Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना

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Father’s Day Special- बेटी : पापा के प्यार को तरसती मरियम

जब वह छोटी थी, तो मां यह कह कर उसे बहला दिया करती थी कि पापा परदेश में नौकरी कर रहे हैं और उस के लिए ढेर सारा पैसा ले कर आएंगे. लेकिन मरियम अब बड़ी हो गई थी और स्कूल जाने लगी थी. एक बार मरियम ने मां से कहा, ‘‘मम्मी, न तो पापा खुद आते हैं, न ही कभी उन का फोन आता है. क्या वे हम से नाराज हैं?’’

मरियम के इस सवाल पर फिरदौस कहतीं, ‘‘नहीं बेटी, तुम्हारे पापा तो दुनिया में सब से अच्छे पापा हैं. वे हम लोगों से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन वे जहां नौकरी करते हैं, वहां छुट्टी नहीं मिलती है, इसीलिए आ नहीं पाते हैं.’’

मां की बातों से मरियम को तसल्ली तो मिल जाती, लेकिन पिता की याद कम नहीं हो पाती थी. समय हवा के झोंके की तरह बीतता रहा. मरियम अब 5वीं जमात की एक समझदार बच्ची बन चुकी थी. एक दिन स्कूल की छुट्टी के समय मरियम ने देखा कि उस के स्कूल की एक छात्रा सुमन ने दौड़ कर अपने पापा के गले से लिपट कर कहा कि आज हम पहले आइसक्रीम खाएंगे, उस के बाद घर जाएंगे. यह देख कर मरियम को अपने पापा की याद बहुत आई. वह स्कूल से घर आई, तो बगैर कुछ खाएपीए सीधे अपने कमरे में जा कर लेट गई. घर के काम निबटा कर फिरदौस मरियम के पास आ कर बैठ गईं और उस के काले खूबसूरत बालों में हाथ से कंघी करते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आज हमारी बेटी कुछ उदास लग रही है?’’ फिरदौस का इतना पूछना था कि मरियम फफक कर रो पड़ी, ‘‘मम्मी, आप मुझ से झूठ बोलती हैं न कि पापा दुबई में नौकरी करते हैं? अगर वे दुबई में हैं, तो फोन पर हम लोगों से बात क्यों नहीं करते हैं?’’

अब फिरदौस के लिए सचाई को छिपा कर रख पाना बहुत मुश्किल हो गया.

‘‘अच्छा, पहले तुम खाना खा लो. आज मैं तुम्हें सबकुछ सचसच बता दूंगी,’’ कहते हुए फिरदौस मरियम के लिए खाना लेने चली गईं. जब फिरदौस खाना ले कर कमरे आईं, तो मरियम ने उन से कहा, ‘‘मम्मी, आप को पापा के बारे में जोकुछ बताना है, बताती जाइए. मैं खाना खाती हूं.’’

‘‘बेटी, तुम्हारे पापा इंजीनियर थे और दुबई में नौकरी करते थे. मैं भी उन्हीं के साथ रहती थी.’’

‘‘मम्मी, आप बारबार ‘थे’ शब्द का क्यों इस्तेमाल कर रही हैं? क्या पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं?’’ इतना कह कर वह रोने लगी.

‘‘नहीं बेटी, पापा जिंदा हैं.’’

मरियम तुरंत आंसू पोंछ कर चुप हो गई. उसे डर था कि कहीं मम्मी सचाई बताए बगैर चली न जाएं. फिरदौस ने बात का सिलसिला फिर से शुरू करते हुए कहा, ‘‘12 साल पहले की बात है, जब तुम्हारे पापा और मैं दुबई से भारत आए थे. हम दोनों ही बहुत खुश थे, लेकिन हमें क्या पता था कि इस के बाद हम सब एक ऐसी मुसीबत में पड़ जाएंगे, जिस से छुटकारा पाना नामुमकिन हो जाएगा.’’

‘‘शहर में दंगा हो गया. हिंदू और मुसलमान एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे. ‘‘जैसेतैसे कर के जब फसाद थोड़ा थमा, तो हम दुबई जाने के लिए तैयार हो गए. यह भी एक अजीब इत्तिफाक था कि जिस दिन हमारी फ्लाइट थी, उसी दिन शहर में बम धमाके हो गए. इस में काफी लोगों की जानें चली गईं. ‘‘हम लोग दुबई तो पहुंच गए, लेकिन भारत से आने वाली हर खबर बड़ी संगीन थी. बम धमाकों के अपराधियों में तुम्हारे पापा का नाम भी आ रहा था.

‘‘तुम्हारे पापा को यह बात नामंजूर थी कि उन्हें कोई देशद्रोही या आतंकवादी समझे. उन्होंने किसी तरह भारत में रहने वाले अपने घरपरिवार और दोस्तों के जरीए पुलिस तक यह बात पहुंचाई कि वे बेकुसूर हैं और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए भारत आना चाहते हैं. कुछ दिनों के बाद तुम्हारे पापा भारत आ गए. ‘‘फिर वही हुआ, जिस का डर था. पुलिस ने हाथ आए तुम्हारे बेगुनाह मासूम पापा को उन बम धमाकों का मास्टरमाइंड बना कर जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया.

‘‘पिछले 12 सालों से तुम्हारे पापा जेल में हैं,’’ इतना कह कर फिरदौस फूटफूट कर रोने लगीं.

मरियम ने किसी संजीदा शख्स की तरह पूछा, ‘‘क्या मैं अपने पापा से मिल सकती हूं?’’

‘‘हां बेटी, जरूर मिल सकती हो,’’ फिरदौस ने जवाब दिया, ‘‘मैं हर रविवार को तुम्हारे पापा से मिलने जेल जाती हूं. अब तुम भी मेरे साथ चल सकती हो.’’ 12 साल की बेटी जब सामने आई, तो शहजाद ने अपना चेहरा छिपा लिया. अपनी बेटी के सामने वे एक अपराधी की तरह जेल की सलाखों के पीछे खड़े हो कर जमीन में धंसे जा रहे थे.

‘‘पापा, क्या आप सचमुच अपराधी हैं?’’ मरियम के इस सवाल पर शहजाद घबरा गए.

‘‘बेटी, तुम्हारे पापा बेकुसूर हैं. उन्होंने कोई जुर्म नहीं किया है. बस, हालात ने जेल की सलाखों के पीछे ला कर खड़ा कर दिया है,’’ इतना कह कर शहजाद बेटी की तरफ देखने लगे.

‘‘पापा, आप निश्चिंत हो जाइए. चाहे सारी दुनिया आप को अपराधी समझे, पर बेटी की नजर में आप एक ईमानदार नागरिक और देशभक्त रहेंगे.’’ अब मरियम हर रविवार को अपने पापा से मिलने जेल जाने लगी. वह जब भी पापा से मिलने जाती, तो उन की पसंद की खाने की कोई न कोई चीज बना कर ले जाती और अपने हाथों से खिलाती. बापबेटी की इस मुलाकात को 10 साल और गुजर गए. 22 साल की मरियम अब स्कूल से निकल कर कालेज में जाने लगी थी.

पिछले 10 सालों से जेल का पूरा स्टाफ पिता और बेटी का मुहब्बत भरा मेलमिलाप बड़े शौक से देखता चला आ रहा था. शहजाद ने अपनी जिंदगी के 22 साल जेल में कुछ इस तरह बिता दिए कि दुश्मन भी दोस्त बन गए. अनपढ़ कैदियों को पढ़ाना, बीमार कैदियों की सेवा करना व जरूरतमंद कैदियों की मदद करने की आदत ने उन्हें जेल में मशहूर बना दिया था. कानून अंधा होता है, यह सिर्फ कहावत ही नहीं, बल्कि सच भी है. वह उतना ही देखता है, जितना उसे दिखाया जाता है. कानून के रखवालों ने शहजाद को एक आतंकवादी बना कर पेश किया था. उन के खिलाफ जो तानाबाना बुना गया, वह इतना मजबूत था कि इस अपराध से छुटकारा पाना उन के लिए नामुमकिन हो गया. वैसे भी जिस पर आतंकवाद का ठप्पा लग जाए, फिर उस की सुनता कौन है? शहजाद के साथ मुल्क के नामीगिरामी वकील थे, लेकिन सब मिल कर भी उन्हें बेगुनाह साबित करने में नाकाम रहे.

निचली अदालत से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक ने मौत की सजा को बरकरार रखा. मरियम और फिरदौस की दया की अपील को राष्ट्रपति महोदय ने भी ठुकरा दिया. फांसी की तारीख तय हो गई. सुबह 4 बजे शहजाद को फांसी दी जानी थी. मरियम और फिरदौस के साथ जेल के कैदी भी उदास थे. फिरदौस और मरियम आखिरी दीदार के लिए शहजाद की कोठरी में भेजे गए. बेटी और बीवी को देख शहजाद की आंखों की वीरानी और बढ़ गई. मरियम ने बाप की हालत देख कर कहा, ‘‘पापा, आप की मौत का हम लोग जश्न मनाएंगे. लीजिए, आखिरी बार बेटी के हाथ की बनी खीर खा लीजिए.’’

शहजाद एक फीकी मुसकराहट के साथ करीब आए, तो मरियम ने अपने हाथों से उन्हें खीर खिलाई. 2 चम्मच खीर खाने के बाद ही शहजाद का चेहरा जर्द पड़ने लगा. मुंह से खून की उलटी शुरू हो गई. शहजाद को उलटी करते देख जहां फिरदौस घबरा गईं, वहीं मरियम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘पापा, आप की बेगुनाही तो साबित न करा सकी, लेकिन आप को फांसी से बचा लिया.

