भाजपा के लिए चुनौती हैं प्रियंका

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने चुनावी प्रचार का शुभारम्भ ‘गंगा यात्रा’ से करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. इस बार का लोकसभा चुनाव सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाला महायुद्ध नजर आ रहा है. प्रयागराज के मनैया घाट से अपनी तीन दिन की ‘गंगा-यात्रा’ का आगाज करके प्रियंका ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं. वही गंगा, काशी में जिसके तट पर खड़े होकर 2014 में नरेन्द्र मोदी ने ललकार लगायी थी – ‘मुझे मां गंगा ने बुलाया है…’ वही गंगा, जिसके घाट पर 56 इंच की छाती ठोंक कर नरेन्द्र मोदी ने उसे प्रदूषण-मुक्त करने की शपथ उठायी थी और आजतक गंगा को प्रदूषण-मुक्त न कर सके, प्रयागराज में उसी गंगा की गोद में बैठ कर काशी तक 140 किलोमीटर का रास्ता बोट से तय करके प्रियंका गांधी वाड्रा ने भाजपा और मोदी की नींद उड़ा दी है. गंगा तट पर खड़े होकर उन्होंने गंगा मय्या में दूध अर्पित करते वक्त कहा – ‘मैं गंगा की बेटी हूं और मां का दर्द बेटी ही समझ सकती है.’ प्रियंका की यह भावनात्मक बात मोदी के दंभ और दावे पर भारी पड़ती है. वहीं गंगा तट पर घने बसे अत्यन्त पिछड़ी जाति के लोगों से सीधा सम्वाद स्थापित करके उन्होंने बसपा नेत्री मायावती का ब्लडप्रेशर भी बढ़ा दिया है. गंगा तट पर बसे केवट और मछुआरों को ही नहीं, बल्कि गैर यादव, गैर कुर्मी और गैर जाटव जातियों को अपने पाले में लाने की कोशिश में प्रियंका मोदी के ‘मन की बात’ सरीखी एकतरफा संवाद के विपरीत लोगों से जिस तरह आमने-सामने बातचीत कर रही हैं, उसके परिणाम कांग्रेस के हित में सिद्ध होंगे, इसमें दोराय नहीं है. गौरतलब है कि अत्यन्त पिछड़ी जातियों की संख्या उत्तर प्रदेश में करीब 34 फीसदी है, जिसमें निषाद, मछुआरा, बिंद, चौहान, धोबी, कुम्हार, केवट आदि शामिल हैं. यह जातियां गंगा के किनारे वाले इलाकों में बहुतायत से बसी हैं और  मिर्जापुर, जौनपुर, इलाहाबाद, लखीमपुर खीरी, फतेहपुर, मुजफ्फरनगर, अंबेडकर नगर, भदोही, बनारस जैसी सीटों पर इनका खासा प्रभाव है. इस तबके को जहां भाजपा की ’सवर्ण-मानसिकता’ अपने निकट भी फटकने नहीं देती, वहीं बसपा के सत्ता में रहने पर भी इस तबके को कभी कोई खास फायदा नहीं मिला है. प्रियंका की नजर उत्तर प्रदेश के मछुआरों और निषादों पर खासतौर पर है, जो पिछले चुनावों में भाजपा को वोट करते रहे हैं. पूरे सूबे में इन जातियों की आबादी करीब 12 फीसदी है. दरअसल, गोरखपुर उपचुनाव के परिणामों के बाद निषाद सूबे में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे थे. निषादों को अपने पाले में बनाये रखने के लिए भाजपा भी जीतोड़ मेहनत कर रही है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो निषादराज की भव्य प्रतिमा बनवाने का ऐलान कर चुकी है. निषादों को साथ लाने के लिए प्रियंका ने संगम के पास छतनाग से ‘गंगा यात्रा’ शुरू करने के बजाय मनैया के घाट को चुना क्योंकि मनैया निषादों द्वारा बसाया गया गांव है. कहना गलत न होगा कि प्रियंका की ‘गंगा यात्रा’ के निहितार्थ गहरे हैं, होमवर्क पूरा है और शायद यही वजह है कि किसी भी गठबंधन से दूर कांग्रेस ने पूरे देश में अपने दम पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है.

घिर गये हैं चौकीदार

खुद को देश का चौकीदार घोषित करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जनता से संवाद के वक्त बॉडीलैंग्वेज जहां अहंकार, कठोरता, कटुता, व्यंग्य, अतिश्योक्तियों और लड़ने-मरने जैसे भाव प्रदर्शित करती है, वहीं उससे बिल्कुल उलट प्रियंका के भाषणों में जमीन से जुड़ी, किसानों-मजदूरों की परेशानियों से जुड़ी, युवाओं के रोजगार से जुड़ी इमोशनल बातें लोगों को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. प्रियंका के वाक्यों पर गौर करें – ‘देश संकट में है, इसलिए मुझे घर से निकलना पड़ा… मैं काफी वर्षों से घर में थी, लेकिन अब देश संकट में है… आज किसानों को फसलों का सही दाम नहीं मिल रहा है… पिछले पांच साल में देश में बेरोजगारी बढ़ी है…’ इन वाक्यों से आमजन खुद का ज्यादा जुड़ा हुआ पाता है. और सबसे बड़ा और तीखा हमला तो प्रियंका ने मोदी पर यह कह कर किया है कि – ‘चौकीदार तो अमीरों के होते हैं….’. ऐसा कह कर प्रियंका ने मोदी को उन्हीं के नारे ‘मैं भी चौकीदार’ में घेर दिया है. मोदी सिर्फ अपने खास और अमीर उद्योगपति अडानी-अम्बानी के चौकीदार हैं, प्रियंका के कथन में छिपी इस बात को समझना जनता के लिए मुश्किल नहीं है.

संभ्रांत और सेक्युलर छवि

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठन अक्सर प्रियंका को ईसाई बता कर उन पर निशाना साधते रहे हैं, लेकिन संगम तट पर लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद ‘गंगा-यात्रा’ की शुरुआत करके उन्होंने साफ कर दिया है कि उनकी रगों में हिन्दू का खून भी है. प्रियंका ने उसी जगह पर पूजा की, जहां कभी उनकी दादी इंदिरा गांधी ने पूजा की थी. ऐसा करके जहां उन्होंने इंदिरा की यादों को लोगों के दिलों में ताजा किया, वहीं उन्हें हिन्दू विरोधी कहने वालों के मुंह पर भी ताला जड़ दिया है. रोजी-रोटी के सवालों से जूझ रही और देश में शान्ति-अमन की चाह रखने वाली जनता प्रियंका की इस सेक्युलर छवि से काफी प्रभावित है और इसका फायदा चुनाव में कांग्रेस को मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं है.

वहीं, अब तक जो मुसलमान बसपा, सपा और भाजपा के बीच बंट गया था, वह भी अब कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होता नजर आ रहा है. बीते पांच सालों में मोदी-राज में गोरक्षा और लवजिहाद के नाम पर जो कत्लेआम मचा उससे अल्पसंख्यकों में डर का माहौल है, ऐसे में प्रियंका की सेक्युलर छवि उन्हें आकर्षित कर रही है. इसमें दोराय नहीं है कि इस बार मुसलमान कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होगा. वहीं अति पिछड़ी जातियों से सीधा संवाद स्थापित करके प्रियंका ने सपा और बसपा के दिल में भी धुकधुकी पैदा कर दी है.

मेरठ में जिस तरह प्रियंका भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद को देखने अस्पताल पहुंचीं, उससे बसपा नेत्री मायावती की झुंझलाहट बढ़ गयी है. भीम आर्मी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत है. यहां के लोग मायावती से बड़ा नेता युवा और जोश से लबालब चंद्रशेखर को मानते हैं, जो लम्बे समय से मजदूरों के हक में आवाज बुलंद कर रहे हैं. दलित समुदाय के युवा खुद को चंद्रशेखर से जुड़ा महसूस करते हैं. ऐसे में प्रियंका का उनसे मिलना एक सीधा सियासी गणित है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एससी वोटों पर अच्छी पकड़ रखने वाले चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित होगा.

