हर मुद्दे पर खुल कर बोल रहे हैं राहुल गांधी

उत्तर प्रदेश में अपनी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सेना में अग्निवीर योजना, बेरोजगारी, अडानी, राम मंदिर और जातीय गणना पर खुल कर बोला. प्रदेश में इस यात्रा में पार्टी नेता प्रियंका गांधी को भी शामिल होना था, लेकिन तबीयत ठीक न होने के चलते वे शामिल नहीं हो सकी थीं.

16 फरवरी, 2024 को ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ ने देश के सब से ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में प्रवेश किया था. यह यात्रा बिहार से चंदौली के रास्ते उत्तर प्रदेश पहुंची थी, जहां यात्रा का तय कार्यक्रम ‘तिरंगा सैरेमनी’ हुआ, जिस में बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को तिरंगा सौंपा था.

इस मौके पर राष्ट्रीय महासचिव व प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे, कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा मोना और दूसरे कई नेता हाजिर रहे थे.

चंदौली पहुंच कर राहुल गांधी ने सैयद राजा शहीद स्मारक पर शहीदों को नमन किया. राहुल गांधी ने कहा, ‘‘एक विचारधारा भाई को भाई से लड़ाती है और आप की जेब से पैसा निकाल कर चुनिंदा अरबपतियों को दे देती है, वहीं दूसरी विचारधारा नफरत के बाजार में मुहब्बत की दुकान खोलती है और आप का हक आप को वापस लौटाती है.’’

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान राहुल गांधी ने लोगों से पूछा कि देश में फैली नफरत की क्या वजह है? इस पर जवाब मिला कि देश में फैल रही नफरत की वजह डर है और इस डर की वजह नाइंसाफी है.

आज देश के हर हिस्से में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लैवल पर नाइंसाफी हो रही है. देश में किसानों और गरीबों की जमीनें छीन कर अरबपतियों को दी जा रही हैं. महंगाई और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है.

मोदी सरकार की अग्निपथ योजना को नौजवानों के साथ धोखा बताते हुए राहुल गांधी ने कहा कि अग्निवीर को न कैंटीन सुविधा मिलेगी, न पैंशन मिलेगी और न शहीद का दर्जा मिलेगा. यह नौजवानों के साथ धोखा है.

मोदी सरकार अग्निपथ योजना इसलिए लाई, ताकि देश के रक्षा बजट से पैसा हमारे जवानों की रक्षा, उन की ट्रेनिंग और पैंशन में न जाए. रक्षा के सभी कौंट्रैक्ट अडानी की कंपनी के पास हैं. मोदी सरकार हिंदुस्तान के बजट का पूरा पैसा अडानी को देना चाहती है, इसलिए अग्निवीर योजना लाई गई.

राहुल गांधी ने आगे कहा कि मोदी सरकार चाहती है कि सब लोग ठेके के मजदूर बनें. नौजवानों को सेना, रेलवे और पब्लिक सैक्टर में नौकरी नहीं मिल रही, क्योंकि मोदी सरकार चाहती है कि नौजवान ठेके पर ही काम करें.

आज हिंदुस्तान में 2-3 अरबपतियों को पूरा फायदा मिल रहा है और नौजवानों का ध्यान भटका कर उन का भविष्य छीना जा रहा है. केंद्र में ‘इंडिया’ की सरकार आने पर पूरे हिंदुस्तान में खाली पड़े सरकारी पदों पर भरती की जाएगी.

राहुल गांधी ने आगे यह भी कहा, ‘‘कुछ ही दिनों पहले हम ने किसानों के लिए एमएसपी की लीगल गारंटी दी है. हम कानूनी गारंटी देंगे कि हिंदुस्तान के किसानों को सही एमएसपी दी जाए.

‘‘मैं आप से यह कहना चाहता हूं कि सामाजिक अन्याय हो रहा है, आर्थिक अन्याय हो रहा है, किसानों के खिलाफ अन्याय हो रहा है.’’

राहुल गांधी ने जनता से सवाल किया कि नरेंद्र मोदी ने किसानों का कितना कर्जा माफ किया?

जनता की भीड़ ने कहा, ‘जीरो. एक रुपया नहीं किया.’

राहुल गांधी ने दूसरा सवाल किया, ‘हिंदुस्तान के 20-25 अरबपतियों का कितना कर्जा माफ किया?’

भीड़ से जवाब आया, ‘16 लाख करोड़ रुपए.’

मीडिया पर तंज कसते हुए राहुल गांधी बोले, ‘‘हम ने किसानों का कर्जा माफ किया, 72,000 करोड़ रुपए हम ने माफ किए और उस टाइम सारे मीडिया ने कहा कि देखो, यूपीए की सरकार पैसा जाया कर रही है, किसानों को आलसी बना रही है. तो जब किसानों का कर्जा माफ होता है तो मीडिया कहती है कि किसानों को आलसी बनाया जा रहा है और जब नरेंद्र मोदी 15-20 लोगों का 16 लाख करोड़ रुपए का कर्जा माफ करते हैं, तो फिर ये एक शब्द नहीं कहते.’’

जनता की भीड़ ने कहा, ‘मोदी मीडिया, गोदी मीडिया एक शब्द नहीं कहता.’

जनता के यह कहने पर राहुल गांधी बोले, ‘‘तो इसी अन्याय के खिलाफ हम ने यह यात्रा निकाली है.’’

कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके राहुल गांधी ने आगे कहा कि मीडिया में कभी किसान या मजदूर का चेहरा नहीं दिखाई देगा. राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में अडानी, अंबानी, अरबपति, फिल्मी सितारे दिखे, लेकिन कोई गरीब, किसान, बेरोजगार, दुकानदार या मजदूर नहीं दिखा.

भागीदारी न्याय का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि देश में पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की आबादी 73 फीसदी है. मगर इन वर्गों की कहीं भी भागीदारी नहीं है.