‘‘अब दुनिया यह न कह सकेगी कि आतंकवाद के अपराध में शहजाद को फांसी पर लटका दिया गया. आप को इज्जत की जिंदगी तो न मिल सकी, पर हां, इज्जत की मौत जरूर मिल गई.’’ फिरदौस की चीख सुन कर जब तक पहरेदार शहजाद की खबर लेते, तभी मरियम ने भी जहरीली खीर के 2 चम्मच खा लिए. जेल की उस काल कोठरी में अब 2 लाशें पड़ी थीं. एक को अदालत ने आतंकवादी होने की उपाधि दी थी, तो दूसरी को समाज ने आतंकवादी की बेटी करार दिया था. दोनों ही समाज और दुनिया से अब आजाद हो चुके थे.

Father’s Day Special- उलटी धारा: हामिद शाह ने अपनी बेटी की जान कैसे बचाई?

यह बात आग की तरह पूरी बस्ती में फैल चुकी थी. सारा महल्ला गुस्से में था और हामिद शाह को खरीखोटी सुना रहा था.  बाय यह थी कि हामिद शाह अपनी बेटी कुलसुम को संभाल नहीं सके और कैसे उस ने एक हिंदू लड़के के साथ शादी कर ली. मौलवीमुल्ला सभी इकट्ठा हो कर एकसाथ मिल कर उन पर हमला बोल रहे थे. एक हिंदू लड़के से शादी कर के मजहब को बदनाम किया.

हामिद शाह का पूरा परिवार आंगन में खड़ा हो कर सब की जलीकटी बातें सुन रहा था. उन के खिलाफ जबान से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था. मगर बस्ती के कुछ मुसलिम समझदार भी थे, जो इसे गलत नहीं बता रहे थे, मगर ऐसे लोगों की तादाद न के बराबर थी.

भीड़ बड़ी गुस्से में थी खासकर नौजवान. वे कुलसुम को वापस लाने की योजना बनाने लगे. मगर हामिद शाह इस की इजाजत नहीं दे रहे थे, इसीलिए उन से सारी भीड़ नाराज थी. वे किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे.

धीरेधीरे सारी भीड़ अपने घरों में चली गई. हामिद शाह भी अपनी बैठक में आ गए. साथ में उन की बेगम नासिरा बी, दोनों बेटेबहुएं बैठे हुए थे.

नासिरा बी सन्नाटे को तोड़ते हुए बोलीं, ‘‘करमजली कुलसुम मर क्यों न गई. इस कलमुंही की वजह से ये दिन देखने पड़े. यह सब आप की वजह से हुआ. न उसे इतनी छूट देते, न वह एक हिंदू लड़के से शादी करती. नाक कटा दी उस ने जातबिरादरी में. देखो, पूरा महल्ला बिफर पड़ा. कैसीकैसी बातें कह रहे थे और आप कानों में तेल डाल कर चुपचाप गूंगे बन कर सुनते रहे.

‘‘अरे, अब भी जबान तालू में क्यों चिपक गई,’’ मगर हामिद शाह ने कोई जवाब नहीं दिया. उन की आंखें बता रही थीं कि उन्हें भी अफसोस है.

‘‘अब्बा, अगर आप कहें तो उस कुलसुम को उस से छुड़ा कर लाता हूं. आग लगा दूंगा उस घर में,’’ छोटा बेटा उस्मान अली गुस्सा हो कर बोला.

‘‘नहीं उस्मान, ऐसी भूल कभी मत करना,’’ आखिर हामिद शाह अपनी जबान खोलते हुए बोले. पलभर रुक कर वे आगे बोले, ‘‘इस में मेरी भी रजामंदी थी. कुलसुम को मैं ने बहुत समझाया था. मगर वह जिद पर अड़ी रही, इसलिए मैं ने फिर इजाजत दे दी थी.’’

‘‘यह आप ने क्या किया अब्बा?’’ नाराज हो कर उस्मान अली बोला.

‘‘उस्मान, अगर मैं इजाजत नहीं देता, तो कुलसुम खुदकुशी कर लेती. यह सारा राज मैं ने छिपा कर रखा था.’’

‘‘आप ने मुझे नहीं बताया,’’ नासिरा बी चिल्ला कर बोलीं, ‘‘सारा राज छिपा कर रखा. अरे, बस्ती के लड़कों को ले जाते उस के घर में और आग लगा देते. कैसे अब्बा हो आप, जो अपनी बेगम को भी नहीं बताया.’’

‘‘कैसी बात करती हो बेगम, ऐसा कर के शहर में दंगा करवाना चाहती थी क्या?’’ हामिद शाह बोले.

‘‘अरे, इतनी बड़ी बात तुम ने छिपा कर रखी. मुझे हवा भी नहीं लगने दी. अगर मुझ से कह देते न तो उस की टांग तोड़ कर रख देती. यह सब ज्यादा पढ़ाने का नतीजा है. मैं ने पहले ही कहा था, बेटी को इतना मत पढ़ाओ. मगर तुम ने मेरी कहां चलने दी. चलो, पढ़ाने तक तो ठीक था. नौकरी भी लग गई,’’ गुस्से से उफन पड़ीं नासिरा बी, ‘‘आखिर ऐसा क्यों किया आप ने? क्यों छूट दी उस को?’’

‘‘देखो बेगम, तुम चुप हो तो मैं तुम्हें सारा किस्सा सुनाऊं,’’ कह कर पलभर को हामिद शाह रुके, फिर बोले, ‘‘तुम तो आग की तरह सुलगती जा रही हो.’’

‘‘हां कहो, अब नहीं सुलगूंगी,’’ कह कर नासिरा बी खामोश हो गईं. तब हामिद शाह ने सिलसिलेवार कहानी सुनानी शुरू की, लेकिन उस से पहले उन के घर के हालात से आप को रूबरू करा दें.

हामिद शाह एक सरकारी मुलाजिम थे. वे 10 साल पहले ही रिटायर हुए थे. कुलसुम से बड़े 2 भाई थे. दोनों की साइकिल की दुकान थी. सब से बड़े का नाम मोहम्मद अली था, जिस के 5 बच्चे थे. छोटे भाई का नाम उस्मान अली था, जिस के 3 बच्चे थे.

कुलसुम से बड़ी 3 बहनें थीं, जिन की शादी दूसरे शहरों में हो चुकी थी. कुलसुम सब से छोटी थी और सरकारी टीचर थी.

कुलसुम जब नौकरी पर लग गई थी, तब उस के लिए जातबिरादरी में लड़के देखना शुरू किया था. शाकिर मियां के लड़के अब्दुल रहमान से बात तकरीबन तय हो चुकी थी. लड़का भी कुलसुम को आ कर देख गया था और उसे पसंद भी कर गया था. मगर कुलसुम ने न ‘हां’ में और न ‘न’ में जवाब दिया था.

एक दिन घर में कोई नहीं था, तब हामिद शाह ने कुलसुम से पूछा, ‘‘कुलसुम, तुम ने जवाब नहीं दिया कि तुम्हें अब्दुल रहमान पसंद है कि नहीं. अगर तुम्हें पसंद है तो यह रिश्ता पक्का कर दूं?’’

मगर 25 साल की कुलसुम अपने अब्बा के सामने चुपचाप खड़ी रही. उस के मन के भीतर तो न जाने कैसी खिचड़ी पक रही थी. उसे चुप देख हामिद शाह फिर बोले थे, ‘‘बेटी, तुम ने जवाब नहीं दिया?

‘‘अब्बा, मुझे अब्दुल रहमान पसंद नहीं है,’’ इनकार करते हुए कुलसुम बोली थी.

‘‘क्यों मंजूर नहीं है, क्या ऐब है उस में, जो तू इनकार कर रही है?’’

‘‘क्योंकि, मैं किसी और को चाहती हूं,’’ आखिर कुलसुम मन कड़ा करते हुए बोली थी.

‘‘किसी और का मतलब…?’’ नाराज हो कर हामिद शाह बोले थे, ‘‘कौन है वह, जिस से तू निकाह करना चाहती है?’’

‘‘निकाह नहीं, मैं उस से शादी करूंगी.’’

‘‘पर, किस से?’’

‘‘मेरे स्कूल में सुरेश है. मैं उस से शादी कर रही हूं. अब्बा, आप अब्दुल रहमान क्या किसी भी खान को ले आएं, मैं सुरेश के अलावा किसी से शादी नहीं करूंगी,’’ कह कर कुलसुम ने हामिद शाह के भीतर हलचल मचा दी थी.

हामिद शाह गुस्से से बोले थे, ‘‘क्या कहा, तू एक हिंदू से शादी करेगी? शर्म नहीं आती तुझे. पढ़ालिखा कर तुझे नौकरी पर लगाया, इस का यही सिला दिया कि मेरी जातबिरादरी में नाक कटवाना चाहती है.’’

‘‘अब्बा, आप मुझे कितना ही समझा लें, चिल्ला लें, मगर मैं जरा भी टस से मस नहीं होऊंगी.’’

‘‘देख कुलसुम, तेरी शादी उस हिंदू लड़के के साथ कभी नहीं होने दूंगा,’’ हामिद शाह फिर गुस्से से बोले, ‘‘जानती नहीं कि हमारा और उस का मजहब अलगअलग है. फिर हमारा मजहब किसी हिंदू लड़के से शादी करने की इजाजत नहीं देता है.

