Funny Story : भैयाजी का चुनावी कन्फैशन

Funny Story : मेरे मोबाइल फोन पर उन के मैसेज बारबार रहे थे कि मेरा वोट मेरी आवाज है. मैं अपनी आवाज को किसी के पास बिकने दूं. पर दूसरी ओर भैयाजी बराबर कह रहे थे कि रे लल्लू, मेरा वोट केवल और केवल उन की आवाज है. वे मेरी आवाज खरीदने के बाद ही संसद में अपनी आवाज उठाने लायक हो पाएंगे. मैं ने उन के मैसेज को इग्नोर कर इस बार भी मान लिया कि मेरा वोट उन की ही आवाज है.

वैसे दोस्तो, मेरे पास बेचने को अब मेरी आवाज बोले तो मेरा वोट ही बचा है. बाकी तो मेरा सबकुछ बिक चुका है, देश की संपत्तियों की तरह. सो, चुनाव के दिनों में उसे बेच कर कुछ दिन मैं भी हलकीफुलकी मस्ती कर लेता हूं.

अब के फिर चुनाव केड्राई डेको भी मुझे तर रखने वाले भैयाजी को वोट डालने के बाद मैं उन के घर गया उन का धन्यवाद करने. धन्य हों ऐसे भैयाजी, जोड्राई डेको भी अपने वोटरों को ड्राई नहीं रहने देते. उन को तर रखने का इंतजाम वे पहले ही कर देते हैं.

ऐसे भैयाजी जनता को बहुत सत्कर्मों के बाद मिलते हैं. हम ने पिछले जन्म में पता नहीं ऐसे क्या सत्कर्म किए थे, जो इस जन्म में हमें ऐसे ही खानदानी भैयाजी मिले.

भैयाजी केड्राई डेका कर्ज उतारने मैं उन के घर गया, तो वे अंधेरे कमरे में बैठे थे. राजमुजरा या राजमुद्रा में, वे ही जानें. पहले तो मैं ने सोचा कि चुनाव की थकान निकाल रहे होंगे. चुनाव के दिनों में तो जो नेता लोहे का भी हो तो वह भी थकान से चूरचूर हो जाए.

अपने भैयाजी तो ठहरे हाड़मांस के. इतने दिनों तक जागे, नींद आई. सोएसोए भी जागते रहते, जागतेजागते ही सोए रहते. जितना नेता चुनाव के दिनों में दिनरात एक करते हैं, इतना जो कोई साधारण से साधारण जीव स्वर्ग पाने के लिए करे तो उसे मोक्ष प्राप्त करने से कोई रोक पाए.

मैं ने उन के कमरे की दीवारों से आंखकान लगाए, तो भीतर अपने भैयाजी की आवाज सुनाई दी, भैयाजी दिखाई दिए. उन के चारों ओर मच्छर गुनगुना रहे थे. उन्होंने अपने आगे संविधान रखा था और खुद संविधान के आगे घुटने टेके क्षमायाचना की मुद्रा में.

तब पहली बार पता चला कि नेता भी किसी के आगे घुटने टेकते हैं, वरना मैं तो सोचता था कि नेता सभी को अपने आगे घुटने टिकवाते हैं.

भैयाजी हाथ जोड़े संविधान के आगे घुटने टेके कह रहे थे, ‘हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने अपने मौसेरे भाइयों को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख होती, तो मैं अपने मौसेरे भाइयों को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

चुनाव के दिनों में जो मैं ने दिवंगत नेताओं को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख होती, तो मैं अपने दिवंगत नेताओं को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने जनता को लुभाने, रिझाने पटाने के लिए उन को झूठे आश्वासन दिए, तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए मैं दिल की गहराइयों से जनता से माफी मांगता हूं. ये मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख होती, तो मैं भोलीभाली जनता को जो मैं ने इस चुनाव में झाठी गारंटियां दीं, कभी देता. इस अपराध के लिए झूठे आश्वासन हेतु मुझे माफ करें.

हे संविधान, झू बोलना हर पार्टी के, हर किस्म के नेता के अधिकार क्षेत्र में आता है. जनता से झू बोलना उस का मौलिक अधिकार है. जनता को छलना, दलना उस का पहला फर्ज है. पर चुनाव के दिनों में स्वयंमेव हर नेता को झू बोलने का विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता है.

इस महापर्व में नेता के हजार झू भी माफी लायक होते हैं. दरअसल, इन दिनों उसे खुद पता नहीं होता कि वह जो बोल रहा है, क्या बोल रहा है. चुनाव के दिनों में जो मन में आए, बोलना उस का धर्म होता है, क्योंकि इन दिनों वह केवल और केवल अपने प्रचारी धर्म का पालन कर रहा होता है. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के मेरा झू मुझे माफ करे.

हे संविधान, तुम मुझे समाज में जातिगत, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रदूषण को फैलाने के दोष से दोषमुक्त करना.

मैं मानता हूं कि प्रदूषणों में सब से खतरनाक प्रदूषण जातिगत प्रदूषण होता है. पर क्या करूं, इन प्रदूषणों को समाज में फैलाने पर ही कोई अच्छा नेता बन पाता है.

समाज में जातिगत, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाए बिना स्वस्थ राजनीति हो ही नहीं सकती. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के लिए जाति, धर्म मुझे माफ करे.

हे संविधानहे संविधान…’  

Family Story : नरगिस

लेखक – मनोज शर्मा, Family Story : घर की दहलीज पर चांदनी हाथ बांधे खड़ी थी. सामने आतेजाते लोगों में अपनी शाम ढूंढ़ रही थी. कोई दूर से देख लेता तो एक पल के लिए दिल मचल जाता, पर उसे वापस लौटते देखते ही सारी उम्मीदें टूट जातीं.

लौकडाउन से पहले ही आखिरी बार कोई आया था शायद…वह बंगाली, जिस के पास पूरे पैसे तक नहीं थे, फिर अगली बार रुपए देने का वादा कर के सिर्फ 50 का नोट ही थमा गया था.

उस रोज ही नहीं, बल्कि उस से पहले से ही लगने लगा था कि अब इस धंधे में भी चांदनी जैसी अधेड़ औरतों के लिए कुछ नहीं रखा, पर उम्र के इस पड़ाव पर कहां जाएं? उम्र का एकतिहाई हिस्सा तो यहीं निकल गया. सारी जवानी, सारे सपने इसी धंधे में खाक हो चुके हैं. अब तो यही नरक उस का घर है.

कभी जब चांदनी कुछ खूबसूरत थी, सबकुछ जन्नत लगता था. हर कोई उस की गदराई जवानी पर मचल जाता था. पैसे की चाह में सब की रात रंगीन करना कितना अच्छा लगता था.

पर, अब तो जिंदगी जहन्नुम बन चुकी है. लौकडाउन में पहले कुछ दिन बीते, फिर हफ्ते और अब तो महीने. यहां कई दिनों से फांके हैं. कैसे जी रही है, चांदनी खुद ही जानती है. सरकार कुछ नहीं करती इस के लिए. न अनाज का दाना है अब और न ही फूटी कौड़ी. कोई फटकता तक नहीं है अब.

जब चांदनी नईनई आई थी, तब बात ही अलग थी. 12 साल पहले, पर ठीक से याद नहीं. वे भी क्या दिन थे, जब दर्जनों ड्रैस और हर ड्रैस एक से बढ़ कर एक फूलों से सजी. कभी गुलाबी, कभी सुनहरी और कभी लाल. कभी रेशमी साड़ी या मखमली लाल चमकीला गाउन.

रोजरोज भोजन में 3 किस्म की तरकारी, ताजा मांस, बासमती पुलाव, पूरीनान. क्या स्वाद था, क्या खुश थी. घर पर पैसा पहुंचता था, तो वहां भी चांदनी की तूती बोलती थी. नएनए कपड़े, साजोसामान के क्या कहने थे. बस राजकुमारी सी फीलिंग रहती थी.

हर ग्राहक की पहली पसंद उन दिनों चांदनी ही थी और दाम भी मनचाहा. जितना मांगो उतना ही. और कई बार तो डबल भी. हर शिफ्ट में लोग उस का ही साथ मांगते थे. सोने तक नहीं देते थे रातभर. और वह बूढ़ा तो सबकुछ नोच डालता था और फिर निढाल हो कर पड़ जाता था. वे कालेज के लड़के तो शनिवार की शाम ही आते थे, पर मौका पाते ही चिपट जाते थे. हां, पर एक बात तो थी, अगर शरीर चाटते थे तो पैसा भी मिलता था और फिर कुछ घंटों में ही हजारों रुपए.

आज देह भी काम की नहीं रही और एक धेला तक साथ में नहीं. शक्ल ही बदल गई, जैसे कोई पहचानता ही न हो. बूढ़ा बंगाली या गुटका खाता वह ट्रक ड्राइवर या 2-4 और उसी किस्म के लोग, बस वही दोचार दिनों में. सब मुफ्तखोर हैं. मुफ्त में सब चाहते हैं. अब यहां कुछ भी नहीं बचा. यह तो जिंदगी का उसूल है कि जब तक किसी से कोई गर्ज हो, फायदा हो, तभी तक उस से वास्ता रखते हैं, वरना किसी की क्या जरूरत.

अब तो कालेज के छोकरे चांदनी की सूरत देखते ही फूहड़ता से हंसने लगते हैं, पास आना तो दूर रहा. 100-50 में भी शायद अब कोई इस शरीर को सूंघे. आंखें यह सब सोचते हुए धरती में गढ़ गईं. चांदनी रेलिंग पर हथेली टिकाए सुनसान सड़क को देखती रहती है.

कितना बड़ा घर था, पर अब समय के साथसाथ इसे छोटा और अलहदा छोड़ दिया गया है. कभी यह बीच में होता था. जब सारी आंखें चांदनी को हरपल खोजती थीं, पर अब इसे काट कर या मरम्मत कर एक ओर कर दिया है, ताकि चांदनी जवान और पैसे वाले ग्राहकों के सामने न आ सके, शायद ही कभीकभार कोई आंखें इस ओर घूरती हैं.

और फिर गलती से यहां कोई पहुंच भी जाता है तो आधे पैसे तो दलाल ले जाता है. वह मुच्छड़ वरदी वाला या वह टकला वकील और छोटेमोटे व्यवसायी या दूरदराज से आए नौकरीपेशा लोग ही यहां आते हैं. इस शरीर की इतनी कम कीमत, यह सोच कर ही मन सहम जाता है.

टैलीविजन का स्विच औन करते हुए चांदनी खिड़की से बाहर सुनसान सड़क पर देखती है. 2-1 पियक्कड़ इस ओर घूर रहे हैं. जाने कभी आए हों यहां किसी रोज. अब तो याद भी नहीं.

आज चांदनी का उदास चेहरा और अलसाई सी आंखें उन्हें खींचने में पूरी तरह नाकाम हैं. शायद भूखा पेट किसी की हवस को पूरा करने में अब नाकाम है और शरीर का गोश्त भी ढल चुका है.

चांदनी ने चैनल बदलतेबदलते किसी न्यूज चैनल पर टीवी पर कोरोना के बढ़ते प्रकोप को देखा. मर्तबान से मुट्ठीभर चने निकाल कर धीरेधीरे चबाने लगी. कुछ ही देर में टैलीविजन बंद कर के वह पलंग पर लेट गई. उस की खुली आंखें छत पर घूमतेरेंगते पंखे की ओर कुछ देर देखती रहीं और फिर वह गहरी नींद में खो गई.

सुबह कमरे के बाहर से चौधरी के चीखने की सी आवाज सुनाई पड़ी. रात की चुप्पी कहीं खो गई और सुबह का शोर चल पड़ा.

जाने क्यों लगा, सींखचों से कोई कमरे में झांक रहा है. आवाज बढ़ने लगी और गहराती गई.

‘‘3 महीने हो गए भाड़ा दिए हुए…’’ चौधरी के स्वर कानों में पड़ने लगे, ‘‘तुम्हारे बाप का घर है? मुझे शाम तक भाड़ा चाहिए, कैसे भी दो.’’

वही पुरानी तसवीर, जो 10-12 बजे के आसपास 2-3 महीनों में अकसर उभरती है.

चांदनी ने सींखचों से झांक कर देखा चौधरी का रौद्र रूप. लंबातगड़ा गंजा आदमी, सफेद कमीज पर तहमद बांधे मूंछों पर ताव देता गुस्से में चीख रहा था. वह बारीबारी से हर बंद कमरे की ओर देख कर दांत पीसता और आंखें तरेरता.

उस के सामने कुरसी रख दी गई, पर वह खड़ा ही खड़ा सब को आतंकित करता रहा.

‘‘अरे चौधरी साहब, बैठ भी जाइए अब,’’ अमीना बानो ने कुरसी पर बैठने के लिए दोबारा इशारा किया.

एक बनावटी हंसी लिए अमीना कितने ही दिनों से चौधरी को फुसला रही है, ‘‘अच्छा बताइए, आप चाय लेंगे या कुछ और?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, केवल भाड़ा चाहिए.’’

8-9 साल की लड़की के कंधे को मसलते हुए अमीना ने चौधरी के लिए चाय बनवा कर लाने को बोला.

‘‘नहींनहीं, मैं यहां चाय पीने नहीं आया हूं. अपना भाड़ा लेने आया हूं.’’

छोटी लड़की झगड़ा देखते हुए तीसरे कमरे में घुस जाती है.

उसी कमरे के बाहर झड़ते पलस्तर की ओर देखते हुए चौधरी ने कहा, ‘‘घर को कबाड़खाना बना कर रख दिया है अमीना तुम लोगों ने… न साफसफाई, न लिपाईपुताई. देखो, हर तरफ बस कूड़ाकरकट और जर्जर होती दीवारें. सोचा था कि इस बार इस घर की मरम्मत करा दूंगा, पर यहां तो भाड़ा तक नहीं मिलता कभी टाइम से.

‘‘मैं 10 तारीख को फिर आऊंगा. मुझे भाड़ा चाहिए जैसे भी दो. घर से पैसा मंगवाओ या कहीं और से, मुझे
नहीं मालूम.’’

‘‘अरे चौधरी साहब, इन दिनों कोई नहीं आता यहां,’’ दूसरी कुरसी करीब सरका कर चौधरी को समझाने की कोशिश करते हुए अमीना ने कहा.

‘‘आप का भाड़ा क्यों नहीं देंगे… हाथ जोड़ कर देंगे. बहुत जल्दी सब ठीक हो जाएगा, टैंशन न लो आप. आप के चलते ही तो हम सब हैं यहां, वरना इस धरती पर हमारा कोई वजूद कहां.’’

सामने एक कमरे से एक जवान होती लड़की उठी. दरवाजा खोल कर अमीना के पास आई और ऊंघने लगी, ‘‘अम्मां क्या हुआ? कौन है ये बाबू? क्या कह रहे हैं?’’

इतना कह कर चौधरी की तरफ देख कर वह जबान पर जीभ फिरा कर हंसने लगी. उस लड़की की शक्लोसूरत पर अजीब सी मासूमियत है, पर उस की छाती पूरी भरी है, जिस पर इस अल्हड़ लड़की को खास गुमान है. उस के बदन पर एक टाइट मैक्सी है.

चेहरे पर गिरी जुल्फें उसे और खूबसूरत बना रही हैं. चौधरी की नजरें अमीना से हट कर उस ओर चली गईं और रहरह कर उस के गदराए बदन पर टिक जाती हैं.