इन वर्गों को कुछ नहीं मिल रहा है. यह नाइंसाफी है. जाति जनगणना से पता चलेगा कि देश में कितने पिछड़े, दलित और आदिवासी हैं. किस वर्ग के पास कितना पैसा है.

जाति जनगणना देश का ऐक्सरे है. इस से पता लग जाएगा कि सोने की चिडि़या का पैसा किस के हाथ में है. यह क्रांतिकारी कदम है. केंद्र में ‘इंडिया’ की सरकार आने पर पूरे देश में जाति जनगणना कराई जाएगी.

मंदिर दर्शन में न भटक जाए ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के 9वें दिन राहुल गांधी असम के बरगांव पहुंचे. यहां वे बोर्दोवा में संत शंकरदेव के जन्मस्थल पर दर्शन करने जाना चाहते थे. सुरक्षाबलों ने राहुल गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं को बरगांव में रोक दिया.

सुरक्षाबलों से बहस के बाद राहुल गांधी और बाकी कांग्रेसी नेता धरने पर बैठ गए. सभी को अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के बाद 3 बजे मंदिर आने के लिए कहा गया.

कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के मंदिर दर्शन को मुद्दा बना दिया. पुलिस ने गुवाहाटी सिटी जाने वाली सड़क पर बैरिकेडिंग कर दी. इस के बाद कांग्रेस समर्थक पुलिस से भिड़ गए. उन्होंने बैरिकेडिंग तोड़ दी. इस धक्कामुक्की में कइयों को चोटें भी आईं.

राहुल गांधी की ‘न्याय यात्रा’

18 जनवरी, 2024 को नागालैंड से असम पहुंची थी. 20 जनवरी, 2024 को यात्रा अरुणाचल प्रदेश गई, फिर 21 जनवरी, 2024 को फिर असम लौट आई.

इस के बाद यात्रा 22 जनवरी, 2024 को मेघालय निकली और अगले दिन यानी 23 जनवरी को एक बार फिर असम पहुंची.

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के बारे में राहुल गांधी ने कहा, ‘‘भाजपा देश में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अन्याय कर रही है. ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का लक्ष्य हर धर्म, हर जाति के लोगों को एकजुट करने के साथ इस अन्याय के खिलाफ लड़ना भी है.’’

राहुल गांधी मैतेई और कुकी दोनों समुदायों के इलाकों से गुजरे. उन्होंने कांगपोकपी जिले की भी यात्रा की, जहां पिछले साल मई में 2 औरतों को बिना कपड़ों के घुमाया गया था.

अपनी इस यात्रा के बारे में राहुल गांधी ने कहा था, ‘‘इस यात्रा को मणिपुर से शुरू करने की वजह यह है कि मणिपुर में भाजपा ने नफरत की राजनीति को बढ़ावा दिया है. मणिपुर में भाईबहन, मातापिता की आंखों के सामने उन के अपने मरे और आज तक हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री मणिपुर में आप के आंसू पोंछने, गले मिलने नहीं आए. यह शर्म की बात है.’’

मंदिर दर्शन विवाद में फंसे

66 दिनों तक चलने वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ देश के 15 राज्यों और 110 जिलों में 337 विधानसभा और 100 लोकसभा सीटों से हो कर गुजरेगी. इन राज्यों में मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, ?ारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं. राहुल गांधी जगहजगह रुक कर स्थानीय लोगों से संवाद करेंगे. इस दौरान राहुल 6,700 किलोमीटर का सफर तय करेंगे.

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ 20 मार्च, 2024 को मुंबई में खत्म होगी. मगर इस यात्रा के बीच ही 22 जनवरी, 2024 को मोदी और योगी सरकार द्वारा आयोजित अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम आ गया, जिस में कांग्रेस के नेताओं को भी बुलाया गया था.

कांग्रेस ने अपनी धर्मनिरपेक्ष नीति के उलट राम मंदिर न जाने के पीछे की वजह मंदिर का पूरा न बनना और राजनीति में धर्म का प्रयोग बताया. लेकिन इस को ले कर पूरी पार्टी 2 भागों में बंटी दिखी. एक तरफ केंद्रीय नेताओं ने राम मंदिर समारोह में हिस्सा लेने से मना किया, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूरी टीम प्रचारप्रसार के साथ अयोध्या गई, मंदिर दर्शन किया और सरयू में स्नान भी किया.

यही ऊहापोह राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में भी दिखी. राहुल गांधी की यह मुहिम भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नीतियों के खिलाफ है. भाजपा और संघ देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. कांग्रेस इस का विरोध करती आ रही थी.

ऐसे में मंदिर दर्शन और धार्मिक आस्था की बातों को इस यात्रा से अलग रखना चाहिए था, मगर राहुल खुद मंदिर जाने की जिद में धरने पर बैठ गए. उन्हें धर्मनिरपेक्ष नीतियों पर चल कर अपनी यात्रा जारी रखनी चाहिए थी, तो वे इस जिद पर अड़ गए कि उन्हें मंदिर जाना है. इस ने यात्रा में खलल डाल दिया.

धर्म से कैसे मिलेगा न्याय

कांग्रेस सौफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रही है. इस से उस की धर्मनिरपेक्ष छवि प्रभावित होगी और वह धर्म की राजनीति का विरोध पुरजोर तरीके से नहीं कर पाएगी. इस समय बहुत जरूरी है कि कांग्रेस भाजपा और संघ के हिंदू राष्ट्र के खिलाफ लोगों का आह्वान करे.

आज भी तमाम मिले वोटों के मुकाबले आधे से कम वोट ही भाजपा को मिलते हैं. ऐसे में यह साफ है कि देश के आधे से ज्यादा लोग भाजपा की धर्म वाली नीतियों से खुश नहीं हैं.

दुनिया में जितने लोग या देश धार्मिक कट्टरता की राह पर चल रहे हैं, वे विकास की राह पर बहुत पीछे हैं और आतंकी गतिविधियों के शिकार हैं. पाकिस्तान और अफगानिस्तान इस का मुख्य उदाहरण हैं.

