Story In Hindi: आज के भूत – नीलम के जीवन में लगा था कैसा दाग

Story In Hindi: नीलम सुबहसवेरे ससुराल छोड़ कर मायके में आ गई थी. उसे अचानक घर में आते देख कर उस के मातापिता परेशान हो उठे.

उन्होंने उस से घर आने की वजह पूछी, तो उस ने जलती आंखों से देख कर कहा, ‘‘आप लोग किसी अच्छे डाक्टर से मेरा इलाज कराएं, तो बेहतर होगा.’’

वे दोनों बौखला कर उस का मुंह देखते रहे.

नीलम बेहद खूबसूरत थी. वह 12वीं जमात की छात्रा थी. डेढ़ महीने के बाद उस ने महसूस किया कि उस के पैर भारी हो गए हैं. फिर 3 महीने के बाद वह अपना पेट छिपाने लगी थी.

एक दिन जब रात में उसे नींद नहीं आ रही थी, तब उस का गुजरा वक्त उस की आंखों के सामने तैरने लगा.

नीलम की शादी हो गई थी. तब उसे एक बीमारी ने दबोच लिया था. उस का इलाज शहर के बड़े डाक्टर से हो रहा था. कई महीने तक उस का इलाज चलता रहा, मगर उसे कोई आराम नहीं मिला था.

एक दिन नीलम के पिता ने उस डाक्टर से नीलम के हालचाल के बारे में पूछा, तो उन्होंने सम?ाया कि नीलम को हिस्टीरिया नाम की बीमारी है. अभी उस का इलाज चलता ही रहेगा. हां, अगर वह अपने पति के साथ रहेगी, तो उस की यह बीमारी अपनेआप ठीक हो जाएगी.

पर उस डाक्टर की बात पिता की समझ में नहीं आई, क्योंकि वह पाखंडों का गुलाम था. उस के सिर पर यह भूत सवार हो गया कि नीलम पर किसी प्रेत का साया है, क्योंकि दौरे के दौरान वह देर तक आंखें फाड़ कर देखती थी.

नीलम अजीबोगरीब हावभाव से अपने हाथपैरों को ऐंठती?ाटकती और दांतों को किटकिटा कर चबाती थी. फिर डाक्टर से उस का इलाज बंद हो गया था.

उस के घर में एक से बढ़ कर एक ओ?ागुनी आए, मगर उसे जरा भी फायदा नहीं हुआ था. उस के पिता ने ओझाई पर पानी की तरह पैसा खर्च किया था.

एक दिन पिता को खबर मिली कि ताड़डीह में एक काफी मशहूर ओझा है. वह नीलम के साथ फौरन वहां जा पहुंचा.

मंदिर में भीड़ लगी थी. वहां पर तथाकथित भूतप्रेत से हैरानपरेशान कुछ औरतें और कुछ जवान लड़कियां थीं.

जब नीलम का नंबर आया, तब तक रात हो गई थी. वहां पर बल्ब की रोशनी थी. बाकी सभी लोग जा चुके थे.

रंगीन फूलों वाली रेशमी साड़ी में नीलम की जवानी साफ झलक रही थी. ओझा उस की रसभरी आंखों में देखता रहा. उस की शरारत पर नीलम ने शरमा कर अपनी नजरें झाका लीं.

वह ओझ मन ही मन मंत्र बुदबुदाने लगा. उस ने कुछ कौडि़यां हवा में उछालीं, चावल चारों दिशाओं में

फेंके और हवा में अपना त्रिशूल लहरा कर गरजा, ‘ऐ दुष्ट प्रेतो, तुम अपने निवास से चलो और इस पर सवार हो जाओ.’

काफी देर तक विचित्र हावभाव से वह ओझ ऊपर की तरफ मुंह कर के इशारेबाजी करता रहा, फिर नीलम ने उस के अनपढ़ पिता को समझाया,

‘3 दिशाओं की 3 खतरनाक प्रेतात्माएं इसे सता रही हैं. मेरी महिमा के डर से वे इस पर प्रकट नहीं हुई हैं.

‘खैर, मैं उन्हें हवन कुंड में जला कर भस्म कर दूंगा,’ कह कर उस ओझा ने हवा में अपना त्रिशूल लहराया और एक बड़ा सा जंतर नीलम के गले में डाल दिया.

इस के बाद उस ने नीलम के अंधविश्वासी पिता से कहा, ‘हवनजाप यहीं पर होगा. क्या तुम्हारे पास 15-20 हजार रुपए हैं?’

पिता ने कहा, ‘जी महाराज.’

उस ओझा ने उसे चेतावनी दी, ‘यह लड़की देवी मां की शरण में रहेगी, तो वे प्रेतात्माएं इसे सता नहीं पाएंगी. तुम 10 दिन बाद यहां रुपए ले कर आओ.’

उस ओझा की बात नीलम के पिता को जंच गई.

अगली सुबह वह नीलम को देवी मां की शरण में छोड़ कर अपने गांव चला गया.

गांव में ओझा का हराभरा परिवार था. नीलम की उस ओझा की बड़ी बेटी काजल से दोस्ती हो गई थी. उस की गोद में एक साल का एक लड़का भी था.

जब रात में नीलम सोने के लिए कमरे में गई, तब ओझा का एक चेला उसे एक गिलास दूध दे कर बोला,

‘यह मां का प्रसाद है. इसे खा कर ही सोना.’

नीलम ने देखा कि दूध मे मेवा भी डाला गया था. बिना कुछ सोचेसमझे ही वह चटखारे लेले कर देवी मां का प्रसाद खा गई. उसे फौरन नींद की झपकियां आने लगीं और वह पलंग पर जा कर गहरी नींद में सो गई थी. फिर रात में उस के साथ क्या हुआ, उसे कुछ भी मालूम नहीं हो पाया था.

सुबह नीलम देर से जागी, तो हैरानपरेशान हो गई कि उस के कपड़े जमीन पर पड़े थे. उस का दिमाग चकरा कर रह गया. उसे एहसास हुआ कि किसी ने उस की इज्जत लूट ली है.

नीलम ने रात की यह घटना काजल को बताई, तो उस का भी दिमाग चकरा कर रह गया.

नीलम बोली, ‘मेरी इज्जत लूटने वाला वह भेडि़या यहां पर आया कैसे?’

यह सुन कर काजल ने कहा, ‘तुम चुप रहोगी, तो मैं उस भेडि़ए को रंगे हाथ पकड़ सकती हूं.’

फिर रात में वही चेला नीलम को एक गिलास दूध दे कर चला गया,

तभी उस के पास काजल आ गई. उस ने वह दूध एक बिल्ली को पीने के लिए दिया, तो वह बिल्ली दूध पी कर फौरन सो गई.

काजल बोली, ‘नीलम, इस में कुछ मिलाया गया है.’

जब घर के सभी लोग सो गए, तब खिड़की के रास्ते से कोई नीलम के कमरे में कूदा.

वह शख्स नीलम के पलंग की ओर बढ़ने लगा कि तभी एक कोने से उस पर टौर्च की तेज रोशनी पड़ी, तो वह बुरी तरह से बौखला उठा.

उस ने देखा कि पलंग पर काजल लेटी हुई थी. वह शख्स खिड़की के रास्ते से वापस भागा.

टौर्च की रोशनी में नीलम और काजल ने देखा कि वहां से भागने वाला ओ?ा था. दोनों की नजरों में उस ओ?ा की पोल खुल गई थी. नीलम अपनी यादों से बाहर निकल आई.

अगले दिन मां चुपके से नीलम को शहर के नर्सिंगहोम में ले गई, जहां एक लेडी डाक्टर ने हमेशा के लिए उसे इस पाप से छुटकारा दिला दिया.

लेकिन आज के उस भूत ने नीलम को जो दाग लगाया था, उसे कौन धो सकता है? Story In Hindi

Best Family Story: रिश्तों की मर्यादा – अपनों ने तोड़े माला के सपने

Best Family Story: ढोलक पर बन्नाबन्नी गाते सब के बीच बैठी माला कोने में 20 वर्षीय भांजी रुचि की फुसफुसाहट सुनते ही तिलमिला उठी. वह तुरंत उठी और दुकान से सटे कमरे में जा कर देखा तो उस की 8 वर्षीय बेटी परी जेठानी के पिता की गोदी में बैठी थी और जिस तरह से कहानी सुनाते उन के हाथ उस मासूम के कोमल अंगों को छू रहे थे, माला की आंखों में खून उतर आया. उस की पिता की उम्र के उस व्यक्ति की नापाक हरकत कतई माफी योग्य नहीं थी. उस का जी चाहा कि बेटी के साथ ऐसा घिनौना खिलवाड़ करने वाले का मुंह नोच ले, पर समझदार माला शादी जैसे मौके पर रंग में भंग नहीं डालना चाहती थी.

वैसे भी मिनी उस की प्रिय भतीजी थी और उसी की शादी अटेंड करने वह इंदौर से इटावा अपने पति और बेटी के साथ आई थी. इसलिए जैसेतैसे अपनेआप को नियंत्रित कर उस ने तेज आवाज में बेटी को आवाज दी, “चलो, परी खेल हो चुका. अब आओ, हाथमुंह धुला कर तुम्हें तैयार कर दूं.”

मां की आवाज सुनते ही परी भाग कर आई और उस के पैरों से लिपट गई. तभी जेठानी के पिता की आंखें माला से जा मिलीं. उस की आंखों में घृणा मिश्रित क्रोध देख वे थोड़ा सकपकाते हुए बोले, “बच्चों ने जिद की तो उन्हें कहानी सुना रहा था.”

‘छि: कैसा बेशर्म इनसान है. रंगेहाथों पकड़े जाने पर भी वह बातें बना रहा है,’ माला उस के दुस्साहस पर हैरान थी. इस तरह अपनों की भीड़ में कोई व्यक्ति वो भी पिता जैसे सम्मानित ओहदे वाला ऐसी नीच हरकत करेगा, उस ने सपने में भी नहीं सोचा था.

रिश्तों की मर्यादा भंग होती देख मन का आक्रोश आंखों के रास्ते उमड़तेघुमड़ते बहने लगा. उफ्फ क्या करूं, क्या कवीश को बताना ठीक रहेगा. लेकिन, अगर उन्हें गुस्सा आ गया तो माहौल बिगड़ते समय न लगेगा. ठीक है, देखती हूं अगर उन्होंने फिर ऐसी हरकत दोहराई तो उन की उम्र और ओहदे का खयाल न रखूंगी… सोचते हुए माला ने जैसे मन ही मन कुछ ठान लिया.

वाशरूम में उस ने परी के हाथमुंह धुलाते समय उसे नाना से दूर रहने को कहा.

“पर क्यों मम्मी, नाना तो हमें प्यार करते हैं, चौकलेट भी देते हैं.”

“पर, उन्हें आप को यहांवहां छूना नहीं चाहिए. ये गलत होता है,” कहते हुए माला ने उसे अच्छेबुरे टच के बारे में समझाया.

“हां मम्मी, उन का छूना तो मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था. मैं उन की गोद में बैठना भी नहीं चाहती थी, लेकिन उन्होंने कहा कि कहानी सुनने के लिए तो सब को बारीबारी से उन की गोद में बैठना होगा.

“पर, अब मैं नाना से चौकलेट भी नहीं लूंगी और कहानी भी नहीं सुनूंगी, फिर आप सुनाओगी न मुझे कोई अच्छी सी कहानी,” नन्ही परी मचल उठी.

“हां, मैं अपनी परी को एक सुंदर सी कहानी सुनाऊंगी, पर रात को सोते समय.

“लेकिन, अब हमेशा ध्यान रखना है कि आप को रुचि दीदी के साथ ही रहना है. ठीक है?”

“ओके…” अपनी छोटीछोटी बांहें उस के गले में डाल परी झूल गई.

12 साल पहले 5 भाईबहनों वाले उस हवेलीनुमा घर में माला सब से छोटी बहू बन कर आई थी. सासससुर थे नहीं, इसलिए अपने से काफी बड़े जेठजेठानी को ही वह सासससुर सा सम्मान देती थी. उस से बड़ी 3 ननदें भी उस पर बहुत स्नेह लुटाया करती थीं.

माला को याद आया, जब वह नीता दीदी के पिता से पहली बार मिलने पर उन के पैर छूने झुकी थी, तो उन्होंने ये कहते हुए उसे पैर नहीं छूने दिया था कि “कहीं बिटियन से पांव छुआए जात हैं. अरे बिटिया तो देवी का अवतार होती हैं. उन के तो पांव पूजे जात हैं…” और आज एक बिटिया के अंदर उन्हें देवी के बजाय उस की देह का दर्शन हो रहा है.
कैसी दोगुली मानसिकता, कैसा पाखंड… माला विचारों के भंवर में गोते लगा ही रही थी कि बाहर से आती भतीजे की आवाज ने उसे चौंका दिया, “चाची क्या कर रही हो, चाचा कब से आवाज दिए जा रहे हैं.”

“आईईई…” परी के कपड़े बदल चुकी माला ने जवाब दिया और परी को दुलारते हुए बाहर भेजा और खुद भी जल्दीजल्दी तैयार होने लगी.

आज लेडीज संगीत था, जिस में उस की और कवीश की भी परफोर्मेंस थी. प्योर जोर्जेट की रेड कलर की बौर्डर वाली साड़ी में माला बेहद खूबसूरत लग रही थी. शादी के लिए बुक किया गया गार्डन घर से 5 मिनट के फासले पर था. वहीं संगीत का प्रोग्राम होना था. काफी बड़े स्टेज की सजावट देखते ही बनती थी. पीच कलर का गाउन पहने मिनी भी बिलकुल गुड़िया सी लग रही थी.
सब से पहले दुलहन की सहेलियों का डांस हुआ, फिर मिनी ने भी उन को ज्वाइन कर लिया.

“मम्मा, मम्मा, मुझे भी डांस करना है.”

काफी देर से परी जिद कर रही थी. फिर तो वह भी कमर पर दोनों हाथ रखे ठुमकठुमक कर सब के बीच खूब नाची. फिर बारी आई माला और कवीश की. पुराने गीतों की पैरोडी पर उन दोनों ने इतना मस्ती भरा डांस किया कि सभी मंत्रमुग्ध हो उन्हें देखते रह गए. फिर तो क्या बच्चे क्या बड़े सभी एकएक कर डांस की मस्ती में डूबते चले गए.
माला भी प्रोग्राम ऐंजौय कर रही थी, पर उस की पैनी नजरें अपनी बच्ची की सुरक्षा के लिए पूरी तरह मुस्तैद थीं. उस की नजर बराबर दीदी के पिताजी पर थी. परी को खाना खिलाने के दौरान उस का ध्यान थोड़ा भटका तो वे गायब थे. “दीदी, क्या बात है, पिताजी नजर नहीं आ रहे?”

“अरे, उन से ज्यादा देर बैठा नहीं जाता. कहने लगे कि तुम बच्चों का प्रोग्राम है, तुम लोग मस्ती करो. मुझ से अब बैठा नहीं जाएगा. सो, खाना खा कर घर निकल गए.”

“दीदी, मेरी तबियत भी कुछ ढीली लग रही है, शायद थकान का असर है. घर जा कर आराम करती हूं. परी को ले जा रही हूं. कवीश पूछे तो बता देना.”

“अरे, पर तू ने तो अभी कुछ खाया भी नहीं है.”

“अभी भूख नहीं है. अगर लगी तो किसी के हाथों घर पर ही मंगवा लूंगी. आप चिंता न करो,” कहते हुए माला ने परी का हाथ पकड़ा और लंबे डग भरती हुई घर की तरफ चल दी. वह बेहद परेशान थी, क्योंकि बात यहां सिर्फ उस की बच्ची के प्रति हुए अन्याय की नहीं थी, बल्कि ये एक अनाचार और व्यभिचार था, जिसे करने वाला बेहद करीबी रिश्ते में बंधा एक धूर्त व्यक्ति था. सभ्य समाज का दुश्मन ऐसा व्यक्ति कभी भी किसी भी निरीह को अपनी कुचेष्टाओं का शिकार बना सकता है. तो क्या मासूमों के दोषी को यों ही छोड़ देना सही है, क्या रिश्ते की आड़ में उस की धृष्टता क्षमा करने योग्य है? ऐसे अनेक प्रश्न उस के मन को मथ रहे थे.

उस की आंखों के आगे जेठानी नीता की तसवीर तैर गई. कितनी अच्छी हैं दीदी, अपने पिता की सचाई जान कर उन्हें कितनी तकलीफ होगी? फिलहाल वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए. जानबूझ कर माला घर के सामने वाले गेट से न जा कर आंगन में बने पीछे वाले दरवाजे से अंदर घुसी. वहां नाइन और कामवाली अगले दिन की पूजा के लिए मंडप के नीचे कुछ तैयारी कर रही थीं. परी को उस ने हाल में ले जा कर चुपचाप बैठने को कहा.

आंगन से लगे लंबे गलियारे को पार करती हुई वह दुकान के पास वाले कमरे तक जा पहुंची, तभी उस के कानों में बच्चों के खिलखिलाने की आवाज पड़ी, “नानाजी, अब हमारी बारी है.”

“सब की बारी आएगी, तनिक धीरज रखो… नाना के हाथों की जादू वाली मालिश,” खरखराती आवाज में भद्दी सी हंसी सुन वह खड़ी न रह सकी. उटका हुआ दरवाजा हाथ से ठेलते ही खुल गया.
अंदर का नजारा देख उसे एक बार फिर अपनी आंखों पर विश्वास न हुआ. आसपड़ोस के बच्चे नाना कहे जाने वाले शख्स को घेरे बैठे थे और अपनी गोदी में 5-6 साल की बच्ची को उलटा लिटाए वो उस की मालिश करने की भावभंगिमा कर रहा था. लपक कर माला ने बच्ची को उस की गोद से लगभग छीना और सभी को प्यार से अपनेअपने घर जाने को कहा.

