भारतीय जनता पार्टी के बड़े-बड़े काम

भारतीय जनता पार्टी की सरकार लगातार बड़े एयरपोर्टों, सुंदर रेलवेस्टेशनों, चौड़ी आधुनिक कई लेन वाली सड़कों, मैट्रो के स्टेशनों, वंदे भारत ट्रेनों का गुणगान करती रहती है. देश की मिडिल क्लास इस पहुंच पर जम कर तालियां बजा रही हैं क्योंकि इन में से ज्यादातर किसी न किसी तीर्थस्थान को ही ले कर जाने के लिए बन रही हैं. इन सब के पीछे आम मजदूर, किसान, फैक्टरी को कोई सुविधा देना नहीं है.

मिडिल क्लास के पास जो थोड़ाबहुत पैसा आया है, उसे मंदिरों के मारफत मंदिर दुकानदारों के  हवाले करवाना है. जोकुछ नया बन रहा है, जिस का ढोल रातदिन बजाया जा रहा है वह ‘रामचरितमानस’ के आदेशों की तरह शूद्रों, गंवारों व औरत को पीटना है और पशुओं को इन रास्तों पर खाने में परोसना है. न ट्रेनों में, न बड़े ग्रीनफील्ड चौड़े नए रास्तों पर, न हवाईअड्डों पर सस्ती कारें दिखेंगी, न खचाखच भरी सवारियां. इन सब एयरकंडीशंड जगहों पर देश का वह वर्ग है जो भरपूर पैसे का आनंद उठा रहा है. देश की 140 करोड़ में से 120 करोड़ जनता आज भी बेसिक सुविधाओं के लिए तरस रही है.

आज भी दिल्ली जैसे शहर की डेढ़-2 करोड़ वाली जनसंख्या में से 30 फीसदी के पास सीवर का कनैक्शन नहीं है. लोग उन बस्तियों में भी सीवर कनैक्शन नहीं करा पाते जहां गली में सीवर आया हुआ है, क्योंकि उस के लिए भी 5,000 से 10,000 रुपए तक का खर्च है. देश के गांवों, कसबों और छोटे शहरों का क्या हाल होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है. सीवर या पानी का कनैक्शन न होने से मजदूर किसान यानी शूद्र और औरतें जो उन घरों को चलाते हैं, तरसते हैं. यह ताड़ना ही है.

‘रामचरितमानस’ के आदेश का अक्षरश: पालन किया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि सीवर या पानी कनैक्शन के लिए कोई विशेष साइंस चाहिए या मोटी रकम चाहिए. यह तो ग्रीनफील्ड सीधी 8 लेन की सड़कों पर जरूरत होती है, वंदे भारत ट्रेनों में जरूरत होती है, नए हवाईअड्डों पर जरूरत होती है. पर वहां आम औरत–चाहे सवर्ण घरों की ही क्यों न हो–या आम मजदूर और किसान नहीं जाते. सीवरपानी कनैक्शन तो उन बहुत सी छोटी सी सुविधाओं में से हैं जो शहरियों और फैलते गांवों के लिए अब जरूरी हैं.

देश के विकास के लिए सड़कों के जाल, तेज ट्रेनों, हवाईअड्डों की जरूरत है पर उस के साथ यह भी जरूरी है कि देश में गौतम अडानी जैसे पैदा न हों जो दुनिया के दूसरेतीसरे नंबर के हों जबकि देश में जितने गरीबी रेखा के नीचे हैं, वे दुनिया में नंबर 1 हों. देश से भूख, बीमारी और गंदगी दूर हो पहले, फिर गौतम अडानी बनें तो कोई हर्ज नहीं होगा. गरीबी, बीमारी, गंदगी दूर हो और आम साफ पानी पा सकें और साफ ?ाग्गी?ोंपड़ी में रह सकें.

यह सरकारों की पहली जिम्मेदारी है. शूद्र दलित नीची जाति के हैं. पिछले जन्मों के कर्मों का फल भोग रहे हैं, पहले पाप किए हैं इसलिए सवर्णों की औरतें भी पापयोनि में पैदा हुई हैं. इन का ढोल पीटा जाना जब बंद होगा तब सड़कों, हवाईअड्डों और ट्रेनों का ढोल पीटा जाए. देश का गरीब खुशहाल होगा तो अमीरों की सुविधाएं अपनेआप और बढ़ेंगी. पढ़ीलिखी, चुस्त लेबर फोर्स ही अमीरों की जिंदगी को खुशहाल करेगी.

पाकिस्तान को तबाह किया धर्म के दुकानदारों ने

पाकिस्तान अब लगभग ढहने लगा है और बड़ी बात है कि इस ढहने में भारत का कोई हाथ नहीं है. पाकिस्तान जो एक समय-अभी 20 साल पहले-भारत से थोड़ा ज्यादा अमीर था, आज कंगाल हो गया है. डौलर के मुकाबले उस का रुपया 250-300 के पास पहुंच गया है और उस के पास न तेल खरीदने के पैसे हैं, न बिजली बनाने लायक कोयला खरीदने के. भारत के दबाव ने नहीं, पाकिस्तान के धर्म के दुकानदारों ने उसे तहसनहस कर दिया है.

पाकिस्तानी अमीर उमराव इस का पैसा ले कर कब के निकल चुके हैं और दूसरे देशों में बस गए हैं जहां उन्हें इसी धर्म की कट्टरता के कारण शक से देखा जाता है. पाकिस्तान ने पश्चिमी देशों में फैली आतंकवादी घटनाओं को अपने यहां पनपने दिया था, यह दुनिया भूली नहीं है और उस का आज सब से करीबी दोस्त चीन भी अब पाकिस्तानी कट्टरता की वजह से नाराज सा चल रहा है.

कट्टरता को हरदम अपनी हथेलियों पर रखने की वजह से पाकिस्तानी जनता पर एक जुनून चढ़ा रहता है. वहां की पसमांदा जनता को लगातार धर्म की अफीम की गोलियां खिलाई जाती हैं, ताकि वे लोग भारत में फैली जाति व्यवस्था से डरे रहें. इसी जाति व्यवस्था की वजह से इन्होंने इसलाम अपनाया था और ईरान, तुर्की, अरब देशों, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान से आए ऊंचे कद के लंबेगोरे, आज पंजाबी बोलने वालों के हवाले अपने को कर दिया था. पर इन्हें मिला क्या?

जहां ऊंची जगहों पर बैठे लोग ऐयाशी की जिंदगी जी रहे हैं, आम पसमांदा मुसलमान गंदीमैली गलियों में बसे हैं और इसलाम का ढोल बजा रहे हैं. उन्हें देश की तरक्की की नहीं, इसलाम के आज बेमतलब हो चुके तौरतरीकों को लकीर का फकीर बन कर पीटने की आदत बन चुकी है.

भारत को इस का बड़ा सबक सीखना चाहिए. हम ने 1947 में धर्म की जगह संविधान, बराबरी, उदारता, धर्म को पीछे रखने का फार्मूला अपनाया और एक बेहद गरीब देश से खासे ठीकठाक पर गरीब लेकिन कंगले देश की तरह बन गए. पिछले 30 सालों में यहां जो लहरें उठाई जा रही हैं, वे हमें पाकिस्तान की राह पर ले जा रही हैं. हमारे यहां रातदिन हिंदूमुसलिम होता रहता है. कभी यूनिफौर्म सिविल कोड की बात होती है, तो कभी नैशनल रजिस्टर औफ सिटीजन्स की, जिस का निशाना भारत के मुसलमान ही हैं.

मुसलमानों को हिंदू गुंडों को ताकत दे कर बस्तियों में बंद कर दिया गया. गुजरात में 2002 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में नमूना दिखा दिया गया. आज भारत के मुसलमानों को न आजादी से व्यापार करने को मिल रहा है, न अपनी बात कहने का. हिंदू बस्तियों में उन्हें जगह नहीं मिलती. हिंदू कंपनियों में नौकरियां नहीं मिलतीं.