पाकिस्तान और बंगलादेश की तुलना करें, तो पाकिस्तान के मुकाबले कम कट्टरता वाला बंगलादेश ज्यादा तरक्की कर गया है. बंगलादेश की प्रति व्यक्ति आय 2,688 डौलर भारत की 2,085 डौलर से (साल 2022 के आंकड़े) कहीं ज्यादा है. भाजपा और संघ ने जब से देश को मंदिर आंदोलन में धकेला है, उस के बाद से देश का धार्मिक ढांचा ही प्रभावित नहीं हुआ है, बल्कि यहां की माली हालत भी प्रभावित हुई है.

साल 2007 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 1,070 डौलर थी. उस समय भारत की प्रति व्यक्ति आय बंगलादेश की 550 डौलर से दोगुनी थी. मतलब, धर्म से न तो माली तौर पर प्रगति हो सकती है और न ही न्याय मिल सकता है. अगर धर्म से ही लोगों को न्याय मिल जाता, तो आईपीसी बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

धर्म औरतों की आजादी की बात नहीं करता है. औरतों की सारी परेशानियां धर्म के ही कारण चलती हैं. धार्मिक कुप्रथाएं और रूढि़यां औरतों के पैरों में बेडि़यों की तरह जकड़ी हैं. दहेज प्रथा, सती प्रथा, पेट में लड़की की हत्या, विधवाओं की बढ़ती संख्या इस के सुबूत हैं. धर्म ने औरतों को पढ़नेलिखने और नौकरी करने के हक से दूर कर उन्हें कम उम्र में पत्नी के रूप में मर्द की गुलाम और बच्चा पैदा करने वाली मशीन बना दिया है.

धार्मिक सत्ता से देश को आजादी दिलाने का काम कांग्रेस की जिम्मेदारी है. अब अगर कांग्रेस ही मंदिरमंदिर घूमेगी तो वह भाजपा और संघ की राह पर चल कर धर्म की सत्ता को मजबूत करने का ही काम करेगी. राहुल गांधी

11 दिन की तपस्या करने में होड़ न करें. वे धर्म के शिकंजे में बारबार फंसने से खुद को बचाएं.

राहुल गांधी को चाहिए कि वे अपनी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ को मजबूत कर देश को धार्मिक सत्ता से बाहर निकालने का काम करें, ताकि देश की गरीब जनता को रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मिल सके.

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न, पिछड़ों और दलितों को फंसाने का खेल

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न सम्मान नरेंद्र मोदी सरकार के हाथों से मिलना कोई ताली बजाने वाली बात नहीं है. यह सिर्फ मई, 2024 के चुनावों की दांवपेंच वाली बात है. नरेंद्र मोदी सरकार उसी तरह कुरुक्षेत्र का युद्ध जीतने की कोशिश कर रही है जैसे कृष्ण ने महाभारत की कहानी में किया था. कृष्ण ने युद्ध से हिचक रहे अर्जुन को पट्टी पढ़ाई, दांवपेंच खेले, अपनों को कौरवों की तरफ भेजा, कौरवों के साथियों को फोड़ा, नियमरिवाज ताक पर रखे ताकि कौरव और पांडव दोनों के परिवार खत्म हो जाएं.

आज जो हो रहा है वह पिछड़ों और दलितों को फंसाने के लिए हो रहा है. कर्पूरी ठाकुर से भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस को कोई प्रेम नहीं है क्योंकि उन्होंने बिहार के अमीर, जमींदार, ऊंची जातियों के दबदबे को खत्म करने की बात उठाई थी. उन्होंने भारतीय जनसंघ (तब भारतीय जनता पार्टी का यही नाम था) और कांग्रेस के खिलाफ दबीकुचली जनता को जमा किया था.

आज भारत रत्न दे कर उन्हें असल में मरने के बाद इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कांगे्रसी वल्लभभाई पटेल और सुभाषचंद्र बोस को किया गया था. मंदिर की राजनीति भी पुरानी हार के गड़े मुरदों के पुतले खड़े कर के वोट जमा करना है. भारतीय जनता पार्टी हमेशा दूसरे घरों में तोड़फोड़ करा कर सत्ता में बने रहने की कोशिश करती है. यह हमारी धार्मिक कला है जिस में घरों में आने वाला पुरोहित बड़ेबड़े शब्दों में जजमान की तारीफ करता है और पड़ोसियों के राज जगजाहिर करता है ताकि उसे मोटी दक्षिणा मिल सके. भारतीय जनता पार्टी इसी बात को राष्ट्रीय पैमाने पर कर रही है और कर्पूरी ठाकुर के गुणगान कर के अब बिहार के पिछड़ों से वोट दक्षिणा में मांग रही है.

यह काबिलेतारीफ है कि धर्म के दुकानदार आसानी से हार नहीं मानते. ईसाई मिशनरी हों या इसलामी मौलवी या बौद्ध भिक्षु या निरंकारी सिख, उन्होंने धर्म के नाम पर हर तरह की आफतें झेली हैं ताकि इन के भाईबंदों को हलवापूरी मिलती रहे. यही वजह है कि 2000 साल की गुलामी के बावजूद गांवों से दक्षिणा देने का रिवाज कभी कम नहीं हुआ. जो हिंदू अपने धर्म को छोड़ कर गए, उन्हें नए धर्म में उसी तरह दक्षिणा देना शुरू करना पड़ा.

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर उन के परिवार वालों को राष्ट्रपति भवन में बुला कर फोटो हर जगह छपवा और चिपकवा दी जाएगी पर चुनावों के बाद कर्पूरी ठाकुर ने जो कहा था, जो करना चाहा था वह कभी नहीं किया जाएगा. हमारे दक्षिणापंथी कभी भी राजपाट पिछड़ों व दलितों के हाथों में नहीं जाने देंगे, चाहे वे पढ़लिख जाएं, पार्टियां बना लें, चुनाव जीत जाएं. पार्टियों में तोड़फोड़, मुकदमे, जीभर के पैसा लुटाना इसीलिए किया जाता है न.

