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विरोधाभास : सबीर का कैसा था चरित्र

मुजफ्फरपुर आए 2-3 दिन हो चुके थे. अभी मैं दफ्तर के लोगों को जानने, समझने, स्थानीय राजनीति की समीक्षा करने में ही लगा हुआ था. मेरा विभाग गुटबंदी का शिकार था. यूनियन 3 खेमों में बंटी थी और हर खेमा अपनी प्रमुखता और दूसरे की लघुता प्रमाणित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ता था. 3 गेंदों को एकसाथ हवा में उछालने वाला जादूगर बिस्मार्क मुझे रहरह कर याद आता था. अचानक, ‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं,’ का स्वर मेरे कानों में पड़ा. मैं काफी देर से फाइलों में उलझा हुआ था. इस स्वर में निहित विनम्रता तथा संगीतमय खनक ने मेरा ध्यान बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लिया. मैं ने गरदन ऊपर उठाई और चेहरे पर थोड़ी सी मुसकान ला कर कहा, ‘‘हांहां, आइए.’’

‘‘नमस्कार, सर. आप कैसे हैं?’’ आगंतुक सबीर अहमद ने बुलबुल की तरह चहकते हुए कहा. मैं ने हाथ के संकेत से उसे बैठने का इशारा कर दिया था. वह शायद संकेतों की भाषा में माहिर था. मुसकराते हुए मेरे सामने रखी कुरसियों में से एक पर बैठ गया.

‘‘मैं ठीक हूं. आप कैसे हैं, मि. अहमद?’’ मैं ने पूछा. ‘‘सर, पहली बात तो यह कि आप मुझे ‘मि. अहमद’ न कहें. यह बेहद औपचारिक लगता है. मेरी इल्तिजा है, मेरा अनुरोध है कि आप मुझे सबीर ही कहें. आप से हर मामले में छोटा हूं, उम्र में, नौकरी में, पद में, प्रतिष्ठा में…’’

‘‘बसबस, आगे कुछ मत कहिए, सबीर साहब. तारीफ जब सीमा लांघने लगती है तो उस में चापलूसी की बू आ जाती है, जो कहने और सुनने वाले, यानी दोनों के लिए नुकसानदेह होती है,’’ मैं ने प्यार से मुसकराते हुए कहा तो सबीर ने बड़ी अदा से सिर झुका कर आंखें बंद कर हथेलियों को माथे से सटाया.

मैं ने कहा, ‘‘और दूसरी बात क्या है?’’ ‘‘सर, दूसरी बात यह है कि आप बड़े चिंतित लग रहे हैं, पर ऊपर से सामान्य दिख रहे हैं. कृपया इसे चापलूसी न समझें. अगर आप मुझे अपने छोटे भाई की जगह दें तो मुझे बहुत खुशी होगी.’’

पता नहीं क्यों, सबीर के स्वर में मुझे सचाई की झलक महसूस हुई और मैं ने घंटी बजा कर चपरासी को बुला कर कहा, ‘‘2 कौफी…’’ चपरासी के जाने के बाद मैं ने गहरी सांस ली. अंदर की सारी परेशानी मानो थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गई.

‘‘मैं गुडि़या और डौली के दाखिले को ले कर बहुत परेशान हूं. महिला कालेज में कई बार जा चुका हूं, पर रिसैप्शनिस्ट हर बार एक ही जवाब देती है कि सीट नहीं है. बेचारी लड़कियां नाउम्मीद सी हो गई हैं,’’ मैं ने कहा. ‘‘सर, आप बेफिक्र रहें, समझ लें कि यह काम हो गया. मैं वाइस चांसलर को जानता हूं. उन से कह कर यह काम करा लूंगा. बस, इस नाचीज को 24 घंटे की मुहलत दे दें और दोनों बेटियों के कागजात भी मुझे दे दें,’’ उस ने इतमीनान से कहा.

‘‘शुक्रिया, दोस्त. अगर यह काम हो गया तो मैं चैन की सांस ले सकूंगा,’’ मैं ने कहा. तभी कौफी आ गई और सबीर मुझे कौफी पर कई शेर सुनाता चला गया. उस की आवाज तो दिलकश थी ही, शेरों का चयन भी उम्दा था. मैं ने उस की खूब तारीफ की. थोड़ी देर बाद मुसकराता हुआ वह कागजात ले कर चला गया.

अगले दिन वह दोपहर के भोजन के समय मेरे घर पर आ गया. मुझे देखते ही बोला, ‘‘सर, दाखिला हो गया. यह रही रसीद और ये रहे बाकी पैसे.’’ डौली और गुडि़या, जो बेमन से खाना सजा रही थीं, यह बात सुनते ही उछल पड़ीं.

‘‘यह तुम्हारे सबीर चाचा हैं. इन्होंने ही इस काम को करवाया,’’ मैं ने बेटियों से कहा तो दोनों ने उन्हें धन्यवाद दिया. पत्नी ने अपनी खुशी का इजहार, ‘सबीर भाईसाहब, खाना खा कर ही जाइएगा,’ कह कर किया.

सबीर ने पहले तो इनकार किया, पर मां, बेटियां उस पर इतनी मेहरबान थीं कि बिना खिलाए जाने ही नहीं दिया. 2 दिनों बाद रविवार था. मैं बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था. अचानक सबीर को जीप से उतरते देखा. ‘यह तो मोटरसाइकिल सवार है, जीप से कैसे?’ मैं अभी सोच ही रहा था कि ड्राइवर ने पीछे से 2 गैस सिलिंडर उतारे और सबीर के निर्देश पर भीतर ले आया.

उसी समय मेरी पत्नी भी बाहर आ गई. गैस सिलिंडर देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई. शायद मैं ने उसे बहुत कम मौकों पर इतना पुलकित देखा था. वह खिलखिलाती हुई बोली, ‘‘वाह, भाईसाहब, वाह, स्टोव से पीछा छुड़ाने का लाखलाख शुक्रिया.’’ सबीर नए दूल्हे की तरह शरमाता हुआ बोला, ‘‘इस में शुक्रिया काहे का, मालूम होता तो यह काम पहले ही हो जाता.’’

‘‘पर तुम्हें गैस के लिए किस ने और कब कहा?’’ मैं ने परेशान होते हुए पूछा. ‘‘मैं ने कहा था जब उस दिन आप स्नानघर में घुसे हुए थे. इन्होंने पूछा, ‘और कोई सेवा?’ और मैं ने अपना दुखड़ा सुना दिया,’’ जवाब पत्नी ने दिया.

‘‘पर यह सब करनेकराने की क्या जरूरत थी, 2-4 माह स्टोव पर ही…’’ मैं ने पत्नी पर नाराजगी उतारते हुए कहा, ‘‘तुम यूनियन वालों को नहीं जानतीं, वे लोग हंगामा खड़ा कर देंगे कि क्षेत्रीय प्रबंधक स्टाफ को अपना घरेलू नौकर समझते हैं. बनीबनाई इज्जत धूल में मिल जाएगी.’’ ‘‘सर, मैं ने आप से प्रार्थना की थी कि मुझे अपना छोटा भाई समझें. क्या भाभीजी का छोटामोटा काम आप के भाई नहीं करते? क्या घर वाले एकदूसरे पर एहसान करते हैं?’’ उस ने दुखी स्वर में कहा.

‘‘माफ करना, भई, मेरा इरादा तुम्हें दुख पहुंचाना नहीं था, पर…’’ कहतेकहते मैं रुक गया. मुझे शब्द ही नहीं मिल रहे थे. ‘‘परवर कुछ नहीं, सर, डीएम का पीए मेरा भाई है, उसी से कह कर महीनों का काम कुछ दिनों में करवा लिया, वरना गैस एजेंसी वाले तो ऐसा चक्कर डालते हैं कि कभीकभी 2 साल भी लग जाते हैं. मैं आखिर किस मर्ज की दवा हूं…’’

मेरा परिवार सबीर पर फिदा था. पत्नी तो उसे घर का सदस्य ही समझती थी. चंद दिनों में उस ने राशनकार्ड भी बनवा दिया. घर की हर जरूरत, हर समस्या वह ‘भाभीजी’ यानी मेरी श्रीमती की इच्छानुसार पूरी करवाता. सबीर की निकटता ने मुझे यूनियन के झगड़ों से भी मुक्त कर दिया था. वह सभी गुटों का काम करता, करवाता. सब के बच्चों के दाखिले और शादीब्याह वगैरा में मदद करता. वह सब की आंखों का तारा, हरदिल अजीज सबीर भाई था.

वह औफिस के काम में भी बहुत चुस्त था. जो सूचना चाहिए, सबीर अहमद मिनटों में दे देता. औफिस के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तो वह जान ही था. अकसर मैं सोचता, ‘प्रकृति ने इस आदमी में एकसाथ इतने गुणों को भर दिया है कि सामने वाला न चाहते हुए भी खुद को इस पर निर्भर मानता है.’

वह मोतिहारी में क्षेत्राधिकारी था. मुजफ्फरपुर से मोतिहारी की दूरी 80-85 किलोमीटर है, पर उस के लिए यह सामान्य सी बात थी. मैं अभी मोतिहारी गया भी नहीं था, सारे क्षेत्राधिकारी महीने में 1-2 बार मुख्यालय आते और आवश्यक जानकारी दे जाते. एक दिन सबीर ने प्रार्थनापत्र देते हुए कहा, ‘‘सर, मैं ने मोतिहारी में किराए का मकान ले लिया है, गांव से पत्नी और बच्चों को ले आया हूं. सरकारी नियमों के अनुसार, मकान में दफ्तर रखने पर किराया मिल जाता है, आप निरीक्षण कर लेते और ओसीआर यानी औफिस कम रैजीडैंस प्रमाणपत्र दे देते तो मुझे प्रतिमाह 15 सौ रुपए मिल जाते.’’

‘‘ठीक है, पता मेरे ड्राइवर को बता दो. मैं अगले सप्ताह मोतिहारी कार्यालय का निरीक्षण करने आऊंगा तो यह कार्य भी कर दूंगा.’’ ‘‘शुक्रिया, सर,’’ कहता हुआ वह उठ खड़ा हुआ. थोड़ी देर बाद उस की मोटरसाइकिल के स्टार्ट होने की आवाज आई, जो धीरेधीरे दूर होती चली गई.

मैं ने पान की पीक थूकने के लिए खिड़की का परदा उठाया. आसमान पर हलकेहलके बादल तैर रहे थे, धूप की चमक फीकी हो रही थी, जो कि वर्षा आने का संकेत था. मौसम तेजी से बदल रहा था, जो कि स्वास्थ्य के लिए बुरा था.

मोतिहारी में सबीर का मकान ढूंढ़ना नहीं पड़ा. चांदमारी महल्ले के मोड़ पर ही सबीर मुझे पान की एक दुकान पर मिल गया. फिर अपने मकान पर ले गया. बाहर नेमप्लेट पर लिखा था, ‘सबीर अहमद, फील्ड औफिसर, इफको.’ वह मुझे बैठक में ले गया. कमरे को दफ्तर कहना ज्यादा श्रेष्ठ था. एक बड़ी सी मेज व 6 कुरसियां लगी थीं. मेज पर मेरे विभाग का कैलेंडर रखा था, डायरी थी, फाइलें थीं और कागज आदि थे. दीवार पर विभागीय मोनोग्राम लटका हुआ था. एक कोने में सोफासैट था, हम उस पर बैठ गए.

थोड़ी देर बाद 8-9 वर्ष की प्यारी सी गुडि़या कौफी ले कर आई. उस ने सलीके से ‘नमस्ते, अंकल,’ कहा और ट्रे मेज पर रख कर बाहर चली गई. सबीर ने हंस कर कहा, ‘‘बड़ी शरमीली बिटिया है.’’ मैं ने कहा, ‘‘नहीं, बड़ी प्यारी बिटिया है.’’

इस पर हम दोनों हंस पड़े. सबीर फाइलें लाता रहा, मुझे दिखाता रहा और अपने बारे में भी बताता रहा. उस ने कहा कि एक कमरे में उस की गर्भवती बहन रह रही है, जो प्रसव के लिए आई है, दूसरे में उस का परिवार है. बैठक को औफिस बना लिया है. एक स्टोर, रसोई और भोजनकक्ष है.

कुछ देर बाद वह भीतर गया और जल्दी ही लौट कर बोला, ‘‘सर, खाना तैयार है, अम्मी बुला रही हैं.’’ निरीक्षण के दौरान उस के घर खाना खाना मेरे अुनसार गलत कार्य था. मैं ने मना कर दिया, मगर उस के पैने तर्कों के आगे मेरे सिद्धांत फीके लग रहे थे. वह मां की ममता का वास्ता दे रहा था, ‘‘अम्मी बहुत दुखी हो जाएंगी. वे कह रही हैं कि हम मुसलमान हैं, इसलिए हमारे घर का खाना…’’

अंत में मुझे भोजन के लिए उठना ही पड़ा. पता नहीं मन की किस भावना ने मुझे खाने से ज्यादा उस की भावना के प्रति नतमस्तक कर दिया. रसोई सामने थी. एक बूढ़ी, विधवा औरत वहां मौजूद थी. मैं ने ‘प्रणाम, माताजी,’ कहा तो उन्होंने ‘जीते रहो, भैया,’ कह कर ममता का सागर उड़ेल दिया. खाना शाकाहारी व बेहद स्वादिष्ठ था. 2 स्त्रियां दूसरे कमरे में दिखीं, मगर मैं ने सोचा ‘परदे की वजह से शायद वे सामने नहीं आईं.’ चलते समय वह बच्ची फिर आई और ‘नमस्ते, अंकलजी, फिर कभी आएइगा,’ कह कर अपने नन्हे हाथों से बायबाय कर गई. मैं संतुष्ट था, उस का मकान वास्तव में 15 सौ रुपए के लायक था, उस में दफ्तर मौजूद था ही, परिवार भी रहता था. मैं ने तुरंत ही ओसीआर रिपोर्ट पटना भेज दी. कुछ दिनों बाद उस की स्वीकृति भी आ गई और सबीर को हर माह 15 सौ रुपए मिलने लगे.

लगभग 4-5 महीने बाद मेरे बड़े भाई की लड़की की शादी मोतिहारी में होनी तय हुई. लड़का तो दिल्ली में नौकरी करता था. पर उस के मातापिता मोतिहारी में ही रहते थे. भैया को केवल उन का नाम और चांदमारी महल्ला ही पता था. अचानक बादलों में जैसे बिजली कौंध गई, सबीर का खयाल आते ही मैं स्फूर्ति से भर उठा. ड्राइवर ने मोतिहारी में सबीर के मकान के आगे गाड़ी रोकी. मैं अभी गाड़ी से उतर भी नहीं पाया था कि सबीर की नन्ही सी प्यारी सी, बिटिया ने ‘नमस्ते, अंकल,’ कहा.

