निशान

पूर्व कथा

हर मातापिता की तरह सुरेश और सरला भी अपनी बेटी मासूमी को धूमधाम से विदा कर ससुराल भेजना चाहते हैं. 2 भाइयों की इकलौती बहन मासूमी खूबसूरत होने के साथ घर के कामों में दक्ष है. उस के रिश्ते भी खूब आते लेकिन जब शादी की बात पक्की होने को आती, उसे दौरे पड़ जाते. वह चीख उठती और रिश्ता जुड़ने से पहले टूट जाता. एक दिन मौसी ने मासूमी से उस के दिल की बात जाननी चाही तो वह बोली, ‘मौसी, आप ने ऐसा सोचा भी कैसे…’ वहीं, मासूमी को कई बार विवाह की महत्ता का एहसास होता रहा. वह सोचने लगी कि उसे भी शादी कर घर बसा लेना चाहिए. 28 साल की हो चुकी मासूमी का नया रिश्ता आया तो सभी ने सोचा कि यह रिश्ता चूंकि काफी समय बाद आया है, लड़का अच्छा पढ़ालिखा व उच्च पद पर है और मासूमी ज्यादा समझदार भी हो गई है, अत: वह इस रिश्ते को हरी झंडी दे देगी लेकिन मासूमी को लगा कि वह विवाह का रिश्ता संभालने में असफल रहेगी. उधर वह अपने पापा से बेहद डरीसहमी रहती थी. स्कूल से घर आते ही उस का पहला प्रश्न होता, ‘मां, पापा तो नहीं आ गए, राकेश भैया स्कूल गए थे या नहीं, दोनों भाइयों में झगड़ा तो नहीं हुआ?’ सरला उसे परेशानी में देख कहती, ‘तू क्यों इन चिंताओं में डूबी रहती है? अरे, घर है तो लड़ाईझगड़े भी होंगे.’ इसी असमंजस में फंसी मासूमी स्कूल से कालेज में आ गई थी और आज फिर वह दिन आ गया था जो किसी आने वाले तूफान का संकेत दे रहा था…

अब आगे…

हमेशा की तरह इस बार भी शादी के लिए आए रिश्ते को मासूमी ने ठुकरा दिया तो पिता सुरेशजी ने उस से उस की परेशानी स्पष्ट करने को कहा. तब मासूमी ने जो बताया, उसे जान कर वे सन्न रह गए.

गतांक से आगे…

भाई राकेश का मुकदमा मां की अदालत में था. मांपिताजी दोनों की चुप्पी आने वाले तूफान का संकेत दे रही थी. किसी भी क्षण झगड़ा होने वाला था. इसलिए मासूमी फिर पिता की ओर बढ़ कर बोली, ‘‘पापा, आप हाथमुंह धोएं, मैं चाय बनाती हूं.’’

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रसोई में जा कर भी मासूमी का मस्तिष्क उलझा रहा. पापा काम से थकेहारे आते हैं. ये बातें तो बाद में भी हो सकती हैं. भाई राकेशप्रकाश भी अब बड़े हैं, उन्हें अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहिए. समय से घर आना व पढ़ना चाहिए पर दोनों कुछ खयाल ही नहीं रखते. मासूमी अकसर पिता का पक्ष लेती. इस के पीछे छिपा कारण यह था कि वह मां को गुस्से से बचाना चाहती थी लेकिन सरला को शिकायत होती कि वह सबकुछ जानते हुए भी पिता का पक्ष लेती है.

पिता चाय की प्याली ले कमरे में चले गए और मासूमी से पूछा, ‘‘तुम्हारी मां को क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, क्यों? आप से कुछ कहा?’’ मासूमी ने अनजान बन कर पूछा.

‘‘नहीं, कहा तो नहीं पर लग रहा है कुछ गड़बड़ है. जाओ, बुला कर लाओ मां को,’’ उन्होंने आदेश देने के अंदाज में मासूमी से कहा तो उस का दिल अनजानी आशंका से धड़क उठा.

दरवाजे पर खड़ी मां तमतमाए चेहरे से उसे देख कर बोलीं, ‘‘रसोई में जाओ और खाने की तैयारी करो.’’

‘‘जी,’’ कह मासूमी बाहर निकल गई पर उस के पैर कांपने लगे थे. हमेशा यही होता था. जब घर में कलह होती तो उसे रसोई में जाने का आदेश मिल जाता था. और फिर वह पल आ गया जिस से उस का मन हमेशा कांपता था. अंदर मां पापा से कह रही थीं :

‘‘देखिए, आज मैं आप से ऐसी बात कहने वाली हूं जिस में आप की, बच्चों की व इस घर की भलाई है. यह समझ लीजिए कि घर के इस माहौल ने मासूमी की जिंदगी पर गहरा असर डाला है. हमेशा एक तानाशाह बन कर घर पर राज किया है. मुझे बराबरी का दर्जा देना तो दूर, आप ने हमेशा अपने पैर की जूती समझा है. मैं ने फिर भी कुछ नहीं कहा. मासूमी भी मुझे ही चुप कराती है, क्योंकि वह लड़ाईझगड़े से डरती है लेकिन अब मामला दोनों लड़कों का है. अब राकेश ने भी कह दिया है कि पापा हमें दूसरों के सामने बेइज्जत न करें. संभालिए खुद को वरना कल प्रकाश घर से भागा था अब कहीं राकेश भी…’’

‘‘कर चुकीं बकवास. खबरदार, अब एक शब्द भी आगे बोला तो,’’ अंगारों सी लाल आंखें लिए मुट्ठियां भींचे सुरेश की कड़क आवाज दूर तक जा रही थी, ‘‘कान खोल कर सुन लो, बच्चों को बिगाड़ने में सिर्फ तुम्हारा हाथ है. तुम्हारे कारण ही वे इतनी हिम्मत करते हैं. कहां है वह उल्लू का पट्ठा, मेरे सामने कहता तो खाल खींच देता उस सूअर की औलाद की.’’

‘‘गाली देने से झूठ, सच नहीं हो जाता. तुम्हें बदलते वक्त का अंदाजा नहीं. बच्चों के साथ कदम नहीं मिला सकते तो उन का रास्ता मत रोको,’’ सरला भी तैश में आ गई थीं.

जिस बात से दूर रखने के लिए सरला ने मासूमी को रसोई में भेजा था वे सारी बातें दीवारों की हदें पार कर उस के कानों में गूंज रही थीं.

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सुरेश मर्दों वाले अंदाज में सरला की कमजोरियों को गिनवा रहे थे और दोनों बेटे मां की बेइज्जती पर दुख से पहलू बदल रहे थे तो मासूमी दोनों भाइयों को फटकार रही थी :

‘‘लो, पड़ गया चैन. एक दिन भी घर में शांति नहीं रहने देते. रोज कोई न कोई हंगामा होता है. रोज के झगड़ों से मेरी जान निकल जाती है. इस से अच्छा है, मैं मर ही जाऊं. ऊपर से मौसी, बूआ रोज आ कर अपने पतियों की वीरगाथाएं सुनाती हैं कि वे उन से लड़ते हैं. क्या सारे पुरुष एक से होते हैं? उन्हें यही करना होता है तो वे शादियां ही क्यों करते हैं?’’

प्रकाश गुस्से से गुर्राया, ‘‘तुम चुप ही रहो. सारा दोष मांपिताजी का है. हर समय ये झगड़ते रहते हैं. पापा तो सारी उम्र हमें बच्चा ही समझते रहेंगे. जब मन में आया डांट दिया, जब मन आया गाली दे दी.’’

उधर मां की तेज आवाज आने पर मासूमी मां की ओर बढ़ी, ‘‘मां, रहने दो. आप ही चुप हो जाइए. आप को पता है कि पापा अपनी बात के आगे किसी की नहीं सुनते तो आप मत बोलिए.’’

‘‘तू हट जा. आज फैसला हो कर रहेगा. मुझे गुलाम समझ रखा है. बाप रौब जमाता है तो बेटे अलग मनमानी करते हैं. तेरा क्या है, शादी के बाद अपने घर चली जाएगी, पर मेरे सामने तो बुढ़ापा है. अगर तेरे पिता का यही हाल रहा तो क्या दामाद और बहुओं के सामने भी ऐसे ही गालियां खाती रहूंगी? नहीं, आज होने दे फैसला,’’ मां बुरी तरह हांफ रही थीं और मासूमी रो रही थी.

राकेश बोला, ‘‘क्यों रोती है? हम बच्चे तो नहीं कि हर बात को सही मान लें.’’

मासूमी चिल्लाई, ‘‘देखा प्रकाश, सारा झगड़ा इसी का शुरू किया है. बित्ते भर का है और मांबाप का मुकाबला कर रहा है.’’

‘‘चुप रह वरना एक कस कर पड़ेगा. पापा की चमची कहीं की,’’ राकेश लालपीला हो कर बोला.

प्रकाश भी तमक उठा, ‘‘दिमाग फिर गया है तुम लोगों का…उधर वे लड़ रहे हैं इधर तुम. कोई मानने को तैयार नहीं है.’’

‘‘आप माने थे…’’ राकेश ने पलट- वार किया तो प्रकाश उसे मारने दौड़ा.

उसी समय अंदर से कुछ टूटने की आवाजें आईं. मासूमी दौड़ कर अंदर गई तो देखा पिताजी हाथ में क्रिकेट का बैट लिए शो केस पर तड़ातड़ मार रहे हैं.

राकेश द्वारा पाकेटमनी जोड़ कर खरीदा गया सीडी प्लेयर और सारी सीडी जमीन पर पड़ी धूल चाट रही थीं…शोपीस टुकड़ेटुकड़े हो कर बिखरा पड़ा था.

मासूमी हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘पापा, प्लीज, शांत हो जाएं.’’

लेकिन सुरेशजी की जबान को लगाम कहां थी, गालियों पर गालियां देते चीख रहे थे, ‘‘तू हट जा. एकएक को देख लूंगा. बहुत खिलाड़ी, गवैए बने फिरते हैं पर मैं ये नहीं होने दूंगा. इन को सीधा कर दूंगा या जान से मार डालूंगा.’’

प्रकाश का जवान खून भी उबाल खा गया, ‘‘हां, हां, मार डालिए. रोजरोज के झगड़ों से तो अच्छा ही है.’’

सरला और मासूमी ने मिल कर प्रकाश को बाहर धकेलना चाहा और राकेश ने बाप को पकड़ा पर कोई बस में नहीं आ रहा था.

मासूमी ने घबरा कर इधरउधर देखा तो बहुत सारी आंखें उन की खिड़कियों से झांक रही थीं और कान दरवाजे से चिपके हुए थे. बस, यही वह समय था जब मासूमी का सिर चकराने लगा. उसे लगा कि वह गहरे पाताल में धंसती जा रही है, जहां न उसे मां की बेबसी का होश था न पिता के गुस्से का और न भाइयों की बगावत का.

मासूमी को होश आया तो सारा माहौल बदला हुआ था. पिता सिर झुकाए सिरहाने बैठे थे, मां पल्लू से आंखें पोंछ रही थीं, भाई हाथपैर सहला रहे थे. पिता का गुस्सा तो साबुन के बुलबुलों की तरह बैठ गया था पर मां सरला आज मौके का फायदा उठा कर फिर बोल उठी थीं, ‘‘जवान बच्चों के लिए आप को अपनी आदतों और कड़वाहटों पर काबू पाना चाहिए. यह नहीं कि घर में घुसते ही हुक्म देना शुरू कर दें.’’

प्रकाश ने उन्हें चुप कराया, ‘‘मां, बस भी करो. देख नहीं रही हैं मासूमी की हालत.’’

सुरेशजी मासूमी की हालत देख खामोश और शर्मिंदा थे तो मांबेटों की तकरार चालू थी. सब एकदूसरे को दोष दे रहे थे. पिता का कहना था कि अगर बच्चों पर लगाम न कसो तो वे बेकाबू हो जाएंगे. बच्चों का कहना था, ‘‘पापा हमें हर बात पर बस डांटते हैं. घर से बाहर रहो तो घर में रहने का आदेश, घर पर रहो तो टोकाटाकी. गाने सुनें तो हमें भांड बनाने लगते हैं. दोस्तों के साथ खेलें तो उसे आवारागर्दी कहते हैं. हम तो यहां बस मां के कारण चुप हैं वरना…’’

सरला बेटों को चुप करा रही थीं, ‘‘चुप रहो, जवान हो गए हो तो इस का मतलब यह नहीं कि पिता के सामने जबान खोलो.’’

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सब मिल कर मासूमी को एहसास दिलाना चाह रहे थे कि कोई किसी का दुश्मन नहीं. हां, झगड़े तो होते ही रहते हैं. देखो, तुम्हें तकलीफ हुई तो सब तुम्हारी चिंता में बैठे हैं.

मां ने मासूमी के बाल सहलाए, ‘‘सब लड़झगड़ कर एक हो जाते हैं पर तुम बेकार में उसे दिल में पाल लेती हो…’’

मासूमी बिखर गई, ‘‘मां, आप को अच्छा लगे या बुरा पर सच यह है कि गलती आप की भी है. आप को यही लगता है कि पिताजी ने कभी आप की कद्र नहीं की लेकिन मैं जानती हूं कि पापा के मन में आप के लिए क्या है. आप घर नहीं होतीं तो आप को पूछते हैं. आप की बहुत सी बातों की सराहना निगाहों से करते हैं पर कहना नहीं आता उन्हें. लेकिन उन की तकलीफदेह बातों के कारण आप का ध्यान उन की इन बातों पर नहीं जाता. इसी कारण पापा पर गुस्सा आने पर आप बच्चों के सामने पापा की कमजोरियां गिनवाती हैं और फिर बच्चे उन को आप की पीठ पीछे बुराभला कहते हैं,’’ मासूमी बोल रही थी और सरला चोर सी बनी सब बातें सुन रही थीं.

सुरेशजी भी मासूमी की हालत से घबराए थे. हमेशा ही गुस्सा ठंडा होने पर वह एकदम बदल जाते. उन्हें बीवीबच्चों पर प्यार उमड़ आता था. आज भी यही हुआ. वे उठे और टूटा शोपीस, सीडी प्लेयर उठा कर गाड़ी में रखने लगे. टूटी सीडी के नाम, नंबर नोट करने लगे. मासूमी खामोशी से लेटी देख रही थी कि अब पापा बाजार जा कर सब नया सामान लाएंगे. आइसक्रीम, मिठाई से फ्रिज भर जाएगा. मां के लिए नई साड़ी, भाइयों को पाकेटमनी मिलेगी. प्यार से समझाएंगे कि बेटा, अभी तुम लोगों का ध्यान पढ़ने में लगना चाहिए. मैं तो चाहता हूं कि तुम लोग खाओपियो, हंसोबोलो.

पिताजी खुश होंगे तो सब के साथ बैठे दुनियाजहान की बातें करेंगे. मां भी चहकती फिरेंगी. बस, 2 दिन बाद ही जरा सी कोई बात होगी तो फिर हंगामा शुरू हो जाएगा. मासूमी का तो कालेज जाना भी बंद हो चुका था. यों वहां जाने पर भी हमेशा की तरह मन धड़कता था कि कहीं फिर दोनों भाइयों में, मांबाप में झगड़ा न हो गया हो. कहीं मौसी और बूआ अपनेअपने पतियों से झगड़ कर न आ बैठी हों. बस, यही हालात थे जिन के कारण मासूमी को पुरुषों से नफरत हो गई थी, जिस में उस के पिता, भाई, फूफा, मौसा सभी शामिल थे. सारे पुरुष उसे जल्लाद लगते थे, जो सिर्फ स्त्रियों पर अपना हक जता कर उन्हें नीचा दिखाना चाहते थे. इस से बचने के लिए वह इतना ही कर सकती थी कि मर्दों के साए से दूर रहे.

आज उस के भाई अच्छाखासा कमा कर परिवार वाले हो गए थे. एक मासूमी ही थी जिस के लिए सबकुछ बेकार हो चला था. अब यह रिश्ता फिर से हाथ आया था और मासूमी ने फिर से इनकार कर दिया था. इस बार सुरेशजी को गुस्सा तो बहुत आया फिर भी खुद पर काबू पा कर वे मासूमी को समझा रहे थे, ‘‘यह क्या नादानी है. तुम्हारी इतनी उम्र होने पर भी यह रिश्ता आया है. अब कहीं न कहीं तो समझौता करना ही पड़ेगा. खुशियां दरवाजे पर खड़ी हैं फिर तुम्हें क्या परेशानी है? या तो तुम्हें मुझे यह बात स्पष्ट समझानी होगी वरना मैं अपने हिसाब से जो करना है कर दूंगा.’’

कुछ समय मासूमी सिर झुकाए खड़ी रही फिर हिम्मत कर के बोली, ‘‘आप मुझ से जवाब मांग रहे हैं तो सुनिए पापा, मैं हार गई हूं खुद से लड़तेलड़ते. बहुत सोचने के बाद मुझे विश्वास हो गया है कि मैं मां जैसी हिम्मत व सब्र नहीं रखती. मैं नहीं चाहती कि मेरे पिता द्वारा जो व्यवहार मेरी मां से किया गया वही व्यवहार कोई और व्यक्ति मेरे साथ करे.

‘‘औरत होने के नाते मैं उस औरत के दुख को महसूस कर सकती हूं जो मेरी मां है. हो सकता है कि विवाह के बाद मैं भी व्यावहारिकता में जा कर सबकुछ सह लूं पर मैं इतिहास दोहराना नहीं चाहती. आप के, मां व परिवार के बीच होने वाले झगड़ों ने मेरे अस्तित्व को ही जैसे खोखला व कमजोर बना दिया है. मुझे नहीं लगता कि मैं अब किसी परिवार का हिस्सा बनने लायक हूं. एक अनजाना सा डर मुझे हर खुशी से दूर ही रखेगा. इसलिए आप मुझे माफ कर दें और रिश्ते के लिए मना कर दें.’’

इतना कह कर वह दोनों हाथों से मुंह छिपा कर फूटफूट कर रो दी और कमरे में भाग गई.

मासूमी की बात सुन कर सुरेशजी सन्न रह गए. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि आएदिन घर में होने वाले झगड़े उन की बेटी की जिंदगी में ऐसा गहरा निशान छोड़ जाएंगे कि उस की जिंदगी की खुशियां ही छिन जाएंगी. जिंदगी के कटघरे में आज वे अपराधी बन सिर झुकाए खड़े थे.

: स्मिता जैन

पन्नूराम का पश्चात्ताप

सांप के आकार वाली पहाड़ी सड़क ढलान में घूमतेघूमते रूपीन और सुपीन नदियों के संगम पर बने पुल को पार करते हुए एक मोड़ पर पहुंचती है. वहां सदानंद की चाय की दुकान है, जहां आतेजाते पथिक बैठ कर चाय पीते हुए दो पल का विश्राम ले लेते हैं. दुकान पर आने वाले ग्राहकों के लिए पन्नूराम दिनभर बैंच पर बैठा रहता. उस के बाएं हाथ की कलाई से हथेली और पांचों उंगलियां गायब थीं. चाय पीते राहगीर पन्नूराम से उस के बाएं हाथ के बारे में पूछते तो वह अपने पर घटी दुर्घटना की आपबीती सुनाता.

दोनों नदियों के संगम से निकला हुआ सोता चट्टानों के बीच तंग हो कर नीचे की तरफ बहता है. उसी के बाएं किनारे पर खड़े सेमल के पेड़ की ओर इशारा करते हुए पन्नूराम बोलता : ‘‘उस सेमल के नीचे बैठ कर मैं कंटिया से दिनभर मछली पकड़ता था. तरहतरह की मछलियां, महाशीर, टैंगन, शोल, काली ट्राउट आदि सोते के पानी की विपरीत दिशा में आती थीं. दिनभर कंटिया में मछलियों का चारा लगा कर बैठा रहता और मछलियों का अच्छाखासा शिकार कर लेता था. परिवार वाले बहुत प्रसन्न थे. रूपीन व सुपीन नदियों की मछलियों का स्वाद ही कुछ अलग था.’’

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एक हाथ से पकड़ी चाय की प्याली से घूंट भरते हुए पन्नूराम अपनी कहानी जारी रखता : ‘‘तब गांव में आबादी काफी कम थी. आहिस्ताआहिस्ता सभी को रूपीन व सुपीन नदियों की मछलियों के अनोखे स्वाद के बारे में पता लग चुका था. चूंकि वर्षाकाल आते ही मछलियों के पेट अंडे से भर जाते थे और वर्षा ऋतु की समाप्ति तक मछलियां पानी के अंदर उगे घास, पत्ते व पत्थरों के बीच अंडे देती थीं, इसलिए उन दिनों गांव के लोग मछलियों के वंश की रक्षा के लिए उन्हें खाना बंद रखते थे. मैं भी मछली का शिकार बंद कर देता था.’’ गले की खराश को बाहर थूकते हुए पन्नूराम अपनी कहानी जारी रखता…

‘‘5 साल पहले मल्ला गांव के ऊपरी ढलान पर, जहां रूपीन नदी का स्रोत ढलान से बहते हुए झरने के रूप में गिरता है, वहां पनबिजली संयंत्र लगाने के लिए सरकारी योजना बनी. पहाडि़यों के ऊपर कृत्रिम जलाशय बनाने के लिए चीड़ के जंगल की कटाई शुरू हो गई तो इलाके में लकड़ी के ठेकेदार, लकडि़यों की ढुलाई के लिए ट्रक चालकों और लकड़ी काटने व चीरने में लगे मजदूरों की चहलपहल बढ़ती गई. बाहरी लोगों को भी स्थानीय लोगों से रूपीन व सुपीन नदियों की मछलियों के अनोखे स्वाद के बारे में जानकारी मिली.