हिंदी के न्यूज चैनल लगातार मुसलिम अपराधियों पर घंटों बरबाद करते रहते हैं और हिंदू गुंडों के कारनामे डिजिटल कारपेटों के नीचे छिपा देते हैं. यह पाकिस्तान की तरह बनने की कोशिश है जिस में मंदिरमठ चलाने वाले शामिल हैं ही, उन्होंने आम हिंदू को भी कायल कर दिया है कि देश की मुसीबतों की वजह इसलाम है. पाकिस्तान ने यही काम कश्मीर का नाम ले कर किया था जिस का खमियाजा आज चौथी पीढ़ी बुरी तरह सह रही है.

हमारे यहां अभी तो दूसरी पीढ़ी ही हिंदू मूर्तियों को फैला रही है पर पाकिस्तान बनने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. इस के निशान दिखने लगे हैं. हिमालय विशाल है पर उस में भी दरारें पड़ती हैं, यह जोशीमठ याद दिला रहा है. भारत को पाकिस्तान या श्रीलंका न बनने दो.

कट्टरपंथी हिंदू और मुसलमान

कट्टरपंथियों ने हिंदूमुसलिम के जो बीज बोए हैं अब देश में अलगअलग शक्ल ले कर अलगअलग तरह के बीजों को जमीन देने लगे हैं. खेत में खलपरवार उगती है है तो वह एक ही तरह की नहीं होती. इस में बीसियों जहरीले पौधे भी होते हैं और उस में हर तरह के खतरनाक जानवर भी पनपने लगते हैं. पजाब में वारिस पंजाब दे नाम से बने गृह की जिम्मेदारी सीधेसीधे उन बजरंगियों पर जाती है जिन्होंने देश भर में कानून, संविधान, सभ्यता, बोलने की आजादी को पुलिस के मोटे जूतों और बुलडोजरों से रौंब है. अब दोनों पंजाब में किस तरह नाकाम हुए यह दिख गया है.

अमृपाल ङ्क्षसह के साथी कि पंजाब के अजचला पुलिस स्टेशन पर पकड़ कर रखे गए को छुड़ा लाए यह एक खतरनाक इशारा है. खेतों को बांधने वाली बाड़ अब टूटने लगी हैं. पंजाब की आम आदमी सरकार को कमजोर कह कर केंद्र सरकार अपना पीछा नहीं छुटा सकती. यह उसी की देन है कि अब इस तरह की घटना सारे देश में सुॢखयां बनने लगी हैं. कहीं अंबेडक़र की बेइज्जती की जा रही है, कहीं रामचरित्रमानस में लिखी देश की बड़ी जनता की ङ्क्षनदा पर हमला होने लगा है, कहीं जाति जनगणना होने की बात हो रही है. कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा मानो जो हो रहा था उस की पहले से दी गई चेतावनी थी.

पंजाब जैसी घटनाएं पहले भी हुई है. बाबरी मसजिद को गिराने से पहले और फिरगिराने के बाद देश इस तरह के जलजलों से परेशान होने लगा था. बाद में 2004 में भारतीय जनता पार्टी की हार से कुछ बात संभली थी पर अब फिर बिगड़ चुकी है.पंजाब का झगड़ा कहने को पुलिस और धर्म से जुड़े गुट का हो पर इन की जड़ में ङ्क्षहदू सिख मतभेद है जो वैसे नहीं दिखते पर पंजाब की राजनीति में अहम हैं.

आम आदमी पार्टी के अनगढ़ हाथों में ऐसा राज्य आ गया है जो न सिर्फ पाकिस्तान के साथ बार्डर पर है, 1947 के बाद कभी पूरी तरह शांत नहीं रहा. क्या पंजाबी सूवे की मांग, कभी पंजाबी की मांग, कभी गुरुद्वारा कानून पर झगड़ा, कभी सेना में भॢतयों का सवाल, कभी अपने ही दलित गुरू रामरहीम से झगड़ा उसी की निशानी है. पंजाब में सिख अलगाववादी तो उन से भी ज्यादा मुखर रहे हैं जिन्हें अरबन

नक्सल, माओवादी, देशद्रोही जैसे वालों से पुकारा जाता है. जनता को 2-3 हिस्सों में बांट देने वाली यह नीति कुछ समय तक तो सर्दी में हाथ तापने वाली आग का काम करती है पर फिर पतंगे फैलने लगते हैं और बस्तियां जलने लगती हैं. अब हम उस कोने पर आने लगे हैं. अब क्या कुछ करा सकता है. शायद नहीं. यह वह कोविड वायरस है जिस की वैक्सीन बनाने की खोज भी नहीं हो रही है.

दिल्ली : मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी, सियासत के फंदे में दिल्ली की आधी सरकार

अरविंद केजरीवाल की मजबूत दिल्ली सरकार में वित्त, योजना, शिक्षा, भूमि और भवन, जागरूकता, सेवा, श्रम, रोजगार, लोक निर्माण विभाग, कला और संस्कृति और भाषाएं, ऊर्जा, आवास, शहरी विकास, जल, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण, इंडस्ट्रीज, आबकारी, स्वास्थ्य के अलावा कई और मंत्रालय संभालने वाले उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को 26 फरवरी, 2023 को शराब घोटाला मामले में सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया था.

मंत्रालयों के लिहाज से दिल्ली की आधी सरकार चलाने वाले मनीष सिसोदिया को शायद इस बात की भनक पहले से ही लग गई थी, तभी तो सीबीआई दफ्तर रवाना होने से पहले उन्होंने दिल्ली वालों के नाम एक चिट्ठी लिखी थी, जिसे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शेयर किया था.

इस चिट्ठी में मनीष सिसोदिया ने किसी का नाम लिए बगैर कहा था कि ‘ये लोग आज मुझे गिरफ्तार करने वाले हैं. उन्होंने मुझ पर झूठे आरोप लगाए हैं. मुझे यकीन है कि ये सभी मामले अदालत में खारिज हो जाएंगे, लेकिन इस में कुछ समय लग सकता है. हो सकता है मुझे कुछ समय के लिए जेल में रहना पड़े , लेकिन मैं इसे ले कर बिलकुल भी चिंतित नहीं हूं.’

मनीष सिसोदिया का ‘ये लोग’ कहना एक बड़ा इशारा है कि किस तरह देश की केंद्र सरकार दिल्ली में आम आदमी पार्टी को कमजोर करने के लिए सरकारी एजेंसियों का सहारा ले रही है और दिल्ली में शिक्षा की बेहतरी को बड़ा आंदोलन बनाने वाले ‘शरीफ उपमुख्यमंत्री’ पर ही बड़ा वार किया है.

दूसरी ओर आबकारी घोटाला मामले में सीबीआई का आरोप था कि मनीष सिसोदिया के कंप्यूटर से कुछ फाइलें डिलीट कर दी गई थीं. इन्हें फौरैंसिक टीम ने रिट्राइव किया. इन में मनीष सिसोदिया के खिलाफ अहम सबूत मिले.

इस मामले में सीबीआई ने 17 अगस्त, 2022 को मामला दर्ज किया था. सीबीआई ने 6 महीने की जांच और कई ठिकानों पर छापेमारी के बाद मनीष सिसोदिया के खिलाफ यह कार्यवाही की. इस से पहले मनीष सिसोदिया को अक्तूबर, 2022 में भी पूछताछ के लिए बुलाया गया था.

याद रहे कि सीबीआई ने 17 अगस्त, 2022 को नई आबकारी नीति (2021-22) में धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी के आरोप में मनीष सिसोदिया समेत 15 लोगों पर मामला दर्ज किया था. 19 अगस्त, 2022 को सीबीआई ने मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के 3 और सदस्यों के आवास पर छापा मारा था.

मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से सीबीआई को क्या मिलेगा या मनीष सिसोदिया का आगे क्या होगा, यह तो देरसवेर पता चल ही जाएगा, पर एक बड़ा सवाल यहां यह उठता है कि अब अरविंद केजरीवाल 33 में से 18 महकमे संभालने वाले मनीष सिसोदिया की भरपाई कैसे करेंगे और कौन ऐसा चेहरा होगा जो दिल्ली की आम आदमी पार्टी को मजबूती देगा?