मैं ने बिस्कुट का पैकेट बच्ची को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘बेटा, पापा घर पर हैं?’’

‘‘जी हां.’’ थोड़ी देर में एक सज्जन अंदर से आए. लंबा कद और आंखों पर चश्मा. मैं ने पूछा, ‘‘सबीर घर पर हैं क्या?’’

वे हैरानी से बोेले, ‘‘कौन सबीर?’’ मैं ने प्रत्युत्तर में पूरी दास्तान सुनाते हुए कहा, ‘‘आप सबीर को नहीं जानते?’’

‘‘अच्छाअच्छा, सबीर साहब, देखिए, उस दिन एक रोज के लिए यह घर उन्होंने एक हजार रुपए किराए पर लिया था. मेरी ‘नेमप्लेट’ उतारी गई और उन की पहचान टांगी गई और नौकरानी ने मां बन कर खाना खिलाया. मेरी बेटी ने उन की बेटी की भूमिका निभाई. बस, खेल खत्म पैसा हजम.’’ मैं ने वितृष्णा से कहा, ‘‘शर्म आनी चाहिए.’’

वे छूटते ही बोले, ‘‘किसे? मुझे या सबीर साहब को? अरे साहब, यह सब इस बिहार में दाल में नमक के बराबर भी नहीं, समुद्र में एक चम्मच चीनी मिलाने जैसा है. यहां आएदिन घोटाले हो रहे हैं, मंत्री अरबों लूट रहे हैं तो सरकारी कर्मचारी हरिश्चंद्र क्यों बने रहें?’’ मैं वापस चल पड़ा. नुक्कड़ पर पान वाले से आ कर पता पूछा. आज उस से अंतिम फैसला करना है. मैं गुस्से से उबल रहा था. मेरा विश्वास, मेरी ईमानदारी को सबीर ने दांव पर लगा दिया था.

पान वाले ने उस का नाम सुनते ही कहा, ‘‘हां साहब, जानते हैं हम. उन्हें हम ही क्या, इस शहर का हर पान वाला एक उम्दा इंसान समझता है. बड़े रईस आदमी हैं, मोतिहारी के चांदमारी में भी एक मकान है, चकिया में स्वयं रहते हैं. पीपराकोड़ी में उन का विशाल फार्महाउस है, वहां मेरा भाई दरबान है, हुजूर.’’ ‘स्वयं चकिया में, फार्महाउस पीपराकोठी में और पता चांदमारी का. वाह रे सबीर, क्या गुल खिलाया है तुम ने,’ मैं ने मन ही मन भन्नाते हुए कहा. मूड खराब हो चुका था. सो, लौट जाने का निर्णय किया.

अचानक मैं ने ड्राइवर से पीपराकोठी फार्महाउस चलने को कहा. ज्यादा परेशानी नहीं हुई. मुख्य सड़क से 14-15 किलोमीटर अंदर झखराग्राम में उस का फार्महाउस मिल गया. दरबान को उस के भाई का हवाला दिया तो उस ने विशाल फाटक खोल दिया. अंदर किले सा दृश्य था. चमचमाती सड़क और सुंदर सा गैस्टहाउस. गैस्टहाउस के पीछे एक विशाल गोदाम और वहां खड़े दर्जनों ट्रक. मैं ने वहां खड़े एक व्यक्ति से कहा, ‘‘मैं सीबीआई इंस्पैक्टर राणा हूं.’’

फार्महाउस में इफको खाद में नदी की बारीक रेत मिलामिला कर 1 टन खाद को 3 टन बनाया जा रहा था और करोड़ों रुपए गैरमामूली तौर पर कमाए जा रहे थे. पूछताछ से ज्ञात हुआ कि इस काले व्यापार में मंत्री महोदय भी बराबर के हिस्सेदार हैं. मैं सबीर के चरित्र के इस विरोधाभास पर हतप्रभ था.

परवरिश : सोचने पर क्यों विवश हुई सुजाता

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किसना : जिस्म बेचकर बना दी बेटी की जिंदगी

झारखंड का एक बड़ा आदिवासी इलाका है अमानीपुर. जिले के नए कलक्टर ने ऐसे सभी मुलाजिमों की लिस्ट बनाई, जो आदिवासी लड़कियां रखे हुए थे. उन सब को मजबूर कर दिया गया कि वे उन से शादी करें और फिर एक बड़े शादी समारोह में उन सब का सामूहिक विवाह करा दिया गया. दरअसल, आदिवासी बहुल इलाकों के इन छोटेछोटे गांवों में यह रिवाज था कि वहां पर कोई भी सरकारी मुलाजिम जाता, तो किसी भी आदिवासी घर से एक लड़की उस की सेवा में लगा दी जाती. वह उस के घर के सारे काम करती और बदले में उसे खानाकपड़ा मिल जाता. बहुत से लोग तो उन में अपनी बेटी या बहन देखते, मगर उन्हीं में से कुछ अपने परिवार से दूर होने के चलते उन लड़कियों का हर तरह से शोषण भी करते थे.

वे आदिवासी लड़कियां मन और तन से उन की सेवा के लिए तैयार रहती थीं, क्योंकि वहां पर ज्यादातर कुंआरे ही रहते थे, जो इन्हें मौजमस्ती का सामान समझते और वापस आ कर शादी कर नई जिंदगी शुरू कर लेते. मगर शायद आधुनिक सोच को उन पर रहम आ गया था, तभी कलक्टर को वहां भेज दिया था. उन सब की जिंदगी मानो संवर गई थी.

मगर यह सब इतना आसान नहीं था. मुखिया और कलक्टर का दबदबा होने के चलते कुछ लोग मान गए, पर कुछ लोग इस के विरोध में भी थे. आखिरकार कुछ लोग शादी के बंधन में बंध गए और लड़कियां दासी जीवन से मुक्त हो कर पत्नी का जीवन जीने लगीं.

मगर 3 साल बाद जब कलक्टर का ट्रांसफर हो गया, तब शुरू हुआ उन लड़कियों की बदहाली का सिलसिला. उन सारे मुलाजिमों ने उन्हें फिर से छोड़ दिया और  शहर जा कर अपनी जाति की लड़कियों से शादी कर ली और वापस उसी गांव में आ कर शान से रहने लगे.

तथाकथित रूप से छोड़ी गई लड़कियों को उन के समाज में भी जगह नहीं मिली और लोगों ने उन्हें अपनाने से मना कर दिया. ऐसी छोड़ी गई लड़कियों से एक महल्ला ही बस गया, जिस का नाम था ‘किस बिन पारा’ यानी आवारा औरतों का महल्ला.

उसी महल्ले में एक ऐसी भी लड़की थी, जिस का नाम था किसना और उस से शादी करने वाला शहरी बाबू कोई मजबूर मुलाजिम न था. उस ने किसना से प्रेम विवाह किया था और उस की 3 साल की एक बेटी भी थी. पर समय के साथ वह भी उस से ऊब गया, तो वहां से ट्रांसफर करा कर चला गया. किसना को हमेशा लगता था कि उस की बेटी को आगे चल कर ऐसा काम न करना पड़े. वह कोशिश करती कि उसे इस माहौल से दूर रखा जाए.

लिहाजा, उस को किसना ने दूसरी जगह भेज दिया और खुद वहीं रुक गई, क्योंकि वहां रुकना उस की मजबूरी थी. आखिर बेटी को पढ़ाने के लिए पैसा जो चाहिए था. बदलाव बस इतना ही था कि पहले वह इन लोगों से कपड़ा और खाना लेती थी, पर अब पैसा लेने लगी थी. उस में से भी आधा पैसा उस गांव की मुखियाइन ले लेती थी. उस दिन मुखियाइन किसना को नई जगह ले जा रही थी, खूब सजा कर. वह मुखियाइन को काकी बोलती थी. वे दोनों बड़े से बंगले में दाखिल हुईं. ऐशोआराम से भरे उस घर को किसना आंखें फाड़ कर देखे जा रही थी.

तभी किसना ने देखा कि एक तगड़ा 50 साला आदमी वहां बैठा था, जिसे सब सरकार कहते थे. उस आदमी के सामने सभी सिर झुका कर नमस्ते कर रहे थे.

उस आदमी ने किसना को ऊपर से नीचे तक घूरा और फिर रूमाल से मोंगरे का गजरा निकाल कर उस के गले में डाल दिया. वह चुपचाप खड़ी थी.

सरकार ने उस की आंखों में एक अजीब सा भाव देखा, फिर मुखियाइन को देख कर ‘हां’ में गरदन हिला दी.

तभी एक बूढ़ा आदमी अंदर से आया और किसना से बोला, ‘‘चलो, हम तुम्हारा कमरा दिखा दें.’’

किसना चुपचाप उस के पीछे चल दी. बाहर बड़ा सा बगीचा था, जिस के बीचोंबीच हवेली थी और किनारे पर छोटे, पर नए कमरे बने थे.

वह बूढ़ा नौकर किसना को उन्हीं बने कमरों में से एक में ले गया और बोला, ‘‘यहां तुम आराम से रहो. सरकार बहुत ही भले आदमी हैं. तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है…’’

किसना ने अपनी पोटली वहीं बिछे पलंग पर रख दी और कमरे का मुआयना करने लगी.

दूसरे दिन सरकार खुद ही उसे बुलाने कमरे तक आए और सारा काम समझाने लगे. रात के 10 बजे से सुबह के 6 बजे तक उन की सेवा में रहना था.

किसना ने भी जमाने भर की ठोकरें खाई थीं. वह तुरंत समझ गई कि यह बूढ़ा क्या चाहता है. उसे भी ऐसी सारी बातों की आदत हो गई थी.

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘हम अपना काम बहुत अच्छी तरह से जानते हैं सरकार, आप को शिकायत का मौका नहीं देंगे.’’

कुछ ही दिनों में किसना सरकार के रंग में रंग गई. उन के लिए खाना बनाती, कपड़े धोती, घर की साफसफाई करती और उन्हें कभी देर हो जाती, तो उन का इंतजार भी करती. सरकार भी उस पर बुरी तरह फिदा थे. वे दोनों हाथों से उस पर पैसा लुटाते.

एक रात सरकार उसे प्यार कर रहे थे, पर किसना उदास थी. उन्होंने उदासी की वजह पूछी और मदद करने की बात कही.

‘‘नहीं सरकार, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ किसना बोली.

‘‘देख, अगर तू बताएगी नहीं, तो मैं मदद कैसे करूंगा,’’ सरकार उसे प्यार से गले लगा कर बोले.

किसना को उन की बांहें किसी फांसी के फंदे से कम न लगीं. एक बार तो जी में आया कि धक्का दे कर बाहर चली जाए, पर वह वहां से हमेशा के लिए जाना  चाहती थी. उसे अच्छी तरह मालूम था कि यह बूढ़ा उस पर जान छिड़कता है. सो, उस ने अपना आखिरी दांव खेला, ‘‘सरकार, मेरी बेटी बहुत बीमार है. इलाज के लिए काफी पैसों की जरूरत है. मैं पैसा कहां से लाऊं? आज फिर मेरी मां का फोन आया है.’’

‘‘कितने पैसे चाहिए?’’

‘‘नहीं सरकार, मुझे आप से पैसे नहीं चाहिए… मुखियाइन मुझे मार देगी. मैं पैसे नहीं ले सकती.’’

सरकार ने उस का चेहरा अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मुखियाइन को कौन बताएगा? मैं तो नहीं बताऊंगा.’’

‘‘एक लाख रुपए चाहिए.’’

‘‘एक… लाख…’’ बड़ी तेज आवाज में सरकार बोले और उसे दूर झटक दिया. किसना घबरा कर रोने लगी.

‘‘अरे… तुम चुप हो जाओ,’’ और सरकार ने अलमारी से एक लाख रुपए निकाल कर उस के हाथ पर रख दिए, फिर उस की कीमत वसूलने में लग गए.

बेचारी किसना उस सारी रात क्याक्या सोचती रही और पूरी रात खुली आंखों में काट दी.

शाम को जब सरकार ने किसना को बुलाने भेजा था, तो वह कमरे पर नहीं मिली. चिडि़या पिंजरे से उड़ चुकी थी. आखिरी बार उसे माली काका ने देखा था. सरकार ने भी अपने तरीके से ढूंढ़ने की कोशिश की, पर वह नहीं मिली.

उधर किसना पैसा ले कर कुछ दिनों तक अपनी सहेली पारो के घर रही और कुछ समय बाद अपने गांव चली गई.

किसना की सहेली पारो बोली, ‘‘किसना, अब तू वापस मत आना. काश, मैं भी इसी तरह हिम्मत दिखा पाती. खैर छोड़ो…’’

किसना ने अपना चेहरा घूंघट से ढका और बस में बैठते ही भविष्य के उजियारे सपनों में खो गई. इन सपनों में खोए 12 घंटों का सफर उसे पता ही नहीं चला. बस कंडक्टर ने उसे हिला कर जगाया, ‘‘ऐ… नीचे उतर, तेरा गांव आ गया है.’’

किसना आंखें मलते हुए नीचे उतरी. उस ने अलसाई आंखों से इधरउधर देखा. आसमान में सूरज उग रहा था. ऐसा लगा कि जिंदगी में पहली बार सूरज देखा हो.

आज 30 बसंत पार कर चुकी किसना को ऐसा लगा कि जैसे जिंदगी में ऐसी सुबह पहली बार देखी हो, जहां न मुखियाइन, न दलाल, न सरकार… वह उगते हुए सूरज की तरफ दोनों हाथ फैलाए एकटक आसमान की तरफ निहारे जा रही थी. आतेजाते लोग उसे हैरत से देख रहे थे, तभी अचानक वह सकुचा गई और अपना सामान समेट कर मुसकराते हुए आगे बढ़ गई.

किसना को घर के लिए आटोरिकशा पकड़ना था. तभी सोचा कि मां और बेटी रोशनी के लिए कुछ ले ले, दोनों खुश हो जाएंगी. उस ने वहां पर ही एक मिठाई की दुकान में गरमागरम कचौड़ी खाई और मिठाई भी ली.

किसना पल्लू से 5 सौ का नोट निकाल कर बोली, ‘‘भैया, अपने पैसे काट लो.’’

दुकानदार भड़क गया, ‘‘बहनजी, मजाक मत करिए. इस नोट का मैं क्या करूंगा. मुझे 2 सौ रुपए दो.’’

‘‘क्यों भैया, इस में क्या बुराई है.’’

