Long Hindi Story: बस खाली करो – आखिरी भाग

Long Hindi Story, लेखक – सैयद परवेज

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था: हसामुद्दीन बस में यह सोच कर बैठा कि आज कनाट प्लेस घूमने जाएगा. बस में भीड़ थी. पर उसे सीट मिल गई. बस में एक ट्रांसजैंडर चढ़ी, जिस को ले कर लोगों ने बातें बनाई फिर 2 जेबकतरे टाइप लड़के बस में हुड़दंग करने लगे. जब वे उतरे तो जैसे बस वालो ने चैन की सांस ली. अब पढि़ए आगे…

उस लड़के ने बात तो ठीक कही थी. इस जमाने में पैसे कीमत ही कहां है. महंगाई के दौर में आम आदमी की जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है.

उन दोनों लड़कों के उतरने पर बस कंडक्टर ने सवारियों से कहा, ‘‘ये दोनों जेबकतरे थे. इन से कौन बहस करे…’’

बस कंडक्टर ने एक बात और कही, ‘‘शनिवार के दिन दिल्ली की बसों में किसी की जेब नहीं कटती है.’’

हसामुद्दीन की बाईं तरफ एक सीट छोड़ कर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था.

हसामुद्दीन ने उस आदमी से कहा, ‘‘ये लड़के पहले ऐसे नहीं होंगे, जैसा हम ने इन्हें फिलहाल देखा है.

किसी के हालात उसे क्या से क्या बना देते हैं. मुझे लगा कि मैं ने एक लड़के को कहीं देखा है. जन्म से कोई बुरा या अच्छा नहीं होता है. अच्छा या बुरा बनने में भी समय लगता है. यह समाज उसे अच्छा या बुरा बनाता है.

उस अधेड़ आदमी ने हसामुद्दीन की तरफ देख कर कहा, ‘‘आप की बात तो ठीक है, पर बच्चे समझते कहां हैं…’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी से पूछा, ‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘केंद्रीय सचिवालय.’’

‘‘क्या आप सरकारी नौकरी में हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘नहीं… एक क्लब है, वहीं पर काम करता हूं.’’

‘‘आप कब से वहां काम कर रहे हैं?’’ हसामुद्दीन ने पूछा.

उस आदमी ने कहा, ‘‘तकरीबन पिछले 3 साल से.’’

‘‘बड़ा क्लब है?’’ हसामुद्दीन ने पूछा.

‘‘हां. उस क्लब में बहुत से लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं.’’

‘‘आप पहले कहां काम करते थे?’’

‘‘साउथ ऐक्सटैंशन में एक होटल है, मैं वहीं पर कुक था.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप ने कितने साल वहां काम किया?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘25 साल से ज्यादा ही.’’

‘‘फिर तो आप को वह काम छोड़ना नहीं चाहिए था.’’

‘‘क्या करें, मालिक ने लौकडाउन का फायदा उठाते हुए एकदम से 18 लोगों को निकाल दिया, जिन में मैं भी शामिल था.’’

‘‘वहां पर तो आप परमानैंट होंगे?’’

‘‘हां, छुट्टियां भी मिलती थीं. अभी भी वहां पर बहुत लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं. हमारी तो वहां एक यूनियन भी थी. पर मालिक ने धीरेधीरे सभी को निकालना शुरू कर दिया था.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘क्या मालिक को यूनियन से डर होता है?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘डर तो होता है, क्योंकि यूनियन होने से कामगार को एक तरह की सिक्योरिटी मिलती है. अगर किसी ने कामगार को उचित वेतन नहीं दिया है, तब यूनियन मैनेजमैंट के सामने अपनी बात रखती है.

यूनियन न होने से कामगार अपनी बात को मजबूती से और बिना डर के नहीं रख सकता है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप उस क्लब में क्यों नहीं एक यूनियन बना लें?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब ट्रेड यूनियन बनाना आसान काम नहीं है. सरकार ने ट्रेड यूनियन बनाने के लिए नियमों में बड़ी कड़ाई की है. पहले जहां 7 लोग मिल कर यूनियन बना लेते थे, अब कुल कामगारों का 10 फीसदी कर दिया गया है. न 10 फीसदी कामगार होंगे, न यूनियन बनेगी.

अब कारखाने और फैक्टरी के अंदर धरनाप्रदर्शन करने की भी छूट नहीं है. सरकार केवल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रही है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘जब ट्रेड यूनियनें नहीं होंगी, तब कामगारों की आवाज कौन उठाएगा?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब आवाज ही कौन उठा रहा है… जो हैं वे बहुत कमजोर हैं. देखिए, इस क्लब में काम करते हुए मुझे 3 साल हो गए हैं, लेकिन कोई छुट्टी नहीं मिलती है. जिस दिन काम करने नहीं गए, उस दिन की दिहाड़ी नहीं मिलती है.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप को यहां कितने पैसे मिलते हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘15,000 मिलते हैं, लेकिन आनेजाने का किराया और छुट्टी निकाल लूं, तो 10,000 बच जाते हैं. लेकिन भाई साहब, बगैर छुट्टी के कैसे काम चलेगा. बस, यही सोचता हूं कि खाली बैठने से अच्छा है कि कुछ करता रहूं.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप के बच्चे तो बड़े हो गए होंगे…’’

‘‘जी…’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘आप कहां रहते हैं भाई साहब?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘विनय नगर, फरीदाबाद में.’’

‘‘किराए पर रहते हैं?’’

‘‘नहीं. 30 गज का प्लौट ले कर घर बना लिया है. उसी में रहते हैं.’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी के पीले और जंग लगे हुए दांत देख कर पूछा, ‘‘क्या आप गुटका या पान मसाला खाते हैं?’’

‘‘नहीं, पर बीड़ी जरूर पीता हूं.’’

हसामुद्दीन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, ‘‘आप वादा कीजिए कि आज से बीड़ी नहीं पीएंगे?’’

उस आदमी ने अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया, लेकिन कहा, ‘‘वादा कर के तोड़ना नहीं चाहता हूं.’’

हसामुद्दीन ने उसे एक सलाह दी, ‘‘आप आलू, प्याज, फल बेचने का अपना काम करें. इतना पैसा तो आप फरीदाबाद में ही कमा लेंगे.

उस आदमी ने कहा, ‘‘एक बार ढाबा शुरू किया था, लेकिन चला नहीं.’’

वह आदमी केंद्रीय सचिवालय उतरने लगा, तब हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘मैं ने आप को 2 बातें बताई हैं. एक बीड़ी न पीने की और दूसरी अपना कोई काम करने की.’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘मैं आप की बात हमेशा याद रखूंगा.’’

हसामुद्दीन सोचने लगा, ‘आमजन में बेरोजगारी के चलते ही ठेकेदारी प्रथा फलफूल रही है और नवउदारवादी नीति का मतलब है कि काम ज्यादा, पैसे कम और न कोई छुट्टी, न कोई स्वास्थ्य सुरक्षा और न ही कोई दूसरा फायदा.

‘इस नीति ने केवल पूंजीपतियों को मजबूत किया है. सरकार की इच्छाशक्ति से ही इस देश में ठेकेदारी प्रथा को खत्म किया जा सकता है या लोग ठेकेदारी पर काम ही न करें.’

निजीकरण पर हसामुद्दीन को अपनी कालोनी के एक साथी दशरथ ठाकुर की बात याद आई. वे कहते हैं, ‘‘सरकारी मुलाजिम खुद इस के लिए जिम्मेदार हैं. जिस की नौकरी लग जाती है, वह खुद को सरकारी दामाद समझने लगता है.’’

दशरथ ठाकुर रेलवे महकमे से रिटायर हो चुके हैं. हसामुद्दीन ने उन से एक बार पूछा था, ‘‘क्या रेलवे में सभी मुलाजिम काम नहीं करते हैं?’’

तब उन्होंने कहा था, ‘‘सरकारी मुलाजिम देरी से आता है और जल्दी घर चला जाता है.’’

हसामुद्दीन इस बारे में विचार करता है कि कैंटीन में चाय पीना, सिगरेट फूंकना या किसी से बात करने का मतलब यह नहीं है कि वह काम नहीं करता है.

कुछ मुलाजिम कामचोर जरूर होते हैं, लेकिन उन्हें कड़ाई से दुरुस्त किया जा सकता है न कि उदारवादी लोककल्याणकारी व्यवस्था को बदल कर पूंजीवादी व्यवस्था लागू कर.

अंगरेजी राज में भी तो सरकारी स्कूल थे. सरकारी रेलवे और डाक महकमे थे. तब वहां काम होता था, तो आज क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या केवल डर से ही लोग सही से काम करेंगे? निजीकरण तो इस का कोई हल नहीं है.

फैक्टरी मालिक ग्रैच्युटी नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि नवउदारवादी नीति तो केवल टैंपरेरी नौकरी देने के पक्ष में है. आज बड़ेबड़े उद्योगों में भी टैंपरेरी नौकरियां ही दी जा रही हैं.

पूंजीपतियों के पक्षधर कहते हैं, ‘भाई, सभी को परमानैंट नौकरी नहीं दी जा सकती है…’ यह सोच हमारे समाज में तेजी से बढ़ाई गई है.

पर लोग यह क्यों नहीं सोचते कि कोई पूंजीपति खुद पूंजीपति नहीं बनता है, उसे मजदूर तबका पूंजीपति बनाता है. क्या पूंजीपति मजे नहीं करते हैं? उन के बच्चों की शादी में करोड़ों रुपए खर्च नहीं होते हैं?

खर्च करना गलत नहीं है, क्योंकि एक का खर्च होना भी तो अर्थशास्त्र में दूसरे की आमदनी है. सरकारी मुलाजिमों की आड़ में तो प्राइवेट कंपनियों में काम कर रहे मजदूरों, दूसरे मुलाजिमों के हकों को इन बीते दशकों में तेजी से हड़प लिया गया है.

7 लोग मिल कर यूनियन क्यों नहीं बना सकते हैं, जबकि धर्म को बचाने के लिए 4 लोग खड़े हो कर होहल्ला कर सकते हैं? कामगारों का हक क्या हक नहीं है? किसी कंपनी के मालिक ने किसी को रोजगार दे कर क्या उसे अपना गुलाम बना लिया है?

हसामुद्दीन को बस की सीढि़यों पर बैठे उस बड़े लड़के की याद आई, जिस के शरीर पर टैटू खुदे थे. क्या वे पैदाइशी थे या समाज ने ही उसे इतना धर्मभीरू बना दिया? अच्छेबुरे की परवाह न करते हुए उस ने अपने धर्म को ज्यादा अहमियत दी, लेकिन धर्म भी एक पदार्थ है… निकालने वाले तो उस में से अच्छीअच्छी चीजें निकाल कर अपनी जिंदगी संवार लेते हैं.

दूसरी तरफ सांप्रदायिक और धार्मिक अवसरवादी तत्त्व हैं, जो ऐसे लड़कों का इस्तेमाल हैं, क्योंकि धर्मभीरुता और पक्षधरता तो हर आदमी में होती है, लेकिन सांप्रदायिकता उस के अनुपात को बढ़ा देती है.
वे दोनों लड़के भयमुक्त लग रहे थे, लेकिन उन्हें भी भूख और प्यास लगती है. उन्होंने बस में कुछ लोगों को धमकाया भी था.

आदमी में डर होता है, पर जिसे सजा का डर न हो तो वह भयमुक्त हो जाता है या व्यवस्था ही अमानवीय हो जाए, तब आदमी का डर खत्म हो जाता है. अगर आदमी की जीने की चाह ही मर जाए, तब भी आदमी को डर नहीं लगता है.

कालोनी के साथी दशरथ ठाकुर को अब सरकारी नौकरियों में कमियां नजर आती हैं, जबकि वे खुद सरकारी मुलाजिम थे. उन का पैर रेल से कट गया था. रेलवे ने उन्हें अपने महकमे में दूसरा काम दिया, उन का इलाज करवाया. यहां तक कि नकली पैर भी लगवाया.

उन की रेलवे की पैंशन है, पर प्राइवेट सैक्टर में काम कर रहे कामगारों के साथ होने वाले हादसों में मालिक उन्हें बाहर का रास्ता ही दिखा देते हैं.

इतने में हसामुद्दीन को कंडक्टर की आवाज सुनाई देने लगी, ‘‘अरे भाई, बस खाली कर दो…’’ हसामुद्दीन बस से उतर कर मिंटो ब्रिज से होता हुआ रीगल सिनेमा की तरफ चल दिया. Long Hindi Story

Hindi Romantic Story: कौन तुम्हें यों प्यार करेगा…

Hindi Romantic Story ‘‘दादी, मैं बाहर खेलने जाऊं?’’ सुरभि ने सोफिया से इजाजत मांगी.

‘‘हां, लेकिन ज्यादा दूर मत जाना. यहीं अहाते में खेलना. और हां, शोर बिलकुल भी नहीं करना. दोपहर का वक्त है. सब लोग अपनेअपने घरों में सो रहे होंगे.’’

‘‘ठीक है दादी,’’ कहते हुए सुरभि दौड़ कर नीचे खेलने चली गई.

सोफिया टीवी के चैनल बदलने लगीं. सुरभि उन के बेटे कमलेश और बहू निम्मी की बेटी है. कमलेश एक सरकारी बैंक में काम करता है. बारबार तबादले से परेशान हो कर उस ने कठुआ में ही अपनी बेटी का दाखिला करा दिया था.

दोनों पतिपत्नी कामकाजी लोग हैं और बैंक में ही कभी अंबाला तो कभी चंडीगढ़ में काम करते हैं. उन का बेटा सुनील और सुरभि यहां कठुआ में अपनी दादी के साथ रहते हैं.

सोफिया अब विधवा हो चुकी हैं. उन के पति देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे.

इस साल सोफिया 97 साल की हो गई थीं. अब तो उन से हिला भी नहीं जाता था. घर में मेड आती थी, जो सुबहशाम खाना बनाती, कपड़े धो देती, बच्चों को खाना खिला देती.

बुढि़या सोफिया के पास अब कोई काम नहीं था. वे बच्चों से अखबार पढ़वाती थीं. जासूसी उपन्यासों का उन को शुरू से शौक था. वे अपने पोते सुनील को जबतब बिठा लेती थीं. कभी अखबार पढ़ने को कहती थीं, तो कभी जासूसी कहानियों को पढ़ कर सुनाने की इच्छा जाहिर करती थीं.

यह सब काम इतवार को या सरकारी छुट्टी या फिर किसी पर्वत्योहार पर ज्यादा होता था. जब थोड़ाबहुत पढ़ कर बच्चे इधरउधर भागने लगते या खेलने जाने की जिद करने लगते, तो सोफिया का एक ही सहारा होता था, टैलीविजन पर न्यूज चैनल देखना.

आज एक न्यूज चैनल बदलते हुए सोफिया के हाथ एकाएक रुक गए. आज फिर एक फौजी की लाश तिरंगे में लिपटी हुई आई थी. उस फौजी की उम्र 25 साल के आसपास रही होगी. सीमा पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुए वह जवान शहीद हो गया था. उस शहीद जवान को हवा में बंदूक की गोलियां चला कर सलामी दी जा रही थी. सब लोग सावधान की स्थिति में खड़े थे.

सोफिया के पति की विदाई भी ऐसे ही हुई थी. उन को भी ऐसे ही गोलियों की सलामी दी गई थी. गोलियों की आवाज के बीच सोफिया अपने अतीत की खोह में गुम होती चली गईं.

‘‘माफ कीजिए, क्या मैं यहां थोड़ी देर के लिए बैठ जाऊं? मैं आप को बहुत देर तक तकलीफ नहीं देने वाला हूं. बस, मुझे कठुआ तक जाना है. अगले किसी स्टेशन पर उतर कर मैं जनरल डब्बे में चला जाऊंगा. अगर आप को एतराज न हो तो…’’ उस नौजवान ने बहुत सधे हुए शब्दों में कहा था.

लेकिन पता नहीं क्यों सोफिया को गुस्सा आ गया था. बिना सौरभ की तरफ देखे ही वह बोली, ‘‘आप को पता नहीं है कि यह रिजर्वेशन वाला कंपार्टमैंट है… आप को इस कंपार्टमैंट में नहीं आना चाहिए था. अगर चढ़ना ही था, तो किसी जनरल कंपार्टमैंट में चढ़ जाते.

‘‘हम लोग जनरल कंपार्टमैंट की परेशानियों से बचने के लिए ही रिजर्वेशन कराते हैं, ताकि आराम से सफर कर सकें.’’

सोफिया पहले से ही बहुत परेशान थी. धनबाद से उस की ट्रेन थी. उसे जम्मू जाना था. घर पर उस के मांबाप अकेले थे. उधर जम्मूकठुआसांभा बौर्डर पर लगातार सीजफायर का उल्लंघन हो रहा था. मोर्टार और गोलियों की बरसात हो रही थी.

सोफिया अपने मांबाप को ले कर बहुत चिंतित थी. उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी तरह जल्द से जल्द जम्मू पहुंच जाए.

सोफिया दिल्ली में काम करती थी. धनबाद अपने किसी काम से आई थी. तब तक पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी शुरू हो गई थी. वह अभी अपना काम निबटा भी नहीं पाई थी, तब तक युद्ध जैसे हालात शुरू हो गए थे. लोगों में एक तरह का डर पैदा हो गया था. चारों तरफ अफरातफरी का माहौल बन गया था.

सोफिया को अपने मांबाप की चिंता सताने लगी थी. पहले तो उसे ट्रेन की टिकट ही नहीं मिल रही थी, पर किसी तरह इधरउधर से जुगाड़ बिठा कर उस ने टिकट का बंदोबस्त किया था.

उस नौजवान ने एक बार फिर कोशिश की, ‘‘प्लीज, केवल अगले स्टेशन तक मुझे यहां बैठने दीजिए. मुझे मालूम है कि आप बहुत नेकदिल हैं. आप का दिल मोम की तरह कोमल है और खूबसूरत लोग किसी का दिल नहीं दुखाते, बल्कि दूसरों की हमेशा मदद ही करते हैं. ऐसा पता नहीं मुझे क्यों आप को देख कर लगता है. वैसे, मेरा नाम सौरभ है.’’

इस बार सोफिया को मुड़ कर सौरभ को देखना बड़ा जरूरी हो गया. वह बोली, ‘‘अच्छा तो मैं खूबसूरत और रहमदिल भी हूं. यह तो मुझे पता ही नहीं था. आप की मेहरबानी से आज मुझे पता चल गया… शुक्रिया. आप पीछे से भी लोगों का चेहरा देख लेते हैं क्या या आप ने झूठ बोलने में पीएचडी कर रखी है?’’

सौरभ झेंप गया. उस ने सचमुच सोफिया को सामने से नहीं देखा था. वह तो हड़बड़ी में ट्रेन में चढ़ गया था. खिड़की से उस ने बस सोफिया का आधा चेहरा ही देखा था.