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‘‘अब आएदिन पकड़ी हुई मछलियों का सौदा करने के लिए लोग मेरे पास आने लगे. अपनी जरूरत से अधिक पकड़ी हुई मछलियों को मैं ने बेचना शुरू कर दिया. कुछ पैसे मिले तो घर की आमदनी बढ़ने लगी. इस तरह हर रोज मछलियों की मांग बढ़ती गई. कंटिया से पकड़ी मछलियों से मांग पूरी नहीं हो पाती थी. अच्छीखासी कमाई होने की संभावना को देखते हुए मैं अधिक मछली पकड़ने के उपाय की तलाश में था.’’

इसी बीच रामानंद ने कहानी सुनने वाले ग्राहकों के आदेश पर उन्हें और पन्नूराम को गरम चाय की एकएक प्याली और थमाई. गरम चाय की चुस्की लगाते हुए पन्नूराम ने अपनी कहानी जारी रखी… ‘‘एक दिन लकड़ी के ट्रकों में आतेजाते एक ठेकेदार ने कंटिया के बजाय जाल का इस्तेमाल करने की सलाह दी. यही नहीं उस ठेकेदार ने मछली पकड़ने का जाल भी शहर से ला दिया. जाल देते समय उस की शर्त यह थी कि मैं रोजाना उस को मुफ्त की मछली खिलाता रहूं. ‘‘जहां पर चट्टानों के बीच संकरा रास्ता था वहां मैं ने संगम से निकले सोते में खूंटों के सहारे जाल को इस प्रकार से डाला जिस से पानी से कूदती हुई मछलियां जाल में फंस जाएं. यह तरीका अपनाने के बाद पहले से दोगुनी मछलियां पकड़ में आने लगीं. परिवार की कमाई भी बढ़ गई.’’

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चाय के प्याले से अंतिम घूंट लेते हुए पन्नूराम ने फिर से कहना शुरू किया : ‘‘जाल से मछली पकड़ना आसान हो गया. परिवार का कोई भी सदस्य बीचबीच में जा कर फंसी हुई मछलियों को पकड़ लाता. रोजगार बढ़ाने की इच्छा से पहाडि़यों के ऊपर डायनामाइट से पत्थरों को तोड़ कर मैं रूपीन नदी में कृत्रिम जलाशय बनाने के काम में लग गया. धीरेधीरे विद्युत परियोजना के कार्यों के लिए मल्लागांव में लोगों की भीड़ जमा होती गई और इसी के साथ रूपीन व सुपीन की स्वादिष्ठ मछलियों की मांग बढ़ती गई. मछलियों की मांग इतनी बढ़ी कि उसे जाल से पूरा करना संभव नहीं था. ‘‘मैं और अधिक मछली पकड़ने के तरीके की तलाश में था. इसी बीच जल विद्युत परियोजना के लिए बड़ेबड़े ट्रकों और संयंत्रों के आवागमन, पहाड़ी सड़क की चौड़ाई बढ़ाने और डामरीकरण में लगे पूरब से आए मजदूरों में से रामदीन के साथ मेरी दोस्ती हो गई.

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बातोंबातों में एक दिन मैं ने रामदीन को अपनी समस्या बताई. सब सुन कर वह बोला, ‘यार, यह तो काफी आसान कार्य है. जाल से नहीं… डायनामाइट से मछली मारो. देखना, मछली का शिकार कई गुना अधिक हो जाएगा.’ ‘‘रामदीन की बात सुनते ही मेरे पूरे शरीर में सिहरन सी होने लगी. मैं डायनामाइट से पत्थर तोड़ने के काम में लगा ही था. अत: एकआध डायनामाइट चुरा कर मछली मारना मुझे खासा आसान लगा था. फिर एक दिन शाम को काम से छुट्टी के बाद मैं रामदीन के साथ चुराए हुए डायनामाइट को ले कर मछली के शिकार के लिए चल पड़ा.

‘‘एक समतल जगह पर चट्टानों के बीच नदी का पानी फैल कर तालाब सा बन गया था. वहां किनारे पर खड़े हम मछलियों के झुंड की प्रतीक्षा कर रहे थे. तालाब का पानी इतना स्वच्छ था कि तलहटी तक सबकुछ साफ दिखाई दे रहा था. जैसे ही मछलियों का एक झुंड बहते पानी से स्रोत के विपरीत दिशा में तैरता हुआ दिखाई दिया रामदीन ने डायनामाइट में लगी हुई सुतली में आग लगाई और झुंड के नजदीक आने का इंतजार करने लगा. मुझे तो डर लग रहा था कि डायनामाइट कहीं हाथ में ही न फट जाए लेकिन रामदीन ने ठीक समय पर जलते हुए डायनामाइट को पानी में फेंका और देखते ही देखते एक विकट सी आवाज के साथ ऊपर की ओर पानी को उछालते हुए डायनामाइट फटा.

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‘‘धमाका इतना तेज था कि चट्टानों के पत्थरों के बीच से कंपन का अनुभव होने लगा. तालाब में छोटी, बड़ी और मझोली सभी तरह की मछलियां, यहां तक कि पानी की तलहटी में रहने वाले केकड़े, घोंघा आदि भी पानी की सतह पर तड़पते नजर आने लगे. तालाब में तड़पती मछलियों का ढेर देख कर मैं खुशी से भर उठा. रामदीन की सहायता से तड़पती हुई मछलियों को पकड़ लिया. उस दिन मछलियों से आमदनी पहले की अपेक्षा दस गुना अधिक हो गई.’’

एक लंबी सांस लेने के बाद पन्नूराम ने कहना शुरू किया : ‘‘रामदीन भी अच्छा मछुआरा था. उस को मछलियों की काफी जानकारी थी. मछली मारने के लिए नईनई जगह की तलाश करना तथा मछलियों के आवागमन के प्रति नजर रखने का काम रामदीन ही करता था. मैं डायनामाइट ले कर रामदीन के इशारे का इंतजार करता था और इशारा मिलते ही सुलगते हुए डायनामाइट को ऐसा फेंकता कि पानी की सतह स्पर्श करते ही फट जाए. बहुत खतरनाक कार्य था, लेकिन अधिक पैसा कमाने के इरादे से खतरे को नजरअंदाज कर दिया.

‘‘उन दिनों जब मछलियां गर्भधारण से ले कर प्रजनन का कार्य करती हैं, उन का शिकार बंद नहीं किया. इस से मछलियों के छोटेछोटे बच्चे समाप्त होते गए. एक बार काफी बड़ी महाशीर मछली डायनामाइट से घायल हो कर पकड़ी गई. मैं ने जब उसे उठाया तो उस का पेट अंडों से भरा था. मुझे लगा कि मछली मुझे बताने की कोशिश कर रही थी, ‘मेरे साथसाथ हजारों बच्चों का भी तुम लोग विनाश कर रहे हो. हम तो उजड़ ही जाएंगे, तुम्हारा भविष्य भी खतरे में है.’ तब मैं मन ही मन सोच रहा था कि महाशीर के स्वादिष्ठ अंडों से भी अच्छीखासी कमाई हो जाएगी.’’

दुकान पर बैठे ग्राहकों की ओर तिरछी नजरों से देखते हुए पन्नूराम ने महसूस किया कि वे मछलियों के कत्लेआम से कातर हो रहे थे. अपने द्वारा मछलियों पर किए गए अत्याचार को सही साबित करते हुए पन्नूराम कहता, ‘‘क्या करें, हमें भी तो पेट पालना था. गांव में रोजीरोजगार का दूसरा कोई भी जरिया नहीं था जिस से हम मछलियों के ऊपर रहम करते हुए जीविका का कोई और साधन अपना लें. मछली मारने से हुई मेरी आर्थिक तरक्की को देख कर अन्य गांव वालों ने भी डायनामाइट के जरिए मछली मारना शुरू कर दिया. देखते ही देखते रूपीन व सुपीन नदियां रणक्षेत्र बन गईं. मछलियां कम होती गईं. अंत में तो ऐसा हुआ कि स्रोतों में कीड़े तक नहीं दिखाई देते थे.

मछली से आमदनी कम होती गई तो मैं चिंतित हो उठा. अब घर चलाने का जरिया क्या होगा? मछलियों के झुंड ढूंढ़ने के लिए नदी के किनारेकिनारे मुझे मीलों तक जाना पड़ता था. कमाई कम होते ही रामदीन अपने गांव वापस चला गया. ‘‘सावन के महीने में एक दिन बारिश की धारा अनवरत बह रही थी. दिनभर की खोज के बाद शाम के समय काफी दूर से मछलियों का एक झुंड आता दिखाई दिया. अपनी उत्तेजना को वश में रखने के लिए मैं दाएं हाथ में जलती बीड़ी से कश मारते हुए बाएं हाथ में सुलगता डायनामाइट पकड़े मौके का इंतजार करता रहा. महीनों बाद पानी के स्रोत में तैरती मछलियों का झुंड देख कर मैं इतना खुश हुआ था कि मानो खुली आंख से कोई सपना देख रहा हूं. हिसाब लगा रहा था कि इतने बड़े झुंड से कितनी कमाई होगी. परिवार की आवश्यकताएं तो पूरी हो जाएंगी साथ ही कुछ पैसा भविष्य के लिए भी बच जाएगा. थोड़ी देर में जब देखा तो मछली का झुंड आ चुका है. मैं ने त्वरित गति से अपनी कार्यवाही की… लेकिन डायनामाइट का धमाका नहीं निकला.

परेशान हो कर अपनी बंद आंखें खोल कर जब देखा तब तक डायनामाइट मेरे बाएं हाथ को धम से उड़ा कर ले जा चुका था. सपने में लीन मैं अपने दाहिने हाथ की सुलगती हुई बीड़ी को फेंक कर समझ रहा था कि मैं ने डायनामाइट फेंक दिया.’’ अपनी पूरी कहानी सुनाने के बाद स्वाभाविक होने पर पन्नूराम दोहराता, ‘‘मछलियों की आंसू भरी कातर आखें मुझे सताती रहती हैं. मैं अपने सीने में एक असहनीय पीड़ा अनुभव करते हुए आज भी मूर्छित हो जाता हूं. अपराधबोध से अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए रोजाना मैं सहृदय पथिक को आपबीती कहानी सुना कर पश्चात्ताप करता रहता हूं…

कम से कम सुनने वाला पथिक ऐसे कुकृत्य से बचा रहे.’’ सदानंद को पन्नूराम की कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उस के फायदे की बात यह थी कि सुनने वाले राहगीर कहानी सुनतेसुनते एक के बजाय कई प्याली चाय पी जाया करते थे…पन्नूराम की कहानी से सदानंद की आमदनी में बढ़ोतरी होती रही और…सदानंद ने पन्नूराम की दिनभर की चाय मुफ्त कर दी.

आशियाना

‘‘मालकिन, आप के पैरों में अधिक दर्द हो तो तेल लगा कर मालिश कर दूं?’’

‘‘हूं,’’ बस, इतना ही निकला नंदिता के मुंह से.

‘‘तेल गरम कर के लाती हूं,’’ कह कर राधा चली गई. राधा को जाते देख कर नंदिता सोचने लगी कि आज के इस मशीनी युग में प्यार खत्म हो गया है. भावनाओं, संवेदनाओं का मोल नहीं रहा. ऐसे में प्रेम की वर्षा से नहलाने वाला एक भी प्राणी मिल जाए तो अच्छा लगता है. नंदिता के अधर मौन थे पर मन में शब्दों की आंधी सी चल रही थी. मन अतीत की यादों में मुखर हो उठा था. कभी इस घर में बहुत रौनक रहती थी. बहुत ध्यान रखने वाले पति मोहन शास्त्री और दोनों बेटों, आशीष और अनुराग के साथ नंदिता को समय का पता ही नहीं चलता था.

मोहन शास्त्री संस्कृत के अध्यापक थे. वे खुद भी इतिहास की अध्यापिका रही थीं. दोनों स्कूल से अलगअलग समय पर घर आते, पर जो भी पहले आता, घर और बच्चों की जिम्मेदारियां संभाल लेता था.

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अचानक एक दिन दिल का दौरा पड़ा और मोहन शास्त्री का निधन हो गया. यह एक ऐसा गहरा वज्रपात था जिस ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था. एक पल को ऐसा लगा था जैसे शरीर बेजान हो गया और वे बस, एक लाश बन कर रह गई थीं. सालों से रातदिन का प्यारा साथ सहसा सामने से गायब हो अनंत में विलीन हो जाए, तो हृदयविदारक अनुभूति ही होती है.

समय की गति कितनी तीव्र होती है इस का एहसास इनसान को तब होता है जब वह किसी के न रहने से उत्पन्न हुए शून्य को अनुभूत कर ठगा सा खड़ा रह जाता है. बच्चों का मुंह देख कर किसी तरह हिम्मत रखी और फिर अकेले जीना शुरू किया.

दोनों बेटे बड़े हुए, पढ़लिख कर विदेश चले गए और पीछे छोड़ गए एक बेजान बुत. जब दोनों छोटे थे तब उन्हें मां की आवश्यकता थी तब वे उन पर निस्वार्थ स्नेह और ममता लुटाती रहीं और जब उम्र के छठे दशक में उन्हें बेटों की आवश्यकता थी तो वे इतने स्वार्थी हो गए कि उन के बुढ़ापे को बोझ समझ कर अकेले ही उसे ढोने के लिए छोड़ गए. अपनी मां को अकेले, बेसहारा छोड़ देने में उन्हें जरा भी हिचकिचाहट नहीं हुई, सोचतेसोचते उन की आंखें नम हो जातीं.

संतान का मोह भी कैसा मोह है जिस के सामने संसार के सभी मोह बेबस हो कर हथियार डाल देते हैं पर यही संतान कैसे इतनी निर्मोही हो जाती है कि अपने मातापिता का मोह भी उसे बंधन जान पड़ता है और वह इस स्नेह और ममता के बंधन से मुक्त हो जाना चाहती है. भर्राई आवाज में जब उन्होंने पूछा था, ‘मैं अकेली कैसे रहूंगी?’ तो दोनों बेटे एक सुर में बोले थे, ‘अरे, राधा है न आप के पास. और कौन सा हम हमेशा के लिए जा रहे हैं. समय मिलते ही चक्कर लगा लेंगे, मां.’

नंदिता फिर कुछ नहीं बोली थीं. भागदौड़ भरे उन के जीवन में भावनाओें की शायद कोई जगह नहीं थी.

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दोनों चले गए थे. वे एक तरफ बेजान बुत बन कर पड़ी रहतीं. उन्हें कुछ नहीं चाहिए था सिवा दो प्यार भरे शब्द और बच्चों के साथ कुछ पलों के. रात को सोने जातीं तो उन की आंखें झरझर बहने लगतीं. सोचतीं, कभी मोहनजी का साथ, बेटों की शरारतों से उन का आंगन महका करता था और अब यह सन्नाटा, कहां विलुप्त हो गए वे क्षण.

अकेलेपन की पीड़ा का जहर पीते हुए, बेटों की उपेक्षा का दंश झेलते हुए समय तेज गति से चलता हुआ उन्हें यथार्थ की पथरीली भूमि पर फेंक गया.

दोनों बेटे पैसे भेजते रहते थे. उन्हें अपनी पैंशन भी मिलती रहती थी. उन का गुजारा अच्छी तरह से हो जाता था. उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें रुपएपैसे से कोई मोह नहीं था. वे तो बस, अकेलेपन से व्यथित रहतीं. कभीकभी आसपड़ोस की महिलाओं से तो कभी अपनी साथी अध्यापिकाओं से मिल लेती थीं, लेकिन उस के बाद फिर खालीपन. पूरे घर में वे और उन की विधवा बाई राधा थी. न कोई बच्चा न कोई सहारा देने वाला रिश्तेदार. राधा को भी उन की एक सहेली ने कुछ साल पहले भेजा था. उन्हें भी घर के कामधंधे के लिए कोई चाहिए था, सो अब राधा घर के सदस्य की तरह नंदिता को प्रिय थी.

जीवन किसी सरल रेखा सा नहीं चल सकता, वह अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ ले लेता है.

‘‘मालकिन, मैं तेल के साथ चाय भी ले आई हूं. मैं तेल लगाती हूं, आप चाय पीती रहना,’’ राधा की आवाज से उन की तंद्रा टूटी. इतने में ही पड़ोस की मधु आ गई. वह अकसर चक्कर काट लेती थी. अपने बच्चों को स्कूल भेजने के बाद कभीकभी उन के पास खड़ी हो दोचार बातें करती फिर चली जाती. नंदिताजी को उस पर बड़ा स्नेह हो चला था. उन्होंने यह भी महसूस किया कि मधु कुछ गंभीर है, बोलीं, ‘‘आओ मधु, क्या हुआ, चेहरा क्यों उतरा हुआ है.’’

‘‘आंटी, मेरी मम्मी की तबीयत खराब है और मुझे आज ही गांव जाना है. अनिल और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे हैं लेकिन मेरी ननद पिंकी की परीक्षाएं हैं, उसे अकेले घर में नहीं छोड़ सकती. अगर आप को परेशानी न हो तो कुछ दिन पिंकी को आप के पास छोड़ जाऊं.’’

‘‘अरे, यह भी कोई पूछने वाली बात है. आराम से जाओ, पिंकी की बिलकुल भी चिंता मत करो.’’

मधु चली गई और पिंकी अपना सामान ले कर नंदिता के पास आ गई. पिंकी के आते ही घर का सन्नाटा दूर हो गया और नंदिता का मन चहक उठा. पिंकी की परीक्षाएं थीं, उस के खानेपीने का ध्यान रखते हुए नंदिता को अपने बेटों की पढ़ाई का जमाना याद आ जाता फिर वे सिर झटक कर अपनेआप को पिंकी के खानेपीने के प्रबंध में व्यस्त कर लेतीं. एक पिंकी के आने से उन की और राधा की दिनचर्या में बहुत बदलाव आ गया था. पिंकी फुर्सत मिलते ही नंदिता के पास बैठ कर अपने कालेज की, अपनी सहेलियों की बातें करती.

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एक हफ्ते बाद मधु लौट आई तो पिंकी अपने घर चली गई. घर में अब फिर पहले सा सन्नाटा हो गया. इस सन्नाटे को राधा की आवाजें ही तोड़ती थीं. अन्यथा वे चुपचाप रोज के जरूरी काम निबटा कर अपने कमरे में पड़ी रहती थीं. टीवी देखने का उन्हें ज्यादा शौक नहीं था. वैसे भी जब मन दुखी हो तो टीवी भी कहां अच्छा लगता है.

मधु ने पिंकी का ध्यान रखने के लिए नंदिता आंटी को कई बार धन्यवाद दिया तो उन्होंने कहा, ‘‘मधु, धन्यवाद तो मुझे भी कहना चाहिए. एक हफ्ता पिंकी के कारण मन लगा रहा.’’

नंदिता से बात करने के बाद मधु थोड़ी देर सोचती रही, फिर बोली, ‘‘आंटी, आजकल कितनी ही लड़कियां पढ़ने और नौकरी करने को बाहर निकलती हैं. आप क्यों नहीं ऐसी लड़कियों को पेइंगगेस्ट रख लेतीं. आप का समय भी कट जाएगा और आर्थिक रूप से भी ठीक रहेगा.’’

‘‘नहीं मधु, मुझे पैसे की जरूरत नहीं है, मेरा काम अच्छी तरह से चल जाता है.’’

‘‘ठीक है आंटी, लेकिन आप का मन अच्छा रहेगा तो आप शारीरिक रूप से भी स्वयं को स्वस्थ महसूस करेंगी.’’

‘‘ठीक है, देखती हूं.’’

‘‘बस, आंटी, बाकी काम अब मुझ पर छोड़ दीजिए,’’ कह कर मधु चली गई.

4 दिन बाद ही मधु एक बोर्ड बनवा कर लाई जिस पर लिखा था, ‘आशियाना.’ और नंदिता को दिखा कर बोली, ‘‘देखिए आंटी, आप का खालीपन मैं कैसे दूर करती हूं. अब आप के आसपास इतनी चहलपहल रहेगी कि आप ही शांति का एक कोना ढूंढें़गी.’’

नंदिता मुसकरा दीं, अंदर गईं, वापस आ कर मधु को कुछ रुपए दिए तो उस ने नाराजगी से कहा, ‘‘आंटी, आप के लिए मेरी भावनाओं का यही महत्त्व है?’’

‘‘अरे, बेटा, बोर्ड वाले को तो देने हैं न? उसी के लिए हैं. तुम्हारी भावनाओं, प्रेम और आदर को मैं किसी मूल्य से नहीं आंक सकती. इस वृद्धा के जीवन के सूनेपन को भरने के लिए तुम्हारे इस सराहनीय कदम का कोई मोल नहीं है.’’

‘‘आंटी, आप ऊपर के कमरे साफ करवा लीजिए. अब मैं चलती हूं, बोर्ड वाले को एक बोर्ड पिंकी के कालेज के पास लगाने को कहा है और यह वाला बोर्ड बाहर लगवा दूंगी,’’ मधु यह कह कर चली गई.

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नंदिता ने पता नहीं कब से ऊपर जाना छोड़ा हुआ था. ऊपर बेटों के कमरों को बंद कर दिया था. आज वे ऊपर गईं, कमरे खोले तो पुरानी यादें ताजा हो आईं. राधा के साथ कमरों की सैटिंग ठीक की, साफसफाई करवाई और फिर नीचे आ गईं.

एक हफ्ते बाद पिंकी आई तो उस के साथ 2 लड़कियां और 1 महिला भी आई. पिंकी बोली, ‘‘आंटी, ये मेरे कालेज में नई आई हैं और इन के मम्मीपापा इन्हें होस्टल में रहने की इजाजत नहीं दे रहे हैं.’’

उस के बाद साथ आई महिला बोली, ‘‘आप के यहां मेरी बच्चियां रहेंगी तो हमें चिंता नहीं होगी. मधुजी ने बताया है कि आप के यहां दोनों सुरक्षित रहेंगी और अब तो देख कर बिलकुल चिंता नहीं रही. बस, आप कहें तो ये कल से ही आ जाएं?’’

नंदिता ने कहा, ‘‘हां, हां, क्यों नहीं?’’

‘‘तो ठीक है. ये अपना सामान ले कर कल आ जाएंगी,’’ यह कह कर वह चली गई.