अमीना की तरफ देखते हुए चौधरी बोला, ‘‘कौन है यह? नई आई है क्या? पहले तो इसे कभी नहीं देखा?’’

लड़की अपनी उंगलियों से बालों की लटों के गोले बनाती रही.

‘‘हां, यह कुछ दिन पहले ही यहां आई है. मुस्तफाबाद की जान है. अभी 17 की होगी, शायद दिसंबर में.’’

‘‘क्या नाम है तेरा?’’ लड़की को देखते हुए चौधरी बोला.

लड़की चुप रही, पर मुसकराती रही.

अमीना ने लड़की की कमर सहलाते हुए कहा, ‘‘बेटी, नाम बताओ अपना. ये चौधरी साहब हैं अपने. यह पूरा घर इन्हीं का है.’’

चौधरी किसी रसूखदार आदमी की तरह अपने गालों पर उंगली फिराने लगा.

लड़की गौर से देखती रही, कभी अमीना को तो कभी चौधरी को.

‘‘नरगिस है यह. नमस्ते तो करो साहब को.’’

लड़की हंसते हुए दोनों हथेलियां जोड़ कर सीने तक ले आई, पर चौधरी की आंखें अभी भी नरगिस के सीने पर थीं.

‘‘ओह नरगिस, कितना अच्छा नाम है,’’ एक भौंड़ी मुसकराहट लिए चौधरी बोला.

नरगिस अपनी तारीफ सुन कर चहकने लगी और अमीना की एक बांह पर लहर गई.

घड़ी में समय देखते हुए चौधरी कुछ सोचते हुए कुरसी से उठा. पहले इधरउधर देखा, पर जल्दी ही लौटने की बात कहता हुआ देहरी की ओर बढ़ने लगा.

अमीना ने कहा, ‘‘चाय की एक प्याली तो ले ही लेते?’’

मुंह पर मास्क लगाते हुए चौधरी ने नरगिस को भी मास्क लगाने की सलाह दी, ‘‘फिर आऊंगा. सब अपना खयाल रखना.’’

नरगिस के सीने पर नजर रखता और जबान पर होंठ फिराता हुआ चौधरी चला गया.

एकएक कर के कमरों की सांकलें खुलने लगीं. भूखेअलसाए चेहरे, जो अभी तक कमरों में बंद थे, बाहर दालान में इकट्ठा हो गए मानो किसी खास बात पर जिरह करनी हो.

‘‘कौन था? चौधरी?’’ एक अधेड़ उम्र की धंधे वाली ने अमीना से पूछा.

‘‘हां, चौधरी ही लग रहा था,’’ दूसरी ने बेमन से कहा.

‘‘और क्या हुआ तेरे सेठ का? कल भी नहीं आया क्या?’’ रोशनी की तरफ देखते हुए एक ने पूछा.

‘‘नहीं. लौकडाउन है न. फोन पर ही मजा लेता रहा, पर मैं ने भी पेटीएम से 500 रुपए झाड़ ही लिए.’’

‘‘अरे, यहां तो कोई ऐसा भी नहीं,’’ एक बोली और फिर वे एकदूसरे को देखते हुए बतियाने लगीं.

‘‘जैसे भी हो, अपनेअपने ग्राहकों को बुलाओ, नहीं तो चौधरी यहां से निकाल देगा,’’ अमीना ने नेता भाव से सब को इकट्ठा कर के कहा.

‘‘3 महीने हो गए हैं, एक धेला तक नहीं दे पाए उन को. वह महारानी कहां है? उसे यह सब दिखता नहीं क्या?’’ चांदनी के कमरे की तरफ देख कर अमीना ने आवाज दी, ‘‘चांदनी, ओ चांदनी.’’

चांदनी जैसे सपने से जाग गई हो.

एक बार तो दिल ने चाहा कि सांकल खोल कर सब की जबान पर लगाम लगा दे कि एक वक्त था, जब सारे उस की आमदनी पर जीते थे, पर आज मुश्किल घड़ी में ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं और यह चौधरी जब मूड करता था आ जाता था मुंह मारने, पर देखो तो आज कैसे सुर बदल गए हैं इस मरदूद के.

बाहर दालान में कुछ देर की बहस हुई. सब एकदूसरे को देखती रहीं, पर नतीजा कुछ नहीं निकला. सब को लगा कि अब नए सिरे से शुरुआत करनी होगी.

सुरैया पास ही खड़ी थी. चांदनी की रोंआसी सूरत देख और करीब आ गई. उस की ठुड्डी को सहलाते हुए बोली, ‘‘चांदनी दीदी, सब ठीक हो जाएगा.’’

सब अपनेअपने कमरे में लौट गईं. सुरैया न केवल शक्लोसूरत से खूबसूरत थी, बल्कि अच्छा गाती भी थी.

लौकडाउन से पहले सब से ज्यादा ग्राहक इसी के होते थे. कुछ तो केवल गायकी के फन को तराशने आते थे और 2-1 ने तो गाने के लिए बुलावा भी भेजा. जिस्म तो यहां सभी बेचती हैं, पर उस के सुर की बात ही अलग है. अगर वह यहां न आती और गायकी पर फोकस रखती तो जरूर ही नाम कमाती.

वह खाकी वरदी वाला रोज नई उम्मीद की किरण दे कर मुफ्त में सुरैया को नोच जाता है. बेचारी पढ़ीलिखी है. 10वीं तक स्कूल गई है, पर यहां आ कर सब एकसमान हो जाते हैं. आई तो यहां बाप के साथ कुछ बनने, पर इस खाकी वरदी वाले ने झूंठा झांसा दे कर इस धंधे में उतार दिया. अब खुद तो आता है 2-4 और भी आ जाते हैं. सुरैया न सही, मेरे जैसी अधेड़ ही मिल जाए.

सुरैया चांदनी का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई.

‘‘क्या हुआ? रो क्यों रही हो?’’ सुरैया ने चांदनी के बालों में उंगलियां फिराते हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं बस ऐसे ही. परसों देर रात तक तुम्हारे कमरे से आवाजें आ रही थीं,’’ चांदनी ने सुरैया से पूछा.

‘‘कब? अच्छा, परसों? वही वरदी वाला आया था. 3 और भी थे. मुंह पर मास्क बांधे थे. मैं ने जब पूछा कि दारोगा साहब कुछ बात बनी, मेरे गाने की तो वह हंसने लगा और मेरे सीने को छूने लगा. मैं ने उस से कुछ पैसे मांगे तो गाली देने लगा, पर एक धेला तक नहीं दिया…

‘‘उस का मुंह सूखे पान से भरा था. बीड़ी की राख फेंकते हुए बोला, ‘रानी, हो जाएगा सब. देखती नहीं कि अभी सब बंद है.’

‘‘और पीछे से उस ने आगोश में भर लिया. मैं ने कहा कि अच्छा दारोगा साहब थोड़े पैसे ही दे दो?’’

यह सुन कर उस का सारा नशा जाता रहा और गालीगलौज करने लगा.

‘‘चांदनी दीदी, आप ही बताओ कि अब कैसे चलेगा? सब मुफ्त में मजा चाहते हैं. कुत्ते कहीं के.’’

सुरैया बोलती रही, चांदनी सब ध्यान से सुनती रही.

‘‘पर, अब चारा भी क्या है. जब पेट की प्यास बुझाने को पैसा नहीं तो कोई क्या देह को दिखाए. वह रातभर के लिए अपने कमरे पर ले जाना चाहता था. बोलता था, ‘मेरी रानी, ऐश करवा दूंगा, चल तो बस एक बार.’

‘‘जब मैं ने मना किया तो मुझे घसीटने लगा. अमीना मैम ने समझाबुझा कर उसे चलता किया.’’

‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं मुझे?’’ चांदनी बोली.

‘‘चांदनी दीदी, अब क्या किसी को तंग करूं. तुम्हें मैं अपना मानती हूं, फिर यह सब देख कर तुम और ज्यादा दुखी होगी.’’

सुरैया की रोती आंखें चांदनी को देखती रहीं, कुछ देर तक वे दोनों चुप रहीं.

‘‘सुरैया एक काम करोगी मेरे लिए?’’

‘‘हांहां, कहो न?’’

‘‘नरगिस… जो अभी नई लड़की आई है न…’’

‘‘हां…’’

‘‘उसे यहां से कहीं दूर भेज दो, जहां वह जिस्मबाजारी न कर सके.’’

‘‘अभी तो वह बच्ची है. मैं उस में अपनी सूरत देखती हूं. इस जुम्मेरात जब अमीना बाई 1-2 घंटे के लिए बाहर जाए, तब किसी भी तरह उसे वापस भिजवा दो. तुम्हारा एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी या तुम 500-600 रुपए का इंतजाम कर दो, मैं ही उसे घर छोड़ आऊंगी सुरैया.’’

‘‘अरे दीदी, अभी सब बंद है. तुम कैसे जाओगी? और उस लड़की को भी तो समझाना होगा. वह तो अभी नासमझ है. देह ही निखरी है अभी, दिमाग से तो नादान ही है?’’

‘‘मैं जानती हूं, पर मौका पाते ही उसे भी समझा दिया जाएगा. वह चौधरी ही कहीं 1-2 दिन में… उस की नजर ही गंदी है. अब तो उस का वह छोकरा भी…’’

‘‘नहींनहीं दीदी, ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘सुनो, एक बात बताऊं. यहां पास ही कालेज है. उस में पढ़ने वाला एक शरीफ लड़का है. उस से फोन पर बात करती हूं. वह कोई पढ़ाई कर रहा है धंधे वाली औरतों की जिंदगी पर. शायद, वह कुछ मदद कर दे.

‘‘जैसे भी हो, हम सब तो यहां बरबाद हो गईं अब और किसी नई को यहां न खराब होने दें.’’

‘‘ठीक है दीदी. आज दोपहर जब सब सोए होंगे, तब बात करते हैं. अच्छा, मैं भी अब चलती हूं. तुम से बतिया कर सच में सुकून पाती हूं. बहुत उम्मीद है तुम से.’’

‘‘अरे दीदी, ये बिसकुट तो खाती जाओ.’’

‘‘नहींनहीं, बस.’’

कमरे में लौट कर मानो चांदनी सब भूल गई. काम हो जाए. हमारा तो अब कोई नहीं हो सकता, पर उस की तो पूरी जिंदगी बन जाएगी. वह लड़का जरूर कुछ करेगा.

आज ही उस लड़के का फोन भी आना है. मेरी जिंदगी पर कुछ लिख रहा है वह. हां, रिसर्च कर रहा है. ये लोग काफी पढ़ेलिखे हैं, जरूर हमारी कुछ न कुछ मदद करेंगे.

चांदनी का दिल कहता है कि वह लड़का नरगिस के लिए कुछ करेगा. क्या नाम था उस का…?

जो भी हो, इस जहन्नुम भरी जिंदगी से इस लड़की को भेजना ही पहला काम होगा. सरकार और ग्राहकों के भरोसे भी कब तक बैठे रह सकते हैं. कोई किसी का नहीं इस नरक में.

अभी लौट गई तो कोई अपना भी लेगा. नहीं तो यह भी दूसरी धंधे वालियों जैसी हो जाएगी. जरूर कुछ होगा. अच्छा होगा, यकीनन.

3 महीने बाद…

‘‘ओह, कितना अच्छा लग रहा है आज 3 महीने बाद. नरगिस कैसी होगी? सुरैया, बात हुई कोई?’’

‘‘हां दीदी, कल रात हुई थी,’’ सुरैया चहकते हुए बोली.

चांदनी जैसे खुशी से झूम गई.

‘‘यह नया सूट कब लाई सुरैया? पहले तो कभी न देखा इस में.’’

‘‘दीदी, यह सूट उस पढ़ने वाले साहब ने दिया है. बहुत अच्छे हैं ये पढ़ने वाले लोग. हमारे जज्बात समझते हैं. कभी छुआ तक नहीं, पर हरमुमकिन मदद देते हैं. आप की बहुत तारीफ करता है वह.’’

‘‘कौन सा…?’’ चांदनी ने पूछा.

‘‘अरे वही, जिस ने नरगिस को यहां से उस के घर तक भिजवाया था. और न केवल भिजवाया था, बल्कि उस के घर वालों को अच्छे से समझाया भी था.’’

‘‘अच्छा…’’

‘‘हां, दीदी…’’

‘‘एक बात कहूं?’’

‘‘कहो न…’’

‘‘वे प्रोफैसर बन जाएंगे, कालेज में जल्दी ही.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘हां, वे बोलते हैं कि मेरे साथ घर बसाएंगे.’’

‘‘अरे वाह सुरैया, तेरा सपना अब पूरा हो जाएगा.’’

‘‘दीदी आप बहुत अच्छी हो, सब तुम्हारी बदौलत ही मुमकिन हुआ है. तुम सच में महान हो.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मैं इस लायक कहां.’’

‘‘दीदी, अगर उन की किताब छप गई न, तो वे तुम्हें भी तुम्हारे घर पर भिजवा देगा.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मेरा तो यही है सब स्वर्ग या नरक.’’

इस के बाद वे दोनों चहकते हुए घंटों तक बतियाती रहीं.

Short Story : मोम की गुड़िया

Short Story : जिंदगी में सबकुछ तयशुदा नहीं होता. कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है, जिस की आप ने ख्वाब में भी उम्मीद नहीं की होती है. हालांकि अब मैं उस बुरे ख्वाब से जाग गई हूं. राशिद ने मेरी तकदीर को बदलना चाहा था. मु झे मोम की गुडि़या समझ कर अपने सांचे में ढालना चाहा था.

यों तो राशिद मेरी जिंदगी में दबे पैर चला आया था. वह मेरी बड़ी खाला का बेटा था. पहली बार वह तरहतरह के सांचे में ढली मोमबत्तियां ले कर आया था और एक दिन मु झ से कहा था, ‘‘इनसान को मोम की तरह होना चाहिए. वक्त जब जिस सांचे में ढालना चाहे, इनसान को उसी आकार में ढल जाना चाहिए.’’

राशिद का मोमबत्ती बनाने का बहुत पुराना कारोबार था. हमारे शहर में भी राशिद की बनाई मोमबत्तियों की काफी मांग बढ़ गई थी. अब वह दिल्ली से कुछ नए सांचे ले कर आया, तो हमारे ही घर पर रुका.

राशिद ने मेरे सामने मोम पिघला कर सांचे से मोमबत्तियां बनाईं. तब मु झे भी अपना वजूद मोम की तरह पिघला महसूस हुआ. मैं सोचने लगी, ‘काश, मु झे भी कोई पसंदीदा सांचा मिल जाता, जिस में मैं मनमुताबिक ढल जाती.’

एक दिन तपती दोपहर में राशिद ने मेरे दोनों बाजुओं को अपने हाथों से ऐसे जकड़ लिया मानो मैं मोम हूं और वह जैसे चाहेगा, मुझे सांचे में ढाल देगा.

राशिद बड़ी मासूमियत भरे अंदाज में फुसफुसाया, ‘‘मैं तुम से बेहद मुहब्बत करता हूं.’’

वह मेरे जवाब के इंतजार में था और मैं सोच में पड़ गई. उस ने फिर फुसफुसाना शुरू किया, ‘‘जेबा, तुम्हारे बगैर सुबह सूनी, दोपहर वीरान और शाम उदास नजर आती है.’’

मैं इतना सुनते ही न जाने क्यों बेतहाशा हंसने लगी और हंसतेहंसते मेरी आंखें भर आईं. राशिद हैरान सा मेरी ओर देखने लगा.

