⚲

आशिक के प्यार में पति से की बेवफाई

मुंबई की ग्लोबल सिटी विरार वेस्ट के गोकुल, राऊत सोसायटी की गोकुल एंपायर इमारत में 40 साल की शिल्पी वर्मा अपने 50 साल के पति सरवेंद्र वर्मा और 20 साल की एकलौती बेटी के साथ रहती थी. सरवेंद्र वर्मा एक कंपनी में मैनेजर थे तो बेटी पढ़ाई कर रही थी. 2 फरवरी, 2016 को शिल्पी सहेली नूपुर श्रीवास्तव के साथ विरार के एक मौल से शौपिंग कर के लौट रही थी, तभी पुराने विभा कालेज और केएफसी रेस्टोरैंट के बीच उन की कार एक आदमी से टकरा गई.

उस आदमी की उम्र 30-35 साल रही होगी. टक्कर लगते ही वह आदमी जमीन पर गिर पड़ा. इस हादसे से शिल्पी और नूपुर घबरा गईं. दोनों सहेलियां अपनी गलती के लिए माफी मांगतीं, उस के पहले ही वह आदमी उठ कर कार का बोनट पीटते हुए चिल्ला कर कहने लगा, ‘‘आप लोग आंखें बंद कर के कार चलाती हैं. आप लोगों को सड़क पर चलने वाला आदमी दिखाई नहीं देता?’’ नूपुर और शिल्पी ने सौरी कहा तो वह आदमी और जोर से चिल्लाया, ‘‘आप के सौरी कह देने से मेरी टांग ठीक हो जाएगी क्या? चलिए आप लोग चल कर मेरी टांग का इलाज कराइए. उस के बाद जाइए.’’ यह कह कर वह आदमी कार का पिछला दरवाजा खोल कर कार के अंदर बैठ गया. शिल्पी और नूपुर उस आदमी को कुछ पैसे दे कर अपना पीछा छुड़ाना चाहती थीं, पर वह नहीं माना. जब उस आदमी ने देखा कि वहां भीड़ इकट्ठा हो रही है तो उस ने शिल्पी को डांट कर कार आगे बढ़ाने को कहा.

शिल्पी उसे ले कर कुछ दूर गई होगी कि उस आदमी ने रूमाल में छिपी रिवौल्वर जैसी कोई चीज दिखाते हुए कहा, ‘‘मैं जैसा कहूं तुम वैसा ही करो, वरना मैं तुम दोनों को गोली मार दूंगा.’’

‘‘नहीं, आप को ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं है.’’ शिल्पी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूंगी.’’ इस के बाद वह आदमी जैसे कहता रहा, शिल्पी उसी तरह कार चलाती रही. करीब 2 घंटे तक वह उस आदमी के कहे अनुसार नवनिर्माण ग्लोबल सिटी की सड़कों पर कार को घुमाती रही. करीब 5 बजे उस की कार विरार के डोंगर पाड़ा रोड़ पर पहुंची तो कार का अगला टायर फट गया और कार बिजली के खंभे से टकरा गई.

कार रुक गई तो उस आदमी ने दोनों महिलाओं को कार से नीचे उतारा और एक औटो रुकवा कर उस में शिल्पी को बैठा कर नूपुर को इस तरह धक्का दिया कि वह जमीन पर गिर पड़ी. वह उठ पाती, उस के पहले ही वह शिल्पी को ले कर चला गया.  फिल्मी स्टाइल में घटी इस घटना से नूपुर हैरान थी. उस ने शोर भी मचाया, पर लोगों के इकट्ठा होने तक वह आदमी शिल्पी को ले कर चला गया था. नूपुर ने जब यह बात शिल्पी के घर जा कर उस के पति सरवेंद्र वर्मा और बेटी को बताई तो दोनों परेशान हो उठे. उस समय तक रात के साढ़े 8 बज चुके थे. वे नूपुर श्रीवास्तव को साथ ले कर थाना आगासी अरनाला पहुंचे और असिस्टैंट इंसपेक्टर संदीप शिवले को सारी बात बता कर शिल्पी वर्मा के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. मामला एक संभ्रात परिवार की महिला के अपहरण का था, इसलिए संदीप शिवले ने तुरंत घटना की जानकारी एसपी शारदा राऊत, एएसपी श्रीकृष्ण कोकाटे और डीएसपी नरसिंह भोसते के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को दे कर थाने में मौजूद स्टाफ को मामले की जांच में लगा दिया. आमतौर पर अपहरण जैसे मामले पैसों के लिए या दुश्मनी में किए जाते हैं. शुरू में पुलिस को यही लगा कि यह अपहरण भी पैसे के लिए किया गया होगा, इसलिए पुलिस अपहर्त्ता के फोन का इंतजार करने लगी. लेकिन जब अगले दिन तक अपहर्त्ता का कोई फोन नहीं आया तो संदीप शिवले को लगा कि यह अपहरण पैसे के लिए नहीं किया गया. इस में कोई और ही बात है.

वह इस मामले का हल ढूंढ ही रहे थे कि मीडिया ने इस मामले को हवा दे दी, जिस की वजह से पुलिस जांच में तेजी आ गई. संदीप शिवले ने हैडकांस्टेबल मंदार दलवी, आर.डी. बेलधर, मुकेश पवार, अमोल तटकरे, प्रियंका पाटिल, योगिता भोईर और अमोल कांटे की एक टीम बना कर ग्लोबल सिटी की सड़कों पर लगे सारे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने को कहा. इस से उस औटो के बारे में पता चल गया, जिस से शिल्पी को ले जाया गया था.

औटो वाले से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि दोनों को उस ने बसई के परिजात गेस्टहाउस के पास छोड़ा था. वे हड़बड़ी में अपना एक मोबाइल फोन उस के औटो में ही छोड़ गए थे. उस ने गलती मानते हुए कहा कि उस मोबाइल का सिम निकाल कर उस में अपना सिम डाल कर वह उस का उपयोग करने लगा था. लेकिन उस ने पुलिस को हैरान करने वाली बात यह बताई कि उस के औटो से जो महिला और आदमी गए थे, वे औटो में पतिपत्नी जैसा व्यवहार कर रहे थे, जबकि उस से कहा जा रहा कि आदमी ने महिला का अपहरण किया था. उन के बातव्यवहार से उसे अपहरण जैसा कुछ नहीं लग रहा था. इस से संदीप शिवले को शिल्पी का चरित्र संदिग्ध लगा. लेकिन शिल्पी की उम्र को देखते हुए उन के मन में एक बार यह भी आया कि औटो वाले को भ्रम भी तो हो सकता है, उन्होंने सरवेंद्र वर्मा और उन की बेटी को थाने बुला कर औटो वाले को मिला मोबाइल दिखाया तो उन्होंने बताया कि यह मोबाइल शिल्पी का ही है.

पुलिस ने बसई के परिजात गेस्टहाउस जा कर वहां के कर्मचारियों को शिल्पी का फोटो दिखा कर पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि यह महिला उन के गेस्टहाउस में अपने पति के साथ पिछले 3 दिनों से ठहरी थी. पुलिस के आने के कुछ घंटे पहले ही दोनों वहां से गए थे. पुलिस को जैसी उम्मीद थी कि दोनों ने गेस्टहाउस के रजिस्टर में अपना सही नामपता नहीं लिखा होगा, वह सच था. रजिस्टर में जो नामपता लिखा था, उस की जांच की गई तो वह झूठा पाया गया. इस के बाद जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस ने शिल्पी के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर 3 महीने पहले सिर्फ एक बार फोन किया गया था.

वह नंबर पुलिस को संदिग्ध लगा तो पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया. पता चला कि वह नंबर आगरा के किसी अमरीश कुमार का था, लेकिन वह नंबर अब बंद हो चुका था. मुंबई पुलिस आगरा पहुंची तो पता चला अमरीश कुमार तो 3 महीने पहले दुबई चला गया था. पुलिस खाली हाथ लौट आई. इसी तरह 10 दिन बीत गए, पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. 14 फरवरी, 2016 को मोबाइल के आईएमईआई नंबर की मदद से पुलिस पंजाब के लुधियाना शहर की एक दुकान पर पहुंची और वहां से शिल्पी और अमरीश कुमार को गिरफ्तार कर लिया.

अमरीश कुमार ने उस दुकान पर अपना मोबाइल फोन ठीक कराने के लिए दिया था. दोनों को मुंबई ला कर थाना आगासी पुलिस ने वसई की अदालत में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट श्रीमती धारे के समक्ष पेश कर विस्तार से पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में पता चला कि प्रेमी के साथ रहने के लिए शिल्पी ने खुद ही अपहरण का ड्रामा रचा था.

30 साल का अमरीश कुमार उत्तर प्रदेश के आगरा शहर का रहने वाला था. वह वहां के एक थ्री स्टार होटल में सेफ था. शिल्पी वर्मा से उस की जानपहचान कोई 4 साल पहले सोशल मीडिया फेसबुक के माध्यम से हुई थी. दोस्त बनने के बाद पहले दोनों के बीच फेसबुक द्वारा चैटिंग शुरू हुई, उस के बाद सीधे फोन से बात होने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों में प्यार हो गया. उस समय शिल्पी पति और बेटी के साथ कोलकाता में रहती थी. उसे पता था कि शिल्पी उस से 10 साल बड़ी थी. इस के बावजूद अमरीश के प्यार में जरा भी कमी नहीं आई. मूलरूप से बिहार के पटना शहर की रहने वाली शिल्पी की शादी सन 1993 में दिल्ली के रहने वाले सरवेंद्र वर्मा के साथ हुई थी. सरवेंद्र कोलकाता में रहते थे, इसलिए वह भी पति के साथ वहीं रहने लगी थी. सरवेंद्र वहीं एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी करते थे.

पति के नौकरी और बेटी के स्कूल जाने के बाद शिल्पी घर में अकेली रह जाती तो बोर होने लगती. इस के अलावा न जाने क्यों पति और बेटी का व्यवहार भी उस के प्रति ठीक नहीं था. चैटिंग और बातचीत के बाद शिल्पी और अमरीश एकदूसरे के काफी करीब आ गए. बातचीत में उन के बीच मर्यादा की कोई सीमा नहीं रह गई थी. दोनों एकदूसरे से खुल कर बातें करने लगे थे. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों मिलने के लिए बेचैन हो उठे. उन की यह बेचैनी तभी शांत हुई, जब अमरीश कोलकाता जा पहुंचा. शिल्पी ने अपनी दोनों बांहें फैला कर उस का स्वागत किया. जब तक अमरीश कोलकाता में रहा, शिल्पी ने उस का हर तरह से खयाल रखा. एक बार दोनों की मुलाकात हुई तो सिलसिला ही चल निकला. अमरीश को जब भी मौका मिलता, वह शिल्पी से मिलने कोलकाता पहुंच जाता. फिर तो दोनों साथसाथ रहने के सपने देखने लगे.

अपने इस सपने को पूरा करने के लिए शिल्पी जब सन 2013 में कोलकाता से पति और बेटी के साथ दिल्ली अपनी ससुराल आ रही थी तो दिल्ली पहुंचने से पहले ही गायब हो गई. 4 दिनों की अथक कोशिश के बाद पुलिस ने शिल्पी और अमरीश को उस के मोबाइल फोन के जरिए कानपुर के  एक लौज से बरामद किया. शिल्पी की यह हरकत सरवेंद्र और उस के घर वालों को काफी नागवार लगी. अब वह शिल्पी को अपने साथ रखना नहीं चाहते थे, लेकिन रिश्तेदारों के समझाने पर उसे चेतावनी दे कर साथ रख लिया था. पर शिल्पी पर उन की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ. वह अमरीश को भूल नहीं पाई आौर मौका मिलने पर अमरीश से फोन पर बातें करती रही.

पत्नी की हरकतों से तंग आ कर सरवेंद्र ने सन 2015 में अपना ट्रांसफर मुंबई करा लिया. मुंबई में उन्हें विरार की नवनिर्माण ग्लोबल सिटी में रहने के लिए बढि़या फ्लैट मिला ही था, आनेजाने के लिए कार भी मिली थी. हर सुखसुविधा होने के बावजूद शिल्पी का मन नहीं लग रहा था. उस का मन तो अमरीश में बसा था. वह उस के साथ खुले आकाश में उड़ने के लिए तड़प रही थी. बापबेटी शिल्पी की हर गतिविधि पर नजर रख रहे थे, लेकिन उस की हरकतें बंद नहीं हुईं. वह किसी न किसी तरह अमरीश से बातें कर ही लेती थी. इस के लिए वह अलग मोबाइल रखती थी, जिस से वह सिर्फ अमरीश से ही बातें करती थी. मुंबई आने के बाद वह अमरीश से मिल नहीं पा रही थी, इसलिए उस ने उस के साथ भाग जाने की योजना बनाई. इस बार वह उस के साथ इस तरह भागना चाहती थी कि घर वालों की तो छोड़ो, पुलिस उन तक न पहुंच सके. इसीलिए इस बार उस ने भागने को अपहरण के ड्रामे में बदल दिया. लेकिन इस बार भी वह मोबाइल नंबर के जरिए ही पकड़ी गई.

योजना के अनुसार, अमरीश ने 3 महीने पहले यह कह कर घर छोड़ दिया कि उसे दुबई में नौकरी मिल गई है. घर वालों से झूठ बोल कर वह पंजाब के शहर लुधियाना चला गया. वह शेफ का काम जानता ही था, इसलिए उसे वहां एक रेस्टोरेंट में नौकरी मिल गई. इस के बाद वह शिल्पी को भगाने की तैयारी करने लगा. शिल्पी को भगाने के 3 दिन पहले यानी 30 जनवरी को अमरीश लुधियाना से मुंबई पहुंचा तो शिल्पी उस के साथ भागने की तैयारी करने लगी. घर वालों को अमरीश के साथ भाग जाने का संदेह न हो, इस के लिए उस ने सीधे भागने के बजाय अपने अपहरण का ड्रामा रचा, जिस में वह सफल भी रही.

लुधियाना पहुंच कर अमरीश और शिल्पी निश्चिंत हो गए थे और देश छोड़ कर दुबई जाने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन शिल्पी ने 3 महीने पहले जो गलती की थी, उसी की वजह से पुलिस ने उसे पकड़ लिया. शिल्पी और अमरीश कुमार ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, वे बालिग भी थे, इसलिए उन पर कोई अपराध नहीं बनता था. लेकिन अपने अपहरण का ड्रामा रच कर उस ने पुलिस को गुमराह करने का अपराध किया था. इसलिए पुलिस ने उसी का मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया. चूंकि उन का यह अपराध जमानती था, इसलिए जल्दी ही उन की जमानतें हो गईं. जमानत होने के बाद शिल्पी ने पति के साथ जाने से मना कर दिया और प्रेमी अमरीश से विवाह कर के उसी के साथ रह रही है.

सनकी पति ने की अपनी ही पत्नी की हत्या

कल्लू को अकेला घर आया देख कर घर वालों में से किसी ने पूछा कि अंजू कहां है तो उस ने बेहद इत्मीनान से जवाब दिया कि उस की तो उस ने हत्या कर दी है. पहले तो चौंक कर सभी ने कल्लू की ओर देखा. लेकिन उस के हावभाव देख कर सभी को यकीन हो गया कि इस सिरफिरे का कोई भरोसा नहीं कि यह जो कह रहा है, उसे कर चुका हो. भोपाल के कोटरा इलाके के बापूनगर में मामूली खातेपीते लोग रहते हैं. उन्हीं में एक कल्लू विश्वकर्मा भी था. पेशे से वेल्डर कल्लू की एक पहचान निहायत ही सनकी आदमी की भी थी, जो अड़ोसपड़ोस में हर किसी से झगड़ बैठता था, इसलिए लोग उस से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे.

30 साल की अंजू कल्लू की पत्नी थी, जो उस के 5 बच्चों की मां थी. पतिपत्नी में आए दिन झगड़ा होता रहता था, जिस के न केवल उन के बच्चे, बल्कि पड़ोसी भी आदी हो चुके थे. 5 बच्चों की मां होने के बावजूद अंजू जवान और आकर्षक दिखती थी. लेकिन इस बात पर खुश होने के बजाय कल्लू को उस पर शक हो चला था कि उस के किसी से अवैधसंबंध हैं. पतियों के इस तरह के शक की न कोई वजह होती है और न ही इस का कोई इलाज है, जिस की मार बेकसूर पत्नियों को झेलनी पड़ती है. अंजू भी उस में से एक थी, जो पति की बातों और तानों को सुनसुन कर परेशान रहती थी. जब कभी वह उस का शक दूर करने की कोशिश करती, कल्लू समझने के बजाय और भड़क उठता था.

26 अक्तूबर, 2016 को जब सभी लोग दिवाली की तैयारियां कर रहे थे, दोपहर कोई एक बजे कल्लू ने अंजू से कहीं घूमने चलने को कहा. पति की इस पेशकश पर पहले तो वह चौंकी, लेकिन जल्द ही खुश भी हो गई. पति शक्की था, झक्की था, लेकिन कभीकभी उस का प्यार उमड़ता था तो अंजू पुराना सब कुछ भूल जाती थी. उस दिन भी जब कल्लू ने अपनी मारुति कार से कलियासोत डैम घूमने चलने को कहा तो वह झटपट यह सोच कर तैयार हो गई कि कहीं ऐसा न हो कि पति का इरादा बदल जाए. दोनों कार में सवार हो कर कलियासोत डैम पहुचे, जहां पतिपत्नी में किसी बात को ले कर विवाद शुरू हो गया. जब दोनों लड़तेझगड़ते डैम के गेट नंबर 13 पर पहुंचे तो कल्लू ने अंजू को काबू कर के उस का गला दबाना शुरू कर दिया. उस समय वहां सुनसान था. क्योंकि आमतौर पर कम लोग ही उतनी दूर तक घूमने जाते हैं. गुस्साए कल्लू ने तब तक पत्नी की गरदन नहीं छोड़ी, जब तक वह लाश बन कर उस की बांहों में नहीं झूल गई. जब पत्नी के मरने की तसल्ली हो गई तो कल्लू ने इत्मीनान से उस की लाश को डैम के बहते पानी में फेंक दिया. लेकिन फरार होने के बजाय वह सीधे घर जा पहुंचा और पत्नी की हत्या की बात दो टूक कह दी. घर वालों ने सकपका कर आसपड़ोस वालों से यह बात कही तो मोहल्ले वालों ने पहले तो जम कर उस की धुनाई की, उस के बाद उसे रस्सी से बांध दिया और पुलिस को खबर कर दी. खबर मिलते ही पुलिस कल्लू के घर पहुंच गई.