सौरभ झेंपते हुए बोला, ‘‘नहीं, मैं ने खिड़की से आप को देख लिया था.’’

‘‘अच्छा जी, आप कहीं इसलिए तो इस कंपार्टमैंट में नहीं चढ़ गए कि आप को एक खूबसूरत लड़की दिख गई थी और आप उस के पीछेपीछे हो लिए? आप को कहीं जाना भी है या बस यों ही ट्रेन में चढ़ गए? मैं खूब जानती हूं आप जैसे लोगों को. लड़की देखी नहीं और लगे हाथ साफ करने.’’

सौरभ बस इतना ही कह सका, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. मुझे ड्यूटी जौइन करनी है.’’

सोफिया को अब अफसोस हुआ. उस ने सौरभ को बहुत भलाबुरा कह दिया था. वह बोली, ‘‘अच्छा, बैठ जाइए.’’

सौरभ ने कहा, ‘‘जी, मैं ठीक हूं. मुझे तो खड़े रहने की आदत है.’’

‘‘फिर भी बैठ जाइए. अगला स्टेशन अभी घंटेभर बाद आएगा.’’

सौरभ पर सोफिया ने सरसरी नजर दौड़ाई. चौड़ी छाती, तांबई रंग, कद साढ़े 6 फुट. मजबूत कंधे. गोरा उम्र कोई 30-32 साल. जींसटीशर्ट में वह बेहद खूबसूरत लग रहा था. हाथ में एक बैग. बंधा हुआ एक कंबल. कुल इतना ही सामान था.

‘‘क्या करते हैं वहां जम्मू में?’’ सोफिया ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस घोड़ों के अस्तबल में काम करता हूं और मुसाफिरों को ऊपर पहाड़ पर ले जाता हूं.’’

‘‘मुझे बना रहे हैं. आप की कदकाठी और आप की पर्सनैलिटी देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि आप कोई अस्तबल या घोड़े के सईस हो. सचसच बताइए कि कौन हैं आप?’’

सौरभ का दिल इस बार तेजी से धड़का था. वह नहीं चाहता था कि अपनी असलियत सोफिया को बताए.

दरअसल, उस को कठुआ जाना था. सीमा पर हालात बहुत खराब चल रहे थे. वह अपनी बहन की शादी में यहां धनबाद आया था. शादी अभी 2 दिन पहले ही निबटी थी. तब तक देश में युद्ध जैसे हालात बन गए थे.

सौरभ अपनी पहचान किसी को बताना नहीं चाहता था कि वह एक फौजी है. इस तरह से सब को अपनी असलियत बताना उसे ठीक नहीं लगता था. वह बहुत ही शांत स्वभाव का था. ज्यादा बात करना उस के स्वभाव में नहीं था.

सौरभ बोला, ‘‘नहीं, मैं घोड़ों की देखभाल ही करता हूं. पहाड़ की चोटी पर मुसाफिर सीधे नहीं चढ़ पाते, इसलिए घोड़ों की मदद से ऊपर पहाड़ पर जाते हैं. मैं छोटामोटा काम करने वाला ही आदमी हूं. पता नहीं आप को क्यों ऐसा लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूं.’’

सौरभ की बातों में पता नहीं ऐसा क्या था कि न चाहते हुए भी सोफिया को यकीन करना पड़ गया कि सौरभ जोकुछ कह रहा है, वह सच है. शाम कब की हो चुकी थी. ट्रेन अपनी रफ्तार में दौड़ती जा रही थी.

अगला स्टेशन आने ही वाला था. उस स्टेशन से सोफिया का मुंहबोला भाई मुरारी आ कर ट्रेन में चढ़ने वाला था. उस को भी सोफिया के साथ जम्मू जाना था.

सोफिया बहुत बेचैन हो कर पहलू बदल रही थी. दरअसल, मुरारी आईटीआई का इम्तिहान दे कर सीधे स्टेशन आ कर उस के साथ ही जम्मू तक जाने वाला था.

सोफिया के पास वाली अपर बर्थ मुरारी के नाम से बुक थी. स्टेशन आया, लेकिन उस का भाई नहीं दिखा.
सोफिया ने मुरारी को फोन लगाया, ‘‘हां, मुरारी तुम कहां हो? आ जाओ स्टेशन, गाड़ी स्टेशन पर खड़ी है.’’

‘दीदी, मैं ट्रैफिक में फंस गया हूं. मुझे स्टेशन आने में करीब एकसवा घंटे से कम नहीं लगेगा,’ मुरारी ने बताया.

‘‘ट्रेन तो केवल 10 मिनट ही रुकती है इस स्टेशन पर. किसी तरह कोशिश करो जल्दी पहुंचने की,’’ सोफिया बोली.

‘दीदी, नहीं हो पाएगा. आप चली जाओ. मैं एकदो दिन बाद आ जाऊंगा,’ मुरारी ने कहा.

‘‘लेकिन मैं अकेले कैसे इतनी दूर तक का सफर करूंगी. मेरे साथ सामान भी तो है.’’

‘अरे दीदी, मैं कठुआ में अपने किसी दोस्त को फोन कर दूंगा. वह सामान उतरवा देगा. घबराने की कोई जरूरत नहीं है. सब ठीक होगा. अच्छा, रखता हूं. ट्रैफिक खुल गया है. अब स्टेशन न जा कर सीधा घर चला जाऊंगा. चलो, ठीक है. हैप्पी जर्नी दीदी.’

‘‘ठीक है, रखो फोन,’’ सोफिया ने बेमन से कहा.

सौरभ और मुरारी की कदकाठी और चेहरा एक सा था. वह सोचने लगी कि जगहजगह युद्ध जैसे हालात चल रहे हैं. पता नहीं पड़ोसी दुश्मन देश कब हमला कर दे. क्यों न वह सौरभ को ही अपने साथ ले चले? स्टेशन पर मुरारी का दोस्त तो आ ही जाएगा उस का सामान लेने.

सौरभ उतरने ही वाला था कि तभी सोफिया को परेशान देख कर बोला, ‘‘आप कुछ परेशान सी लग रही हैं.’’

‘‘हां, मेरा मुंहबोला भाई मुरारी अभी स्टेशन पर आने ही वाला था, लेकिन ट्रैफिक में फंस गया. अब मुझे अकेले ही सफर करना पड़ेगा.’’

‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. खैर, मैं चलता हूं,’’ सौरभ ने कहा.

सौरभ जब सोफिया के पास से गुजरा, तब सोफिया ने टोका, ‘‘सुनिए, आप चाहें तो मेरे भाई की सीट पर बैठ सकते हैं. अकेली लड़की के साथ में किसी विश्वासी आदमी का होना बेहद जरूरी है. अगर आप को कोई दिक्कत न हो तो.’’

‘‘लेकिन जब टीटी आएगा तब?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘अरे, टीटी से मैं बात कर लूंगी. बस आप यहीं रहिए,’’ सोफिया बोली.

सौरभ मान गया. थोड़ी देर के बाद सोफिया ने सौरभ से पूछा, ‘‘आप चाय लेंगे?’’

‘‘आप किसी ऐरेगैरे को चाय पिलाएंगी?’’ सौरभ ने चुटकी ली.

‘‘अरे, मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. आप उस बात को अब भी पकड़े हुए हैं. आदमी को पहचानने में कभीकभी गलती हो जाती है,’’ सोफिया बोली.

‘‘यानी कि आप के हिसाब से मैं गलत आदमी हूं?’’

‘‘ऐसा मैं उस समय तक ही सोचती थी, लेकिन अब नहीं. आदमीआदमी में फर्क होता है. इतनी तो परख है मुझ में,’’ सोफिया ने कहा.

‘‘तो क्या परखा आप ने? कैसा आदमी हूं मैं?’’

‘‘आप भले आदमी हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘आप भले आदमी न होते, तो मैं आप को अपने साथ सफर करने की इजाजत नहीं देती.’’

‘‘अच्छा, तो यह बात है.’’

‘‘हां, और क्या…’’

‘‘यह तो आप की जरूरत है कि आप के साथ कोई मर्द सफर करने के लिए नहीं है, नहीं तो आप मुझे अपने साथ इस कंपार्टमैंट में रुकने को न कहतीं. खैर, ऐसा होना लाजिमी भी है,’’ सौरभ ने जैसे सफाई देनी चाही.

सोफिया ने चाय की प्याली बनाई और सौरभ की तरफ बढ़ा दी. इस बार सौरभ के हाथ से सोफिया का हाथ छू गया.

ठंड के मौसम में सोफिया का हाथ बिलकुल ठंडा हो गया था. सौरभ ने चाय की प्याली थाम ली और धीरेधीरे चाय पीने लगा.

सौरभ ने गौर से सोफिया के चेहरे को निहारा. गोरा रंग, हरी आंखें. भरीभरी छातियां. जींसटौप में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

सोफिया ने पूछा, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हैं?’’

‘‘आप का खूबसूरत चेहरा.’’

‘‘मैं कहां खूबसूरत हूं. मेरी तो उम्र भी अब ढलने लगी है. मेरी उम्र के लोगों के तो बड़ेबड़े बच्चे होते हैं.’’

‘‘नहीं, मैं सच कह रहा हूं. आप बहुत खूबसूरत हैं. आप के जिस्म के हर हिस्से को कुदरत ने बहुत फुरसत से बनाया है.’’

फिर सौरभ को लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गया है. वह अब चुप हो गया था. वह खिड़की से बाहर देखने लगा था.

‘‘उधर क्या देख रहे हो? अभी मेरी खूबसूरती की बात कर रहे थे और अभी बाहर क्या निहारने लगे?’’

‘‘कुछ नहीं, कुदरत की बनाई हुई चीजें ही देख रहा था. नदी, तालाब, पहाड़, चांद की चांदनी…’’

‘‘क्या ये मुझ से भी खूबसूरत हैं?’’

सौरभ केवल हंस कर रह गया.

‘‘शादी हो गई तुम्हारी?’’ सोफिया ने सौरभ के चेहरे को निहारते हुए पूछा.

‘‘नहीं,’’ सौरभ बाहर के नजारे में कहीं खोता हुआ बोला.

‘‘शादी लायक तो तुम्हारी उम्र हो ही गई है. अब तक क्यों नहीं की?’’

‘‘यह सवाल तो मैं तुम से भी पूछ सकता हूं.’’

‘‘जिम्मेदारियां… और क्या वजह हो सकती है. मैं अपने मांबाप की अकेली बेटी हूं. मेरे मांबाप बूढ़े हैं. उन की उम्र हो गई है. आखिर किन के भरोसे उन को छोड़ूं? मेरे चले जाने के बाद उन को कौन देखेगा?

लेकिन तुम ने शादी क्यों नहीं की? तुम्हारी भी तो शादी लायक उम्र हो गई है?’’ सोफिया बोली.

‘‘वही जिम्मेदारी की बात आ जाती है. तुम्हारी वाली हालत. घर में बहन थी. उस की शादी करनी थी. उस के बाद ही तो अपनी शादी के बारे में सोचता,’’ सौरभ बोला.

दोनों अपनी हालत पर मुसकराने लगे.

‘‘अरे, मैं ने अपना फोन कहां रख दिया,’’ सौरभ को अचानक अपना फोन याद आया.

‘‘ठीक से देखो, यहींकहीं होगा.’’

सुनो, तुम अपने मोबाइल से जरा मेरे नंबर पर रिंग कर दो. हो सकता है, यहींकहीं गिरा हो. मिल जाए.’’

सोफिया ने नंबर पूछ कर मिलाया और मोबाइल की घंटी पर एक प्यारी सी रिंगटोन बजने लगी, ‘सुनो न संगेमरमर… कुछ भी नहीं है…’

मोबाइल सौरभ की सीट के बगल में ही गिरा था. रिंग मारने पर आसानी से मिल गया.

‘‘रिंगटोन तो तुम ने बहुत अच्छी लगा रखी है.’’

‘‘हां, मुझे यह गाना बेहद पसंद है.’’

‘‘तुम ने मेरी कौलर ट्यून सुनी है?’’

‘‘नहीं,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘फिर मेरा मोबाइल नंबर डायल करो.’’

सौरभ ने स्पीकर औन कर दिया. आवाज आई, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा, जैसे मैं करती हूं…’

सोफिया का चेहरा खुशी के मारे चमकने लगा.

सौरभ बोला, ‘‘ये दोनों मेरे फेवरेट गाने हैं.’’

‘‘तुम बहुत स्मार्ट हो.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम ने बहाना बना कर मेरा मोबाइल नंबर ले लिया,’’ सोफिया बोली.

‘‘नहीं, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. तुम कहो तो डिलीट कर दूं?’’

‘‘नहीं, लेकिन तुम्हें पता है कि लड़कियां अपना नंबर किस को देती हैं?’’

‘‘किस को?’’

‘‘किसी खास को.’’

‘‘अच्छा, तो क्या चलोगी मेरे साथ डेट पर?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘लेकिन तुम उम्र में मुझ से बहुत छोटे हो. कहां तुम 30 के और कहां मैं 40 की. एक दशक का अंतर है हमारी और तुम्हारी उम्र में,’’ सोफिया बोली.

‘‘प्यार में उम्र, ऊंचनीच, जातपांत, अमीरगरीब कुछ माने नहीं रखता, बस दिल मिलना चाहिए,’’ सौरभ ने बताया.

‘‘10 साल बीतने के बाद तुम ही किसी नईनवेली को खोजने लगोगे. तब मैं तुम्हारे लिए बूढ़ी हो जाऊंगी,’’ सोफिया बोली.

‘‘ऐसा नहीं होगा. मैं तुम्हें रूह की गहराइयों से चाहता हूं. तुम्हारा प्यार मेरे लिए पल दो पल का नहीं है,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘सच में?’’ सोफिया ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अच्छा, इस नंबर का क्या करना है? हो सकता है, हम फिर कभी मिलें ही न. यह हमारी आखिरी मुलाकात हो,’’ सौरभ ने कहा.

सोफिया चुप रही. ट्रेन रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. आगे का सफर बहुत अच्छा रहा. ट्रेन कठुआ स्टेशन पर पहुंची. मुरारी का दोस्त मयंक सोफिया को लेने आया था. आखिरी बार सौरभ और सोफिया मिल रहे थे.

सौरभ ने सोफिया को इशारे से कहा कि फोन करना. थोड़ी देर में गाड़ी जम्मू के लिए आगे बढ़ गई.

घर पहुंचने के बाद सोफिया का दिल किसी काम में नहीं लगता था. उस को बारबार सौरभ की याद आती थी.

एक तय समय तक लड़के वाले सोफिया को देखने और रिश्ते की बात करने के लिए आते थे, लेकिन सोफिया जिम्मेदारियों के बो?ा तले खुद को दबाती चली गई. उस ने शादी के इरादे को ही एक सिरे से खारिज कर दिया था. लेकिन सौरभ से मिल कर उस में उमंगें जागने लगी थीं.

एक दिन सोफिया ने सौरभ को फोन लगाया और शिकायत करती हुई बोली, ‘‘तुम्हें तो मेरी याद भी नहीं आती होगी न?’’

‘ऐसा नहीं है मेरी जान. तुम्हें तो मैं एक पल भी भूल नहीं सका, लेकिन केवल बात करने से काम नहीं चलता. काम भी तो करना पड़ता है. अगर घोड़े की सेवाटहल न करूं, तो मालिक मेरी जान खा जाएगा.

मेरा ज्यादातर समय टूरिस्टों के साथ ही बीतता है. पेट के लिए सब करना पड़ता है,’ सौरभ बोला.

‘‘तुम यहीं आ जाओ. चार घोड़े तुम्हारे लिए खरीद देती हूं. तुम उन की सेवा करना और मुझे उन घोड़ों पर घुमाना. जो मजदूरी तुम वहां पाते हो, यहां आ कर मुझ से ले लेना,’’ सोफिया बोली.

सौरभ ने कहा, ‘सो तो ठीक है, लेकिन मेरी नौकरी का सवाल है, नहीं तो मैं जरूर आता. एक बार नौकरी चली गई, तो फिर न मिलेगी. और तुम्हें तो पता है कि नौकरी मिलना आज के समय में कितना मुश्किल है.’
सोफिया बोली, ‘‘और तुम ने मु?ो डेट पर ले जाने को कहा था. उस का क्या हुआ?’’

‘डेट पर भी चलेंगे. अभी इधर सीजन चल रहा है. दो पैसे कमाने के दिन हैं, इसलिए मालिक से छुट्टी की बात भी नहीं कर सकता. मैं आऊंगा तुम से मिलने, लेकिन अभी तुम थोड़ा समय दो.’

‘‘सौरभ, मैं तुम्हें जीजान से चाहती और प्यार करती हूं. मैं तुम से मिलना चाहती हूं. तुम को छूना चाहती हूं. तुम में समाना चाहती हूं,’’ सोफिया ने अपना दिल खोल कर रख दिया.

‘मैं भी तुम से सच्चा प्यार करता हूं. तुम को तो भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता,’ सौरभ ने कहा.

‘‘ओह सौरभ, तुम कितने अच्छे हो,’’ सोफिया खुश हो गई.

किसी तरह 2 महीने बीते. बर्फ पिघलने के बाद पाकिस्तानी सेना ने भारत में घुसपैठ कर दी. पहलगाम, कठुआ और कारगिल के अलावा श्रीनगर, अखनूर, बारामूला में बेकुसूर नागरिक मारे जा रहे थे. अब युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था.

एक दिन सौरभ का फोन आया. उस समय सोफिया बाजार में सामान खरीदने गई थी. घर आ कर मोबाइल देखा तो कई मिस्ड काल थे.

सोफिया ने फोन मिलाया, ‘‘बोलो मेरे चरवाहे, मेरी जान ने कैसे याद किया मुझे?’’

‘मैं अब तुम्हें देखे बगैर नहीं रह सकता. तुम्हारी बहुत याद आती है. तुम्हारी आवाज सुनते ही मेरे शरीर में अजीब सी हरकत होने लगती है,’ सौरभ ने कहा.

सोफिया बोली, ‘‘आ जाओ न फिर मुझ से मिलने, तुम को किस ने रोक रखा है.’’

सौरभ बोला, ‘आ जाता, लेकिन मेरा काम मुझे रोक लेता है. तुम समझ रही हो न…’

सोफिया नाराज हो कर बोली, ‘‘ये सब कहने की बातें हैं क्या…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘सुनो सोफिया, मैं तुम से एक बेहद जरूरी बात करना चाहता हूं. मेरा काम अब ज्यादा बढ़ गया है. मैं ज्यादातर ऊंचाई पर ही रहूंगा और उतनी ऊंचाई पर कोई नैटवर्क भी नहीं आता, इसलिए फोन से बहुत मुमकिन है बात न हो पाए. पर जब भी मौका मिलेगा मैं तुम्हें फोन कर लूंगा. फोन न कर सका, तो मैं तुम्हें हर हफ्ते खत लिखा करूंगा.