‘‘तुम को पता नहीं है कि 2 दिन पहले ही 5 सौ और एक हजार के नोट चलना बंद हो गए हैं.’’

किसना ने दुकानदार को बहुत समझाया, पर जब वह न माना तो आखिर में अपने पल्लू से सारे पैसे निकाल कर उसे फुटकर पैसे दिए और आगे बढ़ गई.

अभी किसना ढंग से खुशियां भी न मना पाई थी कि जिंदगी में फिर स्याह अंधेरा फैलने लगा. अब क्या करेगी? उस के पास तो 5 सौ और एक हजार के ही नोट थे, क्योंकि इन्हें मुखियाइन से छिपा कर रखना जो आसान था.

रास्ते में बैंक के आगे लगी भीड़ में जा कर पूछा तो पता लगा कि लोग नोट बदल रहे हैं. किसना को तो यह डूबते को तिनके का सहारा की तरह लगा. किसी तरह पैदल चल कर ही वह अपने घर पहुंची.

बेटी रोशनी किसना को देखते ही लिपट गई और बोली, ‘‘मां, अब तुम यहां से कभी वापस मत जाना.’’

किसना उसे प्यार करते हुए बोली, ‘‘अब तेरी मां कहीं नहीं जाएगी.’’

बेटी के सो जाने के बाद किसना ने अपनी मां को सारा हाल बताया. उस की मां ने पूछा, ‘‘अब आगे क्या करोगी?’’

किसना ने कहा, ‘‘यहीं सिलाईकढ़ाई की दुकान खोल लूंगी.’’

दूसरे दिन ही किसना अपने पैसे ले कर बैंक पहुंची, मगर मंजिल इतनी आसान न थी. सुबह से शाम हो गई, पर उस का नंबर नहीं आया और बैंक बंद हो गया.

ऐसा 3-4 दिनों तक होता रहा और काफी जद्दोजेहद के बाद उस का नंबर आया, तो बैंक वालों ने उस से पहचानपत्र मांगा. वह चुपचाप खड़ी हो गई.

बैंक के अफसर ने पूछा कि पैसा कहां से कमाया? वह समझाती रही कि यह उस की बचत का पैसा है.

‘‘तुम्हारे पास एक लाख रुपए हैं. तुम्हें अपनी आमदनी का जरीया बताना होगा.’’

बेचारी किसना रोते हुए बैंक से बाहर आ गई.

किसना हर रोज बैंक के बाहर बैठ जाती कि शायद कोई मदद मिल जाए, मगर सब उसे देखते हुए निकल जाते.

तभी एक दिन उसे एक नौजवान आता दिखाई पड़ा. जैसेजैसे वह किसना के नजदीक आया, किसना के चेहरे पर चमक बढ़ती चली गई. उस के जेहन में वे यादें गुलाब के फूल पर पड़ी ओस की बूंदों की तरह ताजा हो गईं. कैसे यह बाबू उस का प्यार पाने के लिए क्याक्या जतन करता था? जब वह सुबहसुबह उस के गैस्ट हाउस की सफाई करने जाती थी, तो बाबू अकसर नजरें बचा कर उसे देखता था.

वह बाबू किसना को अकसर घुमाने ले जाता और घंटों बाग में बैठ कर वादेकसमें निभाता. वह चाहता कि अब हम दोनों तन से भी एक हो जाएं. किसना अब उसे एक सच्चा प्रेमी समझने लगी और उस की कही हर बात पर भरोसा भी करती थी, मगर किसना बिना शादी के कोई बंधन तोड़ने को तैयार न थी, तो उस ने उस से शादी कर ली, मगर यह शादी उस ने उस का तन पाने के लिए की थी.

किसना का नशा उस की रगरग में समाया था. उस ने सोचा कि अगर यह ऐसे मानती है तो यही सही, आखिर शादी करने में बुराई क्या है, बस माला ही तो पहनानी है. उस ने आदिवासी रीतिरिवाज से कलक्टर और मुखिया के सामने किसना से शादी कर ली, लेकिन उधर लड़के की मां ने उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया था.

एक दिन बिना बताए किसना का बाबू कहीं चला गया. इस तरह वे दोनों यहां मिलेंगे, किसना ने सोचा न था.

जब वह किसना के बिलकुल नजदीक आया, तो किसना चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे बाबू… आप यहां?’’

वह नौजवान छिटक कर दूर चला गया और बोला, ‘‘क्या बोल रही हो? कौन हो तुम?’’

‘‘मैं तुम्हारी किसना हूं? क्या तुम अब मुझे पहचानते भी नहीं हो? मुझे तुम्हारा घर नहीं चाहिए. बस, एक छोटी सी मदद…’’

‘‘अरे, तुम मेरे गले क्यों पड़ रही हो?’’ वह नौजवान यह कहते हुए आगे बढ़ गया और बैंक के अंदर चला गया.

अब तो किसना रोज ही उस से दया की भीख मांगती और कहती कि बाबू, पैसे बदलवा दो, पर वह उसे पहचानने से मना करता रहा.

ऐसा कहतेकहते कई दिन बीत गए, मगर बाबू टस से मस न हुआ.

आखिरकार किसना ने ठान लिया कि अब जैसे भी हो, उसे पहचानना ही होगा. उस ने वापस आ कर सारा घर उलटपलट कर रख दिया और उसे अपनी पहचान का सुबूत मिल गया.

सुबह उठ कर किसना तैयार हुई और मन ही मन सोचा कि रो कर नहीं अधिकार से मांगूंगी और बेटी को भी साथ ले कर बैंक गई. उस के तेवर देख कर बाबू थोड़ा सहम गया.

उसे किनारे बुला कर किसना बोली, ‘‘यह रहा कलक्टर साहब द्वारा कराई गई हमारी शादी का फोटो. अब तो याद आ ही गया होगा?’’

‘‘हां… किसना… आखिर तुम चाहती क्या हो और क्यों मेरा बसाबसाया घर उजाड़ना चाहती हो?’’

किसना आंखों में आंसू लिए बोली, ‘‘जिस का घर तुम खुद उजाड़ कर चले आए थे, वह क्या किसी का घर उजाड़ेगी, रमेश बाबू… वह लड़की जो खेल रही है, उसे देखो.’’

रमेश पास खेल रही लड़की को देखने लगा. उस में उसे अपना ही चेहरा नजर आ रहा था. उसे लगा कि उसे गले लगा ले, मगर अपने जज्बातों को काबू कर के बोला, ‘‘हां…’’

किसना तकरीबन घूरते हुए बोली, ‘‘यह तुम्हारी ही बेटी है, जिसे तुम छोड़ आए थे.’’

रमेश के चेहरे के भाव को देखे बिना ही बोली, ‘‘देखो रमेश बाबू, मुझे तुम

में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं एक नई जिंदगी जीना चाहती हूं. अगर इन पैसों का कुछ न हुआ, तो लौट कर फिर वहीं नरक में जाना पड़ेगा.

‘‘मैं अपनी बेटी को उस नरक से दूर रखना चाहती हूं, नहीं तो उसे भी कुछ सालों में वही कुछ करना पड़ेगा, जो उस की मां करती रही है. अपनी बेटी की खातिर ही रुपया बदलवा दो, नहीं तो लोग इसे वेश्या की बेटी कहेंगे.

‘‘अगर तुम्हारे अंदर जरा सी भी गैरत है, तो तुम बिना सवाल किए पैसा बदलवा लाओ, मैं यहीं तुम्हारा इंतजार कर रही हूं.’’

रमेश ने उस से पैसों का बैग ले लिया और खेलती हुई बेटी को देखते हुए बैंक के अंदर चला गया और कुछ घंटे बाद वापस आ कर रमेश ने नोट बदल कर किसना को दे दिए और कुछ खिलौने अपने बेटी को देते हुए गले लगा लिया.

तभी किसना ने आ कर उसे रमेश के हाथों से छीन लिया और बेटी का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर बोली, ‘‘रमेश बाबू… चाहत की अलगनी पर धोखे के कपड़े नहीं सुखाए जाते…’’ और बेटी के साथ सड़क की भीड़ में अपने सपनों को संजोते हुए खो गई.

पछतावा: लालपरी उस रोज विलास के साथ क्यों भाग गई

विलास की विलासी नजरें लालपरी से बची न थीं. इसीलिए बच्चा पाने के लिए राजदेव की बात मान कर विलास के पास जा कर भूत झड़वाना उसे गवारा न था. लेकिन लालपरी एक रोज उसी विलास के साथ क्यों भाग खडी़ हुई?

सब को चाय पिला कर मैं ने जूठी प्यालियां टेª में समेट लीं. घडी सुबह के 7 बजा रही थी. मैं ने टीवी खोल दिया. समाचार देखने सारा परिवार ड्राइंगरूम में आ गया. यह तो रोज का रुटीन है. समाचार देखने के समय मैं चाकू ले कर सब्जियां काटने बैठती हूं. पतिदेव सोफे पर आराम से बैठ कर सेंटर टेबिल पर आईना रख कर शेव करने बैठते हैं. पिकी और मीनी एकदूसरे को चिढा़ती, मुंह बिचकाती, जीभ दिखाती टीवी देखती रहती हैं.

फ्भई, आज सेकंड राउंड चाय नहीं हो रही है? इन्होंने दाढी़ बनाते हुए पूछा.

फ्आज लालपरी नहीं आई है. मुझे आटा गूंधना है, मसाला पीसना है. बच्चों का टिफिन, आप का खाना, नाश्ता—

फ्समझ गया सरकार, लालपरी होती है तब तो आप कहती हैं, ‘निकम्मी है यह, सारा काम मुझे ही संभालना पड़ता है,’ और एक दिन नहीं आई तो–. बीच में ही बात रोक कर उन्होंने मेरी नकल उतारी और हंसने लगे.

फ्लालपरी अभी किशोरी है. उसे ऐसे नहीं कहूंगी तो वह काम में तेजी कैसे लाएगी. काम तो करती ही है बेचारी. मूर्ख पति मिला है उस बदनसीब को, मैं ने ठंडी आह भरी.

साढे़ 9 बजतेबजते घर खाली सा हो गया. बच्चे स्कूल और पतिदेव आफिस जा चुके थे. मैं ने घर के बाकी काम समेटने शुरू किए. झाड़न्न् लगाना आसान था, पर पाेंछा लगाने में तो कमर ही जैसे टूट गई, ‘कोई होता तो लालपरी के घर भेज कर उस का हाल पुछवा लेती. क्या करूं, अभी तो खैर कालिज बंद हैं पर जिस रपतार से यह नागा करने लगी है उस से तो काम नहीं चलेगा. लगता है किसी और को रखना होगा. आने दो, मैं स्वयं बात करती हूं इस सिलसिले में,’ मैं ने मन ही मन सोचा.

शाम को लालपरी आई. आते ही नजरें नीची किए बंगले के पिछवाडे़ जाने लगी. मेरी सास के जमाने से यह सिलसिला चला आ रहा है कि मुख्यद्वार से दाईं ओर नौकर अंदर नहीं जाते. रसोई के पीछे नल है, वहां साबुन, तौलिया रखा रहता है, आने पर हाथपैर साबुन से अच्छी तरह धोकर ही रसोई में घुसना होता है. लालपरी अपनी मां के साथ आती थी. मां जब सोहन रिकशे वाले के साथ भाग गई तब मैं ने इसे ‘सहारा’ दिया या इस ने मुझे ‘सहारा’ दिया, कहना मुश्किल है. 14 साल की नन्ही उम्र में बाप ने इस की शादी कर दी इसी टोले में. अब यह अपने पति के साथ रहती है.

Short Story: आखिर कहां तक?

फ्लालपरी, जरा इधर आना, मैं ने आवाज दी.

फ्जी, भाभीजी, कह कर वह सामने आ कर खडी़ हो गई.

मैं ने उस के चेहरे पर नजरें जमा दीं. बाप रे, उस का चेहरा बुरी तरह सूजा हुआ था. आंखें लाललाल अंगारों की तरह दहक रही थीं. नाक की कील गायब थी और उस जगह कटे का ताजाताजा सा निशान चीखचीख कर हाल बयान कर रहा था.

फ्क्या हुआ तुझे? राजदेव ने तुझे फिर मारा है? तेरा चेहरा तो सूज कर पुआ बन गया री, मेरे शब्द डगमगा गए. इस युवती को 3 साल की छोटी उम्र से मैं ने लगभग पाला ही तो है. मां कपडे़ धोती और यह रोने लगती तब मैं कभी इसे बिस्कुट देती, कभी टाफी, कभी खाली डब्बे, क्रीम की खाली बोतलें, पुरानी कंघी जैसे बेकार पडे़ घरेलू सामान देती और जरा सा पुचकारती, यह झट से मुसकरा देती.घ्और इस की मासूम मुसकान से बंगले का कोनाकोना महक उठता. उन दिनों घर की मालकिन मेरी अम्मांजी थीं इसलिए नौकरचाकर, धोबी, दूध वाला, पेपर वाला सब मुझे ‘भाभीजी’ कहते. ससुराल में इस से सुंदर, सरस भला और क्या संबोधन हो सकता है. मां से सुनसुन कर यह भी ‘भाभीजी’ ही कहने लगी थी.

मैं ने लालपरी की ठोडी़ ऊपर उठाई, मेरे हाथों को पकड़ कर वह फफकफफक कर रो पडी़. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. मैं ने उसे हाथ पकड़ कर बिठाया. टेबिल पर रखी बोतल में से एक गिलास पानी दिया और कहा, फ्मैं तेरी मां जैसी हूं, मुझे अपना दुख नहीं बताएगी क्या.

पानी के 4-6 घूंट पी कर वह थोडी़ शांत हुई थी. उस ने नजरें नीची किए ही कहा, फ्वह बोलता है मैं बांझ हूं. आज अमावस्या है न, आज इमलीचौक वाले मठ पर विलसवा की देह पर भूत आता है, उसी से झड़वानेफुंकवाने ले जाना चाह रहा था. मैं ने मना कर दिया, बस, वह फिर रोने लगी.

फ्अरी, तो चली जाती, राजदेव का मन ही रखने के लिए. इतनी मार से तो बच जाती नादान लड़की.

फ्कैसे चली जाती भाभीजी. विलसवा की आंखों में, उस की बातों में गंदगी दिखाई देती है हमें. वह कई बार हमें इंद्रासन का सुख दिखाने की बात कह चुका है. मूछड़ हमें देख कर आंख मारता है और इस हरामी मरद को वह ‘परमात्मा का अवतार’ लगता है.

लालपरी गुस्से और उत्तेजना से कांप रही थी. मैं ने कहा, फ्तुम ने राजदेव से विलास की हरकतों के बारे में बातें कीं कभी. कौन पति ऐसा होगा जो किसी कामुक, हवस के भूखे के पास अपनी बीवी को भेज देगा.

