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Hindi Story : दामाद

Hindi Story.साधारण परिवार के अमित की सरकारी नौकरी क्या लगी, उस के लिए अमीर व्यापारी की बेटी का रिश्ता आ गया. शादी के बाद अमित को कुछ ऐसा पता चला कि उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

जि  ला बदायूं के एक छोटे से गांव में, जहां सड़कें धूल भरी और घर मिट्टी के थे, वहां अमित कुमार का जन्म हुआ था. उस के पिता, रामनिवास, एक साधारण किसान थे, जिन के पास 5 बीघे की जोत थी और मां, सुमित्रा देवी, घर की चारदीवारी में सिमटी एक मजबूत औरत.

अमित बचपन से ही होशियार था और गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी वह जिले में टौप करता रहा. उस की मेहनत ने उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया और वहां से एक सरकारी नौकरी तक का सफर पूरा हुआ.

नौकरी लगते ही गांव में अमित की इज्जत बढ़ गई. रिश्तों की बाढ़ आ गई. हर कोई अपनी बेटी इस होनहार नौजवान से ब्याहना चाहता था, लेकिन अमित की इच्छा साधारण थी. एक ऐसी पत्नी, जो उस के बूढ़े मातापिता की सेवा कर सके, जो उस की साधारण बैकग्राउंड को समझे.

गांव के पंडित हरिनारायण शर्मा, जो अमित के पिता के विश्वासपात्र थे, ने एक दिन रामनिवासजी को बुलाया, ‘‘रामनिवासजी, मैं ने आप के लिए सोना ढूंढ़ निकाला है…’’ उन्होंने राज भरे अंदाज में कहा, ‘‘शहर के एक बड़े व्यापारी मोहनलाल अग्रवाल की बेटी आशा. परिवार बहुत अमीर है, दहेज में आप को जो चाहिए वह मिलेगा.’’

रामनिवास ने कहा, ‘‘पर पंडितजी, हमारे और उन के बीच तो सामाजिक और पैसे की बहुत बड़ी खाई है.’’

पंडितजी ने सम?ाया, ‘‘आजकल जमाना बदल गया है. अमीर परिवार पढ़ालिखा और सरकारी नौकरी वाला दामाद चाहते हैं. आप अमित की शादी इस लड़की से करवा दीजिए, पूरे गांव में आप की इज्जत बढ़ेगी.’’

अमित ने जब इस रिश्ते के बारे में सुना तो वह सहमत नहीं था. उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं उस लड़की को देखे बिना, उस से बात किए बिना शादी नहीं कर सकता.’’

लेकिन रामनिवास पर पंडितजी की बातों का जादू चल चुका था. उन्होंने अमित को डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शादी के बाद खूब देखने का मौका मिलेगा. अभी तुम्हारा काम पढ़ाई और नौकरी करना है.’’

सुमित्रा देवी ने बीच में पड़ कर कहा, ‘‘कम से कम अमित को लड़की से एक बार मिल लेने दो.’’

लेकिन रामनिवास अड़े रहे, ‘‘नहीं, शादी तय हो चुकी है. अग्रवाल परिवार जल्दी शादी चाहता है.’’

शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. अग्रवाल परिवार ने शानदार इंतजाम किया… बरात पांचसितारा होटल में ठहरी, भोजन विदेशी व्यंजनों से सजा था. दहेज में अमित के लिए एक नई कार भी थी, जिसे उस ने साफ शब्दों में लेने से मना कर दिया, ‘‘मैं दहेज के खिलाफ हूं,’’ पर पिता के दबाव में उसे दूसरे सामान स्वीकार करने पड़े.

सुहागरात पर अमित को एक ?ाटका लगा. आशा, उस की पत्नी, ने न केवल उस से दूरी बनाई, बल्कि उस के मातापिता के प्रति भी उदासीनता दिखाई. अगले 2 दिन तक वह किसी से ठीक से बात नहीं करती रही, घर के कामों से भी दूर रही.

अमित ने एकांत में आशा से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी शादी मु?ा से जबरदस्ती हुई है? क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?’’ आशा ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल खिड़की से बाहर देखती रही.

तीसरे दिन, गांव की परंपरा के मुताबिक, अमित आशा को उस के मायके छोड़ने गया. ट्रेन से यात्रा के दौरान भी आशा चुप रही. स्टेशन से पैदल चलते हुए, अचानक आशा ने चलने की रफ्तार बढ़ा दी और अमित से आगे निकल गई.

तभी एक मोटरबाइक पर 2 नौजवान आते दिखे. आशा को देखते ही वे रुक गए. अमित ने पहली बार आशा के चेहरे पर मुसकान देखी. उन दोनों ने आशा से कुछ कहा और वह और भी खुश हो गई.

अमित के पास पहुंचने तक वे दोनों नौजवान चले गए थे. आशा ने इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया और अमित ने भी नहीं पूछा, पर उस के मन में सवालों की लहर उठने लगी.

अग्रवाल परिवार का घर भव्य था. तिमंजिला हवेली, बगीचा, गाडि़यां, पर अमित का स्वागत ठंडा था. आशा की मां उसे उसे तुरंत अंदर ले गईं, जबकि अमित को बरामदे में छोड़ दिया गया.

शाम को अमित को पहली मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया. थकान के मारे वह सो गया. रात के 9 बजे, नीचे से आती हंसी की आवाज से उस की नींद खुली.

झांक  कर देखा तो मोहनलाल अग्रवाल और 2 दोस्त शराब पी रहे थे. मोहनलाल नशे में चूर थे, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल…’’ वे चिल्लाए, ‘‘सब कहते थे मेरी बिगड़ी बेटी से कौन शादी करेगा? मैं ने एक गरीब लड़के से करवा दी.’’

दोस्तों में से एक ने हंसते हुए कहा, ‘‘सचमुच मोहनलाल, तुम तो जैकपौट हिट कर गए.’’

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई. तभी आशा की मां आईं और मोहनलाल के कान में कुछ कहा. वे तुरंत अंदर चले गए.

अमित चुपचाप नीचे उतरा और अंदर के कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. वहां का सीन उस के लिए चौंकाने वाला था.

आशा एक कोने में बैठी थी. उस के सामने मोहनलाल खड़े थे. ‘‘बता, किस के साथ मुंह काला करवाया है?’’ मोहनलाल चिल्ला रहे थे, ‘‘मैं ने तेरी हर गलती माफ की, तेरी शादी करवाई, और तू…’’

तभी आशा की मां ने उस के बाल पकड़े और उसे पीटना शुरू कर दिया. आशा विरोध नहीं कर रही थी, मानो यह सजा उसे स्वीकार थी.

अमित खुद को रोक नहीं पाया. वह कमरे में घुसा और आशा की मां का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बस करिए…’’ उस की आवाज में गुस्सा था. मोहनलाल और उन की पत्नी घबरा गए. मोहनलाल की नशा उतर चुका था. उन्हें एहसास हो गया कि अमित ने सबकुछ सुन लिया है.

मोहनलाल रोने लगे, ‘‘अमित, माफ कर दो. आशा… आशा ने एक गलती की थी. हम ने सोचा था कि शादी करवा देंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’ आशा की मां ने रोते हुए कहा, ‘‘यह पेट से है अमित. उस लड़के ने इसे छोड़ दिया. हमें लगा कि तुम्हारी इस से शादी करवा दें तो…’’

मोहनलाल अचानक उठे और कमरे से एक दोनाली बंदूक ले आए, ‘‘मैं इस की हर गलती माफ करता रहा…’’ वे आशा की तरफ बंदूक तानते हुए बोले, ‘‘लेकिन अब नहीं. यह हमारे कुल का नाम डुबो चुकी है.’’

अमित ने तेजी से आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी, ‘‘बस…’’ उस की आवाज में मजबूती थी, ‘‘आशा, चलो मेरे साथ. हम अपने घर चलते हैं.’’ सब चौंक गए. आशा ने पहली बार अमित की तरफ देखा.

‘‘अमित…’’ मोहनलाल ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘तुम… तुम इसे अपने साथ ले जाना चाहते हो? इस की इस हालत के बावजूद?’’

अमित ने गहरी सांस ली और तेज आवाज में कहा, ‘‘जी, गलती आशा की नहीं, आप की है. आप ने उसे वह प्यार नहीं दिया, वह संस्कार नहीं दिए जो एक बच्चे को चाहिए. आप ने पैसे और इज्जत को परिवार से ऊपर रखा…’’

अमित थोड़ा रुका, फिर बोला, ‘‘और आशा की सजा यही है कि इसे अब मेरे साथ, एक साधारण परिवार में, मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा. इसे सीखना पड़ेगा कि प्यार क्या होता है, इज्जत क्या होती है.’’

मोहनलाल अमित के पैरों पर गिर पड़े, ‘‘तुम महान हो अमित.’’  अमित ने उन्हें उठाया, ‘‘नहीं, मैं केवल एक इनसान हूं जो समझता है कि हर गलती के पीछे एक कहानी होती है.’’

अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकल गया. आशा उस के पीछेपीछे चल रही थी, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे… शायद पहली बार राहत के आंसू.

स्टेशन जाते समय, वही 2 नौजवान फिर मिले. उन में से एक, जो शायद आशा का प्रेमी था, मुसकराते हुए बोला, ‘‘आओ आशा डार्लिंग, चलो हम तुम्हारे पेट के बच्चे को गिरवा देते हैं, फिर मजे करेंगे…’’ इतना कह कर उस ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की.

तभी अमित ने उसे जोरदार घूंसा मारा. दूसरा लड़का आगे बढ़ा तो आशा ने खुद आगे बढ़ कर उसके बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. ‘‘तुम लोगों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी…’’ आशा ने पहली बार तेज आवाज में कहा, ‘‘लेकिन अब खत्म. जाओ, और कभी मेरे सामने मत आना.’’

वे दोनों नौजवान भाग खड़े हुए. अमित ने आशा को गले लगाया, ‘‘शाबाश, तुम में लड़ने की ताकत है.’’

अमित ने अपने मातापिता को कुछ नहीं बताया. आशा ने धीरेधीरे घर संभालना शुरू किया. वह सुमित्रा देवी की मदद करती, रामनिवासजी की सेवा करती. उस का बरताव पूरी तरह बदल गया था।

एक दिन आशा ने अमित से कहा, ‘‘मैं… मैं इस बच्चे को गिरवाना चाहती हूं. यह तुम्हारा नहीं है.’’ अमित ने आशा की ओर देखा, ‘‘पर इस में इस मासूम की क्या गलती है आशा? यह तो बेकुसूर है.’’

आशा अमित के पैरों पर गिर पड़ी, ‘‘तुम… तुम इसे अपनाओगे? मेरी इस गलती को?’’ अमित ने आशा को उठाया, आंखों में देखा, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू… यही तो तुम्हारी पवित्रता है..हम इस बच्चे को पालेंगे, अपने बच्चे की तरह.’’

एक साल बीत गया. आशा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रेहान  रखा गया. अमित ने उसे अपनी गोद में लिया और कहा, ‘‘यह मेरा बेटा है आशा. हमारा बेटा.’’

आशा ने फिर से रोना शुरू कर दिया, पर इस बार खुशी के आंसू थे. अमित के मातापिता ने बच्चे को अपना पोता मान लिया. गांव में कोई नहीं जानता था कि यह बच्चा अमित का नहीं है.

एक शाम, आशा ने अमित से पूछा, ‘‘तुम ने मुझे क्यों स्वीकार किया? मैं तो…’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं ने तुम में वह आशा देखी जो तुम्हारे नाम का मतलब है. प्यार का मतलब ही है स्वीकार करना.’’

बाहर, शाम का सूरज डूब रहा था, नई सुबह के इंतजार में. एक ऐसी सुबह जो नए विश्वास, नए प्यार और नई जिंदगी की कहानी ले कर आएगी.  Hindi Story

Story in Hindi : रेल हादसा – मजा या सजा

Story in Hindi. वह उस रेल से पहली बार बिहार आ रहा था. इंदौर से पटना की यह रेल लाइन बिहार और मध्य प्रदेश को जोड़ती थी. वह मस्ती में दोपहर के 2 बजे चढ़ा. लेकिन 13-14 घंटे के सफर के बाद वह एक हादसे का शिकार हो गया. पूरी रेल को नुकसान पहुंचा था. वह किसी तरह जान बचा कर उतरा. उसे कम ही चोट लगी थी.

उसे पता नहीं था कि अब वह कहां है कि तभी एक बूढ़ी अम्मां ने उस का हाथ थाम कर कहा, ‘‘बेटा, अम्मां से रूठ कर तू कहां भाग गया था?’’

उस ने चौंक कर पीछे की ओर देखा. तकरीबन 64-65 साल की वे अम्मां उसे अपना बेटा समझ रही थीं. फिर तो आसपास के सारे लोगों ने उसे बुढ़िया का बेटा साबित कर दिया.

उसे जबरदस्ती बुढ़िया के घर जाना पड़ा. उस बुढ़िया के बेटे की शक्ल और उम्र पूरी तरह उस से मिलतीजुलती थी. ‘चलो, थोड़ा मजा ले लेते हैं,’ उस ने मन ही मन सोचा.

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रात को खाना खाने के बाद जैसे ही वह सोने के लिए कमरे में पहुंचा, तो चौंक गया. बुढि़या की बहू गरमागरम दूध ले कर उस के पास आई. वह भरेपूरे बदन की सांवले रंग की औरत थी.

‘‘अब मैं कभी आप से नहीं लड़ूंगी. आप की हर बात मानूंगी,’’ वह औरत उस से लिपटते हुए बोली. ‘‘क्यों, क्या हुआ था?’’ उस ने बड़ी हैरानी से पूछा. ‘‘आप शादी के 2 महीने बाद अचानक गायब हो गए थे. सब ने आप को बहुत ढूंढ़ा, पर आप कहीं नहीं मिले. इस गम में बाबूजी चल बसे,’’ वह रोते हुए बता रही थी.

‘‘मैं सब भूल चुका हूं. मुझे कुछ याद नहीं है. मैं किसी को नहीं पहचानता,’’ वह शांत भाव से बोला. उस औरत ने रात को उसे भरपूर देह सुख दिया. सुबह के तकरीबन 8 बजे उस की नींद खुली. उस ने ब्रश कर के चाय पी.

दिन में पता चला कि वह दुकान चलाता था. वह दिनभर में अपनी इस जिंदगी के बारे में काफीकुछ जान गया. उस की 5 बहनें थीं और वह एकलौता भाई है. उस की पत्नी चौथी बहन की ननद है.

तकरीबन 6 साल पहले शादी हुई थी. उस का बेटा लापता हो गया है. शायद सड़क हादसे में या किसी दूसरे हादसे में अपनी औलाद खो चुका है. बेटा वह भी एकलौता, इसलिए यह दर्द दिखाया नहीं जा सकता.

दूसरी ओर अनपढ़ और देहाती बहू है, जो 16-17 साल की उम्र में ही ब्याह कर यहां आई थी. कुछ ही दिनों में पति गुजर गया, इसलिए बड़ी मुश्किल से मिले इस पति को वह संभाल कर रखना चाह रही है.

कितना भी बड़ा हादसा हो, सरकार बस एक जांच कमीशन बिठा देगी. इस से ज्यादा करेगी, तो इस पीड़ित या उस के परिवार को 2-3 लाख रुपए का मुआवजा दे देगी. मगर उसे न तो मुआवजा मिला था, न ही लाश. वैसे भी जनरल डब्बे में सफर करने वाले लोगों की जिंदगी की कोई कीमत है क्या?

काफी दिन न मिलने के चलते उस ने मरा मान लिया था. क्या पता, कहीं जिंदा हो और लौट आया हो. उस हादसे में क्या पता याददाश्त चली गई हो, इसलिए सासबहू दोनों ही अपनेअपने तरीके से उसे याद दिलाने की कोशिश में थीं. 2 दिन बाद ही सभी बहनें, बहनोई और बच्चे आ गए.

‘‘अम्मां, यह तो अपना ही भाई है,’’ चौथी बहन उसे ढंग से देखते हुए उस के हाथपैरों को छू कर बोली. ‘‘क्या मैं अपने साले को नहीं पहचानता… पक्का वही है. मुझे तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं दिखती है.’’ ‘‘बालकिशन, मैं तेरा तीसरे नंबर का जीजा हूं. साथ ही, तेरी पत्नी का बड़ा भाई भी,’’ जीजा उस के कंधे पर हाथ रखते हुए बोल उठा. ‘‘जी,’’ कह कर वह चुप हो गया. बस वह सब को बड़े ही ध्यान से देख रहा था, मानो उन्हें पहचानने की कोशिश कर रहा हो.

‘‘अरी अम्मां, यह हादसे में अपनी याददाश्त बिलकुल ही खो बैठा है. बाद में इसे सब याद आ जाएगा,’’ इतना कह कर उस की बहन उस का हाथ सहलाने लगी. वह इंदौर में अकेला रहता था. वहीं रह कर छोटामोटा काम करता था, जबकि यहां उसे पत्नी, भरापूरा परिवार मिल रहा था. वह बालकिशन का हूबहू था.

पासपड़ोस वालों के साथसाथ सारे नातेरिश्तेदार उसे बालकिशन बता रहे थे और याददाश्त खोया हुआ भी. पत्नी एकदम साए की तरह उस के साथ रहती, ताकि वह दोबारा न भाग जाए.