ठीक वक्त पर एंट्री

नजरें लक्ष्य पर, सौम्य-सधी आवाज और बातचीत में एकदम अपनों जैसा प्यार… इन विशेषताओं के साथ प्रियंका गांधी वाड्रा अन्तत: चुनाव मैदान में हैं. सालों से पर्दे के पीछे रह कर काम करने वाली प्रियंका को राजनीति में प्रत्यक्ष उतारने की मांग बहुत लम्बे समय से होती रही है, मगर निजी कारणों का हवाला देकर इतने सालों तक उन्हें इससे अलग रखा गया. एक तो उनके बच्चे छोटे थे और दूसरा उनके भाई राहुल गांधी का करियर डांवाडोल था. अब ऐसे वक्त में प्रियंका की एंट्री हुई है, जब बच्चे भी समझदार हो गये हैं और राहुल गांधी भी ‘पप्पू’ वाली छवि तोड़ कर बतौर पार्टी-अध्यक्ष कांग्रेस की झोली में तीन राज्यों की सरकारें डालने में कामयाब रहे हैं. अब सदन के भीतर-बाहर राहुल धाराप्रवाह भाषण करते हैं. उनके अचानक अटैक और प्यार की झप्पी से तो प्रधानमंत्री मोदी तक हतप्रभ हो चुके हैं. इसलिए अब ऐसा कहना कि प्रियंका के आने से राहुल का करियर चौपट हो जाएगा, गलत है. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो प्रत्यक्ष राजनीति में प्रियंका की एंट्री से कांग्रेस दोहरी मजबूती के साथ चुनाव मैदान में है. एक और एक ग्यारह की ताकत के साथ राहुल-प्रियंका 2019 की लोकसभा की वैतरणी पार करेंगे.

दो मोर्चों पर मजबूती से खड़ी हैं प्रियंका

प्रियंका गांधी वाड्रा आज देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर मजबूती से खड़ी हैं. गौरतलब है कि उनके राजनीति में उतरने की सुगबुगाहट के साथ ही भाजपा चौकन्नी हो गयी थी. जैसे ही यह ऐलान हुआ कि प्रियंका को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया जा रहा है, पांच साल तक राबर्ट वाड्रा के अवैध रूप से प्रॉपर्टी खरीद मामले में खामोशी ओढ़े पड़ी जांच एजेंसियों में अचानक हलचल देखी जाने लगी और फिर प्रवर्तन निदेशालय ने राबर्ट वाड्रा को कथित रूप से अवैध सम्पत्ति और मनी लांड्रिग मामले में पूछताछ के लिए ठीक उसी दिन तलब कर लिया, जिस दिन प्रियंका को बतौर कांग्रेस महासचिव अपना पद ग्रहण करना था. आशंका व्यक्त की जा रही थी कि इसके खिलाफ कांग्रेसी हो-हल्ला मचाएंगे, मगर राबर्ट और प्रियंका दोनों ने शालीनता और सहयोग का परिचय दिया और रॉबर्ट वाड्रा पूछताछ का सामना करने के लिए एजेंसी के सामने हाजिर हो गये. चुनावी तैयारियों और रैलियों के अतिव्यस्त कार्यक्रम के बीच प्रियंका अपने पति राबर्ट को पूरा सपोर्ट करती नजर आयीं. कांग्रेस महासचिव की कुर्सी पर बैठने से पहले वे पति को लेकर प्रवर्तन निदेशालय पहुंचीं और फिर वहां से कांग्रेस आॅफिस जाकर उन्होंने कार्यभार संभाला. यही नहीं, जब राबर्ट वाड्रा को पूछताछ के लिए जयपुर तलब किया गया, तब भी प्रियंका लखनऊ में रैली पूरी करने के बाद सीधी जयपुर पहुंचीं. इन बातों से प्रियंका ने साफ कर दिया है कि वह देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूती से कमर कस के खड़ी हैं और उनके यही तेवर भाजपा खेमे को डरा रहे हैं.

गौरतलब है कि 2014 में जब मोदी सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब राबर्ट वाड्रा को जेल भेजने की बातें खूब करते थे, मगर सत्ता में आने के बाद पांच साल तक वह इस मामले में खामोशी ओढ़े रहे. जैसे ही यह खबर आयी कि प्रियंका गांधी राजनीति में पदार्पण करने वाली हैं, केन्द्र के अधीन जांच एजेंसियां अचानक नींद से जाग पड़ीं. ऐसा क्यों हुआ यह सवाल सबकी जुबां पर है. प्रियंका ने एक लाइन में इस सवाल का जवाब दिया है – ‘सबको पता है, क्या हो रहा है?’ वहीं प्रियंका की तारीफ करते हुए पति रॉबर्ट वाड्रा ने सोशल मीडिया पर लिखा – ‘प्रिय पी, तुम एक सच्ची दोस्त, परफेक्ट वाइफ और मेरे बच्चों के लिए बेस्ट मां साबित हुई हो. आज के दिन दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक माहौल है, मुझे पता है तुम अपनी जिम्मेदारी को सही से निभाओगी. हम प्रियंका को देश के हवाले करते हैं. भारत की जनता इनका ध्यान रखे.’ राबर्ट के इस इमोशनल मैसेज से प्रियंका तो प्रभावित हुर्इं ही, कांग्रेसी खेमे में इस मैसेज ने संजीवनी का काम किया.

खून में दौड़ती राजनीति

राजनीति प्रियंका के खून में है. लम्बे समय से वह अमेठी और रायबरेली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की रैलियों के आयोजन का कार्यभार संभालती रही हैं. उनकी कार्यशैली अनूठी है. वे अजनबियों के साथ पलक झपकते ही स्नेहिल सम्बन्ध बना लेती हैं. उनकी खूबसूरती और मोहक मुस्कान सामने वाले को सम्मोहित कर लेती है. अपने राजनीतिक दौरों के दौरान कभी प्रियंका किसी बूढ़ी महिला का हाथ थाम कर बैठ जाती हैं, कभी उनके साथ परांठा-अचार का नाश्ता करती हैं, तो कभी रिक्शे पर अपने बच्चों को घुमाती हैं. उनका यह व्यवहार क्षेत्र के लोगों को उनसे गहरे जोड़ता है. हालांकि वे थोड़ी गुस्सैल स्वभाव की भी हैं. मगर कार्यकर्ताओं का मानना है कि उनका गुस्सा उन लोगों पर ही प्रकट होता है, जो पार्टी का काम ठीक से नहीं करते हैं. ऐसा ही आचरण उनकी दादी इंदिरा गांधी का भी था. दरअसल प्रियंका में लोगों को इंदिरा की ही छवि नजर आती है. खासतौर पर उनकी हेयर स्टाइल और लम्बी नाक. तमाम समानताओं के साथ एक समानता यह भी है कि प्रियंका गांधी का करियर भी इंदिरा गांधी की तरह ही शुरू हुआ है. प्रियंका की तरह इंदिरा भी शुरू से ही स्मार्ट थीं, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रखा गया था. जवाहर लाल नेहरू ने कभी उन्हें अपनी उत्तराधिकारी के रूप में नहीं देखा. ये अलग बात थी कि राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी. शुरू में गूंगी गुड़िया के रूप में मशहूर इंदिरा के राजनीतिक तेवर पिता की मृत्यु के बाद राजनीति में पदार्पण के साथ देश-दुनिया ने देखे. वैसे ही तेवर प्रियंका के हैं. महज 16 साल की उम्र में, प्रियंका गांधी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया था. तब से वह कई राजनीतिक जुलूसों, रैलियों और सम्मेलनों में हिस्सा लेती रही हैं.