अगले दिन ही नीता और ऋतु सामान ले कर आ गईं और राधा खुशीखुशी उन का सामान ऊपर के कमरों में सैट करवाने लगी.

नंदिताजी दोनों लड़कियों के खाने की पसंदनापसंद पूछ कर सोचने लगीं कि चलो, अब इन लड़कियों के बहाने खाना तो ढंग से बन जाया करेगा. शाम को अमेरिका से बड़े बेटे का फोन आया तो उन्होंने इस बारे में उसे बताया. वह कहने लगा, ‘‘मां, क्या जरूरत थी आप को इन चक्करों में पड़ने की, आप को आराम करना चाहिए.’’

‘‘यह आराम ही तो मुझे परेशान कर रहा था, इस में बुरा क्या है?’’ आशीष ने फोन रख दिया था. छोटे बेटे अनुराग को भी उन की यह योजना पसंद नहीं आई थी लेकिन नंदिता ने दोनोें की पसंद की चिंता नहीं की.

नीता और ऋतु शाम को आतीं तो नीचे ही नंदिता के साथ खाना खातीं, कुछ बातें करतीं फिर ऊपर चली जातीं. दोनों नंदिता से खूब घुलमिल गई थीं, उन के मातापिता के फोन आते रहते और नंदिताजी से भी उन की बात होती रहती. अब नंदिता को घर में, अपने जीवन में अच्छा परिवर्तन महसूस होता. वे अब खुश रहने लगी थीं.

15 दिन बाद ही एक और लड़की अवनि भी अपना बैग उठाए चली आई और सब बातें समझ कर नंदिता के हाथ में एडवांस रख दिया. नंदिता ने सब से पहले राधा की मदद के लिए एक और महिला चंपा को रख लिया. तीनों लड़कियां सुबह नाश्ता कर के जातीं फिर शाम को ही आतीं. सब के मातापिता को यह तसल्ली थी कि लड़कियों को साफसुथरा घर का खाना मिल रहा है.

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नंदिता की कोई बेटी तो थी नहीं, अब हर रोज लड़कियों और उन के क्रियाकलापों को देखते रहने का लोभ वे संवरण न कर पातीं. लड़कियों के शोर में उन्हें जीवन का संगीत सुनाई देता, नई उमंग और इस संगीत ने उन के जीवन में नई उमंग, नया जोश भर दिया था.

दुबलीपतली, बड़ीबड़ी आंखों वाली, सुतवां नाक और गौरवर्णा अवनि उन के मन में बस गई. नीता और ऋतु हंसती, खिलखिलाती रहतीं लेकिन अवनि बस, हलका सा मुसकरा कर रह जाती और हमेशा सोच में घिरी दिखती. अवनि की मां की मृत्यु हो चुकी थी. उस के पिता फोन पर नंदिता से संपर्क बनाए रखते. गांव में ही वे अवनि के छोटे भाईबहन के साथ रहते थे. बिना मां की बच्ची से नंदिता को विशेष स्नेह था.

इधर कुछ दिनों से नंदिता देख रही थीं कि अवनि कालेज भी देर से जा रही थी और असमय लौट कर चुपचाप ऊपर अपने कमरे में पड़ी रहती थी. उन लड़कियों के व्यक्तिगत जीवन में नंदिता हस्तक्षेप नहीं करना चाहती थीं लेकिन जब रहा नहीं गया तो नीता और ऋतु के जाने के बाद ऊपर गईं, देखा, अवनि आंखों पर हाथ रखे चुपचाप लेटी है. आहट पा कर उठ कर बैठ गई.

नंदिता ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, अवनि? तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘कुछ नहीं, आंटी, कालेज जाने का मन नहीं था.’’

‘‘चलो, अगर तबीयत ठीक नहीं है तो डाक्टर को दिखा देती हूं.’’

‘‘नहीं, आंटी, आप परेशान न हों, मैं ठीक हूं.’’

नंदिता उस के बैड पर बैठ गईं. उस के सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘मैं अकेली जिंदगी काट रही थी, तुम लोग आए तो मैं फिर से जी उठी. सिर्फ पैसे दे कर पेइंगगेस्ट बनने की बात नहीं है, तुम लोगों से मैं जुड़ सी गई हूं. मेरी तो कोई बेटी है नहीं, तुम्हें देखा तो बेटी की कमी पूरी हो गई. मुझे भी अपनी मां की तरह समझ लो, किसी बात पर अकेले परेशान होने की जरूरत नहीं है, मुझ से अपनी परेशानी शेयर कर सकती हो.’’

अवनि सुबक उठी, घुटनों पर सिर रख कर रो पड़ी. एक बार तो नंदिता चौंक पड़ी, कहीं यह लड़की कोई गलती तो नहीं कर बैठी, यह विचार आते ही नंदिता मन ही मन परेशान हो गईं, फिर बोलीं, ‘‘अवनि, मुझे बताओ तो सही.’’

‘‘आंटी, मुझ से गलती हो गई है, मैं प्रैग्नैंट हूं. मैं पापा को क्या मुंह दिखाऊंगी.’’

‘‘कौन है, कहां रहता है?’’ नंदिताजी ने पूछा.

‘‘इसी शहर में रहता है. कह रहा है कि उस की मम्मी कभी अपनी जाति से बाहर इस विवाह के लिए तैयार नहीं होंगी.’’

‘‘तुम मुझे उस का पता और फोन नंबर तो दो.’’

‘‘नहीं, आंटी. संजय ने कहा है कि वह अपनी मम्मी से बात नहीं कर सकता, अब कुछ नहीं हो सकता.’’

‘‘सारी सामाजिक संहिताओं को फलांग कर तुम ने अच्छा तो नहीं किया लेकिन अब तुम मुझे उस का पता दो और फ्रेश हो कर कालेज जाओ, देखती हूं क्या हो सकता है.’’

नंदिता ने अवनि को कालेज भेजा और अवनि को बिना बताए उस के पिता केशवदास को फौरन आने के लिए कहा.

मधु को भी बुला कर उस से विचारविमर्श किया. शाम तक केशवदास आ गए. नंदिता ने उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया. केशवदास यह सब सुन कर सकते में आ गए और शर्मिंदा हो गए. उन की झुकी हुई गरदन देख कर नंदिता ने उन की मानसिक दशा का अंदाजा लगा कर कहा, ‘‘क्यों न एक बार संजय के मातापिता से मिल लिया जाए, आप कहें तो मैं और मधु भी चल सकते हैं.’’

केशवदास को यह बात ठीक लगी और तय हुआ कि एक बार कोशिश की जा सकती है. उसी दिन नंदिता ने संजय की मम्मी से फोन कर के मिलने का समय मांगा. इतने में अवनि लौट आई और अपने पापा को देख कर चौंक गई. केशवदास का झुका हुआ चेहरा देख कर अवनि की आंखों से आंसू बह निकले.

रात को नंदिता और मधु केशवदास के साथ संजय के घर गए. नंदिता को देख कर संजय की मम्मी चौंक पड़ीं. नंदिता उस का चौंकना समझ नहीं सकीं. नीता, संजय की मम्मी, हाथ जोड़ कर बोलीं, ‘‘मैडम, आप ने मुझे नहीं पहचाना?’’

नंदिता ने कहा, ‘‘सौरी, वास्तव में मैं ने आप को नहीं पहचाना.’’

‘‘मैडम, मैं नीता भारद्वाज, मुझे आप ने ही पढ़ाया था, 12वीं में पूरा साल मेरी फीस आप ने ही भरी थी.’’

‘‘हां, याद आया. नीता इतने साल हो गए, तुम इसी शहर में हो, कभी मिलने नहीं आईं.’’

‘‘नहीं मैडम, अभी 1 साल पहले ही हम यहां आए हैं. कई बार सोचा लेकिन मिल नहीं पाई.’’

नीता के पिता की मृत्यु के बाद उस के घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी जिस का पता चलने पर नंदिता ही नीता की फीस भर दिया करती थीं. नीता और उस की मां उन की बहुत एहसानमंद थीं. लेकिन अब घर के रखरखाव से आर्थिक संपन्नता झलक रही थी. नीता ने कहा, ‘‘संजय मेरा इकलौता बेटा है और उस के पिता रवि इंजीनियर हैं जो अभी आफिस के काम से बाहर गए हुए हैं.’’

‘‘हां, मैं संजय के बारे में ही बात करने आई थी, क्या करता है आजकल?’’

‘‘अभी कुछ ही दिन पहले उसे नौकरी मिली है.’’

अब तक नीता का नौकर चाय ले कर आ चुका था. नंदिता ने सारी बात नीता को बता दी थी और कहा, ‘‘नीता, मैं आशा करती हूं जातिधर्म के विचारों को एक ओर रख कर तुम अवनि को अपना लोगी.’’

‘‘मैडम, अब आप चिंता न करें, आप का कहना क्या मैं कभी टाल सकती हूं?’’

सब के दिलों से बोझ हट गया. नीता ने कहा, ‘‘मैं रवि से बात कर लूंगी. मैं जानती हूं उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी. हां, मैं अवनि से कल आ कर जरूर मिलूंगी और जल्दी ही विवाह की तिथि निश्चित कर लूंगी. मैडम, अब आप बिलकुल चिंता न करना, आप जैसा चाहेंगी वैसा ही होगा.’’

सब चलने के लिए उठ खड़े हुए. केशवदास ने कहा, ‘‘आप लोगों का एहसान कभी नहीं भूलूंगा, आप विवाह की तिथि तय कर के बता दीजिए, विवाह की भी तैयारी करनी होगी.’’

नंदिताजी मुसकराईं और बोलीं, ‘‘आप को ही नहीं मुझे भी तैयारी करनी है, मैं ने उसे बेटी जो कहा है.’’

केशवदास लौट गए, नंदिता और मधु भी घर आ गए. नंदिता ने अवनि को यह समाचार दिया तो वह चहक उठी और उन के गले लग गई, ‘‘थैंक्यू, आंटी.’’

वे अब बहुत खुश थीं. उन्होंने जीवन की कठोर सचाई को अपनाकर पुरानी यादों को मन के एक कोने में दबा कर रख दिया था और नईनई प्यारी खिलखिलाती यादों के साथ जीना शुरू कर दिया था. वे अब यह जान चुकी थीं कि जिन्हें प्रेम का, ममता का मान रखना नहीं आता, उन पर स्नेह लुटा कर अपनी ममता का अपमान करवाना निरी बेवकूफी है. अब उन्हें अवनि के विवाह की भी तैयारियां करनी थीं. इस उत्साह में उन के जोड़ों के दर्द ने भी हार मान ली थी. आराम तो उन्हें अब मिला था उकताहट से, दर्द से, घर में पसरे सन्नाटे से.

अब उन का ‘आशियाना’ खिल- खिलाता रहेगा, हंसता रहेगा, बोलता रहेगा लड़कियों के साथ और उन के साथ. अब उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं, किसी के प्रति क्रोध नहीं. जीवन की छोटीछोटी खुशियों में ही बड़ी खुशी खोज लेना, यही तो जीवन है.

मैं नहीं जानती

पूर्व कथा

दिल्ली से दूर नदी के एकांत होटल में दिव्या 1 सप्ताह गुजार देती है तो वहां उसे देवयानी मिल जाती है. वह बताती है कि अब वह यहीं रह रही है, सो वह उस से जिद करती है कि होटल में नहीं उस के घर में रहे लेकिन दिव्या उसे टाल देती है. वह होटल आ कर अतीत में खो जाती है. पीएच.डी. कर दिव्या कालेज में जौब करती है. जब वह एम.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी, देवयानी का महेश के साथ विवाह हो गया था?. वह खुश थी. दिव्या की चाहत थी कि देवयानी की तरह उसे भी खुशमिजाज परिवार मिले. उसे मिला भी लेकिन वह सुख, शांति, प्यार, सम्मान नहीं. कामेश विवाह के 3 दिन बाद ही दिव्या को नौकरी न करने का अल्टीमेटम दे देता है.

कामेश समय पर घर आते नहीं, दिव्या प्रतीक्षा करतेकरते सो जाती. देर रात कामेश का स्पर्श उसे बिच्छू के डंक सा लगता. उस ने दिव्या की जरूरत को कभी समझा ही नहीं.

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एक दिन दिव्या को देवयानी का फोन आता है कि कामेश का अंबाला ट्रांसफर हो गया है, वे अंबाला ट्रेन से जा रहे हैं. इसलिए मिलने दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आ जाए. दिव्या और कामेश स्टेशन पहुंच कर मुलाकात करते हैं. दिव्या महेश और देवयानी से हंसहंस कर बातें करती है. कामेश दिव्या को ताना देता है कि ‘ऐसी खुश तो तुम कभी नहीं होतीं, जितनी महेश की बातें सुन कर हो रही हो.’ कामेश का यह ताना दिव्या को अच्छा नहीं लगा. अब आगे…

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

भैया-भाभी के विवाह की 25वीं सालगिरह थी. बहुत बार कहने पर कामेश जाने को तैयार हुए. उस खुशी भरे माहौल में भी मैं घुटीघुटी सी रही. मुखौटा लगाए चेहरे पर मुसकान लाने का प्रयत्न करती रही कि कोई मेरी मनोस्थिति को भांप न ले…डरतीडरती रही. सांची की परीक्षा थी सो देवयानी नहीं आई. महेश अकेला आया था. मैं उस से बचती रही. मैं जानती थी कामेश की नजरें मेरा पीछा कर रही होंगी. मैं ऐसी स्थिति से खासकर बचना चाहती थी जो उन्हें ताने मारने का अवसर दे.

खुश रहना और खुशियां बांटना बुरा है क्या? महेश यही तो करता है. फंक्शन पार्टी में भी वह अपने खुलेपन और खुशमिजाज के कारण छाया रहा. हरेक के साथ अपनेपन से मिलता रहा, बातें करता रहा, हंसता रहा, हंसाता रहा. वहीं कामेश चुपचाप अपने में ही सीमित बैठे रहे. मैं भी उन के साथसाथ ही रही.

मैं कामेश का साथ चाहती थी. ये 2 दिन वे पूरी तरह से मेरे साथ थे. फिर भी खुश नहीं थी तो कामेश के कारण, उन की चुप्पी के कारण. सब से अलगथलग रहने के कारण. मैं चाहती थी वे सब के साथ मिल कर बैठें, उन से बात करें. एक बार धीरे से कहा भी लेकिन उन के उत्तर ने चुप करा दिया था. कहने लगे, ‘तुम्हारे भैयाभाभी के विवाह की सालगिरह है, तुम खुशियां मनाओ. मैं ने मना तो नहीं किया.’

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यह कहना क्या कम था. फिर उन से मैं ने कुछ नहीं कहा.

आज पीछे मुड़ कर देखती हूं तो सोचती हूं, क्यों सहा मैं ने इतना कुछ. अब बंधन तोड़ कर चली आई हूं तो क्या इतने बरसों में कामेश की तानाशाही को नहीं तोड़ सकती थी. उन की हर गलत बात का जवाब क्यों नहीं दे पाई मैं. पढ़लिख कर भी रूढि़यों में बंधी रही, अपने अधिकारों से वंचित रही. बच्चों तक ने मुझे गंवार समझ लिया. मेरे त्याग, मेरी ममता को वे भी नहीं समझ पाए. उन के लिए, कामेश के लिए, एक जरूरत की वस्तु बन कर रह गई मैं.

मैं ने जीवन में क्या पाया? शून्यता, रीतापन, तृष्णा से भरा मन. सामने सागर बहता रहा और मैं प्यासी की प्यासी ही रही. उस का खारापन मुझे सालता रहा. शांत बहती नदी अच्छी लगती है लेकिन पानी की अधिकता से उफनती वही नदी किनारों को तोड़ विनाश का रूप धारण कर लेती है. सबकुछ बहा कर ले जाती है. मेरा मन भी जब तक शांत था, शांत था. भीतर ही भीतर सुप्त ज्वालामुखी पनपता रहा जिस ने एक न एक दिन मन की सीमाओं को तोड़ना ही था. उस ने एक दिन फटना था और वह फट गया. पानी किनारों को लांघ कर दूरदूर तक बहने लगा था.

निक्की की शादी के बाद मेरे जीवन में और सूनापन आ गया. अपनी खुशियां उस के चेहरे पर देखती थी. जो मैं नहीं पा सकी, चाहती थी वह पा ले. वह तो अपना जीवन पूरी तरह जी ले. उस की हर इच्छा को पूरा करती रही.

जिस दिन मुझे पता चला कि निक्की और विनीत एकदूसरे को चाहते हैं, मैं ने उन्हें एक करने की ठान ली थी. विनीत को घर पर बुला कर उस से बात की. उस के मातापिता के बारे में जानकारी ली. उसे समझाया कि यदि वह निक्की से सच में प्यार करता है तो उसे अपने मातापिता से बात करनी होगी. वह निक्की का रिश्ता मांगने हमारे घर आएंगे ताकि कामेश को पता न चले कि यह लवमैरिज है.

विनीत इस के लिए मान गया और फिर यह सब इस तरह से हो गया कि किसी को पता ही नहीं चला.

निक्की अपने घर में खुश थी. मैं भी उस की खुशी में अपनी खुशियां ढूंढ़ रही थी. देवयानी की बात हमेशा याद आती रही, ‘दीदी, हर पल में खुशी ढूंढ़ो…जो मिल जाए उस क्षण को जी भर कर जी लो. बड़ीबड़ी खुशियों की तलाश में छोटीछोटी खुशियां, जो हमारे चारों ओर बिखरती रहती हैं, हम उन्हें अनदेखा कर जाते हैं. वे हमारे हाथ से निकल जाती हैं और हम मुंह ताकते रह जाते हैं.’

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ऐसा ही तो हुआ था मेरे साथ. मैं ने बड़ी खुशी की तलाश में छोटीछोटी खुशियों के अवसर भी खो दिए. अवसाद में डूबी रही. अपनी प्रतिभा, रचनात्मकता सब भूल गई. मैं ने उन की ओर ध्यान ही नहीं दिया और जीवन की डोर मेरे हाथ से छूटती गई.

निक्की की शादी के बाद मैं नए सिरे से अपने जीवन को पहचानने की कोशिश करने लगी थी. मैं निक्की और विनीत का विवाह करवा सकती हूं. कामेश को इस की भनक नहीं लगने दी तो अपने जीवन की इस ढलान पर ही सही, मैं आत्मतुष्टि के लिए कुछ क्यों नहीं कर सकती, खुशियां क्यों नहीं तलाश सकती भला.

मैं प्रयास करने भी लगी. ढेर सारी पुस्तकें मंगवा ली थीं. घरगृहस्थी के कामों से समय निकाल कर पढ़ती रहती. कुछकुछ लिखने भी लगी थी. खालीपन को भरने का इस से अच्छा रास्ता कोई और नहीं था लेकिन कई बार न चाहते हुए भी एक के बाद एक मुसीबत आ खड़ी होती है. मेरे साथ भी वही हुआ. कामेश ने एक दिन मेरी डायरी देख ली और मुझ पर बिफर पड़े थे.

चिल्ला कर बोले थे, ‘तुम मेरे साथ इतनी दुखी हो जो अपनी पीड़ा को इन कागजों पर उतार कर मुझे जलील करना चाहती हो. चाहती क्या हो तुम? मैं ने तुम्हें क्या नहीं दिया. किस बात की कमी है तुम्हें, आखिर दुनिया को क्या बताना चाहती हो तुम.’

जीवन भर चुप्पी साधे रहे और सारा आक्रोश एक ही दिन में निकाल दिया. डायरी के पन्नों को फाड़ कर आग में झोंक दिया. मैं हतप्रभ उन्हें देखती रही. कुछ कह नहीं सकी, पर मेरी आत्मा अंदर से चीख रही थी. मेरा रोमरोम कराह रहा था.

पता नहीं मुझ में इतनी शक्ति कहां से आ गई थी. अगली सुबह अर्णव, गौरव के चले जाने के बाद मैं ने एक नोट लिख कर टेबल पर रखा. अटैची में कुछ कपड़े रखे और घर से बाहर आ गई.

मैं जानती हूं, जो कुछ मैं ने किया है वह इस समस्या का हल नहीं है. पलायन करने से समस्याएं नहीं सुलझतीं. पर मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था. भाग जाना चाहती थी, अपने ही घर से, दूर रहना चाहती थी. इसलिए सबकुछ छोड़ कर चली आई. 1 सप्ताह में ही मैं जैसे पूरा जी ली. बस, अब और बंधन नहीं. मुक्ति चाहिए मुझे.

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ठक…ठक…ठक…दरवाजे पर दस्तक हुई तो मेरी तंद्रा टूटी. मैं अतीत से वर्तमान में आ सोचने लगी, बैरा होगा. उसे रुकने के लिए कहा. दोबारा दस्तक हुई, तो जा कर दरवाजा खोला. सामने देवयानी खड़ी थी.

‘‘इतनी सुबहसुबह, कोई और काम नहीं था तुम्हें.’’

‘‘आप भी दीदी, आप से ज्यादा और कोई काम हो सकता है भला. आप को लेने आई हूं. चलिए, जल्दी से सामान बांधिए.’’

‘‘नहीं, देवयानी, मैं यहां ठीक हूं. मिलने आ जाऊंगी.’’

‘‘ऐसा नहीं हो सकता, दीदी, मेरे रहते आप यहां नहीं रहेंगी. यह मेरा अंतिम फैसला है.’’

मेरे कुछ कहने से पहले ही देवयानी मेरा सामान एक जगह जमा करने लगी.

मैं उसे कैसे समझाती कि तुम्हारे घर जाने से मेरी समस्याएं और बढ़ जाएंगी. चैकआउट कर के मैं उस के साथ चल दी.