फ्मूर्ख है, जाहिल है, भेजे में भूसा भरा हुआ है उस के. कहता है, ‘ओझा की आंखों में भूतप्रेत बसते हैं, तू उन में झांकती क्यों है री छिनाल,’ उस की इसी गाली पर हम ने कहा, ‘तू जान ले ले पर बदचलनी का दोष मत लगा हमारे चरित्र पर. बस, इसी बात पर लातघूंसों से टूट पडा़ वह हमारे ऊपर. मुंह पर मारता रहा और चिल्लाता रहा, ‘तू जबान चलाती है साली’—

लालपरी अपने पति की दी गालियों को एक सांस में दोहरा गई और उस के बाद फिर वही लावा जो भीतर कैद था, आंसुओं के रूप में बाहर आने लगा. और कोई रास्ता न देख मैं ने कहा, फ्ऐ लालपरी, ऐ सब्जपरी, तू रोती क्यों है री. भाभीजी को चाय नहीं पिलाएगी क्या?

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जैसे नींद से जाग गई लालपरी. उस ने मेरी ओर देख कर कहा, फ्अभी तुरंत हाजिर करती हूं. आप हमें अभी भी बच्चा समझती हैं, लालपरी, सब्जपरी कह कर तो आप बचपन में हमें चुप कराती थीं, कहती हुई 20 साल की युवती, जिस के रगरग से यौवन, सरलता, सरसता, प्राकृतिक, अनुपम सौंदर्य छलक रहा था, अंदर चली गई.

रात में इन से लालपरी का जिक्र किया, उस की सारी परेशानियां बयान कीं. सुन कर ये उदास हो गए और थोडी़ देर चुप रहने के बाद बोले, फ्राजदेव पागल हो गया है क्या. उसे कल दोपहर में किसी बहाने बुलाना, मैं बात करूंगा उस से. लालपरी इस घर के सदस्य की तरह है. जब इस महल्ले में मेरे दादाजी ने यह बंगला बनवाया था तब गांव से ही इस के दादादादी को ले आए थे. दादी बताती थीं कि इस का खानदान पूरे इलाके में अपने चरित्र की उज्ज्वलता के लिए ‘वफादारईमानदार’ की उपाधि से संबोधित किया जाता था. यह लड़की कष्ट सहे, यह तो पुरखों का अपमान है…

फ्राजदेव अर्थ का अनर्थ समझ लेगा तो, मैं ने आशंका जताई.

फ्उस के बाप का राज है क्या. बिना डाक्टरी जांच कराए उस ने इसे ‘बांझ’ घोषित कर दिया है. तुम इसे ले कर अपनी सहेली डाक्टर के पास चली जाना ताकि सचाई मालूम हो सके. उन के सुझाव पर जो भी उचित होगा, दवा या आपरेशन, हम करवाएंगे. इसे यों ही नहीं छोड़ सकते न.

दूसरे दिन अचानक गांव से रामू लौट आया. वह हर साल 2 माह की छुट्टी ले कर गांव जाता है. धान रोप आता है, गेहूं तैयार कर घर में रख आता है.घ्आते समय मालदा आम की 2 बोरियां ठेले पर ले आता है. मैं ने खुश हो कर कहा, फ्रामू, 8 दिन पहले आ गए तुम.

फ्बरसात समय पर हो गई. आप के खेतों में धानरोपाई हो गई, आम बेच दिया. काम खत्म हो गया तो अम्मां ने कहा, ‘चला जा. यहां बुधनी तो है ही, उस के बच्चे भी आ गए हैं, खूब चहलपहल है.’

फ्तेरी बीवी कैसी है? मैं ने पूछा.

फ्अच्छी है, भाभीजी, उसे फिर लड़का हुआ है, कह कर रामू शरमा गया.

फ्अरे, लड्डू बांटने की जगह शरमा रहे हो तुम. बहुतबहुत बधाई हो रामू. तुम 2 बेटों के बाप बन गए 3 साल में ही, मैं स्वयं ही यह कह कर मुसकराने लगी.

फ्अम्मां ने कहा है इस साल आप मेरा आपरेशन करवा दें, रामू गमछे से मुंह पोंछने का बहाना कर शरमाता हुआ अंदर चला गया. 25-26 साल का रामू मन से 10 साल का बालक है. बिलकुल भोलाभाला, सीधासादा.

रामू को भेज कर राजदेव को बुलवाया. वह आ गया तो इन्होंने कहा, फ्राजदेव, क्या हालचाल हैं?

फ्ठीक हैं, वकील साहब, उस ने कहा.

फ्आजकल आतेजाते नहीं हो, क्या बात है, उन्होंने कहा.

फ्रामू की तरह बेटों का बाप हूं क्या जो खुशियां मनाता फिरूं, उसने कहा.

फ्तुम्हारी और लालपरी की अभी उम्र ही क्या है. प्रेम और शांति से रहो, इसी में गृहस्थी का सुख है. जब मन सुखी होगा तभी तो मांबाप बनता है कोई, धीरज रखो.

फ्वह छिनाल बांझ है, उस पर नखरा यह कि ओझा विलास के पास नहीं जाती, उस ने कहा.

फ्गालियां क्यों दे रहे हो, वह तुम्हारी पत्नी है. अपनी पत्नी की इज्जत तुम स्वयं नहीं करोगे तो दूसरे कैसे करेंगे. बच्चा चाहिए तो डाक्टर के पास जाओ, ओझा क्या करेगा. विलास तो एक नंबर का गंजेडी़ है. कल तक स्मगलरों का मुखबिर था. आज ओझा कैसे हो गया?

फ्यह हमारा घरेलू मामला है. इस में आप बडे़ लोग न बोलें तो ही ठीक है. ओझा को हम मानते हैं, बस.

फ्ठीक है, तुम उसे चाहे जो मानो परंतु लालपरी मेरी बहन जैसी है. उस पर इस तरह हाथलात मत उठाया करो.

फ्क्या कर लेंगे आप. वह मेरी बीवी है कि आप की बहन जैसी है, हूं. मैं सब समझता हूं, आप चाहते ही नहीं कि लालपरी को औलाद हो. आप के बरतन कौन घिसेगा इतने चाव से, वह जाने लगा.

फ्पागल मत बनो. दुनिया में कानून भी कोई चीज है या नहीं. जिस दिन हवालात पहुंच जाओगे, सारी अकड़ निकल जाएगी, समझे. लालपरी पर हाथ उठाने से पहले हजार बार सोच लेना. जाओ, दफा हो जाओ, इन के स्वर में क्रोध साफ झलक रहा था.

रामू पर घरद्वार, रसोई छोड़ कर मैं लालपरी को ले कर शहर में डाक्टर केघ्पास आ गई. डाक्टर शोभनाजी क्लीनिक में ही मिल गईं. सारी बात जाननेपूछने के बाद उन्होंने लालपरी की जांच की. कुछ टेस्ट कराए और मेरे पास आ कर बैठती हुई बोलीं, फ्सीता दीदी, आप बेफिक्र रहें. इस लड़की में कोई कमी नहीं है. टेस्ट की रिपोर्ट भी कल तक आ जाएगी. वैसे इस का पति भी टेस्ट करवा लेता तो इलाज में सुविधा होती.

फ्वह नहीं आएगा, मैं ने कहा.

शोभना ने हंस कर कहा, फ्लालपरी समझा कर, प्यार से कहेगी तो मान जाएगा, क्यों लालपरी.

शोभना के साथ हम दोनों भी हंसने लगीं. थोडी़ देर इधरउधर की बात कर के हम दोनों वापस आ गए.

कुछ दिनों तक राजदेव शांत रहा. शांत क्या, बल्कि मुंह फुलाए रहा. लालपरी रोज उस का किस्सा सुनाती और खूब खिल- खिलाती. रामू शोभना के यहां से रिपोर्ट ले आया था. लालपरी ने जब राजदेव से कहा, फ्हम में कोई खराबी नहीं है, हमतुम जिस दिन चाहेंगे बच्चा होगा पर तुम एक बार डाक्टरनी के पति से दिखा लेते तो…

फ्ऐ, कहना क्या चाहती है तू. मैं नामर्दघ्हूं, बोल, मैं नपुंसक हूं, वह चिल्लाने लगा.

फ्चिल्लाओ मत, हम में खराबी नहीं है, तुम में खराबी नहीं है तो इंतजार करो. ओझागुणी का चक्कर छोडो़, लालपरी ने कहा.

रात में राजदेव विलास को बुला लाया. लालपरी से कहा, फ्बढि़या सी कलेजी भून दे, एक लोटा ठंडा पानी, 2 खाली गिलास रख यहां और भाभीजी के यहां से बर्फ ले आ जा कर.

फ्तुम भैयाजी से झगडा़ करते रहो और हम बर्फ—, उस ने बच्चों की तरह ठुनक कर कहा.

फ्अरे, वो तो नशे में बोल गया था. उन का 20 हजार रुपया लगा है हमारी बीमारी में, कौन देता बिना सूद के इतने पैसे? तेरे तो वह सगे भाई थे पिछले जन्म के. जा, जा कर बर्फघ्ले आ.

लालपरी ने आ कर मुझ से सारा किस्सा कहा और अपनी स्वाभाविक हंसी हंसने लगी. मैं ने कहा, फ्तू बहुत प्यार करती है राजदेव से, है न.

फ्हां, भाभीजी. हम यह भी जानते हैं कि वह कभी बाप नहीं बन पाएगा. बचपन में ताड़ के पेड़ से गिर गया था न, कल उस की बडी़ बहन मीठनपुरा बाजार में मिली थी, बता कर रोने लगी. बोली, ‘डाक्टर टी.के. झा ने कहा था, राजदेव कभी बाप नहीं बनेगा.’ पर हम हर हाल में उस के साथ खुश हैं भाभीजी. बच्चा नहीं हुआ तो क्या, आप के बच्चे हैं, मेरी ननद के बच्चे हैं, उस का स्वर छलछला उठा.

फ्बर्फ के साथ थोडा़ प्याज, टमाटर, नीबू भी लेती जाना, राजदेव अकसर मंगवाता था. आज झिझक से नहीं बोला होगा, मैं ने लालपरी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

सामान ले कर लालपरी चली गई. सुबह आई तो सुस्तसुस्त सी लगी. मैं ने सोचा थकी होगी. बेचारी बरतन घिसने बैठी तो थोडी़ देर बार सिर पकड़ कर बोली, फ्रामू भैया, एक प्याली चाय पिला दो, सिर बहुत भारी है.

फ्क्या सिरदर्द है? मैं ने पूछा.

फ्न, ऐसे ही, उस के शब्द लड़खडा़ रहे थे. मुझे बडा़ अजीब लगा. लालपरी जरूर कुछ छिपा रही है. मैं ने रामू से कहा, फ्रामू, तुम बरतन धो लो और उसे चाय पीने के बाद मेरे पास भेज दो.

10 मिनट बाद लालपरी आ कर कमरे में खडी़ हुई. मैं ने कहा, फ्क्या बात है, आंखें आज फिर लाल हैं, क्या फिर मारा राजदेव ने?

फ्मारता तो दुख नहीं होता पर मुझे धोखे से नशा करवा कर जाने क्या किया- कराया है उस ने.

फ्क्या किया है? खुल कर बताओ तभी तो समझूंगी.

फ्भाभीजी, भैयाजी का शरीर, उन के शरीर की गंध, उन के प्यार करने का तरीका सब आप को मालूम है न. आंखें बंद हों या खुली उन्हें तो आप कैसे भी पहचान ही लेंगी न? लालपरी ने सवाल के बदले सवाल किया.

फ्हां, बिलकुल, अपने पति को तो अंधी स्त्री भी पहचानती है.

फ्बस, यही हमारा दुख है भाभीजी. हमें लगता है रात में मेरे साथ वह खुद नहीं विलसवा सोया था, पर वह बोलता है यह हमारा भ्रम है, शक है, सचाई नहीं. पर हमें पूरा विश्वास है भाभीजी, रात में हमारी इज्जत, हमारी आबरू इस हरामी ने बेच दी एक किलो कलेजी और एक बोतल शराब के वास्ते. हम तो अपनी नजर में ही गिर गए हैं भाभीजी, लालपरी बिलखबिलख कर रोने लगी.

मैं ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, फ्देख लालपरी, कत्ल भी अनजाने में, बेहोशी में या पागलपन में होता है तो कानून उसे कत्ल नहीं मानता, फांसी नहीं देता. जब तू ठीकठीक जानती ही नहीं कि क्या हुआ, कैसे हुआ तो इतना विलाप क्या उचित है? तूने तो धर्म नहीं छोडा़ न, तू तो नहीं गई किसी के पास, फिर अपने को अपराधी क्यों मानती है?

मैं ने समझाबुझा कर उसे सामान्य बनाने की पूरी कोशिश की और वह जाते समय तक सामान्य दिखने भी लगी थी.

2 दिन यों ही बीत गए. इस घटना की चर्चा मैं ने लालपरी का वहम समझ कर किसी से नहीं की. पता नहीं क्यों, मेरा मन इसे सत्य मानने को तैयार नहीं था, राजदेव इतना पतित नहीं हो सकता. यह बेचारी जाए तो कहां जाए. बाप 2 साल पहले ही मर चुका है. एक भाई है जो 7-8 साल से बाहर है. कौन जाने जीवित भी है या नहीं. मां जो भागी तो आज तक पता नहीं चला वह पृथ्वी के किस कोने में समा गई. सोहना का भी ठिकाना नहीं.

सुबहसुबह रामू ने कहा, फ्रात दुसाध टोले से लालपरी के चीखनेचिल्लाने की आवाज आ रही थी, जरा जा कर देख आता हूं.

आया तो कुछ उदास, परेशान सा था. बोला, फ्लालपरी थोडी़ देर बाद खुद आएगी पर उस के घर का हाल बेहाल था. कल राजदेव का सिर फोड़ दिया है लालपरी ने. लालपरी के घुटने एवं गरदन में बहुत चोट है.