अपनी बात मनवाने में माहिर हैं प्रियंका

रायबरेली के पुराने लोग प्रियंका में हमेशा इंदिरा को देखते हैं. इंदिरा की तरह वे भी सीधी और भावुक बातें करके लोगों को वह करने पर मजबूर कर देती हैं, जो वह चाहती हैं. यह बात तो रायबरेली की पहली ही जनसभा में ही साबित हो गयी थी. वह 1999 का लोकसभा चुनाव था. कांग्रेस ने रायबरेली सीट से कैप्टन सतीश शर्मा को खड़ा किया था. भाजपा ने जवाब में राजीव गांधी के ममेरे भाई अरुण नेहरू को टिकट दिया था. अरुण नेहरू और राजीव गांधी में रिश्ते बिगड़ गये थे. वे कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गये थे. अरुण नेहरू मजबूत नेता थे. वहीं कैप्टन सतीश शर्मा सोनिया परिवार के घरेलू मित्र थे. प्रियंका उन्हें अंकल कहती थीं. कैप्टन रायबरेली से लगभग हारे हुए कैंडिडेट नजर आ रहे थे. उन्होंने प्रियंका से आग्रह किया कि वह उनकी एक चुनावी सभा में आ जाएं. तब प्रियंका सिर्फ 27 साल की थीं. रायबरेली में उनकी पहली जनसभा थी. प्रियंका ने वहां सिर्फ एक लाइन बोली – ‘मेरे पापा के साथ जिसने गद्दारी की. पीठ में छुरा भोंका, ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?’ भीड़ ने प्रियंका की डांट सुनी. एक सन्नाटा खिंच गया चारों ओर. प्रियंका को लगा कि कुछ ज्यादा हो गया. उन्होंने बात संभाली और बोलीं – ‘मेरी मां ने ये कह कर भेजा था कि कभी किसी की बुराई मत करना. लेकिन मैं आपसे भी अगर अपने दिल की बात नहीं कहूंगी, तो किससे कहूंगीं.’ और प्रियंका के इस इमोशनल सम्बोधन के बाद पूरा चुनाव ही पलट गया. कैप्टन सतीश शर्मा जीत गये और अरुण नेहरू का राजनीतिक करियर खत्म हो गया. कैप्टन खुद मानते थे कि ये चुनाव उन्हें अकेली प्रियंका की एक मीटिंग ने जिता दिया था.

27 साल की तब की प्रियंका और 47 साल की आज की प्रियंका में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है. वे आज भी उसी तरह इमोशनल बातें करके लोगों का दिल जीत जीतने में उस्ताद हैं, मगर कोई कार्यकर्ता काम से जी चुराये तो डांट-डपट भी करने से नहीं चूकतीं. राजनीति उनके खून में है और मेच्योरिटी लेवल भाई राहुल गांधी से कहीं ज्यादा. यही वजह रही कि इतने साल तक सोनिया ने उन्हें राजनीति से दूर रखा ताकि राहुल ठीक तरह से स्थापित हो सकें.

भय्याजी के नाम से मशहूर हैं प्रियंका

राहुल और सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी और रायबरेली में प्रियंका बचपन से ही काफी सक्रिय रही हैं. क्षेत्र के लोग राहुल गांधी के साथ-साथ प्रियंका को भी ‘भय्याजी’ के सम्बोधन से पुकारते हैं. इन दोनों जगहों को प्रियंका अपने घर के रूप में देखती हैं. प्रियंका की खासियत है कि वो लोगों से जल्दी जुड़ जाती हैं. इस बात के गवाह कई लोग हैं कि रायबरेली में प्रियंका गांधी कभी भी अचानक ही बीच सड़क पर रुककर किसी भी कार्यकर्ता को नाम से पुकार लेती थीं और उसका हालचाल लेती थीं. वर्ष 2004 के आम चुनाव में उन्होंने रायबरेली में सोनिया गांधी के लिए अभियान प्रबंधक के रूप में जबरदस्त काम किया था. वहीं अमेठी में भाई राहुल गांधी के अभियान की निगरानी भी उन्होंने की. वर्ष 2004 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत का परचम लहराया तो पार्टी में प्रियंका का कद बढ़ गया. हालांकि वह एक उम्मीदवार के रूप में या प्रचारक के रूप में पार्टी की चुनावी जीत में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाती थीं, लेकिन वह इसके पीछे थीं.

2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, जब राहुल गांधी अपने राज्यव्यापी अभियान में व्यस्त थे, प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली क्षेत्र की दस सीटों पर अपनी ऊर्जा और प्रयास केन्द्रित किया. आम चुनाव 2009 और 2014 में, प्रियंका गांधी ने अमेठी और रायबरेली के निर्वाचन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रचार किया और अपने भाई और मां के लिए जीत हासिल करने में मदद की.

प्रियंका गांधी की छवि और कार्यशैली में उनकी दादी इंदिरा की छाप और असर है. कांग्रेस पार्टी में प्रियंका से बड़ा स्टार प्रचारक कोई नहीं है. अबकी लोकसभा में कांग्रेस की नय्या पार लगाने की पूरी जिम्मेदारी प्रियंका पर है. गांधी परिवार की इस सदस्या के सक्रिय राजनीति में उतरने की राह लोग काफी समय से देख रहे थे. प्रियंका गांधी वाड्रा का लक्ष्य भी हालांकि सत्ता प्राप्त करना है, मगर यह सत्ता वह अपने भाई राहुल गांधी के लिए पाना चाहती हैं. वह लम्बे समय से पार्टी और राहुल के लिए काम कर रही हैं. मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों में संयोजक के तौर पर उनकी भूमिका हमेशा प्रभावशाली रही है. उनकी तेजी और स्मरण शक्ति गजब की है. अमेठी और रायबरेली में वह अपने कार्यकर्ताओं को बकायदा नाम से पुकारती हैं. उनकी यह खूबी उन्हें कार्यकर्ताओं से सीधे जोड़ती है. 2019 के चुनाव में उनका उतरना विपक्षी दलों के लिए चिन्ता का विषय है.

भाजपाइयों में उत्साह नदारद

भाजपा का सीधा मुकाबला इस बार कांग्रेस से है, यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनका गोदी-मीडिया भलीभांति समझ रहा है. प्रियंका के आने के बाद कांग्रेस पार्टी मजबूती से खड़ी हुई है, इस बात से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इत्तेफाक रखते हैं. कांग्रेस का सपा और बसपा से गठबंधन न करना यह साफ जाहिर करता है कि प्रियंका की लीडरशिप में अबकी बार पार्टी पूरे कॉन्फिडेंस में है. विरोधी खेमा प्रियंका-प्रलय का आंकलन करने में जुटा है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कुम्भ स्नान के बाद से ही हवा का रुख भांपने में लगे हैं. पुलवामा में सीआरपीएफ के चालीस जवानों की शहादत और पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक कर मोदी-शाह जनता पर ‘भाजपा की देशभक्ति’ का रौब गालिब करने में उस तरह सफल नहीं हो पाये, जैसा कि उनकी सोच थी. उलटे वह कई संगीन और संवेदनशील सवालों के घेरे में आ फंसे हैं. कई जवानों के परिजनों ने यह सवाल उठा दिये हैं कि पुलवामा में एक आतंकी इतना विस्फोटक लेकर पहुंचा कैसे? सुरक्षा में इतनी बड़ी खामी आखिर किसकी गलती से हुई? पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक कर सेना के कारनामे को अपना कारनामा बताने वाली केन्द्र की भाजपा सरकार ने आखिर अब तक पुलवामा हमले की जांच क्यों नहीं करवायी? यह तमाम सवाल चारों ओर से उठ रहे हैं और ऐसे में प्रियंका गांधी वाड्रा का अनेक शहीद जवानों के परिजनों से जाकर मिलना और उनसे संवाद स्थापित करना मोदी-शाह की मुश्किलें बढ़ा रहा है.

अबकी बार भाजपा कार्यकर्ताओं में भी जोश 2014 के मुकाबले जरा कम ही नजर आ रहा है. संघ के भीतर से भी कई बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अलग-अलग मत सामने आ चुके हैं. 2014 में जहां भाजपा के दिग्गज नेताओं ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकारा था और संघ की पूरी ताकत उनके पीछे थी, वहीं अबकी बार यह ताकत कुछ कम दिख रही है. ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ या ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ जैसा कोई प्रभावी नारा भी अभी तक जनता के कानों में नहीं पड़ा है. ‘मैं भी चौकीदार’ मुहिम भी टांय-टांय फिस्स ही दिख रही है. प्रधानमंत्री मोदी की इस मुहिम में शामिल होकर जब पंकजा मुंडा ने ट्वीट किया – ‘मैं भी चौकीदार’ तो इस पर उनको मिला एक मजेदार जवाब – ‘चिक्की कौन खाया?’

