एक देश एक चुनाव का बेमतलब का मुद्दा उठा कर भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक दलों का ध्यान बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, सरकार के पल्लू से बंधे हर रोज अमीर होते धन्ना सेठों, अरबों रुपए के सेठों के कर्जों की ओर से हटा देने की कोशिश कर रही है. यह कदम नरेंद्र मोदी का हर चुनाव जीत ही लेने की ताकत की पोल भी खेलता है.
एक चुनाव का मतलब है कि जब लोकसभा के चुनाव हों तभी विधानसभाओं के भी हों. शायद तभी शहरी कारपोरेशनों, जिला परिषदों और पंचायतों के भी हों. एकसाथ आदमी वोट देने जाए तो वह 4-5 चुनावों में एक बार वोट दे दे और फिर 5 साल तक घर बैठे, रोए या हंसे.
एक देश एक चुनाव का नारा एक देश एक टैक्स की तरह का है जिस ने हर चीज पर कुल मिला कर टैक्स पिछले 6 सालों में दोगुना कर दिया है. इसी के साथ एक विवाह नियम की बात भी होगी. फिर शायद कहना शुरू करेंगे कि सारी शादियां भी 5 साल में एक बार हों और बच्चे भी एकसाथ पैदा हों.
इस जमात का भरोसा नहीं है कि यह कौन सा शिगूफा कब ले कर खड़ी हो जाए. मोदी सरकार लगातार शिगूफों पर जी रही है. 2016 में नोटबंदी 2 घंटे में लागू कर दी गर्ई कि अब नकदी का राज खत्म, काला धन गायब. फिर टैक्स के बारे में यही कहा गया. फिर कोविड के आने पर एक देश एक दिन में लौकडाउन का शिगूफा छेड़ा गया. हर बार का वादे किए गए, जो कभी पूरे नहीं हुए.
अभी सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कहा कि एक देश एक कानून के हिसाब से धारा 370 जो कश्मीर से हटाई गई है उस के बाद वहां के हालात कब ठीक होंगे कि उसे केंद्र शासित राज्य की जगह दूसरों जैसी राज्य सरकार मिल सके.
एक ही मालिक है वाली सोच स्वयंसेवक संघ के सदस्यों को पहले दिन से पढ़ानी शुरू कर दी जाती है. मंदिरों, मठों में जिन के पास जनता की दान की गई अरबों की संपत्ति होती है एक बार ही, शायद जन्म से तय, बड़े महंत को गद्दी मिलती है, फिर उस के बेटे को. कहींकहीं जहां शादी की इजाजत न हो, वहां एक बार एक चेला महंत बना नहीं, वह जब तक चाहे गद्दी पर बैठेगा.
सरकार की मंशा एक देश एक ‘बार’ चुनाव की है, ठीक वैसे जैसे हिंदू संयुक्त परिवार में एक बार कर्ता बना तो हमेशा वही रहेगा चाहे जितना मरजी खराब काम करे. परिवार को तोड़ना पड़ता है, पार्टीशन होता है. मंदिरों में झगड़ेदंगे होते हैं, दूसरा बड़ा चेला मंदिर के दूसरे हिस्से पर जबरन कब्जा कर लेता है.
क्या यह देश में राजनीति में दोहराया जाएगा? क्या लेनिन, स्टालिन, माओ, हिटलर की तरह एक चुनाव का मतलब एक बार चुनाव होगा? नतीजा क्या हुआ, वह इन देशों के बारे में जानने से पता चल सकता है. व्यापारिक घरानों में एक बार चुनाव का मतलब व्यापारिक घर छूटना होता है. अंबानी का घरव्यापार टूटा, बिड़लों के टूटे तो एक हिस्से का 20,000 करोड़ एक अकाउंटैंट के हाथ लग गए.
खापों में एक बार मुखिया चुन लिया गया तो इस का मतलब होता है उस की धौंस, उस की उगाही, उस की बेगार कराने की ताकत. एक देश एक चुनाव जिसे एक ‘बार’ चुनाव कहना ठीक होगा. इसी ओर एक कदम है. फिर तो जैसे इंद्र अपनी गद्दी बचाने के लिए मेनकाओं का और वज्रों का इस्तेमाल करता था, भाजपा का एक बार चुना गया नेता करेगा. रूस के पुतिन और चीन के शी जिनपिंग ने 2 बड़े देशों को अब पतन की राह पर ले जाना शुरू कर दिया है. लाखों अमीर, पढ़ेलिखे रूसीचीनी भाग रहे हैं, फिर लाखों भारतीय भी भागेंगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सब से बड़े नेता शरद पवार का राजनीति के मैदान में घातप्रतिघात का दौर चल रहा है. नरेंद्र मोदी लगातार प्रयास में लगे हुए हैं कि शरद पवार को अपने पक्ष में ले कर देश की राजनीति का मानचित्र ही बदल दें. वहीं दूसरी ओर शरद पवार हैं कि लगातार लाख कोशिशों के बावजूद नरेंद्र मोदी के संजाल में फंसने के बजाय नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक बड़ी लकीर खींचते चले जा रहे हैं, ऐसे में आने वाले लोकसभा चुनाव में शरद पवार की एक बड़ी भूमिका सामने आने की संभावना दिखाई देने लगी है.
शरद पवार के गृह प्रदेश महाराष्ट्र के साथसाथ देश की सियासत में उठापटक जारी है. इसी उठापटक के बीच खबर आई है कि नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार को कैबिनेट मंत्री का पद औफर किया गया है. लेकिन खुद शरद पवार ने इन अटकलों पर प्रतिक्रिया दी है और जो कहा है, उस से नरेंद्र मोदी के हाथों के तोते उड़ने लगे होंगे.