“तुम बहुत जल्दी आ गई बिटिया,” उस के चेहरे पर अभी भी कुटिल मुसकान तैर रही थी.

“आप को शर्म नहीं आती ये नीच हरकत करते हुए. कहने को आप पितातुल्य हैं, पर आप को पिता कहना उस पवित्र शब्द का अपमान होगा. उम्र में आप की पोतियों से भी छोटी हैं ये बच्चियां. सच बताएं, आप का विवेक मर चुका है क्या, जो इन के साथ इतनी घिनौनी हरकत करते वक्त आप के हाथ नही कांपे,” अत्यंत क्षोभ व गुस्से से वह फट पड़ी.

“तुम क्या कह रही हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा. मुझ पर झूठा इलजाम लगाते तुम्हें शर्म आनी चाहिए.”

अचानक ही उस की बोली और सुर बदल चुका था. बेशर्मी की ये पराकाष्ठा देख माला दंग थी.

“सच में आप जैसे इनसान को चुल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए. जिस तरह की जलील हरकत आप ने की है, कायदे से आप को पुलिस में दे देना चाहिए, परंतु मैं सिर्फ समझाइश दे कर छोड़ रही हूं. वक्त रहते सुधर जाइए, नहीं तो दीदी और दूसरे लोगों को पता चला तो आप कहीं के नहीं रहेंगे,” आवेश में ऊंची होती उस की आवाज आंगन में काम कर रहे लोगों तक जा पहुंची.

“पागल हो क्या, बित्तेभर की छोकरी मुझे सबक सिखाने चली है, जानती नहीं कि कौन हूं मैं? तुझे तो…” तैश में उस ने माला पर अपना हाथ छोड़ दिया. पर उस उठे हाथ को किसी ने हवा में ही रोक लिया.

“खबरदार, जो माला पर हाथ उठाया. और सही कहा आप ने, वो मासूम आप को जानेगी भी कैसे? पर, मैं आप की भलेमानस वाली छवि के पीछे की घिनौनी हकीकत से भलीभांति वाकिफ हूं. आप इस संसार के सब से निकृष्ट व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपनी घृणित वासना की पूर्ति के लिए अपनी बच्ची तक को न छोड़ा. सच में आप को पिता कहते मुझे लज्जा आती है,” गुस्से में नीता का चेहरा तमतमा रहा था.

“ये क्या कह रही हो दीदी, एक बाप अपनी बेटी के साथ ऐसा कैसे…”

“बाप… इस की दरिंदगी देख प्रकृति ने इसे बाप बनने का अवसर ही कहां दिया?

“एक अदद बच्चे की आस में इस की सहृदय पत्नी तमाम कोशिशें कर के हार गई. सब तरफ से निराश हो कर उस की जिद पर मुझे एक अनाथालय से गोद लिया गया था. लेकिन बेटी हो कर भी मैं इस की बेटी कभी न बन सकी.

“एक दिन इसे मेरे साथ गलत हरकत करते देख मां का दिल भारी पीड़ा से भर उठा. उस दिन मुझे अपने सीने से चिपटाए वे देर तक रोती रहीं. 2 दिन बाद ही उन्होंने अपने भाई को बुला कर मुझे उन के हाथों सौंप दिया. उन 2 दिनों में वे साए की तरह मेरे साथ रहीं. और मेरे जाने के महीनेभर बाद ही ये खबर आ गई कि घर के अहाते में बने कुएं में कूद कर उन्होंने आत्महत्या कर ली. शायद इन का ये भयावह रूप उन की बरदाश्त से बाहर हो चुका था…” कहते हुए नीता फफक पड़ी.

“काश, उस वक्त मैं अपनी मां के साथ मजबूती से खड़ी हो पाती और इसे इस के किए का दंड दिला पाती, तो आज मेरी मां जिंदा होती. मैं ने तो सदा ही इस से एक निश्चित दूरी बना रखी थी.

“मिनी की शादी में भी न बुलाती, पर तुम्हारे भैया ने कहा तो उन्हें कैसे मना करती. अपना हर जख्म उन से साझा करना पड़ता. फिर मुझे भी लगा कि उम्र के इस पड़ाव पर जीवन की काफी ठोकरें खाने के बाद शायद इन्हें कुछ समझ आ गई हो, पर नहीं, कुछ लोगों की फितरत कभी नहीं बदलती. सोचती हूं कि इन्हें न बुलाना ही सही होता. वो तो अच्छा हुआ, तुम्हारी बातों से मुझे कुछ संदेह हुआ और मैं तुम्हारे पीछे चल पड़ी. पर अब क्या करूं? इन की हैवानियत ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, क्या बताऊंगी तुम्हारे भैया को. जी तो कर रहा है कि अपनेआप को ही खत्म कर लूं. मैं नहीं रहूंगी, तो इस घर से इन का रिश्ता भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा.”

“गलती से भी ऐसा कभी मत सोचना. भुगतना तो उसे पड़ेगा, जिस ने ये जलील काम किया है. इन्हें इन के गुनाहों की सजा मिल कर रहेगी, ताकि ऐसी घिनौनी हरकत करने से पहले कोई सौ बार सोचे.”

दरवाजे पर नीता के पति खड़े थे.

“तुम यहां…?”

“हां, रुचि ने तुम दोनों को एक के बाद एक जाते देखा तो उस ने आज सुबह की घटना मुझे कह सुनाई और मैं सीधा यहां चला आया. तुम्हारी पूरी बात सुनते ही मैं ने कवीश को पुलिस को फोन करने को कहा है, पुलिस आती ही होगी,” कहते हुए नीता के कंधे को उन्होंने हौले से थपथपाया मानो उस के साथ खड़े रहने का भरोसा दे रहे हों.

“तुम अपने बाप को जेल भिजवाओगी?” इनसानी चोले के पीछे छिपे हैवान की आंखों में गहरा अविश्वास था.

“नहीं, मैं उस अनाचारी को जेल भेजूंगी, जिस ने रिश्तों की सभी मर्यादाओं को लांघ जाने का दुस्साहस किया है,” तल्ख स्वर में जवाब दे कर नीता ने घृणा से मुंह फेर लिया और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चल दी.

“मुझे माफ कर दो दीदी, तुम्हारे आंसुओं की जिम्मेदार हूं मैं. ऐसे मौके पर ये सब नहीं चाहती थी, पर…”

“कैसी बातें करती हो माला, तुम्हारी वजह से आज एक अपराधी अपनी सही जगह पहुंच जाएगा. शुक्रगुजार हूं तुम्हारी, आज तुम्हारे कारण ही मैं इतनी हिम्मत जुटा पाई और एक सही फैसला लिया है,” नीता उस की बात को काटते हुए बोली.

“सच में दीदी, गर्व है मुझे आप पर,” कहते हुए माला नीता के गले लग गई.

पुलिस की गाड़ी का सायरन धीरेधीरे पास हो कर तेज ध्वनि में तबदील हो रहा था. Best Family Story

Best Hindi Story: भरमजाल – रमेश ने कैसे बरबाद की अपनी जिंदगी

Best Hindi Story: आज पार्क जा कर जौगिंग करने में मेरा बिलकुल भी मन नहीं लगा. हालांकि, रमेश को छोड़ कर बाकी सभी दोस्त थे, मगर रमेश से मेरी कुछ ज्यादा ही पटती थी.

25 सालों से हम दोनों एकसाथ इस पार्क में जौगिंग करने आते रहे हैं. कुछ तो वैसे ही रमेश का न होना मुझे एक अधूरेपन का एहसास करा रहा था और कुछ दोस्तों ने जब उस के बारे में उलटीसीधी बात करनी शुरू की, तो मेरा मन और भी परेशान हो गया.

‘‘4 महीने बाद 60वां जन्मदिन होने वाला था रमेश का. उम्र के इस पड़ाव पर ऐसा काम करते हुए उसे जरा भी शर्म नहीं आई. देखने में कितना धार्मिक लगता था और काम देखो कैसा किया. सारा समाज थूथू कर रहा है उस पर,’’ एक दोस्त ने कहा.

दूसरे दोस्त ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे तो भाभीजी पर तरस आ रहा है. अच्छा हुआ दोनों लड़कों ने घर से निकाल दिया ऐसे बाप को…’’

इस से ज्यादा सुनने की ताकत मुझ में नहीं थी.

‘‘कुछ काम है…’’ कह कर मैं वापस घर आ गया और रमेश के बारे में सोचने लगा.

रमेश और मेरी कारोबार के सिलसिले में एकदूसरे से जानपहचान हुई थी. यह जानपहचान कब दोस्ती और फिर गहरी दोस्ती में बदल गई, पता ही नहीं चला.

रमेश बहुत ही साफदिल, अपने काम में ईमानदार और सामाजिक इनसान था. उस के इन्हीं गुणों के चलते हमारी दोस्ती इतनी बढ़ी कि 25 साल तक हम रोजाना एकसाथ जौगिंग करने जाते रहे.

हम दोनों अपनी सारी बातें जौगिंग के दौरान ही कर लेते थे. कई बार तो दूसरे दोस्त हमें लैलामजनू कह कर चिढ़ाते थे.

इतने सालों में रमेश ने अपना कारोबार काफी बढ़ा लिया था. ट्रांसपोर्ट के कारोबार के साथ ही अब उस ने दिल्ली के पौश इलाके में पैट्रोल पंप भी खोल लिया था.

एक तरफ लक्ष्मी उस पर पैसा बरसा रही थी, वहीं दूसरी तरफ उस की सुंदर सुशील पत्नी ने 2 बेटे उस की गोद में दे कर दुनिया का सब से अमीर इनसान बना दिया था.

जिंदगी ने अच्छी रफ्तार पकड़ ली थी, मगर सब से अमीर आदमी सुखी भी हो, ऐसा जरूरी नहीं होता. वह लालच के ऐसे दलदल में धंसता चला जाता है कि जब तक उसे एहसास होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

2 साल पहले बाजार में गिरावट आई, तो सभी के कारोबार ठप हो गए. रमेश किसी भी तरह कारोबार को चलाना चाहता था. उस ने अपने पैट्रोल पंप पर पैट्रोल भरने के लिए लड़कियां रख लीं और वाकई उस के पैट्रोल पंप की कमाई पहले से काफी ज्यादा बढ़ गई.

ग्राहक वहां पैट्रोल लेने के बहाने लड़कियां देखने ज्यादा आने लगे. अब रमेश हर तीसरे महीने पहली लड़की को हटा कर किसी नई और खूबसूरत लड़की को काम पर रखता.

मुझे उस की इस सोच से नफरत हुई. मैं ने उसे समझाने की कोशिश भी की, तो उस ने कहा ‘आल इज फेयर इन बिजनेस’.

मैं अपनी आंखों से देख रहा था कि पैसा कैसे एक सीधेसादे इनसान की अक्ल मार देता है.

ज्यादातर उस के मैनेजर ही इन लड़कियों को काम पर रखते थे. पर वे लड़कियां काम कैसा कर रही हैं, यह देखने के लिए रमेश कभीकभार अपने पैट्रोल पंप पर ही पैट्रोल भरवाने चला जाया करता था.

उन्हीं दिनों एक लड़की रानी, उस के पैट्रोल पंप पर काम करने आई. एक शाम को मैं उसी की गाड़ी में काम के सिलसिले में उस के साथ गया था.

उस दिन रमेश ने पहली बार रानी को देखा था. गठे हुए बदन की लंबीपतली थोड़ी सांवली सी थी वह, उम्र यही होगी कोई 23-24 साल यानी रमेश के बेटे से भी छोटी उम्र की थी.

रमेश ने मैनेजर को बुला कर पूछा, तो उस ने बताया कि यह नई लड़की है रानी, अपना काम भी बखूबी कर रही है. उस के बाद रमेश और मैं वापस आ गए.

3 महीने बाद मैनेजर का रमेश के पास फोन आया कि रानी आप से मिलना चाहती है. वह काम से हटने को तैयार नहीं है. उसे समझाने की बहुत कोशिश की, मगर कहती है कि एक बार मालिक से मिलवा दो, फिर चली जाऊंगी.

रमेश ने कहा, ‘‘उसे मेरे दफ्तर भेज देना.’’

दफ्तर आते ही रानी रमेश के पैरों में गिर गई और लगी जोरजोर से रोने, ‘‘मालिक, मुझे काम से मत निकालो. मेरे घर में कमाने वाली सिर्फ मैं ही हूं. बाप शराबी है. वह पैसे के लिए मुझे बेच देगा. 3 महीने से आधी तनख्वाह उस के हाथ में रख देती थी, तो शांत रहता था. बड़ी मुश्किल से अच्छी नौकरी और अच्छे लोग मिले थे. मैं आप के सब काम कर दिया करूंगी, ओवरटाइम भी करूंगी. उस के पैसे भी चाहे मत देना, पर मुझे काम से मत निकालो.’’

रमेश ने 1-2 बार उस से कहा भी कि उठो, ऐसे पैरों में मत गिरो, मगर वह पैरों को पकड़े रोती रही. आखिरकार रमेश को ही उसे उठाना पड़ा और मानना पड़ा कि वह उसे काम से नहीं निकालेगा.

ऐसा सुनते ही रानी ने रमेश का हाथ चूम लिया. 60 साल के बूढ़े रमेश के अंदर कमसिन रानी के चुंबन से एक सिहरन सी दौड़ गई.

रानी के जाने के बाद भी रमेश उसी के बारे में सोचता रहा. वह खुद को उस की तरफ खिंचता हुआ महसूस कर रहा था. 1-2 बार उस ने अपने इन विचारों को झटका भी कि वह यह क्या सोच रहा है. मगर रानी का गठीला बदन और उस का चुंबन रहरह कर उसे उस से मिलने को बेचैन कर रहे थे.

उस दिन के बाद से रमेश अकसर अपने पैट्रोल पंप पर जाने लगा. पहले वह वहां बैठता नहीं था. अब उस ने वहां बैठना भी शुरू कर दिया था.

रानी के दफ्तर आने वाली बात रमेश ने मुझे बताई थी और जब उस ने अपनी उस सोच के बारे में मुझे बताया, तभी मैं ने उसे समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम रानी से दूर ही रहो. फिसलने की कोई उम्र नहीं होती. कीचड़ में कितना धंस जाओगे, खुद तुम्हें भी पता नहीं चलेगा.’’

मेरे समझाने के बाद से रमेश ने मुझ से रानी के बारे में बातें करना बंद कर दिया, मगर मैं बरसों पुराना दोस्त था उस का, उस की बदलती हरकतों को बखूबी देख पा रहा था.

अगले 3 महीने का समय भी इसी तरह निकल गया. अब रमेश ने रानी को बुला कर कहा, ‘‘देखो, अब मुझे तुम्हें यहां से हटाना होगा, नहीं तो बाकी की लड़कियां भी यही मांग करेंगी कि हमें भी काम से मत हटाओ.’’

‘‘मगर, मैं कहां जाऊंगी मालिक?’’

‘‘शहर से बाहर निकल कर हमारा एक फार्म हाउस है, वहां उस घर की देखभाल के लिए किसी की जरूरत है. मैं तुम्हें वहां नौकरी दे सकता हूं. चौबीस घंटे वहीं रहना होगा. खानापीना सब हम देंगे और तनख्वाह अलग.’’

रानी ने खुशीखुशी हां भर दी.

अब रानी फार्म हाउस में काम करने लगी. कभीकभी रमेश अपने दोस्तों को वहां ले जाता, तो रानी खाना भी बना देती थी सब के लिए.

रानी हर काम में माहिर थी. फार्म हाउस पूरा चमका दिया था उस ने. रमेश को यह देख कर बहुत अच्छा लगा.

एक बार कहीं बाहर से आते हुए रमेश फार्म हाउस पर चला गया. वहां जा कर पता चला कि चौकीदार छुट्टी पर है. तब रानी ही गेट खोलने आई. चायपानी, नाश्ता सब दे दिया और जाने लगी, तो रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हें यहां कोई दिक्कत तो नहीं है?’’

‘‘जितना चाहा था, उस से भी ज्यादा मिल गया मालिक. आप की वजह से ही मैं आज इज्जत की जिंदगी जी रही हूं, नहीं तो मेरा बाप कब का मुझे बेच देता,’’ कहतेकहते वह रोने लगी.

रमेश ने उस के आंसू पोंछे, तो रानी ने रमेश का हाथ पकड़ लिया, ‘‘सर, आप बहुत ही अच्छे इनसान हैं. आजकल अपने कर्मचारियों के बारे में कौन सोचता है.’’ और फिर से उस का हाथ चूमने लगी और बोली, ‘‘आप तो मेरे लिए सबकुछ हैं.’’

उस चुंबन की सिहरन ने रमेश के हाथों वह काम करवा दिया, जो रानी उस से कराना चाहती थी. उस के बाद से तो रमेश का हर हफ्ते का यही काम हो गया. वह हर हफ्ते काम का बहाना बना कर फार्म हाउस आ जाता.

रानी ने उसे अपनी बातों में इस कदर उलझा लिया था कि अब रमेश को अपने घर और बीवीबच्चों की भी चिंता नहीं थी.

इस बीच रमेश ने मुझ से मिलनाजुलना बंद कर दिया था. फिर अचानक एक दिन भाभी (रमेश की पत्नी) का फोन आया कि रमेश ने दूसरी शादी कर ली है.

यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया. मुझे यह तो अंदाजा था कि कुछ गलत हो रहा है, मगर इस हद तक होगा, यह नहीं सोचा था.

शादी की उम्र तो उस के बेटों की थी, ऐसे में जब उन्हें अपने बाप की करतूत का पता चला, तो उन्होंने उन्हें घर से निकाल दिया.

रमेश ने पार्क आना बंद कर दिया. आता भी किस मुंह से. इतने सालों से कमाई इज्जत पल में मिट्टी में मिल गई. सारा समाज रमेश पर थूथू कर रहा था.