पार्टी कार्यकर्ताओं में ही नहीं, बल्कि भाजपा के धुरंधर नेताओं में भी इस बार जोश नदारद है. राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, उमा भारती, शाहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी, अरुण जेटली जैसे कई दिग्गज भाजपाई खामोशी ओढ़े बैठे हैं, तो वहीं पुराने भाजपाई कलराज मिश्र, सैयद शाहनवाज हुसैन अपने टिकट कटने से नाराज दिख रहे हैं. ऐसे में चुनाव प्रचार उस गर्मजोशी से परवान चढ़ेगा, जैसा कि 2014 में था, ऐसा लगता नहीं है.

आम चुनाव की दस्तक

जैसेजैसे आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस बार बातें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की कम हो रही हैं, विरोधी दलों की चर्चा ज्यादा होने लगी है. सुर्खियों में अब मायावती और अखिलेश का गठबंधन, कांग्रेस, ममता बनर्जी, डीएमके आदि छाने लगे हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री अब सिर्फ उद्घाटनों, शिलान्यासों और सम्मेलनों में भाषण करने की औपचारिकताएं निभाने में लगे हैं. सरकार के कई मंत्रियों और भाजपा अध्यक्ष की बीमारियां जरूर सुर्खियां बनी हैं.

भाजपा ने जो संगठित चेहरा 2014 से 2017 तक दिखाया था, अब बिखरने लगा है. यह अच्छा नहीं है. जनता की पसंद लोकतंत्र में बदलती रहती है पर मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों को हर स्थिति में अपना संतुलन और सामर्थ्य बनाए रखना होता है. यह देश के लिए जरूरी होता है. सत्तारूढ़ पार्टी को अंत तक अपनी हिम्मत नहीं खोनी चाहिए चाहे उस के काम सही हों या गलत.

यह ठीक है जब कई पराजयों का सामना एकसाथ करना पड़े तो लोग हताश होने लगते हैं. पर, फिर भी हजारोंलाखों लोग उस नेता से जुड़े होते हैं और वे मैदान छोड़ कर न भाग जाएं, यह देखना नेताओं का ही काम होता है.

नरेंद्र मोदी ने यह गलती की कि उन्होंने पूरी जिम्मेदारी और सत्ता अपनेआप में केंद्रित कर ली क्योंकि भाजपा 2014 का चुनाव केवल उन के बल पर जीती थी. बाकी सब मोहरे बन कर रह गए थे. यह पार्टी या सरकार चलाने का सब से गलत तरीका है, पर दुनियाभर में ऐसा ही होता है.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, ब्रिटेन में टेरेसा मे और जरमनी में एंजेला मर्केल की हालत नरेंद्र मोदी की तरह है. इन को कई फ्रंटों पर लड़ना पड़ रहा है और जीत कम ही मिल रही है. ट्रंप मैक्सिको और अमेरिका के बीच वाल बनाने के पीछे ऐसे पड़े हैं जैसे मोदी मंदिर, गाय और जीएसटी के. टेरेसा मे ब्रैक्सिट को ले कर जिद कर रही हैं, एंजेला मर्केल यूरोप में एकछत्र राज चाहती हैं.

बिना चुनौतियों के राज करने या अनायास सत्ता पाने के अवसर ने इन नेताओं से सब से मिल कर चलने का गुण छीन लिया है और इसी वजह से इन के अपने सहयोगी, संगीसाथी इन के साथ मन मार कर काम कर रहे हैं. जो समस्याएं पहले चुटकियों में हल हो जाती थीं, अब विकराल बनने लगी हैं.

इस सब का नुकसान जनता को सहना पड़ता है क्योंकि सरकार ठप हो जाती है. आजकल भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और जरमनी में कोई खास फैसले नहीं लिए जा रहे क्योंकि नेताओं को अपने बचाव से फुरसत नहीं है. इस का असर एकदम न पड़ेगा, पर 4-5 वर्षों बाद इस तरह हुए बीमार नेतृत्व का खमियाजा पूरा देश भुगतेगा, यह पक्का है.

राफेल पर सरकार का बहाना

राफेल हवाई जहाजों की बढ़ी कीमतों के बारे में एक बहाना जो मोदी सरकार दे रही है कि वे पूरी तरह सुसज्जित हैं. भाजपा समर्थक वैबसाइटों और ग्रुपों पर फोटो प्रचारित किए जा रहे हैं कि पहले जो राफेल खरीदे जा रहे थे वेबस चेसिस की तरह के थे और अब जो आएंगे वे लक्जरी टूरिस्ट बस की तरह के हैं. अगर यह तथ्य सच है तो सरकार बनाने में क्यों हिचक रही है कि क्या बदलाव लाए गए हैं और क्या खर्चा हुआ है.

रक्षा मामलों को गुप्त रखा जाना चाहिए पर इस का मतलब यह तो नहीं कि रक्षा खरीद और सैनिक मामलों में कुछ लोग मनमानी कर सकें. सेना की कौन सी ऐसी बात है जो दूसरे देश की सेना को नहीं मालूम होती. हर देश भारी पैसा और लोहो लगाता है कि दुश्मन की हर जानकारी मिलती रहे. आम जनता से छिपा कर रखने से तो लाभ तब हो जब वही एकमात्र जानकारी स्रोत हो.

भारत ये जहाज खुद नहीं बना रहा. फ्रांस की कंपनी डोसा बना रही है. वह यह जहाज किसी को भी बेच सकती है. पाकिसतान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश और यहां तक कि चाहे तो भूटान भी इन्हें खरीद सकता है. ये सब देश जब खरीदने जाएंगे तो कंपनी निश्चित रूप से अपनी नई से नई तकनीक बनाएगी और कहेगी कि भारत ने भी इसे खरीदा है और यदि भारत की तकनीक की मार या ….. उन के पास होगी तो वे क्यों न बेचेंगी.

ऐसे मामले में हमारी सुरक्षा धरी की धरी नहीं रह जाएगी क्या, फ्रांस और इंजिप्स ने राफेल हवाई जहाज खरीद ही रखे हैं. इंजिप्स से उन की जानकारी दूसरे मुसलिम  देश पाकिस्तान को न देगा इस की गारंटी क्या है?

वैसे भी आजकल जो इलैक्ट्रौनिक्स इन हवाई जहाहों की तो छोडि़ए आप की महंगी गाडि़यों तक में लग रही है वह दूर बैठे बनाने वाले के हाथों में पलपल में पहुंच रही है. हमारे मोबाइल की हर गतिविधि चाहे तो बनाने वाली कंपनी कभी भी खोल सकती है, यहां तक कि हम ने क्या बात की.

राफेल विमानों में गुप्त बातों का बहाना तो बेमतलब की बात है क्योंकि ये बातें हर खरीदार या संभावित खरीदार देश को बनानी ही होगी और इस तरह के लड़ाकू विमानों के हर समय दुनिया में 20-25 देश ग्राहक होते हैं. कतार और ब्रूनेई जैसे छोटे अमीर देश भी हवाई बेड़े रखते हैं. कतार भी राफेल के खरीदारों में से एक है.

अगर यह विवाद नहीं उठता, अगर 15 दिन पुरानी कंपनीको औफसेट पार्टनर नहीं बनाया जाता जिस के मालिक अनिल अंबानी हैं, अगर फैसला नरेंद्र मोदी की जगह रक्षा मंत्री और रक्षा अधिकारी करते तो बात दूसरी थी. अब जब लग रहा है कि घड़े में पानी के साथ कुछ और तो सिर्फ अमृत कहने से बला नहीं टल जाएगी. उस में गंगाजल नहीं यह गारंटी कहां है, नरेंद्र मोदी को इस को निबटाना होगा ही. उन के आराध्य विष्णु और शिव कहीं मोहिनी अवतार और विष पीने वाले बन कर आएं तो बात बने.

उज्ज्वला फेल, लकड़ी व उपले पास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीसियों और घोषणाओं की तरह उज्ज्वला योजना के जरीए गांव में चूल्हे के कायाकल्प करने का दावा किया गया. 1 मई, 2016 से शुरू की गई इस योजना में गरीब परिवारों को एलपीजी गैस के मुफ्त कनैक्शन दिए गए.

सरकार दावा कर रही थी कि इस योजना के बाद गांवदेहात के घरों में लकड़ी के चूल्हों से छुटकारा मिल जाएगा, पर उज्ज्वला योजना में गैस के कनैक्शन जहां दिए गए वहां चूल्हे महज दिखाने के लिए ही हैं. ज्यादातर चूल्हों में जंग लग चुका है या फिर वे किसी ज्यादा पैसे वाले नातेरिश्तेदार के घर पहुंच चुके हैं.