शरद पवार ने कहा, “मैं नरेंद्र मोदी केबिनेट में आ रहा हूं, इस से वाकिफ नहीं हूं. सीक्रेट मीटिंग की बातें हो रही हैं, लेकिन वास्तविकता ये है कि इस बैठक में कोई राजनीतिक चर्चा नहीं हुई. केंद्र सरकार ने मुझे कैबिनेट मंत्री बनने का औफर किया है. इस तरह की बातों में कोई सचाई नहीं है.
“भारत में राजनीतिक माहौल मोदी के पक्ष में नहीं है. केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में भाजपा सत्ता में नहीं है. यहां तक कि चंद्रबाबू नायडू भी इंडिया गठबंधन से जुड़ गए हैं. महाराष्ट्र और मध्य
प्रदेश में नरेंद्र मोदी की भाजपा ने सरकारों को अस्थिर किया. दिल्ली, झारखंड, बंगाल और अन्य राज्यों में भाजपा सत्ता में नहीं है. देश के लोगों ने यह तय कर लिया है कि उन्हें क्या करना है. इसलिए अब नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि मैं वापस आऊंगा. पवार ने कहा कि भाजपा ने कई राज्यों की सरकारों को अस्थिर करने का काम किया है.”
देश के महत्वपूर्ण नेताओं में एक शरद पवार ने बेबाक तरीके से अपनी बात रखी है. शरद पवार ऐसे नेताओं में हैं, जिन की बात देश बड़ी गंभीरता से सुनता है और जो बहुत ही सालदोरिक तथ्य के साथ अपनी बात रखते हैं. सरसावा में जो कुछ कहा है, उसे अगर हम सच मानें, तो नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में उलटी गिनती शुरू हो गई है.
शरद पवार ने कहा, “मोदी की अगुआई में चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने का काम किया जा रहा है. मणिपुर चीन की सीमा पर है. इस वजह से यह संवेदनशील राज्य है. हमें सचेत रहने की जरूरत है. लेकिन उत्तर भारत में जो हो रहा है, वह चिंताजनक है. पुलिस बलों पर हमला किया गया. दो समुदायों के बीच जहर घोला जा रहा है. नरेंद्र मोदी मणिपुर को ले कर लोकसभा में सिर्फ तीन से चार मिनट ही बोलते हैं.”
इस तरह शरद पवार ने सबकुछ देश को बता दिया है. जो आप सोचतेसमझते हैं और इन बातों में सचाई भी है. इस तरह उन्होंने एक अलग लाइन खींच दी है. इस सब के बाद विपक्ष के नएनए गठबंधन इंडिया में एक नई ताकत का संचार होना स्वाभाविक है और नरेंद्र मोदी के लिए चिंता का सबब.
पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आह्वान पर राहुल गांधी, ममता बनर्जी, लालू यादव, शरद पवार और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं की “विपक्षी एकता” को देखकर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार के माथे पर साफ-साफ पसीना देखा जा सकता है. लोक तंत्र में सत्ता के विरुद्ध विपक्ष का एक होना एक सामान्य बात है. अब लोकसभा चुनाव में ज्यादा समय नहीं है ऐसे में अगर विपक्ष एक हो रहा है तो यह भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी सरकार के लिए स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है. क्योंकि जब तक विपक्ष में एकता नहीं है भारतीय जनता पार्टी सत्ता में बनी रहेगी यह सच विपक्ष के सामने भी और सत्ता में बैठी भाजपा के नेताओं को भी पता है. यही कारण है कि जब पटना में विपक्ष के लगभग सारे राजनीतिक दलों में एक सुर में भारतीय जनता पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में उखाड़ फेंकने का ऐलान किया तो भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता तिलमिला गए उनके बयानों से दिखाई देता है कि उन्हें अपनी कुर्सी हिलती हुई दिखाई दे रही है . दरअसल ,भारतीय जनता पार्टी और आज की केंद्र सरकार का एजेंडा जगजाहिर हो चुका है. बड़े-बड़े नेता यह ऐलान कर चुके हैं कि हम तो 50 सालों तक सत्ता पर काबिज रहेंगे, यह बोल कर के इन भाजपा के नेताओं और सत्ता में बैठे चेहरों ने बता दिया है कि उनकी आस्था लोकतंत्र में नहीं है और सत्ता उन्हें कितनी प्यारी है. और उनकी मंशा क्या है यही कारण है कि आज एक वर्ग द्वारा लोकतंत्र को खतरे में माना जा रहा है. क्योंकि सत्ता में बैठे हुए अगर यह कहने लगे कि हम तो उसी छोड़ेंगे ही नहीं इसका मतलब यह है कि असंवैधानिक तरीके से सत्ता पर काबिज रहने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं. यही कारण है कि विपक्ष आरोप लगा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियां कुछ इस तरह की है जिससे चंद लोगों को लाभ है अदानी और अंबानी इसके बड़े उदाहरण हमारे सामने हैं. अब हालात यह है कि विपक्षी दलों के एकजुट होने की कोशिश की आलोचना करते हुए पटना की बैठक को ‘स्वार्थ का गठबंधन’, ‘नाटक’ और ‘तस्वीर खिंचवाने का अवसर बताकर भारतीय जनता पार्टी के नेता अपना बचाव कर रहे हैं.