यह सवाल पूछने की सब से बड़ी वजह यह है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पास कोई भी महकमा नहीं है. आम आदमी पार्टी के कद्दावर नेता सत्येंद्र जैन पहले से ही जेल में बंद हैं. मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी भी चुन कर ऐसे समय हुई, जब बोर्ड के इम्तिहान शुरू हो गए थे. दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग के कामों पर इस गिरफ्तारी का यकीनन असर पड़ेगा.

इतना ही नहीं, पंजाब में जो अलगाववाद का ढिंढोरा पीटा जा रहा है और वहां आम आदमी पार्टी को कमजोर किए जाने की जो कोशिश हो रही है, उसी के साथसाथ राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं और साल 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में भी यह पार्टी जुटी हुई है. पर अब मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से आम आदमी पार्टी की राह में सियासी दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं.

तो क्या यह समझ लिया जाए कि आगामी चुनावों के मद्देनजर यह केंद्र सरकार द्वारा आम आदमी पार्टी को कमजोर करने की कोई साजिश है? इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि जिस तरह से अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के बाद पंजाब में अपनी जीत का परचम लहराया है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है.

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के साथसाथ अकाली दल भी इसी मुगालते में था कि पंजाब के लोग अरविंद केजरीवाल पर भरोसा नहीं करेंगे, पर उन सब दलों ने मुंह की खाई और बेशक आम आदमी पार्टी का कोई सियासी विचार या नीतियां नहीं हैं, फिर भी उस ने एक बार को वह कर के दिखा दिया जो उस ने कहा था.

केंद्रीय एजेंसियों का शिकार बन चुके शिव सेना के तेजतर्रार नेता संजय राउत ने इस मसले पर मनीष सिसोदिया का पक्ष लेते हुए कहा, “सिसोदिया पर हुई कार्यवाही बताती है कि केंद्र सरकार विपक्ष का मुंह बंद कराना चाहती है. हम सिसोदियाजी के साथ हैं. महाराष्ट्र हो, झारखंड हो, दिल्ली हो, केंद्र सीबीआई और ईडी का इस्तेमाल कर विपक्षी नेताओं को जेल भेज रही है या उन्हें समर्पण करने पर मजबूर कर रही है, चाहे वे सिसोदिया हों, नवाब मलिक हों, अनिल देशमुख हों या फिर मैं. क्या भाजपा में सारे संत हैं?” संजय राउत का यह उछलता सवाल भाजपा कैच कर पाएगी या नहीं, यह तो फिलहाल कहा नहीं जा सकता, पर जनता यह सोचने पर जरूर मजबूर होगी कि क्या वाकई भाजपा में सारे संत हैं?

दलित समाज: एक पिछड़ा वर्ग

कांवड़ ढोने, मंदिरों में लंगरोंके बाद फैली पत्रलों को बटोरने वाले, मंदिरों और मठों के बाहर की सफाई करने वाली दलित धर्म और मंदिरों के लिए जरूरी हैं पर अगर जो जोशीमठ धंस रहा है और उस में उन की बल्लियां भी धंस रही हैं तो यह उन के पिछले जन्मों के कर्मों का फल है, सरकारी, प्रशासन, तिलकधारी उन को न सहायता देंगे, न फिर बसाएंगे.

उत्तराखंड के जोशीमठ शहर में चल रहे राहत के काम में वहां की गांधी के कालोनी के लोगों को न रजिस्टर किया जा रहा और न पूरी सहायता दी जा रही है क्योंकि वे शड्यूल कास्ट हैं, रामचरित मानस ने जिस अब फिर चर्चा में आए ढोर, गंवार, शूद्र, पशु अब नारी दोहन उस हर जने की ताकत का स्रोत है जो किसी ओहदे पर बैठा है.

असल में ङ्क्षहदूमुसलिम झगड़ा इसीलिए खड़ा किया जाता है कि शूद्र यानी पिछड़े ओबीसी अपना हक मांगते हुए तुलसीदास के कानून को याद रखें. उन्हें पीटना चाहिए. दिया नहीं जाने चाहिए. तुलसीदास ने तो उन दलितों की तो बात भी नहीं की जो जोशीमठ की गांधी कालोनी में रहते हैं. दलितों की बात तो पूरे पौराणिक साहित्य में न के बराबर की गई है.

पिछड़े और दलित उलझे रहें और पिछड़े लठैत एससी दलितों को दबा कर रखते रहें इसलिए उन्हें भगवा टुपट्टे दे दिए है और नारे मुसलमानों के खिलाफ दिए हैं. इस शोर में कि दलितों का रोल किसे सुनाई देगा. संविधान ने इन के लिए खास जगह अंबेडकर गांधी के पूना पैक्ट के हिसाब से बनाई पर वह जमीन पर लागू नहीं हो पाती. दलितों की बस्तियां हर शहर में कूढ़े के ढेरों की तरह दिखती हैं. उन के मायावती और प्रकाश अंबेडकर जैसे नेता भी अपने सुखों की खातिर में खुद को कभी इस पार्टी को तो कभी उस पार्टी को भेंट करते रहते हैं. जोशीमठ में उन के साथ क्या हो रहा है. इस पर किसी के आंसू नहीं बह रहे जबकि वहां के धंसने से परेशान ऊंचे लोगों का पैसा, जमीन, चिकित्सा सब दिया जा रहा है.

ये वे दलित है जिन्हें उत्तराखंड के मंदिरों में आज भी घुसने नहीं दिया जाता. यह बात दूसरी है कि वे अगर घुस भी जाएं तो अपनी जेब ढीली करके आएंगे क्योंकि मूॢतयां तो भोगती हैं, देती नहीं. ये मूॢतयों के नाम पर कुछ को सजा मिलती है, कुछ के व्यापार चमकते हैं, कुछ जमीनें हड़पते हैं, कुछ अंधभक्तों को लूटने का लाइसेंस पाते हैं. दलितों को मूॢतयों से क्या मिलेगा जब मूॢतयों के नाम ही उन्हें ढोर, गंवार, शूद्र और पशु भी मानने को तैयार नहीं हैं.

लैक्ट कहे जाने वाले ऊंची जातियों के युवाओं को जो लोग हर समय गालियां देते हैं क्योंकि वे अंधभक्ति को नकारते हैं और हिमालय को बनाना चाहते हैं, वे भला उन दलितों की क्या सुनेंगे जो हजारों सालों से बात करने लायक भी नहीं समझे गए. बाहरी आक्रमण करने वालों ने उन को बराबर का दर्जा दिया, काम दिया, मौका दिया पर जब फिर ऊंची जातियों की सरकारें या ऊंचे राजा रजवाड़ों का युग आया, उस से सब कुछ छीन लिया गया.

देश भर में जो बुल्डोजर झुग्गियों पर चलते हैं उन में आमतौर पर यही लोग रहते हैं और अगर ङ्क्षजदा रहते हैं तो इसलिए कि वे ऊंचों की सेवा कर सकें. जोशीमठ के घंसने के समय उन की सेवा ऊंचे करेंगे, यह उम्मीद करना ही बेवकूफी है.

आरक्षण : पिछड़े और दलितों को लड़ाने की साजिश

सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) यानी गरीब सवर्ण तबके के आरक्षण को बरकरार रखने का फैसला देते हुए आरक्षण के मामले में 50 फीसदी की सीमा रेखा को पार करने को जायज ठहरा दिया है, जबकि ओबीसी वर्ग को 50 फीसदी सीमा पार करने की जब बात होती है, तब सुप्रीम कोर्ट इस सीमा को संवैधानिक सीमा मान लेता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से साल 1993 के अपने ही उस फैसले को पलट दिया है, जिस में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की पीठ ने 27 फीसदी पिछड़े वर्ग, 15 फीसदी दलित वर्ग और 7.5 फीसदी अतिदलित वर्ग के कुल योग 49.5 फीसदी आरक्षण से आगे बढ़ाने से मना कर दिया था.अब सवर्ण गरीबों के 10 फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट से भी हरी ?ांडी मिलने के बाद आरक्षण 50 फीसदी की सीमा रेखा को लांघ कर 59.5 फीसदी पर पहुंच गया है. 7 नवंबर, 2022 को ईडब्ल्यूएस आरक्षण की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट के सवर्ण जजों ने सवर्णों के हक में स्वर्णिम फैसला सुना कर मोदी सरकार द्वारा साल 2019 में संविधान में संशोधन कर ईडब्ल्यूएस सवर्णों को जो 10 फीसदी आरक्षण दिया था, उस को जायज करार दे दिया.