लालपरी दोपहर में आई और उस ने बिना किसी भूमिका के कहा, फ्हमारा शक सही था भाभीजी. कल रात भूत झाड़ने का बहाना कर उस ने विलास को बुलवाया. मुझे जो ‘दवा’ दी उसे मैं ने नजरें बचा कर नीचे गिरा दिया. 2 दिन मैं इस पापी की ‘दवा’ के शक में जी चुकी थी. मैं ने सोचा तीसरी बार बेहोशी में इज्जत नहीं लुटाऊंगी. जो होगा जान लूं, समझ लूं. इस ने विलास से कहा, ‘हम पर लगा कलंक धो दे यार. बस, 1 बच्चा पैदा कर दे ताकि मैं भी मरद बन कर जी सकूं.’ मुझे गुस्सा आया, मैं ने उस के सिर पर बेलन दे मारा. उस ने भी मुझे खूब मारा होता मगर विलास ने कहा,  ‘औरत को मार कर मरद नहीं बना जाता,’ बस, हम ने भी ठान ली और कहा, ‘विलास, तुझ में हिम्मत है तो आ, मुझे ले कर कहीं भाग चल, गृहस्थी बसा कर लौटेंगे,’ फिर वह बिना बोले चला गया.

मुझे लगा, लालपरी गुस्से  में बोल रही है, पर वह सही थी. दूसरे दिन राजदेव रोता हुआ आ कर इन के पैरों में गिर गया, फ्मालिक, लालपरी को हम ने ही गलत रास्ता दिखा दिया. वह विलसवा के साथ भाग गई, जेवर कपडा़ ले कर. मैं तो पछता रहा हूं.

इन्होंने ठंडी सांस ले कर कहा, फ्पछतावे का भी एक समय होता है अब क्या लाभ?

स्नेह के सहारे : एक से हुए दो

रोज की तरह नहा कर माताजी बगीचे में पहुंचीं. वहां से उन की नजर पडोसी के बगीचे में पडी. वहां कोई वृद्ध व्यक्ति बड़े ध्यान से काम कर रहा था.

‘शायद इन को माली मिल गया है,’ माताजी बुदबुदाईं. फिर उन्होंने सोचा, ‘पर माली इतनी जल्दी उठ कर काम कर रहा है. फिर उस केघ्कपडे़ भी तो एकदम साफ हैं. ऊंह, होगा कोई उन का रिश्तेदार.’

उन्होंने अपने मन को उधर से हटाने का प्रयास किया. लेकिन उन का ध्यान बारबार पडो़स केघ्बगीचे की ओर ही चला जाता था. वह सोचने लगीं, ‘कौन होगा वह वृú सज्जन?’

कई दिनों के बाद उन के मन को कुछ सोचने लायक मसाला मिला था. कुछ वर्षों से वह अपनी बेटी सरला के साथ रह रही थीं. पहले जब सरला के पिता थे तब चेन्नई के नजदीक के एक छोटे से गांव में वह उन के साथ अपने घर में रहती थीं. पति के रिटायर होने के बाद भी उन्होंने अपने पति के साथ इस तरह का रोज का कार्यक्रम बना लिया था कि उन्हें समय बीतने का पता ही नहीं चलता था. साल में एक बार सरला अपने बच्चों के साथ आती थी. तब कुछ दिनों के लिए उस वृú दंपती का जीवन बच्चों केघ्शोरगुल से भर जाता था. उन्हें यह शोरगुल अच्छा लगता था, लेकिन सरला की वापसी केघ्बाद घर में छाने वाली शांति भी उन्हें बेहद अच्छी लगती थी.

पति के देहांत केघ्बाद उन्हें सरला केघ्पास ही रहना पडा़. सरला के पति सांबशिवन वायुसेना में अफसर थे. वह ही माताजी को समझा कर ले आए थे.

फ्अकेली गांव में क्या करोगी मांजी? फिर हम लोगों को भी आप की चिता लगी रहेगी. इस से अच्छा है कि घर बेचबाच कर पैसे बैंक में जमा करा दो और बुढापा हमारे साथ आराम से गुजारो, सांबशिवन ने कहा था.

माताजी ने घर बेचा तो नहीं था, पर किराए पर चढा़ दिया था. पति केघ्बीमे के पैसे भी बैंक में जमा करवा दिए थे. उस के ब्याज का भी कुछ आ ही जाता था. वैसे खानेपीने की सरला केघ्घर में भी कमी नहीं थी, पर सिर्फ शरीर की जरूरतें पूरी होने से ही क्या इनसान खुश रहता है?

वायुसेना के कैंप में बूढों़ की कमी थी. शहर से दूर, अंगरेजी बोलचाल, रहनसहन का अलग तरीका, आधुनिक विचारों वाले बच्चे. माताजी का दम पहलेपहल तो उस वातावरण में घुटता रहता था. पर अब उन्हें इस जीवन की आदत हो गई थी. अब वह आराम से बैठी रहती थीं और मन को इधरउधर बगीचे में लगाने की कोशिश करती थीं.

फ्सरला, बच्चों ने ब्रश भी नहीं किया और नाश्ता खा रहे हैं. तुम ने सिर चढा़ रखा है इन को, शुरू में वह कहती थीं तो सरला हंस देती थी. बच्चे नानी को ‘ओल्ड फैशन’ यानी पुराने रिवाजों वाली कह कर चिढा़ते थे. कभी वह नौकरानी के गंदे काम पर बरस पड़ती थीं तो सरला नौकरानी केघ्जाने के बाद समझाती थी, फ्अम्मां, आजकल नौकर मिलते ही नहीं हैं. अब तुम्हारे वाला पुराना जमाना गया. यह नौकरानी चली गई तो स्वयं काम करना पडे़गा.

फ्तो कर लेंगे, वह गुस्से में बोलतीं.

फ्अम्मां, तुम्हें तो बस, किचन, घर और धर्म के सिवा दूसरा कुछ सूझता ही नहीं है. मेरे पास दूसरे हजारों काम हैं. बच्चों को पढा़ना, सिलाई, बुनाई, लेडीज क्लब, सामाजिक जीवन आदि. इसलिए मेरा काम नौकर के बिना नहीं चल सकता.

माताजी को पता चल गया था कि यहां लोग दिखावे के बल पर ही ऊंचे स्तर के माने जाते हैं. यहां बैठक की सजावट, कालीन, परदे और पेंटिग को देखा और सराहा जाता है. चौके में गंदे हाथों वाली आया, बिना नहाए, बिना सब्जी या चावल धोए खाना बनाती है, यह कोई नहीं देखता. बच्चे मन चाहे, तब नहाते हैं, मन चाहे जो पढ़ते हैं. खूब फिल्म देखते हैं और अनुशासन के नाम से नाकभौं चढा़ते हैं. पर इस की यहां कोई परवा नहीं करता. यह सब देखदेख कर अम्मां कुढ़ती रहतीं, लेकिन कर कुछ नहीं पातीं. अपना घर छोड़ने के साथ उन केघ्अधिकार भी भूतकाल में गल गए थे. कभीकभार धीरज छोड़ कर वह कुछ कहतीं तो सरला समझाती, फ्अम्मां, तुम क्यों चिता करती हो? आराम से रहो. दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है, तुम्हें क्या मालूम? सच, मुझे अगर तुम्हारे जितना आराम मिले तो मैं तो इधर की दुनिया उधर कर दूं. इस उम्र में घर के झंझट में दोबारा क्यों पड़ती हो?

लेकिन माताजी जानती थीं कि आराम भी एक हद तक ही किया जा सकता है. ज्यादा आराम व्यक्ति केघ्उत्साह को खत्म कर देता है.

माताजी पडो़स में आए वृú सज्जन के बारे में जानने केघ्लिए बहुत ही उत्सुक थीं. आखिर उन्होंने आया से पूछ ही लिया, फ्कौन हैं रे, वह बूढे़ बाबा?

फ्वह तो महंती साहब के चाचा हैं. अकेले हैं तो यहां रहने आ गए हैं, आया के पास पूरी जानकारी थी.

फ्पहले कहां थे?

फ्इन्हीं चाचाजी ने साहब को बडा़ किया, पढा़यालिखाया. पहले यह साहब के दूसरे भाईबहनों के साथ रहते थे. शादी नहीं की. भाई की मृत्यु के बाद भाई के परिवार के लिए ही इन्होंने अपनी जिदगी काट दी, आया ने पूरी बात बता दी. और माताजी उस से पूछती रहीं. हालांकि वह जानती थीं कि उन का आया से बतियाना भी सरला को पसंद नहीं.

अब माताजी  अकसर पडो़स के बगीचे की तरफ देखती रहतीं. कुछ ही समय में बगीचे में निखार आ गया था. रंगबिरंगे फूल क्यारियों में खिलने लगे थे. उन की देखादेखी माताजी भी थोेडा़बहुत अपना बगीचा संवारने लगीं.

एक दिन अचानक ही उन के कानों में आवाज आई, फ्लगता है, आप को भी बागबानी का शौक है.

माताजी ने चौंक कर देखा तो सामने वही वृú खडे़ थे. उन्होंने हाथ जोड़ कर नमस्ते कर दी. माताजी ने भी उत्तर में मुसकरा कर हाथ जोड़ दिए.

फिर इस के बाद उन की दोस्ती बढ़ती गई. दोनों बातें कर के समय गुजारने लगे और भाषा, जातपांत के कूडे़कचरे को नजरअंदाज करती हुई उन की मित्रता बढ़ती गई. अब वे घंटों बगीचे में खडे़ हो कर बातें करते. शाम को दोनों सब्जी लाने उत्साह से चल पड़ते. माताजी का चिड़चिडा़पन धीरेधीरे गुनगुनाहट में डूबता गया. चाचाजी भी अपने पास की दुनिया को मुसकान भरी आंखों से देखने लगे.

आया के जरिए माताजी को पता चल गया था कि बहू और भतीजे में चाचाजी के खर्चे को ले कर खटपट हो जाया करती है. एक आदमी के आने से उन का महीने का बजट चौपट हो गया था. बच्चों की फीस, शराब का खर्च, पत्नी की रमी और पति केघ्ब्रिज के अड्डों में अब कुछ अड़चनें सी आने लगी थीं.

फ्उन्हें भेज क्यों नहीं देते जेठजी के घर? श्रीमती महंती अपने पति से पूछतीं.

फ्वहां भी तो यही हाल है. उन्हें हम लोगों को छोड़ कर दूसरे किसी का सहारा नहीं है मालू. अगर हम चारों भाईबहन में से कोईघ्भी उन्हें नहीं रखेगा तो—

फ्तब उन्हें वृúाश्रम में भेज दो.

फ्क्या? तुम्हारी जबान इतनी चल कैसे गई? जिस ने हमारे लिए अपना घर नहीं बसाया, उसे मैं वृúाश्रम में छोड़ दूं? महंती चीखने लगे.

फ्मुझ से तो यह झंझट नहीं होगा. कभी चावल ज्यादा खिलाया तो गैस की तकलीफ, कभी रोटी ज्यादा खा गए तो पेट में गड़बड़.

फ्मालू, जरा तो खयाल करो. बुढा़पे पर उन का क्या बस चल सकता है.

फ्जब वह उस मद्रासी बुड्ढी के साथ हंसहंस कर बतियाते हैं तो बुढा़पा कहां गुम हो जाता है, श्रीमती महंती पूछतीं.

इधर सरला ने भी एक दिन झिझकते हुए माताजी से कह दिया, फ्अम्मां, चाचाजी से इतनी दोस्ती इस उम्र में अच्छी नहीं लगती. लोग मजाक उडा़ते हैं.

माताजी बिफर गईं. बोलीं, फ्अच्छे हैं तुम्हारे लोगबाग. पेड़ को सूखते हुए देख कर लोटा भर पानी तो देेंगे नहीं, अगर दूसरा कोई दे भी रहा हो तो जलेंगे भी. क्या हम लोगों को किसी बात करने वाले साथी की जरूरत नहीं है?

फ्मैं ने मना कब किया है? लेकिन— उसे आगे के शब्द नहीं सूझ रहे थे.

फ्हां, तुम्हारी सोसाइटी में स्त्रियां औरों केघ्साथ खुलेआम नाच  तो सकती हैं, अविवाहित लड़केलड़कियां डेटिग तो कर सकते हैं लेकिन 2 बूढे़, जिन से कोई बात करने वाला नहीं, आपस में भी बातें नहीं कर सकते. यही सोसाइटी है तुम्हारी. वाहवाह.

एक दिन चाचाजी ने भतीजे से कहा,  फ्बेटे, मैं सोचता हूं कि मैं किसी आश्रम में जा कर अपना समय बिता दूं. तुम सभी भाई थोडे़थोडे़ पैसे भेजते रहोगे तो मेरा खर्च तो… मुझे पता है बेटे कि तुम्हारी तनख्वाह तुम्हारे लिए ही पर्याप्त नहीं, पर मैं—मेरा तोे कुछ है ही नहीं. बोझ बनना पड़ रहा है तुम सब पर—

महंती ने उन के पांव पकड़ लिए, फ्चाचाजी, हमें शर्मिंदा न करें. मालू तो मूर्ख है. मैं उसे समझा दूंगा.

फ्नहीं बेटे, वह मूर्ख नहीं है. मूर्ख मैं हूं जो स्वावलंबी नहीं हूं. नौकरी सरकारी नहीं थी तो पेंशन कहां से मिलती. फिर भी, काश, मैं कुछ बचा कर रखता.

चाचाजी के इस सुझाव के बारे में जब माताजी को पता चला तो उन की आंखें भर आईं. मौका मिलते ही उन्होंने चाचाजी से कहा, फ्तुम मेरे साथ चलो, मेरा एक छोटा सा घर है गांव में. हां, भाषा तुम्हारी नहीं, पर मैं हूं वहां. मेरे साथ रहो. मैं भी तो नितांत अकेली हूं.

चाचाजी अवाक देखते रहे. फिर बोले, फ्लोग क्या कहेंगे, इस उम्र में हमारी दोस्ती लोगों की नजर में पवित्र नहीं हो सकती.

फ्तो हम शादी कर लेंगे. सच, मैं इस भरी दुनिया की तनहाई से तंग आ गई हूं. उस छोटे गांव में, अपने घर में शांति से रहना चाहती हूं. तुम भी चलो. दोनों के बाकी दिन कट जाएंगे, स्नेह केघ्सहारे.

फ्लेकिन लोग—लोग क्या कहेंगे? इतने बुढा़पे में शादी? फिर मैं तो—

मुझे पता है कि तुम निर्धन हो, लेकिन तुम्हारे पास छलकते स्नेह और त्याग की जो दौलत है, उस की कोई कीमत नहीं है. और हां, उन लोगों की क्या परवा करनी जो तुम्हारी इस दौलत की कीमत नहीं जानते. फिर अब हमें कहां अपने बच्चे ब्याहने जाना है? वह हंस पडीं़.

फिर एक दिन उस फूलों से लदे बगीचे के पास एक टैक्सी आ कर रुकी. उस में से फूलों के हार पहने चाचाजी व माताजी उतरे. दोनों ने शादी कर ली थी. उसी टैक्सी में अपनाअपना सामान लदवा कर माताजी और चाचाजी गांव जाने के लिए स्टेशन चले गए.