गरीबी है अहम वजह

गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों की झुग्गियों में आज भी बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जो गरीबी में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं. उन को यह पता है कि धुएं से आंखें खराब होती हैं और सांस यानी दमे की बीमारी का खतरा होता है.

वाराणसी के रहने वाले इंदू शेखर सिंह कहते हैं, ‘‘गांव के रहने वाले ज्यादातर लोगों की हालत ऐसी नहीं है कि वे 500 से 1,000 रुपए का गैस सिलैंडर खरीद सकें. गांव में उन्हें लकड़ी या उपले मुफ्त में मिल जाते हैं. ऐसे में उन्हें लकड़ी और उपले ही सुलभ ईंधन लगते हैं. जिन लोगों के पास पैसा है भी, तो वे यह सोचते हैं कि अगर पैसा बचा लिया जाए तो क्या नुकसान है? यही पैसा किसी और काम में लग जाएगा. गैस के इस्तेमाल को गांव के लोग अभी भी जरूरत की नहीं, बल्कि विलासिता की चीज मानते हैं.’’

सस्ती और सुलभ हो

लखनऊ की नेहा सिंह अपना स्कूल चलाती हैं जिस में तमाम गांव के लोग अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं.

वे कहती हैं, ‘‘गांव के लोगों के पास पैसा पहले की तुलना में बढ़ा जरूर है, पर उसी अनुमात में महंगाई भी बढ़ गई है. घरेलू गैस के लिए खर्च करना उन को फुजूल का काम लगता है. जरूरत इस बात की है कि घरेलू गैस को सस्ता किया जाए और वह हर जगह मिल जाए. अभी तो लोगों को दूर जा कर सिलैंडर लेना होता है.’’

उज्ज्वला योजना के सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि सिलैंडर को दोबारा सही से भरने का काम नहीं हो रहा है. गैस कंपनियों के आंकड़े बताते हैं कि 60 फीसदी गैस सिलैंडर दोबारा ढंग से नहीं भर पाते हैं.

आमदनी के साधन बढ़ें

दलितों व गरीबों के गांवों में अभी भी 60 से 80 फीसदी आबादी लकड़ी और चूल्हे पर ही खाना बना रही है. जिन बड़े परिवारों में घरेलू गैस का इस्तेमाल होने लगा है, वहां भी पूरा खाना घरेलू गैस पर नहीं बनता है.

ऐसे तमाम घरों में चायनाश्ता या घर की लड़कियां और नई बहुएं घरेलू गैस पर भले ही खाना या नाश्ता बना लें, पर बड़े घरों में भी पारंपरिक खाना चूल्हे पर ही बन रहा है. ऐसे में पैसे की कमी के साथसाथ जानकारी की कमी भी इस के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती है. इस की वजह एक ओर पैसों की कमी तो दूसरी ओर मुफ्त की लकड़ी और उपले हैं. अगर गांव के लोगों को भी लकड़ी और उपले खरीदने पड़ें तो वे पारंपरिक चूल्हों को बंद कर घरेलू गैस का इस्तेमाल शुरू कर सकते हैं.

मसूद अजहर को छोड़ना भारत की सबसे बड़ी गलती थी

पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर आतंकी हमले के बाद पूरा देश आक्रोशित है, 38 जवानो के शवों को देखकर हर आंख भीगी है. हर जुबान से बस यही निकल रहा है कि बस अब बहुत हुआ… अब इन्हे छोड़ना नहीं है. जिस वक़्त देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद जवान के ताबूत को कंधा दिया वो पल पूरे देश को रुला गया. पुलवामा की घटना और इससे पहले हुई कई घटनाएं ना घटतीं अगर हमने मसूद अज़हर जैसे खूंखार आतंकी को अपने चंगुल से ना निकलने दिया होता. बहुत बड़ी गलती हो गई जब कंधार विमान हाईजैक के दौरान आतंकी मसूद अजहर को छोड़ा गया. अगर उसको उस वक़्त शूट कर दिया जाता तो शायद संसद, उरी, पठानकोट और अब पुलवामा में आतंकी हमले न होते.

पुलवाम की साजिश रचने वाला जैश-ए-मुहम्मद का सरगना मौलाना मसूद अजहर वही आतंकी है, जिसे कंधार विमान हाईजैक के दौरान रिहा करना पड़ा था. मसूद अजहर की रिहाई के बाद पाकिस्तान चौड़ा हो गया और उसकी शह पाकर ही मसूद ने आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद को जन्म दिया. इसमें कोई शक नहीं कि मसूद के आतंकी संगठन को जहां पाकिस्तानी सेना का पूरा सपोर्ट है वहीं चीन भी उसको पूरा सपोर्ट करता है और उसका इस्तेमाल भारत को परेशान करने के लिए करता है.

मसूद अजहर को साल 1994 में पहली बार गिरफ्तार किया गया था. कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन का सदस्य होने के आरोप में उस वक्त उसकी श्रीनगर से गिरफ्तारी हुई. मौलाना मसूद अजहर की गिरफ्तारी के बाद, जो कुछ हुआ उसका शायद किसी को अंदाजा भी नहीं था. अज़हर को छुड़ाने के लिए आतंकियों ने 24 दिसंबर, 1999 को 180 यात्रियों से भरे एक भारतीय विमान को नेपाल से अगवा कर लिया और विमान को कंधार ले गए. भारतीय इतिहास में यह घटना ‘कंधार विमान कांड’ के नाम से दर्ज है. कंधार विमान कांड के बाद भारतीय जेलों में बंद आतंकी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक जरगर और शेख अहमद उमर सईद की रिहाई की मांग की गई और यात्रियों की जान बचाने के लिए छह दिन बाद 31 दिसंबर को आतंकियों की शर्त मानते हुए भारत सरकार ने मसूद अजहर समेत तीनों आतंकियों को छोड़ दिया. इसके बदले में कंधार एयरपोर्ट पर अगवा रखे गए विमान के बंधकों समेत सभी को छोड़ दिया गया.

यहीं से शुरू हुई जैश की कहानी 

जेल से छूटने के बाद मसूद अजहर ने फरवरी 2000 में जैश-ए-मुहम्मद आतंकी संगठन की नींव रखी, जिसका मकसद था भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना और कश्मीर को भारत से अलग करना. उस वक्त सक्रिय हरकत-उल-मुदाहिददीन और हरकत-उल-अंजाम जैसे कई आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद में शामिल हो गए. खुद मसूद अजहर भी हरकत-उल-अंसार का महासचिव रह चुका है. साथ ही हरकत-उल-मुजाहिदीन से भी उसके संपर्क थे.

संसद, पठानकोट, उरी से लेकर पुलवामा हमले में जैश का हाथ

यह कोई पहली बार नहीं है, जब जैश ने भारत को दहलाने की कोशिश की हो. साल 2001 में संसद हमले से लेकर उरी और पुलवामा हमले में जैश का हाथ रहा है. अपनी रिहाई और आतंकी संगठन की स्थापना के दो महीने के भीतर ही जैश ने श्रीनगर में बदामी बाग स्थित भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली थी.

बड़े आतंकी हमले में जैश का हाथ

28 जून, 2000:

जम्मू कश्मीर सचिवालय की इमारत पर हमला. जैश ने ली हमले की जिम्मेदारी.

14 मई, 2002:

जम्मू-कश्मीर के कालूचक में हुए हमले में 36 जवान शहीद हो गए, जबकि तीन आतंकी मारे गए.

1, अक्टूबर 2008:

जैश के तीन आत्मघाती आतंकी विस्फोटक पदार्थों से भरी कार लेकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा परिसर में घुस गए. इस घटना में 38 लोग मारे गए.

26/11 मुंबई हमला:

26/11 मुंबई आतंकी हमले को भी जैश ने अंजाम दिया था. 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में समुद्र के रास्ते आए 10 आतंकियों ने 72 घंटे तक खूनी तांडव किया था. इस हमले में 166 लोग मारे गए थे, जबकि कई घायल हो गए थे. इस हमले का मास्टर माइंड भी मसूद अजहर रहा है. मुंबई हमले में 9 आतंकी भी मारे गए थे. इस में एक जिंदा आतंकी आमिर अजमल कसाब को भी पकड़ा गया था, जिसे बाद में फांसी की सजा दी गई.