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एक दिन दोपहर का खाना खाने के तकरीबन डेढ़ घंटे बाद वह अपना काम समझने की कोशिश कर रहा था. यहां उस की पान की दुकान थी. कोई रजिस्टर या कागज… पता चला कि सभी अंगूठाछाप थे. बस, वही 10वीं फेल था. अब कैसे बताए कि वह बीटैक है. लेकिन छोटामोटा चोर है. मोटरसाइकिल पर मास्क लगा कर जाना, औरतों के जेवर उड़ाना और घरों में चोरी करना उस का पेशा है.

मगर, इस परिवार में सभी सीधेसादे हैं. उस की तीसरे नंबर की बहन ने पूरे 5 तोले का सोने का हार पहना हुआ था. गोरा रंग, दोहरा बदन. भारीभरकम शरीर पर वह हार जंच रहा था. जब वह गौर से उस हार को देखने लगा, तो झट से बहनोई बोला, ‘‘क्यों साले साहब, पसंद है तो रख लो इस हार को.’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है,’’ वह सकपका कर बोला था.

‘‘फिर भी, तुम मेरी बहन के सुहाग हो. अगर कुछ चाहिए तो बोलो? मेरी बहन की वीरान जिंदगी में बहार आ चुकी है,’’ जीजा भावुक होते हुए बोला.  ‘‘ऐसा कुछ नहीं है,’’ वह मना करते हुए बोला.

शाम को उस का साला जब जाने लगा, तो कुछ रुपए उस की पत्नी को देने लगा और बोला, ‘‘दुकान काफी दिनों से बंद पड़ी हुई है. मैं कल ही जा कर दुकान को सही कर दूंगा.’’ ‘‘न भैया, मेरे पास पैसे हैं. इन के पास भी जेब में 20 हजार रुपए हैं,’’ वह भाई को पैसे देने से मना करते हुए बोली.

‘मगर, मैं तो पान की दुकान चलाना भूल गया हूं. पान लगाना तक नहीं आता मुझे. कैसे बेचूंगा?’ उस के दिमाग में तेजी से कुछ चलने लगा. ‘‘क्या सोच रहे हो साले साहब?’’ जीजा मानो उस के चेहरे को गौर से पढ़ते हुए बोला. ‘‘पान की दुकान मैं ने कभी चलाई नहीं है. मैं तो टैलीविजन, ट्रांजिस्टर, फ्रिज सुधारना जरूर जानता हूं,’’ वह जीजा को समझाते हुए बोला. ‘‘फिर तो हमारे पड़ोस में दुकान ले लेते हैं. 5-10 किलोमीटर में एक भी दुकान नहीं है. खूब चलेगी,’’ जीजा हंसते हुए बोला.

अगले दिन सुबह घर से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर बंद पड़ी दुकान उसे सौंपी गई, तो दिनभर में उसे सुधार कर दुकान की शक्ल दे दी. जरूरी सामान का इंतजाम किया गया. पहले दिन वह 5 सौ रुपए कमा कर लाया, तो बहुत खुश था. जीजा भी उस के काम से खुश था. वह उसे खुद घर छोड़ने आया था.

‘‘अम्मां, यह तो कुशल कारीगर है. देखो, आज ही इस ने 5 सौ रुपए कमा लिए. अब तक यह 4 और्डर पा चुका है,’’ जीजा जोश में बोल रहा था. ‘‘अब बेटा आ गया है न, मेरी सारी गरीबी दूर हो जाएगी,’’ अम्मां तकरीबन रोते हुए कह रही थीं. ‘‘रो मत अम्मां. मैं सब ठीक कर लूंगा,’’ वह पहली बार बोला था.

रात को खाना खाने के बाद जब वह बिस्तर पर सोने पहुंचा, तो पत्नी खुशी से भरी थी, ‘‘अरे, आप तो बहुत ही कुशल कारीगर निकले,’’ वह चुहल करते हुए पूछ रही थी. ‘‘कुछ नहीं. बस यों ही थोड़ाबहुत जानता हूं.’’

सोते समय वह सोचने लगा, ‘अब तक मैं चोरउचक्का था. गंदे काम से पैसे कमाने वाला. अब मैं मेहनत से पैसा कमाऊंगा और परिवार का पेट भरूंगा,’ इतना सोचतेसोचते उस ने पत्नी के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और बोला, ‘‘मैं तुम्हें अब कभी नहीं छोड़ूंगा… कभी नहीं.’’ इतना कहते ही उसे सुख की नींद आने लगी. सच कहें, तो इस सजा में भी मजा था. Story in Hindi

Family Story : अदलाबदली – क्यों था झगड़ा चौकोर जमीन का?

Family Story. जब से गांव की कच्ची सड़क को हाईवे से जोड़ने की बात छिड़ी है, कारू के घर में कुहराम मच गया. उस की पत्नी को लगा कि जेठजी की जमीन के ज्यादा दाम मिलेंगे, जबकि जमीन का बंटवारा कारू के मनमुताबिक हुआ था. कारू इस बवाल से परेशान हो गया था. क्या उस का बड़ा भाई ललन इस समस्या का हल निकाल पाया?

ललन और कारू 2 भाई अपने परिवार के साथ पुश्तैनी जमीन पर अपनेअपने हिस्से में रह रहे थे. दोनों भाइयों की आपस में कभीकभार 2-4 बातें हो जाया करती थीं, पर दोनों की पत्नियां एकदूसरे को फूटी आंख न सुहाती थीं. अब तो एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया था, जिस से आएदिन हीलहुज्जत तय थी.

पहले जमीन के आगे कच्चा रास्ता हुआ करता था, पर जब से उसे नैशनल हाईवे से उसे पक्की सड़क बना कर जोड़े जाने की खबर उड़ी है, तब से छोटे भाई कारू के घर अकसर चिकचिक होती रहती थी.

सड़क बनने के सिलसिले में कुछ लोगों की जमीन उस हिस्से में पड़ रही थी. कारू की 4 हाथ और ललन की कुछ ज्यादा ही जमीन थी.

जाहिर था कि सरकार की तरफ से पैसा भी उसी हिसाब से मिलना था. कारू की पत्नी को लग रहा था कि उस के साथ गलत हुआ है. ललन को पहले से ही मालूम था कि भविष्य में इधर से बड़ी सड़क गुजरेगी, तभी उस ने आसानी से हर बात मान ली थी.

कारू तो हमेशा से शहर में रहता रहा था. उसे गांव का कुछ खास अतापता भी तो न था. बारबार उस के दिमाग में एक ही विचार कौंध रहा था कि आखिर कोई सामने की जगह छोड़ कर तिरछा हिस्सा क्यों लेना चाहेगा, जैसा कि ललन ने किया था?

गांव वालों के सामने सब की रजामंदी से 2 हिस्से हुए थे. ललन ने तो छोटे भाई की मरजी पर ही छोड़ दिया. जिधर तुम्हें चाहिए वह ले लो. सब ने ललन की दरियादिली पर उस की तारीफ भी की थी.

‘‘आखिर ललन ने राम की मिसाल पेश कर दी, वरना कौन इस तरह किसी की मरजी पर छोड़ता है आज के कलयुगी जमाने में.’’

कारू की पत्नी झट से बोल पड़ी थी, ‘‘मुझे तो सामने का ही हिस्सा चाहिए…’’ चौकोर जमीन उस की आंखों में तैर रही थी. ललन ने बस इतना ही कहा था, ‘‘भाई, जमीन 2 हिस्सों में बंटी है, हमारे दिल नहीं बंटने चाहिए.’’

कारू की पत्नी बहुत खुश थी, पर आज वह अपने ही फैसले पर सिर फोड़ रही थी. हर वक्त बुराभला कहती रहती. ‘‘आज जो तुम ने बात नहीं की, तो मेरा मरा मुंह देखना. आखिरी बार कहे देती हूं तुम्हें…’’

वह कारू को कहती, ‘‘जाओ, अपने बड़े भाई से कहो कि यह 4 हाथ जमीन भी ले ले. हमें तो जानबूझ कर ठगा गया है. आज हमारे पास भी ज्यादा जमीन होती, तो ज्यादा पैसे मिलते.’’

वह भी चिढ़ कर कह देता, ‘‘भैया ने कोई जोरजबरदस्ती नहीं की थी. तुम ने ही आगे बढ़ कर कहा था. जो चाहा वह मिला. यह उन का नसीब है कि उन की जमीन रास्ते में जाएगी. मैं नहीं जाता कहने, तुम्हें जो करना है करो.’’ कारू किस मुंह से बड़े भाई को कहता. ललन ने उसे ही तो फैसले का हक दिया था.

कारू को अपनी पत्नी पर बहुत गुस्सा आ रहा था. खुद ही तो आगे बढ़ कर बोली थी और आज घर में कुहराम मचा रखा है. 2 दिन से खानापीना सब पर आफत छाई थी. बच्चे बाहर से कुछकुछ ला कर खा रहे थे. कारू भी कल सुबह से जो गया देर शाम होने को आया, वह घर नहीं लौटा था.

न जाने क्यों ललन का मन बेचैन हो रहा था. खून के रिश्ते जब तक गाढ़े रहते हैं तो सुखदुख का भी भान होता है. आज उसे कारू की चिंता सता रही थी. कुछ तो बात है. इतना सन्नाटा कि कोई आवाज भी नहीं. धड़कते दिल से बच्चों को आवाज लगाई.

मालूम चला कि पिछले 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जल रहा है, खाना नहीं बन रहा है और कारू भी घर नहीं आया. अब तो पक्का यकीन हो गया था कि कुछ तो गड़बड़ है. पर क्या…?

ललन ने टौर्च उठाई और हर ठिकाने पर जाजा कर ढूंढ़ता रहा, लोगों से पूछता रहा, ‘‘किसी ने कारू को देखा है क्या?’’ कहीं कोई खाबर नहीं थी. मन में तरहतरह के खयाल हिलोरें मार रहे थे. आखिर गया तो कहां गया?

तभी किसी ने बताया कि कारू को गांव के बाहर बने देवस्थान के चबूतरे पर लेटे हुए देखा था, जहां कभी किसी खास मौके पर लोग जाते थे. ललन दौड़ कर उस ओर आवाज लगाता हुआ गया.

‘‘कारू, यह क्या भाई… तू यहां क्यों लेटा है? बच्चों से मालूम चला कि कल सुबह से ही घर से निकले हो तुम. ऐसा कोई करता है भला. 2-4 बातें पतिपत्नी में हो भी गईं तो क्या हुआ. सब ठीक हो जाएगा. चलो मेरे साथ… गांव वाले क्या कहेंगे…’’

‘‘घर… कौन सा घर भैया… जहां पत्नी मेरे सिर पर तांडव करती है. सब तो उस का ही कियाधरा है, फिर भी आएदिन के झगड़ों से परेशान हो गया हूं. घर में मैं सो नहीं पा रहा हूं. यहां काफी अच्छी नींद आई.’’

‘‘इस तरह की बहकीबहकी बातें मत करो. चलो मेरे साथ. क्या बात है, मुझे बताओ… बच्चों से पूछना अच्छा नहीं लगता. तुम ही बता दो अब. मुझे बड़ा भाई मानते हो तो…’’ ‘‘भैया… मानूंगा क्यों नहीं. हमेशा मेरे लिए आप खड़े रहे. आप ने कितने त्याग किए हैं, मुझ से ज्यादा और कौन जान सकता है…’’ और वह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा.

ललन कारू के सिर पर हाथ फिराते हुए बोला, ‘‘बोल न, बात क्या है, जिस ने तुझे इतना परेशान कर रखा है?’’ ‘‘भैया, वह कहती है कि वह 4 हाथ जमीन भी आप ही ले लें, जो सड़क बनने में जा रही है. आप की ज्यादा जमीन गई है, तो पैसे भी आप को ज्यादा मिलेंगे. आप ने जानबूझ कर पीछे की तरफ की जमीन ली थी. यही झगड़े की वजह है.’’

‘‘ठीक है… तो एक काम करते हैं कि अपनीअपनी जगह बदल लेते हैं, तब तो कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. तुम मेरे हिस्से की और मैं तुम्हारे हिस्से की जमीन ले लेता हूं. चलो, चल कर घर में बात कर लो.’’

‘‘पर भैया, क्या भाभी कुछ नहीं बोलेंगी?’’ ‘‘वह बाद में देख लेंगे. पहले अपनी पत्नी से बात तो करो. सब हल निकल जाएगा.’’ कारू ने अपनी पत्नी के सामने यह प्रस्ताव रखा. इस बार ललन की पत्नी ने भी कुछ बोलना चाहा, पर सारी बात समझाने पर वह चुप ही रही.

इधर कारू ने अपनी पत्नी से सारी बात कही. पहले तो वह सुन कर बहुत खुश हुई, लेकिन जब दिमाग लगाया तो उस की गणना ही उसे ठेंगा दिखाती मिली.

ललन की जमीन हमेशा दबंगों की नजर में खटकती रहती, पर ललन की भलमनसाहत और अच्छा स्वभाव उन्हें हर बार रोक लेता था. सरकार जमीन ले रही थी तो एवज में पैसे भी दे रही थी, जिस से वह कहीं दूसरी जमीन खरीद सकता था.

यह बात कारू की पत्नी को पता थी कि उस के स्वभाव के चलते उस की गांव में अच्छी इमेज नहीं थी. कोई साथ भी नहीं देगा. आखिर में उस ने चुप रहना ही बेहतर समझ.

कारू के पूछने पर उस ने कहा, ‘‘जो जिसे मिला वही ठीक है. मेरे 4 हाथ तो 4 हाथ ही सही, मुझे अदलाबदली नहीं करनी.’’

अब दोनों भाइयों के चेहरे पर सुकून आ गया था. Family Story

Family Story : आखिर क्यों ?

Family Story. जैसे ही खाला ने अम्मी के कान भरे वे अपने बेटे की दूसरी शादी कराने पर आमादा हो गईं. इस राह में सब से बड़ा रोड़ा इन की बहू थी. मांबेटे ने एक प्लान बनाया. क्या वे दोनों कामयाब रहे?

‘‘फूफी जान… फूफी जान… अम्मी नहीं आईं क्या?’’ बुखार से तपते सुहेल ने फरजाना से पूछा. ‘‘अम्मी आ जाएंगी… मैं तो हूं न…’’ फरजाना सुहेल के माथे पर पानी से भीगा कपड़ा रखते हुए बोली.

‘‘फूफी जान, अम्मी कहां गई हैं? बताओ न? क्या मेरी अम्मी भी नीशू की अम्मी के जैसे अब कभी लौट कर नहीं आएंगी?’’ मासूम सुहेल ने धीरे से अपनी आंखें खोलते हुए फरजाना से दोबारा पूछा.

सुहेल की बात सुन कर फरजाना खामोश हो गई. आयशा उस के पड़ोस में ही रहती थी. वह उसे ‘अप्पी कहती थी. आयशा खूबसूरत ही नहीं, जहीन भी थी. सिलाईकढ़ाई हो या घर का काम, सभी में माहिर थी वह. उस की ग्रेजुएशन भी पूरी हो चुकी थी और स्वभाव ऐसा कि कुछ ही वक्त में किसी को भी अपना बना ले.

फरजाना को याद है कि आयशा के रिश्ते के लिए उस के परिवार को ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ी थी. जल्द ही उस के लिए एक बेहतर रिश्ता आ गया था. लड़का समीर एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था और परिवार भी पढ़ालिखा था. और फिर धूमधाम और हंसीखुशी के साथ आयशा अप्पी का निकाह समीर से हो गया.

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आयशा के पापा को यकीन था कि उन की पढ़ीलिखी और कामकाजी बेटी को बहू के रूप में पा कर ससुराल वाले बहुत ही खुश होंगे, लेकिन फिर भी उन्होंने आयशा को भरपूर दहेज दिया था.

लेकिन निकाह के कुछ दिनों के बाद ही आयशा अप्पी को दहेज के लिए परेशान किया जाने लगा. शादी के 2 साल बीत गए थे और आयशा अप्पी की गोद में नीशू आ गया, लेकिन उस के बावजूद अभी तक आयशा अप्पी की ससुराल वालों ने उन्हें नहीं अपनाया था.

एक दिन रहमान चाचा बता रहे थे कि आयशा का रिश्ता उन्होंने पढ़ालिखा घरबार देख कर किया था कि पढ़ीलिखी और सलीकेमंद बहू पा कर वे लोग खुश होंगे, लेकिन वहां तो सबकुछ पैसा ही अहमियत रखता है. आज फिर फोन आया है कि 2 लाख रुपए उन को भेजें, लेकिन उन के पास तो अब कुछ बचा भी नहीं है.

फरजाना को यकीन था कि नीशू के आ जाने के बाद अब जल्द ही आयशा अप्पी को उस की ससुराल वाले अपना लेंगे, लेकिन कुछ दिनों के बाद ही आयशा की ससुराल से फोन आया कि सिलैंडर लीक होने की वजह से उस के कपड़ो में आग लग गई, जिस से वह गंभीर रूप से ?ालस गई और फिर अस्पताल में उस की मौत हो गई. यह सुन कर वह अंदर तक कांप गई थी.

लेकिन जब फरजाना को पता चला कि आयशा अप्पी ने मरने से पहले बयान दिया था कि उस के कपड़ों में आग लगने की वजह से ही वह जल गई थी, क्योंकि अप्पी को सम?ा दिया गया था कि अगर उस ने बता दिया कि तुम्हारे साथ हम ने ऐसा किया है और हम लोग जेल चले गए, तो उस के मासूम नीशू को कौन संभालेगा?

ममता के मोह में बेचारी आयशा अपने हत्यारों के खिलाफ मुंह भी न खोल सकी थी और उस के हत्यारे जेल जाने से बच गए थे.

यह जान कर फरजाना का खून खौल उठा था. वह सोच रही थी कि आयशा अप्पी के हत्यारों को सजा जरूर मिलनी चाहिए थी.