एएसपी आर.डी. भारद्वाज ने जब कल्लू से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद गोताखोरों की मदद से अंजू की लाश और टूटी हुई चूडि़यां भी घटनास्थल से बरामद कर ली गईं. इस के बाद औपचारिक काररवाई पूरी कर के अंजू के शव को पोस्टमार्टम के लिए हमीदिया अस्पताल भिजवा दिया गया. पुलिस के बारबार पूछने पर कल्लू एक ही बात दोहराता रहा कि अंजू बहुत बकबक करती थी, इसलिए उस ने उसे मार डाला. लेकिन इस मामले से यह उजागर हुआ है कि पतिपत्नी के बीच रोजमर्रा की कलह कभीकभी जानलेवा साबित हो जाती है. सनकी और शक्की पति की अक्ल पर इस कदर परदा पड़ जाता है कि वह अपना अंजाम तो दूर की बात, बच्चों के भविष्य की भी परवाह नहीं करता.

लगता तो यही है कि मामूली शक्ल सूरत वाला कल्लू वेल्डिंग के धंधे से कमा तो अच्छा लेता था, पर अपनी जवान और खूबसूरत पत्नी को ले कर हीनभावना से ग्रस्त था, जिस के चलते उस ने उसे हमेशा के लिए ठिकाने लगा कर खुद अपने हाथों अपनी जमीजमाई गृहस्थी उजाड़ दी.

शादी में फायरिंग दलितों पर रोब गांठने का फैशन

चारों ओर चहलपहल थी. खुशी का माहौल था. शहनाई के सुर माहौल में रस घोल रहे थे. इसी बीच शोर मचा कि बरात आ गई. दूल्हा कार से उतरा और उसे वरमाला के लिए बने स्टेज की ओर ले जाया गया.

कुछ देर में दुलहन भी छमछम करते हुए स्टेज पर आई. लोग तालियां बजाने लगे. शहनाइयों की आवाज तेज हो उठी.

दूल्हे ने दुलहन के गले में वरमाला डाली. दनादन हवाई फायरिंग होने लगी. बंदूकों और रायफलों की गोलियों से शामियाने में सैकड़ों छेद हो गए.

अचानक स्टेज के किनारे से चीख की आवाज उठी. एक बच्चा खून से सना जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. चारों ओर चीखपुकार मच गई. शहनाइयां और गाजेबाजे बंद हो गए.

दरअसल, हवाई फायरिंग करने वालों में से किसी एक की गोली गलती से बच्चे को जा लगी थी. लोग घायल बच्चे को उठा कर अस्पताल ले जाने के लिए भागे.

कुछ देर पहले तक खुशी का माहौल अचानक मातम में बदल गया. कुछ लोगों ने पुलिस को खबर कर दी. आननफानन शादी की रस्मों को 10-12 मिनटों में खत्म कराया गया. पुलिस दूल्हे के फूफा को गिरफ्तार कर के ले गई. उसी की बंदूक से निकली गोली से बच्चा जख्मी हुआ था.

इसी तरह 7 दिसंबर, 2016 को पंजाब के भटिंडा शहर में शादी के समारोह में डांस का प्रोग्राम चल रहा था.  उसी दौरान कुछ नौजवान अपनी बंदूकों से हवाई फायरिंग भी कर रहे थे.

इसी बीच स्टेज पर डांस कर रही लड़की को एक गोली जा लगी और वह चीखते हुए खून से लथपथ हो कर गिर पड़ी. उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

25 साल की उस डांसर का नाम कुलविंदर कौर था और वह पेट से भी थी. पुलिस ने गोली चलाने वाले को दबोच लिया.

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब जैसे राज्यों में शादीब्याह में हवाई फायरिंग करने का पुराना फैशन है. ऐसी फायरिंग की वजह से कइयों की जान जाने और जख्मी होने के बाद भी लोग इस से बाज नहीं आ रहे हैं. प्रशासन और पुलिस भी ऐसे जानलेवा फैशन पर रोक लगाने को ले कर खासा गंभीर नहीं हैं.

दरअसल, हवाई फायरिंग करने का मकसद खुशी जताने के साथसाथ दबंगों का आसपास के इलाकों के गरीबों और दलितों के बीच डर का माहौल बनाना भी होता है.

बिहार पिछड़ा वर्ग महासंघ के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि अगड़ी जातियों में जो दबंग टाइप के लोग होते हैं, वे बंदूक, रायफल से गोलियां चला कर या तलवारें भांज कर निचली जातियों के लोगों में खौफ पैदा करते हैं.

वे आगे बताते हैं कि पटना शहर के लोहानीपुर महल्ले में मुसहरों की पुरानी और बड़ी बस्ती है. उस के आसपास कुछ अगड़ी जाति के दबंगों ने ऊंचीऊंची इमारतें बना ली हैं. उन इमारतों के चारों ओर 10-12 फुट ऊंची चारदीवारी खड़ी की गई है. अंदर क्या होता है, इस का पता बाहर वालों को नहीं लगता है.

चारदीवारी के अंदर भी अजीब सा माहौल बना कर रखा जाता है. 5-7 दिनों में वहां के कुछ लोग अपनीअपनी छतों पर जा कर हवाई फायरिंग करते हैं. इस से पूरी बस्ती में खौफ का माहौल बना रहता है. शादी वगैरह के मौके पर तो अंधाधुंध फायरिंग की जाती है.

किसी से इस बात की शिकायत भी नहीं की जा सकती. उन के जलसों में मंत्री, नेता, अफसर और पुलिस वाले ही मेहमान होते हैं. ऐसे में दलितों की शिकायत पर कितनी कार्यवाही होगी, इस का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.

दलित पिछड़ों पर रोब गांठने के लिए बंदूक, रायफल और पिस्तौल से हवाई फायरिंग की जाती है. दूल्हे के रिश्तेदार दनादन हवाई फायरिंग कर खुशियां जताते हैं, जबकि हकीकत में वे आसपास के गरीबों और दलितों के बीच खौफ पैदा करना चाहते हैं, ताकि दलित हर समय उन से सहम कर रहें. उन से बात करने की जुर्रत नहीं कर सकें. उन की बदमाशियों और शोषण के खिलाफ आवाज न उठा सकें.

शादी समारोहों में खुशी और ताकत जाहिर करने के लिए गोलियां चलाने का एक दर्दनाक वाकिआ देश की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा शहर में हुआ था.

18 फरवरी, 2010 को नोएडा के सैक्टर 10 में एक शादी समारोह में हवाई फायरिंग तब हुई, जब शादी की रस्में खत्म हो चुकी थीं. दुलहन की विदाई की तैयारी चल रही थी. इसी बीच दूल्हे के फूफा ने खुशी जताने के लिए हवाई फायरिंग की, लेकिन गोली सीधे दूल्हे के सीने में जा लगी और उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

ताजा मामला उत्तराखंड के जसपुर इलाके का है, जहां 5 दिसंबर, 2016 को बरातियों द्वारा हवाई फायरिंग करने से 2 लोग घायल हो गए थे. उन्हें आननफानन प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया गया था. पुलिस में केस दर्ज नहीं किया गया था, क्योंकि गोली चलाने वाले भी अपने थे और जिन्हें गोली लगी थी, वे भी रिश्तेदारों में ही थे.

पुलिस इस मसले पर कहती है कि हथियारों का गलत इस्तेमाल होने पर  आर्म्स ऐक्ट की धारा-17 और धारा-30 के तहत लाइसैंस रद्द किया जा सकता है. आरोपी को 3 साल की कैद और जुर्माने की सजा मिल सकती है.

गोली चलाने पर किसी की मौत हो जाने पर धारा-304 के तहत एफआईआर दर्ज की जाती है. इस के तहत गैरइरादतन हत्या का केस दर्ज होता है. इस मामले में 10 साल की सजा या फिर ताउम्र कैद हो सकती है.

शादी या फिर किसी भी तरह के समारोह में हथियार ले कर जाने पर बैन लगना चाहिए. हालांकि केंद्र सरकार ने इस तरह का बैन लगाने का निर्देश सभी राज्य सरकारों को दिया है, इस के बाद भी इस पर रोक नहीं लग पा रही है.

गोलियां चलानी हैं तो शादी में मत आओ

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बड़ौत थाने के वाजिदपुर गांव के फौजी रह चुके एक शख्स सुभाष कश्यप ने शादियों में गोलियां बरसाने वाले लोगों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा था.

उन्होंने अपनी शादी के कार्ड में अनोखी चेतावनी छाप कर लोगों का दिल जीत लिया था. उन्होंने उस कार्ड में वैवाहिक कार्यक्रमों के साथसाथ यह भी छापा था, ‘शादी में फायरिंग और शराब के सेवन पर पूरी तरह से पाबंदी है. जो लोग फायरिंग करना चाहते हैं और शराब पीना चाहते हैं, ऐसे लोगों से निवेदन है कि वे शादी में शामिल नहीं हों…’ शादी के मजे को किरकिरा बनाने वालों ने वहां न जाने में ही अपनी भलाई समझी.

काश ! वह मान जाती : हुस्न के फेर में किया कत्ल

जून का महीना था, बिजली न होने की वजह से गरमी से लोगों का बुरा हाल था. लगभग 2 घंटे बाद बिजली आई भी तो परमजीत कौर के घर के तार में आग लग जाने की वजह से परेशानी कम होने के बजाए और बढ़ गई. दिन तो गुजारा जा सकता था, लेकिन रात गुजारना मुश्किल था. इसलिए परमजीत कौर ने अपनी 17 साल की बेटी संदीप कौर से कहा, ‘‘देख तो बेटा, तेरा भाई रमन कहां है. उस से कहो किसी बिजली मिस्त्री को बुला लाए, जिस से घर की बिजली ठीक हो जाए.’’

‘‘मम्मी, रमन तो दोस्तों के साथ ट्यूबवैल पर गया है.’’

‘‘फिर बिजली कैसे ठीक होगी?’’

‘‘मैं जा कर किसी मिस्त्री को देखती हूं.’’ संदीप कौर ने कहा और दुपट्टा ले कर घर से बाहर निकल गई. बिजली की दुकान गांव से बाहर सड़क किनारे थी, जिस पर 2 लड़के रहते थे. उन में से एक का नाम राजवीर सिंह उर्फ राजा था.

राजा गांव के ही रहने वाले रंजीत सिंह का बेटा था. रंजीत सिंह खुद तो ड्राइवर थे, लेकिन चाहते थे कि उन के बच्चे पढ़लिख कर ठीकठाक नौकरी कर लें. लेकिन दुर्भाग्य से उन के दोनों बेटे पढ़ नहीं सके. बड़े बेटे राजवीर सिंह उर्फ राजा ने 8वीं पास कर के स्कूल छोड़ दिया तो छोटा 8वीं भी पास नहीं सका.

पढ़ाई छोड़ कर राजा ने बिजली मरम्मत का काम सीख लिया और गांव के बाहर दुकान खोल ली. संदीप कौर राजवीर की दुकान पर पहुंची और उसे घर ले आई. 15-20 मिनट में राजवीर ने बिजली ठीक कर के परमजीत कौर से कहा, ‘‘बेबे, आप के घर के सारे तार गल गए हैं. आप नया तार मंगवा लीजिए, मैं तार बदल दूंगा.’’

‘‘बेटा, तू पैसे ले जा और बाजार से नया तार ला कर बदल दे. मेरे यहां कौन तार लाने जाएगा?’’ परमजीत कौर ने कहा.

‘‘ठीक है बेबे, मैं तार ला कर बदल दूंगा.’’

परमजीत कौर उसे पैसे देने लगीं तो उस ने कहा, ‘‘बेबे,जब तार ला कर बदल दूंगा तब पैसे देना. अभी मैं पैसे नहीं लूंगा.’’ राजवीर परमजीत कौर से बातें करते हुए कनखियों से संदीप कौर को भी ताक रहा था.

राजवीर संदीप कौर को आज पहली बार इस तरह नहीं ताक रहा था. इस के पहले दोनों गांव के एक समारोह में मिले थे, तभी से दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे थे.

राजवीर को देखते ही 17 साल की संदीप कौर के दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं. राजवीर भी अकसर सुबहशाम स्कूल आतेजाते उसे देखता रहता था पर सहेलियों के साथ होने की वजह से वह संदीप से बात नहीं कर पाता था. बिजली खराब होने की वजह से उस दिन वह संदीप कौर के इतना करीब आया था.

राजवीर संदीप कौर के घर कभी बिजली ठीक करने के बहाने तो कभी किसी और बहाने आनेजाने लगा. गांव का होने की वजह से परमजीत कौर ने न कभी बुरा माना और न संदेह किया. क्योंकि राजवीर उम्र में संदीप कौर से बड़ा था. इसी तरह आनेजाने में राजवीर और संदीपकौर के बीच न केवल प्यार का इजहार हो गया, बल्कि एकदूसरे की बांहों में समा कर दोनों अपनी सीमाएं भी लांघ गए, इस का अहसास होने पर जब संदीप कौर उदास हुई तो राजवीर ने उसे आश्वासन देते हुए कहा, ‘‘इस में परेशान होने की क्या बात है, आखिर हम दोनों को शादी तो करनी ही है.’’

संदीप और राजवीर अकसर चोरीछिपे मिलने लगे थे. धीरेधीरे 2 साल का समय बीत गया. इस बीच संदीप कौर ने राजवीर से कई बार कहा कि वह उस से शादी कर ले. इस पर राजवीर उसे समझाते हुए कहता, ‘‘संदीप, शादी कोई बच्चों का खेल नहीं. शादी के बाद जिंदगी गुजारने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है. पहले उस लायक हो जाने दो, उस के बाद शादी कर लेंगे.’’

राजवीर की बातें सुन कर संदीप कौर मन मसोस कर रह जाती. लेकिन अब उस की रातें राजवीर के बिना मुश्किल से कटती थीं, इसलिए वह लगातार उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी थी. इधर कुछ दिनों से शादी की बात को ले कर राजवीर से उस का झगड़ा भी होने लगा था. क्योंकि राजवीर शादी के लिए बहाने बना रहा था. अंत में संदीप कौर ने उसे धमकी दे दी कि अगर उस ने 2 दिनों में शादी नहीं की तो वह उसे गांव वालों के सामने बदनाम कर के जहर खा लेगी.

संदीप कौर की इस धमकी से राजवीर बुरी तरह डर गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह संदीप कौर को किस तरह समझाए. 22 दिसंबर, 2016 की सुबह रोज की तरह संदीप कौर स्कूल जाने के लिए घर से निकली जरूर, लेकिन लौट कर नहीं आई.

 

संदीप कौर लौट कर नहीं आई तो उस की मां को चिंता हुई. जालंधर के थाना लांबड़ा का एक गांव है कोहाला. तरसेम सिंह इसी गांव के रहने वाले थे. उन के पास कुछ जमीन थी, उसी की पैदावार से घर का खर्च चलता था. लेकिन इस से वह संतुष्ट नहीं थे. उन के गांव के तमाम लोग विदेशों में रहते थे, इसलिए उन की देखादेखी तरसेम सिंह भी 3 साल पहले सऊदी अरब चले गए थे.

पति के विदेश जाने के बाद परमजीत कौर ने परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली थी. उन के परिवार में एक बेटी संदीप कौर और बेटा रमन था. संदीप कौर आठोला के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 11वीं में पढ़ रही थी.

वह सुबह स्कूल जाती थी और शाम साढ़े 4 बजे तक घर लौट आती थी, पर 22 दिसंबर, 2016 को वह शाम 6 बजे तक घर नहीं लौटी तो परमजीत कौर को चिंता हुई. उन्होंने संदीप कौर की सहेलियों के घर जा कर पूछा तो पता चला कि उस दिन तो वह स्कूल गई ही नहीं थी. यह सुन कर परमजीत कौर के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

बेटी के लापता होने से परमजीत कौर रोने लगीं. गांव वालों ने उन्हें सांत्वना दी और सभी मिल कर संदीप कौर को रात भर ढूंढते रहे. अगले दिन स्कूल जा कर भी पता किया, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं मिला. परमजीत कौर ने सऊदी अरब फोन कर के पति को भी बेटी के लापता होने के बारे में बता दिया.

जवान लड़की का मामला था, इसलिए सभी घबरा रहे थे. 3 दिनों तक तलाश करने के बाद जब संदीप कौर की कहीं कोई खबर नहीं मिली तो गांव वालों के कहने पर संदीप कौर की गुमशुदगी थाना लांबड़ा में दर्ज करा दी गई.

थानाप्रभारी सुखपाल सिंह को पूछताछ में पता चला कि 22 दिसंबर को संदीप कौर किसी युवक के साथ थी. युवक के बारे में पता करने के लिए थानाप्रभारी ने संदीप कौर की सहेलियों से पूछताछ की, पर कुछ पता नहीं चला. हां, इतनी जानकारी जरूर मिली कि उस का किसी युवक से चक्कर था. लेकिन युवक के बारे में किसी को पता नहीं था.

युवक के बारे में पता करने के लिए सुखपाल सिंह ने मुखबिरों को लगा दिया. इस बीच संदीप कौर को गायब हुए 8 दिन बीत गए थे. संदीप कौर के पिता तरसेम सिंह भी सऊदी अरब से आ गए थे. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और किसी मुखबिर से पता चला कि संदीप कौर के गायब होने में गांव के ही राजवीर सिंह का हाथ है.

संदेह के आधार पर पुलिस ने पूछताछ के लिए राजवीर को थाने बुला लिया. उस से संदीप के बारे में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने संदीप कौर के गायब होने का रहस्य उजागर करते हुए जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर सभी हैरान रह गए. उस ने बताया कि संदीप कौर की हत्या कर के उस की लाश को उस ने जमीन में गाड़ दिया है.

3 जनवरी, 2017 को राजवीर को अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान राजवीर सिंह उर्फ राजा की निशानदेही पर पुलिस ने एसडीएम, ग्राम सरपंच और अन्य लोगों की उपस्थिति में गांव कोहाला के बाहर एक खेत से संदीप कौर की लाश बरामद कर ली. लाश काफी हद तक सड़ चुकी थी.

सुखपाल सिंह ने संदीप कौर के घर वालों से लाश की शिनाख्त करवाने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और गुमशुदगी की जगह हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. राजवीर के बताए अनुसार उसे संदीप कौर की मौत का बहुत दुख था क्योंकि वह उसे सचमुच बहुत प्यार करता था. लेकिन उस ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि न चाहते हुए भी उसे उस की हत्या करनी पड़ी.