मैं ने अपनी बांहें छुड़ा कर राशिद से कहा, ‘‘मर्द की फितरत अजीब होती है. जब तक वह किसी चीज को पा नहीं लेता, उस पर जान छिड़कता है. मगर उसे पा लेने के बाद वह उसे भूल जाता है. मर्द हमेशा उस पहाड़ की चोटी पर चढ़ना चाहता है, जिसे अभी तक किसी ने छुआ न हो, मगर चोटी पर चढ़ने के बाद वह आगे बढ़ जाता है दूसरी अजेय पहाड़ की चोटी को जीतने के लिए.’’

राशिद न तो स्कूली तालीम ज्यादा ले पाया था और न ही जिंदगी की पाठशाला में होनहार था, जबकि मैं जिंदगी की पाठशाला में काफीकुछ सीख चुकी थी.

मर्द के सामने पूरी तरह खुल जाना औरत की बेवकूफी होती है. उसे हमेशा राज का परदा सा बनाए रखना चाहिए. ऐसी औरत मर्द को ज्यादा अपनी तरफ खींचती है. यह बात जिंदगी की पाठशाला में मैं सीख चुकी थी.

2 साल पहले मैं 12वीं जमात पास करने के बाद घर बैठ गई थी. मेरा आगे पढ़ने का मन ही नहीं हुआ. दुनिया बेरौनक सी लगती थी. कहीं किसी काम में मन नहीं लगता था. जी चाहता था कि दुनिया से छिप कर किसी अंधेरी कोठरी में बैठ जाऊं, जहां मु झे कोई देख न पाए.

फिर पता नहीं क्यों मेरे दिल ने एक करवट सी ली. मैं ने एक दिन अम्मी से आगे पढ़ने की बात की. वे खुश हो गईं. औरत ही औरत के दर्द को पहचान पाती है. वे चाहती थीं कि मैं पढ़ने में मन लगाऊं और खुश रहूं. मैं भी अब खुशीखुशी स्कूल से कालेज में पहुंची. बीएससी में जीव विज्ञान मेरा पसंदीदा विषय रहा. इनसान के भीतर देखने की चाह ने इस विषय में मेरी और दिलचस्पी पैदा कर दी थी. अब विषय के साथसाथ और भी बहुतकुछ बदल गया था.

जमात बढ़ने के साथसाथ स्टूडैंट में भी काफीकुछ बढ़ोतरी हो जाती है. दिमाग के जाले साफ हो जाते हैं. पुराने दोस्त काफी पीछे रह जाते हैं. नया माहौल, नए दोस्त हवा में नई खुशबू सी घोल देते हैं.

एक दिन मैं बायोलौजी का प्रैक्टिकल कर के घर पहुंची, तो घर में कुछ ज्यादा ही चहलपहल नजर आई. बड़ी खाला, खालू और राशिद घर पर दिखाई दिए. खाला, खालू को सलाम कर मैं अंदर अपने कमरे में चली गई.

रात का खाना खाने के वक्त मैं ने एक बात नोट की कि राशिद मु झे एक अलग तरह की मुसकान से देख रहा था.

खाना खाने के बाद मौका मिलने पर राशिद मेरे पास आया और बोला, ‘‘जेबा, अब वक्त आ गया है तुम्हें मेरे सांचे में ढलना होगा. तुम्हें तो मालूम है कि मेरे पास कितने सांचे हैं. मैं जब जिस सांचे में चाहूं, मोम पिघला कर नई शक्ल दे देता हूं.’’

मैं राशिद की सोच से काफी आगे बढ़ चुकी थी. उसे जवाब देना मैं ने मुनासिब नहीं सम झा.

सुबह कालेज जाते वक्त अम्मी मेरे पास आईं. कुछ देर तक वे मु झे देखती रहीं, फिर धीरे से बोलीं, ‘‘जेबा, बाजी तेरा रिश्ता मांगने आई हैं. तेरे अब्बा तो खामोश हैं, तू ही कि बता क्या जवाब दूं?’’

मैं ने अम्मी की तरफ देखा. वे अजीब से हालात में थीं. एक तरफ उन की बहन थी, तो वहीं दूसरी तरफ बेटी.

मैं ने अब अपनी जबान खोलना वक्त का तकाजा सम झा. मैं ने कहा, ‘‘अम्मी, अब वक्त काफी आगे बढ़ चुका है और ये लोग पुराने वक्त पर ही ठहरे हुए हैं. आप खुद बताइए कि क्या राशिद मेरे लायक है? वैसे भी मु झे आगे पढ़ना है, काफी आगे जाना है. मेरे अपने सपने हैं, जो मु झे पूरे करने हैं.

‘‘मैं पिंजरे में बंद मजबूर बेसहारा पक्षी की तरह नहीं हूं, जिस का कोई भी मोलभाव कर ले. मैं खुले आसमान में उड़ने वाला वह पक्षी हूं, जो अपनी मंजिल खुद तय करता है.’’

मेरे इनकार के बाद मुझ पर मेरे ही घर में राशिद ने तेजाब का एक भरा हुआ मग फेंका था. वह तो मैं समय पर पलट गई थी और सारा तेजाब मेरी पीठ और हाथ पर ही गिर सका था.

घर में कुहराम मच गया था. अब्बा घर पर नहीं थे. अम्मी ही फौरन मुझे अस्पताल ले गई थीं. एक महीने के इलाज के बाद मैं बेहतर हो सकी थी. मैं अपने विचारों में, इरादों में पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गई थी.

राशिद को तो उस के किए की सजा मिली ही, मगर मैं ने भी अपनी जीने की इच्छा को जिंदा रखा और आज एक कामयाब टीचर के तौर पर अपने पैरों पर खड़ी हूं.

Hindi Kahani: औलाद की खातिर- कजरी को किसने दिया यह सुख

Hindi Kahani: पहली मुलाकात में ही प्रदेश के जेल मंत्री जयप्रकाश यादव बाबा सुखानंद के पांचसितारा होटल जैसे आलीशान आश्रम में जब कजरी से मिले, तो उन की लार टपकने लगी.

मंत्रीजी बाबा सुखानंद से बोल पड़े, ‘‘वाह बाबाजी, वाह, आज आप ने मेरे लिए क्या बुलबुल परोसी है. बिलकुल संगमरमर जैसी चमक रही है. यह तो रस भरी मदमस्त जवानी की मालकिन है.’’

बाबाजी ठहाका लगा कर बोले, ‘‘मंत्रीजी, आप तो जानते ही हैं कि हमारे आश्रम के बगल में एक पुराना मंदिर है. यहां हर साल मेला लगता है. इस मेले के बंदोबस्त के लिए शहर के तमाम आला अफसर मेरी इस कुटिया में पहले आ कर मु  झ से बातचीत कर के काम को आगे बढ़ाते हैं. तमाम फोर्स लगाने के बाद ही मेला शुरू होता है.

‘‘मेरे ऊपर पिछले चुनाव में हमला हो चुका है, लेकिन मैं उस हमले में बालबाल बच गया था. इस बार विपक्षी पार्टी के लोग अगर मेरे ऊपर हमला करते हैं, तो मेरे गुरगे उन को वहीं ढेर कर देंगे, क्योंकि इस बार हम ने भी पूरी तैयारी कर ली है. आप ठहरे जेल मंत्री, तो जेलर आप की मुट्ठी में है…

‘‘अब आप जाइए, कजरी आप का इंतजार कर रही है… रात के 11 भी बज चुके हैं.’’

‘‘ठीक है स्वामीजी, मुझे भी सुबह जल्दी जाना है,’’ कहते हुए मंत्रीजी वहां से कजरी के कमरे में चले गए.

कजरी को बांहों में भरते हुए जेल मंत्री बोले, ‘‘तुम तो बहुत लाजवाब चीज हो. मैं अकसर इस आश्रम में आ कर इस कमरे में शराब और शबाब का मजा लेता रहा हूं, लेकिन अब तक तुम जैसी कोई नहीं मिली…’’

कजरी भी मटकते हुए बोली, ‘‘क्या करूं मंत्रीजी, मेरा पति ही नकारा है. दिनभर सेठ के यहां काम करतेकरते थक जाता है और रातभर मैं जल बिन मछली की तरह करवटें बदल कर प्यासी ही तड़पती रहती हूं.

‘‘शादी के 4 साल बाद भी मुझे कोई बच्चा नहीं हुआ. लेकिन हां, मेरा पति कभीकभार ही हलकीफुलकी मर्दानगी दिखा पाता है.’’

‘‘कोई बात नहीं कजरी… तुम्हारे पास मोबाइल फोन है न? नहीं है, तो मैं दुकान से मंगवा देता हूं,’’ मंत्रीजी ने कहा.

‘‘हां, है न मेरे पास मोबाइल फोन. आजकल मोबाइल का जमाना है. जब बाबाजी को जरूरत पड़ती है, तो वे मु  झे मोबाइल से फोन कर के बुला लेते हैं,’’ कजरी ने कहा.

‘‘बाबा को मैं भी सवेरे फोन पर बोल देती हूं कि आज पति की नाइट ड्यूटी है. जरूरत पड़े तो याद कीजिएगा.

‘‘शाम को घूमने के बहाने मैं अपनी सहेली रमिया के साथ यहां आ जाती हूं. इस आश्रम में शाम को बहुत लोग आते हैं.’’

‘‘यह रमिया कौन है?’’ मंत्रीजी ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘वह इस समय दूसरे कमरे में बाबाजी के साथ मौजमस्ती कर रही होगी. वह यहां पर साफसफाई का काम करती है,’’ कजरी अपने कपड़े उतारते हुए बोली.

कजरी की पीठ पर हाथ फेरते हुए मंत्रीजी बोले, ‘‘कजरी, तुम कहां की रहने वाली हो?’’

‘‘मेरा घर तो जौनपुर में है. यहां इलाहाबाद में मेरा पति एक सेठ के यहां काम करता है. शादी होने के एक साल बाद ही मेरा पति मुझे यहां ले आया था. घर पर बूढ़े सासससुर, जेठजेठानी और उन के 3 बच्चे हैं.

‘‘रमिया से गहरी दोस्ती होने पर उस ने मुझे यहां पर लाना शुरू किया. मंदिर में मन्नत मांगने के बहाने रात में हम दोनों साथ आ जाती हैं और काम निबटा कर साथ ही घर चली जाती हैं.’’

मंत्रीजी बोले, ‘‘ठीक है, जल्दी करो. मुझे देर हो रही है. सुबह दौरे पर भी जाना है. तुझे देख कर तो मेरा मन उतावला हो रहा है,’’ यह कह कर वे कजरी की कमर में हाथ डालते हुए उस को पलंग की तरफ ले जाने लगे.

कुछ देर बाद तूफान थम चुका था. कजरी और रमिया दोनों घर आ गईं. रमिया भी बाबा सुखानंद को दूसरे कमरे में जा कर भरपूर सुख दे कर लौटी थी.

रास्ते में दोनों ने मैडिकल स्टोर से दर्द दूर करने की दवा खरीदी और अपनीअपनी दवा खाने के बाद सोईं, तो फिर सुबह ही उन की आंख खुली.

सुबह कजरी का चेहरा खिलाखिला सा लग रहा था. अब मौका मिलते ही किसी अफसर या मंत्री से कोई खास काम करवाना रहता, तो बाबा सुखानंद कजरी को उस के आगे परोस देते. इस के लिए बाबा मनोवैज्ञानिक तरीका ही अपनाते थे.

कुछ दिन बाद कजरी के पैर भारी हो गए, तो वह बहुत खुश हुई.

सुबहसुबह उलटी करते देख कजरी का पति मनोज बोला, ‘‘क्या बात है? उलटी क्यों कर रही हो?’’

कजरी बोली, ‘‘यह तो खुशी की बात है. तुम बाप बनने वाले हो.’’ यह सुन कर मनोज बहुत खुश हुआ.

कजरी बोली, ‘‘यह बाबा सुखानंद के आशीर्वाद का नतीजा है.’’ Hindi Kahani:

Hindi Story: बाबा नामदेव का सरप्राइज – क्या मिल पाया गजर सिंह को औलाद का सुख

Hindi Story: डीएसपी गजर सिंह ने अपनी नौकरी के दौरान नकली बाबाओं और अंधविश्वास के खिलाफ गदर मचा रखा था. उस की पोस्टिंग जिस भी शहर में होती, उस इलाके के आसपास के बाबातांत्रिक सभी की जानकारी वह हासिल कर लेता था और फिर उन के आश्रमों में रेड डाल कर उन की काली करतूतों का भंडाफोड़ करता था.

‘‘आखिर क्या बात है? तुम क्यों बाबा लोगों के इतने खिलाफ रहते हो? वे बेचारे तो सीधेसादे तो होते हैं,’’ एक दिन डीएसपी गजर सिंह की पत्नी मालती ने उस से पूछा.

‘‘ये बाबा लोग सीधेसादे नहीं होते, बल्कि लोगों को धोखा देने के अलावा कुछ भी नहीं करते हैं. हाथ की

सफाई दिखा कर लोगों को अपनी ओर खींचते हैं और इन का शिकार मैं खुद भी हुआ हूं, इसलिए इन को सबक सिखाना मेरा पहला टारगेट है,’’ गजर सिंह ने बताया.

मालती और गजर सिंह की शादी के कई साल बाद भी उन के कोई औलाद नहीं हुई थी, जिस का इलाज भी दोनों ने कराया था.

गजर सिंह की बाबाओं से चिढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि एक समय में जब वह बाबाओं पर भरोसा करता था, तो एक दिन अपनी समस्या ले कर सब से पहले एक बाबा के पास गया था, पर उस बाबा ने पूरे 2 साल तक गजर सिंह को झांसे में रखा. उस से खूब पैसे भी ऐंठे, पर उसे औलाद नहीं हुई थी.

फिर किसी दोस्त की सलाह पर गजर सिंह ने खुद को एक डाक्टर को दिखाया था. कई तरह की जांचों के बाद उसे पता चला कि वह औलाद नहीं पैदा कर सकता, क्योंकि उस का स्पर्म काउंट बहुत कम है.

वैसे, गजर सिंह बिस्तर पर संबंध बनाने में पूरी तरह से परफैक्ट था और किसी भी औरत को संतुष्ट कर सकता था, फिर भी वह अभी तक बेऔलाद था और दवाओं से भी उसे कोई फायदा नहीं हुआ था.

हाल में ही गजर सिंह की पोस्टिंग अजमेर में हुई थी और यहां का चार्ज संभालते ही उस ने अपनी आदत के मुताबिक बाबाओं का रिकौर्ड मांगा और उन के आश्रमों की जानकारी भी ली.

अजमेर से जयपुर जाने वाले हाईवे पर एक छोटा सा कसबा किशनगढ़ पड़ता है, जो अपने मार्बल के काम के लिए बहुत मशहूर है.

इसी किशनगढ़ कसबे से तकरीबन 10 किलोमीटर अंदर जाने पर बाबा नामदेव का आश्रम था, जो सफेद रंग के मार्बल से बना हुआ था.

जब गजर सिंह ने और जानकारी जुटाई, तो उसे पता चला कि बाबा नामदेव एक तरफ तो लोगों में चमत्कार दिखा कर अंधश्रद्धा पैदा करता है और दूसरी तरफ उस के कई कारखाने हैं, जिन में वह तमाम तरह के प्रोडक्ट बनाता है और उन्हें बाजार में बेचता है. ये सारे काम वह एक ट्रस्ट के तहत करता है, ताकि किसी भी तरह के आरोपों के दायरे से बाहर ही रहे.