इस के बाद सारे कैंप में ‘बूढी़ घोडी़, लाल लगाम’ के नारे, लतीफे और कहकहे कई दिनों तक गूंजते रहे. महंती और सांबशिवन का परिवार शरम के मारे कई दिनों तक मुंह छिपाए घर में बैठा रहा. घर से बाहर आने पर दोनों परिवारों ने गैरों से भी बढ़ कर अपने उन बूढों़ को गालियां दीं.

लेकिन उन बूढों के कानों तक यह सबकुछ कभी नहीं पहुंचा. वे दोनों आदमी स्नेह केघ्सहारे लंबी लगने वाली जिदगी को मजे से जीते रहे. अब वे अकेले जो नहीं रह गए थे.

आंधी से बवंडर की ओर

फन मौल से निकलतेनिकलते, थके स्वर में मैं ने अपनी बेटी अर्पिता से पूछा, ‘‘हो गया न अप्पी, अब तो कुछ नहीं लेना?’’

‘‘कहां, अभी तो ‘टी शर्ट’ रह गई.’’

‘‘रह गई? मैं तो सोच रही थी…’’

मेरी बात बीच में काट कर वह बोली, ‘‘हां, मम्मा, आप को तो लगता है, बस थोडे़ में ही निबट जाए. मेरी सारी टी शर्ट्स आउटडेटेड हैं. कैसे काम चला रही हूं, मैं ही जानती हूं…’’

सुन कर मैं निशब्द रह गई. आज की पीढ़ी कभी संतुष्ट दिखती ही नहीं. एक हमारा जमाना था कि नया कपड़ा शादीब्याह या किसी तीजत्योहार पर ही मिलता था और तब उस की खुशी में जैसे सारा जहां सुंदर लगने लगता.

मुझे अभी भी याद है कि शादी की खरीदारी में जब सभी लड़कियों के फ्राक व सलवारसूट के लिए एक थान कपड़ा आ जाता और लड़कों की पतलून भी एक ही थान से बनती तो इस ओर तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता कि लोग सब को एक ही तरह के कपड़ों में देख कर मजाक तो नहीं बनाएंगे…बस, सब नए कपड़े की खुशी में खोए रहते और कुछ दिन तक उन कपड़ों का ‘खास’ ध्यान रखा जाता, बाकी सामान्य दिन तो विरासत में मिले कपड़े, जो बड़े भाईबहनों की पायदान से उतरते हुए हम तक पहुंचते, पहनने पड़ते थे. फिर भी कोई दुख नहीं होता था. अब तो ब्रांडेड कपड़ों का ढेर और बदलता फैशन…सोचतेसोचते मैं अपनी बेटी के साथ गाड़ी में बैठ गई और जब मेरी दृष्टि अपनी बेटी के चेहरे पर पड़ी तो वहां मुझे खुशी नहीं दिखाई पड़ी. वह अपने विचारों में खोईखोई सी बोली, ‘‘गाड़ी जरा बुकशौप पर ले लीजिए, पिछले साल के पेपर्स खरीदने हैं.’’

सुन कर मेरा दिल पसीजने लगा. सच तो यह है कि खुशी महसूस करने का समय ही कहां है इन बच्चों के पास. ये तो बस, एक मशीनी जिंदगी का हिस्सा बन जी रहे हैं. कपड़े खरीदना और पहनना भी उसी जिंदगी का एक हिस्सा है, जो क्षणिक खुशी तो दे सकता है पर खुशी से सराबोर नहीं कर पाता क्योंकि अगले ही पल इन्हें अपना कैरियर याद आने लगता है.

इसी सोच में डूबे हुए कब घर आ गया, पता ही नहीं चला. मैं सारे पैकेट ले कर उन्हें अप्पी के कमरे में रखने के लिए गई. पूरे पलंग पर अप्पी की किताबें, कंप्यूटर आदि फैले थे…उन्हीं पर जगह बना कर मैं ने पैकेट रखे और पलंग के एक किनारे पर निढाल सी लेट गई. आज अपनी बेटी का खोयाखोया सा चेहरा देख मुझे अपना समय याद आने लगा…कितना अंतर है दोनों के समय में…

मेरा भाई गिल्लीडंडा खेलते समय जोर की आवाज लगाता और हम सभी 10-12 बच्चे हाथ ऊपर कर के हल्ला मचाते. अगले ही पल वह हवा में गिल्ली उछालता और बच्चों का पूरा झुंड गिल्ली को पकड़ने के लिए पीछेपीछे…उस झुंड में 5-6 तो हम चचेरे भाईबहन थे, बाकी पासपड़ोस के बच्चे. हम में स्टेटस का कोई टेंशन नहीं था.

देवीलाल पान वाले का बेटा, चरणदास सब्जी वाले की बेटी और ऐसे ही हर तरह के परिवार के सब बच्चे एकसाथ…एक सोच…निश्ंिचत…स्वतंत्र गिल्ली के पीछेपीछे, और यह कैच… परंतु शाम होतेहोते अचानक ही जब मेरे पिता की रौबदार आवाज सुनाई पड़ती, चलो घर, कब तक खेलते रहोगे…तो भगदड़ मच जाती…

धूल से सने पांव रास्ते में पानी की टंकी से धोए जाते. जल्दी में पैरों के पिछले हिस्से में धूल लगी रह जाती…पर कोई चिंता नहीं. घर जा कर सभी अपनीअपनी किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाते. रोज का पाठ दोहराना होता था…बस, उस के साथसाथ मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई अलग से थोड़ी करनी होती थी, अत: 9 बजे तक पाठ पूरा कर के निश्ंिचतता की नींद के आगोश में सो जाते पर आज…

रात को देर तक जागना और पढ़ना…ढेर सारे तनाव के साथ कि पता नहीं क्या होगा. कहीं चयन न हुआ तो? एक ही कमरे में बंद, यह तक पता नहीं कि पड़ोस में क्या हो रहा है. इन का दायरा तो फेसबुक व इंटरनेट के अनजान चेहरे से दोस्ती कर परीलोक की सैर करने तक सीमित है, एक हम थे…पूरे पड़ोस बल्कि दूरदूर के पड़ोसियों के बच्चों से मेलजोल…कोई रोकटोक नहीं. पर अब ऐसा कहां, क्योंकि मुझे याद है कि कुछ साल पहले मैं जब एक दिन अपनी बेटी को ले कर पड़ोस के जोशीजी के घर गई तो संयोगवश जोशी दंपती घर पर नहीं थे. वहीं पर जोशीजी की माताजी से मुलाकात हुई जोकि अपनी पोती के पास बैठी बुनाई कर रही थीं. पोती एक स्वचालित खिलौना कार में बैठ कर आंगन में गोलगोल चक्कर लगा रही थी, कार देख कर मैं अपने को न रोक सकी और बोल पड़ी…

‘आंटी, आजकल कितनी अच्छी- अच्छी चीजें चल गई हैं, कितने भाग्यशाली हैं आज के बच्चे, वे जो मांगते हैं, मिल जाता है और एक हमारा बचपन…ऐसी कार का तो सपना भी नहीं देखा, हमारे समय में तो लकड़ी की पेटी से ही यह शौक पूरा होता था, उसी में रस्सी बांध कर एक बच्चा खींचता था, बाकी धक्का देते थे और बारीबारी से सभी उस पेटी में बैठ कर सैर करते थे. काश, ऐसा ही हमारा भी बचपन होता, हमें भी इतनी सुंदरसुंदर चीजें मिलतीं.’

‘अरे सोनिया, सोने के पिंजरे में कभी कोई पक्षी खुश रह सका है भला. तुम गलत सोचती हो…इन खिलौनों के बदले में इन के मातापिता ने इन की सब से अमूल्य चीज छीन ली है और जो कभी इन्हें वापस नहीं मिलेगी, वह है इन की आजादी. हम ने तो कभी यह नहीं सोचा कि फलां बच्चा अच्छा है या बुरा. अरे, बच्चा तो बच्चा है, बुरा कैसे हो सकता है, यही सोच कर अपने बच्चों को सब के साथ खेलने की आजादी दी. फिर उसी में उन्होंने प्यार से लड़ कर, रूठ कर, मना कर जिंदगी के पाठ सीखे, धैर्य रखना सीखा. पर आज इसी को देखो…पोती की ओर इशारा कर वे बोलीं, ‘घर में बंद है और मुझे पहरेदार की तरह बैठना है कि कहीं पड़ोस के गुलाटीजी का लड़का न आ जाए. उसे मैनर्स नहीं हैं. इसे भी बिगाड़ देगा. मेरी मजबूरी है इस का साथ देना, पर जब मुझे इतनी घुटन है तो बेचारी बच्ची की सोचो.’

मैं उन के उस तर्क का जवाब न दे सकी, क्योंकि वे शतप्रतिशत सही थीं.

हमारे जमाने में तो मनोरंजन के साधन भी अपने इर्दगिर्द ही मिल जाते थे. पड़ोस में रहने वाले पांडेजी भी किसी विदूषक से कम न थे, ‘क्वैक- क्वैक’ की आवाज निकालते तो थोड़ी दूर पर स्थित एक अंडे वाले की दुकान में पल रही बत्तखें दौड़ कर पांडेजी के पास आ कर उन के हाथ से दाना  खातीं और हम बच्चे फ्री का शो पूरी तन्मयता व प्रसन्न मन से देखते. कोई डिस्कवरी चैनल नहीं, सब प्रत्यक्ष दर्शन. कभी पांडेजी बोट हाउस क्लब से पुराना रिकार्ड प्लेयर ले आते और उस पर घिसा रिकार्ड लगा कर अपने जोड़ीदार को वैजयंती माला बना कर खुद दिलीप कुमार का रोल निभाते हुए जब थिरकथिरक कर नाचते तो देखने वाले अपनी सारी चिंता, थकान, तनाव भूल कर मुसकरा देते. ढपली का स्थान टिन का डब्बा पूरा कर देता. कितना स्वाभाविक, सरल तथा निष्कपट था सबकुछ…

सब को हंसाने वाले पांडेजी दुनिया से गए भी एक निराले अंदाज में. हुआ यह कि पहली अप्रैल को हमारे महल्ले के इस विदूषक की निष्प्राण देह उन के कमरे में जब उन की पत्नी ने देखी तो उन की चीख सुन पूरा महल्ला उमड़ पड़ा, सभी की आंखों में आंसू थे…सब रो रहे थे क्योंकि सभी का कोई अपना चला गया था अनंत यात्रा पर, ऐसा लग रहा था कि मानो अभी पांडेजी उठ कर जोर से चिल्लाएंगे और कहेंगे कि अरे, मैं तो अप्रैल फूल बना रहा था.

कहां गया वह उन्मुक्त वातावरण, वह खुला आसमान, अब सबकुछ इतना बंद व कांटों की बाड़ से घिरा क्यों लगता है? अभी कुछ सालों पहले जब मैं अपने मायके गई थी तो वहां पर पांडेजी की छत पर बैठे 14-15 वर्ष के लड़के को देख समझ गई कि ये छोटे पांडेजी हमारे पांडेजी का पोता ही है…परंतु उस बेचारे को भी आज की हवा लग चुकी थी. चेहरा तो पांडेजी का था किंतु उस चिरपरिचित मुसकान के स्थान पर नितांत उदासी व अकेलेपन तथा बेगानेपन का भाव…बदलते समय व सोच को परिलक्षित कर रहा था. देख कर मन में गहरी टीस उठी…कितना कुछ गंवा रहे हैं हम. फिर भी भाग रहे हैं, बस भाग रहे हैं, आंखें बंद कर के.

अभी मैं अपनी पुरानी यादों में खोई, अपने व अपनी बेटी के समय की तुलना कर ही रही थी कि मेरी बेटी ने आवाज लगाई, ‘‘मम्मा, मैं कोचिंग क्लास में जा रही हूं…दरवाजा बंद कर लीजिए…’’

मैं उठी और दरवाजा बंद कर ड्राइंगरूम में ही बैठ गई. मन में अनेक प्रकार की उलझनें थीं… लाख बुराइयां दिखने के बाद भी मैं ने भी तो अपनी बेटी को उसी सिस्टम का हिस्सा बना दिया है जो मुझे आज गलत नजर आ रहा था.

सोचतेसोचते मेरे हाथ में रिमोट आ गया और मैंने टेलीविजन औन किया… ब्रेकिंग न्यूज…बनारस में बी.टेक. की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वह कामर्स पढ़ना चाहती थी…लड़की ने मातापिता द्वारा जोर देने पर इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था. मुझे याद आया कि बी.ए. में मैं ने अपने पिता से कुछ ऐसी ही जिद की थी… ‘पापा, मुझे भूगोल की कक्षा में अच्छा नहीं लग रहा क्योंकि मेरी सारी दोस्त अर्थशास्त्र में हैं. मैं भूगोल छोड़ रही हूं…’

‘ठीक है, पर मन लगा कर पढ़ना,’ कहते हुए मेरे पिता अखबार पढ़ने में लीन हो गए थे और मैं ने विषय बदल लिया था. परंतु अब हम अपने बच्चों को ‘विशेष कुछ’ बनाने की दौड़ में शामिल हो कर क्या अपने मातापिता से श्रेष्ठ, मातापिता साबित हो रहे हैं, यह तो वक्त बताएगा. पर यह तो तय है कि फिलहाल इन का आने वाला कल बनाने की हवस में हम ने इन का आज तो छीन ही लिया है.

सोचतेसोचते मेरा मन भारी होने लगा…मुझे अपनी ‘अप्पी’ पर बेहद तरस आने लगा. दौड़तेदौड़ते जब यह ‘कुछ’ हासिल भी कर लेगी तो क्या वैसी ही निश्ंिचत जिंदगी पा सकेगी जो हमारी थी… कितना कुछ गंवा बैठी है आज की युवा पीढ़ी. यह क्या जाने कि शाम को घर के अहाते में ‘छिप्पीछिपाई’, ‘इजोदूजो’, ‘राजा की बरात’, ‘गिल्लीडंडा’ आदि खेल खेलने में कितनी खुशी महसूस की जा सकती थी…रक्त संचार तो ऐसा होता था कि उस के लिए किसी योग गुरु के पास जा कर ‘प्राणायाम’ करने की आवश्यकता ही न थी. तनाव शब्द तो तब केवल शब्दकोश की शोभा बढ़ाता था… हमारी बोलचाल या समाचारपत्रों और टीवी चैनलों की खबरों की नहीं.