‘अपना खयाल रखना. खत का भी ज्यादा इंतजार मत करना. देश में अभी इमर्जैंसी जैसे हालात हैं.

बारामूला में मेरा पूरा परिवार दादादादी, चाचाचाची सब लोग रहते हैं.

‘इधर जम्मू में हालात बिगड़े तो मेरा एक और मकान धनबाद में है. मेरे दादादादी, अपने मांपिताजी को ले कर वहीं चली जाना. रुपएपैसों की बिलकुल चिंता मत करना. एक एटीएम कार्ड तुम्हें कुरियर से भेज रहा हूं. पिन की जानकारी ह्वाट्सएप कर दी है. ये सब मोटीमोटी बातें हैं, जिन की तुम को आने वाले समय में जरूरत पड़ेगी.’

‘तुम जा कहां रहे हो? मुझे बताओगे भी या मुझे इसी तरह अपना आदेश सुनाते रहोगे फोन पर?’
‘यह जान कर तुम क्या करोगी कि मैं कहां जा रहा हूं. सेफ्टी रीजन से तुम को ये बातें बताई हैं. बस, तुम इन बातों को मानना और एक बात यह कि सेना हैडक्वार्टर के पास ही एक डाकखाना है, जिस में एक डाक बाबू ‘नील चाचा’ काम करते हैं. कोई खास जानकारी चाहिए हो, तो उन से ले लेना.’

‘‘फिर भी तुम कहां जा रहे हो, मुझे कुछ तो पता होना चाहिए.’’

सौरभ ने कहा, ‘सोफिया, मुझे भी कुछ पता नहीं है कि मुझे कहां भेजा जा रहा है. बस, मुझे भेजा रहा है और मैं जा रहा हूं और मुझे जाना भी चाहिए.

‘देश में हालात बेहद खराब हैं. लोगों की छुट्टियां रद्द हो रही हैं. सब लोग काम पर लौट रहे हैं. होमगार्ड के सिपाही, पुलिस, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, आर्मी, एयरफोर्स. सब लोग. बीएसएफ तो मोरचे पर पहले से ही डटी हुई है.’

सोफिया बोली, ‘‘लेकिन इन का तुम से क्या संबंध है? तुम तो आम नागरिक हो. आम नागरिक को युद्ध से भला क्या मतलब है और खासकर एक सईस को?’’

‘मैं इस देश का एक नागरिक हूं और मुझे लगता है कि जब देश को युद्ध जैसी इमर्जैंसी का सामना करना पड़े, तो हर आदमी को युद्ध लड़ने के लिए तैयार होना चाहिए.’

अब सोफिया का माथा ठनका. सौरभ का डीलडौल और साढ़े 6 फुट लंबा कद देख कर उस को पहले ही इस बात का शक था कि वह फौज में काम करने वाला कोई आदमी है.

सोफिया ने कहा, ‘‘अच्छा तुम ठीकठीक बताओ कि तुम कौन हो? तुम सेना में काम करते हो? गुप्तचर विभाग में हो या कौन हो? तुम को मैं जितना समझाने की कोशिश करती जा रही हूं, तुम उतना ही उलझते जा रहे हो. प्लीज, मुझे सही जानकारी दो…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘मेरा एक फोन आ रहा है. रुको, मैं तुम से बाद में बात करता हूं.’’

सौरभ का फोन कट गया था, लेकिन भीतर में कहीं गहरा था सौरभ और उस की बातें भी. कुछ भी साफसाफ नहीं बताता सौरभ. जितना सोफिया सौरभ को सम?ाना चाहती थी, कहीं गहरे में उलझती जाती थी. उस को ट्रेन में ही चेत जाना चाहिए था कि ऐसे लोगों पर जल्दी यकीन नहीं करना चाहिए था.

तभी मोबाइल पर टिंग से एक मैसेज गिरा. सोफिया ने गौर से देखा. वह एटीएम कार्ड का पिन था. 0169.
तकरीबन 15 दिनों के बाद सोफिया को डाक से एटीएम कार्ड भी मिल गया. उस में एक लिहाफा था, जिस में एक बैंक खाता था. एचडीबीसी नाम का कोई बैंक था. उस की शाखा सोफिया के घर के बहुत पास में ही थी यानी सौरभ यहां आया था और उस ने लोकेशन भी देखी थी.

अजीब बात है. सौरभ को मेरे घर और मेरे घर के पास इस बैंक के बारे में अच्छे से पता था. मेरे घर तक आ कर वह मुझ से मिले बगैर चला गया और कहता है कि मुझ से बहुत प्यार करता है. खाक प्यार करता है. जरूर कोई मायावी किस्म का आदमी है सौरभ.

लेकिन लोकलाज का भी तो डर है सौरभ को. शादी से पहले अगर कोई लड़का मिलने आता है, तो लड़की को लोग गलत नजरों से देखते हैं, लेकिन केवल मायावी कह देने भर से काम नहीं चलेगा. वह जिम्मेदार भी तो है. वह भी शादी से पहले. लोग शादी के बाद जिम्मेदारी नहीं स्वीकारते, यह तो शादी से पहले ही जिम्मेदारी स्वीकार रहा है.

पड़ोसी देश के लिए अब नाक बचाने की बात आ गई थी. हमारी फौज ने पड़ोसी मुल्क को नाकों चने चबवा दिए थे, लेकिन हमारी तरफ भी कैजुअल्टी हुई थी. चीन और नेपाल भी इन खराब हालात में पाकिस्तान का साथ दे रहे थे. पूरे देश में ब्लैकआउट चल रहा था. हर जगह अंधेरा. हर जगह डर का माहौल. दिन में ही सोता पड़ जाता था.

सब जगह लोग महफूज ठिकानों में छिप गए थे. देश के किसी भी हिस्से से कभी भी भयानक खबरें आ जाती थीं. सड़कों पर लोगों के कहीं हाथ के टुकड़े तो कहीं पैर के टुकड़े जहांतहां दिखाई देते थे. दिनरात अस्पतालों में भीड़ लगी रहती थी.

मिलिटरी अस्पतालों में कैजुअल्टी ज्यादा हुई थी. वहां एंबुलैंस में भरभर कर लोग आते थे. लोगों का हुजूम अस्पतालों के बाहर अपनों की शिनाख्त कर रहा था. सायरन बजता और लोग बंकरों की तरफ भाग जाते.

अरुणाचल प्रदेश और सियाचिन से डरावनी और भयावह खबरें आ रही थीं. रूस और इजराइल हमारे देश के साथ खड़े थे. रूस ने हमारे लिए 2 दर्जन लड़ाकू बमवर्षक हवाईजहाज भेजे थे. इजराइल भी प्रचुर मात्रा में हमें हथियार मुहैया करा रहा था, लेकिन दोनों तरफ कैजुअल्टी बढ़ रही थीं.

सोफिया का दिल हलकान हो रहा था. वह बारबार सौरभ के बारे में ही सोच रही थी कि इस युद्ध में सौरभ की क्या हालत होगी? वह क्या कर रहा होगा? वह ठीक तो होगा या नहीं? महीनाभर हो चुका था, उस से बात किए. अब तक उस का कोई फोन नहीं आया था.

फोन आता भी तो कैसे… ज्यादातर टावर पहले ही बमबारी में बरबाद हो चुके थे. कुछ थोड़ेबहुत टावर जो थे, सिक्योरिटी की वजह से वहां इंटरनैट बंद कर दिया गया था.

अब लेदे कर सेना हैडक्वार्टर और उस के डाकघर का सहारा था. सेना हैडक्वार्टर और डाकघर सोफिया के
घर के करीब था, लेकिन वह वहां सिक्योरिटी की वजह से नहीं जाना चाहती थी.

पर एक दिन अलसुबह ही सोफिया निकल पड़ी. सेना का हैडक्वार्टर और डाकघर ऊंचाई पर थे.

चलतेचलते उस की सांसें फूलने लगीं. पूछतीपाछती वह किसी तरह काउंटर पर पहुंची. वहां के पोस्टमास्टर का नाम नीलमणि था, जिन्हें सब ‘नील चाचा’ कहते थे.

सोफिया ने पूछा, ‘‘आप में से ‘नील चाचा’ कौन हैं?’’

एक दुबलापतला आदमी वहां डाक छांट रहा था. उस ने पतली ऐनक से खिड़की की तरफ देखा और कहा, ‘‘कौन?’’

सोफिया को लगा जैसे उस का आना कामयाब रहा. वह बोली, ‘‘आप ही ‘नील चाचा’ हैड पोस्टमास्टर हैं?’’
बूढ़े ने ‘हां’ में गरदन हिलाई और कहा, ‘‘डाकिया परसों डाक बांटते समय मोर्टार के छर्रे से जख्मी हो गया है. अभी वह अस्पताल में है. उस की जगह मैं उस का काम कर रहा हूं.’’

‘‘अगर आप को कोई तकलीफ न हो, तो आप मेरी डाक देख देंगे… मेरी कोई चिट्ठी आई हो तो… आप समझ रहे हैं मैं जो कह रही हूं…’’

‘नील चाचा’ ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है बेटी?’’

‘‘मेरा नाम सोफिया है.’’

सोफिया नाम सुनते ही ‘नील चाचा’ जबरदस्ती मुसकराते हुए वे बोले, ‘‘अच्छा, तो तुम सौरभ की मंगेतर हो… नहीं बेटी, तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई है. सौरभ तुम्हारे बारे में मु?ा से अकसर बातें करता था.’’

‘‘आप सौरभ को जानते हैं ‘नील चाचा’?’’

‘‘अरे, सौरभ को कौन नहीं जानता… वह बहुत ही प्यारा लड़का है.’’

‘‘वैसे क्या करते हैं वे सेना में?’’

इस बार ‘नील चाचा’ ने बहुत जोर से सोफिया को घूरा और कुछ देर तक वे उस के चेहरे को देखते रहे, फिर बोले, ‘‘तुम सोफिया ही हो न… सौरभ की मंगेतर?’’

‘‘हां,’’ सोफिया ने ‘नील चाचा’ को बहुत हैरत से देखा.

‘‘हां, तो तुम्हें सचमुच नहीं पता कि सौरभ सेना का जवान है. वह भारतीय सेना में अफसर है.’’

‘‘देखो, उस ने बताया था मुझे, लेकिन मैं भूल गई,’’ सोफिया को झिझक हुई. उसे अपने बरताव पर कोफ्त हो रही थी. नाहक ही उस ने ‘नील चाचा’ से सौरभ के बारे में पूछ लिया. आखिर क्या सोचेंगे वे…
‘‘मेरी कोई डाक आए तो बताइएगा,’’ सोफिया बोली.

‘‘जरूर,’’ ‘नील चाचा’ बोले.

सोफिया घर पहुंची तो वह सौरभ के बारे में ही सोचती रही. सेना में अफसर… और अपने आप को घोड़े की सेवा करने वाला एक मामूली सेवक बता रहा था. इंडियन आर्मी में अफसर और अपने आप को मामूली गाइड बता रहा था.

आने दो इस बार, फिर खबर लेती हूं. महीनों बात नहीं करूंगी. सम?ाता क्या है अपने आप को. बहुत स्मार्ट बनते हो, बच्चू. अब खत लिखेंगे तो जवाब भी नहीं दूंगी. इस बार मजा चखा कर दम लूंगी.

जब हम किसी से मिल नहीं पाते और उस से प्यार भी करते हैं, तो हालात बहुत मुश्किल हो जाते हैं. प्यार में पड़ी सोफिया का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वह सौरभ से मिल तो नहीं सकती थी, लेकिन मिलने की जो भी उम्मीद होती उस पर विचार करती. उस की गैरमौजूदगी में उस से लड़तीझगड़ती और फिर खुद अपनी बेबसी पर रोने भी लगती.

सोफिया का जो था, सौरभ ही था और वह तो बस यह चाहती थी कि किसी तरह उस से बात हो जाए. कहीं से उस का खत आ जाए. कहीं से उस की सलामती की खबर मिल जाए या कम से कम वह सौरभ को एक नजर भर देख ले.

इतने भर से ही सोफिया को संतोष हो जाता, लेकिन इस युद्ध ने सब मटियामेट कर दिया था. जो युद्ध में गए, वे वापस नहीं लौटे, लेकिन सोफिया का दिल कहता था कि उस का सौरभ एक दिन जरूर लौटेगा.

उस का सौरभ उस को जरूर मिलेगा.

सोफिया अपने सौरभ के प्यार में दिनोंदिन मानो गलती जा रही थी. उस का खिलाखिला रहने वाला चेहरा मुरझाने लगा था.

वह जाड़े की एक दोपहर थी, जिस दिन वह खत सोफिया को डाकिया थमा गया था. खत का मजमून देख कर वह वहीं ‘धम्म’ से आंगन में रखी कुरसी पर गिर पड़ी थी. पुरानी टूटी हुई कुरसी पर से संतुलन गड़बड़ाया और बेहोश हो कर वह गिरी तो टाइल्स से चोट लग गई.

2 महीने अस्पताल में बिताए. ठीक हुई तो सोफिया घर लौटी. सौरभ दुश्मनों से बहादुरी से लड़ता हुआ सियाचीन में शहीद हो गया था.

सोफिया की उम्र भी हो रही थी. मांपिताजी के बहुत जोर देने पर वह पहले तो 3-4 साल तक शादी के लिए तैयार ही नहीं हुई, लेकिन मांबाप की जिद के आगे उस की एक न चली और उस ने सेना के एक अफसर मेजर राजीव से शादी कर ली. अभी 4 साल पहले मेजर साहब भी नहीं रहे थे.

‘‘दादी, आप टीवी देख रही हैं या आराम करेंगी?’’ सुनील ने टोका तो सोफिया का ध्यान टूटा. घड़ी शाम के
5 बजा रही थी.

सुनील ने गलती से चैनल बदल दिया. टीवी पर एक धुन तैर रही थी, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा जैसे मैं करती हूं…’ Hindi Romantic Story

Story In Hindi: एक म्यान दो तलवार

Story In Hindi: ‘‘बिटिया नीलू, आज काम पर तू ही चली जाना. मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है,’’ बूढ़े थपरू ने अपनी बेटी से कहा.

‘‘ठीक है बाबा, मैं ही चली जाऊंगी,’’ नीलू ने खुश हो कर कहा.

थपरू चौधरी सुखराम के खेतों पर काम करता था. अगर किसी वजह से वह काम पर नहीं जा पाता था, तो अपनी बेटी नीलू को काम पर भेज देता था. इस से उस की मजदूरी नहीं कटती थी.

जटपुर के चौधरी दलितों पर अपना हक ऐसे ही सम?ाते थे, जैसे अंगरेज हिंदुस्तानियों पर. चौधरी जमीनों के मालिक थे. उन के पास धनदौलत की कमी न थी. जो दलित अपनी मेहनत, हुनर या फिर सरकार की रिजर्वेशन पौलिसी की मदद से नौकरी पा गए थे, वे शहरों में जा बसे थे. रहेसहे दलित आज भी चौधरियों के खेतों पर मजदूरी करने के लिए मजबूर थे.

चौधरी सुखराम 60 बीघे का अमीर काश्तकार था. किसी चीज की कोई कमी न थी. सबकुछ बढि़या चल रहा था. उस ने अपनी दोनों बेटियों का समय से ब्याह कर उन को ससुराल भेज दिया था. दोनों बेटों खगेंद्र और जोगेंद्र की भी अच्छे घरों में शादी कर दी थी. खगेंद्र की 2 बेटियां थीं, जो स्कूल जाने लायक हो गई थीं.

धनदौलत किसे नहीं रिझती है? खगेंद्र ने नीलू को पटा लिया. वह उस के चंगुल में फंस गई. धीरेधीरे उन के संबंधों की चर्चा पूरे गांव में फैल गई.

बूढ़े थपरू ने नीलू को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन इश्क का भूत जिस पर सवार हो जाए, तो फिर आसानी से नहीं उतरता. उस के जवाब को सुन कर बूढ़ा थपरू भी अवाक रह गया.

नीलू ने भयावह हकीकत उगलते हुए कहा, ‘‘बाबा, मुझे क्यों रोकते हो? गांव में हमारी जात की कितनी ही लोंडियां और औरतें हैं, जो चौधरियों के लड़कों से नैन मटक्का करती हैं और उन के पैसों पर मौज करती हैं. उन से संबंध बना कर नाक ऊंची कर के चलती हैं.’’

‘‘करमजली, धीरे बोल. कमबख्त, वे ऐसा करती हैं तो नाशपिटी तू भी ऐसा ही करेगी. बुढ़ापे में कुलच्छिनी मेरी नाक कटाएगी…’’ थपरू ने कहा.

इस पर नीलू खूब हंसी. उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘बाबा, दिखाओ तुम्हारी नाक कहां है? हमारी जात के लोग तो बिना नाक के पैदा होते हैं. नाक तो उन की कटती है जिन के नाक हो. नाक होती है चौधरियों की. उन की लड़की और औरत को हमारी जात का कोई लोंडा छू कर तो दिखाए…’’

‘‘चुप कर बेहया,’’ थपरू बोला.

‘‘मैं कोई तेरी गुलाम न हूं. कमा के लाती हूं और तब तेरा और अपना पेट भरती हूं. तेरे तो दोनों मुस्टंडे बेटे ब्याह कर के तुझ से अलग हो गए और तुझे मेरी छाती पर मरने के लिए छोड़ गए. अब मैं चाहे जो करूं, मुझे रोकने वाला कौन होता है. ले रोटी खा,’’ नीलू ने खाट पर थाली पटकते हुए कहा.

बूढ़ा थपरू नीलू की बात सुन कर सिहर गया. वह चुपचाप दाल के पानी में रोटी भिगो कर खाने लगा. नीलू गाय का दूध निकालने चली गई.

बूढ़ा थपरू सोच रहा था, ‘काश, मैं ने नीलू की शादी बेटों से पहले कर दी होती, तो आज यह दिन न देखना पड़ता.’

उधर नीलू को ले कर खगेंद्र के घर में भी कोहराम मचा हुआ था. खगेंद्र की पत्नी अनीता को यह बरदाश्त नहीं था कि उस का पति नीलू से किसी तरह का कोई संबंध रखे, लेकिन खगेंद्र के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

शादी के 12 साल बाद भी अनीता खगेंद्र को बेटे का सुख नहीं दे पाई थी. और बच्चे जनने से उस ने मना कर दिया था. वह पढ़ीलिखी सम?ादार औरत थी. उस का कहना था कि बेटाबेटी एकसमान होते हैं. छोटा परिवार, सुखी परिवार.

लेकिन खगेंद्र के अंदर की जमींदारों वाली पुरानी सोच जोर मार रही थी, जहां वंश चलाने के लिए बेटा होना जरूरी था. वह नीलू को रखैल बना कर उस से बेटे का सुख चाहता था.

उस का बाप सुखराम और उस की मां नंदो भी उस के साथ थी. वे भी चाहते थे कि खगेंद्र अपनी इच्छा पूरी करे, लेकिन उस का भाई जोगेंद्र इस के सख्त खिलाफ था.