जिस दिन संदीप कौर ने उसे बदनाम करने और खुद जहर खाने की धमकी दी थी, उस दिन वह काफी डर गया था और रात भर सो नहीं सका. अगले दिन भी वह काफी घबराया हुआ था. वह गांव के बाहर खेतों में घूमता रहा और सोचता रहा कि इस मुसीबत से कैसे छुटकारा पाए, क्योंकि वह संदीप कौर को हर तरह से समझा कर थक चुका था. वह शादी की अपनी जिद पर अड़ी थी. शायद वह चाहती थी कि सऊदी अरब से पिता के आने से पहले शादी कर हो जाए.

राजवीर ने एक बार फिर संदीप कौर को समझाया कि वह कुछ दिनों रुक जाए लेकिन संदीप कौर रुकने को तैयार नहीं थी. जब वह किसी तरह नहीं मानी तो राजवीर ने उसे गांव से बाहर जाने वाली सड़क पर मिलने को कहा. उस ने कहा कि दोनों घर से भाग कर शादी करेंगे.

अगले दिन 22 दिसंबर, 2016 की सुबह संदीप कौर स्कूल जाने के लिए घर से निकली और राजवीर के पास पहुंच गई. दिन भर राजवीर उसे लांबड़ा में घुमाता रहा. शाम को वह उसे गांव के बाहर एक सुनसान खेत, जिसे उस ने एक दिन पहले देख रखा था, में ले आया. कुछ देर प्यारमोहब्बत की बातें करने के बाद उस ने एक बार फिर संदीप कौर को समझाने की कोशिश की पर वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

इस के बाद राजवीर ने इधरउधर देखा. दूरदूर तक उसे कोई नहीं दिखाई दिया तो संदीप कौर के गले में बांहें डाल कर वह जोरों से दबाने लगा. अचानक हुए इस हमले से संदीप कौर की आंखें हैरानी से फटी रह गईं. वह कुछ कर पाती, उस के पहले ही दबाव बढ़ने से कुछ देर तड़प कर उस की मौत हो गई.

कहीं वह जिंदा न रह जाए, यह सोच कर उस ने वहां पड़ी ईंट उठा कर संदीप कौर के सिर पर कई वार किए. जब उसे विश्वास हो गया कि अब वह मर चुकी है तो उसे बाहों में ले कर वह कुछ देर रोता रहा और कहता रहा कि काश उस ने उस की बात मान ली होती.

संदीप कौर की लाश ठिकाने लगाने के लिए राजवीर ने रात में ही खेत में फावड़े से एक गहरा गड्ढा खोदा और लाश को उसी गड्ढे में दबा दिया. फावड़ा वह पहले से खेत में रख आया था. पुलिस ने वह फावड़ा भी बरामद कर लिया था. सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने राजवीर सिंह को फिर से 5 जनवरी, 2017 को अदालत में पेश किया, जहां से जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जानलेवा बना पत्नी के प्रेमी से अवैध संबंध

उस दिन मई 2021 की 11 तारीख थी. तीर्थनगरी हरिद्वार के पथरी थाने के थानाप्रभारी अमर चंद्र शर्मा अपने औफिस में बैठे कुछ आवश्यक काम निपटा रहे थे, तभी उन के पास एक महिला आई और बोली, ‘‘साहब, मेरी मदद कीजिए.’’

वह महिला बड़े ही दुखी लहजे में बोली, ‘‘मेरा नाम अंजना है और मैं रानी माजरा गांव में रहती हूं. साहब, परसों 9 मई को मेरा पति संजीव सुबह फैक्ट्री गया था, लेकिन शाम को वापस नहीं लौटा. उस के न लौटने पर उस की फैक्ट्री व परिचितों के घर जा कर पता किया लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. उस के बारे में कुछ पता न चलने पर मैं आप के पास मदद मांगने आई हूं. अब आप ही मेरे पति को तलाश सकते हैं.’’

‘‘ठीक है, हम तुम्हारे पति को खोज निकालेंगे. तुम लिखित तहरीर दे दो और साथ में अपने पति की एक फोटो दे दो.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘ठीक है साहब. मुझे शक है कि मेरे गांव के ही प्रधान ने मेरे पति को गायब कराया है. कहीं उस ने मेरे पति के साथ कुछ गलत न कर दिया हो. इस बात से मेरा दिल बैठा जा रहा है.’’ वह बोली.

‘‘ठीक है, जांच में सब पता लगा लेंगे. अगर प्रधान का इस सब में हाथ हुआ तो उसे सजा जरूर दिलाएंगे.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘ठीक है साहब,’’ कह कर वह महिला अंजना वहां से चली गई. कुछ ही देर में वह वापस लौटी और एक तहरीर और फोटो थानाप्रभारी शर्मा को दे गई तो उन्होंने संजीव की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

थानाप्रभारी शर्मा अभी कुछ प्रयास करते, उस से पहले ही अगले दिन फिर अंजना उन से मिलने आ गई. उस ने गांव के प्रधान द्वारा अपने पति को मार देने का आरोप लगाते हुए लाश जंगल में पड़ी होने की आशंका जाहिर की.

उस ने यह बात उस की इस हरकत से इंसपेक्टर शर्मा को उस पर शक हो गया. ऐसी हरकत तो इंसान तभी करता है, जब वह खुद उस मामले में संलिप्त हो और दूसरे को फंसाने की कोशिश करता है.

अंजना भी जिस तरह से गांव के प्रधान को बारबार इंगित कर रही थी, उस से यही लग रहा था कि अंजना का अपने पति संजीव को गायब कराने में हाथ है और इस में वह गांव के प्रधान को फंसाना चाहती है.

संजीव ने गांव के कई विकास कार्यों के बारे में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांग रखी थी. इस से प्रधान और संजीव के बीच विवाद चल रहा था. इसी का फायदा शायद अंजना उठाना चाहती थी.

अंजना पर शक हुआ तो इंसपेक्टर शर्मा ने अंजना के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस में एक नंबर पर अंजना की काफी बातें होने की बात पता चली. 9 मई को भी कई बार बातें हुई थीं. दोनों की लोकेशन भी कुछ देर के लिए साथ में मिली.

अंजना पर जब शक पुख्ता हो गया तो 16 मई, 2021 को थानाप्रभारी शर्मा ने अंजना को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. फिर महिला कांस्टेबलों बबीता और नेहा की मौजूदगी में अंजना से काफी सवाल किए, जिन का सही से अंजना जवाब नहीं दे पाई. जब सख्ती की गई तो अंजना ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

अंजना ने ही अपने पति संजीव की हत्या की थी. हत्या में उस का साथ उस के प्रेमी शिवकुमार उर्फ शिब्बू ने दिया था, जोकि धनपुरा गांव में रहता था. उसी ने हत्या के बाद संजीव की लाश पैट्रोल डाल कर जलाई थी. पुलिस ने शिवकुमार को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

दोनों की निशानदेही पर पीपली गांव के जंगल के काफी अंदर जा कर संजीव की अधजली लाश पुलिस ने बरामद कर ली. मौके से ही हत्या में प्रयुक्त रस्सी और प्लास्टिक बोरी भी बरामद हो गई.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया गया. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ के बाद जो कहानी निकल कर सामने आई, वह काफी हैरतअंगेज थी.

उत्तराखंड के शहर हरिद्वार के पथरी थाना क्षेत्र के गांव रानी माजरा में रहता था संजीव. संजीव पदार्था स्थित पतंजलि की फूड पार्क कंपनी में काम करता था. परिवार के नाम पर उस की पत्नी और 12 साल का बेटा सनी था.

जब परिवार का मुखिया सही न चले तो परिवार का बिगड़ना तय होता है. संजीव में कई गलत आदतें थीं, जिस से अंजना काफी परेशान रहती थी. संजीव को अप्राकृतिक यौन संबंध बनवाने का शौक था, जिस के चलते वह शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार भी रहता था.

कभीकभी उस की मानसिक स्थिति काफी बदतर हो जाती थी. घर के सामने से कोई कुत्ता गुजर जाता तो वह कुत्ते को जम कर मारतापीटता था. कई बार उस ने पुलिस कंट्रोल रूम में फोन कर के पुलिसकर्मियों को गालियां दीं. पुलिसकर्मियों ने शिकायत की तो उस की हालत देख कर थाना स्तर से कोई काररवाई नहीं की जाती. उस के दिमाग में कब क्या फितूर बस जाए कोई नहीं जान सकता था.

धनपुरा गांव में रहता था 45 वर्षीय शिवकुमार उर्फ शिब्बू. शिवकुमार के परिवार में पत्नी, एक बेटी और एक बेटा था. शिवकुमार दूध बेचने का काम करता था. संजीव के घर वह पिछले 10 सालों से दूध देने आता था.

संजीव से उस की दोस्ती थी. संजीव ने शिवकुमार को अपनी पत्नी अंजना से मिलाया. दोनों मे दोस्ती कराई. दोस्ती होने पर शिवकुमार दूध देने घर के अंदर तक आने लगा. अंजना से वह घंटों बैठ कर बातें करने लगा. कुछ ही दिनों में वे दोनों काफी घुलमिल गए. उन के बीच हंसीमजाक भी होने लगा.

एक दिन दूध देने के बाद शिवकुमार अंजना के पास बैठ गया. उसे देखते हुए बोला, ‘‘भाभी, लगता है आप अपना खयाल नहीं रखती हो?’’

अंजना को उस की बात सुन कर हैरत हुई, बोली, ‘‘अरे, भलीचंगी तो हूं …और कैसे खयाल रखूं?’’

‘‘सेहत पर तो आप ध्यान दे रही हो, जिस से स्वस्थ हो लेकिन अपने हुस्न को निखारनेसंवारने में बिलकुल भी ध्यान नहीं दे रही हो.’’

‘‘ओह! तो यह बात है. मैं भी सोचूं कि मैं तो अच्छीखासी हूं.’’ फिर दुखी स्वर में बोली, ‘‘अपने हुस्न को संवार कर करूं भी तो क्या.  जिस के साथ बंधन में बंधी हूं, वह तो ध्यान ही नहीं देता. उस का शौक भी दूसरी लाइन का है. मुझे खुश करने के बजाय खुद को खुश करने के लिए लोगों को ढूंढता फिरता है.’’

‘‘क्या मतलब…?’’ चौंकते हुए बोला.

शिवकुमार कुछकुछ समझ तो गया था लेकिन अंजना से खुल कर पूछने के लिए उस से सवाल किया.

‘‘यही कि वह आदमी है और आदमी से ही प्यार करता है, उसे औरत में कोई लगाव नहीं है. जैसेतैसे उस ने कुछ दिन मुझे बेमन से खुशी दी, जिस की वजह से एक बेटा हो गया. उस के बाद उस ने मेरी तरफ देखना ही बंद कर दिया. उस के शौक ही निराले हैं.’’

इस पर शिवकुमार उस से सुहानुभूति जताते हुए बोला, ‘‘यह तो आप के साथ अत्याचार हो रहा है, शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से. आप कैसे सह लेती हो इतना सब?’’

‘‘क्या करूं…जब नसीब में ही सब लिखा है तो भुगतना तो पडे़गा ही.’’ दुख भरे लहजे में अंजना ने कहा.

‘‘जैसे वह आप का खयाल नहीं रखता, वैसे आप भी उस का खयाल मत रखो. आप का भी अपना वजूद है, आप को भी अपनी खुशी का खयाल रखने का हक है.’’ उस ने उकसाया.

‘‘खुद को खुश रखने की कोशिश भी करूं तो कैसे, संजीव मेरी खुशियों में आग लगाने में पीछे नहीं हटता. अब उस से बंध गई हूं तो उस के साथ ही निभाना पड़ेगा.’’

‘‘आप अपनी खुशी के लिए कोई भी कदम उठा सकती हैं. इस के लिए आप पर कोई बंधन नहीं है. जरूरत है तो आप के एक कदम बढ़ाने की.’’

‘‘कदम तो तभी बढ़ेंगे, जब कोई मंजिल दिखे. बिना मंजिल के कदम बढ़ाने से कोई फायदा नहीं, उलटा कष्ट ही होगा.’’ वह बेमन से बोली.

‘‘मंजिल तो आप के सामने ही है लेकिन आप ने देखने की कोशिश ही नहीं की.’’ शिवकुमार ने अंजना की आंखों में देखते हुए कहा.

शिवकुमार की बात सुन कर अंजना ने भी उस की आंखों में देखा तो वहां उसे अपने लिए उमड़ता प्यार दिखा. अंजना के दिल को सुकून मिला कि उसे भी कोई दिल से चाहता है और उस का होना चाहता है.

‘‘लेकिन शिव, हम दोनों का ही अपना बसाबसाया परिवार है. ऐसे में एकदूसरे की तरफ कदम बढ़ाना सही होगा.’’ अंजना ने सवाल किया.

‘‘मेरी छोड़ो, अपनी बात करो. कौन सा परिवार… परिवार के नाम पर पति और एक बेटा. पति ऐसा कि जो अपने लिए ही मस्ती खोजता रहता है, जिसे अपनी पत्नी की जरूरतों का कोई खयाल नहीं और न ही उस की भावनाओं की कद्र करता है. ऐसे इंसान से दूर हो जाना बेहतर है.’’

‘‘कह तो तुम ठीक रहे हो शिव. जब उसे मेरा खयाल नहीं तो मैं क्यों उस की चिंता करूं.’’

‘‘हां भाभी, मैं आप को वह सब खुशियां दूंगा, जिस की आप हकदार हैं. बस आप एक बार हां तो कहो.’’

अंजना ने उस की बात सुन कर मूक सहमति दी तो शिवकुमार ने उसे बांहों में भर कर कर सीने से लगा लिया. उस के बाद शिवकुमार ने अंजना को वह खुशी दी, जो अंजना पति से पाने को तरसती थी. उस दिन शिवकुमार ने अंजना की सूखी जमीन को फिर से हराभरा कर दिया.

फिर तो उन के बीच नाजायज संबंध का यह रिश्ता लगभग हर रोज निभाया जाने लगा. अंजना का चेहरा अब खिलाखिला सा रहने लगा. वह अब अपने को सजानेसंवारने लगी थी. शिवकुमार के बताए जाने पर वह शिवकुमार के दिए जाने वाले कच्चे दूध से चेहरे की सफाई करती. दूध उबालने के बाद पड़ने वाली मोटी मलाई को अपने चेहरे पर लगाती, जिस से उस के चेहरे की चमक बनी रहे.

समय का पहिया निरंतर आगे बढ़ता गया. संजीव से उन के संबंध छिपे नहीं रहे. उसे पता चला तो उसे बिलकुल गुस्सा नहीं आया. अमूमन कोई भी पति अपनी पत्नी के अवैध रिश्ते के बारे में जानता तो गुस्सा करता, पत्नी के साथ मारपीट लड़ाईझगड़ा करता, लेकिन संजीव के मामले में ऐसा कुछ नहीं था. उस के दिमाग में तो और ही कुछ चल रहा था. जो उस के दिमाग में चल रहा था उसे सोच कर वह मंदमंद मुसकरा रहा था.

अब संजीव दोनों पर नजर रखने लगा. एक दिन उस ने दोनों को शारीरिक रिश्ता बनाते रंगेहाथ पकड़ लिया. उसे आया देख कर शिवकुमार और अंजना सहम गए.

संजीव ने दोनों को एक बार खा जाने वाली नजरों से देखा, फिर उन के सामने कुरसी डाल कर आराम से बैठ गया और बोला, ‘‘तुम दोनों अपना कार्यक्रम जारी रखो.’’

उस के बोल सुन कर शिवकुमार और अंजना हैरत से एकदूसरे को देखने लगे. उन के आश्चर्य की सीमा नहीं थी. संजीव ने जो कहा था उन की उम्मीद के बिलकुल विपरीत था. संजीव के दिमाग में क्या चल रहा है, दोनों यह जानने के लिए उत्सुक थे.

उन दोनों को हैरत में पड़ा देख कर संजीव मुसकरा कर बोला, ‘‘चिंता न करो, मुझे तुम दोनों के संबंधों से कोई एतराज नहीं है. मैं तो खुद तुम दोनों को संबंध बनाते देखने को आतुर हूं.’’

संजीव के बोल सुन कर अंजना के अंदर की औरत जागी, ‘‘कैसे मर्द हो जो अपनी ही बीवी को पराए मर्द के साथ बिस्तर पर देखना चाहते हो. तुम इतने गिरे हुए इंसान हो, मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी.’’

‘‘तुम्हारे प्रवचन खत्म हो गए हों तो आगे का कार्यक्रम शुरू करो.’’ बड़ी ही बेशरमी से संजीव बोला.

‘‘क्यों कोई जबरदस्ती है, हम दोनों ऐसा कुछ नहीं करेंगे.’’ अंजना ने सपाट लहजे में बोल दिया.

संजीव ठहाके लगा कर हंसा, फिर बोला, ‘‘मुझे न बोलने की स्थिति में नहीं हो तुम दोनों. मैं ने बाहर वालों को तुम दोनों के नाजायज संबंधों के बारे में बता दिया तो समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे.’’

बदनामी का भय इंसान को अंदर तक हिला कर रख देता है. अंजना और शिवकुमार भी बदनाम नहीं होना चाहते थे. वैसे भी जिस से उन को डरना चाहिए था, वह खुद उन को संबंध बनाने की छूट दे रहा था. ऐसे में दोनों ने संबंध बनाए रखने के लिए संजीव की बात मान ली.

अंजना और शिवकुमार शारीरिक संबंध बनाने लगे. संजीव उन के पास ही बैठ कर अपनी आंखों से उन को ऐसा करते देखता रहा और आनंदित होता रहा. किसी पोर्न मूवी में फिल्माए जाने वाले दृश्य की तरह ही सब कुछ वहां चल रहा था.

अंजना के साथ संबंध बनाने के बाद संजीव ने शिवकुमार से अपने साथ अप्राकृतिक संबंध बनाने को कहा. शिवकुमार ने न चाहते हुए उस की बात मान ली. संजीव को उस की खुशी दे दी. अब तीनों के बीच बेधड़क संबंधों का यह नाजायज खेल बराबर खेला जाने लगा.

अंजना और शिवकुमार को संजीव ब्लैकमेल कर रहा था. दोनों को अपने प्यार में बाधा पहुंचाने वाला और बदनाम करने की धमकी देने वाला संजीव अब अखरने लगा था. उस से छुटकारा पाने का एक ही तरीका था, वह था उसे मौत की नींद सुला देने का. दोनों ने संजीव को ठिकाने लगाने का फैसला किया तो उस पर योजना भी बना ली.

शिवकुमार का फेरूपुर गांव में खेत था, उसी में उस ने अपना एक अलग मकान बनवा रखा था. 9 मई को अंजना संजीव को यह कह कर वहां ले गई कि वहीं तीनों मौजमस्ती करेंगे. संजीव अंजना के जाल में फंस गया. उस के साथ शिवकुमार के मकान पर पहुंच गया. शिवकुमार वहां पहले से मौजूद था.