बिहार की राजधानी पटना में विपक्षी दलों की ओर से साल 2024 के लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर लड़ने की घोषणा के तत्काल बाद दिल्ली मे पार्टी मुख्यालय केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी मोर्चा संभाला और कहा ” जो राजनीतिक दल कभी एक दूसरे को आंखों नहीं सुहाते थे, वे भारत को आर्थिक प्रगति से वंचित करने के संकल्प से एकत्रित हुए हैं.”
अपने चिर परिचित अंदाज में स्मृति ईरानी ने कहा, ‘कहा जाता है कि भेड़िये शिकार के लिए झुंड में आते हैं और यह राजनीतिक झुंड पटना में मिला. उनका ‘शिकार’ भारत का भविष्य है.’
महत्वपूर्ण बात या की पटना में विपक्षी एकता चल रही थी और केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह जम्मू मे थे उनसे भी नहीं रहा गया और बोल पड़े ” विपक्षी एकता लगभग असंभव है. उन्होंने कहा, ‘आज पटना में एक फोटो सेशन चल रहा है। सारे विपक्ष के नेता संदेश देना चाहते हैं कि हम भाजपा और मोदी को चुनौती देंगे मैं सारे विपक्ष के नेताओं को यह कहना चाहता हूं कि कितने भी हाथ मिला लो, आपकी एकता कभी संभव नहीं है और हो भी गई … कितने भी इकट्ठा हो जाइए और जनता के सामने आ जाइए…. 2024 में 300 से ज्यादा सीटों के साथ मोदी का प्रधानमंत्री बनना तय है.’
दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा उड़ीसा कालाहांडी में थे, उन्होंने वहीं से कहा “आज जब सभी विपक्षी दल पटना में गलबहियां कर रहे हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है कि कांग्रेस विरोध के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने वाले नेताओं की स्थिति क्या से क्या हो गई है. उन्होंने कहा, ‘यही लालू प्रसाद यादव पूरे 22 महीने जेल में रहे. कांग्रेस की इंदिरा … राहुल की दादी ने उन्हें जेल में डाला था. यही नीतीश कुमार पूरे 20 महीने जेल की सलाखों के पीछे रहे.”
सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर भी चुप नही बैठे उन्होने विपक्षी दलों की बैठक को एक ‘तमाशा’ करार दिया. अब आप स्वयं देखें और विवेचना करें कि राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जो एकता कर रहे हैं वह कितना देश हित में है और भारतीय जनता पार्टी पर जो सत्ता का मद चढ़ा हुआ है उससे देश को किस तरह हानि हो रही है
देश भर के रेलवे स्टेशनों को नई शक्ल दी जा रही है और उन पर भरपूर पैसा खर्च किया जा रहा है. इस का मतलब यह नहीं कि आम गरीग को कोई अच्छा सुख मिलेगा. स्टेशनों को संवारने का मतलब है कि वहां हर चीज मंहगी होती जाना. रेल टिकट तो मंहगे हो ही रहे हैं क्योंकि ज्यादातर नई ट्रेनें एयरकंडीशंड हैं जिन में झुग्गी झोपडिय़ों में रहने वाले किसान मजदूर नहीं चल रहे, मध्यमवर्ग के लोग चल रहे हैं.
रेल के बाहर भी स्टेशनों पर जहां सस्ते में खाना, मुफ्त में पानी, मुफ्त में शौचालय मिल जाता था, अब सब का पैसा लगने लगा है. रेलवे प्लेटफार्म पर रेल छूटने से कुछ समय पहले ही जाने दिया जाता है और वेङ्क्षटग हालों में पैसे लेबर सोने, बैठने की जगह मिलती है.
जो रेलवे बैंच कभी बेघरबारों के लिए एक ठिकाना होते थे. अब अपडेटीं के लिए चमचम करते होने लगे हैं. इलैक्ट्रिक ट्रेनों के बाद तो एयर कंडीशंड प्लेटफार्म बनने लगे हैं पर उन में स्लम में रहने वालों का कोई ठिकाना नहीं है.
रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण नहीं हो रहा. अमीरी करण हो रहा है. आम मजदूर खचड़ा बसों में टूटीफूटी सडक़ों पर 24 घंटे का सफर 48-50 घंटों में पैसे बचाने के लिए करे ऐसी साजिश रची जा रही है.
सरकार की मंशा है कि जैसे 3-4 या 5 सितारा होटल के दरबान, चमचम फर्श को देख कर गरीब किसान मजबूर दूर से ही चला जाए वैसे ही रेलवे स्टेशनों के पास भी न भटके. रेलें 2 तरह का काम करें, अमीरी को ऐसी जगह ले जाएं जहां हवाई जहाज नहीं जाते या माल ढोएं. मजदूर किसान को मीलों ले जाने वाली रेलें अब गायब होने लगी हैं.
अंग्रेजो को जालिम और साह की नीयत का कहा जाता था पर आज की सरकारें ज्यादा आदमी और ऊंची जातियों और ऊंचे पैसे वालों के लिए बन रही हैं. स्टेशनों पर अब वीडियो गेम बिकते हैं, पढऩे की किताबें नहीं क्योंकि सफर करने वाले साहब सोचते हैं कि उन्हें तो सब कुछ वैसे ही पता है. वे ऊंची विरादरी के पैसे वाले है उन्हें पढऩे से क्या मतलब.
स्टेशनों पर अब 2 रुपए की मूंगफली नहीं मिलेगी और 220 रुपए का बर्गर मिलेगा और किस के लिए होगा यह अंदाजा लागया जा सकता है. स्टेशनों पर एयरकंडीशंड पाउंच टाइप वेङ्क्षटग कम बन रहे हैं, वह जमाना गया जब प्लेटफौर्म पर खेस बिछा कर रात गुजारी जा सकती थी.
