. मुझे उस क्षण का बेसब्री से इंतजार है. इसी लिए मैं बहुत उत्तेजित हूं और मुझे नींद नहीं आ रही है.

आज दोपहर को इस ‘मिशन’ के लिए, जिसे हम ने ‘औपरेशन पैरट्स बीक’ नाम दिया है, मेरा चयन हुआ है.

हां, तो मां, अब थोड़ी ही देर बाद रात के ठीक 2 बजे मैं वह विशिष्ट पोशाक पहन कर हिम नदी में बनी दरार के जरिए पानी में कूदूंगा. तेज बहते हुए पानी को किसी तरह चीर कर चट्टानों, पत्थरों और बर्फ का सहारा ले कर नदी का दूसरा किनारा पकड़ूंगा और सावधानी से किसी दूसरी दरार से बाहर निकलूंगा. मेरी कमर में बंधी लंबी रस्सी का सहारा ले कर मेरे 4 जवान हथियार, गोलाबारूद और बम ले कर मेरे पास आएंगे.

उस के बाद उस चोटी के नीचे बारूद भर कर हम उसे उड़ा देंगे. संयोग से दूसरे तट पर खड़े हुए मनुष्य को दुश्मन देख नहीं सकता क्योंकि वह बिलकुल उस की नाक के नीचे होता है. दूसरा यह कि दुश्मन यह ख्वाब में भी नहीं सोच सकता कि रात के अंधेरे में हिम नदी के नीचे से तैर कर इंसान दूसरे तट पर आ सकता है.

मां, यह समूची कार्यवाही साढ़े 3-4 बजे तक हो जानी चाहिए. उस के बाद हमारी ब्रिगेड आगे बढ़ेगी और समूची घाटी पर कब्जा कर लेगी. मैं जानता हूं कि काम खतरनाक है, लेकिन फिर भी मैं कामयाबी हासिल कर के रहूंगा और इतिहास में अपना नाम सुरक्षित कर दूंगा.

याद है मां, कुछ वर्ष पूर्व हम ने मैट्रो में एक फिल्म देखी थी, ‘दि गंस औफ नेव्हरौन’, यहां भी लगभग वही परिस्थिति है. फर्क इतना है कि वहां खौलता हुआ डरावना समुद्र था और यहां बर्फीली हिम नदी और बर्फीला पानी है.

मैं जानता हूं कि मुझे यह सब नहीं लिखना चाहिए. यह सब गोपनीयता और सुरक्षा के खिलाफ है. फिर भी आज शाम से ही मैं इतना रोमांचित हूं कि किसी से कुछ कहने के लिए मन व्याकुल हो रहा है. फिर दुनिया में मां के सिवा और कौन है जो बेटे की हकीकत सुन कर उसे दिल में छिपा सकती है. हो सकता है कि इस मिशन के बाद मुझे वीरचक्र मिले. मैं चाहता हूं कि उस वक्त आप अपनी सहेलियों से और रिश्तेदारों से बड़े फख्र से कहें कि मेरे अक्षू ने ऐसा किया…वैसा किया…

आज मैं एक और अपराध कर रहा हूं, मैं यह पत्र सेना के डाकघर के माध्यम से न भेजते हुए एक सिपाही के हाथ भेज रहा हूं. यह सिपाही कल दिल्ली जा रहा है. बर्फ के प्रभाव से उस की उंगलियां गल गई हैं. दिल्ली पहुंचते ही वह इस पर टिकट लगा कर किसी लाल डब्बे में डाल देगा. हो सकता है, यह लिफाफा आप को 3 दिनों में ही मिल जाए. सेना के डाकघर से यह आप को शायद 15 दिन बाद मिले.

अरे, बाप रे. आधी रात हो गई है. थोड़ा सोना चाहिए. अच्छा मां, बाकी बातें अगले खत में लिखूंगा. सच कहता हूं, आप से बातें क्या हुईं, मन शांत हो गया है. अरे हां, अच्छा हुआ कि कुछ याद आया. मैं ने बीमा की एक किस्त शायद नहीं भरी है, पिताजी से कह कर भुगतान करवा देना.

मेरे लिए खाने की कोई चीज न भेजें, रास्ते में, दिल्ली वाले चोर सब खा जाते हैं. कोई अच्छा उपन्यास अवश्य भेजें, यहां पढ़ने के लिए सिर्फ फिल्मी पत्रिकाएं ही हैं. मेघा से कहना कि मन लगा कर पढ़ाई करे, उसे डाक्टर जो बनना है. आप दोनों अपनी तबीयत का खयाल रखें. ज्यादा दौड़धूप करने की कोई आवश्यकता नहीं है. अब मैं बड़ा हो गया हूं. फौजी कप्तान हूं. आप सब की देखभाल कर सकता हूं.

अच्छा मां, अब मैं सोता हूं. आंखें अपनेआप बंद हो रही हैं. मां, बस एक बार, सिर्फ एक बार मेरे गालों को चूम कर कहो, ‘कैसा पगला राजा बेटा है, मेरा मुन्ना…सो जा बेटे, सो जा…कल जल्दी जो उठना है.’

आप का, प्यारा अक्षय

अक्षय के पत्र के आखिरी अक्षर तो वासंती के आंसुओं में ही धुल गए. उन्होंने आंखें पोंछीं, मन शांत किया. आखिरी पंक्तियां फिर से पढ़ीं और ‘अक्षय’ शब्द को चूम कर बोलीं, ‘‘बिलकुल पगला है, मेरा राजा बेटा…’’

उसी वक्त घंटी खनकी और वासंती के मुंह से अनायास शब्द फूट पड़े, ‘‘अक्षू बेटा, रुक, मैं आ रही हूं.’’

उन्होंने दौड़ कर दरवाजा खोला. दरवाजे पर अक्षय नहीं था, लेकिन उसी की रैजीमैंट का एक युवा अफसर खड़ा था. वह वरदी पहने था. सिर पर ‘पी कैप’ थी. उस ने वासंती को सैल्यूट करते हुए धीरे से पूछा, ‘‘कैप्टन अक्षय कुमार?’’

‘‘जी हां, यह अक्षय का ही घर है.’’

‘‘आप?’’

‘‘मैं उस की मां हूं, वैसे अभी घर में कोई नहीं है. साहब दफ्तर गए हैं. मेघा कालेज में है और अक्षय तो सीमा क्षेत्र में तैनात है. तबीयत नासाज थी, इसलिए मैं रुक गई अन्यथा मैं भी कालेज गई होती. आप अंदर आइए.’’

अफसर हौले से अंदर आया. उस ने धीरे से कुछ इशारा किया. खुले दरवाजे से 2 सिपाही लोहे का एक बड़ा संदूक ले कर अंदर आए. उन्होंने उसे नीचे रखा और दोनों सावधान मुद्रा में खड़े हो गए. संदूक के बीचोबीच एक ‘पी कैप’ रखी हुई थी और उस के सामने वाले भाग पर लिखा था, ‘कैप्टन अक्षय कुमार, बौंबे इंजीनियर्स ग्रुप, इंजीनियर्स रैजीमैंट’.

‘‘यह सब क्या है?’’ वासंती ने घबरा कर पूछा, उस का दिल तेजी से धड़क रहा था.

‘‘अक्षय का सामान है,’’ अफसर धीरे से बोला.

‘‘अक्षय कहां है?’’ वासंती ने संदूक की ओर एकटक देखते हुए पूछा.

अफसर कुछ नहीं बोला. उस ने अपनी टोपी उतारी और वह जमीन ताकने लगा.

‘‘आप बोलते क्यों नहीं? अक्षय कहां है? यह सब क्या हो रहा है? अक्षय को क्या हुआ है? बोलिए, कुछ तो बोलिए?’’ वासंती ने चीख कर कहा.

अफसर ने अपनी जेब से कागज का एक छोटा सा टुकड़ा निकाला, जो मैला था और बुरी तरह मुड़ा हुआ था.

‘‘अक्षय की वरदी की ऊपरी जेब से यह टुकड़ा बरामद हुआ है, टुकड़ा गीला था, अब सूख चुका है. कृपया, आप पढ़ लें,’’ अफसर धीमी आवाज में बोला.

थरथराते हाथों से वासंती ने कागज का टुकड़ा लिया. उस मैले से मुड़े हुए कागज के टुकड़े पर केवल 3 पंक्तियां लिखी थीं:

‘अगर मैं बढ़ूं, मेरे पीछे आएं,

अगर मैं मुड़ूं, मुझे शूट करें,

अगर मैं मरूं, मुझे भूल जाएं.’ Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: अधूरी प्रीत

Hindi Romantic Story: घर की दहलीज पर कदम रखते ही सामने दीवार पर मम्मी का मुसकराता फोटो देख कर उस के कदम वहीं रुक गए. न जाने कितनी देर अपलक वह मम्मी के फोटो को निहारती रही.

‘‘दीदी, अब अंदर भी चलो. कब तक दरवाजे के बाहर खड़ी रहोगी?’’ उन को बसस्टैंड से लिवाने गए अविनाश ने पीछे से आते हुए कहा.

‘‘हां, चलो,’’ कहते हुए वह घर के अंदर दाखिल हो गई.

मम्मी की फोटो के आगे हाथ जोड़ कर प्रणाम करने के बाद वह कमरे का मुआयना करने लगी. अविनाश उस का बैग ले कर अंदर के कमरे में चला गया. कमरे में करीने से सजा कर रखी गई एक भी वस्तु में उसे कहीं भी इस बार अपनेपन का एहसास नहीं हो रहा था. इस कमरे में दीवार पर लगी मम्मी की फोटो के अतिरिक्त उसे सबकुछ अपरिचित सा दिखाई दे रहा था. 10 महीनों में पूरे घर की साजसज्जा ही बदल चुकी थी. लकड़ी के नक्काशी वाले पुराने सोफे की जगह मखमली गद्दी वाले नए सोफे ने ले ली थी.

एक समय मम्मी की पसंद रही भारीभरकम सैंट्रल टेबल की जगह पर कांच वाली राउंड सैंट्रल टेबल आ चुकी थी. खिड़की के पास कमरे के कोने में मनीप्लांट का पौट रखा हुआ होता था. वह उसे कहीं दिखाई नहीं दे रहा था. मम्मी ने कई वर्षों तक जतन कर उसे सहेज कर रखा हुआ था. उसे अब भी याद है कि सुबह हाथ में चाय का प्याला लेने के साथ ही मम्मी मनीप्लांट को पानी देना कभी नहीं भूलती थीं.

तभी अविनाश की पत्नी ज्योति पानी का गिलास ले कर बाहर के कमरे में आई.

‘‘आप खड़ी क्यों हैं? बैठिए न दीदी.’’

‘‘बस यों ही कमरे की सजावट देख रही थी,’’ पानी का गिलास हाथ में लेते हुए उस ने अनमने भाव से कहा.

‘‘पसंद आया न आप को? सारी चीजें मेरी पसंद की हैं. आप के भाई को तो इन सब बातों में कुछ सूझता ही नहीं,’’ ज्योति ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा है,’’ बुझे स्वर में उत्तर देते हुए वह अंदर की ओर जाने लगी. उस के कदम अपनेआप ही मम्मी जिस कमरे में सोती थीं उस ओर बढ़ गए. तभी पीछे से ज्योति की आवाज सुन कर वह रुक गई.

‘‘दीदी, उधर नहीं इधर. सासुमां के जाने के बाद अब वह कमरा रानी का है. आप का सामान इधर दूसरे कमरे में रखा है.’’

मम्मी और उस की कई कही और अनकही बातों का साक्षी था वह कमरा. 12वीं पास करने के बाद से ही वह इस कमरे में मम्मी के साथ अपनी शादी होने तक रह चुकी थी. उस के इस घर से विदा होने के बाद मम्मी अपनी अंतिम सांस तक इसी कमरे में रहीं. दो घड़ी एक नजर उस ने उस कमरे पर डाली और फिर मनमसोस कर दूसरे कमरे में चली गई.

यह कमरा उसे पहले की अपेक्षा कुछ छोटा महसूस हुआ. सहसा कमरे के फर्नीचर पर नजर पड़ते ही उसे इस के छोटे लगने का कारण समझ आ गया. दरवाजे के बाजू की सूनी पड़ी रहती दीवार पर वार्डरोब बन चुका था. खिड़की के पास एक बैड और उस के नजदीक एक कुरसी रखी हुई थी. 10×10 फुट के कमरे में इस से अधिक फर्नीचर आने की गुंजाइश नहीं थी. वह वहीं पलंग पर बैठ गई.