गजर सिंह ने महसूस किया कि बाबा नामदेव के आश्रम में बेऔलाद औरतों का जमावड़ा लगा रहता था, जो आश्रम में आ कर कुछ खास तरह की थैरेपी लेती थीं और औलाद पाने का सुख हासिल करती थीं.

धर्म के नाम पर डरने वाली मालती अपने बांझपन को उन बाबाओं का शाप मानती थी, जिन का भंडाफोड़ गजर सिंह ने किया था, इसीलिए वह अपने पति से छिपछिपा कर बाबाओं से कर्मकांड कराती थी और उन्हें दानदक्षिणा भी देती थी.

अजमेर आ कर जब मालती के कानों तक बाबा नामदेव की मशहूरी के चर्चे पहुंचे और मालती ने यह जाना कि उन की शरण में जाने से बहुत सारी औरतों को औलाद मिल जाती है, तो उस ने गजर सिंह से वहां जाने की इच्छा जाहिर की.

‘‘भई, मुझे तो बाबा नामदेव से मिलने जाना ही है, पर एक भक्त के रूप में नहीं, बल्कि एक जागरूक इनसान के रूप में. मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं, पर मैं अपना यह स्पाई कैमरा भी साथ ले चलना चाहता हूं, ताकि आश्रम की गतिविधियां चुपके से रिकौर्ड कर सकूं.’’

मालती खुशीखुशी राजी हो गई और अगले दिन ही गजर सिंह और मालती किशनगढ़ के पास बने हुए आश्रम में पहुंच गए. गेट के अंदर घुसते ही उन पर एक आटोमैटिक मशीन से खुशबूदार डियो का छिड़काव हो गया.

सीधे गैलरी से अंदर जाने पर 2 खूबसूरत लड़कियां एक बड़े से रजिस्टर में वहां आने वाले भक्तों की कुछ डिटेल्स लिखवा रही थीं. उसी में एक कौलम यह भी था कि भक्त आश्रम में किस वजह से आए हैं? मालती ने उन्हें बताया कि वह औलाद पाने के लिए यहां आई है.

‘‘क्या आप बताना चाहेंगी कि वह औलाद आप को बेटी चाहिए या बेटा?’’ लिखने वाली लड़की ने पूछा.

मालती ने बिना देर किए ‘बेटा’ बोल दिया. उस लड़की ने रजिस्टर के एक कौलम में ‘बेटा’ लिख दिया. गजर सिंह का कैमरा यह सबकुछ रिकौर्ड कर रहा था.

आगे बढ़ने पर एक बड़े से हाल के बीचोंबीच बाबा नामदेव की एक बहुत बड़ी सी तसवीर लगी हुई थी, जिस से लगातार राख झड़ रही थी. भक्त लोग उसे भभूत कह कर अपने माथे से लगा रहे थे. कुछ तो उसे अपनी जबान पर भी रख रहे थे. मालती ने भी खुश हो कर बाबा की तसवीर से गिरती हुई भभूत उठा ली.

कुछ देर तक वे दोनों बाबा नामदेव के मायालोक में घूमते रहे, फिर अचानक दीवारों पर लगे हुए विशाल स्पीकर से आवाज आई कि बाबा नामदेव अभी ‘चाणक्य हाल’ में सब को दर्शन देंगे.

भक्तगण ‘चाणक्य हाल’ की तरफ दौड़ पड़े. मालती और गजर सिंह भी उसी हाल में पहुंच गए. हाल की खूबसूरती और भव्यता देखते ही बनती थी.

बाबा के इंतजार में सभी भक्त हाथ जोड़े बैठे थे. एक लंबे इंतजार के बाद बाब नामदेव मंच पर प्रकट हुए और भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में हाथ उठाया, फिर कुछ देर तक प्रवचन देने के बाद बाबा ने एक चमत्कार दिखाया. वहां मौजूद सैकड़ों लोगों ने बाबा के सिंहासन को 5 फुट तक हवा में ऊंचा उठते देखा.

जैसे ही सिंहासन ऊपर उठा, तो भक्त लोग जयजयकार करने लगे. मालती भी उन में से एक थी, जबकि गजर सिंह और उस का कैमरा सबकुछ बड़ी बारीकी से नोट कर रहे थे.

मालती तो पूरे रास्ते बाबा नामदेव के गुण ही गाती आई थी, जबकि उस की हर बात पर गजर सिंह मुसकरा देता था.

घर पहुंच कर रात में बिस्तर पर आते समय मालती ने गजर सिंह से कहा कि वह बाबा नामदेव के ट्रस्ट में कुछ दान देना चाहती है.

‘‘अरे, तुम भी कमाल करती हो. ये सब बाबा नहीं, बल्कि मदारी हैं, मदारी,’’ गजर सिंह ने हंसते हुए कहा. फिर उस ने अपने स्पाई कैम को लैपटौप से जोड़ा और मालती को दिखा कर बोला, ‘‘ये मदारी लोग अपने हाथ की सफाई दिखा कर भोलेभाले लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. जैसे जब वे लोग रजिस्टर में जानकारी दर्ज करते समय औलाद के बारे में पूछते हैं कि पीडि़त लोग बेटा चाहते हैं या बेटी, तो हमारे देश में सौ फीसदी लोग बेटा मांगने के लिए ही आश्रम में जाते होंगे.

‘‘अब इसे ऐसे समझ कि जिन के बेटा हो गया तो वे तो 10 और पीडि़तों को भेजेंगे, पर बेटी होने पर अफसोस करने वाले लोग आश्रम में जा कर विरोध दर्ज कराएंगे, तो उस रजिस्टर पर लिखे ‘बेटा’ शब्द को पहले से ही ‘बेटी’ कर दिया गया होगा और भक्त से कहा जाएगा कि देखिए, आप ने बेटी ही तो मांगी थी, बस वह भक्त कुछ नहीं बोल पाएगा…’’ गजर सिंह किसी माहिर जासूस की तरह यह सब बोलता जा रहा था.

आगे गजर सिंह ने तसवीर से राख या भभूत के गिरने की वजह एक रासायनिक क्रिया का होना बताया, जैसे किसी चित्र पर तरल एल्युमिनियम में मरकरी औक्साइड नामक कैमिकल मिला कर लगा दिया जाए तो एक तरह का नया कैमिकल बनता है, जो राख जैसा दिखता है, जिसे लोग भभूत समझ लेते हैं.

‘‘पर बाबा नामदेव के सिंहासन का हवा में उड़ना तो एक चमत्कार ही था न?’’ मालती ने पूछा.

‘‘जैसे किसी अस्पताल में मरीज के बिस्तर के सिरहाने को उठाने के लिए कुछ छोटे यंत्रों इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह से परदे के पीछे लीवर घुमा कर बाबा के सिंहासन को उठा देना कोई बड़ी बात नहीं,’’ गजर सिंह ने कहा तो मालती के चेहरे पर अनेक अबूझे सवाल तैरने लगे थे, जिसे देख कर गजर सिंह फिर मुसकरा दिया.

अगले दिन गजर सिंह बाबा नामदेव के खिलाफ कुछ और सुबूत जमा कर लेना चाहता था, इसलिए वह आश्रम जाने की तैयारी करने लगा.

गजर सिंह आश्रम पहुंचा. बाबा के आश्रम में रोज की तरह आज भी चहलपहल थी. कुछ लोगों से बात करने के बाद गजर सिंह को पता चला कि कुछ लोग यहां पर कुछ दिनों के लिए ही रह कर बाबा के साथ का लाभ उठाते हैं, जबकि बहुत से लोग इसी आश्रम में हमेशा के लिए ही रहने आ गए हैं और अपनी कमाई हुई सारी दौलत उन्होंने आश्रम और बाबा नामदेव के चरणों में ही रख दी है.

गजर सिंह हर चीज को बड़ी बारीकी से देख रहा था, तभी उस की नजर एक ऐसी लड़की पर पड़ी, जो पौधों को पानी दे रही थी. उस के बाल खुले हुए थे और वे बारबार आगे की ओर गिर रहे थे, जिन्हें वह लड़की बारबार संभाल लेती थी.

तकरीबन 25 साल की उस लड़की के गोरे रंग, तीखी सी नाक और काले बालों ने सीधा गजर सिंह की हवस पर चोट की थी.

अचानक उस लड़की की नजर गजर सिंह से टकराई और उस ने एक मनमोहक मुसकराहट बिखेर दी.

‘‘क्या आप यहां पहली बार आए हैं?’’ बातचीत की पहल उस लड़की ने की.

‘‘जी नहीं, मैं यहां दूसरी बार आया हूं,’’ गजर सिंह ने कहा.

‘‘मेरा नाम कला है और मैं पिछले कई साल से यहीं आश्रम में ही रहती हूं, और आप…?’’

‘‘गजर सिंह…’’ उस लड़की की खूबसूरती में खो सा गया था गजर सिंह.

कला बातचीत करने में कुछ ज्यादा ही उतावली दिख रही थी. गजर सिंह और वह साथसाथ चलने लगे. गजर सिंह ने सोचा कि कला से ही बाबा नामदेव के बारे में कुछ और जानकारी मिल सकती है.

कला से बातें करतेकरते गजर सिंह आश्रम के दूसरे छोर पर आ गया था. कला बहुत तेजी से बातों के विषय बदलती थी. कभी वह प्यार पर बात करती, तो कभी हवस पर. कभी वह मर्दऔरत के रिश्ते पर बात करती, तो कभी लैस्बियन पर. वह बातोंबातों में गजर सिंह के हाथों को भी छू लेती थी. बदले में गजर सिंह ने भी कला के हाथों को मसल दिया था.

एक दिन कला बिना कुछ कहे गजर सिंह को वहीं पास में बनी एक कौटेज में ले गई, जहां पर दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ता बन गया. गजर सिंह जैसा मर्द भी कला के साथ सैक्स करने में खुद को थका हुआ महसूस करने लगा था.

गजर सिंह पर कला के रूप का जादू ऐसा छाया कि उस ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि बाबा नामदेव के आश्रम में रहने वाली एक लड़की ने उस के साथ जिस्मानी संबंध क्यों बनाए थे.

एक दिन गजर सिंह ने कला से मन की बात पूछ ही ली, ‘‘आखिर ऐसा क्या दिख गया मुझे में, जो तुम इतना मेहरबान हो गई?’’

‘‘आप डीएसपी हो इस शहर के. हम आश्रम वालों की मजबूरी होती है आप जैसे बड़े लोगों से संबंध बना कर रखने की, ताकि आश्रम किसी विवाद में न फंसे,’’ कला ने एक मादक अंगड़ाई लेते हुए कहा.

कला के मोहजाल में उलझ कर गजर सिंह अंधविश्वास का खुलासा करने और बाबाओं का भंडाफोड़ करने जैसी बातें भूल चुका था. वह अब मालती को भी आश्रम में ले जाने लगा था.

तकरीबन 6 महीने तक यही सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन गजर सिंह को कला ने अपने पेट से होने की सूचना दी.

यह बात सुन कर गजर सिंह को झटका सा लगा, क्योंकि यह बात वह अच्छी तरह जानता था कि कम स्पर्म काउंट के चलते वह किसी औरत को मां नहीं बना सकता था और इसीलिए

कभी भी उस ने संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल भी नहीं किया था, पर आज यह कला तो कुछ और ही कहानी बता रही है.

बहुत मुमकिन है कि कला किसी और का बच्चा पहले से ही लिए घूम रही हो और अब अपनी बला टालने के लिए उसे बलि का बकरा बना रही हो, पर गजर सिंह बाप न बनने की अपनी कमजोरी कला को बता भी तो नहीं सकता था.

‘‘यह मेरा बच्चा नहीं है कला…’’

‘‘तो तुम यह कहना चाहते हो कि मेरे कई लोगों से संबंध हैं….’’ कहते हुए कला ने गजर सिंह और खुद की एक सैक्स क्लिप उसे दिखा दी और ब्लैकमेल करने के अंदाज में कहने लगी, ‘‘जानते हो, अगर यह क्लिप इंटरनैट पर चली गई, तो तुम्हारी वरदी उतरने में एक दिन भी नहीं लगेगा और फिर कभी बहाल भी नहीं हो पाओगे.’’

‘‘नहीं… पर… मुझे तो बच्चे,’’ इस से आगे कुछ कह न पाया था गजर सिंह. माना कि बच्चा उस का नहीं था, पर कला अपना किया हुआ उसी के सिर फोड़ना चाहती थी.

यह बात सम?ाते और मानसिक परेशानी से गुजरते हुए गजर सिंह के दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों न वह कला के बच्चे को जन्म लेने के बाद गोद ले ले और अपनी पत्नी को सौंप दे और उसे यह बताया जाए कि यह बच्चा एक दोस्त की एक पत्नी का है, जो इसे जन्म देते समय मर गई है?

गजर सिंह ने ऐसा ही किया. 3 महीने और गुजरे और कला ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया.

उस बच्ची को गोद में ले कर गजर सिंह घर पहुंचा, तो उस ने खुशीखुशी मालती को वह बच्ची देते हुए कहा, ‘‘लो, आज से तुम ही इस की मां हो, मेरे दोस्त की विधवा इसे जन्म देते ही मर गई है, इसलिए मैं इसे घर ले आया हूं.’’

गजर सिंह की बात सुन कर मालती के चेहरे पर एक फीकी सी हंसी दौड़ गई.

‘‘दरअसल, एक तोहफा तो मैं भी आप को देना चाहती हूं…’’ शरमाते हुए मालती ने कहा और गजर सिंह को बताया कि वह भी एक बच्चे की मां बनने वाली है.

यह बात सुन कर गजर सिंह के पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई.

‘‘यह सब बाबा नामदेव की दवाओं और उन के आशीर्वाद का ही फल है, हो गए न सरप्राइज…’’ मालती ने कहा.

मालती की बात सुन कर गजर सिंह दंग रह गया था, क्योंकि वह सच में सरप्राइज हो गया था.

मालती अपने बच्चे को बाबा नामदेव की मेहरबानी मान रही थी, जबकि सच तो यह था कि बाबा नामदेव ने कला और मालती दोनों के जिस्म से खेल कर उन दोनों को 1-1 सरप्राइज दे ही दिया था. Hindi Story

Family Story in Hindi: सौतेला बरताव – चंपा क्यों बनी देहधंधे वाली

Family Story in Hindi: चंपा को देह धंधा करने के आरोप में जेल हो गई. वह रंगे हाथ पकड़ी गई थी. वह जेल की सलाखों में उदास बैठी हुई थी. चंपा के साथ एक अधेड़ औरत भी बैठी हुई थी. थोड़ी देर पहले पुलिस उसे भी इस बैरक में डाल गई थी. चंपा जिस होटल में देह धंधा करती थी, उसी होटल में पुलिस ने छापा मारा था और उसे रंगे हाथ पकड़ लिया था. आदमी तो भाग गया था, मगर पुलिस वाला उसे दबोचते हुए बोला था, ‘चल थाने.’ ‘नहीं पुलिस बाबू, मुझे माफ कर दो…’ वह हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘अब नहीं करूंगी यह धंधा.’ ‘वह आदमी कौन था?’ पुलिस वाला उसी अकड़ से बोला था. ‘मुझे नहीं मालूम कि वह कौन था?’ वह फिर हाथ जोड़ते हुए बोली थी. ‘झूठ बोलती है. चल थाने, सारा सच उगलवा लूंगा.’ ‘मुझे छोड़ दीजिए.’‘हां, छोड़ देंगे. लेकिन तू ने उस ग्राहक से कितने पैसे लिए हैं?’ ‘कुछ भी नहीं दे कर गया.’‘झठ कब से बोलने लगी? चल थाने?’ ‘छोड़ दीजिए, कहा न कि अब कभी नहीं करूंगी यह धंधा.’