मतलब, अब देश में 60 फीसदी आरक्षण हो गया है, जबकि इसी सुप्रीम कोर्ट ने साल 1992 में, जब मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार ओबीसी को उस की आबादी के अनुपात में 52 फीसदी आरक्षण दिया जाना था, ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला सुनाया था कि देश में कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए, क्योंकि एससीएसटी का 22-50 फीसदी आरक्षण पहले से ही था. इस का मतलब हुआ कि कुल 110 स्थानों में जहां पहले पिछड़ों और दलितों के 55 स्थान होते थे, अब 50 ही रह जाएं.

देश में ओबीसी विधायकों और सांसदों की संख्या 1,500 से भी ज्यादा है, लेकिन दुख की बात है कि ये नेता विधानसभाओं और लोकसभा में कभी भी ओबीसी के अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ते. कमोबेश यही हालत एससीएसटी विधायकसांसदों की है.

देश के ओबीसी अब यह अच्छी तरह सम?ा लें कि उन के अधिकारों की लड़ाई कोई राजनीतिक दल या उन के समाज के विधायकसांसद न कभी पहले लड़े थे और आगे भी कभी नहीं लड़ेंगे. जिस तरह एससीएसटी के लोगों ने अपने ऐट्रोसिटी ऐक्ट को बचाने के लिए 2 अप्रैल, 2018  को बिना किसी नेता और राजनीतिक दल के पूरे देश में सड़कों पर उतर कर आंदोलन किया था और जिस के बाद मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए मजबूर होना पड़ा था और संविधान में संशोधन कर ऐट्रोसिटी ऐक्ट को बहाल किया था, वैसा ही अब कुछ करना होगा.

देखा जाए तो कुल जनसंख्या अनुपात में ओबीसी का आंकड़ा बड़ा है. भारत में समाज कल्याण की जितनी भी योजनाएं फेल हो रही हैं, उस का मुख्य कारण भी यही है कि ओबीसी समाज के पास जातिगत जनसंख्या का कोई आंकड़ा नहीं है. केंद्र में ओबीसी के लिए मंत्रालय बना है, ओबीसी आयोग बना है, विभिन्न राज्यों में ओबीसी मंत्रालय, विभाग व आयोग बने हुए हैं, मगर ओबीसी का आंकड़ा उपलब्ध न होने के कारण कम फंड जारी होता है, और जो जारी होता है वह या तो विभागों के वेतन पर ही खर्च हो जाता है या केंद्र का फंड राज्य के लिए उपयोग में ले लेते हैं, क्योंकि जनसंख्या का आंकड़ा उपलब्ध न होने का बहाना जरूर उपलब्ध है.

आज तो ओबीसी नेताओं और ओबीसी के जातीय संगठनों का हाल यह है कि वे ऊंचे वर्ग के सामने पूरी तरह से समर्पण कर चुके हैं और जो न्यायपूर्ण तरीके से 27 फीसदी आरक्षण मिला था, उस को भी नहीं बचा पा रहे हैं. ओबीसी का बुद्धिजीवी वर्ग सचाई लिखता तो है, मगर कोई सम?ाने या लड़ने वाला नहीं है. उस के वर्ग के अफसर बहुत हैं, पर वे हकों के लिए लड़ने को तैयार नहीं हैं.

ब्राह्मणवाद के शिकंजे में पिछड़ा समाज

साल 2011 की जनगणना में ओबीसी की गिनती को ले कर लालू प्रसाद यादव ने दबाव बनाया था और गिनती हुई भी, लेकिन उस को जारी नहीं किया गया. उस के बाद लालू प्रसाद यादव को कई केसों में फंसा दिया गया. बाद में राजद के दबाव में नीतीश सरकार ने ओबीसी की जनगणना का प्रस्ताव बिहार विधानसभा में पास कर के भेजा, लेकिन उस के बाद की प्रक्रिया पर विचारविमर्श बंद कर दिया गया.

अब पिछले दिनों केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि ओबीसी की जनगणना के आंकड़े साल 2021 के सैंसैक्स में शामिल नहीं किए जाएंगे. ऊंचे वर्गों की सरकारें ओबीसी समुदाय को पढ़ाई और सरकारी नौकरी के हकों में शामिल नहीं करना चाहती हैं, जबकि धर्मों की दुकानों में जाने के रास्ते खुले हैं.

अंगरेजों ने साल 1881 में जाति आधारित जनगणना की शुरुआत की थी और उन आंकड़ों से जो सचाई सामने आई, उन को आधार बना कर महात्मा ज्योतिबाराव फुले ने सब से पहले विभिन्न जातियों को आबादी में उन के हिस्से के मुताबिक सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिए जाने की मांग उठाई थी.

आंकड़ों से साफ हो गया था कि सरकारी नौकरियों में जाति विशेष का एकछत्र कब्जा है. उन्होंने इस बारे में अपनी पुस्तक ‘शेतकर्याचा असुड़’ (किसान का चाबुक, 1883) में लिखा है.

साल 1901 की जनगणना को आधार बना कर कोल्हापुर के राजा शाहूजी महाराज ने साल 1902 में अपने राज्य में 50 फीसदी आरक्षण लागू किया था, जिस के लिए उन्हें ब्राह्मणों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस के कद्दावर ब्राह्मण नेता बाल गंगाधर तिलक ने भी उन का विरोध किया था.

जाति आधारित जनगणना अंतिम बार साल 1931 में हुई थी और उस के अनुसार भारत में ओबीसी की संख्या

52 फीसदी थी. साल 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण जनसंख्या का विवरण अटक गया और आजादी के बाद 1951 में पहली जनगणना हुई, मगर जाति आधारित जनगणना छोड़ दी गई.

भीमराव अंबेडकर ने संविधान में अनुच्छेद-340 के तहत ओबीसी के उत्थान का प्रावधान किया था, जिस के तहत सरकार को संविधान लागू करने के एक साल के भीतर ओबीसी आयोग का गठन करना था.

साल 1951 में जाति आधारित जनगणना न करने व ओबीसी आयोग का गठन न करने के कारण दुखी हो कर अंबेडकर ने 10 अक्तूबर, 1951 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था.

नेहरू सरकार ने दबाव में आ कर 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में ओबीसी आयोग का गठन किया व इस आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट दी. कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं, हिंदू महासभा आदि ने यह कह कर इस को लागू करने से रोक दिया कि ओबीसी जनसंख्या के आंकड़े साल 1931 के हैं.

साल 1955 से ले कर साल 1977 तक जनगणना के समय जाति आधारित गिनती का यह कह कर विरोध करते रहे कि इस से देश कमजोर होगा व ओबीसी को हक देने की बात आती तो यह कह कर विरोध करने लग जाते कि नवीनतम आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए लागू नहीं किया जा सकता.

साल 1977 में समाजवादियों के दबाव में वीपी मंडल की अध्यक्षता में दोबारा ओबीसी आयोग बनाया और उठापटक के बीच साल 1980 में रिपोर्ट देते हुए मंडल ने कहा कि मैं यह रिपोर्ट विसर्जित कर रहा हूं.उन को अंदेशा था कि कुछ होगा नहीं, मगर साल 1989 में वीपी सिंह की सरकार बनी और समाजवादियों के दबाव में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का आदेश दे दिया गया.

मंडल के खिलाफ ब्राह्मण वर्ग ने कमंडल आंदोलन शुरू कर दिया और 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के आंकड़ों का हवाला देते हुए 27 फीसदी तक आरक्षण सीमित कर दिया और ऊपर से क्रीमीलेयर थोप दिया गया. सब से बड़ा खेल यह किया गया कि ओबीसी आरक्षण को महज सरकारी नौकरियों तक सीमित कर दिया गया.