पलंग पर बैठ कर न जाने क्यों उसे एक अजीब तरह की अनुभूति होने लगी. यहां उसे कुछ अपना सा महसूस हो रहा था. उठ कर उस ने गौर से पलंग को देखा तो उस का मन खुशी से भर गया. इसी पलंग पर तो मम्मी ने अपनी अंतिम सांसें ली थीं. इसी पलंग पर लेटे हुए उन्होंने उस से और अविनाश से एकदूसरे के सुखदुख में हमेशा साथ निभाने का वचन लिया था. पुरानी डिजाइन का यह पलंग शायद रानी को पसंद नहीं आया होगा, इसीलिए इसे मम्मी के जाने के बाद शायद अलग कमरे में रख दिया. वह यह सोच कर कुछ अंदाजा लगा रही थी कि सहसा उसे याद आया इसी कमरे में तो मम्मी की अलमारी रखी होती थी. अलमारी की जगह पर तो वार्डरोब बन चुका था.

‘तो अलमारी कहां गई?’ वह मन ही मन बुदबुदाई.

मम्मी की अलमारी से तो उन की कितनी सारी यादें जुड़ी हुई थीं. वह तब 14 वर्ष की रही होगी जब पापा ने मम्मी को उन के जन्मदिन पर अलमारी गिफ्ट में दी थी. मम्मी ने बड़ी ही सूझबूझ के साथ अलमारी में पापा, अविनाश और उस के कपड़ों के लिए एक अलग जगह बना दी थी. उन्होंने अपने सामान के लिए एक लौकर वाला पार्टिशन बचा कर रखा था जिस में वे अपने गहने और अन्य कीमती सामान रखा करती थीं.

घर में किसी की भी मजाल नहीं थी कि कोई उन के उस लौकर को छू सके. पापा तो हर दफा अपने कपड़े अलमारी से निकालते वक्त सारी अलमारी अस्तव्यस्त कर देते थे और मम्मी उन पर गुस्सा होते हुए सारे कपड़े फिर से करीने से जमाने बैठ जाती थीं. उसे अब भी याद है जब एक बार अविनाश से अलमारी के दरवाजे पर लगा कांच टूट गया था और वह मम्मी के खौफ से बचने के लिए अलमारी के अंदर ही छिप गया था.

बड़बड़ाते हुए मम्मी ने अविनाश को खोजा, उस के न मिलने पर उसे कोसती हुई वे टूटे पड़े कांच बटोरने लगीं. तभी अलमारी के दरवाजे के कोने से खून की बूंदें निकलते देख वे घबरा उठीं और हड़बड़ा कर दरवाजा खोला तो अविनाश नीचे के खाने में बेहोश पड़ा हुआ था.

घबराए बिना उन्होंने उसे बाहर निकाला और पानी के छींटे दे कर उसे होश में लाने का प्रयत्न किया. उस ने जब आंखें खोलीं तो उसे सीने से लगाए वे घंटों तक रोती रहीं. इस घटना के बाद तो उन्होंने उस के समझदार होने तक अलमारी को लौक कर रखने की आदत बना ली.

तभी अविनाश अंदर आ कर उस के पास ही कुरसी ले कर बैठ गया.

‘‘दीदी, मम्मी के जाने के बाद से तो जैसे आप ने इस ओर आना ही बंद कर दिया. मम्मी थीं तो कम से कम महीनेदोमहीने में आप उन की खबर पूछने के बहाने आ जाती थीं.’’

‘‘तब की बात और थी, अविनाश. मम्मी की बीमारी का पता चलते ही हर बार मन में एक भय सा बना रहता था कि अगली बार मम्मी मिलेंगी या नहीं. इसलिए बारबार जब मन होता था तो आ जाती थी,’’ उस ने शांति से अविनाश की बात का उत्तर दिया.

‘‘आप का यह छोटा भाई अब भी इसी घर में रहता है. आप को इस घर की याद अब क्या केवल रक्षाबंधन के दिन ही आती है?’’ अविनाश के स्वर में शिकायत थी.

‘‘नहीं रे, ऐसा नहीं है. तू तेरी घरगृहस्थी में सुखी है, फिर अब मम्मी के जाने के बाद बारबार इस उम्र में मायके आना शोभा नहीं देता,’’ कहते हुए उस के चेहरे के भाव बदल गए.

‘‘क्या बात है, दीदी? आप कुछ उखड़ी हुई सी लग रही हैं,’’ अविनाश उस के चेहरे के बदलते भाव भांप गया.

‘‘अविनाश, यहां इस कमरे में मम्मी की अलमारी रखी होती थी. वह कहां है?’’ उस से रहा नहीं गया.

‘‘वो तो निकाल दी. इस कमरे में वार्डरोब बनवाने के बाद तिजोरी रखने की जगह नहीं बची थी. वैसे भी, वह बहुत पुरानी हो चुकी थी,’’ अविनाश ने जवाब दिया.

मम्मी की मौजूदगी में जब भी आई तब तक वह घर उस के लिए मम्मी का घर था पर अब एक रिश्ते के जाते ही जैसे समीकरण बदल चुके थे. मम्मी का घर कहलाने वाला घर अब भाई का घर हो चुका था. इसीलिए मम्मी के जाने के 10 महीनों के बाद एक बार फिर से इस घर में आने पर उसे बारबार पहली बार यहां आने का आभास हो रहा था. दुख उसे इस बात का हो रहा था कि मम्मी से जुड़ी यादों का सौदा करने से पहले अविनाश ने एक बार भी उस से पूछा नहीं. मम्मी के जाते ही उसे पराया कर दिया.

‘‘तू ने मम्मी की आखिरी निशानी नहीं रखी? उसे बेच दिया? मम्मी को कितनी प्यारी थी वह अलमारी, मुझ से एक बार कहा होता तो…’’ कहते हुए उस की आंखों से आंसू की 2 बूंदें उभर आईं.

‘‘क्या दीदी आप भी. इतनी भावुक हो कर कैसे जी लेती हैं?’’ अविनाश थोड़ा असहज हो गया.

‘‘सवाल भावुकता का नहीं है. मम्मी की वह कीमती निशानी तो रहने दी होती इस घर में?’’

‘‘पुरानी चीज जाएगी तभी तो नया सामान आएगा. फिर मम्मी ने दादी की बसाई हुई पुरानी चीजें समय बीतने पर नहीं निकाल दी थीं?’’ अविनाश ने अपना तर्क रखा.

‘‘पर कम से कम कुछ समय तो बीतने दिया होता. अभी सालभर भी नहीं हुआ है उन को गए,’’ कहते हुए उस का गला रुंध गया.

‘‘आप की भावना समझता हूं मैं. मम्मी की बसाई सारी चीजें ऐसी जगह गई हैं जहां उन की सब से ज्यादा जरूरत थी.’’

‘‘तू कहना क्या चाहता है? मैं समझी नहीं?’’ अविनाश की बात सुन कर उस ने उस की ओर देखा.

‘‘एक वृद्धाश्रम को उन सब चीजों की जरूरत थी तो मैं ने दान कर दीं. इस बहाने उन की याद बनी रहेगी. वैसे भी मम्मी को तो अलमारी इसलिए प्यारी थी क्योंकि उस में उन की एक और कीमती चीज उन्होंने रख छोड़ी थी,’’ अविनाश की बात सुन कर वह उसे सवालिया नजरों से देखने लगी.

किचन में काम करती ज्योति शायद भाईबहन के बीच हो रही बात सुन चुकी थी. तभी वह एक छोटा सा डब्बा ले कर उस कमरे में दाखिल हुईर्. अविनाश ने वह डब्बा उस के हाथ से ले लिया.

‘‘दीदी, आप को याद है मम्मी की अलमारी का लौकर हम सब के लिए कुतूहल का विषय बना रहता था? लौकर को वे किसी को भी छूने नहीं देती थीं?’’

‘‘हां, तो?’’ अविनाश के प्रश्न के उत्तर में उस ने हामी भरते हुए सिर हिला दिया.

‘‘यह उन के उस अलमारी के लौकर से निकला है,’’ यह कह कर अविनाश ने वह डब्बा उस की ओर बढ़ा दिया.

उस छोटे से डिब्बे को हाथ में ले कर उस की आंखें डबडबा आईं. उसे लगा जैसे उस ने मम्मी को स्पर्श कर लिया. धीमे से उस ने उस डब्बे का ढक्कन खोला. एक पुराना सा ब्लैक ऐंड व्हाइट फोटो और एक पुराना सा पत्र उस के हाथ में आ गया.

फोटो को बड़े ही गौर से देखने के बाद भी उस में कैद छवि को वह पहचान नहीं पाई.

‘‘कौन है यह अविनाश?’’

‘‘फोटो के साथ रखा पत्र पढ़ लो, दीदी, सब समझ जाओगी,’’ अविनाश ने उस की जिज्ञासा को और बढ़ाते हुए कहा.

‘मेरी प्रिय रंजना,

फूलों की खुशबू की तरह अब भी तुम मेरे मन पर छाई हुई हो. तुम्हारी तसवीर जब भी देखता हूं, बस, तुम से मिलने को जी बेताब होने लगता है. इस बार शायद गांव न आ पाऊं. यहां बौर्डर पर दुश्मनों की हलचल बढ़ चुकी है, इसलिए अगले महीने मिलने वाली छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं. जब भी छुट्टी मंजूर होगी, दौड़ा चला आऊंगा तुम से मिलने और तुम्हें अपना बनाने. आते ही तुम्हारे बाबा से बात कर हमारी शादी के लिए उन्हें मना लूंगा. बस, तब तक मेरा इंतजार करना.

तुम्हारा, केवल तुम्हारा

रतन.’

वह 2-3 बार धूमिल हो चुके उस पत्र को पढ़ गई.

‘‘रतन? कहीं ये मामा के गांव वाले रतन चाचा तो नहीं?’’ उस ने एक बार फिर से उस तसवीर को गौर से देख कर कुछ अनुमान लगाते हुए कहा.

‘‘वही हैं, दीदी. मैं ने फोन पर उन से बात कर कन्फर्म किया है,’’ कहते हुए अविनाश की आंखें भीग आईं.

‘‘तू यह क्या कह रहा है? मम्मी और रतन चाचा…फिर पापा…? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है?’’ उस के मन में एक अजीब सी हड़बड़ाहट होने लगी.

‘‘सबकुछ सच है, दीदी. मम्मी और रतन चाचा आपस में प्यार करते थे पर जब वे 2 साल तक बौर्डर पर से गांव नहीं आ पाए तो मम्मी की शादी पापा से हो गई. रतन चाचा उन्हें बेहद प्यार करते थे और यही वजह है कि फिर वे किसी दूसरी स्त्री को अपनी जिंदगी में स्थान नहीं दे पाए.’’ अविनाश अपनी जगह से खड़ा हो गया.

मम्मी की मृत्यु के बाद पहली बार इस घर में आ कर जिन चीजों में वह मम्मी के एहसास को खोज रही थी उन्हें न पा कर मन ही मन उसे अब अपनेआप को इस घर से पराए होने का एहसास हो रहा था. पर फिर अविनाश द्वारा सहेज कर रखी गई मम्मी की इस अमूल्य याद को पा कर उस के मन में उठता पराएपन का भाव अपनेआप ही तिरोहित हो गया. इस क्षण पहली बार उसे भाई के घर में मम्मी के अब भी होने का एहसास हो आया.

‘‘अब समझ आ रहा है कि क्यों मम्मी के प्यार में एक दुखमिश्रित दर्द समाया होता था. अपने अंतिम समय में क्यों वे बारबार अलमारी की रट लगाए हुए थीं. आज पहली बार जान पाई कि मम्मी किस पीड़ा को अपने अंदर समाए जी रही थीं,’’ कहते हुए उस की आंखों से अश्रुधारा निकल पड़ी. Hindi Romantic Story

Story In Hindi: वे सूखे पत्ते

Story In Hindi: आज से 15 साल पहले की बात है. मैं 11वीं जमात में पढ़ता था. वह लड़की हमारी क्लास में नईनई आई थी. उस के पैर में कुछ लचक थी. शायद कुछ चोट लगी हो, इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी. उस ने 10वीं क्लास में पूरे उदयपुर में टौप किया था और मैं ने अपने स्कूल में.