संसद हमला

13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर हुए हमले के पीछे भी लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद के आतंकियों का हाथ. इस हमले में 6 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे, जबकि तीन संसद भवन कर्मी भी मारे गए. संसद हमले का दोषी अफजल गुरु भी जैश से जुड़ा था. उसे 10 फरवरी 2013 में फांसी दी गई थी.

पठानकोट हमला

जनवरी 2016 को पंजाब के पठानकोट स्थित वायु सेना ठिकाने पर हमले के लिए भी ज़िम्मेदार. इस हमले में वायुसेना और एनएसजी के कुल सात सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे. दो दिनों की मुठभेड़ के बाद सभी आतंकियों को मार गिराया गया था.

उरी हमला

18 सितंबर, 2016 में कश्मीर के उरी स्थित सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में भी जैश का हाथ रहा है. उरी हमले में 18 सैनिक शहीद हो गए थे. इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी और पीओके में घुसकर कई आतंकी ठिकानों का खात्मा कर दिया था.

आतंकी संगठनों की सूची में शामिल ‘जैश’

जैश-ए-मुहम्मद को भारत ने ही नहीं बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र भी आतंकी संगठनों की सूची में शामिल कर चुका है. हालांकि अमेरिका के दबाव के बाद पाकिस्तान ने भी साल 2002 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था, मगर अंदर ही अंदर सेना का पूरा सपोर्ट जैश को मिलता रहा. भारत मसूद अज़हर के प्रत्यर्पण की पाकिस्तान से कई बार मांग कर चुका है, लेकिन पाकिस्तान हर बार सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए इस मांग को नामंजूर कर देता है. इसके लिए उसे चीन की मदद भी बराबर मिल रही है. चीन ने तो मसूद अज़हर को आतंकी मानने तक से इंकार कर दिया है.

भारत को अब अपने पड़ोसी देशों – पकिस्तान और चीन से टक्कर लेने और और उनको कड़ा सबक सिखाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. सांप को दूध पिलाने से वो अपनी प्रवृत्ति नहीं छोड़ देगा, पुलवामा के बाद तो हमें ये बाद अच्छी तरह समझ में आ जानी चाहिए.

PM मोदी की बायोपिक के पोस्टर पर उठे सवाल

दो वर्षों से बौलीवुड में चर्चा रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन व कृतित्व को लेकर बायोपिक फिल्म बनने जा रही है. इसी के साथ खबर आयी थी कि इस फिल्म में अभिनेता व सांसद परेश रावल इसमें नरेंद्र मोदी का किरदार निभा रहे हैं. परेश रावल ने 2018 में स्वयं एक मुलाकात में कहा था- ‘‘प्रधानमंत्री के जीवन पर फिल्म बन रही है. जिसमें मैं नरेंद्र मोदी की भूमिका निभा रहा हूं. मैने फिल्म की पटकथा पढ़ी है. पटकथा जिस तरह से लिखी गयी है, उससे मैं बहुत खुश हूं. अब मुझे इस फिल्म में काम करने में मजा आएगा. इसकी शूटिंग सितंबर माह से शुरू होगी. मेरे लिए यह चुनौतीपूर्ण फिल्म होगी. ’’मगर पर्दे के पीछे बहुत कुछ घटा. उसके बाद सितंबर में इस फिल्म की शूटिंग शुरू न हो सकी.

उसके बाद दिसंबर माह में खबर आयी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म बनने जा रही है, जिसमें मोदी का किरदार अभिनेता विवेक ओबेराय निभाने वाले हैं. अब जबकि महाराष्ट् के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने मुंबई में आयोजित एक खास समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म ‘‘पी एम नरेंद्र मोदी’’ का पहला पोस्टर जारी किया, तो पोस्टर देखकर लोगों से अच्छी प्रतिक्रियाएं नहीं आ रही हैं. बौलीवुड का एक तबका जरुर इस पोस्टर और विवेक ओबेराय की तारीफ कर रहा है.

ज्ञातव्य है कि फिल्म ‘‘पी एम नरेंद्र मोदी’’ में नरेंद्र मोदी का किरदार विवेक ओबेराय निभा रहे हैं, जो कि इससे पहले ‘‘कंपनी’’, ‘‘ओमकारा’’, ‘‘कृष 3’’ जैसी  फिल्मों में खलनायक या माफिया डौन के किरदार सहित कई अन्य तरह के किरदार निभा चुके हैं. फिल्म के निर्देशक उमंग कुमार हैं, जो कि ‘मैरी कौम’ व ‘सरबजीत’ फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं. इस फिल्म का निर्माण संदीप सिंह के साथ मिलकर सुरेश ओबेराय कर रहे हैं. सुरेश ओबेराय, विवेक ओबेराय के पिता हैं और वह राखी गुलजार के साथ ‘श्रृद्धांजली’ सहित तमाम बेहतरीन फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके हैं. जब पिता फिल्म का निर्माता हो, तो स्वाभाविक है कि वह अपने अभिनेता पुत्र को ही मुख्य किरदार निभाने का अवसर देगा. फिल्म के दूसरे निर्माता संदीप सिंह इससे पहले ‘‘सरबजीत’’, ‘‘भूमि’’ फिल्मो का सहनिर्माण कर चुके हैं. संदीप सिंह के खिलाफ मार्च 2018 में मौरीशस में अवयस्क बालक का यौन शोषण का आरोप लगा था, जिसका संदीप सिंह ने खंडन किया था.

बहरहाल, सोमवार, सात जनवरी को जारी फिल्म ‘‘पी एम नरेंद्र मोदी’’ के पहले पोस्टर में विवेक ओबेराय प्रधानमंत्री मोदी के लुक में खादी का कुर्ता पहने हुए नजर आ रहे हैं. बौलीवुड का एक तबका जहां इसकी तारीफ कर रहा है, वहीं अधिकांश लोग दावा कर रहे हैं कि विवेक ओबेराय बिलकुल फिट नही बेठते.

इसी बीच परेश रावल ने पुनः दावा कर दिया है कि पर्दे पर प्रधानमंत्री मोदी का किरदार उनसे बेहतर कोई नहीं निभा सकता.

भाजपा की नई चाल: मूर्ति में सिमटी मंदिर की राजनीति

अयोध्या में शिव सेना का ‘संत सम्मान’ और भारतीय जनता पार्टी की ‘धर्म संसद’ खत्म हो चुकी है. इस बीच अयोध्या का जनजीवन पूरी तरह से ठप हो गया था. सब से ज्यादा बुरा असर स्कूली बच्चों पर पड़ा. निजी स्कूलों और कई सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बंद रही.

शिव सेना के ‘संत सम्मान’ में उद्धव ठाकरे पूरे परिवार के साथ हावी रहे. अयोध्या में पहली बार शिव सेना प्रमुख आए थे. इस के बाद भी जनता का समर्थन उन को नहीं मिला.

शिव सेना ने हमेशा से ही मुंबई में उत्तर भारतीयों का विरोध किया है. ऐसे में उत्तर प्रदेश के लोगों ने शिव सेना को अपना समर्थन नहीं दिया.

‘धर्म संसद’ का आयोजन वैसे तो विश्व हिंदू परिषद का था, पर इस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की पूरी ताकत लगी थी. संतों से ज्यादा भाजपा नेताओं और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ऊपर सब की नजर थी.

‘धर्म संसद’ में राम मंदिर को ले कर कोई ठोस बात नहीं हुई. उत्तर प्रदेश की सरकार ने अयोध्या में राम की मूर्ति लगाने का ऐलान किया. ऐसे में राम मंदिर की बात को राम की मूर्ति में बदल दिया गया.

उत्तर प्रदेश सरकार ने 800 करोड़ रुपए की लागत से 221 मीटर ऊंची मूर्ति बनाने की बात कही. इस काम को करने में साढ़े 3 साल का समय बताया गया है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर को हाशिए पर रखा था, पर देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति लगाने की बात कही थी.

4 साल में गुजरात में सरदार सरोवर बांध के पास वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति लगाई गई. राम की मूर्ति इस से भी बड़ी होगी.

बेअसर रही अयोध्या

अयोध्या की जनता इसे बेमकसद की कवायद बताती है. यहां के लोग मानते हैं कि भीड़ जुटाने से कोर्ट के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ता है. इस से केवल अयोध्या में रहने वालों को परेशानी होती है.

इसी तरह साल 1992 के पहले कई साल तक कारसेवा के बहाने भीड़ जुटाई जाती थी. अब फिर से मंदिर के नाम पर भीड़ जुटाई जा रही है. इस से अयोध्या के रामकोट महल्ले में रहने वाले लोगों को अपने घरों में आनेजाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है.

अयोध्या में रहने वाले व्यापारी भी इस तरह की बंदी से काफी परेशान होते हैं. इन दिनों यहां कारोबार ठप पड़ जाता है. कारोबारी नेता मानते हैं कि अयोध्या के नाम पर पूरे देश में राजनीति होती है, पर इस का बुरा असर केवल अयोध्या के कारोबार पर पड़ता है.

अयोध्या के विनीत मौर्य मानते हैं

कि अयोध्या अब धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन कर रह गया है. मंदिर पर राजनीति अब बंद होनी चाहिए.

साफ दिख रहा है कि भाजपा का मकसद मंदिर मुद्दे को साल 2019 के आम चुनावों तक गरम बनाए रखने का है. अयोध्या के बाद ऐसे आयोजन दिल्ली और प्रयाग में भी होंगे.

जनवरी, 2019 में प्रयागराज में कुंभ का आयोजन हो रहा है. यह मार्च, 2019 तक चलेगा. इसी दौरान अदालत में मंदिर मुद्दे की सुनवाई भी चलेगी. इस से समयसमय पर अयोध्या मुद्दा आम लोगों की जिंदगी पर असर करता रहेगा.

हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोग इस का फायदा लेना चाहेंगे, जबकि मंदिर के मुद्दे को देखें तो भाजपा और उस के साथी संगठनों ने मंदिर को ले कर केवल होहल्ला ही मचाया है, कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं.

इस बार मंदिर मुद्दे पर विरोधी दलों की राजनीति बदली हुई है. वे खामोश रह कर भाजपा की शतरंजी चालों को देख रहे हैं.

साल 1998 के बाद भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी 2 बार देश के प्रधानमंत्री बने थे. उन के समय में भी मंदिर बनाने की दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ था. उस समय भाजपा ने कहा था कि अटल सरकार बहुमत की सरकार नहीं है, इसलिए मंदिर बनवाने की दिशा में कोई कानून नहीं बनाया जा सकता.

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी की अगुआई में तो केंद्र में भाजपा की बहुमत वाली सरकार बन गई है. इस के बाद भी 4 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है और अब जब 2019 के लोकसभा चुनाव आने वाले हैं तो उसे राम मंदिर की याद आई है. उस ने राम मंदिर बनाने की जगह पर फैजाबाद जिले का नाम बदल कर अयोध्या कर दिया. अब वह राम मंदिर से दूर सरयू नदी के किनारे राम की मूर्ति लगानेकी बात कर रही है. ऐसे में साफ दिखता है कि भाजपा के लिए राम मंदिर एक चुनावी मुद्दे से ज्यादा कुछ नहीं है.

मंदिर और अदालत

राजनीतिक फायदे की नजर से अयोध्या राजनीति के केंद्र में है. भाजपा मंदिर मुद्दे पर जनता को ऐसा बताती है कि जैसे सुप्रीम कोर्ट में यह मुकदमा मंदिर बनाने के लिए है. कोर्ट में मंदिर को ले कर केवल हिंदूमुसलिम ही आमनेसामने हैं.

यह सच नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का मुकदमा इस बात के लिए है कि विवादित जगह किस की है.

दरअसल, इस मुकदमे के 3 पक्षकार हैं. इन में से 2 पक्षकार रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा हिंदुओं की पार्टी है. मुकदमे की तीसरी पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड ही मुसलिम पक्षकार है.

सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह इन तीनों पक्षकारों में से ही किसी के हक में होगा. अगर मंदिर के पक्ष में भी फैसला हो गया तो 2 हिंदू पक्षकारों को राजी करना होगा.

समझने वाली बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी या विश्व हिंदू परिषद ने साल 2010 में हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद भी रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़े से बात करने की कोशिश नहीं की है.

अगर हालिया केंद्र सरकार दोनों हिंदू पक्षकारों से ही बात कर उन्हें एकजुट कर लेती तो भी लगता कि मंदिर बनाने की दिशा में उस ने सही कदम उठाया है.

भाजपा जिस संत समाज की बात कर रही है उस में भी बड़ी तादाद ऐसे संतों की है जो विश्व हिंदू परिषद के विरोधी हैं. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि मंदिर बनाने में भाजपा का क्या रोल होगा?

60 साल की कानूनी लड़ाई के बाद अयोध्या में राम मंदिर का फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने 30 सितंबर, 2010 को सुनाया था. यह फैसला 3 जजों की स्पैशल बैंच द्वारा 8189 पन्नों में सुनाया गया था. फैसला देने वालों में जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एसयू खान और जस्टिस धर्मवीर शर्मा शामिल थे.

सब से बड़ा फैसला जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने सुनाया था. 5238 पन्नों के फैसले में उन्होंने कहा था, ‘विवादित ढांचे का मध्य गुंबद हिंदुओं की आस्था और विश्वास के अनुसार राम का जन्मस्थान है. यह पता नहीं चल सका कि मसजिद कब और किस ने बनाई लेकिन यह मसजिद इसलाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ बनी है, लिहाजा मसजिद का दर्जा नहीं दिया जा सकता.’

2666 पन्नों के फैसले में जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा था, ‘पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के नतीजों से साफ है कि विवादित ढांचा पुराने निर्माण को गिरा कर बनाया गया था. एएसआई ने साबित किया है कि यहां पर पहले हिंदुओं का बड़ा धार्मिक ढांचा रहा है यानी यहां हिंदुओं का कोई बड़ा निर्माण था.’

285 पन्नों के फैसले में जस्टिस एसयू खान ने कहा, ‘जमीन पर हिंदू, मुसलमान और निर्मोही अखाड़े का बराबर हक है. इसे तीनों में बराबर बांटा जाना चाहिए. अगर किसी पार्टी का हिस्सा कम पड़ता है तो उस की भरपाई केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत जमीन से दे कर करनी चाहिए.’

अदालत के फैसले के बाद रामलला विराजमान पक्ष को अधिकार मिला कि रामलला जहां पर हैं वहीं विराजमान रहेंगे. जहां रामलला की पूजाअर्चना हो रही है वह स्थल राम जन्मभूमि है.  रामलला को एकतिहाई जमीन भी दी गई.

निर्मोही अखाड़े को रामचबूतरा और सीता रसोई दी गई. साथ ही, एकतिहाई जमीन भी दी गई.

इसी तरह मुकदमे के तीसरे पक्ष सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी एकतिहाई जमीन दी गई है. कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 1949 में जब मूर्तियां वहां पर रखी गईं, तब मुकदमा दाखिल क्यों नहीं किया गया?

अयोध्या का यह फैसला जितना रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड के लिए अहम है उस से ज्यादा अहम राजनीतिक दलों के लिए भी है. ऐसे में चुनाव के समय यह राजनीतिक मुद्दा बन जाता है.

अयोध्या मामला: एक नजर में

1528: मुगल बादशाह बाबर ने मसजिद बनवाई. हिंदुओं का दावा है कि इस जगह पर पहले राम मंदिर था.

1859: ब्रिटिश अफसरों ने एक अलग बोर्ड बना कर पूजा स्थलों को अलगअलग कर दिया. अंदर का हिस्सा मुसलिमों को और बाहर का हिस्सा हिंदुओं को दिया.

1885: महंत रघुवर दास ने याचिका दायर कर राम चबूतरे पर छतरी बनवाने की मांग की.

1949: मसजिद के भीतर राम की प्रतिमा प्रकट हुई. मुसलिमों का कहना है कि प्रतिमा हिंदुओं ने रखी.  सरकार ने उस जगह को विवादित बता कर ताला लगा दिया.

1950: मालिकाना हक के लिए गोपाल सिंह विशारद ने पहला मुकदमा दायर किया. अदालत ने प्रतिमा को हटाने पर रोक लगा कर पूजा की इजाजत दी.

