एक से बढ़कर एक- भाग 2: दामाद सुदेश ने कैसे बदली ससुरजी की सोच

‘‘सासूमां अकसर कहतीं कि आप ने जो पैंट पहनी है, वह हम ने दी थी. वही है न? हां, क्या कभी अपनी पत्नी को कोई साड़ी दिलाई या जो हम ने दी थी उसी से काम चलाते हो?

‘‘फिर अपनी बेटी से पूछतीं कि बेटी क्या कोई नया गहना बनवाया या नहीं या गहने भी हमारे दिए हुए ही हैं. गले में अभी तक मामूली मंगलसूत्र ही है. क्या मैं दूं अपने गले का निकाल कर? मैं देख रही थी कि तेरे ससुराल वाले कुछ करते भी हैं या नहीं.

‘‘मेरी सास हमारे घर में आती तब भी वही ढाक के तीन पात. यह थाली हमारी दी हुई है न. यह सैट इतनी जल्दी क्यों निकाला है.

‘‘वह दूरदूर के रिश्तेदारों को हमारा घर दिखाने लातीं और बतातीं कि बेटी की गृहस्थी के लिए हम ने सबकुछ दिया है.

‘‘सुबह होते ही सास का फोन आता कि क्या तुम अभी तक उठी नहीं हो. आज खाने में क्या बना रही हो? खाना बनाने के लिए नौकरानी क्यों नहीं रख लेती. तुम अपनी सास से कह दो कि मैं ने कभी खाना बनाया नहीं है और मेरी मां को भी इस की आदत नहीं है. अगर तुम नौकरानी नहीं रख सकती तो मु झे बताओ, मैं एक नौकरानी तुम्हारे लिए भेज दूंगी, जो तुम्हारे सारे काम कर लेगी?

‘‘हमारी नईनई शादी हुई थी. सो अकसर फिल्म देखने जाते, तो फिर बाहर होटल में ही खाना खा लेते. तो कभी शौपिंग के लिए निकल पड़ते. शुरूशुरू में यह बात मु झे चुभी नहीं. मेरे मातापिता, भैयाभाभी कौन हमें सम झाता? मां तो मेरी बिलकुल सीधीसादी. उस ने देखा कि उस का बेटा यानी मैं तो हूं पूरा गोबर गणेश, फिर अपनी बीवी को क्या सम झाऊंगा. घर में होने वाली कलह से बचने के लिए उस ने मेरी अलग गृहस्थी बसाई. हम दोनों को उस पर बहुत गुस्सा आया, लेकिन इस से मेरी आंखें पूरी तरह खुल गईं.

‘‘सिर्फ मीठीमीठी बातें और अच्छे शानदार कपड़े पहनने से पेट तो नहीं भरता. मेरी पत्नी को तो दालचावल भी बनाना नहीं आता था. पहले जब मैं ससुराल जाता तो मेरी सास बतातीं कि यह पूरनपूरी नीतू ने ही बनाई है. आज का सारा खाना उसी ने बनाया है. आप को गुलाबजामुन पसंद हैं न, वे भी उसी ने बनाए हैं.

‘‘मेरे घर में मां और भाभी होने के कारण मेरी पत्नी को क्याक्या बनाना आता है, इस का पता ही नहीं चला. उसे पूरनपूरी तो क्या सादी चपाती भी बनाना नहीं आता था. अगर अपनी मां से पूछ कर कुछ बनाना है तो पूछे कैसे? हमारे घर में फोन ही नहीं था. सबकुछ मुश्किल.

‘‘हमारे यहां फोन नहीं था तो उस के मांबाप हमेशा घर में आते कहते कि हमेशा बाहर की चीजें ला कर खाते रहते. मेरी नाराजगी दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. जब तक हमारी गृहस्थी अलग नहीं थी, तब सारा खर्च पिताजी और भाईसाहब उठाते थे.

‘‘इसलिए यह बो झ मेरे सिर पर कभी नहीं आया. पैसा कैसे खर्च किया जाए, मितव्ययित कैसे की जाए, मु झे इस का बिलकुल ज्ञान नहीं था. होटल में खाना, घूमना, मौजमस्ती तथा शौपिंग में ही मेरी सारी कमाई खर्च हो जाती थी. पिताजी से पैसा मांगना भी मु झे अच्छा नहीं लगता था. मां मेरी इस मजबूरी को सम झती थीं, इसलिए वे अपने साथसाथ मेरे घर के लिए भी राशन का इंतजाम कर देती थीं.

‘‘अब मु झे जीवन की असलियत का पता चलने लगा था. नईनई शादी की मौजमस्ती अब खत्म हो चली थी. इस से उबरने के लिए अब हमें अपना रास्ता खोज निकालना था और यही सोच कर मैं ने नीतू को सब बातें ठीक से सम झाने का फैसला कर लिया.

‘‘उसी समय शहर से जरा दूर पिताजी का एक प्लाट था. वे उसे मुझे देने वाले हैं यह बात उन्होंने मेरे ससुर को बताई तो उन्होंने घर बनाने के लिए रुपया दिया. हम सब से जरा दूर रहने के लिए गए, इसलिए बहुत से सवाल अपनेआप हल हो जाएंगे. अत: बंगला बनने तक मैं खामोश रहा.

‘‘नए घर में रहने के लिए जाने के बाद मैं ने अपनी पत्नी को सम झाया कि अब मेरी कमाई में ही घर का सारा खर्च चलाना है. उस ने मितव्ययिता शुरू कर दी. हमारा बाहर घूमनाफिरना बंद हो गया. शुरुआत में उसे घर के काम करने में बड़ी दिक्कत आती. इसलिए मैं भी उसे सहायता करता था. धीरेधीरे उस ने खाना बनाना सीख लिया. शहर से जरा दूर होने से अब मेरे सासससुर का आनाजाना जरा कम हो गया था. लेकिन सास जब कभी हमारे घर आतीं, तो फिर शुरू हो जाती कि नीतू तुम कैसे अपनी गृहस्थी चलाती हो. तुम्हारे घर में यह चीज नहीं है, वह चीज नहीं है.

‘‘इस पर नीतू अपनी मां को जवाब देती कि मां तुम्हारी गृहस्थी को कितने साल हो गए? मैं तुम्हारी उम्र की हो जाऊंगी तो मेरे पास भी वे सारी चीजें हो जाएंगी.

‘‘मुझे न बता कर मेरी सास हमारे लिए कोई चीज ले कर आती और कहतीं कि सुदेश बेटा, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूं. तुम्हारे पास यह चीज नहीं थी, इसलिए ले आई हूं. यह इंपौर्टेड माल है. मुझे तो इंडियन चीजें जरा भी पसंद नहीं आतीं.

‘‘मैं भी नहले पर दहला मारता कि हां, लेकिन मुझे भी दूसरों की दी हुई चीजें पसंद नहीं आती.

‘‘मेरी पत्नी नीता न मु झ से कुछ कह पाती और न अपनी मां से. लेकिन मेरी नाराजगी की वजह अब वह सम झने लगी थी. वह अब घर के सारे काम खुद करने लगी और मेरे प्यार के कारण अब उस में आत्मविश्वास जागने लगा था. अत: अब उस में धीरेधीरे परिवर्तन होने लगा. अब वह अपनी मां से सीधे कह देती कि मां, अब तुम मेरे लिए कुछ न लाया करो. सुदेश को भी तुम्हारा बरताव पसंद नहीं आता और इस से हम दोनों के बीच मनमुटाव होता है और  झगड़ा होने लगता है.

‘‘दूसरों की भावनाओं को सम झना मेरी सास ने कभी सीखा ही नहीं था और शान दिखाने की आदत कैसे छूटती? अब मु झे अपनी आमदनी बढ़ा कर इन सब से छुटकारा पाना था.

Father’s Day Special- मुट्ठीभर स्वाभिमान: भाग 2

‘तो मैं क्या करूं? मुझे भी तो घूमने के कभीकभी ही अवसर मिलते हैं,’ शांता का रोषपूर्ण स्वर था.

और अधिक सुनने का साहस न था दीनानाथजी में. सो, कमरे का दरवाजा बंद कर हाथ की किताब रख दी और बत्ती बुझा कर सोने की चेष्टा करने लगे. किंतु कहां थी नींद आंखों में? बंद भीगी पलकों में वे सुनहरे छायाचित्र तैर रहे थे, जो पत्नी के साथ बिताए 40 वर्षों की देन थे.