दिखने में तो वह बला की खूबसूरत थी. मगर कहते हैं न कि चांद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उस के पैर की वह चोट उस चांद से हुस्न का दाग बन गई थी.

उस ने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था. उस की सादगी की चर्चा हर जबान पर थी.

शुरुआत के चंद महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे. सब को उस के हुस्न से मतलब था, उस से नहीं. हम लड़कों की सोच गिरी हुई होती है. लड़की को इस्तेमाल करने की चीज समझते हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. मगर सबकुछ जानते हुए भी उस ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया. न ही नाराजगी से और न ही खुशी से.

और एक मैं था, जो अभी तक उस का नाम भी नहीं जानता था. सच कहूं, तो मैं ने कभी कोशिश भी नहीं की थी. नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे. हर कोई उसे अलगअलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उस का असली नाम.

मैं ने उस की आंखें देखी थीं. कुछ बोलती थीं उस की आंखें, मगर क्या बोलती थीं, यह जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं. मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी. अनाथ था न मैं. अपना सबकुछ खुद ही देखना था. अपना भविष्य खुद बनाना था. जिस उम्र में लड़के तरहतरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था. भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी.

कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए. उस लड़की ने क्लास में फिर से टौप कर दिया. मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उस ने खत्म कर दिया था. हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सरोज, तुम ने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टौप किया है.’’ मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया. मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था.

टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे  95.8 फीसदी नंबर आए हैं. तुम दूसरे नंबर पर हो.’’

इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है. मगर फर्क क्यों है, इस का जवाब मुझे खुद को देना था. यह जवाब मैं कहां से लाता? मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा. सब लड़के खुश थे. जो फेल थे वे भी, क्योंकि उन्हें उस का असली नाम पता लग गया था. क्लास खत्म होने पर मैं उस से मिला और बधाई दी. वह इस की हकदार भी थी, इसलिए उस ने भी मुझे बधाई दी.

यह हमारी पहली मुलाकात थी. इस के बाद आगे के दिनों में धीरेधीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से. दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था.

फाइनल इम्तिहान आने वाले थे. हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं.

मगर मैं ने कभी सरोज के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था.

फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना.’’

मगर कहां मिलना, यह नहीं बताया. मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो यह था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था. क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं. तो क्या फिर उस के घर में? मगर उस का घर तो मुझे पता ही नहीं. तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना. मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उस के इस जवाब ने.

इम्तिहान खत्म हुए. हम मिले, हम फिर मिले, हम बारबार मिले. एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एकदूसरे के साथ की.

फिर एक दिन मैं ने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है. मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम गई थीं कि इतनी प्यारी लड़की के मांबाप नहीं हैं.  बला की खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी. समझ आ गया था मुझे कि उस की आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी. मुझे आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने बड़ी हसरत से उस से पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?’’

वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि सरोज क्या बोल रही है. मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उस के चेहरे पर हंसी  नहीं दिख रही थी.

‘‘सरोज, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैं ने बहुत जिज्ञासा से पूछा.

जब उस की आंखें सबकुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उस की जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था. वह चाह रही थी कि उस का यह दोस्त उस की आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उस के दोस्त थे. मगर उस ने नहीं बताया और मैं ने भी मान लिया कि शायद

दुनिया में कहीं उस का भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है. हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरेधीरे बहुत करीब आ गए थे. एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था. मैं जानना चाहता था उस का और उस के सूखे पत्तों का रिश्ता. मैं इतना करीब तो था उस के, मगर उस के दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे.

फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उस से सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझ से ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था. स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई. उस से मिले हुए काफी दिन गुजर गए. अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था. सरोज लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और.

फर एक दिन मैं ने स्कूल जा कर पता किया. कितना बेवकूफ था मैं. इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह रहती कहां थी.

मैं अपने टीचर के पास गया और सरोज का पता पूछा. टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सरोज तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है.’’ मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में. जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी.

टीचर बोले, ‘‘अरे, यह क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उस के हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’‘‘पता नहीं, सर. मगर यह मामूली नहीं है,’’ इतनकह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला. और क्या भागा यह मैं भी नहीं जानता. शायद मुझ में हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की.

मैं बहुत भागा और न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे. मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं. थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से. और डर था उसे खो देने का. डर था मुझे कि यह चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा. या उस का मेरे लिए पहला और आखिरी खत था. क्या करूं, कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. अभी पढ़ूं कि नहीं.

मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे. सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं. फिर सोचा, ‘शायद उस ने इस में अपना नया पता लिखा हो.’ बहुत हिम्मत कर के मैं ने वह खत खोल ही दिया और वह कुछ यों था:

‘प्यारे दोस्त राघव,

‘मैं जानती हूं कि यह खत पढ़ने से पहले तुम ने हजार बार सोचा होगा. तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा. मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उन में सब से बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों?

‘राघव, मैं ने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं. मैं अपने मातापिता की एकलौती लड़की थी. जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था. जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था. मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था. तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था.

‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उन की जान ले ली. उन्होंने मुझे बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं. मैं भी रो रही थी. फिर मां ने मुझे छोड़ा और घर बंद कर के खुद को आग लगा ली. मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई.

‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली. जिस उम्र में औलाद को उस की मां के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझ से छिन गया था. मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए.‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था उस वक्त मुझे बचाने वोल वे सूखे पत्ते ही थे, जिन से मैं ने कभी बात तक नहीं की थी. उन बेजबानों ने मुझे एक नई जिंदगी दे दी थी. मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था.

‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है. मैं उन का कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया. ‘मुझे जब भी इस बेहया दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें खत लिखती हूं. मैं इन का एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोंका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सरोज… ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं… हमेशा.

‘मैं जानती हूं राघव कि तुम यह खत अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे हो, और तुम्हारी आंखें भीग गई हैं. मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए. मगर महसूस कर के देखना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह.

‘तुम्हारी सरोज.’

मेरी आंखें सच में भर आई थीं. एक आह निकल गई थी मेरे दिल से. आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उस के दोस्त… कितना जानती थी वह मुझे… उसे पता था कि मैं यह खत उस बाग में ही पढ़ूंगा. अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागतेभागते मुझे इस बाग में ले आए थे.

मैं सरोज के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सरोज की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोंका आया, जिस ने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सरोज मेरे बहुत करीब है… बहुत ही करीब… Story In Hindi

Hindi Romantic Story: वह धोखेबाज प्रेमिका – नीलेश का दीवानापन

Hindi Romantic Story: अनीता की खूबसूरती के किस्से कालेज में हरेक की जबान पर थे. वह जब कालेज आती तो हर ओर एक समा सा बंध जाता था. वह हरियाणा के एक छोटे से शहर सिरसा के नामी वकील की बेटी थी तथा बेहद खूबसूरत व प्रतिभाशाली थी. चालाक इतनी कि अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझती थी. अभिजात्य व आत्मविश्वास से उस का नूरानी चेहरा हरदम चमकता रहता. वह मुसकराती भी तो ऐसे जैसे सामने वाले पर एहसान कर रही हो. कालेज में एक रसूख वाले नामी वकील की बेटी यदि होशियार और सुंदर हो, तो उस के आगेपीछे घूमने वालों की फेहरिस्त भी लंबी ही होगी.

लेकिन अनीता ने सब युवकों में से नीलेश को चुना जो गरीब और हर वक्त किताबों में खोया रहता था. वह अनीता का ही सहपाठी था, और गांव के एक गरीब किसान का बेटा था. उस के पिता का असमय निधन हो गया था, इसलिए बड़ी मुश्किल से विधवा मां नीलेश को पढ़ा रही थीं व नीलेश हर समय अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहता था. अनीता को तो नीलेश ही पसंद आया, क्योंकि वह लंबा, हैंडसम और मेहनती नौजवान था. अनीता जबतब कुछ पूछने के बहाने उसे अपने नजदीक लाती गई और देखतेदेखते उन की दोस्ती की चर्चा अब पूरे कालेज में होने लगी. नीलेश खोयाखोया रहने लगा. धीरेधीरे इस मेधावी छात्र की पढ़ाई जहां ठप सी हो गई, वहीं अनीता जो पढ़ाई में औसत दर्जे की थी अब वह उस के बनाए नोट्स पढ़ कर फर्स्ट आने लगी.

इस सब में नीलेश की मेहनत होती. वह रातभर उस के लिए नोट्स बनाता, उस की प्रैक्टिकल की फाइल्स तैयार करता, लैब में ऐक्सपैरिमैंट्स वह करता, लेकिन उस की मेहनत का सारा फल अनीता को मिलता. नीलेश तो बस, अपनी प्रेमिका के प्रेम में ही डूबा रहता. वह उस के अलावा कुछ सोच भी नहीं पाता. यहां तक कि छुट्टी में वह अपनी मां से मिलने गांव भी नहीं जाता. ये सब देख मां भी बीमार रहने लगीं.

नीलेश प्यार के छलावे में इस कदर खो गया कि उसे याद ही नहीं रहता कि गांव में उस की मां भी हैं, जो आठों पहर उस की राह देखती रहती हैं. मां ने अपने जेवर बेच कर उस के कालेज की फीस भरी. मां बड़े किसानों के यहां धान साफ कर के उस की पढ़ाई का खर्च पूरा कर रही थीं. उन के प्रति चाह कर भी नीलेश नहीं सोच पाता, क्योंकि अनीता के साथ उस के प्रश्नोत्तर बनाना, फिर उस के घर जाना, वह कहीं जा रही हो, तो उसे साथ ले जाना, उस के संग पिक्चर व पार्टी अटैंड करना, ये सब काम वह करता. वह इन सब में इतना थक जाता कि उसे अपना भी होश न रहता. कालेज की गैदरिंग में उस ने अनीता को देख कर ही यह गीत गाया था, ‘एक शेर सुनाता हूं मैं, जो तुझ को मुखातिब है, इक हुस्नपरी दिल में है, जो तुझ को मुखातिब है…’

इस गीत को गाने में वह इतना तन्मय हो गया था कि बड़ी देर तक तालियां बजती रही थीं, पर वह सामने कुरसी पर बैठी अनीता को ही ताकता रहा और उस के कान में तालियों की आवाज भी जैसे नहीं पड़ रही थी. अनीता का सिर गर्व से ऊंचा हो गया था. सारे कालेज में वह जूलियट के नाम से जानी जाने लगी थी. हालांकि उस ने इस प्यार में अपना कुछ नहीं खोया. नीलेश ने उसे कभी उंगली से भी नहीं छुआ था.

इधर ऐग्जाम होतेहोते अनीता का मुंबई में रिश्ता तय हो गया. अनीता को क्या फर्क पड़ना था. वह तो मस्त थी. कभी प्रेम में पड़ी ही नहीं थी. वह तो मात्र मनोरंजन और मतलब के लिए नीलेश को इस्तेमाल कर रही थी. आखिर रिजल्ट आया, अनीता अव्वल आई पर नीलेश 2 विषयों में लटक गया. उस का 1 वर्ष बरबाद हो गया. इधर अनीता विवाह कर मुंबई रहने चली गई, जबकि नीलेश को प्यार में नाकामी और अवसाद हाथ लगा.

उस का साल बरबाद हो गया इस का तो उसे गम नहीं हुआ लेकिन जिसे वह दिल ही दिल में चाहने लगा था, उस अनीता के एकाएक चले जाने से वह इतना निराश हो गया कि उस ने नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या का प्रयास किया. जब अनीता की बरात आ रही थी, तब नीलेश अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रहा था. उस की गरीब मां का रोरो कर बुला हाल था. वह नहीं समझ पा रही थीं कि हर कक्षा में प्रथम आने वाला उस का बेटा आज कैसे फेल हो गया. वह इतना होशियार, सच्चा, ईमानदार, व मेहनती था कि मां ने उस के लिए असंख्य सपने संजोए थे, किंतु एक बेवफा के प्यार ने उसे इतना नाकाम बना दिया कि वह शराब पीने लगा. उस का भराभरा चेहरा व शरीर हड्डियों का ढांचा नजर आने लगा. Hindi Romantic Story

Romantic Story In Hindi: परिवर्तन – मोहिनी क्यों बदल गई थी?