‘करेगी… जरूर करेगी. अगर करना ही है, तो लाइसैंस ले कर कोठे पर बैठ. फिर हम तुझ से कुछ नहीं कहेंगे…’ हवलदार थोड़ा नरम पड़ते हुए बोला था, ‘तुझे छोड़ सकता हूं, मगर अंटी में जितने पैसे हैं, निकाल कर मुझे दे दे.’

‘साहब, आज तो मेरी अंटी में कुछ भी नहीं है,’ वह बोली थी.

‘ठीक है, तब तो एक ही उपाय है… जेल,’ फिर वह पुलिस वाला उसे पकड़ कर थाने ले गया था.

चंपा दीवार के सहारे चुपचाप बैठी हुई थी. वह अधेड़ औरत न जाने कब से उसे घूर रही थी. आखिरकार वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘ऐ लड़की, तू कौन है?’’

तब चंपा ने अपना चेहरा ऊपर कर उस अधेड़ औरत की तरफ देखा, मगर जवाब कुछ नहीं दिया.

वह अधेड़ औरत जरा नाराजगी से बोली, ‘‘सुना नहीं? बहरी है क्या?’’

‘‘हां, पूछो?’’ चंपा ने कहा.

‘‘क्या अपराध किया है तू ने?’’

‘‘मैं ने वही अपराध किया है, जो तकरीबन हर औरत करती है?’’

‘‘क्या मतलब है तेरा? गोलमोल बात क्यों कर रही है, सीधेसीधे कह न,’’ वह अधेड़ औरत गुस्से से बोली.

‘‘मुझे देह धंधा करने के आरोप में पकड़ा गया है.’’

‘‘शक तो मुझे पहले से ही था. अरे, जिस पुलिस वाले ने तुझे पकड़ा है, उस के मुंह पर नोट फेंक देती.’’

‘‘अगर मेरे पास पैसे होते, तो उस के मुंह पर मैं तभी फेंक देती.’’

‘‘तुम ने यह धंधा क्यों अपनाया?’’

‘‘क्या करोगी जान कर?’’

‘‘मत बता, मगर मैं सब जानती हूं.’’

‘‘क्या जानती हैं आप?’’

‘‘औरत मजबूरी में ही यह धंधा अपनाती है.’’

‘‘नहीं, गलत है. मैं मजबूरी में वेश्या नहीं बनी, बल्कि बनाई गई हूं.’’

‘‘कैसे? अपनी कहानी सुना.’’

‘‘हां सुना दूंगी, मगर आप इस उम्र में जेल में क्यों आई हो?’’

‘‘मेरी बात छोड़, मेरा तो जेल ही घर है,’’ उस अधेड़ औरत ने कहा.

‘‘आप आदतन अपराधी हैं?’’

‘‘यही समझ ले…’’ उस अधेड़ औरत ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘फिर भी सुनना चाहती है तो सुन. मैं अफीम की तस्करी करती थी. अब सुना तू अपनी कहानी.’’

चंपा की कहानी कुछ इस तरह थी:

चंपा के पिता मजदूर थे. उन का नाम मांगीलाल था. उन्होंने रुक्मिणी नाम की औरत से शादी की थी.

शादी के 2 साल गुजर गए थे. एक दिन पिता मांगीलाल को पता चला कि रुक्मिणी मां बनने वाली है. उन की खुशियों का ठिकाना न रहा.

रुक्मिणी को बांहों में भरते हुए वे बोले थे, ‘पहला बच्चा लड़का होना चाहिए…’

‘यह मेरे हाथ में है क्या?’ रुक्मिणी उन्हें झिड़कते हुए बोली थी.

9 महीने बाद जब चंपा पैदा हुई, तो 4 दिन बाद उस की मां मर गई. पिता के ऊपर सारी जवाबदारी आ पड़ी. रिश्तेदार कहने लगे कि पैदा होते ही यह लड़की मां को खा गई. तब मौसी ने उसे पाला.

मां के मरने पर पिता टूट गए थे. वे उदासउदास से रहने लगे थे. तब अपना गम भुलाने के लिए वे शराब पीने लगे थे. रिश्तेदारों और उन के बड़े भाई ने खूब कहा कि दोबारा शादी कर लो, मगर वे तैयार नहीं हुए थे.

धीरेधीरे चंपा मौसी की गोद में बड़ी होती गई. जब वह 5 साल की हो गई, तब उसे स्कूल में भरती करा दिया गया. पिता को दोबारा शादी के प्रस्ताव आने लगे. चारों तरफ से दबाव भी बनने लगा.

एक दिन पिता के बड़े भाई भवानीराम और उन की पत्नी तुलसाबाई आ धमके. आते ही भवानीराम बोले, ‘ऐसे कैसे काम चलेगा मांगीलाल?’

‘क्या कह रहे हैं भैया?’ मांगीलाल ने पूछा.

‘सारी जिंदगी यों ही बैठे रहोगे?’ भवानीराम ने दबाव डालते हुए कहा.

‘आप कहना क्या चाहते हो भैया?’

‘अरे देवरजी…’ तुलसाबाई मोरचा संभालते हुए बोली, ‘देवरानी को गुजरे 6-7 साल हो गए हैं. अब उस की याद में कब तक बैठे रहोगे? चंपा भी अब बड़ी हो रही है.’

‘भाभी, मेरा मन नहीं है शादी करने का,’ मांगीलाल ने साफ इनकार कर दिया था.

‘मैं पूछती हूं कि आखिर मन क्यों नहीं है?’ दबाव डालते हुए तुलसाबाई बोली, ‘यों देवरानी की याद करने से वह वापस तो नहीं आ जाएगी. फिर शादी कर लोगे, तो देवरानी के गम को भूल जाओगे.’

‘नहीं भाभी, मैं ने कहा न कि मुझे शादी नहीं करनी है.’

‘क्यों नहीं करनी है? हम तेरी शादी के लिए आए हैं. और हां, तेरी हां सुने बगैर हम जाएंगे नहीं,’ भैया भवानीराम ने हक से कहा, ‘हम ने तेरे लिए लड़की भी देख ली है. लड़की इतनी अच्छी है कि तू रुक्मिणी को भूल जाएगा.’

‘नहीं भैया, मैं चंपा के लिए सौतेली मां नहीं लाऊंगा,’ एक बार फिर इनकार करते हुए मांगीलाल बोला.

‘कैसी बेवकूफों जैसी बातें कर रहा है. जिन की औरत भरी जवानी में ही चली जाती है, तब वे दोबारा शादी नहीं करते हैं क्या?’

‘अरे देवरजी, यह क्यों भूल रहे हो कि चंपा को मां मिलेगी. कब तक मौसी उस की देखरेख करती रहेगी? इस बात को दिमाग से निकाल फेंको कि हर मां सौतेली होती है. जिस के साथ हम तुम्हारी शादी कर रहे हैं, वह ऐसी नहीं है. चंपा को वह अपनी औलाद जैसा ही प्यार देगी?’

‘भाभी, आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हो?’

‘बिना औरत के आदमी का घर नहीं बसता है और हम तेरा घर बसाना चाहते हैं. लड़की हम ने देख ली है. एक बात कान खोल कर सुन ले, हम तेरी शादी करने के लिए आए हैं. इनकार तो तुम करोगे नहीं. बस, तैयार हो जाओ,’ कह कर भवानीराम ने बिना कुछ सुने फैसला सुना दिया.

मांगीलाल को भी हार माननी पड़ी. भैयाभाभी ने जो लड़की पसंद की थी, उस का नाम कलावती था. मान न मान मैं तेरा मेहमान की तरह कलावती के साथ उस की शादी कर दी गई.

जब तक कलावती की पहली औलाद न हुई, तब तक उस ने चंपा को यह एहसास नहीं होने दिया कि वह उस की सौतेली मां है. मगर बच्चा होने के बाद वह चंपा को बातबात पर डांटने लगी. उस का स्कूल छुड़वा दिया गया. वह उस से घर का सारा काम लेने लगी.

पिता भी नई मां पर ज्यादा ध्यान देने लगे. इस तरह नई मां ने पिता को अपने कब्जे में कर लिया. धीरेधीरे चंपा बड़ी होने लगी. लड़के उसे छेड़ने लगे.

कलावती भी उसे देख कर कहने लगी, ‘लंबी और जवान हो गई है. कब तक हमारे मुफ्त के टुकड़े तोड़ती रहेगी. कोई कामधंधा कर. कामधंधा नहीं मिले, तो किसी कोठे पर जा कर बैठ जा. तेरी जवानी तुझे कमाई देगी.’

चंपा के पिता जब शादी की बात चलाते, तब सौतेली मां कहती, ‘कहां शादी के चक्कर में पड़ते हो. चंपा अब बड़ी हो गई है. साथ ही, जवान भी. रूप भी ऐसा निखरा है कि अगर इसे किसी कोठे पर बिठा दो, तो खूब कमाई देगी.’

तब पिता विरोध करते हुए कहते, ‘जबान से ऐसी गंदी बात मत निकालना. क्या वह तुम्हारी बेटी नहीं है?’

‘‘मेरी पेटजाई नहीं है वह. आखिर है तो सौतेली ही,’ कलावती उसी तरह जवाब देती.

पिता को गुस्सा आता, मगर वह उन्हें भी खरीखोटी सुना कर उन की जबान बंद कर देती थी. इस गम में पिता ज्यादा शराब पीने लगे. रातदिन की चकचक से तंग आ कर चंपा ने कोई काम करने की ठान ली. मगर सौतेली मां तो उस से देह धंधा करवाना चाहती थी.

आखिर में चंपा ने भी अपनी सौतेली मां की बात मान ली. जिस होटल में वह धंधा करती थी, वहीं सौतेली मां ग्राहक भेजने लगी. ग्राहक से सारे पैसे सौतेली मां झटक लेती थी.

चंपा ने उस अधेड़ औरत के सामने अपना दर्द उगल दिया.

थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘तेरी कहानी बड़ी दर्दनाक है. आखिर सौतेली मां ने अपना सौतेलापन दिखा ही दिया.’’

चंपा कुछ नहीं बोली.

‘‘अब क्या इरादा है? तेरी सौतेली मां तुझे छुड़ाने आएगी?’’ उस अधेड़ औरत ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो अब जेल में ही रहना चाहती हूं. उस सौतेली मां की सूरत भी नहीं देखना चाहती हूं.’’

‘‘तू भले ही मत देख, मगर तेरी सौतेली मां तुझ से पैसा कमाएगी, इसलिए तुझे छुड़ाने जरूर आएगी,’’ अपना अनुभव बताते हुए वह अधेड़ औरत बोली.

‘‘मगर, अब मैं घर छोड़ कर भाग जाऊंगी?’’

‘‘भाग कर जाएगी कहां? यह दुनिया बहुत बड़ी है. यह मर्द जात तुझे अकेली देख कर नोच लेगी. मैं कहूं, तो तू किसी अच्छे लड़के से शादी कर ले.’’

‘‘कौन करेगा मुझ से शादी? बस्ती के सारे बिगड़े लड़के मुझ से शादी नहीं मेरा जिस्म चाहते हैं. वैसे भी मैं बदनाम हो गई हूं. अब कौन करेगा शादी?’’

‘‘हां, ठीक कहती हो…’’ कह कर वह अधेड़ औरत खामोश हो गई. कुछ पल सोच कर वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘हम औरतों के साथ यही परेशानी है. देख न मुझे भी मेरी जवानी का फायदा उठा कर तस्करी का काम दिया, ताकि औरत देख कर कोई शक नहीं करे. मगर जब पैसे मिलने लगे, तब धंधा मुझे रास आ गया. इस का नतीजा देख रही हो, आज मैं जेल में हूं.’’

फिर दोनों के बीच काफी देर तक सन्नाटा पसरा रहा. तभी एक पुलिस वाले ने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘बाहर निकल. तेरी मां ने जमानत दे दी है.’’

चंपा ने देखा कि उस की मां कलावती खड़ी थी. वह गुस्से में बोली, ‘‘तू चुपचाप धंधा करती रही और मुझे बदनाम कर दिया. सारी बस्ती वाले मुझ पर थूक रहे हैं. आखिर मैं तेरी सौतेली मां हूं न, बदनाम तो होना ही है. वैसे भी सौतेली मां तो बदनाम ही रहती है.

‘‘चल, निकल बाहर. अब कभी धंधा किया न, तो तेरी खाल खींच लूंगी. मां हूं तेरी, भले ही सौतेली सही. मैं ने जमानत दे दी है.’’

चंपा कुछ नहीं बोली. वह अपनी सौतेली मां के साथ हो ली. वह जानती थी कि यह केवल लोकलाज का दिखावा है. अब यह कैसी साहूकार बन रही है. उलटा चोर कोतवाल को डांट कर. Family Story in Hindi

Hindi Family Story: चौथा कंधा – सोनू की कालगर्ल भाभी

Hindi Family Story: अन्य पिछड़ा वर्ग का दीना कोलकाता के एक उपनगर संतरागाछी में रहता था. वहीं एक गली में उस की झोंपड़ी थी. उसी झोंपड़ी के आगे उस की छोटी सी दुकान थी, जहां उस ने एक सिलाई मशीन लगा रखी थी. दुकान में वह रैक्सीन के साथसाथ कपड़ों के बैग भी तैयार करता था. साथ में कुछ चप्पलें भी बनाता था.

दीना की पत्नी मीरा महल्ले में मजदूरी का काम करती थी या फिर गल्ले की दुकानों में चावल, गेहूं, मसाले की सफाई करती थी. बदले में नकद मजदूरी या अनाज मिल जाता था.

दीना के 4 बेटे थे, सब से बड़ा बेटा गोलू, उस के बाद पिंकू, टिंकू और सब से छोटा सोनू. चारों बेटे स्कूल जाते थे. बीचबीच में दोनों बड़े बेटे शहर जा कर सामान बेचा करते थे. परिवार की गुजरबसर हो जाती थी.

एक दिन दीना ने अपनी पत्नी मीरा से कहा, ‘‘हम दोनों कितने भाग्यवान हैं. हमारी मौत पर कंधा देने वाले चारों बेटे हैं. बाहरी कंधे की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

देखतेदेखते गोलू और पिंकू दोनों बीए पास कर गए. इत्तिफाक से राज्य के नए मुख्यमंत्री भी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे. उन्होंने फरमान जारी किया कि अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे के खाली पदों पर फौरन बहाली कर ऐक्शन टेकन रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाए.

दीना के दोनों बेटों को राज्य सरकार में आरक्षण के बल पर क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. एक की पोस्टिंग बर्दवान थी और दूसरे की आसनसोल में हो गई.

कुछ साल तक वे दोनों परिवार की माली मदद करते रहे और बीचबीच में अपने घर भी आया करते थे.

टिंकू और सोनू भी अपनी पढ़ाई में लग गए थे. मीरा ने अब बाहर का काम करना बंद कर दिया था.

इधर दोनों बड़े बेटों ने अपनी मरजी से शादी कर ली. वे अपनीअपनी गृहस्थी में बिजी रहने लगे. घर में पैसे भेजना बंद कर दिया था.

टिंकू बीए फाइनल में था और सोनू मैट्रिक पास था. दीना को खांसी और दमे की पुरानी बीमारी थी. अब उस से काम नहीं होता था.