अपना एकाकीपन आज उन्हें बुरी तरह झकझोर गया. फिर भी स्वाभिमान के धनी थे. इसलिए सुबह होते ही सुकांत से अपने वापस जाने की इच्छा प्रकट की. किंतु सुकांत अटल था अपने निश्चय पर कि बाबूजी यहीं रहेंगे. सो, वे वहीं रहे. सुकांत अकेला ही जरमनी गया. सुकांत के बिना वह पूरा 1 महीना दीनानाथजी ने लगभग मौनव्रत रख कर ही काटा.

और फिर एक दिन उन के दांत में बेहद दर्र्द होने लगा. सारा दिन दर्द से तड़पते रहे. अपने देश में तो दंतचिकित्सक था, जो एक फोन करते ही उन्हें आ कर देख जाता था. दवा तक खरीदने जाना नहीं पड़ता था. वही खरीद कर भिजवा देता था. किंतु यहां? यहां तो वे असहाय से मफलर से मुंह लपेटे दफ्तर से सुकांत के घर लौटने का इंतजार करते रहे. यहां न तो वे गाड़ी चला सकते थे और न ही उन्हें किसी डाक्टर का पता मालूम था.

शाम को सुकांत लौटा तो बाबूजी का सूजा हुआ गाल देख कर सब समझ गया. पिता को गाड़ी में बिठा कर तुरंत दंतचिकित्सक के पास ले गया. 80 डौलर ले कर डाक्टर ने उन्हें देखा और फिर आगे के स्थायी इलाज के लिए लगभग 3,000 डौलर का खर्चा सुना दिया. दवा आदि ले कर जब सुकांत बाबूजी के साथ घर लौटा तो उस का चेहरा खिलाखिला सा था कि बाबूजी को अब आराम आ जाएगा.

किंतु रात को खाने की मेज पर बैठे दलिया खा रहे दीनानाथजी से शांता कह ही उठी, ‘बाबूजी, आप को भारत से स्वास्थ्य संबंधी बीमा पौलिसी ले कर ही आना चाहिए था. अब देखिए न, अभी तो डाक्टर ने 80 डौलर सिर्फजांच करने के ही ले लिए, इलाज में कितना खर्च होगा, कुछ पता नहीं.’

‘बस करो शांता,’ सुकांत कड़े स्वर में बोला, ‘यह मत भूलो कि बाबूजी अपना टिकट खुद खरीद कर आए हैं, तुम से नहीं मांगा है…’

‘तुम भी यह मत भूलो सुकांत कि जो पैसा बाबूजी पर खर्च हो रहा है, वह आखिरकार हमारा है,’ तलवार की धार जैसे इस एक ही वाक्य से दीनानाथजी का सीना चीर कर बहू उठ खड़ी हुई और अपने कमरे में जा कर झटके से दरवाजा बंद कर लिया.

सुकांत स्तब्ध रह गया. शांता के इस लज्जाजनक व्यवहार की तो उस ने कभी कल्पना भी न की थी. दीनानाथजी खामोश, मुंह झुकाए अपमानित से बैठे रहे. बात का रुख यह मोड़ लेगा, उन्हें उम्मीद न थी.

दूसरे दिन सुकांत को अकेला पा कर दीनानाथजी ने उस से अपने वापस लौटने की इच्छा जाहिर की. न चाहते हुए भी सुकांत को उन के निश्चय के आगे झुकना पड़ा. सो, भारत जा रहे अपने एक मित्र के साथ उन के वापस लौटने का प्रबंध कर दिया.

70 वर्ष की आयु में दीनानाथजी ने अपने इस एकाकी जीवन का एक नया अध्याय शुरू किया. घर में सबकुछ यथास्थान था. पत्नी घर को सदा ही सुव्यवस्थित रखती थी. बैंक में पैसा था और पैंशन भी आती थी. फिर किसी बात की दिक्कत क्यों होगी भला?

यही सब सोचते हुए उन्होंने यारदोस्तों से एक छोटे नौकर के लिए भी कह छोड़ा. किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था.

6 महीने भी न निकल पाए, वे अकेले टूट से गए थे. बहुत सालता था यह एकाकी जीवन. पढ़नेलिखने के शौकीन थे, सो, किताबें पढ़ कर कुछ समय कट जाता था. किंतु आखिर कोई बोलने वाला भी तो होना चाहिए घर में. आखिरकार उन्होंने डायरी लिखनी शुरू की और डायरी के पहले पन्ने पर लिखा, ‘सुकांत व शांता के नाम.’

अंत्येष्टि के सारे कामों से फुरसत पाने के बाद सुकांत को ध्यान आया कि बैंक व घर के कागजों को भी संभालना है. सभी चीजें बड़ी वाली अलमारी में बंद होंगी, वह जानता था. सारे कागज संभालना मां की जिम्मेदारी थी और बाबूजी उन के द्वारा रखी चीजों की जगह को कभी नहीं बदलते थे, यह भी वह जानता था. अलमारी की चाबी उसे पहले की ही तरह एक कागज के लिफाफे में लिपटी मिली. ‘कुछ भी तो नहीं बदला यहां,’ सुकांत सोचता रहा कि सबकुछ वैसा ही है. उस की मां नहीं बदली, बाबूजी नहीं बदले. बदल गया तो केवल वह खुद. और अब पहली बार सुकांत अकेले में फूटफूट कर रोया. घर की सूनी दीवारों ने मानो उसे अपने सीने में समेट लिया.

दूसरे दिन सुबह शांता का फोन आ गया, ‘‘कैसे हो? सब ठीक तो है न? फोन भी नहीं किया तुम ने?’’

‘‘सब ठीक है,’’ सुकांत का दोटूक जवाब था.

‘‘अरे, बोल कैसे रहे हो?’’ आदत के मुताबिक झल्ला उठी शांता, ‘‘हुआ क्या है तुम्हें?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ सुकांत अपनेआप पर नियंत्रण रखे था.

‘‘तो फिर,’’ शांता के स्वर में बेचैनी थी, ‘‘जल्दी ही सब काम निबटा कर वापस आने की कोशिश करो. बैंक के खाते और मकान के कागज तुम्हारे नाम हुए कि नहीं? बाबूजी की वसीयत तो होगी?’’

सुकांत ने बिना उत्तर दिए फोन रखदिया. विरक्ति से भर उठा वह. उस का हृदय मानो हाहाकार कर रहा था कि कैसी है यह स्त्री, जिसे पैसे के सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं देता और क्यों वह स्वयं इतना कमजोर बन गया कि उस ने कभी शांता के इन विचारों पर अंकुश नहीं लगाया. इस भयावह स्थिति का जिम्मेदार वह खुद को मान रहा था.

सुकांत का सिर दर्द से फट रहा था. रिश्तेदार सब अपनेअपने घर चले गए थे, बल्कि सच तो यह था कि सुकांत ने ही हाथ जोड़ कर उन से विनती की थी कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए. कुछ को बुरा भी लगा, किंतु विरोध नहीं किया किसी ने भी. विदेश में बसे लोगों की मानसिकता कुछ भिन्न हो जाती है और यदि साफ शब्दों में कहें तो कुछ ऐसा कि उन का खून सफेद हो जाता है, यही मान कर चुपचाप चले गए सब.

जातेजाते चाची ने खाने के लिए भी पूछा, किंतु सुकांत ने मना कर दिया. पर अब एक प्याला चाय या कौफी चाहिए थी उसे, सो रसोई में चला गया. कौफी तो थी ही नहीं, क्योंकि मांबाबूजी चाय ही पीते थे. चीनी व चाय की पत्ती 2 डब्बों में मिल गई. दूध नहीं था. सो, बिना दूध की चाय ही बना ली. फिर रसोई में पड़े स्टूल पर बैठ गया.

उसे अच्छी तरह याद था कि मां रसोई में काम करती रहती थीं और बाबूजी इसी स्टूल पर बैठे उन से बातें करते हुए उन का हाथ बंटाने की कोशिश करते रहते. एक हूक सी उठी सुकांत के हृदय में… कितने अच्छे थे वे दिन…अपनेआप में परिपूर्ण और जीवंत. उसे लगा कि अब वह एक बनावटी जिंदगी जी रहा है.

चाय पी कर सुकांत का मन कुछ हलका हुआ तो उस ने यह सोच कर अलमारी खोली कि आखिर कागजों का काम तो निबटाना ही होगा. बड़ीबड़ी 2 फाइलों में बाबूजी ने सारे कागज सिलसिलेवार लगा रखे थे. उन्हीं कागजों में उन की वसीयत भी थी. वैसे वसीयत की कोई खास आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि सुकांत अपने मातापिता की अकेली संतान था. किंतु दीनानाथजी की आदत हर काम को पक्के तौर पर करने की थी. आगेपीछे बहुत रिश्तेदार थे और सुकांत उतनी दूर विदेश में…किसी का क्या भरोसा?

Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना- भाग 2

मम्मी स्वभाव से ही गरम एवं तीखी थीं. दोनों की बातें होतीं तो मम्मी का स्वर जरूरत से ज्यादा तेज हो जाता और पापा का धीमा होतेहोते शांत हो जाता. फिर दोनों अलगअलग कमरों में चले जाते. सुबह तैयार हो कर मैं पापा के साथ बस स्टाप तक जाना चाहती थी पर मम्मी मुझे घसीटते हुए ले जातीं. मैं पापा को याचना भरी नजरों से देखती तो वह धीमे से हाथ हिला पाते, जबरन ओढ़ी हुई मुसकान के साथ.

मैं जब भी स्कूल से आती मम्मी अपनी सहेलियों के साथ ताश और किटी पार्टी में व्यस्त होतीं और कभी व्यस्त न होतीं तो टेलीफोन पर बात करने में लगी रहतीं. एक बार मैं होमवर्क करते हुए कुछ पूछने के लिए मम्मी के कमरे में चली गई थी तो मुझे देखते ही वह बरस पड़ीं और दरवाजे पर दस्तक दे कर आने की हिदायत दे डाली. अपने ही घर में मैं पराई हो कर रह गई थी.

एक दिन स्कूल से आई तो देखा मम्मी किसी अंकल से ड्राइंगरूम में बैठी हंसहंस कर बातें कर रही थीं. मेरे आते ही वे दोनों खामोश हो गए. मुझे बहुत अटपटा सा लगा. मैं अपने कमरे में जाने लगी तो मम्मी ने जोर से कहा, ‘निकी, कहां जा रही हो. हैलो कहो अंकल को. चाचाजी हैं तुम्हारे.’

मैं ने धीरे से हैलो कहा और अपने कमरे में चली गई. मैं ने उन को इस से पहले कभी नहीं देखा था. थोड़ी देर में मम्मी ने मुझे बुलाया.

‘निकी, जल्दी से फे्रश हो कर आओ. अंकल खाने पर इंतजार कर रहे हैं.’

मैं टेबल पर आ गई. मुझे देखते ही मम्मी बोलीं, ‘निकी, कपड़े कौन बदलेगा?’

‘ममा, आया किचन से नहीं आई फिर मुझे पता नहीं कौन से…’

‘तुम कपड़े खुद नहीं बदल सकतीं क्या. अब तुम बड़ी हो गई हो. अपना काम खुद करना सीखो,’ मेरी समझ में नहीं आया कि एक दिन में मैं बड़ी कैसे हो गई हूं.

‘चलो, अब खाना खा लो.’

मम्मी अंकल की प्लेट में जबरदस्ती खाना डाल कर खाने का आग्रह करतीं और मुसकरा कर बातें भी कर रही थीं. मैं उन दोनों को भेद भरी नजरों से देखती रही तो मम्मी ने मेरी तरफ कठोर निगाहों से देखा. मैं समझ चुकी थी कि मुझे अपना खाना खुद ही परोसना पड़ेगा. मैं ने अपनी प्लेट में खाना डाला और अपने कमरे में जाने लगी. हमारे घर पर जब भी कोई आता था मुझे अपने कमरे में भेज दिया जाता था. मैं टीवी देखतेदेखते खाना खाती रहती थी.

‘वहां नहीं बेटा, अंकल वहां आराम करेंगे.’

‘मम्मी, प्लीज. बस एक कार्टून…’ मैं ने याचना भरी नजर से उन्हें देखा.

‘कहा न, नहीं,’ मम्मी ने डांटते हुए कहा, जो मुझे अच्छा नहीं लगा.

खाने के बाद अंकल उस कमरे में चले गए तथा मैं और मम्मी दूसरे कमरे में. जब मैं सो कर उठी, मम्मी अंकल के पास चाय ले जा रही थीं. अंकल का इस तरह पापा के कमरे में सोना मुझे अच्छा नहीं लगा. जाने से पहले अंकल ने मुझे ढेर सारी मेरी मनपसंद चाकलेट दीं. मेरी पसंद की चाकलेट का अंकल को कैसे पता चला, यह एक भेद था.

वक्त बीतता गया. अंकल का हमारे घर आनाजाना अनवरत जारी रहा. जिस दिन भी अंकल हमारे घर आते मम्मी उन के ज्यादा करीब हो जातीं और मुझ से दूर. मैं अब तक इस बात को जान चुकी थी कि मम्मी और अंकल को मेरा उन के आसपास रहना अच्छा नहीं लगता था.

एक दिन पापा आफिस से जल्दी आ गए. मैं टीवी पर कार्टून देख रही थी. पापा को आफिस के काम से टूर पर जाना था. वह दवा बनाने वाली कंपनी में सेल्स मैनेजर थे. आते ही उन्होंने पूछा, ‘मम्मी कहां हैं.’

‘बाहर गई हैं, अंकल के साथ… थोड़ी देर में आ जाएंगी.’

‘कौन अंकल, तुम्हारे मामाजी?’ उत्सुकतावश उन्होंने पूछा.

‘मामाजी नहीं, चाचाजी…’

‘चाचाजी? राहुल आया है क्या?’ पापा ने बाथरूम में फे्रश होते हुए पूछा.

‘नहीं. राहुल चाचाजी नहीं कोई और अंकल हैं…मैं नाम नहीं जानती पर कभी- कभी आते रहते हैं,’ मैं ने भोलेपन से कहा.

‘अच्छा,’ कह कर पापा चुप हो गए और अपने कमरे में जा कर तैयारी करने लगे. मैं पापा के पास पानी ले कर आ गई. जिस दिन पापा मेरे सामने जाते मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं उन के आसपास घूमती रहती थी.

‘पापा, कहां जा रहे हो,’ मैं उदास हो गई, ‘कब तक आओगे?’

‘कोलकाता जा रहा हूं मेरी गुडि़या. लगभग 10 दिन तो लग ही जाएंगे.’

‘मेरे लिए क्या लाओगे?’ मैं ने पापा के गले में पीछे से बांहें डालते हुए पूछा.

‘क्या चाहिए मेरी निकी को?’ पापा ने पैकिंग छोड़ कर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा. मैं क्या कहती. फिर उदास हो कर कहा, ‘आप जल्दी आ जाना पापा… रोज फोन करना.’

‘हां, बेटा. मैं रोज फोन करूंगा, तुम उदास नहीं होना,’ कहतेकहते मुझे गोदी में उठा कर वह ड्राइंगरूम में आ गए.

तब तक मम्मी भी आ चुकी थीं. आते ही उन्होंने पूछा, ‘कब आए?’

‘तुम कहां गई थीं?’ पापा ने सीधे सवाल पूछा.

‘क्यों, तुम से पूछे बिना कहीं नहीं जा सकती क्या?’ मम्मी ने तल्ख लहजे में कहा.

‘तुम्हारे साथ और कौन था? निकिता बता रही थी कि कोई चाचाजी आए हैं?’

‘हां, मनोज आया था,’ फिर मेरी तरफ देखती हुई बोलीं, ‘तुम जाओ यहां से,’ कह कर मेरी बांह पकड़ कर कमरे से निकाल दिया जैसे चाचाजी के बारे में बता कर मैं ने उन का कोई भेद खोल दिया हो.

‘कौन मनोज, मैं तो इस को नहीं जानता.’

‘तुम जानोगे भी तो कैसे. घर पर रहो तो तुम्हें पता चले.’

‘कमाल है,’ पापा तुनक कर बोले, ‘मैं ही अपने भाई को नहीं पहचानूंगा…यह मनोज पहले भी यहां आता था क्या? तुम ने तो कभी बताया नहीं.’

‘तुम मेरे सभी दोस्तों और घर वालों को जानते हो क्या?’

‘तुम्हारे घर वाले गुडि़या के चाचाजी कैसे हो गए. शायद चाचाजी कहने से तुम्हारे संबंधों पर आंच नहीं आएगी. निकिता अब बड़ी हो रही है, लोग पूछेंगे तो बात दबी रहेगी…क्यों?’

और तब तक उन के बेडरूम का दरवाजा बंद हो गया. उस दिन अंदर क्याक्या बातें होती रहीं, यह तो पता नहीं पर पापा कोलकाता नहीं गए.

जीवनसाथी – भाग 1: उस नौजवान ने कैसे जीता दिल

दीपक को सरकारी अफसर की कुरसी पर देख कर आशा हैरान रह गई. वह जाति से दलित था और उन के यहां काम करने वाली नौकरानी का बेटा. आशा की दादी को दीपक एक आंख नहीं भाता था. उसे देखते ही उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता था.