Romantic Story In Hindi: गेट पर तिपहिया के रुकने का स्वर सुन कर परांठे का कौर मुंह की ओर ले जाते हुए खुदबखुद विभा का हाथ ठिठक गया. उस ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मांजी की ओर देखा. उन की आंखों में भी यही प्रश्न तैर रहा था कि इस वक्त कौन आ सकता है?

सुबह के 10 बजने वाले थे. विनय और बाबूजी के दफ्तर जाने के बाद विभा और उस की सास अभी नाश्ता करने बैठी ही थीं कि तभी घंटी की तेज आवाज गूंज उठी. विभा ने निवाला थाली में रखा और दौड़ कर दरवाजा खोला तो सामने मोहिनी खड़ी थी.

‘‘तुम, अकेली ही आई हो क्या?’’

‘‘क्यों, अकेली आने की मनाही है?’’ मोहिनी ने नाराजगी दर्शाते हुए सवाल पर सवाल दागा.

‘‘नहींनहीं, मैं तो वैसे ही पूछ…’’ विभा जब तक बात पूरी करती, मोहिनी तेजी से अंदर के कमरे की ओर बढ़ गई. विभा भी दरवाजा बंद कर के उस के पीछे हो गई.

मांजी अभी मेज के सामने ही बैठी थीं, वे मोहिनी को देख आश्चर्य में पड़ गईं. उन के मुंह से निकला, ‘‘मोहिनी, तू, एकाएक?’’

मोहिनी ने सूटकेस पटका और कुरसी पर बैठती हुई रूखे स्वर में बोली, ‘‘मां, तुम और भाभी तो ऐसे आश्चर्य कर रही हो, जैसे यह मेरा घर नहीं. और मैं यहां बिना बताए अचानक नहीं आ सकती.’’ मोहिनी का मूड बिगड़ता देख विभा ने बात पलटी, ‘‘तुम सफर में थक गई होगी, थोड़ा आराम करो. मैं फटाफट परांठे और चाय बना कर लाती हूं.’’ विभा रसोई में घुस गई. वह जल्दीजल्दी आलू के परांठे सेंकने लगी. तभी मांजी उस की प्लेट भी रसोई में ले आईं और बोलीं, ‘‘बहू, अपने परांठे भी दोबारा गरम कर लेना, तुझे बीच में ही उठना पड़ा…’’

‘‘कोई बात नहीं, आप का नाश्ता भी तो अधूरा पड़ा है. लाइए, गरम कर दूं.’’

‘‘नहीं, जब तक तू परांठे सेंकेगी, मैं मोहिनी के पास बैठ कर अपना नाश्ता खत्म कर लूंगी,’’ फिर उन्होंने धीमी आवाज में कहा, ‘‘लगता है, लड़ कर आई है.’’ मांजी के स्वर में झलक रही चिंता ने विभा को भी गहरी सोच में डाल दिया और वह अतीत की यादों में गुम हो, सोचने लगी :

जहां मां, बाबूजी और विनय प्यार व ममता के सागर थे, वहीं मोहिनी बेहद बददिमाग, नकचढ़ी और गुस्सैल थी. बातबात पर तुनकना, रूठना, दूसरों की गलती निकालना उस की आदत थी. जब विवाह के बाद विभा ससुराल आई तो मांजी, बाबूजी ने उसे बहू नहीं, बेटी की तरह समझा, स्नेह दिया. विनय से उसे भरपूर प्यार और सम्मान मिला. बस, एक मोहिनी ही थी, जिसे अपनी भाभी से जरा भी लगाव नहीं था. उस ने तो जैसे पहले दिन से ही विभा के विरुद्ध मोरचा संभाल लिया था. बातबात में विभा की गलती निकालना, उसे नीचा दिखाना मोहिनी का रोज का काम था. लेकिन विभा न जाने किस मिट्टी की बनी थी कि वह मोहिनी की किसी बात का बुरा न मानती, उस की हर बेजा बात को हंस कर सह लेती.

हर काम में कुशल विभा की तारीफ होना तो मोहिनी को फूटी आंख न सुहाता था. एक दिन विभा ने बड़े मनोयोग से डोसा, इडली, सांबर आदि दक्षिण भारतीय व्यंजन तैयार किए थे. सभी स्वाद लेले कर खा रहे थे. विनय तो बारबार विभा की तारीफ करता जा रहा था, ‘वाह, क्या लाजवाब डोसे बने हैं. लगता है, किसी दक्षिण भारतीय लड़की को ब्याह लाया हूं.’ तभी एकाएक मोहिनी ने जोर से थाली एक तरफ सरकाते हुए कहा, ‘आप लोग भाभी की बेवजह तारीफ करकर के सिर पर चढ़ा रहे हो. देखना, एक दिन पछताओगे. मुझे तो इन के बनाए खाने में कोई स्वाद नजर नहीं आता, पता नहीं आप लोग कैसे खा लेते हैं?’

अभी मोहिनी कुछ और कहती, तभी बाबूजी की कड़क आवाज गूंजी, ‘चुप हो जा. देख रहा हूं, तू दिन पर दिन बदतमीज होती जा रही है. जब देखो, तब बहू के पीछे पड़ी रहती है, नालायक लड़की.’ बाबूजी का इतना कहना था कि मोहिनी ने जोरजोर से रोना शुरू कर दिया. रोतेरोते वह विभा को कोसती भी जा रही थी, ‘जब से भाभी आई हैं, तभी से मैं सब को बुरी लगने लगी हूं. न जाने इन्होंने सब पर क्या जादू कर दिया है. भैया तो बिलकुल ही जोरू के गुलाम बन कर रह गए हैं.’ अब तक चुप तमाशा देख रहा विनय और न सुन सका, उस ने मोहिनी को डांटा, ‘बहुत हो गया, अब फौरन अपने कमरे में चली जा.’

मोहिनी तो पैर पटकती अपने कमरे में चली गई परंतु विभा इस बेवजह के अपमान से आहत हो रो पड़ी. उसे रोता देख विनय, मां और बाबूजी तीनों ही बेहद दुखी हो उठे. बाबूजी ने विभा के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘बेटी, हमें माफ कर देना. मोहिनी की तरफ से हम तुम से माफी मांगते हैं.’’ जब विभा ने देखा कि मां, बाबूजी बेहद ग्लानि महसूस कर रहे हैं और विनय तो उसे रोता देख खुद भी रोंआसा सा हो उठा है तो उस ने फौरन अपने आंसू पोंछ लिए. यही नहीं, उस ने अगले ही दिन मोहिनी से खुद ही यों बातचीत शुरू कर दी मानो कुछ हुआ ही न हो. मांजी तो विभा का यह रूप देख निहाल हो उठी थीं. उन का मन चाहा कि विभा को अपने पास बिठा कर खूब लाड़प्यार करें. परंतु कहीं मोहिनी बुरा न मान जाए, यह सोच वे मन मसोस कर रह गईं. एक दिन मोहनी अपनी सहेली के घर गई हुई थी. विभा और मांजी बैठी चाय पी रही थीं. एकाएक मांजी ने विभा को अपनी गोद में लिटा लिया और प्यार से उस के बालों में उंगलियां फेरती हुई बोलीं, ‘काश, मेरी मोहिनी भी तेरी तरह मधुर स्वभाव वाली होती. मैं ने तो उस का चांद सा मुखड़ा देख मोहिनी नाम रखा था. सोचा था, अपनी मीठी हंसी से वह घर में खुशियों के फूल बिखेरेगी. लेकिन इस लड़की को तो जैसे हंसना ही नहीं आता, मुझे तो चिंता है कि इस से शादी कौन करेगा?’

मांजी को उदास देख विभा का मन भी दुखी हो उठा. उस ने पूछा, ‘मांजी, आप ने मोहिनी के लिए लड़के तो देखे होंगे?’ ‘हां, कई जगह बात चलाई, परंतु लोग केवल सुंदरता ही नहीं, स्वभाव भी तो देखते हैं. जहां भी बात चलाओ, वहीं इस के स्वभाव के चर्चे पहले पहुंच जाते हैं. छोटे शहरों में वैसे भी किसी के घर की बात दबीछिपी नहीं रहती.’ कुछ देर चुप रहने के बाद मांजी ने आशाभरी नजरों से विभा की ओर देखते हुए पूछा, ‘तुम्हारे मायके में कोई लड़का हो तो बताओ. इस शहर में तो इस की शादी होने से रही.’

बहुत सोचनेविचारने के बाद एकाएक उसे रंजन का ध्यान आया. रंजन, विभा के पिताजी की मुंहबोली बहन का लड़का था. एक ही शहर में रहने के कारण विभा अकसर उन के घर चली जाती थी. वह रंजन की मां को बूआ कह कर पुकारती थी. रंजन के घर के सभी लोग विभा से बहुत स्नेह करते थे. रंजन भी विभा की तरह ही बुराई को हंस कर सह जाने वाला और शीघ्र ही क्षमा कर देने में विश्वास रखने वाला लड़का था. ‘यह घर मोहिनी के लिए उपयुक्त रहेगा. रंजन जैसा लड़का ही मोहिनी जैसी तेजतर्रार लड़की को सहन कर सकता है,’ विभा ने सोचा.

फिर मां, बाबूजी की आज्ञा ले कर वह अपने मायके चली गई. जैसा कि होना ही था, मोहिनी का फोटो रंजन को ही नहीं, सभी को बहुत पसंद आया. लेकिन विभा ने मोहिनी के स्वभाव के विषय में रंजन को अंधेरे में रखना ठीक न समझा. मोहिनी के तीखे स्वभाव के बारे में जान कर रंजन हंस पड़ा, ‘अच्छा, तो यह सुंदर सी दिखने वाली लड़की नकचढ़ी भी है. लेकिन दीदी, तुम चिंता मत करो, मैं इस गुस्सैल लड़की को यों काबू में ले आऊंगा,’ कहते हुए उस ने जोर से चुटकी बजाई तो उस के साथसाथ विभा भी हंस पड़ी. लेकिन विभा जानती थी कि मोहिनी को काबू में रखना इतना आसान नहीं है जितना कि रंजन सोच रहा है. तभी तो उस के विवाह के बाद भी वह और मांजी निश्ंिचत नहीं हो सकी थीं. उन्हें हर वक्त यही खटका लगा रहता कि कहीं मोहिनी ससुराल में लड़झगड़ न पड़े, रूठ कर वापस न आ जाए. अभी मोहिनी के विवाह को हुए 4 महीने ही बीते थे कि अचानक वह अजीब से उखड़े मूड में आ धमकी थी.

‘न जाने क्या बात हुई होगी?’ विभा का दिल शंका से कांप उठा था कि तभी परांठा जलने की गंध उस के नथुनों से टकराई. अतीत में खोई विभा भूल ही गई थी कि उस ने तवे पर परांठा डाल रखा है. फिर विभा ने फटाफट दूसरा परांठा सेंका, चाय बनाई और नाश्ता ले कर मोहिनी के पास आ बैठी.

पता नहीं, इस बीच क्या बातचीत हुई थी, लेकिन विभा ने स्पष्ट देखा कि मांजी का चेहरा उतरा हुआ है. नाश्ता करते हुए जब मोहिनी चुप ही रही तो विभा ने बात शुरू की, ‘‘और सुनाओ, ससुराल में खुश तो हो न?’’ शायद मोहिनी इसी अवसर की प्रतीक्षा में थी. उस ने बिफर कर जवाब दिया, ‘‘खाक खुश हूं. तुम ने तो मुझे इतने लोगों के बीच फंसवा दिया. दिनरात काम करो, सासससुर के नखरे उठाओ,  और एक देवर है कि हर वक्त उस के चोंचले करते फिरो.’’ मोहिनी का धाराप्रवाह बोलना जारी था, ‘‘रंजन भी कम नहीं है. हर वक्त अपने घर वालों की लल्लोचप्पो में लगा रहता है. मेरी तो एक नहीं सुनता. उस घर में रहना मेरे बस का नहीं है. अब तो मैं तभी वापस जाऊंगी, जब रंजन अलग घर ले लेगा.’’ इसी तरह मोहिनी, रंजन के परिवार को बहुत देर तक भलाबुरा कहती रही. परंतु मांजी और विभा को क्या उस के स्वभाव के बारे में मालूम न था. वे जान रही थीं कि मोहिनी सफेद झूठ बोल रही है. वास्तव में तो संयुक्त परिवार में रहना उसे भारी पड़ रहा होगा, तभी वह खुद ही लड़ाईझगड़ा करती होगी ताकि घर में अशांति कर के अलग हो सके.