कागजी घोड़ों पर दौड़ती सरकारी योजनाएं

देश के किसानों का क्या हाल है यह इस बात से ही पता चलता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीति भुनाने के लिए जो प्रधानमंत्री किसान योजना शुरू की थी उस में 10 करोड़ किसानों ने हिस्सा ले लिया: कितने पैसे के लिए? महज 6,000 सालाना के लिए. इस योजना में सरकार ने बैंक खाते में पैसे भेजने होते हैं और इस का मतलब 2,000 रुपल्ली के लिए हर 3 माह में भूखा नेता किसान बैंक मैनेजरों की मिन्नतें करे और पैसे निकालने के लिए हाथ जोड़े.

किसानों के लिए 6,000 रुपए सालाना भी बहुत होते हैं यह वे कहां जानें जो 8,000 करोड़ के विमान में सफर करते हैं और जिन के 1 मील चलने पर लाखों खर्च हो जाते हैं. जो बंदोबस्त राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री फकीरी के हाल में करते हैं यह किसी से छिपा नहीं है.

प्रधानमंत्री किसान योजना के 10 करोड़ शुरू किसानों में से अब 8 करोड़ रह गए हैं क्योंकि सरकार भुगतान का वादा करती है, करती नहीं. कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं. आधारकार्ड बनवाओ. यह गांव में तो नहीं बनेगा न. बस का पैसा खर्चा कर के कसबे में जाना होगा जहां इंटरनैट कभी चलेगा कभी नहीं. आधारकार्ड बनाने वाला मुफ्त में तो बनाएगा नहीं. दिनभर खाने के लिए पैसे चाहिए होंगे. फिर बैंक में खाता खोलना होगा. यह भी अनपढ़ों के लिए कहां आसान है. जब पैसा आने वाला हो चाहे महज 6,000 रुपल्ली हों, बीच में घात मारने वाले बहुत बैठे होंगे.

खाता चालू रहेगा तो ही तो पैसे आएंगे. बैंक मैनेजर भी अपनी मरजी से कह सकता है कि डौरमैंट यानी सोए हुए खाते को फ्रीज यानी गाड़ा जा सकता है. रिजर्व बैंक औफ इंडिया तुगलकी फरमान जारी करता रहता है जो इस किसान के खाते पर भी लागू होते हैं जिस के पास बैंक में आते ही सालभर में 6,000 रुपल्ली हैं. बैंक का स्टाफ इस में से हिस्सा न मांगे तो वह इस देश का भक्त नागरिक नहीं है. रिश्वत लेना और एक हिस्सा मंदिर में देना हर सरकारी नागरिक का पहला फर्ज है जिसे पूरी तरह निभाया जाता है.

दानेदाने को मुहताज छोटे किसानों का हाल क्या है यह किसी भी गांव की चौपाल, गांव के पास बसअड्डे या कचहरी में दिख जाता है. जिन के घरों में कोई शहर में नौकरी कर ले या कोई सरकारी नौकरी पा जाए उस की बात दूसरी पर किसानी जिस पर देश की 50 फीसदी जनता निर्भर है, फक्कड़ है. तभी तो वोटों की खातिर यह योजना शुरू की गई.

असल में इस तरह की सरकारी स्कीमों का एक छोटा हिस्सा ही आम आदमी तक पहुंच पाता है. बड़ा हिस्सा तो बिचौलिए हड़प कर जाते हैं क्योंकि 100 रुपए भी किसी को देने हों तो सरकार उस पर 10-20 कागज मांगती है और 10 जने सही करते हैं. हर कागज पर खर्च होता है, हर सही करने वाला अपनी फीस मांगता है.

सरकार ये स्कीमें शुरू करती है कि ढोल पीटा जा सके और उस की ऊपरी कमाई से पार्टी वर्कर, विधायक, सांसद को भी खुश रखा जाए और सरकारी मशीनरी को भी जो चुनावों में पोलिंग बूथ में बैठी होती है. इस तरह की सरकारी योजनाओं से जनता को छाछ मिलती है, कइयों को मोटा मक्खन.

मुनाफा बिचौलियों की जेब में

सरकार गरीबों की बहुत सी चीजों जैसे खाने, खाद, इलाज, गैस, पढ़ाई की कीमत कम रखती है और लागत और वसूले पैसे का फर्क टैक्स से जमा किए पैसे से पूरा करती है. लोग शिकायत करते हैं कि इस में बहुत धांधलियां हैं. सस्ता खाना गरीबों के नाम पर ले कर इकट्ठा किया जाता है और बेच दिया जाता है अमीरों को. मुनाफा बिचौलियों की जेब में. सस्ती गैस के सिलैंडर होटलों, कारखानों को दिए जाते हैं.

इलाज किया नहीं जाता पर दवाओं और वेतन का पैसा भारीभरकम डाक्टरों, नर्सों, अर्दलियों, बिचौलियों की जेब में जाता है. खाद के मामले में तो बड़ी कंपनियों को दोहरातिहरा मुनाफा कमाने का मौका मिलता है. कंपनियां जितना माल बनाया उस से ज्यादा बनाया दिखा कर सरकारी सहायता डकार जाती हैं और कागजों पर बाजार में खाद की बिक्री दिखा जाती हैं. हर सस्ती चीज के पीछे महंगे नेताओं, सरकारी बाबुओं, बिचौलियों और रातोंरात बने धन्ना सेठों की कतारें दिखती हैं.

सरकार अब कह रही है कि बजाय गरीबों को सस्ती चीज देने के, गरीबों को पैसे दे देगी ताकि वे अपने पैसे से जो चाहे बाजार से व लागत दाम पर खरीद सकें. चूंकि अब सरकार ने करोड़ों आधार कार्ड बना डाले हैं, सरकार का कहना है कि इस से बिचौलियों के बिना पैसा सीधे गरीब के बैंक अकाउंट में जा सकता है. किसी हेरफेर की गुंजाइश ही नहीं.