जब बखेड़ा बढ़ गया तो इस मामले को ले कर एक दिन गांव में पंचायत हुई. खगेंद्र की पत्नी अनीता ने साफसाफ कह दिया, ‘‘पंचो, कान खोल कर सुन लो… एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती हैं. अगर इन्हें उस नीलू के साथ रहना तो खुशी से रहें, मेरे हिस्से की जमीनजायदाद मुझे दे दी जाए. मैं उसी से अपनी बेटियों और अपना पेट पाल लूंगी.’’

खगेंद्र और सुखराम को इस में कोई एतराज नहीं था. वे इस के लिए राजी हो गए. पंचायत में हुए समझौते के मुताबिक पहले जमीन 3 हिस्सों में बंटी. 25-25 बीघा जमीन खगेंद्र और जोगेंद्र के हिस्से में आई और 10 बीघा जमीन सुखराम को मिली.

खगेंद्र की जमीन के 2 हिस्से हुए. आधी जमीन यानी साढ़े 12 बीघा जमीन अनीता के हिस्से में आई. बाकायदा पंचायत के समझौते के मुताबिक सारी जमीनों के बैनामे लिखे गए, जिस से आने वाले समय में कोई झगड़ा न हो. अनीता और खगेंद्र का तलाक हो गया.

खगेंद्र ने नीलू से कोर्ट मैरिज कर ली और वह उस के साथ शहर में रहने लगा. उस के मांबाप भी उस के साथ आ गए.

गांव में रहने और शहर में रहने में जमीनआसमान का फर्क होता है. शहर में रह कर गांव में जा कर खेती करना खगेंद्र के बस की बात न थी, इसलिए उस ने और सुखराम ने अपनी जमीन बंटाई पर उठा दी.

बंटाईदार सालभर में पैसा पहुंचाता तो कुछ दिन तो मौसम बासंती रहता. खगेंद्र और नीलू खूब मौज उड़ाते. सुखराम भी चौधरी बना घूमता. अंगरेजी शराब की दुकान के चक्कर लगाता.

खगेंद्र भी खाली था. वह दोस्तों के साथ खूब पार्टी करता और फिर पैसा खत्म होते ही कर्जा लेने की शुरुआत होती.

लेकिन ऐसा कब तक चलता और कर्जा पहाड़ सा होता गया. जमीन का एक टुकड़ा बेचने के सिवा कोई रास्ता न था. जमीन बेचने का रोग एक बार लग जाए, तो फिर छूटता नहीं. पहले सुखराम की जमीन बिकी, फिर धीरेधीरे खगेंद्र के खूड़ बिकने लगे.

उधर सब से बड़ी चिंता की बात यह थी कि नीलू के बेटा छोड़ बेटी भी पैदा नहीं हो रही थी. खगेंद्र ने नीलू का बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. बेटे से वंशबेल चलाने की बात तो बहुत दूर जमीन, जायदाद, जमींदारा सब जाता रहा.

सुखराम की चौधराहट की चूल हिल गई. वह एक आरा मशीन पर चौकीदार हुआ. उसे बहुत पछतावा हुआ कि उस के गलत फैसले से सबकुछ बिखर गया. उसे खगेंद्र को रोकना चाहिए था, लेकिन पुरानी जमींदारी सोच उसे ले डूबी.

खगेंद्र कोई छोटा काम करने से हिचकता था. अभी तक वह शान से जमींदारों वाली जिंदगी जीता आ रहा था, अब पेट पालने के लिए क्या करे, सबकुछ तो वह गंवा बैठा था.

तब एक दिन नीलू ने उसे खरीखोटी सुना दी, ‘‘बड़ा शौक पाल रखा था दूसरी औरत रखने का. अब कुछ करने के नाम पर मां मरी जाती है.’’

ऐसा कब तक चलता. एक दिन खगेंद्र की लाश नहर में तैरती मिली. किसी ने इसे खुदकुशी का मामला बताया, तो किसी ने नीलू की करतूत. गरीब आदमी का मुकदमा कौन लड़ता है. जोगेंद्र ने खगेंद्र का अंतिम संस्कार कर पल्ला झाड़ लिया.

सुखराम पहले ही अपने बेटे खगेंद्र से अलग रहने लगा था. नीलू दूसरों के घरों में झाड़ूपोंछा कर गुजरबसर करने लगी. फिर एक बूढ़े सेठ ने उसे अपनी सेवा में रख लिया. उस के बेटे विदेश में रहते थे और उस की कोई परवाह नहीं करते थे.

बूढ़े सेठ ने बेटों से चिढ़ कर और नीलू की सेवा से खुश हो कर अपनी बहुत सी जायदाद उस के नाम कर दी.

एक दिन बूढ़ा चल बसा. नीलू के दिन सुखचैन से कटने लगे. लोग उसे अब ‘सेठानी’ कह कर पुकारते हैं. Story In Hindi

Hindi Family Story: अपना सा घर

Hindi Family Story: ‘कुछ सुना तुम ने?’

‘क्या हुआ है?’

‘कामिनी ने अपने किराएदार विवेक से शादी कर ली.’

‘यह तो एक दिन होना ही था.’

‘यह सब उस की मां की सोचीसमझी चाल है.’

‘अरे, किराएदार होने के नाते उस ने इतनी छूट दे रखी थी.’

‘यों कहो कि दहेज बचा लिया.’

‘हां, दहेज तो बचा लिया, सो बचा लिया. मगर एक मां को इतनी खुली छूट नहीं देनी चाहिए थी.’

‘अरे, जवान बेटी के होते उस ने किसी कुंआरे को मकान किराए पर दिया ही क्यों?’

‘फिर उस ने किराए की कीमत ब्याज समेत वसूल कर ली.’

पूरे महल्ले में यही सब चर्चा चल रही थी.

रमा देवी विधवा थीं. उन के पति ज्वालाप्रसाद सेल्स टैक्स अफसर थे. जब वे जिंदा थे, तभी से उन्होंने रहने के लिए बड़ा मकान बना लिया था. रिटायरमैंट के एक साल के बाद उन की मौत हो गई. उन के 2 बेटे प्रदीप और नवीन सरकारी नौकरी में अच्छे पदों पर थे.

बड़ा बेटा प्रदीप जबलपुर में असिस्टैंट इंजीनियर था, तो छोटा बेटा नवीन सैंट्रल बैंक औफ इंडिया गुना में मैनेजर था. दोनों की शादी कर उन की गृहस्थी बसा दी गई. वे अपने बीवीबच्चों के साथ मजे में थे. बड़ी बेटी करुणा की शादी कर के वे निश्चिंत हो गए थे.

कामिनी सब से छोटी बेटी थी. वह अभी तक कुंआरी थी, जो कालेज में पढ़ रही थी. मकान का कुछ हिस्सा रमा देवी ने किराए पर दे रखा था. एक कमरा ऊपर वाला अभी 2 महीने पहले ही खाली हुआ था, इसलिए उस के लिए कोई किराएदार चाहिए था, जिस की खोजबीन जारी थी. आखिरकार किराएदार की खोज पूरी हुई.

उस दिन भरी दोपहर में ऐसे ही कामिनी ने दरवाजा खोला, तो सामने एक नौजवान को खड़ा पाया. दोनों की नजरें मिलीं. नौजवान कामिनी को एकटक देखता जा रहा था.

तब कामिनी संकोच से शरमा गई. वह बोली, ‘‘कहिए?’’

वह नौजवान बोला, ‘‘सुना है, आप के यहां कोई कमरा खाली है और उसे किराए पर देना है?’’

‘‘आप ने सही सुना है. क्या आप किराएदार बन कर आए हैं?’’

‘‘हां,’’ उस नौजवान ने कहा.

‘‘भीतर आइए,’’ कामिनी ने जब यह कहा, तब उस ने नौजवान के चेहरे को गौर से देखा, तो पाया कि वे तो उसी के कालेज के नए असिस्टैंट प्रोफैसर विवेक शर्मा हैं.

कामिनी उन्हें सोफे पर बैठा कर अंदर चली गई. थोड़ी देर बाद रमा देवी आ कर बोलीं, ‘‘कहिए मिस्टर, कमरा देखने आए हो?’’

‘‘जी हां अम्मांजी,’’ उस नौजवान ने हाथ जोड़ कर उठते हुए कहा.

‘‘फिलहाल तो एक कमरा खाली है, उसे किराए पर देना है. मगर किराए पर देने से पहले मैं आप की जानकारी लेना चाहती हूं,’’ रमा देवी ने कहा.

‘‘ले लीजिए अम्मांजी, मैं देने को तैयार हूं.’’

‘‘नाम क्या है? करते क्या हो? कहां के रहने वाले हो?’’ जब रमा देवी ने एकसाथ कई सवाल पूछ लिए, तब वह नौजवान बोला, ‘‘अम्माजी, मेरा नाम विवेक शर्मा है. मैं कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर हूं और उज्जैन का रहने वाला हूं.

‘‘जाति से ब्राह्मण हो. मगर यह बताओ, तुम शादीशुदा हो या कुंआरे?’’ रमादेवी का अगला सवाल सुन कर विवेक शर्मा कुछ पल तक नहीं बोला.

तब रमा देवी ने फिर पूछा, ‘‘तुम ने बताया नहीं.’’

‘‘जी अम्मांजी, अभी कुंआरा हूं.’’

‘‘तब तो कमरा नहीं मिलेगा,’’ रमा देवी इनकार करते हुए बोलीं.

‘‘मेरे साथ मेरी अम्मां भी रहेंगी.’’

‘‘ठीक है, तब तो चलेगा. आइए, चल कर कमरा देख लीजिए,’’ कह कर रमा देवी विवेक को कमरा दिखाने ऊपर ले गईं.

थोड़ी देर बाद वे दोनों लौटे, तब तक कामिनी चाय ला चुकी थी.

चाय पीते हुए विवेक ने कहा, ‘‘मुझे कमरा पसंद है. किराया बता दीजिए.’’

‘‘मगर मैं अनजान पर कैसे भरोसा कर लूं. किसी की गवाही चाहिए,’’ रमा देवी की यह बात सुन कर विवेक कोई जवाब नहीं दे पाया. अभी 2 महीने पहले ही वह ट्रांसफर हो कर यहां आया है. गवाही किस से दिलवाए, यह समस्या थी.

तभी रमा देवी उसे चुप देख कर बोलीं, ‘‘जवाब नहीं दिया.’’

‘‘अभी मैं इस शहर में नयानया आया हूं…’’ विवेक ने कहा, ‘‘मगर आप मुझ पर विश्वास रखिए, मैं आप को किराया हर महीने दूंगा. आप किराया बता दीजिए.’’

‘‘किराया 1,500 रुपए लगेगा,’’ रमा देवी बोलीं, ‘‘लाइट और पानी का खर्च अलग से देना होगा. मंजूर हो तो आ कर रह सकते हो.’’

‘‘आप एक छोटे से कमरे का किराया ज्यादा बता रही हैं,’’ विवेक बोला.

‘‘किराया तो यही लगेगा. इस से एक पैसा भी कम नहीं होगा…’’ रमा देवी अपना फैसला सुनाते हुए बोलीं, ‘‘रहना है तो रहो. हां, एक महीने का किराया एडवांस देना होगा.’’

‘‘ठीक है, मुझे मंजूर है,’’ कह कर विवेक ने कामिनी की तरफ देख कर अपने हथियार डाल दिए. फिर रमा देवी के हाथों में एडवांस थमाते हुए वह बोला, ‘‘लीजिए यह एडवांस किराया. मकान में सब तरह की सुविधाएं हैं, इसलिए महंगा किराया भी चलेगा.’’

इतना कह कर विवेक हाथ जोड़ कर बाहर निकल गया. एक बार उस ने कामिनी की ओर देखा, फिर कामिनी अपनी मां से बोली, ‘‘मम्मी, ये तो वही सर हैं, जो हमारे कालेज में आए हैं.’’

‘‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’ रमा देवी जरा डांटते हुए बोलीं, ‘‘मगर है बड़ा समझदार. मैं ने उसे ब्राह्मण समझ कर किराए पर रखा है.’’

विवेक पहली तारीख को रमा देवी के मकान में किराएदार बन कर आ गया और थोड़े दिनों में ही उस ने रमा देवी का विश्वास जीत लिया. अब उस का ज्यादातर समय रमा देवी के यहां बीतने लगा. वह खुल कर बातें करने लगा. अगर कोई बाहरी आ जाए तो विवेक को किराएदार नहीं, बल्कि परिवार का एक जिम्मेदार सदस्य ही समझता था.

जब उन के बीच पारिवारिक संबंध बन गए, तब विवेक और कामिनी के बीच संकोच की दीवार भी टूट गई. दोनों के बीच खुल कर बातें होने लगीं. विवेक से पढ़ने के बहाने कामिनी बिना किसी रोकटोक के उस के कमरे में घंटों बैठी रहती थी.

कभीकभार विवेक कामिनी को घुमाने ले जाने लगा, जबकि रमा देवी ने कभी इस का विरोध नहीं किया. मगर धीरेधीरे यह बात महल्ले और रिश्तेदारों में फैलने लगी. विवेक किराएदार बन कर जरूर आया है, मगर अपने घर जमाई बनने का देख रहा है. अगर कोई अपरिचित उन्हें साथसाथ देख लेते थे, तब वे विवेक को कामिनी का पति समझते थे.

‘रमा देवी ने इन दोनों को इतनी छूट दे रखी है कि दोनों बेशर्मी से घूमते है.’

‘कामिनी तो पढ़ने के बहाने प्रोफैसर के कमरे में बैठ कर प्रेम गीत लिख रही है.’

‘देखो, रमा देवी इतनी अंधी हैं कि उसी के घर में प्रोफैसर रंगरेलियां मना रहा है. देखना एक दिन कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा. तब रमा देवी की आंखें खुलेंगी.’

ये सारी बातें रमा देवी के कानों में जरूर पड़ती थीं, मगर उन्होंने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया.

जब चर्चा ज्यादा होने लगी तब रमा देवी की खास सहेली कमला देवी आ कर बोलीं, ‘‘ऐ रमा, मैं क्या सुन रही हूं…’’

‘‘क्या सुन रही है कमला?’’ रमा देवी नाराजगी से बोलीं.

‘‘अरे वह प्रोफैसर, कामिनी के साथ ज्यादा ही दिख रहा है और तू अंधी बनी हुई है.’’

‘‘कमला, यह तू महल्ले वालों की भाषा बोल रही है.’’

‘‘क्या मतलब है तेरा?’’

‘‘मेरा मतलब यह है कि तू भी वही कह रही है, जो पूरा महल्ला कह रहा है.’’

‘‘अरे, महल्ले ने जो देखा है, वही मैं ने भी देखा है.’’

‘‘और तू महल्ले वालों की हां में हां मिला रही है.’’

‘‘महल्ले वालों की हां में हां नहीं मिला रही हूं, बल्कि इन आंखों से देखा है, इसलिए कह रही हूं…’’ कमला देवी बोलीं, ‘‘मेरा कहना मान, उस प्रोफैसर को निकाल दे. एक दिन वह कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा.’’

‘‘मगर तुम लोगों में से किसी ने भी प्रोफैसर को नहीं समझा,’’ रमा देवी बचाव करते हुए बोलीं.

‘‘अच्छा तो तू उसे पूरी तरह समझ चुकी है. बता क्या समझी तू? जवाब दे? चुप क्यों है? इस प्रोफैसर पर तू घमंड कर रही है, देखना एक दिन कामिनी को ले कर भाग जाएगा. तब तेरी यह अंधी आंखें खुलेंगी… इसलिए कहती हूं कि तू प्रोफैसर से कमरा खाली करा कर निकाल दे.’’

‘‘मगर कमला, कामिनी मेरी बेटी है और उस की मुझे भी चिंता है.’’

‘‘क्या खाक चिंता है तुझे. चिंता होती तो जवान बेटी के होते उस प्रोफैसर को कमरा नहीं देती.’’

‘‘अरे, मैं ने कमरा दे दिया तब तेरे पेट में क्या मरोड़ उठ रही है?’’

‘‘मैं तेरी सहेली हूं, इस नाते कह रही हूं…’’ एक बार फिर कमला देवी समझाते हुए बोलीं, ‘‘अगर तेरी समझ में नहीं आता है. तो तू जान तेरा काम जाने. अब मैं कभी नहीं कहूंगी. और दे अपनी बेटी को मनचाही छूट.

‘‘अभी मेरी बात तेरी समझ में नहीं आ रही है. जब पानी सिर से गुजर जाएगा, तब मेरी बात तेरे समझ में आएगी. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. अच्छा चलती हूं,’’ इतना कह कर कमला देवी नाराज हो कर वहां से चली गईं.

कामिनी और विवेक का प्यार अब तक पूरी तरह परवान चढ़ चुका था, मगर रमा देवी की तब भी आंखें नहीं खुलीं. लोगों में अब चर्चा बहुत गरम चलने लगी कि रमा देवी ने खुली छूट दे रखी है, तभी तो वे दोनों साथसाथ दिखाई देते हैं. कालेज में गुरुशिष्य का नाता घर आ कर बदल जाता है.

कामिनी विवेक के स्कूटर पर ही बैठ कर कालेज आती जाती है. महल्ले वाले अपनी निगाह से देख रहे थे और तरहतरह की बातें कर रहे थे.

यह बात रिश्तेदारों में भी पहुंच गई. वे भी मौका आने पर टिप्पणी करने से नहीं छूटते थे, सारा कुसूर रमा देवी को दे रहे थे. मगर रमा देवी की हालत यह थी कि जब भी वे अपने बेटों से कामिनी के लिए लड़का देखने की बातें करतीं, तब वे उन्हें उलटा कहते कि अम्मां तुम ही ढूंढ़ लो. हमें नौकरी के चलते फुरसत नहीं है.

इस तरह दोनों बेटे हाथ झटक लेते थे. विधवा रमा देवी ने कई जगह बात चलाई, मगर कुछ जगह दहेज ज्यादा मांगने के चलते बात टूट जाती, और कुछ को रमा देवी ने इसलिए खारिज कर दिया कि वे कोई नौकरी व कामधंधा नहीं करते थे. कामिनी को वे ऐसे घराने में ब्याहना चाहती थीं कि वह सुख से रह सके.

ऐसे में विधवा रमा देवी ने कहांकहां दौड़ नहीं लगाई. आगेपीछे उस की शादी तो करना ही है, इसी वजह से कामिनी और विवेक को उस ने ज्यादा छूट दे रखी थी.

आखिर वही हुआ, जिस की उम्मीद थी. कामिनी और विवेक ने गुपचुप तरीके से कोर्टमैरिज कर ली. शादी कर वे उज्जैन चले गए. तब यह बात सारे महल्ले के साथ रिश्तेदारों में भी फैल गई. रमा देवी जो चाहती
थीं, वह हो गया. मगर अब रिश्तेदारों व महल्ले वालों के ताने भी वे सुन रही थीं.