वैसे भी विभा, रंजन के परिवार को वर्षों से जानती थी. उसे पता था कि रंजन और उस के परिवार के अन्य सदस्य मोहिनी को खुश रखने की हर संभव कोशिश करते होंगे. उस से दिनरात काम करवाने का तो सवाल ही नहीं उठता होगा, उलटे बूआ तो उस के छोटेबड़े काम भी खुश हो कर कर देती होंगी.

मांजी ने मोहिनी को समझाने की कोशिश की, ‘‘देख बेटी, तेरी भाभी भी तो खुशीखुशी संयुक्त परिवार में रह रही है, यह भी तो हम सब के लिए काम करती है. इस ने तेरी बातों का बुरा मानने के बजाय हमेशा तुझे छोटी बहन की तरह प्यार ही किया है. तुझे इस से सीख लेनी चाहिए.’’ लेकिन मोहिनी तो विभा की तारीफ होते देख और भी भड़क गई. उस ने साफ कह दिया, ‘‘भाभी कैसी हैं, क्या करती हैं, इस से मुझे कोई मतलब नहीं है. मैं तो सिर्फ अपने बारे में जानती हूं कि मैं अपने सासससुर के साथ नहीं रह सकती. अब भाभी या तो रंजन को अलग होने के लिए समझाएं, वरना मैं यहां से जाने वाली नहीं.’’

मोहिनी का अडि़यल रुख देख कर विभा ने खुद ही जा कर रंजन से बातचीत करने का फैसला किया. रास्तेभर विभा सोचती रही कि वह किस मुंह से रंजन के घर जाएगी. आखिर उसी ने तो सबकुछ जानते हुए भी मोहिनी जैसी बददिमाग लड़की को उन जैसे शरीफ लोगों के पल्ले बांधा था. परंतु रंजन के घर पहुंच कर विभा को लगा ही नहीं कि उन लोगों के मन में उस के लिए किसी प्रकार का मैल है. विभा को संकोच में देख रंजन की मां ने खुद ही बात शुरू की, ‘‘विभा, मैं ने रंजन को अलग रहने के लिए मना लिया है. अब तू जा कर मोहिनी को वापस भेज देना. दोनों जहां भी रहें, बस खुश रहें, मैं तो यही चाहती हूं.’’

विभा ने शर्मिंदगीभरे स्वर में कहा, ‘‘बूआ, मेरी ही गलती है जो रंजन का रिश्ता मोहिनी से करवाया…’’ तभी रंजन ने बीच में टोका, ‘‘नहीं दीदी, आप ने तो मुझे सबकुछ पहले ही बता दिया था. खैर, अब तो जैसी भी है, वह मेरी पत्नी है. मुझे तो उस का साथ निभाना ही है. लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन उस का स्वभाव जरूर बदलेगा.’’ वापस घर पहुंच कर जब विभा ने रंजन के अलग घर ले लेने की खबर दी तो मोहिनी खुश हो गई. लेकिन विनय खुद को कहने से न रोक सका, ‘‘मोहिनी, तू जो कर रही है, ठीक नहीं है. खैर, अब रंजन को खुश रखना. वह तेरी खुशी के लिए इतना बड़ा त्याग कर रहा है.’’

‘‘अच्छा, अब ज्यादा उपदेश मत दो,’’ मुंह बिचका कर मोहिनी ने कहा और फिर वापस जाने की तैयारी में जुट गई. फिर एक दिन रंजन का फोन आया. उस ने घबराए स्वर में बतलाया, ‘‘दीदी, मोहिनी को तीसरे महीने में अचानक रक्तस्राव शुरू हो गया है. डाक्टर ने उसे बिस्तर से बिलकुल न उठने की हिदायत दी है. आप को या मांजी को आना पड़ेगा. मैं तो मां को ला रहा था, लेकिन मोहिनी कहती है कि अब वह किस मुंह से उन्हें आने के लिए कह सकती है.’’ सास की तबीयत खराब थी, इसलिए विभा को ही जाना पड़ा. लेकिन वहां पहुंच कर उस ने देखा कि रंजन की मां वहां पहले से ही मौजूद हैं.

विभा ने सुखद आश्चर्य में पूछा, ‘‘बूआ, आप यहां?’’

‘‘अरी, यह मोहिनी तो पागल है, भला मुझे बुलाने में संकोच कैसा? मुसीबत में में काम नहीं आएंगे तो और कौन काम आएगा? यह तो अपने पूर्व व्यवहार के लिए बहुत ग्लानि महसूस कर रही है. बेटी, तू इसे समझा कि इस अवस्था में ज्यादा सोचा नहीं करते.’’ रात को विभा मोहिनी के कमरे के पास से गुजर रही थी कि अंदर की बातचीत सुन वहीं ठिठक गई. रंजन मोहिनी को छेड़ रहा था, ‘‘अब क्या करोगी, अब तो तुम्हें काफी समय तक मां के साथ रहना पड़ेगा?’’ ‘‘मुझे और शर्मिंदा मत कीजिए. आज मुझे परिवार का महत्त्व समझ में आ रहा है. सच, सब से प्यार करने से ही जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त होता है.’’

‘‘अरे, अरे तुम तो एक ही दिन में बहुत समझदार हो गई हो.’’

‘‘अच्छा, अब मजाक मत कीजिए. और हां, जब मैं ठीक हो जाऊं तो मुझे अपने घर ले चलना, अब मैं वहीं सब के साथ रहूंगी.’’

बाहर खड़ी विभा ने चैन की सांस ली, ‘चलो, देर से ही सही, लेकिन आज मोहिनी को परिवार के साथ मिलजुल कर रहने का महत्त्व तो पता चला.’ अब विभा को यह समाचार विनय, मांजी और बाबूजी को सुनाने की जल्दी थी कि मोहिनी के स्वभाव में परिवर्तन हो चुका है. Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: दिल चाहता है – दिल पर क्यों नहीं लग पाता उम्र का बंधन

Hindi Romantic Story: जुलाई का महीना है. सुबह की सैर  से वापस आ कर मैं ने कपड़े  बदले. छाता होने के बाद भी कपड़े कुछ तो भीग ही जाते हैं. चाय का अपना कप ले कर मैं बालकनी में आ कर चेयर पर बैठ गई और सुबहसुबह नीचे खेल रही छोटी बच्चियों पर नजर डाली. मन में स्नेह की एक लहर सी उठी. बहुत अच्छी लगती हैं मुझे हंसतीखेलती छोटीछोटी बच्चियां. जब भी इन्हें देखती हूं, दिल चाहता है सब छोड़ कर नीचे उतर जाऊं और इन बच्चियों के खेल में शामिल हो जाऊं, पर जानती हूं यह संभव नहीं है.

इस उम्र में बारिश में भीगते हुए छोटी बच्चियों के साथ पानी में छपाकछपाक करते हुए सड़क पर कूदूंगी तो हर कोई मुझे पागल समझेगा, कहेगा, इस उम्र में बचपना दिखा रही है, खुद को बच्ची समझ रही है. अब अपने मन में छिपे बच्चे के बचपन की इस कसक को दिखा तो सकती नहीं, मन मार कर बच्चियों को खेलते देखते रह जाती हूं. कितने सुहाने लगते हैं इन के खेल, कितने भरोसे के साथ हाथ पकड़ते हैं ये एकदूसरे का लेकिन बड़े होने पर न तो वे खेल रहते हैं न खिलखिलाहट, न वैसा विश्वास और साथ, कहां चला जाता है यह सब?

अभी सैर पर थी तो पार्क में कुछ युवा जोड़े एकदूसरे में खोए बैठे थे. मुंबई में जगह की कमी शायद सब से ज्यादा इन्हीं जोड़ों को खलती है. सुबहसुबह भी लाइन से बैठे रहते हैं. बराबर वाला जोड़ा क्या कर रहा है, इस की चिंता उन्हें नहीं होती. हां, देखने वाले अपने मन में, कितने बेशर्म हैं ये युवा, सोचते कुढ़ते हुए अपनी सैर पूरी करते हैं, लोगों का ध्यान अकसर उन्हीं पर होता है लेकिन वे जोड़े किसी की चिंता में अपना समय खराब नहीं करते. सैर की मेरी साथी भी जब अकसर उन्हें कोस रही होती है, मैं मन ही मन सोच रही होती हूं कि आह, यह उम्र क्यों चली गई, मीठेमीठे सपनों, सुंदर एहसासों की उम्र, अब क्यों हम अपनी जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह सबकुछ बेमानी हो जाता है.

मेरा तो आज भी दिल यही चाहता है कि अनिरुद्ध जब भी अपने काम से फ्री हों, हम दोनों ऐसे ही बाइक पर घूमने निकल जाएं, उन की कमर में हाथ डाल कर बैठना कितना अच्छा लगता था. अब तो कार में गाने सुनते हुए, कभी चुपचाप, कभी दोचार बात करते हुए सफर कटता है और हम अपना काम निबटा कर घर लौट आते हैं.

कई बार मैं स्नेहा और यश से जब कहती हूं, ‘चलो, अपना फोन और कंप्यूटर बंद करो, कहीं बाहर घूमने चलते हैं. थोड़ा साथ बैठेंगे या पिकनिक की बात करती हूं तो दोनों कहेंगे, ‘स्टौप इट मौम, क्या बच्चों जैसी बात करती हैं आप, इस उम्र में पिकनिक का शौक चढ़ा है आप को, हमें और भी काम हैं.’

मैं पूछती हूं, ‘क्या काम हैं छुट्टी के दिन?’ तो उन के काम यही होते हैं, सोना, टीवी देखना या अपने दोस्तों के साथ किसी मौल में घूमना. फिर मेरा दिल जो चाहता है, वह दिल में ही रह जाता है. कालेज से लौटती हुई अपने घर जाने से पहले सड़क पर खड़ी लड़कियों को कहकहे लगाती देखती हूं तो दिल चाहता है अपनी सहेलियों को बुला कर ऐसे ही खूब दिल खोल कर हंसू, ठहाके लगाऊं लेकिन अब न वे सहेलियां हैं न वह समय.

अब तो हमें वे मिलती भी हैं तो बस पति और बच्चों की शिकायतें, अपनीअपनी बीमारियों की, महंगाई की, रिश्तेदारों की परेशानियां क्यों हम ऐसे खुश रहना, बेफिक्री से समय बिताना भूल जाती हैं.

पिछले संडे की बात है. अनिरुद्ध नाश्ते के बाद फ्री थे. मैं ने कहा, ‘चलो, अनि, आज कार छोड़ कर बारिश में कहीं बाइक पर चलते हैं.’

फट से जवाब आया, ‘पागल हो गई हो क्या, नीरा? हड्डियां तुड़वानी हैं क्या? बाइक स्लिप हो गई तो, कितनी बारिश हो रही है?’

‘अनि, पहले भी तो जाते थे हम दोनों.’

‘पहले की बात और थी.’

‘क्यों, पहले क्या बात थी जो अब नहीं है?’ कह कर मैं ने उन के गले में बांहें डाल दीं, ‘अनि, मेरा दिल करता है हम अब भी बारिश में थोड़ा घूम कर रोमांस करें, एकदूसरे में खो जाएं.’

अनि हंसते हुए बोले, ‘यह सब तो रात में भी हो सकता है, उस के लिए बारिश में भीगने की क्या जरूरत है.’

‘कुछ चैंज होगा, अनि.’

‘क्या चैंज होगा? यही कि मुझे जुकाम हो जाएगा और मुंबई की सड़कों पर बाइक पर बैठ कर तुम्हें कमरदर्द. डार्लिंग, दिल को काबू में रखो, दिल का क्या है.’