कम्यूनिस्ट पार्टियों का इन आंकड़ों से कोई लेनादेना ही नहीं है, क्योंकि वे जाति संबंधी मुद्दों को नजरअंदाज करने का ढोंग करती आई हैं. एक तरह से मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अभियान में कांग्रेस व भाजपा के साथ उन के ज्यादातर नेता ब्राह्मण वर्ग के ही थे. आरएसएस व सभी हिंदू समूह और ब्राह्मण सभाएं मंडल विरोधी आंदोलन की अगली लाइन में थीं.

एससीएसटी वर्ग के लोग जितने मंडल आयोग के समर्थन में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे, वे अब ओबीसी की जनगणना को ले कर उतने मुखर नजर नहीं आते हैं. इस के 2 कारण हो सकते हैं. पहला तो एससीएसटी की जनसंख्या की गणना होती है व दूसरा मंडल आयोग के समर्थन से जो ओबीसी नेताओं से उम्मीद थी, वह धूमिल हुई है.

नजरअंदाज ओबीसी की सरकार में भागीदारी

आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय मंत्रालयों में अवर सचिव से ले कर सचिव व निदेशक स्तर के 747 अफसरों में महज 60 अफसर एससी, 24 अफसर एसटी व 17 अफसर ओबीसी समुदाय के हैं यानी ऊंचे सरकारी पदों पर दलितों का प्रतिनिधित्व महज 15 फीसदी है, जबकि सामान्य वर्ग से तकरीबन 85 फीसदी अफसर इन पदों पर कार्यरत हैं और ओबीसी समुदाय तो कहीं नजर ही नहीं आता है.

केंद्र सरकार में सचिव रैंक के

81 अधिकारी हैं, जिस में केवल 2 अनुसूचित जाति के और 3 अनुसूचित जनजाति के हैं व ओबीसी शून्य. 70 अपर सचिवों में केवल 4 अनुसूचित जाति के और 2 अनुसूचित जनजाति के हैं व 3 ओबीसी के हैं. 293 संयुक्त सचिवों में केवल 21 अनुसूचित जाति के और 7 अनुसूचित जनजाति के व 11 ओबीसी के हैं. निदेशक स्तर पर 299 अफसरों में 33 अनुसूचित जाति के और 13 अनुसूचित जनजाति के और 22 ओबीसी के अधिकारी हैं.

केंद्र सरकार की ग्रुप ए की नौकरियों में अनुसूचित जाति की भागीदारी का फीसदी 12.06 है, पिछड़ा वर्ग की भागीदारी 8.37 फीसदी है. सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 74.48 फीसदी है. गु्रप बी की नौकरियों में अनुसूचित जाति की भागीदारी का फीसदी 15.73 है, पिछड़ा वर्ग की भागीदारी का 10.01 फीसदी है, जबकि सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 68.25 फीसदी है. गु्रप सी की नौकरियों में अनुसूचित जाति की भागीदारी का फीसदी 17.30 है, पिछड़ा वर्ग की भागीदारी का 17.31 फीसदी है, जबकि सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 57.79 फीसदी है.

वहीं केंद्र सरकार के उपक्रमों की नौकरियों में अनुसूचित जाति की भागीदारी का फीसदी 18.14 है, पिछड़ा वर्ग की भागीदारी 28.53 फीसदी है, जबकि सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 53.33 फीसदी है. यूजीसी के आरटीआई द्वारा मिले जवाब के मुताबिक, देशभर में कुल 496 कुलपति हैं. इन 496 में से केवल

6 एससी, 6 एसटी और 36 ओबीसी कुलपति हैं. इस के अलावा बाकी बचे सभी 448 कुलपति सामान्य वर्ग के हैं. मतलब, देश की 85 फीसदी आबादी (एससी, एसटी और ओबीसी) से 48 कुलपति और 11 फीसदी आबादी (सामान्य) से 448 कुलपति. प्रधानमंत्री के कार्यालय में एक भी ओबीसी अधिकारी नहीं है. जहां से पूरे देश के लिए नीति निर्माण के फैसले होते हैं, वहां देश की 65 आबादी का कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है. न्यायपालिका आजादी के समय ही दूर चली गई थी. सोशल जस्टिस की लड़ाई को धार्मिक ?ांडों के हवाले कर दिया गया है.

गरीबी का दोहरा मापदंड क्यों

जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने ईडब्ल्यूएस के 10 फीसदी आरक्षण को बरकरार रखने के अपने फैसले में कहा कि आरक्षण गैरबराबरी वालों को बराबरी पर लाने का लक्ष्य हासिल करने का एक औजार है. इस के लिए न सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है, बल्कि किसी और कमजोर क्लास को भी शामिल किया जा सकता है. जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के ईडब्ल्यूएस के पक्ष में फैसले और खासकर जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की टिप्पणी के बाद आने वाले दिनों में अन्य जातियां भी खुद को आरक्षण के दायरे में लाने की मांग करने लगेंगी और मुमकिन है कि इन में से कुछ नए वर्गों को आरक्षण के दायरे में लाने का रास्ता साफ हो, क्योंकि सरकार को अपनी वोट बैंक की राजनीति करनी है और इस के लिए वह किसी भी ऐसे तबके को नाराज नहीं करना चाहेगी, जिस का वोट बैंक किसी राज्य में हार या जीत तय करने की ताकत रखता हो. मसलन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में जाट इस निर्णायक भूमिका में रहते हैं.

केंद्र सरकार के सामने बड़ी चुनौती

अब आने वाले दिनों में आरक्षण के बंटवारे को ले कर देश में एक बड़ा विवाद छिड़ सकता है, जिसे शांत करने में सरकार के पसीने छूटेंगे, क्योंकि हर तबके के लोग अपने हिस्से की नौकरियों में किसी दूसरे तबके का किसी भी हालत में दखल नहीं चाहते हैं, इसलिए हर जाति और तबके के लोग अपनेअपने लिए आरक्षण की मांग सरकार से करते रहे हैं.

इस में कोई दोराय नहीं है कि आज पूरे देश में धर्म और जाति की राजनीति हो रही है, ऊपर से हर जाति के लोग अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं. ऐसे में सवर्णों के इस 10 फीसदी आरक्षण ने आग में घी का काम किया है, जिस के नतीजे अच्छे तो नहीं होने वाले, क्योंकि अगर आप को याद हो, तो ओबीसी आरक्षण लागू होने के समय को याद कीजिए, जब सुप्रीम कोर्ट ने साल 1992 में ओबीसी आरक्षण की

52 फीसदी की मांग को घटा कर खुद 27 फीसदी किया था और कहा था कि आरक्षण को 50 फीसदी से ज्यादा नहीं किया जा सकता. आज यही आरक्षण 50 फीसदी के पार जा कर 59.5 फीसदी पर पहुंच चुका है. ऐसे में जाहिर है कि इस से अब आरक्षण को ले कर नएनए विवाद पैदा होंगे और बहुत सी जातियों के लोग, जिन्होंने अब तक अलग आरक्षण की मांग नहीं की है, सब के सब अब अलगअलग आरक्षण की मांग कर सकते हैं, जिस का असर आगामी आम चुनाव में साफसाफ दिखाई देगा.

जाति के अधार पर होती है शादियां

ऊंची जातियोंखासतौर पर ब्राह्मणों को एक परेशानी यह रहती है कि हिंदू समाज में चतुर्वर्ण के नाम से जानी जाने वाली 4 जातियों के लोग कितने मिलते हैंयह न पता चले. 1872 से जब से अंगरेजों ने जनगणना शुरू की थीउन्होंने जाति के हिसाब से ही लोगों की गिनती शुरू की थी. उन्होंने तो धर्म को भी बाहर कर दिया था.

1949 में जब कांग्रेस सरकार आई तो वह मोटेतौर पर कट्टर तौर पर ब्राह्मणों की सरकार थी या उन की थी जो ब्राह्मणों के बोल को अपना भाग समझते थे. वल्लभभाई पटेलराजेंद्र प्रसाद जैसे नेता घोर जातिवादी थे. जवाहर लाल नेहरू ब्राह्मणवादी न होते हुए भी ब्राह्मण लौबी को मना नहीं पाए और भीमराव अंबेडकर की वजह से शैड्यूल कास्ट और शैड्यूल ट्राइबों की गिनती तो हुई पर बाकी ब्राह्मणोंक्षत्रियोंवैश्यों व शूद्रों यानी पिछड़ों की जातियों की गिनती नहीं हुई. कांग्रेस ने 195119611971198119912001 (वाजपेयी)2011 में जनगणना में जाति नहीं जोड़ी.