शादी के 6 महीने बाद ही रानी ने एक बच्चे को जन्म दे दिया. रमेश रानी के साथ फार्म हाउस में ही रह रहा था. एक दिन अचानक रात में रमेश मुझ से मिलने आया. वह जानता था कि उस की हरकत से मैं भी बहुत नाराज हूं.

मेरे कुछ कहने से पहले ही वह बोला, ‘‘मुझे मालूम है कि तुम मेरी शक्ल भी नहीं देखना चाहते, पर एक बार मेरी बात सुन लो. मैं यही चाहता हूं और कुछ नहीं. तुम्हारी माफी भी नहीं.’’

फिर रमेश ने शुरू से आखिर तक सारी बातें मुझे बताईं. रमेश ने यह भी बताया कि यह बच्चा उस का है ही नहीं. मगर रमेश ने रानी के साथ संबंध बनाए थे, उस का वीडियो रानी के आशिक ने चुपके से बना लिया था. रमेश पर शादी करने का दबाव डाला गया.

‘‘शादी के बाद ही उसे सारी सचाई का पता चल गया था. रानी ने सिर्फ पैसों के लिए उसे फंसाया था. यह उस की और उस के आशिक की सोचीसमझी चाल थी,’’ यह सब कह कर रमेश फूटफूट कर रोने लगा और मेरे घर से चला गया.

मैं तो यह सुन कर सन्न सा बैठा रह गया. अपने दोस्त की जिंदगी अपनी आंखों के सामने बरबाद होते हुए देख रहा था. जिसे रमेश प्यार समझ रहा था, वह केवल एक भरमजाल था. उस ने अपनी इज्जत, परिवार, दोस्तों को तो खोया ही, साथ ही उस प्यार से भी इतना बड़ा धोखा खाया.

काश, वह पहले ही समझ जाता, तो इतने सालों से कमाई हुई उस की इज्जत पर इतना बड़ा कलंक तो नहीं लगता. वह इतना समझता कि 60 साल की उम्र प्यार करने के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए होती है. Best Hindi Story

Hindi Family Story: एक तलाक ऐसा भी – गंगू और मोहिनी का यादगार फैसला

Hindi Family Story: गंगू अपनी पत्नी मोहिनी के साथ पूर्वी दिल्ली की एक कच्ची बस्ती में रहता था. कदकाठी में वह मोहिनी के सामने एकदम बच्चा लगता था, क्योंकि मोहिनी भरेपूरे बदन की औरत थी. उस का कद भी साढ़े 5 फुट था. जब वह गली से गुजरती थी, तो मनचले उस की मटकती कमर और उठे उभारों को देख कर आहें भरने लगते थे.

यह सब देख कर गंगू कुढ़ कर रह जाता था. रहीसही कसर मोहिनी के मोबाइल फोन ने पूरी कर दी थी. गंगू जब भी मोहिनी को फोन से चिपके देखता, तो वह उसे हड़का देता था. एक दिन तो हद हो गई. गंगू जब थकाहरा घर लौटा, तो मोहिनी हंसहंस कर किसी से फोन पर बात कर रही थी. उस की हंसी सुन कर गंगू का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया.

उस ने आव देखा न ताव और एक करारा तमाचा मोहिनी के गाल पर जड़ दिया.  अचानक पड़े तमाचे से मोहिनी बौखला गई और पलट कर उस ने भी गंगू को खींच कर एक तमाचा रसीद कर दिया. अब तो गुस्से के मारे गंगू के नथुने फूलने लगे.

यह देख कर बस्ती के कुछ लोग कहने लगे कि मर्द का अपनी पत्नी से मार खाना खानदान की नाक कटने के बराबर है. वे मानो गंगू के जले पर नमक छिड़क रहे थे. उधर गंगू गुस्से में और भी लालपीला हो रहा था. लिहाजा, मामला और भी बढ़ता चला गया.

इसी तनातनी में उन दोनों के रिश्तेदार दिल्ली आए तो मामला और भी संगीन होता गया और बात धीरेधीरे तलाक पर आ गई. दोनों पक्षों की तरफ से खूब आरोप उछाले गए. गंगू ने मोहिनी को और मोहिनी ने गंगू को बहुत सारी बकवास बातें कहीं. मुकदमा कोर्ट में दर्ज कराया गया. गंगू ने मोहिनी के खिलाफ बदचलनी का, तो मोहिनी ने गंगू के खिलाफ दहेज के नाम पर सताने का आरोप लगाया.

मुकदमा तकरीबन ढाई साल तक चलता रहा. आखिर में 7 साल तक शादीशुदा जिंदगी बिताने और एक बच्ची के मांबाप बनने के बाद आज गंगू और मोहिनी के बीच तलाक हो गया. गंगू और मोहिनी दोनों के हाथ में तलाक की परची थी. वे दोनों चुप थे. चूंकि मुकदमा तकरीबन ढाई साल तक चला था, लिहाजा वे दोनों ढाई साल से अलगअलग रह रहे थे.

गंगू दिल्ली में तो मोहिनी अपने मायके में रह रही थी. दोनों जब सुनवाई पर आते तो एकदूसरे को देख कर जलते, गुस्सा करते और मुंह मोड़ लेते.  तलाक की परची मिलने के बाद दोनों पक्ष के रिश्तेदार और गंगू व मोहिनी कोर्ट के पास के ही एक होटल में ठहरे थे. मोहिनी ने दिल्ली वाले घर में जाने से मना कर दिया था, तो गंगू भी वहीं रुक गया. सब की चाय पीने की इच्छा हुई.

इत्तिफाक से जिस मेज के सामने गंगू बैठा था, उसी मेज के सामने मोहिनी भी आ कर बैठ गई. अब दोनों आमनेसामने बैठे थे. शक्ल से लग रहा था कि उन दोनों के दिल में पछतावा था. दोनों एकदूसरे को काफी देर तक आंखों में आंखें मिला कर देखते रहे.  चाय आई.

दोनों ने कप उठाए, फिर कुछ देर बाद गंगू अपनी आंखों में पछतावे के आंसू ले कर हड़बड़ाती हुई आवाज में मोहिनी से बोला, ‘‘इस बीच जुदाई में मैं तुम्हें बहुत याद करता था.’’

यह सुन कर मोहिनी की भी आंखों में आंसू आ गए और उस ने गंगू के हाथ पर अपना हाथ रख कर धीरे से कहा, ‘‘मैं भी…’’ अब गंगू ने लंबी सांस ली और धीरेधीरे कहने लगा,

‘‘अभी तुम्हें 2 लाख रुपए नकद और 4,000 रुपए भी तो हर महीने देने हैं.

मुझे इस का जल्द ही बंदोबस्त करना पड़ेगा.’’

‘‘अरे… तो दे देना, कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हैं आप…’’ मोहिनी बोली.

मोहिनी की यह बात सुन कर गंगू की आंखों से और ज्यादा आंसू छलक पड़े और उस ने धीरे से कहा, ‘‘मैं तुम्हें अब भी बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘और मैं भी…’’ मोहिनी बोली. ‘‘तुम पर बदचलनी का झूठा आरोप लगाने के लिए मुझे माफ कर दो.’’ यह सुन कर मोहिनी बोली,

‘‘माफी मांगने की क्या जरूरत है… मैं ने भी तो आप पर दहेज के नाम पर सताने का झूठा आरोप लगाया था.’’

अब गंगू ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे बिना बिलकुल अकेला हो जाऊंगा.’’

‘‘और मैं भी,’’ मोहिनी बोली. गंगू डरते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हारे  साथ ही अपनी सारी जिंदगी गुजारना चाहता हूं.’’

‘‘और मैं भी आप के साथ ही रहना चाहती हूं…’’ मोहिनी ने कहा,

‘‘पर…’’ ‘‘पर क्या?’’ गंगू ने पूछा. ‘‘पर, इस तलाक की परची का क्या करोगे?’’ मोहिनी बोली.

‘‘तो इस तलाक की परची को फाड़ कर फेंक देते हैं,’’ गंगू ने कहा.

फिर उन दोनों ने एकदूसरे को देखते हुए अपनीअपनी परची फाड़ कर फेंक दी और ठहाका मार कर हंस पड़े. इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे का हाथ पकड़ लिया और कुरसी से उठ कर गले लग गए. दोनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े. देखते ही देखते गंगू और मोहिनी दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर हंसते हुए होटल से बाहर चले गए. यह नजारा देख कर उस होटल में ठहरे उन के रिश्तेदारों के चेहरों पर मुर्दनी छा गई. Hindi Family Story

Hindi Family Story: पति-पत्नी और वो

Hindi Family Story: मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी कर रही थी. अभी मुझे 2 साल भी नहीं हुए थे. कंपनी का एक बड़ा प्रोजैक्ट पूरा होने की खुशी में शनिवार को फाइव स्टार होटल में एक पार्टी थी. मुझे भी वहां जाना था. मेरे मैनेजर ने मुझे बुला कर खासतौर पर कहा, ‘‘प्रीति, तुम इस प्रोजैक्ट में शुरू से जुड़ी थीं, तुम्हारे काम से मैं बहुत खुश हूं. पार्टी में जरूर आना… वहां और सीनियर लोगों से भी तुम्हें इंट्रोड्यूज कराऊंगा जो तुम्हारे फ्यूचर के लिए अच्छा होगा.’’

‘‘थैंक्यू,’’ मैं ने कहा.

सागर मेरा मैनेजर है. लंबा कद, गोरा, क्लीन शेव्ड, बहुत हैंडसम ऐंड सौफ्ट स्पोकन. उस का व्यक्तित्व हर किसी को उस की ओर देखने को मजबूर करता. सुना है वाइस प्रैसिडैंट का दाहिना हाथ है… वे कंपनी के लिए नए प्रोजैक्ट लाने के लिए कस्टमर्स के पास सागर को ही भेजते. सागर अभी तक इस में सफल रहा था, इसलिए मैनेजमैंट उस से बहुत खुश है.

मैं ने अपनी एक कुलीग से पूछा कि वह भी पार्टी में आ रही है या नहीं तो उस ने कहा, ‘‘अरे वह हैंडसम बुलाए और हम न जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है. बड़ा रंगीन और मस्तमौला लड़का है सागर.’’

‘‘वह शादीशुदा नहीं है क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘एचआर वाली मैम तो बोल रही थीं शादीशुदा है, पर बीवी कहीं और जौब करती है. सुना है अकसर यहां किसी न किसी फ्रैशर के साथ उस का कुछ चक्कर रहा है. यों समझ लो मियांबीवी के बीच कोई तीसरी वो. पर बंदे की पर्सनैलिटी में दम है. उस के साथ के लिए औफिस की दर्जनों लड़कियां तरसती हैं. मेरी शादी के पहले मुझ पर भी डोरे डाल रहा था. मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है, सिर्फ सगाई ही हुई है… एक शाम उस के नाम सही.’’

‘‘मतलब तेरा भी चक्कर रहा है सागर के साथ… पगली शादीशुदा हो कर ऐसी बातें करती है. खैर ये सब बातें छोड़ और बता तू आ रही है न पार्टी में?’’

‘‘हंड्रेड परसैंट आ रही हूं?’’

मैं शनिवार रात पार्टी में गई. मैं ने पार्टी के लिए अलग से मेकअप नहीं किया था. बस वही जो नौर्मल करती थी औपिस जाने के लिए. सिंपल नेवी ब्लू कलर के लौंग फ्रौक में जरा देर से पहुंची. देखा कि सागर के आसपास 4-5 लड़कियां पहले से बैठी थीं.

मुझे देख कर वह फौरन मेरे पास आ कर बोला, ‘‘वाऊ प्रीति, यू आर लुकिंग गौर्जियस. कम जौइन अस.’’

पहले सागर ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे वाइस प्रैसिडैंट के पास ले जा कर उन से मिलवाया.

उन्होंने कहा, ‘‘यू आर लुकिंग ग्रेट. सागर तुम्हारी बहुत तारीफ करता है. तुम्हारे रिपोर्ट्स भी ऐक्सीलैंट हैं.’’

मैंने उन्हें थैंक्स कहा. फिर अपनी कुलिग्स की टेबल पर आ गई. सागर भी वहीं आ गया. हाल में हलकी रंगीन रोशनी थी और सौफ्ट म्यूजिक चल रहा था. कुछ स्नैक्स और ड्रिंक्स का दौर चल रहा था.

सागर ने मुझ से भी पूछा, ‘‘तुम क्या लोगी?’’

‘‘मैं… मैं… कोल्डड्रिंक लूंगी.’’

सागर के साथ कुछ अन्य लड़कियां भी हंस पड़ीं.

‘‘ओह, कम औन, कम से कम बीयर तो ले लो. देखो तुम्हारे सभी कुलीग्स कुछ न कुछ ले ही रहे हैं. कह कर उस ने मेरे गिलास में बीयर डाली और फिर मेरे और अन्य लड़कियों के साथ गिलास टकरा कर चीयर्स कहा.

पहले तो मैं ने 1-2 घूंट ही लिए. फिर धीरेधीरे आधा गिलास पी लिया. डांस के लिए फास्ट म्यूजिक शुरू हुआ. सागर मुझ से रिक्वैस्ट कर मेरा हाथ पकड़ कर डांसिंग फ्लोर पर ले गया. पहले तो सिर्फ दोनों यों ही आमने-सामने खड़े शेक कर रहे थे, फिर सागर ने मेरी कमर को एक हाथ से पकड़ कर कहा, ‘‘लैट अस डांस प्रीति,’’ और फिर दूसर हाथ मेरे कंधे पर रख कर मुझ से भी मेरा हाथ पकड़ ऐसा ही करने को कहा.

म्यूजिक तो फास्ट था, फिर भी उस ने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मुझे स्लो स्टैप्स ही अच्छे लगते हैं. ज्यादा देर तक सामीप्य बना रहता है, कुछ मीठी बातें करने का मौका भी मिल जाता है और थकावट भी नहीं होती है.’’ मैं सिर्फ मुसकरा कर रह गई. वह मेरे बहुत करीब था. उस की सांसें मैं महसूस कर रही थी और शायद वह भी मेरी सांसें महसूस कर रहा था. उस ने धीरे से कहा, ‘‘अभी तुम्हारी शादी नहीं हुई है न?’’

‘‘नहीं, शादी अभी नहीं हुई है, पर 6 महीने बाद होनी है. समरेश मेरा बौयफ्रैंड ऐंड वुड बी हब्बी फौरन असाइनमैंट पर अमेरिका में है.’’

‘‘वैरी गुड,’’ कह उस ने मेरे कंधे और गाल पर झूलते बालों को अपने हाथ से पीछे हटा दिया, ‘‘अरे यह सुंदर चेहरा छिपाने की चीज नहीं है.’’

फिर उस ने अपनी उंगली से मेरे गालों को छू कर होंठों को छूना चाहा तो मैं ‘नो’ कह कर उस से अलग हो गई. मुझे अपनी सहेली का कहा याद आ गया था. उसके बाद हम दोनों 2 महीने तक औफिस में नौर्मल अपना काम करते रहे.

एक दिन सागर ने कहा, हमें एक प्रोजैक्ट के लिए हौंगकौंग जाना होगा.’’

‘‘हमें मतलब मुझे भी?’’

‘‘औफकोर्स, तुम्हें भी.’’

‘‘नहीं सागर, किसी और को साथ ले लो इस प्रोजैक्ट में.’’

‘‘तुम यह न समझना कि यह मेरा फैसला है… बौस का और्डर है यह. तुम चाहो तो उन से बात कर सकती हो.’’

मैं ने वाइस प्रैसिडैंट से भी रिक्वैस्ट की पर उन्होंने कहा, ‘‘प्रीति, बाकी सभी अपनेअपने प्रोजैक्ट में व्यस्त हैं. 2 और मेरी नजर में थीं, उन से पूछा भी था, पर दोनों अपनी प्रैगनैंसी के चलते दूर नहीं जाना चाहती हैं… मेरे पास तुम्हारे सिवा और कोई औप्शन नहीं है.’’

मैं सागर के साथ हौंगकौंग गई. वहां 1 सप्ताह का प्रोग्राम था. काफी भागदौड़ भरा सप्ताह रहा. मगर 1 सप्ताह में हमारा काम पूरा न हो सका. अपना स्टे और 3 दिन के लिए बढ़ाना पड़ा. हम दोनों थक कर चूर हो गए थे. बीच में 2 दिन वीकैंड में छुट्टी थी.

हौंगकौंग के क्लाइंट ने कहा, ‘‘इसी होटल में स्पा, मसाज की सुविधा है. मसाज करा लें तो थकावट दूर हो जाएगी और अगर ऐंजौय करना है तो कोव्लून चले जाएं.’’

‘‘मैं तो वहां जा चुका हूं. तुम कहो तो चलते हैं. थोड़ा चेंज हो जाएगा,’’ सागर ने कहा.

हम दोनों हौंगकौंग के उत्तर में कोव्लून द्वीप गए. थोड़े सैरसपाटे के बाद सागर बोला, ‘‘तुम होटल के मसाज पार्लर में जा कर फुल बौडी मसाज ले लो. पूरी थकावट दूर हो जाएगी.’’

मै स्पा गई. स्पा मैनेजर ने पूछा, ‘‘आप ने अपौइंटमैंट में थेरैपिस्ट की चौइस नहीं बताई है. अभी पुरुष और महिला दोनों थेरैपिस्ट हैं मेरे पास. अगर डीप प्रैशर मसाज चाहिए तो मेरे खयाल से पुरुष थेरैपिस्ट बेहतर होगा. वैसे आप की मरजी?’’

मैंने महिला थेरैपिस्ट के लिए कहा और अंदर मसाजरूम में चली गई.