मैं मन मार कर चुप रह गई थी. यह नहीं समझा पाई थी कि दिल करता है हम भीग जाएं, थोड़ी ठंड लगे, आ कर कपड़े बदल कर साथ कौफी पीएं, फिर बैडरूम में चले जाएं, फिर बस, इस के आगे नहीं समझा पाऊंगी.

कभीकभी तो हद हो जाती है, दिल करता है खुद ही अकेले कार ले कर लौंगड्राइव पर निकल जाऊं, कहीं दूर खुले रेस्तरां में बैठ कर कौफी पीऊं, फिर वहां कोई मिल जाए जो मेरा अच्छा दोस्त बन जाए, बस एक दोस्त, इस के आगे कुछ नहीं, जो मुझ से ढेर सी बातें करे, जो मेरी ढेर सी बातें सुने, अभी मैं और पता नहीं क्याक्या सोचती कि जम्हाई लेते हुए अनिरुद्ध आए और बोले, ‘‘यहां क्या कर रही हो सुबहसुबह? चाय मिलेगी?’’ और मैं यह सोचती हुई कि सच ही तो कहते हैं अनि, दिल का क्या है, दिल तो पता नहीं क्याक्या सोचता है, उठ कर अपने रोज के कामों में व्यस्त हो गई. Hindi Romantic Story

Romantic Story: तुम्हारी रोजी – क्यों पति को छोड़कर अमेरिका लौट गई वो?

Romantic Story: उस का नाम रोजी था. लंबा शरीर, नीली आंखें और सांचे में ढला हुआ शरीर. चेहरे का रंग तो ऐसा जैसे मैदे में सिंदूर मिला दिया गया हो.

रोजी को भारत की संस्कृति से बहुत प्यार था और इसलिए उस ने अमेरिका में रहते हुए भी हिंदी भाषा की पढ़ाई की थी और हिंदी बोलना भी सीखा.

उस ने किताबों में भारत के लोगों की शौर्यगाथाएं खूब सुनी थीं और इसलिए भारत को और नजदीक से जानने के लिए वह राजस्थान के एक छोटे से गांव में घूमने आई थी.

अभी उस की यात्रा ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई थी कि कुछ लोगों ने एक विदेशी महिला को देख कर आदतानुसार अपनी लार गिरानी शुरू कर दी और रोजी को पकड़ कर उस का बलात्कार करने की कोशिश की. पर इस से पहले कि वे अपने इस मकसद में कामयाब हो पाते, एक सजीले से युवक रूप ने रोजी को उन लड़कों से बचाया और उस के तन को ढंकने के लिए अपनी शर्ट उतार कर दे दी.

रूप की मर्दानगी और उदारता से रोजी इतना मोहित हुई कि उस ने रूप से चंद मुलाकातों के बाद ही शादी का प्रस्ताव रख दिया.

रोजी पढ़ीलिखी थी व सुंदर युवती थी. पैसेवाली भी थी इसलिए रूप को उस से शादी करने के लिए हां कहने मे कोई परेशानी नहीं हुई पर थोड़ाबहुत प्रतिरोध आया भी तो वह रूप के रिश्तेदारों की तरफ से कि एक विदेशी क्रिस्चियन लड़की से शादी कैसे होगी? न जात की न पात की और न देशकोस की…इस से कैसे निभ पाएगी?

पर रूप अपना दिल और जबान तो रोजी को दे ही चुका था इसलिए उस की ठान को काटने की हिम्मत किसी में नहीं हुई पर पीठ पीछे सब ने बातें जरूर बनाईं.

अंगरेजन बहू की पूरे गांव में चर्चा थी.

“भाई देखने में तो सुंदर है. पतली नाक और लंबा शरीर,” एक ने कहा.

“पर भाई, दोनों लोगों में संबंध भारतीय तरीके से बनते होंगे या फिर अंगरेजी तरीके से? या फिर दोनों लोग इशारोंइशारों मे ही सब काम करते होंगे,” दूसरे ने चुटकी ली.

“कुछ भी कहो, यार पर मुझे तो सारी अंगरेजन लड़कियों को देख कर तो बस एक ही फीलिंग आती है कि ये सब वैसी वाली फिल्मों की ही हीरोइनें हैं.”

इस पर सभी जोर के ठहाके लगाते हुए हंसते.

उधर औरतों की जमात में भी आजकल बातचीत का मुद्दा रोजी ही थी.

“सुना है रूप की बहू मुंह उघाड़ कर घूमती है,” पहली औरत बोली.

“न जी न कोई झूठ न बुलवाए. अभी कल ही उस से मिल कर आई हूं, बड़ी गुणवान सी लगी मुझे और कल तो उस ने घाघराचोली पहना था और अपने सिर को भी ढंकने की कोशिश कर रही थी पर अभी नईनई है न इसलिए पल्लू बारबार खिसक जा रहा था,”दूसरी औरत ने कहा.

“पर जरा यह तो बताओ कि दोनों में बातचीत किस भाषा में होती होगी ? रूप इंग्लिश सीखे या फिर अंगरेजन बहू को हिंदी सीखनी पड़ेगी,” तीसरी औरत ने कहा.

और उन की बात सच ही साबित हुई. रोजी को नया काम सीखने का इतना चाव था कि काफी हद तक घर का कामकाज भी सीखने लगी थी.

रोजी के गांव में आने से जवान तो जवान बल्कि बूढ़े भी उस की खूबसूरती के दीवाने हो गए थे और आहें भरा करते थे. कुछ युवक तो रोजी की एक झलक पाने के लिए रूप से बहाने से मिलने भी आ धमकते.

गांव के पुरुषों को लगता था कि एक विलायती बहू के लिए तो किसी से भी शारीरिक संबंध बना लेना बहुत ही सहज होता है.

रोजी के सासससुर को शुरुआत में तो अपनी विलायती बहू के साथ आंकड़ा बैठाने में समस्या हुई पर मन से न सही ऊपर मन से ही सास रोजी को मानने का नाटक करने ही लगी थीं.
दूसरों की क्या कही जाए रूप का चचेरा भाई शेरू भी अपनी रिश्ते की भाभी पर बुरी नजर लगाए हुए था.

रूप और शेरू का घर एकदूसरे से कुछ ही दूरी पर था इसलिए शेरू दिन में कई बार आता और बहाने से रोजी के आसपास मंडराता. ऐसा करने के पीछे भी उस की यही मानसिकता थी कि अंगरेजन तो कई मर्दों से संबंध  बना लेती हैं और इन के लिए
पति बदलना माने चादर बदलना होता है.

क्या पता कब दांव लग जाए और अपने पति की गैरमौजूदगी में कब रोजी का मूड बन जाए और शेरू को उस के साथ अपने जिस्म की आग निकालने का मौका मिल जाए.

पर रोजी बेचारी इन सब बातों से अनजान भारत में ही रह कर यहां के लोगों को समझ रही थी और रीतिरिवाज सीख रही थी.

इस सीखने में एक बड़ी बाधा तब आई जब रोजी को शादी के बाद माहवारीचक्र से गुजरना था. रोजी ने पढ़ रखा था कि इन दिनों में गांव में बहुत ही नियमों का पालन किया जाता है इसलिए उस ने इस बारे में अपनी सास को बता दिया.

रोजी की सास ने उसे कुछ नसीहतें दीं और यह भी बताया कि अभी वे लोग पास के गांव में एक समारोह में जा रहे हैं और चूंकि उसे अभी किचन में प्रवेश नहीं करना है इसलिए सासूमां ने उसे बाहर ही नाश्ता भी दे दिया और घर के लोग चले गए.

रोजी घर में अकेली रह गई. उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. नाश्ता शुरू करने से पहले रोजी की चाय ठंडी हो गई थी और चाय को गरम करने के लिए उसे किचन में जाना था.

‘सासूमां तो किचन में जाने को मना कर गई हैं. कोई बात नहीं बाहर से किसी बच्चे को बुला कर उसे किचन में भेज कर चाय गरम करवा लेती हूं,’ ऐसा सोच कर रोजी ने दरवाजा खोल कर बाहर की ओर झांका तो सामने ही आसपड़ोस के कुछ किशोर लड़के बैठेबैठे गाना सुन रहे थे.

“भैयाजी, जरा इधर आना तो… मेरा एक छोटा सा काम कर देना,” रोजी ने एक लड़के को उंगली से इशारा कर के बुलाया और खुद अंदर चली गई.

रोजी घर में अकेली है, यह उन बाहर बैठे हुए लड़कों को पता था हालांकि रोजी की नजर में वे लड़के अभी बच्चे ही थे पर उसे क्या पता कि ये बच्चे उस के बारे में क्या सोचे बैठे हैं…

“अबे भाई तेरी तो लौटरी लग गई. विलायती माल घर में अकेली है और तुझे इशारे से बुला रही है. जा मजे लूट.”

“हां, एक काम जरूर करना दोस्त, उस की वीडियो जरूर बना लेना,” एक ने कहा.

मन में ढेर सारी कामुक कल्पनाएं ले कर वह किशोर लड़का अंदर आया तो रोजी ने निश्छल भाव से उस से चाय गरम कर देने को कहा.

लड़का मन ही मन खुश हुआ और उस ने सोचा कि य. तो हंसीनाओं के अंदाज होते हैं. उस ने चाय गरम कर के रोजी को प्याली पकड़ाई और उस की उंगलियों को छूने का उपक्रम करते हुए उस के सीने को जोर से भींच लिया.

इस बदतमीजी से रोजी चौंक उठी और गुस्से में भर उठी. एक जोरदार तमाचा उस ने उस लड़के के गाल पर रसीद दिए. गाल सहलाता रह गया वह लड़का मगर फिर भी रोजी से जबरदस्ती करने लगा. रोजी ने उसे
धक्का दे दिया. तभी इतने में रूप खेतों पर से वापस आ गया. रोजी जा कर उस से लिपट गई और कहने लगी कि यह लड़का उसे छेड़ रहा है.

इस से पहले कि सारा माजरा रूप की समझ में आ पाता नीचे गिरा हुआ लड़का जोर से रोजी की तरफ मुंह कर के चिल्लाने लगा,”पहले तो इशारे से बुलवाती हो और जब कोई पीछे से आ जाता है तो छेड़ने का आरोप लगाती हो. अरे वाह रे त्रियाचरित्र…” वह लड़का चीखते हुए बोला.

“रूप इस का भरोसा नहीं करना. यह गंदी नीयत डाल रहा था मुझ पर. मेरा भरोसा करो.”

रोजी की बात पर रूप को पूरा भरोसा था इसलिए उस ने तुरंत ही उस लड़के के कालर पकङे और धक्का देते हुए दरवाजे तक ले आया.

तब घर के बाहर उस के पड़ोसियों की भीड़ जमा होते देख कर उस ने खुद ही मामला रफादफा कर दिया और उस लड़के को डांट कर भगा दिया.

उस दिन की घटना के बारे में भले ही लोग पीठ पीछे बातें करते रहे पर सामने कोई कुछ नहीं कह सका.

यह पहली दफा था जब रोजी को गांव में शादी कर के आना खटक रहा था. वह इस घटना से अंदर तक हिल गई थी पर जब रात को रूप ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और जीभर कर प्यार किया तो उस के मन का भारीपन थोड़ा कम हुआ.

एक दिन की बात है. रूप किसी काम से शहर गया हुआ था तब मौका देखकर शेरू रोजी की सास के पास आया और आवाज में लाचारी भर कर बोला,”ताईजी, दरअसल बात यह है कि आप की बहू की तबीयत अचानक खराब हो गई है और मुझे शाम होने से पहले शहर
जा कर दवाई लानी है और अब आनेजाने का कोई साधन नहीं है, जो मुझे शाम से पहले शहर पहुंचा दे.”

“हां तो उस में क्या है शेरू, तू रूप की गाड़ी ले कर चला जा. खाली ही तो खड़ी है,”रोज़ी की सासूमां ने कहा.

“हां सो तो है ताईजी, पर आप तो जानती हो कि मैं गाड़ी चलाना नहीं जानता. अगर आप इजाजत दो तो मैं भाभी को अपने साथ लिए जाऊं? वे तो विदेशी हैं और गाड़ी तो चला ही लेती हैं. हम बस यों जाएंगे और बस यों आएंगे.”