हेरफेर की गुंजाइश ही नहीं का असल मतलब आप समझिए कि अब प्राइवेट बिचौलियों की जरूरत नहीं होगी. अब सारा पैसा सरकारी बाबू बिना नेता, दलाल, उद्योगपति, व्यापारी के हजम कर सकता है. अब सरकार के आकाओं को अपना खजाना लूटने के लिए दूसरों का सहारा नहीं चाहिए. अब ऐसा सिस्टम बनाया गया है कि खरबों (यानी 1 के बाद 11 जीरो) डकारे जा सकें और किसी को कमीशन भी न देना पड़े.

अब तक सस्ती चीजों को बांटने में किसानों की यूनियनें, ट्रांसपोर्टरों की सभा, नेताओं की पार्टियां, बनाने वालों के चैंबर होते थे, जो गड़बड़ में बराबरी का हिस्सा मांगने के लिए एकजुट हो कर हल्ला मचा डालते थे. वे प्रैस में जाते. अदालतों में जाते. करोड़ों की हेराफेरी दिखती. आसानी से चोर माल ले जाते दिख जाते.

अब यह पैसा सरकारी खजाने से निकलेगा हर साल हर आदमी के लिए 1000-2000 या 3000 बस. 5 करोड़ को पहुंचा या 10 करोड़ को कौन कैसे गिनती करेगा? गांव वाले कहते रहेंगे कि पैसा नहीं पहुंचा, सरकार कहती रहेगी चला गया. गरीब बेचारा अब ज्यादा महंगी चीजें खरीदेगा, और भूखा रहेगा, और नंगा रहेगा पर उस की सुनेगा कौन? नेताओं को अपना हिस्सा मिल जाएगा जो गिनती में हजारपांच सौ होंगे, पर लाखों सरकारी बाबू, बैंकर, कंप्यूटर औपरेटर अरबों बना डालेंगे.

इसे कहते हैं कंप्यूटर के जरीए टैक्नो तानाशाही. यह रिश्वतखोरी पर मोनोपोली लाएगा. जिन कुछ लाखों को पैसा मिलेगा वे वाहवाही करेंगे. बाकी की जबान ही नहीं है. सभी पार्टियां मिल कर जनता को लूटेंगी. डायरैक्ट बैनिफिट या बैंक ट्रांसफर में शिकायतें होंगी तो कंप्यूटर साहब पर चांप दो जिसे न पुलिस छू सकती, न अदालत और न प्रैस उस का इंटरव्यू ले सकता है. गरीबों को लूटने का इस से अच्छा उपाय न होगा. वाहवाह, क्या सोच है?

जानिए शेरपा अमिताभ कांत के बारे में

हाल ही में दिल्ली में जी-20 का सम्मेलन किया गया था. इस सम्मेलन में भारत के रवैए और कूटनीति पर कांग्रेस के बड़े नेता शशि थरूर का बड़ा ही पौजिटिव कमैंट आया था और उन्होंने सरकार से ज्यादा एक आदमी की तारीफ की थी, जिन का नाम है शेरपा अमिताभ कांत.
तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने अपनी एक पोस्ट में कहा था, ‘बहुत अच्छे अमिताभ कांत. ऐसा लगता है कि जब आप ने आईएएस बनना चुना तो आईएफएस ने एक बहुत अच्छा राजनयिक खो दिया. जी-20 शेरपा ने कहा कि रूस और चीन के साथ बातचीत की और कल रात ही अंतिम ड्राफ्ट मिला. यह भारत के लिए जी-20 में एक गौरवपूर्ण क्षण है.’
याद रहे कि भारत के जी-20 की अध्यक्षता मिलने के बाद अमिताभ कांत को भारत की तरफ से शेरपा नियुक्त किया गया था. अमिताभ कांत से पहले केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल जी-20 में भारत के शेरपा थे.
जी-20 में शेरपा की अहम जिम्मेदारी होती है. इन का सब से अहम काम जी-20 सदस्य देशों के बीच तालमेल बिठाना और बातचीत करना होता है.
शेरपा ही सदस्य देशों के साथ बैठकें करते हैं, जी-20 के काम की जानकारी साझा करते हैं और आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनवाते हैं.
सवाल उठता है कि शेरपा शब्द जी-20 के साथ कैसे जुड़ गया? दरअसल, यह शब्द आया है नेपाल और तिब्बत की पहाड़ियों में रहने वाले एक समुदाय के नाम से. इन लोगों को उन की जीवटता और मुश्किल हालात में हिम्मत दिखाने के लिए जाना जाता है. इतना ही नहीं, शेरपा पर्वतारोहियों को शिखर पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं.
शेरपा अमिताभ कांत ने भी एक तरह से जी-20 के शिखर सम्मेलन में भारत की शिखर पर पहुंचाया है.
भारत सरकार के कार्यक्रमों स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया, इंक्रेडिबिल इंडिया में अहम भूमिका निभाने वाले अमिताभ कांत का जन्म उत्तर प्रदेश के बनारस में हुआ था और वे 1980 बैच के आईएएस हैं. वे केरल के कोझीकोड के कलक्टर रहे हैं. इस के अलावा वे केरल सरकार के पर्यटन विभाग के सचिव भी रहे हैं.
अमिताभ कांत भारत सरकार के पर्यटन विभाग के संयुक्त सचिव भी रह चुके हैं और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम  के वे भारत में ग्रामीण पर्यटन के नैशनल प्रोजैक्ट डायरैक्टर भी रह चुके हैं. जून, 2022 तक वे नीति आयोग के चेयरमैन भी थे.