एक दिन सोनू ने पिता से कहा, ‘‘टिंकू भैया तो कुछ दिनों में बीए पास कर लेगा. उसे कुछ न कुछ काम जरूर मिल जाएगा. तब तक भैया को पढ़ने दें, आप का काम मैं संभाल लूंगा. भैया को नौकरी मिलते ही मैं अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दूंगा.’’

दुकान का काम अब मीरा देखती थी. सोनू रोज कुछ बैग और चप्पलें ले कर बेचने निकल जाता था.

रोज की तरह सोनू उस दिन भी दोनों कंधों पर एकएक थैला लिए था. एक थैले में कुछ जोड़ी चप्पलें थीं, कुछ जैट्स और कुछ लेडीज. दूसरे कंधे पर भी थैला होता था, जिस में रैक्सीन और कपड़े के बैग थे.

अकसर प्लैनेटोरियम इलाके से थोड़ा आगे सड़क के किनारे एक सुंदर लड़की उसे दिखती थी. जब भी उसे देखता, वह पूछता ‘‘दीदी, कुछ लोगी?’’

वह मना करते हुए बोलती, ‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, तुम अपना समय बरबाद न करो.’’

एक छुट्टी के दिन सोनू फिर उस लड़की के सामने रुक कर बोला, ‘‘दीदी, कुछ चाहिए आज? आप की चप्पलें काफी घिसी हुई लगती हैं.’’

लड़की ने अपनी साड़ी खींच कर नीचे कर चप्पलों को ढक लिया, फिर वह बोली, ‘‘कुछ नहीं चाहिए, पर तुम रोजरोज मुझ से ही क्यों पूछते हो? यहां तो थोड़ीथोड़ी दूरी पर हर खंभे पर लड़कियां खड़ी हैं, तुम उन से क्यों नहीं पूछते?’’

‘‘दीदी, आप मुझे अच्छी लगती हो. बस रुक कर दो पल आप से बात कर लेता हूं, बिक्री हो न हो.’’

‘‘अच्छा, अपना नाम बताओ?’’

‘‘मैं सोनू… और आप?’’

‘‘मैं पारो.’’

‘‘और, आप का देवदास कौन है?’’

‘‘सारा शहर मेरा देवदास है. चल भाग यहां से… बित्ते भर का छोकरा और गजभर की जबान,’’ पारो बोली.

सोनू हंसते हुए आगे बढ़ गया और पारो भी हंसने लगी थी.

अगले दिन फिर सोनू की मुलाकात पारो से हुई. उस ने पूछा, ‘‘दीदी, आप रोज यहां खड़ीखड़ी क्या करती हो?’’

‘‘मैं भी कुछ बेचती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम नहीं समझोगे,’’ बोल कर पारो ने आगे वाले खंभे के पास खड़ी लड़की की तरफ दिखा कर कहा, ‘‘देख, जो वह करती है, मैं भी वही करती हूं.’’

सोनू ने देखा कि उस लड़की के पास एक लड़का आया और उस के साथ

2 मिनट बात की, फिर वे दोनों एक टैक्सी में बैठ कर निकल गए.

अगले दिन सोनू फिर उसी जगह पारो से मिला. दोनों ने आपस में एकदूसरे के परिवार की बातें कीं.

सोनू ने कहा, ‘‘मैं काम कर के घर का खर्च और बड़े भाई की पढ़ाई का खर्च जुटाने की कोशिश करता हूं.’’

पारो बोली, ‘‘तू तो बड़ा अच्छा काम कर रहा है. मैं भी अपने छोटे भाई

को पढ़ा रही थी. वह बीए पास कर

चुका है. कुछ जगह नौकरी की अर्जी

दी है. उसे काम मिलने के बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा था. सोनू की अकसर पारो से मुलाकात होती रहती थी. टिंकू बीए पास कर चुका था. नौकरी के लिए उस ने भी अर्जी दे रखी थी. पर साहब को रिश्वत चाहिए थी, इसलिए औफर लैटर रुका हुआ था.

पिछले 2-3 दिनों से सोनू सामान बेचने नहीं निकल सका था. उस के पिता की तबीयत ज्यादा खराब थी. उन्हें सरकारी अस्पताल में भरती किया गया था. उन की हालत में कोई सुधार नहीं था. टिंकू पिता के पास अस्पताल में था.

आज सोनू बाजार निकला था. पारो ने सोनू को आवाज दे कर कहा, ‘‘तू कहां था? मैं तुझे खुशखबरी देने के लिए ढूंढ़ रही थी. मेरे भाई को नौकरी मिल गई है आसनसोल के कारखाने में. सोमवार को उसे जौइन करना है. बस, अब 2-4 दिन बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

‘‘मुबारक हो दीदी, तो मिठाई नहीं खिलाओगी? मेरे पिता अस्पताल

में भरती हैं, इसलिए मैं नहीं आ सका था.’’

‘‘घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’’ बोल कर पारो ने मिठाई उस के मुंह में डाल दी.

‘‘क्या ठीक होगा, टिंकू भैया की नौकरी रुकी है. वैसे, आरक्षण कोटे में औफर तो मिलना है, पर साहब ने घूस के लिए अभी तक लैटर इशू नहीं किया है.’’

‘‘तुम उस साहब का पता बताओ, मैं उन से रिक्वैस्ट करूंगी.’’

‘‘कोई फायदा नहीं, हम लोगों ने बहुत नाक रगड़ी उन के सामने, वह बिना रिश्वत लिए मानने वाला नहीं है.’’

‘‘अरे, तुम बताओ तो सही. हो सकता है कि कोई पहचान वाला हो और काम बन जाए.’’

‘‘ठीक है. बताता हूं, पर घूस की बात वह घर पर करता है.’’

‘‘ठीक है, घर पर ही मिल लूंगी.’’

उस दिन शाम को पारो उस साहब के घर पर मिली. एक काली मोटी सी औरत ने कहा, ‘‘मैं साहब की पत्नी हूं. कहो, क्या काम है?’’

पारो बोली, ‘‘मुझे भाई की नौकरी के सिलसिले में उन से बात करनी है.’’

‘‘ठीक है, तुम यहीं रुको. मैं उन्हें भेजती हूं,’’ बोल कर वह अंदर चली गई.

साहब आए, तो पारो को ऊपर से नीचे तक गौर से देखते रह गए.

पारो ने अपने आने की वजह बताई, तो वे बोले, ‘‘तुम लोगों को पता होना चाहिए कि दफ्तर का काम मैं घर पर नहीं करता हूं.’’

पारो ने सीधे मुद्दे पर आते हुए धीमी आवाज में कहा, ‘‘सर, मैं ज्यादा रुपए तो नहीं दे सकती हूं, हजार डेढ़ हजार रुपए से काम हो जाता, तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

साहब ने धीरे से कहा, ‘‘मैं तुम से ज्यादा लूंगा भी नहीं. बस जो तुम्हारे पास है, उतने से मैं काम कर दूंगा. तुम कल शाम को इस होटल में मिलना. याद रहे, अकेले में प्राइवेट मीटिंग होगी,’’ और उन्होंने होटल और कमरा नंबर पारो को बता दिया.

अगले दिन साहब ने दफ्तर जाते समय पत्नी से कहा, ‘‘लंच के बाद मुझे बर्दवान जाना है. एक जरूरी मीटिंग है. आतेआते रात के 12 बज जाएंगे.’’

दूसरे दिन पारो सोनू को रोज वाली जगह पर नहीं मिली. वह तो साहब के साथ होटल के कमरे में मीटिंग में थी. रात के 12 बजे तक साहब ने पारो के साथ इस उम्र में खूब मौजमस्ती की.

पारो ने पूछा, ‘‘मेरा काम तो हो जाएगा न सर?’’

साहब बोले, ‘‘मैं इतना बेईमान नहीं हूं. तुम ने मेरा काम कर दिया, तो समझो तुम्हारा काम हो चुका है. और्डर मैं ने आज साइन कर दिया है. मेरे ही दराज में है. कल सुबह भाई को अपना आईडी प्रूफ ले कर दफ्तर भेज देना. डाक से पहुंचने में कुछ दिन लग जाएंगे. सरकारी तौरतरीके तो जानती ही हो.’’

‘‘जी सर, मैं भाई को भेज दूंगी,’’ साड़ी लपेटते हुए पारो बोली.

अगले दिन सुबहसुबह पारो सोनू के घर पहुंची. सोनू और टिंकू घर पर ही थे. उन की मां अस्पताल में थीं.

पारो ने टिंकू से दफ्तर जा कर बहाली का और्डर लेने को कहा.

सोनू बोला, ‘‘कितनी घूस देनी पड़ी?’’

पारो बोली, ‘‘मेरे पास ज्यादा कुछ था भी नहीं. थोड़े में ही मान गए वे.’’

‘‘ओह दीदी, तुम कितनी अच्छा हो,’’ बोल कर सोनू उस के पैर छूने को ?ाका, तो पारो ने उसे रोक कर गले लगाया.

टिंकू ने दफ्तर से और्डर ले कर उसी दिन जौइन भी कर लिया. दीना को यह खुशखबरी सोनू ने दे दी थी.

दीना बोला, ‘‘अब मैं चैन से मर सकूंगा. टिंकू अपनी मां और छोटे भाई की देखभाल करेगा.’’

उसी शाम को दीना चल बसा, इत्तिफाक से पारो और उस का भाई

तपन उस दिन अस्पताल में दीना से मिलने गए थे. सोनू ने दोनों बड़े भाइयों को पिता की मौत की खबर उसी समय दे दी और कहा कि दाहसंस्कार कल सुबह होना है.

बड़ा बेटा गोलू तो 2 घंटे की दूरी पर बर्दवान में था. वह बोला, ‘‘मैं तो नहीं आ सकूंगा, बहुत जरूरी काम है, तेरहवीं के दिन आने की कोशिश करूंगा.’’

दूसरा बेटा पिंकू आसनसोल से उसी रात आ गया, पर उस की पत्नी नहीं आई. सुबह अर्थी उठने वाली थी. पारो भी अपने भाई के साथ आई थी.

टिंकू ने सोनू से कहा, ‘‘हम तीन भाई तो हैं ही. जा कर पड़ोस से किसी को बुला ला, कंधा देने के लिए.’’

पारो आगे बढ़ कर बोली, ‘‘चौथा कंधा मेरा भाई तपन देगा.’’

मीरा अपने पति की अंतिम विदाई के समय फूटफूट कर रो रही थी. उसे पति की कही बात याद आ गई. कितने फख्र से कहते थे कि मरने पर मेरे चारों बेटे हैं ही कंधा देने के लिए.

कुछ दिनों बाद सोनू का घर सामान्य हो चला था. पारो अकसर आती रहती थी. सोनू अपनी पढ़ाई में लग गया.

एक दिन मीरा ने पारो से कहा, ‘‘बेटी, तुम ने बड़े एहसान किए हैं हम लोगों पर. एक और एहसान कर सकोगी?’’

‘‘मां, मैं ने कोई एहसान नहीं किया है. आप बोलिए, मैं क्या कर सकती हूं?’’

‘‘सोनू को अपना देवर बना लो, वह तुम्हारी बड़ी तारीफ करता है. हां, अगर टिंकू तुम्हें ठीक लगे तो…’’

टिंकू भी उस समय घर में था, उस ने खामोश रह कर स्वीकृति दे दी थी और पारो की ओर देख कर उस के जवाब का इंतजार कर रहा था.

पारो बोली, ‘‘आप लोगों को मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहती हूं. मैं कुछ दिन पहले तक कालगर्ल थी. पता नहीं, टिंकू मुझे पसंद करेंगे या नहीं.’’

‘‘कौन सी गर्ल, वह क्या होता है?’’ मां ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं मां. सेल्स गर्ल समझो. सोनू इस के बारे में मुझे सब बताया करता था. पारो बहुत अच्छी लड़की है. अब फैसला इसे करने दो.’’

सोनू पारो के पास आ कर बोला, ‘‘मान जाओ न दीदी… नहीं भाभी.’’

पारो ने नजरें झका लीं. उस ने सिर पर पल्लू रख कर मां के पैर छुए. Hindi Family Story

Hindi Family Story: दूसरी भूल – अनीता की कशमकश

Hindi Family Story: अनीता बाजार से कुछ घरेलू चीजें खरीद कर टैंपू में बैठी हुई घर की ओर आ रही थी. एक जगह पर टैंपू रुका. उस टैंपू में से 4 सवारियां उतरीं और एक सवारी सामने वाली सीट पर आ कर बैठ गई.जैसे ही अनीता की नजर उस सवारी पर पड़ी, तो वह एकदम चौंक गई और उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

इस से पहले कि अनीता कुछ कहती, सामने बैठा हुआ नौजवान, जिस का नाम मनोज था, ने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे अनीता, तुम?’’

‘‘हां मैं,’’ अनीता ने बड़े ही बेमन से जवाब दिया.

‘‘तुम कैसी हो? आज हम काफी दिन बाद मिल रहे?हैं,’’ मनोज के चेहरे पर खुशी तैर रही थी.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘मुझे पता चला था कि यहां इस शहर में तुम्हारी शादी हुई है. जान सकता हूं कि परिवार में कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरे पति, 2 बेटियां और एक बेटा,’’ अनीता बोली.

‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘कार मेकैनिक हैं.’’

‘‘क्या नाम है?’’

‘‘नरेंद्र कुमार.’’

‘‘मैं यहां अपनी कंपनी के काम से आया था. अब काम हो चुका है. रात की ट्रेन से वापस चला जाऊंगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा, ‘‘घर का पता नहीं बताओगी?’’

‘‘क्या करोगे पता ले कर?’’ अनीता कुछ सोचते हुए बोली.

‘‘कभी तुम से मिलने आ जाऊंगा.’’

‘‘क्या करोगे मिल कर? देखो मनोज, अब मेरी शादी हो चुकी?है और मुझे उम्मीद है कि तुम ने भी शादी कर ली होगी. तुम्हारे घर में भी पत्नी व बच्चे होंगे.’’

‘‘हां, पत्नी और 2 बेटे हैं. तुम मुझे पता बता दो. वैसे, तुम्हारे घर आने का मेरा कोई हक तो नहीं है, पर एक पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि एक दोस्त के रूप में आ जाऊंगा किसी दिन.’’

‘‘शिव मंदिर के सामने, जवाहर नगर,’’ अनीता ने कहा.

कुछ देर बाद टैंपू रुका. अनीता टैंपू से उतरने लगी.

‘‘अनीता, अब तो रात को मैं वापस आगरा जा रहा हूं, फिर किसी दिन आऊंगा.’’

अनीता ने कोई जवाब नहीं दिया. घर पहुंच कर उस ने देखा कि उस की बड़ी बेटी कल्पना, छोटी बेटी अल्पना और बेटा कमल कमरे में बैठे हुए स्कूल का काम कर रहे थे.

अनीता ने कल्पना से कहा, ‘‘बेटी, मैं जरा आराम कर रही हूं. सिर में तेज दर्द है.’’

‘‘मम्मी, आप को डिस्प्रिन की दवा या चाय दूं?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘नहीं बेटी, कुछ नहीं,’’ अनीता ने कहा और दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

अनीता को तकरीबन 11 साल पहले की बातें याद आने लगीं. जब वह 12वीं जमात में पढ़ रही थी. कालेज से छुट्टी होने पर वह एक नौजवान को अपने इंतजार में पाती थी. वह मनोज ही था. उन दोनों का प्यार बढ़ने लगा. अनीता जान चुकी थी कि मनोज किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा है.