उस के घर जा कर भी मैं अनमनी सी रही. खाना खा कर सो गई. दोपहर बाद उठी तो ड्राइंगरूम से जानीपहचानी आवाज आ रही थी. झांक कर देखा तो कामेश सामने बैठे थे. उलटे पांव कमरे में आ गई. हृदय की धड़कन बढ़ गई. पता नहीं कामेश, देवयानी और महेश के सामने कैसा व्यवहार करेंगे. मेरा दिल डूबने लगा लेकिन मैं संभल गई. जब इतना कदम उठा लिया है तो उस का सामना करने का साहस भी होना चाहिए. पर कामेश को पता कैसे चला कि मैं यहां हूं. हो सकता है देवयानी ने बता दिया हो. कल शाम मुझे अकेला देख कर वह हैरान तो हो गई थी. मुझे विश्वास हो गया कि उसी का काम है. मुझे उस पर गुस्सा आने लगा. मुझे यहां से चले जाना चाहिए. सामान मेरा बंधा हुआ था. मैं बाहर जाने का रास्ता देखने लगी. तभी सामने कामेश आ गए. मैं मुंह मोड़ कर खड़ी हो गई. उस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार थी, जो अभी आने वाली थी.

मैं ने महसूस किया. कामेश मेरे बिलकुल पीछे आ कर चुपचाप खड़े हो गए. मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहने लगे, ‘‘अपने घर चलो दिव्या. तुम्हारे बिना घर घर ही नहीं लगता. तुम्हारे चले आने पर मुझे पता चला कि मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूं. कहांकहां नहीं ढूंढ़ा तुम्हें. तुम्हें मुझ से कोई शिकायत थी तो कहा क्यों नहीं.’’

‘‘आप ने कभी मौका दिया मुझे. हमेशा ही मुझे चुप रहने को कहा. किस से शिकायत करती,’’ मैं ने पहली बार अपनी आवाज में गुस्सा लाते हुए कहा.

‘‘यह मेरी गलती थी. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं, दिव्या. मैं ने सदैव अपने बारे में ही सोचा. तुम्हारे बारे में सोचा ही नहीं. तुम पर एकाधिकार समझा. व्यस्तता का लबादा ओढ़े, तुम से दूरदूर ही रहा. अपने अनुसार तुम को ढालने का प्रयत्न करता रहा. तुम्हारा अपना जीवन है, कभी सोचा ही नहीं. तुम चली आईं तो यह सब जाना. मैं ने जो अन्याय किया है मैं उस के लिए माफी मांगता हूं.’’

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‘‘मैं कैसे विश्वास कर लूं कि आप जो कह रहे हैं वह सच है. सोच इतनी जल्दी तो नहीं बदल जाती.’’

‘‘तुम से दूर रह कर मेरी सोच बदल गई है दिव्या,’’ कहते हुए कामेश ने मेरा मुंह अपनी ओर फेर लिया. मैं ने उन की आंखों में तैरते हुए आंसू देखे. शायद वे आंसू पश्चात्ताप के थे. मैं धीरेधीरे पिघलने लगी थी.

कदम से कदम मिला कर चलने की चाह बलवती हो रही थी. ठगी जाऊंगी या कदम मिला कर चल सकूंगी, नहीं जानती. पर यह जो खुशी का क्षण आया है उसे नहीं जाने दूंगी.

राशनकार्ड की महिमा

रसोई गैस का सिलेंडर लेने के लिए राशनकार्ड जरूरी हो गया था. चूंकि जिंदा रहने के लिए भोजन अतिआवश्यक है, सो राजगोपालजी राशनकार्ड दफ्तर के चक्कर लगाने लगे. दफ्तर वालों ने आवेदन की औपचारिकता में उन्हें बुरी तरह उलझा दिया था. वे बिचौलियों के इर्दगिर्द घूमे, फिर भी काम न बना तो उन्होंने राशनकार्ड को ही अपने जीने का मकसद बना लिया और इसी धुन में लगे रहे.

‘‘साहब, सिलेंडर खाली हो गया है,’’ रसोईघर से रामकिशन के शब्द किसी फोन की घंटी की तरह मुझे चौंका गए.

हम ने एजेंसी को फोन खड़खड़ाया, ‘‘गैस सिलेंडर बुक करवाना है.’’

‘‘नंबर?’’ किसी मैडम की आवाज थी.

‘‘9242,’’ मैं ने भी ऐसे बोला जैसे फोन में नंबर पहले से ही फीड हो.

‘‘राजगोपालजी?’’

‘‘जी हां, देवीजी.’’

‘‘आप को अपना राशनकार्ड दिखाना होगा,’’ मधुर आवाज में मैडम बोलीं.

‘‘क…क्या?’’ हम हकलाए, ‘‘राशनकार्ड?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘किस खुशी में?’’

‘‘बस, हमारी खुशी है. इसी खुशी में.’’

हम घबरा गए. यह तो नहले पे दहला मार रही है, ‘‘लेकिन वह तो मैं ने कभी बनवाया ही नहीं?’’

अब की बारी उन की थी, ‘‘क्या कहा?’’

‘‘हां. कभी बनवाया ही नहीं तो लाने का सवाल ही नहीं उठता.’’

‘‘कमाल है,’’ मैडमजी बोलीं, ‘‘अच्छा, ऐसा कीजिए, अपनी सिलेंडर बुक ले कर हमारी एजेंसी के दफ्तर में आ जाइए. पता जानते हैं न कि एजेंसी कहां है? बहुचरजी के पास.’’

‘‘जी हां, उस जगह को आबाद कर चुका हूं.’’

हम जब सिलेंडर बुक ले कर वहां पहुंचे तो मैडमजी ने हमेें घूरा और बोलीं, ‘‘आप ही राजगोपालजी हैं.’’

हम ने हां में गरदन हिलाई तो एक मोटा रजिस्टर हमारे सामने कर दिया गया.

‘‘इस में आप अपनी सिलेंडर बुक का नंबर लिखिए फिर यह भी लिखिए कि अगली बार राशनकार्ड दिखाऊंगा और यहां हस्ताक्षर कर दीजिए. इस बार हम आप का सिलेंडर बुक कर देते हैं लेकिन अगली बार राशनकार्ड दिखाना पड़ेगा.’’

‘‘लेकिन क्यों? यह सिलेंडर बुक देखिए. 1988 से मैं आप से सिलेंडर लेता आ रहा हूं तो अब की यह राशनकार्ड की आफत कैसे आ गई?’’

‘‘सर, ऊपर से आदेश आया है कि बिना राशनकार्ड देखे किसी को सिलेंडर न दिया जाए.’’

‘‘लेकिन मेरी समझ से तो राशन- कार्ड केवल गरीबों की मदद के लिए होता है ताकि उन्हें सरकारी रियायत से सस्ते खाद्य पदार्थ जैसे चावल, गेहूं, तेल, चीनी आदि मिल जाएं. मैं इस श्रेणी में नहीं आता. यहां बड़ौदा में कभी राशनकार्ड का उल्लेख नहीं हुआ. पासपोर्ट है, बिजली, टेलीफोन, हाउस टैक्स के बिल हैं, पैनकार्ड व ड्राइविंग लाइसेंस हैं. इन सब से ही हमारा काम चल जाता है.’’

‘‘अरे साहब, कई लोगों ने कईकई जाली कनेक्शन ले रखे हैं इसलिए सरकार को यह कदम उठाना पड़ा. कोई गैरकानूनी ढंग से तिपहिए में गैस लगा रहा है तो कोई मोटर में. कोई कईकई सिलेंडरों की ब्लैक कर रहा है.’’

‘‘अच्छा? तो हम बेचारे सीधेसादे पुरुष लोग पकड़ गए? कमाल है.’’

वे हंस पड़ीं.

‘‘यह तो बताइए कि यह कम्बख्त कार्ड बनता कहां है?’’

‘‘कुबेर भवन में.’’

‘‘ठीक,’’ कह कर हम ने स्कूटर दौड़ाया. बहू कुबेर भवन में ही 8वीं मंजिल पर काम करती है, यह सोच कर मन में तसल्ली मिली.

वैसे हमें अजनबियों से पूछताछ करने में कोई झिझक नहीं होती. अधिक से अधिक ‘न’ या ‘नहीं मालूम’ यही तो कोई कहेगा. झांपड़ तो नहीं मारेगा. और इसी बहाने कई बार नए मित्र भी बन जाते हैं.

जानकारी के बाद हम राशन कार्ड आफिस पहुंच गए. क्लर्क से आवेदनपत्र (फार्म) मांगा, मिल गया. फिर पूछा, ‘‘भैया, क्याक्या भरना है और क्याक्या प्रमाणपत्र इस के साथ देने हैं?’’

‘‘बिजली का बिल, पुराना राशन- कार्ड और उस में क्याक्या बदलना है, पता या प्राणियों की संख्या,’’ भैया एक सांस में बोल गया.

हम घबरा गए, ‘‘लेकिन मैं ने तो कभी राशनकार्ड बनवाया ही नहीं.’’

‘‘क्यों, कहां से आए हो?’’

‘‘बरेली, यू.पी. से.’’

‘‘तो वहां का राशनकार्ड लाओ,’’ भैया ने फरमाया.

‘‘अरे, वहां भी कभी बनवाया नहीं और वह तो बहुत पुरानी बात हो गई. बड़ौदा में 22 साल से रह रहा हूं. तो अब मैं बड़ौदा का ही रहने वाला हो गया.’’

उस ने हमें ऐसे घूरा जैसे हम कोई अजायबघर के जीव हों. फिर बोला, ‘‘तो फिर साहब से मिलो,’’ और दाईं तरफ इशारा किया.

हमारी भृकुटि तन गईं, ‘‘वहां तो कोई है ही नहीं?’’

‘‘साहब हर सोमवार को आते हैं और 11 से 2 बजे तक, तभी मिलो. आज गुरुवार है,’’ और हमें दरवाजा नापने का इशारा किया.

सोमवार को सवा 11 बजे पहुंचे तो देखा छोटे से दरवाजे के सामने करीब 60 लोग लाइन लगाए खड़े हैं. हम भी उन के पीछे खड़े हो गए. कुछ देर गिनती करते रहे और पाया कि एक प्राणी हर 4 मिनट में अंदर जाता है यानी हमारा नंबर 4 घंटे बाद आएगा. दिल टूट गया, कुछ तिकड़म लगाना पड़ेगा.

वहां से बाहर आए और मित्र सागरभाई को अपनी दुखभरी कहानी सुनाई. वे फोन पर बोले, ‘‘काटजू साहब, चिंता की कोई बात नहीं, सब पैसे बनाने के धंधे हैं. आप अपने कागज मुझे दे दीजिए. मैं अपने एक एजेंट मित्र से काम करवा दूंगा. 3 साल पहले मैं ने अपना भी राशनकार्ड ऐसे ही बनवाया था.’’

हम बड़े खुश हुए कि चलो, बला टली. मन ही मन कहा कि सागरभाई, दोस्त हो तो आप जैसा. जा कर उन्हें सब कागजों की एकएक प्रतिलिपि दे दी.

एक बात और, ‘एक हथियार काम न करे तो दूसरा तो काम करे,’ यह सोच कर अपने एक और मित्र गोबिंदभाई से भी संपर्क किया. उन्होंने तो अपने एक पुराने मामलतदार मित्र से मुलाकात भी करवा दी.

पटेल साहब बोले, ‘‘आप को कब तक राशनकार्र्ड चाहिए?’’

‘‘यही 8-10 दिन में.’’

वे बेफिक्री से बोले, ‘‘ठीक है, अपने सब कागजात दे दीजिएगा.’’

वापस लौटते समय गोबिंदभाई ने समझाया कि पटेल साहब को कुछ दक्षिणा भी देनी पड़ेगी और दक्षिणा समय पर निर्भर रहेगी, कम समय माने अधिक दक्षिणा. हम समझ गए, सिर हिला दिया.

2 दिन बाद हम ने फोन किया, ‘‘सागरभाई, मामला तय हो गया?’’

फोन पर रोनी आवाज सुनाई दी, ‘‘नहीं साहब, उस ने कहा है कि अब यह काम बहुत मुश्किल हो गया है. वह नहीं बनवा सकता. राशन विभाग के भाईलोग बहुत सख्त हो गए हैं, उस को घास भी नहीं डालते.’’

मन ही मन हम ने सागरभाई और उन के एजेंट को गाली देते हुए फोन रख दिया. यह दांव तो खाली गया.

अब हम पहुंचे पटेल साहब के यहां. उन की बहू घंटी सुनने पर बाहर निकली.

‘‘साहब हैं?’’ हम ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘अरे, कहां गए?’’

‘‘भारगाम.’’

‘‘कब आएंगे?’’

‘‘5 दिन बाद.’’

हम ने फिर माथा पकड़ लिया. लगता है यह सोमवार भी गया. दर्देदिल लिए हुए गोबिंदभाई को मामला-ए-राशन कार्ड की रिपोर्ट दी. उन्होंने दिलासा दिया, ‘‘कोई बात नहीं काटजू साहब, 5 दिन बाद पटेल साहब आप का काम जरूर करवा देंगे.’’

हम ने घर की राह ली.

मंगलवार को फिर पटेल साहब के दर्शन हेतु निकल पड़े. अब की किस्मत से साहब घर पर ही थे.

‘‘साहब, मेरे राशनकार्ड का काम?’’

पटेल साहब ने दुखभरी मुद्रा बनाई, ‘‘काटजू साहब, 2-3 महीने लग जाएंगे. डिपार्टमेंट में कुछ अंदरूनी जांच चल रही है. मेरी समझ से आप खुद ही कार्ड के लिए जाएं तो ठीक होगा.’’

हम ने मन ही मन अपनेआप को कोसा और पटेल साहब को भी. बड़ा तीसमार खां बना फिरता था. कहता था, ‘कितने दिनों में कार्ड चाहिए?’ मेरे 2 सोमवारों का खून कर दिया. सोचा भीम और अर्जुन तो फेल हो गए, अब शेर की मांद में खुद ही जाना पड़ेगा और कोई चारा बचा ही नहीं था. चलो, इस को भी आजमा लिया जाए.

खैर, सोमवार को पौने 11 बजे राशनकार्ड के दफ्तर पहुंचे तो देखा लंबी लाइन लगी हुई है, जबकि दरवाजा बंद है, हम भी लाइन में लग गए. बुढ़ापे में समय की कोई तकलीफ नहीं और करना भी क्या है? हां, स्टैमिना अवश्य चाहिए, कहीं खड़ेखड़े दिल धड़कना न बंद कर दे.

गिनती की तो सामने 55 जवान व बूढ़े खड़े थे. अगर हरेक पर 3-3 मिनट लगता है तो ढाई या 3 घंटे लगेंगे. खैर, देखते हैं क्या होता है?

झोले से यह सोच कर किताब निकाली कि चलो, 2-3 अध्याय ही पढ़ लिए जाएं. वैसे भी हमारी आदत है कि जहां किसी काम के लिए बैठना या खड़े रहना पड़ेगा वहां हम कोई किताब जरूर ले जाते हैं, टाइम पास के लिए. अभी 3 पन्ने पढ़े ही थे कि दफ्तर खुला. आधे घंटे में 5 प्राणी अंदर घुसे. हम गम में डूब गए, अब क्या होगा? सामने वाले पुरुष ज्ञानी व दयालु निकले. पूछा तो उन्होंने सवाल किया, ‘‘आप को क्या करवाना है?’’

‘‘नया राशनकार्ड बनवाना है.’’

‘‘सौगंधपत्र बनवा लिया है?’’

‘‘यह क्या बला है.’’

वे हंसे (हमारे दुख पर), ‘‘अरे, ऐफिडेविट. इस के बिना कुछ नहीं होगा. आप इसे बनवा लीजिए.’’

‘‘बगल वाली इमारत में इस का दफ्तर है. वहां आवेदनपत्र भी मिल जाएगा और स्टैंपपेपर भी.’’

हम उस ओर भागे.

रास्ते में एक और सज्जन से पूछा, ‘‘सौगंधपत्र यहां कहां पर बनता है?’’

वे भी ज्ञानी व मार्गदर्शक निकले. बोले, ‘‘यहीं बनता था, किंतु गांधी- जयंती के बाद से अब नर्मदा भवन में बनता है.’’

वडोदरा शहर की खासीयत है कि सभी सरकारी आफिस, दोचार किलोमीटर के भीतर ही मिल जाते हैं. उन्हें धन्यवाद दे कर हम नर्मदा भवन भागे.

नर्मदा भवन में 3 देवियों ने हमारी बहुत सहायता की. एक सज्जन ने फार्म तो दे दिया किंतु कुबेर भवन जाने की सलाह दी. हम अब तक काफी अनुभव प्राप्त कर चुके थे. कुछ शंका हुई और पास खड़े चौकीदार की तरफ देखा. वह भी अनुभवप्राप्त प्राणी था उस ने अपने पास बुलाया फिर अंदर इशारा किया, ‘‘उस महिला से मिलो.’’

उस युवती ने फार्म भरवाया फिर बिजली बिल, पासपोर्ट की कापी इत्यादि नत्थी की और अंदर दाईं तरफ की मेज पर जाने को कहा.

वहां एक मुहर लगाई गई, रजिस्टर में कुछ लिखा गया और 11 नंबर का सिक्का दिया और कहा, ‘‘उस 11 नंबर के काउंटर पर जाइए, वहां आप का सब काम हो जाएगा.’’

11 नंबर काउंटर की कुमारी मुसकराई तो बड़ी भोली लगी. वह थी तो दुबलीपतली पर बहुत खूबसूरत थी. बोली, ‘‘कहिए?’’

‘‘पहले अपना नाम बताइए.’’

वह खिले चेहरे से बोली, ‘‘निकी.’’

‘‘आगे?’’

‘‘पाटिल.’’

‘‘कुछ खातीपीती नहीं हो क्या? देखो, हाथ की हड्डी भी उभरी हुई दिख रही है और उम्र तो 17 की होगी.’’

मुसकरा कर बोली, ‘‘अंकल, खाती बहुत हूं किंतु वजन नहीं बढ़ता, और 22 वर्ष की हूं.’’

‘‘पढ़ाई कितनी की, बी.कौम या 12वीं?’’

‘‘नहीं, कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा किया है.’’

‘‘और शादी?’’

उस ने सिर हिला दिया.

हम ने सोचा कि इसे अपने बेटे के लिए गांठ लें तो बहुत भाग्यवान समझेंगे.

अपने काम के बीच में बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रहे हैं, अंकल?’’

लगता है, हमारे मन के विचारों को उस ने पढ़ लिया था. सो बोला, ‘‘सोच रहा था कि तुम्हारी व मेरे बेटे की जोड़ी कैसी रहेगी? वह भी अविवाहित है. वैसे तुम मेरा काम पूरा करो नहीं तो बातों ही बातों में पूरा दिन बीत जाएगा.’’

उस ने कनखियों से हमें घूरा, आंखों से आश्चर्य जाहिर किया. सोचा होगा कि कैसे अंकल से पाला पड़ा है, काम के साथ रिश्ता भी ले आए. फिर कहा, ‘‘20 रुपए दीजिए, अंकल. यहां हस्ताक्षर कीजिए और सीधे खड़े रहिए. मुझे आप की फोटो खींचनी है, सौगंधपत्र पर जाएगी.’’

फोटो खींचने के बाद निकी ने भरा फार्म हमें थमाते हुए उप मामलतदार की तख्ती की तरफ इशारा किया कि वहां यह दे दीजिए. वे रजिस्टर में इसे दर्ज व हस्ताक्षर कर आप को दे देंगी.

उस को धन्यवाद दे हम आगे बढ़े.

कुछ ही देर में नर्मदा भवन का सारा काम समाप्त हुआ. सौगंधपत्र हमारे हाथ में था.

घड़ी में देखा तो साढ़े 12 बज चुके थे. सोचा, शायद आज ही काम बन जाए और हम कुबेर भवन जा पहुंचे.

देखा, भीड़ तो कम थी. करीब 20 प्राणी. हम भी उन्हीं में लग गए, 21वें. सामने एक जवान था. परिचय किया, ‘‘आप का नाम?’’

‘‘हितेनभाई.’’

हम ने कहा, ‘‘यार, जरा आगे जा कर पता लगा लो कि भीड़ कितनी रफ्तार से चल रही है और नए राशनकार्ड के लिए कुछ और झमेला यानी कुछ और कागजात तो नहीं चाहिए. मैं कतार में तुम्हारी जगह सुरक्षित रखता हूं.’’

हितेन मान गया और आगे दरियाफ्त कर के बदहवास हालत में वापस लौटा. बोला, ‘‘नया राशनकार्ड यहां नहीं भुतड़ी कचहरी में बनता है. यहां केवल पुराने कार्डों के नाम या बदले पते ठीक किए जाते हैं.’’

‘‘अच्छा, यह भूत की कचहरी है कहां?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’

हमारा यह वार्त्तालाप एक और सज्जन सुन रहे थे. बीच में आ गए, ‘‘मैं जानता हूं और मुझे भी वहीं जाना है. जुबली बाग यहां से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है.’’

हितेनभाई के पास मोटरसाइकिल थी, हमारे पास स्कूटर तो हम ने उस सज्जन से कहा, ‘‘चलिए, आप को ले चलते हैं. रास्ता बता दीजिएगा.’’

भुतड़ी कचहरी में केवल 4 लोग कतार में थे. हमारा नंबर आने पर अधिकारी बदतमीजी से बोला, ‘‘यह क्या है? आवेदनपत्र कहां है, ऐफिडेविट व मतदाता पहचानपत्र कहां है?’’

‘‘यह रहा आवेदनपत्र और यह ऐफिडेविट है. मतदाता पहचानपत्र खो गया.’’

‘‘उस के बिना कुछ नहीं होगा. वह लाओ. कहां से आए हो?’’

‘‘वैसे तो बरेली, यू.पी. का रहने वाला हूं लेकिन वडोदरा में 22 साल से रह रहा हूं. अभी तक राशनकार्ड की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ी. इसलिए बनवाया नहीं था.’’

‘‘तो अब कौन सी जरूरत आन पड़ी है?’’

‘‘गैस सिलेंडर वाला राशनकार्ड दिखाने को कह रहा है.’’

उस ने हमारे सारे कागज वापस करते हुए कहा, ‘‘जाओ, मेरा समय बरबाद न करो. बाहर दाईं तरफ दरवाजे पर एक आदमी बैठा है. वह आप को सब समझा देगा कि क्याक्या लाना है.’’