विपक्ष की ऐतिहासिक एकता : सत्ता डरी हुई क्यो है

पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आह्वान पर राहुल गांधी, ममता बनर्जी, लालू यादव, शरद पवार और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं की “विपक्षी एकता” को देखकर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार के माथे पर साफ-साफ पसीना देखा जा सकता है. लोक तंत्र में सत्ता के विरुद्ध विपक्ष का एक होना एक सामान्य बात है. अब लोकसभा चुनाव में ज्यादा समय नहीं है ऐसे में अगर विपक्ष एक हो रहा है तो यह भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी सरकार के लिए स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है. क्योंकि जब तक विपक्ष में एकता नहीं है भारतीय जनता पार्टी सत्ता में बनी रहेगी यह सच विपक्ष के सामने भी और सत्ता में बैठी भाजपा के नेताओं को भी पता है. यही कारण है कि जब पटना में विपक्ष के लगभग सारे राजनीतिक दलों में एक सुर में भारतीय जनता पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में उखाड़ फेंकने का ऐलान किया तो भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता तिलमिला गए उनके बयानों से दिखाई देता है कि उन्हें अपनी कुर्सी हिलती हुई दिखाई दे रही है . दरअसल ,भारतीय जनता पार्टी और आज की केंद्र सरकार का एजेंडा जगजाहिर हो चुका है. बड़े-बड़े नेता यह ऐलान कर चुके हैं कि हम तो 50 सालों तक सत्ता पर काबिज रहेंगे, यह बोल कर के इन भाजपा के नेताओं और सत्ता में बैठे चेहरों ने बता दिया है कि उनकी आस्था लोकतंत्र में नहीं है और सत्ता उन्हें कितनी प्यारी है. और उनकी मंशा क्या है यही कारण है कि आज एक वर्ग द्वारा लोकतंत्र को खतरे में माना जा रहा है. क्योंकि सत्ता में बैठे हुए अगर यह कहने लगे कि हम तो उसी छोड़ेंगे ही नहीं इसका मतलब यह है कि असंवैधानिक तरीके से सत्ता पर काबिज रहने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं. यही कारण है कि विपक्ष आरोप लगा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियां कुछ इस तरह की है जिससे चंद लोगों को लाभ है अदानी और अंबानी इसके बड़े उदाहरण हमारे सामने हैं. अब हालात यह है कि विपक्षी दलों के एकजुट होने की कोशिश की आलोचना करते हुए पटना की बैठक को ‘स्वार्थ का गठबंधन’, ‘नाटक’ और ‘तस्वीर खिंचवाने का अवसर बताकर भारतीय जनता पार्टी के नेता अपना बचाव कर रहे हैं.

भाजपा की बैचेनी जगजाहिर

बिहार की राजधानी पटना में विपक्षी दलों की ओर से साल 2024 के लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर लड़ने की घोषणा के तत्काल बाद दिल्ली मे पार्टी मुख्यालय केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी मोर्चा संभाला और कहा ” जो राजनीतिक दल कभी एक दूसरे को आंखों नहीं सुहाते थे, वे भारत को आर्थिक प्रगति से वंचित करने के संकल्प से एकत्रित हुए हैं.”
अपने चिर परिचित अंदाज में स्मृति ईरानी ने कहा, ‘कहा जाता है कि भेड़िये शिकार के लिए झुंड में आते हैं और यह राजनीतिक झुंड पटना में मिला. उनका ‘शिकार’ भारत का भविष्य है.’
महत्वपूर्ण बात या की पटना में विपक्षी एकता चल रही थी और केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह जम्मू मे थे उनसे भी नहीं रहा गया और बोल पड़े ” विपक्षी एकता लगभग असंभव है. उन्होंने कहा, ‘आज पटना में एक फोटो सेशन चल रहा है। सारे विपक्ष के नेता संदेश देना चाहते हैं कि हम भाजपा और मोदी को चुनौती देंगे मैं सारे विपक्ष के नेताओं को यह कहना चाहता हूं कि कितने भी हाथ मिला लो, आपकी एकता कभी संभव नहीं है और हो भी गई … कितने भी इकट्ठा हो जाइए और जनता के सामने आ जाइए…. 2024 में 300 से ज्यादा सीटों के साथ मोदी का प्रधानमंत्री बनना तय है.’
दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा उड़ीसा कालाहांडी में थे, उन्होंने वहीं से कहा “आज जब सभी विपक्षी दल पटना में गलबहियां कर रहे हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है कि कांग्रेस विरोध के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने वाले नेताओं की स्थिति क्या से क्या हो गई है. उन्होंने कहा, ‘यही लालू प्रसाद यादव पूरे 22 महीने जेल में रहे. कांग्रेस की इंदिरा … राहुल की दादी ने उन्हें जेल में डाला था. यही नीतीश कुमार पूरे 20 महीने जेल की सलाखों के पीछे रहे.”
सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर भी चुप नही बैठे उन्होने विपक्षी दलों की बैठक को एक ‘तमाशा’ करार दिया. अब आप स्वयं देखें और विवेचना करें कि राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जो एकता कर रहे हैं वह कितना देश हित में है और भारतीय जनता पार्टी पर जो सत्ता का मद चढ़ा हुआ है उससे देश को किस तरह हानि हो रही है

बिहार में जातियों के लिए खुलेंगे बंद दरवाजे

बिहार उच्च न्यायालय ने जातियों की गिनती को कानूनी बता कर मई में लगाई रोक हटा ली है और अब नीतीश कुमार सरकार एक बार फिर गिनती शुरू कर सकती है कि किस जाति के लोग कितने है और उन की माली हालत कैसे हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट ने रोक फिर नहीं लगाई या कुछ महीनों में पता चल जाएगा देश में लोकतंत्र की असली चाबी किस के पास है और शायद जातियों के लिए बंद दरवाजे खुलने लगे.

यह बात तो पक्की है कि चाहे मामला सरकारी नौकरियों का हो, दुकानदारी का हो, छोटे धंधों में नौकरियों का हो, पढ़ाई का हो थोड़े से मुट्ठी भर लोग एक लंबी पौराणिक समय में चली आ रही साजिश के तहत देश की 80-85′ आबादी से पैसा ही नहीं इज्जत भी छीन कर अपने पास गिरवी रख लेते हैं.