1959: निर्मोही अखाड़े ने भी मुकदमा दाखिल किया. उस ने सरकारी रिसीवर हटाने और खुद का मालिकाना हक देने की बात कही.

1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी सैंट्रल बोर्ड औफ वक्फ भी विवाद में शामिल हुआ.

1986: फैजाबाद जिला अदालत ने मसजिद के फाटक खोलने और राम दर्शन की इजाजत दी. मुसलिमों ने बाबरी मसजिद ऐक्शन कमेटी बनाई.

1989: विश्व हिंदू परिषद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर मालिकाना हक राम के नाम पर ऐलान करने की गुजारिश की. फैजाबाद जिला कोर्ट में चल रहे सारे मामले इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजे गए.

इसी साल विश्व हिंदू परिषद ने विवादित जगह के पास ही राम मंदिर का शिलान्यास किया.

1990: विश्व हिंदू परिषद की अगुआई में कारसेवकों ने विवादित जगह पर बने राम मंदिर में तोड़फोड़ की. मुलायम सरकार ने गोलीबारी की.

1992: विवादित जगह पर कारसेवकों ने तीनों गुंबद ढहा दिए.

2002: अदालत ने एएसआई को खुदाई कर यह पता लगाने के लिए कहा कि विवादित जगह के नीचे मंदिर था या नहीं. इसी साल हाईकोर्ट के 3 जजों ने मामले की सुनवाई शुरू की.

2010: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने विवादित जगह को 3 हिस्सों में बांटने का आदेश दिया.

जानें काले गेहूं पर सफेद झूठ

मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर से 40 किलोमीटर दूर बसे कस्बे देपालपुर के गांव शाहपुरा के एक किसान सीताराम गेहलोत इन दिनो बेहद खुश हैं. जो भी सुनता है उनके गांव की तरफ भागता है. सीताराम ने काला गेंहू बोया है जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं और जो जानते हैं वह बड़ा दिलचस्प और हैरतअंगेज है कि इस गेंहू की बनी रोटी खाने से न केवल कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी ठीक होती है बल्कि दूसरी कई डायबिटीज़, मोटापा और हाइ ब्लडप्रेशर सरीखी बीमारियाँ भी दूर होती हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि काला गेंहू खाने से तनाव भी दूर होता है और दिल की बीमारी यानि हार्ट अटैक भी नहीं होता.

सीताराम गेंहू की यह अनूठी किस्म पंजाब के नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नालाजी इंस्टीट्यूट यानि एनएबीआई से लाये हैं. जिसे नाबी भी कहा जाता है. गेहूं का रंग हरे और पकने के बाद पीले के अलावा भी कुछ और खासतौर से काला हो सकता है इस बात पर भरोसा करना मुश्किल काम है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि काले रंग का गेहूं होता है पर क्या वह वाकई उतना चमत्कारी होता है जितना बताया जाता है, यह जरूर शक वाली बात है.

lie on black wheat

सीताराम गेहलोत काले गेंहू के बीज के लिए 2 साल से नाबी के चक्कर काट रहे थे, तब कहीं जाकर इस साल उन्हें 5 किलो बीज मिला जिसे वे श्री विधि से उगा रहे हैं इस विधि में फसलों की पैदावार ज्यादा होती है और फसल पर तेज हवा और पानी का असर नहीं होता.

काला गेहूं हर किसी की जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय है, वजह केवल इसका रंग ही नहीं बल्कि वे गिनाई जा रही खूबियां भी हैं जिनसे कई बीमारियां न होने या उनके दूर होने की भी चर्चा जमकर होती रहती है. फसल की पैदावार और बढ़वार के वक्त इस गेहूं की  वालियों का रंग हरा ही होता है. लेकिन जैसे जैसे फसल बढ़ती जाती है वैसे वैसे उनका रंग बदलकर काला होने लगता है. यह कोई कुदरत का करिश्मा नहीं है, बल्कि जानकारों की मानें तो एंथोसायनिन नाम का रसायन इसका जिम्मेदार है, जिसकी अधिकता से फसलें नीली बैंगनी या फिर काले रंग की होती हैं. अनाज, सब्जी या फलों का रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट की तादाद पर निर्भर रहता है. अधिकतर पेड़ पौधे हरे क्लोरोफिल की वजह से होते हैं.

दरअसल, एंथोसायनिन एक अच्छा एंटीऔक्सीडेंट होता है, जो हरे रंग के गेहूं के मुकाबले काले गेहूं में 40 गुना ज्यादा तक होता है. काले गेहूं में आयरन भी 60 फीसदी से ज्यादा पाया जाता है.

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अगर ये खूबियां कुदरत ने काले गेहूं को बख्शी हैं तो कुछ कमियां भी उसमें हैं. मसलन इसमें स्टार्च और प्रोटीन के अलावा दूसरे पोषक तत्व कम मात्रा में होते हैं. फिर क्यों और कौन काले गेहूं को अमृत सरीखा बताकर बेच रहा है, इसकी जांच होनी चाहिए. जानकार हैरानी होती है कि कुछ वेबसाइट्स पर काले गेहूं का आटा 2 से लेकर 4 हजार रु प्रतिकिलों तक बिक रहा है.

इस बारे में मध्य प्रदेश कृषि विभाग में कार्यरत स्वदेश विजय कहते हैं कि यह हम भारतीयों के चमत्कारों के आदी हो जाने की वजह से है. जबकि हकीकत में काले गेहूं के बाबत ऐसा कोई दावा जानकारों ने नहीं किया है. हां, काले गेंहू पर काम कर रही नाबी की वैज्ञानिक मोनिका गर्ग ने यह जरूर माना है कि अभी इसका प्रयोग चूहों पर किया गया है जिसके नतीजे उत्साहवर्धक आए हैं. जिन चूहों पर काले गेंहू का प्रयोग किया गया उनका वजन कम हुआ है और उनका कोल्स्ट्रोल और शुगर भी कम हुआ लेकिन इन्सानों के मामले में भी ऐसा हुआ है या होगा इसका दावा नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि एंथोसायनिन आक्सीडेंट की वजह से इंसानों को भी फायदा होगा पर वह ठीक वैसा ही जैसा दूसरे एंटऔक्सीडेंट्स से होता है.

तो फिर काले गेंहू के नाम पर हल्ला क्यों इस सवाल का जबाब साफ है कि इसे बढ़ा चढ़ा कर पेश करने वाले जरूर तबियत से चांदी काट रहे हैं. बात ठीक वैसी ही है कि दो सर, चार सींग और छह पैरों वाले पैदा हुये बछड़े को लोग भगवान का अवतार या लीला मानते उसका पूजा पाठ शुरू कर देते हैं, दक्षिणा भी चढ़ाने लगते हैं. फसलों के मामले में भी बगैर सोचे समझे और जाने अगर लोग महज रंग की बिना पर अंधविश्वासी होकर पैसा लुटा रहे हैं तो वे खुद का ही नुकसान कर रहे हैं.

काले गेंहू से अगर कैंसर ठीक होता है तो कोई वजह नहीं कि इस जानलेवा और लाइलाज बीमारी से एक भी मौत हो और शुगर के मरीजों जिनकी तादाद देश में 6 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही है को तो रोज सुबह शाम गुलाबजामुन की दावत उड़ाना चाहिए क्योंकि काला गेंहू जो है. हकीकत में एक साजिश के तहत सफेद झूठ फैलाकर काले गेंहू का काला कारोबार कुछ लोग कर रहे हैं जैसे चमत्कारी विज्ञापन वाले किया करते हैं कि हमारी दवाई की एक खुराक लो और सालों पुराना बावसीर जड़ से मिटाओ. बावसीर के मरीज ठीक हो जाने के लालच के चलते एक नहीं बल्कि हजारों खुराक फांक जाते हैं, लेकिन उनकी सुबह की तकलीफ दूर नहीं होती.

यह तय है कि काले गेंहू में कुछ ऐसे गुण हैं जो हर फसल में नहीं होते और होते भी हैं तो  अलग अलग तरीके से होते हैं, इसमें कुछ तत्व ज्यादा हैं जो हैरानी की बात नहीं पर सनसनी और हैरानी गेंहू के काले होने के नाम पर फैलाई जा रही है तो लोगों को इससे सावधान भी रहना चाहिए.

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