ये भव्य स्टेशन उस कहानी के चायवाले के नहीं जो केतली में चाय बेचा करता था, ये उस प्रधानमंत्री के है जो दिन में 4 बार कपड़े बदलता है और हर वंदे भारत को पहले सफर के लिए वहीं से भी हरी झंडी लिए पहुंचा जाता है. स्टेशनों की मरम्मत गरीबों के लिए नहीं अमीरों के लिए हो रही है.
बिहार उच्च न्यायालय ने जातियों की गिनती को कानूनी बता कर मई में लगाई रोक हटा ली है और अब नीतीश कुमार सरकार एक बार फिर गिनती शुरू कर सकती है कि किस जाति के लोग कितने है और उन की माली हालत कैसे हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट ने रोक फिर नहीं लगाई या कुछ महीनों में पता चल जाएगा देश में लोकतंत्र की असली चाबी किस के पास है और शायद जातियों के लिए बंद दरवाजे खुलने लगे.
यह बात तो पक्की है कि चाहे मामला सरकारी नौकरियों का हो, दुकानदारी का हो, छोटे धंधों में नौकरियों का हो, पढ़ाई का हो थोड़े से मुट्ठी भर लोग एक लंबी पौराणिक समय में चली आ रही साजिश के तहत देश की 80-85′ आबादी से पैसा ही नहीं इज्जत भी छीन कर अपने पास गिरवी रख लेते हैं.
नई तकनीक के 200 सालों और आजादी के 75 साल बाद भी जरा सा ही फर्क आया है कि अब पिछड़ों दलितों को अमीरों और ऊंचों के घर के सामने से गुजरते हुए चप्पल बगल में नहीं दबानी पड़ती. कर्पूरी ठाकुर जयप्रकाश नारायण, लालू यादव के बदलावों से पिछड़ों को अहसास तो हो गया है कि वे जानवर नहीं है और धर्म की पट्टी को आंखों और दिमाग पर बांधी गई है उस ने फिर उन्हें अपनेअपने टोलों में धकेल दिया है और वे अपनी बुरी हालत के लिए पहले की तरह पिछड़े जन्मों के कर्मों को जिम्मेदार मानते हैं और अब जोरशोर से अपनेअपने मंदिरों में जाने लगे हैं जहां से पैसा सारा ऊंची जमातों के पंडे पुजारियों के हाथ में ही जाता है.
जाति सवो से शायद पता चले कि किस जाति के लोग कितने गरीब हैं. यह भी हो सकता है कि ऊंची जातियों के लोगों के पास केवल जाति का ठप्पा ही हो और जब उन की खाली हो. सर्वे से, जो जनगणना की तरह है पर जनगणना नहीं, यह पता चलेगा कि सरकार किस पर कितना खर्च करे.
पिछले कुछ सालों से एयरपोर्टो, चमचम करते रेलवे स्टेशनों, बंदे भारत टे्रनों, 6 और 8 लेन के हाईवे, बड़ी सांसद, भव्य मीङ्क्षटग हाल, ऊंची मूॢतयां, नए मंदिर बनाने की लग पड़ गई है. सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों, सरकारी मंडियों, बाजारों, घरों के आगे सडक़ों, सीवरों, पीने का पानी सब पीछे रह गया है. प्रधानमंत्री हर रोज एक ऐसी चीज का उद्घाटन करते नजर आते है जो अमीरों को सुख देती है, गरीब किसान मजदूर, सफाई कर्मचारी और सवर्णों की औरतों को नहीं हो सकता है इस एक सर्वे से कुछ फायदा हो पर लगता यही है कि सर्वे की रिपोर्ट भी किसी दफ्तर में फाइलों में बंद हो जाएगी क्योंकि जो नेता आज सत्ता में हैं कल हों या न हों. पता नहीं. नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव अगर सत्ता में नहीं रहे तो इस सर्वे के गंगा में बहा दिया जाएगा,
नरेंद्र मोदी का जादू जो सिर पर चढ़ कर इतने साल बोला अब लगता है कि धीमा पडऩे लगा है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी खुद अपने से नाराज होकर गई पाॢटयों को दोबारा बुला रही है. 18 जुलाई को हुई एक मीङ्क्षटग में कई पुराने साथी आए जो पहले कतार में लगे थे पर बाद में उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया.
भाजपा की धर्म फौज रातदिन नरेंद्र मोदी को देवताओं को अवतार बनाने में लगी रही है और अगर फ्रांस के म्यूजियम में खाना भी वह खा आएं तो सुॢखयां बनवाता है जबकि इस म्यूजियम को कोई भी खाना खिलाने के लिए किराए पर ले सकता है. भारतीय जनता पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ रही साबित करने में कि नरेंद्र मोदी में देश को एक चमत्कारी नेता मिला है.
नरेंद्र मोदी चमत्कारी है, इस में शक नहीं है, उन्होंने 2016 चमत्कार से 500 रुपए और 1000 रुपए के नोट गायब कर दिए और पूरे देश को बैंकों के आगे लाइनों में लगवा दिया. रातोंरात चमत्कार से मजदूरों के अधड़ में रखे गाड़ी कमाई के रुपए कोरे कागज में बदल गए.
जब कोरोना आया तो रातोंरात उन्होंने चमत्कार से लौकडाउन थोप दिया चाहे इस की जरूरत थी या नहीं और लाखों मजदूर जो चलना भूल चुके थे सैंकड़ों मील पैदल तपती धूप में चलने लगे. उन्होंने चमत्कार से थालीताली बजवा कर बता दिया कि इस से कोरोना पर 17 दिनों में जीत हासिल हो जाएगी का फायदा कर डाला और यह चमत्कार ही है कि पूरा देश हल्ला मचाने लगा. शायद चीन अमेरिका तक गूंज पहुंची होगी.