शिवकुमार के पहुंचते ही शिवकुमार ने अंजना को इशारा किया. अंजना ने तुरंत पीछे से संजीव को दबोच लिया. दुबलापतला संजीव अंजना के चंगुल से तमाम कोशिशों के बाद भी छूट न सका.

शिवकुमार ने संजीव के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कस दिया, जिस से दम घुटने से संजीव की मौत हो गई. शिवकुमार ने उस की लाश प्लास्टिक बोरी में डाल कर बोरी बंद कर दी और उस बोरी को बाइक पर रख कर वह पीपली गांव के जंगल में ले गया और जंगल में काफी अंदर जा कर संजीव की लाश फेंक दी. लाश ठिकाने लगा कर वह वापस आ गया.

योजना के तहत 11 मई, 2021 को अंजना ने पथरी थाने में पति की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अंजना ने ग्राम प्रधान पर हत्या का शक जाहिर किया, जिस से हत्या में ग्रामप्रधान फंस जाए. इधर अंजना को पता नहीं क्यों भय सताने लगा कि वे दोनों किसी बड़ी मुसीबत में फंसने वाले हैं.

इस भय के कारण 14 मई को ईद के दिन अंजना ने शिवकुमार से संपर्क किया और शिवकुमार से कहा कि लाश को पैट्रोल डाल कर जला दो. शिवकुमार ने फिर से जंगल जा कर संजीव की लाश पर पैट्रोल डाल कर जला दी.

लेकिन दोनों की ज्यादा होशियारी काम न आई, दोनों पुलिस के हत्थे चढ़ गए. चूंकि अंजना ही वादी थी, ऐसे में पीडि़त को गुनहगार साबित करना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित होता है. लेकिन थानाप्रभारी अमर चंद्र शर्मा ने बड़ी सूझबूझ से पहले पुख्ता सुबूत जुटाए, फिर अंजना को उस के प्रेमी शिवकुमार के साथ गिरफ्तार किया.

थानाप्रभारी शर्मा ने दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर दोनों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

हत्यारा हमसफर

उस दिन जनवरी 2020 की 7 तारीख थी. शाम के 7 बज रहे थे. हर रोज की तरह घरेलू नौकरानी पूजा, जयपुर की यूनिक टावर सोसायटी के आई ब्लौक स्थित रोहित तिवारी के फ्लैट नंबर 103 पर काम करने के लिए पहुंची. उस ने डोरबैल बजाई तो मालकिन श्वेता तिवारी ने दरवाजा नहीं खोला और न ही अंदर कोई हलचल सुनाई दी.

पूजा ने दरवाजे को अंदर की ओर धकेला तो वह खुल गया. नौकरानी कमरे के अंदर पहुंची तो उस के मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर पलंग पर मालकिन श्वेता तिवारी मृत पड़ी थीं. उन का मुंह खून से लाल था.पूजा चीखतेचिल्लाते बाहर निकली और पासपड़ोस के फ्लैट्स में रहने वाले लोगों को जानकारी दी. मर्डर की खबर से सोसायटी में हडकंप मच गया, लोगों की भीड़ जुटने लगी. इसी बीच किसी ने थाना प्रताप नगर पुलिस को सूचना दे दी.

पौश सोसायटी के फ्लैट में हत्या की सूचना पा कर प्रताप नगर थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ मौके पर आ गए. उन्होंने यह खबर वरिष्ठ अधिकारियों को दी और पूछताछ में जुट गए. पूछताछ से पता चला कि जिस फ्लैट में मर्डर हुआ है उस में रोहित तिवारी किराए पर रहते हैं. रोहित इंडियन औयल कारपोरेशन में सीनियर मैनेजर हैं और जयपुर एयर पोर्ट पर बतौर फ्यूल इंचार्ज तैनात हैं. मर्डर उन की पत्नी श्वेता तिवारी का हुआ है.

हत्या का मामला हाई प्रोफाइल था. सूचना पा कर पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव, डीआईजी सुभाष बघेल, एएसपी डा. अवधेश सिंह, एसपी डा. सतीश कुमार, डीएसपी (पूर्वी) राहुल जैन तथा सीओ संजय शर्मा घटना स्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जयपुर एयरपोर्ट पर तैनात रोहित तिवारी को उन की पत्नी श्वेता की हत्या की सूचना दी तो कुछ देर में वह भी फ्लैट पर आ गए.

रोहित ने फ्लैट के अंदर देख कर पुलिस अधिकारियों को बताया कि बेड पर पड़ी लाश उस की पत्नी श्वेता की है, लेकिन उस के 21 माह के मासूम बेटे श्रीयम का पता नहीं है. लगता है, हत्यारों ने श्वेता की हत्या के बाद श्रीयम का अपहरण कर लिया है. रोहित की बात सुन कर पुलिस अधिकारी सन्न रह गए. क्योंकि अभी तक जानकारी हत्या की थी लेकिन अब श्रीयम के अपहरण की बात सामने आई थी.

पुलिस अधिकारियों ने हत्या और अपहरण के इस मामले को गंभीरता से लेते हुए घटना स्थल का बारीकी से निरीक्षण शुरू किया. कमरे के अंदर पड़े बेड पर 30-32 वर्षीय श्वेता तिवारी की लाश पड़ी थी. उस के सिर से खून रिस रहा था, जिस से उस का चेहरा खून से लाल था. उस का गला भी रेता गया था. सिर पर भी जख्म था.

बेड पर खून से सना चाकू पड़ा था, बेड के नीचे अदरक कूटने वाली लोहे की मूसली पड़ी थी. बिस्तर भी खून से तरबतर था. खून की बूंदे दीवार पर भी दिखाई दे रही थीं. कमरे में रखी प्लास्टिक टेबल पर चाय के 2 कप रखे थे. जिस में कुछ चाय बची हुई थी. श्वेता का मोबाइल फोन भी गायब था.

घटना स्थल का निरीक्षण करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि श्वेता का हत्यारा कोई करीबी ही रहा होगा, जिस के आने पर श्वेता ने दरवाजा खोला और उसे कमरे में बिठा कर चाय पिलाई. इसी बीच हत्यारे ने अदरक कूटने वाली मूसली से उस के सिर पर प्रहार कर उसे पलंग पर गिरा दिया होगा, फिर चाकू से उस का गला रेता होगा. इस के बाद वह श्रीयम का अपहरण कर ले गया होगा. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू व मूसली को सुरक्षित कर लिया.

फोरैंसिक टीम ने भी घटना स्थल का निरीक्षण किया और दीवार, प्याले, फर्श व बेड से फिंगरप्रिंट उठाए. डौग स्क्वायड टीम ने सुराग के लिए खोजी कुत्ते को छोड़ा. खोजी कुत्ता घटना स्थल को सूंघ कर भौंकते हुए बाहर निकला और रोहित की कार के 2 चक्कर काटे. कुछ देर वह रोहित के आसपास भी मंडराता रहा. इस से टीम को रोहित पर शक हुआ. किंतु उस के खिलाफ कोई पक्का सुबूत न मिलने से उस से ज्यादा कुछ पूछताछ नहीं की गई.

निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका श्वेता का शव पोस्टमार्टम के लिए जयपुर के महात्मा गांधी अस्पताल भिजवा दिया.

श्वेता तिवारी का मायका उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर स्थित सर्वोदय नगर में था और ससुराल गांधी नगर, दिल्ली में थी. रोहित ने फोन कर के श्वेता की हत्या और मासूम श्रीयम के अपहरण की जानकारी अपने माता पिता तथा ससुराल वालों को दे दी. बेटी की हत्या की खबर पा कर श्वेता के पिता सुरेश कुमार मिश्रा तथा उन की पत्नी माधुरी मिश्रा घबरा गईं.

परिवार में कोहराम मच गया. वह पत्नी, बेटे शुभम व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ निजी वाहन से जयपुर के लिए रवाना हो लिए. अब तक श्वेता की हत्या की खबर टीवी चैनलों पर भी प्रसारित होने लगी थी. वह मोबाइल फोन पर रास्ते भर हत्या की जानकारी लेते रहे.

पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव ने इस हत्या और अपहरण के मामले को बेहद गंभीरता से लिया. उन्होंने 22 महीने के श्रीयम का पता लगाने के लिए 6 थाना प्रभारियों, 3 सीओ तथा पुलिस के 100 जवानों को लगा दिया. भारीभरकम पुलिस फोर्स ने डीएसपी (पूर्वी) राहुल जैन तथा एसपी डा. सतीश कुमार के निर्देशन में श्रीयम की खोज आरंभ की.

इस बारे में पुलिस ने तकरीबन डेढ़ सौ लोगों से पूछताछ की. दरजनों संदिग्ध लोगों को हिरासत में ले कर उन से कड़ाई से पूछताछ की. सैकड़ों संदिग्ध नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई, तकनीक का सहारा लिया. लेकिन श्रीयम का कोई सुराग नहीं मिला और न ही श्वेता के हत्यारों का.

पुलिस अधिकारी रात भर रोहित तिवारी के फ्लैट पर जुटे रहे. एसपी डा. सतीश कुमार एएसपी डा. अवधेश सिंह तथा सीओ संजय शर्मा  अन्य पुलिस कर्मियों के साथ जांच में जुटे थे.

वह सीसीटीवी फुटेज खंगाल चुके थे और कमरे की हर चीज का निरीक्षण कर रहे थे. तभी रोहित तिवारी के मोबाइल फोन पर एक मैसेज आया. मैसेज देख कर वह चीख पड़ा, ‘‘सर, यह देखो श्रीयम के अपहर्त्ता का मैसेज आया है. उस ने 30 लाख रुपए फिरौती की मांग की है.’’

फिरौती का मैसेज मृतका श्वेता के मोबाइल नंबर से भेजा गया था. रोहित ने उसी नंबर पर काल बैक कर अपहर्त्ता से कहा कि वह फिरौती की रकम देने को तैयार है लेकिन पहले श्रीयम का चेहरा दिखाए. लेकिन फोन करने वाले ने चेहरा नहीं दिखाया और फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

पुलिस अधिकारियों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अपहर्त्ता को रोहित का मोबाइल नंबर कैसे मिला. क्या अपहर्त्ता रोहित की जान पहचान का है?

पुलिस अधिकारी अभी जांच कर ही रहे थे कि सुबह मृतका श्वेता के मांबाप व अन्य परिजन रोहित के फ्लैट पर आ गए. श्वेता के पिता सुरेश कुमार मिश्रा तथा मां माधुरी मिश्रा ने आते ही एसपी डा. सतीश कुमार को बताया कि उन की बेटी की हत्या उन के दामाद रोहित ने ही की है.

5 जनवरी को मोबाइल रिचार्ज न करवाने की बात को ले कर रोहित और श्वेता के बीच झगड़ा हुआ था. मारपीट करने के बाद रोहित ने उन के मोबाइल पर फोन किया था. उस ने गुस्से में कहा था, ‘‘पापा जी, हम बहुत परेशान हैं. आप को जितना रुपया चाहिए, ले लो लेकिन श्वेता को अपने साथ ले जाओ. नहीं तो मैं इस की हत्या कर दूंगा.’’

इस पर उन्होंने रोहित को समझाने का प्रयास किया तो उस ने फोन काट दिया. इस के बाद उन्होंने श्वेता को काल कर के समझाया था. लेकिन यह नहीं सोचा था कि रोहित हत्या कर ही देगा.

रोहित जिस तरह से बारबार अपनी बेगुनाही का सबूत दे रहा था और हत्या के समय अपनी मौजूदगी औफिस में बता रहा था, उस से पुलिस अधिकारियों को उस पर शक बढ़ता जा रहा था. लेकिन जब मृतका के मांबाप ने भी उस पर सीधे तौर पर हत्या का आरोप लगाया तो पुलिस का भी शक उस पर गहराने लगा.

8 जनवरी, 2020 की दोपहर 3 बजे हल्ला मचा कि एक बच्चे का शव रोहित के फ्लैट की बाउंड्रीवाल के पीछे झाडि़यों में पड़ा है. पुलिस ने झाडि़यों से शव को बाहर निकाला, शव तौलिया में लिपटा था. तौलिया हटाया गया तो सभी अवाक रह गए, शव श्रीयम का ही था. उस की हत्या गला दबा कर की गई थी. श्रीयम का सिर भी कुचला गया था. जिस श्रीयम को खोजने के लिए पुलिस के 100 जवान पसीना बहा रहे थे, उस का शव उसी के घर के पीछे झाडि़यों में पड़ा था. नाती की लाश देख कर सुरेश कुमार मिश्रा व उन की पत्नी माधुरी मिश्रा फफक पड़ी. बेटे शुभम ने मांबाप को धैर्य बंधाया.मासूम श्रीयम की हत्या की जानकारी पाते ही पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव तथा डीएसपी (पूर्वी) राहुल जैन वहां आ गए. उन्होंने मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों से कहा कि मां के बाद बेटे की हत्या दिल को झकझोर देने वाली है. ऐसे क्रूर हत्यारों को वह जल्द से जल्द सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं. इस के बाद उन्होंने श्रीयम का शव भी पोस्टमार्टम के लिए महात्मा गांधी अस्पताल भेज दिया.

भारी पुलिस सुरक्षा के बीच 3 डाक्टरों के एक पैनल ने श्वेता और उस के मासूम बेटे श्रीयम के शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों शव मृतका के पति रोहित के बजाय मृतका के मातापिता को सौंप दिए गए.

सुरेश कुमार मिश्रा बेटी श्वेता व नाती श्रीयम के शव सर्वोदय नगर (कानपुर) स्थित अपने घर ले आए. वहां भैरवघाट पर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

अंतिम संस्कार का दृश्य बड़ा ही हृदय विदारक था. शव यात्रा के समय 22 महीने के श्रीयम का शव श्वेता की गोद में था. ठीक इसी तरह उन्हें चिता पर लिटाया गया. श्वेता का एक हाथ बेटे के ऊपर था. ठीक वैसे ही जैसे कोई सो रही मां अपने बेटे को अपनी बांहों की सुरक्षा देती है. श्मशान घाट पर जिस ने भी यह दृश्य देखा उस का कलेजा फट गया. लोग तो अपनी आंखों से आंसू नहीं रोक सके.

उधर डबल मर्डर की गुत्थी सुलझाने के लिए जयपुर पुलिस अधिकारियों ने मृतका के पति रोहित तिवारी पर शिकंजा कसा और उस से सख्ती से पूछताछ की. पुलिस अधिकारी उसे एयर पोर्ट ले गए और घटना वाले दिन यानी 7 जनवरी की सीसीटीवी फुटेज खंगाली.

पता चला कि उस रोज रोहित तिवारी सुबह 9 बजे एयरपोर्ट पहुंचा था और पत्नी की हत्या की सूचना मिलने के बाद एयरपोर्ट से घर को निकला था. फुटेज से यह भी पता चला कि रोहित घटना के समय वहां एक बैठक में मौजूद था.

उस के मोबाइल की लोकेशन भी दिन भर एयरपोर्ट की ही मिल रही थी. सारे सबूत रोहित के पक्ष में जा रहे थे जिस से पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी. यद्यपि पुलिस अधिकारियों को पक्का यकीन था कि दोहरी हत्या में रोहित का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ हो सकता है.

पुलिस ने रोहित पर कड़ा रुख अपनाया तो पुलिस पर दबाव बनाने के लिए उस ने कोर्ट का रुख किया. 9 जनवरी को रोहित ने जयपुर की निचली अदालत में अपने वकील दीपक चौहान के मार्फत प्रार्थना पत्र दे कर पुलिस पर प्रताडि़त करने का अरोप लगाया.

कोर्ट ने इस मामले में प्रताप नगर थानाप्रभारी को 10 जनवरी को प्रकरण से जुड़े तथ्यों के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया.

रोहित की इस काररवाई से पुलिस बौखला गई. जिस मोबाइल फोन से रोहित के मोबाइल पर मैसेज किया गया था, पुलिस ने उस मोबाइल फोन की जांच में जुट गई. जांच से पता चला कि श्वेता अपने मोबाइल फोन में पैटर्न लाक लगाती थी, जिसे कोई दूसरा नहीं खोल सकता था.

इस का मतलब मैसेजकर्ता ने श्वेता का सिम निकाल कर किसी दूसरे मोबाइल में डाला था. मैसेज करते समय इस मोबाइल फोन की लोकेशन जयपुर के सांगानेर की मिली. पुलिस फोन के आईएमईआई नंबर के सहारे उस दुकानदार तक पहुंची, जहां से वह हैंडसेट खरीदा गया था.

वहां से मोबाइल खरीदार के बारे में जानकारी नहीं मिली तो उस फोन के आईएमईआई (इंटरनैशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिटी) नंबर को ट्रेस कर पुलिस मैसेजकर्ता तक पहुंच गई.

पुलिस मैसेजकर्ता को उस के घर से पकड़ कर थाने ले आई. उस ने अपना नाम सौरभ चौधरी निवासी भरतपुर (राजस्थान) तथा हाल पता सांगानेर बताया. उस से जब श्वेता व उस के मासूम बेटे श्रीयम की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने ऐसा कुछ करने से इनकार किया.

लेकिन जब उस के साथ सख्ती की गई तो वह टूट गया और दोहरी हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. सौरभ चौधरी ने बताया कि रोहित तिवारी ने ही उसे 20 हजार रुपए दे कर पत्नी व बेटे की हत्या की सुपरी दी थी. मतलब दोहरी हत्या की साजिश रोहित ने ही रची थी.

सौरभ से पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने 10 जनवरी, 2020 को रोहित तिवारी को भी बंदी बना लिया. थाने में जब उस का सामना सौरभ चौधरी से हुआ तो उस का चेहरा लटक गया और उस ने सहज ही पत्नी श्वेता की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

डबल मर्डर के हत्यारों के पकड़े जाने की जानकारी पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव और डीसीपी (पूर्वी) डा. राहुल जैन को हुई तो वह थाना प्रताप नगर आ गए. उन्होंने आरोपियों से पूछताछ की, फिर प्रैसवार्ता कर घटना का खुलासा कर दिया.

चूंकि हत्यारोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए थानाप्रभारी ने भादंवि की धारा 302/201 तथा 120बी के तहत सौरभ चौधरी तथा रोहित तिवारी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर एक ऐसे पति की कहानी सामने आई जिस ने दूसरी शादी रचाने के लिए अपनी पत्नी व बच्चे के कत्ल की साजिश रच डाली.उत्तर प्रदेश के कानुपर महानगर के काकादेव थाना अंतर्गत एक मोहल्ला है सर्वोदय नगर. सुरेश कुमार मिश्रा अपने परिवार के साथ इसी सर्वोदय नगर में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी माधुरी मिश्रा के अलावा एक बेटा और 3 बेटियां थीं. सुरेश कुमार मिश्रा भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में अधिकारी थे, जो अब रिटायर हो चुके हैं. उन का आलीशान मकान है, मिश्राजी अपनी 2 बेटियों की शादी कर चुके थे.