आज दीपक ने आशा से ऐसी बात कह दी कि…  उन दिनों मैं नौकरी के लिए दौड़धूप कर रही थी. इसी सिलसिले में कचहरी में मुझे एक अफसर से मिलना था. मैं जब उन के कमरे में गई तो सामने कुरसी पर एक गोरेचिट्टे, हैंडसम आदमी को बैठे हुए पाया. मैं ने उन्हें नमस्कार किया और अपने कागज उन की मेज पर रख दिए.

मैंने देखा, उन की नजर मुझ पर ही टिकी थी, जैसे मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हों. गौर से देखने पर खुद मुझे भी उन का चेहरा कुछ जानापहचाना सा लगा, जैसे हम बहुत समय तक एकसाथ रहे हों, परंतु मुझे कुछ भी याद नहीं आ  रहा था. ‘‘आप… आप आशाजी हैं न?’’ उन्होंने हैरानी और खुशी भरी आवाज  में पूछा. ‘‘हां,’’ मुझे अब कुछकुछ याद आने लगा था, ‘‘और… तुम शायद दीपक हो,’’ मेरे मुंह से अचानक निकल गया था.

मैं हैरानी से उसे देख रही थी. गुजरे वक्त की कई बातें मुझे याद आने  लगी थीं. तभी दीपक किसी से मिलने बाहर चला गया और मैं सोच में डूब गई. दीपक हमारी नौकरानी का लड़का था, जो कई सालों तक हमारे साथ रहा था. मैं अपने दिमाग पर जोर दे कर याद करने लगी.

उस दिन दीपक पहली बार हमारे घर आया था. सर्दियों के दिन थे. उस दिन दोपहर को मैं, मेरा भाई मनोज, मां और दादीजी बाहर बैठे धूप का मजा ले रहे थे, तभी एक अधेड़ औरत अपने 7-8 साल के लड़के के साथ हमारे घर आई. उस ने हाथ जोड़ते हुए मां से कहा, ‘‘मुझे साहब ने भेजा है.’’ ‘‘किसलिए…?’’ मां के साथ हम सब की सवालिया नजरें उस की ओर उठ गई थीं. ‘‘बीबीजी, मुझे अपने घर में नौकरानी रख लो. मैं बहुत गरीब हूं,’’ उस ने गुजारिश की. सचमुच हमें एक नौकरानी की जरूरत थी, इसलिए पिताजी ने उसे घर भेजा था.

सांवले से रंग की वह औरत ईमानदार और मेहनती लग रही थी. मां और दादीजी ने उस का अच्छी तरह जायजा लिया.  फिर दादीजी ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘पार्वती,’’ उस ने जवाब दिया. ‘‘जात क्या है?’’ ‘‘दलित.’’ यह सुन कर दादीजी ने नाकभौं सिकोड़ ली थी और मां से कहने लगी थीं, ‘‘इनकार कर दे बहू… और बहुत मिल जाएंगी…’’ यह सुनते ही पार्वती मां के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाने लगी थी, ‘‘बीबीजी, मुझ पर दया करो. मैं कहां दरदर ठोकरें खाती फिरूंगी.

जब से दीपक के बापू इस दुनिया से गए हैं, तब से ये बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं.  ‘‘मैं आप के घर में पूरी मेहनत से काम करूंगी और कभी भी आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगी. मेरे इस बच्चे पर तरस खाओ, हम भूखे मर जाएंगे…’’ मां को पार्वती पर दया आ गई थी.

उसे घर में नौकरानी रख लिया गया  और रहने के लिए पीछे वाला कमरा दे दिया गया. उसी दिन से पार्वती ने घर का काम अपने हाथों में संभाल लिया था. परंतु दादीजी जातपांत के मामलों में बहुत सख्त थीं और उसी तरह की सीख दे कर उन्होंने मां को भी अपने जैसा बना लिया था, इसलिए पार्वती सिर्फ निचली मंजिल पर ही काम करती थी.

दादीजी ऊपर की दोनों मंजिल पर उसे फटकने तक नहीं देती थीं. अगर कभी गलती से वहां उस का पैर पड़ जाता तो फर्श को दोबारा पानी से साफ करतीं और कमरे में इत्र वगैरह छिड़कतीं. पार्वती से शरीर छू जाने पर दादीजी दोबारा नहातीं. जब पार्वती जूठे बरतन धो कर रखती तो उन्हें दोबारा साफ पानी से धो कर रसोई में रखतीं.

दादीजी ने मुझे और मनोज को भी अपने सख्त कायदेकानूनों की कैद में जकड़ रखा था. दीपक को तो हमारे घर के भीतर आने की सख्त मनाही थी, परंतु हमें भी उन के कमरे की ओर नहीं जाने दिया जाता था, इसलिए दीपक वहां अकेला, गुमसुम सा बैठा रहता और बेचारगी से हमारी ओर ताकता रहता. हम भी उसे नफरत भरी नजरों से देखते.

3-4 दिन के बाद मनोज ने मुझे बताया था, ‘‘आशा, यह पढ़ता भी है…’’ ‘‘किस क्लास में?’’ मैं ने पूछा. ‘‘दूसरी में… इस की मां आज इसे हमारे स्कूल में दाखिल करा आई है…’’ मैं हैरान रह गई थी. मैं भी दूसरी क्लास में ही पढ़ती थी. दीपक मुझ से तकरीबन एक साल बड़ा था. अब मनोज मुझे बारबार चिढ़ाता और छेड़ता रहता, ‘‘आशा, अब मेरे साथ स्कूल न जाया करो. वह तेरे साथ पढ़ता है, उसी के साथ चली जाया करो. मैं अपने दोस्तों के संग जाया करूंगा.’’

जब मैं कभीकभी उस की इस बात पर रोने लग जाती तो वह कहता, ‘‘अरी आशा, मेरी प्यारी बहन, मैं तो मजाक कर रहा था.’’ दीपक गोलमटोल चेहरे वाला खूबसूरत लड़का था. अगर उसे मनोज की तरह अच्छे कपड़े पहनने को मिलते तो लोग उसे नौकरानी का नहीं, किसी बड़े अफसर का लड़का समझते. पढ़ने में भी वह बहुत अच्छा था, क्लास में सब से पहले सवाल हल कर के मास्टरजी को दिखाता था. हम दीपक से दोस्ती करना चाहते थे, परंतु कोई तरीका नहीं सूझ रहा था.

एक दिन जब मैं और मनोज आंगन में गेंद खेल रहे थे तो मैं ने जानबूझ कर गेंद को दीपक के कमरे की ओर उछाल दिया. दीपक ने कमरे के अंदर से गेंद को ला कर मुझे लौटा दिया. मैं ने मुसकरा कर उस का शुक्रिया अदा किया. उस के बाद यह रोज का ही काम हो गया.

हम आंगन में जब गेंद खेलते, तो उसे उठा कर दीपक के कमरे की ओर फेंक देते और छिपछिप कर उस के कमरे के भीतर देखने की कोशिश करते. कुछ दिनों के बाद दीपक भी हमारा साथी बन गया. स्कूल में भी हम इकट्ठे ही रहते थे.

पापा के लिए- भाग 1: सौतेली बेटी का त्याग

जिस स्नेह और अपनेपन से मेरी मम्मी ने पापा के पूरे परिवार को अपना लिया था, उस का एक अंश भी अगर पापा उन की बेटी को यानी मुझे दे देते तो… लेकिन नहीं, पापा मुझे कभी अपनी बेटी मान ही नहीं सके. उन के लिए जो कुछ थे, उन की पहली पत्नी के दोनों बच्चे थे अमन और श्रेया. अमन तो तब मेरे ही बराबर था, 7 साल का, जब उस के पापा ने मेरी मम्मी से शादी की थी और श्रेया मात्र 3 बरस की थी.

दादी के बारबार जोर देने पर और छोटे बच्चों का खयाल कर के पापा ने मम्मी से, जो उन्हीं की कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर थीं, शादी तो कर ली. लेकिन मन से वे उन्हें नहीं अपना पाए. मम्मी भी कहां मेरे असली पापा को भुला सकी थीं.

अचानक रोड ऐक्सीडैंट में उन की डैथ हुई थी. उस के बाद अकेले छोटी सी बच्ची यानी मुझे पालना उन के लिए पुरुषों की इस दुनिया में बहुत मुश्किल था. पापा के जाने के बाद 2 साल में ही इस दुनिया ने उन्हें एहसास करा दिया था कि एक अकेली औरत, जिस के सिर पर किसी पुरुष का हाथ नहीं, 21वीं सदी में भी बहुत बेबस और मजबूर है. उस का यों अकेले जीना बहुत मुश्किल है.