उन के राज में चमत्कार हुए कि खालिस कांग्रेसी नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल और सुभाष चंद्र बोस मरने के 50 साल बाद भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बन गए और एक की मूॢत गुजरात में लगा दी गई दूसरे की इंडिया गेट पर. दोनों ने जीवन भर ङ्क्षहदू महासभा और आरएसएस को गलत माना पर नमस्कार के कारण वह इतिहास अब भुला दिया गया.
चमस्कार के कारण देश भर खुले में शौच खत्म हो गया और घरघर में शौचालय बन गया. जिस में किया गया शौच वहीं पड़ापड़ा घर में बदबू फैलाता है और बिना पानी के न जाने कहां गायब हो जाता है. चमत्कारों में सीवर अपनेआप डालना शायद मोदी भूल गए. उज्जवला गैस का चमत्कार हुआ कि करोड़ों कारों गैस के सिलेंडर पहुंच गए और अब उन पर गोबर के उपले रख कर खाना बनाया जाता है.
ऐसे चमत्कारी नेता को 2024 में तो जीतना ही है भारतीय जनता पार्टी अब रातदिन इस मेहनत में लगी है जो इन चमत्कारों को नहीं मानते उन्हें किसी तरह ङ्क्षहदू धर्म से निकाल दिया जाए और वे अगर कोई धर्म अपनाएं तो जेल में बंद कर दिया जाएं. भाजपा को छोड़ कर गए नेताओं को ट्र्वाला टाइप का ईडी, सीबीआई थाप का डर दिखा कर कहा जा रहा है कि सीधेसीधे चमत्कारी पार्टी में आ जाओ. जहां आने पर सब ऐसे ही शुरू हो जाते हैं जैसे गांव में नहाने से इस में भाजपा को सफलता मिलेगी इस की पूरी गारंटी है.
साल 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए देश की सभी बड़ी विपक्षी पार्टियां जैसे कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), आम आदमी पार्टी यानी जो भारतीय जनता पार्टी से इतर विचारधारा रखती हैं, एक हो कर अलगअलग जगह बैठक कर रही हैं. इस से देश को एक संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि विपक्ष एकसाथ है.
यह भी सच है कि विपक्ष की एकता का आगाज बहुत पहले हो गया था, मगर इस के साथ ही मानो भारतीय जनता पार्टी की कुंभकर्णी नींद टूट गई और आननफानन में वह उन राजनीतिक दलों को एक करने में जुट गई है, जिन्हें सत्ता के घमंड में आ कर उस ने कभी तवज्जुह नहीं दी थी.
सब से बड़ा उदाहरण है रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का, जबकि उन के बेटे चिराग पासवान आंख बंद कर के नरेंद्र मोदी की भक्ति करते देखे गए हैं. यही नहीं, नीतीश कुमार के साथ भी भाजपा ने दोयम दर्जे का बरताव किया था. इस तरह गठबंधन का धर्म नहीं निभा कर भारतीय जनता पार्टी में एक तरह से अपने सहयोगियों के साथ धोखा किया था, जिसे सत्ता के लालच में आज छोटीछोटी पार्टियां भूल गई हैं. इस की क्या गारंटी है कि साल 2024 में नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद इन के साथ समान बरताव किया जाएगा?
कहा जाता है कि एक बार धोखा खाने के बाद समझदार आदमी सजग हो जाता है, मगर भारतीय जनता पार्टी के भुलावे में आ कर 38 उस के साथ आ कर खड़े हो गए हैं. मगर यह सच है कि यह सिर्फ एक छलावा और दिखावा मात्र है. एक तरफ विपक्ष अभी 26 दलों का गठबंधन बना पाया है, वहीं भारतीय जनता पार्टी खुद को हमेशा की तरह बड़ा दिखाने के फेर में छोटेछोटे दलों को भी आज नमस्ते कर रही है.
भाजपा का देश को यह सिर्फ आंकड़ा दिखाने का खेल है. वह यह बताना चाहती है कि उस के पास देश के सब से ज्यादा राजनीतिक दलों का समर्थन है और विपक्ष जो आज एकता की बात कर रहा है वह उन के सामने नहीं ठहर सकता है, जबकि असलियत यह है कि यह सब भाजपा डर के मारे कर रही है ताकि आने वाले समय में उस के हाथों से देश की केंद्रीय सत्ता निकल न जाए.
10 साल की राजग सरकार के भ्रष्टाचार और घोटालों का एक खाका खींचने के मद्देनजर विपक्षी गठबंधन के लिए एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम बनाया जा रहा है और आपसी तालमेल के साथ रैलियां, सम्मेलन, आंदोलन करने जैसे मुद्दों को ले कर मसौदा तैयार करने के लिए एक उपसमिति बनाने का भी प्रस्ताव है.
विपक्षी दल साल 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ एकजुट हो कर लड़ने के लिए अपनी रणनीति तैयार करेंगे. कांग्रेस के मुताबिक अगले लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्षी दलों की एकजुटता भारत के राजनीतिक दृश्य के लिए बदलाव वाली साबित होगी और जो लोग अकेले विपक्षी पार्टियों को हरा देने का दंभ भरते थे, वे इन दिनों ‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भूत’ में नई जान फूंकने कोशिश में लगे हुए हैं.
कुल जमा कहा जा सकता है कि विपक्ष की एकता से भारतीय जनता पार्टी के माथे पर पसीना उभर आया है और उसे यह समझते देर नहीं लगी है कि अगर वह सोती रहेगी तो राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष भारी पड़ सकता है.