श्वेता सुरेश कुमार मिश्रा की सब से छोटी बेटी थी. वह अपनी दोनों बहनों से ज्यादा खूबसूरत थी. जब वह आंखों पर काला चश्मा लगा कर घर से बाहर निकलती थी तो लोग उसे मुड़मुड़ कर देखते थे, लेकिन वह किसी को भाव नहीं देती थी. श्वेता ने कानपुर छत्रपति साहू जी महाराज विश्वविद्यालय से बीए किया था.

वह आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहती थी ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सके, लेकिन पिता सुरेश कुमार मिश्रा कोई अच्छा घरवर ढूंढ कर उस के हाथ पीले करना चाहते थे. उन्होंने उस के लिए वर की खोज भी शुरू कर दी. उसी खोज में उन्हें रोहित तिवारी पसंद आ गया.

रोहित के पिता उमाशंकर तिवारी मूल रूप से औरैया जनपद के गांव कंठीपुर के रहने वाले थे, लेकिन वह दिल्ली के गांधी नगर के रघुवरपुरा स्थित माता मंदिर वाली गली में रहते थे. उमाशंकर तिवारी के परिवार में पत्नी कृष्णादेवी के अलावा बेटा रोहित तथा 2 बेटियां थीं. बेटियों की शादी वह कर चुके थे.

रोहित अभी कुंवारा था. रोहित पढ़ालिखा हैंडसम युवक था. वह इंडियन आयल कारपोरशन में मैनेजर था. उस की पोस्टिंग दिल्ली में ही थी. सुरेश कुमार मिश्रा ने रोहित को देखा तो उसे अपनी बेटी श्वेता के लिए पसंद कर लिया.

फिर 24 जनवरी, 2011 को रीतिरिवाज से रोहित के साथ श्वेता का विवाह धूमधाम से कर दिया. उस की शादी में उन्होंने लगभग 30 लाख रुपए खर्च किए थे.

शादी के बाद श्वेता और रोहित ने बड़े प्रेम से जिंदगी का सफर शुरू किया. हंसतेखेलते 2 साल कब बीत गए दोनों में किसी को पता ही न चला. लेकिन इन 2 सालों में श्वेता मां नहीं बन सकी. सूनी गोद का दर्द जहां श्वेता और रोहित को था, वहीं श्वेता के सासससुर को भी टीस थी. सास कृष्णादेवी तो श्वेता को ताने भी देने लगी थी.

इतना ही नहीं, श्वेता को कम दहेज लाने की भी बात कही जाने लगी. उस के हर काम में कमी निकाली जाने लगी. यहां तक कि उस के खानपान और पहनावे पर भी सवाल उठाए जाने लगे. उसे तब और गहरी चोट लगी जब उसे पता चला कि उस के पति रोहित के किसी अन्य लड़की से नाजायज संबंध हैं, जो उस के साथ कालेज में पढ़ती थी.

वर्ष 2013 में जब श्वेता की प्रताड़ना ज्यादा बढ़ गई तो वह ससुराल छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी. यहां वह 7 महीने तक रही. उस के बाद एक प्रतिष्ठित कांग्रेसी नेता ने बीच में पड़ कर समझौता करा दिया. उस के बाद सुरेश कुमार मिश्रा ने श्वेता को ससुराल भेज दिया.

ससुराल में कुछ समय तक तो उसे ठीक से रखा गया. लेकिन उसे फिर से प्रताडि़त किया जाने लगा. मांबाप की नुकताचीनी पर रोहित उसे पीट भी देता था. कृष्णा देवी तो सीधेसीधे उसे बांझ होने का ताना देने लगी थी. ननद नूतन और मीनाक्षी भी अपने मांबाप व भाई का ही पक्ष ले कर प्रताडि़त करती थीं.

ससुराली बातों की प्रताड़ना से दुखी हो कर श्वेता ने एक रोज अपनी बड़ी बहन सपना को एक खत भेजा, जिस में उस ने अपना दर्द बयां करते हुए लिखा, ‘सपना दीदी, रोहित तथा उस के मांबाप मुझे बहुत परेशान करते हैं. चैन से जीने नहीं देते. सब पीटते हैं, मुझे नीचा दिखाते हैं. खाने को भी नहीं देते. यहां तक कि मेरे पहनावे पर सवाल उठाते हैं.

‘‘मुझे यह भी पता चला है कि रोहित के एक युवती से संबंध हैं. वह उस के कालेज समय की दोस्त है. वह उसी से प्यार करता है. यही वजह है कि वह मुझे प्रताडि़त करता है. उसे मेरी हर बात बुरी लगती है. मामूली बातों पर मारपीट कर घर से जाने को कहता है. सासससुर भी उसी का साथ देते हैं. नौकरानी की तरह दिन भर घर का काम करवाते हैं. यदि मेरे साथ कोई अप्रिय वारदात हो जाए तो ये सभी जिम्मेदार होंगे.’’

छोटी बहन का दर्द सुन कर सपना बहुत दुखी हुई. उस ने सारी बात मांबाप को बताई. तब सुरेश कुमार मिश्रा ने दामाद रोहित तथा उस के मांबाप से बात की और अनुरोध किया कि वे लोग श्वेता को प्रताड़ित न करें.

इतना ही नहीं उन्होंने श्वेता को भी समझाया कि वह परिवार में सामंजस्य बनाए रहे. लेकिन सुरेश कुमार के अनुरोध का रोहित और उस के परिजनों पर कोई असर न पड़ा, उन की प्रताड़ना बदस्तूर जारी रही.

इसी तनाव भरी जिंदगी के बीच रोहित का तबादला उदयपुर के महाराणा प्रताप एयरपोर्ट पर हो गया. श्वेता दिल्ली छोड़ कर पति के साथ उदयपुर चली गई. उदयपुर में ही श्वेता ने अप्रैल 2018 में बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम श्रीयम रखा गया. बेटे के जन्म के बाद श्वेता को लगा कि अब उस की खुशियां वापस आ जाएंगी और पति के स्वभाव में भी परिवर्तन आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.श्रीयम के जन्म से न तो रोहित को खुशी हुई और न ही उस के स्वभाव में परिवर्तन आया. उस की प्रताड़ना बदस्तूर जारी रही. रोहित के मातापिता भी श्रीयम के जन्म से खुश नजर नहीं आए.

उदयपुर एयरपोर्ट पर तैनाती के दौरान रोहित तिवारी की मुलाकात सह कर्मी हरीसिंह से हुई. धीरेधीरे दोनों में गहरी दोस्ती हो गई. हरी सिंह अपनी पत्नी सुधा सिंह को साथ ले कर रोहित के घर आने लगा. सुधा सिंह मिलनसार थी. इसलिए श्वेता और सुधा अपना सुखदुख एकदूसरे से शेयर कर लेती थीं. श्वेता ने प्रताडि़त किए जाने की बात भी सुधा से शेयर की थी.

सौरभ चौधरी हरीसिंह का साला था. वह भरतपुर में रहता था, और हैंडीक्राफ्ट का काम करता था. हरीसिंह के मार्फत सौरभ की जानपहचान रोहित से हुई. वह रोहित के घर आने लगा. उस ने श्वेता से भी पहचान बना ली, और उस से खूब बतियाने लगा. सौरभ जब भी रोहित से मिलने आता था, वह उसे शराब पिलाता था.

इधर श्रीयम के जन्म के बाद रोहित तिवारी का ट्रांसफर उदयपुर से जयपुर हो गया. जयपुर में रोहित ने प्रताप नगर थाना क्षेत्र के जगतपुरा में स्थित यूनिक टावर सेक्टर 26, आई ब्लौक में फ्लैट संख्या 103 किराए पर ले लिया और पत्नी श्वेता तथा बेटे श्रीयम के साथ रहने लगा.

जयपुर आ कर भी श्वेता और रोहित के बीच तनाव बरकरार रहा. दोनों का छोटीछोटी बातों में झगड़ा और मारपीट होती रहती थी. हरीसिंह का साला सौरभ चौधरी यहां भी रोहित से मिलने आता था. उसे दोनों की तनाव भरी जिंदगी के बारे में जानकारी थी. रोहित कभीकभी शराब के नशे में कह भी देता था कि वह झगड़ालू श्वेता से छुटकारा पाना चाहता है.

दिसंबर 2019 की बात है. रोहित को कंपनी के काम से 8 से 21 दिसंबर के बीच शहर से बाहर जाना था. इसलिए वह श्वेता को अपने मांबाप के पास दिल्ली छोड़ गया. पहले वह कोलकाता गया फिर मुंबई. 21 दिसंबर को वह मुंबई से दिल्ली आया. घर वालों ने हमेशा की तरह उसे श्वेता के खिलाफ भड़काया. तब दोनों के बीच झगड़ा भी हुआ.

इस के बाद वह श्वेता को ले कर जयपुर आ गया. दोनों कार से आए थे. घर आ कर श्वेता ने अपनी मां माधुरी को फोन पर बताया कि रोहित ने 272 किलोमीटर के सफर में उसे पानी तक नहीं पीने दिया और वह झगड़ता रहा.

अब तक रोहित अपनी शादीशुदा जिंदगी से ऊब चुका था. वह दूसरी शादी रचा कर अपनी नई जिंदगी की शुरूआत करने के सपने देखने लगा, लेकिन एक पत्नी के रहते वह दूसरी शादी नहीं कर सकता था. उस ने श्वेता की हत्या के साथ मासूम श्रीयम की भी हत्या कराने का फैसला किया, ताकि शादीशुदा जिंदगी का नामोनिशान मिट जाए. वह जिंदगी की बैक हिस्ट्री को ही डिलीट करना चाहता था.

3 जनवरी, 2020 को रोहित ने सौरभ चौधरी को फोन कर जयपुर एयरपोर्ट के पास स्थित होटल फ्लाइट व्यू में बुलाया. वहां रोहित ने सौरभ के साथ बैठ कर पत्नी व बेटे की हत्या की साजिश रची. साजिश इस तरह रची गई कि रोहित का नाम सामने नहीं आए. रोहित ने हत्या के लिए सौरभ को 20 हजार रुपए भी दे दिए.

दरअसल सौरभ चौधरी शादीशुदा था. रोहित की तरह सौरभ भी पत्नी से परेशान रहता था और पत्नी से छुटकारा पाना चाहता था. इसलिए दोनों में तय हुआ कि पहले वह रोहित का साथ देगा. फिर रोहित उस की पत्नी की हत्या में उस का साथ देगा. यही कारण था कि मात्र 20 हजार में सौरभ डबल मर्डर को राजी हो गया था.

5 जनवरी, 2020 को मोबाइल रिचार्ज न कराने को ले कर रोहित और श्वेता के बीच झगड़ा और मारपीट हुई. इस के बाद उस ने श्वेता के पिता सुरेश कुमार मिश्रा को फोन कर के झगड़े की जानकारी दी और गुस्से में कहा, ‘‘पापा जी, आप श्वेता को ले जाइए. मैं उस का मुंह नहीं देखना चाहता. आप को जितना पैसा चाहिए ले लीजिए. अन्यथा मैं इस की हत्या कर दूंगा.’’

दामाद की धमकी से सुरेश कुमार मिश्रा घबरा उठे. उन्होंने दामाद को भी समझाया और बेटी को भी. लेकिन समझाने के बावजूद रोहित का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. उस ने फोन कर सौरभ चौधरी को जयपुर बुला लिया और श्वेता तथा उस के मासूम बेटे श्रीयम की हत्या की पूरी योजना तैयार कर के हत्या का दिन तारीख और समय तय कर दिया.

योजना के मुताबिक 7 जनवरी, 2020 की सुबह 9 बजे रोहित जयपुर एयरपोर्ट पहुंच गया और अपने काम पर लग गया. वह वहां एक मीटिंग में भी शामिल हुआ. वहां लगे सीसीटीवी कैमरों के सामने भी वह आताजाता रहा, ताकि उस का फोटो कैमरों में कैद हो जाए.

इधर योजना के मुताबिक सौरभ चौधरी भी 7 जनवरी को दोपहर बाद लगभग 2 बजे रोहित के यूनिक टावर अपार्टमेंट स्थित फ्लैट पर पहुंचा और डोरवेल बजाई. श्वेता ने दरवाजा खोला तो सामने सौरभ खड़ा था.

चूंकि सौरभ को श्वेता जानतीपहचानती थी, इसलिए उसे घर के अंदर ले गई और कमरे में बिठाया. फिर उस ने 2 कप चाय बनाई और दोनों ने बैठ कर चाय पी. चाय पी कर दोनों ने कप प्लास्टिक की टेबल पर रख दिए.

इसी बीच श्वेता दूसरे कमरे में चली गई, जहां उस का बेटा श्रीयम सो रहा था. तभी मौका पा कर सौरभ रसोई में गया और अदरक कूटने वाली लोहे की मूसली उठा लाया. चंद मिनट बाद श्वेता वापस आई तो सौरभ ने अकस्मात श्वेता के सिर पर मूसली से वार कर दिया. श्वेता सिर पकड़ कर पलंग पर गिर पड़ी.

इस के बाद सौरभ ने श्वेता को दबोच लिया, और मूसली से उस का सिर व चेहरा कूट डाला. इस के बाद वह पुन: रसोई में गया और चाकू ले आया और चाकू से श्वेता का गला रेत दिया. उस ने चाकू पलंग पर तथा मूसली पलंग के नीचे फेंक दी.

श्वेता की हत्या करने के बाद सौरभ चौधरी दूसरे कमरे में पहुंचा, जहां मासूम श्रीयम पलंग पर सो रहा था. सौरभ को उस मासूम पर जरा भी दया नहीं आई और न ही उस का कलेजा कांपा. उस ने श्रीयम को गला दबा कर मार डाला तथा उस का सिर भी कूट डाला. इस के बाद सौरभ ने उस का शव तौलिए में लपेटा और बाउंड्री वाल के पीछे झाडि़यों में फेंक दिया.

श्रीयम का शव ठिकाने लगाने के बाद उस ने फिर से कमरे में आ कर श्वेता का मोबाइल फोन अपनी जेब में डाला और मुंह पर कपड़ा ढक कर फ्लैट से निकल गया. बाद में उस ने श्वेता का मोबाइल फोन तोड़ कर सांगानेर से शिकारपुरा की ओर बहने वाले नाले में फेंक दिया और दूसरा फोन खरीद कर फिरौती के लिए रोहित को मैसेज भेजा.

इधर शाम 4 बजे नौकरानी काम करने फ्लैट पर आई तब घटना की जानकारी हुई. इस के बाद तो कोहराम मच गया. थाना प्रताप नगर पुलिस को सूचना मिली तो पुलिस मौके पर पहुंची.

11 जनवरी, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त रोहित तिवारी तथा सौरभ चौधरी को जयपुर कोर्ट में पेश किया. पुलिस ने मृतका का मोबाइल फोन व सिम कार्ड बरामद करने के लिए अदालत में अभियुक्तों की 3 दिन के रिमांड की अरजी लगाई. अदालत ने 2 दिन की रिमांड अरजी मंजूर कर ली.

रिमांड मिलने पर जब पुलिस ने सौरभ से श्वेता के मोबाइल फोन व सिम के बारे में पूछा तो उस ने सिम तो बरामद करा दिया, लेकिन मोबाइल फोन के बारे में बताया कि उस ने मोबाइल तोड़ कर सांगानेर के नाले में फेंक दिया था. रिमांड के दौरान पुलिस मोबाइल बरामद नहीं कर सकी. जिस से उन दोनों को 13 जनवरी को अदालत में पेश करना पड़ा.पुलिस की अरजी पर अदालत ने 15 जनवरी, 2020 तक फिर से रिमांड अवधि बढ़ाई लेकिन पुलिस मोबाइल फोन फिर भी बरामद नहीं कर सकी. इसलिए उन्हें अदालत में पेश कर जयपुर की जिला जेल भेज दिया गया. हरीसिंह को पुलिस ने उदयपुर से हिरासत में जरूर ले लिया था, परंतु बाद में उसे इस मामले में क्लीन चिट दे दी.

 

टीचर बन कर पढ़ा रहा था जिहाद

बिहार के गया शहर में वह मास्टर बन कर रह रहा था. पहले उस ने एक स्कूल में नौकरी की, उस के बाद वह प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने लगा. उस ने पुलिस और लोकल लोगों को झांसा देने के लिए अपना नाम और पहचान बदल ली थी. उस ने अपना नाम अतीक रख लिया था, जबकि उस का असली नाम तौसिफ खान था. अतीक साल 2008 में अहमदाबाद में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों का आरोपी था. पिछले 9 सालों से वह गया में अपना हुलिया बदल कर रह रहा था.

13 सितंबर, 2017 को बिहार के गया जिले में दबोचे गए 3 आतंकियों में से एक की पहचान तौसिफ खान के रूप में हुई, तो पुलिस और खुफिया महकमे के होश उड़ गए. उस ने खुलासा किया कि गया शहर के 3 खास इलाकों विष्णुपद मंदिर के पितृपक्ष मेले का इलाका, महाबोधि मंदिर और गया रेलवे जंक्शन पर बम धमाका करने की साजिश रची गई थी.

गौरतलब है कि जिस समय तौसिफ खान ने धमाके की साजिश रची, उस समय गया में 15 दिनों का पितृपक्ष मेला लगा हुआ था. इस में देशविदेश के लाखों लोग पिंडदान करने के लिए गया पहुंचते हैं.

तौसिफ खान साइबर कैफे के एक संचालक की मुस्तैदी से पुलिस के हत्थे चढ़ गया. वह रोजाना साइबर कैफे से ईमेल के जरीए सारी जानकारी अपने आका को भेजता था.

पुलिस ने कैफे से वह कंप्यूटर जब्त कर लिया है, जिस से वह किसी चांद नाम के आदमी को ईमेल भेजता था. गया के एसएसपी ने बताया कि 3 और संदिग्धों को पकड़ा गया है, जिन से पूछताछ के बाद तौसिफ खान के आतंकी होने की बात पक्की हो गई है. पुलिस ने बताया कि साइबर कैफे संचालक अनुराग को तौसिफ खान की हरकतें ठीक नहीं लगी थीं, तो उस ने तौसिफ खान से पहचानपत्र मांगा. जब उस ने पहचानपत्र नहीं दिया, तो अनुराग ने पुलिस को सूचना दी. उस के बाद तौसिफ खान और उस के साथी भागने लगे.