‘‘कब तक मजहब के नाम पर आप जैसे सुधारवादी लोग भी कठमुल्लाओं के हाथ का खिलौना बनते रहेंगे? कब तक हिंदुओं को अपने से अलग मानते रहेंगे,’’ इस समय कुलसुम को भी न जाने कहां से जोश आ गया. उस ने अपनी रोबीली आवाज में कहा, ‘‘अरे अब्बा, 5-6 पीढ़ी पीछे जाओ. इस देश के मुसलमान भी हिंदू ही थे. फिर हिंदू मुसलमान को 2 खानों में क्यों बांट रहे हैं. मुसलमानों को इन कठमुल्लाओं ने अपने कब्जे में कर लिया है.’’

‘‘अरे, चंद किताबें क्या पढ़ गई, मुझे पाठ पढ़ा रही है. कान खोल कर सुन ले, तेरी शादी वहीं होगी, जहां मैं चाहूंगा,’’ हामिद शाह उसी गुस्से से बोले थे.

‘‘अब्बा, मैं भी शादी करूंगी तो सुरेश से ही, सुरेश के अलावा किसी से नहीं,’’ उसी तरह कुलसुम भी जवाब देते हुए बोली थी.

इतना सुनते ही हामिद शाह आगबबूला हो उठे, मगर जवाब नहीं दे पाए थे. अपनी जवान लड़की का फैसला सुन कर वे भीतर ही भीतर तिलमिला उठे थे. फिर ठंडे पड़ कर वे समझाते हुए बोले थे, ‘‘देखो बेटी, तुम पढ़ीलिखी हो, समझदार हो. जो फैसला तुम ने लिया है, वह भावुकता में लिया है. फिर निकाह जातबिरादरी में होता है. तुम तो जातबिरादरी छोड़ कर दूसरी कौम में शादी कर रही हो.

‘‘बेटी, मेरा कहना मानो, तुम अपना फैसला बदल लो और बदनामी से बचा लो. तुम्हारी मां, तुम्हारे भाई और तुम्हारी बहनों को जातबिरादरी का पता चलेगा तो कितना हंगामा होगा, इस बात को समझो बेटी, मैं कहीं भी मुंह देखाने लायक नहीं रहूंगा.’’

‘‘देखिए अब्बा, आप की कोई भी बात मुझे नहीं पिघला सकती,’’ थोड़ी नरम पड़ते हुए कुलसुम बोली, ‘‘सुरेश और मैं ने शादी करने का फैसला कर लिया है. अगर आप मुझ पर दबाव डालेंगे, तब मैं अपने प्यार की खातिर खुदकुशी कर लूंगी.’’

कुलसुम ने जब यह बात कही, तब हामिद शाह ऊपर से नीचे तक कांप उठे, फिर वे बोले थे, ‘‘नहीं बेटी, खुदकुशी मत करना.’’

‘‘तब आप मुझे मजबूर नहीं करेंगे, बल्कि इस शादी में आप मेरा साथ देंगे,’’ कुलसुम ने जब यह बात कही, तब हामिद शाह सोच में पड़ गए. एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई. कुलसुम का साथ दें, तो समाज नाराज. अगर जबरदस्ती कुलसुम की शादी बिरादरी में कर भी दी, तब कुलसुम सुखी नहीं रहेगी, बल्कि खुदकुशी कर लेगी.

अपने अब्बा को चुप देख कुलसुम बोली, ‘‘अब्बा, अब सोचो मत. इजाजत दीजिए.’’

‘‘मैं ने कहा न कि बेटी घर में बहुत बड़ा हंगामा होगा. सचमुच में तुम सुरेश से ही शादी करना चाहती हो?’’

‘‘हां अब्बा,’’ कुलसुम हां में गरदन हिला कर बोली.

‘‘बीच में धोखा तो नहीं देगा वह?’’

‘‘नहीं अब्बा, वे लोग तो बहुत

अच्छे हैं.’’

‘‘तुम एक मुसलमान हो, तो क्या वे तुम्हें अपना लेंगे?’’

‘‘हां अब्बा, वे मुझे अपनाने के लिए तैयार हैं.’’

‘‘देख बेटी, हमारा कट्टर समाज इस शादी की इजाजत तो नहीं देगा, मगर मैं इस की इजाजत देता हूं.’’

‘‘सच अब्बा,’’ खुशी से झूम कर कुलसुम बोली.

‘‘हां बेटी, तुझे एक काम करना होगा, सुरेश से तुम गुपचुप शादी कर लो. किसी को कानोंकान हवा न लगे. इस से सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी…’’ सलाह देते हुए अब्बा हामिद शाह बोले, ‘‘जब तुम दोनों शादी कर लोगे, तब फिर कुछ नहीं होगा. थोड़े दिन चिल्ला कर लोग चुप हो जाएंगे.’’

इस घटना को 8 दिन भी नहीं गुजरे थे कि कुलसुम ने सुरेश के साथ कोर्ट में शादी कर ली. इस घटना की खबर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई.

‘‘देखिएजी, इस शादी को मैं शादी नहीं मानती,’’ नासिरा बी झल्लाते हुए बोलीं, ‘‘मुझे कुलसुम चाहिए. कैसे भी कर के उस को उस हिंदू लड़के से छुड़ा कर लाओ.’’

‘‘बेगम, जिसे तुम हिंदू कह रही हो, वही तुम्हारा दामाद बन चुका है. कोर्ट में मैं खुद मौजूद था गवाह के तौर पर और तभी जज ने शादी बिना रोकटोक के होने दी थी.’’

‘‘मैं नहीं मानती उसे दामाद,’’ उसी तरह नासिरा बी गुस्से से बोलीं, ‘‘पुलिस को ले जाओ और उसे छुड़ा कर लाओ.’’

‘‘पुलिस भी कानून से बंधी हुई है बेगम. दोनों बालिग हैं और कुलसुम बयान देगी कि उस ने अपनी मरजी से शादी की है और बाप की गवाही है, तब पुलिस भी कुछ नहीं कर पाएगी. उसे अपना दामाद मान कर भूल जाओ,’’ समझाते हुए हामिद शाह बोले.

‘‘तुम बाप हो न, इसलिए तुम्हारे दिल में पीड़ा नहीं है. एक मां की पीड़ा को तुम क्या जानो?’’ गुस्से से नासिरा बी बोलीं, ‘‘मैं सब समझती हूं तुम बापबेटी की यह चाल है. खानदान में मेरी नाक कटा दी,’’ कह कर नासिरा बी गुस्से से बड़बड़ाती हुई चली गईं.

हामिद शाह मुसकराते हुए रह गए. नासिरा बी अब भी अंदर से बड़बड़ा रही थीं. इधर दोनों बेटे भी दुकान पर चले गए.

Father’s Day Special- घर ससुर: क्यों दामाद के घर रहने पर मजबूर हुए पिताजी?

मेहुल ने तल्ख शब्दों में पूछा था, ‘‘मैं आप से फिर पूछ रहा हूं पिताजी कि आप घर आ रहे हैं या नहीं. आखिर कब तक दामाद के घर पड़े रहेंगे? अपनी नहीं तो मेरी इज्जत का तो कुछ खयाल कीजिए. भला आज तक किसी ने ‘घर ससुर’ बनने की बात सुनी है. मुझे तो लगता है कि आप का दिमाग ही चल गया है जो ऐसी बातें करते हैं.’’

‘‘नहीं सुनी तो अब सुन लो, और कितनी बार कहूं कि मैं ने  घर ससुर बनने का फैसला काफी सोचसमझ कर लिया है. मुझे अपने दामाद का घर ही अच्छा लग रहा है. कम से कम यहां एक प्याली चाय के लिए 10 बार कुत्ते की तरह भौंकना नहीं पड़ता. सीमा और किशोर मेरी हर बात का पूरा खयाल रखते हैं.

‘‘और सुनो, मेहुल, जब वे लोग भी मुझे बोझ समझने लगेंगे तो दिल्ली का ‘आशीर्वाद सीनियर सिटीजन्स होम’ तो है

ही   मुझ   जैसे उपेक्षित और बोझ बन चुके बूढ़ों के लिए. इसलिए तुम लोग अब मेरी चिंता मत करो,’’ मेघा के ससुर रुद्रप्रताप सिंह बोले.

जवाब में मेहुल कुछ और विषवमन करता हुआ बोला, ‘‘तो फिर बने रहिए घर ससुर और दामाद के हाथों अपनी इज्जत की धज्जियां उड़वाते रहिए.’’

मेघा को अपने ससुर के कहे शब्द स्पष्ट सुनाई पडे़, ‘‘हांहां, अपना आत्मसम्मान खो कर बेइज्जत बाप बने रहने से कहीं बेहतर है कि मैं इज्जतदार ‘घर ससुर’ ही बना रहूं,’’ और इसी के साथ उन्होंने फोन पटक कर अपनी नाराजगी जाहिर की तो मेहुल ने भी गुस्से में स्पीकर का स्विच बंद कर दिया.