भारतीय जनता पार्टी ने जब देखा कि केंद्र की सत्ता उस के हाथों से निकल सकती है तो वह आननफानन में उन राजनीतिक दलों को अपने साथ मिलाने मिल गई है, जो कभी उस के रूखे बरताव और सत्ता के घमंड को देख कर छोड़ कर चले गए थे.
मंगलवार, 18 जुलाई, 2023 को भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में अपने साथी राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक आयोजित की, जिस से जनता में संदेश जाए कि हम किसी से कम नहीं हैं.
दरअसल, यह बैठक सत्तारूढ़ गठबंधन के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखी गई. इस बैठक में भाजपा के कई मौजूदा और नए सहयोगी दल मौजूद रहे. सत्तारूढ़ पार्टी ने हाल के दिनों में नए दलों को साथ लेने और गठबंधन छोड़ कर जा चुके पुराने सहयोगियों को वापस लाने के लिए कड़ी मेहनत की है.
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के मुताबिक, हम ने अपने सहयोगियों को न पहले जाने के लिए कहा था और न अब आने के लिए मना कर रहे हैं. उन्होंने कहा जो हमारी विचारधारा और देशहित में साथ आना चाहता है, आ सकता है.
हालांकि जनता दल (यूनाइटेड), उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिव सेना और अकाली दल जैसे अपने कई पारंपरिक सहयोगियों को खोने के बाद भाजपा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट, उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, जीतनराम मांझी के नेतृत्व वाले हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सैक्युलर) और उपेंद्र कुशवाला के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक जनता दल के साथ गठबंधन करने में कामयाब रही है.
मगर यह देखना खास है कि ये सारे दल देश की राजनीति में कोई ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं और भाजपा का सिर्फ कोरम पूरा करने का काम कर रहे हैं.
रा जनीति में जाने वालों के लिए सब से बड़ी दिक्कत की बात यह है कि राजनीति में कैरियर कैसे बनाएं, यह बताने वाला कोई नहीं है. इस की पढ़ाई कहीं नहीं होती. ऐसे में राजनीति में कैरियर बनाने वालों के लिए मुश्किलें ज्यादा हैं. उन को लगता है कि केवल नेताओं के पीछे घूमने से ही काम हो सकता है. ऐसा नहीं है.
राजनीति में कैरियर बनाने के लिए जरूरी है कि आप सफल नेताओं के बारे में पढ़ें, उन को सम?ों, उन गुणों को अपने अंदर पैदा करें. आप को खुद से सीखना है, यह बड़ी चुनौती है.
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का नाम हर किसी को पता है. गरीब परिवार में पैदा हुए, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर राजनीति में सब से बड़ा परिवार बना लिया. एक दौर वह था कि भारत में जनता द्वारा चुने गए पदों पर सब से अधिक लोग मुलायम परिवार के थे. 40-50 साल के राजनीतिक जीवन में उन्होंने यह चमत्कार कैसे किया?
राजनीति में कैरियर बनाने वाले हर युवा को मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक यात्रा को सम?ाना और स्टडी करना चाहिए. सब से बड़ी बात कि उन के प्रबल विरोधी भी उन के कायल थे. मुलायम सिंह का सब से बड़ा गुण था कि वे बेहद सरल स्वभाव के थे. उन को अपने हर कार्यकर्ता का नाम याद रहता था. वे सभा के बीच भी किसी आम कार्यकर्ता का नाम ले कर बुलाते थे.
किसी के घर कोई अवसर होता था, सुख या दुख का, तो वे पहुंचते जरूर थे. उन के दौर में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए पैदल, साइकिल, किराए की कार जैसे साधन थे तब भी और जब सरकारी सुविधा मिली तब भी, वे एकजैसा बरताव करते थे.
कानपुर देहात के एक गांव में एक देशराज नाम का साधारण कार्यकर्ता मुलायम सिंह यादव को अपने घर कई बार बुला चुका था. वे नहीं पहुंच पाए थे. साल 2002 के आसपास की बात है.
देशराज का अपना तिलक समारोह था. उस ने मुलायम सिंह को निमंत्रणपत्र दे कर बुलाया. उसे लगा कि नेताजी आएंगे तो हैं नहीं, तो वह अपने घर कामकाज में लग गया.
जिस दिन देशराज का तिलक था, सुबह 8 बजे उस के क्षेत्र के थाने का दारोगा उस के घर पहुंचा. तब मोबाइल इतना प्रयोग में नहीं होता था. दारोगा ने कहा कि 10 बजे मुलायम सिंह का कार्यक्रम आप के घर पर है. अभी एसपी साहब का मैसेज आया है. देशराज हैरान कि कैसे इतनी जल्दी इंतजाम होगा. समारोह तो शाम का था. वह जैसेतैसे मैनेज करने लगा.
सुबह 10 बजे मुलायम सिंह यादव अपने काफिले के साथ उस के घर आ गए. वे बिना किसी उम्मीद के साथ सहज भाव से मौजूद रहे. गांव और वहां मौजूद लोगों से मिलते रहे. आज भी पूरे इलाके में इस बात की चर्चा होती है. अपने कार्यकर्ता की इज्जत तब ज्यादा होती है, जब नेता पर्सनल बरताव रखता है.
बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव का भी ऐसा ही स्वभाव था. होली में फाग वे सब के बीच में आ कर खेलते थे. अपने कार्यकर्ता से ही मांग कर खैनी खा लेते थे. कार्यकर्ता से खैनी मांगने में कोई संकोच नहीं होता था उन्हें.