मासूम नीशू को उस के नानानानी घर ले आए और उन को किसी ने रोकने की कोशिश भी नहीं की थी. फिर कुछ दिनों के बाद ही समीर के घर वालों ने उस का दूसरा निकाह भी करवा दिया.

यह देख कर फरजाना समझ गई कि वे लोग आयशा अप्पी की मौत का इंतजार ही कर रहे थे कि वह मरे तो वे अपने बेटे का दूसरा निकाह कर दें.

फरजाना हैरान थी कि आज भी लोग लड़कियों को बो?ा ही सम?ाते हैं. सब को पता है कि वे लोग आयशा अप्पी के हत्यारे हैं, लेकिन उस के बावजूद लोग अपनी बेटियों का निकाह ऐसे लोगों के घर में कर देते हैं.

‘‘फूफी जान, अम्मी आ जाएंगी?’’ सुहेल की आवाज सुनते ही फरजाना खयालों से फारिग हो कर एक बार फिर हकीकत में आ गई. ‘‘हां, बिलकुल आ जाएंगी. अपने प्यारे बेटे को छोड़ कर वे कहीं जा सकती हैं भला,’’ बहुत ही प्यार से सुहेल को समझाते  हुए फरजाना बोली.

‘‘फरजाना, अब सुहेल की तबीयत कैसी है?’’ अम्मी ने कमरे में आते हुए पूछा. ‘‘दवा पिला दी है, लेकिन बुखार अभी तेज है,’’ फरजाना धीरे से बोली. ‘‘दादी, अम्मी कब आएंगी?’’ बहुत ही मासूमियत से सुहेल ने दादी से पूछा. ‘‘अरे, आ जाएंगी अम्मी, पहले तुम ठीक तो हो जाओ,’’ फरजाना ने एक बार फिर प्यार से समझाते हुए धीरे से सुहेल से कहा.

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फरजाना को मालूम था कि सुहेल के इस सवाल पर अम्मी भाभी के लिए जरूर उलटासीधा बोलना शूरू कर देंगी, जो सुहेल के कोमल मन पर गलत असर ही डालेगा.

‘‘इस लड़के ने तो नाक में दम कर के रखा हुआ है. हर वक्त अम्मीअम्मी की रट लगाए रहता है,’’ अम्मी झुन्झला  कर बोलीं.

‘‘चुप रहो अम्मा… क्यों तुम इस मासूम की जान लेने पर तुली हो. अगर इस से इतनी ही परेशानी है तो इसे रोका क्यों, इसे भी भाभी के साथ भेज देतीं,’’ फरजाना कुछ तीखे लहजे में बोली.

‘‘तू बहुत ही हमदर्द बन रही है अपनी भाभी की. ऐसा लग रहा है कि हम कुछ नहीं, सबकुछ वह करमजली ही है,’’ गुस्से से बड़बड़ाती हुई अम्मी कमरे से बाहर चली गईं.

फरजाना कुछ नहीं बोली, चुपचाप सुहेल के माथे पर पानी से पट्टी करती रही. कितनी हैरानी की बात है कि कहां वह आयशा अप्पी की ससुराल वालों के बारे सोच रही थी कि कैसे लोग हैं वे, लेकिन यहां तो उस के घर वाले भी दहेज के लोभी बन चुके हैं.

पहले कितना सुकून था घर में. चारों ओर खुशियां ही खुशियां थीं. घर पर केवल अम्मी, वह और भाईभाभी थे. भाईजान सुबह दुकान चले जाते और वह कालेज. घर पर केवल भाभी और अम्मी रह जातीं. भाभी घर का काम करती रहतीं और अम्मी सुहेल को बाहर घुमाने चली जातीं.

भाभी फरजाना के लिए भाभी कम बड़ी बहन ज्यादा थीं. वह कालेज से आ कर खाली समय में भाभी की घर के कामों में मदद करती और बाकी समय में वह भाभी से कुछ न कुछ सीखती रहती. उन्हीं की बदौलत वह सिलाईकढ़ाई से ले कर बेहतर खाना बनाना भी सीख गई थी.

लेकिन जब से फरजाना की खाला घर पर आने लगी थी, तभी से उस के घर का सुकून छिन गया था. एक दिन वह घर पर अम्मी के साथ बैठी हुई थी, तभी घर पर खाला आ गई.

‘‘रुखसाना, तुम्हें पता है कि तरीकुन के लड़के जुबेर की शादी में लड़की वालों ने बहुत ज्यादा दहेज दिया है कि उन के घर में भी नहीं आ पा रहा है और बाइक के साथसाथ कार भी मिली है. लेकिन रुखसाना, तुम तो ठग गई. बताओ, मेरे भांजे को तुम ने सस्ते में ही निबटा दिया. बहू तो एक बाइक तक नहीं ला पाई,’’ कह कर खाला चली गई, लेकिन उस ने यह सब कह कर जैसे शांत अपनी में कंकड़ मार दिया था और घर का सुकून कहीं खो गया था.

उस के बाद से फरजाना की अम्मी के मन में यह बैठ गया था कि रेहान भाईजान के निकाह में वे ठगी गई हैं और वे बिलकुल बदल गईं. वे अब भाभी को बातबात पर बेइज्जत करने लगी थीं. दिनभर भाभी की तारीफ करते न थकने वाली अम्मी अब बातबात पर भाभी के काम में कमी निकालने लगी थीं.

फरजाना को बहुत हैरानी हो रही थी कि हर रिश्ता अब पैसों से तोला जाने लगा है. यह वही खाला थी जिस ने भाईजान के बीमार हो जाने पर हजार रुपए देने से साफ इनकार कर दिया था, जबकि उस के खालू का इतना अच्छा बिजनैस चल रहा है. तब अब्बू के दोस्त लक्ष्मी अंकल ने अम्मी को भाईजान के इलाज के लिए रुपए दिए थे.

लक्ष्मी अंकल अब्बू के बहुत ही पुराने दोस्त थे. पहले अब्बू और अंकल एकसाथ मिल कर ही मेलों में दुकानें लगाते थे, जिस से उन में आपस में दोस्ती बढ़ती गई. अब्बू के इंतकाल के बाद लक्ष्मी अंकल को काफी सदमा पहुंचा था.

थोड़ी सी खेती की जमीन थी जिस से खाने भर का अनाज पैदा हो जाता था और अम्मी घर पर ही सिलाई करने लगी थीं, जिस से दूसरे खर्चे निकल जाते थे. उन के घर के हालात खराब होते ही सभी नातेरिश्तेदार न जाने कहां गायब हो गए थे.

रेहान भाईजान पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन आमदनी का कोई नजरिया न होने पर उन्होंने कपड़े की एक दुकान कर ली. पैसे कम पड़े तो अम्मी ने बचीखुची जमीन बेच दी थी. भाईजान की दुकान होते ही काम अच्छा चलने लगा, जिस से सबकुछ सही हो गया. घर के हालात सही होते ही सभी रिश्तेदारी दोबारा जुड़ने लगे थे.

कुछ दिनों के बाद ही भाईजान की शादी कर दी गई और शबनम के रूप में भाभी फरजाना के घर आ गईं. शबनम भाभी के अब्बू ने अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा दहेज दिया था. पहले तो अम्मी को दहेज के कम ज्यादा से कोई मतलब नहीं था, लेकिन जब से खाला आने लगी थी तभी से अम्मी के मन में जहर का बीज पलने लगा था.

‘‘रेहान, तुम्हारे ससुर ने तो तुम से कहा था कि वह तुम को बाइक देंगे, लेकिन अभी तक उन्होंने बाइक नहीं दी. तुम अब उन से कहो कि वे बाइक के बदले एक लाख रुपए दे दें,’’ अम्मी रेहान से बोलीं.

‘‘लेकिन अम्मी, शादी में तो अब्बू ने अपनी औकात से ज्यादा ही उस को दहेज दिया था, जिस के चलते उन्हें घर की कुछ जमीन भी बेचना पड़ी थी. अब वे कहां से लाएंगे इतने रुपए,’’ शबनम भाभी ने हैरानी से धीरे से अम्मी से कहा. ‘‘तो हम क्या करें. हम ने क्या ठेका ले रखा है कि वे कहां से रुपए देंगे,’’ अम्मी गुस्से से बोलीं.

अम्मी की बात सुन कर भाभी खामोश हो गई. उस दिन के बाद से भाईजान के दिमाग पर एक लाख रुपए या फिर बाइक की बात दिमाग में बैठ गई. अब वे आएदिन भाभी से कहने लगे थे कि वह अपने अब्बू से कह कर रुपए मंगवाए, जिस के बाद से जैसे भाभी की जिंदगी जहन्नुम बन गई.

‘‘अम्मी, क्यों भाभी को परेशान करती हो…’’ फरजाना ने अम्मी से कहा था. ‘‘तुम्हें कुछ नहीं मालूम. यह सब चलता रहता है,’’ अम्मी ने फरजाना को समझाया था. ‘‘रेहान, शबनम को रुपए लाने के लिए उस के मायके भेज दो,’’ एक दिन अम्मी ने भाईजान से कहा और दूसरे दिन भाईजान ने भाभी को घर जा कर रुपए लाने के लिए बोल दिया.

मजबूरी में भाभी अपने घर जाने लगीं. तब अम्मी ने सुहेल को गोद में यह कह कर ले लिया कि वह सुहेल को नहीं जाने देंगी… तुम पहले पैसे ले कर आओ.

सुहेल अपनी अम्मी के लिए बिलखता रहा था. आज 2 दिन हो गए थे, लेकिन भाभी अभी तक नहीं आईं. इस वजह से सुहेल को बुखार आ रहा था. तभी बाहर उसे खाला की आवाज सुनाई दी. खाला की आवाज सुन कर फरजाना एक बार फिर यादों के भंवर से बाहर आ गई. उस ने सुहेल को छू कर देखा, बुखार थोड़ा हलका हो गया था.

फरजाना कमरे से बाहर आई. उस ने देखा कि खाला अम्मी के पास बैठी हुई थी. उसे मालूम था कि आज फिर खाला अम्मी के दिमाग में कुछ जहर बोने आई होगी. ‘‘बताओ… रेहान के लिए कितना अच्छा रिश्ता है.चारपहिया गाड़ी देने की बात कर रहे थे, लेकिन अफसोस मुझे उन्हें मना करना पड़ा. अगर बहू न होती तो…’’ खाला जानबूझ  कर बात अधूरी छोड़ कर वहां से चली गई.

‘‘इस से तो छुटकरा पाना ही होगा. अब रेहान का निकाह बड़े घर में करेंगे,’’ फरजाना ने कुछ ही देर में अम्मी को भाईजान से कहते सुना. ‘‘अम्मी, क्या तुम भाभी को मार दोगी?’’ फरजाना ने अम्मी के पास जा कर डर से सिहरते हुए पूछा.

‘‘देख, अब रेहान का दूसरा निकाह तो करना ही है. वैसे भी आजकल बहुओं की जल कर बहुत मौतें हो रही हैं,’’ अम्मी ने फरजाना से कहा. ‘‘क्या तुम पैसों के लिए भाभी की हत्या करोगी?’’ डर से सिहरते हुए फरजाना अम्मी से बोली. ‘‘आजकल पैसों से सारे गुनाह धुल जाते हैं,’’ अम्मी दो टूक उस से बोलीं और वहां से चली गईं. ‘‘तभी बाहर दरवाजे की डोरबैल बजी. फरजाना ने दरवाजा खोला. सामने भाभी खड़ी थीं.

भाभी फरजाना से बोले बिना चुपचाप अंदर आ कर सुहेल के पास चली गईं. भाभी को खाली हाथ देख कर फरजाना समझ  गई कि रुपयों का इंतजाम नहीं हो सका था. उस ने एक झलक अम्मी को देखा, जिन की आंखें गुस्से से लाल हो रही थीं. तभी उन्होंने भाईजान को बुलाया और उन से धीरेधीरे कुछ बात करने लगीं.

अम्मी को बातें करते देख कर अचानक फरजाना का दिल तेज धड़कने लगा. ‘‘भाभी, आज आप सुहेल को ले कर मेरे कमरे में सो जाना. मुझे  देर तक पढ़ाई करनी है और मेरे कमरे की लाइट कम लग रही है,’’ फरजाना ने कमरे में जा कर भाभी से कहा. ‘‘ठीक है जैसे तुम कहो,’’ भाभी धीरे से फरजाना से बोलीं और सुहेल को ले कर उस के कमरे में चली गईं.

फरजाना ने देखा कि भाभी के चेहरे की रंगत उड़ गई थी. हंसताखिलखिलाता हुआ चेहरा पूरी तरह से कुम्हला चुका था. यह देख कर अनायास ही उस की आंखो में आंसू आ गए.

फरजाना ने कमरे की लाइट बंद की और वह निढाल हो कर बिस्तर पर लेट गई. आज उस का दिल किसी अनहोनी के डर से घिरा हुआ था.आज उस की आंखो से नींद कोसों दूर थी. वह सोच रही थी कि अगर खाला ने उस की अम्मी के मन में जहर का बीज नहीं बोया होता तो आज भी उस का पूरा परिवार हंसीखुशी रह रहा होता.

तभी अचानक फरजाना पर पानी जैसा कुछ पड़ा. वह चौंक गई. उस के नथुनों में अजीब सी गंध समाई. फरजाना ने देखा कि सामने अम्मी और भाईजान थे. भाईजान के हाथ में बड़ी प्लास्टिक की बोतल थी. वह कुछ समझती उस से पहले ही उस पर जलती हुई कोई चीज गिरी और फिर आग भड़क उठी.

तेज जलन की वजह से फरजाना चीखनेचिल्लाने लगी. उस की आवाज सुन कर अम्मी और भाईजान चौंक गए. तेज आग की रोशनी होते ही सामने बहू की जगह फरजाना को जलता देख कर वे दोनों घबरा गए और आग बुझाने की कोशिश करने लगे.  फरजाना की चीखपुकार सुन कर भाभी भी वहां आ गईं और वहां का नजारा देख कर वे कांप गईं.

‘‘अम्मी, जो तुम भाभी के साथ करना चाहती थीं वहीं कल मेरे साथ भी होना था, क्योंकि जो बच्चों के मांबाप करते हैं वही बच्चों को भुगतना ही पड़ता है. इस से बेहतर था कि मैं भाभी की जान बचा लूं.” ‘‘आप लोगों ने यह भी नहीं सोचा कि आप की भी बेटी और बहन है, जिस को भी अपनी सुसराल जाना है और जैसा आप किसी दूसरे की बेटी के साथ कर रहे हैं अगर आप की बेटी के साथ भी वही हुआ तो क्या गुजरेगी आप लोगों पर, कभी सोचा है? आखिर क्यों नहीं सोचते आप लोग कि बहू भी बेटी है? आखिर क्यों?’’ फरजाना तेज जलन और दर्द से तड़पते हुए बोली और फिर धीरेधीरे उस की आंखें बंद होती चली गईं. Family Story

लेखक : फारूख हुसैन

Family Story in Hindi: एक भाई ऐसा भी

Family Story in Hindi. नौ शाद अपने 6 भाइयों में दूसरे नंबर पर था, जो शारीरिक रूप से तो कमजोर था ही, मानसिक रूप से भी अपने बाकी भाइयों के मुकाबले काफी कमजोर था. बचपन से ले कर बुढ़ापे तक उस ने अपना सबकुछ अपने भाइयों और उन के बच्चों पर कुरबान कर दिया, पर जब आज उस की बीवी नजमा की मौत हो गई, तो उस के भाइयों ने उसे एक वक्त का खाना भी देना गवारा न समझ. उसे ऐसे झिड़क कर भगा दिया मानो वह कोई भिखारी हो. पर नौशाद का दिल इतना बड़ा था कि उसे उन की इन बातों का बुरा नहीं लगा और वह उन के छोटेछोटे मासूम बच्चों को अपनी औलाद की तरह घुमाताफिराता, खिलाता और अपनी जमापूंजी उन पर लुटाता रहा.

नौशाद अपने भाइयों के साथ बिजनौर जिले के नगीना शहर में रहता था. घर की माली हालत काफी कमजोर थी. नौशाद की अम्मी की मौत के बाद उस के अब्बा काफी टूट गए थे. अब उन का कामकाज में मन नहीं लगता था.

नौशाद की उम्र उस समय महज 14 साल थी, जब उस ने मजदूरी कर के अपने घर का सारा खर्चा तो उठाया ही, साथ ही अपने बड़े भाई और छोटे भाइयों की पढ़ाई का भी ध्यान रखा.

वक्त गुजरता गया. नौशाद अपने भाइयों को पढ़ाता रहा. मेहनतमजदूरी कर के घर में खानेपीने का सारा इंतजाम नौशाद की कमाई से चलता रहा.

नौशाद अपने भाइयों पर जान छिड़कता था और उन सब को कामयाब इनसान बनाने के लिए जीतोड़ मेहनत करता था. उस ने जैसेतैसे खुद भी इंटर पास कर लिया था.

नौशाद के बड़े भाई आरिफ का बीएएमएस में एडमिशन हो गया और वे पढ़ने के लिए जयपुर चले गए. उस से छोटा भाई जुबैर डीएमएलटी करने दिल्ली चला गया. उस से छोटा भाई शान का मन पढ़ाई में न लगा तो वह रोजगार की तलाश में मुंबई निकल गया. बाकी 2 भाई अभी नगीना में रह कर पढ़ाई कर रहे थे.