हम निराश हो बाहर निकले. देखा हितेन भी मुंह लटकाए खड़ा था. उस को भी अधिकारी ने झिड़क दिया था. बाहर के आदमी से पूछा तो वह ज्ञानी निकला. हमारे कागजात देखे और सुझाव दिया.

‘‘यहां कुछ नहीं होगा. आप कुबेर भवन के नीचे कमरा नं. 23 में जाइए. वहीं सब काम होगा.’’

‘‘लेकिन वहां से तो हम आए हैं. और यहां उस अंदर के बाबू ने यह सब और मांग लिया. कहां से लाएंगे?’’

‘‘आप उन की परवा न कीजिए. जैसा मैं कहता हूं वैसा कीजिए.’’

वहां से हट कर हम उबल पड़े. ‘‘सच, हम भारतवासियों को एकदूसरे को तड़पाने व तड़पते देख खूब आनंद आता है. कभी कहते हैं यह लाओ, कभी कहते हैं वह लाओ.’’

हमारे समाज में पुरुषों को रोना वर्जित है, स्त्री होते तो दहाड़ मारमार कर रो लेते. गम में डूबे हुए जब कुबेर भवन पहुंचे तो देखा कमरा नंबर 23 बंद हो चुका था.

8वीं मंजिल पर बहू से जा कर मिले तो उस ने कहा, ‘‘पापा, अपने कागज मुझे दीजिए. मैं अपनी एक मित्र से पूछताछ करवाऊंगी. वह नीचे की पहली मंजिल पर काम करती है और ऐसे मामलों को निबटाती भी है.’’

हम बोले, ‘‘ठीक है, बेटी. कोशिश करो. 400-500 तक खर्च करने को मैं तैयार हूं.’’

2 दिन बाद बहू का फोन आया, ‘‘मैं अपनी दोस्त के साथ राशन अधिकारी से मिली थी. बड़ा बदतमीज आदमी है. पहले तो एकदम मना कर दिया. फिर जब मैं ने कहा कि मैं भी राज्य सरकार में काम करती हूं तब माना. उस का रेट 500 रुपए है. आप अगले सोमवार को आइएगा.’’

हम ने बहू को धन्यवाद दिया. विक्रम और बेताल की कहानी में विक्रम की तरह सोमवार को हम फिर दफ्तर पहुंचे. बहू को फोन मिलाया तो वह नीचे उतर कर आई और लाइन में हमें खड़े देख संतुष्ट हुई. बोली, ‘‘मेरी दोस्त की किसी करीबी रिश्तेदार की 2 दिन पहले मौत हो गई है. वह कई दिन नहीं आ पाएगी. अच्छा किया आप लाइन में लग गए.’’

कतार में करीब 25 लोग लगे थे. 40 मिनट में अपना नंबर आ गया. साहब के पास कागज का पुलिंदा रख चुपचाप खड़े हो गए. सब पन्नों पर उन्होंने एक निगाह डाली फिर कुछ कहे बिना हस्ताक्षर कर हमें बाहर की तरफ इशारा कर दिया.

बाहर गए. पावती पाने वालों की कतार लगी थी, यानी कागज व रुपए जमा कर रसीद लेना. इस कतार मेें हम घंटे भर तक धीरेधीरे सरकते रहे फिर आफिस के अंदर दाखिल हुए. 20 रुपए दिए, रसीद मिली और आदेश मिला कि 5 नवंबर को शाम 4 से 6 बजे के बीच कार्ड लेने आ जाना.

रसीद को पर्स में संभाल कर रखा (खरा सोना जो हो गया था) ऊपर भागे बहू को धन्यवाद देने. देखें, अब 5 नवंबर को क्याक्या गुल खिलते हैं.

5 नवंबर को राशनकार्ड मिल गया, आप को आश्चर्य हुआ न? हमें भी हो रहा है, आज तक.

 राज गोपाल काटजू  

बरात के चस्के

चाहे रात भर खाना न मिले लेकिन बरात का अपना एक अलग मजा है. ऐसा मजा जो न सेब में है न सेब के जूस में. बरात के आनंद को महसूस किया जाता है. उस का सहीसही वर्णन किया जाना उतना ही मुश्किल है जितना गधे को स्वीमिंग पूल में नहलाना.

घर में शादी का कार्ड देख कर मन राष्ट्रीय चैनल से एम टीवी में अपनेआप बदल गया. कार्ड सुंदर था. हिंदुस्तान में वरवधू चाहे खूबसूरत, सुघड़ हों न हों, लेकिन उन की शादी के कार्ड जरूर ही सुंदर होते हैं. लड़की के हाथों की मेहंदी का डिजाइन भले ही टेढ़ामेढ़ा, आड़ातिरछा क्यों न हो लेकिन कार्ड की छपाई बहुत ही आकर्षक होती है.

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शादी का कार्ड फ्रिज के ऊपर रखा था. आमतौर पर मध्यवर्गीय घरों में शादी के कार्ड, राशनकार्ड, बिजली का बिना जमा किया बिल, बच्चों के रिजल्टकार्ड…सब के सब फ्रिज के ऊपर ही रखे जाते हैं. फ्रिज, अंदर का सामान तो ठंडा रखता ही है, ऊपर रखे टैंशन वाले कागजात भी ठंडा कर देता है. ठंडे बस्ते में डालना कहावत पुरानी हो गई है, नए जमाने की कहावत ‘फ्रिज के ऊपर रखना’ हो सकती है.

हमें मालूम था कि पड़ोसी शर्माजी के छोटे साहबजादे लल्लू की शादी है. बड़े वाले कल्लू की शादी तो हम 3 साल पहले ही निबटा चुके थे. कल्लू की शादी की यादें मन में जीवंत हो उठीं. खासतौर पर पनीर और छोले के स्वाद जीभ पर ताजा हो गए. मन में स्वाद ध्यान आते ही लगभग 10 प्रतिशत स्वाद तो मिल ही गया.

हम ने जानबूझ कर श्रीमतीजी से पूछा, ‘‘यह किस की शादी का कार्ड आया है?’’

पत्नीश्री झल्ला गईं, बोलीं, ‘‘यह कार्ड कोई तमिल या मलयालम भाषा में तो छपा नहीं है. न ही फारसी या अरबी भाषा में प्रिंट हुआ है, जो तुम्हारे पढ़ने में नहीं आ रहा है.’’

हम ने भी मोर्चा नहीं छोड़ा. कहा, ‘‘कार्ड है तो शादी ही होगी. शादी होगी तो उस में दूल्हे का होना भी निहायत जरूरी है. हमें तो खाली इतना बता दो कि दूल्हा कौन बन रहा है?’’

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पत्नीश्री का मूड कुछ नौरमल हुआ तो हमारे चेहरे पर भी मुसकान तैर गई. जैसे बढ़ते शेयर सूचकांक को देख कर दलालों के चेहरों पर चमक आ जाती है. कुछ मजाक का पुट ले कर बोलीं, ‘‘कम से कम तुम तो नहीं बन रहे हो.’’

हम ने कहा, ‘‘हम तो एक बार ही वर बने थे. उस के बाद तो कुंवर, सुवर जानवर, दुष्टवर और न जाने कौनकौन से वर बन गए. हम तो शादी के समय जिस घोड़ी पर बैठे थे वह घोड़ी भी बरात के बाद जमीन पर धूल में खूब लोटी थी. शायद हमारे बैठने से उस की पीठ अपवित्र हो गई हो. जब घोड़ी तक हमारी बेइज्जती कर चुकी है तो फिर तुम्हारी बात का बुरा क्यों मानें? फिर शादी के बाद तो हमारी इज्जत धोने का लाइसेंस तुम्हें मिल ही चुका है.’’

इस पर पत्नीश्री ‘हीही’ कर के हंसती रहीं.

मूड ठीक होने पर बताया कि लल्लू की 13 को शादी है. हम ने कहा कि हमारी शादी भी 13 को हुई थी, तभी से हमारी जिंदगी तीनतेरह हो गई है. कम से कम लल्लू को तो रोका जाना चाहिए. रोक नहीं सकते तो कम से कम शादी 12 या 14 तारीख को कर ले.

हमारी न चलनी थी और न चली.

13 तारीख को हम पत्नी और बच्चों के साथ रिकशे पर बैठ कर सीधे लल्लू के घर पहुंच गए. वहां पहुंच कर हमें पता चला कि शादी का कार्यक्रम घर पर नहीं है बल्कि शहर से दूर बने एक फार्महाउस में है. अब रिकशा वालों से फिर तूतू, मैंमैं. कोई जाने को तैयार नहीं तो कोई पैसे इतने मांग रहा था कि हमें लग रहा था कि हम अपने छोटे शहर में नहीं, बल्कि लोखंडवाला में खड़े हैं.

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जैसेतैसे हम परिवार समेत फार्महाउस पहुंचे. वहां रिकशे से उतरते ही हम ने रोब झाड़ा, ‘‘क्या करें, गाड़ी निकाली थी लेकिन आगे का एक पहिया पंक्चर निकला. सोचा, स्टैपनी बदल लें लेकिन तब ध्यान आया कि परसों ही तो स्टैपनी मिस्त्री के यहां डाली थी. मजबूरी में रिकशा पकड़ कर आना पड़ा.’’

पत्नीश्री दो कदम आगे बढ़ गईं, बोलीं, ‘‘मैं ने तो इन से कई बार कहा है कि एक नई गाड़ी ले लो. मेरी मान कर एक नई गाड़ी ले ली होती तो कम से कम आज रिकशे पर तो न बैठना पड़ता. मैं तो आज पहली बार रिकशे पर बैठी हूं,’’ हालांकि सुनने वाले मुंह दबा कर हंसने लगे.

थोड़ी देर में बरात चलने का माहौल बनने लगा. बरात रवाना होने से पहले माहौल बनाया जाता है. सब से पहले तो मामा या मौसा रूठ जाते हैं कि उन्हें स्टेशन पर लेने के लिए किसी को भेजा क्यों नहीं? उन की बेइज्जती करनी थी तो बुलाया ही क्यों? फिर बाकी रिश्तेदार मिल कर उन्हें मनाते हैं.

बरात के चलने से थोड़ा पहले अफरातफरी का माहौल बन जाता है. दूल्हे के चाचा ने जो नई शर्ट सिलवाई थी वह अब मिल ही नहीं रही है.

महिलाएं एक कमरा अलग से घेर लेती हैं जिस में वे तैयार होती हैं. उस कमरे में छोटीछोटी लड़कियां सब से ज्यादा चिल्लपों करती हैं. उस में कंघा ढूंढ़े नहीं मिलता है. क्रीम पर छीनाझपटी होती है. तेल की शीशी फर्श पर फैल जाती है. मैचिंग दुपट्टा खोजने पर मिलता ही नहीं है. बाद में याद आता है कि उसे तो अटैची में रखा ही नहीं था. वह तो घर पर ही रह गया.

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जैसेतैसे बरात चलना शुरू करती है. जैसे ही बरात निकली, लड़कियां फैशन परेड का आयोजन करती चलती हैं. कुछ तो ऐसे चलती हैं जैसे वे रैंप पर कैटवाक कर रही हों. जिन्हें अगर सरोज खान या फरहा खान देख लें तो वे भी भौचक रह जाएं कि ऐसे डांस के स्टैप के आइडिया आखिर उन के दिमाग में क्यों नहीं आए?

अब जिन्हें डांस नहीं आता है उन्हें सिर्फ एक काम आता है कि वे बैंड वाले के पास जा कर रौब झाड़ते हैं कि गाना बदलो. क्या बकवास गाने लगा रखे हैं. कुछ शकीला, टकीला बजाओ और खुद ताली बजाने लगते हैं. जब कुछ समझ में नहीं आता है तो जेब से 10 का नोट निकाल कर थोड़ी देर हवा में लहराते हैं. जब वे मुतमईन हो जाते हैं कि सभी ने उन के हाथ में 10 का नोट देख लिया है तो फिर वे उस नोट को अपने मुंह में दबा लेते हैं. जब बैंड वाला उस नोट को झपटने की कोशिश करता है तो वे हरगिज उस नोट को नहीं देते हैं. फिर वे बैंड वाले को इशारा कर देते हैं कि डांस करते हुए आओ, तो ही नोट मिलेगा.

बैंड वाले भी कम उस्ताद नहीं होते हैं. उन की नजर लोगों के हाथों पर होती है कि किस की उंगली में नोट फंसा है. फिर वे क्लीरिनेट से तूतू तूतू की धुन निकालते हुए, थोड़ी सी कमर मटका कर अपनी 2 उंगलियां बगले की चोंच की तरह बना कर नोट झपट ले जाते हैं.

बरात में सब से पीछे बुजुर्ग चलते हैं और वे भी चलते हैं जो अपने को शरीफ समझते हैं. बीच में नर्तक दल पूरे जोश में होता है. जहां भी बैंड वाले रुके, नर्तक सड़क घेर कर उस पर कब्जा कर लेते हैं, मानो नगर निगम से उन्होंने सड़क के इस टुकड़े का बैनामा करा लिया हो. सड़क पर जूते इतने घिसते हैं कि जूता सुधारने वाले खुश हो जाते हैं कि कम से कम दोचार जोड़ी तो मरम्मत के लिए जरूर आएंगे.

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जहां पर नृत्य का अखिल भारतीय कार्यक्रम चल रहा होता है वहां किनारे पर जीजाजी सूटबूट में सजे खड़े हो जाते हैं. वे सोचते हैं कि सालों और उन के दोस्तों की नजर पड़ जाए तो उन्हें भी डांस के लिए खींचा जाए. उन्हें डांस करने के लिए मनाया जाए. ध्यान खींचने को वे डांस को सपोर्ट करते हुए ताली बजाने लगते हैं. तभी साले उन के पास डांस करते हुए आते हैं और डांस के डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. फ्लोर पर खींचने लगते हैं. अब एक बार में मान जाएं तो काहे के जीजाजी. पहले तो वे नानुकर करते हैं फिर एकदम हरकत में आते हुए डांस जैसी हरकत करने लगते हैं.

उन के डांस पर ससुरालीजन नोटिस लेते हुए तारीफें करते हैं, सालियां मुंह बना कर हंसती हैं. हालांकि वे मन ही मन कहती हैं कि डांस करते हुए कैसे बंदर लग रहे हैं और उछल तो भालू की तरह रहे हैं लेकिन कुछ स्टैप चिंपैंजी से भी मेल खा रहे हैं…

बरात सफर तय करती हुई फार्म हाउस के गेट पर पहुंच जाती है. बस, यही वह स्थान है जहां पर पूरी ताकत दिखाई जानी है. सभी हथियार चलाए जाने हैं. लास्ट में ब्लास्ट भी करना है ताकि पता चल सके कि हमारे पास परमाणु बम भी है. यहां पर तो जवान, नौजवान, बूढ़े, महिला, बच्चे…सभी को डांस करना जरूरी है. मान्यता है कि लड़की वाले के गेट पर डांस करने से कुंभ नहाने का पुण्य मिलता है. यहां पर भीड़भाड़ कुंभ के समान ही होती है, जिस में छोटे बच्चे बिछड़ जाते हैं जो बाद में चाउमिन के स्टाल पर मिलते हैं.

जम कर नृत्य प्रतियोगिता के बाद अब अंदर घुसते ही बरातियों की नजर भोजन वाले पंडाल को ढूंढ़ती है. एक तरफ कुछ डोंगे मेजों पर सजे दिखाई देते हैं. मगर यह क्या? डोंगे अभी ढके हुए हैं. उन के आसपास वरदीधारी वेटर टहलटहल कर पहरा दे रहे हैं जिस से कि कोई डोंगा खोल कर शुरू न हो जाए. डोंगा खुलते ही संग्राम शुरू. ‘हम लाए हैं तूफान से पूड़ी निकाल के – मेरे देश के बच्चो इसे खाना संभाल के’ की तर्ज पर एक बार में ही फाइबर की प्लेट में इतना कुछ भर लाए कि कौन जाने दोबारा भरने का मौका भीड़ में मिले या न मिले.

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बरात का आनंद उठा कर हम घर लौटे तो देखा कि साहबजादे ने एक पौलिथीन खोल कर मेज पर रख दी जिस में बरात का खाना था. हम ने पूछा तो बोले, ‘‘हम से वहां खाया नहीं गया तो हम चुपचाप परोसा ले आए.’’ ऊपर से हम गुस्सा हुए लेकिन मन ही मन अच्छा लगा. बरात का खाना घर ला कर गरम कर के खाओ तो स्वाद ऐसे बढ़ जाता है जैसे शरबती चावल, बासमती चावल के रूप में बदल गया हो.

बरात में चाहे जितनी फजीहत हो लेकिन हर बार मन नहीं मानता है. हम हर बार कहते हैं कि अब बरात में नहीं जाएंगे लेकिन ये बात नई बरात के निमंत्रण से पहले तक ही याद रह पाती है. हम ने श्रीमतीजी को आवाज लगाई, ‘‘देखना, अब किस की शादी पड़ रही है?’’

श्रीमतीजी गुस्से से बोलीं, ‘‘अब तो हमारी शादी है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘आखिर किस से?’’

हमारी पत्नी हंस कर बोलीं, ‘‘तुम से और किस से.’’

अकाल्पनिक

रक्षाबंधन से एक रोज पहले ही मयंक को पहली तन्ख्वाह मिली थी. सो, पापामम्मी के उपहार के साथ ही उस ने मुंहबोली बहन चुन्नी दीदी के लिए सुंदर सी कलाई घड़ी खरीद ली.

‘‘सारे पैसे मेरे लिए इतनी महंगी घड़ी खरीदने में खर्च कर दिए या मम्मीपापा के लिए भी कुछ खरीदा,’’ चुन्नी ने घड़ी पहनने के बाद पूछा.

‘‘सब के लिए खरीदा है, दीदी, लेकिन अभी दिया नहीं है. शौपिंग करने और दोस्तों के साथ खाना खाने के बाद रात में बहुत देर से लौटा था. तब तक सब सो चुके थे. अभी मां ने जगा कर कहा कि आप आ गई हैं और राखी बांधने के लिए मेरा इंतजार कर रही हैं, फिर आप को जीजाजी के साथ उन की बहन के घर जाना है. सो, जल्दी से यहां आ गया, अब जा कर दूंगा.’’

‘‘अब तक तो तेरे पापा निकल गए होंगे राखी बंधवाने,’’ चुन्नी की मां ने कहा.

‘‘पापा तो कभी कहीं नहीं जाते राखी बंधवाने.’’

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‘‘तो उन के हाथ में राखी अपनेआप से बंध जाती है? हमेशा दिनभर तो राखी बांधे रहते हैं और उन्हीं की राखी देख कर तो तूने भी राखी बंधवाने की इतनी जिद की कि गीता बहन और अशोक जीजू को चुन्नी को तेरी बहन बनाना पड़ा.’’ चुन्नी की मम्मी श्यामा बोली.

‘‘तो इस में गलत क्या हुआ, श्यामा आंटी, इतनी अच्छी दीदी मिल गईं मुझे. अच्छा दीदी, आप को देर हो रही होगी, आप चलो, अगली बार आओ तो जरूर देखना कि मैं ने क्या कुछ खरीदा है, पहली तन्ख्वाह से,’’ मयंक ने कहा.

मयंक के साथ ही मांबेटी भी बाहर आ गईं. सामने के घर के बरामदे में खड़े अशोक की कलाई में राखी देख कर श्यामा बोली, ‘‘देख, बंधवा आए न तेरे पापा राखी.’’

‘‘इतनी जल्दी आप कहां से राखी बंधवा आए पापा?’’ मयंक ने हैरानी से पूछा.

‘‘पीछे वाले मंदिर के पुजारी बाबा से,’’ गीता फटाक से बोली.

मयंक को लगा कि अशोक ने कृतज्ञता से गीता की ओर देखा. ‘‘लेकिन पुजारी बाबा से क्यों?’’ मयंक ने पूछा.

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‘‘क्योंकि राखी के दिन अपनी बहन की याद में पुजारी बाबा को ही कुछ दे सकते हैं न,’’ गीता बोली. ‘‘तू नाश्ता करेगा कि श्यामा बहन ने खिला दिया?’’

‘‘खिला दिया और आप भी जो चाहो खिला देना मगर अभी तो देखो, मैं क्या लाया हूं आप के लिए,’’ मयंक लपक कर अपने कमरे में चला गया. लौटा तो उस के हाथ में उपहारों के पैकेट थे.

‘‘इस इलैक्ट्रिक शेवर ने तो हर महीने शेविंग का सामान खरीदने की आप की समस्या हल कर दी,’’ अपना हेयरड्रायर सहेजती हुई गीता बोली.

‘‘हां, लेकिन उस से बड़ी समस्या तो पुजारी बाबा का नाम ले कर तुम ने हल कर दी,’’ अशोक की बात सुन कर अपने कमरे में जाता मयंक ठिठक गया. उस ने मुड़ कर देखा, मम्मीपापा बहुत ही भावविह्वल हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. उस ने टोकना ठीक नहीं समझा और चुपचाप अपने कमरे में चला गया. बात समझ में तो नहीं आई थी पर शीघ्र ही अपने नए खरीदे स्मार्टफोन में व्यस्त हो कर वह सब भूल गया.

एक रोज कंप्यूटर चेयरटेबल खरीदते  हुए शोरूम में बड़े आकर्षक  डबलबैड नजर आए. मम्मीपापा के कमरे में थे तो सिरहाने वाले पलंग मगर दोनों के बीच में छोटी मेज पर टेबललैंप और पत्रिकाएं वगैरा रखी रहती थीं. क्यों न मम्मीपापा के लिए आजकल के फैशन का डबलबैड और साइड टेबल खरीद ले. लेकिन डिजाइन पसंद करना मुश्किल हो गया. सो, उस ने मम्मीपापा को दिखाना बेहतर समझा. डबलबैड के ब्रोशर देखते ही गीता बौखला गई, ‘‘हमें हमारे पुराने पलंग ही पसंद हैं, हमें डबलवबल बैड नहीं चाहिए.’’