शेरू की बात सुन कर रोजी की सास हिचकी, पर उस ने इतनी लाचारी से यह बात कही थी कि वे चाह कर भी मना नहीं कर पाईं.

“अरे बहू, जरा गाड़ी निकाल कर शेरू के साथ चली जा. शहर से कोई दवा लानी है इसे,” रोजी की सास ने कहा.

“जी मांजी, चली जाती हूं.”

“और सुन, जरा धीरे गाड़ी चलाना. यह गांव है हमारा, तेरा विदेश नहीं,” सासूमां ने मुस्कराते हुए कहा.

रोजी को क्या पता था कि शेरू की नीयत में ही खोट है. उस ने गाड़ी निकाली और शेरू कृतज्ञता से हाथ जोड़ कर बैठ गया. रोजी ने गाड़ी बढ़ा दी.

गांव से कुछ दूर निकल आने के बाद एक सुनसान जगह पर शेरू दांत चियारते हुए बोला,”भाभी, थोडा गाड़ी रोको… जरा पेशाब कर आएं.”

गाड़ी रुकी तो शेरू झाड़ियों के पीछे चल गया और उस के जाते ही शेरू के 3 दोस्त कहीं से आ गए और शेरू से बातचीत करने लगे और बातें करतेकरते गाड़ी मैं बैठ गए.

इससे पहले कि रोजी कुछ समझ पाती शेरू ने उस का मुंह तेजी से दबा दिया और एक दोस्त ने रोजी के हाथों को रस्सी से बांध दिया और शेरू गाड़ी के अंदर ही रोजी के कपड़े फाड़ने लगा.

रोजी अब तक उन लोगों की गंदी नीयत समझ गई थी. उस के हाथ जरूर बंधे हुए थे पर पैर अभी मुक्त थे. उस ने एक जोर की लात शेरू के मरदाना अंग पर मारी.

दर्द से बिलबिला उठा था शेरू. अपना अंग अपने हाथों से पकड़ कर वहीं जमीन पर लौटने लगा.

इस दौरान उस के एक दोस्त ने रोजी के पैरों को भी रस्सी से बांध दिया और रोजी के नाजुक अंगों से खेलने लगा.

“रुक जाओ, पहले इस विदेशी कुतिया को मैं नोचूंगा. कमीनी ने बहुत तेज मार दिया है. अब इसे मैं बताता हूं कि दर्द क्या होता है.”

एक दरिंदा की तरह वह टूट पङा रोजी पर. रिश्ते की मर्यादा को भी उस ने तारतार कर दिया था. उस के बाद उस के तीनों दोस्तों ने रोजी के साथ बलात्कार किया. चीख भी नहीं सकी थी वह.

बलात्कार करने के बाद उस के हाथपैरों को खोल दिया उन लोगों ने.
जब रोजी की चेतना लौटी तो पोरपोर दर्द कर रहा था. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? पुलिस में रिपोर्ट करे या अपना जीवन ही खत्म कर दे?

पर भला वह जीवन को क्यों खत्म करे? आखिर उस ने क्या गलत क्या किया है? बस इतना कि किसी झूठ बोल कर सहायता मांगने वाले की सहायता की है और फिर किसी के चेहरे को देख कर उस की
नीयत का अंदाजा तो नहीं लगाया जा सकता है न…

‘अगर मैं इसी तरह मर गई तो रूप क्या सोचेगा?’ परेशान रोजी ने पहले यह बात रूप को बताने के लिए सोची और उस के बाद ही कोई फैसला लेने का मन बनाया.

रोजी किसी तरह घर वापस पहुंची तो रूप वहां पहले से ही बैठा हुआ उस की राह देख रहा था. रोजी रूप से लिपट गई और रोने लगी.

“क्या हुआ रोजी? तुम्हारे बदन पर इतने निशान कैसे आए? क्या कोई दुर्घटना हुई है तुम्हारे साथ?” रूप ने रोजी के हाथों और चेहरे को देखते हुए कहा.

“हां, दुर्घटना ही तो हुई है. ऐसी दुर्घटना जिस के घाव मेरे जिस्म पर ही नहीं आत्मा पर भी पहुंचे हैं…”

“पर हुआ क्या है?” सब्र का बाँध टूट रहा था रूप का.

“शेरू ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर मेरे साथ बलात्कार किया है…” फफक पङी थी रोजी.

“क्या… उस ने तुम्हारे साथ ऐसा किया? मैं शेरू को ऐसी सजा दूंगा कि उस की पुश्तें भी कांप उठेंगी. मैं उस को जिंदा नहीं छोडूंगा.”

रूप ने रिवाल्वर पर मुट्ठी कसी, कुछ कदम तेजी से बढ़ाए और फिर अचानक रोजी की तरफ पलटा और बोला,”वैसे, एक बात मुझे समझ नहीं आती कि जब से मैं ने तुम्हें जाना है तब से तुम्हारे साथ कोई न कोई छेड़छाड़ होती ही रहती है. कहीं कोई तुम्हें देख कर घर में घुसता है और कहीं कोई तुम्हारे साथ गैंगरेप करता है. आखिर अपनी गाड़ी चला कर तुम
क्यों गई थीं शेरू को ले कर? सवाल तो तुम पर भी उठ सकते हैं न?”

शेरू के मुंह से निकले ये शब्द उसे बाणों की तरह लग रहे थे. कुछ भी न कह सकी रोजी. आंसुओं में टूट गई थी वह और अपने कमरे की तरफ भाग गई थी.

अगले दिन रोजी पूरे घर में कहीं नहीं थी. अलबत्ता, उस के बिस्तर पर एक कागज रखा जरूर मिला.

कागज में लिखा था-

मेरे रूप,

मैं जब से भारत आई, सब ने मेरी देह को ही देखा और सब ने मेरी देह को ही भोगना चाहा. कहीं किसी ने कुहनी मारी तो किसी ने पीछे से धक्का मारा. तुम्हारी आंखों में पहली बार मुझे सच्चा प्रेम दिखा तो मैं ने तुम से ब्याह रचाया पर अब मुझ पर तुम्हारा विश्वास भी डगमगा रहा है.

माना कि मैं यहां के लिए विदेशी हूं, मगर इस का मतलब यह तो नहीं कि मैं सब के साथ सो सकती हूं. क्या सब लोग मुझे एक वेश्या भर समझते हैं?

मेरे जाने के बाद मुझे ढूंढ़ने की कोशिश मत करना, क्योंकि मैं अपने घर वापस जा रही हूं. मैं तो यहां की संस्कृति के बारे में जानने और समझने आई थी, पर अब मन भर गया है. अफसोस यह वह भारत नहीं जिस के बारे में मैं ने किताबों में पढ़ा था… Romantic Story

Romantic Story: एक झूठ – इकबाल से शादी करने के लिए क्या था निभा का झूठ?

Romantic Story: इकबाल जल्दीजल्दी निभा के लिए केक बना रहा था. दरअसल, आज निभा का बर्थडे था. इकबाल ने अपने औफिस से छुट्टी ले ली थी. वह निभा को सरप्राइज देना चाहता था.

उस ने निभा की पसंद का खाना बनाया था, पूरा घर सजाया था और निभा के लिए एक खूबसूरत सी ड्रैस भी खरीदी थी. आज की शाम वह निभा के लिए यादगार बना देना चाहता था.

शाम में जब निभा घर लौटी तो इकबाल ने दरवाजा खोला. निभा के अंदर कदम रखते ही इकबाल ने पंखा चला दिया और रंगबिरंगे फूल निभा के ऊपर गिरने लगे. निभा को बांहों में भर कर इकबाल ने धीरे से कहा,”जन्मदिन मुबारक हो मेरी जान.”

इकबाल का हाथ थाम कर निभा ने कहा,”सच इकबाल, तुम मेरी जिंदगी की सच्ची खुशी हो. कितना प्यार करते हो मुझे. ख्वाहिशों का आसमान छू लिया है मैं ने तुम्हारे दम पर… अब तमन्ना यही है मेरा दम निकले तुम्हारे दर पर…”

इकबाल ने उस के होंठों पर उंगली रख दी,”दम निकलने की बात दोबारा मत करना निभा. तुम ने मेरी जिंदगी हो. तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं.”

केक काट कर और गिफ्ट दे कर जब इकबाल ने अपने हाथों से तैयार किया हुआ खाना डाइनिंग टेबल फर सजाया तो निभा की आंखों में आंसू आ गए,”इतना प्यार मत करो मुझ से इकबाल. हम लिवइन में रहते हैं मगर तुम तो मुझे पत्नी से ज्यादा मान देते हो. हमारा धर्म एक नहीं पर तुम ने प्यार को ही धर्म बना दिया. मेरे त्योहार तुम मनाते हो. मेरे रिवाज तुम निभाते हो. मेरा दिल हर बार तुम चुराते हो. कब तक चलेगा ऐसा?”

“जब तक धरती पर मैं हूं और आसमान में चांद है…”

दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए थे. धर्म, जाति, ऊंचनीच, भाषा, संस्कृति जैसे हर बंधन से आजाद उन का प्यार पिछले 5 सालों से परवान चढ़ रहा था.

5 साल पहले एक कौमन फ्रैंड की पार्टी में दोनों मिले थे. उस वक्त दोनों ही दिल्ली में नए थे और जौब भी नईनई थी. समय के साथसाथ दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई. एकदूसरे के विचार और व्यवहार से प्रभावित इकबाल और निभा धीरेधीरे करीब आने लगे थे. दोनों के बीच दूरियां सिमटने लगीं और फिर दोनों अलगअलग घर छोड़ कर एक ही घर में शिफ्ट हो गए. किराया तो बचा ही जीवन को नई खुशियां भी मिलीं.

जल्दी ही दोनों ने मिल कर एक फ्लैट किस्तों पर ले लिया. दोनों मिल कर मकान की किस्त भी देते और घर के दूसरे खर्चे भी करते. दोनों के बीच प्यार गहरा होता गया. रिश्ता गहरा हुआ तो दोनों ने घर वालों को बताने की सोची.

इकबाल के घर वालों में केवल मां थीं जो बहुत सीधी थीं. वह तुरंत मान गई थीं. मगर निभा के यहां स्थिति विपरीत थी. उस के पिता इलाहाबाद के जानेमाने उद्योगपति थे. शहर में अपनी कोठी थी. 3-4 फैक्ट्रियां थीं. 100 से ज्यादा मजदूर काम करते थे. उन की शानोशौकत ही अलग थी. पैसों की कोई कमी नहीं थी पर पतिपत्नी दोनों ही अव्वल दरजे के धार्मिक और कट्टरमिजाज थे. मां अकसर ही धार्मिक कार्यक्रमों में शरीक हुआ करती थीं.

धर्म की तो बात ही अलग है. यहां तो जाति के साथसाथ गोत्र, वर्ण, कुंडली सब कुछ देखा जाता था. ऐसे में निभा को हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वह घर वालों से कुछ कहे.

एक बार दीवाली की छुट्टियों में जब वह घर गई तो उसे शादी के लिए योग्य लड़कों की तसवीरें दिखाई गईं. निभा ने तब पिता से सवाल किया,”पापा क्या मैं अपनी पसंद के लड़के से शादी नहीं कर सकती?”

पापा ने गुस्से से उस की तरफ देखा. तब तक मां ने उन्हें चुप रहने का इशारा किया और बोलीं,” देख बेटा, तू अपनी पसंद की शादी करने को तो कर सकती है, पर इतना ध्यान रखना कि लड़का अपने धर्म, अपनी जाति और अपनी हैसियत का होना चाहिए. थोड़ा भी इधरउधर हम स्वीकार नहीं करेंगे. इसलिए प्यार करना भी है तो आंखें खोल कर. वरना तू तो जानती ही है गोलियां चल जाएंगी.”

“जी मां,” कह कर निभा खामोश हो गई.

उसे पता था कि इकबाल के बारे में बता कर वह खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी दे मारेगी. इसलिए उस ने रिश्ते का सच छिपाए रखना ही उचित समझा. वक्त इसी तरह बीतता रहा.

एक दिन सुबह निभा बड़ी परेशान सी बालकनी में खड़ी थी. इकबाल ने पीछे से उसे बांहों में भरते हुए पूछा,”हमारी बेगम के चेहरे पर उदासी के बादल क्यों छाए हुए हैं?”