अचानक मैं उठी और मैं ने मन में दृढ़ निश्चय किया कि मैं अपनी ‘अप्पी’ को इस ‘रैट रेस’ का हिस्सा नहीं बनने दूंगी. आज जब वह कोचिंग से लौटेगी तो उस को पूरा विश्वास दिला दूंगी कि वह जो करना चाहती है करे, हम बिलकुल भी हस्तक्षेप नहीं करेंगे. मेरा मन थोड़ा हलका हुआ और मैं एक कप चाय बनाने के लिए रसोई की ओर बढ़ी…तभी टेलीफोन की घंटी बजी…मेरी ननद का फोन था…

‘‘भाभीजी, क्या बताऊं, नेहा का रिश्ता होतेहोते रह गया, लड़का वर्किंग लड़की चाह रहा है. वह भी एम.बी.ए. हो. नहीं तो दहेज में मोटी रकम चाहिए. डर लगता है कि एक बार दहेज दे दिया तो क्या रोजरोज मांग नहीं करेगा?’’

उस के आगे जैसे मेरे कानों में केवल शब्दों की सनसनाहट सुनाई देने लगी, ऐसा लगने लगा मानो एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई हो…अभी मैं अपनी अप्पी को आजाद करने की सोच रही थी और अब ऐसा समाचार.

क्या हो गया है हम सब को? किस मृगतृष्णा के शिकार हो कर हम सबकुछ जानते हुए भी अनजान बने अपने बच्चों को उस मशीनी सिस्टम की आग में धकेल रहे हैं…मैं ने चुपचाप फोन रख दिया और धम्म से सोफे पर बैठ गई. मुझे अपनी भतीजी अनुभा याद आने लगी, जिस ने बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रहे अपने एक सहकर्मी से इसलिए शादी की क्योंकि आज की भाषा में उन दोनों की ‘वेवलैंथ’ मिलती थी. पर उस का परिणाम क्या हुआ? 10 महीने बाद अलगाव और डेढ़ साल बाद तलाक.

मुझे याद है कि मेरी मां हमेशा कहती थीं कि पति के दिल तक पेट के रास्ते से जाया जाता है. समय बदला, मूल्य बदले और दिल तक जाने का रास्ता भी बदल गया. अब वह पेट जेब का रास्ता बन चुका था…जितना मोटा वेतन, उतना ही दिल के करीब…पर पुरुष की मूल प्रकृति, समय के साथ कहां बदली…आफिस से घर पहुंचने पर भूख तो भोजन ही मिटा सकता है और उस को बनाने का दायित्व निभाने वाली आफिस से लौटी ही न हो तो पुरुष का प्रकृति प्रदत्त अहं उभर कर आएगा ही. वही हुआ भी. रोजरोज की चिकचिक, बरतनों की उठापटक से ऊब कर दोनों ने अलगाव का रास्ता चुन लिया…ये कौन सा चक्रव्यूह है जिस के अंदर हम सब फंस चुके हैं और उसे ‘सिस्टम’ का नाम दे दिया…

मेरा सिर चकराने लगा. दूर से आवाज आ रही थी, ‘दीदी, भागो, अंधड़ आ रहा है…बवंडर न बन जाए, हम फंस जाएंगे तो निकल नहीं पाएंगे.’ बचपन में आंधी आने पर मेरा भाई मेरा हाथ पकड़ कर मुझे दूर तक भगाता ले जाता था. काश, आज मुझे भी कोई ऐसा रास्ता नजर आ जाए जिस पर मैं अपनी ‘अप्पी’ का हाथ पकड़ कर ऐसे भागूं कि इस सिस्टम के बवंडर बनने से पहले अपनी अप्पी को उस में फंसने से बचा सकूं, क्योंकि यह तो तय है कि इस बवंडर रूपी चक्रव्यूह को निर्मित करने वाले भी हम हैं…तो निकलने का रास्ता ढूंढ़ने का दायित्व भी हमारा ही है…वरना हमारे न जाने कितने ‘अभिमन्यु’ इस चक्रव्यूह के शिकार बन जाएंगे.

इसी को कहते हैं जीना : कैसा था नेहा का तरीका

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घर है या जेल: उर्मि ने ये क्या किया

नई-नवेली पत्नी उर्मि को पा कर मोहन बहुत खुश था. हो भी क्यों न, आखिर हूर की परी जो मिली थी उसे. सच में गजब का नूर था उर्मि में. अगर उसे बेशकीमती पोशाक और लकदक गहने पहना दिए जाते तो वह किसी रानीमहारानी से कम न लगती. लेकिन बेचारी गरीब मांबाप की बेटी जो ठहरी, तो कहां से उसे यह सब मिलता भला, पर सपने उस के भी बहुत ऊंचेऊंचे थे.

अब सपने तो कोई भी देख सकता है न. तो बेचारी वह भी ऊंचेऊंचे सपना देखती थी कि उस का राजकुमार भी सफेद छोड़े पर चढ़ कर उसे ब्याहने आएगा और उसे दुनियाभर की खुशियों से नहला देगा.

लेकिन जब उर्मि ने अपने दूल्हे के रूप में मोहन को देखा तो उस का मन बुझाबुझा सा हो गया क्योंकि मोहन उस के सपनों के राजकुमार से कहीं भी मैच नहीं बैठ रहा था. खैर, चल पड़ी वह अपने पति मोहन के साथ जहां वह उसे ले गया.

‘‘जब शादी हो ही गई है तो अब अपनी जिम्मेदारी भी संभालना सीखो…’’ पिता का यह हुक्म मान कर मोहन उर्मि को ले कर शहर आ गया और काम की तलाश करने लगा.

लेकिन मोहन को कहीं भी कोई ढंग का काम नहीं मिल पा रहा था. दिहाड़ी पर मजदूरी कर के वह किसी तरह कुछ पैसे कमा लेता, मगर उतने से क्या होगा और दोस्त के घर भी वह कितने दिन ठहरता भला?

आखिर मोहन को काम न मिलता देख उस दोस्त ने सलाह दी कि क्यों न वह बड़ी सब्जी मंडी से सब्जियां ला कर बेचे. इस से उस की अच्छी कमाई हो जाएगी और रोज काम न मिलने की फिक्र भी नहीं रहेगी.

किसी तरह जोड़ेजुटाए पैसों से मोहन बड़ी सब्जी मंडी जा कर सब्जियां खरीद लाया और उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचने लगा.

अब मोहन का रोज का यही काम था. अंधेरे मुंह सुबहसवेरे उठ कर वह बड़ी सब्जी मंडी चला जाता और वहां से थोक भाव में खूब सारी फलसब्जियां खरीद कर उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचता.

अब मोहन की कमाई इतनी होने लगी थी कि पतिपत्नी के लिए अच्छे से दालरोटी जुट जाती थी. बेचारा मोहन, जब फलसब्जियां बेच कर थकाहारा घर आता तो उस के माथे पर पसीने का मुकुट और सीने में धड़कनों का जंगल होता, लेकिन फिर भी वह अपनी खूबसूरत पत्नी का मुखड़ा देख कर अपनी सारी थकान भूल जाता.

लेकिन उस की उर्मि जाने उस से क्या चाहती थी. वह कभी खुश ही नहीं रहती थी.

नहीं, वैसे तो वह खुश रहती थी, पर मोहन को देखते ही ठुनकने लगती थी कि उसे क्याक्या कमी है.

बेचारा मोहन हर तरह से कोशिश करता कि उर्मि को खुश रखे, पर उस की मांगें रोजाना बढ़ती ही जाती थीं.

मोहन मेहनत के चार पैसे इसलिए ज्यादा कमाना चाहता था ताकि उर्मि को ज्यादा से ज्यादा खुश रख सके, मगर उर्मि को इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी. वह तो अपने ही पड़ोस के एक बांके नौजवान धीरुआ के साथ नैनमटक्का कर रही थी.

तेलफुलेल, चूड़ी, बिंदी वगैरह बेचने वाला धीरुआ पर उस का दिल आ गया था. जब भी वह उसे देखती, उसे कुछकुछ होने लगता.

सोचती, काश, धीरुआ उस का पति होता तो कितना मजा आता. पता नहीं, क्यों उस के मांबाप ने उस से 10 साल  से भी ज्यादा बड़े मोहन के साथ उसे ब्याह दिया?

उधर धीरुआ भी जब उर्मि को देखता तो देखता रह जाता. उस के गठीले बदन के उभार को देख कर उस के मुंह से लार टपकने लगती. उसे लगता, कैसे वह उसे अपने ताकतवर हाथों में समेट ले और फिर कभी छोड़े ही न. और वैसे भी वह अभी तक कुंआरा था.

जब भी उर्मि उस की दुकान पर आती, धीरुआ उसे ही निहारते रहता. यह बात उर्मि भी समझ रही थी इसलिए तो बहाना बना कर वह उस की दुकान पर अकसर जाती रहती थी.

धीरुआ अपने मोबाइल फोन में उर्मि को बढि़याबढि़या प्यार वाले गाने सुनाता और वीडियो भी दिखाता. प्यार वाले गाने सुन कर वह ऐसे मंत्रमुग्ध हो जाती कि पूछो मत. वह खुद को उस गाने की हीरोइन ही समझने लगती और धीरुआ को हीरो.

एक दिन उर्मि ने ठुनकते हुए मोहन से मोबाइल फोन की मांग कर दी. हैसियत तो नहीं थी बेचारे की, लेकिन फिर भी एक सस्ता सा मोबाइल, जिस से सिर्फ बात हो सकती थी, उर्मि के लिए खरीद लाया.

मोबाइल फोन देख कर उर्मि बहुत खुश तो नहीं हुई, पर लगा चलो बात तो होगी न इस से. अब उस का जब भी मन करता, धीरुआ को फोन लगा देती और खूब बातें करती. पर अपने पति मोहन से कभी सीधे मुंह बात नहीं करती थी.

न जाने क्यों उर्मि बातबात पर मोहन पर चढ़ जाती और बेचारा मोहन भी उस के गुस्से को शरबत समझ कर चुपचाप हंसतेहंसते पी जाता.

सोचता, उम्र कम है इसलिए समझ भी थोड़ी कम है. मगर उसे तो मोहन जरा भी भाता ही नहीं था. उस का दिल तो अपने आशिक धीरुआ के दिल से जा कर अटक गया था.

किसी तरह हिचकोले खाते हुए मोहन और उर्मि की गृहस्थी चल रही थी. लेकिन कहते हैं न, वक्त कब करवट ले, कह नहीं सकते. अचानक एक दिन लोगों में हड़कंप देख कर मोहन चौंक गया. देखा तो सब अपनेअपने सामान समेट कर भागने लगे हैं.

‘‘अरे, क्या हुआ भाई?’’ मोहन ने पास में अपनी सब्जियां समेट रहे सब्जी वाले से पूछा.

‘‘अरे, क्या हुआ क्या, तुम भी अपना सामान जल्दी से उठा कर भागो. तुम देख नहीं रहे कब्जा हटाने के लिए नगर प्रशासन का दस्ता आया हुआ है,’’ उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘नगर प्रशासन का दस्ता… पर वह क्यों भाई?’’ मोहन ने उस सब्जी वाले से हैरानी से पूछा.

‘‘क्योंकि यहां सब्जियां बेचना गैरकानूनी है,’’ झुंझलाते हुए उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘गैरकानूनी… पर यहां शहर के बीचोंबीच कुछ लोगों ने जो मौल और होटल बना रखे हैं, वे भी आधे से ज्यादा सरकारी जमीन पर हैं तो उन्हें ये प्रशासन वाले क्यों कुछ नहीं कहते? क्या इन लोगों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती? हम गरीब ही मिले हैं इन्हें सताने को?’’ मोहन ने गुस्से से कहा.

‘‘अरे भाई, वे अमीर लोग हैं. पैसा और पहुंच बहुत है उन की. फिर उन के खिलाफ क्यों कोई कार्यवाही होने लगी? चल, मैं तो चला, तू भी निकल ले जल्दी से,’’ कह कर वह सब्जी वाला चलता बना.

मोहन भी खुद में भुनभुनाते हुए अपनी सब्जियां समेटने लगा, लेकिन तभी किसी की कड़क आवाज से वह कांप उठा और उस के हाथ थरथर कांपने लगे.

‘‘क्यों बे, अब तुझे क्या अलग से न्योता देता… हां, बोल?’’ कह कर उस में से एक ने उस की टोकरी में ऐसी लात मारी कि वह लुढ़कती हुई दूर चली गई. सारे टमाटर सड़क पर छितरा गए.

तभी एक दूसरा अफसर उस की तरफ बढ़ा ही था कि मोहन हाथ जोड़ कर विनती करते हुए कहने लगा, ‘‘साहब, मैं अभी उठाए लेता हूं सारी सब्जियां, दया माईबाप दया…’’

लेकिन मोहन की बातों को अनसुना कर एक बड़े अफसर ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘इन का तो यह रोज का नाटक है. जब तक इन्हें सबक नहीं सिखाओगे, समझेंगे नहीं,’’ कह कर उस ने उस की बचीखुची सब्जियां भी फेंक दीं.

बेचारा मोहन उन सब के सामने गिड़गिड़ाता रह गया. वह अपने आंसू पोंछते हुए जो भी सब्जियां बची थीं, ले कर घर चला गया, पर वहां भी उर्मि की जहरीली बातों ने उसे मार डाला.

‘‘तो क्या करूं… बोल न? क्या गरीब होना मेरी गलती है या वहां जा कर सब्जियां बेच कर मैं ने कोई गुनाह कर दिया, बोलो?’’ मोहन रोंआसी आवाज में बोला.

‘‘वह सब मुझे नहीं पता… तुम चोरी करो, डकैती करो, जेब काटो चाहे जो भी करो मुझे तो बस पैसे चाहिए घर चलाने के लिए,’’ जख्म पर महरम लगाने के बदले उर्मि अपनी बातों से उसे और जख्म देने लगी.

अब क्या करता बेचारा, पैसे तो थे नहीं जो फिर से कोई धंधा शुरू करता. कहीं सचमुच में उर्मि उसे छोड़ कर भाग न जाए, इस वजह से मोहन ने गलत रास्ता अख्तियार कर लिया.

अब सब्जियां बेचने के बजाय लोगों की जेबें काटने लगा और छोटीमोटी चोरियां भी करने लगा.

शुरूशुरू में तो मोहन को बहुत बुरा लगता था ये सब काम करने में, लेकिन फिर धीरेधीरे उसे भी यह सब करने में मजा आने लगा.

घर में सामानपैसा आते रहने से उर्मि भी अब खुश रहने लगी थी. उस के ठाठ देख आसपड़ोस की औरतें जल मरतीं और उर्मि उन्हें देख और इतराती. लेकिन उन के पास यह सुख भी ज्यादा दिनों तक टिका न रह सका.