‘‘मगर मुझे तो घर में स्टाइलिश फर्नीचर चाहिए. आप लोग अपनी पसंद नहीं बताते तो न सही, मैं अपनी पसंद का बैडरूम सैट ले आऊंगा,’’ मयंक ने दृढ़स्वर में कहा.

गीता रोंआसी हो गई और सिटपिटाए से खड़े अशोक से बोली, ‘‘आप चुप क्यों हैं,

रोकिए न इसे डबलबैड लाने से. यह अगर डबलबैड ले आया तो हम में से एक को जमीन पर सोना पड़ेगा और आप जानते हैं कि जमीन पर से न आप आसानी से उठ सकते हैं और न मैं.’’

‘‘लेकिन किसी एक को जमीन पर सोने की मुसीबत क्या है?’’ मयंक ने झुंझला कर कहा, ‘‘पलंग इतना चौड़ा है कि आप दोनों के साथ मैं भी आराम से सो सकता हूं.’’

‘‘बात चौड़ाई की नहीं, खर्राटे लेने की मेरी आदत की है, मयंक. दूसरे पलंग पर भी तुम्हारी मां मेरे खर्राटे लेने की वजह से मुंहसिर लपेट कर सोती है. मेरे साथ एक कमरे में सोना तो उस की मजबूरी है, लेकिन एक पलंग पर सोना तो सजा हो जाएगी बेचारी के लिए. इतना जुल्म मत कर अपनी मां पर,’’ अशोक ने कातर स्वर में कहा.

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‘‘ठीक है, जैसी आप की मरजी,’’ कह कर मयंक मायूसी से अपने कमरे में चला गया और सोचने लगा कि बचपन में तो अकसर कभी मम्मी और कभी पापा के साथ सोता था और अभी कुछ महीने पहले अपने कमरे का एअरकंडीशनर खराब होने पर जब फर्श पर गद्दा डाल कर मम्मीपापा के कमरे में सोया था तो उसे तो पापा के खर्राटों की आवाज नहीं आई थी.

मम्मीपापा वैसे ही बहुत परेशान लग रहे थे, जिरह कर के उन्हें और व्यथित करना ठीक नहीं होगा. जान छिड़कते हैं उस पर मम्मीपापा. मम्मी के लिए तो उस की खुशी ही सबकुछ है. ऐसे में उसे भी उन की खुशी का खयाल रखना चाहिए. उस के दिमाग में एक खयाल कौंधा, अगर मम्मीपापा को आईपैड दिलवा दे तो वे फेसबुक पर अपने पुराने दोस्तों व रिश्तेदारों को ढूंढ़ कर बहुत खुश होंगे.

हिमाचल में रहने वाले मम्मीपापा घर वालों की मरजी के बगैर भाग कर शादी कर के, दोस्तों की मदद से अहमदाबाद में बस गए थे. न कभी स्वयं घर वालों से मिलने गए और न ही उन लोगों ने संपर्क करने की कोशिश की. वैसे तो मम्मीपापा एकदूसरे के साथ अपने घरसंसार में सर्वथा सुखी लगते थे, मयंक के सौफ्टवेयर इंजीनियर बन जाने के बाद पूरी तरह संतुष्ट भी. फिर भी गाहेबगाहे अपनों की याद तो आती ही होगी.

‘‘क्यों भूले अतीत को याद करवाना चाहता है?’’ गीता ने आईपैड देख कर चिढ़े स्वर में कहा, ‘‘मुझे गड़े मुर्दे उखाड़ने का शौक नहीं है.’’

‘‘शौक तो मुझे भी नहीं है लेकिन जब मयंक इतने चाव से आईपैड लाया है तो मैं भी उतने ही शौक से उस का उपयोग करूंगा,’’ अशोक ने कहा.

‘‘खुशी से करो, मगर मुझे कोई भूलाबिसरा चेहरा मत दिखाना,’’ गीता ने जैसे याचना की.

‘‘लगता है मम्मी को बहुत कटु अनुभव हुए हैं?’’ मयंक ने अशोक से पूछा.

‘‘हां बेटा, बहुत संत्रास झेला है बेचारी ने,’’ अशोक ने आह भर कर कहा.

‘‘और आप ने, पापा?’’

‘‘मैं ने जो भी किया, स्वेच्छा से किया, घर वाले जरूर छूटे लेकिन उन से भी अधिक स्नेहशील मित्र और सब से बढ़ कर तुम्हारे जैसा प्यारा बेटा मिल गया. सो, मुझे तो जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है,’’ अशोक ने मुसकरा कर कहा.

कुछ समय बाद मयंक की, अपनी सहकर्मी सेजल मेहता में दिलचस्पी देख कर गीता और अशोक स्वयं मयंक के लिए सेजल का हाथ मांगने उस के घर गए.

‘‘भले ही हम हिमाचल के हैं पर वर्षों से यहां रह रहे हैं, मयंक का तो जन्म ही यहीं हुआ है. सो, हमारा रहनसहन आप लोगों जैसा ही है, सेजल को हमारे घर में कोई तकलीफ नहीं होगी, जयंतीभाई,’’ अशोक ने कहा.

‘‘सेजल की हमें फिक्र नहीं है, वह अपने को किसी भी परिवेश में ढाल सकती है,’’ जयंतीभाई मेहता ने कहा. ‘‘चिंता है तो बस उस के दादादादी की, अपनी परंपराओं को ले कर दोनों बहुत कट्टर हैं. हां, अगर शादी उन के बताए रीतिरिवाज के अनुसार होती है तो वे इस रिश्ते के लिए मना नहीं करेंगे.’’

‘‘वैसे तो हम कोई रीतिरिवाज नहीं करने वाले थे, पर सेजल की दादी की खुशी के लिए जैसा आप कहेंगे, कर लेंगे,’’ गीता ने सहजता से कहा, ‘‘आप बस जल्दी से शादी की तारीख तय कर के हमें बता दीजिए कि हमें क्या करना है.’’

सब सुनने के बाद मयंक ने कहा, ‘‘यह आप ने क्या कह दिया, मम्मी, अब तो उन के रिवाज के अनुसार, सेजल की मां, दादी, नानी सब को मेरी नाक पकड़ कर मेरा दम घोंटने का लाइसैंस मिल गया.’’

गीता हंसने लगी, ‘‘सेजल के परिवार से संबंध जोड़ने के बाद उन के तौरतरीकों और बुजुर्गों का सम्मान करना तुम्हारा ही नहीं, हमारा भी कर्तव्य है.’’

गीता बड़े उत्साह से शादी की तैयारियां करने लगी. अशोक भी उतने ही हर्षोल्लास से उस का साथ दे रहा था.

शादी से कुछ रोज पहले, मेहता दंपत्ती उन के घर आए.

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‘‘शादी से पहले हमारे यहां हवन करने का रिवाज है, जिस में आप का आना अनिवार्य है,’’ जयंतीभाई ने कहा, ‘‘आप को रविवार को जब भी आने में सुविधा हो, बता दें, हम उसी समय हवन का आयोजन कर लेंगे. वैसे हवन में अधिक समय नहीं लगेगा.’’

‘‘जितना लगेगा, लगने दीजिए और जो समय सेजल की दादी को हवन के लिए उपयुक्त लगता है, उसी समय  करिए,’’ गीता, अशोक के बोलने से पहले ही बोल पड़ी.

‘‘बा, मेरा मतलब है मां तो हमेशा हवन ब्रह्यबेला में यानी ब्रैकफास्ट से पहले ही करवाती हैं.’’ जयंतीभाई ने जल्दी से पत्नी की बात काटी, कहा, ‘‘ऐसा जरूरी नहीं है, भावना, गोधूलि बेला में भी हवन करते हैं.’’

‘‘सवाल करने का नहीं, बा के चाहने का है. सो, वे जिस समय चाहेंगी और जैसा करने को कहेंगी, हम सहर्ष वैसा ही करेंगे,’’ गीता ने आश्वासन दिया.

‘‘बस, हम दोनों के साथ बैठ कर आप को भी हवन करना होगा. बच्चों के मंगल भविष्य के लिए दोनों के मातापिता गठजोड़े में बैठ कर यह हवन करते हैं,’’ भावना ने कहा.

गीता के चेहरे का रंग उड़ गया और वह चाय लाने के बहाने रसोई में चली गई. जब वह चाय ले कर आई तो सहज हो चुकी थी. उस ने भावना से पूछा कि और कितनी रस्मों में वर के मातापिता को शामिल होना होगा?

‘‘वरमाला को छोड़ कर, छोटीमोटी सभी रस्मों में आप को और हमें बराबर शामिल होना पड़ेगा?’’ भावना हंसी, ‘‘अच्छा है न, कुछ देर को ही सही, भागदौड़ से तो छुट्टी मिलेगी.’’

‘‘दोनों पतिपत्नी का एकसाथ बैठना जरूरी होगा?’’ गीता ने पूछा.

‘‘रस्मों के लिए तो होता ही है,’’ भावना ने जवाब दिया.

‘‘वैसा तो हिमाचल में भी होता है,’’ अशोक ने जोड़ा, ‘‘अगर वरवधू के मातापिता में से एक न हो तो विवाह की रस्में किसी अन्य जोड़े चाचाचाची वगैरा से करवाई जाती हैं.’’

‘‘बहनबहनोई से भी करवा सकते हैं?’’ गीता ने पूछा.

‘‘हां, किसी से भी, जिसे वर या वधू का परिवार आदरणीय समझता हो,’’ भावना बोली.

मयंक को लगा कि गीता ने जैसे राहत की सांस ली है. मेहता दंपती के जाने के बाद गीता ने अशोक को बैडरूम में बुलाया और दरवाजा बंद कर लिया. मयंक को अटपटा तो लगा पर उस ने दरवाजा खटखटाना ठीक नहीं समझा. कुछ देर के बाद दोनों बाहर आ गए और गीता फोन पर नंबर मिलाने लगी.

‘‘हैलो, चुन्नी… हां, मैं ठीक हूं… अभी तुम और प्रमोदजी घर पर हो, हम

मिलना चाह रहे हैं, तुम्हारे भाई की शादी है. भई, बगैर मिले कैसे काम चलेगा… यह तो बड़ी अच्छी बात है… मगर कितनी भी देर हो जाए आना जरूर, बहुत जरूरी बात करनी है.’’ फोन रख कर गीता अशोक की ओर मुड़ी, ‘‘चुन्नी और प्रमोद दोस्तों के साथ बाहर खाना खाने जा रहे हैं, लौटते हुए यहां आएंगे.’’

‘‘ऐसी क्या जरूरी बात करनी है दीदी से जिस के लिए उन्हें आज ही आना पड़ेगा?’’ मयंक ने पूछा.

गीता और अशोक ने एकदूसरे की ओर देखा. ‘‘हम चाहते हैं कि तुम्हारे विवाह की सब रस्में तुम्हारी चुन्नी दीदी और प्रमोद जीजाजी निबाहें ताकि मैं और गीता मेहमानों की यथोचित आवभगत कर सकें,’’ अशोक ने कहा.

‘‘मेहमानों की देखभाल करने को मेरे बहुत दोस्त हैं और दीदीजीजा भी. आप दोनों की जो भूमिका है यानी मातापिता वाली, आप लोग बस वही निबाहेंगे,’’ मयंक ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘‘उस में कई बार जमीन पर बैठना पड़ता है जो अपने से नहीं होता,’’ गीता ने कहा.

‘‘जमीन पर बैठना जरूरी नहीं है, चौकियां रखवा देंगे कुशन वाली.’’

‘‘ये करवा देंगे वो करवा देंगे से बेहतर है चुन्नी और प्रमोद से रस्में करवा ले,’’ गीता ने बात काटी. ‘‘तेरी चाहत देख कर हम बगैर तेरे कुछ कहे सेजल से तेरी शादी करवा रहे हैं न, अब तू चुपचाप जैसे हम चाहते हैं वैसे शादी करवा ले.’’

‘‘कमाल करती हैं आप भी, अपने मांबाप के रहते मुंहबोली बहनबहनोई से मातापिता वाली रस्में कैसे करवा लूं्?’’ मयंक ने झल्ला कर पूछा.

‘‘अरे बेटा, ये रस्मेंवस्में सेजल की दादी को खुश करने को हैं, हम कहां मानते हैं यह सब,’’ अशोक ने कहा.

‘‘अच्छा? पुजारी बाबा से राखी किसे खुश करने को बंधवाते हैं?’’ मयंक ने व्यंग्य से पूछा और आगे कहा, ‘‘मैं अब बच्चा नहीं रहा पापा, अच्छी तरह समझ रहा हूं कि आप दोनों मुझ से कुछ छिपा रहे हैं. आप को बताने को मजबूर नहीं करूंगा लेकिन एक बात समझ लीजिए, अपनों का हक मैं मुंहबोली बहन को कभी नहीं दूंगा.’’

‘‘अब बात जब अपनों और मुंहबोले रिश्ते पर आ गई है, गीता, तो हमें मयंक को असलियत भी बता देनी चाहिए,’’ अशोक मयंक की ओर मुड़ा, ‘‘मैं भी तुम्हारा अपना नहीं. मुंहबोला पापा, बल्कि मामा हूं. गीता मेरी मुंहबोली बहन है. मैं किसी पुजारी बाबा से नहीं, गीता से राखी बंधवाता हूं. पूरी कहानी सुनना चाहोगे?’’

स्तब्ध खड़े मयंक ने सहमति से सिर हिलाया.

‘‘मैं और गीता पड़ोसी थे. हमारी कोईर् बहन नहीं थी, इसलिए मैं और मेरा छोटा भाई गीता से राखी बंधवाते थे. अलग घरों में रहते हुए भी एक ही परिवार के सदस्य जैसे थे हम. जब मैं चंडीगढ़ में इंजीनियरिंग कर रहा था तो मेरे कहने पर और मेरे भरोसे गीता के घर वालों ने इसे भी चंडीगढ़ पढ़ने के लिए भेज दिया. वहां यह रहती तो गर्र्ल्स होस्टल में थी लेकिन लोकल गार्जियन होने के नाते मैं इसे छुट्टी वाले दिन बाहर ले जाता था.

‘‘मेरा रूममेट नाहर सिंह राजस्थान के किसी रजवाड़े परिवार से था, बहुत ही शालीन और सौम्य, इसलिए मैं ने गीता से उस का परिचय करवा दिया. कब और कैसे दोनों में प्यार हुआ, कब दोनों ने मंदिर में शादी कर के पतिपत्नी का रिश्ता बना लिया, मुझे नहीं मालूम. जब मैं एमबीए के लिए अहमदाबाद आया तो गीता एक सहेली के घर पर रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी. नाहर चंडीगढ़ में ही मार्केटिंग का कोर्स कर रहा था.

‘‘मुझे होस्टल में जगह नहीं मिली थी और मैं एक दोस्त के घर पर रहता था. अचानक गीता मुझे ढूंढ़ती हुई वहां आ गई. उस ने जो बताया उस का सारांश यह था कि उस ने और नाहर ने मंदिर में शादी कर ली थी और उस के गर्भवती होते ही नाहर उसे यह आश्वासन दे कर घर गया था कि वह इमोशनल ब्लैकमेल कर के अपनी मां को मना लेगा और फिर सबकुछ अशोक को बता कर अपने घर वालों को सूचित कर देना.

‘‘उसे गए कई सप्ताह हो गए थे और ढीले कपड़े पहनने के बावजूद भी बढ़ता पेट दिखने लगा था. दिल्ली में कुछ हफ्तों की कोचिंग लेने के बहाने उस ने घर से पैसे मंगवाए थे और मेरे पास आ गई थी. मैं और गीता नाहर को ढूंढ़ते हुए बीकानेर पहुंचे. नाहर का घर तो मिल गया मगर नाहर नहीं, वह अपने साले के साथ शिकार पर गया हुआ था. घर पर उस की पत्नी थी. सुंदर और सुसंस्कृत, पूछने पर कि नाहर की शादी कब हुई, उस ने बताया कि चंडीगढ़ जाने से पहले ही हो गईर् थी. नाहर के आने का इंतजार किए बगैर हम वापस अहमदाबाद आ गए.

‘‘समय अधिक हो जाने के कारण न तो गीता का गर्भपात हो सकता था और न ही वह घर जा सकती थी. मैं उस से शादी करने और बच्चे को अपना नाम देने को तैयार था. लेकिन न तो यह रिश्ता गीता और मेरे घर वालों को मंजूर होता न ही गीता अपने राखीभाई यानी मुझ को पति मानने को तैयार थी.

‘‘नाहर से गीता का परिचय मैं ने ही करवाया था, सो दोनों के बीच जो हुआ, उस के लिए कुछ हद तक मैं भी जिम्मेदार था. सो, मैं ने निर्णय लिया कि मैं गीता से शादी तो करूंगा, उस के बच्चे को अपना नाम भी दूंगा लेकिन भाईबहन के रिश्ते की गरिमा निबाहते हुए दुनिया के लिए हम पतिपत्नी होंगे, मगर एकदूसरे के लिए भाईबहन. इतने साल निष्ठापूर्वक भाईबहन का रिश्ता निबाहने के बाद गीता नहीं चाहती कि अब वह गठजोड़ा वगैरा करवा कर इस सात्विक रिश्ते को झुठलाए. मैं समझता हूं कि हमें उस की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए.’’

‘‘जैसा आप कहें,’’ मयंक ने भर्राए स्वर में कहा, ‘‘आप ने जो किया है, पापा, वह अकाल्पनिक है, जो कोई सामान्य व्यक्ति नहीं महापुरुष ही कर सकता है.’’

कुछ देर बाद वह लौटा और बोला, ‘‘पापा, मैं सेजल की दादी से बता कर आता हूं. हम दोनों अदालत में शादी करेंगे और फिर शानदार रिसैप्शन आप दे सकते हैं. दादी को सेजल ने कैसे बताया, क्या बताया, मुझे नहीं मालूम. पर आप की बात सुन कर वह तुरंत तैयार हो गई.’’

गीता और अशोक ने एकदूसरे को देखा. उन के बेटे ने उन की इज्जत रख ली.

देहमुक्ति

सुबह टीवी औन कर न्यूज चैनल लगाया तो रिपोर्टर को यह कहते सुन कर कि अपने शोषण के लिए औरतें स्वयं दोषी हैं, मन गुस्से से भर गया. फिर खिन्न मन से टीवी बंद कर दिया. सोचने लगी कि हर समय दोषी औरत की क्यों? आजकल जो भी घटित हो रहा है वह क्या कुछ नया है? न तो बाबा नए हैं न ही आश्रम रातोंरात बन गए. फिर अशांत मन से उठ कर चाय बनाने रसोईघर में घुस गई. पर मन था कि गति पकड़ बैठा और न जाने कब की भूलीबिसरी यादें ताजा हो गईं, फिर सारा दिन मन उन यादों के इर्दगिर्द घूमता रहा. बहुत कोशिश की इन यादों से बाहर आने की पर मन न जाने किस धातु का बना है? लाख साधो, सधता ही नहीं.

कभी लगता है कि नहीं हमारा मन हमारे कहने में है. लेकिन फिर छिटक कर दूर जा बैठता है. जीवन के घेरे में न जाने कितनी बार मन को परे धकेल देते हैं. पर आज तो जैसे इस मन का ही साम्राज्य था.

आज न जाने क्यों मौसी बहुत याद आ रही थीं. हम बच्चे इतना कुछ समझते नहीं थे. कमला मौसी आतीं तो बहुत खुश हो जाते. वे मां की बड़ी बहन थीं. लेकिन मां और मौसी बातें करतीं तो हमें वहां से हटा देती थीं. कहती थीं, ‘‘जाओ बच्चो अपना खेल खेलो.’’

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उन की आधीअधूरी बातें कानों में जाती, तो भी पल्ले नहीं पड़ती थीं. बस जो भी समझ में आता था वह यह था कि मौसी बालविधवा है. शायद उस समय हमें विधवा का अर्थ भी ठीक से नहीं पता था. थोड़ा बड़ा होने पर जब मां से पूछा कि मौसी बालविधवा क्यों हैं, तो मां ने बस इतना ही कहा कि मौसाजी, मौसी को बहुत छोटी उम्र में छोड़ कर, परलोक सिंधार गए थे और फिर कभी कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि वक्त के साथसाथ हम भी बड़े होते चले गए.

मौसी की शादी एक अच्छे घराने में हुई थी. काफी धनदौलत थी. पर मौसाजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. वे अपने मांबाप के अकेले बेटे और मौसी से उम्र में काफी बड़े थे. उन के स्वास्थ्य की सलामती के लिए घर में पूजापाठ चलते रहते. वृंदावन से एक गुरुजी का भी आनाजाना था. वे कुछ दिन वहीं रुकते और सब सदस्य उन के आदेशों का पालन करते. गुरुजी को भगवान जैसा पूजा जाता था. उन के आदेश को सब पत्थर की लकीर मानते थे.

मौसी से जो भी कार्य मौसाजी के स्वास्थ्य के लिए करने को कहा जाता, मौसी पूरे यत्न से करतीं. मुझे याद है एक बार गुरुजी ने कड़ाके की सर्दी में उन्हें रात में मिट्टी की 1001 गौरी की पिंडलियां बनाने के लिए कहा तो इतनी छोटी उम्र में भी मौसी ने नानुकुर किए बिना बना दीं. लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. उन के रत्न भी मौसाजी को नहीं बचा पाए.

किसी ने कहा कि बहुत छोटी है, दूसरा विवाह करा दो, तो किसी ने सती होने की सलाह दी. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

गुरुजी ने कहा कि इसे भगवान की सेवा में लगा दो. सब को वही सही लगा.

एक यक्ष प्रश्न यह भी था कि संतान न होने की वजह से इतनी बड़ी जायदाद को कौन संभालेगा? परिवार वालों ने रिश्तेदारी में से ही एक लड़का गोद ले लिया और अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ससुराल वाले मौसी की तरफ से उदासीन हो गए. घर को वारिस की जरूरत थी. यह जरूरत पूरी होते ही मौसी की हैसियत नौकरानी से कुछ ही ज्यादा रही. फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा. वे सिर्फ शांतिपूर्वक रहना चाहती थीं.