ननिहाल और ससुराल में कहीं भी ऐसा कोई नहीं था जिस के सहारे वे अपना जीवन काट सकतीं. इसलिए एक दिन जब औफिस में पापा ने उन्हें प्रपोज किया तो वे मना नहीं कर सकीं. सोचा, कि ज्यादा कुछ नहीं तो इज्जत की एक छत और मुझे पापा का नाम तो मिल जाएगा न. और वैसा हुआ भी.

पापा ने मुझे अपना नाम भी दिया और इतना बड़ा आलीशान घर भी. उन की कंपनी अच्छी चलती थी और समाज में उन का नाम, रुतबा सब कुछ था. नहीं मिली तो मुझे अपने लिए उन के दिल में थोड़ी सी भी जगह.

मेरे अपने पापा कैसे थे, यह तो विस्मृत हो गया था मेरी नन्ही यादों से, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ यह बखूबी समझ आ रहा था कि ये वाले पापा वाकई दुनिया के बैस्ट पापा थे, जो अपने दोनों बच्चों पर जान छिड़कते थे. मम्मी के सब कुछ करने के बावजूद भी उन्हें खुद स्कूल के लिए तैयार करते, उन्हें गाड़ी से स्कूल छोड़ने जाते, शाम को उन्हें घुमाने ले जाते, उन के लिए बढि़याबढि़या चीजें लाते, खिलौने लाते, तरहतरह की डै्रसेज लाते और भी न जाने क्याक्या. मेरे अकेले के लिए अगर मम्मी कभी कुछ ले आतीं, तो बस बहुत जल्दी सौतेलीमां की उपाधि से उन्हें सजा दिया जाता.

उन बच्चों को तो मेरी मम्मी पूरी तरह से मिल गई थीं. वे उन के संग हर जगह जातीं, संग खेलतीं, संग खातीं, मगर शायद उन की हरीभरी दुनिया में मेरे लिए कोई जगह नहीं थी. यहां तक कि अगर मम्मी मेरा कुछ काम कर रही होतीं और इस बीच यदि श्रेया और अमन, यहां तक कि पापा और दादी का भी कोई काम निकल आता, तो मम्मी मुझे छोड़ कर पहले उन का काम करतीं. इस डर से कि कहीं पापा गुस्सा न हो जाएं, कहीं दादी फिर से सौतेलीमां का पुराण न शुरू कर दें.

हमारे समाज में हमेशा सौतेली मां को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है कि वह चाहे अपना कलेजा चीर कर दिखा दे, लेकिन कोई उस की अमूल्य कुरबानी और प्यार को नहीं देखेगा, बस उस पर हमेशा लांछन ही लगाए जाएंगे.

अच्छी मम्मी बनने के चक्कर में मम्मी मेरी तरफ से लापरवाह हो जातीं. सब को सब मिल गया था, मगर मेरा तो जो अपना था वह भी मुझ से छिनने लगा था. मम्मी को मुझे प्यार भी छिप कर करना पड़ता और मेरा काम भी. मैं उन की मजबूरी महसूस करने लगी थी,

मगर मैं भी क्या करती. उन के सिवा मेरा और था ही कौन? उन के बिना तो मैं पूरे घर में अपने को बहुत अकेला महसूस करती थी. चारों लोग कहीं तैयार हो कर जा रहे होते और अगर मैं गलती से भी उन के संग जाने का जिक्र भर छेड़ देती तो मम्मी मारे डर के मुझे चुप करा देतीं.

मेरा बालमन तब पापा की तरफ इस उम्मीद से देखता कि शायद वे मुझे खुद ही साथ चलने को कहें, मगर वहां तो स्नेह क्या, गुस्सा क्या, कोई एहसास तक नहीं था मेरे लिए. जैसे मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद उन के लिए हो कर भी नहीं था. वे सब लोग गाड़ी में बैठ कर चले जाते और मैं वहीं दरवाजे पर बैठी रोतेबिसूरते उन के लौटने का इंतजार करती रहती. इतने बड़े घर में अकेले मुझे बहुत डर लगता था. तब सोचती, क्या मम्मी ने इन नए वाले पापा से शादी कर के ठीक किया? पता नहीं उन्होंने क्या पाया, लेकिन जातेजाते बारबार आंसू भरी आंखों से पीछे मुड़मुड़ कर उन का मुझे निहारना मुझ से उन के रीते हाथों की व्यथा कह जाता.

दादी का तो होना न होना बराबर ही था. वे भी मुझ से तब ही बात करती थीं जब उन्हें कोई काम होता था, वरना वे तो शाम को

जल्दी ही खापी कर अपने कमरे में चली जाती थीं. फिर पीछे दुनिया में कुछ भी होता रहे, उन की बला से. मैं आंखों में बस एक ही अरमान ले कर बड़ी होती रही कि एक दिन तो जरूर ही पापा कहेंगे – तू मेरी बेटी है, मेरी सब से प्यारी बेटी…

Father’s Day Special:अपनाअपना क्षितिज- भाग 1: एक बच्चे के लिए तड़पते सत्यव्रत

प्रशांत को देखते ही प्रभावती की जान में जान आ गई. प्रशांत ने भी जैसे ही मां को देखा दौड़ कर उन के गले लग गया, ‘‘मां, यह कैसी हालत हो गई है तुम्हारी.’’

प्रभावती के गले से आवाज ही न निकली. बहुत जोर से हिचकी ले कर वह फूटफूट कर रो पड़ीं. प्रशांत ने उन्हें रोकने की कोई चेष्टा नहीं की. इस रोने में प्रभावती को विशेष आनंद मिल रहा था. बरसों से इकट्ठे दुख का अंबार जैसे किसी ने धो कर बहा दिया हो.

थोड़ी देर बाद धीरे से  प्रशांत स्वयं हटा और उन्हें बैठाते हुए पूछा, ‘‘मां, पिताजी कहां हैं?’’

‘‘अंदर,’’ वह बड़ी कठिनाई  से बोलीं. एक क्षण को मन हुआ कि कह दें, पिताजी हैं ही कहां. पर जीभ को दांतों से दबा कर खुद को बोलने से रोक लिया. सच बात तो यह थी कि वह अपने जिस पिता के बारे में पूछ रहा था वह तो कब के विदा हो चुके थे. अवकाश ग्रहण के 2 माह बाद ही या एक तरह से सुशांत के पैरों पर खड़ा होते ही उन की देह भर रह गई थी और जैसे सबकुछ उड़ गया था.

अपनी आवाज की एक कड़क से, अपनी भौंहों के एक इशारे से पिताजी का जो व्यक्तित्व इस्पात की तरह सब के सामने  बिना आए ही खड़ा हो जाता था, वह पिताजी अब उसे कहां मिलेंगे.

प्रशांत दूसरे कमरे की ओर बढ़ा तो तुरंत प्रभावती के पैरों पर रजनी आ कर झुक गई और साथ ही 7 बरस का नन्हा प्रकाश. उन्होंने पोते को भींच कर छाती से लगा लिया. मेले में बिछुड़ गए परिवार की तरह वह सब से मिल रही थीं. पूरे 7 साल बाद प्रशांत और रजनी से भेंट हो रही थी. वह प्रकाश को तो चलते हुए पहली बार देख रही थीं. उस की डगमग चाल, तुतलाती बोली, कच्ची दूधिया हंसी, यह सब वह देखसुन नहीं सकी थीं. साल दर साल केवल उस के जन्मदिन पर उन के पास प्रकाश का एक सुंदर सा फोटो आ जाता था औैर उन्हें इतने से ही संतोष कर लेना पड़ता था कि अब मेरा प्रकाश ऐसे दिखाई देने लगा है.

7 साल पहले जब वह कुल 9 माह का था, तभी प्रशांत घर छोड़ कर अपने परिवार को ले कर वहां से दूर बंगलौर चला गया था. इस अलगाव  के पीछे मुख्य कारण था प्रशांत और सुशांत की आपसी नासमझी और उन के पिता द्वारा बोया गया विषैला बीज. सुशांत डाक्टर था और प्रशांत कालिज में शिक्षक. बस, यही अंतर दोनों के मध्य उन के पिता के कारण बड़ा होता चला गया और इतना बड़ा कि फिर पाटा न जा सका.