एक दिन मोहन चोरी करते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ गया और उसे जेल भेज दिया.

मोहन के जेल जाने से उर्मि को कोई खास फर्क नहीं पड़ा, बल्कि उस की तो और मौज हो गई. अब वह खुल कर धीरुआ के साथ आंखें चार करने लगी.

धीरुआ उसे जबतब अपने घर ले जाता और दोनों खूब मस्ती करते. अपनी मोटरसाइकिल पर वह उर्मि को खूब घूमाताफिराता, सिनेमा दिखाता. जब लोग कुछ कहते तो उर्मि उन्हें दोटूक जवाब दे कर चुप कर देती.

इधर बिना गुनाह साबित हुए ही मोहन महीनों तक जेल में पड़ा सड़ता रहा, क्योंकि कोई उस की जमानत कराने नहीं आया इसलिए. जब जान लिया उर्मि ने कि अब मोहन नहीं आने वाला, तो एक दिन वह धीरुआ के साथ भाग गई.

बिना गुनाह साबित हुए ही महीनों जेल में गुजारने की बात जब एक कैदी दोस्त ने सुनी तो उसे मोहन पर दया आ गई. छूटते ही उस कैदी दोस्त ने मोहन की जमानत तो करवा दी, लेकिन महीनों जेल में पड़े रहने से वह बहुत कमजोर हो गया. जब पत्नी के बारे में जाना तो उस का दिल और टूट गया. लगा जिस के लिए उस ने इतना सबकुछ सहा, वही उस का साथ छोड़ गई.

अब मोहन बीमार और बेसहारा हो गया था. न तो अब वह कोई काम करने लायक रहा और न ही चोरीजेबकतरी के ही लायक रह गया. कोई कुछ दे जाता तो खा लेता, वरना भूखे पेट ही सो जाता. उसे लग रहा था कि उस के लिए तो जेल भी वैसी ही थी जैसा घर.

समस्या का अंत : बेचारा अंबर, करे तो क्या करे

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लाल कमल : अंधविश्वास को मात देता उजाला

आईएएस यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने के बाद आनंद अभी बेंगलुरु में एक ऊंचे प्रशासनिक पद पर काम कर रहा है. महात्मा गांधी की पुकार पर साल 1942 के आंदोलन में स्कूल छोड़ कर देश की आजादी के लिए कूद पड़ने वाले करमना गांव के आदित्य गुरुजी के पोते आनंद को देश और समाज के प्रति सेवा करने की लगन विरासत में मिली है. आनंद बचपन से ही अपने तेज दिमाग, बड़ेबुजुर्गों के प्रति आदर और हमउम्र व बच्चों के बीच मेलजोल के साथ पढ़नेलिखने व खेलनेकूदने में भाग लेने के चलते बहुत लोकप्रिय था.

गांवसमाज के हर तीजत्योहार, शादीब्याह, रीतिरिवाज में आनंद को उमंग के साथ हिस्सा लेने में बहुत खुशी होती थी. केवल छात्र जीवन में ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सेवा में आने के बाद भी होलीदशहरा में वह गांव आने का मौका निकाल ही लेता था.

इस बार मार्च महीने में दफ्तर के कुछ काम से उसे पटना जाना था. पटना आने के बाद आनंद ने एक दिन गांव जाने का प्रोग्राम बनाया.

आनंद को गांव आ कर काफी अच्छा लगता है, पर अब यहां बहुतकुछ बदल गया है.

यह बात आज के बच्चे सोच भी नहीं सकते कि जहां पहले कभी कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी और टमटम के अलावा कोई दूसरी सवारी नहीं हुआ करती थी, वहां अब पक्की रोड पर बसें और आटोरिकशा 12 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए हर 15 मिनट पर तैयार मिल जाते हैं.

यहां तक कि पटना से निकलने वाले सभी अखबार अब इस गांव में आते हैं और हौकर इन्हें घरघर तक पहुंचा जाता है. साथ ही, टैलीविजन पर भी अब हर छोटीबड़ी खबर और मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों समेत नईपुरानी फिल्में भी देखने को मिल जाती हैं.

अब आनंद के बाबूजी तो रहे नहीं, पर चाचा और चाची रहते हैं. उसे देखते ही उन के चेहरे पर खुशी की चमक आंखों में नमी लिए पसर गई.

आनंद ने चाचा के पैर छुए. उन्होंने उस के सिर को दोनों हाथों में ले कर चूमते हुए ढेर सारा आशीर्वाद दिया.

चाची दोनों की बातें सुनते हुए अंदर से बाहर आ गई थीं. आनंद ने उन के भी पैर छुए.

चाची ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हम कह रहे थे कि आनंद हम को देखे बिना जा ही नहीं सकता.’’

‘‘कैसे हैं आप लोग?’’ आंखों में भर आए आंसुओं को रूमाल से पोंछते हुए आनंद ने पूछा.

‘‘तुम्हारे जैसे बेटे के रहते हमें क्या हो सकता है? हम भलेचंगे हैं. लो, कुछ चायनाश्ता कर के थोड़ा आराम कर लो, तब तक मैं खाना तैयार कर लेती हूं,’’ कह कर चाची अंदर चल पड़ीं.

‘‘बहुत परेशान न होइएगा चाची. सादा खाना ही ठीक रहेगा,’’ आनंद ने कहा और चायनाश्ता करते हुए चाचा

से अपने खेतखलिहान के साथ ही साफ बागबगीचे, गांवसमाज की बातें करने लगा.

चाची के हाथ का बना खाना खाते हुए आनंद को बरबस ही बचपन की यादें ताजा हो आईं.

खाना खाने के बाद आनंद ने कुछ देर आराम किया. शाम को चाचा ने फागू को बुलाया. उन्होंने सरसों के सूखे डंठलों को खलिहान से मंगवा कर परिवार के सदस्यों की संख्या के हिसाब से एक ज्यादा होल्लरी यानी लुकाठी बनवाई.

होलिका दहन के लिए गांव की तय जगह पर लोग समय पर इकट्ठा हो गए थे. आनंद भी चाचा के जोर देने पर वहां पहुंच गया था.

वैसे, होली के इस मौके पर होने वाली हुल्लड़बाजी और नशे के असर से सहीगलत न समझ पाने वाले नौजवानों की हरकतों को आनंद बचपन से ही नापसंद करता रहा है.

आनंद को यह बात तो अच्छी लगती कि होलिका दहन में गांवमहल्ले की बहुत सी गंदगी, बेकार की चीजें, जो सही माने में बुराई की प्रतीक हैं, जला कर आबोहवा को कुछ हद तक साफ करने में मदद मिलती है. परंतु वह यह भी मानता है कि होलिका दहन के ढेर से उठती आग की लपटों से कभीकभार आसपास के हरेभरे पेड़ों और मकानों को पहुंचने वाले नुकसान से इस को मनाने के सही ढंग पर नए सिरे से सोचना चाहिए.

आनंद को देख कर गांव के बहुत से नौजवान लड़के उस के पास आ गए. उन सभी लड़कों ने अपने मातापिता से आनंद के बारे में पहले ही बहुतकुछ सुन रखा था. वे अपने बच्चों को आनंद जैसा बनने की सीख देते थे.

आनंद को भी उन से मिल कर बहुत अच्छा लगा.

आनंद ने उन नौजवानों से दोस्त की तरह कई बातें कीं, फिर होलिका दहन के बारे में भी अपने मन की बातें उन से साझा कीं. वे सभी आनंद जैसे एक बड़े ओहदे वाले शख्स की इतनी अपनेपन भरी बातों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे.

एक लड़के सुंदर ने आगे आते हुए कहा, ‘‘आनंद अंकल, हम आप से वादा करते हैं कि आगे से सावधान रहेंगे और किसी भी दुर्घटना की नौबत नहीं आने देंगे.’’

सुधीर ने भी भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘अंकल, आज होली के नाम पर न तो कोई गंदे गाने गाएगा और न ही गंदी हरकत करेगा.’’

और सच में ही उस शाम के होलिका दहन को बड़ी सादगी से मनाया गया.

आनंद ने सभी को होली की मिठाई खिलाई. उस के बाद वह अपने चाचा के साथ घर लौट आया.

चैत्र पूर्णिमा की रात थी. दालान में चारपाई पर लेटे आनंद को चांदनी में नहाई रात काफी अच्छी लग रही थी. नींद की गहराई में धीरेधीरे उतरते हुए भी आनंद के कानों में होली के गीत सुनाई पड़ रहे थे.

अचानक ही तभी कुत्तों के भूंकने की आवाजों को बीच गांव के लोगों की घबराहट भरी आवाजों का शोर जोर पकड़ता हुआ सुनाई पड़ा.

‘‘मालिक, गोलीबंदूक के साथ बसहा गांव वाले फसल लगे खेतों की सीमा पर आ कर लड़नेमरने को तैयार खड़े हैं,’’ दीनू को अपने चाचा से यह कहते हुए सुन कर चौंकता हुआ आनंद झटके से उठ बैठा.

आनंद ने अपने मोबाइल फोन से कुछ संबंधित बड़े पुलिस अफसरों से बात करने की कोशिश की.

रास्ते में दीनू ने बताया कि आधी रात के बाद गांव के कुछ अंधविश्वासी लोग देवी मां के मंदिर में जमा हुए थे.

तांत्रिक इच्छा भगत ने पहले देवी मूर्ति की लाल उड़हुल के फूलों, रोली, अबीरगुलाल से पूजा की थी, उस के बाद एक तगड़ा काला कुत्ता भैरों के रूप में वहां लाया गया.

वहां जुटे लोगों ने खुद शराब पीने के साथसाथ उस कुत्ते को भी शराब पिलाई और फूलमाला से पूजा की गई.

नए साल में अपने गांव की खुशहाली और पुराने साल आई मुसीबतों को हमेशा के लिए भगाने के लिए उन्होंने करायल, अरंडी का तेल, पीली सरसों, लाल मिर्च, सिंदूर, चावल वगैरह को एक छोटे मिट्टी के बरतन में ढक कर भैरों कहे जाने वाले कुत्ते की गरदन में बांध दिया.

तांत्रिक इच्छा भगत ने मंदिर से एक जलता हुआ दीया उठा कर कुत्ते की गरदन में सामान समेत बंधे मिट्टी के बरतन में सावधानीपूर्वक रख दिया. फिर दीए की गरमी से परेशान कुत्ता भूंकता हुआ बसहा गांव की तरफ दौड़ पड़ा.

इच्छा भगत और कुछ लोग इस बात को पक्का करना चाहते थे कि वह कुत्ता वापस उन के अपने गांव में न लौटे.

उधर खेतों की रखवाली कर रहे बसहा गांव के कुछ किसानों ने दूसरे छोर पर आग की लपटों के साथ कुत्ते की गुर्राहट भरी आवाज सुनी. कुछ ही देर में पकने को तैयार गेहूं की फसल लपटों में झुलसने लगी थी.

रखवाली कर रहे किसानों को पूरा माजरा समझने में ज्यादा समय नहीं लगा. उन्होंने दौड़ कर तमाम गांव वालों को बुला लिया. ट्यूबवैल चला कर पानी से आग बुझाने के साथसाथ कुछ लोग गोलीबंदूक के साथ इस घटना के पीछे रहे करमना गांव को सबक सिखाने को ललकारने लगे थे. हवा में गोलियों की आवाजें गूंजने लगी थीं.

इस से पहले कि करमना गांव के कुछ अंधविश्वासी और नासमझ तत्त्वों की शरारत के कारण पड़ोसी गांव वालों की होली की खुशी खूनखराबे और मातम की भेंट चढ़ जाती, आनंद अपने साथ जिला मजिस्ट्रेट और एसपी की टीम मौके पर ले कर पहुंच गया. उस ने गुस्साए लोगों को समझाबुझा कर शांत किया.

अंधविश्वास में ‘भैरव टोटका’ करने वाले इच्छा भगत व दूसरे लोगों को पुलिस पकड़ कर वहां थोड़ी ही देर में पहुंच गई.

आनंद के कहने पर उन लोगों ने बसहा गांव के लोगों से अपने गलत अंधविश्वास के चलते किए गए काम के लिए माफी मांगी.

‘‘हम आप के पैर पकड़ते हैं भैया, हमें माफ कर दीजिए. हम शपथ लेते हैं कि आगे से नासमझी और अंधविश्वास से भरा कोई काम नहीं करेंगे.’’

तब तक आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की टीम भी वहां आ चुकी थी.

तेजी से किए गए बचाव काम से आग को ज्यादा फैलने के पहले ही बुझाने में कामयाबी मिल गई थी.

आनंद ने गांव वालों की ओर से हुई गलती के लिए माफी मांगते हुए कहा, ‘‘रघुवीर, मैं तुम्हारे जज्बात को अच्छी तरह समझ सकता हूं… अपनी जिस फसल को खूनपसीना बहा कर तुम ने तैयार किया है, उस के खेत में इस तरह जल जाने के चलते हुए दिल के घाव को भरना किसी के लिए मुमकिन नहीं है. फिर भी करमना गांव के लोगों की ओर से मैं खुद जिम्मेदारी लेता हूं कि तुम्हें जो भी नुकसान हुआ है, उसे हमारे द्वारा कल ही पूरा किया जाएगा.’’

अपने खेत की तैयार फसल के जलने से नाराज रघुवीर कुसूरवारों को सबक सिखाने पर आमादा था, पर अपने स्कूल के दिनों में सही बात से आगे बढ़़ने की प्रेरणा देने वाले आदित्य गुरुजी जैसे आनंद के रूप में अभी वहां आ खड़े हो गए थे, इसलिए वह अपने गुस्से पर काबू कर गया.

रघुवीर आनंद के पैरों पर झुकता हुआ बोला, ‘‘माफ करें सर. आप की हर बात मेरे सिरआंखों पर.’’

आनंद ने रघुवीर को गले लगाते हुए कहा, ‘‘उठो रघुवीर, अब बसहापुर गांव और करमना गांव आपस में

मिल कर एकदूसरे की मुसीबतों को मिटाते हुए खुशियां लाने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे. तुम बिलकुल चिंता मत करो.

‘‘इस बार गांव के स्कूल वाले मैदान में करमना और बसहा दोनों गांव मिल कर एकसाथ होली मनाएंगे.’’

वहां जमा दोनों गांवों के लोगों के चेहरे पर खुशी की लाली चमक उठी. ‘हांहां’ के साथ ‘होली है होली है’ की आवाजें चिडि़यों की चहचहाहट भरे माहौल में गूंज उठीं.

उसी समय गांव के पूर्वी आकाश में सूरज एक लाल कमल की तरह खिलता नजर आ रहा था.

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