दिन बीतते चले गए और लोगों का व्यवहार मौसी से बदलता चला गया. एक दिन वृंदावन से गुरुजी ने संदेश भिजवाया कि बहू को गुरुसेवा के लिए वृंदावन भेज दो, पुण्य मिलेगा.

घर के सभी सदस्यों ने बिना सोचविचार किए उन्हें वृंदावन भेज दिया. हमेशा की तरह मौसी ने भी बिना कुछ कहे बड़ों की आज्ञा का पालन किया. वैसे भी एक हकीकत यह भी है कि आज भी बहुत सी विधवाओं को वृंदावन में भीख मांगते देखा जा सकता है. पर मौसी को एक आश्रम में आश्रय मिल गया. अब मौसी कुछ दिन वृंदावन और कुछ दिन अपने घर रहतीं.

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रुपएपैसों की कोई कमी नहीं थी. इसलिए गुरुजी के कहने पर वृंदावन में एक बड़ा सा आश्रम बनवा दिया गया. धीरेधीरे मौसी का वृंदावन से आना बंद हो गया और वे उसी आश्रम में एक कमरा बनवा कर रहने लगीं. कहीं न कहीं लोगों का बदलता व्यवहार और नजरिया इस का एक बड़ा कारण रहा.

कभीकभी मम्मी की और मौसी की फोन पर बात हो जाती. पर बात करने के बाद मां बहुत दुखी रहती थीं. एक दिन में पस्थितियां कुछ ऐसी बन गई कि मां ने गुस्से में वृंदावन जाने का निश्चय कर लिया और फिर घर से चल दीं. पर भाई ने उन्हें अकेले नहीं जाने दिया और वह भी उन के साथ कुछ दिनों के लिए वृंदावन चला गया. मां को मौसी से मिल कर बहुत खुशी हुई. पर मौसी ने उन्हें यहां 2 दिन से ज्यादा रुकने नहीं दिया.

मौसी ने कहा, ‘‘इस तरह से नाराजगी में घर छोड़ कर तूने सही नहीं किया, सुधा. मेरी बात कड़वी लगेगी पर स्त्री को हमेशा एक संरक्षण की जरूरत पड़ती है. शादी से पहले पिता और भाई, शादी के बाद पति और बुढ़ापे में बेटा. समाज में इस से इतर स्त्री को सम्मानपूर्वक जीने का हक नहीं मिलता. आगे से यह गलती दोबारा मत दोहराना. अकेली औरत का दर्द मुझ से ज्यादा कौन समझ सकता है?’’

वापसी में मां ने भाई से कहा, ‘‘बेटा, मौसी के चरणस्पर्श करो.’’

मगर भाई ने पैर छूने से इनकार कर दिया. मां को बहुत बुरा लगा. मौसी ने यह कह कर कि बच्चा है भाई के सिर पर हाथ रखा. लेकिन भाई ने उन का हाथ झटक दिया. शायद मौसी भाई की आंखों में अपने लिए नफरत साफ देख पा रही थीं. इसलिए उन्होंने मां को गुस्सा करने नहीं दिया. शांत रहने का आदेश दे कर बिदा करा.

घर आ कर मां और भाई में बहुत कहासुनी हुई. मां मौसी के खिलाफ कुछ सुनना नहीं

चाहती थीं, पर भाई था कि एक ही बात की रट लगाए हुए था, ‘‘वह मौसी नहीं वेश्या है, वेश्या?’’

यह सुनते ही मां ने तड़ाक से एक थप्पड़ जड़ दिया.

इस पर भाई ने गुस्से में कहा, ‘‘आप चाहे कुछ भी कहो, मारो, लेकिन यह एक कड़वी हकीकत है, जिसे आप झुठला नहीं सकतीं. वह वेश्याओं का अड्डा है. वहां सब तरह का धंधा होता है.’’

मां ने चीख कर कहा, ‘‘बस…बहन है वह मेरी. मां समान है. मैं उस के खिलाफ एक शब्द नहीं सुनना चाहूंगी.’’

इस पर भाई ने कहा, ‘‘इन 2 दिनों में मैं ने वहां जो देखा या मुझे बताया गया, तो क्या वह सब झूठ है?’’

‘‘हां, सब झूठ है. होगा सच औरों के लिए पर मेरी मां समान बहन के लिए नहीं. अगर आज के बाद उन के लिए एक भी शब्द बोला, तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

उन दोनों के बीच की कहासुनी सुन कर हम लोगों को बहुत डर लग रहा था. पर जैसे भाईर् भी जिद पर उतर आया था. उस ने कहा, ‘‘आप के लिए होगी मां. मेरे लिए तो…’’

मां बीच में ही बोल पड़ीं, ‘‘बस चुप रहो. मैं एक भी शब्द नहीं सुनना चाहती.’’

भाई गुस्से से वहां से चला गया. झगड़ा खत्म नहीं हो रहा था. मां ने कई बार उसे समझाना चाहा, लेकिन वह भी जिद पर अड़ा रहा. शायद उस के मानसपटल पर सबकुछ चिह्नित हो गया था. मां ने एक बार फिर उसे समझाने की नाकाम कोशिश की.

इस पर उस ने कहा, ‘‘चलो अब बात छोड़ो. अभी मेरे साथ वृंदावन चलो. मैं आप को उन सब लोगों से मिलवाता हूं, जिन्होंने मुझे ये सब बताया.’’

तभी अचानक मौसी का फोन आ गया. मां के सवाल करने पर मौसी रो पड़ीं और फिर बोलीं, ‘‘जब मुझे भेजने का निर्णय लिया गया था तब किसी ने भी नहीं रोका. तब कहां थे सब? यह निर्णय तो समाज का ही था. जितने मुंह उतनी बातें. एक अकेली औरत को क्या नहीं सहना पड़ता? सब का सामना करना आसान नहीं है?’’

‘‘इस जीवन से तो अच्छा मरना है, जीजी,’’ मां ने कहा.

‘‘क्या मरना इतना आसान है सुधा?’’ मौसी ने पूछा.

कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर मौसी ने ही चुप्पी को तोड़ा और कहा, ‘‘सुधा, इस बात की वजह से अपने घर में क्लेश मत रखना. हां, यहां दोबारा मत आना और न ही कोई पत्र व्यवहार करना.’’

‘‘पर… जीजी…’’ अभी मां कुछ पूछतीं उस से पहले ही मौसी ने कहा, ‘‘तुझे मेरा वास्ता.’’

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शायद मां में इतनी हिम्मत नहीं थी कि मां समान बहन की बात न मानें. खैर, बात आईगई हो गई. महीनों या कहो सालों तक न तो मां ने ही फोन करना ठीक समझा और न ही मौसी का फोन आया.

कुछ सालों बाद एक पत्र से पता चला कि मौसी बहुत बीमार हैं और इलाज के लिए दिल्ली गई हैं. तब मां से रहा नहीं गया और उन्होंने भाई के सामने मौसी से मिलने की इच्छा जताई. भाई खुद मां को मौसी से मिलवाने के लिए दिल्ली ले गया. मौसी और मां मिल कर बहुत रोईं. मौसी को कैंसर बताया गया था और वह भी लास्ट स्टेज का.

मौसी की हालत देख मां रोए जा रही थीं. तब कमला मौसी ने नर्स को कमरे में बाहर जाने को कहा और मां से बोलीं, ‘‘सुधा, पूछ क्या पूछना चाहती थी?’’

मां की रूलाई फूट गई. शब्द नहीं निकल रहे थे. मौसी ने अपने जर्जर शरीर से बैठना चाहा पर नाकामयाब रहीं. भाई दूर खड़ा सब देख रहा था. उस ने आगे बढ़, मौसी को सहारा दे कर बैठाया. कमला मौसी ने हाथ से इशारा करते हुए कहा, ‘‘आशू बैठ. नाराज है न मौसी से? सुधा तेरे सभी सवालों के आज जवाब मिल जाएंगे. तू जानना चाहता है न कि कितनी सचाई है इस आशू की बातों में?’’ उन की सांस उखड़ने लगी थी.

मां ने कहा भी, ‘‘मुझे कुछ नहीं जानना. आप शांत रहो.’’

मौसी ने कहा, ‘‘अकेली स्त्री का दर्द बहुत बड़ा होता है. हां मैं अछूती नहीं… सुधा कड़वी सचाई यह है कि यह जो इज्जत, शीलशुचिता, शब्द हैं न, जिन की वजह से बारबार स्त्रियों को कमजोर किया जाता है असल में औरतों के शोषण की सब से बड़ी वजह शायद यही हैं.

‘‘आज भी वह इस तथाकथित चारित्रिक बंधन से मुक्त नहीं हो पाई है. जब मैं जा रही थी, तो किसी ने मुझे हक से रोका भी तो नहीं था. कोई कहता तो सही कि हम मर गए हैं क्या? तुम कैसे जा सकती हो, अपना घर छोड़ कर? लेकिन ऐसा नहीं हुआ. किसी ने भी तो मेरे लिए दरवाजे नहीं खोले. मैं एकदम इतनी पराई हो गई सब के लिए. यह शायद मेरे औरत होने की सजा थी.’’

कुछ देर सुबकने के बाद वे फिर बोलीं, ‘‘आज सब मुझ पर ऊंगलियां उठा रहे हैं. जिन लोगों ने, जिस समाज ने भेजा, वही पीठ पीछे हंसता था, बातें बनाता था. पता है एक महिला अपने चरित्र पर उठती ऊंगली आज भी बरदाश्त नहीं कर पाती और शायद यहीं वह चूक जाती है. यही वजह उस के मानसिक और शारीरिक शोषण का कारण होती है.

‘‘हां, आश्रम में सबकुछ होता है. लेकिन मेरे लिए यह वेश्यालय नहीं. वह आश्रम तो मुझ जैसी और भी कई औरतों के लिए एक आश्रय है. मैं ने उन्हें गुरु माना है. वही मेरे सबकुछ हैं. बहुत सी बार स्थितियोंवश जब 2 लोग जुड़ते हैं तब उस समय एक भावनात्मक संबंध जुड़ता है जो शारीरिक संबंध का रूप ले लेता है. वैसे भी अपनों ने तो मुंह मोड़ लिया था. कहां जाती? ससुराल वालों ने पीछा छुड़ाना चाहा तो मायके वालों का भी तो साथ नहीं मिला… किस ने ढोना चाहा इस बोझ को? बोलो? ऐसे में गुरुजी ने ही सहारा दिया, आश्रय दिया.

‘‘सहारा देने वाला ही मेरे लिए सबकुछ होता होगा. आश्रम में मेरे जैसी न जाने कितनी बेसहारा औरतों को संरक्षण तो मिल जाता है. पति की मृत्यु के बाद तो कुछ लोगों ने कहा कि इस लड़की को मर जाना चाहिए. अब यह जी कर क्या करेगी? पर… मेरे अंदर इतनी शक्ति नहीं थी, जो मैं अपने प्राण त्याग देती. कहना बहुत आसान होता है पर करना बहुत मुश्किल. अपनेअपने गरीबान में झांक कर देखो सब,’’ कहतेकहते फफक कर रो पड़ीं.

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फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद आगे बोलीं, ‘‘सत्य की भूख तो सब को होती है, लेकिन जब यह परोसा जाता है, तो बहुत कम लोग इसे पचा पाते हैं, सुधा. अकेली औरत को हजारों बुनियादी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और इसी कारण उसे कई अत्याचारों, शोषण और प्रतिरोध करने पर दमन का शिकार होना पड़ता है.

‘‘मुझे मालूम है पति के साए से दूर औरत को वेश्या ही समझा जाता है. आखिरकार इस पुरुषप्रधान समाज में स्त्री को एक देह से अलग एक स्त्री के रूप में देखता ही कौन है? यहां तो, स्त्री के कपड़ों के भीतर से नग्नता को खींचखींच कर बाहर लाने की परंपरा है. नग्नता और शालीनता के मध्य की बारीक रेखा समाज स्वयं बनाता और स्वयं बिगाड़ता है. हर औरत इस दलदल में हमेशा फंसा महसूस करती है. स्त्री की मुक्ति केवल देह की मुक्ति है? मेरी जिंदगी क्या है? मैं तो एक टूटा हुआ पत्ता हूं. न मेरा कोई आगे, न पीछे. क्या पता एक हवा का झोंका कहां फेंक दे?’’

उस दिन मां और मौसी घंटों रोती रही थीं. भाई को भी अपने कहे शब्दों पर बहुत अफसोस हुआ था. मां से इस मुलाकात के बाद मौसी का मन हलका हो गया था शायद इतना हलका कि उस के बाद उन की सांसें हमेशा के लिए गईं.

नायाब नुसखे रिश्वतबाजी के

रिश्वत के लेनदेन की भूमिगत नदी न जाने कब से बहती चली आ रही है. पत्रंपुष्पं से आरंभ हुई रिश्वत की यह धारा अब करोड़ों के कमीशन की महानदी में बदल चुकी है. रिश्वत के मामले में भारतीय समाज ने ही क्या पूरे विश्व ने धर्म को भी नहीं बख्शा. अपने किए पापों के परिणाम से बचने के लिए हम तथाकथित देवीदेवताओं को रिश्वत देते हैं. इच्छित फल पाने के लिए सवा रुपए से ले कर सवा लाख तक का प्रसाद और दक्षिणा चढ़ाते हैं जो रिश्वत का ही एक रूप है. थोड़ी सी भेंट चढ़ा कर उस के बदले में करोड़ों की संपत्ति की चाह रखते हैं. इसी के मद्देनजर एक तुकबंदी भी बनाई गई है:

‘तुम एक पैसा दोगे, वह दस लाख देगा.’

अब बताइए कि इतनी सुविधा- जनक रिश्वत का कारोबार अपने देश के अलावा और कहां चल सकता है. वर्षा के अभाव में नदियां सूख कर भले ही दुबली हो जाएं लेकिन रिश्वत की धारा दिनप्रतिदिन मोटी होती जा रही है. रिश्वत को अपने यहां ही क्या, सारी दुनिया में किस्मत खोलने वाला सांस्कृतिक कार्यक्रम समझा जाता है. रिश्वत के दम पर गएगुजरों से ले कर अच्छेअच्छों तक की किस्मत का ताला खुलता है.

आप रिश्वत दे कर टाप पर पहुंच सकते हैं पर अगर रिश्वत देने में कोताही की तो टापते रह जाएंगे और दूसरों को आगे बढ़ता देख कर लार टपकाते रहेंगे. बिना रिश्वत के आप सांसत में पडे़ रहिए या फिर रिश्वत दे कर चैन की बंसी बजाइए. रिश्वत के लेनदेन का एक ऐसा शिष्टाचार, एक ऐसा माहौल शुरू हुआ है कि लोग अपना काम कराने के लिए सरकारी कार्यालयों में अफसर और कर्मचारियों को रिश्वत से खुश रखते हैं. चुनाव के दिनों में नेता जनता से वोट बटोरने के लिए जो वादे करते हैं, जो इनाम बांटते हैं वह भी रिश्वत की श्रेणी में ही आता है. इस तरह प्रजातंत्र में सारा भ्रष्टाचार शिष्टाचार का मुखौटा पहन कर गोमुखी गंगा हो जाता है.

रिश्वत के लेनदेन में पहले कोई डर नहीं रहता था. लोग बेफिक्र हो कर नजराने, शुकराने, मेहनताने आदि के नाम पर जो कुछ ‘पत्रंपुष्पं’ मिलता था, ले लिया करते थे और शाम को आपस में बांट लेते थे. अब लेनदेन अधिक हुआ तो पकड़ने और पकड़ाने वाले भी बहुत हो गए. पहले चुनावों में भी यही हाल था. नीचे से ले कर चुनाव आयोग तक चुनावी रिश्वत पर विशेष तवज्जो नहीं दी जाती थी. चुनाव आयोग नेताओं पर विश्वास किया करते थे.

अब तो बिना भ्रष्टाचार के चुनाव संभव ही नहीं है. चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित खर्च की सीमा से सौ गुना खर्च कर के चुनाव लड़ने वाला नेता चुनाव आयोग को खर्चे के हिसाब को व्यय की सीमा में बांध कर किस तरह पेश करता है, इस गणित को जान पाना मुश्किल है. जनता को दी गई तरहतरह की रिश्वत का तो कोई हिसाब ही नहीं होता है.

आजकल जिन्हें कुछ नहीं मिलता है या जो चुनाव हार जाते हैं वे दूसरों को पकड़वाने की फिराक में रहते हैं. कौन कब, किस को, कहां फंसा बैठे इस का ठिकाना नहीं. इसलिए रिश्वत में बचाव की जोखिम राशि शामिल होने से रिश्वत के भाव भी बढ़ गए हैं. कहा जाता है कि लेते हुए पकड़े जाओ तो कुछ दे कर छूट जाओ और देते हुए पकडे़ जाओ तो बोलो कि आप के पिताश्री का क्या दे रहे हैं, आप को चाहिए तो कुछ हिस्सा आप भी ले लीजिए.

इस के बाद इतना निश्चित है कि मिल जाने पर कोई माई का लाल कुछ भी एतराज नहीं करेगा. लेनेदेने वाले, पकड़ने और पकड़ाने वाले सभी अपने ही देशवासी हैं. अपनों को अपने ही मौसेरे भाइयों से क्या डर है. वे अपने ही भाइयों को कैसे पकड़ सकते हैं. पकड़ भी लेंगे तो प्यार जताने पर छोड़ देंगे.

रिश्वत लेने और देने वाले दोनों ही दबंग होते हैं. उन में वैज्ञानिक बुद्धि, सामाजिक चतुराई, राजनीतिक चालबाजी और धार्मिक निष्ठा होती है. ये लोग लेनदेन के नएनए आयाम, नएनए तरीके और नायाब नुसखे तलाशते रहते हैं. कहावत है, ‘तू डालडाल मैं पातपात’, पकड़ने वाले अपना जाल बुनते रहते हैं और रिश्वत लेने और देने वाले उस जाल को तोड़ने और बच निकलने की तरकीबें ईजाद करते रहते हैं. जैसे मारने वाले से बचाने वाला प्रबल होता है वैसे ही पकड़ने वाले से बचाने वाला भी प्रबल होता है.

दुनिया का रिवाज है कि मगरमच्छ कभी नहीं पकड़े जाते, न वे कभी मारे जाते हैं. उन्हें तो सिर्फ पाला जाता है. हमेशा छोटी मछलियां ही पकड़ी जाती हैं, मारी जाती हैं और निगली जाती हैं. मछली भी बड़ी हो तो बच जाती है, जैसे ह्वेल मछली. रिश्वत कई रूपों, कई नामों, कई प्रकारों और कई आयामों से ली जाती है. आइए, कुछ ऐसे ही नायाब तरीकों की चर्चा करें जो लेनदेन में इस्तेमाल होते हैं.

दानपात्र में डालिए

आप देवस्थानों पर जाएं तो जगहजगह गुल्लकनुमा दानपात्र रखे मिलेंगे. आप उन में देवीदेवताओं के लिए रिश्वत डालिए तो आप को फायदा होगा. समाज को भी उस का फायदा मिलता ही होगा तभी तो इतने पढ़ेलिखे लोग भी उन दानपात्रों को भरते हैं. इस से यही साबित होता है कि रिश्वत देने के मामले में मनुष्य ने धर्म को भी नहीं छोड़ा. धर्म के नाम पर रिश्वत दे कर पुण्य कमाने और स्वर्ग में अपनी सीट रिजर्व करने का रिवाज आजकल जोरों पर है.

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चूल्हे में डाल दो

हमारे समय में एक बहुत ही तेजतर्रार अफसर हुआ करते थे. लेकिन कुछ पा जाने पर उतने ही मुलायम हो जाया करते थे. जब कोई आदमी उन के पास दफ्तर में अपना काम कराने के लिए आता और कायदे के मुताबिक कुछ देने की पेशकश करता तो वह कहते, ‘चूल्हे में डाल दो.’ काम कराने वाला व्यक्ति घबरा कर उन के स्टेनो की शरण जाता और अफसर के गूढ़ वचनों का अर्थ पूछता. स्टेनो उस व्यक्ति को बगल में बने छोटे से कमरे में चूल्हा दिखाता. यह व्यक्ति उस ठंडे चूल्हे में इच्छित रकम डाल कर और स्टेनो को अपना काम बता कर बेफिक्र हो जाता. दिन भर इसी तरह चूल्हे में रुपए पड़ते रहते और शाम को अफसर और कर्मचारी बांट लेते. अब कोई बताए कि चूल्हे में फेंके गए और उठाए गए रुपयों पर किसी को क्या एतराज होगा. इस  में कौन माई का लाल किसे पकडे़गा.

शुकराना, नजराना और मेहनताना

काम कराने के लिए आदमी क्या नहीं करता. पहले समय में लोग कहा करते थे कि हुजूर, काम हो जाए तो खुश कर देंगे. काम हो जाने पर शुक्रिया अदा करने के नाम पर जो रकम दी या ली जाती थी उसे शुकराना कहा जाता था. काम कराने के लिए कुछ लोग नजर भेंट करते थे, वह नजराना कहलाता था.

कुछ लोग काम का मेहनताना वसूल करते थे जबकि काम करने के लिए सरकारी वेतन मिलता ही था. आज तो फाइल तलाशने, उठाने और उसे आगे बढ़ाने का भी मेहनताना लिया जाता है. आज भी न्याय मंदिरों में और सरकारी दफ्तरों में शुकराने, नजराने और मेहनताने की प्रथा बदस्तूर लागू है.

पंडेपुजारियों को चढ़ौत्री

आप त्योहारों पर देवस्थानों पर जाएं तो दर्शन करने वालों की लंबी कतारें लगी हुई मिलेंगी. आप लेनदेन जानते हैं तो आप को शार्टकट से दर्शन कराए जा सकते हैं. अगर समझ नहीं है तो पब्लिक की लाइन में लगे रहिए, कभी न कभी दर्शन हो ही जाएंगे.