बहुत खुशनुमा माहौल था. पहले तो मुझे ग्रीन टी पीने को मिली. कैंडल लाइट की धीमी रोशनी थी, जिस से लैवेंडर की भीनीभीनी खुशबू आ रही थी. लाइट म्यूजिक बज रहा था. थेरैपिस्ट ने मुझे कपड़े खोलने को कहा. फिर मेरे बदन को एक हरे सौफ्ट लिनेन से कवर कर पैरों से मसाज शुरू की. वह बीचबीच में धीरेधीरे मधुर बातें कर रही थी. फिर थेरैपिस्ट ने पूछा, ‘‘आप को सिर्फ मसाज करानी है या कुछ ऐक्स्ट्रा सर्विस विद ऐक्स्ट्रा कौस्ट… पर इस टेबल पर नो सैक्स?’’

‘‘मुझे आश्चर्य हुआ कि उसे ऐसा कहने की क्या जरूरत थी. मैं ने महसूस किया कि मेरी बगल में भी एक मसाज चैंबर था. दोनों के बीच एक अस्थायी पार्टीशन वाल थी. जैसेजैसे मसाज ऊपर की ओर होती गई मैं बहुत रिलैक्स्ड फील कर रही थी. करीब 90 मिनट तक वह मेरी मसाज करती रही. महिला थेरैपिस्ट होने से मैं भी सहज थी और उसे भी मेरे अंगों को छूने में संकोच नहीं था. उस के हाथों खासकर उंगलियों के स्पर्श में एक जादू था और एक अजीब सा एहसास भी. पर धीरेधीरे उस के नो सैक्स कहने का अर्थ मुझे समझ में आने लगा था. मैं अराउज्ड यानी उत्तेजना फील करने लगी. मुझे लगा. मेरे अंदर कामवासना जाग्रत हो रही है.’’

तभी थेरैपिस्ट ने ‘‘मसाज हो गई,’’ कहा और बीच की अस्थायी पार्टीशन वाल हटा दी. अभी मैं ने पूरी ड्रैस भी नहीं पहनी थी कि देखा दूसरे चैंबर में सागर की भी मसाज पूरी हो चुकी थी. वह भी अभी पूरे कपड़े नहीं पहन पाया था. दूसरी थेरैपिस्ट गर्ल ने मुसकराते हुए कहा ‘‘देखने से आप दोनों का एक ही हाल लगता है, अब आप दोनों चाहें तो ऐंजौय कर सकते हैं.’’

मुझे सुन कर कुछ अजीब लगा, पर बुरा नहीं लगा. हम दोनों पार्लर से निकले. मुझे अभी तक बिना पीए मदहोशी लग रही थी. सागर मेरा हाथ पकड़ कर अपने रूम में ले गया. मैं भी मदहोश सी उस के साथ चल पड़ी. उस ने रूम में घुसते ही लाइट औफ कर दी.

सागर मुझ से सट कर खड़ा था. मेरी कमर में हाथ डाल कर अपनी ओर खींच रहा था और मैं उसे रोकना भी नहीं चाहती थी. वह अपनी उंगली से मेरे होंठों को सहला रहा था. मैं भी उस के सीने से लग गई थी. फिर उस ने मुझे किस किया तो ऐसा लगा सारे बदन में करंट दौड़ गया. उस ने मुझे बैड पर लिटा दिया और कहा, ‘‘जस्ट टू मिनट्स, मैं वाशरूम से अभी आया.’’

सागर ने अपनी पैंट खोल बैड के पास सोफे पर रख दी और टौवेल लपेट वह बाथरूम में गया. मैं ने देखा कि पैंट की बैक पौकेट से उस का पर्स निकल कर गिर पड़ा और खुल गया. मैं ने लाइट औन कर उस का पर्स उठाया. पर्स में एक औरत और एक बच्चे की तसवीर लगी थी.

मैं ने उस फोटो को नजदीक ला कर गौर से देखा. उसे पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मैं ने मन में सोचा यह तो मेरी नीरू दी हैं. कालेज के दिनों में मैं जब फ्रैशर थी सीनियर लड़के और लड़कियां दोनों मुझे रैगिंग कर परेशान कर रहे थे. मैं रोने लगी थी. तभी नीरू दी ने आ कर उन सभी को डांट लगाई थी और उन्हें सस्पैंड करा देने की वार्निंग दी थी. नीरू दी बीएससी फाइनल में थीं. इस के बाद मेरी पढ़ाई में भी उन्होंने मेरी मदद की थी. तभी से उन के प्रति मेरे दिल में श्रद्धा है. आज एक बार फिर नीरू दी स्वयं तो यहां न थीं, पर उन के फोटो ने मुझे गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया. मेरी मदहोशी अब फुर्र हो चली थी.

सागर बाथरूम से निकल कर बैड पर आया तो मैं उठ खड़ी हुई. उस ने मुझे बैड पर बैठने को कहा, ‘‘लाइट क्यों औन कर दी? अभी तो कुछ ऐंजौय किया ही नहीं.’’

‘‘ये आप की पत्नी और साथ में आप का बेटा है?’’

‘‘हां, तो क्या हुआ? वह दूसरे शहर में नौकरी कर रही है?’’

‘‘नहीं, वे मेरी नीरू दीदी भी हैं… मैं गलती करने से बच गई,’’ इतना बोल कर मैं उस के कमरे से निकल गई.

जहां एक ओर मुझे कुछ आत्मग्लानि हुई तो वहीं दूसरी ओर साफ बच निकलने का सुकून भी था. वरना तो मैं जिंदगीभर नीरू दी से आंख नहीं मिला पाती. हालांकि सागर ने कभी मेरे साथ कोई जबरदस्ती करने की कोशिश नहीं की.

इस के बाद 3 दिन और हौंगकौंग में हम दोनों साथ रहे… बिलकुल प्रोफैशनल की तरह

अपनेअपने काम से मतलब. चौथे दिन मैं और सागर इंडिया लौट आए. मैं ने नीरू दी का पता लगाया और उन्हें फोन किया. मैं बोली, ‘‘मैं प्रीति बोल रही हूं नीरू दी, आप ने मुझे पहचाना? कालेज में आप ने मुझे रैगिंग…’’

‘‘ओ प्रीति तुम? कहां हो आजकल और कैसी हो? कालेज के बाद तो हमारा संपर्क ही टूट गया था.’’

‘‘मैं यहीं सागर की जूनियर हूं. आप यहीं क्यों नहीं जौब कर रही हैं?’’

‘‘मैं भी इस के लिए कोशिश कर रही हूं. उम्मीद है जल्द ही वहां ट्रांसफर हो जाएगा.’’

‘‘हां दी, जल्दी आ जाइए, मेरा भी मन लग जाएगा,’’ और मैं ने फोन बंद कर दिया. हौंगकौंग के उस कमजोर पल की याद फिर आ गई, जिस से मैं बालबाल बच गई थी और वह भी सिर्फ एक तसवीर के चलते वरना अनजाने में ही पति-पत्नी के बीच मैं ‘वो’ बन गई होती. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: बचपना – सुधा की बेचैनी

Best Hindi Kahani: आज फिर वही चिट्ठी मनीआर्डर के साथ देखी, तो सुधा मन ही मन कसमसा कर रह गई. अपने पिया की चिट्ठी देख उसे जरा भी खुशी नहीं हुई. सुधा ने दुखी मन से फार्म पर दस्तखत कर के डाकिए से रुपए ले लिए और अपनी सास के पास चली आई और बोली ‘‘यह लीजिए अम्मां पैसा.’’ ‘‘मुझे क्या करना है. अंदर रख दे जा कर,’’ कहते हुए सासू मां दरवाजे की चौखट से टिक कर खड़ी हो गईं. देखते ही देखते उन के चेहरे की उदासी गहरी होती चली गई.

सुधा उन के दिल का हाल अच्छी तरह समझ रही थी. वह जानती थी कि उस से कहीं ज्यादा दुख अम्मां को है. उस का तो सिर्फ पति ही उस से दूर है, पर अम्मां का तो बेटा दूर होने के साथसाथ उन की प्यारी बहू का पति भी उस से दूर है. यह पहला मौका है, जब सुधा का पति सालभर से घर नहीं आया. इस से पहले 4 नहीं, तो 6 महीने में एक बार तो वह जरूर चला आता था.

इस बार आखिर क्या बात हो गई, जो उस ने इतने दिनों तक खबर नहीं ली? अम्मां के मन में तरहतरह के खयाल आ रहे थे. कभी वे सोचतीं कि किसी लड़की के चक्कर में तो नहीं फंस गया वह? पर उन्हें भरोसा नहीं होता था. हो न हो, पिछली बार की बहू की हरकत पर वह नाराज हो गया होगा. है भी तो नासमझ. अपने सिवा किसी और का लाड़ उस से देखा ही नहीं जाता.

नालायक यह नहीं समझाता, बहू भी तो उस के ही सहारे इस घर में आई है. उस बेचारी का कौन है यहां? सोचतेसोचते उन्हें वह सीन याद आ गया, जब बहू उन के प्यार पर अपना हक जता कर सूरज को चिढ़ा रही थी और वह मुंह फुलाए बैठा था. अगली बार डाकिए की आवाज सुन कर सुधा कमरे में से ही कहने लगी, ‘‘अम्मां, डाकिया आया है.

पैसे और फार्म ले कर अंदर आ जाइए, दस्तखत कर दूंगी.’’ सुधा की बात सुन कर अम्मां चौंक पड़ीं. पहली बार ऐसा हुआ था कि डाकिए की आवाज सुन कर सुधा दौड़ीदौड़ी दरवाजे तक नहीं गई… तो क्या इतनी दुखी हो गई उन की बहू? अम्मां डाकिए के पास गईं. इस बार उस ने चिट्ठी भी नहीं लिखी थी. पैसा बहू की तरफ बढ़ा कर अम्मां रोंआसी आवाज में कहने लगीं, ‘‘ले बहू, पैसा अंदर रख दे जा कर.’’ अम्मां की आवाज कानों में पड़ते ही सुधा बेचैन निगाहों से उन के हाथों को देखने लगी.

वह अम्मां से चिट्ठी मांगने को हुई कि अम्मां कहने लगीं, ‘‘क्या देख रही है? अब की बार चिट्ठी भी नहीं डाली है उस ने.’’ सुधा मन ही मन तिलमिला कर रह गई. अगले ही पल उस ने मर जाने के लिए हिम्मत जुटा ली, पर पिया से मिलने की एक ख्वाहिश ने आज फिर उस के अरमानों पर पानी फेर दिया. अगले महीने भी सिर्फ मनीआर्डर आया, तो सुधा की रहीसही उम्मीद भी टूट गई.

उसे अब न तो चिट्ठी आने का भरोसा रहा और न ही इंतजार. एक दिन अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. पहली बार तो सुधा को लगा, जैसे वह सपना देख रही हो, पर जब दोबारा किसी ने दरवाजा खटखटाया, तो वह दरवाजा खोलने चल दी. दरवाजा खुलते ही जो खुशी मिली, उस ने सुधा को दीवाना बना दिया. वह चुपचाप खड़ी हो कर अपने साजन को ऐसे ताकती रह गई, मानो सपना समझ कर हमेशा के लिए उसे अपनी निगाहों में कैद कर लेना चाहती हो.

सूरज घर के अंदर चला आया और सुधा आने वाले दिनों के लिए ढेर सारी खुशियां सहेजने को संभल भी न पाई थी कि अम्मां की चीखों ने उस के दिलोदिमाग में हलचल मचा दी. अम्मां गुस्सा होते हुए अपने बेटे पर चिल्लाए जा रही थीं, ‘‘क्यों आया है? तेरे बिना हम मर नहीं जाते.’’ ‘‘क्या बात है अम्मां?’’ सुधा को अपने पिया की आवाज सुनाई दी.

‘‘पैसा भेज कर एहसान कर रहा था हम पर? क्या हम पैसों के भूखे हैं?’’ अम्मां की आवाज में गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था. ‘‘क्या बात हो गई?’’ आखिर सूरज गंभीर हो कर पूछ ही बैठा. ‘‘बहू, तेरा पति पूछ रहा है कि बात क्या हो गई. 2 महीने से बराबर खाली पैसा भेजता रहता है, अपनी खैरखबर की छोटी सी एक चिट्ठी भी लिखना इस के लिए सिर का बोझ बन गया और पूछता है कि क्या बात हो गई?’’ सूरज बिगड़ कर कहने लगा, ‘‘नहीं भेजी चिट्ठी तो कौन सी आफत आ गई?

तुम्हारी लाड़ली तो तुम्हारे पास है, फिर मेरी फिक्र करने की क्या जरूरत पड़ी?’’ सुधा अपने पति के ये शब्द सुन कर चौंक गई. शब्द नए नहीं थे, नई थी उन के सहारे उस पर बरस पड़ी नफरत. वह नफरत, जिस के बारे में उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. सुधा अच्छी तरह समझ गई कि यह सब उन अठखेलियों का ही नतीजा है, जिन में वह इन्हें अम्मां के प्यार पर अपना ज्यादा हक जता कर चिढ़ाती रही है, अपने पिया को सताती रही है.

इस में कुसूर सिर्फ सुधा का ही नहीं है, अम्मां का भी तो है, जिन्होंने उसे इतना प्यार किया. जब वे जानती थीं अपने बेटे को, तो क्यों किया उस से इतना प्यार? क्यों उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वह इस घर की बेटी नहीं बहू है? अम्मां सुधा का पक्ष ले रही हैं, यह भी गनीमत ही है, वरना वे भी उस का साथ न दें, तो वह क्या कर लेगी.

इस समय तो अम्मां का साथ देना ही बहुत जरूरी है. अम्मां अभी भी अपने बेटे से लड़े जा रही थीं, ‘‘तेरा दिमाग बहुत ज्यादा खराब हो गया है.’’ अम्मां की बात का जवाब सूरज की जबान पर आया ही था कि सुधा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘यह सब अच्छा लगता है क्या आप को? अम्मां के मुंह लगे चले जा रहे हैं. बड़े अच्छे लग रहे हैं न?’’ ‘‘चुप, यह सब तेरा ही कियाधरा है. तुझे तो चैन मिल गया होगा, यह सब देख कर.

न जाने कितने कान भर दिए कि अम्मां आते ही मुझ पर बरस पड़ीं,’’ थोड़ी देर रुक कर सूरज ने खुद पर काबू करना चाहा, फिर कहने लगा, ‘‘यह किसी ने पूछा कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं भेजी? इस की फिक्र किसे है? अम्मां पर तो बस तेरा ही जादू चढ़ा है.’’ ‘‘हां, मेरा जादू चढ़ा तो है, पर मैं क्या करूं? मुझे मार डालो, तब ठीक रहेगा.

मुझ से तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा और मुझे तुम्हारे बिना जीने से.’’ अब जा कर अम्मां का माथा ठनका. आज उन के बच्चों की लड़ाई बच्चों का खेल नहीं थी. आज तो उन के बच्चों के बीच नफरत की बुनियाद पड़ती नजर आ रही थी. बहू का इस तरह बीच में बोल पड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. वे अपनी बहू की सोच पर चौंकी थीं.

वे तो सोच रही थीं कि उन के बेटे की सूरत देख कर बहू सारे गिलेशिकवे भूल गई होगी. अम्मां की आवाज से गुस्सा अचानक काफूर गया. वे सूरज को बच्चे की तरह समझने लगीं, ‘‘इस को पागल कुत्ते ने काटा है, जो तेरी खुशियां छीनेगी? तेरी हर खुशी पर तो तुझ से पहले खुश होने का हक इस का है. फिर क्यों करेगी वह ऐसा, बता? र

ही बात मेरी, तो बता कौन सा ऐसा दिन गुजरा, जब मैं ने तुझे लाड़ नहीं किया?’’ ‘‘आज ही देखो न, यह तो किसी ने पूछा नहीं कि हालचाल कैसा है? इतना कमजोर कैसे हो गया तू? तुम को इस की फिक्र ही कहां है. फिक्र तो इस बात की है कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं?डाली?’’ सूरज बोला.

अम्मां पर मानो आसमान फट पड़ा. आज उन की सारी ममता अपराधी बन कर उन के सामने खड़ी हो गई. आज यह हुआ क्या? उन की समझ में कुछ न आया. अम्मां चुपचाप सूरज का चेहरा निहारने लगीं, कुछ कह ही न सकीं, पर सुधा चुप न रही.

उस ने दौड़ कर अपने सूरज का हाथ पकड़ लिया और पूछने लगी, ‘‘बोलो न, क्या हुआ? तुम बताते क्यों नहीं हो?’’ ‘‘मैं 2 महीने से बीमार था. लोगों से कह कर जैसेतैसे मनीआर्डर तो करा दिया, पर चिट्ठी नहीं भेज सका. बस, यही एक गुनाह हो गया.’’ सुधा की आंखों से निकले आंसू होंठों तक आ गए और मन में पागलपन का फुतूर भर उठा, ‘‘देखो अम्मां, सुना कैसे रहे हैं? इन से तो अच्छा दुश्मन भी होगा, मैं बच्ची नहीं हूं, अच्छी तरह जानती हूं कि भेजना चाहते, तो एक नहीं 10 चिट्ठियां भेज सकते थे.

‘‘नहीं भेजते तो किसी से बीमारी की खबर ही करा देते, पर क्यों करते ऐसा? तुम कितना ही पीछा छुड़ाओ, मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली.’’ अम्मां चौंक कर अपनी बहू की बौखलाहट देखती रह गईं, फिर बोलीं, ‘‘क्या पागल हो गई है बहू?’’ ‘‘पागल ही हो जाऊं अम्मां, तब भी तो ठीक है,’’ कहते हुए बिलख कर रो पड़ी सुधा और फिर कहने लगी, ‘‘पागल हो कर तो इन्हें अपने प्यार का एहसास कराना आसान होगा.