मेघा को अपनेआप पर ग्लानि हो आई. सोचने लगी कि उस के मायके में जब लोगों को पता चलेगा कि उस की और मेहुल की लापरवाही के चलते उस के ससुर को बेटी के घर जाना पड़ा तो मायके के लोग उन के बारे में क्या सोचेंगे. उस की भाभियां क्या मां को ताना मारने का ऐसा सुनहरा अवसर हाथ से जाने देंगी. नहींनहीं, किसी भी तरह रिश्तेदारों को यह खबर होने से पहले उसे अपने ससुर को मना कर वापस लाना ही पडे़गा.

इस बारे में पहले मेहुल से बात करनी होगी. यह सोच कर मेघा ने मेहुल से कहा, ‘‘देखो, जो भी हुआ ठीक नहीं हुआ. आखिर वह तुम्हारे पिताजी हैं और उन्होंने तुम को दो बातें कह भी दीं तो क्या हुआ, तुम्हें चुप रहना था. थोड़ा सा सह लेते और उन से नरमी से पेश आते तो यों बात का बतंगड़ नहीं बनता.’’

‘‘हांहां, अब तो तुम भली बनने का नाटक करोगी ही लेकिन तब एक वृद्ध व्यक्ति को समय पर खाना और चायनाश्ता देने में तुम्हारी नानी मरती थी. उस पर रातदिन बाबूजी की शिकायत करकर के तुम्हीं ने मेरा जीना हराम कर रखा था. अब भी तुम्हें बाबूजी के जाने का दुख नहीं है बल्कि उन के साथ पेंशन के 10 हजार रुपए जाने का गम सता रहा है.’’

इस तरह मेहुल ने सारा दोष मेघा के सिर मढ़ दिया तो वह तिलमिला उठी और व्यंग्यात्मक लहजे में बोली, ‘‘तो तुम भी कौन सा बाबूजी की याद में तड़प रहे हो. अपने दिल पर हाथ रख कर कहो कि तुम्हें बाबूजी के रुपयों की कोई जरूरत नहीं है.’’

मेहुल को जब मेघा ने उलटा आईना दिखाया तो वह खामोश हो गया. फिर कुछ नरमी से बोला, ‘‘खैर, जो हो गया सो हो गया. अब इस पर बहस कर के क्या फायदा. सोचो कि उन्हें कैसे बुलाया जाए. क्योंकि जितना मैं उन्हें जानता हूं वह अब खुद आने वाले नहीं हैं. अभी तो वह सीमा के घर हैं पर जहां कहीं उन के आत्म- सम्मान को जरा सी ठेस पहुंची तो वह ‘आशीर्वाद सीनियर सिटीजन्स होम’ जाने में एक पल की भी देर नहीं लगाएंगे. उस के बाद वहां से वह शायद ही वापस आएं.’’

‘‘तुम कहो तो मैं बात कर के देखती हूं,’’ मेघा बोली, ‘‘अब गलती हम ने की है तो उसे सुधारने की कोशिश भी हमें ही करनी पडे़गी. पिताजी हैं.’’

‘‘नहीं, रहने दो,’’ मेहुल बोला, ‘‘बाबूजी को गए महीना भर तो हो ही गया है. अब हफ्ते भर बाद ही बच्चों की क्रिसमस की छुट्टियां होने वाली हैं. हम सब जा कर बाबूजी को मना कर आदर के साथ ले आएंगे.’’

यह सब सुन कर हुर्रे कहते हुए रानी और फनी परदे के पीछे से निकल आए जो मम्मीपापा की ऊंची आवाज सुन कर वहां आ गए थे.

‘‘मां, सच में दादाजी हमारे पास वापस आ जाएंगे?’’ दोनों बच्चे खुशी से उछलते हुए एक स्वर में बोले.

‘‘हां, बेटे, वह जरूर आएंगे. हम सब मिल कर उन्हें लेने जाएंगे,’’ मेघा भीगे स्वर में बोली तो मेहुल के चेहरे पर भी स्नेहसिक्त मुसकान आ गई.

बच्चों की छुट्टियां शुरू होने पर वे अपनी कार से बाबूजी को लेने निकल पडे़. मेहुल ने घर छोड़ने से पहले फोन पर सीमा से यह पूछ लिया था कि बाबूजी घर पर हैं कि नहीं और उन का कहीं जाने का कार्यक्रम तो नहीं है.’’

सच है बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो साथ रहने वाले अपनों के महत्त्व को समझ नहीं पाते पर किसी कारण से जब वही अपने दूर चले जाते हैं तब उन की कमी शिद्दत से महसूस करते हैं. यही हाल मेहुल और मेघा का था. जब तक बाबूजी साथ रहते थे उन्हें हर समय ऐसा लगता था कि बाबूजी बेवजह उन के कामों में टोकाटाकी करते हैं. बच्चों से गैरजरूरी बातें कर के उन का समय बरबाद करते हैं. बाबूजी ने सब पर ही एक तरह से अंकुश लगा रखा था. ऐसा लगता था मानो उन की आजादी खत्म हो गई थी.

बाबूजी कहते थे कि जीवन में कुछ बनने के लिए अपने बच्चों में अनुशासन का बीजारोपण करने के लिए खुद को अनुशासित रह कर आचरण करना पड़ता है तभी बच्चे भी हमें अपना आदर्श मान कर हम से कुछ सीख पाते हैं. तब मेघा और मेहुल को उन की ये बातें कोरी बकवास लगा करती थीं किंतु आज उन्हें बाबूजी की कही एकएक बात में सचाई का आभास हो रहा है.

बाबूजी से हर महीने उन की पेंशन को लेना तो उन्हें याद रहा या यों कहें कि अपना अधिकार तो उन्हें याद रहा पर फर्ज निभाने से वे चूक गए. अपनी सहेलियों के साथ गप लड़ाते हुए मेघा अकसर भूल जाती कि बाबूजी चाय के लिए इंतजार कर रहे हैं. वह शुगर के मरीज हैं पर उन के ही दिए पैसों से शुगर फ्री खरीदने में उन्हें पैसों की बरबादी लगती थी.

मेहुल ने भी कभी यह न सोचा कि वृद्ध पिता को उस से भी कुछ उम्मीदें हो सकती हैं. दो घड़ी मेहुल से बात करने को वह तरस जाते पर उस को इस की कोई परवा न थी. बाबूजी ने तो मेहुल के बड़ा होते ही उसे अपना मित्र बना लिया था पर वही कभी उन का दोस्त नहीं बन पाया.

अचानक गाड़ी घर्रघर्र कर हिचकोले खा कर रुक गई. यह तो अच्छा हुआ कि पास ही में एक मोटर गैराज  था. धक्के दे कर गाड़ी को वहां तक ले जाया गया. मैकेनिक ने जांच करने के बाद बताया कि ब्रेक पाइप फट गया है और उसे ठीक होने में कम से कम एक दिन तो लगेगा ही. चूंकि यह एक इत्तेफाक था कि हादसा मेघा के मायके वाले शहर में हुआ था. इसलिए कोई उपाय न देख उन्होंने गाड़ी ठीक होने तक मेघा के मायके में रुकने का फैसला लिया.

एक टैक्सी कर मेहुल अपने परिवार को ले कर ससुराल की ओर चल दिया. उन्हें अचानक आया देख कर सभी बहुत खुश हुए. मेघा के परिवार में मम्मीपापा के अलावा उस के 2 बडे़ भाई और भाभियां थीं. बडे़ भैया के 2 जुड़वां बेटे जय और लय तथा छोटे भैया की एक बेटी स्वीटी थीं. बच्चों में उम्र का ज्यादा फासला नहीं था इसलिए जल्दी ही वे एकदूसरे से घुलमिल गए और हुड़दंग मचाने लगे.

मांबाबूजी के साथ थोड़ी देर बातें करने के बाद मेघा मेहुल को वहीं छोड़ कर रसोई की ओर चल पड़ी जहां उस की  दोनों भाभियां रात के खाने की तैयारी में जुटी थीं.

मेघा ने भाभियों का हाथ बंटाना चाहा पर उन्होंने उस का मन रखने के लिए चावल बीनने की थाली पकड़ा दी और वहीं रसोई के बाहर पड़ी कुरसी पर बैठा लिया. मेघा ने देखा कि उस की भाभियों ने बातोंबातों में कितने सारे पकवान बना लिए. वे जब 2 तरह की सब्जियां बना रही थीं तब मेघा ने पूछ लिया कि भाभी यह कम तेलमसाले की सब्जी किस के लिए बना रही हो तो बड़ी भाभी ने कहा कि मम्मीपापा बहुत सी खाने की चीजों से परहेज करते हैं. उन की उम्र देखते हुए उन के लिए थोड़ा अलग से बनाना पड़ता है.

‘‘पर मांबाबूजी को तो कोई बीमारी नहीं है. फिर उन के लिए आप लोग इतना झंझट क्यों कर रही हैं?’’ मेघा ने पूछा.

जवाब छोटी भाभी ने दिया, ‘‘तो क्या हुआ, बुजुर्ग लोग हैं, परहेज करते हैं तभी तो उन का स्वास्थ्य अच्छा है. फिर उन के लिए कुछ करने में कष्ट कैसा? यह तो हमारा फर्ज है. वैसे भी तुम जितना अपने ससुर के लिए करती हो उस हिसाब से हम तो कुछ भी नहीं करतीं.’’

‘‘मैं ने क्या किया और आप को कैसे पता चला?’’ मेघा कुछ असमंजस भरे स्वर में बोली.

‘‘अब रहने भी दो, दीदी,’’ बड़ी भाभी हंसती हुई बोलीं, ‘‘ज्यादा बनो मत. कल ही तो तुम्हारे ससुरजी का फोन आया था. उन्होंने ही तुम्हारे और मेहुल के बारे में हमें सबकुछ बताया.’’