अनुराग ने उन का पीछा किया, तो वे उसे धक्का दे कर आटोरिकशा में सवार हो गए. उसी समय सामने से पुलिस की गाड़ी आ रही थी. अनुराग ने पुलिस वालों को आटोरिकशा रुकवाने का इशारा किया. पुलिस ने आटोरिकशा रोका और उस में सवार तौसिफ खान और उस के साथी सना खान और गुलाम सरवर को पकड़ा.

35 साल के तौसिफ खान उर्फ अतीक का पता अहमदाबाद के जूहापुरा इलाके का यूनाइटेड अपार्टमैंट्स का फ्लैट नंबर-15ए है. वह इंडियन मुजाहिदीन का फं्रटलाइन आतंकी है. इलैक्ट्रोनिक्स ऐंड कम्यूनिकेशन से इंजीनियरिंग की डिगरी लेने के बाद उस ने आतंक की दुनिया में कदम रख दिया था. उस ने महाराष्ट्र के नंदूरबाग के डीएन पाटिल इंजीनियरिंग कालेज से साल 2001-05 में बीटैक किया था.

अहमदाबाद में बम धमाकों को अंजाम देने के बाद तौसिफ खान साल 2008 में गया आ गया था. 26 जुलाई, 2008 को अहमदाबाद में 90 मिनट के अंदर एक के बाद एक 16 बम धमाके किए गए थे, जिन में 56 लोगों की मौत हो गई थी और 2 सौ से ज्यादा लोग जख्मी हो गए थे.

तौसिफ खान गया जिले के डोभी थाने के करमौनी गांव में रह रहा था और पहचान छिपाने के लिए उस ने अपना नाम अतीक रख लिया था. उस ने स्थानीय सना खान की मदद से मुमताज पब्लिक हाईस्कूल में टीचर की नौकरी हासिल कर ली थी. वह विज्ञान और गणित पढ़ाया करता था.

3 साल तक स्कूल में पढ़ाने के बाद तौसिफ खान ने नौकरी छोड़ दी और प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने लगा. गिरफ्तारी के बाद उस ने कबूल किया कि वह आईएसआई के प्रचार का काम कर रहा था. पुलिस इस बात की पड़ताल कर रही है कि वह कितने बच्चों के दिमाग में आतंक का कीड़ा डाल चुका है. उस के पाकिस्तान कनैक्शन की भी खोज की जा रही है.

तौसिफ खान से पूछताछ के बाद कई खुलासे हुए हैं. उस के घर से पाकिस्तान के लाहौर में प्रिंट कराई गई किताबें और जिहादी परचे बरामद हुए हैं. पुलिस को शक है कि उस ने गया में 50 जिहादियों को तैयार कर दिया है, जिस में से ज्यादातर 14 साल से 16 साल की उम्र के लड़के हैं.

तौसिफ खान ने किनकिन बच्चों को पढ़ाने के नाम पर जिहाद की घुट्टी पिलाई है, इस की भी जांच की जा रही है. गया में रहने के दौरान तौसिफ खान कई दफा राजस्थान और मुंबई गया था. पुलिस और एटीएस उस की इन यात्राओं के मकसद का पता लगा रही है. साल 2016 और साल 2017 में वह 2 बार राजस्थान गया था. उस के पास मुंबई जाने का टिकट भी मिला है.

तौसिफ खान के साथ दबोचा गया गुलाम सरवर खान बोधगया ब्लौक के बारा पंचायत के प्राथमिक निमहर विद्यालय का प्रभारी है. स्कूल के बच्चों ने पुलिस को बताया कि गुलाम सरवर खान हफ्ते में 2-3 दिन ही स्कूल आता था. साल 2006 में उस की बहाली पंचायत शिक्षक के रूप में हुई थी.

पुलिस जब गुलाम सरवर खान को गिरफ्तार कर ले जा रही थी, तो गांव वालों ने विरोध किया. पुलिस के काफी समझानेबुझाने के बाद ही गांव वाले शांत हुए. गया की एसएसपी गरिमा मलिक ने बताया कि तौसिफ खान पर पुलिस ने देशद्रोह का केस दर्ज किया है और उस के साथ पकड़े गए उस के 2 साथियों पर उसे संरक्षण देने का आरोप लगा है. उस के पास से मिले कागजात, पैनड्राइव और मोबाइल डाटा से देशद्रोह की गतिविधियों में शामिल होने के ठोस सुबूत मिल चुके हैं.

गुजरात की एटीएस टीम ने 15 सितंबर, 2017 को उस से पूछताछ की. गया के सिविल लाइन थाने में तीनों के खिलाफ केस (नंबर-277/2017) दर्ज कराया गया है. गया पुलिस की रिमांड की सीमा खत्म होने के बाद गुजरात एटीएस उन्हें रिमांड पर ले लेगी.

वहीं पुलिस सूत्रों की मानें, तो तौसिफ खान ने अहमदाबाद बम धमाकों में खुद के शामिल होने की बात को कबूल कर लिया है. पटना एटीएस, एसटीएफ और गया पुलिस अफसरों को पहले वह झांसा देने की कोशिश करता रहा. पहले तो वह आतंकी होने से ही इनकार करता रहा, उस के बाद उस ने माना कि अहमदाबाद बम धमाकों में संदिग्धों की लिस्ट में उस का नाम आने के बाद गिरफ्तारी के डर से वह वहां से भाग निकला था.

15 सितंबर की रात गुजरात एटीएस की टीम गया पहुंची और उस से पूछताछ की. एटीएस टीम ने बम धमाके के दूसरे आरोपियों के साथ उस का फोटो दिखाया, तो उस के होश उड़ गए. चारों ओर से खुद को फंसा देख कर आखिर तौसिफ खान ने हार मान ली.

गुजरात एटीएस की पूछताछ के बाद तौसिफ खान ने माना कि वह सिमी का हार्डकोर सदस्य है. वह 24 आतंकी मामलों में वांटेड था. वह मूल रूप से महाराष्ट्र के जलगांव का रहने वाला है.

सिमी का सदस्य बनने के बाद उसे ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भी भेजा गया था. पाकिस्तान में उस ने बम धमाके की ट्रेनिंग ली थी. इंजीनियर और तेज दिमाग का होने की वजह से उस ने बड़े आतंकियों के बीच अपनी खासी पैठ बना ली थी. वह सिमी की बैठकों और योजनाओं में शामिल होता था और उस की बातें गौर से सुनी जाती थीं.

वरदी की आड़ में हनीट्रैप का खेल

उत्तरी दिल्ली के जय माता मार्केट, त्रिनगर का रहने वाला कमलेश कुमार एलआईसी ऐजेंट था. अपने इस काम की वजह से उसे दिन भर इधरउधर भागदौड़ करनी पड़ती थी. इस मेहनत से उसे महीने में ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. 25 मई, 2016 को वह किसी काम से त्रिनगर के पोस्ट औफिस गया. तभी उस के मोबाइल पर ज्योति नाम की एक महिला का फोन आया. वह ज्योति को पिछले 5-6 सालों से जानता था. कमलेश ने उस की जीवन बीमा पौलिसी की थी. ज्योति के सहयोग से उसे कई और भी पौलिसी मिली थीं. ज्योति ने उसे बताया, ‘‘मेरी एक बहन रोहिणी में रहती है. उसे एक पौलिसी करानी है. आप उस की कोई अच्छी सी पौलिसी कर देना.’’

‘‘उन के पास कब पहुंचना है?’’ कमलेश कुमार ने पूछा.

‘‘आज ही चले जाओ. मैं भी उसी के पास ही जा रही हूं.’’ ज्योति ने बताया.

‘‘ठीक है, मैं अभी पोस्ट औफिस में हूं. यहां से निबट कर मैं रोहिणी पहुंच जाऊंगा. वहां का एड्रेस बता दो?’’ कमलेश ने कहा.

‘‘जब तुम यहां से निकलो तो मुझे फोन कर देना, मैं वहां कहीं मिल जाऊंगी और अपने साथ ले चलूंगी.’’ ज्योति बोली.

‘‘ठीक है, मैं बता दूंगा.’’

कोई नया केस तलाशने के लिए कभीकभी कितनी मेहनत करनी पड़ती है, इस बात को कमलेश अच्छी तरह जानता था, पर अब उसे ज्योति के माध्यम से एक केस आसानी से मिलने जा रहा था. इसलिए वह खुश था. उस ने फटाफट पोस्ट औफिस का काम निपटाया और बाहर आते ही ज्योति को फोन किया. ज्योति ने उसे बताया कि वह दोपहर एक बजे रोहिणी वेस्ट मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 2 पर मिलेगी. ज्योति से बात करने के बाद कमलेश ने मोबाइल में समय देखा तो साढ़े 11 बज रहे थे. एक बजने में डेढ़ घंटा बाकी था. वह सोचने लगा कि यह टाइम कहां बिताए. उस ने कुछ लोगों को फोन किया. इत्तेफाक से पीतमपुरा के एक क्लाइंट ने उसे मिलने के लिए अपने घर बुला लिया. कमलेश के लिए तो यह अच्छा ही था क्योंकि दोपहर एक बजे उसे पीतमपुरा से आगे रोहिणी जाना था, इसलिए उस ने फटाफट अपनी स्कूटी स्टार्ट की और पीतमपुरा की तरफ चल दिया.

15 मिनट में वह पीतमपुरा में अपने क्लाइंट के यहां पहुंच गया. उस क्लाइंट को एकमुश्त मोटी रकम एलआईसी में जमा करनी थी. उसी संबंध में बातचीत करने के लिए उस ने कमलेश को घर बुलाया था. कमलेश को रोहिणी भी पहुंचना था, इसलिए बातचीत करने के बाद वह निश्चित समय पर रोहिणी वेस्ट मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 2 पर पहुंच गया. वादे के मुताबिक ज्योति वहां खड़ी मिली. रोहिणी सेक्टर-1 की तरफ जाने की बात कह कर ज्योति उस की स्कूटी पर बैठ गई. सेक्टर-1 में पानी की टंकी के पास पहुंच कर ज्योति ने किसी महिला से बात की. फिर उस ने कमलेश से कुछ देर वहीं इंतजार करने को कहा. करीब 10 मिनट बाद वहां 30-35 साल की एक महिला आई. ज्योति ने उस का परिचय अपनी सहेली के रूप में कराया. उसे भी स्कूटी पर बैठा कर कमलेश उन के बताए अनुसार विजय विहार में बी.डी. जैन पब्लिक स्कूल के पास एक फ्लैट पर पहुंच गया.

वहां पहुंच कर 30-35 साल की उस महिला ने कमलेश से कहा, ‘‘मैं आप से अभी बात करती हूं. तब तक आप अंदर एसी वाले कमरे में बैठ जाएं. कमलेश अंदर वाले कमरे में चला गया. पहले से उस कमरे में जो लड़की बैठी थी, वह कमलेश से बातचीत करने लगी. उसे वहां आए अभी 5 मिनट ही हुए थे कि उसी दौरान वहां 4 व्यक्ति आए. लंबेचौड़े डीलडौल वाले वह चारों खुद को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के लोग बता रहे थे. उन में से एक व्यक्ति पुलिस वरदी में था.’’

कमरे में घुसते ही उन्होंने कमलेश को हड़काते हुए कहा, ‘‘यहां बैठे इस लड़की के साथ गलत काम कर रहे हो?’’

उन लोगों की बात सुनते ही कमलेश हक्काबक्का रह गया. कमलेश ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘नहीं सर, आप लोगों को शायद कोई गलतफहमी हुई है. मैं तो यहां बीमा केस के संबंध में आया हूं. आप चाहें तो बाहर बैठी ज्योति से पूछ सकते हैं. ज्योति सारी सच्चाई बता देगी.’’

कमलेश की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वरदी वाले ने कमलेश के गाल पर जोरदार तमाचा मारा. पलभर के लिए कमलेश का दिमाग घूम गया. उसी दौरान कमरे में बैठी महिला वहां से चली गई. कमरे में अब कमलेश के अलावा वही 4 लोग ही थे.

कमलेश समझ गया कि उसे फंसाया गया है. ऐसी हालत में उसे क्या करना चाहिए, उस की समझ में नहीं आ रहा था. फिर भी खुद को बचाने के लिए वह उन के सामने गिड़गिड़ाने लगा. पर उन लोगों ने उस की एक नहीं सुनी. वह उसे हड़काते हुए जेल भेजने की धमकी देने लगे. तभी उन में से एक ने कमलेश की तलाशी लेनी शुरू कर दी. उन्होंने उस का पर्स निकाल लिया और बैग की भी तलाशी ली. उस के पर्स में 4-5 सौ रुपए निकले, जबकि बैग में 25 हजार रुपए थे. वह रुपए उन्होंने अपने पास रख लिए. उस के पर्स में बैंक औफ बड़ौदा, आंध्रा बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम कार्ड थे. कमलेश को ले कर वह चारों फ्लैट से बाहर निकल आए. ज्योति नाम की जिस महिला के साथ वह एलआईसी केस के लालच में उस फ्लैट में आया था, वह दूसरे कमरे में बैठी हुई थी. कमलेश समझ गया कि यह सब उसी की साजिश है.

फ्लैट के बाहर आने के बाद उन में से एक व्यक्ति ने कमलेश को एक साइड में ले जा कर कहा, ‘‘देखो तुम्हारे खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो गई तो परेशानी में फंस जाओगे. जेल तो जाना ही पड़ेगा साथ में बदनामी होगी अलग से. फिर सालों साल कोर्ट जा कर मुकदमा लड़ते रहना. वकीलों की फीस तो तुम जानते ही हो. अगर तुम इन सब से बचना चाहते हो तो 2 लाख रुपए खर्च कर दो. सारी बात यहीं रफादफा हो जाएगी और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा.’’ यह सुन कर कमलेश कुछ सोचने लगा. फिर कुछ पल बाद वह बोला, ‘‘इतने पैसे मेरे पास तो हैं नहीं. कहां से दूंगा. मैं आप लोगों से फिर से अनुरोध करता हूं कि मुझे छोड़ दीजिए.’’ कमलेश ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘हम ने तुझे जो तरीका बताया, तेरी समझ में नहीं आया. जब जेल जाएगा तब अक्ल ठिकाने आ जाएगी.’’ उसी शख्स ने धमकाया जिस ने 2 लाख रुपए में मामला रफादफा करने को कहा था. इस के बाद पुलिस वरदी वाले ने कमलेश के पर्स से निकाले हुए एटीएम कार्ड अपने एक साथी को देते हुए कहा, ‘‘इस के साथ कहीं आसपास के एटीएम बूथ पर जाओ और देखो कि इन खातों में पैसे हैं कि नहीं. यदि हों तो 2 लाख रुपए निकाल कर इस का मामला यहीं निपटा दो.’’

उस के कहने पर एक आदमी कमलेश की स्कूटी पर बैठ कर आईसीआईसीआई के एटीएम बूथ पर पहुंच गया. कमलेश ने डर की वजह से उसे अपना पिन बता दिया था. जिस के बाद उस शख्स ने कमलेश के एटीएम कार्डों से 82,200 रुपए निकाल लिए. इस तरह उन लोगों ने कमलेश से 1,10,200 ऐंठ लिए पैसे लेने के बाद उन्होंने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. बिना कुछ किएधरे ही कमलेश लुटपिट कर घर पहुंचा. उस का चेहरा उतरा हुआ था. पत्नी ने उस से वजह भी पूछी पर उस ने उसे कुछ नहीं बताया. यह ऐसी बात थी, जिसे वह किसी को बताने की हिम्मत भी नहीं जुटा रहा था. 3-4 दिन बीत जाने के बाद भी वह उस घटना को भुला नहीं पा रहा था. आखिर एक दिन उस के दोस्त ने उस से उस की खामोशी और परेशानी का कारण पूछ ही लिया. सोचविचार कर कमलेश ने अपने साथ घटी पूरी घटना उसे बता दी.

उस की बात सुनने के बाद दोस्त को लगा कि उस के साथ धोखाधड़ी हुई है क्योंकि असली पुलिस होती तो उसे सीधे थाने ले जाती. अगर किसी तरह की कोई सैटिंग होती भी तो थाने में होती. दूसरे पुलिस को इस तरह किसी के खाते से पैसे निकालने का कोई हक नहीं होता. ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा कि करूं तो क्या करूं.’’ कमलेश दुखी मन से बोला.

‘‘करना क्या है, तुम्हें थाने जाना चाहिए. तुम थाने जाओगे तो उन चारों पुलिसवालों में से कोई न कोई तो वहां दिख ही जाएगा. अगर उन में से कोई न दिखे तो थानाप्रभारी को बता देना. यह भी तो हो सकता है कि वो लोग पुलिसवाले हों ही नहीं. क्योंकि इसी तरह से एक पायलट से 15 लाख रुपए लेने के आरोप में पुलिस ने दिल्ली होमगार्ड के एक पूर्व कमांडर को गिरफ्तार किया था. मेरी बात मानो, तुम थाने चलो. मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं.’’ दोस्त ने उस की हिम्मत बढ़ाई. इस के बाद कमलेश दोस्त के साथ बाहरी दिल्ली के थाना विजय विहार पहुंचा. कमलेश ने थानाप्रभारी अभिनेंद्र जैन को आपबीती सुनाई. थानाप्रभारी ने शाम 5 बजे थाने के समस्त स्टाफ की ब्रीफिंग के दौरान शिनाख्त कराई. कमलेश को उन में से कोई नहीं दिखा. इस से थानाप्रभारी को लगा कि कमलेश के साथ ठगी करने वाले या तो किसी दूसरे थाने के रहे होंगे या फिर उन्होंने फरजी पुलिस बन कर कमलेश से पैसे ऐंठे होंगे.

जो भी हो, उन्होने अपराध तो किया ही था. इसलिए थानाप्रभारी ने कमलेश की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 384/388/208/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज करवा दी. थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ विजय विहार स्थित उस फ्लैट पर गए, जहां ज्योति कमलेश को ले गई थी. वह फ्लैट बंद मिला. पता चला कि वह फ्लैट अवध गुप्ता नाम के व्यक्ति का था. पुलिस अवध गुप्ता की तलाश में जुट गई. मुखबिर की सूचना के बाद पुलिस टीम ने 2 दिन बाद ही उसे रोहिणी के विजय विहार क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने बताया कि कई सालों से वह इस फ्लैट में अकेला रहता है. उस की दोस्ती रोहिणी सेक्टर-22 के रहने वाले सुनील कुमार से थी. सुनील दिल्ली होमगार्ड में था. वह कभीकभी ज्योति नाम की एक महिला को ले कर उस के फ्लैट पर आता था. जब कभी ज्योति किसी व्यक्ति को ले कर आती थी तो सुनील अपने दोस्तों सीताराम, अनिल और आरिफ उर्फ बंटी को ले कर आ जाता था. उस वक्त सुनील पुलिस की वरदी में होता था. ये लोग उस व्यक्ति को रेप के आरोप में बंद करने की धमकी दे कर उस से मोटे पैसे ऐंठते थे. जितने पैसे ऐंठे जाते उसे सभी लोग आपस में बांट लेते थे. अवध गुप्ता ने बताया कि वह सुनील और ज्योति के ठिकानों के बारे में जानता है.