नई तकनीक के 200 सालों और आजादी के 75 साल बाद भी जरा सा ही फर्क आया है कि अब पिछड़ों दलितों को अमीरों और ऊंचों के घर के सामने से गुजरते हुए चप्पल बगल में नहीं दबानी पड़ती. कर्पूरी ठाकुर जयप्रकाश नारायण, लालू यादव के बदलावों से पिछड़ों को अहसास तो हो गया है कि वे जानवर नहीं है और धर्म की पट्टी को आंखों और दिमाग पर बांधी गई है उस ने फिर उन्हें अपनेअपने  टोलों में धकेल दिया है और वे अपनी बुरी हालत के लिए पहले की तरह पिछड़े जन्मों के कर्मों को जिम्मेदार मानते हैं और अब जोरशोर से अपनेअपने मंदिरों में जाने लगे हैं जहां से पैसा सारा ऊंची जमातों के पंडे पुजारियों के हाथ में ही जाता है.

जाति सवो से शायद पता चले कि किस जाति के लोग कितने गरीब हैं. यह भी हो सकता है कि ऊंची जातियों के लोगों के पास केवल जाति का ठप्पा ही हो और जब उन की खाली हो. सर्वे से, जो जनगणना की तरह है पर जनगणना नहीं, यह पता चलेगा कि सरकार किस पर कितना खर्च करे.

पिछले कुछ सालों से एयरपोर्टो, चमचम करते रेलवे स्टेशनों, बंदे भारत टे्रनों, 6 और 8 लेन के हाईवे, बड़ी सांसद, भव्य मीङ्क्षटग हाल, ऊंची मूॢतयां, नए मंदिर बनाने की लग पड़ गई है. सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों, सरकारी मंडियों, बाजारों, घरों के आगे सडक़ों, सीवरों, पीने का पानी सब पीछे रह गया है. प्रधानमंत्री हर रोज एक ऐसी चीज का उद्घाटन करते नजर आते है जो अमीरों को सुख देती है, गरीब किसान मजदूर, सफाई कर्मचारी और सवर्णों की औरतों को नहीं हो सकता है इस एक सर्वे से कुछ फायदा हो पर लगता यही है कि सर्वे की रिपोर्ट भी किसी दफ्तर में फाइलों में बंद हो जाएगी क्योंकि जो नेता आज सत्ता में हैं कल हों या न हों. पता नहीं. नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव अगर सत्ता में नहीं रहे तो इस सर्वे के गंगा में बहा दिया जाएगा,

नरेंद्र मोदी का जादू

नरेंद्र मोदी का जादू जो सिर पर चढ़ कर इतने साल बोला अब लगता है कि धीमा पडऩे लगा है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी खुद अपने से नाराज होकर गई पाॢटयों को दोबारा बुला रही है. 18 जुलाई को हुई एक मीङ्क्षटग में कई पुराने साथी आए जो पहले कतार में लगे थे पर बाद में उन्होंने भाजपा से नाता  तोड़ लिया.

भाजपा की धर्म फौज रातदिन नरेंद्र मोदी को देवताओं को अवतार बनाने में लगी रही है और अगर फ्रांस के म्यूजियम में खाना भी वह खा आएं तो सुॢखयां बनवाता है जबकि इस म्यूजियम को कोई भी खाना खिलाने के लिए किराए पर ले सकता है. भारतीय जनता पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ रही साबित करने में कि नरेंद्र मोदी में देश को एक चमत्कारी नेता मिला है.

नरेंद्र मोदी चमत्कारी है, इस में शक नहीं है, उन्होंने 2016 चमत्कार से 500 रुपए और 1000 रुपए के नोट गायब कर दिए और पूरे देश को बैंकों के आगे लाइनों में लगवा दिया. रातोंरात चमत्कार से मजदूरों के अधड़ में रखे गाड़ी कमाई के रुपए कोरे कागज में बदल गए.

जब कोरोना आया तो रातोंरात उन्होंने चमत्कार से लौकडाउन थोप दिया चाहे इस की जरूरत थी या नहीं और लाखों मजदूर जो चलना भूल चुके थे सैंकड़ों मील पैदल तपती धूप में चलने लगे. उन्होंने चमत्कार से थालीताली बजवा कर बता दिया कि इस से कोरोना पर 17 दिनों में जीत हासिल हो जाएगी का फायदा कर डाला और यह चमत्कार ही है कि पूरा देश हल्ला मचाने लगा. शायद चीन अमेरिका तक गूंज पहुंची होगी.

उन के राज में चमत्कार हुए कि खालिस कांग्रेसी नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल और सुभाष चंद्र बोस मरने के 50 साल बाद भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बन गए और एक की मूॢत गुजरात में लगा दी गई दूसरे की इंडिया गेट पर. दोनों ने जीवन भर ङ्क्षहदू महासभा और आरएसएस को गलत माना पर नमस्कार के कारण वह इतिहास अब भुला दिया गया.

चमस्कार के कारण देश भर खुले में शौच खत्म हो गया और घरघर में शौचालय बन गया. जिस में किया गया शौच वहीं पड़ापड़ा घर में बदबू फैलाता है और बिना पानी के न जाने कहां गायब हो जाता है. चमत्कारों में सीवर अपनेआप डालना शायद मोदी भूल गए. उज्जवला गैस का चमत्कार हुआ कि करोड़ों कारों गैस के सिलेंडर पहुंच गए और अब उन पर गोबर के उपले रख कर खाना बनाया जाता है.

ऐसे चमत्कारी नेता को 2024 में तो जीतना ही है भारतीय जनता पार्टी अब रातदिन इस मेहनत में लगी है जो इन चमत्कारों को नहीं मानते उन्हें किसी तरह ङ्क्षहदू धर्म से निकाल दिया जाए और वे अगर कोई धर्म अपनाएं तो जेल में बंद कर दिया जाएं. भाजपा को छोड़ कर गए नेताओं को ट्र्वाला टाइप का ईडी, सीबीआई थाप का डर दिखा कर कहा जा रहा है कि सीधेसीधे चमत्कारी पार्टी में आ जाओ. जहां आने पर सब ऐसे ही शुरू हो जाते हैं जैसे गांव में नहाने से इस में भाजपा को सफलता मिलेगी इस की पूरी गारंटी है.

पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव नतीजे : भारतीय जनता पार्टी के ‘मिशन 24’ पर गाज

अब से कुछ साल पहले तक ऐसा माना जाता था कि पंचायत चुनाव गांव की सरहद तक सीमित रहते हैं, पर अब ऐसा नहीं है. आज की तारीख में हर बड़ा सियासी दल पूरी ताकत से इन चुनाव में अपना दमखम दिखाता है और अगर लोकसभा चुनाव नजदीक हों तो पंचायत चुनाव नतीजों की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है.

इस बात को पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव से समझते हैं, जहां ममता बनर्जी को मिली बंपर जीत से पूरी तृणमूल कांग्रेस की बांछें खिली हुई हैं और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बिखरे विपक्ष में थोड़ी उम्मीद जगी है कि केंद्र की ‘डबल इंजन’ सरकार की चूलें हिल सकती हैं, बशर्ते आपसी मतभेद भूल कर भारतीय जनता पार्टी के झूले में झूलते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का डट कर सामना किया जाए.

पश्चिम बंगाल में 8 जुलाई, 2023 को एक चरण में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की कुल 73,887 सीटों के लिए चुनाव हुए. नतीजों में तृणमूल कांग्रेस सब पर भारी पड़ी. उस ने भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और वामपंथी दलों को रगड़ कर रख दिया.

ममता बनर्जी का जलवा बरकरार

कोई कुछ भी कहे, पर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को टक्कर देना फिलहाल बड़ा मुश्किल दिख रहा है. इस की सब से बड़ी वजह ममता बनर्जी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए चलाई गई कल्‍याणकारी योजनाएं हैं, जिन का फायदा आम लोगों तक पहुंच रहा है.

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, गांवदेहात के इलाकों में ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी महिला सशक्तीकरण योजना ने महिला वोटरों को पार्टी से बांधे रखने में अहम रोल निभाया है. इस योजना के तहत सरकार सामान्य श्रेणी के परिवारों को 500 रुपए हर महीने और एससीएसटी श्रेणी के परिवारों को 1,000 रुपए हर महीने देती है.

इस के अलावा राज्य के लोगों को ममता बनर्जी के जुझारू तेवर पसंद आते हैं. वे सादगी से भरी जिंदगी जीती हैं और जनता की नब्ज पकड़ने में माहिर हैं. उन्होंने ‘मां, माटी, मानुष’ का जबरदस्त नारा द‍िया था और इसी के दम पर पश्चिम बंगाल में साल 2011 का विधानसभा चुनाव जीता था.

शिक्षकों की भरती और मवेशी व कोयला तस्करी रैकेट जैसे कई भ्रष्टाचार घोटालों के इलजाम लगने के बावजूद वोटरों ने तृणमूल कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा. याद रहे कि भ्रष्टाचार के इन मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा एक प्रमुख कैबिनेट मंत्री, विधायकों, युवा नेताओं और सरकार के करीबी बड़े सरकारी अफसरों की गिरफ्तारी हुई थी.

भाजपा के साथ हुआ ‘खेला’

भारतीय जनता पार्टी को पंचायत चुनाव में भले ही पहले से ज्यादा सीटें मिली हों, पर नतीजे मनमुताबिक नहीं रहे. वहां पर राज्य भाजपा में टूट होती भी दिखी. पंचायत चुनाव से ठीक पहले भाजपा को बड़ा झटका देते हुए पार्टी विधायक सुमन कांजीलाल सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. अलीपुरद्वार निर्वाचन क्षेत्र की नुमाइंदगी करने वाले सुमन कांजीलाल को तृणमूल कांग्रेस पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कोलकाता में एक समारोह में टीएमसी का झंडा सौंपा था.

पिछले कुछ समय से उत्तर बंगाल में मजबूत होती जा रही भाजपा को इस पंचायत चुनाव में झटका लगा. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर बंगाल में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया था, जबकि इस बार के पंचायत चुनाव में उसे मनचाहे नतीजे नहीं मिले. कुछ जगहों पर अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद यह पार्टी उत्तर बंगाल में अच्छा रिजल्ट नहीं दे पाई.

साल 2019 के लोकसभा और साल 2021 के विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन को पैमाना मानें तो भारतीय जनता पार्टी को इस बार सीटों की तादाद में काफी बढ़ोतरी की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. पूर्व मेदिनीपुर, कूचबिहार, उत्तर 24 परगना के मतुआ बहुल इलाकों और पूर्व मेदिनीपुर में नंदीग्राम छोड़ कर हर जगह उस के प्रदर्शन में काफी गिरावट आई.

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की एकमात्र लोकसभा सीट पर भाजपा का लंबे समय से कब्जा रहा है, लेकिन इलाके में स्थानीय भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोरचा ने भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन को काफी पीछे छोड़ दिया. भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोरचा के अध्यक्ष अनित थापा ने कहा, “यह जीत लोगों की जीत है. उन्होंने हमें काम करने का मौका दिया है और हम इसे पूरा करेंगे.”

भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाए थे और सोचा था कि जनता इसे मुद्दा बना कर भाजपा के हक में वोट डालेगी, पर यहां भी उस की दाल नहीं गली. प्रदेश में भारीभरकम 81 फीसदी के आसपास वोट पड़े, जो तृणमूल कांग्रेस की झोली भर गए.

भाजपा जानती है कि पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेश में सत्ता की चाबी गांवदेहात के वोटरों के हाथ में है और फिलहाल यह वोटर ममता बनर्जी के पक्ष में खड़ा है. यहीं से उस की चिंता बढ़नी शुरू हो जाती है, क्योंकि अब ममता बनर्जी और ज्यादा मजबूत हो गई हैं और देशभर में विपक्ष को एकसाथ करने में खासा रोल निभा सकती हैं. यह बात भाजपा के ‘मिशन 24’ के लिए खतरे की घंटी है.

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