उन के पिता सत्यव्रत शुरू से ही चाहते थे कि दोनों बच्चे डाक्टर बनें. इस के लिए उन्होंने अपनी सीमित आय की कभी परवा नहीं की. उन का बराबर यही प्रयत्न रहा कि उन के बच्चों को कभी किसी चीज का अभाव न खटके.

सत्यव्रत दफ्तर से लौटने के बाद बच्चों की पढ़ाई  पर ध्यान देते. उन का पाठ सुनते, उन्हें समझाते, उन की गलतियां सुधारते, उन्हें स्वयं नाश्ता परोसते, उन के कपड़े बदलते, बत्ती जलाते, मसहरी लगाते पुस्तकें खोल कर रखते. बच्चे पढ़तेपढ़ते सोने लगते तो पंखा चला देते. दूध का गिलास थमाते. कभी अपने हिस्से का दूध भी दोनों के गिलास में उडे़ल देते. सोचते, ‘बहुत पढ़ते हैं दोनों. गिलास भर दूध से इन का क्या होगा.’

भविष्य के दर्पण में उन्हें 2 डाक्टर बेटों का अक्स दिखाई पड़ता और वह दोगुनेचौगुने गर्व से झूम उठते. अपने इस सपने को बुनने में बस, इसी बात का कोई ध्यान नहीं रखा कि असल में उन के बेटे क्या चाहते हैं. उन की रुचि किस बात में है, डाक्टर बनने में या इंजीनियर अथवा कुछ और बनने में.

सत्यव्रत इस मामले में एक तानाशाह की तरह थे. जो सोच लिया वह बच्चों को पूरा करना ही है. वह सदा यही सोच कर चलते थे, पर ऐसा हो कहां सका. बड़े लड़के प्रशांत को डाक्टर बनने में कोई रुचि  नहीं थी. उस का कविताओं, कहानियों, पेंटिंग, साहित्य में खूब मन लगता था. कई बार वह पढ़ाई  के ही मध्य में आड़ीतिरछी लकीरें खींचता पकड़ा जाता था. कभी रेखागणित की आकृतियां बनातेबनाते पन्ने पर कविता लिखने लगता था.

सत्यव्रत की नजर उस पर पड़ जाती तो जैसे आग में घी पड़ जाता. खूब कस कर धुनाई होती उस की. खाना बंद कर दिया जाता. उसे सोने नहीं दिया जाता. यहां तक कि प्यास से उस का कंठ सूखने लगता, पर वह नल में मुंह नहीं लगा सकता था.

वह अकसर कहा करते, ‘साहित्य, पेंटिंग, कविता भी कोई विषय हैं?’

प्रभावती सन्न रह जातीं. हाथ जोड़ कर कहतीं, ‘मेरे बेटे को इतना मत सताओ.  उस की तो तारीफ होनी चाहिए कि वह इतनी बढि़या कहानियां लिखता है. तुम्हें कब अक्ल आएगी पता नहीं.’

‘कविता, कहानी से पेट नहीं भरता,’ वह चीख कर कहते, ‘जानती हो न कि कितने कवि और लेखक भूखों मरते हैं?’

वह इतने से ही बस न करते. कहते, ‘मैं जानता हूं, तुम्हीं प्रशांत का दिमाग बिगाड़ रही हो. पर अच्छी तरह समझ लो इसे कवि या शिक्षक नहीं, डाक्टर बनना है. इस का भोजन अभी तो एक दिन ही बंद हुआ है, कभी हफ्ते भर भी बंद किया जा सकता है.’

डर से प्रभावती के हाथ फूल जाते, क्या कहें बेटे को. हर व्यक्ति एक ही बात को आसानी से नहीं सीख सकता. किसी के लिए हिसाब आसान है तो किसी के लिए इतिहास. प्रकृति ने सब की समझ का पैमाना एक कहां रखा है? पर वह यह भेद अपने पति को न समझा पातीं. उन्हें  तमाशाई  बन कर चुपचाप सबकुछ देखना, सहना पड़ता.

सब से बुरी हालत तो प्रशांत की हो गईर्र्  थी. अपनी और पिता की इच्छाओं के मध्य वह झूलता रहता था. न वह कविता लिखना छोड़ सकता था न पिता की तमन्ना पूरी करने से पीछे हटना चाहता था. दिनरात किताब उस की आंखों के आगे लगी रहती थी. इस चक्कर में आंखों पर मोटे फे्रम का चश्मा चढ़ गया था. चेहरे की चमक खो गई थी. वह किसी से कुछ कहता नहीं था. बस, भीतर ही भीतर छटपटाता रहता था.

इस के विपरीत सुशांत की आंखोंं के आगे बस, एक ही सपना तैरता रहता था, डाक्टर बनने का. उस के लिए उसे न पिता से मदद लेने की जरूरत थी न मां से. प्रशांत को बड़ी तेजी से पीछे छोड़ता हुआ सुशांत अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था.

Father’s Day Special- मुट्ठीभर स्वाभिमान: भाग 1

15 वर्ष हो चुके थे उसे विदेश में रहते. इसलिए इन खोखली औपचारिकताओं से उसे सख्त परहेज था. चाचा से मालूम हुआ कि अंतिम संस्कार के लिए रुपयों का प्रबंध करना है, दीनानाथजी की जेब से कुल 270 रुपए मिले हैं और अलमारी में ताला बंद है, जिसे खोलने का हक केवल सुकांत को है.

पड़ोस के घर से चाय बन कर आ गई थी, किंतु सुकांत ने पीने से मना कर दिया. अपने बाबूजी के मृतशरीर के पास खामोश बैठा उन्हें देखता रहा. उन के ढके चेहरे को खोलने का उस में साहस नहीं हो रहा था. जिस जीवंत पुरुष को सदा हंसतेहंसाते ही देखा हो, उस का भावहीन, स्पंदनहीन चेहरा देखने की कल्पना मर्मांतक थी. सुकांत ने अपने बटुए से 200 डौलर निकाल कर चाचा के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘इन्हें आप बैंक से रुपयों में भुना कर अंतिम संस्कार के सामान का इंतजाम कर लीजिए.’’

‘‘तुम नहीं चलोगे सामान लेने?’’

‘‘आप ही ले आइए, चाचा,’’ सिर झुकाए धीमे स्वर में बोला सुकांत.

‘‘ठीक है,’’ कह कर चाचा पड़ोस के व्यक्तियों को साथ ले कर चले गए.

घर में घुसने के बाद से ले कर अब तक पलपल सुकांत को मां का चेहरा हर ओर नजर आ रहा था. अपने बचपन को यहीं छोड़ कर वह जवानी की जिस अंधीदौड़ में शामिल हो विदेश जा बसा था, वह उसे बहुत महंगी पड़ी. लेकिन कभीकभी अपने ही लिए फैसलों को बदलना कितना कठिन हो जाता है.

पास ही बैठी चाची बीचबीच में रो पड़ती थीं. किंतु सुकांत की आंखों में आंसू नहीं थे. वह एक सकते की सी हालत में था. 2 वर्षों पूर्व जब मां का देहांत हुआ था तो वह आ भी न पाया था. अंतिम बार मां का मुख न देख पाने की कसक अभी भी उस के हृदय में बाकी थी. उस समय वह ट्रेनिंग के सिलसिले में जरमनी गया हुआ था. पत्नी भी घूमने के लिए साथ ही चली गई थी. दीनानाथजी फोन पर फोन करते रहे. घंटी बजती रहती पर कौन था जो उठाता. खत और तार भी अनुत्तरित ही रहे.

पत्नी के शव को बर्फ की सिल्लियों पर रखे 2 दिनों तक दीनानाथजी प्रतीक्षा करते रहे कि शायद कहीं से सुकांत का कोई संदेश मिले. फिर निराश, निरुपाय दीनानाथजी ने अकेले ही पत्नी का दाहसंस्कार किया और खामोशी की एक चादर सी ओढ़ ली.

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जरमनी से वापस आ कर जब सुकांत को अपने बाबूजी का पत्र मिला तो वह दुख के आवेग में मानो पागल हो उठा कि यह क्या हो गया, कैसे हो गया. उस के दिमाग की नसें मानो झनझना उठीं. मां के प्रति बेटा होने का अपना फर्ज भी वह पूरा न कर पाया. उस का हताश मन रो उठा. किंतु अब भारत जाने का कोई अर्थ नहीं बनता था. सो, एक मित्र को उस के घर पर फोन कर के सुकांत ने उस से आग्रह किया कि वह वापसी में बाबूजी को अपने साथ ले आए. न चाहते हुए भी दीनानाथजी चले गए.