मनोज के पिताजी का अपना कारोबार था और अनीता के पिताजी का भी. वे दोनों शादी करना चाहते थे, पर अनीता के पापा को यह रिश्ता बिलकुल मंजूर नहीं था.

लिहाजा, अनीता और मनोज ने घर से भागने की ठान ली. घर से 50 हजार रुपए नकद व कुछ जेवर ले कर अनीता मनोज के साथ जयपुर जाने वाली ट्रेन में बैठ गई थी.

जयपुर पहुंच कर वे 8-10 दिन होटल में रहे. पता नहीं, पुलिस को कैसे पता चल गया और उन दोनों को पकड़ लिया गया. अनीता के पापा को आगरा से बुलाया गया. मनोज को पुलिस ने नहीं छोड़ा. नाबालिग लड़की को भगाने के अपराध में जेल भेज दिया गया.

पापा को अनीता से बहुत नफरत हो गई थी, क्योंकि उस ने कहना नहीं माना था.

अनीता ने आगे पढ़ाई करने को कहा था, पर पापा ने मना कर दिया था और उस की शादी करने की ठान ली थी. उस के लिए रिश्ते ढूंढ़े जाने लगे.

सालभर इधरउधर धक्के खाने के बाद पापा को एक रिश्ता मिल ही गया था. विधुर नरेंद्र की उम्र 35 साल थी. उस की पत्नी की एक हादसे में मौत हो चुकी थी. उस की 2 बेटियां थीं. एक 5 साल की और दूसरी 3 साल की.

नरेंद्र एक कार मेकैनिक था. उस की अपनी वर्कशौप थी. पापा ने नरेंद्र से जब शादी की बात की, तो उसे सब सच बता दिया था. नरेंद्र ने सब जान कर भी मना नहीं किया था.

अनीता शादी कर के नरेंद्र के घर आ गई थी. अब वह 2 बेटियों की मां बन गई थी.

एक दिन नरेंद्र ने कहा था, ‘देखो अनीता, मुझे तुम्हारी पिछली जिंदगी से कोई मतलब नहीं. तुम भी वह सब भुला दो. इस घर में आने का मतलब है कि अब तुम्हें एक नई जिंदगी शुरू करनी है. अब तुम अल्पना और कल्पना की मम्मी हो… तुम्हें इन दोनों को पालना है.’

‘जी हां, मैं ऐसा ही करूंगी. अब कल्पना और अल्पना आप की ही नहीं, मेरी भी बेटियां हैं,’ अनीता ने कहा था.

एक साल बाद अनीता ने एक बेटे को जन्म दिया था. बेटा पा कर नरेंद्र बहुत खुश हुआ था. बेटे का नाम कमल रखा गया था.

अनीता नरेंद्र को पति के रूप में पा कर खुश थी और उस ने भी कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था. पापामम्मी भी अपना गुस्सा भूल कर अब उस से मिलने आने लगे थे.

आज दोपहर अनीता की अचानक मनोज से मुलाकात हो गई. उसे मनोज को घर का पता नहीं देना चाहिए था.

उस के दिल में एक अनजाना सा डर बैठने लगा. वह आंखें बंद किए चुपचाप लेटी रही.

अगले दिन सुबह के तकरीबन 11 बजे अनीता रसोई में खाना तैयार कर रही थी. कालबेल बज उठी. उस ने दरवाजा खोला, तो सामने मनोज खड़ा था.

‘‘तुम…’’ अनीता के मुंह से अचानक ही निकला,’’ तुम तो कह रहे थे कि मैं रात की गाड़ी से आगरा जा रहा हूं.’’

‘‘अनीता, मुझे रात की गाड़ी से ही आगरा जाना था, पर टैंपू में तुम से मिलने के बाद मेरा दिल दोबारा मिलने को बेचैन हो उठा. होटल में रातभर नींद नहीं आई. तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा. तुम नहीं जानती अनीता कि मैं आज भी तुम को कितना चाहता हूं,’’ मनोज ने कहा.

अनीता चुपचाप खड़ी रही. उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अनीता, अंदर आने के लिए नहीं कहोगी क्या? मैं तुम से केवल 10 मिनट बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘आओ,’’ न चाहते हुए भी अनीता के मुंह से निकल गया.

कमरे में सोफे पर बैठते हुए मनोज ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘कोई दिखाई नहीं दे रहा है… सभी कहीं गए हैं क्या?’’

‘‘बच्चे स्कूल गए हैं और नरेंद्र वर्कशौप गए हैं,’’ अनीता बोली.

तभी रसोई से गैस पर रखे कुकर से सीटी की आवाज सुनाई दी.

‘‘जो कहना है, जल्दी कहो. मुझे खाना बनाना है.’’

‘‘अनीता, तुम अब पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई हो. दिल करता है कि तुम्हें देखता ही रहूं. क्या तुम्हें जयपुर के होटल के उस कमरे की याद आती है, जहां हम ने रातें गुजारी थीं?’’

‘‘क्या यही कहने के लिए तुम यहां आए हो?’’

‘‘अनीता, मैं तुम्हारे पति को सब बताना चाहता हूं.’’

‘‘तुम उन्हें क्या बताओगे?’’ अनीता ने घबरा कर पूछा.

‘‘मैं नरेंद्र से कहूंगा कि जयपुर में मैं अकेला ही नहीं था. मेरे 2 दोस्त और भी थे, जिन के साथ अनीता ने खूब मस्ती की थी.’’

‘‘झठ, बिलकुल झूठ,’’ अनीता गुस्से से चीखी.

‘‘यह झूठ है, पर इसे मैं और तुम ही तो जानते हैं. तुम्हारा पति तो सुनते ही एकदम यकीन कर लेगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा.

अनीता ने हाथ जोड़ कर पूछा, ‘‘तुम आखिर चाहते क्या हो?’’

‘‘मैं चाहता हूं कि आज दोपहर बाद तुम मेरे होटल के कमरे में आ जाओ.’’

‘‘नहीं मनोज, मैं नहीं आऊंगी. अब मैं अपनी जिंदगी में जहर नहीं घोलूंगी. नरेंद्र मुझ पर बहुत विश्वास करते हैं. मैं उन से विश्वासघात नहीं करूंगी,’’ अनीता ने मनोज से घूरते हुए कहा.

‘‘तो ठीक है अनीता, मैं नरेंद्र से मिलने जा रहा हूं वर्कशौप पर,’’ मनोज ने कहा.

‘‘वर्कशौप जाने की जरूरत नहीं है. मैं यहीं आ गया हूं,’’ नरेंद्र की आवाज सुनाई पड़ी.

यह देख अनीता और मनोज बुरी तरह चौंक उठे. अनीता के चेहरे का रंग एकदम पीला पड़ गया.

‘‘यहां क्यों आया है?’’ नरेंद्र ने मनोज को घूरते हुए पूछा, ‘‘तुझे इस घर का पता किस ने दिया?’’

‘‘अनीता ने. कल यह मुझे बाजार में मिली थी,’’ मनोज बोला.

अनीता ने घबराते हुए नरेंद्र को पूरी बात बता दी.

‘‘अबे, तुझे अनीता ने पता क्या इसलिए दिया था कि तू घर आए और उसे ब्लैकमेल करे. मैं ने तुम दोनों की बातें सुन ली हैं. अब तू यहां से दफा हो जा. फिर कभी इस घर में आने की कोशिश की, तो पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’ नरेंद्र ने मनोज की ओर नफरत से देखते हुए गुस्साई आवाज में कहा.

मनोज चुपचाप घर से निकल गया.अनीता को रुलाई आ गई. वह सुबकते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं ने मनोज को घर का पता दे दिया था.’’

‘‘हां अनीता, यह तुम्हारी जिंदगी की दूसरी भूल है, जो तुम ने अपने दुश्मन को घर में आने दिया. मनोज तुम्हारा प्रेमी नहीं, बल्कि दुश्मन था. सच्चे प्रेमी कभी भी अपनी प्रेमिका को घर से रुपएगहने वगैरह ले कर भागने को नहीं कहते.’’

अनीता की आंखों से आंसू बहते रहे. नरेंद्र ने उस के चेहरे से आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘अनीता, मुझे तुम पर बहुत विश्वास था, पर आज की बातें सुन कर यह विश्वास और बढ़ गया है. वैसे तो मनोज अब यहां नहीं आएगा और अगर आ भी गया, तो मुझे फोन कर देना. मैं उसे पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

नरेंद्र की यह बात सुन कर अनीता के मुंह से केवल इतना ही निकला, ‘‘आप कितने अच्छे हैं…’ Hindi Family Story

Funny Story In Hindi: रिश्वत का ऐक्सक्लूसिव कोड

Funny Story In Hindi: हे मेरे शहर की सेम पदों पर सेम काम की फाइल खुलवाने, निकलवाने की मनमरजी की रिश्वत लेने वालों से परेशान रिश्वत खिलाने को मजबूर आत्माओ, तुम्हें यह जान कर खुशी नहीं, हद से ज्यादा खुशी होगी कि जनाब ने शहर के ढाबों में चाय, परांठों, लंच, कच्चे, उबले अंडों के रेटों को ले कर ऐक्सक्लूसिव कोड जारी करने के बाद अब शहर के तमाम औफिसों में रिश्वत प्रोटोकाल में चल रही गड़बड़ी को ले कर बड़ी सर्जरी की है.

छोटीमोटी सर्जरी तो वे अकसर करते रहते हैं, पर यह सर्जरी असल में रिश्वत लेने वालों की नहीं होती, रिश्वत देने वालों की ही होती रही है. रिश्वत कोड लागू होने के बाद भी शहर के तमाम महकमों में एक से काम की अलगअलग दर के हिसाब से रिश्वत लेने पर जनाब को आ रही जनता की शिकायतों की अलगअलग प्रैक्टिस से तंग आ कर जनाब ने आखिर भ्रम के हालात अपने कठोर फैसले के बाद साफ कर दिए हैं.

जनाब मानते हैं कि उन के औफिसों में काम करवाने के बदले रिश्वत देने का कोड नहीं, ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड जारी किया है, ताकि जनता औफिसों के स्वच्छ प्रशासन के नारे के धोखे में रह कर धक्के खातेखाते परेशान न हो.

जनाब द्वारा अब पूरे शहर के औफिसों में सेम तरह के काम करवाने के सब महकमों में दाम तय कर दिए गए हैं. अब हर महकमे में किस तरह की फाइल के कितने रुपए रिश्वत में लिए दिए जाएंगे, जनाब द्वारा यह फिक्स कर दिया गया है.

जनाब की ओर से जारी हुए ताजा आदेशों में जनाब ने साफ कर दिया है कि अब छोटा बाबू, बड़ा बाबू या कोई और काबिल अफसर किसी काम के अपनी मरजी से किसी से रिश्वत नहीं वसूल कर पाएगा.

ऐक्सक्लूसिव रिश्वत प्रोटोकाल के तहत अब हर महकमे में एकसमान रिश्वत कोड होगा और वही हर मुलाजिम के लिए लास्ट कोड माना जाएगा. जनाब ने यह फैसला जनहित में जनता द्वारा रिश्वत देने की हड़बड़ी से निकालने के लिए लिया है.

गौर हो, पहले के रिश्वत प्रोटोकाल में रिश्वत लेने की असमानता, गलतफहमियों और जनता की नाराजगियों के मामले लगातार जनाब के सामने आ रहे थे, जिस के चलते जनाब को हालात हाथ में लेते हुए यह कठोर कदम उठा कर उस में दखल देने को न चाहते हुए भी मजबूर होना पड़ा.

पिछले कुछ समय से शहर के दफ्तरों में आम देखा जा रहा था कि किसी महकमे में एक ही टाइप की फाइल को निकलवाने के इतने तो दूसरे महकमे में उसी तरह की फाइल को निकलवाने के जनता से दोगुने पैसे वसूले जा रहे थे. ऐसे में रिश्वत लेने और रिश्वत देने वाले दोनों ही अपने अपने को असहज महसूस कर रहे थे.

इस सिलसिले में रिश्वत देने वालों का कहना था कि औफिसों में काम के बदले रिश्वत देना तो ठीक है, पर सभी औफिसों में एक से काम होने के बाद भी रिश्वत कोड में समानता क्यों नहीं, जबकि संविधान में सब को समानता का अधिकार है? ऐसे में हर जगह सेम काम का रिश्वत प्रोटोकाल अलगअलग क्यों?

इसी के बाद जनाब ने महसूस किया कि असल में रिश्वत के पुराने जनाब ने जो नियम तय किए थे, वे क्लियर होते हुए भी क्लियर नहीं थे. उन में संशोधन इतने हुए थे कि न रिश्वत देने वाला उन नियमों को समझ पा रहा था, न रिश्वत लेने वाला समझ पा रहा था कि रिश्वत लेनेदेने का नियम है तो सही, पर लास्ट नियम क्या है?

और उस से भी ज्यादा यह कि रिश्वत के प्राटोकाल जैसे सैंसेटिव मामले में समानता के न होने के चलते जनाब के औफिसों की कोई इमेज न होने के बाद उस की इमेज को नुकसान हो रहा था, इसलिए जनाब ने पुराने रिश्वत लेने के सारे नियमों को रद्द करते हुए ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड बनाने की सोची, ताकि अब उन के औफिसों की इमेज और खराब न हो, उन के वर्करों की इमेज तो उसी दिन खराब हो जाती है, जिस दिन जनता उन के पास अपने काम करवाने जेब पकड़े आती है.

जनाब मानते हैं कि कुछ वीवीआईपी मामलों में रिश्वत लेनेदेने के अलग नियम हो सकते हैं, पर इस का मतलब यह नहीं हो जाता कि ये नियम सब जगह लागू हों और इन का मनमाना गलत इस्तेमाल किया जाए.

बाकी नियमों की तरह समाज में रिश्वत के नियमों में भी नियम बने रहने से समाज में अफरातफरी के माहौल से बचा जा सकता है, इसलिए जनाब ऐक्सक्लूसिव कोड औफ रिश्वत के जरीए नए सिरे से सब के लिए कुरसी के हिसाब से रिश्वत लेना तय कर रहे हैं, ताकि पद के हिसाब से रिश्वत लेने में समानता बने.

जनाब का यह भी मानना है कि और जगह कंफ्यूजन होता हो तो होता रहे, पर इस ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड के लागू हो जाने के बाद से रिश्वत लेनेदेने में किसी तरह का कोई कंफ्यूजन नहीं रहेगा.

बड़े अफसरों से ले कर चपरासी तक को ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड के हिसाब से ही रिश्वत लेनी होगी. उस से आगे दाता जो मुलाजिम को अपनी खुशी के हिसाब से दे, उस की इच्छा.

ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड लागू हो जाने के बाद भी जो किसी मुलाजिम ने ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड का पालन नहीं किया और जनता ने किसी की शिकायत उन से की तो वे रिश्वतनिष्ठ मुलाजिम को ले कर इतने सख्त होंगे कि… ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड का पालन न करने पर उस का पक्ष सुने बिना मजे से उसे बरखास्त तक किया जा सकेगा.

जनाब मानते हैं कि कायदे से वैसे तो रिश्वत लेने के बाद जनता का काम पहली बार में ही हो जाना चाहिए, पर जो किसी वजह से वह काम करवाने को रिश्वत देने के बाद भी जो किसी कानूनी रुकावट के चलते दोबारा जनता को औफिस में विजिट करना जरूरी हो, तो अब से काम करवाने वाले से हर बार ऐक्स्ट्रा रिश्वत नहीं ली जाएगी.