निभा ने खुद को छुड़ाते हुए परेशान स्वर में कहा,”क्योंकि आप के शहजादे दुनिया में आने के लिए निकल चुके हैं.”

“क्या?”

“हां इकबाल. मैं मां बनने वाली हूं और यह जिम्मेदारी मैं अभी उठा नहीं सकती. एक तरफ घर वालों को कुछ पता नहीं और दूसरी तरफ मेरा कैरियर भी पीक पर है. मैं यह रिस्क अभी नहीं ले सकती.”

“तो ठीक है निभा गर्भपात करा लो. मुझे भी यही सही लग रहा है.”

“पर क्या यह इतना आसान होगा?”

“आसान तो नहीं होगा बट डोंट वरी, हम पतिपत्नी की तरह व्यवहार करेंगे और कहेंगे कि एक बच्चा पहले से है और इसलिए अभी दूसरा बच्चा इतनी जल्दी नहीं चाहते.”

“देखो क्या होता है. शाम को आ जाना मेरे औफिस में. वहीं से लैडी डाक्टर के पास चलेंगे. ”

और फिर निभा ने वह बच्चा गिरा दिया. इस के 5-6 महीने बाद एक बार फिर गर्भपात कराना पड़ा. निभा को काफी अपराधबोध हो रहा था. शरीर भी कमजोर हो गया था. पर वह करती क्या…. उसे कोई और रास्ता ही समझ नहीं आया था. पर अब इस बात को ले कर वह काफी सतर्क हो गई थी और जरूरी ऐहतियात भी लेने लगी थी.

एक दिन औफिस में ही उस के पास खबर आई कि उस के पिता का ऐक्सीडैंट हो गया है और वे काफी गंभीर अवस्था में हैं. निभा एकदम बदहवाश सी घर लौटी और जरूरी सामान बैग में डाल कर निकल पड़ी. अगली सुबह वह हौस्पिटल में थी. उस के पापा आखिरी सांसें ले रहे थे.

उसे देखते ही पापा ने कुछ बोलने की कोशिश की तो वह करीब खिसक आई और हाथ पकड़ कर कहने लगी,” बोलो पापा, आप क्या कहना चाहते हैं?”

“बेटा मैं चाहता हूं कि मेरा सारा काम तुम्हारा चचेरा भाई नहीं बल्कि तुम संभालो. वादा कर बेटा…”

निभा ने उन के हाथों पर अपना हाथ रख कर वादा किया. फिर कुछ ही देर बाद उन का देहांत हो गया. अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया कर वह 14 दिनों बाद दिल्ली लौटी. इकबाल भी औफिस से जल्दी आ गया था. निभा उस के गले लग कर बहुत रोई और फिर अपना सामान पैक करने लगी.

इकबाल चौंकता हुआ बोला,”यह क्या कर रही हो निभा?”

“मुझे हमेशा के लिए घर लौटना पड़ेगा इकबाल. पापा ने वादा लिया है मुझ से. उन का सारा कारोबार मुझे संभालना है.”

“वह तो ठीक है मगर एक बार मेरी तरफ भी तो देखो. मैं यहां अकेला तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा? मकान की किस्तें, अकेलापन और तुम्हारे बिना जीने का दर्द कैसे उठा पाऊंगा? नहीं निभा नहीं. मैं नहीं रह पाऊंगा ऐसे…”

“रहना तो पड़ेगा ही इकबाल. अब मैं क्या करूं?”

“मत जाओ निभा. यहीं से संभालो अपना काम. कोई मैनेजर नियुक्त कर लो जो तुम्हें जरूरी जानकारी देता रहेगा.”

“इकबाल लाखोंकरोड़ों का कारोबार ऐसे नहीं संभलता. पापा अपने कारोबार के प्रति बहुत जनूनी थे. उन्होंने कोई भी काम मातहतों पर नहीं छोड़ा. हर काम में खुद आगे रहते थे. तभी आज इस मुकाम तक पहुंचे. उन्हें मेरे चचेरे भाई पर भी यकीन नहीं. मेरे भरोसे छोड़ कर गए हैं सब कुछ और मैं उन को दिया गया अंतिम वचन कभी तोड़ नहीं सकती.”

“और मुझ से किए गए प्यार के वादे? उन का क्या? उन्हें ऐसे ही तोड़ दोगी? नहीं निभा, तुम्हारे बिना मैं यहां 2 दिन भी नहीं रह सकता.”

“तो फिर चले आओ न…” आंखों में चमक लिए निभा ने कहा.

“मतलब?”

“देखो इकबाल, तुम एक बार मेरे पास इलाहाबाद आ जाओ. हमें एकदूसरे की कंपनी मिल जाएगी और फिर देखेंगे…कोई न कोई रास्ता भी निकाल ही लेंगे.”

फिर क्या था 10 दिन के अंदर ही इकबाल इलाहाबाद पहुंच गया. दोनों ने एक होटल में मुलाकात कर आगे की योजना तैयार की.

अगली सुबह इकबाल मैनेजर बन कर निभा के घर में खड़ा था. निभा ने अपनी मां से इकबाल का परिचय कराया,” मां यह बाला हैं. हमारे नए मैनेजर.”

इकबाल ने बढ़ कर मां के पैर छू लिए तो मां एकदम से अलग होती हुई बोलीं,”अरे नहीं बेटा. तुम मैनेजर हो. मेरे पैर क्यों छू रहे हो?”

“क्योंकि बड़ों के आशीर्वाद से ही सफलता के रास्ते खुलते हैं मां.”

“बेटा अब तुम ने मुझे मां कहा है तो यही आशीष देती हूं कि तुम्हारी हर इच्छा पूरी हो.”

बाला यानी इकबाल ने हाथ जोड़ कर आशीर्वाद लिया और अपने काम में लग गया. निभा ने मां को बताया, “मां, दरअसल बाला कालेज में मेरा क्लासमैट था. इस ने एमबीए की पढ़ाई की हुई है. पढ़ाई के बाद कुछ समय से दिल्ली में काम कर रहा था. यहां मुझे अकेले इतना बड़ा कारोबार संभालना था तो मेरी हैल्प के लिए आया है. वैसे इस का घर तो जमशेदपुर में है. यहां बिलकुल अकेला है यह. मां, क्या हम इसे अपने बड़े से घर में रहने के लिए एक छोटा सा कमरा दे सकते हैं?”

“क्यों नहीं बेटा? इसे गैस्टरूम में ठहरा दो. कुछ दिनों में यह खुद अपने लिए कोई घर ढूंढ़ लेगा.”

“जी मां…” कह कर निभा अपने कैबिन में चली गई. योजना का पहला चरण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ था. इकबाल घर में आ भी गया था और मां को कोई शक भी नहीं हुआ था. मैनेजर के रूप इकबाल बाला बन कर निभा के साथ काम करने लगा.

धीरेधीरे समय बीतने लगा. इकबाल और निभा ने मिल कर कारोबार अच्छी तरह संभाल लिया था. मां भी खुश रहने लगी थीं. इकबाल समय के साथ मां के संग काफी घुलमिल गया. वह मां की हरसंभव सहायता करता. हर मुश्किल का हल निकालता. बेटे की तरह अपनी जिम्मेदारियां निभाता. यही नहीं, कई बार उस ने अपने हाथों से बना कर मां को स्वादिष्ठ खाना भी खिलाया. उस के बातव्यवहार से मां बहुत खुश रहती थीं.

इस बीच दीवाली आई तो इकबाल ने उन के साथ मिल कर त्योहार मनाया. किसी को कभी एहसास ही नहीं हुआ कि वह हिंदू नहीं है.

एक बार कारोबार के किसी काम के सिलसिले में निभा को दिल्ली जाना था. इकबाल भी साथ जा रहा था. तभी मां ने कहा कि वे भी दिल्ली घूमना चाहती हैं. बस फिर क्या था, तीनों ने काम के साथसाथ घूमने का भी कार्यक्रम बना लिया.

तीनों अपनी गाड़ी से दिल्ली के लिए निकले. लेकिन नोएडा के पास हाईवे पर अचानक निभा की गाड़ी का ऐक्सीडैंट हो गया. उस वक्त निभा गाड़ी चला रही थी और मां बगल में बैठी थीं. ऐक्सीडैंट इतना भयंकर हुआ कि गाड़ी पूरी तरह डैमेज हो गई. निभा को गहरी चोटें लगीं पर उतनी नहीं जितनी मां को लगीं. मां के सिर में कांच घुस गए थे और खून बह रहा था. वह बीचबीच में होश में आ रही थीं और फिर बेहोश हो जा रही थीं.

करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर एक बड़ा अस्पताल था. निभा ने मां को वहीं ऐडमिट करने का फैसला लिया.

रात का समय था. हाईवे का वह इलाका थोड़ा सुनसान था. हाथ देने पर भी कोई भी गाड़ी रुकने का नाम नहीं ले रही थी. कोई और उपाय न देख कर इकबाल ने मां को गोद में उठाया और तेजी से अस्पताल की तरफ भागा. पीछेपीछे निभा भी भाग रही थी.

निभा ने ऐंबुलैंस वाले को काल किया मगर ऐंबुलैंस को आने में वक्त लग रहा था. इतनी देर में इकबाल खुद ही मां को गोद में उठाए अस्पताल पहुंच गया.

मां को तुरंत आईसीयू में ऐडमिट किया गया. उन्हें खून की जरूरत थी. संयोग था कि इकबाल का ब्लड ग्रुप ओ पौजिटिव था. उस ने मां को अपना खून दे दिया. मां को बचा लिया गया था. इस दौरान इकबाल लगातार दौड़धूप करता रहा.

इस घटना ने मां के दिल में इकबाल की जगह बहुत ऊंची कर दी थी. वापस घर लौट कर एक दिन मां ने इकबाल को सामने बैठाया और प्यार से उस के बारे में सब कुछ पूछने लगीं. पास ही निभा भी बैठी हुई थी.

निभा ने मां का हाथ पकड़ कर कहा,”मां मैं आज आप से एक हकीकत बताना चाहती हूं.”

“वह क्या बेटा?”

“मां यह बाला नहीं इकबाल है. हम ने झूठ कहा था आप से.”

इतना कह कर वह खामोश हो गई और मां की तरफ देखने लगी. मां ने गौर से इकबाल की तरफ देखा और वहां से उठ कर अपने कमरे में चली गईं. दरवाजा बंद कर लिया. निभा और इकबाल का चेहरा फक्क पड़ गया. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब इस परिस्थिति से कैसे निबटें.

अगले दिन तक मां ने दरवाजा नहीं खोला तो निभा को बहुत चिंता हुई. वह दरवाजा पीटती हुई रोतीरोती बोली,”मां, माफ कर दो हमें. तुम नहीं चाहती हो तो मैं इकबाल को वापस भेज दूंगी. गलती मैं ने की है इकबाल ने नहीं. मैं ने ही उसे बाला बन कर आने को कहा था. प्लीज मां, माफ कर दो.”

मां ने दरवाजा खोल दिया और मुंह घुमा कर बोलीं,”गलती तुम्हारी नहीं. गलती बाला की भी नहीं. गलती तो मेरी है जो मैं उसे पहचान न सकी.”

निभा और इकबाल परेशान से एकदूसरे की तरफ देखने लगे. तभी पलटते हुए मां ने हंस कर कहा,”बेटा, मैं ही पहचान न सकी कि तुम दोनों के बीच कितना गहरा प्यार है. इकबाल कितना अच्छा इंसान है. धर्म या जाति से क्या होता है? यदि सोचो तो समझ आएगा. बेटा, पलभर में मेरा धर्म भी तो बदल गया न जब इकबाल ने मुझे अपना खून दिया. मेरे शरीर में उसी का खून तो बह रहा है. फिर क्या अंतर है हम में या उस में. इतने दिनों में जितना मैं ने समझा है इकबाल मुझे एक शरीफ, ईमानदार और साथ निभाने वाले लड़का लगा है. इस से बेहतर जीवनसाथी तुम्हें और कौन मिलेगा?”

“सच मां, आप मान गईं…” कह कर खुशी से निभा मां के गले लग गई. आज उसे जिंदगी की सब से बड़ी खुशी मिल गई थी. पास ही इकबाल भी मुसकराता हुआ अपने आंसू पोंछ रहा था. Romantic Story

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