नरेंद्र मोदी की 2021 (जो टल गई) में तो जाति पूछने का सवाल ही नहीं उठता था. इसलिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चौंकाने वाला फैसला लिया कि वे अलग से एक माह में बिहार में जातियों के हिसाब से गिनती कराएंगे.

गिनती इसलिए जरूरी है कि पिछड़े जो एक अंदाजे से हिंदू आबादी के 60 फीसदी हैंसरकारी नौकरियोंपढ़ाईप्राइवेट नौकरियों में मुश्किल से 10 फीसदी हैं. जनता की 3 फीसदी ऊंची ब्राह्मण जातियों ने सरकारी रुतबे वाले ओहदों में से 60-70 फीसदी पर कब्जा कर रखा है. प्राइवेट सैक्टर का 60-70 फीसदी 3 फीसदी बनियों के पास है. 60-70 फीसदी पिछड़ों और 20 फीसदी शैड्यूल कास्टों के पास निचले मजदूरीकिसानीघरों में नौकरी करनेसेना में सिपाही बननेपुलिस में कांस्टेबलसफाईढुलाईमेकैनिक बनने जैसे काम हैं. उन्हें शराब व धर्म का नशा बहकाता है और इसी के बल पर पहले कांग्रेस ने राज किया और अब भाजपा कर रही है.

पढ़ाई के दरवाजे खोलने और सरकारी रुतबों वाली नौकरियां देने के लिए रिजर्वेशन एक अच्छा और अकेला तरीका है और सही रिजर्वेशन तभी दिया जा सकता है जब पता रहे कि कौन कितने हैं. जाति की गिनती का काम इसलिए जरूरी है कि देश के पंडों ने ही हिंदुओं को जातियों में बांट रखा है और अब थोड़ी मुट्ठीभर सस्ती पढ़ाई की सीटें या रुतबे वाली कुरसियां हाथ से निकल रही हैं तो वे जाति नहीं’ है का हल्ला मचा रहे हैं.

आज किसी युवक या युवती का शादी के लिए बायोडाटा देख लो. उस में जातिउपजातिगौत्र सब होगा. क्योंअगर जाति गायब हो गई है तो लोग क्यों एक ही जाति में शादी करें. अगर ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य शादियां आपस में कर लें तो इसे अंतर्जातीय शादियां नहीं कहा जा सकता. समाज ब्राह्मण युवती के साथ जाट युवक और क्षत्रिय युवक के साथ शैड्यूल कास्ट युवती की शादी को जब तक आम बात न मान ले तब तक देश में जाति मौजूद हैमाना जाएगा.

रिजर्वेशन के लिए जाति गणना जरूरी है पर यह सामाजिक बुराई दूर करने की गारंटी नहीं है. लोगों के दफ्तरों में जाति गुट बना लिए. छात्रों ने स्कूलों और कालेजों में बना लिए हैं. नीतीश कुमार के पास इस मर्ज की कोई वैक्सीन है क्यारिजर्वेशन सरकारी शिक्षा की सीटें और पावर की सीटों पर छोटा सा हिस्सा देने के लिए ऐसा ही है जैसे कोविड के लिए डोलोपैरासीटामोल (क्रोसीन) लेनाइस से ज्यादा नहीं. यह बीमारी से नहीं लड़ने की ताकत देती हैबीमार को राहत देती है. पर जब तक वैक्सीन न बनेयही सही.

जातिवाद के नाम पर हुई जनगणना

ऊंची जातियों, खासतौर पर ब्राह्मणों को एक परेशानी यह रहती है कि हिंदू समाज में चतुर्वर्ण के नाम से जानी जाने वाली 4 जातियों के लोग कितने मिलते हैं, यह न पता चले. 1872 से जब से अंगरेजों ने जनगणना शुरू की थी, उन्होंने जाति के हिसाब से ही लोगों की गिनती शुरू की थी. उन्होंने तो धर्म को भी बाहर कर दिया था.

1949 में जब कांग्रेस सरकार आई तो वह मोटेतौर पर कट्टर तौर पर ब्राह्मणों की सरकार थी या उन की थी जो ब्राह्मणों के बोल को अपना भाग समझते थे. वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद जैसे नेता घोर जातिवादी थे. जवाहर लाल नेहरू ब्राह्मणवादी न होते हुए भी ब्राह्मण लौबी को मना नहीं पाए और भीमराव अंबेडकर की वजह से शैड्यूल कास्ट और शैड्यूल ट्राइबों की गिनती तो हुई पर बाकी ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों व शूद्रों यानी पिछड़ों की जातियों की गिनती नहीं हुई. कांग्रेस ने 1951, 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 (वाजपेयी), 2011 में जनगणना में जाति नहीं जोड़ी.

नरेंद्र मोदी की 2021 (जो टल गई) में तो जाति पूछने का सवाल ही नहीं उठता था. इसलिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चौंकाने वाला फैसला लिया कि वे अलग से एक माह में बिहार में जातियों के हिसाब से गिनती कराएंगे.

गिनती इसलिए जरूरी है कि पिछड़े जो एक अंदाजे से हिंदू आबादी के 60 फीसदी हैं, सरकारी नौकरियों, पढ़ाई, प्राइवेट नौकरियों में मुश्किल से 10 फीसदी हैं. जनता की 3 फीसदी ऊंची ब्राह्मण जातियों ने सरकारी रुतबे वाले ओहदों में से 60-70 फीसदी पर कब्जा कर रखा है. प्राइवेट सैक्टर का 60-70 फीसदी 3 फीसदी बनियों के पास है. 60-70 फीसदी पिछड़ों और 20 फीसदी शैड्यूल कास्टों के पास निचले मजदूरी, किसानी, घरों में नौकरी करने, सेना में सिपाही बनने, पुलिस में कांस्टेबल, सफाई, ढुलाई, मेकैनिक बनने जैसे काम हैं. उन्हें शराब व धर्म का नशा बहकाता है और इसी के बल पर पहले कांग्रेस ने राज किया और अब भाजपा कर रही है.

पढ़ाई के दरवाजे खोलने और सरकारी रुतबों वाली नौकरियां देने के लिए रिजर्वेशन एक अच्छा और अकेला तरीका है और सही रिजर्वेशन तभी दिया जा सकता है जब पता रहे कि कौन कितने हैं. जाति की गिनती का काम इसलिए जरूरी है कि देश के पंडों ने ही हिंदुओं को जातियों में बांट रखा है और अब थोड़ी मुट्ठीभर सस्ती पढ़ाई की सीटें या रुतबे वाली कुरसियां हाथ से निकल रही हैं तो वे ‘जाति नहीं’ है का हल्ला मचा रहे हैं.

आज किसी युवक या युवती का शादी के लिए बायोडाटा देख लो. उस में जाति, उपजाति, गौत्र सब होगा. क्यों? अगर जाति गायब हो गई है तो लोग क्यों एक ही जाति में शादी करें. अगर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शादियां आपस में कर लें तो इसे अंतर्जातीय शादियां नहीं कहा जा सकता. समाज ब्राह्मण युवती के साथ जाट युवक और क्षत्रिय युवक के साथ शैड्यूल कास्ट युवती की शादी को जब तक आम बात न मान ले तब तक देश में जाति मौजूद है, माना जाएगा.

रिजर्वेशन के लिए जाति गणना जरूरी है पर यह सामाजिक बुराई दूर करने की गारंटी नहीं है. लोगों के दफ्तरों में जाति गुट बना लिए. छात्रों ने स्कूलों और कालेजों में बना लिए हैं. नीतीश कुमार के पास इस मर्ज की कोई वैक्सीन है क्या? रिजर्वेशन सरकारी शिक्षा की सीटें और पावर की सीटों पर छोटा सा हिस्सा देने के लिए ऐसा ही है जैसे कोविड के लिए डोलो, पैरासीटामोल (क्रोसीन) लेना, इस से ज्यादा नहीं. यह बीमारी से नहीं लड़ने की ताकत देती है, बीमार को राहत देती है. पर जब तक वैक्सीन न बने, यही सही.