किसी तरह से रो कर, गा कर और नाचनाच कर इन्हें अपने जाल में फंसा ही लूंगी. कम से कम मेरा समझदार होना तो आड़े नहीं आएगा,’’ कहतेकहते सुधा का गला भर आया. सूरज आज अपनी बीवी का नया रूप देख रहा था. अब गिलेशिकवे मिटाने की फुरसत किसे थी? सुधा पति के आने की खुशियां मनाने में जुट गई. अम्मां भी अपना सारा दर्द समेट कर फिर अपने बच्चों से प्यार करने के सपने संजोने लगी थीं. Best Hindi Kahani

खो गई जीनत : अम्मी और अब्बू में किसी हुई जीत

अम्मी और अब्बू की सिर्फ तसवीर ही देखी थी जीनत ने. उन का प्यार कैसा होता है, इस का उसे कोई अहसास ही नहीं था.

अम्मी और अब्बू के एक सड़क हादसे में मारे जाने के बाद मामी और मामू ही जीनत का सहारा थे.

मामू ने जीनत को पढ़ायालिखाया और इस लायक बनाया कि बड़ी हो कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और मामू का सहारा बने.

मामू की माली हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. एक कमरे के मकान के बाहर मामू ने एक छोटा सा खोखा रख रखा था. वे उस में बिसातखाने का सामान रख कर बेचते थे.

जो औरतें सामान खरीदने आ भी जातीं, वे मामू से इतना मोलभाव करतीं कि किसी चीज पर मिलने वाला मुनाफा कम हो जाता और वैसे भी मामू को बाहर की औरतों से बहुत लगाव महसूस होता था और वे चाहते थे कि औरतें उन के खोखे पर

आ कर मामू से बातें करती ही रहें. उन की इसी कमजोरी का फायदा चालाक औरतें खूब उठाती थीं. वे मामू से खूब रसीली बातें करतीं और सामान सस्ते में खरीद लेतीं.

घर में 5 लोग थे. मामू, मामी, उन के 2 बच्चे और एक जीनत. इन सब का खर्च चलाने की जिम्मेदारी जीनत के कंधों पर ही थी, इसीलिए वह शहर के ही एक स्कूल में कंप्यूटर पढ़ाने का काम करने लगी थी.

जीनत के मामू जितने लापरवाह किस्म के थे, मामी उतनी ही सख्त थीं.

‘‘मैं तो कहती हूं कि घर में अगर लड़की हो तो उस पर एक नजर टेढ़ी ही रखनी चाहिए और घर की अंदरूनी बातों में लड़की जात को ज्यादा शामिल नहीं करना चाहिए,’’ मामी ने पड़ोस में रहने वाली शकीला से कहा और शकीला ने भी हां में हां मिलाई.

‘‘हां… सही कहा आप ने और इसीलिए मैं ने अपनी बेटी सलमा का स्कूल जाना बंद करवा दिया है. अब 8वीं जमात तो पास हो ही गई है, आगे की पढ़ाई के लिए लड़कों वाले स्कूल में भेजना पड़ेगा और हम ने तो सुना है

कि वहां लड़का और लड़की एकसाथ बैठते हैं.’’

मामी की इसी सख्ती का नतीजा था कि जीनत ने अपनेआप को बहुत संभाल रखा था और हमेशा ही डरीसहमी सी रहती थी.

इस सहमेपन के साथ जीतेजीते जीनत 30 साल की हो गई थी और अभी तक कुंआरी थी. ऐसा नहीं था कि उस के लिए शादी के पैगाम नहीं आए, पर भला मामू उस की शादी करा देता तो घर के लिए पैसे कौन लाता.

मामूमामी की सोच यही थी कि जीनत इसी घर में ही रहे और पैसे लाती रहे.

मामू और मामी के दोनों बेटे भी अब जवान हो चले थे. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को भरपूर सम?ाते हुए कुछ पैसे जोड़े, कुछ पैसा बैंक से लोन लिया और अपने अब्बा की बिसातखाने की दुकान को अब एक बढि़या मेकअप  सैंटर में तबदील कर दिया था.

जीनत भी मेहनत से स्कूल में अपनी ड्यूटी पूरी करती और घर आ कर मामी के साथ रसोईघर में मदद करती.

जीनत ने अपनी जवान होती भावनाओं को अच्छी तरह से काबू कर रखा था, पर फिर भी जवानी में किसी की तरफ ?ाकाव होना बड़ा ही लाजिमी होता है और जीनत भी कोई अलग नहीं थी.

‘‘अरे जीनत मैडम… मैं ने एक शायरी लिखी है… जरा इस पर गौर तो फरमाइएगा,’’ जीनत के साथ ही स्कूल में पढ़ाने वाले एक साथी टीचर आफताब ने कहा.

‘‘अजी, आप की शायरी का क्या सुनना… वह तो हमेशा की तरह अच्छी ही होती हैं… हां, अगर आप फिर भी अपनी और तारीफ सुनना चाहते हैं तो सुना सकते हैं.’’

‘‘किसी आशिक के कलेजे को जलाया होगा, तब जा कर खुदा ने सूरज को बनाया होगा.’’

‘‘अरे वाह… क्या बात है… बहुत ही उम्दा… लगता है, सूरज से कुछ ज्यादा ही प्यार है आप को और तभी तो आप ने तखल्लुस भी सूरज ही रखा है.’’

‘‘जी, बिलकुल सही कहा आप ने, इसीलिए मेरा नाम तो आफताब भले ही है, पर मैं चाहता हूं कि अब लोग मुझे सूरज के नाम से ही पुकारें,’’ आफताब ने कहा.

‘‘हां जी… ऐसी बात है तो मैं

आप को सूरज के नाम से ही बुलाऊंगी,’’ जीनत ने कहा.

2 जवां दिलों के बीच प्यार को पनपने के लिए कुछ खास की जरूरत नहीं होती, बस थोड़ा सा अपनापन का पानी, खूबसूरती की खाद और प्यार के फल आने लगते हैं.

आफताब एक सीधासादा लड़का था, जो जिंदगी से जूझ रहा था, फिर भी हमेशा मुसकराता रहता और अपनी जिंदगी के गम को शायरी में कह कर उड़ा दिया करता था. पर माली हालत की बात करें तो आफताब जीनत से तो बेहतर ही था.

इस बार नए साल पर आफताब ने जीनत को एक मोबाइल फोन गिफ्ट कर दिया. जीनत ने बहुत नानुकर की, पर आफताब ने ऐसी दलील दी कि उसे चुप हो जाना पड़ा.

‘‘देखिए मैडम, यह मैं आप को इसलिए गिफ्ट कर रहा हूं, ताकि मैं आप को ह्वाट्सएप पर अपने शेर भेज सकूं और आप उस की अच्छाइयां और कमियां मुझे बताएं, जिस से मुझे और बेहतर शायर बनने में मदद मिल सकेगी. क्या अब भी आप यह मोबाइल नहीं लेंगी?’’

‘‘ठीक है, ठीक है… ले लेती हूं… पर जब मैं अपने घर पर रहूंगी, तब आप फोन नहीं करेंगे… हां, मैसेज में बात जरूर कर सकते हैं.’’

‘‘ठीक है जीनतजी.’’

जीनत और आफताब को एकदूसरे का साथ अच्छा लग रहा था और दोनों ही अपनी आगे की जिंदगी एकदूसरे के साथ गुजरने की बात सोच रहे थे, पर हमेशा ही इनसान का सोचा हुआ कहां होता है?

इतनी जिंदगी गुजरने के बाद एक बात तो जीनत मन ही मन जान चुकी थी कि मामू और मामी उस की शादी जानबूझ कर नहीं करना चाहते और वे लोग यही चाहते हैं कि जीनत उन के लिए बस ऐसे ही पैसे कमाती रहे और वे लोग आराम से मजे करते रहें, इसलिए जीनत इस बाबत मामी से खुद ही बात करने की सोचने लगी.

एक रात को आफताब ने कुछ शायरियां लिख कर जीनत के मोबाइल पर भेजीं और पूछा कि कोई सुधार की गुंजाइश हो तो बताए.

जीनत ने सारी शायरियां पढ़ीं और उन का जवाब भी आफताब को लिख दिया और सो गई. सुबह उठी तो स्कूल के लिए देर हो रही थी, इसलिए जल्दी में जीनत मोबाइल अपने बिस्तर पर ही भूल गई.

‘‘चलो फिर मैं आज तुम्हें घर तक छोड़ देता हूं,’’ अपनी बाइक की तरफ इशारा करता हुआ आफताब बोला.

जीनत पहले तो हिचकिचाई, क्योंकि गली के नुक्कड़ पर ही तो मामू की दुकान है. बहुत मुमकिन है कि घर के लोग आफताब के साथ उसे देख लें.

‘देख लें तो देख लें, मैं कोई चोरी तो नहीं कर रही. और फिर आज तो मुझे वैसे भी आफताब के बारे में बात करनी ही है,’ ऐसा सोच कर जीनत ने बाइक पर जाने के लिए हां कर दी और आफताब के साथ बैठ कर चल दी.

जीनत कुछ देर बाद घर के सामने पहुंचने वाली थी. उस ने आफताब को उसे वहीं उतार देने को कहा और वह घर तक पैदल ही चली गई.

घर में अंदर का नजारा ही अलग था. मामू, उन का बेटा असलम और मामी एकसाथ बैठे हुए थे. वे जीनत को घूर रहे थे.

‘‘अरे जीनत बेटी… बहुत थक गई होगी,’’ मामू ने कहा.

‘‘हां… मामू… स्कूल में काम ही इतना होता है, थोड़ीबहुत थकान आना तो लाजिमी ही है,’’ जीनत ने कहा.

जीनत का इतना कहना ही था कि मामी बिफर उठीं, ‘‘हां… हां थकान तो आएगी ही, जब देर रात तक किसी दूसरे लड़के से चक्कर चलाया जाएगा.’’

जीनत को तुरंत ही याद आया कि आज वह अपना मोबाइल घर में ही भूल गई थी और इसीलिए मामी ऐसा बोल रही हैं.

‘‘वह मामी, मैं आप से बात करने ही वाली थी… आज,’’ जीनत हकला गई.

‘‘अरे, तू क्या बात करेगी… तू तो चक्कर चला रही है. और वह भी किसी गैरधर्म के लड़के के साथ…’’

‘‘अरे नहीं मामी… वह तो आफताब…’’

‘‘बता कौन है यह सूरज… जो तुझे से अपनी मुहब्बत का इजहार शेरोशायरी से कर रहा है? और जिस का जवाब भी तू खूब वाहवाह कर के दे रही है…

‘‘अरे, मैं कह रही हूं कि हमारी जात में कोई लड़के नहीं रह गए थे, क्या जो तू किसी हिंदू लड़के से…’’

‘‘नहीं मामी… वह सूरज नहीं, आफताब है और हमारे ही धर्म का है… मैं खुद ही आज आप से अपनी शादी के बारे में बात करने वाली थी,’’ जीनत बोलती चली गई.

‘‘अरे, तू दोचार शब्द पढ़ क्या गई है, मुझे ही शब्दों के मतलब समझाने लगी है… और तू समझ क्या रही है, तू किसी भी जात वाले से शादी करने को कहेगी और हम कर देंगे. तुझे ऐसे ही हमारे लिए पैसे कमाने होंगे. भूल जा कि तेरी कभी शादी भी होगी,’’ मामी का पारा चढ़ चुका था.

‘‘शादी तो मैं सूरज से ही करूंगी… और आप सब को बताना चाहूंगी कि मैं सूरज के बच्चे की मां बनने वाली हूं…’’ जीनत ने यह बात सिर्फ इसलिए कह दी थी कि ऐसा सुन कर मामू और मामी का पारा कम हो जाएगा, पर इस बात ने आग में घी डालने का काम किया था.

‘‘आप लोग नहीं मानोगे, तो जबरदस्ती ही सही… देखती हूं कि मुझे कौन रोकता है,’’ जीनत भी अड़ गई थी.

‘‘मैं रोकूंगी तु?ो… नमकहराम… हमारी नाक कटवाती है… महल्ले में हमारा जीना मुश्किल करना चाहती है,’’ मामी चिल्ला रही थीं.

जीनत ने सोचा कि जब बात इतनी बढ़ ही चुकी है, तो आफताब को भी फोन कर के यहीं बुला लेती हूं और इस गरज से उस ने मामी के हाथ से अपना मोबाइल छीन कर आफताब को फोन कर दिया.

‘‘हां… तुम मेरे घर आ जाओ… सब लोग घर पर ही हैं… आमनेसामने बैठ कर बात हो जाएगी.’’

आफताब अभी ज्यादा दूर नहीं गया था, वह तुरंत ही लौट पड़ा.

मामू ने जीनत के विद्रोही सुर देखे तो मामी को शांत कराने लगे.

‘‘ठीक है जीनत… तुम्हारे फैसले को हमारी भी हां है… जैसा तुम चाहो वैसा करो,’’ मामू ने कहा.

पर असलम को काटो तो खून नहीं, उसे यह बात कतई मंजूर नहीं हो पा रही थी कि किसी लड़के को घर बुला कर जीनत खुद ही अपनी शादी की बात करे.

कुछ देर बाद ही आफताब वहां आ गया. अभी उस ने दरवाजे के अंदर पहला कदम रखा ही था कि असलम उसे देख कर भड़क गया.

असलम ने तुरंत ही आफताब का कौलर पकड़ लिए और उस को जमीन पर गिरा कर लातघूंसे चलाने लगा.

आफताब को अचानक इस हमले की उम्म्मीद नहीं थी, इसलिए वह असलम का विरोध नहीं कर सका. अब तो मौका देख कर जीनत के मामू ने भी आफताब को मारना शुरू कर दिया. वे दोनों आफताब को मारते हुए बाहर ले आए, जीनत आफताब को बचाने दौड़ी, तो मामी ने उसे पकड़ लिया.

बाहर महल्ले के लोग जमा होने लगे थे.

‘‘दिनदहाड़े चोरी करने घुसता है. आज तुझे नहीं छोड़ेंगे,’’ असलम चीख रहा था.

एक चोर को पिटता देख कर जमा हुई भीड़ की हथेलियों में भी खुजली होने लगी थी. बिना जाने कि सच क्या है, भीड़ ने भी बेतहाशा आफताब को मारना शुरू कर दिया.

जीनत ने बड़ी कोशिशों से अपनेआप को मामी की गिरफ्त से आजाद किया और आफताब को बचाने दौड़ी.

भीड़ अब भी आफताब को मारे जा रही थी… जीनत आफताब तक पहुंच ही नहीं पा रही थी… वह लगातार चीख रही थी, ‘‘मत मारो इसे… यह चोर नहीं है…’’ पर भीड़ तो खुद ही वकील होती है और खुद ही जज…

इतने में जीनत पिटते हुए आफताब को बचाने की गरज से उस से जा चिपकी, पर गुस्साई भीड़ को वह दिखाई तक न दी और भीड़ लाठीडंडे बरसाती रही. कुछ ही देर बाद जीनत और आफताब के सिर से खून की धारा निकल पड़ी थी और उन दोनों की लाशें एकदूसरे से लिपटी हुई पड़ी थीं. भीड़ ने अपनी ताकत दिखाते हुए इंसाफ कर दिया था.

अब मैं नहीं आऊंगी पापा : पापा की सताई एक बेटी

मैं अपने जीवन में जुड़े नए अध्याय की समीक्षा कर रही थी, जिसे प्रत्यक्ष रूप देने के लिए मैं दिल्ली से मुंबई की यात्रा कर रही थी और इस नए अध्याय के बारे में सोच कर अत्यधिक रोमांचित हो रही थी. दूसरी ओर जीवन की दुखद यादें मेरे दिमाग में तांडव करने लगी थीं.

उफ, मुझे अपने पिता का अहंकारी रौद्र रूप याद आने लगा, स्त्री के किसी भी रूप के लिए उन के मन में सम्मान नहीं था. मुझे पढ़ायालिखाया, लेकिन अपने दिमाग का इस्तेमाल कभी नहीं करने दिया. पढ़ाई के अलावा किसी भी ऐक्टिविटी में मुझे हिस्सा लेने की सख्त मनाही थी. घड़ी की सुई की तरह कालेज से घर और घर से कालेज जाने की ही इजाजत थी.

नीरस जीवन के चलते मेरा मन कई बार कहता कि क्या पैदा करने से बच्चे अपने मातापिता की संपत्ति बन जाते हैं कि जैसे चाहा वैसा उन के साथ व्यवहार करने का उन्हें अधिकार मिल जाता है? लेकिन उन के सामने बोलने की कभी हिम्मत नहीं हुई.

मां भी पति की परंपरा का पालन करते हुए सहमत न होते हुए भी उन की हां में हां मिलाती थीं. ग्रेजुएशन करते ही उन्होंने मेरे विवाह के लिए लड़का ढूंढ़ना शुरू कर दिया था. लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद ही मेरा विवाह विवेक से हो पाया. मेरी इच्छा या अनिच्छा का तो सवाल ही नहीं उठता था. गाय की तरह एक खूंटे से खोल कर मुझे दूसरे खूंटे से बांध दिया गया.

मेरे सासससुर आधुनिक विचारधारा के तथा समझदार थे. विवेक उन का इकलौता बेटा था. वह अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी तो था ही, पढ़ालिखा, कमाता भी अच्छा था और मिलनसार स्वभाव

का था. इकलौती बहू होने के चलते सासससुर ने मुझे भरपूर प्यार दिया. बहुत जल्दी मैं सब से घुलमिल गई. मेरे मायके में पापा की तानाशाही के कारण दमघोंटू माहौल के उलट यहां हरेक के हक का आदर किया जाता था, जिस से पहली बार मुझे पहचान मिली, तो मुझे अपनेआप पर गर्व होने लगा था.