बेटे का आग्रह ठुकरा न सके. पत्नी के इस आकस्मिक निधन पर अपनेआप को बहुत असहाय सा पा रहे थे. बेटे के पास पहुंच उस की बांहों में मुंह छिपा कर रो लेने का मन था उन का. बेटे के सिवा और कौन बांट सकता था उन के इस दुख को?

चले तो गए, किंतु वहां अधिक दिन रह न सके. बुढ़ापे की कुछ अपनी समस्याएं होती हैं, जिस तरह बच्चों की होती हैं. पहले तो हमेशा पत्नी साथ होती थी, जो उन की हर जरूरत का ध्यान रखती थी. किंतु अब कौन रखता? सुबह 4 बजे जब आंख खुलती और चाय की तलब होती तो चुपचाप मुंह ढांप कर सोए रहते.

पत्नी साथ आती थी तो बिना आहट किए दबे पांव जा कर रसोई से चाय बना कर ले आती थी. किंतु अब जब एक बार उन्होंने खुद सुबह चाय बनाने की कोशिश की थी तो बरतनों की खटपट से बेटाबहू दोनों जाग कर उठ आए थे और दीनानाथजी संकुचित हो कर अपने कमरे में लौट गए थे. फिर दोपहर होते न होते बड़े तरीके से बहू ने उन्हें समझा भी दिया, ‘बाबूजी, मैं उठ कर चाय बना दिया करूंगी.’

और उस के बाद दीनानाथजी ने दोबारा रसोई में पांव नहीं रखा. बहू कितनी भी देर से सो कर क्यों न उठे, वे अपने कमरे में ही चाय का इंतजार करते रहते थे.

सुकांत अपने काम में अत्यधिक व्यस्त रहता था. घर में दीनानाथजी बहू के साथ अकेले ही होते थे. उन की इच्छा होती कि बेटी समान बहू उन के  पास बैठ कर दो बातें करे क्योंकि पत्नी की मृत्यु का घाव अभी हरा था और उसे मरहम चाहिए था, किंतु ऐसा न हो पाता. 2-4 मिनट उन के पास बैठ कर ही बहू किसी न किसी बहाने से उठ जाती और दीनानाथजी अपनेआप को अखबार व किताबों में डुबो लेते. वे परिमार्जित रुचियों के व्यक्ति थे. बेटे ने भी उन से विरासत में शालीन संस्कार ही पाए थे. सो, किताबों से कितनी ही अलमारियां भरी पड़ी थीं.

अपने दफ्तर की ओर से सुकांत को फिर 1 महीने के लिए जरमनी जाना था और सदा की तरह इस बार भी उस की पत्नी शांता साथ जाना चाहती थी. वह सुकांत के बिना 1 महीना रहने को तैयार न थी. रात की निस्तब्धता में दीनानाथजी के कानों में बहू एवं सुकांत के बीच चल रही तकरार के कुछ शब्द पड़े, ‘बाबूजी को इस अवस्था में यहां अकेले छोड़ना उचित है क्या?’ सुकांत का स्वर था.

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बंद कमरे में हुई बाबू दीनानाथ की मृत्यु रिश्तेदारों व महल्ले वालों को आश्चर्य व सदमे की हालत में छोड़ गई थी. स्वभाव से ही हंसमुख व्यक्ति थे दीनानाथ. रोज सुबहसुबह ही घर के सामने से निकलते हर जानपहचान वाले का हालचाल पूछना व एकाध को घर ले आ कर पत्नी को चाय के लिए आवाज देना उन की दिनचर्या में शामिल था. पैसे से संपन्न भी थे. किंतु 2 वर्ष पूर्व पत्नी के निधन के बाद वे एकदम खामोश हो गए थे. महल्ले वाले उन का आदर करते थे. सो, कोई न कोई हालचाल पूछने आताजाता रहता. किंतु सभी महसूस करते थे कि बाबू दीनानाथ ने अपनेआप को मानो अपने अंदर ही कैद कर लिया था. शायद पत्नी की असमय मृत्यु के दुख से सदमे में थे. 70 वर्ष की आयु में अपने जीवनसाथी से बिछुड़ना वेदनामय तो होता ही है, स्मृतियों की आंधी भी मन को मथती रहती है. पीड़ा के दंश सदा चुभते रहते हैं.

जब तक पत्नी जिंदा थी, बेटे के बुलाने पर वे अमेरिका भी जाते थे, किंतु वापस लौटते तो बुझेबुझे से होते थे. जिस मायानगरी की चमकदमक औरों के लिए जादू थी, वह उन्हें कभी रास न आई. वापस अपने देश पहुंच कर ही वे चैन की सांस लेते थे. अपने छोटे से शांत घर में पहुंच कर निश्ंिचत हो जाते. किंतु अब यों उन का आकस्मिक निधन, वह भी इस तरह अकेले बंद कमरे में, सभी अपनेअपने ढंग से सोच रहे थे. सब से अधिक दुखी थे योगेश साहब, जो दीनानाथजी के परममित्र थे.

दीनानाथजी के छोटे भाई ने फोन पर यह दुखद समाचार अपने भतीजे को दिया. फिर मृतशरीर को बर्फ पर रखने की तैयारी शुरू कर दी. वे जानते थे कि उन के भतीजे सुकांत को तुरंत चल पड़ने पर भी आने में 2 दिन लगने ही थे.

हवाईअड्डे पर हाथ में एक छोटी अटैची थामे सुकांत इधरउधर देख रहा था कि शायद उस के घर का कोई लेने आया होगा, लेकिन किसी को न पा कर वह टैक्सी ले कर चल पड़ा. घर के सामने काफी लोग जमा थे. कुछ उसे पहचानते थे, कुछ नहीं. आज 7 वर्षों के बाद वह आया था. अंदर पहुंच कर नम आंखों से उस ने चाचा के पांव छुए.

‘‘बहू और बिटिया को नहीं लाए बेटा?’’ चाचा ने पूछा.

‘‘जी, नहीं. इतनी जल्दी सब का आना कठिन था,’’ सुकांत ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

आंखों से पल्लू लगाए रोने का अभिनय सा करती चाची ने आगे आ कर सुकांत को गले लगाना चाहा, किंतु वह उन के पांव छू कर पीछे हट गया.

एक से बढ़कर एक- भाग 1: दामाद सुदेश ने कैसे बदली ससुरजी की सोच

दरवाजेकी बैल बजाने के बजाय दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर और आने वाली की पुकार सुन कर मैं सम झ गया कि कौन आया है. मैं ने कहा, ‘‘अरे भई जरा ठहरो… मैं आ रहा हूं,’’ बैठेबैठे ही मैं ने आने वाले से कहा.

यह सुन कर मेरी पत्नी बोली, ‘‘लगता है भाई साहब आए हैं,’’ कहते हुए उस ने ही दरवाजा खोल दिया.

‘‘आइए भाई साहब, बहुत दिनों बाद आज हमारी याद आई है.’’

‘‘भाभीजी, मैं आज एक खास काम से आप के पास आया हूं. लेकिन पहले चाय पिलाइए.’’

नंदा से चाय की फरमाइश की है तो मैं सम झ गया कि आज जरूर उस का कोई काम है. मैं ने अपने सामने रखे सारे कागजात उठा कर रख दिए, क्योंकि उस के आने की मु झे भी बड़ी खुशी हुई थी.

‘‘हां. बोलो क्या काम है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘देखो राजाभाई, मैं चित्रा की शादी पक्की करने जा रहा हूं. लड़का अच्छा है और घरबार भी ठीकठाक है… मु झे रुपयों की कोई कमी नहीं है. मेरी सिर्फ 2 बेटियां हैं. मेरा सबकुछ उन्हीं का तो है. मैं उन्हें बहुत कुछ दूंगा. सच है कि नहीं? फिर भी लड़के की ज्यादा जानकारी तो मालूम करनी ही पड़ेगी और वही काम ले कर मैं तुम्हारे पास आया हूं.’’

दादाजी की बेटी चित्रा सचमुच बहुत सुंदर और भली लड़की थी. अमीरी में पल कर भी बहुत सीधीसादी थी. हम दोनों को हमेशा यही सवाल सताता कि चित्रा की मां बड़े घर की बेटी. मायके से खूब धनदौलत ले कर आई थी और हमेशा अपना बड़प्पन जताने वाली. उस की पढ़ाईलिखाई ज्यादा नहीं हुई थी और उसे न कोई शौक था, न किसी कला का ज्ञान. वह अपनी अमीरी के सपनों में खोने वाली और इसीलिए उस की मेरी पत्नी से जमी नहीं.

‘‘देख, राजाभाई, मेरे पास दौलत की कोई कमी नहीं है और मेरी बेटी भी अच्छी है. तो हमें अच्छा दामाद तो मिलना ही चाहिए.’’