 

आदिवासी आरक्षण: सवालों की सूली पर

होना तो यह चाहिए था कि आदिवासी समुदाय की होने के नाते छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुइया उइके नए विधेयक का स्वागत करते हुए न केवल उस पर दस्तखत कर अपनी मंजूरी देतीं, बल्कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का शुक्रिया भी अदा करतीं, जो उन्होंने गैरआदिवासी होते हुए भी आदिवासियों के भले की पहल की, लेकिन हुआ उलटा.
राज्यपाल महोदया ने विधेयक को सवालों की सूली पर लटका कर जता दिया कि उन्हें अपने समाज के लोगों की बदहाली से ज्यादा भगवा गैंग के उन उसूलों की फिक्र है, जिन के तहत आदिवासियों को पिछड़ा और बदहाल बनाए रखने की साजिश सदियों से रची जाती रही है.
राजनीति में दिलचस्पी और दखल रखने वालों को बेहतर याद होगा कि ये वही अनुसुइया उइके हैं, जिन का नाम राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मू से पहले और ज्यादा चला था, क्योंकि उन के पास अनुभव ज्यादा है और वे खासी पढ़ीलिखी भी हैं.
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के तामिया के कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर की नौकरी करते हुए वे समाजसेवा के कामों में भी हिस्सा लेने लगी थीं और आदिवासी हितों खासतौर से औरतों के मुद्दे जोरशोर से उठाया करती थीं.
अब से तकरीबन 35 साल पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी मर्द तो कई थे, लेकिन औरतों का टोटा था. तब छिंदवाडा के सांसद कमलनाथ की नजर तेजतर्रार बौयकट बाल रखने वाली अनुसुइया उइके पर पड़ी और वे उन्हें सक्रिय राजनीति में ले आए. आदिवासियों ने भी उन्हें हाथोंहाथ लिया और साल 1985 में दमुआ विधानसभा से उन्हें कांग्रेस के टिकट से जिता कर विधानसभा भेजा.
बाद में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया. उस वक्त में धाकड़ आदिवासी नेता जमुना देवी के बाद अनुसुइया उइके दूसरी नेत्री थीं, जिन से आदिवासियों ने कई उम्मीदें बांध ली थीं.
ये उम्मीदें तब टूटी थीं, जब अनुसुइया उइके कांग्रेस छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई थीं और उन्होंने आदिवासियों के हक का राग अलापना बंद कर दिया था. साल 2019 में छत्तीसगढ़ का राज्यपाल बना कर भाजपा ने उन्हें उन की वफादारी का इनाम दे दिया था. राष्ट्रपति पद की दौड़ में वे केवल इसलिए पिछड़ गई थीं, क्योंकि उन पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगा था.
आदिवासी समाज के भले का विधेयक पिछले साल दिसंबर की
2 तारीख को विधानसभा में छत्तीसगढ़ लोक सेवा संशोधन विधेयक 2022 सभी दलों की रजामंदी से पास किया था, जिस में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण के इंतजाम नए सिरे से किए गए थे, जिस के तहत अनुसूचित जनजाति यानी एसटी को 32 फीसदी, अनुसूचित जाति यानी एससी को 13 फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण दिया गया था.
आर्थिक तौर पर कमजोर यानी गरीबों के लिए भी 4 फीसदी आरक्षण के इंतजाम इस में किए गए हैं. इस तरह कुल आरक्षण 76 फीसदी हो गया. इस व्यवस्था को और सरल तरीके से समझें, तो अगर किसी भी सरकारी नौकरी की 100 पोस्ट निकलती हैं, तो उन में आदिवासियों के 32, दलितों के 13 ओबीसी के 27 और गरीब तबके के 4 उम्मीदवार नौकरी से लग जाते, बाकी 24 नियुक्तियां सामान्य वर्ग के यानी सवर्ण तबके के खाते में जातीं.
इसे आरक्षण का एक आदर्श मौडल हर लिहाज से कहा जा सकता है, क्योंकि राज्य में कुल आबादी का तकरीबन
32 फीसदी आदिवासी और 42 फीसदी पिछड़े हैं, जो हर लिहाज से बेहतर हालत में हैं. इतना ही नहीं 12 फीसदी दलितों को भी उम्मीद और जरूरत के मुताबिक आरक्षण मिल गया है.
तो फिर अडं़गा क्यों
इस विधेयक के पास होते ही कांग्रेसियों ने कुदरती तौर पर जश्न मनाया और आतिशबाजी चलाई, लेकिन जैसे ही कुछ सीनियर मंत्री राज्यपाल के पास विधेयक ले कर पहुंचे तो बात बिगड़ गई, जबकि हर कोई उम्मीद कर रहा था कि अनुसुइया उइके तुरंत दस्तखत कर देंगी, लेकिन ऐसा उन्होंने किया नहीं, उलटे राज्य सरकार से दस सवाल पूछ डाले, जिन का मजमून यह था कि आरक्षण देने के पहले उस ने जातिगत आंकड़ों का सर्वे किया है या नहीं और क्या 50 फीसदी से ज्यादा रिजर्वेशन दिया जा सकता है. उन्होंने कानून के जानकारों से मशवरा लेने की बात कहते हुए भी जोश से भरे मंत्रियों को टरका दिया.
इस से आदिवासी युवाओं की उम्मीदों को झटका लगा, क्योंकि सरकारी नौकरियां उन के हाथ में आने से पहले ही खिसकती नजर आ रही थीं. इधर मौका देख कर भूपेश बघेल और कांग्रेसियों ने अनुसुइया उइके पर चढ़ाई कर दी. देखते ही देखते विधेयक अधर में लटक गया. हैरत तो तब और हुई, जब दस बेकार से सवालों के जवाब भी सरकार ने दे दिए, लेकिन राज्यपाल टस से मस नहीं हुईं.
तूल पकड़ते इस मामले पर सियासत उस वक्त और गरमा गई, जब अनुसुइया उइके दिल्ली जा कर अपने आकाओं से इस मसले को ले कर मिलीं, पर किसी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या गृह मंत्री ने आदिवासियों से हमदर्दी नहीं दिखाई. अगर दिखाई होती तो तय है कि वे तुरंत दस्तखत कर विधेयक राज्य सरकार को दे देतीं और यह कानून की शक्ल में लागू हो जाता.
देरी का नुकसान यह हुआ कि बेमतलब के मुद्दे खड़े होने लगे, मसलन यह कि रोस्टर कैसा रहेगा? जिन 16 जिलों में पिछड़ों की तादाद ज्यादा है वहां नौकरियां कैसे दी जाएंगी?
मौका देख कर भाजपाई भी मैदान में यह कहते हुए कूद पड़े कि पिछड़ों को ज्यादा आरक्षण दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन की आबादी ज्यादा है. लेकिन अब तक यह हवा भी आंधी बन कर फिजांओं में धमक देने लगी थी कि राज्यपाल भाजपा के इशारे पर नाच रही हैं, जो आदिवासियों के भले की तरफ पीठ कर सोती हैं, इसलिए तरहतरह के अड़ंगे डाल रही हैं. रही बात पिछड़ों की, तो उन का आरक्षण भी भूपेश बघेल सरकार ने बढ़ाया ही है, इसलिए भाजपा के बहकावे में वे नहीं आएं.
रिमोट कंट्रोल हैं राज्यपाल
अनुसुइया उइके पर भाजपा के इशारे पर नाचने का इलजाम कांग्रेसी तो लगाते ही रहे, लेकिन खुल कर बात कही भारतीय ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता लौटन राम निषाद ने कि अनुसुइया उइके अगर आदिवासी न होतीं, तो भाजपा के दफ्तर में झाड़ू लगा रही होतीं.
उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा और संघ का जन्म ही सामाजिक न्याय, संविधान व लोकतंत्र के विरोध में हुआ है. इन्होंने मंडल कमीशन का भी विरोध किया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लोटन राम निषाद ने यह कहते हुए निशाना साधा कि वे पिछड़ों का शिकार करने के लिए संघ का चारा हैं.
बात सही है, क्योंकि भगवा गैंग का पूरा ध्यान सवर्णों और उन में भी ब्राह्मणों की तरफ ज्यादा है. मंदिरों और पूजापाठ पर बेतहाशा पैसा फूंका जा रहा है. राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदू राष्ट्र बनाया जा रहा है, जिस से दलित, पिछड़े और आदिवासी पिछड़ रहे हैं. दिनरात हिंदूमुसलिम का राग अलापा जाना भी किसी सुबूत का मुहताज नहीं.
ऐसे बिगड़ते माहौल में आदिवासियों को अगर आरक्षण मिल रहा था, तो भगवा गैंग को यह नागवार गुजरा और उस ने राज्यपाल के जरीए उस में भी टांग फंसा दी.
फायदे में कांग्रेस
इस साल छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. लिहाजा, यह विधेयक बड़ा मुद्दा बन गया है, जिस का पूरा फायदा कांग्रेस उठाएगी. पिछड़ों का समर्थन और साथ तो उसे मिला ही हुआ है, अब आदिवासी भी उस के खेमे में पूरी तरह आ सकते हैं. सधे और मंझे हुए खिलाड़ी की तरह भूपेश बघेल ने अपनी चाल चल दी है, जिस में भाजपा फंस भी गई है.
अगर अनुसुइया उइके दिल्ली की तरफ नहीं ताकतीं, तो कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं होता. कांग्रेस की मंशा बहुत साफ है कि अगर आदिवासियों और पिछड़ों के आधे से कुछ ज्यादा वोट भी उसे मिल जाएं, तो दूसरी बार सत्ता में आने से उसे कोई रोक नहीं सकता.
10 साल सत्ता में रहने के बाद भी भाजपा ने इन तबकों के भले के लिए ऐसा कुछ किया नहीं, जिस के दम पर वोट मांगे जा सकें, इसीलिए साल 2018 के चुनाव में रमन सिंह सरकार औंधे मुंह गिरी थी. तब कांग्रेस को 90 में से
68 सीटें मिली थीं और भाजपा महज
15 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. इस नतीजे से साबित यह भी हुआ था कि अकेले सवर्णों के बूते भाजपा सत्ता हासिल नहीं कर सकती.
नुकसान में आदिवासी
ऐसा नहीं है कि यह बात अकेले छत्तीसगढ़ में सिमट कर रह गई है, बल्कि उस से सटे मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र और ओडिशा के आदिवासियों में भी गलत मैसेज गया है कि भाजपा नहीं चाहती कि आदिवासी पढ़ेंलिखें, सरकारी नौकरियों में ज्यादा आएं, गैरतमंद और पैसे वाले बनें. उस की नजर में तो यह हक केवल ऊंची जाति वालों का ही है, जिन की तूती मोदी राज में देशभर में बोल रही है.
किसी को इस बात से भी मतलब नहीं कि तकरीबन 90 फीसदी आदिवासी नौजवान बेरोजगार घूम रहे हैं और पेट पालने के लिए दूसरे शहरों में जा कर मेहनतमजदूरी और दूसरी छोटमोटी नौकरियां करने पर मजबूर हैं.
इस हकीकत से भी कोई वास्ता नहीं रखना चाहता कि 50 फीसदी से भी ज्यादा आदिवासी बच्चे मिडिल के बाद स्कूली पढ़ाई छोड़ देने पर मजबूर रहते हैं, क्योंकि घरखर्च चलाने के लिए उन्हें कमाने के लिए दुनिया के बाजार में उतरना पड़ता है. अब यही बच्चे अगर ग्रेजुएशन कर पाएं, तो अच्छी सरकारी नौकरी, जो आरक्षण से ही मुमकिन
है, हासिल कर गैरत की जिंदगी जी
सकते हैं.
कहने का मतलब यह नहीं कि एक विधेयक से रातोंरात उन की बदहाली दूर हो जाएगी, लेकिन कुछ न होने से कुछ होना बेहतर तो होता है.