बड़े भाई आरिफ की अभी पढ़ाई पूरी भी नहीं हुई थी कि उन की शादी हो गई. कमाई का कोई जरीया नहीं था, जिस से घर में काफी दिक्कतें आ रही थीं, पर नौशाद जीतोड़ मेहनत कर के घर के खर्चे पूरे कर रहा था.

वक्त के साथसाथ बड़े भाई आरिफ डाक्टर बन गए और नौशाद से छोटा भाई जुबैर अपना कोर्स पूरा कर के मुरादाबाद में नौकरी करने लगा.

2 भाइयों के कामयाब होने के बाद नौशाद ने चैन की सांस ली और अब नौशाद ने अपना भी निकाह कर लिया. बचपन से जीतोड़ मेहनत कर के आधी खुराक में जिंदगी गुजारतेगुजारते वह काफी कमजोर हो गया था. वक्त के साथसाथ सब भाई कामयाब हो गए और सब की शादी भी हो गई. वे सब अच्छी तरह जिंदगी गुजारने लगे.

सभी भाई शादी के बाद अपनीअपनी बीवियों के साथ जिंदगी गुजार रहे थे. किसी ने भी कभी यह नहीं सोचा कि जिस भाई ने उन के लिए इतना बलिदान किया है, उस के क्या हाल हैं.

घर के ज्यादातर हिस्सों पर नौशाद के बाकी भाइयों का कब्जा था, जबकि नौशाद के हिस्से में नाममात्र के लिए एक कमरा ही था और उस में भी और भाइयों के दहेज का सामान रखा रहता या मोटरसाइकिल खड़ी रहती, जिस से नौशाद और उस की बीवी को काफी दिक्कत होती, पर वे कभी कुछ न बोलते थे.

नौशाद अब काफी कमजोर हो चुका था. वक्त की मार ने उसे वक्त से पहले ही बूढ़ा बना दिया था. जैसेतैसे वह अपना और अपनी बीवी का खर्चा उठा रहा था. कभीकभी उसे और उस की बीवी को भूखे ही रहना पड़ता था, क्योंकि कमजोरी के चलते वह अब काम भी नहीं कर पाता था.

इस गरीबी के चलते नौशाद की बीवी भी बीमार रहने लगी और जल्द ही उस ने चारपाई पकड़ ली. अब नौशाद का ज्यादा वक्त अपनी बीवी की देखभाल और घर के कामकाज में बीतने लगा.

नौशाद के अब्बा का पुश्तैनी बाग था, जो अब बेच दिया गया, पर उस का सारा पैसा नौशाद के भाइयों के हाथों में ही सिमट कर रह गया और उन्होंने उस के हिस्से के पैसे भी अपने घर और दुकान बनाने में लगा लिए.

नौशाद के हिस्से में तकरीबन 7 लाख रुपए आए, पर उसे वह पैसा मिलना तो दूर देखना भी गवारा न हुआ. जब भी नौशाद अपने भाइयों से पैसे मांगता, तो वे कोई न कोई बहाना बना कर अपना पीछा छुड़ा लेते और कहते कि ‘तुम्हें क्या पैसे की जरूरत? न तुम्हारे कोई औलाद है, न तुम्हारा कोई खर्चा है.’

भाइयों का यह जवाब सुन कर नौशाद मन मार कर रह जाता. फिर नौशाद ने जब अपने पैसे पाने के लिए अपने अब्बा से अपने भाइयों पर जोर देने को कहा, तो उन्होंने उन से बात की और नौशाद के पैसे देने के लिए कहा.

वक्त बदल चुका था. नौशाद के अब्बा अब बूढ़े हो चुके थे और औलाद काबिल बन चुकी थी. उन्होंने अपने अब्बा की कोई बात नहीं सुनी और कह दिया कि ‘अभी हमारे पास पैसा नहीं है, जब होगा, तब दे देंगे’.

नौशाद की माली हालत काफी खराब हो गई थी. उस के अब्बा ने अपनी औलादों से नौशाद का खयाल रखने और उस का पैसा देने के लिए कहा, तो वे बड़ी मुश्किल से इस बात पर राजी हुए कि ‘हम उसे इकट्ठा पैसा तो नहीं देंगे, हां 50 रुपए रोजाना दे दिया करेंगे’.

अब नौशाद को खर्चे के लिए 50 रुपए मिलने लगे. उस की बीवी की तबीयत खराब रहती थी. उन पैसों से वह घर चलाए या अपनी बीवी का इलाज कराए, उस की समझ में नहीं आ रहा था. एक भाई 50 रुपए दे रहा था, जबकि बाकी भाई बोले कि ‘जब हमारे पास होंगे दे देंगे. अभी हमारे पास पैसा नहीं है’. नौशाद घंटों उन के घर पैसे के लिए एक भिखारी की तरह पड़ा रहता.

आज अपने हिस्से के पैसे लेने के लिए नौशाद भिखारी की तरह हाथ फैलाता, पर उसे कभी पैसे मिलते, तो कभी ?िड़क कर भगा दिया जाता.

कुछ ही महीनों में उस की बीवी की तबीयत ज्यादा खराब होने की वजह से वह इस दुनिया से चल बसी.

अब नौशाद तनहा हो कर रह गया. अभी तक भाईभाभियों ने उस का साथ छोड़ा था, पर अब उस की बीवी भी उसे इस बेरहम दुनिया में अकेला छोड़ कर चली गई थी.

नौशाद खर्चे से पहले ही परेशान था और अब तो उस के भाइयों ने उसे पैसा देना बिलकुल बंद कर दिया था. वह उन से पैसे मांगता, तो वे बोलते कि ‘तुझे क्या पैसों की जरूरत? तेरे कौन से बीवीबच्चे हैं. हां, अगर तुझे खाना खाना है, तो यहां आ कर खा लेना और हमारे बच्चों का खयाल रखना.’

नौशाद अब दिनभर अपने भाइयों के बच्चों की देखभाल करता, उन्हें हर वक्त गोद मे टांगे फिरता और उन का खयाल अपने बच्चों की तरह रखता, तब जा कर उसे रूखासूखा कुछ खाने को मिलता. अगर कभी तबीयत खराब होने की वजह से वह बच्चों को नहीं ले जा पाता, तो उसे बुराभला कह कर भगा दिया जाता और उसे उस दिन भूखे ही रहना पड़ता.

नौशाद के भाई जुबैर की बीवी एक नेक औरत थी. वह जब भी गांव आती, नौशाद का खयाल रखती, उसे अच्छा खाना खिलाती और इज्जत भी करती. वैसे, जुबैर ने नौशाद का कोई हक नहीं मारा. बस वह गांव से दूर अपने परिवार के साथ रहता था. गांव आनाजाना कम था, जिस वजह से वह नौशाद की कोई खास मदद नहीं कर पाता था.

जब भी जुबैर की बीवी गांव आती, नौशाद के लिए कपड़े लाती, उसे अच्छे से अच्छा खाना खिलाती और कुछ पैसे भी दे कर जाती थी.

नौशाद का छोटा भाई शान तो मुंबई में ही शिफ्ट हो गया था. वह कभी गांव नहीं आता था. उस ने अपने भाई नौशाद का कोई पैसा नहीं खाया, पर उस की इतनी गलती तो थी ही कि कभी गांव आ कर अपने भाई के हालात नहीं देखे और न ही उस की कोई मदद की.

नौशाद ने परेशान हो कर एक दुकान पर नौकरी की. वहां से उसे इतना पैसा मिल जाता, जिस से उसे दो वक्त की रोटी मिल जाती थी.

नौशाद बड़ा ही कमअक्ल इनसान था. उसे जो पैसे मिलते, वह उन्हें अपने भाइयों के छोटेछोटे बच्चों को खिलाने मे खर्च कर देता और खुद भूखा रहता.

नौशाद की भाभी हमेशा उसे बेइज्जत करती रहती और दानेदाने को मुहताज बनने पर मजबूर करती रहती. नौशाद का दिल साफ था. वह कभी अपने ऊपर हुए ज़ुल्म को दिल में नहीं रखता था और तनमन से अपने परिवार की सेवा करता था. साथ ही, सब के बच्चों को एक आया की तरह हर वक्त देखता था.

नौशाद के भाई और भाभी उसे बेवकूफ समझ कर उस का मजाक बनाते और उस की विरासत में मिली दौलत

को लूट कर अपनेआप को अक्लमंद समझते. वे लोग क्या जानें भाई के रिश्ते को. उन्हें तो ढंग से भाई शब्द का मतलब भी नहीं मालूम.

ऐसा है एक भाई जो अपनी जानमाल से अपने परिवार वालों की खिदमत कर रहा है और उन के दुख को अपना दुख समझ कर अपनी जिंदगी उन पर कुरबान कर रहा है.

ऐसे भाई लाखों में एक होते हैं, जो परिवार के लिए अपना सबकुछ बलिदान कर देते हैं और ऐसे भाई भी लाखों हैं, जो अपने भाई का खून चूसने में पीछे नहीं हटते.Family Story in Hindi

शादी के बाद: क्या विकास को अपना पाई रजनी

रजनी को विकास जब देखने के लिए गया तो वह कमरे में मुश्किल से 15 मिनट भी नहीं बैठी. उस ने चाय का प्याला गटागट पिया और बाहर चली गई.

रजनी के मातापिता उस के व्यवहार से अवाक् रह गए. मां उस के पीछेपीछे आईं और पिता विकास का ध्यान बंटाने के लिए कनाडा के बारे में बातें करने लगे. यह तो अच्छा ही हुआ कि विकास कानपुर से अकेला ही दिल्ली आया था. अगर उस के घर का कोई बड़ाबूढ़ा उस के साथ होता तो रजनी का अभद्र व्यवहार उस से छिपा नहीं रहता. विकास तो रजनी को देख कर ऐसा मुग्ध हो गया था कि उसे इस व्यवहार से कुछ भी अटपटा नहीं लगा.

रजनी की मां ने उसे फटकारा, ‘‘इस तरह क्यों चली आई? वह बुरा मान गया तो? लगता है, लड़के को तू बहुत पसंद आई है.’’

‘‘मुझे नहीं करनी उस से शादी. बंदर सा चेहरा है. कितना साधारण व्यक्तित्व है. उस के साथ तो घूमनेफिरने में भी मुझे शर्म आएगी,’’ रजनी ने तुनक कर कहा.

‘‘मुझे तो उस में कोई खराबी नहीं दिखती. लड़कों का रूपरंग थोड़े ही देखा जाता है. उन की पढ़ाईलिखाई और नौकरी देखी जाती है. तुझे सारा जीवन कैनेडा में ऐश कराएगा. अच्छा खातापीता घरबार है,’’ मां ने समझाया, ‘‘चल, कुछ देर बैठ कर चली आना.’’

रजनी मान गई और वापस बैठक में आ गई.

‘‘इस की आंख में कीड़ा घुस गया था,’’ विकास की ओर रजनी की मां ने बरफी की प्लेट बढ़ाते हुए कहा.

रजनी ने भी मां की बात रख ली. वह दाएं हाथ की उंगली से अपनी आंख सहलाने लगी.

विकास ने दोपहर का खाना नहीं खाया. शाम की गाड़ी से उसे कानपुर जाना था. स्टेशन पर उसे छोड़ने रजनी के पिताजी गए. विकास ने उन्हें बताया कि उसे रजनी बेहद पसंद आई है. उस की ओर से वे हां ही समझें. शादी 15 दिन के अंदर ही करनी पड़ेगी, क्योंकि उस की छुट्टी के बस 3 हफ्ते ही शेष रह गए थे और दहेज की तनिक भी मांग नहीं होगी.

रजनी के पिता विकास को विदा कर के लौटे तो मन ही मन प्रसन्न तो बहुत थे परंतु उन्हें अपनी आजाद खयाल बेटी से डर भी लग रहा था कि पता नहीं वह मानेगी या नहीं.

पिछले 3 सालों में न जाने कितने लड़कों को उसे दिखाया. वह अत्यंत सुंदर थी, इसलिए पसंद तो वह हर लड़के को आई लेकिन बात हर जगह या तो दहेज के कारण नहीं बन पाई या फिर रजनी को ही लड़का पसंद नहीं आता था. उसे आकर्षक और अच्छी आय वाला पति चाहिए था. मातापिता समझा कर हार जाते थे, पर वह टस से मस न होती. उस रात वे काफी देर तक जागते रहे और रजनी के विषय में ही सोचते रहे कि अपनी जिद्दी बेटी को किस तरह सही रास्ते पर लाएं.

अगले दिन रात को तार वाले ने जगा दिया. रजनी के पिता तार ले कर अंदर आए. तार विकास के पिताजी का था. वे रिश्ते के लिए राजी थे. 2 दिन बाद परिवार के साथ ‘रोकने’ की रस्म करने के लिए दिल्ली आ रहे थे. रजनी ने सुन कर मुंह बिचका दिया. छोटे बच्चों को हाथ के इशारे से कमरे से जाने को कहा गया. अब कमरे में केवल रजनी और उस के मातापिता ही थे.

‘‘बेटी, मैं मानता हूं कि विकास बहुत सुंदर नहीं है पर देखो, कनाडा में कितनी अच्छी तरह बसा हुआ है. अच्छी नौकरी है. वहां उस का खुद का घर है. हम इतने सालों से परेशान हो रहे हैं, कहीं बात भी नहीं बन पाई अब तक. तू तो बहुत समझदार है. विकास के कपड़े देखे थे, कितने मामूली से थे. कनाडा में रह कर भी बिलकुल नहीं बदला. तू उस के लिए ढंग के कपड़े खरीदेगी तो आकर्षक लगने लगेगा,’’ पिता ने समझाया.

‘‘देख, आजकल के लड़के चाहते हैं सुंदर और कमाऊ लड़की. तेरे पास कोई ढंग की नौकरी होती तो शायद दहेज की मांग इतनी अधिक न होती. हम दहेज कहां से लाएं, तू अपने घर की माली हालत जानती ही है. लड़कों को मालूम है कि सुंदर लड़की की सुंदरता तो कुछ साल ही रहती है और कमाऊ लड़की तो सारा जीवन कमा कर घर भरती है,’’ मां ने भी बेटी को समझाने का भरसक प्रयास किया.

रजनी ने मातापिता की बात सुनी, पर कुछ बोली नहीं. 3 साल पहले उस ने एम.ए. तृतीय श्रेणी में पास किया था. कभी कोई ढंग की नौकरी ही नहीं मिल पाई थी. उस के साथ की 2-3 होशियार लड़कियां तो कालेजों में व्याख्याता के पद पर लगी हुई थीं. जिन आकर्षक युवकों को अपना जीवनसाथी बनाने का रजनी का विचार था वे नौकरीपेशा लड़कियों के साथ घर बसा चुके थे. शादी और नौकरी, दोनों ही दौड़ में वह पीछे रह गई थी.

‘‘देख, कनाडा में बसने की किस की इच्छा नहीं होती. सारे लोग तुझ को देख कर यहां ईर्ष्या करेंगे. तुम छोटे भाईबहनों के लिए भी कुछ कर पाओगी,’’ पिता ने कहा.

रजनी को अपने छोटे भाईबहनों से बहुत लगाव था. पिताजी अपनी सीमित आय में उन के लिए कुछ भी नहीं कर सकते थे. वह सोचने लगी, ‘अगर वह कनाडा चली गई तो उन के लिए बहुतकुछ कर सकती है, साथ ही विकास को भी बदल देगी. उस की वेशभूषा में तो परिवर्तन कर ही देगी.’ रजनी मां के गले लग गई, ‘‘मां, जैसी आप दोनों की इच्छा है, वैसा ही होगा.’’

रजनी के पिता तो खुशी से उछल ही पड़े. उन्होंने बेटी का माथा चूम लिया. आवाज दे कर छोटे बच्चों को बुला लिया. उस रात खुशी से कोई न सो पाया.

2 सप्ताह बाद रजनी और विकास की धूमधाम से शादी हो गई. 3-4 दिन बाद रजनी जब कानपुर से विकास के साथ दिल्ली वापस आई तब विकास उसे कनाडा के उच्चायोग ले गया और उस के कनाडा के आप्रवास की सारी काररवाई पूरी करवाई.

कनाडा जाने के 2 हफ्ते बाद ही विकास ने रजनी के पास 1 हजार डालर का चेक भेज दिया. बैंक में जब रजनी चेक के भुगतान के लिए गई तो उस ने अपने नाम का खाता खोल लिया. बैंक के क्लर्क ने जब बताया कि उस के खाते में 10 हजार रुपए से अधिक धन जमा हो जाएगा तो रजनी की खुशी की सीमा न रही.

रजनी शादी के बाद भारत में 10 महीने रही. इस दौरान कई बार कानपुर गई. ससुराल वाले उसे बहुत अच्छे लगे. वे बहुत ही खुशहाल और अमीर थे. कभी भी उन्होंने रजनी को इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि उस के मातापिता साधारण स्थिति वाले हैं. रजनी का हवाई टिकट विकास ने भेज दिया था. उसे विदा करने के लिए मायके वाले भी कानपुर से दिल्ली आए थे.

लंदन हवाई अड्डे पर रजनी को हवाई जहाज बदलना था. उस ने विकास से फोन पर बात की. विकास तो उस के आने का हर पल गिन रहा था.

मांट्रियल के हवाई अड्डे पर रजनी को विकास बहुत बदला हुआ लग रहा था. उस ने कीमती सूट पहना हुआ था. बाल भी ढंग से संवारे हुए थे. उस ने सामान की ट्राली रजनी के हाथ से ले ली. कारपार्किंग में लंबी सी सुंदर कार खड़ी थी. रजनी को पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि यह कार उस की है. वह सोचने लगी कि जल्दी ही कार चलाना सीख लेगी तो शान से इसे चलाएगी. एक फोटो खिंचवा कर मातापिता को भेजेगी तो वे कितने खुश होंगे.