‘‘हां भई हां. तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो. तुम्हारा देखा हुआ लड़का जरूर अच्छा ही होगा.’’

मैं उस के शब्द सुन कर चौंक पड़ा. बार रे बाप. क्या मैं फिर से ऐसे ही फंसूंगा? मेरे मन में विचार आया.

‘‘राजाभाई, लड़का तुम्हारी जानकारी में है. तुम्हारी चचेरी साली का बेटा, जो सदाशिव पेठ में रहता है.’’

इस पर मैं ने और नंदा ने एकदूसरे की तरफ देखा. हाल ही में हम ने एक शादी तय करने में योगदान दिया था. अब इस दोस्त से क्या कहूं? मैं वैसे ही उठ खड़ा हुआ और सुदेश का खत अलमारी से निकाल कर उसे दे दिया.

‘‘दादाजी, तुम्हारी चित्रा की शादी तय हो रही है, यह सुन कर हम दोनों को बहुत खुशी हो रही है. चित्रा बड़ी गुणी लड़की है. अत: उसे अच्छी ससुराल मिलनी चाहिए यही हमारी भी तमन्ना है. लेकिन अब पहले जैसी परिस्थितियां नहीं रही है. आजकल हर घर में 1-2 बच्चे… अपनी बच्चियों को मांबाप खूब धनदौलत देते हैं. तुम्हारे जैसे धनवान सिर्फ देते ही नहीं, बल्कि उस का बोलबोला भी करते हैं.

‘‘बारबार कह कर दिखाते हैं कि हम ने बेटी को इतना दिया, उतना दिया. यह बात किसी को पसंद आती है तो किसी को नहीं और लगता है कि उस का अपमान किया जा रहा है. इस पर वे क्या करते हैं, वह अब तुम्हीं इस खत में पढ़ लो. मैं क्या कहना चाहता हूं वह तुम सम झ जाओगे-

‘‘माननीय काकाजी को नमस्कार. मैं यह पत्र जानबू झ कर लिख रहा हूं, क्योंकि आज या कल कुछ बातें आप को मालूम होंगी, तो उस के कारण आप को पहले ही ज्ञात कराना चाहूंगा. पिछले कुछ दिनों से मैं बहुत परेशान हूं. फिर आप कहेंगे कि पहले क्यों नहीं बताया. जो कुछ घटित हुआ है उस समस्या का हल मु झे ही निकालना था.

‘‘हो सकता है मेरा निकाला हुआ हल आप को पसंद न आए. आप को कोई दोष न दे, यही मेरी इच्छा है. आप ने हमारी शादी तय करने में बड़ा योगदान दिया है. वैसे शादियां तय कराना आप का सामाजिक कार्य है. लेकिन कभीकभी ऐसा भी हो सकता है यह बतलाने के लिए ही यह पत्र लिख रहा हूं.

‘‘शादी के बाद मैं अपनी पत्नी के साथ उस के मायके जाया करता था. लेकिन हर बार किसी न किसी कारण वहां से नाराज हो कर ही लौटता था.

यही सच है- भाग 1: आखिर क्या थी वह त्रासदी?

उस ने एक बार फिर सत्या के चेहरे को देखा. कल से न जाने कितनी बार वह इस चेहरे को देख चुकी है. दोपहर से अब तक तो वह एक मिनट के लिए भी उस से अलग हुई ही न थी. बस, चुपचाप पास में बैठी रही थी. दोनों एकदूसरे से नजरें चुरा रही थीं. एकदूसरे की ओर देखने से कतरा रही थीं.

सत्या का चेहरा व्यथा और दहशत से त्रस्त था. वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी बेटी को किस तरह दिलासा दे. उस के साथ जो कुछ घट गया था, अचानक ही जैसे उस का सबकुछ लुट गया था. वह तकिए में मुंह छिपाए बस सुबकती रही थी. सबकुछ जाननेसमझने के बावजूद उस ने सत्या से न तो कुछ कहा था न पूछा था. ऐसा कोई शब्द उस के पास नहीं था जिसे बोल कर वह सत्या की पीड़ा को कुछ कम कर पाती और इस विवशता में वह और अधिक चुप हो गई थी.

जब रात घिर आई, कमरे में पूरी तरह अंधेरा फैल गया तो वह उठी और बत्ती जला कर फिर सत्या के पास आ खड़ी हुई, ‘‘कुछ खा ले बेटी, दिनभर कुछ नहीं लिया है.’’

‘‘नहीं, मम्मी, मुझे भूख नहीं है. प्लीज आप जाइए, सो जाइए,’’ सत्या ने कहा और चादर फैला कर सो गई.

कुछ देर तक उसी तरह खड़ी रहने के बाद वह कमरे से निकल कर बालकनी में आ खड़ी हुई. उस के कमरे का रास्ता बालकनी से ही था अपने कमरे में जाने से वह डर रही थी. न जाने कैसी एक आशंका उस के मन में भर गई थी.

आज दोपहर को जिस तरह से लिथड़ीचिथड़ी सी सत्या आटो से उतरी थी और आटो का भाड़ा दिए बिना ही भाग कर अपने कमरे में आ गई थी, वह सब देख कर उस का मन कांप उठा था. सत्या ने उस से कुछ कहा नहीं था, उस ने भी कुछ पूछा नहीं था. बाहर निकल कर आटो वाले को उस ने पैसे दिए थे.

आटो वाला ही कुछ उदासउदास स्वर में बोला था, ‘‘बहुत खराब समय है बीबीजी, लगता है बच्ची गुंडों की चपेट में आ गई थी या फिर…रिज के पास सड़क पर बेहाल सी बैठी थी. किसी तरह घर तक आई है…इस तरह के केस को गाड़ी में बैठाते हुए भी डर लगता है. पुलिस के सौ लफड़े जो हैं.’’

पैसे दे कर जल्दी से वह घर के भीतर घुसी. उसे डर था, आटो वाले की बातें आसपास के लोगों तक न पहुंच जाएं. ऐसी बातें फैलने में समय ही कितना लगता है. वह धड़धड़ाती सी सत्या के कमरे में घुसी. सत्या बिस्तर पर औंधी पड़ी, तकिए में मुंह छिपाए हिचकियां भर रही थी. कुछ देर तक तो वह समझ ही न पाई कि क्या करे, क्या कहे. बस, चुपचाप सत्या के पास बैठ कर उस का सिर सहलाती रही. अचानक सत्या ही उस से एकदम चिपक गई थी. उसे अपनी बांहों से जकड़ लिया था. उस की रुलाई ने वेग पकड़ लिया था.

‘‘ममा, वे 3 थे…जबरदस्ती कार में…’’

सत्या आगे कुछ बोल नहीं पाई, न बोलने की जरूरत ही थी. जो आशंकाएं अब तक सिर्फ सिर उठा रही थीं, अब समुद्र का तेज ज्वार बन चुकी थीं. उस का कंठ अवरुद्ध हो आया, आंखें पनीली… परंतु अपने को संभालते हुए बोली, ‘‘डोंट वरी बेटी, डोंट वरी…संभालो अपने को… हिम्मत से काम लो.’’

कहने को तो कह दिया, सांत्वना भरे शब्द, किंतु खुद भीतर से वह जिस तरह टूटी, बिखरी, यह सिर्फ वह ही समझ पाई. जिस सत्या को अपने ऊपर अभिमान था कि ऐसी स्थिति में आत्मरक्षा कर पाने में वह समर्थ है, वही आज अपनी असमर्थता पर आंसू बहा रही थी. बेटी की पीड़ा ने किस तरह उसे तारतार कर दिया था, दर्द की कितनी परतें उभर आई थीं, यह सिर्फ वह समझ पा रही थी, बेटी के सामने व्यक्त करने का साहस नहीं था उस में.

सत्या इस तरह की घटनाओं की खबरें जब भी अखबार में पढ़ती, गुस्से से भर उठती, ‘ये लड़कियां इतनी कमजोर क्यों हैं? कहीं भी, कोई भी उन्हें उठा लेता है और वे रोतीकलपती अपना सबकुछ लुटा देती हैं? और यह पुलिस क्या करती है? इस तरह सरेआम सबकुछ हो जाता है और…’

वह सत्या को समझाने की कोशिश करती हुई कहती, ‘स्त्री की कमजोरी तो जगजाहिर है बेटी. इन शैतानों के पंजे में कभी भी कोई भी फंस सकता है.’

‘माई फुट…मैं तो इन को ऐसा मजा चखा देती…’

यही सच है : आखिर क्या थी वह त्रासदी?

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