पुलिस ने अवध की निशानदेही पर ज्योति को गिरफ्तार कर लिया. शादीशुदा ज्योति की दोस्ती सुनील से थी. पैसे के लालच में वह हनीट्रैप में लोगों को फंसाने का धंधा करने लगी. कम मेहनत में उसे अच्छी कमाई होने लगी तो वह नएनए शिकार को तलाशने लगी थी. इसी चक्कर में उस ने कमलेश को फांसा था. पुलिस ने अवध गुप्ता और ज्योति को गिरफ्तार कर रोहिणी न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अन्य अभियुक्तों की तलाश में पुलिस ने उन के संभावित ठिकानों पर दबिशें दीं, पर वे लोग अपने घरों से फरार मिले. इसी तरह करीब 5 महीने बीत गए. आरोपियों का कहीं कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था. इस पर उत्तर पश्चिम जिले के डीसीपी ने यह केस जिले की स्पैशल स्टाफ यूनिट को सौंप दिया. तेजतर्रार सब इंसपेक्टर राममनोहर मिश्रा की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई गई.

यह पुलिस टीम फरार अभियुक्त सुनील कुमार, सीताराम, अनिल, आरिफ उर्फ बंटी व उन की एक महिला साथी को तलाशने लगी. लेकिन आरोपी बेहद शातिर थे. उन्हें पता चल गया था कि पुलिस उन्हें ढूंढ रही है. इसलिए वह गुप्त ठिकानों पर छिप गए थे. टीम को किसी तरह से सुनील और उस के दोस्त सीताराम के फोन नंबर मिल गए थे. पुलिस उन के फोन नंबरों के सहारे उन्हें तलाशने लगी. उन के फोन नंबरों के आधार पर 18 अक्तूबर, 2016 को एसआई राममनोहर मिश्रा की टीम ने सुनील कुमार और सीताराम को दिल्ली के बाहरी रिंग रोड स्थित विवेकानंद इंस्टीट्यूट के पास से गिरफ्तार कर लिया. वह अपनी होंडा अमेज कार नंबर डीएल 4सीएयू1658 में वहां किसी का इंतजार कर रहे थे. दोनों को स्पैशल स्टाफ औफिस ले जा कर सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

पूछताछ में पता चला कि सुनील दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-22 में रहने वाले मेवालाल का बेटा था. वह शादीशुदा था लेकिन किसी बात को ले कर उस की पत्नी से नहीं बनती थी, इसलिए वह पत्नी से अलग रहता था. सुनील दिल्ली होमगार्ड था. करीब 6 महीने पहले उस की नौकरी छूट गई थी. जब वह होमगार्ड में नौकरी करता था, तभी उस की ड्यूटी सुल्तानपुरी थाने में थी. वहीं पर सीताराम भी उस के साथ ड्यूटी करता था. सीताराम का एक भाई दिल्ली पुलिस में था. सुनील और सीताराम गहरे दोस्त थे. दोनों ही ज्यादा पैसे कमाने की बातें करते रहते थे. तभी उन के दिमाग में हनीट्रैप के जरिए पैसा कमाने का विचार आया. इस के लिए एक महिला की जरूरत थी. उस का इंतजाम सुनील ने कर दिया. दरअसल सुनील ज्योति नाम की एक महिला के साथ लिव इन रिलेशन में रहता था.

ज्योति को उस ने तैयार कर लिया. अब बात आई जगह की तो सुनील का एक जानकार था अवध गुप्ता, जिस का विजय विहार में फ्लैट था. पैसे के लालच में वह भी तैयार हो गया. सीताराम ने अपने 2 दोस्तों अनिल व आरिफ उर्फ बंटी को भी इस गैंग में शामिल कर लिया. यह दोनों गाजियाबाद के लोनी क्षेत्र में रहते थे. ज्योति शिकार को फांस कर अवध गुप्ता के मकान पर ले जाती थी. फिर कुछ देर बाद सुनील अपने सभी साथियों के वहां आ धमकता था. सुनील पुलिस वरदी में होता था. इसलिए वह शिकार को डराधमका कर आसानी से पैसे झटक लेते थे. फिर उस रकम को आपस में बांट लेते थे. इस तरह उन का यह धंधा आसानी से चल रहा था. पर कमलेश कुमार के मामले में सभी फंस गए पुलिस ने सुनील और सीताराम को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया जबकि अन्य अभियुक्तों की तलाश जारी है.

बच्ची के लिए फरिश्ता बना औटोरिक्शा चालक

ग्वालियर के ख्वाजानगर के रहने वाले हेमराज सिंह 29 दिसंबर, 2016 को अपने परिवार के साथ शहर के प्रसिद्ध साईंबाबा मंदिर गए थे. वहीं उन की 4 साल की बेटी दिव्या बिछुड़ गई. हेमराज सिंह और उन की पत्नी बेटी को इधरउधर खोजने लगे, पर वह कहीं दिखाई नहीं दी.

उन्होंने बच्ची को मंदिर परिसर से ले कर बाहर सड़क तक तलाशा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल सका. कुछ ही देर में बच्ची के गायब होने की खबर मंदिर परिसर में मौजूद लोगों के बीच फैल गई. किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम और नजदीकी पुलिस स्टेशन में दिव्या के गुम होने की सूचना दे दी. पुलिस को सूचना देने के बावजूद भी हेमराज सिंह और उन की पत्नी बेटी को मंदिर के आसपास खोजते रहे.

उसी बीच एक महिला एक औटोरिक्शा में बैठते हुए औटोचालक से बोली कि उसे बसअड्डा जाना है. उस महिला के साथ जो बच्ची थी, उस की उम्र यही कोई 3-4 साल थी. वह बच्ची लगातार रोए जा रही थी. उसे चुप कराने के लिए वह महिला उसे खाने को कभी बिस्कुट तो कभी कुछ और चीजें दे रही थी. पर वह बच्ची रोते हुए अपनी मां के पास जाने के लिए कह रही थी. बच्ची को इस तरह रोता देख औटोचालक हरिमोहन चौरसिया को कुछ शक हुआ तो उस ने महिला से पूछा कि यह बच्ची क्यों रो रही है?

‘‘दरअसल, इस बच्ची की मां अस्पताल में भरती है. यह उस के पास जाने की जिद कर रही है.’’ महिला ने कहा. हरिमोहन को उस महिला की बात पर विश्वास नहीं हुआ. उसे दाल में कुछ काला नजर आया. लिहाजा वह अपने औटो को रास्ते में पड़ने वाले इंदरगंज थाने में ले गया. महिला ने जब औटो थाने में लाने के बारे में पूछा तो ड्राइवर हरिमोहन ने कहा कि उसे थाने में किसी से 2 मिनट बात करनी है.

हरिमोहन ने थाने में मौजूद हैडकांस्टेबल राजकिशोर त्रिपाठी को महिला पर हो रहे अपने शक के बारे में बता दिया. हरिमोहन की बात सुन कर हैडकांस्टेबल राजकिशोर उस के औटोरिक्शा के पास पहुंचे और महिला को पूछताछ के लिए औफिस में ले आए. पूछताछ में महिला ने बताया कि वह इस बच्ची की पड़ोसन है. इस बच्ची की मां सरकारी अस्पताल में भरती है. मैं इसे इस की मां से मिलवाने के लिए ले जा रही हूं.

हैडकांस्टेबल को भी उस महिला की बातों पर शक हुआ तो उस ने उस बच्ची को अलग ले जा कर बात की. उस ने कहा, ‘‘अंकल, मेरा नाम दिव्या है. मैं तो अपने मम्मीपापा के साथ साईंबाबा मंदिर में दर्शन के लिए गई थी. यह जो आंटी मुझे ले जा रही हैं, इन्हें मैं नहीं जानती. मेरी मम्मी अस्पताल में नहीं भरती हैं. पता नहीं यह मुझे कहां ले जा रही हैं?’’ इतना कह कर दिव्या रोने लगी.

हैडकांस्टेबल राजकिशोर को अब मामला समझ में आ गया. उस ने उस समय उस महिला से कुछ नहीं कहा. उसे थाने में बिठा कर वह दिव्या को मोटरसाइकिल पर बिठा कर साईंबाबा मंदिर ले गया. वहां दिव्या के पिता हेमराज सिंह और उन की पत्नी मिल गई. दोनों ही परेशान थे. जैसे ही उन्होंने पुलिस वाले के साथ अपनी बेटी को देखा, उन के चेहरे पर खुशी की चमक लौट आई.

मां ने दिव्या को सीने से लगा लिया. कई मिनट तक वह उसे पुचकारती रही. हेमराज सिंह ने जब दिव्या के साथ आए पुलिस वाले से पूछा कि उन्हें उन की बेटी कहां मिली तो उस ने बताया कि एक महिला इस का अपहरण कर औटो में बैठा कर कहीं ले जा रही थी. वह तो भला हो उस औटो वाले का जो अपना औटो सीधे थाने ले आया और आप की बच्ची गलत जगह पहुंचने से बच गई. बेटी को बचाने वाले उस औटोचालक को बहुत दुआएं दीं. इस के बाद हैडकांस्टेबल राजकिशोर हेमराज और उन की पत्नी को थाने ले आए.

थाने पहुंचने के बाद हैडकांस्टेबल ने पूरी जानकारी थानाप्रभारी को दी. दिव्या का अपहरण कर के ले जा रही महिला से हैडकांस्टेबल राजकिशोर त्रिपाठी ने पूछताछ की तो उस महिला ने अपना नाम लक्ष्मी उर्फ मुन्नीबाई बताया. वह डबरा कस्बे की जवाहर कालोनी की रहने वाली थी.

सख्ती से की गई पूछताछ में उस ने स्वीकार कर लिया कि वह बच्चों को चुराने वाले गैंग से जुड़ी है. इस बच्ची को भी वह चुरा कर ले जा रही थी.

थानाप्रभारी ने यह जानकारी एसपी डा. आशीष खरे को दी. जिले के अलगअलग क्षेत्रों से अनेक बच्चियां गायब हो चुकी थीं. उन का कोई सुराग नहीं मिल रहा था, इसलिए उन्होंने झांसी रोड सर्किल के सीएसपी डी.बी.एस. भदौरिया को इस मामले की जांच करने को कहा.

सीएसपी भदौरिया ने महिला पुलिस की मदद से लक्ष्मी से पूछताछ की तो उस ने  सारा राज उगल दिया. पता चला कि लक्ष्मी के गैंग में 8 लोग शामिल थे और ये तमाम बच्चियों को चुरा कर अलगअलग जगहों पर भेज चुके हैं. एक बच्ची चुराने के लिए उन्हें 25 से 30 हजार रुपए मिलते थे. पैसे के लालच में लक्ष्मी के 2 बेटे राजेश और राजू भी यही काम कर रहे थे.

लक्ष्मी ने बताया था कि उस के गैंग में 3 महिलाएं और 5 शातिर पुरुष शामिल हैं. कई शहरों में मौजूद दलालों से बच्चियों को सप्लाई करने का सौदा किया जाता है. कभीकभी दलाल डील के बदले एडवांस में भी पैसे देते थे.

गैंग के सदस्य रेलवे स्टेशनों, बसअड्डे, मंदिरों आदि भीड़भाड़ वाले इलाकों में सक्रिय रहते हैं. पता चला कि गैंग के टारगेट में केवल छोटी बच्चियां ही होती हैं. बच्ची को अगवा करने के बाद कुछ दिनों तक ये अपने ठिकाने पर रखते हैं, फिर उन्हें दूसरी जगहों पर रख कर भीख मंगवाई जाती है और जवान होने पर उन्हें जिस्मफरोशी के धंधे में धकेल दिया जाता है. पता चला है कि 50 वर्षीया लक्ष्मी ही गैंग की मुखिया थी.

सीएसपी डी.बी.एस. भदौरिया ने लक्ष्मी से सभी राज खुलवाने के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर ग्वालियर के गिर्जोरा गांव से राममिलन कंजर, रामदास कुशवाह और लक्ष्मी के दोनों बेटों राजू और राजेश के घर दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने इन के पास से अगवा की गई 3 बच्चियों को बरामद किया था.

इस के बाद एक पुलिस टीम राजस्थान के धौलपुर जिला भेजी गई. वहां से पुलिस ने सरनाम कंजर को धर दबोचा. उस के पास से पुलिस ने अगवा की गई 2 बच्चियां बरामद कीं. ग्वालियर जिले का बदनापुरा क्षेत्र वेश्यावृत्ति के लिए प्रसिद्ध है. यहां पर रोशनबाई और आकाश कालकोट के घर दबिश दी गई. उस के पास से भी 2 बच्चियां बरामद की गईं.

गैंग का नेटवर्क देश के 5 राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ था.

पुलिस ने 8 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर उन के पास से ग्वालियर के माधोगंज की 6 वर्षीया मोहिनी माहौर, गुढ़ागढ़ी के नाके की 5 वर्षीया नेहा खान, नई बस्ती ललितपुर की 6 साल की कांती, मोहनगढ़ की 4 साल की नैना, 8 साल की राशि, 4 साल की अंजलि, 5 साल की प्राची और 4 साल की रज्जो उर्फ आयशा को बरामद किया.

यह पुलिस के लिए बहुत बड़ी सफलता थी. पुलिस ने बरामद की गई सभी बच्चियां उन के मातापिता को सौंप दीं. अपनी बच्चियों को पा कर परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

इस सफलता के लिए सीएसपी डी.बी.एस. भदौरिया और औटो चालक हरिमोहन को प्रदेश की राजधानी भोपाल में बाल आयोग द्वारा सम्मानित किया गया. औटोरिक्शा चालक की चौकसी के बाद यदि लक्ष्मी नहीं पकड़ी जाती तो पता नहीं यह गैंग कितनी और बच्चियों को चुरा कर उन का जीवन तबाह कर देता.

प्यार की भूल

गली में जैसे ही बाइक के हौर्न की आवाज सुनाई दी, शमा के साथसाथ उस की सहेलियां भी चौंक उठीं. क्योंकि वह बाइक शमा के प्रेमी नरेंदर की थी. नरेंदर अपनी बाइक से कपड़ों की फेरी लगाता था. शमा के घर के नजदीक पहुंचते ही वह बारबार हौर्न बजाता. तभी तो बाइक के हौर्न की आवाज सुनते ही एक सहेली ने शमा को छेड़ते हुए कहा, ‘‘लो जानेमन, आ गई तुम्हारे यार की कपड़ों की चलतीफिरती दुकान.’’

‘‘हट बदमाश, तू तो ऐसे कह रही है जैसे वह केवल मेरे लिए ही यहां आता है. क्या मोहल्ले का और कोई उस से कपडे़ नहीं खरीदता है?’’

‘‘और नहीं तो क्या, वह तेरे लिए ही तो इस गांव में आता है.’’ सहेलियों ने शमा को छेड़ते हुए कहा, ‘‘वह बेचारा तो सारे गांव छोड़ कर पता नहीं कहां से धक्के खाता हुआ तेरे दीदार के लिए इस गांव में आता है.’’

सहेलियों की चुहलबाजी से शमा शरमा गई और उन के बीच से उठ कर अपने कमरे में चली गई.

जब वह कमरे से बाहर निकली तो गुलाबी रंग का फूलों के प्रिंट वाला सुंदर सूट पहन कर आई थी. यह सूट पिछले सप्ताह नरेंद्र ने उसे यह कहते हुए दिया था कि इसे सिलवा कर तुम ही पहनना, किसी और को मत देना. इसे मैं अमृतसर से सिर्फ तुम्हारे लिए ही लाया हूं. यूं समझो शमा, यह सूट मेरे प्यार की निशानी है.

नरेंदर के दिए उसी सूट को पहन कर शमा घर से निकली. नरेंदर उस के सामने खड़ा था. जैसे ही वह घर से बाहर आई, उसे देख कर वह खुश हो गया. वह मंत्रमुग्ध सा हो कर उसे ऊपर से नीचे तक देखता रह गया था. उस सूट ने उस की खूबसूरती में चारचांद लगा दिए थे. वह किसी अप्सरा से कम सुंदर नहीं लग रही थी.

घर की ओट में खड़ी शमा की सहेलियां जब जोरजोर से हंसी तो शमा और नरेंदर की तंद्रा भंग हुई. घबराहट और शरम से भरी शमा ने जल्दीजल्दी नरेंद्र से कहा, ‘‘अच्छा, मैं चलती हूं.’’

नरेंदर ने आगे बढ़ कर उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘नहीं शमा, आज नहीं. आज मुझे तुम से बहुत जरूरी बात करनी है.’’

शमा के कदम वहीं रुक गए.

जालंधर शहर की बस्ती शेख निवासी नरेश चौहान के 2 बेटे थे सुरेंदर चौहान और नरेंदर चौहान. कई साल पहले किसी वजह से नरेश की मृत्यु हो गई, जिस की वजह से परिवार का भार उन की पत्नी सुदेश कुमारी के ऊपर आ गया. जो सगेसंबंधी थे, उन्होंने भी मदद करने के बजाय सुदेश का साथ छोड़ दिया था. मेहनतमजदूरी कर के उन्होंने जैसेतैसे दोनों बच्चों का पालनपोषण किया. जहां तक हो सका, उन्हें पढ़ाया भी.

बड़ा बेटा सुरेंदर जब जवान हो कर किसी फैक्ट्री में काम करने लगा तो घर के हालात कुछ सामान्य हुए. कुछ समय बाद उस ने कुछ रुपए इकट्ठे कर के और कुछ इधरउधर से कर्ज ले कर छोटे भाई नरेंदर को कपड़े का काम करवा दिया. उसे एक मोटरसाइकिल भी खरीदवा दी. नरेंदर सुबह कपड़े का गट्ठर बांध कर अपनी बाइक पर रखता और जालंधर से बाहर दूरदूर गांवों में जा कर कपड़ा बेचता.

मोटरसाइकिल से गांवगांव घूम कर कपड़ों की फेरी लगाने पर उस का काम चल निकला. अब दोनों भाई कमाने लगे तो वे पैसे मां को दे देते. मां ने पैसे जोड़जाड़ कर बड़े बेटे सुरेंदर की शादी कर दी.

पर शादी के कुछ दिनों बाद वह अपनी पत्नी को ले कर अलग रहने लगा था. जबकि नरेंदर मां के साथ रहता था. नरेंदर खूब मेहनत कर रहा था. उस का व्यवहार भी अच्छा था जिस की वजह से उसे ठीकठाक आमदनी हो जाती थी.