आज के दौर में तमाम नेता हैं, जो पद हासिल होते ही अपने कार्यकर्ता को सब से पहले भूल जाते हैं. ऐसे में वे कभी भी लंबी रेस की राजनीति नहीं कर पाते. नए नेताओं में तेजस्वी यादव का स्वभाव भी इसी तरह का है.
बिहार में वे अपने एक कार्यकर्ता के घर पर शादी में गए, तो वहां गाली गाने का रिवाज था. महिलाएं थोड़ा संकोच कर रही थीं. तेजस्वी को जैसे ही गानों का मजा लेते सुना, वे गाली गाने लगीं. तेजस्वी यादव ने संकोचसंकोच में ही डांस में भी साथ दिया.
कार्यकर्ता से जुड़ने के लिए यह जरूरी नहीं कि केवल पैसा खर्च हो, उस के ज्यादातर मामलों में उन के बीच जा कर उन की हंसीखुशी में हिस्सा ले कर भी जुड़ा जा सकता है.
भारतीय जनता पार्टी के संगठन मंत्री हैं नागेंद्र. अभी वे बिहार में संगठन मंत्री हैं. पहले उत्तर प्रदेश में सगठन मंत्री रहे. उन को कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच काम करना होता है. वे अपने पास एक छोटी सी नोटबुक रखते हैं, जिस में हर नेता और कार्यकर्ता का नाम व उस का ब्योरा एक पेज पर लिखा होता है. जब वे जिस क्षेत्र रहते हैं, वहां के नेता और कार्यकर्ता से बात कर उस से मिलने की कोशिश करते हैं.
जो लोग राजनीति में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं, उन को इन टिप्स को ध्यान रखना चाहिए. मोबाइल के इस जमाने में डायरी रखना लोग बंद कर चुके हैं. डायरी में लिखना पड़ता है.
मनोविज्ञानी मानते हैं कि जो बातें लिखी जाती हैं, वे लंबे समय तक याद रहती हैं. ऐसे में डायरी लिखना जरूरी होता है. डायरी में अपनी रोज की गतिविधियों को लिखना चाहिए.
डायरी लिखने के साथ ही साथ राजनीति में कदम रखने वालों को पढ़ना भी चाहिए. पढ़ने से विचार बनते हैं, जिन को बोलने से सामने वाले पर असर पड़ता है. नेता के लिए जरूरी होता है कि लोग उस के बोलने को सुनें. जैसे प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में कहा जाता है कि वे कठोर से कठोर बात भी बड़े सहज लहजे में कह जाते थे. उन के बोलने की ताकत ऐसी थी कि गंभीर बहस के बीच भी हंसी छूट जाए. इस की वजह यह थी कि वे लिखते और पढ़ते दोनों ही बहुत थे.
एक बार संसद में बहस चल रही थी. विपक्ष के नेताओं ने आवाजें करनी शुरू कर दीं. माहौल को हलका करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी बोले, ‘मेरा नाम केवल अटल नहीं है, मैं बिहारी भी हूं.’ यह सुनते ही पूरे सदन की हंसी छूट गई. माहौल बदल गया.
बड़े काम की छोटीछोटी बातें राजनीति में अगर कैरियर बनाने जा रहे हैं, तो छोटीछोटी बातें बहुत काम की हैं. जिन कार्यक्रमों में आप को बुलाया गया है, वहां तो जाएं ही, साथ ही जहां आप को कैरियर के हिसाब से बेहतर लग रहा हो, वहां जरूर जाएं. जिन नए लोगों से मिलें, उन के नाम और परिचय ले लें, जिस से आगे मेलजोल बना रहे.
कभी भी ?ागड़ा न करें. ?ागड़ा करने से फालतू का तनाव ?ोलना पड़ता है, अपने काम की जगह पर थानाकचहरी करनी पड़ती है. कई बार छोटी सी गलती कैरियर को खत्म कर सकती है.
समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान इस का उदाहरण हैं. वे बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि शायद छुरी से वार हो रहा हो. चुनाव के दौरान अधिकारियों को ले कर कहे गए ऐसे ही शब्द उन के गले में फांस बन गए.
दमदार नेताओं से अपने संबंध रखें, लेकिन एक सावधानी रखें कि उन के साथ सैल्फी या फोटो सोशल मीडिया पर न डालें. सोशल मीडिया पर डालने से विरोधी को पता चल जाता है कि आप के किस से संबंध हैं. आप का विरोध करने वाले इस का लाभ उठाने में नहीं चूकते.
अपने से छोटे कार्यकर्ता के साथ संबंध अच्छे रखें. उन का हौसला बढ़ाते रहें और समयसमय पर बिना काम के भी बैठक करते रहें. कार्यकताओं पर खर्च भी करते रहें. अगर कहीं से पैसा मिल रहा है, तो उसे बचा कर रखें. उस का इस्तेमाल राजनीति में आगे बढ़ने के लिए करें. गलत तरह से पैसा न कमाएं.
उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव में डाक्टर राजेश्वर सिंह और असीम अरुण पुलिस अफसर की नौकरी छोड़ कर विधायक बनने के लिए चुनाव लड़े. दोनों ही चुनाव जीत गए. असीम अरुण तो योगी सरकार में मंत्री भी बन गए. दिल्ली में आम आदमी पार्टी में वे ही विधायक बने, जो कुछ दिनों पहले तक एनजीओ चला रहे थे. इस तरह से दूसरे कैरियर में कामयाब होने के बाद भी राजनीति में कामयाब हो सकते हैं.