कार में रजनी विकास के साथ वाली सीट पर बैठे हुए अत्यंत गर्व का अनुभव कर रही थी. विकास ने कर्कलैंड में घर खरीद लिया था. वह जगह मांट्रियल हवाई अड्डे से 55 किलोमीटर की दूरी पर थी. कार बड़ी तेजी से चली जा रही थी. रजनी को सब चीजें सपने की तरह लग रही थीं. 40-45 मिनट बाद घर आ गया. विकास ने कार के अंदर से ही गैराज का दरवाजा खोल लिया. रजनी हैरानी से सबकुछ देखती रही.

कार से उतर कर रजनी घर में आ गई. विकास सामान उतार कर भीतर ले आया. रजनी को तो विश्वास ही नहीं हुआ कि इतना आलीशान घर उसी का है. उस की कल्पना में तो घर बस 2 कमरों का ही होता था, जो वह बचपन से देखती आई थी. विकास ने घर को बहुत अच्छी तरह से सजा रखा था. सब तरह की आधुनिक सुखसुविधाएं वहां थीं. रजनी इधरउधर घूम कर घर का हर कोना देख रही थी और मन ही मन झूम रही थी.

विकास ने उस के पास आ कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘आज की शाम हम बाहर मनाएंगे परंतु इस से पहले तुम कुछ सुस्ता लो. कुछ ठंडा या गरम पीओगी?’’ विकास ने पूछा.

रजनी विकास के करीब आ गई और उस के गले में बांहें डाल कर बोली, ‘‘आज की शाम बाहर गंवाने के लिए नहीं है, विकास. मुझे शयनकक्ष में ले चलो.’’

विकास ने रजनी को बांहों के घेरे में ले लिया और ऊपरी मंजिल पर स्थित शयनकक्ष की ओर चल दिया.

Family Story : प्रेरणा- क्या अंकिता ने अपने सपनों को दोबारा पूरा किया?

Family Story . ‘‘बड़ी मुद्दत हुई तुम्हारा गाना सुने. आज कुछ सुनाओ. कोई भी राग उठा लो,  बागेश्वरी, विहाग या मालकोश, जो इस समय के राग हैं,’’ रात का भोजन करने के बाद मनोहर लाल ने अंकिता से इच्छा व्यक्त की. वे बड़े लंबे समय के बाद अपनी बेटी और दामाद के यहां उन से मिलने आए थे.

इस से पहले कि अंकिता कुछ कहती, उस की 14 साल की बेटी चहक पड़ी, ‘‘सुना तो है कि मां बड़ा अच्छा गाती थीं, संगीत विशारद भी हैं, लेकिन मैं ने तो आज तक इन के मुख से कोई गाना नहीं सुना.’’

‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं? तुम तो इतना बढि़या गाती थीं. कुछ और समय लखनऊ में रहना हो गया होता तो तुम ने संगीत में निपुणता प्राप्त कर ली होती.’’ ‘‘अभ्यास छूटे एक युग बीत गया. अब गला ही नहीं चलता. मेरे पास शास्त्रीय संगीत के अनेक कैसेट पड़े हैं, उन में से कोई लगा दूं?’’

‘‘नहीं, वह सब कुछ नहीं. इतने परिश्रम से सीखी हुई विद्या तुम ने गंवा कैसे दी? शाम 4 बजे के बाद कालेज से लौटती थीं तो जल्दीजल्दी कुछ नाश्ता कर रिकशे से भातखंडे कालेज चल देती थीं. वहां से लौटतेलौटते रात के साढ़े 7 बज जाते थे. थक जाने पर भी रियाज करती थीं. जाड़ों में रात जल्दी घिर आती है. तब मैं तुम्हें लेने साइकिल से कालेज पहुंचता था. उस ओर से रिकशे के पैसे बचाने के लिए तुम कितने उत्साह से पैदल ही उछलतीकूदती चली आती थीं. हम लोगों के कैसे कठिन दिन थे वे. वह सारी साधना धूल में मिल गई.’’

‘‘पिताजी, आप तो समझते नहीं. शादी के बाद बराबर तो असम में रहना पड़ा. उस पर नौकरी के आएदिन के तबादले और दौरे. उस अनजाने क्षेत्र में अकेली कलपती मैं क्या अभ्यास करती. मुझे तो हर समय डर लगा रहता था. आप ने देख तो लिया, इतने सालों के बाद आप आए हैं, लेकिन फिर भी इन का दौरे पर जाना जरूरी है.’’

‘‘यह तो नौकरी की विवशता है. इस में तुम दोनों क्या कर सकते हो? अकेलेपन की जो समस्या तुम ने उठाई, उस में तो संगीत या पुस्तकों से उत्तम और कोई साथी होता ही नहीं. अच्छा, यह बताओ कि तुम ने संगीत सीखा क्यों था?’’

‘‘मां और आप को शास्त्रीय संगीत का शौक था. जिस काम से आप लोग प्रसन्न हों उसे करने में हम सभी भाईबहनों को तब आनंद आता था.’’ ‘‘यह सही नहीं है. रुचि न होने पर कहीं पुरस्कार जीते जाते हैं? अच्छा, अब कुछ शुरू करो.’’ ‘‘पिताजी, घर में तानपूरा तक तो है नहीं.’’ ‘‘कोई बात नहीं, बिना तानपूरे के भी चलेगा. किसी संगीत सभा में थोड़े ही गा रही हो?’’

कुछ देर शांत रहने के बाद अंकिता ने गला साफ कर के खांसा. तुहिना किलक उठी, ‘‘आज आईं मां पकड़ में.’’

कुछ गुनगुनाने के बाद अंकिता का स्वर उभरा :

‘कौन करत तोसों विनती पियरवा,

मानो न मानो मोरी बात.’

गाने की इस प्रथम पंक्ति को 3-4 बार दोहराने के बाद अंकिता ने राग के अंतरे को उठाया :

‘जब से गए मोरी सुधि हू न लीनी,

कल न परत दिनरात.’

लेकिन वह खिंच नहीं सका और अंकिता हताशा में सिर झटकते हुए चुप हो गई.

मनोहर लाल, जो आंखें बंद किए बेटी का गायन सुन रहे थे, बोले, ‘‘अगर मुझे ठीक याद है तो बागेश्वरी के इसी गीत पर तुम्हें अंतरविद्यालय संगीत समारोह में पुरस्कार मिला था. आज यह हालत है कि तुम यह भी भूल गईं कि बागेश्वरी में 2 स्वर कोमल लगते हैं. तुम ने तो उन की जगह शुद्ध स्वर लगा दिए. अंतरा भी तुम इसलिए नहीं खींच पाईं क्योंकि अभ्यास छूटा हुआ है.’’

‘‘अब क्या करूं, पिताजी?’’ अंकिता ने झींक कर कहा ‘‘मेरी बात मानो तो एक तानपूरा खरीद लो. तुहिना अब बड़ी हो गई है. उसे तबला सिखवा दो. मैं सच कहता हूं कि यह जो तुम्हें हर समय बोरियत सी महसूस होती रहती है, सब दूर भाग जाएगी.’’ ‘‘कोशिश करूंगी.’’ ‘‘कोशिश नहीं, समझ लो कि यह तो करना ही है. लोग इस देश से प्रतिभा पलायन को ले कर हंगामा खड़ा करते हैं. लेकिन यहां तो प्रत्यक्ष प्रतिभा पराभव को देख रहा हूं. यह कहां तक उचित है?’’

अगले दिन अचल भी दौरे से लौट आए. उन्होंने जब तुहिना से अंकिता की छीछालेदर की बात सुनी तो अपने ससुर को सफाई देने लगे, ‘‘पिताजी, मैं ने तो न जाने कितनी बार इन से कहा कि अपने संगीत ज्ञान को नष्ट न होने दें और रुचि बनाए रखें. कैसेट तो घर में दर्जनों आ गए हैं लेकिन गाने के नाम पर हमेशा यही सुनने को मिला कि गला ही साथ नहीं देता. शायद अब आप के कहने का कुछ असर पड़े.’’

मनोहर लाल तो 4 दिन रहने के बाद लौट गए परंतु अपने पीछे बेटी के घर में मोटरकार के पीछे उठे धूल के गुबार जैसा वातावरण छोड़ गए. अंकिता खिसियानी बिल्ली की तरह कई दिनों तक बातबात पर नौकर और तुहिना पर बरसती रही.

अभी इस घटना को बीते एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था कि एक शाम चपरासी ने अंदर आ कर अंकिता को सूचना दी, ‘‘छोटे साहब आए हैं. साथ में उन की पत्नी भी हैं. उन को बैठक में बैठा दिया है.’’ ‘‘ठीक किया. हम लोग अभी आते हैं. रसोई में चंदन से कहना कि कुछ खाने की चीजें और 4 गिलास शरबत बैठक में पहुंचा जाए.’’ ठीक है कहता हुआ चपरासी रसोईघर की ओर चला गया. ‘‘अभी नए असिस्टैंट इंजीनियर की नियुक्ति हुई है. शायद वही मिलने आए होंगे,’’ अचल ने अंकिता को बताया.

अचल और अंकिता ने बैठक में जा कर देखा कि एक आकर्षक युवा दंपती बैठे प्रतीक्षा कर रहे हैं. शुरुआती शिष्टाचार के बाद दोनों पुरुषों में तो बातचीत शुरू हो गई लेकिन आगंतुक महिला को चुप देख अंकिता ने उस से पूछा, ‘‘आप कहां की हैं?’’ ‘‘मेरी ससुराल तो बरेली में है लेकिन मायका लखनऊ में है.’’ ‘‘मैं भी लखनऊ की हूं. इसलिए तुम मुझे ‘दीदी’ कह सकती हो. वैसे तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘जी, सिकता.’’

फिर तो अंकिता ने उस से उस के महल्ले, स्कूल, कालेज आदि सभी के बारे में पूछ डाला. यह भी पता चला कि सिकता ने भी भातखंडे संगीत विद्यालय में संगीत की शिक्षा पाई थी. ‘‘जब भी खाली समय हुआ करे और मन न लगे तो मेरे पास चली आया करो. अब संकोच न करना.’’ ‘‘खाली समय तो बहुत रहता है क्योंकि ये तो जब देखो तब दौरे पर जाते रहते हैं और मैं अकेली घर में पड़ी ऊबती रहती हूं. अकेले घर में गाया भी नहीं जा सकता. नौकरचाकर न जाने क्या सोचें?’’

अंकिता के मस्तिष्क में सहसा बिजली सी कौंधी. वह बोली, ‘‘हम लोगों के क्लब में एक महिला समिति भी है, जिस में अफसरों की पत्नियां या तो ताश खेलती रहती हैं या फिर कभी ‘हाउसी’. क्यों न हम दोनों मिल कर कालोनी की लड़कियों के लिए संगीत की कक्षाएं शुरू करें. तुम्हारा तो अभी सबकुछ नया सीखा हुआ है. तुम्हारे सहारे मैं भी अपने पुराने अभ्यास पर धार लगाने का प्रयास करूंगी.’’ ‘‘सच दीदी, आप ने तो मेरी बिन मांगी मुराद पूरी कर दी. आप जैसा भी कहेंगी, मैं करती रहूंगी. आप शुरू तो करें,’’ सिकता उत्साह से चहक उठी.

अंकिता ने अपने प्रभाव से क्लब की महिला समिति में एक कमरे में संगीत कक्षाएं चालू करा दीं, लेकिन शुरूशुरू में तथाकथित संभ्रांत महिलाओं ने खूब नाकभौं सिकोड़ी. कुछ ने तो यहां तक कह डाला कि यह 4 दिन की चांदनी है, फिर तो टांयटांय फिस्स होना ही है.

परंतु अंकिता को यह सब सुनने की फुरसत नहीं थी. सिकता और स्वयं के अतिरिक्त उस ने एक अन्य अध्यापक तथा तबलावादक को वेतन दे कर 3 घंटे प्रतिदिन के लिए नियुक्त कर लिया. कालोनी से संगीत सीखने की इच्छुक 10-12 लड़कियां और महिलाएं भी एकत्र हो गईं.

सिकता को तो संगीत सिखाना सहज लगता था लेकिन अंकिता को कुछ कक्षाएं पढ़ाने के लिए पहले घर पर घंटों अभ्यास करना पड़ा. उस पर एक नशा सा छाया हुआ था और वह जीतोड़ परिश्रम में लगी हुई थी. महिला समिति के फंड के अलावा वह अपने पास से भी काफी धन संगीत विद्यालय के लिए खर्च कर चुकी थी.

अंकिता को जैसेजैसे संगीत विद्यालय की आलोचना सुनने को मिलती, वैसेवैसे उस का संकल्प और दृढ़ होता जाता. देखतेदेखते 2 साल के अंदर ही इस संगीत विद्यालय ने अपनी पहचान बनानी आरंभ कर दी. महल्ले में क्या, पूरे शहर में उस की चर्चा होने लगी.

जहां किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता वहां संगीत विद्यालय की छात्राओं को भेजने के अनुरोध भी अंकिता को प्राप्त होने लगे. उस को इस से काफी आत्मसंतोष मिलता. वह इस तरह के सभी प्रस्तावों का स्वागत करती और हरेक कार्यक्रम को प्रस्तुत करने से पहले भाग लेने वाली छात्राओं को जम कर अभ्यास कराती. अधिकांश कार्यक्रमों का संचालन वह खुद ही करती.

क्लब में होली, तीज, ईद, दीवाली तथा राष्ट्रीय पर्वों पर होने वाले समारोहों में वह संगीत विद्यालय के विशेष कार्यक्रम रखती, जिन की सभी प्रशंसा करते. स्थानीय अखबारों में उन की रिपोर्ट छपती. कभीकभी आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी निमंत्रण मिलने लगा.

अचल का जल्द ही होने वाला तबादला अंकिता को अब चिंतित करने लगा था क्योंकि इस स्थान पर उन के 4 साल पूरे हो चुके थे. उसे डर था कि कहीं उस के जाने के बाद विद्यालय बंद न हो जाए, इसलिए अंकिता ने संगीत विद्यालय की संचालन समिति के मुख्य पदों को पदेन रूप से परिवर्तित कर दिया था, जिस से किसी व्यक्ति विशेष के रहने अथवा न रहने से विद्यालय के संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. स्थानीय वेतनभोगी अध्यापकों की संख्या भी बढ़ा दी थी. कुछ प्रमुख रुचिसंपन्न महिलाओं को उस ने विद्यालय का संरक्षक भी बना दिया था.

अचल अकसर अंकिता को खिजाते, ‘‘तुम तो अब पूरी तरह संगीत विद्यालय को समर्पित हो गई हो. कहीं ऐसा न हो कि मैं भी काट दिया जाऊं.’’ ‘‘कैसी बात करते हैं. आप के ही सहयोग से तो मुझे सार्थक जीवन की ये घडि़यां देखने को मिली हैं.’’ ‘‘मेरे कहने की तुम ने कब चिंता की? यह तो पिताजी की झिड़की का प्रभाव है.’’ ‘‘सच, हमारे विद्यालय के कार्यक्रमों में बड़ा निखार आ रहा है. डर यही लगता है कि कहीं हमारे तबादले के बाद यह उत्साह ठंडा न पड़ जाए.’’ ‘‘तुम ने नींव तो इतनी मजबूत डाली है कि अब उसे चलते रहना चाहिए.’’ ‘‘क्यों जी, हम लोगों का तबादला 1-2 साल के लिए रुक नहीं सकता?’’

‘‘इस बार तबादला तरक्की के साथ होगा. उसे रुकवाना हानिकारक होगा. चिंता क्यों करती हो, जिस जगह भी जाएंगे, वहां एक नया विद्यालय शुरू किया जा सकता है.’’ ‘‘यहां सब जम गया था. कहांकहां नए गड्ढे खोदें और पौधे रोपें.’’ ‘‘तो क्या हुआ? अब तो माली निपुण हो गया है. फिर वहां तुम्हारा स्तर ऊंचा होने का भी तो लाभ मिलेगा. वहां कौन काट सकेगा तुम्हारी बात?’’ ‘‘अब जो होगा, देखूंगी. पर जगहजगह तंबू गाड़ना मुझे भाता नहीं.’’ ‘‘भई, हम लोग तो गाडि़या लुहार हैं. दिन में सड़क किनारे गाड़ी रोकी, कुदाल, खुरपी, हंसिए बनाए, बेचे और बढ़ चले. इस जीवन का अपना अलग रस है.’’ ‘‘हर कोई आप की तरह दार्शनिक नहीं होता.’’ बात पर तो विराम लग गया परंतु अंकिता के मन की चंचलता बनी रही.

वसंतपंचमी के अवसर पर दूरदर्शन के प्रादेशिक प्रसारण में संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को अंकिता ने स्वीकार तो कर लिया परंतु उस के लिए 2 गीत तैयार कराने में उसे और छात्राओं को बड़ा परिश्रम करना पड़ा. कार्यक्रम का सफल मंचन हो जाने पर उसे बड़ा संतोष मिला. अंकिता अभी वसंत के कार्यक्रम की अपनी थकान उतार भी नहीं पाई थी कि उसे अपने पिता का पत्र मिला.

‘‘टीवी के प्रादेशिक कार्यक्रम में तुम्हारे विद्यालय द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम देखा. संचालिका के रूप में तुम्हें पहचान लिया. कार्यक्रम बहुत अच्छा था. मन बहुत प्रसन्न हुआ. लेकिन बेटी, एक बात याद रखना कि विद्या के क्षेत्र में प्रसाद वर्जित है.’’