मेघा के मन में जाने कैसेकैसे कुविचार और संदेह सिर उठाने लगे कि बाबूजी ने जरूर उन की शिकायत की होगी और इसीलिए भाभियां उसे यों ताने मार रही हैं पर मन का संशय प्रकट न कर मेघा बोली, ‘‘क्या बताया बाबूजी ने, क्या वह हम से नाराज हैं?’’

‘‘भला क्यों नाराज होंगे? वह तो तुम्हारी और मेहुल की बहुत तारीफ कर रहे थे. कह रहे थे कि बहू तो ऐसी है कि किसी चीज के लिए मेरे मुंह खोलने से पहले ही वह समझ जाती है कि मुझे क्या चाहिए.’’

पता नहीं भाभी और क्याक्या कहती रहीं, मेघा को और कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था. उस की अंतरात्मा उसे धिक्कारने लगी कि अपनी नासमझी की वजह से उस ने कभी बाबूजी की परवा नहीं की. अपनी सुविधानुसार इस बात का खयाल किए बगैर कि वह खाना बाबूजी के स्वास्थ्य के लिए उचित है या नहीं, वह कुछ भी उन के सामने रख देती थी.

शुरुआत में 1-2 बार बाबूजी ने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की थी पर उस ने कोई ध्यान न दिया. नतीजतन, उन की तबीयत आएदिन खराब हो जाती थी. एक उस की भाभियां हैं जो उस के स्वस्थ मातापिता का कितना ध्यान रखती हैं और एक वह है.

दूसरी ओर बाबूजी हैं कि इतना होने पर भी मायके में उस की किसी से शिकायत न कर तारीफ ही की. पश्चात्ताप की आग में जलती हुई उस की भावनाएं आंसुओं के रूप में आंखों से छलकने लगीं. वह मन ही मन प्रतिज्ञा करने लगी कि अब आगे से वह कभी भी बाबूजी को किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं देगी.

उधर मेहुल भी मेघा के भाइयों का अपने मातापिता के साथ व्यवहार देख कर ग्लानि से भरा जा रहा था. मेघा के दोनों भाई अपना खुद का कारोबार संभालते थे. दोनों ने ही घर आ कर उस दिन की बिक्री से प्राप्त रुपयों से अपने पिताजी को अवगत कराया. हालांकि उन्होंने किसी से भी रुपयों का ब्योरा देने के लिए नहीं कहा था. कुछ देर पास बैठ पितापुत्र ने एकदूसरे का हालचाल पूछा. फिर वे लोग मेहुल के साथ व्यस्त हो गए.

मेहुल मन ही मन सोच रहा था कि वह तो अपने पिता का इकलौता पुत्र है. इसलिए उसे तो उन की हर बात की ओर ध्यान देने की जरूरत है. मां के गुजर जाने के बाद वह अपनी बात कहते भी तो किस से. वह क्यों नहीं अब तक अपने पिता के मन की पीड़ा को समझ पाया. अब से वह बाबूजी के पेंशन के रुपयों को हाथ भी नहीं लगाएगा बल्कि उन की जरूरतों को अपने कमाए रुपए से पूरी करेगा.

अगले दिन गाड़ी ठीक हो कर घर आ गई पर मेघा के घर वालों ने जिद कर के उन्हें 2 दिन और रोक लिया. इस दौरान मेहुल ने मेघा के भाइयों का अपने मातापिता के  साथ बातचीत और व्यवहार को देख कर पहली बार जाना कि बुजुर्गों के अनुभव से कैसे लाभ उठाया जा सकता है. बच्चे कैसे दादा- दादी की वजह से अपने पारिवारिक इतिहास को जानते हैं तथा अपनी संस्कृति और रिश्तों की जड़ों से जुड़ते हैं. हमारे बुजुर्ग ही तो इन सारी चीजों की मूल जड़ होते हैं, हम तो बस, शाखा मात्र होते हैं. यदि मूल जड़ को ही काट कर फेंक दिया जाए तो गृहस्थी का वृक्ष कैसे फलफूल सकता है.

जब से मेघा और मेहुल बच्चों सहित बाबूजी को लेने निकले तो उन दोनों के सामने अपना ध्येय बिलकुल साफ हो चुका था. उन्हें विश्वास था कि उन की नादानी को माफ कर बाबूजी अवश्य उन के साथ वापस अपने घर आ जाएंगे. भला उन जैसा स्वाभिमानी व्यक्ति कभी ‘घर ससुर’ बन कर थोड़े ही रह सकता है. यह सब तो उन्हें सबक सिखाने के लिए बाबूजी ने कहा होगा. इस विश्वास के साथ वे खुशी मन से अपनी मंजिल की ओर बढ़ चले.

Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना- भाग 4

घड़ी ने रात के 2 बजाए. मुझे लगा अब मुझे सो जाना चाहिए. मगर आंखों में नींद कहां. मैं ने अलमारी से पापा की तसवीर निकाली जिस में मैं मम्मीपापा के बीच शिमला के एक पार्क में बैठी थी. मेरे पास पापा की यही एक तसवीर थी. मैं ने उन के चेहरे पर अपनी कांपती उंगलियों को फेरा और फफक कर रो पड़ी, ‘पापा तुम कहां हो…जहां भी हो मेरे पास आ जाओ…देखो, तुम्हारी निकी तुम्हें कितना याद करती है.’

एक दिन सुबह संदीप अखबार पढ़तेपढ़ते कहने लगे, ‘जानती हो आज क्या है?’

‘मैं क्या जानूं…अखबार तो आप पढ़ते हैं,’ मैं ने कहा.

‘आज फादर्स डे है. पापा के लिए कोई अच्छा सा कार्ड खरीद लाना. कल भेज दूंगा.’

‘आप खुशनसीब हैं, जिस के सिर पर मांबाप दोनों का साया है,’ कहतेकहते मैं अपने पापा की यादों में खो गई और मायूस हो गई, ‘पता नहीं मेरे पापा जिंदा हैं भी या नहीं.’

‘हे, ऐसे उदास नहीं होते,’ कहतेकहते संदीप मेरे पास आ गए और मुझे अंक में भर कर बोले, ‘तुम अच्छी तरह जानती हो कि हम ने उन्हें कहांकहां नहीं ढूंढ़ा. अखबारों में भी उन का विवरण छपवा दिया पर अब तक कुछ पता नहीं चला.’

मैं रोने लगी तो मेरे आंसू पोंछते हुए संदीप बोले थे, ‘‘अरे, एक बात तो मैं तुम को बताना भूल ही गया. जानती हो आज शाम को टेलीविजन पर एक नया प्रोग्राम शुरू हो रहा है ‘अपनों की तलाश में,’ जिसे एक बहुत प्रसिद्ध अभिनेता होस्ट करेगा. मैं ने पापा का सारा विवरण और कुछ फोटो वहां भेज दिए हैं. देखो, शायद कुछ पता चल सके.’?

‘अब उन्हें ढूंढ़ पाना बहुत मुश्किल है…इतने सालों में हमारी फोटो और उन के चेहरे में बहुत अंतर आ गया होगा. मैं जानती हूं. मुझ पर जिंदगी कभी मेहरबान नहीं हो सकती,’ कह कर मैं वहां से चली गई.

मेरी आशाओं के विपरीत 2 दिन बाद ही मेरे मोबाइल पर फोन आया. फोन धर्मशाला के नजदीक तपोवन के एक आश्रम से था. कहने लगे कि हमारे बताए हुए विवरण से मिलताजुलता एक व्यक्ति उन के आश्रम में रहता है. यदि आप मिलना चाहते हैं तो जल्दी आ जाइए. अगर उन्हें पता चल गया कि कोई उन से मिलने आ रहा है तो फौरन ही वहां से चले जाएंगे. न जाने क्यों असुरक्षा की भावना उन के मन में घर कर गई है. मैं यहां का मैनेजर हूं. सोचा तुम्हें सूचित कर दूं, बेटी.

‘अंकल, आप का बहुतबहुत धन्यवाद. बहुत एहसान किया मुझ पर आप ने फोन कर के.’

मैं ने उसी समय संदीप को फोन किया और सारी बात बताई. वह कहने लगे कि शाम को आ कर उन से बात करूंगा फिर वहां जाने का कार्यक्रम बनाएंगे.

‘नहीं संदीप, प्लीज मेरा दिल बैठा जा रहा है. क्या हम अभी नहीं चल सकते? मैं शाम तक इंतजार नहीं कर पाऊंगी.’

संदीप फिर कुछ सोचते हुए बोले, ‘ठीक है, आता हूं. तब तक तुम तैयार रहना.’

कुछ ही देर में हम लोग धर्मशाला के लिए प्रस्थान कर गए. पूरे 6 घंटे का सफर था. गाड़ी मेरे मन की गति के हिसाब से बहुत धीरे चल रही थी. मैं रोती रही और मन ही मन प्रार्थना करती रही कि वही मेरे पापा हों. देर तो बहुत हो गई थी.

हम जब वहां पहुंचे तो एक हालनुमा कमरे में प्रार्थना और भजन चल रहे थे. मैं पीछे जा कर बैठ गई. मैं ने चारों तरफ नजरें दौड़ाईं और उस व्यक्ति को तलाश करने लगी जो मेरे वजूद का निर्माता था, जिस का मैं अंश थी. जिस के कोमल स्पर्श और उदास आंखों की सदा मुझे तलाश रहती थी और जिस को हमेशा मैं ने घुटन भरी जिंदगी जीते देखा था. मैं एकएक? चेहरा देखती रही पर वह चेहरा कहीं नहीं मिला, जो अपना सा हो.