विवाह के बाद कई बार पापा का, पगफेरे की रस्म के लिए, मेरे ससुर के पास मुझे बुलाने के लिए फोन आया. लेकिन मेरे अंदर मायके जाने की कोई उत्सुकता न देख कर उन्होंने कोई न कोई बहाना बना कर उन को टाल दिया. उन के इस तरह के व्यवहार से पापा के अहं को बहुत ठेस पहुंची. सहसा एक दिन वे खुद ही मुझे लेने पहुंच गए और मेरे ससुर से नाराजगी जताते हुए बोले, ‘मैं ने बेटी का विवाह किया है, उस को बेचा नहीं है, क्या मुझे अपनी बेटी को बुलाने का हक नहीं है?’

‘अरे, नहीं समधी साहब, अभी शादी हुई है, दोनों बच्चे आपस में एकदूसरे को समझ लें, यह भी तो जरूरी है. अब हमारा जमाना तो है नहीं…’

‘परंपराओं के मामले में मैं अभी भी पुराने खयालों का हूं,’ पापा ने उन की बात बीच में ही काट कर बोला तो सभी के चेहरे उतर गए.

मुझे पापा के कारण की तह तक गए बिना इस तरह बोलना बिलकुल अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं मूकदर्शक बनी रहने के लिए मजबूर थी. उन के साथ मायके आने के बाद भी उन से मैं कुछ नहीं कह पाई, लेकिन जितने दिन मैं वहां रही, उन के साथ नाराजगी के कारण मेरा उन से अनबोला ही रहा.

परंपरानुसार विवेक मुझे दिल्ली लेने आए, तो पापा ने उन से उन की कमाई और उन के परिवार के बारे में कई सवालजवाब किए. विवेक को अपने परिवार के मामले में पापा का दखल देना बिलकुल नहीं सुहाया. इस से उन के अहं को बहुत चोट पहुंची. पापा से तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मुझे सबकुछ बता दिया. मुझे पापा पर बहुत गुस्सा आया कि वे बात करते समय यह भी नहीं सोचते कि कब, किस से, क्या कहना है.

मैं ने जब पापा से इस बारे में चर्चा की तो वे मुझ पर ही बरस पड़े कि ऐसा उन्होंने कुछ नहीं कहा, जिस से विवेक को बुरा लगे. बात बहुत छोटी सी थी, लेकिन इस घटना के बाद दोनों परिवारों के अहं टकराने लगे. उस के बाद, पापा एक बार मुझे मेरी ससुराल से लेने आए, तो विवेक ने उन से बात नहीं की. पापा को बहुत अपमान महसूस हुआ. जब ससुराल लौटने का वक्त आया तो विवेक ने फोन पर मुझ से कहा कि या तो मैं अकेली आ जाऊं वरना पापा ही छोड़ने आएं.

पापा ने साफ मना कर दिया कि वे छोड़ने नहीं जाएंगे. मैं ने हालत की नजाकत को देखते हुए, बात को तूल न देने के लिए पापा से बहुत कहा कि समय बहुत बदल गया है, मैं पढ़ीलिखी हूं, मुझे छोड़ने या लेने आने की किसी को जरूरत ही क्या है? मुझे अकेले जाने दें. मां ने भी उन्हें समझाया कि उन का इस तरह अपनी बात पर अड़ना रिश्ते के लिए नुकसानदेह होगा. लेकिन वे टस से मस नहीं हुए. मेरे ज्यादा जिद करने पर वे अपनी इज्जत की दुहाई देते हुए बोले, ‘तुम्हें मेरे मानसम्मान की बिलकुल चिंता नहीं है.’

मैं अपने पति को भी जानती थी कि जो वे सोच लेते हैं, कर के छोड़ते हैं. न विवेक लेने आए, न मैं गई. कई बार फोन से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बात नहीं की.

पापा के अहंकार के कारण मेरा जीवन त्रिशंकु बन कर रह गया. इन हालात को न सह सकने के कारण मां अवसाद में चली गईं और अचानक एक दिन उन की हृदयाघात से मृत्यु हो गई. इस दुखद घटना के बारे में भी पापा ने मेरी ससुराल वालों को सूचित नहीं किया तो मेरा मन उन के लिए वितृष्णा से भर उठा. इन सारी परिस्थितियों के जिम्मेदार मेरे पापा ही तो थे.

मां की मृत्यु की खबर सुन कर आए हुए सभी मेहमानों के वापस जाते ही मैं ने गुस्से के साथ पापा से कहा, ‘क्यों हो गई तसल्ली, अभी मन नहीं भरा हो तो मेरा भी गला घोंट दीजिए. आप तो बहुत आदर्श की बातें करते हैं न, तो आप को पता होना चाहिए कि हमारी परंपरानुसार दामाद को और उस के परिजनों को बहुत आदर दिया जाता है और बेटी का कन्यादान करने के बाद उस के मातापिता से ज्यादा उस के पति और ससुराल वालों का हक रहता है. जिस घर में बेटी की डोली जाती है, उसी घर से अर्थी भी उठती है. आप ने अपने ईगो के कारण बेटी का ससुराल से रिश्ता तुड़वा कर कौन सा आदर्श निभाया है. मेरी सोच से तो परे की बात है, लेकिन मैं अब इन बंधनों से मुक्त हो कर दिखाऊंगी. मेरा विवाह हो चुका है, इसलिए मेरी ससुराल ही अब मेरा घर है. मैं जा रही हूं अपने पति के पास. अब आप रहिए अपने अहंकार के साथ इस घर में अकेले. अब मैं यहां कभी नहीं आऊंगी, पापा.’

इतना कह कर, पापा की प्रतिक्रिया देखे बिना ही, मैं घर से निकल आई और मेरे कदम बढ़ चले उस ओर जहां मेरा ठौर था और वही थी मेरी आखिरी मंजिल.

8वीं पास : कैसे थे आदित्य के पापा

‘‘देखिए सेठजी, मेरा बेटा आप का बहुत लिहाज करता है. वह आप पर मुझ से ज्यादा भरोसा करता है. हमेशा आप के कहे मुताबिक चलता रहा है. लेकिन वह अपना पैर तुड़वा बैठा है.

‘‘मैं मानता हूं कि उस से गलती हुई है. बच्चों से गलती हो जाती है. मगर उस के इलाज में काफी पैसे लग रहे हैं. बमुश्किल उसे आईसीयू में होश आया है. और अब वह जनरल वार्ड में पहुंच गया है,’’ रामनरेश हाथ जोड़े सेठ सुखसागर से कह रहे थे.

‘‘आप के कहे मुताबिक मैं ने उसे सरकारी अस्पताल के बजाय प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया. वहां की भारीभरकम फीस का खर्च उठाना मेरे बस की बात तो थी नहीं. वह सब खर्च आप ने उठाया. इस के लिए मैं आप का बहुत आभारी हूं. मगर अभी उस के पैर का आपरेशन होना है, जिस के लिए वे ढाई लाख रुपए मांग रहे हैं. अब आप ही का आसरा है,’’ उन्होंने आगे कहा.

‘‘मैं तो तुम्हारे बेटे के चक्कर में गजब की मुसीबत में फंस गया. ठीक है कि मैं ने उसे प्राइवेट अस्पताल में भरती कराने के लिए कहा था, मगर मुझे क्या पता था कि इस में मेरे लाखों रुपए खर्च हो जाएंगे.

‘‘खर्च की तो मैं परवाह नहीं करता. मगर डाक्टर कह रहा था कि उस का पैर ठीक होना मुश्किल है. उसे काटना ही होगा. और बताइए इस अपाहिज को ले कर मैं क्या करूंगा?’’ सेठ सुखसागर बोले.

‘‘मेरा बेटा अपाहिज नहीं है सेठजी,’’ रामनरेश चिल्लाए, ‘‘मैं मानता हूं कि उस से गलती हुई है और उसे इस की सजा भी मिल गई है. मगर इस का मतलब यह तो नहीं कि मैं उस के इलाज से

मुंह मोड़ लूं. मेरे बेटे का पैर अच्छा हो जाए, इस के लिए मैं अपना घरबार तक बेच दूंगा.’’

‘‘अब आप को जो भी करना हो कीजिए. अब मैं कुछ नहीं कर सकता.’’

‘‘वह तो मैं करूंगा ही. अगर आप उसे इस महंगे अस्पताल में भरती नहीं कराते, तो मैं उस का सस्ते सरकारी अस्पताल में ही इलाज कराता. अब भी देर नहीं हुई है. मैं उसे वहीं ले जाऊंगा.’’

अब आदित्य सरकारी अस्पताल में था. यहां उस के पापा रामनरेश के परिचित और बुजुर्ग डाक्टर कमल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि सबकुछ ठीक से हो जाएगा.

इस बात को तो सभी जानते हैं कि प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने में कितना बड़ा खर्च आता है. मगर अब वहां के खर्चों को कौन उठाएगा, क्योंकि सेठ सुखसागर ने आगे और खर्च देने से इनकार कर दिया था, इसलिए वहां रहने का कोई मतलब नहीं था.

आदित्य तो यह जान कर हैरान रह गया कि सेठ सुखसागर ने उस के इलाज से अपना मुंह मोड़ लिया है.

‘‘देख ली न अपने चार्टर्ड अकांउंटैंट सेठजी की करामात. जब तक उन के लिए तुम जान देते रहे, तुम बहुत अच्छे थे. डाक्टर अब तुम्हारा पैर काटने को कह रहा है. अब उन्हें लग रहा है कि इस अपंगअपाहिज पर खर्च करने से क्या फायदा? अपंगअपाहिज उन के पीछे भागेगा कैसे. सो, इलाज से पीछे हट रहे हैं,’’ रामनरेश गुस्से में आ चुके थे.

‘‘मगर, मैं ऐसा कुछ होने नहीं दूंगा. अभी तो तुम्हें सरकारी अस्पताल में लिए चलता हूं. वहां मेरे एक परिचित डाक्टर कमल हैं. मु?ो पूरा भरोसा है कि वे तुम्हारा इलाज अच्छे से करेंगे. और जहां तक खर्चे की बात है, मैं अपना घर बेच दूंगा, मगर तुम्हें अपाहिज होने नहीं दूंगा. सेठ अपनेआप को सम?ाता क्या है,’’ उन्होंने आगे कहा.

सारे कागजात और एक्सरे रिपोर्ट देखने के बाद डाक्टर कमल बोले, ‘‘एक्सीडैंट हुआ है और चोट तो लगी ही है. थोड़ा समय लगेगा. मगर सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘मगर, वहां तो डाक्टर पैर काटने की बात बता रहे थे.’’

‘‘वहां इलाज करने का अपना ढंग है और मेरा इलाज करने का ढंग अलग है. मैं कोशिश करूंगा कि ऐसी नौबत ही न आए.’’

‘‘मैं कम पढ़ालिखा सही, मगर मेरा सहारा यही है डाक्टर साहब,’’ रामनरेश गिड़गिड़ाते हुए बोल रहे थे, ‘‘मैं अपनी सारी जमापूंजी खर्च कर दूंगा. घरमकान भी बेच दूंगा. भले ही बाद में मुझे मजदूरी क्यों न करनी पड़े. मगर, मैं यही चाहता हूं कि आदित्य अपाहिज न बने.’’

‘‘आप बिलकुल बेफिक्र रहें. वह ठीक हो जाएगा. मैं ने उस की सारी रिपोर्ट देखसमझ ली है. उस के पैर काटने की नौबत नहीं आएगी. वह पहले की तरह चलने और फुटबाल के पीछे भागने भी लगेगा. और आप तो यही चाहते हैं न? हां, उसे कुछ समय तक आराम करना होगा.’’

‘‘क्या आदित्य सचमुच ठीक हो जाएगा?’’ रामनरेश हैरानी से उन का मुंह देखते हुए बोले, ‘‘मैं आप का पूरे जन्म तक आभारी रहूंगा साहब.’’

आदित्य सारी बात को देख समझ रहा था, ‘तो क्या वह ठीक हो जाएगा. आइंदा ऐसी गलती मुझे से नहीं होगी,’ उस ने मन ही मन कहा.

फिर आदित्य सेठ सुखसागर के बारे में सोचने लगा कि उन के पीछे वह क्यों भागता रह गया, सिर्फ इसलिए कि वे पैसे वाले थे और पढ़ेलिखे भी थे. हमेशा वे उसे ले कर अपनी योजनाएं बनाते थे, जिस में वे उसे मोहरे की तरह इस्तेमाल करते आए थे. उस ने अपने प्लास्टर चढ़े पैर को देखा, तो उस के मुंह से आह सी निकल गई.

ओह, इस पैर को तो डाक्टर काटने को कह रहा था. इसे काटने के बाद तो वह हमेशा के लिए अपाहिज हो जाएगा. नहींनहीं, ऐसा कुछ होगा, तो वह कहीं का नहीं रहेगा. बिना पैर के वह दुनिया की इस दौड़ में कैसे आगे बढ़ेगा? और उस के सामने जैसे अपनी पुरानी यादें ताजा होने लगी थीं. पिछले कुछ समय पहले की ही तो बात थी.

‘‘वाह, आदित्य तुम ने तो कमाल कर दिया,’’ आदित्य की गर्लफ्रैंड सुरेखा

उसे देख कर मुसकराई थी, ‘‘दहीहांड़ी प्रतियोगिता में तो तुम ने कमाल कर दिया. 5 लाख रुपए का अवार्ड पाने के लिए बधाई. वैसे, इतने रुपए पा कर तुम क्या करोगे?’’

‘‘शुक्रिया सुरेखा. वैसे, मैं ने इसे अकेले नहीं जीता है, बल्कि मेरी टीम ने जीता है. ये रुपए तो सभी के बीच ही बंटेंगे.’’

आदित्य उसे देख कर मुसकराया था, ‘‘वैसे, तुम्हें भी इस में से कुछ हिस्सा दे दूंगा, क्योंकि तुम को देख कर ही मैं ने यह हिम्मत जुटाई थी. लेकिन जरा ठहरो, पहले मैं सेठ सुखसागर को तो शुक्रिया कह दूं.’’

एंकर बारबार माइक से अनाउंस कर रहा था कि विजेता टीम के सभी सदस्य मंच की ओर इकट्ठा हों. मगर जीत के जोश में वहां सभी जोश में थे और खुश थे. सो, उस की सुनता कौन. आदित्य को उस की टीम अपने कंधे पर उठा

कर विशाल गांधी मैदान का चक्कर काटने लगे थे. जीत का सुरूर कुछ ऐसा ही होता है.

आदित्य मन ही मन खुश हो रहा था. उसे जैसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि उस ने वह कारनामा कर दिखाया है, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी.

सेठ सुखसागर एंकर को समझ रहे थे, ‘‘अभी जीत का नशा है. जरा मैदान का चक्कर लगा लेने दो. हम भागे थोड़े ही जा रहे हैं. अपना ही लड़का और उस की टीम है. हमारे काम आता रहता है.’’

आखिरकार आदित्य अपनी टीम के साथ वापस मंच की ओर लौटा. उस ने और उस की टीम के सभी लड़कों ने नीली हाफ पैंट और सफेद टीशर्ट पहन रखी थी. दूर से ही देखने से लगता था कि ये सभी एक टीम के सदस्य हैं.

सुरेखा ने अब आदित्य को ध्यान से देखा. मिट्टीकीचड़ से सने आदित्य का चेहरा चमक से भरा जा रहा था. उस के गठीले बदन की मांसपेशियां जैसे धूप में सोने सी चमक रही थीं. बांहों में खिल रही मछलियां मचल रही थीं और उस का चौड़ा सीना टीशर्ट में से जैसे निकलना ही चाह रहा था और यह आदित्य उस का है, यह विचार मन में आते ही उस में गुदगुदी सी फैल गई.

अचानक ही अपनी टीम से घिरे आदित्य के जीत की ट्रौफी लेते ही पूरा गांधी मैदान जयकारों से गूंज उठा.

सेठ सुखसागर के होंठों पर गहरी मुसकान खेल गई. पिछले साल वे मुंबई गए थे, तो वहीं उन्होंने दहीहांड़ी प्रतियोगिता देखी थी. तभी उन के मन में विचार आया था कि वह पटना में भी इस का आयोजन करें, तो कैसा रहे. और फिर उन्होंने इसे पूरा भी कर दिया था.

सेठजी का धंधा कई तरह का था. इस के अलावा वे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजन करते रहते थे. इस में उन्हें काफी सुख और संतोष भी मिलता था. पहली बार उन्हें ऐसा लगा कि नौजवानों के लिए ऐसा आयोजन कर के उन्होंने एक अच्छा काम किया है.

आदित्य उन के महल्ले का ही लड़का था और स्थानीय कौमर्स कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था.

पिछले साल की बात थी, जब एक दिन कुछ बदमाश सेठ सुखसागर के बंगले में उन के चैंबर में घुस गए थे. उसी समय वह उधर से ही गुजर रहा था, तो उसे शोरगुल सुनाई दिया. वह चैंबर में घुसा और थोड़ी ही देर में उन बदमाशों को खदेड़ दिया.

बाद में उस से एक स्टाफ ने दबी जबान से कहा भी कि उसे इस तरह बदमाशों से भिड़ना नहीं चाहिए था. आजकल तमंचेबंदूक मिलते हैं. अगर किसी ने गोली चला दी होती तो क्या होता. सेठ का क्या है. उस के पास तो अपने बौडीगार्ड और सिक्योरिटी हैं. सो, उसे रिस्क नहीं लेना था.

आदित्य हंस कर रह गया था. लेकिन सेठ सुखसागर उस से बहुत प्रभावित हुए थे. उसे अपने चैंबर में बैठा कर बढि़या चायनाश्ता कराने के बाद 2,000 रुपए दिए और शाबाशी दी थी. और इसी के साथ वह उन का शागिर्द सा बन गया था. वह उधर कभी भी आएजाए, उसे कोई रोकताटोकता नहीं था और सेठ उसे

500-1,000 रुपए यों पकड़ा दिया करते थे, जिस से उस का अपना शाहखर्ची चलता था.

आदित्य का खुद पर तो कुछ खास खर्च था भी नहीं. बस सुरेखा के लिए उसे कभीकभार गिफ्ट खरीदने होते या रैस्टोरैंट जाना होता, तो उसी का खर्च था.