जब रमा देवी ने इस बात की खबर अपने दोनों बेटों को दी, उन्होंने भी यही राय दी कि हमें भी यह रिश्ता मंजूर है. कामिनी ने जिस से भी शादी की, वह कमाऊ है. तुम भी तो कमाऊ दामाद चाहती थीं. रहा रिश्तेदारों और महल्ले वालों का तो थोड़े दिनों तक कह कर वे भी चुप हो जाएंगे. Hindi Family Story

Hindi Story: कौन जिम्मेदार किशोरीलाल की मौत का

Hindi Story: ‘‘किशोरीलाल ने खुदकुशी कर ली…’’ किसी ने इतना कहा और चौराहे पर लोगों को चर्चा का यह मुद्दा मिल गया.

‘‘मगर क्यों की…?’’  भीड़ में से सवाल उछला.

‘‘अरे, अगर खुदकुशी नहीं करते, तो क्या घुटघुट कर मर जाते?’’ भीड़ में से ही किसी ने एक और सवाल उछाला.

‘‘आप के कहने का मतलब क्या है?’’ तीसरे आदमी ने सवाल पूछा.

‘‘अरे, किशोरीलाल की पत्नी कमला का संबंध मनमोहन से था. दुखी हो कर खुदकुशी न करते तो वे क्या करते?’’

‘‘अरे, ये भाई साहब ठीक कह रहे हैं. कमला किशोरीलाल की ब्याहता पत्नी जरूर थी, मगर उस के संबंध मनमोहन से थे और जब किशोरीलाल उन्हें रोकते, तब भी कमला मानती नहीं थी,’’ भीड़ में से किसी ने कहा.

चौराहे पर जितने लोग थे, उतनी ही बातें हो रही थीं. मगर इतना जरूर था कि किशोरीलाल की पत्नी कमला का चरित्र खराब था. किशोरीलाल भले ही उस के पति थे, मगर वह मनमोहन की रखैल थी. रातभर मनमोहन को अपने पास रखती थी. बेचारे किशोरीलाल अलग कमरे में पड़ेपड़े घुटते रहते थे. सुबह जब सूरज निकला, तो कमला के रोने की आवाज से आसपास और महल्ले वालों को हैरान कर गया. सब दौड़ेदौड़े घर में पहुंचे, तो देखा कि किशोरीलाल पंखे से लटके हुए थे.

यह बात पूरे शहर में फैल गई, क्योंकि यह मामला खुदकुशी का था या कत्ल का, अभी पता नहीं चला था. इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस आई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले गई.

यह बात सही थी कि किशोरीलाल और कमला के बीच बनती नहीं थी. कमला किशोरीलाल को दबा कर रखती थी. दोनों के बीच हमेशा झगड़ा होता रहता था. कभीकभी झगड़ा हद पर पहुंच जाता था. यह मनमोहन कौन है? कमला से कैसे मिला? यह सब जानने के लिए कमला और किशोरीलाल की जिंदगी में झांकना होगा. जब कमला के साथ किशोरीलाल की शादी हुई थी, उस समय वे सरकारी अस्पताल में कंपाउंडर थे. किशोरीलाल की कम तनख्वाह से कमला संतुष्ट न थी. उसे अच्छी साडि़यां और अच्छा खाने को चाहिए था. वह उन से नाराज रहा करती थी.

इस तरह शादी के शुरुआती दिनों से ही उन के बीच मनमुटाव होने लगा था. कुछ दिनों के बाद कमला किशोरीलाल से नजरें चुरा कर चोरीछिपे देह धंधा करने लगी. धीरेधीरे उस का यह धंधा चलने लगा. वैसे, कमला ने लोगों को बताया था कि उस ने अगरबत्ती बनाने का घरेलू धंधा शुरू कर दिया है. इसी बीच उन के 2 बेटे हो गए, इसलिए जरूरतें और बढ़ गईं. मगर चोरीछिपे यह धंधा कब तक चल सकता था. एक दिन किशोरीलाल को इस की भनक लग गई. उन्होंने कमला से पूछा, ‘मैं यह क्या सुन रहा हूं?’

‘क्या सुन रहे हो?’ कमला ने भी अकड़ कर कहा.

‘क्या तुम देह बेचने का धंधा कर रही हो?’ किशोरीलाल ने पूछा.

‘तुम्हारी कम तनख्वाह से घर का खर्च पूरा नहीं हो पा रहा था, तो मैं ने यह धंधा अपना लिया है. कौन सा गुनाह कर दिया,’ कमला ने भी साफ बात कह कर अपने अपराध को कबूल कर लिया.

यह सुन कर किशोरीलाल को गुस्सा आया. वे कमला को थप्पड़ जड़ते हुए बोले, ‘बेगैरत, देह धंधा करती हो तुम?’

‘तो पैसे कमा कर लाओ, फिर छोड़ दूंगी यह धंधा. अरे, औरत तो ले आया, मगर उस की हर इच्छा को पूरा नहीं करता है. मैं कैसे भी कमा रही हूं, तेरे से तो नहीं मांग रही हूं,’ कमला भी जवाबी हमला करते हुए बोली और एक झटके से बाहर निकल गई.

किशोरीलाल कुछ नहीं कर पाए. इस तरह कई मौकों पर उन दोनों के बीच झगड़ा होता रहता था. इसी बीच शिक्षा विभाग से शिक्षकों की भरती हेतु थोक में नौकरियां निकलीं. कमला ने भी फार्म भर दिया. उसे सहायक टीचर के पद पर एक गांव में नौकरी मिल गई.

चूंकि गांव शहर से दूर था और उस समय आनेजाने के इतने साधन न थे, इसलिए मजबूरी में कमला को गांव में ही रहना पड़ा. गांव में रहने के चलते वह और आजाद हो गई. कमला ने 10-12 साल इसी गांव में गुजारे, फिर एक दिन उस ने अपने शहर के एक स्कूल में ट्रांसफर करवा लिया. मगर उन की लड़ाई अब भी नहीं थमी.

बच्चे अब बड़े हो रहे थे. वे भी मम्मीपापा का झगड़ा देख कर मन ही मन दुखी होते थे, मगर उन के झगड़े के बीच न पड़ते थे. जिस स्कूल में कमला पढ़ाती थी, वहीं पर मनमोहन भी थे. उन की पत्नी व बच्चे थे, मगर सभी उज्जैन में थे. मनमोहन यहां अकेले रहा करते थे. कमला और उन के बीच खिंचाव बढ़ा. ज्यादातर जगहों पर वे साथसाथ देखे गए. कई बार वे कमला के घर आते और घंटों बैठे रहते थे.

कमला भी धीरेधीरे मनमोहन के जिस्मानी आकर्षण में बंधती चली गई. ऐसे में किशोरीलाल कमला को कुछ कहते, तो वह अलग होने की धमकी देती, क्योंकि अब वह भी कमाने लगी थी. इसी बात को ले कर उन में झगड़ा बढ़ने लगा. फिर महल्ले में यह चर्चा चलती रही कि कमला के असली पति किशोरीलाल नहीं मनमोहन हैं. वे किशोरीलाल को समझाते थे कि कमला को रोको. वह कैसा खेल खेल रही है. इस से महल्ले की दूसरी लड़कियों और औरतों पर गलत असर पड़ेगा. मगर वे जितना समझाने की कोशिश करते, कमला उतनी ही शेरनी बनती.

जब भी मनमोहन कमला से मिलने घर पर आते, किशोरीलाल सड़कों पर घूमने निकल जाते और उन के जाने का इंतजार करते थे.

पिछली रात को भी वही हुआ. जब रात के 11 बजे किशोरीलाल घूम कर बैडरूम के पास पहुंचे, तो भीतर से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थीं. वे सुनने के लिए खड़े हो गए. दरवाजे पर उन्होंने झांक कर देखा, तो शर्म के मारे आंखें बंद कर लीं.

सुबह किशोरीलाल की पंखे से टंगी लाश मिली. उन्होंने खुद को ही खत्म कर लिया था. घर के आसपास लोग इकट्ठा हो चुके थे. कमला की अब भी रोने की आवाज आ रही थी. इस मौत का जिम्मेदार कौन था? अब लाश के आने का इंतजार हो रहा था. शवयात्रा की पूरी तैयारी हो चुकी थी. जैसे ही लाश अस्पताल से आएगी, औपचारिकता पूरी कर के श्मशान की ओर बढ़ेगी. Hindi Story

Hindi Story: बच्चे की चाह में – भौंरा ने कैसे सिखाया सबक

Hindi Story: भौंरा की शादी हुए 5 साल हो गए थे. उस की पत्नी राजो सेहतमंद और खूबसूरत देह की मालकिन थी, लेकिन अब तक उन्हें कोई औलाद नहीं हुई थी. भौंरा अपने बड़े भाई के साथ खेतीबारी करता था. दिनभर काम कर के शाम को जब घर लौटता, सूनासूना सा घर काटने को दौड़ता.

भौंरा के बगल में ही उस का बड़ा भाई रहता था. उस की पत्नी रूपा के 3-3 बच्चे दिनभर घर में गदर मचाए रखते थे. अपना अकेलापन दूर करने के लिए राजो रूपा के बच्चों को बुला लेती और उन के साथ खुद भी बच्चा बन कर खेलने लगती. वह उन्हीं से अपना मन बहला लेती थी.

एक दिन राजो बच्चों को बुला कर उन के साथ खेल रही थी कि रूपा ने न जाने क्यों बच्चों को तुरंत वापस बुला लिया और उन्हें मारनेपीटने लगी.

उस की आवाज जोरजोर से आ रही थी, ‘‘तुम बारबार वहां मत जाया करो. वहां भूतप्रेत रहते हैं. उन्होंने उस की कोख उजाड़ दी है. वह बांझ है. तुम अपने घर में ही खेला करो.’’

राजो यह बात सुन कर उदास हो गई. कौन सी मनौती नहीं मानी थी… तमाम मंदिरों और पीरफकीरों के यहां माथा रगड़ आई, बीकमपुर वाली काली माई मंदिर की पुजारिन ने उस से कई टिन सरसों के तेल के दीए में मंदिर में जलवा दिए, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

बीकमपुर वाला फकीर जबजब मंत्र फुंके हुए पानी में राख और पता नहीं कागज पर कुछ लिखा हुआ टुकड़ा घोल कर पीने को देता. बदले में उस से 100-100 के कई नोट ले लेता था. इतना सब करने के बाद भी उस की गोद सूनी ही रही… अब वह क्या करे?

राजो का जी चाहा कि वह खूब जोरजोर से रोए. उस में क्या कमी है जो उस की गोद खाली है? उस ने किसी का क्या बिगाड़ा है? रूपा जो कह रही थी, क्या सचमुच उस के घर में भूतप्रेत रहते हैं? लेकिन उस के साथ तो कभी ऐसी कोई अनहोनी घटना नहीं घटी, तो फिर कैसे वह यकीन करे?

राजो फिर से सोच में डूब गई, ‘लेकिन रूपा तो कह रही थी कि भूतप्रेत ही मेरी गोद नहीं भरने दे रहे हैं. हो सकता है कि रूपा सच कह रही हो. इस घर में कोई ऊपरी साया है, जो मुझे फलनेफूलने नहीं दे रहा है. नहीं तो रूपा की शादी मेरे साथ हुई थी. अब तक उस के 3-3 बच्चे हो गए हैं और मेरा एक भी नहीं. कुछ तो वजह है.’

भौंरा जब खेत से लौटा तो राजो ने उसे अपने मन की बात बताई. सुन कर भौंरा ने उसे गोद में उठा लिया और मुसकराते हुए कहा, ‘‘राजो, ये सब वाहियात बातें हैं. भूतप्रेत कुछ नहीं होता. रूपा भाभी अनपढ़गंवार हैं. वे आंख मूंद कर ऐसी बातों पर यकीन कर लेती हैं. तुम चिंता मत करो. हम कल ही अस्पताल चल कर तुम्हारा और अपना भी चैकअप करा लेते हैं.’’

भौंरा भी बच्चा नहीं होने से परेशान था. दूसरे दिन अस्पताल जाने के लिए भाई के घर गाड़ी मांगने गया. भौंरा के बड़े भाई ने जब सुना कि भौंरा राजो को अस्पताल ले जा रहा है तो उस ने भौंरा को खूब डांटा. वह कहने लगा, ‘‘अब यही बचा है. तुम्हारी औरत के शरीर से डाक्टर हाथ लगाएगा. उसे शर्म नहीं आएगी पराए मर्द से शरीर छुआने में. तुम भी बेशर्म हो गए हो.’’

‘‘अरे भैया, वहां लेडी डाक्टर भी होती हैं, जो केवल बच्चा जनने वाली औरतों को ही देखती हैं,’’ भौंरा ने समझाया.

‘‘चुप रहो. जैसा मैं कहता हूं वैसा करो. गांव के ओझा से झाड़फूंक कराओ. सब ठीक हो जाएगा.’’

भौंरा चुपचाप खड़ा रहा.

‘‘आज ही मैं ओझा से बात करता हूं. वह दोपहर तक आ जाएगा. गांव की ढेरों औरतों को उस ने झाड़ा है. वे ठीक हो गईं और उन के बच्चे भी हुए.’’

‘‘भैया, ओझा भूतप्रेत के नाम पर लोगों को ठगता है. झाड़फूंक से बच्चा नहीं होता. जिस्मानी कमजोरी के चलते भी बच्चा नहीं होता है. इसे केवल डाक्टर ही ठीक कर सकता है,’’ भौंरा ने फिर समझाया.

बड़ा भाई नहीं माना. दोपहर के समय ओझा आया. भौंरा का बड़ा भाई भी साथ था. भौंरा उस समय खेत पर गया था. राजो अकेली थी. वह राजो को ऊपर से नीचे तक घूरघूर कर देखने लगा.

राजो को ओझा मदारी की तरह लग रहा था. उस की आंखों में शैतानी चमक देख कर वह थोड़ी देर के लिए घबरा सी गई. साथ में बड़े भैया थे, इसलिए उस का डर कुछ कम हुआ.

ओझा ने ‘हुं..अ..अ’ की एक आवाज अपने मुंह से निकाली और बड़े भैया की ओर मुंह कर के बोला, ‘‘इस के ऊपर चुड़ैल का साया है. यह कभी बंसवारी में गई थी? पूछो इस से.‘‘

‘‘हां बहू, तुम वहां गई थीं क्या?’’ बड़े भैया ने पूछा.

‘‘शाम के समय गई थी मैं,’’ राजो ने कहा.

‘‘वहीं इस ने एक लाल कपडे़ को लांघ दिया था. वह चुड़ैल का रूमाल था. वह चुड़ैल किसी जवान औरत को अपनी चेली बना कर चुड़ैल विद्या सिखाना चाहती है. इस ने लांघा है. अब वह इसे डायन विद्या सिखाना चाहती है. तभी से वह इस के पीछे पड़ी है. वह इस का बच्चा नहीं होने देगी.’’

राजो यह सुन कर थरथर कांपने लगी.

‘‘क्या करना होगा?’’ बड़े भैया ने हाथ जोड़ कर पूछा.

‘‘पैसा खर्च करना होगा. मंत्रजाप से चुड़ैल को भगाना होगा,’’ ओझा ने कहा.

मंत्रजाप के लिए ओझा ने दारू, मुरगा व हवन का सामान मंगवा लिया. दूसरे दिन से ही ओझा वहां आने लगा. जब वह राजो को झाड़ने के लिए आता, रूपा भी राजो के पास आ जाती.

एक दिन रूपा को कोई काम याद आ गया. वह आ न सकी. घर में राजो को अकेला देख ओझा ने पूछा, ‘‘रूपा नहीं आई?’’

राजो ने ‘न’ में गरदन हिला दी.

ओझा ने अपना काम शुरू कर दिया. राजो ओझा के सामने बैठी थी. ओझा मुंह में कुछ बुदबुदाता हुआ राजो के पूरे शरीर को ऊपर से नीचे तक हाथ से छू रहा था. ऐसा उस ने कई बार दोहराया, फिर वह उस के कोमल अंगों को बारबार दबाने की कोशिश करने लगा.

राजो को समझते देर नहीं लगी कि ओझा उस के बदन से खेल रहा है. उस ने आव देखा न ताव एक झटके से खड़ी हो गई.

यह देख कर ओझा सकपका गया. वह कुछ बोलता, इस से पहले राजो ने दबी आवाज में उसे धमकाया, ‘‘तुम्हारे मन में क्या चल रहा है, मैं समझ रही हूं. तुम्हारी भलाई अब इसी में है कि चुपचाप यहां से दफा हो जाओ, नहीं  सचमुच मेरे ऊपर चुड़ैल सवार हो रही है.’’

ओझा ने चुपचाप अपना सामान उठाया और उलटे पैर भागा. उसी समय रूपा आ गई. उस ने सुन लिया कि राजो ने अभीअभी अपने ऊपर चुड़ैल सवार होने की बात कही है. वह नहीं चाहती थी कि राजो को बच्चा हो.

रूपा के दिमाग में चल रहा था कि राजो और भौंरा के बच्चे नहीं होंगे तो सारी जमीनजायदाद के मालिक उस के बच्चे हो जाएंगे.

भौंरा के बड़े भाई के मन में खोट नहीं था. वह चाहता था कि भौंरा और राजो के बच्चे हों. राजो को चुड़ैल अपनी चेली बनाना चाहती है, यह बात गांव वालों से छिपा कर रखी थी लेकिन रूपा जानती थी. उस की जबान बहुत चलती थी. उस ने राज की यह बात गांव की औरतों के बीच खोल दी.

धीरेधीरे यह बात पूरे गांव में फैलने लगी कि राजो बच्चा होने के लिए रात के अंधेरे में चुड़ैल के पास जाती है. अब तो गांव की औरतें राजो से कतराने लगीं. उस के सामने आने से बचने लगीं. राजो उन से कुछ पूछती भी तो वे उस से सीधे मुंह बात न कर के कन्नी काट कर निकल जातीं. पूरा गांव उसे शक की नजर से देखने लगा. राजो के बुलाने पर भी रूपा अपने बच्चों को उस के पास नहीं भेजती थी.

2-3 दिन से भौंरा का पड़ोसी रामदा का बेटा बीमार था. रामदा की पत्नी जानती थी कि राजो डायन विद्या सीख रही है. वह बेटे को गोद में उठा लाई और तेज आवाज में चिल्लाते हुए भौंरा के घर में घुसने लगी, ‘‘कहां है रे राजो डायन, तू डायन विद्या सीख रही है न… ले, मेरा बेटा बीमार हो गया है. इसे तू ने ही निशाना बनाया है. अगर अभी तू ने इसे ठीक नहीं किया तो मैं पूरे गांव में नंगा कर के नचाऊंगी.’’

शोर सुन कर लोगों की भीड़ जमा हो गई.