तभी लाठी के सहारे चलता एक व्यक्ति मेरे पास आ कर बैठ गया. मैं ने ध्यान से देखा. वही चेहरा, निस्तेज आंखें, बिखरे हुए बाल, न आकृति बदली न प्रकृति. वजन भी घट गया था. मुझे किसी से पूछने की जरूरत महसूस नहीं हुई. यही थे मेरे पापा. गुजरे कई बरसों की छाप उन के चेहरे पर दिखाई दे रही थी. मैं ने संदीप को इशारा किया. आज पहली बार मेरी आंखों में चमक देख कर उन की आंखों में आंसू आ गए.

भजन समाप्त होते ही हम दोनों ने उन्हें सहारा दे कर उठाया और सामने कुरसी पर बिठा दिया. मैं कैसे बताऊं उस समय मेरे होंठों के शब्द मूक हो गए. मैं ने उन के चेहरे और सूनी आंखों में इस उम्मीद से झांका कि शायद वह मुझे पहचान लें. मैं ने धीरेधीरे उन के हाथ अपने कांपते हाथों में लिए और फफक कर रो पड़ी.

‘पापा, मैं हूं आप की निकी…मुझे पहचानो पापा,’ कहतेकहते मैं ने उन की गर्दन के इर्दगिर्द अपनी बांहें कस दीं, जैसे बचपन में किया करती थी. प्रार्थना कक्ष के सभी व्यक्ति एकदम संज्ञाशून्य हो कर रह गए. वे सब हमारे पास जमा हो गए.

पापा ने धीरे से सिर उठाया और मुझे देखने लगे. उन की सूनी आंखों में जल भरने लगा और गालों पर बहने लगा. मैं ने अपनी साड़ी के कोने से उन के आंसू पोंछे, ‘पापा, मुझे पहचानो, कुछ तो बोलो. तरस गई हूं आप की जबान से अपना नाम सुनने के लिए…कितनी मुश्किलों से मैं ने आप को ढूंढ़ा है.’

‘यह बोल नहीं सकते बेटी, आंखों से भी अब धुंधला नजर आता है. पता नहीं तुम्हें पहचान भी पा रहे हैं या नहीं,’ वहीं पास खड़े एक व्यक्ति ने मेरे सिर पर हाथ रख कर कहा.

‘क्या?’ मैं एकदम घबरा गई, ‘अपनी बेटी को नहीं पहचान रहे हैं,’ मैं दहाड़ मार कर रो पड़ी.

पापा ने अपना हाथ अचानक धीरेधीरे मेरे सिर पर रखा जैसे कह रहे हों, ‘मैं पहचानता हूं तुम को बेटी…मेरी निकी… बस, पिता होने का फर्ज नहीं निभा पाया हूं. मुझे माफ कर दो बेटी.’

बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपना संतुलन बनाए रखा था. अपार स्नेह देखा मैं ने उन की आंखों में. मैं कस कर उन से लिपट गई और बोली, ‘अब घर चलो पापा. अपने से अलग नहीं होने दूंगी. 15 साल आप के बिना बिताए हैं और अब आप को 15 साल मेरे लिए जीना होगा. मुझ से जैसा बन पड़ेगा मैं करूंगी. चलेंगे न पापा…मेरी खुशी के लिए…अपनी निकी की खुशी के लिए.’

पापा अपनी सूनी आंखों से मुझे एकटक देखते रहे. पापा ने धीरे से सिर हिलाया. संदीप को अपने पास खींच कर बड़ी कातर निगाहों से देखते रहे जैसे धन्यवाद दे रहे हों.

उन्होंने फिर मेरे चेहरे को छुआ. मुझे लगा जैसे मेरा सारा वजूद सिमट कर उन की हथेली में सिमट गया हो. उन की समस्त वेदना आंखों से बह निकली. उन की अतिभावुकता ने मुझे और भी कमजोर बना दिया.

‘आप लाचार नहीं हैं पापा. मैं हूं आप के साथ…आप की माला का ही तो मनका हूं,’ मुझे एकाएक न जाने क्या हुआ कि मैं उन से चिपक गई. आंखें बंद करते ही मुझे एक पुराना भूला बिसरा गीत याद आने लगा :

‘सात समंदर पार से, गुडि़यों के बाजार से, गुडि़या चाहे ना? लाना…पापा जल्दी आ जाना.’

जीवनसाथी – भाग 3 : उस नौजवान ने कैसे जीता दिल

फिर तो दीपक के साथ हमारी भी शामत आ गई. दादीजी गुस्से से तमतमाते हुए बोलीं, ‘‘बहू, इस गंदी नाली के कीड़े को हमेशा के लिए इस घर से निकाल दो. इस ने सारे घर को ‘अपवित्र’ कर दिया है. इतना मारो इस कुत्ते को कि दोबारा कभी इधर मुंह भी न करे… नहीं तो मैं ही यहां से कहीं दूर चली जाऊंगी.’’

मां का पारा भी सातवें आसमान को छूने लगा था. उन्होंने शहतूत की छड़ी ले कर पहले हम दोनों भाईबहन को पीटा. फिर जोरजोर से दीपक को पीटने लगीं. वह रोया, गिड़गिड़ाया और दया की भीख मांगता रहा, परंतु उस की एक न सुनी गई.

मां उसे खींच कर बाहर ले गई और बोलीं, ‘‘भाग जा यहां से, नहीं तो तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगी.’’ मां का ऐसा चेहरा मैं ने पहली बार देखा था. दीपक चिल्लाता हुआ दौड़ कर गेट से बाहर भाग गया था. उस की किताबकापियां, कपड़े और दूसरे सामान कमरे में ही रह गए थे.

पिताजी चुपचाप देखते रहे और चाह कर भी मां को रोक न सके. उस के  बाद दीपक कभी भी हमारे घर लौट कर नहीं आया. इतने सालों बाद दीपक को अब मैं अफसर की कुरसी पर बैठे हुए देख रही थी. मुझे बहुत खुशी हो रही थी.

तभी वह लौट आया और मुझे खामोश देख कर बोला, ‘‘आशाजी, आप चुप क्यों हो गई हैं? और सुनाओ, क्या हालचाल हैं? चाचाजी और चाचीजी कैसे हैं?’’ ‘‘सब ठीक हैं,’’ मैं उस से नजर नहीं मिला पाई. इसी बीच चपरासी चाय और बिसकुट ले आया था. हम चाय पीने  लगे थे.

‘‘मनोज कहां है और क्या काम करता है?’’ दीपक ने पूछा. ‘‘वह शिमला में बिजली महकमे में इंजीनियर लग गया है,’’ मैं ने उसे बताया. थोड़ी देर बाद अपना काम पूरा कर के मैं घर चली गई. रात को जब मैं ने मां व पिताजी को दीपक के बारे में बताया तो वे भी हैरान रह गए.

मां को तो यकीन ही नहीं हुआ. वह कहने लगीं, ‘‘ऐसा कभी हो ही नहीं सकता. तुम झूठ बोल रही हो.’’ दूसरे दिन मेरे मातापिता भी उस से मिलने गए. दीपक उन से बहुत प्यार से मिला और पिछली किसी भी बात को नहीं कुरेदा.

जब मनोज छुट्टियों में घर आया तो दीपक ने हमारे पूरे परिवार को दावत दी. इसी बीच मुझे नजदीक ही एक कालेज में नौकरी मिल गई थी. दीपक से अकसर मेरी मुलाकात होती रहती थी.  एक दिन दीपक ने मेरे सामने शादी की बात रखी तो मैं गदगद हो गई.

दीपक ने मेरे दिल की बात छीन ली थी, परंतु घर आ कर जब मैं ने मातापिता से बात की तो वे मेरे खिलाफ हो गए. मां कहने लगीं, ‘‘पागल हो गई हो? लोग क्या कहेंगे? अपनी जातबिरादरी वाले क्या कम हैं?’’ दादीजी भी भड़क उठीं, ‘‘उस से कहना कि वह अपनी औकात में रहे.

क्या वह अपनी जात को भूल गया है?’’ पिताजी समझाने लगे, ‘‘बेटी, मैं ने तुम्हारे लिए एक काबिल वर की तलाश कर ली है.’’ शायद वे लोग नहीं चाहते थे कि वही लड़का उन के घर में दामाद बन कर आए, जिसे बचपन में उन्होंने दुत्कारा और सताया था.

परंतु दीपक जैसा जीवनसाथी मुझे कहीं मिल नहीं सकता था, इसलिए मैं हिम्मत कर के गुस्से में बोल उठी, ‘‘आप लोग मेरी शादी दूसरी जगह जबरदस्ती नहीं कर सकते. मैं अपने पैरों पर खड़ी हो गई हूं और यह फैसला मैं ने सोचसमझ कर लिया है.

अगर आप जबरदस्ती करेंगे, तो आज के बाद मैं इस घर में कभी कदम भी नहीं रखूंगी.’’ ‘‘पिताजी, आशा ने अपने लिए एक अच्छा जीवनसाथी चुना है. आप को इस मामले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है,’’ मनोज भी मेरी तरफदारी करता हुआ बोला. अब सभी खामोश हो गए थे. उन्होंने अपनी हार मान ली थी.

Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना- भाग 3

धीरेधीरे उन के संबंध बद से बदतर होते गए. वे एकदूसरे से बात भी नहीं करते थे. मुझे पापा से सहानुभूति थी. पापा को अपने व्यक्तित्व का अपमान बरदाश्त नहीं हुआ और उस दिन के बाद वह तिरस्कार सहतेसहते एकदम अंतर्मुखी हो गए. मम्मी का स्वभाव उन के प्रति और भी ज्यादा अन्यायपूर्ण हो गया. एक अनजान व्यक्ति की तरह वह घर में आते और चले जाते. अपने ही घर में वह उपेक्षित और दयनीय हो कर रह गए थे.

मुझे धीरेधीरे यह समझ में आने लगा कि पापा, मम्मी के तानों से परेशान थे और इन्हीं हालात में वह जीतेमरते रहे. किंतु मम्मी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा. उन का पहले की ही तरह किटी पार्टी, फोन पर घंटों बातें, सजसंवर कर आनाजाना बदस्तूर जारी रहा. किंतु शाम को पापा के आते ही माहौल एकदम गंभीर हो जाता.

एक दिन वही हुआ जिस का मुझे डर था. पापा शाम को दफ्तर से आए. चेहरे से परेशान और थोड़ा गुस्से में थे. पापा ने मुझे अपने कमरे में जाने के लिए कह कर मम्मी से पूछा, ‘तुम बाहर गई थीं क्या…मैं फोन करता रहा था?’

‘इतना परेशान क्यों होते हो. मैं ने तुम्हें पहले भी बताया था कि मैं आजाद विचारों की हूं. मुझे तुम से पूछ कर जाने की जरूरत नहीं है.’

‘तुम मेरी बात का उत्तर दो…’ पापा का स्वर जरूरत से ज्यादा तेज था. पापा के गरम तेवर देख कर मम्मी बोलीं, ‘एक सहेली के साथ घूमने गई थी.’

‘यही है तुम्हारी सहेली,’ कहते हुए पापा ने एक फोटो निकाल कर दिखाया जिस में वह मनोज अंकल के साथ उन का हाथ पकड़े घूम रही थीं. मम्मी फोटो देखते ही बुरी तरह घबरा गईं पर बात बदलने में वह माहिर थीं.

‘तो तुम आफिस जाने के बाद मेरी जासूसी करते रहते हो.’

‘मुझे कोई शौक नहीं है. वह तो मेरा एक दोस्त वहां घूम रहा था. मुझे चिढ़ाने के लिए उस ने तुम्हारा फोटो खींच लिया…बस, यही दिन रह गया था देखने को…मैं साफसाफ कह देता हूं, मैं यह सब नहीं होने दूंगा.’

‘तो क्या कर लोगे तुम…’

‘मैं क्या कर सकता हूं यह बात तुम छोड़ो पर तुम्हारी इन गतिविधियों और आजाद विचारों का निकी पर क्या प्रभाव पड़ेगा कभी इस पर भी सोचा है. तुम्हें यही सब करना है तो कहीं और जा कर रहो, समझीं.’

‘क्यों, मैं क्यों जाऊं. यहां जो कुछ भी है मेरे घर वालों का दिया हुआ है. जाना है तो तुम जाओगे मैं नहीं. यहां रहना है तो ठीक से रहो.’

और उसी गरमागरमी में पापा ने अपना सूटकेस उठाया और बाहर जाने लगे. मैं पीछेपीछे पापा के पास भागी और धीरे से कहा, ‘पापा.’

वह एक क्षण के लिए रुके. मेरे सिर पर हाथ फेर कर मेरी तरफ देखा. उन की आंखों में आंसू थे. भारी मन और उदास चेहरा लिए वह वहां से चले गए. मैं उन्हें रोकना चाहती थी, पर मम्मी का स्वभाव और आंखें देख कर मैं डर गई. मेरे बचपन की शोखी और नटखटपन भी उस दिन उन के साथ ही चला गया. मैं सारा समय उन के वियोग में तड़पती रही और कर भी क्या सकती थी. मेरे अपने पापा मुझ से दूर चले गए.

एक दिन मैं ने पापा को स्कूल की पार्किंग में इंतजार करते पाया. बस से उतरते ही मैं ने उन्हें देख लिया था. मैं उन से लिपट कर बहुत रोई और पापा से कहा कि मैं उन के बिना नहीं रह सकती. मम्मी को पता नहीं कैसे इस बात का पता चल गया. उस दिन के बाद वह ही स्कूल लेने और छोड़ने जातीं. बातोंबातों में मुझे उन्होंने कई बार जतला दिया कि मेरी सुरक्षा को ले कर वह चिंतित रहती हैं. सच यह था कि वह चाहती ही नहीं थीं कि पापा मुझ से मिलें.

मम्मी ने घर पर ही मुझे ट्यूटर लगवा दिया ताकि वह यह सिद्ध कर सकें कि पापा से बिछुड़ने का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा तो मम्मी ने मुझे होस्टल में डालने का फैसला किया.

इस से पहले कि मैं बोर्डिंग स्कूल में जाती, पता चला कि पापा से मिलवाने मम्मी मुझे कोर्ट ले जा रही हैं. मैं नहीं जानती थी कि वहां क्या होने वाला है, पर इतना अवश्य था कि मैं वहां पापा से मिल सकती हूं. मैं बहुत खुश हुई. मैं ने सोचा इस बार पापा से जरूर मम्मी की जी भर कर शिकायत करूंगी. मुझे क्या पता था कि पापा से यह मेरी आखिरी मुलाकात होगी.

मैं पापा को ठीक से देख भी न पाई कि अलग कर दी गई. मेरा छोटा सा हराभरा संसार उजड़ गया और एक बेनाम सा दर्द कलेजे में बर्फ बन कर जम गया. मम्मी के भीतर की मानवता और नैतिकता शायद दोनों ही मर चुकी थीं. इसीलिए वह कानूनन उन से अलग हो गईं.

धीरेधीरे मैं ने स्वयं को समझा लिया कि पापा अब मुझे कभी नहीं मिलेंगे. उन की यादें समय के साथ धुंधली तो पड़ गईं पर मिटी नहीं. मैं ने महसूस कर लिया कि मैं ने वह वस्तु हमेशा के लिए खो दी है जो मुझे प्राणों से भी ज्यादा प्यारी थी. रहरह कर मन में एक टीस सी उठती थी और मैं उसे भीतर ही भीतर दफन कर लेती.

पढ़ाई समाप्त होने के बाद मैं ने एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर ली. वहीं पर मेरी मुलाकात संदीप से हुई, जो जल्दी ही शादी में तबदील हो गई. संदीप मेरे अंत:स्थल में बैठे दुख को जानते थे. उन्होंने मेरे मन पर पड़े भावों को समझने की कोशिश की तथा आश्वासन भी दिया कि जो कुछ भी उन से बन पड़ेगा, करेंगे.

हम दोनों ने पापा को ढूंढ़ने का बहुत प्रयत्न किया पर उन का कुछ पता न चल सका. मेरे सोचने के सारे रास्ते आगे जा कर बंद हो चुके थे. मैं ने अब सबकुछ समय पर छोड़ दिया था कि शायद ऐसा कोई संयोग हो जाए कि मैं पापा को पुन: इस जन्म में देख सकूं.

पापा के लिए- भाग 3: सौतेली बेटी का त्याग

तभी इतनी देर से विचारों की कशमकश में हिचकोले सी खाती मैं ने, उन की बात बीच में काटते हुए कहा, ‘‘नहीं मम्मी, हम सब को, पूरे परिवार को आप की बहुत जरूरत है. पापा को किडनी मैं दूंगी और कोई नहीं.’’

मेरी बात सुन कर मम्मी एकदम चीख कर ऐसे बोलीं, मानो बरसों का आक्रोश आज एकसाथ लावा बन कर फूट पड़ा हो, ‘‘दिमाग तो सही है तेरा नेहा. उस आदमी के लिए अपना जीवन दांव पर लगा रही है, जिस ने तुझे कभी अपना माना ही नहीं, जिस ने कभी दो बोल प्यार के नहीं बोले तुझ से… तू उसे अपने शरीर की इतनी कीमती चीज दे रही है… नहीं, कभी नहीं, यह बेवकूफी मैं तुझे नहीं करने दूंगी मेरी बच्ची, कभी नहीं. अभी तेरे सामने पूरा जीवन पड़ा है. पराए घर की अमानत है तू. अरे, जिन बच्चों पर वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे, वे करें यह सब. अमन का फर्ज बनता है यह सब करने का, तेरा नहीं. तू ही है सिर्फ क्या उन के लिए.’’

‘‘मैं उन के लिए चाहे कुछ न हूं लेकिन मेरे लिए वे बहुत कुछ हैं. मैं ने तो दिल से उन्हें अपना पापा माना है मम्मी. मैं अपने पापा के लिए कुछ भी कर सकती हूं और फिर मम्मी, प्यार का प्रतिकार प्यार ही हो, यह कोई जरूरी तो नहीं.’’

मम्मी मुझे हैरत से देखती रह गई थीं. उन का पूरा चेहरा आंसुओं से भीग गया था. शायद सोच रही थीं – काश, इस बेटी के दिल को भी पढ़ा होता उन्होंने कभी. इस बेटी को भी गले लगाया होता कभी. अपने दोनों बच्चों की तरह कभी इस की भी पढ़ाई, होमवर्क और ऐग्जाम्स की फिक्र की होती. कभी डांटा होता, तो कभी पुचकारा होता इसे भी. कभी झिड़का होता तो कभी समझाया होता इसे भी. मगर उन्होंने तो कभी इसे नजर भर देखा तक नहीं और यह है कि…

और फिर किसी की भी नहीं सुनी मैं ने. पापा ने भले न बनाया हो, मैं ने अपनी एक किडनी दे कर उन्हें अपने शरीर का एक हिस्सा बना ही लिया. दोनों को हौस्पिटल से एक ही दिन डिस्चार्ज किया गया. मैं गाड़ी में कनखियों से बराबर देख रही थी कि पापा बराबर मुझे ही देख रहे थे. उन की आंखों में आंसू थे. कुछ कहना चाह रहे थे, मगर कह नहीं पा रहे थे. ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे उन के दिल के अनकहे शब्द मेरे दिल को स्नेह की तपिश से सहला रहे हों, जिस से बरसों से किया मेरे प्रति उन का अन्याय शीशा बन कर पिघला जा रहा हो.

घर आने के भी कई दिनों बाद एक दिन अचानक वे मेरे कमरे में आए. मुझे तो अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. आज तक वो मेरे इतने करीब, वे भी अकेले में आए भी तो नहीं थे और आज वे मेरे करीब, बिलकुल मेरे करीब. मेरे बैड पर बैठ गए थे. मैं ने उन की तरफ देखा. वे उदासी भरी, दर्दभरी, आंसुओं भरी आंखों से मुझे देख रहे थे. मैं भी देखती ही रही उन्हें… अपने पापा को. मुझे तो अब तक कि जिंदगी का एक दिन भी या यह कहूं कि एक लमहा भी याद नहीं, जब उन्होंने मुझे देखा भी हो. आंखों ही आंखों में उन्होंने बहुत कुछ कह दिया और बहुत कुछ मैं ने सुन लिया. मुझे लगा कि अगर एक शब्द भी उन्होंने जबानी बोला तो अपने आंसुओं के वेग को न मैं थाम सकूंगी और शायद न वे. भरभरा कर बस गिर ही पड़ूंगी अपने पापा की गोद में, जिस के लिए मैं अतृप्त सी न जाने कब से तरस रही थी. फड़फड़ाए ही थे उन के होंठ कुछ कहने को कि तड़प कर उन के हाथ पर अपना हाथ रख दिया मैं ने. बोली ‘‘न पापा न, कुछ मत कहना. मैं ने कोई बड़ा काम नहीं किया है. बस अपने पापा के लिए अपना छोटा सा फर्ज निभाया है.’’

अंतत: रोक ही नहीं सकी खुद को, रो ही पड़ी फूटफूट कर. पापा भी रो पड़े जोर से. उन्होंने मुझे अपने से लिपटा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… माफ कर दे अपने इस गंदे से पापा को… बेटी है मेरी तू तो, दुनिया की सब से अच्छी बेटी है तू तो.’’

जिन लफ्जों और जिस स्नेह से मैं अब तक अपने ख्वाबों में ही रूबरू होती रही थी, आज हकीकत बन कर मेरे सामने आया था. इन पलों ने सब कुछ दे दिया था मुझे. बरसों के गिलेशिकवे आंसुओं के प्रवाह में बह गए थे. तभी पापा को देख कर मम्मी भी वहीं आ गईं तो उन्होंने मम्मी को भी अपने गले से लगाते हुए कहा, ‘‘तुम दोनों के साथ मैं ने बहुत अन्याय किया है, अतीत की यादों में इतना उलझा रहा कि वर्तमान के इतने खूबसूरत साथ और रिश्ते को नकारता रहा. मुझे माफ कर दो तुम दोनों… मुझे माफ कर दो…’’

बरसों बाद ही सही, यह परिवार आज मेरा भी हो गया था. मम्मी की भी आंखें खुशी से भीग गई थीं.

उस के बाद तो जैसे मेरी जिंदगी ही बदल गई. पापा ने मुझे और अमन दोनों को एकसाथ एम.बी.ए. में ऐडमिशन दिला दिया था. वे चाहते थे कि अब हम दोनों भाईबहन नई सोच और नई तकनीक से उन की कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दें. अमन का तो मुझे पता नहीं, लेकिन मैं अपने पापा के लिए कुछ भी करूंगी…

Father’s Day Special – हमारी अमृता- भाग 3: क्या अमृता को पापा का प्यार मिला?

उसी समय स्कूल में मतिमंद बच्चों की बनाई गई वस्तुओं की एक प्रदर्शनी आयोजित की गई. बच्चों द्वारा बनाए गए ग्रीटिंग कार्ड, मिटटी के अनगढ़ खिलौने एवं चित्र रखे गए थे. अमृता के चित्र सभी को बहुत पसंद आए. उस की पीठ पर हाथ रख कर जब कोई उसे शाबाशी देता तो उस की आंखों में चमक आ जाती. चित्रकला प्रदर्शनी का उद्घाटन उसी विद्यालय के पिं्रसिपल ने ही किया. वह अमृता के बनाए चित्रों से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने चित्रों की बेहद तारीफ की.

वह अपने स्कूल के बच्चों के चित्रों की प्रदर्शनी विदेश में लगाना चाहते थे. उन्होंने अमृता के 2 चित्र विदेश भेजने के लिए पसंद कर लिए. वीना ने सुना तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ. विदेश में अमृता का नाम होगा यह सोच कर ही वह रोमांचित हो उठीं.

आज वीना को अपनी बेटी कहीं से भी अपूर्ण नहीं दिखाई दे रही थी, वह तो पूर्ण है. वह उन्हें कविता एवं वनिता से भी ज्यादा पूर्ण लग रही थी. खुशी के अतिरेक में उन की आंखों से आंसू निकल गए. तुरंत फोन कर के उन्होंने अमर को यह खुशखबरी दी. वह भी चौंक गए कि जिस बेटी को वह दुनिया की नजरों से छिपाते आए थे, आज वही उन का नाम रौशन कर रही है. खुशी से उन की आंखें भर आईं.

शाम को जब अमर घर आए तो प्यार से उन्होंने अमृता का माथा चूम लिया. वह उस की गुडि़या के लिए नया फ्राक एवं उस के लिए खिलौने एवं कपड़े लाए थे. घर के सभी सदस्य एक अरसे बाद साथ बैठे. उन की खिल-खिलाहट देख कर लग रहा था कि घर की असली सुखशांति इसी में ही है. कितने ही सुखसुविधा के सामान इस हंसी के आगे फीके पड़ जाते हैं.

अमर ने बातोंबातों में बताया कि कल अमृता की उपलब्धि के उपलक्ष्य में पार्टी आयोजित की जाएगी. वीना के हृदय में कांटा सा चुभा. वह पिछली पार्टी की बात भूली न थी, फिर भी वह बहस कर के रंग में भंग नहीं डालना चाहती थी, अत: चुपचाप रही.

दूसरे दिन सुबह से वीना पार्टी की तैयारी में लग गईं. अमर आफिस के काम के कारण ऐन वक्त पर आने वाले थे. हमेशा की तरह लान में पार्टी रखी गई थी. कविता, वनिता और वीना तैयार हो कर मेहमानों का स्वागत कर रही थीं.

अमर किसी जरूरी काम से

10-15 मिनट लेट आए. आते ही उन की नजरें किसी को खोजने लगीं. उन्होंने वीना को करीब बुलाया और धीरे से पूछा, ‘‘अमृता कहां है?’’

वीना चौंक कर अमर का मुंह देखती रह गईं फिर बोलीं, ‘‘वह अपने कमरे में बाई के साथ बंद है.’’

‘‘अरे, यह क्या वीना, यह पार्टी अमृता के लिए ही रखी गई है. कुछ देर को ही सही, उसे जरूर यहां लाओ. और हां, मैं जो कपड़े लाया था उसे पहना दो.’’

वीना के पैर खुशी से जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. वह झट अंदर गईं. अमृता को नए कपड़े पहनाए. उसे समझाया कि सब से नमस्ते कैसे करनी है. फिर उस का हाथ पकड़ कर पार्टी में ले आईं. लोग जब सवालिया नजरों से अमृता को देखने लगे तब अमर, अमृता और वीना के पास गए. उन्होंने अमृता के गले में हाथ डाल दिया और बोले, ‘‘लेडिज एंड जेंटिलमैन, यह हमारी तीसरी बेटी अमृता है. इसी के बनाए चित्र पुरस्कार हेतु विदेश में भेजे जा रहे हैं और इसी खुशी में आज यह पार्टी रखी गई है.’’

सभी अमृता को तारीफ की नजरों से देखने लगे. उसे बधाई देने वालों का तांता लग गया. तभी ऋतु ने आ कर अमृता को उस की उपलब्धि पर बधाई दी, साथ ही उस ने अमर को भी बधाई दी. अमर बोले, ‘‘ऋतुजी, यह तो आप की नजर है जो आप ने इसे परखा, नहीं तो हमें भी कहां मालूम था कि इतनी गुणी है हमारी अमृता.’’

अनजाने में अमर के मुंह से निकला ‘हमारी अमृता’ शब्द वीना के हृदय के सारे तार छेड़ गया और प्रतिध्वनि रूप में उस में से आवाजें आने लगीं, ‘हमारी अमृता… हमारी अमृता.’

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