पत्र पाने के बाद अंकिता आत्मसंतोष से भर उठी. Family Story

Family Story. मजबूरी: समीर को फर्ज निभाने का क्या इनाम मिला?

Family Story. समीर एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ था. उस की आंखों के आंसू बह कर सूख चुके थे. कुछ ही दूरी पर पड़ोसियों ने सर्दी के सितम को देख कर आग जलाने के लिए लकड़ियों का इंतजाम कर के आग जला दी थी. सामने ही एक टूटी खाट पर समीर की बेटी शाहीन की लाश पड़ी हुई थी, जिस के शरीर पर लिबास के नाम पर जगहजगह से फटापुराना एक सूट ही था.

समीर के पास ही बैठी उस की बीवी रजिया का रोना उस के कलेजे में तीर की तरह चुभ रहा था. घर में पासपड़ोस वालों की भीड़ बढ़ने लगी थी और औरतें लगातार रजिया को दिलासा दे रही थीं. देर रात से रोतीबिलखती रजिया के आंसू भी अब सूख चुके थे.

सुबह सूरज की किरणें धूप के रूप में समीर के आंगन में उतर चुकी थीं और शाहीन की मुरदा देह को न जाने कैसी तपिश देने की कोशिश कर रही थीं. धूप से सर्दी का सितम थोड़ा सा कम हो गया था, पर यह सब हुआ समीर की बेटी शाहीन के जाने के बाद. अगर उस के पास भी पहननेओढ़ने के लिए कुछ होता, तो शायद शाहीन जिंदा होती.

समीर ने लाख कोशिश की कि कहीं से पैसों का इंतजाम कर गरम कपड़े खरीद ले, लेकिन कुछ भी मुमकिन न हो सका. उस की झोंपड़ी भी ऐसी न थी कि ठंड से बचाव हो सके.

समीर अब उस दिन को कोस रहा था जब उस ने एक मासूम बच्चे की जान बचाने का फर्ज निभाया था. कितना खुश था वह अपनी बीवी रजिया और बेटी शाहीन के साथ.

समीर एक ईंटभट्ठे पर मजदूरी करता था. हर रोज उसे मजदूरी में ज्यादा रुपए तो नहीं मिल पाते थे, लेकिन फिर भी वह अपना और अपने परिवार का भरणपोषण किसी तरह सुकून से कर लेता था. उस के मजदूर साथी हमेशा यही कहते थे कि समीर जितना भी परेशान रहता हो, पर हमेशा हंसता ही रहता है, पर उस की खुशियों भरी जिंदगी में ऐसा बवाल मचा कि उस के चेहरे से हंसी हमेशा के लिए गायब हो गई.

समीर उस दिन भी हमेशा की तरह मजदूरी करने ईंटभट्ठे पर जा रहा था कि तभी उस ने देखा सामने की कालोनी से निकल कर एक बच्चा अपनी छोटी सी साइकिल चलाता हुआ सड़क पर आ गया था. शायद उस बच्चे की देखभाल करने वाली आया उसे छोड़ कर अंदर चली गई थी.

इन बड़े लोगों के ठाठ भी बड़े अजीब होते हैं कि अपने खुद के बच्चे को पालने के लिए भी इन्हें किसी और की जरूरत पड़ती है, शायद अपने पैसों का रुतबा दिखाने के लिए ये लोग ऐसा करते हैं.

तभी तेज बजते हौर्न से समीर का ध्यान सड़क की तरफ गया. एक ट्रक तेजी से उस बच्चे की ओर आ रहा था. समीर समझ गया कि उस बच्चे को बचाने के लिए शोर मचाना फुजूल है और वह उसे बचाने के लिए दौड़ पड़ा. जैसे ही वह बच्चे के करीब पहुंचा और उसे उठा कर दौड़ा कि तभी उसे ट्रक की एक जोरदार टक्कर लगी और उस के हाथ से बच्चा उछल कर दूर जा गिरा. समीर चीख पड़ा. उसे कुछ शोर सुनाई दिया और उस के बाद वह बेहोश हो गया.

जब समीर को होश आया तो उस के नथुनों में दवाओं की अजीब सी गंध भर गई. उस ने एक नजर कमरे के चारों ओर डाली और दीवार पर लगे खस्ताहाल कलैंडर से अंदाजा लगा लिया कि वह किसी सरकारी अस्पताल में है. तभी उस ने हिलने की कोशिश की, तो उस के शरीर में एक दर्द की लहर सी दौड़ गई. इस के बाद उसे बच्चे की याद आई.

कुछ ही पलों में कमरे में रजिया शाहीन को ले कर आ गई. रजिया के उलझे बाल और सूजी आंखें देख कर ऐसा लग रहा था कि वह कई रातों से सोई नहीं थी.

समीर को नहीं पता था कि वह कितने दिनों से अस्पताल में था और रजिया ने कैसे उस के इलाज के लिए पैसों का इंतजाम किया होगा. तभी उस के पैर में तेज दर्द उठा. उस ने पैर हिलाने की कोशिश की, तो पाया कि उस का पैर था ही नहीं. यह महसूस होते ही वह अंदर तक सिहर गया.

“मेरा पैर…” समीर के मुंह से बहुत ही मुश्किल से ये 2 शब्द निकले. “ट्रक की टक्कर से आप का एक पैर कई जगह से फैक्चर हो गया था, जो किसी तरह से भी जुड़ने के हालात में नहीं था, लिहाजा हमें आप का पैर काट कर अलग करना पड़ा वरना शरीर में जहर फैलने की वजह से आप की जान भी जा सकती थी,” अंदर आते हुए एक डाक्टर ने बताया.

कुछ दिनों बाद ही समीर को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. घर के हालात बद से बदतर हो चुके थे. रजिया भी अब आसपड़ोस के घरों में चौकाबरतन करने लगी थी, जिस से जैसेतैसे गुजरबसर हो रही थी.

रजिया ने ही समीर को बताया कि ट्रक ड्राइवर ट्रक ले कर वहां से भाग गया था. उस बच्चे के मातापिता ने यह एहसान कर दिया था कि ऊंची पहुंच के चलते उसे उठा कर सरकारी अस्पताल में भरती करा दिया था, पर उस के बाद उन लोगों ने उस का हालचाल पूछने की भी जरूरत नहीं समझी और नातेरिश्तेदारों ने तो 2-4 दिन के बाद ही आना बंद कर दिया था कि कहीं कुछ देना न पड़ जाए.

समीर अब बैसाखियों के सहारे ही था. रजिया को देख कर उसे ऐसा लग रहा था जैसे उस ने खुद अपने हाथों उस की खुशियों और जवानी दोनों पर ग्रहण लगा दिया था. 26 साल की उम्र में वह 46 साल की लगने लगी थी. उस के शरीर में अब हड्डियों के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था.

घर की हालत कुछ ज्यादा ही खराब हो चुकी थी. रजिया द्वारा कमाए गए रुपयों से जैसेतैसे दो वक्त का खाना ही मिल पा रहा था. इसी बीच समीर को घने अंधकार के बीच रोशनी की एक किरण चमकती दिखाई दी. पता चला कि सरकार की ओर से जरूरतमंदों और गरीबों के लिए कई योजनाएं शुरू कर दी गई हैं, जिस के लिए वह सभासद, चेयरमैन से ले कर विधायक और सरकारी अफसरों की चौखट के चक्कर लगाता रहा, लेकिन हर जगह उसे बस आश्वासन ही दिया गया कि जल्द ही आप को सरकारी सुविधाएं दे दी जाएंगी, पर उसे कुछ नहीं मिल पाया, क्योंकि वह किसी भी जांच अधिकारी को अपनी बेबसी और मजबूरी के अलावा और कुछ न दे सका.

इस बार की सर्दी समीर की परेशानियों को बढ़ाने आई थी. कड़ाके की सर्दी होने के बावजूद उस के पास गरम कपड़े के नाम पर कुछ भी नहीं था. और तो और उस की बेटी शाहीन के लिए भी कुछ नहीं था. रजिया ने बहुत कोशिश की थी कि गरम कपड़ों का इंतजाम हो सके, लेकिन कुछ न हो सका.

सर्दी का कहर सितम पर था. घना कोहरा और चल रही शीतलहर समीर के परिवार पर पूरी तरह से कहर बरपा कर रही थी. इसी बीच शाहीन को सर्दी ने अपने आगोश में ले लिया. रजिया जैसेतैसे पैसों का इंतजाम कर महल्ले के नीमहकीम डाक्टर से दवा ले कर शाहीन को खिला रही थी, लेकिन तबीयत में सुधार न होते देख उस डाक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिए और शाहीन को किसी बड़े डाक्टर को दिखाने के लिए कहा, जिस के बाद समीर शाहीन के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल भी गया, पर वहां भी सही इलाज न हो पाया, क्योंकि सरकारी डाक्टर बाहर की दवा ही लिख कर देते थे, जिन्हें खरीदने में वह पूरी तरह नाकाम था.

रजिया ने डाक्टर साहब से विनती भी की थी कि उस की बेटी को बाहर की दवा न लिख कर अंदर से ही दवा दे दी जाए, लेकिन डाक्टर ने उस की एक न सुनी.

समीर अपने बचपन के दोस्त शफीक से रुपए उधार लेने गया, लेकिन उस ने भी कामधंधा न चलने का बहाना बना कर उसे टाल दिया. वह बुझे मन से वापस चला आया. उस का मन कर रहा था कि इस से अच्छा तो वह उसी दिन मर गया होता, जब वह सड़क हादसा हुआ था.

आज जब समीर ने घर की चौखट पर कदम रखा तभी रजिया की जोर से रोने की आवाज सुनाई दी. उस ने अंदर जा कर देखा कि शाहीन अपना इलाज होने का इंतजार करतेकरते हमेशा के लिए सो गई थी. यह देख कर वह वहीं जमीन पर बैठ गया. वह खुद को ही शाहीन का कातिल समझ रहा है. उस के पास तो शाहीन के कफनदफन के लिए भी पैसे नहीं थे.

“अरे, यह सब कैसे हो गया… हमें तो पता ही नहीं चला. एक बार कुछ बताया तो होता,” तभी किसी के ऊंचे स्वर में बोलने की आवाज सुन कर समीर की तंद्रा टूटी. समीर ने देखा कि महल्ले का सभासद किसी बड़े नेता को अपने साथ लाया था. उस नेता के साथ उस के कुछ कार्यकर्ता भी थे, जो रजिया से पूछ रहे थे. दूसरी ओर कुछ लोग मोबाइल फोन से धड़ाधड़ उन के फोटो खींच रहे थे.

“ये लो 5,000 रुपए और बच्ची के कफनदफन का इंतजाम करो,” उस नेता जैसे दिखने वाले आदमी ने पैसे समीर के हाथ में पकड़ा दिए. ‘निकल जाओ यहां से… कोई जरूरत नहीं यह सब दिखावा करने की और ले जाओ अपने ये रुपए…’ समीर का मन जोर से चीखने को कर रहा था, पर सामने पड़ी बेटी की लाश को देख कर उस की चीख न जाने कहां गुम हो गई थी. Family Story

Hindi Story. मां जल्दी आना: विनीता अपनी मां को क्यों साथ रखना चाहती थी?

Hindi Story. औफिस से आ कर जैसे ही मैं ने घर में प्रवेश किया एक सोंधी सी महक मेरे पूरे तनमन में फैल गई. बैग को सोफे पर पटक हाथमुंह धो कर मैं सीधे किचन में जा घुसी. कड़ाही में सिक रहे समोसों को देख कर पीछे से मां के गले में बांहें डाल कर बोली, ‘‘अरे वाह मां, आज तो आप ने समोसे बना कर मोगैंबो को खुश कर दिया. बोलिए आप को क्या चाहिए.’’

‘‘तू खुद मां बन गई है पर अभी भी बचपना नहीं गया तेरा, ले जल्दी से खा कर बता कैसे बने हैं.’’ प्लेट में 2 समोसे और धनिया की चटनी डाल कर देते हुए मां ने हलकी सी चपत मेरे गाल पर लगा दी.

‘‘मां बन गई तो क्या मैं आप की बच्ची नहीं रही,’’ कहते हुए मैं समोसे खाने लगी. सर्दियों में मां के हाथ के समोसों के हम सब दीवाने थे. मुझे याद है मां किलोकिलो मैदा के समोसे बनातीं पर हम भाईबहन खाने में प्रतियोगिता सी करते और सारे समोसों को चट कर जाते थे. मां को कुकिंग का बहुत शौक था इसीलिए शायद हम भाईबहन बहुत चटोरे हो गए थे. मैं बचपन की सुनहरी यादों में कुछ और खोती उस से पहले मेरे पतिदेव अमन ने घर में प्रवेश किया और आते ही फरमान जारी किया.

‘‘विनू, जल्दी से कड़क चाय पिला दो सिर में तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘बेटा तुम हाथमुंह धो कर आ जाओ मैं ने तुम्हारी पसंद के पनीर के समोसे बनाए हैं और कड़क चाय बस तैयार होने ही वाली है.’’

‘‘अरे मां, आप क्यों परेशान होती हो इतनी बार आप से कहा है कि आप बस आराम किया करिए पर नहीं आप मान नहीं सकतीं.’’

‘‘बेटा हाथपैर चलते रहेंगे तो बुढ़ापा आराम से कट जाएगा पर अगर जाम हो गए तो मेरे साथसाथ तुम लोग भी परेशान हो जाओगे. इसलिए हलकाफुलका काम तो करने ही देते रहो… जिंदगीभर तो काम में कोल्हू के बैल की तरह जुते रहे और अब तुम आराम करने को कह रहे हो तो बताओ कैसे हो पाएगा…’’ मां ने मुसकराते हुए कहा तो अमन निशब्द से हो गए.

हमें खिला कर मां अपनी प्लेट लगा कर ले आईं और टीवी देखते हुए स्वयं भी खाने लगीं. मां की शुरू से आदत है कि जब तक घर के एकएक सदस्य को खिला नहीं लेंगी तब तक स्वयं नहीं खाएंगी.

मैं चेंज कर के कुछ देर आराम करने के उद्देश्य से बिस्तर पर लेट गई. लेटते ही मन आज से 2 वर्ष पूर्व जा पहुंचा जब एक दिन सुबहसुबह मेरे भाई अनंत का मेरे पास फोन आया. मां और बाबूजी उस समय अनंत के ही पास थे. मेरे फोन उठाते ही वह बोला, ‘‘मैं तो परेशान हो गया हूं इन दोनों से, जब भी घर में आओ तो लगता है मानो 2 जासूस बैठे हैं घर में, हमारा इन के साथ एडजस्ट करना बहुत मुश्किल हो रहा है. दीदी आप ही कोई तरीका बताओ जिस से ये दोनों यहां से चले जाएं,’’ अनंत की बातें सुन कर मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था.

उस से उम्र में 10 वर्ष बड़ी होने के बावजूद समझ नहीं पाई कि उस के प्रश्न का क्या जवाब दूं. जिस बेटे के जन्म के लिए मांबाबूजी ने न जाने कितनी मन्नतें मांगी, कितने मंदिर मस्जिद के दरवाजे खटखटाए और जिस के जन्म होने पर लगा मानो उन के जीवन के समस्त दुखों का हरण हो गया हो वही बेटा आज उन्हें जासूस कह रहा था. अपनी संतान की प्रगति से खुश होने वाले मातापिता अपने ही बेटे के घर में जासूस कैसे हो सकते हैं. भारतीय संस्कृति में पुत्र को मोक्ष के द्वार तक पहुंचाने वाला कहा गया है.

हमारे धर्मरक्षकों ने इस पर और चाशनी चढ़ाई कि मरणोपरांत पुत्र के द्वारा दी गई मुखाग्नि से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है अन्यथा तो मानव बस नरक में ही जाता है बस इसी मानसिकता के शिकार धर्मभीरू मांबाबूजी इस कमर तोड़ती महंगाई में भी एक के बाद एक तीन बेटियों की कतार लगाते गए. इस बीच मां के गर्भ में पल रहीं कुछ बेटियों को तो जन्म ही नहीं लेने दिया गया. खैर इंतजार का फल मीठा होता है यह कहावत हमारे घर में भी चरितार्थ हुई और अंत में जब बेटा हुआ तो लगा मानो साक्षात स्वर्ग के द्वार खुल गए हों.

मांबाबूजी को उन का वह अनमोल हीरा मिल गया था जो उन की वृद्धावस्था को तारने वाला था. अपने हीरेमोती जैसे भाई को पा कर हम बहनों की खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं था क्योंकि हर रक्षाबंधन और भाईदूज पर हमें ताऊजी के बेटों की राह देखनी पड़ती थी. अब वह औपचारिकता समाप्त हो गई थी. समय अपनी गति से बढ़ रहा था. हम तीनों बहनों की शादियां हो गईं. दोनों बड़ी बहनें अपने परिवार के साथ विदेश जा बसीं थी सो सालदोसाल में एक बार ही आ पातीं थी. न केवल भाई अनंत बल्कि हम बहनों को पढ़ाने लिखाने में भी मांबाबूजी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अब तक अनंत भी इंजीनियरिंग कर के दिल्ली में एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी करने लगा था. मैं भी यहां मुंबई में एक बैंक में कार्यरत थी.

भारतीय समाज में लड़केकी नौकरी लगते ही उस की बोली लगनी प्रारंभ हो जाती है सो अनंत के लिए भी रिश्तों की लाइन लगी थी. जब भी किसी लड़की का फोटो आता तो मांबाबूजी की खुशी देखते ही बनती थी. अपने बुढ़ापे का सुखमय होने का सपना देख रहे मांबाबूजी को उस समय तगड़ा झटका लगा जब एक बार अनंत छुट्टियों में घर आया और मांबाबूजी की लड़की देखने की तैयारी देख कर घोषणा की.