एक पड़ोसन फूलकली कह रही थी, ‘‘राजो ने ही बच्चे पर कुछ किया है, नहीं तो कल तक वह भलाचंगा खापी रहा था. यह सब इसी का कियाधरा है.’’

दूसरी पड़ोसन सुखिया कह रही थी, ‘‘राजो को सबक नहीं सिखाया गया तो वह गांव के सारे बच्चों को इसी तरह मार कर खा जाएगी.’’

राजो घर में अकेली थी. औरतों की बात सुन कर वह डर से रोने लगी. वह अपनेआप को कोसने लगी, ‘क्यों नहीं उन की बात मान कर अस्पताल चली गई. जेठजी के कहने में आ कर ओझा से इलाज कराना चाहा, मगर वह तो एक नंबर का घटिया इनसान था. अगर मैं उस की चाल में फंस गई होती तो भौंरा को मुंह दिखाने के लायक भी न रहती.’’

बाहर औरतें उसे घर से निकालने के लिए दरवाजा पीट रही थीं. तब तक भौंरा खेत से आ गया. अपने घर के बाहर जमा भीड़ देख कर वह डर गया, फिर हिम्मत कर के भौंरा ने पूछा, ‘‘क्या बात है भाभी, राजो को क्या हुआ है?’’

‘‘तुम्हारी औरत डायन विद्या सीख रही है. ये देखो, किशुना को क्या हाल कर दिया है. 4 दिनों से कुछ खायापीया भी नहीं है इस ने,’’ रामधनी काकी ने कहा.

गुस्से से पागल भौंरा ने गांव वालों को ललकारा, ‘‘खबरदार, किसी ने राजो पर इलजाम लगाया तो… वह मेरी जीवनसंगिनी है. उसे बदनाम मत करो. मैं एकएक को सचमुच में मार डालूंगा. किसी में हिम्मत है तो राजो पर हाथ उठा करदेख ले,’’ इतना कह कर वह रूपा भाभी का हाथ पकड़ कर खींच लाया.

‘‘यह सब इसी का कियाधरा है. बोलो भाभी, तुम ने ही गांव की औरतों को यह सब बताया है… झूठ मत बोलना. सरोजन चाची ने मुझे सबकुछ बता दिया है.’’ सरोजन चाची भी वहां सामने ही खड़ी थीं. रूपा उन्हें देख कर अंदर तक कांप गई. उस ने अपनी गलती मान ली. भौंरा ओझा को भी पकड़ लाया, ‘‘मक्कार कहीं का, तुम्हारी सजा जेल में होगी.’’

दूर खड़े बड़े भैया की नजरें झुकी हुई थीं. वे अपनी भूल पर पछतावा कर रहे थे. Hindi Story

Story In Hindi: झिलमिल सितारों का आंगन होगा

Story In Hindi: नीलमस्ती में गुनगुना रहा था, ‘‘मेरे रंग में रंगने वाली, परी हो या हो परियों की रानी,’’ तभी पीछे से उस की छोटी बहन अनु ने आ कर कहा, ‘‘भैया प्यार हो गया है क्या किसी से शादी के बाद?’’

नील बोला, ‘‘नहीं तो पर गाना तो गा ही सकता हूं.’’

अनु मुसकराते हुए अंदर चाय बनाने चली गई. तभी घर के बाहर कार के रुकने की आवाज आई. अनु ने खिड़की से देखा, राजीव भैया और मधु भाभी आ रहे थे.

अनु जब चाय ले कर कमरे में पहुंची तो राजीव भैया बोले, ‘‘अनु मेघा भाभी नहीं आई अब तक?’’

इस से पहले कि अनु कुछ बोल पाती, मम्मी बोलीं, ‘‘अरे मेघा के तो बैंक में बहुत काम चल रहा है देर रात घर में पहुंचती है. बेचारी का काम के बो झ के कारण चेहरा उतर जाता है.’’

नील बरबस बोल उठा, ‘‘अरे मम्मी बहू ही तुम्हारी काले मेघ जैसी है, तुम बेकार में ही काम को दोष दे रही हो.’’

मेघा ने तभी घर में कदम रखा था. नील की बात पर वह सकपका गई.

नील खुद ही अपने चुटकुले पर हंसने लगे. नील की मम्मी का माथा ठनका और बोलीं, ‘‘नील हंसीमजाक करने का भी एक स्तर होता है.’’

नील बोला, ‘‘मम्मी मेघा मेरी जीवनसाथी है. मेरे साथसाथ मेरे मजाक को भी सम झती है.’’

मगर मेघा को देख कर ऐसा नहीं लग रहा था. कुछ देर बाद मेघा तैयार हो कर बाहर आ गई. महरून सूट में बेहद सलोनी लग रही थी. परंतु नील बारबार मधु की तरफ देख रहा था.

राजीव नील का करीबी दोस्त था. अभी पिछले हफ्ते ही उन का विवाह हुआ था. मधु बेहद खूबसूरत थी, परंतु मेघा के तीखे नैननक्श भी कुछ कम नहीं थे.

डाइनिंगटेबल पर तरहतरह के पकवान सजे हुए थे. अनु बोली, ‘‘मधु भाभी यह फ्रूट कस्टर्ड और शाही पनीर हमारी मेघा भाभी की पसंद हैं.’’

राजीव बोल उठा, ‘‘अरे अनु, मधु कुछ भी फ्राइड या औयली नहीं लेती हैं. चेहरे पर दाने आ जाते हैं.’’

एकाएक नील प्रशंसात्मक स्वर में बोल उठा, ‘‘फिर गोरे रंग पर अलग से दिखते भी हैं. गहरे रंग में तो सब घुलमिल जाता है.’’

मेघा बोली, ‘‘हां सिवा प्यार के,’’ उस के बाद मेघा वहां रुकी नहीं और दनदनाती हुई अंदर चली गई. उस के बाद महफिल न जम सकी.

जब वे लोग जा रहे थे तो मेघा उन्हें छोड़ने बाहर भी नहीं आईर्. कमरे में घुसते ही नील बोला, ‘‘मेघा तुम बाहर क्यों नहीं आईं?’’

मेघा ने कहा, ‘‘क्योंकि मैं थक गई थी और तुम तो थे न वहां मधु का ध्यान रखने के लिए.’’

नील गुस्से में बोला, ‘‘इतनी असुरक्षित क्यों रहती हो? अगर कोई सुंदर है तो क्या उसे सुंदर कहने से मैं बेवफा हो जाऊंगा.’’

मेघा बोली, ‘‘नील मैं तुम्हारी तरह अपने पापा के साथ काम नहीं करती हूं कि जब मरजी हो तब जाओ और जब मरजी हो तब मत जाओ.’’

नील गुस्से में बोला, ‘‘बहुत घमंड है तुम्हें अपनी नौकरी का. जो भी करती हो अपने लिए करती हो. मेरे लिए तो तुम ने कभी कुछ नहीं किया है.’’

सुबह मेघा के दफ्तर जाने के बाद मम्मी नील से बोलीं, ‘‘नील, कुछ तो बिजनैस पर ध्यान दे. शादी को 7 महीने हो गए हैं. कल को तुम्हारे खर्चे भी बढ़ेंगे.’’

नील हमेशा की तरह मम्मी की बात को टाल कर चला गया. रात को खाने पर पापा गुस्से में नील से बोले, ‘‘तुम्हारा ध्यान कहां है? आज पूरा दिन तुम दफ्तर में नहीं थे. ऐसा ही रहा तो मैं तुम्हें खर्च देना बंद कर दूंगा.’’

नील बेशर्मी से बोला, ‘‘पापा, आप कमाते हो और मम्मी घर पर रहती हैं पर मेरे केस में मेरी बीवी कमाती है और मैं बाहर के काम देख लेता हूं.’’

मेघा हक्कीबक्की रह गई. अंदर कमरे में घुसते ही मेघा ने नील को आड़े हाथों लिया, ‘‘क्या तुम ने मु झ से शादी मेरी तनख्वाह के कारण की है? मैं ने तो सोचा था कि तुम घर की जिम्मेदारियां उठाओगे और मैं पैसे बचा कर एक घर खरीद लूंगी. कब तक मम्मीपापा पर बोझ बने रहेंगे.’’

नील भी गुस्से में बोला, ‘‘मैं ने भी सोचा था कि गोरीचिट्टी बीवी लाऊंगा, जो मु झे सम झेगी और मेरी मदद करेगी. पर तुम्हें तो अपनी नौकरी की बहुत अकड़ है.’’

हालांकि नील ने यह बात दिल से नहीं कही थी पर यह मेघा के दिल में फांस की तरह चुभ गई.

आज पूरा दिन बैंक में मेघा को नील का रहरह कर मधु को देखना याद आ रहा था. बारबार वह यही सोच रही थी कि क्या वह बस नील की जिंदगी में नौकरी के कारण है.

एकाएक उसे अपनी दादी की बात याद आ गई. दादी कितना कहती थीं कि बिट्टू यह गोरेपन की क्रीम लगा ले. आजकल काले को भी गोरी दुलहन चाहिए.

मेघा का जब गौरवर्ण नील से विवाह हो रहा था तो उस ने दादी से कहा था, ‘‘दादी, देखो तुम्हारी बिट्टू को गोरा दूल्हा मिल गया है और वह भी बिना फेयर ऐंड लवली के.’’

मगर आज मेघा को लगा था कि नील ने तो उस की नौकरी के कारण उस के काले रंग से सम झौता किया था.

मेघा की जिंदगी में वैसे तो सबकुछ नौर्मल था, पर एक अनकहा तनाव था, जो उस के और नील के बीच पसर गया था. नील को लगने लगा था कि मेघा को अपनी नौकरी का घमंड है तो मेघा को लगता था कि नील उस की दबी हुई रंगत के कारण अपने दोस्तों की बीवियों से हेय सम झता है. इसलिए नील उसे कभी भी अपने किसी दोस्त के घर ले कर नहीं जाता था.

उधर नील अपनी नाकामयाबियों के जाल में इतना फंस गया था कि उस ने अपना सामाजिक दायरा बहुत छोटा कर लिया था.

नील कुछ करना चाहता था. वह प्रयास भी करता पर विफल हो जाता था. पिता के व्यापार में उस का मन नहीं लगता था. वह अपने हिसाब से, अपनी तरह से काम करना चाहता था. आज उसे एक बहुत अच्छा प्रोपोजल आया था. काम ऐसा था, जिस में नील अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई को भी इस्तेमाल कर सकता था. परंतु अपने काम के लिए उसे पूंजी की जरूरत थी. नील को पता था कि  उस के पिता अपने पुराने अनुभवों के कारण उस की मदद नहीं करेंगे.

नील को लगा मेघा उस की जीवनसाथी है शायद वह उस की बात सम झ जाए. जब नील ने मेघा से कहा तो मेघा तुनक कर बोली, ‘‘अलग बिजनैस का इतना ही शौक है, तो अपनी कमाई से कर लो. मु झे तो लगता है कि तुम ने मु झ से शादी ही इस कारण से की है कि बीवी की कमाई से अपने सपने पूरे करोगे. फ्रीसैक्स मु झ से मिल ही रहा है. जेबखर्च 30 की उम्र में भी अपने पापा से लेते हो और बाहर घुमाने के लिए ये पतली, सुंदर और गोरी लड़कियां तो तुम्हारे पास होंगी ही न.’’

रात में खाने की मेज पर तनाव छाया रहा. अनु ने चुपके से पापा को सारी बात बता दी थी.

पापा ने मेघा से कहा, ‘‘बेटा एक बार नील की बात पर ठंडे दिमाग से सोचो. जब बच्चे हो जाएंगे तो वैसे ही तुम लोगों का हाथ तंग हो जाएगा.’’

मेघा भाभी फुफकार उठीं, ‘‘अच्छा बहाना ढूंढ़ा है पूरे परिवार ने पैसा उघाई का. जानती हूं एक काली लड़की का उद्धार क्यों किया है इस परिवार ने. अब कीमत तो चुकानी ही होगी न? इतना ही अच्छा बिजनैस प्रोपोजल है तो आप क्यों नहीं लगाते हो पैसा.’’

नील अपनाआपा खो बैठा और चिल्ला कर बोला, ‘‘काला तुम्हारी त्वचा का रंग नहीं पर दिल का रंग है मेघा, तुम से शादी मैं ने अपने दिल से की थी पर लगता है कुछ गलती कर दी है.’’

नील बेहद रोष में खाना अधूरा छोड़ कर चला गया था. यह जरूर था कि वह मेघा को चिढ़ाने के लिए कुछ भी बोल देता था पर उस के दिल में ऐसा कुछ नहीं था. आज मेघा वास्तव में विद्रूप लग रही थी. न जाने क्या सोच कर नील ने कार राजीव के घर की तरफ मोड़ दी थी.

3 बार घंटी बजाने के पश्चात नील मुड़ ही रहा था कि मधु ने दरवाजा खोला. एक रंग उड़ेगा उन में और छितरे हुए बालों में वह बेहद फूहड़ लग रही थी. लग ही नहीं रहा था कि उस के विवाह को एक माह ही हुआ है. अंदर का हाल देख कर तो नील चकरा ही गया. चारों तरफ कपड़ों का अंबार और धूल जमी हुई थी.

राजीव  झेंपते हुए बोला, ‘‘अरे, मधु को धूल से ऐलर्जी है. 2 दिन से कामवाली भी नहीं आ रही है.’’

मधु ट्रे में 2 कप चाय ले आई. अचानक नील को लगा कि वह कितना खुशहाल है मेघा कितनी सुघड़ है. नौकरी के साथसाथ घर भी कितनी अच्छी तरह संभालती है और एक वह है नकारा. अगर मेघा कुछ कहती भी है तो उस के भले के लिए ही कहती है. कब तक वह अपने परिवार पर बो झ बना रहेगा?

चाय पीने के बाद नील ने झिझकते हुए कहा, ‘‘राजीव यार, कुछ पैसे मिल सकते हैं क्या? मैं बिजनैस शुरू करना चाहता हूं.’’

राजीव बोला, ‘‘नील पूरी सेविंग शादी में खर्च हो गई है और मधु के नखरे देख कर लगता है अब सेविंग हो नहीं पाएगी.’’

रात में जब नील घर पहुंचा तो देखा मेघा जगी हुई थी. नील को देख कर बोली, ‘‘फोन क्यों स्विच औफ कर रखा है? नील क्या हम शांति से बात नहीं कर सकते हैं?’’

नील ने मेघा से कहा, ‘‘मेघा मैं कोशिश कर रहा हूं पर मु झे तुम्हारे साथ की जरूरत है.’’

मेघा भी भर्राए स्वर में बोली, ‘‘नील मैं जानती हूं पर जब तुम मेरे रंग पर  कटाक्ष करते हो, तु झे बहुत छोटा महसूस होता है.’’

नील बोला, ‘‘तुम पर नहीं मेघा, अपनी नाकामयाबी पर हताश हो कर कटाक्ष कर देता हूं. आज तक किसी से नहीं कहा पर मेघा बहुत कोशिश कर के भी अपनी नाकामयाबी की परछाईं से बाहर नहीं निकल पा रहा हूं. तुम अच्छी नौकरी में हो तुम नहीं सम झ सकती कि कितना मुश्किल है नाकामयाबी का बो झ ढोना.’’

मेघा सुबकते हुए बोली, ‘‘जानती हूं नील, कैसा लगता है जब लोग आप को रिजैक्ट कर देते हैं. तुम से पहले 10 लड़के मेरे रंग के कारण मु झे नकार चुके थे. तुम से विवाह के बाद ऐसा लगा जैसे सबकुछ ठीक हो गया है पर रहरह कर तुम्हारे मजाक मेरे दिल में कड़वाहट भर देते हैं.’’

नील बोला,’’ पगली ऐसा कुछ नहीं हैं, मैं ज्यादा बोलता हूं न तो कुछ भी बोल जाता हूं. तुम से ज्यादा सम झदार और प्यारी पत्नी मु झे नहीं मिल सकती है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूं. हां तुम्हारा मु झे हेयदृष्टि से देखना पागल कर देता था और इस कारण मैं कभीकभी जानबू झ कर तुम्हें नीचा दिखाने के लिए कभीकभी कटाक्ष कर देता था.’’ Story In Hindi

Hindi Kahani: बलात्कार – बहुत हुआ अब और नहीं

Hindi Kahani: जब पुलिस की जीप एक ढाबे के आगे आ कर रुकी, तो अब्दुल रहीम चौंक गया. पिछले 20-22 सालों से वह इस ढाबे को चला रहा था, पर पुलिस कभी नहीं आई थी. सो, डर से वह सहम गया. उसे और हैरानी हुई, जब जीप से एक बड़ी पुलिस अफसर उतरीं. ‘शायद कहीं का रास्ता पूछ रही होंगी’, यह सोचते हुए अब्दुल रहीम अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया कि साथ आए थानेदार ने पूछा, ‘‘अब्दुल रहीम आप का ही नाम है? हमारी साहब को आप से कुछ पूछताछ करनी है. वे किसी एकांत जगह बैठना चाहती हैं.’’

अब्दुल रहीम उन्हें ले कर ढाबे के कमरे की तरफ बढ़ गया. पुलिस अफसर की मंदमंद मुसकान ने उस की झिझक और डर दूर कर दिया था.

‘‘आइए मैडम, आप यहां बैठें. क्या मैं आप के लिए चाय मंगवाऊं?

‘‘मैडम, क्या आप नई सिटी एसपी कल्पना तो नहीं हैं? मैं ने अखबार में आप की तसवीर देखी थी…’’ अब्दुल रहीम ने उन्हें बिठाते हुए पूछा.

‘‘हां,’’ छोटा सा जवाब दे कर वे आसपास का मुआयना कर रही थीं.

एक लंबी चुप्पी के बाद कल्पना ने अब्दुल रहीम से पूछा, ‘‘क्या आप को ठीक 10 साल पहले की वह होली याद है, जब एक 15 साला लड़की का बलात्कार आप के इस ढाबे के ठीक पीछे वाली दीवार के पास किया गया था? उसे चादर आप ने ही ओढ़ाई थी और गोद में उठा उस के घर पहुंचाया था?’’

अब चौंकने की बारी अब्दुल रहीम की थी. पसीने की एक लड़ी कनपटी से बहते हुए पीठ तक जा पहुंची. थोड़ी देर तक सिर झुकाए मानो विचारों में गुम रहने के बाद उस ने सिर ऊपर उठाया. उस की पलकें भीगी हुई थीं.

अब्दुल रहीम देर तक आसमान में घूरता रहा. मन सालों पहले पहुंच गया. होली की वह मनहूस दोपहर थी, सड़क पर रंग खेलने वाले कम हो चले थे. इक्कादुक्का मोटरसाइकिल पर लड़के शोर मचाते हुए आतेजाते दिख रहे थे.