आदित्य के पापा की फ्रैजर रोड में एक छोटी सी पान की दुकान थी. उन्होंने भी उस से यही कहा कि उसे बदमाशों से उलझाने की क्या जरूरत थी. सेठ का क्या है, लाखोंकरोड़ों में खेलता है. गुंडेबदमाश से उस का रोज का पाला पड़ता होगा. अगर उसे कुछ हो जाता, तो वे क्या कर लेते?

सेठ सुखसागर ने इस होनहार हीरे को पहचान लिया था. वे उसे गाहेबगाहे बुला भी लिया करते थे. वे थोड़ीबहुत मदद तो करते ही थे उस की, जिस से उस का जेबखर्च निकल आता था.

मगर उस के पापा कहते, ‘‘मैं इतनी मेहनत तुम्हारी खातिर करता हूं. तुम पढ़ाईलिखाई पर ध्यान दो. आगे यही काम देगा. ये पैसे वाले हम गरीबों का सिर्फ इस्तेमाल करते हैं.

‘‘ऐसी चर्चा है कि उन की नजर आने वाले विधानसभा चुनावों पर है, जिस के लिए वे उम्मीदवार होना चाहते हैं और इन चुनावों में तुम जैसों का वे लोग इस्तेमाल करेंगे,’’ वे इस के आगे डाक्टर भीमराव अंबेडकर के इस वाक्य को जोड़ देते, ‘‘पढ़ाईलिखाई शेरनी का वह दूध है, जिसे जो पीएगा, वह दहाड़ेगा.’’

यह सुन कर आदित्य हंस पड़ता था. पढ़ाई ही तो कर रहा हूं. मगर अभी सिपाहीचपरासी से ले कर लोक सेवा आयोग तक के इम्तिहान का जो हाल है, उसे वे भी तो पढ़तेसुनते होंगे. मगर 8वीं पास पापा को इस से क्या मतलब. उन्हें तो बस यही लगता है कि उस की पढ़ाई खत्म हुई नहीं कि वह गजटेड अफसर बन जाएगा.

रामनरेश ?ाल्ला कर कहते, ‘‘अभी कुछ ही दिनों बाद तुम्हारी ग्रेजुएशन के ऐग्जाम होने वाले हैं और तुम फालतू चक्कर में फंस कर अपना समय खराब कर रहे हो? कहीं ऐग्जाम खराब होंगे, तो तुम्हारी सारी मटरगश्ती हवा हो जाएगी, इसलिए अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. तुम्हें ढंग की कोई नौकरी मिले, तो हमें भी चैन पड़े.

‘‘मैं ने तुम्हारे लिए कोई बहुत बड़ी इच्छा नहीं पाल रखी है. तुम साधारण ढंग से पढ़ोलिखो. कहीं टीचरक्लर्क भी लगे, तो मेरे लिए यही बहुत है. मैं तुम्हें कोई रिस्क लेते नहीं देखना चाहता. तुम ये सेठ के महल के चक्कर लगाने छोड़ो और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.’’

मगर जब से आदित्य की सुरेखा से जानपहचान हुई थी, उस के खर्चे बढ़ गए थे. आखिर गर्लफ्रैंड है उस की. उसे कुछ उपहार वगैरह तो देना बनता ही है. फिर अपने लिए कुछ बढि़या ड्रैस भी तो हो. लोगों पर, खासकर साथियों के बीच इसी ड्रैसिंग सैंस के वजह से ही तो रोबदाब बना रहता है.  वैसे, अपना कोई टूह्वीलर हो, तो क्या कहने.

मगर आदित्य के पास लेदे कर एक पुरानी, टूटी सी साइकिल थी, जिसे देख कर वह झल्ला उठता था. इस फास्ट लाइफ में आजकल साइकिल पर कौन चलता है. पापा तो टूह्वीलर खरीदने से रहे. उन्हें तो कहीं आनाजाना तो होता नहीं. कोई शौकमौज भी नहीं है उन की. आराम से घर से दुकान तक पैदल ही आतेजाते हैं. बहुत हुआ तो शेयरिंग आटोरिकशा से आए या गए. सारी जिंदगी बस खोखे में बिठा कर बिता दी. यह भी कोई जिंदगी है.

सेठ सुखसागर के यहां काम करने वालों के काम की सहूलियत और आनेजाने के लिए उन के मकान में कुछ स्कूटी और बाइकें थीं, जिन का इस्तेमाल उन का स्टाफ करता था. कभीकभार वह उन से मांग भी लेता था. उस में यह सहूलियत भी थी कि उसे उस में पैट्रोल भरवाने की चिंता नहीं रहती थी.

उधर सेठजी को भी लगता कि ऐसे फ्री के सिक्योरिटी गार्ड कहां मिलते हैं. थोड़े से ही काम चल जाता है, नहीं तो बाउंसर, शूटर कितनी डिमांड रखते हैं आजकल. दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा के समय भी वे उस के ग्रुप को मनचाही रकम दान में देते थे और इन सब से उन लोगों के नएनए शूज और ड्रैस के खर्चे निकल आते थे.

सचमुच सेठजी दयालु थे, मगर इस के साथ ही वे प्रैक्टिकल भी थे. वे जानते थे कि दान का लाभ परलोक में मिले या न मिले, इहलोक में तो निकल ही जाता है. इस तरह उन्होंने अपने इर्दगिर्द एक सुरक्षा घेरा बना लिया था.

सेठजी और शायद वह भी यही सोचता है कि दुनिया ऐसे ही चलती है. इस बार सेठजी ने जो दहीहांड़ी की प्लानिंग की थी, उस के केंद्र में वही था. अब नौजवान लड़का है, तो उस की टीम भी होगी ही.

आदित्य अपने कालेज में फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था और उस की अपनी टीम भी थी. उन्होंने अपनी योजना उसे समझाई, तो वह खुशी से उछल पड़ा. इस में करना कुछ खास नहीं और 5 लाख रुपए का इनाम है.

ऊपर से सेठजी यह भी कह रहे हैं कि उस की टीम के सभी सदस्यों के लिए नई ड्रैस का भी वे इंतजाम करेंगे. तो उसे और क्या चाहिए. यह भी तो एक तरह का खेल है, जिस में उसे भाग लेना चाहिए.

आदित्य की मम्मी को भी कुछ दिन अजीब लगा कि यह लड़का रोजरोज अपने कपड़े गंदे क्यों करता है, तो उस ने इस का राज खोला.

मां गंभीर हो कर बोलीं, ‘‘कितना खतरनाक है यह दहीहांड़ी का खेल. और जो ऊपर से गिरा और नाकामी हाथ लगी, तो इनाम तो मिलेगा नहीं, उलटे हाथपैर जो टूटेंगे, तो इलाज का खर्चा कहां से आएगा? तुम्हारे पापा अलग गुस्सा होंगे, सो तुम समझ लेना.’’

‘‘अरे मम्मी, कुछ नहीं होगा. तुम बेकार में चिंता करती हो. सेठजी बड़े दयालु और समाजसेवी हैं. वे हमारा ध्यान रखते हैं. उन के रहते हमें जरा भी चिंता करने की जरूरत नहीं है. जानती हो, जब हम शाम को फील्ड में इस का अभ्यास करते हैं, तो उस समय सेठजी हमारे लिए चायनाश्ता भी भिजवा देते हैं.’’

लगभग बीसेक दिन तक आदित्य ने अपनी टीम के साथ मानव पिरामिड बनाने का मुश्किल अभ्यास किया था. इस बीच वह कई बार गिरा, चोटें भी आईं. मगर सभी जोश में थे. कुछ अलग, कुछ खास करने का जज्बा ही कुछ अलग होता है.

सुरेखा उन्हें देखती, तो शक में पड़ जाती. अगर ये नाकाम हुए, तो क्या होगा? कालेज के खेल टीचर भी अचरज से उन्हें देखते और कहते, ‘‘जो करना है, अपने रिस्क पर करना.’’

एक दिन तो मानव पिरामिड बनाने के चक्कर में आदित्य अपना बैलेंस संभाल नहीं पाया और औंधे मुंह गिर पड़ा. वह तो खैरियत थी कि मुंह पर चोट नहीं लगी, मगर दाएं हाथ की हथेली में मोच आ गई थी.

आदित्य ने सुरेखा से सलाहमशवरा किया, तो उस ने दवा बाजार जीएम रोड में अपने एक रिश्तेदार की दुकान में भेज दिया था. उन्होंने उसे कुछ दवाएं दीं, जिस से वह जल्दी ही ठीक हो गया था.

मगर इस बीच आदित्य के पापा ने तो हंगामा कर दिया, ‘‘इस लड़के को हुआ क्या है. पढ़ाईलिखाई तो करनी नहीं, खाली खेलकूद में लगा रहता है. क्या जरूरत है ऐसे खतरनाक खेल खेलने की, जिस में जान का खतरा हो?’’

‘‘इस में जान का खतरा कैसे हो सकता है?’’ आदित्य ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘मुंबई और महाराष्ट्र में तो इस का आयोजन हर गलीमहल्ले में होता है. जब वहां कुछ नहीं होता, तो यहां क्या हो जाएगा?’’

‘‘मैं भी थोड़ीबहुत जानकारी रखता हूं रे,’’ पापा चिल्लाए, ‘‘वहां हर साल हादसे होते रहते हैं. लोग अपने हाथपैर तो तुड़वाते हैं ही, जान से भी हाथ धो बैठते हैं. यहां लोग इकमंजिले से गिरने पर घायल हो जाते हैं और तुम 50 फुट के मानव पिरामिड बना कर चढ़ोगे, तो सोचिए क्या होगा…’’

‘‘अब तैयारी तो पूरी है. फिर सेठजी  की इज्जत का भी सवाल है. मुझे तो यह करना ही है.’’

‘‘तुम्हें सेठजी की इतनी चिंता है और मेरी नहीं? सेठजी को अपनी इज्जत की इतनी ही चिंता है, तो वे अपने बेटे को क्यों नहीं तैयार करते? उसे तो मुंबई में महंगी तालीम दिला रहे हैं और तुम्हें बलि का बकरा बना रहे हैं.’’

‘‘आप तो हर बात को उलटी दिशा में ले जाते हैं. आप से तो बात करना ही बेकार है,’’ आदित्य झल्ला कर वहां से उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘उन की हैसियत है, तो वे अपने बेटे को मुंबई क्या, अमेरिका, रूस, जापान या इंगलैंड भी भेज सकते हैं.

आदित्य के पापा पैर पटकते हुए बाहर निकल गए.

अब आदित्य के सामने उस की मां थीं. वे समझ नहीं पा रही थीं कि अपने बेटे को समझाएं कि पति को. मगर उन्हें यह ठीक ही लगता था कि बेटा भी कुछ गलत नहीं कर रहा. अरे, यही उम्र तो है, खेलनेखाने की. फिर तो बाद में हायहाय में जुटना ही है.

सेठ उस के कुछ खर्चे उठाता है, तो क्या बुरा करता है. इन की दुकान से दालरोटी चल जाए, यही बहुत है. फिर भी उसे अपने पापा से ढंग से बात करनी चाहिए थी.

मां ने आदित्य से यही कहा ही था कि वह बिफर पड़ा, ‘‘सेठ सुखसागर सिर्फ रुपएपैसे से ही नहीं भरेपूरे हैं, उन्होंने भी चार्टर्ड अकाउंटैंट की पढ़ाई दिल्ली से की है. पापा की तरह वे 8वीं पास नहीं हैं, जो दरदर की ठोकरें खाते फिरते हैं. एक छोटे से खोखे में जिंदगी गुजार दी हम ने. क्या मिला हमें? हमेशा गरीबी के बीच रोते?ांकते रहे हैं हम.’’

मां एकदम से सन्न रह गईं. बेटा यह क्या बोल रहा है. इस को कुछ खबर भी है कि इसी खोखे के बूते ही रामनरेश ने पूरा परिवार पाल दिया है. पहले गांव के परिवार को देखा और उन की भरपाई की, फिर यहां अपना छोटा सा ही सही, मकान बनाया है. आदित्य की भी जो यह पढ़ाई चल रही है, उस में भी तो खर्च हो रहा है.

आदित्य ने कोचिंग जौइन करने को कहा, तो उस के लिए भी उन्होंने कभी मना नहीं किया. और यह आदित्य आज क्या उलटीसीधी बक रहा है. कहीं उन्होंने सुन लिया तो हंगामा मच जाएगा.

मगर सवाल यह है कि आदित्य के दिमाग में आया कैसे कि उस के पापा सिर्फ 8वीं पास हैं. इस का क्या मतलब हुआ कि वे कमअक्ल हैं, कि वे बेचारे हैं. आज तक कभी उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं पसारा, बल्कि दूसरों को अपनी हैसियत से बढ़ कर कुछ दिया ही है. मगर इस आदित्य को क्या हुआ है…

इनाम के रुपयों में से आदित्य के हिस्से में महज 40,000 रुपए ही आए थे, जिस से उस ने एक सैकंडहैंड बाइक खरीद ली थी.

पापा ने आदित्य से कहा था, ‘‘ठीक है, टूह्वीलर ही खरीदना है, तो स्कूटी ले लो. इस से कभीकभार उन की दुकान के लिए वह कुछ सामान की खरीदारी कर के ला दिया करेगा. इस से उन्हें सहूलियत होगी. अभी से वह इसी बहाने खरीदफरोख्त भी सीख लेगा.

मगर स्कूटी के नाम से आदित्य चिढ़ गया. यह भी कोई सवारी है… यह तो फुटकर बनियों की गाड़ी है, जो इस से इधरउधर का सामान खरीद कर यहांवहां ढोते फिरते हैं. डिलीवरी बौय की तरह वह अपनी मेहनत के पैसों को इस में नहीं लगाने वाला.

बाइक की बात ही दूसरी है. स्कूटी तो ऐसा लगता है कि किसी टेबल के आगे बैठे हैं और बाइक पर अहसास होता है कि टांगों के नीचे कुछ दबा हुआ है.

कितना मजा आएगा, जब वह तेज रफ्तार से बाइक चलाएगा. लहरिया कट गाड़ी चलाने में तो वह पूरा उस्ताद है ही. उस के पापा अनपढ़ तो नहीं, मगर 8वीं पास पापा को इस सुख का क्या पता है.

सुरेखा ठीक कहती है, ‘‘यह जिंदगी तो मजे लेने के लिए है. बाकी तो सब रोना है ही जिंदगी में.’’

आदित्य रोते हुए अपनी जिंदगी नहीं बिता सकता. आखिरकार उस ने बाइक खरीद ही ली थी. सुरेखा के साथ जब वह गंगा पाथवे पर जाता, तो जैसे वह हवा में होता. जिंदगी जीना इसी को ही तो कहते हैं.

मगर पिछले हफ्ते रविवार की शाम को आदित्य का गंगा पाथवे पर एक्सीडैंट हो गया था. एक पिकअप वैन ने उसे ऐसी टक्कर मारी कि वह दूर तक घिसट गया. उसे होश तो तब आया, जब उस ने अपनेआप को अस्पताल में पाया. पूरे शरीर में जख्मों पर पट्टियां बंधी थीं. बायां पैर बुरी तरह फ्रैक्चर था.

पिकअप वैन वाला तो कब का भाग चुका था और पुलिस ने आदित्य के पर्स में रखे परिचयपत्र से उस के पापा और सेठ सुखसागर को भी जानकारी दी थी.

पुलिस का तो यह भी आरोप था कि एक तो उस की बाइक की स्पीड तय सीमा से ज्यादा थी और दूसरे वह लहरिया कट गाड़ी चला रहा था. इस आधार पर पुलिस ने उसी के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर दिए थे, जिसे बमुश्किल अपनी पहुंच के बल पर सेठ सुखसागर ने रफादफा कराया था.

सुरेखा भी एक दिन आदित्य को देखने आई थी और फिर जो वह लापता हुई, तो उस की खबर ही नहीं मिली. आजकल उस का फोन भी स्विच औफ हो चुका था.

वह सब तो अपनी जगह, मगर क्या आदित्य सचमुच अपाहिज हो जाएगा? सेठ सुखसागर तो यही कह रहे थे. मगर डाक्टर कमल ने उसे भरोसा दिलाया था कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएगा. उस के पापा का चेहरा उस समय कैसा निरीह हो गया था, जब वह सेठ सुखसागर से बातें कर रहे थे.

ये पैसे वाले ऐसे ही होते हैं क्या? सिर्फ इस्तेमाल करना भर जानते हैं? मगर उस के पापा कितनी मजबूती से बोले थे कि वे अपनी सारी जमापूंजी और घरबार तक उस के इलाज के लिए बेच डालेंगे. वे मजदूरी करने तक को तैयार हैं उस के लिए और वह उन्हें बेवकूफ, गंवार, 8वीं पास कहता रहा.

अब आदित्य की आंखें सही माने में पूरी तरह खुल चुकी थीं. मगर इस के पहले उसे पूरी तरह ठीक होना है. न सिर्फ अपने लिए, बल्कि अपने पापा के लिए. यही उस का प्रायश्चित्त होगा. अब उसे जिंदगी में कुछ अच्छा कर के दिखाना ही है.

बड़ी बहन : रोशनी का छोटा भाई कैसा था

मेरा नाम रोशनी है. यह मेरी कहानी है और एक ऐसी जगह से शुरू होती है, जहां पिछले कुछ दिनों से मच्छरों ने हम सब का जीना हराम कर दिया था. जिन गरीबों के पास जालीदार दरवाजे लगाने के पैसे नहीं होते, उन्हें मच्छरों के साथ जीना भी सीखना पड़ता है.

मच्छरों से बचने के लिए मैं ने पंखे की रफ्तार बढ़ाई और डबलबैड की चादर ओढ़ कर सोने की कोशिश करने लगी. मुझे लगा कि इतनी बड़ी चादर मुझे मच्छरों से बचा लेगी. मैं ने मन ही मन प्रमिला मैडम को शुक्रिया कहा, जिन्होंने आज ही यह चादर मां को दी थी.