‘‘मां मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और उसी से विवाह करूंगा. आप लोग

नाहक परेशान न हों.’’ अनंत एक वाक्य में अपनी बात कह कर घर से बाहर निकल गया.

‘‘मांबाबूजी को काटो तो खून नहीं. मां कभी उस दरवाजे को देखतीं जहां से अभी अनंत निकल कर गया था और कभी बाबूजी को. अपने कानों सुनी बात पर वे भरोसा ही नहीं कर पा रहीं थीं. अचानक किए गए अनंत के इस विस्फोट से वे बुरी तरह घबरा गईं और फूटफूट कर रोने लगीं और बोली,’’ इसी दिन के लिए पैदा किया था इसे. इसे पता भी है कि कितने बलिदानों के बाद हम ने इसे पाया है. क्याक्या सपने संजोए थे बहू को ले कर, इस ने एक बार भी नहीं सोचा हमारे बारे में. बाबूजी शायद मामले की गंभीरता को भांप नहीं पाए थे या अपने बेटे पर अतिविश्वास को सो वे मां को दिलासा देते हुए बोले, ‘‘मैं समझाऊंगा उसे, बच्चा है, समझ जाएगा. सब ठीक हो जाएगा. यह सब क्षणिक आवेश है. मेरा बेटा है अपने पिता की बात अवश्य मानेगा.’’

मां को भी बाबूजी की बातों पर और उस से भी ज्यादा अपने बेटे पर भरोसा था. सो बोलीं, ‘‘हां तुम सही कह रहे हो मुझे लगता है मजाक कर रहा होगा. ऐसा नहीं कर सकता वह. हमारे अरमानों पर पानी नहीं फेरेगा हमारा बेटा.’’

चूंकि अगले दिन अनंत वापस दिल्ली चला गया था सो बात आईगई हो गई पर अगली बार जब अनंत आया तो बाबूजी ने एक लड़की वाले को भी आने का समय दे दिया. अनंत ने उन के सामने बड़ा ही रूखा और तटस्थ व्यवहार किया और लड़की वालों के जाते ही मांबाबूजी पर बिफर पड़ा.

‘‘ये क्या तमाशा लगा रखा है आप लोगों ने, जब मैं ने आप को बता दिया कि मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और शादी भी उसी से करूंगा फिर इन लोगों को क्यों बुलाया. वह मेरे साथ मेरे ही औफिस में काम करती है. और यह रही उस की फोटो,’’ कहते हुए अनंत ने एक पोस्टकार्ड साइज की फोटो टेबल पर पटक दी.

अपने बेटे की बातों को किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी सुन रहीं मां ने लपक कर टेबल से फोटो उठा ली. सामान्य से नैननक्श और सांवले रंग की लड़की को देख कर उन की त्यौरियां चढ़ गईं और बोलीं, ‘‘बेटा ये तो हमारे घर में पैबंद जैसी लगेगी. तुझे इस में क्या दिखा जो लट्टू हो गया.’’

‘‘मां मेरे लिए नैननक्श और रंग नहीं बल्कि गुण और योग्यता मायने रखते हैं और यामिनी बहुत योग्य है. हां एक बात और बता दूं कि यामिनी हमारी जाति की नहीं है,’’ अनंत ने कुछ सहमते हुए कहा.

‘‘अपनी जाति की नहीं है मतलब???’’ बाबूजी गरजते स्वर में बोले.

‘‘मतलब वह जाति से वर्मा हैं’’ अनंत ने दबे से स्वर में कहा.

‘‘वर्मा!!! मतलब!! सुनार!!! यही दिन और देखने को रह गया था. ब्राह्मण परिवार में एक सुनार की बेटी बहू बन कर आएगी… वाहवाह इसी दिन के लिए तो पैदा किया था तुझे. यह सब देखने से पहले मैं मर क्यों न गया. मुझे यह शादी कतई मंजूर नहीं,’’ बाबूजी आवेश और क्रोध से कांपने लगे थे. किसी तरह मां ने उन्हें संभाला.

‘‘तो ठीक है यह नहीं तो कोई नहीं. मैं आप लोगों की खुशी के लिए आजीवन कुंआरा रहूंगा.’’ अनंत अपना फैसला सुना कर घर से बाहर चला गया था. उस दिन न घर में खाना बना और न ही किसी ने कुछ खाया. प्रतिपल हंसीखुशी से गुंजायमान रहने वाले हमारे घर में ऐसी मनहूसियत छाई कि सब के जीवन से उल्लास और खुशी ने मानो अपना मुंह ही फेर लिया हो. विवाहित होने के बावजूद हम बहनों को भी इस घटना ने कुछ कम प्रभावित नहीं किया. मांबाबूजी का दुख हम से देखा नहीं जाता था और भाई अपने पर अटल था पर शायद समय सब से बड़ा मरहम होता है. कुछ ही माह में पुत्रमोह में डूबे मांबाबूजी को समझ आ गया था कि अब उन के पास बेटे की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं है. जिस घर की बेटियों को उन की मर्जी पूछे बगैर ससुराल के लिए विदा कर दिया गया था उस घर में बेटे की इच्छा का मान रखते हुए अंतर्जातीय विवाह के लिए भी जोरशोर से तैयारियां की गईं.

अनंत मांबाबूजी की कमजोर नस थी सो उन के पास और कोई चारा भी तो नहीं था. खैर गाजेबाजे के साथ हम सब यामिनी को हमारे घर की बहू बना कर ले आए थे. सांवली रंगत और बेहद साधारण नैननक्श वाली यामिनी गोरेचिट्टे, लंबे कदकाठी और बेहद सुंदर व्यक्तित्व के स्वामी अनंत के आसपास जरा भी नहीं ठहरती थी पर कहते हैं न कि ‘‘दिल आया गधी पे तो परी क्या चीज है?’’

एक तो बड़ा जैनरेशन गैप दूसरे प्रेम विवाह तीसरे मांबाबूजी की बहू से आवश्यकता से अधिक अपेक्षा, इन सब के कारण परिवार के समीकरण धीरेधीरे गड़बड़ाने लगे थे. बहू के आते ही जब मांबाबूजी ने ही अपनी जिंदगी से अपनी ही पेटजायी बेटियों को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका था तो बेटेबहू के लिए तो वे स्वत: ही महत्वहीन हो गई थी. कुछ ही समय में बहू ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे.

अनंत और उस की पत्नी यामिनी को परिवार के किसी भी सदस्य से कोई मतलब नहीं था. कुछ समय पूर्व ही यामिनी की डिलीवरी होने वाली थी तब मांबाबूजी गए थे अनंत के पास. नवजात पोते के मोह में बड़ी मुश्किल से एक माह तक रहे थे दोनों तभी अनंत ने मुझ से उन्हें वापस भोपाल आने का उपाय पूछा था. मैं ने भी येनकेन प्रकारेण उन्हें दिल्ली से भोपाल वापस आने के लिए राजी कर लिया था.

अभी उन्हें आए कुछ माह ही हुए थे कि अचानक एक दिन बाबूजी को दिल का दौरा पड़ा और वे इस दुनिया से ही कूच कर गए पीछे रह गई मां अकेली. लोकलाज निभाते हुए अनंत मां को अपने साथ ले तो गया परंतु वहां के दमघोंटू वातावरण और यामिनी के कटु व्यवहार के कारण वे वापस भोपाल आ गईं और अब तो पुन: दिल्ली जाने से साफ इंकार कर दिया. सोने पे सुहागा यह कि अनंत और यामिनी ने भी मां को अपने साथ ले जाने में कोई रुचि नहीं दिखाई. मनुष्य का जीवन ही ऐसा होता है कि एक समस्या का अंत होता है तो दूसरी उठ खड़ी होती है.

अचानक एक दिन मां बाथरूम में गिर गईं और अपना हाथ तोड़ बैठीं. अनंत ने इतनी छोटी सी बात के लिए भोपाल आना उचित नहीं समझा बस फोन पर ही हालचाल पूछ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली. दोनों बड़ी बहनें तो विदेश में होने के कारण यूं भी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त थीं. बची मैं सो अनंत का रुख देख कर मेरे अंदर बेटी का कर्त्तव्य भाव जाग उठा. फ्रैक्चर के बाद जब मां को देखने गई तो उन्हें अकेला एक नौकरानी के भरोसे छोड़ कर आने की मेरी अंतआर्त्मा ने गवाही नहीं दी और मैं मां को अपने साथ मुंबई ले कर आ गई. मैं कुछ और आगे की यादों में विचरण कर पाती तभी मेरे कानों में अमन का स्वर गूंजा.

‘‘कहां हो भाई खानावाना मिलेगा… 9 बजने जा रहे हैं.’’ मैं ने अपने खुले बालों का जूड़ा बनाया और फटाफट किचन में जा पहुंची. देखा तो मां ने रात के डिनर की पूरी तैयारी कर ही दी थी बस केवल परांठे बनाने शेष थे. मैं ने फुर्ती से गैस जलाई और सब को गरमागरम परांठे खिलाए. सारे काम समाप्त कर के मैं अपने बैडरूम में आ गई. अमन तो लेटते ही खर्राटे लेने लगे थे पर मैं तो अभी अपने विगत से ही बाहर नहीं आ पाई थी. आज भी वह दिन मुझे याद है जब मां को देखने गई मैं वापस मां को अपने साथ ले कर लौटी थी. मुझे एअरपोर्ट पर लेने आए अमन ने मां के आने पर उत्साह नहीं दिखाया था बल्कि घर आ कर तल्ख स्वर में बोले,’’ ये सब क्या है विनू मुझ से बिना पूछे इतना बड़ा निर्णय तुम ने कैसे ले लिया.

‘‘कैसे मतलब… अपनी मां को अपने साथ लाने के लिए मुझे तुम से परमीशन लेनी पड़ेगी.’’ मैं ने भी कुछ व्यंग्यात्मक स्वर में उतर दिया था.

‘‘क्यों अब क्यों नहीं ले गया इन का सगा बेटा इन्हें अपने साथ जिस के लिए इन्होंने बेटी तो क्या दामादों तक को सदैव नजरंदाज किया.’’

‘‘अमन आखिर वे मेरी मां हैं… वह नहीं ले गया तभी तो मैं ले कर आई हूं. मां हैं वो मेरी ऐसे ही तो नहीं छोड़ दूंगी.’’ मेरी बात सुन कर अमन चुप तो हो गए पर कहीं न कहीं अपनी बातों से मुझे जता गए कि मां का यहां लाना उन्हें जंचा नहीं. इस के बाद मेरी असली परीक्षा प्रारंभ हो गई थी. अपने 20 साल के वैवाहिक जीवन में मैं ने अमन का जो रूप आज तक नहीं देखा था वह अब मेरे सामने आ रहा था.

घर आ कर सब से बड़ा यक्षप्रश्न था हमारे 2 बैडरूम के घर में मां को ठहराने का. 10 वर्षीय बेटी अवनि के रूम में मां का सामान रखा तो अवनि एकदम बिदक गई. अपने कमरे में साम्राज्ञी की भांति अब तक एकछत्र राज करती आई अवनि नानी के साथ कमरा शेयर करने को तैयार नहीं थी. बड़ी मुश्किल से मैं ने उसे समझाया तब कहीं मानी पर रात को तो अपना तकिया और चादर ले कर उस ने हमारे बैड पर ही अपने पैर पसार लिए कि ‘‘आज तो मैं आप लोगों के साथ सोउंगी भले ही कल से नानी के साथ सो जाउंगी.’’

पर जैसे ही अमन सोने के लिए कमरे में आए तो अवनि को बैडरूम में देख कर चौंक गए.

‘‘लो अब प्राइवेसी भी नहीं रही.’’

‘‘आज के लिए थोड़ा एडजस्ट कर लो कल से तो अवनि नानी के साथ ही सोएगी.’’ मैं ने दबी आवाज में कहा कि कहीं मां न सुन लें.

‘‘एडजस्ट ही तो करना है, और कर भी क्या सकते हैं.’’ अमन ने कुछ इस अंदाज में कहा मानो जो हो रहा है वह उन्हें लेशमात्र भी पसंद नहीं आ रहा पर उन्हें इग्नोर करने के अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था. मां को सुबह जल्दी उठने की आदत रही है सो सुबह 5 बजे उठ कर उन्होंने किचन में बर्तन खड़खड़ाने प्रारंभ कर दिए थे. मैं मुंह के ऊपर से चादर तान कर सब कुछ अनसुना करने का प्रयास करने लगी. अभी मेरी फिर से आंख लगी ही थी कि अमन की आवाज मेरे कानों में पड़ी.

‘‘विनू ये मम्मी की घंटी की आवाज बंद कराओ मैं सो नहीं पा रहा हूं.’’ मैं ने लपक कर मुंह से चादर हटाई तो मां की मंदिर की घंटी की आवाज मेरे कानों में भी शोर मचाने लगी. सुबह के सर्दी भरे दिनों में भी मैं रजाई में से बाहर आई और किसी तरह मां की घंटी की आवाज को शांत किया. जब से मां आईं मेरे लिए हर दिन एक नई चुनौती ले कर आता. 2 दिन बाद रात को जैसे ही मैं सोने की तैयारी कर रही थी कि अवनि ने पिनपिनाते हुए बैडरूम में प्रवेश किया.

‘‘मम्मी मैं नानी के पास तो नहीं सो सकती, वे इतने खर्राटे लेती हैं कि मैं सो ही नहीं पाती.’’ और वह रजाई तान कर सो गई. अमन का रात का कुछ प्लान था जो पूरी तरह चौपट हो गया था और वे मुझे घूरते हुए करवट ले कर सो गए थे बस मेरी आंखों में नींद नहीं थी. अगले दिन अमन को जल्दी औफिस जाना था पर जैसे ही वे सुबह उठे तो बाथरूम पर मां का कब्जा था उन्हें सुबह जल्दी नहाने का आदत जो थी. बाथरूम बंद देख कर अमन अपना आपा खो बैठे.

‘‘विनू मैं लेट हो जाऊंगा मम्मी से कहो हमारे औफिस जाने के बाद नहाया करें उन्हें कौन सा औफिस जाना है.’’

‘‘अरे औफिस नहीं जाना है तो क्या हुआ बेटा चाय तो पीनी है न और तुम जानते हो कि मैं बिना नहाए चाय भी नहीं पीती.’’ मां ने बाथरूम से बाहर निकल कर सफाई देते हुए कहा. जिंदगीभर अपनी शर्तों पर जीतीं आईं मां के लिए स्वयं को बदलना बहुत मुश्किल था और अमन मेरे साथ कोऔपरेट करने को तैयार नहीं थे. इस सब के बीच मैं खुद को तो भूल ही गई थी. किसी तरह तैयार हो कर लेटलतीफ बैंक पहुंचती और शाम को बैंक से निकलते समय दिमाग में बस घर की समस्याएं ही घूमतीं. इस से मेरा काम भी प्रभावित होने लगा था. मेरी हालत ज्यादा दिनों तक बैंक मैनेजर से छुपी नहीं रह सकी और एक दिन मैनेजर ने मुझे अपने केबिन में बुला ही भेजा.

‘‘बैठो विनीता क्या बात है पिछले कुछ दिनों से देख रही हूं तुम कुछ परेशान सी लग रही हो. यदि कोई ऐसी समस्या है जिस में मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं तो बताओ. अपने काम में सदैव परफैक्शन को इंपोर्टैंस देने वाली विनीता के काम में अब खामियां आ रही हैं इसीलिए मैं ने तुम्हें बुलाया.’’

‘‘नहीं मैम ऐसी कोई बात नहीं है बस कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं चल रही है. सौरी अब मैं आगे से ध्यान रखूंगी.’’ कह कर मैं मैडम के केबिन से बाहर आ गई. क्या कहूं मैडम से कि बेटियां कितनी भी पढ़ लिख लें, आत्मनिर्भर हो जाएं पर अपने मातापिता को अपने साथ रखने या उन की जिम्मेदारी उठाने के लिए पति का मुंह ही देखना पड़ता है.

एक पति अपनी पत्नी से अपने मातापिता की सेवा करवाना तो पसंद करता है परंतु सासससुर की सेवा करने में अपनी हेठी समझता है. समाज की इस दोहरी मानसिकता से अमन भी अछूता नहीं था. यदि वह चाहता तो मां के साथ भलीभांति तालमेल बैठा कर नित नई उत्पन्न होने वाली समस्याओं को काफी हद तक कम कर सकता था. यों भी हम दोनों मिल कर अब तक के जीवन में आई प्रत्येक समस्या का सामना करते ही आए थे परंतु जब से मां आई हैं अमन ने उसे अकेला कर दिया. बीती यादों को सोचतेसोचते कब उस की आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला.

सुबह बैड के बगल की खिड़की के झीने परदों से आती सूरज की मद्धिम रोशनी और चिडि़यों की चहचहाहट से उस की नींद खुल गई. तभी अमन ने चाय की ट्रे के साथ कमरे में प्रवेश किया, ‘‘उठिए मैडम मेरे हाथों की चाय से अपने संडे का आगाज कीजिए.’’

‘‘ओह क्या बात है आज तो मेरा संडे बन गया,’’ मैं फ्रैश हो कर चाय का कप ले कर अमन के बगल में बैठ गई.

‘‘तो आज संडे का क्या प्लान है मैडम, मम्मी और अवनि भी आते ही होंगे.’’