अब्दुल रहीम ने उस दिन भी ढाबा खोल रखा था. वैसे, ग्राहक न के बराबर आए थे. होली का दिन जो था. दोपहर होती देख अब्दुल रहीम ने भी ढाबा बंद कर घर जाने की सोची कि पिछवाड़े से आती आवाजों ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया. 4 लड़के नशे में चूर थे, पर… पर, यह क्या… वे एक लड़की को दबोचे हुए थे. छोटी बच्ची थी, शायद 14-15 साल की.

अब्दुल रहीम उन चारों लड़कों को पहचानता था. सब निठल्ले और आवारा थे. एक पिछड़े वर्ग के नेता के साथ लगे थे और इसलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था. वे यहीं आसपास के थे. चारों छोटेमोटे जुर्म कर अंदरबाहर होते रहते थे.

रहीम जोरशोर से चिल्लाया, पर लड़कों ने उस की कोई परवाह नहीं की, बल्कि एक लड़के ने ईंट का एक टुकड़ा ऐसा चलाया कि सीधे उस के सिर पर आ कर लगा और वह बेहोश हो गया.

आंखें खुलीं तो अंधेरा हो चुका था. अचानक उसे बच्ची का ध्यान आया. उन लड़कों ने तो उस का ऐसा हाल किया था कि शायद गिद्ध भी शर्मिंदा हो जाएं. बच्ची शायद मर चुकी थी.

अब्दुल रहीम दौड़ कर मेज पर ढका एक कपड़ा खींच लाया और उसे उस में लपेटा. पानी के छींटें मारमार कर कोशिश करने लगा कि शायद कहीं जिंदा हो. चेहरा साफ होते ही वह पहचान गया कि यह लड़की गली के आखिरी छोर पर रहती थी. उसे नाम तो मालूम नहीं था, पर घर का अंदाजा था. रोज ही तो वह अपनी सहेलियों के संग उस के ढाबे के सामने से स्कूल जाती थी.

बच्ची की लाश को कपड़े में लपेटे अब्दुल रहीम उस के घर की तरफ बढ़ चला. रात गहरा गई थी. लोग होली खेल कर अपनेअपने घरों में घुस गए थे, पर वहां बच्ची के घर के आगे भीड़ जैसी दिख रही थी. शायद लोग खोज रहे होंगे कि उन की बेटी किधर गई.

अब्दुल रहीम के लिए एकएक कदम चलना भारी हो गया. वह दरवाजे तक पहुंचा कि उस से पहले लोग दौड़ते हुए उस की तरफ आ गए. कांपते हाथों से उस ने लाश को एक जोड़ी हाथों में थमाया और वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा. वहां चीखपुकार मच गई.

‘मैं ने देखा है, किस ने किया है. मैं गवाही दूंगा कि कौन थे वे लोग…’ रहीम कहता रहा, पर किसी ने भी उसे नहीं सुना.

मेज पर हुई थपकी की आवाज से अब्दुल रहीम यादों से बाहर आया.

‘‘देखिए, उस केस को दाखिल करने का आर्डर आया है,’’ कल्पना ने बताया.

‘‘पर, इस बात को तो सालों बीत गए हैं मैडम. रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई थी. उस बच्ची के मातापिता शायद उस के गम को बरदाश्त नहीं कर पाए थे और उन्होंने शहर छोड़ दिया था,’’ अब्दुल रहीम ने हैरानी से कहा.

‘‘मुझे बताया गया है कि आप उस वारदात के चश्मदीद गवाह थे. उस वक्त आप उन बलात्कारियों की पहचान करने के लिए तैयार भी थे,’’ कल्पना की इस बात को सुन कर अब्दुल रहीम उलझन में पड़ गया.

‘‘अगर आप उन्हें सजा दिलाना नहीं चाहते हैं, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. बस, उस बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई, उस से सिर्फ वह ही नहीं तबाह हुई, बल्कि उस के मातापिता की भी जिंदगी बदतर हो गई,’’ सिटी एसपी कल्पना ने समझाते हुए कहा.

‘‘2 चाय ले कर आना,’’ अब्दुल रहीम ने आवाज लगाई, ‘‘जीप में बैठे लोगों को भी चाय पिलाना.’’

चाय आ गई. अब्दुल रहीम पूरे वक्त सिर झुकाए चिंता में चाय सुड़कता रहा.

‘‘आप तो ऐसे परेशान हो रहे हैं, जैसे आप ने ही गुनाह किया हो. मेरा इरादा आप को तंग करने का बिलकुल नहीं था. बस, उस परिवार के लिए इंसाफ की उम्मीद है.’’

अब्दुल रहीम ने कहा, ‘‘हां मैडम, मैं ने अपनी आंखों से देखा था उस दिन. पर मैं उस बच्ची को बचा नहीं सका. इस का मलाल मुझे आज तक है. इस के लिए मैं खुद को भी गुनाहगार समझता हूं.

‘‘कई दिनों तक तो मैं अपने आपे में भी नहीं था. एक महीने बाद मैं फिर गया था उस के घर, पर ताला लटका हुआ था और पड़ोसियों को भी कुछ नहीं पता था.

‘‘जानती हैं मैडम, उस वक्त के अखबारों में इस खबर ने कोई जगह नहीं पाई थी. दलितों की बेटियों का तो अकसर उस तरह बलात्कार होता था, पर यह घर थोड़ा ठीकठाक था, क्योंकि लड़की के पिता सरकारी नौकरी में थे. और गुनाहगार हमेशा आजाद घूमते रहे.

‘‘मैं ने भी इस डर से किसी को यह बात बताई भी नहीं. इसी शहर में होंगे सब. उस वक्त सब 20 से 25 साल के थे. मुझे सब के बाप के नामपते मालूम हैं. मैं आप को उन सब के बारे में बताने के लिए तैयार हूं.’’

अब्दुल रहीम को लगा कि चश्मे के पीछे कल्पना मैडम की आंखें भी नम हो गई थीं.

‘‘उस वक्त भले ही गुनाहगार बच गए होंगे. लड़की के मातापिता ने बदनामी से बचने के लिए मामला दर्ज ही नहीं किया, पर आने वाले दिनों में उन चारों पापियों की करतूत फोटो समेत हर अखबार की सुर्खी बनने वाली है.

‘‘आप तैयार रहें, एक लंबी कानूनी जंग में आप एक अहम किरदार रहेंगे,’’ कहते हुए कल्पना मैडम उठ खड़ी हुईं और काउंटर पर चाय के पैसे रखते हुए जीप में बैठ कर चली गईं.

‘‘आज पहली बार किसी पुलिस वाले को चाय के पैसे देते देखा है,’’ छोटू टेबल साफ करते हुए कह रहा था और अब्दुल रहीम को लग रहा था कि सालों से सीने पर रखा बोझ कुछ हलका हो गया था.

इस मुलाकात के बाद वक्त बहुत तेजी से बीता. वे चारों लड़के, जो अब अधेड़ हो चले थे, उन के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई. अब्दुल रहीम ने भी अपना बयान रेकौर्ड करा दिया.

मीडिया वाले इस खबर के पीछे पड़ गए थे. पर उन के हाथ कुछ खास खबर लग नहीं पाई थी.

अब्दुल रहीम को भी कई धमकी भरे फोन आने लगे थे. सो, उन्हें पूरी तरह पुलिस सिक्योरिटी में रखा जा रहा था. सब से बढ़ कर कल्पना मैडम खुद इस केस में दिलचस्पी ले रही थीं और हर पेशी के वक्त मौजूद रहती थीं.

कुछ उत्साही पत्रकारों ने उस परिवार के पड़ोसियों को खोज निकाला था, जिन्होंने बताया था कि होली के कुछ दिन बाद ही वे लोग चुपचाप बिना किसी से मिले कहीं चले गए थे, पर बात किसी से नहीं हो पाई थी.

कोर्ट की तारीखें जल्दीजल्दी पड़ रही थीं, जैसे कोर्ट भी इस मामले को जल्दी अंजाम तक पहुंचाना चाहता था. ऐसी ही एक पेशी में अब्दुल रहीम ने सालभर बाद बच्ची के पिता को देखा था. मिलते ही दोनों की आंखें नम हो गईं.

उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था. बलात्कारियों का वकील खूब तैयारी के साथ आया हुआ मालूम दे रहा था. उस की दलीलों के आगे केस अपना रुख मोड़ने लगा था. सभी कानून की खामियों के सामने बेबस से दिखने लगे थे.

‘‘जनाब, सिर्फ एक अब्दुल रहीम की गवाही को ही कैसे सच माना जाए? मानता हूं कि बलात्कार हुआ होगा, पर क्या यह जरूरी है कि चारों ये ही थे? हो सकता है कि अब्दुल रहीम अपनी कोई पुरानी दुश्मनी का बदला ले रहे हों? क्या पता इन्होंने ही बलात्कार किया हो और फिर लाश पहुंचा दी हो?’’ धूर्त वकील ने ऐसा पासा फेंका कि मामला ही बदल गया.

लंच की छुट्टी हो गई थी. उस के बाद फैसला आने की उम्मीद थी. चारों आरोपी मूंछों पर ताव देते हुए अपने वकील को गले लगा कर जश्न सा मना रहे थे.

लंच की छुट्टी के बाद जज साहब कुछ पहले ही आ कर सीट पर बैठ गए थे. उन के सख्त होते जा रहे हावभाव से माहौल भारी बनता जा रहा था.

‘‘क्या आप के पास कोई और गवाह है, जो इन चारों की पहचान कर सके,’’ जज साहब ने वकील से पूछा, तो वह बेचारा बगलें झांकने लगा.

पीछे से कुछ लोग ‘हायहाय’ का नारा लगाने लगे. चारों आरोपियों के चेहरे दमकने लगे थे. तभी एक आवाज आई, ‘‘हां, मैं हूं. चश्मदीद ही नहीं भुक्तभोगी भी. मुझे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए.’’

सब की नजरें आवाज की दिशा की ओर हो गईं. जज साहब के ‘इजाजत है’ बोलने के साथ ही लोगों ने देखा कि उन की शहर की एसपी कल्पना कठघरे की ओर जा रही हैं. पूरे माहौल में सनसनी मच गई.

‘‘हां, मैं ही हूं वह लड़की, जिसे 10 साल पहले होली की दोपहर में इन चारों ने बड़ी ही बेरहमी से कुचला था, इस ने…

‘‘जी हां, इसी ने मुझे मेरे घर के आगे से उठा लिया था, जब मैं गेट के आगे कुत्ते को रोटी देने निकली थी. मेरे मुंह को इस ने अपनी हथेलियों से दबा दिया था और कार में डाल दिया था.

‘‘भीतर पहले से ये तीनों बैठे हुए थे. इन्होंने पास के एक ढाबे के पीछे वाली दीवार की तरफ कार रोक कर मुझे घसीटते हुए उतारा था.

‘‘इस ने मेरे दोनों हाथ पकड़े थे और इस ने मेरी जांघें. कपड़े इस ने फाड़े थे. सब से पहले इस ने मेरा बलात्कार किया था… फिर इस ने… मुझे सब के चेहरे याद हैं.’’

सिटी एसपी कल्पना बोले जा रही थीं. अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए उन की करतूतों को उजागर करती जा रही थीं.

कल्पना के पिता ने उठ कर 10 साल पुराने हुए मैडिकल जांच के कागजात कोर्ट को सौंपे, जिस में बलात्कार की पुष्टि थी. रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कल्पना को जान से मारने की कोशिश की गई थी.

कल्पना अभी कठघरे में ही थीं कि एक आरोपी की पत्नी अपनी बेटी को ले कर आई और सीधे अपने पति के मुंह पर तमाचा जड़ दिया.

दूसरे आरोपी की पत्नी उठ कर बाहर चली गई. वहीं एक आरोपी की बहन अपनी जगह खड़ी हो कर चिल्लाने लगी, ‘‘शर्म है… लानत है, एक भाई होते हुए तुम ने ऐसा कैसे किया था?’’

‘‘जज साहब, मैं बिलकुल मरने की हालत में ही थी. होली की उसी रात मेरे पापा मुझे तुरंत अस्पताल ले कर गए थे, जहां मैं जिंदगी और मौत के बीच कई दिनों तक झूलती रही थी. मुझे दौरे आते थे. इन पापियों का चेहरा मुझे हर वक्त डराता रहता था.’’

अब केस आईने की तरह साफ था. अब्दुल रहीम की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. कल्पना उन के पास जा कर उन के कदमों में गिर पड़ी.

‘‘अगर आप न होते, तो शायद मैं जिंदा न रहती.’’

मीडिया वाले कल्पना से मिलने को उतावले थे. वे मुसकराते हुए उन की तरफ बढ़ गई.

‘‘अब्दुल रहीम ने जब आप को कपड़े में लपेटा था, तब मरा हुआ ही समझा था. मेज के उस कपड़े से पुलिस की वरदी तक के अपने सफर के बारे में कुछ बताएं?’’ एक पत्रकार ने पूछा, जो शायद सभी का सवाल था.

‘‘उस वारदात के बाद मेरे मातापिता बेहद दुखी थे और शर्मिंदा भी थे. शहर में वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे थे. मेरे पिताजी ने अपना तबादला इलाहाबाद करवा लिया था.

‘‘सालों तक मैं घर से बाहर जाने से डरती रही थी. आगे की पढ़ाई मैं ने प्राइवेट की. मैं अपने मातापिता को हर दिन थोड़ाथोड़ा मरते देख रही थी.

‘‘उस दिन मैं ने सोचा था कि बहुत हुआ अब और नहीं. मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए परीक्षा की तैयारी करने लगी. आरक्षण के कारण मुझे फायदा हुआ और मनचाही नौकरी मिल गई. मैं ने अपनी इच्छा से इस राज्य को चुना. फिर मौका मिला इस शहर में आने का.

‘‘बहुतकुछ हमारा यहीं रह गया था. शहर को हमारा कर्ज चुकाना था. हमारी इज्जत लौटानी थी.’’

‘‘आप दूसरी लड़कियों और उन के मातापिता को क्या संदेश देना चाहेंगी?’’ किसी ने सवाल किया.

‘‘इस सोच को बदलने की सख्त जरूरत है कि बलात्कार की शिकार लड़की और उस के परिवार वाले शर्मिंदा हों. गुनाहगार चोर होता है, न कि जिस का सामान चोरी जाता है वह.

‘‘हां, जब तक बलात्कारियों को सजा नहीं होगी, तब तक उन के हौसले बुलंद रहेंगे. मेरे मातापिता ने गलती की थी, जो कुसूरवार को सजा दिलाने की जगह खुद सजा भुगतते रहे.’’

कल्पना बोल रही थीं, तभी उन की मां ने एक पुडि़या अबीर निकाला और उसे आसमान में उड़ा दिया. सालों पहले एक होली ने उन की जिंदगी को बेरंग कर दिया था, उसे फिर से जीने की इच्छा मानो जाग गई थी. Hindi Kahani

Hindi Short Story: वफादारी का सुबूत – दीपक कहां का सफर तय कर रहा था

Hindi Short Story: तकरीबन 3 महीने बाद दीपक आज अपने घर लौट रहा था, तो उस के सपनों में मुक्ता का खूबसूरत बदन तैर रहा था. उस का मन कर रहा था कि वह पलक झपकते ही अपने घर पहुंच जाए और मुक्ता को अपनी बांहों में भर कर उस पर प्यार की बारिश कर दे.

पर अभी भी दीपक को काफी सफर तय करना था. सुबह होने से पहले तो वह हरगिज घर नहीं पहुंच सकता था. और फिर रात होने तक मुक्ता से उस का मिलन होना मुमकिन नहीं था.

‘‘उस्ताद, पेट में चूहे कूद रहे हैं. ‘बाबा का ढाबा’ पर ट्रक रोकना जरा. पहले पेटपूजा हो जाए. किस बात की जल्दी है. अब तो घर चल ही रहे हैं…’’ ट्रक के क्लीनर सुनील ने कहा, फिर मुसकरा कर जुमला कसा, ‘‘भाभी की बहुत याद आ रही है क्या? मैं ने तुम से बहुत बार कहा कि बाहर रह कर कहां तक मन मारोेगे. बहुत सी ऐसी जगहें हैं, जहां जा कर तनमन की भड़ास निकाली जा सकती है. पर तुम तो वाकई भाभी के दीवाने हो.’’

दीपक को पता था कि सुनील हर शहर में ऐसी जगह ढूंढ़ लेता है, जहां देह धंधेवालियां रहती हैं. वहां जा कर उसे अपने तन की भूख मिटाने की आदत सी पड़ गई है. अकसर वह सड़कछाप सैक्स के माहिरों की तलाश में भी रहता है. शायद ऐसी औरतों ने उसे कोई बीमारी दे दी है.

दीपक ने सुनील की बात का कोई जवाब नहीं दिया. वह मुक्ता के बारे में सोच रहा था. उस की एक साल पहले ही मुक्ता से शादी हुई थी. वह पढ़ीलिखी और सलीकेदार औरत थी. उस का कसा बदन बेहद खूबसूरत था. उस ने आते ही दीपक को अपने प्यार से इतना भर दिया कि वह उस का दीवाना हो कर रह गया.

दीपक एमए पास था. वह सालों नौकरी की तलाश में इधरउधर घूमता रहा, पर उसे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली. दीपक सभी तरह की गाडि़यां चलाने में माहिर था. उस के एक दोस्त ने उसे अपने एक रिश्तेदार की ट्रांसपोर्ट कंपनी में ड्राइवर की नौकरी दिलवा दी, तो उस ने मना नहीं किया.

वैसे, ट्रक ड्राइवरी में दीपक को अच्छीखासी आमदनी हो जाती थी. तनख्वाह मिलने के साथ ही वह रास्ते में मुसाफिर ढो कर भी पैसा बना लेता था. ये रुपए वह सुनील के साथ बांट लेता था.

सुनील तो ये रुपए देह धंधेवालियों और खानेपीने पर उड़ा देता था, पर घर लौटते समय दीपक की जेब भरी होती थी और घर वालों के लिए बहुत सा सामान भी होता था, जिस से सब उस से खुश रहते थे.

दीपक के घर में उस की पत्नी मुक्ता के अलावा मातापिता और 2 छोटे भाईबहन थे. दीपक जब भी ट्रक ले कर घर से बाहर निकलता था, तो कभी 15 दिन तो कभी एक महीने बाद ही वापस आ पाता था. पर इस बार तो हद ही हो गई थी. वह पूरे 3 महीने बाद घर लौट रहा था. उस ने पूरे 10 दिनों की छुट्टियां ली थीं.

‘‘उस्ताद, ‘बाबा का ढाबा’ आने वाला है,’’ सुनील की आवाज सुन कर दीपक ने ट्रक की रफ्तार कम की, तभी सड़क के दाईं तरफ ‘बाबा का ढाबा’ बोर्ड नजर आने लगा. उस ने ट्रक किनारे कर के लगाया. वहां और भी 10-12 ट्रक खड़े थे.