लोगों के लिए शादियां बनी जुआ

शादियां अब हर तरह के लोगों के लिए एक जुआ बन गई हैं जिस में सबकुछ लुट जाए तो भी बड़ी बात नहीं. राजस्थान की एक औरत ने साल 2015 में कोर्ट मैरिज की पर शादी के बाद बीवी मर्द से मांग करने लगी कि वह अपनी जमीन उस के नाम कर दे वरना उसे अंजाम भुगतने पड़ेंगे. शादी के 8 दिन बाद ही वह लापता हो गई पर उस से मिलतीजुलती एक लाश दूर किसी शहर में मिली जिसे लावारिस सम?ा कर जला दिया.

औरत के लापता होने के 6 माह बाद औरत के पिता ने पुलिस में शिकायत की कि उस के मर्द ने उन की बेटी की एक और जने के साथ मिल कर हत्या कर दी है. दूर थाने की पुलिस ने पिता को जलाई गई लाश के कपड़े दिखाए तो पिता ने कहा कि ये उन की बेटी के हैं. मर्द और उस के एक साथी को जेल में ठूंस दिया गया. 7 साल तक मर्द जेलों में आताजाता रहा. कभी पैरोल मिलतीकभी जमानत होती.

अब 7 साल बाद वह औरत किसी दूसरे शहर में मिली और पक्की शिनाख्त हुई तो औरत को पूरी साजिश रचने के जुर्म में पकड़ लिया गया है. आज जब सरकार हल्ला मचा रही है कि यूनिफौर्म सिविल कोड लाओक्योंकि आज इसलाम धर्म के कानून औरतों के खिलाफ हैं. असलियत यह है कि हिंदू मर्दों और औरतों दोनों के लिए हिंदू कानून ही अब आफत बने हुए हैं. अब गांवगांव में मियांबीवी के ?ागड़े में बीवी पुलिस को बुला लेती है और बीवी के रिश्तेदार आंसू निकालते छातियां पीटते नजर आते हैं तो मर्दों को गिरफ्तार करना ही पड़ता है.

शादी हिंदू औरतों के लिए ही नहींमर्दों के लिए भी आफत है. जो सीधी औरतें और गुनाह करना नहीं जानतीं वे मर्द के जुल्म सहने को मजबूर हैं पर मर्द को छोड़ नहीं सकतींक्योंकि हिंदुओं का तलाक कानून ऐसा है कि अगर दोनों में से एक भी चाहे तो बरसों तलाक न होगा. हिंदू कानूनों में छोड़ी गई औरतों को कुछ पैसा तो मिल सकता है पर उन को न समाज में इज्जत मिलती हैन दूसरी शादी आसानी से होती है.

चूंकि तलाक मुश्किल से मिलता है और चूंकि औरतें तलाक के समय मोटी रकम वसूल कर सकती हैंकोई भी नया जना किसी भी कीमत पर तलाकशुदा से शादी करने को तैयार नहीं होता. सरकार को हिंदूमुसलिम करने के लिए यूनिफौर्म सिविल कोड की पड़ी हैजबकि जरूरत है ऐसे कानून की जिस में शादी एक सिविल सम?ौता होउस में क्रिमिनल पुलिस वाले न आएं.

जब औरतें शातिर हो सकती हैंअपने प्रेमियों के साथ मिल कर पति की हत्या कर सकती हैंनकली शादी कर के रुपयापैसा ले कर भाग सकती हैंन निभाने पर पति की जान को आफत बना सकती हैं तो सम?ा जा सकता है कि देश का कानून खराब है और यूनिफौर्म सिविल कोड बने या न बने हिंदू विवाह कानून तो बदला जाना चाहिए जिस में किसी जोरजबरदस्ती की गुंजाइश न हो. यदि लोग अपनी बीवियों के फैलाए जालों में फंसते रहेंगे और औरतें मर्दों से मार खाती रहेंगी तो पक्का है कि समाज खुश नहीं रहेगा और यह लावा कहीं और फूटेगा.     

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