मेरी मां प्रमिला मैडम के घर का सारा काम करती हैं… झाड़ूपोंछे से ले कर रसोई के बरतन और घर के दूसरे काम भी. प्रमिला मैडम बहुत दयालु हैं. वे हमें जबतब बहुत सा सामान देती रहती हैं. सामान भले ही पुराना हो, लेकिन वह बड़े काम का होता है.

प्रमिला मैडम ने हमारे इस छोटे से घर को कई तरह के सामान से भर दिया है, जिस में एक छोटा एलईडी, पुरानी मिक्सी, वाशिंग मशीन और कूलर भी हैं. इस सामान को देख कर सगेसंबंधी हम से जलते हैं.

सुबह मां ने जगाया, तो मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी और बोली, ‘‘वाह मां, वाह, आज तो बहुत अच्छी नींद आई. मच्छर मुझे जरा भी न काट सके. यह सब इस चादर की ही करामात है वरना सिंगल बैड की चादर में तो मच्छर आसानी से घुस जाते हैं और फिर तो खुजलातेखुजलाते मेरा बुरा हाल.’’

मां शायद जल्दी में थीं. वे बोलीं, ‘‘बेटी, मैं मैडम के यहां जा रही हूं. तू जल्दी से उठ कर बाकी काम निबटा कर कालेज चली जाना.’’

‘‘ठीक है मां, आप जाओ,’’ मैं ने मुसकरा कर कहा.

मैं ने जब से होश संभाला है, तब से मां को जिंदगी की जद्दोजेहद झोलते या उस से लड़तेरोते ही देखा है. मैं ने जिस जाति में जन्म लिया है, उस में ऐसा कोई घर नहीं, जहां घर के लोग पियक्कड़ न हों और यही वजह हमारी जाति के पिछड़ेपन की भी रही है.

घर के मर्द शराब पी कर घर की औरतों को बुरी तरह मारतेपीटते हैं, उन्हें भद्दीभद्दी गालियां देते हैं और औरत के कमाए पैसे भी झपट कर अपनी झूठी मर्दानगी दिखाते हैं. घर के बच्चे भी यह सब देख कर दहशत में जीते हैं.

मैं ने घर में सब से बड़ी औलाद के रूप में जन्म लिया था. मां मेरे जन्म के बाद मुझे सीने से चिपकाए पता नहीं कितने घरों में जा कर झाड़ूपोंछा, बरतन धोने का काम करती थीं.

सुबह वे घर से रोटी बना कर निकलती थीं, तो शाम को ही वापस घर का मुंह देखती थीं. घर पर आ कर ही मां को पता चलता था कि बापू आज बेलदारी पर गए हैं या नहीं.

अगर बापू घर पर मिलते, तो मां को गालियों का सामना करना पड़ता था और उन्हें बापू को कुछ रुपए शराब पीने के लिए देने ही पड़ते थे. अगर बापू बेलदारी के लिए चले जाते, तो उन के घर न लौटने तक ही शांति रहती थी. जब वे घर लौटते थे, तो शराब के नशे में चूर हो कर लड़खड़ाते कदमों से घर में घुसते और हमारी जिंदगी नरक बना देते थे.

जब मैं ने मां का हाथ पकड़ कर चलना सीख लिया था, तभी मां के पैर फिर भारी हो गए थे और इस तरह उन की मुसीबतें भी और ज्यादा बढ़ गई थीं.

मैं ने रसोईघर में आ कर कटोरदान देखा… मां कल शाम की बनाई एक रोटी चाय के साथ खा कर चली गई थीं. यह रोजाना का सिलसिला था, क्योंकि मां कभी कोई नागा नहीं करती थीं, जब तक कि उन्हें तेज बुखार न चढ़ जाए.

आटा गूंदते हुए मैं फिर से उन दिनों में गोता लगाने लगी थी, जब मेरे खेलनेकूदने के दिन थे. यह बात अलग है कि मु?ो खेलनाकूदना जरा भी पसंद नहीं था.

तब मेरा छोटा भाई राजू घुटने के बल चलने लगा था और मां लोगों के घरों में जातीं, तो राजू को मेरे भरोसे छोड़ कर बेफिक्र हो जाती थीं.

राजू को छोड़ कर मैं कोई भी काम नहीं कर सकती थी, लेकिन जब वह थक कर सो जाता था, तब मैं जल्द से जल्द सारे काम निबटाने की कोशिश किया करती थी.

बापू को शराब पीने की लत बहुत ज्यादा बढ़ गई थी और उन्होंने काम पर जाना तकरीबन बंद ही कर दिया था. वैसे भी नशे में चूर रहने वाले को कौन काम पर रखेगा?

बापू के शराब के पैसे की कमी मां की खूनपसीने की कमाई से ही पूरी होती थी. अगर कभी मां के पास पैसे न होते, तो गालियों के अलावा मां को मार भी खानी पड़ती थी.

तब मां रोतेरोते कहती थीं, ‘‘मु?ो इस जिंदगी में सुख तो तभी मिलेगा, जब मेरा राजू बड़ा होगा और मैं घरबैठे उस के कमाए पैसों से चैन से रह सकूंगी.’’

‘‘मां, अपनी बिरादरी में तो सारे मर्द औरतों पर जुल्म करने के लिए ही पैदा होते हैं, इसलिए तुम्हें राजू से कोई आस नहीं बांधनी चाहिए,’’ मेरी बात को मां ने सिरे से कई बार खारिज कर दिया था.

मां को यकीन था और वे कहती थीं, ‘‘नहीं, राजू हमारी बिरादरी के मर्दों जैसा नहीं होगा. वह अपनी मां के साथ हो रही नाइंसाफी की वजह से कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाएगा.’’

‘‘काश, ऐसा ही हो मां,’’ मेरे मुंह से यह बात निकलती थी.

दिन हवा में उड़ान भरतेभरते एक दिन ठहर से गए. उस दिन मां के पास पैसे न होने के चलते बापू ने उन्हें बहुत मारा था… मारतेमारते किसी तरह बापू के हाथ मां की एकमात्र पैर की उंगली में अटकी चांदी की बिछिया को छू गए.

बस, फिर क्या था. बापू ने बिछिया को इतनी तेजी से खींचा कि मां की बिछिया के निकलने के साथ ही पैर की उंगली भी लहूलुहान हो गई. खैर, बापू को तो मां की बिछिया से मतलब था, खून निकलने से नहीं.

बापू के पास शराब पीने का इंतजाम होते ही वे पीने चले गए और मां को रोताबिलखता छोड़ गए.

उस दिन मां ने दिल से बापू के मरने की कामना की थी. उन की इस कामना को मेरा भी साथ मिला था… और शाम को सचमुच उन की लाश ही घर पर आई. बापू मां की बिछिया बेच कर दिनभर शराब ही पीते रहे और अचानक लुढ़क गए.

कुछ दिनों तक रोनापीटना हुआ, फिर घर में मां की मेहनत की कमाई का एकदम सही इस्तेमाल होने लगा. हालांकि, मां ने मेरा दाखिला सरकारी स्कूल में ही कराया था, लेकिन मैं अपना ध्यान पढ़ाई पर देने में कामयाब रही.

पता नहीं, मुझे अपनी जाति के समाज के सामने एक उदाहरण बनने की सनक सवार हो गई कि जिस जाति में सब के सब मर्द पियक्कड़ और आवारा हैं, उसी समाज की एक लड़की ऐसे मर्दों को पछाड़ कर बहुत आगे भी निकल सकती है. इतना ही नहीं, पढ़लिख कर और अच्छा पद पाने के बाद उस लड़की पर समाज के मर्दों की मनमानी नहीं चल सकती.

हालांकि मां ने राजू का दाखिला एक प्राइवेट इंगलिश मीडियम स्कूल में कराया था, लेकिन उस का मन कभी भी पढ़ने में लगा ही नहीं. मैं उसे पढ़ाने की कोशिश करती, तो वह उलटे मुझ पर ही बरसने लगता था. मुझे न जाने क्यों लगता था कि वह बापू की ही तरह का बरताव करने पर आमादा रहता है.

राजू ने मां की कुछ हजार रुपए की कमाई पर पानी फेर दिया था और एक बिगड़ैल लड़के का तमगा लगा कर उसे स्कूल के बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

उस दिन मां फूटफूट कर रोई थीं. मां के सपने की उड़ान एकाएक ही क्रैश हो गई थी.

मैं ने मां को बहुत प्यार से सम?ाया, ‘‘मेरी अच्छी मां, तुम मत रोओ… भले राजू न सही, लेकिन मैं तुम्हें कुछ

अच्छा बन कर दिखाऊंगी… और मैं ने सोच लिया है कि मेरी नौकरी लगते ही तुम्हें किसी के घर में काम करने नहीं दूंगी.’’

मां ने तुरंत कहा, ‘‘शादी के बाद तो बेटी पराई हो जाती है पगली.’’

‘‘तो मां, शादी कर कौन रहा है? और क्या तुम उम्मीद करती हो कि मैं किसी पियक्कड़ या शराबी के लिए हां भर दूंगी?’’

मां को चुप हो जाना पड़ा.

इंगलिश में एमए और बीऐड करने के बाद उन दिनों मैं स्कूल टीचर के पद के लिए तैयारी में जुटी थी कि एकाएक छोटा भाई पहली बार शराब पी कर घर में घुसा था.

राजू को नशे की हालत में देख कर मैं और मां सकते में आ गईं.

पहली बार मां का हाथ अपने बेटे पर उठा… मां गुस्से में चिल्लाई थीं, ‘‘तो अब यही देखना बाकी रह गया था. तेरे बाप ने भी शराबी बन कर मुझे खूब मारापीटा और मेरी जिंदगी तबाह कर दी थी.

‘‘मैं ने तुझे अच्छे संस्कार दिए और तुझे कभी शराब को हाथ न लगाने का पाठ पढ़ाया था, लेकिन तू… तू भी वही शैतान की औलाद निकला.

‘‘मैं ने खूब कोशिश की थी कि तू पढ़लिख जाए और इसीलिए तुझे अपना पेट काट कर एक सभ्य इनसान बनाने की कोशिश करती रही, लेकिन आज यह दिन दिखाने के लिए तुझे बड़ा किया था मैं ने? अरे, कुछ तो सीख ले लेता अपनी बड़ी बहन से, लेकिन नहीं… तू तो गंदी नाली के कीड़े की जिंदगी ही जीना चाहता है न, बिलकुल अपने बाप की ही तरह?’’

‘‘मां, आज तू ने थप्पड़ मारा है मुझे? मैं ने क्या गुनाह कर दिया? शराब ही तो पी है, बल्कि शराब न पीना एक भद्दा मजाक ही तो है हमारे समाज में और मैं तो वही कर रहा हूं, जो सब करते हैं. और नहीं पीऊंगा तो मजाक नहीं उड़ेगा मेरा?’’

मां को कोने में पड़ी एक लकड़ी दिखाई दे गई. मां ने वही उठा ली थी… वह फुफकारी, ‘‘इस के पहले कि शराब तुझे पी कर खत्म करे, मैं ही तुझे खत्म कर देती हूं.’’

मैं किताबें छोड़ कर भागी और लपक कर मां को पकड़ लिया और बोली, ‘‘नहीं मां, मैं तुम्हें यह नहीं करने दूंगी, कभी नहीं. राजू के शराब पीने की सजा तुम्हें नहीं भुगतने दूंगी.’’

‘‘हो जाने दे मुझे जेल… लेकिन, लोगों के घरों में जिंदगीभर जूठे बरतन रगड़ने से तो अच्छा है, हो जाए मुझे जेल. कम से कम एक जगह बैठ कर चैन से जी तो सकूंगी. मुझे जिंदगीभर घर में तो सुख नहीं मिला, शायद जेल में ही मिल जाए?’’

मां दहाड़ें मार कर रो रही थीं और महल्ले वाले इकट्ठा हो कर तमाशा देखने लगे.

मां टूट गई थीं आज. मैं ने उन्हें इतना हताश कभी नहीं देखा था. मुझे लगा, कोई भी पत्नी अपने बिगड़ैल पति को एक बार सहन कर सकती है, लेकिन जिस बेटे से इतनी उम्मीद पाल ले, उसे गड्ढे में गिरते देख कर वह बरदाश्त नहीं कर सकती.

खैर, कुछ दिनों के बाद मेरी पहली कोशिश में ही एक दूसरे जिले के सरकारी स्कूल में इंगलिश टीचर की नौकरी मिल गई.

मां को निराशा के भंवर से निकालते हुए मैं ने कहा, ‘‘मां, तुम्हारे लिए यह घर किसी मनहूस से कम नहीं. तुम्हें सुख ही क्या मिला है इस घर में? मैं चाहती हूं कि तुम अब मेरे साथ वहीं रहो. हम किराए के मकान में खुशीखुशी साथ रह लेंगे.’’

जाते समय मकान को राजू के हवाले कर मैं ने कहा, ‘‘वादा करो भाई कि अब कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाओगे. जिस मां ने हम को इतने कष्ट सह कर बड़ा किया, उस का रत्तीभर कर्ज भी अगर उतार सकें तो बड़ी बात होगी. और उसे सुख नहीं तो कम से कम दुख तो न ही दें.’’

राजू बोला, ‘‘ठीक है बड़ी बहन. मैं वादा करता हूं, शराब को कभी हाथ नहीं लगाऊंगा और काबिल इनसान बन कर भी दिखाऊंगा.’’

भाई द्वारा किए इस वादे को मैं गांठ बांध कर साथ ले गई.

मां को मेरी काम करने की जगह पर आ कर बहुत सुकून मिला. मां ने जिंदगीभर न जाने कितने कष्ट सहे और अपनी काया को मशीन की तरह बना दिया था. अब जा कर उन्होंने चैन की सांस ली थी. बीते दिनों में बेटे ने मां की काया को इतना छील दिया था कि अब वे उस का नाम भी नहीं लेना चाहती थीं.

धीरेधीरे कर के मैं ने सभी जरूरी सामान खरीद लिया था और मकान भी थोड़ा और सुविधाजनक ही लिया था.

अभी 6 महीने ही गुजरे थे कि एक दिन राजू मेरे स्कूल में कार ले कर चला आया और बोला, ‘‘बड़ी बहन, मैं ने आप से जो वादा किया था, बिलकुल भी नहीं तोड़ा है और न कभी तोड़ूंगा. लेकिन एक संकट खड़ा हो गया है.’’

‘‘कैसा संकट…?’’ मैं ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘आप के यहां आने के बाद मैं ने सोचा था कि एक कार लोन पर ले कर टैक्सी के रूप में चलाऊं?’’

‘‘लोन कैसे मिला?’’

‘‘इस के लिए मुझे मकान के कागजात बैंक में रखने पड़े और 10 लाख रुपए का लोन जुटा कर यह कार खरीदी.

‘‘मैं 6 महीने से टैक्सी चला रहा हूं, लेकिन पूरी किस्तें नहीं चुका पा रहा हूं. क्या करूं? अब बैंक वाले तकाजा कर रहे हैं.’’

भरी दोपहरी में सूरज की गरमी जब सहन नहीं हुई, तो मैं राजू को नीम के पेड़ के नीचे ले आई और पूछा, ‘‘कितना लोन लिया और किस्त कितनी है?’’

‘‘लोन 10 लाख रुपए का है और किस्त 20,000 रुपए महीना.’’

‘‘तो आमदनी कितनी हुई?’’

‘‘जो आमदनी हुई, उस से 2 किस्तें ही चुका पाया हूं.’’

‘‘तो कार बेच दो.’’

‘‘कार के 6 लाख रुपए से ज्यादा नहीं मिलेंगे.’’

‘‘जितने भी मिलें… फिर जो किस्त आएगी, देखेंगे. किस्त नहीं चुकाने से मकान की नीलामी हो जाएगी न.’’

‘‘इसीलिए मजबूर हो कर आया हूं बड़ी बहन.’’

‘‘भाई, बड़ी बहन हूं, इसलिए अपना फर्ज निभाने से पीछे नहीं हटूंगी. कार बेच कर पहले जो पैसा मिले, वह सारा बैंक वालों को जमा करा दो. फिर मुझे बैंक से डिटेल्स ले कर माहवार किस्त का ब्योरा भेज देना, ताकि मैं हर महीने किस्त समय पर सीधे बैंक में भेज सकूं.’’

‘‘ठीक है, मैं यह काम जाते ही करता हूं.’’

‘‘सुनो भाई, ध्यान रहे कि नया धंधा ऐसा हो जिस में पैसा कम लगे, नुकसान भी न हो. अगर तुम ईमानदार रहोगे तभी मुझ से मदद की उम्मीद कर पाओगे. कभी मेरा भरोसा मत तोड़ना. तुम्हारा शराब पीना मां ही नहीं, मैं भी सहन नहीं करूंगी.’’

‘‘बड़ी बहन, मेरा वादा है कि जिंदगी में किसी भी हालात में शराब के पास नहीं फटकूंगा और आप का भरोसा कभी तोड़ने की हिम्मत तो हरगिज नहीं करूंगा.’’

‘‘फोन पर अपडेट करते रहना,’’ मेरे कहने पर उस ने हां भरी, फिर पूछा, ‘‘मां कैसी हैं?’’

‘‘अब ठीक हैं.’’

वह बोला, ‘‘मैं उन से तभी मिलूंगा, जब कुछ कमाने लायक हो जाऊंगा,’’ कहते हुए उस ने विदा ली. कार स्टार्ट होने से ले कर उस के वहां से जाने तक मैं बुत बनी खड़ी रह गई.

इस बीच सूरज बादलों की ओट में छिप गया था. चारों ओर सुहावनी छाया घिर आई थी. मैं उम्मीद से भरी अपने क्लासरूम में लौट आई.

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