यह ढाबा ट्रक ड्राइवरों और उन के क्लीनरों से ही गुलजार रहता था. इस समय भी वहां कई लोग थे. कुछ लोग आराम कर रहे थे, तो कुछ चारपाई पर पटरा डाले खाना खाने में जुटे थे. वहां के माहौल में दाल फ्राई और देशी शराब की मिलीजुली महक पसरी थी. ट्रक से उतर कर सुनील सीधे ढाबे के काउंटर पर गया, तो वहां बैठे ढाबे के मालिक सरदारजी ने उस का अभिवादन करते हुए कहा, ‘‘आओ बादशाहो, बहुत दिनों बाद नजर आए?’’

सुनील ने कहा, ‘‘हां पाजी, इस बार तो मालिकों ने हमारी जान ही निकाल ली. न जाने कितने चक्कर असम के लगवा दिए.’’ ‘‘ओहो… तभी तो मैं कहूं कि अपना सुनील भाई बहुत दिनों से नजर नहीं आया. ये मालिक लोग भी खून चूस कर ही छोड़ते हैं जी,’’ सरदारजी ने हमदर्दी जताते हुए कहा.

‘‘पेट में चूहे दौड़ रहे हैं, फटाफट 2 दाल फ्राई करवाओ पाजी. मटरपनीर भी भिजवाओ,’’ सुनील ने कहा.

‘‘तुम बैठो चल कर. बस, अभी हुआ जाता है,’’ सरदारजी ने कहा और नौकर को आवाज लगाने लगे.

2 गिलास, एक कोल्ड ड्रिंक और एक नीबू ले कर जब तक सुनील खाने का और्डर दे कर दूसरे ड्राइवरों और क्लीनरों से दुआसलाम करता हुआ दीपक के पास पहुंचा, तब तक वह एक खाली पड़ी चारपाई पर पसर गया था. उसे हलका बुखार था.

‘‘क्या हुआ उस्ताद? सो गए क्या?’’ सुनील ने उसे हिलाया.

‘‘यार, अंगअंग दर्द कर रहा है,’’ दीपक ने आंखें मूंदे जवाब दिया.

‘‘लो उस्ताद, दो घूंट पी लो आज. सारी थकान उतर जाएगी,’’ सुनील ने अपनी जेब से दारू का पाउच निकाला और गिलास में डाल कर उस में कोल्ड ड्रिंक और नीबू मिलाने लगा. तब तक ढाबे का छोकरा उस के सामने आमलेट और सलाद रख गया था.

‘‘नहीं, तू पी,’’ दीपक ने कहा.

‘‘इस धंधे में ऐसा कैसे चलेगा उस्ताद?’’ सुनील बोला.

‘‘तुझे मालूम है कि मैं नहीं पीता. खराब चीज को एक बार मुंह से लगा लो, तो वह जिंदगीभर पीछा नहीं छोड़ती. मेरे लिए तो तू एक चाय बोल दे,’’ दीपक बोला.

सुनील ने वहीं से आवाज दे कर एक कड़क चाय लाने को बोला. दीपक ने जेब से सिरदर्द की एक गोली निकाली और उसे पानी के साथ निगल कर धीरेधीरे चाय पीने लगा. बीचबीच में वह आमलेट भी खा लेता. जब तक उस की चाय निबटी.

होटल के छोकरे ने आ कर खाना लगा दिया. गरमागरम खाना देख कर उस की भी भूख जाग गई. दोनों खाने में जुट गए. खाना खा कर दोनों कुछ देर तक वहीं चारपाई पर लेटे आराम करते रहे. अब दीपक को भी कोई जल्दी नहीं थी, क्योंकि दिन निकलने से पहले अब वह किसी भी हालत में घर नहीं पहुंच सकता था. एक घंटे बाद जब वह चलने के लिए तैयार हुआ, तो थोड़ी राहत महसूस कर रहा था.

कानपुर पहुंच कर दीपक ने ट्रक ट्रांसपोर्ट पर खड़ा किया और मालिक से रुपए और छुट्टी ले कर घर पहुंचा. सब लोग बेचैनी से उस का इंतजार कर रहे थे. उसे देखते ही खुश हो गए. मां उस के चेहरे को ध्यान से देखे जा रही थी, ‘‘इस बार तो तू बहुत कमजोर लग रहा है. चेहरा देखो कैसा निकल आया है. क्या बुखार है तुझे?’’

‘‘हां मां, मैं परसों भीग गया था. इस बार पूरे 10 दिन की छुट्टी ले कर आया हूं. जम कर आराम करूंगा, तो फिर से हट्टाकट्टा हो जाऊंगा,’’ कह कर वह अपनी लाई हुई सौगात उन लोगों में बांटने लगा. सब लोग अपनीअपनी मनपसंद चीजें पा कर खुश हो गए.

मुक्ता रसोई में खाना बनाते हुए सब की बातें सुन रही थी. उस के लिए दीपक इस बार सोने की खूबसूरत अंगूठी और कीमती साड़ी लाया था.

थोड़ी देर बाद एकांत मिलते ही मुक्ता उस के पास आई और बोली, ‘‘आप को बुखार है. आप ने दवा ली?’’

‘‘हां, ली थी.’’

‘‘एक गोली से क्या होता है? आप को किसी अच्छे डाक्टर को दिखा कर दवा लेनी चाहिए.’’

‘‘अरे, डाक्टर को क्या दिखाना? बताया न कि परसों भीग गया था, इसीलिए बुखार आ गया है.’’

‘‘फिर भी लापरवाही करने से क्या फायदा? आजकल वैसे भी डेंगू बहुत फैला हुआ है. मैं डाक्टर मदन को घर पर ही बुला लाती हूं.’’

दीपक नानुकर करने लगा, पर मुक्ता नहीं मानी. वह डाक्टर मदन को बुला लाई. वे उन के फैमिली डाक्टर थे और उन का क्लिनिक पास में ही था. वे फौरन चले आए. उन्होंने दीपक की अच्छी तरह जांच की और जांच के लिए ब्लड का सैंपल भी ले लिया. उन्होंने कुछ दवाएं लिखते हुए कहा, ‘‘ये दवाएं अभी मंगवा लीजिए, बाकी खून की रिपोर्ट आ जाने के बाद देखेंगे.’’

रात में दीपक ने मुक्ता को अपनी बांहों में लेना चाहा, तो उस ने उसे प्यार से मना कर दिया. ‘‘पहले आप ठीक हो जाइए. बीमारी में यह सबकुछ ठीक नहीं है,’’ मुक्ता ने बड़े ही प्यार से समझाया. दीपक ने बहुत जिद की, लेकिन वह नहीं मानी. बेचारा दीपक मन मसोस कर रह गया. उस को मुक्ता का बरताव समझ में नहीं आ रहा था.

दूसरे दिन मुक्ता डाक्टर मदन से दीपक की रिपोर्ट लेने गई, तो उन्होंने बताया कि बुखार मामूली है. दीपक को न तो डेंगू है और न ही एड्स या कोई सैक्स से जुड़ी बीमारी. बस 2 दिन में दीपक बिलकुल ठीक हो जाएगा. दीपक मुक्ता के साथ ही था. उसे डाक्टर मदन की बातें सुन कर हैरानी हुई. उस ने पूछा, ‘‘लेकिन डाक्टर साहब, आप को ये सब जांचें करवाने की जरूरत ही क्यों पड़ी?’’

‘‘ये सब जांचें कराने के लिए आप की पत्नी ने कहा था. आप 3 महीने से घर से बाहर जो रहे थे. आप की पत्नी वाकई बहुत समझदार हैं,’’ डाक्टर मदन ने मुक्ता की तारीफ करते हुए कहा.

दीपक को बहुत अजीब सा लगा, पर वह कुछ न बोला. दीपक दिनभर अनमना सा रहा. उसे मुक्ता पर बेहद गुस्सा आ रहा. रात में मुक्ता ने कहा, ‘‘आप को हरगिज मेरी यह हरकत पसंद नहीं आई होगी, पर मैं भी क्या करती, मीना रोज मेरे पास आ कर अपना दुखड़ा रोती रहती है. उसे न जाने कैसी गंदी बीमारी हो गई है.

‘‘यह बीमारी उसे अपने पति से मिली है. बेचारी बड़ी तकलीफ में है. उस के पास तो इलाज के लिए पैसे भी नहीं हैं.’’ दीपक को अब सारी बात समझ में आ गई. मीना उस के क्लीनर सुनील की पत्नी थी. सुनील को यह गंदी बीमारी देह धंधेवालियों से लगी थी. वह खुद भी तो हमेशा किसी अच्छे सैक्स माहिर डाक्टर की तलाश में रहता था.

सारी बात जान कर दीपक का मन मुक्ता की तरफ से शीशे की तरह साफ हो गया. वह यह भी समझ गया था कि अब वक्त आ गया है, जब मर्द को भी अपनी वफादारी का सुबूत देना होगा. Hindi Short Story

Hindi Story: कुढ़न – जिस्म का भूखा है हर मर्द

Hindi Story: हर साल इस नदी के किनारे मेला लगता है. इस बार भी मेला लगा. मेले में कमला भी रमिया बूआ को अपने साथ ले कर आई थीं.

तभी जोर का शोर उठा.

2 संत वेशधारी आपस में जगह के लिए झगड़ पड़े और देखते ही देखते कुछ ही देर में एक छोटी तमाशाई भीड़ जुट गई.

जो संत वेशधारी अभीअभी लोगों की श्रद्धा का पात्र बने प्रवचन दे रहे थे, उन का इस तरह झगड़ पड़ना मनोरंजन की बात बन गया.

कमला बहुत देख चुकी थीं ऐसे नाटक. क्या पुजारी, क्या मुल्ला, सभी अपना मतलब साधते हैं और दूसरों को आपस में लड़ाने की कोशिश करते हैं. सब दुकानदारी करते हैं. डरा कर लोगों की अंटी ढीली कराते हैं.

कमला के पति किसना पिछले कई महीनों तक बीमार रहे थे. डाक्टर ने उन्हें टीबी की बीमारी बताई थी. कितना इलाज कराया, कितनी सेवा की उन की, तनमनधन से. अपने सारे जेवर, यहां तक कि सुहाग की निशानियां भी बेच दीं. जिस ने जोजो बताया, वे सब करती चली गईं और आखिर में उन के किसना बिलकुल ठीक हो गए, बल्कि अब तो वे पहले से भी कहीं ज्यादा सेहतमंद हैं.

लोग कहते नहीं थकते हैं कि कमला अपने पति किसना को मौत के मुंह से वापस खींच कर ले आई हैं. इस बात से उन की इज्जत बढ़ी है.

कमला को घर लौटने की जल्दी हो रही थी, पर रमिया बूआ का मन अभी भरा नहीं था.

‘‘अब चलो भी बूआ, बहुत देर हो गई है,’’ बूआ को मनातेसमझाते उन्हें अपने साथ ले कर कमला अपने घर की ओर लौट चलीं.

अपनी झोंपड़ी की ओर कमला आगे बढ़ीं कि उन के इंतजार में आंखें बिछाए शन्नोमन्नो भाग कर आती दिखीं.

कमला ने प्यार से उन के लिए लाई चूड़ी, माला दोनों को पहना दीं, तब तक किसना भी आ गए, कमला ने उन्हें भी मिठाई दे दी.

तभी इन पलों का सम्मोहन एक झटके से टूट गया. एक लंबी, छरहरी, खूबसूरत औरत कमला से आ लिपटी. इस धक्के से अपने परिवार में मगन कमला संभलतेसंभलते भी लड़खड़ा गईं.

‘‘दीदी, मुझे अपनी शरण में ले लो. अब तो तुम्हारा ही आसरा है,’’ वह औरत बोली.

‘‘ऐसे कैसे आई लक्ष्मी? क्या हुआ?’’ उसे पहचानते ही किसी अनहोनी के डर से कमला का दिल बैठने लगा. किसना भी हैरानी से खड़े रहे.

लक्ष्मी को हांफतीकांपती देख कमला उसे सहारा दे कर झोंपड़ी के अंदर ले आईं और पानी लाने के लिए मुड़ीं, तो शन्नो को कटोरे में संभाल कर पानी लाते देखा.

पानी का घूंट भरते ही लक्ष्मी ने रोतेबिलखते टूटे शब्दों में जो बताया, उस का मतलब यह था कि कुछ ही दिन पहले लक्ष्मी का मरद उसे अपने मांबाप के पास छोड़ कर दूसरे शहर में काम करने चला गया. कल सुबह तक तो सब ठीक ही चला, पर शाम को जब सासू मां रोज की तरह पड़ोस में चली गईं, उस के ससुर काम पर से जल्दी घर लौट आए और आते ही उस से पानी मांगा. जब वह पानी देने गई, तो उन्होंने उस का हाथ ही पकड़ लिया. उन की बदनीयती भांप कर उन्हें एक जोर से धक्का दे कर वह सीधी बाहर भाग ली.

लक्ष्मी का भोला चेहरा और रोने से गुड़हल सी लाल और सूजी आंखें देख कर कमला ने पूछा, ‘‘पर, तू यहां तक आई कैसे? तुझे अकेले बाहर निकलते डर नहीं लगा? कहीं कुछ हो जाता तो?’’

‘‘नहीं दीदी, डर तो अपने ही घर में लगा, तभी तो अपनी लाज बचाने के लिए यहां भाग आई. पहले तो कभी अकले घर की दहलीज भी नहीं लांघी थी, पर उस समय इतना डर गई कि और कुछ समझ में ही नहीं आया, होश उड़ गए थे मेरे. बस, फिर तुम्हारा ध्यान आया और निकल भागी इधर की ओर,’’ लक्ष्मी ने बताया.

कमला अपने जंजालों को भूल लक्ष्मी को अपने साथ ले कर पीसीओ तक आई और उस के मरद से बात कराई.

मरद से बात हो जाने पर लक्ष्मी ने किलकती आवाज में उन्हें बताया कि उस के मरद ने कहा है कि अभी वह दीदी के पास ही रहे.

झोंपड़ी पर पहुंच कर कमला ने फौरन चाय का पानी चढ़ा दिया. किसना दुकान से डबलरोटी ले आए. मासूम बच्चियां बहुत भूखी थीं. कमला अपने हिस्से का भी उन्हें खिला कर किसना को जरूरी हिदायतें दे कर लक्ष्मी को साथ ले कर अपने काम पर चल दी.

मेहंदीरत्ता मेमसाहब के यहां आज किटी पार्टी है. उन्होंने काफी मेहमान बुला रखे हैं. लक्ष्मी साथ रहेगी, तो थोड़ा हाथ बंटा देगी. जल्दी काम हो जाएगा.

लक्ष्मी यह देख कर हैरान थी कि मेहंदीरत्ता मेमसाहब अपनी किटी पार्टी में मस्त थीं और साहब अकेले अपने कमरे में कंप्यूटर और मोबाइल फोन में बिजी थे.

कमला ने लक्ष्मी से कहा, ‘‘जरा साहब को चाय दे आ.’’

अपने में मस्त साहब ने चाय देने आई ताजगी से भरी लक्ष्मी को नजर उठा कर देखा और देखते ही मुसकरा कर उस से कुछ ऐसी हलकी बात कह दी कि वह घबरा कर फिर कमला के पास भाग गई.

लौटते समय रास्ते में लक्ष्मी बोली, ‘‘इतने पढ़ेलिखे आदमी हैं, लेकिन नजरें बिलकुल वैसी ही.

‘‘हम लोग तो ढोरडंगरों की जिंदगी जीते हैं, पर ऐसी शानदार जिंदगी जीने वाले सफेदपोश लोग भी कितने ओछे होते हैं.’’

लक्ष्मी की इस बात पर कमला चुप थीं.

लक्ष्मी ने फिर पूछा, ‘‘दीदी, क्या सभी बड़े आदमी ऐसे होते हैं?’’

‘‘नहीं, सब ऐसे नहीं होते. अच्छेबुरे, ओछे आदमी तो कभी भी कहीं भी हो सकते हैं,’’ कमला ने कहा, फिर कुछ याद कर वे कहने लगीं, ‘‘जानती हो, कुछ समय पहले यहां से थोड़ी दूरी पर एक साहब व मेमसाहब रहते थे और साथ में उन का एक छोटा सा खूबसूरत बच्चा था. दोनों ही एकदूसरे से बड़ा प्यार करते थे. मेमसाहब कभी झगड़ती भी थीं, तो साहब उन्हें प्यार से मना लेते थे.

‘‘उन्होंने अपने ही घर में एक बड़े कमरे में कोई प्रयोगशाला बनाई थी, वहीं दोनों मिल कर कुछ किया करते, फिर एक दिन…’’ कहतेकहते कमला का गला रुंध आया, ‘‘मेमसाहब प्रयोगशाला में कुछ कर रही थीं. साहब बाहर चंदा मांगने वाले आए थे, उन्हें चंदा दे रहे थे, हम भी तभी काम करने पहुंचे कि अंदर से धमाके की आवाज आई और आग की लपटें…

‘‘साहब बदहवास अंदर भागे. वहां सब धूंधूं कर जल रहा था. मेमसाहब और बच्चे को साहब जलती आग की लपटों से खींच लाए थे, पर वे उन्हें बचा नहीं पाए…

‘‘वे खुद भी बुरी तरह झुलस गए थे, एक खूबसूरत, प्यार भरा घर उजड़ गया. फिर उन के कई आपरेशन हुए. बाद में चलनेफिरने लायक होते ही अपनी सारी जायदाद महिला आश्रम और बाल आश्रम को दान कर न जाने कहां चले गए.

‘‘कुछ लोग बताते हैं कि वे शायद वैरागी हो गए हैं,’’ कमला ने एक गहरी सांस ली.

बातों में न समय का पता चला और न ही रास्ते का, झोंपड़ी आ गई थी.

कमला ने झोंपड़ी के अंदर ही शन्नोमन्नो के साथ लक्ष्मी के भी सोने का इंतजाम कर दिया. वे और किसना बाहर खुले में सो जाएंगे.

अचानक ही किसी ने कमला को झकझोर कर उठा दिया. थरथर कांपती लक्ष्मी उन के कान में फुसफुसा रही थी, ‘‘अंदर कोई नरपिशाच है दीदी.’’

कमला झटके से उठीं, ढिबरी जला कर पूरी झोंपड़ी में देखने लगीं. कनस्तर और संदूक के पीछे भी देखा. कहीं कोई नहीं था.

‘‘तुझे वहम हुआ होगा, कौन आएगा यहां,’’ चिढ़ कर कमला ने झिड़क दिया लक्ष्मी को, फिर वे रसोई की तरफ बढ़ी थीं कि वहां उकड़ू बैठे, मुंह छिपाए अपने पति को देख झट से ढिबरी बुझाई और बोलीं, ‘‘यहां तो कोई नहीं, चल तू आराम से सो जा. मैं दरवाजे पर बैठी हूं.’’

अंधेरे में कमला ने अपने पति किसना को बाहर निकल जाने दिया. फिर वे भरभरा कर दरवाजे पर ही ढह गईं. Hindi Story

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