‘‘मम्मा आज हम लोग वंडरेला पार्क चलेंगे फोर होल डे इंजौयमैंट. चलोगे न मम्मा और नानी भी हमारे साथ चलेंगी.’’ मां के साथ वाक करके  लौटी अवनि ने हमारी बातें सुन कर संडे का अपना प्लान बताया.

‘‘हांहां हम सब चलेंगे. चलो जल्दी से ब्रेकफास्ट कर के सब तैयार हो जाओ.’’ मेरे बोलने से पहले ही अमन ने घोषणा कर दी. पूरे दिन के इंजौयमैंट के बाद लेटनाइट जब घर लौटे तो सब थक कर चूर हो चुके थे सो नींद के आगोश में चले गए. मुझे लेटते ही वह दिन याद आ गया जब मां के आने के बाद एक दिन यूएस से अमन की मां ने फोन कर के बताया कि अगले हफ्ते वे इंडिया वापस आ रहीं हैं. 4 साल पहले अमन के पिता का एक बीमारी के चलते देहांत हो गया था. उस के बाद से उन की मां ने ही अपने दोनों बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया. अमन 2 ही भाई बहन हैं जिन में दीदी की शादी एक एनआरआई से हुई तो वे विवाह के बाद से ही अमेरिका जा बसीं थी. पिछले दिनों उन की डिलीवरी के समय मम्मीजी वहां गई थीं और अब उन का वापसी का समय हो गया था सो आ रही थीं. दोनों बच्चे अपनी मां से बहुत अटैच्ड हैं. उस दिन मैं बैंक से वापस आई तो अमन का मुंह फूला हुआ था. जैसे ही मां सोसाइटी के मंदिर में गईं थी वे फट पड़े.

‘‘अब बताओ मेरी मां कहां रहेंगी? क्या सोचेंगी वे कि मेरे बेटे के घर में तो मेरे लिए जगह तक नहीं है. आखिर इंडिया में है ही कौन मेरे अलावा जो उन्हें पूछेगा. तुम्हारे तो और भाईबहन भी हैं मैं तो एक ही हूं न मेरी मां के लिए.’’

‘‘अमन थोड़ी शांति तो रखो, आने दो मम्मीजी को सब हो जाएगा. मैं ने कहां मना किया है उन की जिम्मेदारी उठाने से पर अपनी मां की जिम्मेदारी भी है मेरे ऊपर. यह कह कर कि और भाईबहन उन्हें रखेंगे अपने पास मैं कैसे अकेला छोड़ दूं उन्हें. आखिर मेरा भी पालनपोषण उन्होंने ही किया है.’’

मेरी इतनी दलीलों में से एक भी शायद अमन को पसंद नहीं आई थी और वे अपने फूले मुंह के साथ बैडरूम में जा कर टीवी देखने लगे थे. एक सप्ताह बाद जब सासू मां आईं तो मैं बहुत डरी हुई थी कि अब न जाने किन नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. यद्यपि मैं अपनी सास की समझदारी की शुरू से ही कायल रही हूं. परंतु मेरी मां को यहां देख कर उन की प्रतिक्रिया से तो अंजान ही थी.

मैं ने सासूमां के रहने का इंतजाम भी मां के कमरे में ही कर दिया था जो अमन को पसंद तो नहीं आया था परंतु 2 बैडरूम में फ्लैट में और कोई इंतजाम होना संभव भी नहीं था. मेरी मां की अपेक्षा सासू मां कुछ अधिक यंग, खुशमिजाज समझदार और सकारात्मक विचारधारा की थीं. मेरी भी उन से अच्छी पटती थी. इसीलिए तो उन के आने के दूसरे दिन अवसर देख कर अपनी सारी परेशानियां बयां करते हुए रो पड़ी थी मैं.

उन्होंने मुझे गले लगाया और बोलीं, ‘‘तू चिंता मत कर मैं कोई समाधान निकालती हूं. सब ठीक हो जाएगा.’’ उन की अपेक्षा मेरी मां का जीवन के प्रति उदासीन और नकारात्मक होना स्वाभाविक भी था क्योंकि पहले बेटे की चाह में बेटियों की कतार फिर बेटेबहू की उपेक्षा आखिर इंसान की सहने की भी सीमा होती है. परिस्थितियों ने उन्हें एकदम शांत, निरुत्साही बना दिया था. वहीं सासूमां के 2 बच्चे और दोनों ही वैल सैटल्ड.

दोचार दिन सब औब्जर्व करने के बाद उन्होंने अपने साथ मां को भी मौर्निंग वाक पर ले जाना प्रारंभ कर दिया था. वापस आ कर दोनों एकसाथ पेपर पढ़ते हुए चाय पीतीं थी जिस से अमन और मुझे अपने पर्सनल काम करने का अवसर प्राप्त हो जाता था. दोनों किचन में आ कर मेड की मदद करतीं जिस से मेरा काम बहुत आसान हो जाता. जब तक मैं और अमन तैयार होते मां और सासूमां मेड के साथ मिल कर नाश्ता टेबल पर लगा लेते. हम चारों साथसाथ नाश्ता करते और औफिस के लिए निकल जाते. अपनी मां को यों खुश देख कर अमन भी खुश होते. कुल मिला कर सासूमां के आने से मेरी कई समस्याओं का अंत होने लगा था. सासूमां को देख कर मेरी मां भी पौजिटिव होने लगीं थी. एक दिन जब हम सुबह नाश्ता कर रहे थे तो सासूमां बोलीं, ‘‘विनीता आज से अवनि अपनी दादीनानी के साथ सोएगी. कितनी किस्मत वाली है कि दादीनानी दोनों का प्यार एक साथ लेगी क्यों अवनि.’’

‘‘हां मां, अब से मैं आप दोनों के नहीं बल्कि दादीनानी के बीच में सोऊंगी. उन्होंने मुझे रोज एक नई कहानी सुनाने का प्रौमिस किया है.’’ अवनि ने भी चहकते हुए कहा.

इस बात से अमन भी बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें उन का पर्सनल स्पेस वापस जो मिल गया था. सासूमां के आने के बाद मैं ने भी चैन की सांस ली थी. और बैंक पर वापस ध्यान केंद्रित कर लिया था. अब 3 माह तक हमारे बीच रह कर सासूमां वापस कुछ दिनों के लिए दिल्ली चलीं गई थीं. पर इन 3 महीनों में उन्होंने मेरे लिए जो किया वह मैं ताउम्र नहीं भूल सकती. सच में इंसान अपनी सकारात्मक सोच और समझदारी से बड़ी से बड़ी समस्याओं को भी चुटकियों में हल कर सकता है जैसा कि मेरी सासूमां ने किया था. मां के मेरे साथ रहने पर भी उन्होंने खुशी व्यक्त करते हुए कहा था.

‘‘जब मेरी बेटी मेरा ध्यान रख सकती है तो मेरी बहू अपनी मां का ध्यान क्यों नहीं रख सकती और मुझे फक्र है अपनी बहू पर कि अपने 3 अन्य भाईबहनों के होते हुए भी उस ने अपनी जिम्मेदारी को समझा और निभाया.’’ तभी तो उन के जाने के समय मैं फफकफफक कर रो पड़ी थी और उन के गले लग के बोली थी, ‘‘मां जल्दी आना.’’ Hindi Story

Story : बसंती

Story. गांव का एकलौता पुरोहित भोला इस बात से पूरी तरह वाकिफ था कि मरने से पहले बसंती की मां बेटी के पास कुछ चांदी के सिक्के व जेवरात छोड़ गई है, जिसे किसी बहाने से हासिल कर के वह कुछ दिनों के लिए अपनी बदहाली तो दूर कर ही सकता है.

थोड़ी देर में ही पूजा का काम खत्म कर उस ने एक गहरी नजर से बीमार सुमन की ओर देखा. फिर बसंती की ओर मुखातिब हो कर बोला, तेरी बेटी को कोई प्रेतात्मा परेशान कर रही है. अब इसे बचाना बड़ा मुश्किल है. अच्छा होगा कि तू इस मनहूस बच्ची का मोह छोड़ कर फिर से गोद भरने की कोशिश करे.

पुरोहित से ऐसा जवाब सुन कर बसंती दुखी आवाज में बोली, बाबा, अगर मेरी एकलौती बेटी मर गई, तो फिर मैं अपनी सूनी गोद ले कर यह पहाड़ सी जिंदगी कैसे काट पाऊंगी? बसंती की इस कमजोरी से पुरोहित को अपने अंधविश्वास का तीर सही निशाने पर लगने का एहसास हुआ. उस ने सहज ही यह जान लिया कि अब देरसवेर वह उस की झोली  में जरूर आ गिरेगी.

पुरोहित भोला मन ही मन मुसकराते हुए मीठी आवाज में बोला, तेरी मां अपने मन में धनदौलत का मोह लिए ही मर गई, इसलिए उस की आत्मा प्रेतलोक में बेचैन भटक रही है. अब वही बेचैन आत्मा प्रेतलोक से लौट कर इस घर में आ बैठी है, जिस के असर से तेरी गोद और सुमन की जिंदगी दोनों खतरे में है.

तो फिर इस प्रेतात्मा से पीछा छुड़ाने का कोई उपाय बताइए बाबा? बसंती ने सहमते हुए पूछा. तुम फौरन अपनी मां के सारे जेवरात और चांदी के सिक्के अपने हाथ से छू कर किसी ब्राह्मण को दान कर दो. उसी दान की बदौलत सुमन को एक नई जिंदगी मिलेगी और तुम्हें मां बनने का सुनहरा मौका.

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पुरोहित की कही बात पर गंवार बसंती ने पूरी तरह यकीन कर लिया. फिर भी वह अपनी लाचारी जाहिर करते हुए बोली, “लेकिन बाबा, मैं तो बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर पहले से ही अपने सारे जेवर बेच चुकी हूं, अब इस हाल में मां के जेवर भी दान में दे दूंगी, तो फिर वक्त पड़ने पर किस के आगे हाथ पसारने जाऊंगी? कौन सहारा देगा मुझे ’’

बसंती की मजबूरी को सुन कर पुरोहित को अपना खेल बिगड़ता नजर आया. लेकिन तुरंत ही लोभ का दूसरा पासा फेंकते हुए वह बोला, ‘‘क्या तेरे मन में बेटा पाने की तनिक भी लालसा नहीं है?’’ ‘‘लालसा तो कब से लगी है…’’ बसंती झेंपते  हुई बोली, ‘‘सिर्फ एक बेटे की कमी से मेरी पूरी जिंदगी बोझ जैसी बन गई है. एक बेटा पाने के लिए मैं कब से तरस रही हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, कल सुबह तुम अपनी मां के सारे जेवर मुझे दान में दे देना. फिर देखना, मैं तेरे अंधेरे घर में कितनी जल्दी उजाला कर देता हूं,’’ इतना कहते हुए भोला की नजर बसंती की देह से फिसलती हुई वहां जा कर ठहर गई, जहां लोहे की पुरानी संदूकची पड़ी हुई थी.

अब बसंती को पुरोहित की नीयत समझने में जरा भी देर नहीं हुई, पर घर में अकेली और देह से कमजोर बसंती मन मसोस कर रह गई. ‘‘अब क्या सोचने लगी?’’ भोला ने उसे टोका, ‘‘क्या मेरा सुझाव ठीक नहीं लगा?’’ ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ बसंती ने ऊंची आवाज में नफरत से कहा, ‘‘अपनी गोद दोबारा भरने के लिए मां के कीमती जेवर किसी और के हाथ में देने की हिम्मत मुझ में नहीं है.’’

बसंती के इस रूखे बरताव ने पुरोहित के लहलहाते अरमानों पर ओले बरसा दिए. फिर भी पुरोहित ने हार नहीं मानी और धीमी आवाज में बोला, ‘‘जब बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर तुम ने अपने जेवर बेच दिए, तो दोबारा मां बनने की उम्मीद में तुम अपनी मां के पुराने गहने पुरोहित को दान में नहीं दे सकतीं? जानती नहीं, पुरोहित को दिया हुआ दान लोकपरलोक दोनों को सुधारता है?’’

पुरोहित ने एक बार फिर उस संदूकची की ओर देखा, तो बसंती का रोमरोम एक अनजाने खौफ से सिहर उठा. अभी वह खामोश खड़ी थी कि पुरोहित की पत्नी कमला पति को तलाशती हुई वहां आ पहुंची और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्योंजी, यजमानी के इस काम से जो आमदनी होती है, उसे आप शराब और गांजा पीने में उड़ा देते हैं, फिर यह धंधा सिर पर ढोने से क्या फायदा, जब घर में बीवीबच्चे रोटी के लिए तरस रहे हों?’’

‘‘ठीक है, आज का ‘सीधा’ बसंती बहू से ले लो और घर जा कर भोजन बनाओ,’’ पुरोहित ने पत्नी को टालने की नीयत से कहा और जल्दी से पोथीपतरा समेट कर दूसरे यजमान के घर कथा बांचने चला गया.

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भोला के जाते ही ‘सीधा’ लेने के लिए ठहरी कमला बसंती को उदास देख कर संजीदगी से पूछ बैठी, ‘‘इस पूजापाठ के पीछे तेरी क्या मुराद है बहू?’’ ‘‘मासूम बेटी की सलामती, जो अब मुमकिन नहीं लगती.’’ ‘‘ऐसा क्यों?’’ कमला उतावली हो कर पूछ बैठी, ‘‘क्या इस पूजापाठ पर तुझे बिलकुल भरोसा नहीं?’’ ‘‘भरोसा तो है चाची, लेकिन आज के पुरोहित पूजापाठ की ओट में अपने यजमान को उलटा पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए हैं. धर्मकर्म के नाम पर अब ये ढोंगी अपने यजमान का धन और धर्म दोनों लूट लेना चाहते हैं.’’

‘‘यह तुम क्या बकने लगी बहू?’’ कमला हैरत से बोली, ‘‘मैं ने क्या पूछा और तू जवाब क्या देने लगी?’’ ‘‘सच कहती हूं चाची…’’ बसंती का गला भर आया, ‘‘बेटी की लंबी बीमारी ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया है और इसी आफत में पुरोहितजी दोबारा गोद भरने का लालच दे कर मेरा सबकुछ ठग लेना चाहते हैं.’’ बसंती की पीड़ा सुन कर कमला का दिमाग झनझना उठा. उस के हाल पर तरस खा कर वह बोली, ‘‘ठीक है बहू, इस समय मैं खाना बनाने जा रही हूं. लेकिन शाम को इस बारे में तुम से फिर बात करूंगी.’’

शाम को कमला बसंती से मिल कर उस की आपबीती से पूरी तरह वाकिफ हो चुकी थी. दूसरे दिन सुबह पुरोहित जैसे ही कथा बांचने के लिए बसंती के घर पहुंचा, तो उस के पीछेपीछे कमला भी आ गई. पत्नी को इस तरह आया देख पुरोहित अपनी लाल आंखों से उसे घूरते हुए रूखे स्वर में बोला, ‘‘आज सुबह से ही तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो? क्या चाहती हो तुम?’’ ‘‘बस यही कि अब आप यह यजमानी का पेशा छोड़ दीजिए,’’ कमला ने कहा. ‘‘वह क्यों?’’ भोला ने हैरत से पूछा.

‘‘क्योंकि अब यह पेशा शरीफ ब्राह्मणों का सुकर्म नहीं, बल्कि खातेपीते ब्राह्मणों का कुकर्म बन गया है. अब यह पेशा पुरोहित और यजमान के पाक रिश्ते के बीच एक ऐसी दरार पैदा करता जा रहा है, जो आने वाले दिनों में दोनों की शराफत पर एक सवालिया निशान लगा सकता है,’’ कमला ने पति की ओर देख कर संजीदगी से कहा.

पुरोहित ने जोर से चीख कर कमला को एक जबरदस्त धक्का दिया, जिस से वह सामने की दीवार से जा टकराई और उस का सिर लहूलुहान हो गया. चोट बड़ी गंभीर लगी थी. कमला फूटफूट कर रो पड़ी, लेकिन भोला पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह गुस्से में अपनी पत्नी को और भी भलाबुरा कहने लगा.

पति की घुड़की से बेअसर कमला बरसती आंखों से उसे देखती हुई बोली, ‘‘आज मुझे भी पता चल गया है कि पुरोहित कितना नीच और घटिया इनसान होता है, जो अपने यजमान की मजबूरी पर तरस खाने के बजाय उस की दौलत व इज्जत लूटने को तैयार हो जाता है.

‘‘अब मेरे लिए विधवा की जिंदगी जी लेना आसान है, मगर किसी ढोंगी, लोभी, पाखंडी, ठग और धर्मकर्म का पेशा करने वाले पुरोहित की सुहागन बन कर जी लेना आसान नहीं. ऐसा कभी नहीं होगा.’’ इतना कह कर कमला जैसे ही वहां से चलने को हुई कि अचानक पुरोहित के भीतर का इनसान जाग उठा और कमला के सिर पर हाथ रखते हुए वह भरे गले से बोला, ‘‘तेरी कसम, यह पूजापाठ, हवन, जाप, लोकपरलोक, पुरोहित और यजमान सब बनावटी बातें हैं.”

‘‘अब इस गलत काम को मैं कभी नहीं दोहराऊंगा. ऐसे दकियानूसी विचारों में कोरे अंधविश्वास व दिमागी वहम के सिवा कुछ और नहीं है. तुम आखिरी बार मुझे माफ कर दो.’’  फिर कमला बिना पति की ओर देखे बसंती की बीमार बेटी सुमन को गोद में उठा कर तेज कदमों से डाक्टर के पास चल पड़ी. Story

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