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और अब सेवा शुल्क

आज जब सरकार ने भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को पकड़नेपकड़ाने का महकमा ही खोल दिया है तो लेनेदेने वाले भी कम नहीं हैं. सरकार तो जनता की बनाई है अत: सरकार की अक्ल से बड़ी तो जनता जनार्दन की अक्ल है. लेनेदेने वालों ने भी अपने तौरतरीके और अस्त्रशस्त्र बदल लिए हैं. अब रिश्वत न ले कर सेवा शुल्क लिया जाता है. देने वाले देते हैं, लेने वाले लेते हैं और सब काम बेखौफ होते हैं. मियांबीवी राजी हों तो काजीजी को क्या पड़ी है कि दोनों के बीच कूदाफांदी करें. पकड़ने या पकड़ाने वाले भी तो सेवा करते हैं, अत: उन्हें भी सेवा शुल्क मिल जाता है और आप का मेवा सुरक्षित हो जाता है. कुछ मिले तो खा लेने में क्या हर्ज है.

सो भैया, अगर कुछ करना है या करवाना है तो मनमाफिक दीजिए और लीजिए और आज के शिष्टाचार में शरीफ हो जाइए. रिश्वत ही सारी मुसीबतों का ‘खुल जा सिमसिम’ है. अत: इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लीजिए और मौजमजे उड़ाइए और दूसरों को भी मौज उड़ाने दीजिए.

जितने लोग उतने तरीके

रिश्वत के लेनदेन के इतने तरीके हैं कि कहां तक गिनाएं. रिश्वत में कोई रूप देता है कोई राशि, कोई माल तो कोई मिल्कीयत. कुछ लोग अपनों से बड़ों के यहां सुबहशाम हाजिरी दे कर ही रिश्वत की भरपाई कर लेते हैं. चरण छूने की रिश्वत तो सब से बड़ी रिश्वत होती है जो सार्वजनिक रूप से ली और दी जा सकती है. कुछ अफसर अपने दफ्तर के आंगन में देवस्थान बनवा लेते हैं और काम कराने आने वालों से चढ़ौत्री चढ़वाते हैं. शाम को सारी चढ़ौत्री घर पहुंच जाती है. एक तथाकथित साहित्यकार तो संपादकों को अपनी रचना भेजते समय पत्र में संपादकजी को चरण स्पर्श लिखते थे और इसी रिश्वत के बल पर वह सभी पत्रपत्रिकाओं में सितारे की तरह चमके.

भेंट का समय

कई राजनेता, अफसर अपने दफ्तर और बंगले में भेंट का समय लिखवा कर तख्ती टांगे रहते हैं. मिलने वाले आते हैं, उन के निजी सहायकों से पूछते हैं कि उन्हें साहब या नेताजी से मिलना है. निजी सहायक भी तो ऐसे लोगों के ऐसे ही हुआ करते हैं, सो वे भी सामने टंगी हुई तख्ती की तरफ इशारा कर समझा देते हैं कि भैयाजी, भेंट का समय लिखा है, मिलने का नहीं. अगर कुछ भेंट लाए हैं तो दीजिए और मिल आइए वरना मिलने की कहां और किसे फुरसत है. जिसे काम कराना होता है वह भेंट चढ़ा कर मिल लेता है. जो भेंट नहीं चढ़ाता वह अपनी बलि भी चढ़ा दे तब भी काम नहीं होता. कभी होता भी है तो तब तक वह इतना खर्च कर चुका होता है जितने में 2 बार भेंट दी जा सकती थी. कभीकभी तो बिना भेंट चढ़ाए तब काम होता है जब मिलने वाला दुनिया से कूच कर चुका होता है.

मुन्ने से मिलिए

अपने देश में मुन्नों की बड़ी महिमा है. देश में इसलिए मुन्नों की भरपूर फसल उगाई जाती है. कई सच्चे और ईमानदार माने जाने वाले अपने मुन्नों की मार्फत वारेन्यारे कर रहे हैं. राजनीति की कुरसी पर भले ही बाप विराजमान हैं लेकिन उन के मुन्ने राज कर रहे हैं. हम लोग तो पक्के ईमानदार हैं और लेनदेन में कोई विश्वास भी नहीं रखते हैं. अब अगर हमारा मुन्ना कुछ करताकराता है तो उस के तो खेलनेखाने के दिन हैं. ऐसे ही तथाकथित ईमानदार लोग जो किसी पद पर होते हैं, मिलने वालों को अपने मुन्नों से मिलवाते हैं. मुन्नों से ओ.के. रिपोर्ट मिलने पर काम हो जाता है. जो मुन्ने को ही खुश न कर पाया वह मुन्ने के बाप को क्या खुश करेगा. फिर उस का काम कैसे हो सकता है. मुन्ने की खुशी में ही साहब की खुशी है.

वजन रखना होगा

काम कराने के लिए आजकल दफ्तरों में फाइल पर वजन रखने की बात कही जाती है. दूसरी चीजें तो वजन से दबती हैं लेकिन फाइल पर वजन रखने से वह फुर्र से उड़ती है.

फाइलों के बारे में विज्ञान का गति सिद्धांत लागू नहीं होता. फाइल पर जितना अधिक वजन रखेंगे उस की गति उतनी ही तेज होती जाएगी और अफसर से हस्ताक्षर करा कर वापस आ जाएगी. वजन रखने वाला व्यक्ति अपना काम करा कर खुशीखुशी चला जाता है. वजन न रखने पर फाइलों पर वर्षों तक निर्णय और हस्ताक्षर नहीं हो पाते हैं. इस तरह लालफीताशाही में फंस कर आप भी फीते की तरह हो जाते हैं.

कुछ लाए हो

हम ने एक नामीगिरामी अफसर ऐसे देखे हैं जो काम कराने के लिए आए लोगों से मिलते ही प्रश्न दागते थे, ‘कुछ लाए हो या यों ही चले आए.’ काम कराने वाला अगर समझदार होता तो नजराना हाजिर कर देता, जिसे वह फौरन डब्बे में रखवा लेते.

उस का काम बेझिझक, बेझंझट हो जाता. अगर मिलने वाला सीधा या शातिर होता और अफसर से पलट कर पूछ बैठता कि सर, क्या लाना था? तो वह फट से कहते, ‘अरे भाई, मेरा मतलब जरूरी कागजात वगैरह से है.’ जाहिर है कि सारे कागज और पूरी जानकारी देने पर ऐसे अनाड़ी लोगों का काम कैसे हो सकता था. पता लगा कर जब अगली बार वह कुछ न कुछ लाता तभी मामला आगे बढ़ता.

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अपने लिए नहीं, ऊपर वालों के लिए

लेने वाला कभी अपने लिए या अपने नाम पर नहीं लेता है. वह तो ऊपर वाले के नाम पर लेता है. लेने वाले को तो कुछ नहीं चाहिए. वह बेचारा तो काम करने के लिए तड़प रहा है.

पैसा तो उसे अपने ऊपर वाले को देना है. लेने वाला तो सतयुगी जीव है उसे तो ऊपर वाले के लिए लेना पड़ता है तभी निर्णय होता है. देने वाले

को झख मार कर देना ही पड़ता है वरना वह नीचे और ऊपर वालों के चक्कर में फंस कर चक्कर ही काटता रहेगा.

पत्रंपुष्पं के रूप में

कुछ लोग काम कराने के लिए पत्रंपुष्पं के रूप में कुछ दियालिया करते हैं. अपने यहां रिश्वत लेनेदेने की किसे फुरसत है.

इस जमाने में अफसर और नेता ही सबकुछ होते हैं और कुछ उन से भी बडे़ होते हैं. देने वाला भी बड़ी नम्रता से पत्रपुष्प ही अर्पित करता है.

अब भला बताइए कि पत्रपुष्प अर्पित करने और स्वीकार करने की मनाही कहां लिखी है. इस में न तो भारतीय दंड संहिता की धारा ही

लग सकती है और न ही भ्रष्टाचार निरोधक कानून की कोई भी धारा या उपधारा.

डाली और डोली

डाली और डोली की रिश्वत तो आदिकाल से चली आ रही है. युद्ध बंद करने, संधि करने अथवा कर्ज माफ कराने के लिए डालियां और डोलियां सजा कर रिश्वत भेजी जाती थी. राजा- महाराजाओं के युग में तथा अंगरेजी राज्य में भी रिश्वत के रूप में दियालिया जाता है और धड़ल्ले से काम हो रहे हैं. डाली और डोली से लोगों ने ऊंचेऊंचे पद और प्रतिष्ठा प्राप्त की है.

कमीशन और कोड नंबर

जैसेजैसे युग बदल रहा है आदमी के तौरतरीके बदल रहे हैं. वैसे ही रिश्वत के तौरतरीके भी बदल रहे हैं. लेनदेन के आयाम बदल रहे हैं. अब रिश्वत न कह कर कमीशन या दलाली देते हैं और वह भी किसी माध्यम

से. सीधी रिश्वत तो नासमझ स्वीकार करते हैं.

चतुर लोग तो माध्यम के माध्यम से वारेन्यारे करते हैं. जो इन में से बड़े और समझदार हैं वे कोड नंबर से रिश्वत की राशि विदेशी बैंकों में जमा कराते हैं.  द्य

नारमल डिलीवरी बस ढूंढ़ते रह जाओगे

‘‘बधाई हो भाई, मिठाई हो जाए,’’ मैं ने कहा तो जैसे हमारे शब्दों को बाजू में सरका कर कहने लगे, ‘‘किसी अच्छे अस्पताल में दिखाना है. गांव में तो सुविधाएं थीं नहीं. हां, पखवाड़े में एक बार हाजिरी भरने के लिए आने वाली डाक्टर साहिबा ने अभी तक सबकुछ नार्मल ही बताया था पर यहां तसल्ली करना जरूरी है क्योंकि श्रीमतीजी को सीजेरियन से बहुत डर लगता है.’’

हम ने भी अपने सामान्य ज्ञान पर इठलाते हुए नजदीकी एक अस्पताल का जिक्र किया एवं शाम को साथ चलने का वादा भी कर दिया.

शाम को कतार में खड़ेखड़े डाक्टर साहिबा पर नजर पड़ते ही हम अंदर तक कांप गए. यह तो वही हैं जिन्हें 10 साल पहले अपनी बहन को इन्हीं परिस्थितियों में दिखाने हम सरकारी अस्पताल में गए थे. उस समय यह डाक्टरनी बड़ी जोर से चिल्ला पड़ी थी, ‘अभी तक जहां दिखाया है वहीं दिखाओ, अब यहां क्या करने आए हो. मेरे पास समय नहीं है.’

डाक्टर साहिबा के इस धाराप्रवाह श्री वचनों के बीच हम बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा पाए थे कि यह हमारी बहन है और कल ही ससुराल से आई है.

अपनी बारी आने तक हम आगे की रणनीति बनाते रहे कि हमें क्या कहना है, पर यह क्या, बर्फ की तरह ठंडी डाक्टर साहिबा ने पूरा चेकअप कर के मुसकराते हुए पूछा, ‘‘बाहर से ट्रांसफर हो कर आए हैं क्या? सब नार्मल है. चिंता की कोई बात नहीं है. हर 15 दिन पर नियमित चेकअप के लिए आते रहना.

डाक्टर साहिबा में आए इस क्रांतिकारी बदलाव को देख कर तो मानो हमारी सोचनेसमझने की क्षमता ही खत्म हो गई. आदमी इतना भी बदल सकता है? खैर, सब नार्मल है, सुन कर हम भी मित्र की खुशी में शामिल हो गए. लगेहाथ मित्र को अपने पूर्व अनुभव के आधार पर तसल्ली भी दे डाली कि इन डाक्टर साहिबा के 99 प्रतिशत केस नार्मल डिलीवरी के ही होते हैं.

निर्धारित समय के 2 दिन पहले डाक्टर साहिबा ने देख कर गंभीर आवाज में कह दिया कि भरती हो जाओ, आपरेशन करना पड़ेगा.

मित्र की आवाज, मुखमुद्रा और प्रश्नसूचक आंखों से निगाह चुराते हुए हम नर्स की शरण में पहुंचे तो वह भी बहुराष्ट्रीय कंपनी की वरिष्ठ बिक्री अधिकारी की तरह समझाने लगी, ‘‘देखिए, यह एक प्रेस्टिजियस अस्पताल है, यहां हम अपने मरीज की बेस्ट पौसिबल केयर करते हैं. हम किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेते हैं. हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हर डिलीवरी 100 प्रतिशत परफेक्ट हो और हर कस्टमर को पूरा सेटिस्फेक्शन मिले.

‘‘मैं खुद पिछले 3 सालों से यहां काम कर रही हूं पर औसतन 90-95 प्रतिशत डिलीवरी आपरेशन से होते देख रही हूं. इनफेक्ट, आजकल हमारी लाइफ स्टाइल, खानपान, रहनसहन, यहां तक कि ब्रीड ही ऐसी हो चुकी है कि नार्मल डिलीवरी में जान जाने का खतरा हमेशा बना रहता है.’’

‘‘यह बिलकुल सही कह रही हैं जनाब,’’ की आवाज के साथ एक भारी-भरकम हाथ हमारे कंधे पर आ पड़ा. मुड़ कर देखा तो वैज्ञानिक सोच वाले आधुनिक बुद्धिजीवी महाशय सामने खड़े मुसकरा रहे थे.

एक सेल्समैन की तरह पूरे आत्म-विश्वास के साथ वे पुन: बोले, ‘‘डरने की कोई बात नहीं है. इस अस्पताल में आधु-निक तकनीक का प्रयोग होता है तथा विश्व स्तर के सभी आधुनिक उपकरण यहां मौजूद हैं. रही बात खर्च की तो डाक्टर साहिबा बिल ही इस तरह से बनवा देंगी कि पूरा का पूरा आप के विभाग से आप को वापस मिल जाएगा. यह लोग इस मामले में एकदम ईमानदार हैं.’’

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‘‘लेकिन साहब, डिलीवरी नार्मल हो जाए तो इस का कोई मुकाबला ही नहीं होता है. अभी तक सबकुछ ठीक ही था. डाक्टर साहिबा कोशिश करें तो डिलीवरी नार्मल भी हो सकती है. हमारे परिवार वालों के विचार भी कुछ ऐसे ही हैं,’’ हमारे मित्र कुछ घिघियाते से बोले थे.

बुद्धिजीवी बोले, ‘‘अमां यार, इस साइबर एज में भी आप बैलगाड़ी युग की बातें कर रहे हैं. मौडर्न टाइम है भाई. अभी पिछले सप्ताह ही मैं विदेश टूर कर के आया हूं. वहां तो नार्मल डिलीवरी का कंसेप्ट ही खत्म हो गया है. हजारों में शायद ही एकदो नार्मल डिलीवरी होती हैं. आदमी मंगल पर पहुंच रहा है और आप हैं कि अभी तक जमीन के अंदर धंसे हुए हैं.’’

मित्र फिर घिघियाए, ‘‘भाई साहब, हमारे पूरे खानदान में ही नहीं बल्कि श्रीमती के परिवार में भी आज तक सभी डिलीवरियां नार्मल ही हुई हैं. किसी में आपरेशन की जरूरत ही नहीं पड़ी.’’

मित्र का मुंह लगभग दबाते हुए बुद्धिजीवी बोले, ‘‘यार, धीरे बोलो, अगर डाक्टर साहिबा ने सुन लिया कि आप ऐसे खानदान से आए हो तो आप का केस लेने से ही मना कर देंगी. अपने खानदान को कुछ तो प्रगतिशील बनाओ. जमाने के साथ चलना सीखो भाई. जिस कालोनी में आप रह रहे हैं वहां सभी ने इसी अस्पताल में डिलीवरी करवाई है, शायद ही कोई नार्मल डिलीवरी हुई हो. कम से कम अपने और अस्पताल के स्टेटस का तो खयाल करो,’’ वह एक पल को किसी मजे हुए नेता की तरह रुके फिर बोलना

शुरू किया, ‘‘यह कोई सरकारी खैराती अस्पताल तो है नहीं, एक हाइटेक अस्पताल है. अब तो इस क्षेत्र में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी कूदने वाली हैं जिन के अस्पताल को देख कर आप की आंखें चुंधिया जाएंगी. फिर तो सीजेरियन डिलीवरी पूरी तरह से स्टेटस सिंबल बन जाएगी.

‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां’, ‘स्टेटस’ जैसे शब्द कान में पड़ने के साथ ही हम अपनी सोचनेविचारने की ‘मुंगेरी’ आदत के चलते विचारों के महासागर में गोते लगाने लगे. अगर वास्तव में बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस क्षेत्र में आ पहुंचीं तो विज्ञापनों की बाढ़ के दबाव से सीजेरियन करवाना हर आदमी की मजबूरी हो जाएगी और नार्मल डिलीवरी तो बस जिद्दी दाग की तरह ढूंढ़ते रह जाएंगे. टेलीविजन पर विज्ञापन आएगा, ‘जो बीवी से करे प्यार वह सीजेरियन से कैसे करे इंकार’ या फिर सरकार ही समाचारों से पहले दिखलाने लगे कि विमला का बेटा टेढ़ामेढ़ा इसलिए पैदा हुआ कि उस ने नार्मल डिलीवरी करवाई थी, अगर स्वस्थ सुंदर बच्चा चाहिए तो भाई साहब सीजेरियन ही करवानी चाहिए.

कंपनियां भी ऐसा टीका विकसित कर लेंगी कि नार्मल डिलीवरी हो ही नहीं पाए. देश भर के तथाकथित क्लब और संस्थाएं पोलियो खुराक की तरह पैदा होते ही हर संतान को यह टीका लगा देगी. एक बार जनमानस पर सीजेरियन स्टेटस के रूप में स्थापित हुआ नहीं कि सामाजिक संबंधों में भूचाल सा आ जाएगा.

शादीसंबंधों में सब से पहले पूछा जाएगा कि लड़का नार्मल है या सीजेरियन. बायोडाटा के कालम में एक लाइन यह भी होगी कि क्या संतान सीजेरियन है? उच्च कुल के लोग पूरे परिवार को गर्व के साथ सीजेरियन बताएंगे. अगर कोई संतान गलती से नार्मल हुई तो मांबाप खिसियाते हुए कहेंगे बाकी भाई और बहन तो सीजेरियन ही हैं, बस, यही गलती से…

गांव से शहर लाते समय यदि रास्ते में नार्मली कुछ हो गया तो इस दुर्घटना को मातापिता छिपाएंगे या अपने बच्चे के भविष्य को देखते हुए दूर पलायन कर जाएंगे. ऐसे बच्चे बड़े होने पर ताना मारेंगे, ‘‘हमारे लिए आप ने किया ही क्या है? नार्मल डिलीवरी से दुनिया में हमें ले आए. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

नार्मल डिलीवरी आर्थिक दिवालि-एपन या मानसिक पिछड़ेपन का प्रतीक बन कर रह जाएगी.

प्रतिक्रियास्वरूप कुछ नेता और सामाजिक संगठन इन की रक्षा के लिए आगे आएंगे. जातियों के महासागर में एक और तलैया शामिल करवाएंगे. नया वर्ग संघर्ष पैदा होगा. समाज इन्हें हेय समझेगा और नेता इन्हें अल्पसंख्यक घोषित करवा कर विकलांगों की तरह इन के लिए आरक्षण कोटा निर्धारित कराएंगे. धारा ‘3’ का सदुपयोग करने का अधिकार भी इन्हें दिलवाया जाएगा. एक वर्ग सरकारी अस्पतालों में नार्मल डिलीवरी करवाने वाले डाक्टरों के खिलाफ प्रदर्शन कर जांच आयोग बैठाने की मांग करेगा तो दूसरी ओर शबाना आजमी टेलीविजन पर आ कर कहेंगी, ‘‘नार्मल को एबनार्मल न समझें, इन्हें प्यार दें.’’

आगे बढ़ते विचारों के अश्व को अचानक डाक्टर साहिबा के सप्तम स्वर ने झटके से रोक दिया. मित्र को सुनाते हुए सफाई कर्मचारी को कह रही थीं, ‘‘सरकारी अस्पताल समझ रखा है क्या? मुझे एकदम साफ चाहिए… क्रिस्टल क्लियर, नो कंप्रोमाइज.’’

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फिर बुद्धिजीवी महाशय से मैराथन तर्कवितर्क में उलझे मित्र की ओर ब्रह्मास्त्र चला दिया, ‘‘मुझे दिक्कत नहीं है पर कल को कुछ हो गया तो हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी,’’ इतना कह कर तेजी से डाक्टर साहिबा अंदर चली गईं. पीछेपीछे बुद्धिजीवी भी रुख्सत हो गए.

बस, मित्र और हम ने अभिमन्यु वाली हार मान ली. मैं ने भी सांत्वना दी. यार करवा भी लो वरना कुछ ऐसावैसा हो गया तो नातेरिश्तेदार और यही संतान बड़ी हो कर 100-100 ताने मारेगी.

बिल की च्ंिता में मित्र के पेट में मरोड़े उठने लगे. नर्स से पूछने पर पता चला 15-20 हजार रुपए का खर्च आएगा. अपनी किसी संस्था के लिए डाक्टर साहिबा से डोनेशन का चेक ले कर वापस आ रहे बुद्धिजीवी महाशय ने फिर समझाया कि अभी तो बड़े सस्ते में निबट रहे हो, बाद में बहुराष्ट्रीय अस्पतालों में तो यही काम लाखों में होंगे.

हम फिर सोचने लगे कि अगर महाभारत काल में ही यह व्यवस्था लागू हो जाती तो बेचारे धृतराष्ट्र तो बिल चुकातेचुकाते ही राजपाट लुटवा बैठते.

खैर, मित्र महोदय ने जैसेतैसे इस प्रकरण को निबटाया फिर तुरंत कसम खाई कि अब दूसरी संतान के बारे में कभी सोचूंगा भी नहीं.

 संजीव झा

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