अब से कुछ साल पहले तक ऐसा माना जाता था कि पंचायत चुनाव गांव की सरहद तक सीमित रहते हैं, पर अब ऐसा नहीं है. आज की तारीख में हर बड़ा सियासी दल पूरी ताकत से इन चुनाव में अपना दमखम दिखाता है और अगर लोकसभा चुनाव नजदीक हों तो पंचायत चुनाव नतीजों की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है.
इस बात को पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव से समझते हैं, जहां ममता बनर्जी को मिली बंपर जीत से पूरी तृणमूल कांग्रेस की बांछें खिली हुई हैं और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बिखरे विपक्ष में थोड़ी उम्मीद जगी है कि केंद्र की ‘डबल इंजन’ सरकार की चूलें हिल सकती हैं, बशर्ते आपसी मतभेद भूल कर भारतीय जनता पार्टी के झूले में झूलते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का डट कर सामना किया जाए.
पश्चिम बंगाल में 8 जुलाई, 2023 को एक चरण में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की कुल 73,887 सीटों के लिए चुनाव हुए. नतीजों में तृणमूल कांग्रेस सब पर भारी पड़ी. उस ने भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और वामपंथी दलों को रगड़ कर रख दिया.
कोई कुछ भी कहे, पर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को टक्कर देना फिलहाल बड़ा मुश्किल दिख रहा है. इस की सब से बड़ी वजह ममता बनर्जी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए चलाई गई कल्याणकारी योजनाएं हैं, जिन का फायदा आम लोगों तक पहुंच रहा है.
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, गांवदेहात के इलाकों में ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी महिला सशक्तीकरण योजना ने महिला वोटरों को पार्टी से बांधे रखने में अहम रोल निभाया है. इस योजना के तहत सरकार सामान्य श्रेणी के परिवारों को 500 रुपए हर महीने और एससीएसटी श्रेणी के परिवारों को 1,000 रुपए हर महीने देती है.
इस के अलावा राज्य के लोगों को ममता बनर्जी के जुझारू तेवर पसंद आते हैं. वे सादगी से भरी जिंदगी जीती हैं और जनता की नब्ज पकड़ने में माहिर हैं. उन्होंने ‘मां, माटी, मानुष’ का जबरदस्त नारा दिया था और इसी के दम पर पश्चिम बंगाल में साल 2011 का विधानसभा चुनाव जीता था.
शिक्षकों की भरती और मवेशी व कोयला तस्करी रैकेट जैसे कई भ्रष्टाचार घोटालों के इलजाम लगने के बावजूद वोटरों ने तृणमूल कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा. याद रहे कि भ्रष्टाचार के इन मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा एक प्रमुख कैबिनेट मंत्री, विधायकों, युवा नेताओं और सरकार के करीबी बड़े सरकारी अफसरों की गिरफ्तारी हुई थी.
भारतीय जनता पार्टी को पंचायत चुनाव में भले ही पहले से ज्यादा सीटें मिली हों, पर नतीजे मनमुताबिक नहीं रहे. वहां पर राज्य भाजपा में टूट होती भी दिखी. पंचायत चुनाव से ठीक पहले भाजपा को बड़ा झटका देते हुए पार्टी विधायक सुमन कांजीलाल सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. अलीपुरद्वार निर्वाचन क्षेत्र की नुमाइंदगी करने वाले सुमन कांजीलाल को तृणमूल कांग्रेस पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कोलकाता में एक समारोह में टीएमसी का झंडा सौंपा था.
पिछले कुछ समय से उत्तर बंगाल में मजबूत होती जा रही भाजपा को इस पंचायत चुनाव में झटका लगा. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर बंगाल में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया था, जबकि इस बार के पंचायत चुनाव में उसे मनचाहे नतीजे नहीं मिले. कुछ जगहों पर अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद यह पार्टी उत्तर बंगाल में अच्छा रिजल्ट नहीं दे पाई.
साल 2019 के लोकसभा और साल 2021 के विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन को पैमाना मानें तो भारतीय जनता पार्टी को इस बार सीटों की तादाद में काफी बढ़ोतरी की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. पूर्व मेदिनीपुर, कूचबिहार, उत्तर 24 परगना के मतुआ बहुल इलाकों और पूर्व मेदिनीपुर में नंदीग्राम छोड़ कर हर जगह उस के प्रदर्शन में काफी गिरावट आई.
दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की एकमात्र लोकसभा सीट पर भाजपा का लंबे समय से कब्जा रहा है, लेकिन इलाके में स्थानीय भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोरचा ने भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन को काफी पीछे छोड़ दिया. भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोरचा के अध्यक्ष अनित थापा ने कहा, “यह जीत लोगों की जीत है. उन्होंने हमें काम करने का मौका दिया है और हम इसे पूरा करेंगे.”
भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाए थे और सोचा था कि जनता इसे मुद्दा बना कर भाजपा के हक में वोट डालेगी, पर यहां भी उस की दाल नहीं गली. प्रदेश में भारीभरकम 81 फीसदी के आसपास वोट पड़े, जो तृणमूल कांग्रेस की झोली भर गए.
भाजपा जानती है कि पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेश में सत्ता की चाबी गांवदेहात के वोटरों के हाथ में है और फिलहाल यह वोटर ममता बनर्जी के पक्ष में खड़ा है. यहीं से उस की चिंता बढ़नी शुरू हो जाती है, क्योंकि अब ममता बनर्जी और ज्यादा मजबूत हो गई हैं और देशभर में विपक्ष को एकसाथ करने में खासा रोल निभा सकती हैं. यह बात भाजपा के ‘मिशन 24’ के लिए खतरे की घंटी है.