जनाब जनहित में ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड इसलिए भी ला रहे हैं, ताकि जनता की जेब पर रिश्वत देने का ऐक्स्ट्रा भार न पड़े, क्योंकि जनता पहले ही बहुत से ऐक्स्ट्रा भारों से दबी हुई है. और जगह ट्रांसपेरेंसी, इज्जत बची हो या नहीं, पर रिश्वत लेने ओर देने में इज्जत और ट्रांसपेरेंसी बची रहे. Funny Story In Hindi

Best Hindi Story: गांव से बौलीवुड का सफर

Best Hindi Story, लेखिका – नीलम झा

रानी एक छोटे से गांव की साधारण लड़की थी, जिस के भीतर असाधारण सपने पलते थे. उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में बसे रामपुर गांव में उस का जन्म हुआ था. पिता किसान थे, जो खेतों में दिनरात मेहनत कर के अपनी जमीन और बच्चों को सींचते थे.

पिता की हथेली पर उकेरी मेहनत की रेखाएं रानी के लिए संघर्ष की पहली पाठशाला थीं. मां घर संभालती थीं, बच्चों को पढ़ाती थीं और गांव की औरतों के साथ हलकीफुलकी गपशप कर के जिंदगी को आसान बनाती थीं.

रानी को पढ़ाई का जुनून था, लेकिन गांव की सामाजिक और भौगोलिक सीमाएं उसे बांधे रखती थीं. स्कूल खत्म होते ही वह घर के कामों में हाथ बंटाती, गायों को चारा डालती और भाईबहनों की देखभाल करती.

उस की रातें सपनों में बीतती थीं. ऐसे सपने जो बौलीवुड की नकली चमक से भरे थे, जहां हीरोइनें स्क्रीन पर राज करती थीं और रानी उस चमक को असली मानती थी.

एक शाम, जब रानी किताबों में खोई थी, मां ने उस के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रानी, ये सपने देखना छोड़ दे. गांव में ही बस जा, शादी कर ले. यही तेरी किस्मत है मेरी बच्ची.’’

रानी ने मुसकराते हुए मां की ओर देखा. उस की आंखों में गांव की मिट्टी से निकली एक अजीब सी जिद थी, जो आसमान छूने को बेताब थी.

‘‘मां, मैं शहर जाऊंगी. कुछ बनूंगी, नाम कमाऊंगी और आप को गर्व महसूस कराऊंगी,’’ रानी ने कहा.
स्कूल खत्म होते ही रानी ने अपना अटूट फैसला लिया. मुंबई, वहां का नाम सुनते ही उस का दिल उत्साह से धड़क उठता. उस ने ट्यूशन पढ़ा कर, घर के काम कर के पाईपाई जोड़ी. जब उस ने ट्रेन का टिकट लिया, तो गांव वालों ने ताने मारे, उन की आवाजें उस के कानों में जहर घोल रही थीं, ‘पागल है यह लड़की.

शहर खा जाएगा इसे. लड़की अकेली क्या करेगी वहां? कोई इज्जत नहीं बचेगी…’

लेकिन रानी नहीं रुकी. बैग में कपड़े, कुछ पैसे और असीम सपने ले कर वह मुंबई पहुंची. उस की आंखें फटी की फटी रह गईं… ऊंची इमारतें, हुजूम, स्टूडियो की चमकदमक. उस का संघर्ष तुरंत शुरू हो गया.

ऐक्स्ट्रा रोल्स करना, चाय सर्व करना, आडिशन के पीछे भूखे पेट भागना और रातें एक छोटे से रूम में संघर्षरत साथी लड़कियों के साथ गुजारना. यह उस की कठोर दिनचर्या बन गई, जिस ने उस की इच्छाशक्ति को और मजबूत किया है.

एक सीनियर ऐक्ट्रैस ने एक रात उसे हिम्मत देते हुए कहा, ‘‘तुम्हें कभी हार नहीं माननी है रानी. यहां टूटना आसान है, क्योंकि अकेलापन बहुत है.’’

रानी ने मजबूती से सिर हिलाया, ‘‘जी, मैं हार नहीं मानूंगी. मैं गांव की लड़की हूं, मैं ने सिर्फ संघर्ष देखा है, हारना नहीं आता मुझे.’’

दिन बीतते गए, महीने गुजरते गए. एक दिन रानी को एक फिल्म ‘देस विदआउट बौर्डर्स’ के आडिशन में छोटा सा चांस मिला. डायरैक्टर ने उस की मासूमियत और ऐक्टिंग की भूख को पहचाना. रोल मिल गया.

फिल्म रिलीज हुई और बौक्स औफिस पर हिट हो गई. रानी रातोंरात स्टार बन गई. गांव में जश्न मनाया गया.

मां ने फोन पर रोते हुए कहा, ‘‘बेटी, तू ने कर दिखाया. तू ने मेरी आंखों में खुशी के आंसू ला दिए.’’

अब रानी का नाम था, शोहरत थी. उस ने एक के बाद एक कामयाब फिल्में दीं… ‘हार्टबीट’, ‘फ्लेम्स औफ लव’, ‘पल्स’. उस ने हर रोल में जान डाल दी. फैंस पागल थे, मीडिया उस के पीछे लगा था. लेकिन उस का दिल कहीं और था, सपनों के बीच प्यार की तलाश में.

2003 का साल था. मुंबई की एक भव्य पार्टी में रानी पहुंची. वहीं उस की मुलाकात विक्रम सिंह से हुई, जो लौन टैनिस का नैशनल चैंपियन और एक चमकता सितारा था. लंबा कद और एक दिलकश मुसकान जो किसी का भी दिल चुरा ले.

विक्रम ने सीधे रानी को देखा और कहा, ‘‘हाय, आप रानी हैं न? ‘देस विदआउट बौर्डर्स’ देखी. कमाल की अदाकारा.’’

रानी शरमाई, अपनी गांव की जड़ों को याद करते हुए, फिर बोली, ‘‘थैंक यू. आप विक्रम सिंह? मैं ने आप के बारे में बहुत सुना है.’’

‘‘हां. टैनिस खेलता हूं. लेकिन आप की फिल्में भी देखता हूं, मैं आप का फैन हूं.’’

बात बढ़ी. डिनर डेट्स हुईं, मीडिया ने फोटोज खींचे. ‘बौलीवुड स्टार और टेनिस हीरो का रोमांस’, यह हैडलाइन हर पत्रिका पर छाई थी. रानी खुश थी. विक्रम का साथ उसे अच्छा लगता था. उस की स्पोर्ट्स वर्ल्ड और रानी की फिल्मी दुनिया, यह एक शानदार जोड़ी लगती थी.

विक्रम ने एक शाम समंदर किनारे कहा, ‘‘रानी, तुम्हारे साथ समय बिताना बहुत मजा आता है. तुम लाइमलाइट में हो कर भी बहुत सच्ची हो.’’

रानी ने विक्रम का हाथ थामा. ‘‘मुझे भी लेकिन हमारा फ्यूचर क्या है विक्रम? तुम शादी के लिए तैयार हो?’’

विक्रम चुप रहा. यह चुप्पी कई महीनों तक चली. रोमांस चलता रहा, लेकिन शादी की बात नहीं हुई. विक्रम का कैरियर, ट्रेनिंग, टूर्नामैंट्स सब प्राथमिकता में थे.

रानी इंतजार करती रही, उस के दिल में असुरक्षा घर करने लगी. साल 2006 तक यह रिश्ता चला, फिर अचानक ब्रेकअप हुआ. मीडिया में खबरें फैलीं ‘रानी और विक्रम अलग हो गए?’

रानी ने कुछ नहीं कहा. उस का दिल टूटा, लेकिन वह मजबूत बनी रही, प्रोफैशनल मुखौटा लगाए रखा.
फिर रानी की मुलाकात हुई अर्जुन मेहरा से, एक शांत, कामयाब आर्किटैक्ट. वह कोलकाता का लड़का था, जिस ने अपने दम पर ‘मेहरा डिजाइंस’ फर्म खड़ी की थी. अर्जुन शांत था और लाइमलाइट से दूर रहता था.

एक कौमन फ्रैंड की पार्टी में उन की मुलाकात हुई, ‘‘हाय, मैं अर्जुन. आप की फिल्में पसंद हैं.’’

रानी मुसकराई. ‘‘थैंक यू. आप क्या करते हैं?’’

‘‘आर्किटैक्ट. बिल्डिंग्स डिजाइन करता हूं. मैं शोरगुल से दूर रहना पसंद करता हूं.’’

बातें हुईं. अर्जुन की सादगी रानी को भा गई. विक्रम के तूफान के बाद यह शांति उसे ठहराव का वादा लगी. डेट्स शुरू हुईं, ट्रिप्स लगे. अर्जुन ने 3 महीने बाद प्रपोज किया, ‘‘रानी, मुझ से शादी करोगी? मैं तुम्हें खुश रखूंगा.’’

रानी ने सोचा. उस का दिल अब अस्थायी चमक नहीं, बल्कि हमेशा का सुकून चाहता था. उस ने हां कहा.
19 मार्च 2006, रानी 33 की उम्र में अर्जुन से शादी के बंधन में बंधी. गांवभर में खुशी थी.

मां ने कहा, ‘‘बेटी, अब बस. तेरा घर बस गया और यही जरूरी है.’’

शादी के बाद रानी की जिंदगी बदल गई. उस ने फिल्में कम कीं. फैमिली फर्स्ट. अर्जुन का साथ, घर की शांति. 2007 में खुशी दोगुनी हुई, बेटी हुई आर्या मेहरा. रानी आर्या को गोद में ले कर रो दी, ‘‘मेरी जान. तू मेरा ग्लो है, मेरी सब से बड़ी कामयाबी.’’

अर्जुन ने रानी को गले लगाया, ‘‘हमारा परिवार पूरा हो गया रानी.’’

रानी ने कहा, ‘‘हां, अब सब ठीक है. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

पहले साल सुहाने थे. घर में शांति, आर्या की नन्ही हंसी. रानी मां बनी, फिल्मों से ब्रेक. लेकिन धीरेधीरे दरारें आईं. अर्जुन कारोबार में इतना बिजी रहने लगा कि उस का प्रैक्टिकल दिमाग रानी की भावनात्मक जरूरतों को समझ नहीं पाया.

रानी अकेली पड़ गई, आर्या को संभालना. फिर मुश्किलें आईं. रानी दोबारा प्रेग्नेंट हुई. खुशी थी, लेकिन डाक्टर ने कहा, ‘‘प्रौब्लम है. अबौर्शन करना पड़ेगा, नहीं तो तुम्हारी जान को खतरा है.’’

रानी रोई. अर्जुन ने हिम्मत दी, ‘‘अगली बार रानी. हम फिर कोशिश करेंगे, हिम्मत रखो.’’

फिर दूसरी बार, वही दर्द.

2 अबौर्शन, जिस ने रानी को अंदर से तोड़ दिया. रानी उदासी में डूब गई, उसे लगा कुदरत उस से उस का दोबारा मां बनने का सपना छीन रही है.

अर्जुन ने कहा, ‘‘सब ठीक हो जाएगा रानी. हम एकदूसरे के लिए काफी हैं. बच्चों के लिए खुद को खतरे में मत डालो.’’

लेकिन तनाव बढ़ा. झगड़े छोटी बातों पर होने लगे. अर्जुन प्रैक्टिकल, रानी भावुक. अर्जुन का बिजनैस माइंड, रानी का फिल्मी बैकग्राउंड. यह फर्क एक गहरी खाई बन गया.

अर्जुन ने एक यूरोप ट्रिप कैंसल की, ‘‘बिजनैस में बड़ा प्रैशर है रानी. क्लाइंट्स जरूरी हैं.’’

रानी गुस्से से बोली, ‘‘आर्या के लिए प्लान था. तुम हमेशा काम को चुनते हो, मैं नहीं, आर्या भी नहीं.’’

स्वभाव का फर्क बढ़ने लगा. झगड़े रोज होने लगे.

आर्या डरती थी, ‘‘मम्मी, पापा से लड़ाई मत करो. मुझे डर लगता है.’’

रानी रोई, बेटी को गले लगाया, ‘‘नहीं बेटी. सब ठीक हो जाएगा, अब नहीं लड़ेंगे, मैं वादा करती हूं.’’

2013 तक चला यह संघर्ष, 6 साल. आखिरकार तलाक.

अर्जुन ने यह कहते हुए फाइल किया, ‘‘हम दोनों को शांति चाहिए रानी.’’

रानी सदमे में थी, ‘‘क्यों अर्जुन? हम कोशिश करें. सब ठीक हो सकता है.’’

अर्जुन ने शांत मगर दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘नहीं चलेगा रानी. अब बहुत देर हो गई है. हम दोनों एकदूसरे को बस दुख दे रहे हैं.’’

कोर्ट, कस्टडी की लड़ाई. आर्या किस के साथ? रानी पूरी ताकत से लड़ी, ‘‘वह मेरी जान है अर्जुन. मैं उसे नहीं छोड़ सकती. मैं उस की मां हूं.’’

जज ने फैसला रानी के पक्ष में दिया… कस्टडी रानी को, लेकिन विजिटेशन राइट्स अर्जुन को. तलाक के बाद रानी अकेली रह गई. सिंगल मदर.

रानी ने टूटे दिल के साथ आर्या को संभाला. अब उसे वापसी करनी थी, आर्या के भविष्य के लिए, अपनी
अधूरी पहचान के लिए. वह शूटिंग पर जाती, आर्या को नानी के पास छोड़ती, ‘‘बेटी, मां काम पर जा रही है. यह सब तुम्हारे लिए है. शाम को आऊंगी.’’

आर्या ने समझदारी से कहा, ‘‘ओके मम्मी. लव यू… और आप अपना ध्यान रखना.’’

रानी मुसकराती, दर्द छिपाया. अबौर्शन का सदमा, तलाक का दर्द, कस्टडी फाइट… सब सहा.

2025 में रानी की फिल्म ‘क्राइसिस’ आई. एक पत्रकार ने रानी से पूछा, ‘‘तलाक दर्दनाक था, लेकिन आप ने सीखा क्या रानीजी?’’

रानी ने ईमानदारी से जवाब दिया, ‘‘तलाक दर्दनाक था. लेकिन मैं ने सीखा कि प्यार काफी नहीं होता.

एकदूसरे को समझना और इज्जत करना जरूरी है. अब मैं जानती हूं कि मेरी कीमत क्या है.’’

आर्या बड़ी हो रही थी, 18 की, स्कूल टौपर. रानी को गर्व था.

‘‘तू डाक्टर बनेगी,’’ रानी ने कहा.

आर्या जोर से हंसी और बोली, ‘‘हां मम्मी. आप जैसी स्ट्रौन्ग बनूंगी. मैं टूटना नहीं सीखूंगी.’’

रानी की जिंदगी गांव से बौलीवुड, प्यार से तलाक, दर्द से सीख. वह मजबूत बनी. अब वह अकेली रानी नहीं थी, वह एक योद्धा थी, जिस की चमक कभी फीकी नहीं पड़ने वाली थी.

रानी का सफर अनोखा था, प्रेरणा से भरा. तलाक ने उसे तोड़ा नहीं, बल्कि एक नया रास्ता दिखाया… आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का.

रानी की चमक अब नकली नहीं, बल्कि अनुभव की असली चमक थी. वह जानती थी कि उस के गांव की लड़कियां अब उस के नाम से सपने देखेंगी और यह उस की सब से बड़ी जीत थी. Best Hindi Story

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