एक बार वह कपड़े बेचने के लिए नंगल लाहौरा गांव गया. वहां की रहने वाली भोलीनामक महिला उसे अपने घर बुला कर ले गई.

उस दिन भोली व उस की बेटी शमा ने उस से 5 हजार रुपए के कपड़े खरीदे. उसी समय उस की मुलाकात शमा से हुई थी. शमा बहुत खूबसूरत थी. उसी दिन उस की शमा से आंखें लड़ गईं.

इस के बाद वह नंगल लाहौरा गांव का रोजाना ही चक्कर लगाता और शमा के घर के नजदीक बाइक पहुंचते ही बारबार हौर्न बजाता.

हौर्न की आवाज सुनते ही शमा घर से बाहर निकल आती थी. दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकराने लगते थे. कभीकभी अच्छे कपड़े दिखाने की बात कह कर वह भोली के घर में भी चला जाता था.

जब नरेंदर उस के यहां ज्यादा ही आनेजाने लगा तो शमा के घर वालों ने उस से बेरुखी से बात करनी शुरू कर दी. इस बारे में नरेंदर ने शमा से फोन पर पूछा तो शमा ने घर वालों की नाराजगी के बारे में बता दिया. घर वालों से चोरीछिपे शमा नरेंदर से मिलती रही. उन की फोन पर भी बात होती रहती. इस तरह उन का प्यार परवान चढ़ता रहा. यह सन 2004 की बात है.

नरेंदर शमा की पूरी पारिवारिक स्थिति जान गया था. शमा की 5 बहनें और एक भाई था. पिता की पहले ही मौत हो चुकी थी. घर की पूरी जिम्मेदारी शमा की मां भोली के कंधों पर ही थी. शमा की बड़ी बहन शादी लायक थी, उस के लिए भोली कोई अच्छा लड़का तलाश रही थी.

नरेंदर जितना शमा को चाहता था, उस से कई गुना अधिक शमा भी उस से प्यार करती थी. नरेंदर हृष्टपुष्ट और भला लड़का था. वह कमा भी अच्छा रहा था, इसलिए उसे उम्मीद थी कि शमा की शादी उस से कर देने पर भोली को कोई ऐतराज नहीं होगा.

पर पता नहीं क्यों नरेंदर ने किसी के माध्यम से शमा से शादी करने का प्रस्ताव भोली के पास भेजा तो भोली ने उस के साथ बेटी का रिश्ता करने से साफ इनकार कर दिया. इस से दोनों प्रेमियों के इरादों पर पानी फिर गया.

ऐसे प्रेमियों के पास घर से भाग कर शादी करने के अलावा कोई और दूसरा रास्ता नहीं बचता, सो शमा और नरेंदर ने भी घर से भाग कर शादी करने की योजना बनाई.

नरेंदर ने मंदिर के पंडित से ले कर वकील तक का इंतजाम कर के शमा से कहा, ‘‘शमा, अब मेरी बात गौर से सुनो. मैं ने शादी की सारी तैयारियां पूरी कर ली हैं. कल सुबह तुम्हें किसी बहाने से अपने गांव से निकल कर बसअड्डे पहुंचना है. फिर वहां से कोई बस पकड़ कर तुम जालंधर आ जाना. मैं तुम्हें वहीं मिलूंगा. वहां से हम साथसाथ चंडीगढ़ चलेंगे और वहीं शादी कर लेंगे. तुम चिंता मत करो, मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है.’’

‘‘मैं घर से कपड़े भी लेती आऊं?’’ शमा ने पूछा.

‘‘नहीं, तुम्हें कुछ भी साथ लाने की जरूरत नहीं है. तुम बस इतना करना कि टाइम से पहुंच जाना.’’ नरेंदर ने शमा को अच्छी तरह समझा दिया था. इतना ही नहीं उस ने किराएभाड़े के लिए कुछ पैसे भी उसे दे दिए थे.

योजना के अनुसार शमा निर्धारित समय पर नरेंदर के पास जालंधर पहुंच गई. फिर वहां से बस द्वारा दोनों चंडीगढ़ पहुंच गए. पहले उन्होंने एक मंदिर में शादी की फिर उस शादी को नोटरी पब्लिक के जरिए रजिस्टर भी करवा लिया.

नरेंदर शमा से शादी कर के बहुत खुश था. उस ने अपनी शादी के लिए बहुत बढि़या इंतजाम कर रखा था. हनीमून को वह यादगार बनाना चाहता था इसलिए उस ने चंडीगढ़ में ही एक थ्रीस्टार होटल में सुइट बुक करवा रखा था. वह बेहद उत्सुक था पर उस रात उस की उत्सुकता ठंडी पड़ गई. उस के सारे अरमानों पर पानी फिर गया.

उस के दिल को इतना बड़ा धक्का लगा कि उस ने सोचा भी नहीं होगा. क्योंकि अपनी मनपसंद की जिस शमा को वह जीजान से चाहता था, सब के विरोध के बावजूद जिस से उस ने शादी की, वह लड़की नहीं बल्कि किन्नर निकली. अब पूरा ब्रह्मांड उसे घूमता नजर आ रहा था. वह बुदबुदाने लगा कि मैं समाज को अब क्या मुंह दिखाऊंगा.

इस के बाद वह बैड से उठ कर जोरजोर से रोने लगा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. गुस्से से तमतमाते हुए उस ने शमा के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘बताओ, मैं ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था. अपनी जान से ज्यादा तुम्हें प्यार किया था और तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा छल किया. बताओ, क्यों किया ऐसा? सच बताओ नहीं तो मैं तुम्हारी जान ले लूंगा.’’ नरेंदर के सिर पर जैसे खून सवार हो गया था.

‘‘मैं कुछ नहीं जानती नरेंदर, तुम्हारे प्यार की कसम. मैं तो बचपन से ही ऐसी हूं. मां ने कहा था कि शादी के बाद अपने आप ठीक हो जाऊंगी.’’ शमा ने मासूमियत से जवाब दिया था.

नरेंदर समझ गया कि या तो शमा इतनी भोली है कि उसे इस बारे में कुछ पता नहीं या वह बेहद चालाक है. लेकिन बात कुछ भी रही हो, पर अब वह क्या करे. यह प्रश्न बारबार नरेंदर के दिमाग में घूम रहा था. वक्त की बेरहम आंधी ने उस की खुशियों के चमन को एक झटके में उखाड़ कर तहसनहस कर दिया था. शमा के मिन्नतें करने पर नरेंदर उसे अपने घर ले गया.

2 दिन अपने घर पर रखने के बाद उस ने शमा को घर से निकालते हुए कह दिया, ‘‘शमा, तुम ने मेरे साथ धोखा किया है. अब मैं यह बताना चाहता हूं कि तुम इस घटना को एक बुरा सपना समझ कर भूल जाना. मैं भी भूलने की कोशिश करूंगा. हां, एक बात याद रखना कि आज के बाद कभी भूल कर भी मेरे सामने मत आना. जिस दिन तुम मेरे सामने आ गई तो समझ लेना कि वह दिन तुम्हारी जिंदगी का आखिरी दिन होगा.’’

शमा को इतनी जल्दी भुला देना नरेंदर के लिए आसान नहीं था. इसलिए उस ने जालंधर से दूर जाना उचित समझा. वह अपना सब कुछ छोड़छाड़ कर अपनी मां को ले कर दिल्ली आ गया. यहां उस ने औटो चलाना शुरू कर दिया. दूसरी ओर शमा भी अपनी मां के पास चली गई.

वक्त के साथ सब कुछ सामान्य होता चला गया था. दूसरी ओर शमा की बड़ी बहन की शादी राजकुमार नामक युवक के साथ हो गई. शादी के बाद भोली के ऊपर लोगों का कर्ज भी हो गया था.

मां जो मेहनतमजदूरी करती, उस से बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चल पाता था. ऐसी हालत में शमा ने मां का हाथ बंटाना जरूरी समझा. उस ने एक आर्केस्ट्रा ग्रुप जौइन कर लिया. इस काम में अच्छीखासी कमाई थी सो घर के हालात धीरेधीरे बदलने लगे.

शमा जालंधर के आर्केस्ट्रा ग्रुप में काम करती थी. गांव से जालंधर आने में शमा को परेशानी होती थी, इसलिए वह अपनी मां और भाईबहन को जालंधर ले आई. वहीं उस ने एक किराए का कमरा ले लिया. शमा और नरेंदर दोनों अपनेअपने काम में लग गए थे, इसलिए उन की प्रेमकहानी का अंत हो चुका था.

वक्त के बेरहम थपेड़ों में दोनों ने एकदूसरे को भुला दिया था. इस तरह वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा था. एकएक कर इस बात को पूरे 11 साल गुजर गए थे. न तो नरेंदर को पता था कि शमा अब कहां है और न ही शमा यह जानती थी कि उसे अपने घर से निकालने के बाद नरेंद्र कहां और किस हाल में है.

पहली मई 2017 की बात है. शमा रात 8 बजे अपने घर से अपनी स्कूटी पर किसी काम से बाजार जाने के लिए निकली. चलते समय उस ने अपनी मां से कहा था कि वह किसी जरूरी काम से बाहर जा रही है, थोड़ी देर में लौट आएगी. लेकिन वह उस रात घर नहीं लौटी तो भोली ने शमा को फोन मिलाया. पर उस का फोन बंद था.

रात भर तलाशने पर भी शमा का कहीं कोई पता नहीं चला. अगली सुबह शमा की एक सहेली ने बताया कि रात शमा उस को बस्ती शेख के तेजमोहन नगर की गली नंबर 6 के कोने पर मिली थी, पूछने पर उस ने बताया था किसी रिश्तेदार से मिलने जा रही है.

‘‘लेकिन यहां हमारा कोई रिश्तेदार तो क्या, कोई जानकार भी नहीं रहता.’’ भोली ने बताया.

बहरहाल, भोली अपने बेटे और दामाद को साथ ले कर तेजमोहन नगर की गली नंबर 6 में पहुंची तो मकान नंबर 3572/19 के सामने शमा की स्कूटी खड़ी मिली. आसपास के लोगों से पूछने पर पता चला कि वह मकान पिछले 4 महीनों से किसी नरेंदर चौहान ने किराए पर ले रखा था.

मकान के बाहर छोटा सा ताला था. भोली और उस के बेटे और दामाद ताला खोल कर जब भीतर गए तो वहां का नजारा देख कर उन सब के होश उड़ गए. बैड पर शमा की लाश पड़ी थी. तब भोली ने इस की सूचना थाना डिवीजन-5 पुलिस को दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुखबीर सिंह अपने सहयोगी इंसपेक्टर नरेश जोशी के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का मुआयना करने से पता चला कि मृतका के गले में दुपट्टा कसा हुआ था. इस के अलावा उस की गरदन पर गहरा घाव भी था.

पूछताछ करने पर पता चला था कि उस मकान में नरेंदर चौहान किराए पर रहता था. वह मृतका का पति था. पड़ोसियों ने बताया कि शमा रात करीब सवा 8 बजे वहां पहुंची थी. इस के कुछ देर बाद ही उस के कमरे से लड़ाईझगड़े की जोरजोर की आवाजें आने लगी थीं. कुछ देर बाद आवाजें आनी बंद हो गईं. रात करीब साढ़े 10 बजे उन्होंने नरेंदर और उस की मां को घर के बाहर निकल कर कहीं जाते हुए देखा था.

भोली ने भी अपने बयान में यही बताया था कि शमा की हत्या उस के दामाद नरेंदर चौहान और उस की मां सुदेश चौहान ने मिल कर की है.

इंसपेक्टर सुखबीर सिंह ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दी. भोली के बयान के आधार पर पुलिस ने नरेंदर चौहान और उस की मां सुदेश चौहान के खिलाफ भादंवि की धारा 302/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर तहकीकात शुरू कर दी.

3 डाक्टरों के पैनल ने शमा की लाश का पोस्टमार्टम कर जो रिपोर्ट दी, उस में उन्होंने साफ लिखा था कि शमा एक किन्नर थी और उस की मौत गला घोंटने और गरदन पर कोई तेज नुकीली चीज के वार से हुई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस ने नरेंदर की तलाश शुरू कर दी. इस के लिए पुलिस की टीमें लगातार छापेमारी कर रही.

खास मुखबिर भी नरेंदर की तलाश में दिनरात एक किए हुए थे. 7 जुलाई 2017 को एक मुखबिर ने सूचना दी कि नरेंदर अपनी मां के साथ दिल्ली के सब्जीमंडी क्षेत्र में छिपा हुआ है.

सूचना मिलते ही पुलिस टीम दिल्ली रवाना हो गई और मुखबिर द्वारा बताए पते पर दबिश दे कर नरेंदर को गिरफ्तार कर के दिल्ली से जालंधर ले आई. उस समय वहां उस की मां मौजूद नहीं थी.

नरेंदर को अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया पर रिमांड अवधि में उस ने अपना मुंह नहीं खोला. तब 10 जुलाई को उसे फिर से अदालत में पेश कर 3 दिन के रिमांड पर ले कर सख्ती से पूछताछ की गई.

आखिर उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही शमा की हत्या की थी. पुलिस अधिकारियों के सामने अपनी कहानी बताते हुए वह जोरजोर से दहाड़ें मार कर रोने लगा. उस ने उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

नरेंदर अपनी मां के साथ दिल्ली में रह रहा था और औटो चला कर अपना गुजारा कर रहा था, जबकि शमा जालंधर में आर्केस्ट्रा का काम करते हुए अपनी मां और भाईबहनों के साथ रह रही थी. इत्तफाक से दिल्ली में नरेंदर की मां बीमार रहने लगी थी उस की सेवा के लिए नरेंदर का काम प्रभावित होने लगा था.

मां के इलाज पर भी काफी खर्च आ रहा था. ऐसे में जालंधर में रहने वाले नरेंदर के भाई सुरेंदर ने उसे सलाह दी कि वह मां को ले कर जालंधर चला आए. दोनों भाई मिल कर मां का इलाज भी करवा लेंगे और कामधंधा भी प्रभावित नहीं होगा.

भाई की सलाह मान कर नरेंदर मां को साथ ले कर दिल्ली छोड़ कर जालंधर की बस्ती शेख में किराए का कमरा ले कर रहने लगा यहां भी उस ने औटो चलाना शुरू कर दिया था.

यह लगभग 3 महीने पहले की बात है. तब तक न शमा जानती थी कि नरेंदर इन दिनों जालंधर में है और न ही नरेंदर यह बात जानता था कि शमा अब जालंधर में रहती है. नरेंदर शमा को एक दु:स्वप्न समझ कर पूरी तरह भुला चुका था.

30 अप्रैल, 2017 की बात है. उस दिन शाम के समय शमा को नरेंदर के चाचा का लड़का छिंदा बाजार में मिल गया था. दोनों बड़े दिनों बाद मिले थे, इसलिए भीड़ से हट कर आपस में बातें करने लगे. बातोंबातों में छिंदा ने उसे बता दिया कि आजकल नरेंदर भाई भी यहीं रह रहे हैं. शमा ने छिंदा से नरेंदर का फोन नंबर ले लिया.

अगले दिन शमा ने नरेंदर को फोन कर के मिलने की इच्छा जताई तो पहले नरेंद्र ने मिलने से इनकार कर दिया. उस ने कहा, ‘‘अब हमारे बीच कुछ नहीं बचा है, मैं तुम्हें भूल भी चुका हूं इसलिए मिलने का क्या फायदा?’’

‘‘सिर्फ एक बार मैं तुम से मिलना चाहती हूं.’’ शमा ने कहा तो वह तैयार हो गया. उसी दिन पहली मई को शमा रात करीब 8 बजे नरेंदर से मिलने उस के घर पहुंच गई.

शमा को देखते ही नरेंदर का खून खौल उठा. उस की आंखों के सामने बीते दिनों की बातें किसी चलचित्र की तरह दिखाई देने लगी थीं. बड़ी मुश्किल से उस ने अपने गुस्से पर काबू पाते हुए ठंडे लहजे में कहा, ‘‘शमा, तुम्हें यहां मेरे पास नहीं आना चाहिए था. याद है, मैं ने अलग होते समय तुम से क्या कहा था?’’

शमा मुसकरा कर बोली, ‘‘अभी भी गुस्सा हो मुझ से?’’

तभी नरेंदर ने कहा, ‘‘अच्छा, जो हुआ सो हुआ. शायद यही नियति ने लिखा था. अब एक काम करते हैं तुम आर्केस्ट्रा का काम छोड़ दो. हम दोनों अपने प्यार से मिल कर एक नई दुनिया बसाते हैं. रहा सवाल संतान का तो हम कहीं से कोई बच्चा गोद ले लेंगे.’’

‘‘नहीं नरेंदर, अब चाह कर भी मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती और न ही आर्केस्ट्रा का काम छोड़ सकती हूं. मेरे इसी काम से मेरे परिवार का खर्च चलता है. मैं उन्हें भूखा नहीं मार सकती.’’ शमा बोली.

नरेंदर को गुस्सा आ गया. वह उसे गालियां देते हुए बोला, ‘‘तो मेरे पास यहां क्या करने आई है? याद है, मैं ने क्या कहा था. जिस दिन तू मेरे सामने आएगी, मैं तुझे खत्म कर दूंगा.’’ नरेंदर ने उसे जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘मैं सब कुछ भूलभाल कर तुझे अपनाने को दोबारा तैयार हो गया और तू है कि अपने बहनभाई और रंडियों वाले नाचगाने का पेशा छोड़ने को तैयार नहीं है. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

कह कर नरेंदर वहां से उठ कर दूसरे कमरे में गया और अपनी मां को उठा कर जबरदस्ती बाथरूम में बंद कर दिया. इस के बाद वह शमा के पास पहुंचा और उसी के दुपट्टे से उस ने उस का गला घोंट दिया. कहीं वह जिंदा न रह जाए, यह सोच कर उस ने एक तेजधार चाकू का भरपूर वार शमा की गरदन पर किया था.

उस की हत्या करने के बाद उस ने बाथरूम का दरवाजा खोल कर अपनी मां को बाहर निकाला. मां सुदेश ने बाहर आ कर जब शमा की लाश देखी तो उसे माजरा समझते देर नहीं लगी. सुदेश ने नरेंदर को काफी भलाबुरा कहा. पर अब कुछ नहीं हो सकता था. इस के बाद वह मां को ले कर दिल्ली चला गया. पर पुलिस ने उसे वहीं से ढूंढ निकाला.

उस की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू भी बरामद कर लिया. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद उसे अदालत में पेश किया गया और अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक सुदेश गिरफ्तार नहीं हो सकी थी.

-कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चाओं पर आधारित

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें