काले धन का नया झांसा

भारत में लोकसभा चुनाव का प्रचार जब अपनी हद पर था, तो 6 मई, 2024 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में कहा था, ‘‘मैं भ्रष्टाचार से लूटे गए गरीबों के धन को वापस करने के बारे में कानूनी सलाह ले रहा हूं. मेरा ध्यान मेरे लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अपशब्दों पर नहीं, बल्कि उन गरीब लोगों पर है, जिन का धन लूटा गया है. इस के लिए कानूनी सलाह ली जा रही है कि वह धन गरीबों को वापस कैसे किया जा सकता है.’’

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहते हुए सीधेसीधे यह बात मान ली है कि दुनिया की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद भी देश में इफरात से गरीब और गरीबी है.

दूसरी बात यह कि 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के फैसले के समय नरेंद्र मोदी की ही की गई यह घोषणा भी खोखली निकली कि इस से देश में काला धन खत्म हो जाएगा.

इसी से जुड़ी तीसरी अहम बात यह कि 10 साल में काले धन को बंद करने के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं, उलटे, यह दिनोंदिन बढ़ ही रहा है. इस के लिए उन्होंने जो कुछ कर रखा है, वह अभी किसी को नजर नहीं आएगा. हां, जिस दिन जनता उखाड़ फेंकेगी, उस दिन जोजो सामने आएगा, उस की भी कल्पना हर कोई नहीं कर सकता.

चौथी और असल बात यह थी कि 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन और दूसरी योजनाओं के जरीए इमदाद देने के बाद भी भाजपा को उम्मीद के मुताबिक वोट और सीटें नहीं मिल रही हैं, इसलिए वोटों के लिए वही लालच दिया जा रहा है, जो आज से 10 साल पहले दिया गया था कि देश में इतना काला धन है कि उसे पकड़ कर हरेक के खाते में 15-15 लाख डाल दूंगा.

नरेंद्र मोदी के इस ?ांसे से लोगों को कोई खास खुशी नहीं हुई, क्योंकि वे एक बार नहीं, बल्कि कई बार ऐसे धोखे पिछले 10 साल में खा चुके हैं.

इत्तिफाक से इसी दिन झारखंड के ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर के पीएस संजीव लाल के नौकर जहांगीर आलम के यहां से तकरीबन 35 करोड़ रुपए की नकदी बरामद हुई थी, जिसे चारा बना कर जनता के सामने उन्होंने पेश किया कि इस पैसे पर पहला हक तुम्हारा है, जो तुम्हें दिया भी जा सकता है, लेकिन इस के लिए जरूरी है कि मुझे तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाओ.

अब इस इत्तिफाक में लोग भाजपा सरकार का यह रोल भी देख रहे हैं कि कहीं यह उस का ही कियाधरा तो नहीं. वजह, आजकल सबकुछ मुमकिन है और चुनाव जीतने के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं. यह पैसा ईमान का था या बेईमानी का, इस बारे में कोई भी दावे से कुछ नहीं कह सकता. इस में हैरानी की एकलौती बात यह है कि इसे संभाल कर कमरे में रखा गया था यानी इसे कभी न कभी खर्च किया जाता, जिस से यह बाजार में आता.

मंदिरों में तो जाम है पैसा

जो नकदी झारखंड से बरामद हुई, वह उन पैसों के आगे कुछ नहीं है, जो मंदिरों में जाम पड़ा है. तथाकथित भ्रष्टाचार का पैसा अगर गरीबों का है, तो मंदिरों में सड़ रहा खरबों रुपया किस का है, प्रधानमंत्री कभी इस पर क्यों नहीं बोलते? क्या यह पैसा भी लूट का नहीं, जो लोकपरलोक सुधारने व मोक्षमुक्ति वगैरह के नाम पर पंडेपुजारियों द्वारा झटका जाता है? यह पैसा क्यों गरीबों में नहीं बांट दिया जाता, जिस के लिए किसी कानूनी सलाह की भी जरूरत नहीं?

गरीबों के लिए दुबलाए जा रहे प्रधानमंत्री चाहें तो एक झटके में देश से गरीबी दूर हो सकती है, उन्हें बस मंदिरों का पैसा गरीबों में बांटे जाने का हुक्म देना भर है, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं, क्योंकि सत्ता गरीबों के वोट से ही मिलती है.

एक दफा लोकतंत्र खत्म हो जाए, संविधान मिट जाए, लेकिन गरीबी पर आंच नहीं आनी चाहिए. जवाहरलाल नेहरू से ले कर इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी से ले कर मनमोहन सिंह की सरकारों ने भी गरीबी दूर करने की सिर्फ बातें की थीं, गरीबी हटाओ के लुभावने नारे दिए थे, लेकिन इसे दूर करने को कुछ ठोस नहीं किया था. यही नरेंद्र मोदी कर रहे हैं.

फंडा बहुत सीधा है कि जब तक धर्म और धर्मस्थल हैं, तब तक गरीबी दूर नहीं हो सकती. इन के चलते गरीब निकम्मा, निठल्ला और भाग्यवादी बना रहता है. वह मेहनत भी कामचलाऊ करता है और जब पेट पीठ से चिपकने लगता है, तो सरकार अपने गोदामों के शटर उठा देती है, जिस से वह भूखा न मरे.

देश के लिए तो वह किसी काम का नहीं, लेकिन धर्म के लिए उसे जिंदा रखा जाता है. वैसे भी मंदिरों के पैसों पर हक भाजपा का ही है, जिसे सलामत रखने की बाबत वह पंडेपुजारियों को पगार और कमीशन देती है, एवज में भगवान के ये एजेंट भाजपा के लिए वोटों की दलाली करते हैं. इन के कोई उसूल नहीं होते. एक वक्त में यही काम ये लोग कांग्रेस के लिए भी करते थे. इन का भगवान सिर्फ बिना मेहनत से आया पैसा होता है, जो इन दिनों मोदी सरकार उन्हें दरियादिली से दिला रही है.

जब पैसे वालों को तसल्ली हो जाती है कि गरीब हैं और गरीबी किसी सरकार की देन नहीं, बल्कि इन के पिछले जन्मों के पापों का फल है, तो वह दान की, पूजापाठ की तादाद बढ़ा देता है, ताकि अगले जन्म में वह गरीबी में पैदा न हो.

ऐसे में छापों के पैसों से गरीबी दूर करने का झांसा देना एक बड़ी चालाकी है. बात तो तभी बन सकती है, जब मंदिरों के खजानों का मुंह गरीबों के लिए खोल दिया जाए.

देश के मंदिरों के पैसे की थाह लेना आसान नहीं है, लेकिन यह हर कोई जानता है कि उन में अथाह धन है. हाल तो यह है कि एक अकेले तिरुपति मंदिर की जायदाद से ही गरीबी दूर हो सकती है. कुबेर के इस रईस मंदिर के ट्रस्ट के मुताबिक, बैंकों में 16,000 करोड़ रुपए की एफडी हैं, जिन का ब्याज ही करोड़ों में होता है. देशभर में मंदिर ट्रस्ट की 960 प्रोपर्टी हैं, जिन की कीमत भी अरबों रुपए में है.

मंदिर के पास 11 टन सोना है और तकरीबन ढाई टन सोने के गहने हैं. साल 2022-23 में ही जमा पैसे पर 3,100 करोड़ रुपए ब्याज में मिले थे और रोज करोड़ों का चढ़ावा बदस्तूर आ ही रहा है.

अगर इस में अयोध्या, काशी, शिरडी, वैष्णो देवी, उज्जैन सहित चारों धामों का भी पैसा मिला दिया जाए, तो देश में अमीरों की भरमार हो जाएगी. लेकिन फिर वे भाजपा को वोट नहीं देने वाले, क्योंकि फिर उन्हें धर्म की जरूरत नहीं रह जाएगी और भाजपा को इस के सिवा कुछ और आता नहीं, जो पूरे चुनाव प्रचार में मुसलिमों का डर दिखाते रामश्याम और राधेराधे करती रही. उस का मकसद पंडेपुजारियों की आमदनी पक्की करना है.

पब्लिक मीटिंगों में विपक्षियों को कोसते रहना नरेंद्र मोदी की कोई सियासी मजबूरी नहीं, बल्कि चालाकी है कि ये अगर सत्ता में आए, तो मुफ्त की तगड़ी कमाई वाला धर्म और मंदिर खत्म कर देंगे, फिर सब बैठ कर चिमटा हिलाते रहना. अगर इस पैसे की, इस सनातनी सिस्टम की हिफाजत चाहते हो, तो मुझे वोट दो, मैं गरीबी बनाए रखूंगा, यह मेरी गारंटी है.

अरविंद केजरीवाल की जमानत और अदालतों की मजबूरी

सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को 20 दिन की कई शर्तों के बाद जो जमानत दी है वह यह नहीं दिखाती कि देश में अभी भी कानून का राज है और कोई मनमानी नहीं कर सकता. यह जमानत सिर्फ यह दिखाती है कि सरकार के आगे सुप्रीम कोर्ट भी कितनी कमजोर है कि वह एक चुने हुए जिम्मेदार मुख्यमंत्री को सिर्फ बेईमान गवाहों के बयानों पर गिरफ्तार किए जाने पर भी जमानत जैसा मौलिक हक नहीं दे सकती.

जो हाथ सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में बंधे दिख रहे हैं, वे हर अदालत में दिखते हैं. हर मजिस्ट्रेट पुलिस के कहने पर हर ऐसे व्यक्ति को जेल भेज देता है जिस के खिलाफ पुलिस ने या किसी और ने कोई एफआईआर कराई हो. 5-7 साल बाद जब मामले का फैसला आता है तो 80 प्रतिशत मामलों में तो पहला जज ही इन आरोपियों को बेगुनाह कह देता है क्योंकि पुलिस ने जब उन्हें पकड़ा था तो उस के पास कोई सुबूत नहीं था.

केवल राजनीति वाले मामलों में सत्ता में बैठी सरकार के इशारे पर पहली अदालत सजा देती है पर उन में से भी बहुत से छूट जाते हैं. आपसी मारपीट, रंजिश, सरेआम हत्या, हत्यारे का खुद गुनाह मान लेने जैसे मामलों में सही सजा सुनाई जाती है. ज्यादातर मामले जो पुलिस वाले या सरकारी अफसर कानून तोड़ने पर दायर करते हैं, उन में न गवाह होते हैं, न सुबूत होते हैं पर महीनों हो सकता है किसी को जेल में रहना पड़ा हो क्योंकि जमानत नहीं मिली.

इस मामले में जिस में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन को जेल में बंद किया, यह शक है कि उन्होंने शराब नीति में हेरफेर कर के जनता या सरकार के पैसे को हड़पा है. ऐसे मामलों में जमानत पर छोड़ देने से भी काम चल जाता पर अदालतें सरकारों की शक्ल देख कर जमानत नहीं देतीं.

2012 से 2014 तक भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर हिसाबकिताब को परखने वाले विनोद राय ने कितने ही मंत्रियों को जेल भिजवा दिया और महीनों उन्हें जमानत नहीं मिली. बाद में एक भी मामले में कोयला घोटाले या 2जी घोटाले में कोई गुनाहगार नहीं पाया गया पर कइयों को महीनों, सालों जेल में गुजारने पड़े. आम आदमियों की हालत तो इस से भी बुरी होती है.

मिलावट करने, जमाखोरी करने, इनकम टैक्स या सेल्स टैक्स में गड़बड़ करने के शक, मकान समय पर बना कर न देने जैसे गुनाहों में एफआईआर करा दी जाती है और पुलिस के कहने पर मजिस्ट्रेट जमानत नहीं देते. उन्हें जमानत न देने का बल सुप्रीम कोर्ट के ऐसे ही मामलों से मिलता है.

मजेदार बात यह है कि लगभग हर जज अपने कैरियर में 4-5 फैसलों में लिखता है कि लोगों की आजादी सब से बड़ी चीज है और कानून का सिद्धांत है कि बेल नौट जेल माना जाए. पर असल में होता उलटा ही है. अरविंद केजरीवाल को 2 जून को जेल में लौटना होगा, यह आदेश दे कर सुप्रीम ने कहा है कि जिस पर शक हो उसे जमानत न दो, महीनों रखो, छोड़ना है तो इस मामले की तरह 10-20 दिन के लिए छोड़ो, जैसे पैरोल दी जाती है.

दिक्कत यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इतनी छूट तो दे दी पर पहला मजिस्ट्रेट इतना रिस्क भी नहीं लेता और जैसा पुलिस वाले या पब्लिक प्रोसिक्यूटर कहता है, मान लेता है. पुलिस के पास इसी से अपार ताकत है और तभी कांस्टेबल की कुछ नौकरियों के लिए भी लाखों कैंडीडेट खड़े हो जाते हैं. देश का आम गरीब जो महंगा वकील नहीं कर सकता जरा सी गलती पर महीनों जेल में सड़ सकता है जबकि उस पर गुनाह साबित भी नहीं हुआ हो.

लोकसभा चुनाव : मुसलिम वोटरों की खामोशी क्यों

सा ल 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए सभी दल एड़ीचोटी का जोर लगा रहे हैं, मगर जीत का सेहरा किस के सिर बंधेगा, यह बड़ेबड़े राजनीतिक जानकार भी नहीं भांप पा रहे हैं. दलितों और मुसलिमों को साधने की कोशिश तो

सब की है, लेकिन उन के मुद्दे सिरे से गायब हैं. तीन तलाक को खत्म कर के भाजपा की मोदी सरकार मुसलिम औरतों की नजर में हीरो बनी थी, लेकिन अब चुनाव के वक्त तीन तलाक खारिज करने का गुणगान कर के वह मुसलिम मर्दों को भी नाराज नहीं कर सकती.

औरतें वोट डालने जाएं या न जाएं, ज्यादातर मुसलिम परिवारों में यह बात मर्द ही तय करते हैं. यही वजह है कि भाजपा की चुनावी रैलियों में तीन तलाक किसी नेता के भाषण का हिस्सा नहीं है.

उधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव मुसलिमों के दिल में जगह बनाने लिए पिछले दिनों  बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी की मौत के बाद उन के घर तक जा पहुंचे थे. उन की मौत का गम मनाया था. उस के बाद मुसलिम वोट साधने के लिए लखनऊ के कई नवाबी खानदानों से भी मुलाकातें की थीं, ईद की सेवइयां चखी थीं, लेकिन इन कवायदों

का आम मुसलिम पर कितना असर होगा, वह जो बिरयानी का ठेला लगाता है या साइकिल का पंचर जोड़ता है या सब्जी बेचता है या फिर काश्तकारी करता है, इस का अंदाजा अखिलेश यादव खुद नहीं लगा पाए थे.

असल माने में तो वोट देने वाला यही तबका है. नवाबी खानदानों से तो एकाध कोई वोट डालने बूथ तक जाए तो जाए. अब कांग्रेस की बात करें तो वह अगर मुसलिमों के लिए कोई बात करती है, तो भाजपाई नेता सीधे गांधी परिवार पर हमलावर हो उठते हैं और उसे मुसलिम बताने लगते हैं, इसलिए कांग्रेस भी मुसलिमों और उन के मुद्दों को ले कर तेज आवाज में नहीं बोल रही है.

एक तरफ राजनीतिक दल पसोपेश में हैं कि मुसलिम किस के कितने करीब हैं, दूसरी तरफ मुसलिम अपने वोट को ले कर खामोशी ओढ़े हुए हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलिम बहुल इलाकों में भी खामोशी पसरी हुई है. इस खामोशी में किस की जीत छिपी है, यह वोटिंग का नतीजा आने के बाद ही पता चल सकेगा.

कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने मदरसा शिक्षा पर रोक लगाने की कोशिश की थी और राज्यभर के सभी 16,000 मदरसों के लाइसैंस रद्द कर दिए थे. मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने ‘यूपी बोर्ड औफ मदरसा ऐजूकेशन ऐक्ट 2004’ को असंवैधानिक करार देने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के 22 मार्च, 2024 के फैसले पर रोक लगा दी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से 17 लाख मदरसा छात्रों पर असर पड़ेगा और छात्रों को दूसरे स्कूल में ट्रांसफर करने का निर्देश देना उचित नहीं है.

मदरसे बंद करने के योगी सरकार की कोशिश पर सरकार में मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने सफाई पेश की. उन्होंने कहा कि सरकार चाहती थी कि मुसलिम बच्चों को भी उसी तरह सरकारी स्कूलों में हिंदी, इंगलिश, साइंस, भूगोल, इतिहास, कंप्यूटर वगैरह की तालीम मिले, जैसी हिंदू और दूसरे धर्मों के बच्चों को मिलती है. बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए मदरसा तालीम को कमतर किया जा रहा था.

बेहतर तालीम मुसलिम नौजवानों को मिले, इस के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में योगी सरकार हमेशा पौजिटिव काम करती रही है. मगर सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करेगी.

सरकार की एकतरफा कार्यवाही

वहीं दूसरी ओर इस मामले में मुसलिम धर्मगुरुओं और नेताओं की कई प्रतिक्रियाएं आईं. मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया. मुसलिमों के कई बड़े रहनुमाओं ने सुप्रीम कोर्ट का शुक्रिया अदा किया कि उस ने मदरसा तालीम को बरकरार रखा.

केंद्रीय स्कूल के शिक्षक मोहम्मद अकील कहते हैं, ‘‘मदरसों में बहुत गरीब मुसलिम परिवारों के बच्चे पढ़ने जाते हैं. मुसलिम यतीमखानों के बच्चे भी वहां पढ़ते हैं. वहां उन को दोपहर का भोजन मिल जाता है. किताबें और कपड़े मिल जाते हैं.

‘‘ज्यादातर बच्चों के परिवार इतने पिछड़े, गरीब और अनपढ़ हैं कि वे अपने बच्चों को दीनी तालीम और एक वक्त की रोटी के नाम पर मसजिदमदरसों में तो भेज देंगे, मगर किसी सरकारी स्कूल में नहीं भेजेंगे.

‘‘वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजने को तैयार हों, इस के लिए पहले सरकार इन परिवारों की काउंसलिंग करे, इन की जिंदगी को सुधारे, उन में तालीम की जरूरत की सम?ा पैदा करे, फिर उन के बच्चों को मदरसा जाने से रोके और सरकारी स्कूल में दाखिला दे.

‘‘ऐसे ही एक आदेश पर मदरसे बंद कर देने से आप इन बच्चों के मुंह से एक वक्त की रोटी भी छीने ले रहे हैं. सरकार का यह कदम बहुत ही गलत है. उस

को पहले हिंदुओं के गुरुकुल बंद करने चाहिए, फिर मदरसों की ओर देखना चाहिए.’’

भाजपा सरकार की मदरसा नीति पर भी मुसलिम तबका बंटा हुआ है. हो सकता है कि सरकार की मंशा मुसलिम बच्चों को बेहतर तालीम देने की हो मगर ज्यादातर इस कदम को मुसलिमों पर हमले के तौर पर ही देख रहे हैं. ऐसे में भाजपा से मुसलिम तबका इस वजह से भी छिटक गया है.

बीते रमजान के आखिरी पखवारे में हिंदुओं का नवरात्र भी शुरू हो गया था. उन के भी व्रत थे. लिहाजा, सरकार ने मीटमछली की दुकानें बंद करवा दीं. यहां तक कि ठेलों पर बिरयानी बेचने वालों को भी घर बिठा दिया गया. ईद के दिन 90 फीसदी मीट की दुकानें बंद थीं. कई मुसलिम घरों में बिना नौनवैज के ईद मनी.

मुसलिम तबके ने कोई शिकायत नहीं की, मगर कांग्रेस के समय को जरूर याद किया. ऐसा अनेक बार हुआ होगा, जब ईद और नवरात्र इकट्ठे पड़े, लेकिन कांग्रेस के वक्त ईद के रोज मीट की दुकानें बंद नहीं हुईं.

पश्चिम बंगाल में सालोंसाल मछली बिकती है, फिर चाहे नवरात्र हों या दीवाली, क्योंकि वहां के हिंदुओं का मुख्य भोजन मछली है. आखिर जिस का जैसा खानपान है, वह तो वही खाएगा, उस पर रोकटोक करने वाली सरकार कौन होती है?

मगर भाजपा सरकार मुसलिमों के खानपान पर बैन लगाने में उस्ताद है. हलाल और झटके के मामले में भी उस ने मुसलिमों को परेशान किया. ऐसे में उन के वोट भाजपा को कैसे मिल सकते हैं.

कम होते मुसलिम नुमाइंदे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जहां से सब से ज्यादा मुसलिम प्रतिनिधि संसद पहुंचते रहे हैं, उस मुसलिम बहुल इलाके में भी खामोशी है. साल 2013 के सांप्रदायिक दंगों के बाद हुए ध्रुवीकरण के माहौल

में साल 2014 के चुनाव में इस इलाके से एक भी मुसलिम प्रतिनिधि नहीं चुना गया.

साल 2019 में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने मिल कर चुनाव लड़ा, तो 5 मुसलिम सांसद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटों से जीत कर संसद पहुंचे थे. सहारनपुर से हाजी फजलुर रहमान, अमरोहा से दानिश अली, संभल से

डा. शफीकुर्रहमान बर्क, मुरादाबाद से एसटी हसन और रामपुर से आजम खान ने जीत दर्ज की थी.

लेकिन साल 2024 का चुनाव आतेआते राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ ‘इंडिया’ गठबंधन में है, राष्ट्रीय लोकदल अब भाजपा के साथ है और बहुजन समाज पार्टी अकेले चुनाव लड़ रही है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नए बदले समीकरणों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मुसलिम सांसद फिर से चुन कर संसद पहुंच पाएंगे? यह सवाल और गंभीर तब हो जाता है, जब कई मुसलिम बहुल सीटों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मुसलिम उम्मीदवार आमनेसामने हैं.

सहारनपुर में कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद हैं, तो बहुजन समाज पार्टी ने माजिद अली को टिकट दिया है. वहीं, अमरोहा में मौजूदा सांसद दानिश अली इस बार कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं और बसपा ने मुजाहिद हुसैन को उम्मीदवार बनाया है.

संभल में सांसद रह चुके और अब इस दुनिया में नहीं रहे डा. शफीकुर्रहमान बर्क के पोते जियाउर्रहमान बर्क को समाजवादी पार्टी ने टिकट दिया है, तो बसपा ने यहां सौलत अली को उम्मीदवार बनाया है.

मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी ने मौजूदा सांसद एसटी हसन का टिकट काट कर रुचि वीरा को उम्मीदवार बनाया है, जबकि यहां बसपा ने इरफान सैफी को टिकट दिया है.

रामपुर में आजम खान जेल में हैं. समाजवादी पार्टी ने यहां मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी को टिकट दिया है, जबकि बसपा से जीशान खां मैदान में हैं. कई सीटों पर मुसलिम उम्मीदवारों के आमनेसामने होने की वजह से यह सवाल उठा है कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश से एक बार फिर मुसलिम प्रतिनिधि चुन कर संसद पहुंच सकेंगे?

संसद में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार घटता जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में ऐसा माहौल बनाया गया है कि जहां कोई मुसलिम उम्मीदवार होता है, वहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की साजिश की जाती है. यह बड़ा सवाल है कि देश की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है.

भारतीय जनता पार्टी नारा देती है कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’, लेकिन असल में इस का मतलब है ‘विपक्ष मुक्त भारत’ और ‘मुसलिम मुक्त विधायिका’. मुसलिम भाजपा की सोच से वाकिफ हैं. वे खामोश हैं, मगर उन की खामोशी का यह मतलब नहीं कि सरकार बनाने या बिगाड़ने में उस का रोल नहीं होगा.

लोकसभा चुनाव : क्या औरतों के रहमोकरम पर हैं मर्द नेता?

चुनाव जैसे ही नजदीक आते हैं, सभी पार्टियां जीतने के लिए बड़ेबड़े वादे करती हैं. 13 मार्च, 2024 को कांग्रेस ने औरतों के लिए ‘नारी न्याय गारंटी’ योजना का ऐलान किया. बताया गया कि यह पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा भी है. इस व दूसरे और वादों को राहुल गांधी ने अनाउंस किया.

‘नारी न्याय गारंटी’ योजना का वादा तो खासकर औरतों की आर्थिक व सामाजिक बैकग्राउंड को मजबूत करने को ले कर था, जिस में 5 बिंदु रखे गए :

– देश की गरीब औरतों को सालाना एक लाख रुपए की माली मदद.

– केंद्र सरकार की नई नियुक्तियों में 50 फीसदी औरतों को हक.

– आंगनबाड़ी, आशा और मिड डे मील वर्कर्स के मासिक वेतन दोगुने.

– हर पंचायत में औरतों की जागरूकता के लिए कानूनी सहायक की नियुक्ति.

– हर जिले में औरतों के लिए कम से कम एक होस्टल.

एक तरह से देखा जाए तो ये वादे अपनेआप में खासा दिलचस्प हैं, क्योंकि जिस तरह संपत्ति और तमाम हकों पर मर्दों का कब्जा है, उसे एक हद तक बैलेंस करने के लिए इस तरह के काम किए जाने जरूरी हैं.

दूसरे, यह जरूरी इसलिए भी है कि आज आम लोगों के पास परचेजिंग पावर कम हो रही है. मार्केट में वैल्थ सर्कुलेशन हो नहीं पा रहा है. पैसा कुछ खास लोगों के हाथों में ही सिमट रहा है.

ऐसे में गरीबों को डायरैक्ट कैश ट्रांसफर से देश की अर्थव्यवस्था को चलाए रखना बेहद जरूरी भी है. पर समस्या यह कि इस तरह के बड़े वादे अकसर डूबते खेमे से ही आते हैं, जिस पर बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं लगाई जा सकतीं.

हालांकि इस से एक सवाल तो बनता ही है कि आजादी के 75 साल बाद भी ऐसी नौबत क्यों है कि पक्षविपक्ष द्वारा औरतों के लिए ऐसे वादे करने पड़ रहे हैं? आखिर क्यों देश की आधी आबादी यानी औरतों को लुभाने के लिए चुनावी पार्टियों को तरहतरह के वादे करने पड़ रहे हैं?

इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 मार्च, 2024 को सिलैंडर पर 100 रुपए की छूट देने का ऐलान किया. अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा की तरफ से कहा गया है कि वह जीतने के बाद

सभी बीपीएल परिवारों की छात्राओं को केजी से पीजी तक मुफ्त तालीम का फायदा देगी.

पीएम उज्ज्वला योजना में औरतों को 450 रुपए में सिलैंडर दिया जाएगा.

15 लाख ग्रामीण औरतों को लखपति योजना के  तहत कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा. एक करोड़, 30 लाख से ज्यादा औरतों को माली मदद के साथसाथ आवास का फायदा मिलेगा. बीपीएल परिवारों की लड़कियों को 21 साल तक कुल 2 लाख रुपए का फायदा दिया जाएगा.

हालांकि सवाल यह भी है कि भाजपा की घोषणाओं से कितनी उम्मीद लगाई जाए? साल 2014 से पहले भाजपा ने ‘अच्छे दिन’, ‘हर साल 2 करोड़ नौकरियां’, ‘महंगाई कम करने’, ‘काला धन वापस लाने’ और ‘हर किसी के बैंक अकाउंट में 15 लाख रुपए डालने’ जैसे तमाम वादे किए थे. हालांकि, चुनाव के बाद सवाल पूछा गया, तो तब के भाजपा अध्यक्ष व वर्तमान में गृह मंत्री अमित शाह ने इसे चुनावी जुमला बता दिया था.

चुनाव में औरतों को लुभाने के लिए राष्ट्रीय पार्टियां ही कोशिश नहीं कर रही हैं, बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी वादे कर रही हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्विटर हैंडल से 4 मार्च, 2024 को ट्वीट करते हुए कहा, ‘महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आप की दिल्ली सरकार ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अब महिलाओं को सालाना 12,000 रुपए की सौगात दी है. 18 साल से अधिक उम्र की हमारी सभी बहनबेटियों, माताओं और बहनों को अब मुख्यमंत्री सम्मान योजना के तहत 1,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे.’

इसी तरह तमिलनाडु में भी द्रविड़ मुनेत्र कषगम सरकार व पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार हर महीने 1,000 रुपए डायरैक्ट ट्रांसफर कर रही हैं. तकरीबन सभी पार्टियां औरतों के लिए जरूरी घोषणाएं कर रही हैं.

यह सोचा जा सकता है कि अचानक इन पार्टियों में औरतों के प्रति ऐसा रु?ान क्यों होने लगा? इस की वजह पिछले एक दशक में औरतों के चुनावी भागीदारी में बड़ा बदलाव आना है. वे सब से बड़ा वोट बैंक बन कर उभरी हैं. इतना ही नहीं, विधानसभा चुनाव में बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में औरतों ने पिछले कुछ चुनावों में मर्दों से ज्यादा वोट डाले.

लोकसभा से ले कर विधानसभा चुनाव तक सभी जगह इन की वोटिंग में 10 से 15 फीसदी तक का भारी इजाफा देखने को मिला है. इसे इन आंकड़ों से सम?ाते हैं कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मर्द और औरत वोटरों के वोटिंग फीसदी में सिर्फ डेढ़ फीसदी का फर्क था, जबकि साल 2019 में वे मर्दों से आगे निकल गईं. साल 2019 के चुनाव में मर्दों का वोटिंग फीसदी जहां 67.02 था, वहीं औरतों का 67.18 फीसदी था.

इस बढ़ते ट्रैंड और औरतों को ले कर हो रही घोषणाओं से ऐसा लग रहा है कि साल 2024 के चुनाव में औरत वोटरों की तादाद पिछली बार की तुलना में ज्यादा होगी. चुनाव आयोग के मुताबिक, साल 2024 के चुनाव में कुल 96.8 करोड़ वोटर हिस्सा ले सकते हैं. इन में 49.7 करोड़ मर्द और 47.1 करोड़ औरत वोटरों के होने का अंदाजा है.

खासकर, ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन की तादाद और भी बढ़ी है. आज किसी भी पार्टी की सियासत को ऊपर या नीचे करने में औरत वोटर बड़ा रोल निभा रही हैं. कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में रहने की एक बड़ी वजह औरतें ही हैं. यही वजह भी है कि केंद्र से ले कर राज्य सरकारों में सरकार चला रही पार्टियां औरतों के लिए कई खास योजनाएं व घोषणाएं कर रही हैं.

अगर इस का क्रेडिट साल 2005 में आए मनरेगा ऐक्ट व पैतृक संपत्ति पर बेटी के अधिकार और साल 2009 में मिले शिक्षा के अधिकार जैसे अधिकारों को दिया जाए, जिन्होंने औरतों को आगे बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया तो गलत न होगा, क्योंकि इन अधिकारों ने निचले से निचले तबके को छूने की कोशिश की, जिन में दोयम दर्जे में औरतें ही थीं.

एक तरह से औरतों के लिए ये नीतियां संजीवनी बूटी बन कर आईं, जिन्होंने उन्हें राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग और अपने हकों के लिए लड़ना सिखाया, उन के हाथों में थोड़ीबहुत आर्थिक ताकत देने की कोशिश की, सही माने में अपने पैरों पर खड़ा करने में योगदान दिया.

मगर इस के बावजूद अगर साल 2024 के चुनावों में औरतों के लिए स्पैशल घोषणाएं की जा रही हैं, तो यह जरूर सोचा जा सकता है कि आज भी औरतें उस लैवल पर नहीं पहुंच पाई हैं जहां उन्हें होना चाहिए था.

आज भी सारी आर्थिक और कानूनी ताकत मर्दों के हाथों में हैं. इस की पुष्टि वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी की गई नई रिपोर्ट ‘वीमेन, बिजनैस ऐंड द ला’ और उस के आंकड़े भी करते हैं.

इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि काम करने वाली जगह पर औरतों और मर्दों के बीच का फर्क पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ा है, वहीं जब हिंसा और बच्चों की देखभाल से जुड़े कानूनी मतभेदों को ध्यान में रखा जाता है, तो औरतों को मर्दों की तुलना में दोतिहाई से भी कम हक हासिल हैं.

हैरानी यह है कि दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जो इस गैरबराबरी से अछूता हो, यहां तक कि दुनिया की अमीर अर्थव्यवस्थाएं भी इस फर्क को दूर करने में कामयाब नहीं हो पाई हैं. भारत में मामला गंभीर है, क्योंकि यहां लैंगिक गैरबराबरी दुनिया के कई देशों के मुकाबले बेहद खराब हालत में है.

‘वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट 2023’ में भारत का नंबर 146 देशों में शर्मनाक 127वें नंबर पर है. भारत के कामकाजी और बड़े पदों पर गैरबराबरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संसद में औरतों की भागीदारी महज 14 फीसदी है, वहीं देश के कुल 119 अरबपतियों की लिस्ट में महज 9 औरतें अरबपति हैं.

आंकड़े साफ करते हैं कि मर्दों के पास औरतों के मुकाबले ज्यादा मौके हैं, वरना देश की कामकाजी औरतों की भागीदारी महज 23 फीसदी और मर्दों की 72 फीसदी न होती.

यानी, देखा जाए तो 50 फीसदी औरतें चुनावी घोषणाएं करने वाली पार्टियों के मुखिया से ले कर संसद में चुने गए मर्द नेताओं के रहमोकरम पर हैं, जो औरतों के लिए गुलामी से कम नहीं.

नेताओं की नेतागीरी में मोहरा बनते ‘स्कूली बच्चे’

क्या देश अभी भी लकीर का फकीर बना हुआ है? क्या यह सोच भारत के जनमानस में अभी भी नहीं पहुंची है कि कम से कम 12 साल से छोटे बच्चों के साथ हमें कैसा कोमल बरताव करना चाहिए? क्या सिर्फ अपनी नौकरी बचाने और नेताओं के इशारे पर हर उस गलत चीज को भी हम सिर झुका कर आसानी से मान लेते हैं और कोई भी हुक्म बजा लाते हैं?

इस का सब से बड़ा उदाहरण हैं प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्रियों के आने पर स्कूल के बच्चों को उन की रैलियों में, सभाओं में ले जाने का काम स्कूल मैनेजमैंट खुशी या मजबूर हो कर करने लगता है. सम?ाने वाली बात यह है कि निजी स्कूल ऐसा क्यों नहीं करते और सरकारी स्कूलों के बच्चों को आननफानन स्कूल ड्रैस में सभा में भीड़ बढ़ाने के लिए ले जाया जाता है? इसे बच्चों के साथ क्रूरता और अपराध की कैटेगिरी में रखा जाना चाहिए.

सवाल यह भी है कि अगर कहीं ऐसे हालात में कोई हादसा हो जाए, तो उस का जिम्मेदार कौन होगा? यह भी तय करने की जरूरत है.

तमिलनाडु के कोयंबटूर जिला शिक्षा अधिकारी ने कोयंबटूर में भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में स्कूली बच्चों की भागीदारी पर जांच के आदेश जारी कर दिए हैं. इस से पक्ष और विपक्ष के बीच बहस की तलवारें खिंच गई हैं. मामला पुलिस तक पहुंच गया है और अब मद्रास हाईकोर्ट में चल रहा है.

सनद रहे कि नरेंद्र मोदी ने मेट्टालयम रोड पर बने गंगा अस्पताल और आरएस पुरम के मुख्य डाकघर के बीच 4 किलोमीटर तक का लंबा रोड शो किया था. सरकारी सहायता प्राप्त श्री साईं बाबा मिडिल स्कूल के 14 साल से कम उम्र के बच्चे रोड शो के दौरान अलगअलग जगहों पर पार्टी के प्रतीक चिह्नों वाली भगवा रंग की कपड़े की पट्टियां पहने हुए भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित मंचों पर परफौर्म करते हुए देखे गए.

याद रहे कि कानूनन राजनीतिक रैलियों में बच्चों की भागीदारी भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के निर्देशों के खिलाफ है. ऐसे में जब आज लोकसभा चुनाव अपने उफान पर है, तब यह सवाल और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है, जिस का जवाब तय किया जाना चाहिए.

अधिकारियों ने स्कूल मैनेजमैंट को प्रधानाध्यापक और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने और घटना की रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है. सवाल और जवाब यही है कि ऐसे घटनाक्रम में सख्त कार्यवाही होनी चाहिए और आइंदा ऐसा न हो, यह संदेश चला जाना चाहिए.

कोयंबटूर जिला कलक्टर ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘हम ने मुद्दे का संज्ञान लिया है और एआरओ ने संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी है. जांच के निष्कर्षों के आधार पर उचित कार्यवाही की जाएगी.’

श्रम विभाग के संयुक्त आयुक्त और मुख्य शिक्षा अधिकारी द्वारा भी अलगअलग जांच शुरू कर दी गई हैं.

भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार ऐसे कार्य आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का उल्लंघन करते हैं. स्कूल मैनेजमैंट पर कार्यवाही की जाती है. मगर इस सब के बावजूद देशभर में ये खबरें अकसर सुर्खियां बटोरती हैं कि प्रधानमंत्री या कोई अन्य राजनीतिक नेता के स्वागत में स्कूली बच्चों को भेड़बकरियों की तरह ठेल दिया जाता है. यह एक आपराधिक कृत्य है और इस से नेताओं को बचना ही चाहिए. स्कूल मैनेजमैंट को भी सख्ती बनाए रखनी चाहिए.

ऐसे मामलों में सब से ज्यादा जिम्मेदारी जहां एक ओर स्कूल मैनेजमैंट की है, वहीं दूसरी ओर बच्चों के मांबाप को भी इस दिशा में जागरूक होने की जरूरत है.

नेताओं की नेतागीरी में मोहरा बनते ‘स्टूडेंट’

क्या देश अभी भी लकीर का फकीर बना हुआ है? क्या यह सोच भारत के जनमानस में अभी भी नहीं पहुंची है कि कम से कम 12 साल से छोटे बच्चों के साथ हमें कैसा कोमल बरताव करना चाहिए? क्या सिर्फ अपनी नौकरी बचाने और नेताओं के इशारे पर हर उस गलत चीज को भी हम सिर झुका कर आसानी से मान लेते हैं और कोई भी हुक्म बजा लाते हैं?

इस का सब से बड़ा उदाहरण हैं प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्रियों के आने पर स्कूल के बच्चों को उन की रैलिया में, सभाओं में ले जाने का काम स्कूल मैनेजमैंट खुशी या मजबूर हो कर करने लगता है और समझने वाली बात यह है कि निजी स्कूल ऐसा क्यों नहीं करते और सरकारी स्कूलों के बच्चों को आननफानन स्कूल ड्रैस में सभा में भीड़ बढ़ाने के लिए ले जाया जाता है? इसे बच्चों के साथ क्रूरता और अपराध की कैटेगिरी में रखा जाना चाहिए.

सवाल यह भी है कि अगर कहीं ऐसे हालात में कोई हादसा हो जाए, तो उस का जिम्मेदार कौन होगा, यह भी तय करने की जरूरत है.

तमिलनाडु के कोयंबटूर जिला शिक्षा अधिकारी ने कोयंबटूर में भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में स्कूली बच्चों की भागीदारी पर जांच के आदेश जारी कर दिए हैं. इस से पक्ष और विपक्ष के बीच बहस की तलवार खींच गई है. मामला पुलिस तक पहुंच गया है और अब मद्रास हाईकोर्ट मे चल रहा है.

सनद रहे कि नरेंद्र मोदी ने मेट्टुपालयम रोड पर बने गंगा अस्पताल और आरएस पुरम के मुख्य डाकघर के बीच 4 किलोमीटर लंबा रोड शो किया था. सरकारी सहायता प्राप्त श्री साईं बाबा मिडिल स्कूल के 14 साल से कम उम्र के बच्चे रोड शो के दौरान अलगअलग जगहों पर पार्टी के प्रतीक चिह्नों वाली भगवा रंग की कपड़े की पट्टियां पहने हुए भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित मंचों पर परफौर्म करते हुए देखे गए.

याद रहे कि कानूनन राजनीतिक रैलियों में बच्चों की भागीदारी भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के निर्देशों के खिलाफ है. ऐसे में जब आज लोकसभा चुनाव अपने उफान पर है यह सवाल और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है, जिस का जवाब तय किया जाना चाहिए.

अधिकारियों ने स्कूल मैनेजमैंट को प्रधानाध्यापक और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने और घटना की रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है. सवाल और जवाब यही है कि ऐसे घटनाक्रम में सख्त कार्यवाही होनी चाहिए और आइंदा ऐसा न हो, यह संदेश चला जाना चाहिए.

कोयंबटूर जिला कलक्टर ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘हम ने मुद्दे का संज्ञान लिया है और एआरओ ने संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी है. जांच के निष्कर्षों के आधार पर उचित कार्यवाही की जाएगी.’

श्रम विभाग के संयुक्त आयुक्त और मुख्य शिक्षा अधिकारी द्वारा भी अलगअलग जांच शुरू कर दी गई हैं.
भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार ऐसे कार्य आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का उल्लंघन करते हैं. स्कूल मैनेजमैंट पर कार्यवाही की जाती है. मगर इस सब के बावजूद देशभर में ये खबरें अकसर सुर्खियां बटोरती हैं कि प्रधानमंत्री या कोई अन्य राजनीतिक नेता के स्वागत में स्कूली बच्चों को भेड़बकरियों की तरह ठेल दिया जाता है. यह एक आपराधिक कृत्य है और इस से नेताओं को बचना ही चाहिए. स्कूल मैनेजमैंट को भी सख्ती बनाए रखनी चाहिए.

ऐसे मामलों में सब से ज्यादा जिम्मेदारी जहां एक ओर स्कूल मैनेजमैंट की है वहीं दूसरी ओर बच्चों के अभिभावकों को भी इस दिशा में जागरूक होने की जरूरत है.

रैलियों में भीड़ बढ़ाने का फंडा

साल 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान मध्य प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र में कोठार गांव के मनीष यादव ने पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखा कर यह गुहार लगाई थी कि वादे के मुताबिक नेताजी ने उसे चुनाव रैली का खर्चा नहीं दिया.

दरअसल, एक पार्टी के मंडल अध्यक्ष प्रबल राव ने मनीष यादव से रैली में गांव के ज्यादा से ज्यादा नौजवानों को मोटरसाइकिल से लाने के लिए कहा था और इस के लिए बाकायदा हर मोटरसाइकिल में पैट्रोल भरवाने के अलावा 200-200 रुपए नकद और खानेपीने का इंतजाम करने की बात भी कही थी.

मंडल अध्यक्ष के कहने पर मनीष यादव अपने गांव से 13 मोटरसाइकिल के साथ 26 लोगों को ले कर चित्रकूट की चुनावी रैली में पहुंचा था, मगर मंडल अध्यक्ष ने न तो मोटरसाइकिल में पैट्रोल भरवाया और न ही उन नौजवानों को रुपयों का भुगतान किया.

मनीष यादव के साथ हुई धोखाधड़ी की यह घटना यह साबित करने के लिए काफी है कि राजनीतिक दलों की रैलियों में जो भीड़ जुटती है, वह नेताओं के भाषण सुनने के लिए नहीं आती. मेहनत मजदूरी करने वाले लोग और बेरोजगार घूम रहे नौजवान पेट की भूख मिटाने और दिनभर का मेहनताना मिलने की गरज से आते हैं.

वैसे तो रैलियों में भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी पार्टी के कार्यकर्ताओं की होती है, इस के लिए उन्हें पैसा भी मिलता है. आमतौर पर रैलियों की भीड़ में खेतों, दुकानों में काम करने वाले होते हैं. कालेज में पढ़ने वाले लड़के, घूंघट वाली औरतें भी होती हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव के पहले से इस तरह के कारोबार ने रफ्तार पकड़ी है. एक दशक पहले सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियां इलाके में पुलिस वालों को बुलाती थीं, जो टैक्सी या बस औपरेटरों को अपनी टैक्सीबस भेजने के लिए कहते थे. अगर वे ऐसा नहीं करते थे, तो उन पर जुर्माना लगाया जाता था या फिटनैस, बीमा, लाइसैंस के नियमों का हवाला दे कर तंग किया जाता था.

उस समय भीड़ जुटाना आसान था, लेकिन अब चीजें बदल गई हैं. रैलियों में जाने वाले लोग पूछते हैं कि रैली में खाने में क्या मिलेगा? अब लोग इतनी आसानी से नहीं मानते. अगर वे एक दिन बिताते हैं, तो बदले में वे कुछ चाहते भी हैं. यह एक तरह से कारोबार बन गया है.

इस तरह के कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं कि उन का रोल दूसरे लोगों को रैलियों में ले जाने तक सीमित है. न तो वे उन्हें किसी पार्टी के पक्ष में वोट देने के लिए कहते हैं, न ही लोग उन की सुनते हैं. एक ही आदमी अलगअलग दलों की रैलियों में जाता है.

चुनाव आते ही बस या टैक्सी औपरेटरों के लिए ज्यादा कमाई का मौका मिल जाता है. ये औपरेटर  रैलियों के लिए गाडि़यां और भीड़ जुटाने में लग जाते हैं.

ऐसे ही कारोबार से जुड़े दिल्ली के एक टैक्सी औपरेटर बिन्नी सिंघला बताते हैं, ‘‘अगर पंजाब में कोई रैली होती है, तो उन्हें सिख लोग चाहिए होते हैं. हरियाणा में कोई रैली हो तो जाट चाहिए होते हैं, इसलिए हम हर तरह की भीड़ मुहैया कराते हैं. हमारे पास अपनी कारें भी हैं और चूंकि रैलियों के लिए बड़ी तादाद में गाडि़यों की जरूरत होती है, हम कमीशन पर दूसरे से भी उन्हें लेते हैं.’’

बिन्नी सिंघला के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा में रैली के लिए आमतौर पर 150-500 ‘किट्स’ की मांग आती है. रैलियों में जाने के लिए 5 सीटों वाली एक कार 2,500 रुपए में, सवारियों

के साथ इस की कीमत 4,500 रुपए पड़ती है. अलग तरह की भीड़ की जरूरत हो, तो यह रकम 6,000 रुपए तक जा सकती है.

इस कारोबार के बारे में भोपाल के एक टैक्सी औपरेटर राकेश कपूर ने बताया, ‘‘हम रैलियों में जाने वाले लोगों को 300-300 रुपए देते हैं. रैली अगर शाम में हो तो लोगों को ले जाने वाली पार्टी उन के खानेपीने, दारू वगैरह का इंतजाम करती है. अगर वे लोग इस का इंतजाम नहीं कर पाते हैं, तो हम ज्यादा पैसे ले कर इंतजाम करते हैं.’’

11 फरवरी, 2024 को मध्य प्रदेश के ?ाबुआ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में आदिवासी जनजातीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिस में प्रदेश के अलावा गुजरात और राजस्थान के भी आदिवासी शामिल हुए थे.

इन आदिवासियों को सभा वाली जगह तक लाने के लिए गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकार ने खूब पैसा खर्च किया था और बड़ीबड़ी बसों में भर कर हजारों की तादाद में आदिवासी लोगों को ?ाबुआ लाया गया था.

बबुआ में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी सभा में मध्य प्रदेश के हर जिले से बसों में भर कर लोगों को वहां पहुंचाया गया था. नरसिंहपुर जिले से इस सभा के लिए हर विधानसभा से 20 से 25 बसों में लोगों को ले जाया गया था.

प्रधानमंत्री की रैली से हो कर लौटे 55 साल के मुन्नी लाल मरकाम ने बताया कि रैली में जाने वाले हरेक को 500-500 रुपए के साथ दो वक्त का भोजन भी दिया गया था.

मेहनतमजदूरी छोड़ कर रैली में जाने की बात पर मुन्नी लाल मरकाम ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘खेतों में दिनभर तेज धूप में काम करते हुए रूखासूखा खाना पड़ता है. रैली में बसों में बैठा कर ले जाते हैं. अच्छा भरपेट भोजन मिल जाता है और सैरसपाटे के साथ प्रधानमंत्री को देखने का मौका भी मिल जाता है.’’

भीड़ बढ़ाने के लिए दलितपिछड़ों का इस्तेमाल

आज भी देश के ज्यादातर इलाकों में आदिवासी और दलितपिछड़े वर्ग के लोग कम पढ़ेलिखे हैं, जिस की वजह सरकारी योजनाओं का फायदा उन तक नहीं पहुंच पाना है. इसी वजह से आदिवासी और दलितपिछड़ों के वोट बैंक का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां अपने लिए आसानी से करती रहती हैं.

साल 2018 के विधानसभा चुनाव के वक्त 24 अप्रैल को मध्य प्रदेश के मंडला जिले में भी एक बड़ी रैली का आयोजन सरकार द्वारा किया गया था, जिस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए थे.

रमपुरा गांव के रहने वाले आदिवासी वंशीलाल गौड़ बताते हैं कि उन्हें बस द्वारा मंडला ले जाया गया था. रास्ते में खानेपीने के इंतजाम के साथ रैली से लौटने पर

500 रुपए बतौर मेहनताना के दिए गए थे. इस रैली में लाखों की तादाद में आदिवासियों को मध्य प्रदेश के कई जिलों से बसों में भर कर लाया गया था.

नरसिंहपुर जिले के चीचली ब्लौक में दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों का इस्तेमाल चुनाव के दौरान रैली, जुलूस और सभाओं में करते हैं. पहाड़ी इलाकों के कई गांवों में तो आज भी बुनियादी सुविधाएं बिजली, पानी, सड़क तक नहीं हैं.

ऐसे में इन इलाकों में रहने वाले आदिवासी औरतों को कपड़े का और मर्दों को शराब का लालच दे कर नेताओं की रैलियों में ले जाया जाता है. इन लोगों को रैलियों में ले जाने के लिए कई दलाल पास के शहर गाडरवारा से आते हैं. किसी राजनीतिक पार्टी को रैली के लिए भीड़ जुटाने के लिए नेता इन्हीं दलालों से बात करते हैं.

चुनावों में दलितपिछड़े वर्ग के लोगों का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी फायदे के लिए कर रही हैं. इन रैलियों में सब से ज्यादा दलितपिछड़े वर्ग के लोगों का इस्तेमाल किया जाता है.

देश में दलितपिछड़ों का एक बड़ा वर्ग अभी भी रोजीरोटी के लिए जद्दोजेहद करता है. अपने परिवार का पेट पालने के लिए रोज कड़ी मेहनत करता है, तभी उन के घरों का चूल्हा जलता है.

यही वजह है कि जब राजनीतिक दलों के लोग उन्हें दिनभर की मजदूरी और खानेपीने का लालच देते हैं, तो वे यह सोच कर आसानी से तैयार हो जाते हैं कि घूमनेफिरने के मौके के साथ  मजदूरी भी मिल जाएगी.

जो राजनीतिक दल सत्ता में होते हैं, उन्हें रैलियों में भीड़ जुटाने में प्रशासन का भी सहयोग मिलता है. जिलों में डीएम, एसपी, आरटीओ अफसर सभी मंत्रियों के कहने पर रैलियों के लिए भीड़ इकट्ठा करने में गाडि़यों का इंतजाम करते हैं. मध्य प्रदेश में औरतों को रैलियों में लाने और ले जाने के लिए महिला बाल विकास विभाग अहम रोल निभाता है.

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका, आशा, ऊषा कार्यकर्ता के साथ स्कूल और आंगनबाड़ी में मिड डे मील बनाने वाली औरतों की बड़ी टीम होती है, जिन का गांवकसबों और शहरों में औरतों से सीधा मेलजोल होता है. महकमे के अफसरों के कहने पर औरतों की बड़ी भीड़ रैलियों में पहुंच जाती है.

हैलीकौप्टर देखने उमड़ती है भीड़

चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए राजनीतिक दलों के लोग तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं. गांवकसबों में भी चुनाव के वक्त बड़े नेताओं, फिल्म ऐक्टरों की रैली और सभाएं होती हैं, जिन में लोग केवल फिल्म ऐक्टर और हैलीकौप्टर देखने जाते हैं.

साल 2018 के विधानसभा चुनाव में गाडरवारा विधानसभा में भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने फिल्म कलाकार हेमा मालिनी आई थीं, जिन्हें देखने के लिए भारी तादाद में भीड़ जुटी थी, लेकिन यह भीड़ भाजपा उम्मीदवार को जीत नहीं दिला सकी थी.

चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की कोशिश रहती है कि उस के प्रचार में कोई स्टार प्रचारक हैलीकौप्टर से आए और उस बहाने बड़ी तादाद में भीड़ जमा हो जाए. पार्टी आलाकमान के कहने पर स्टार प्रचारक हैलीकौप्टर में सवार हो कर दिनभर में 4-5 सभाएं करते हैं, जिन्हें देखने के लिए भीड़ लगती है और पार्टी उम्मीदवार सम?ाता है कि उस की जीत पक्की हो गई है. कई बार तो इस तरह की रैली में भाषण देने आए इन स्टार प्रचारकों को उम्मीदवार का नाम ही पता नहीं रहता.

रणनीतिकार बाकायदा दावा करते हैं कि अमुक नेता की रैली में इतने लाख की भीड़ जुटेगी और भीड़ जुटती भी है, लेकिन इस में कौन किस पार्टी को वोट देगा, कोई नहीं जानता. अब रैलियों की भीड़ से किसी दल या नेता की लोकप्रियता का अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है.

चुनाव का वक्त आते ही सभी राजनीतिक दलों के नेता दलितपिछड़े लोगों के हिमायती बन जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद कोई उन की सुध तक नहीं लेता.

इसी तरह चुनाव में शराब और पैसे का लालच दे कर इन भोलेभाले लोगों के वोट हासिल किए जाते हैं और फिर पूरे 5 साल तक उन की अनदेखी की जाती है.

विकास की मुख्यधारा से हमेशा दूर रहने वाले इस वर्ग के लोगों का चुनावी रैलियों में इस तरह से इस्तेमाल करना लोकतंत्र का मजाक नहीं तो और क्या है? दलितपिछड़े वर्ग के लोगों को जागरूक होने की जरूरत है.

आज देश में तरक्की के लिए स्कूलकालेज और अच्छे अस्पतालों की जरूरत है, लेकिन सरकार का पूरा फोकस ऊंचे और भव्य मंदिर बनाने और ऊंचीऊंची मूर्तियां लगाने पर है. सरकार नहीं चाहती कि देश के नौजवान पढ़लिख कर कमाऊ और समझदार बनें. देश की करोड़ों की आबादी को धार्मिक पाखंड में उलझ कर सरकार अपना उल्लू सीधा करने में लगी है.

नरेंद्र मोदी ने दूसरे नेताओं के पर काटे, तानाशाही की निशानी

बात साल 1982 की है. केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. इंदिरा गांधी ने साल 1980 का लोकसभा चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री के तौर पर वापसी की थी. उत्तर प्रदेश कांग्रेस में उठापटक और गुटबाजी चल रही थी. इंदिरा गांधी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर ऐसे चेहरे की तलाश थी, जिस को ले कर कोई विवाद और गुटबाजी न हो. तलाशने के बाद एक नाम श्रीपति मिश्र का सामने आया. 19 जुलाई, 1982 को इंदिरा गांधी ने श्रीपति मिश्र को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया. 2 साल यानी 1984 तक वे मुख्यमंत्री रहे.

सुलतानपुर जिले के सुरापुर कसबे के रहने वाले श्रीपति मिश्र बेहद सरल, सज्जन और मृदुभाषी थे. ऐसे ही नारायण दत्त तिवारी का मामला भी था.

कुछ इसी तरह से अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने मुख्यमंत्रियों को बदलने का काम करते हैं. वे तकरीबन 13 साल तक जिस गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, उसी गुजरात में अब मुख्यमंत्री ताश के पत्तों की तरह से फेंट कर बदल दिए जाते हैं.

साल 2001 से ले कर साल 2014 तक 13 साल अकेले नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. इस के बाद साल 2014 से ले कर साल 2022 के 8 साल में आनंदी पटेल, विजय रूपाणी और भूपेंद्र पटेल 3 मुख्यमंत्री बदले गए. 13 साल एक मुख्यमंत्री और 8 साल में 3 मुख्यमंत्री बनाए गए.

उत्तराखंड का उदाहरण भी काफी मजेदार है. साल 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तराखंड में भाजपा ने अपने बड़े नेताओं को दरकिनार कर त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया. साल 2021 में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटा कर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया और साल 2022 में पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया. ऐसे नए नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया, जिन को कोई अनुभव नहीं था.

यही बात मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद देखने को मिली, जब विधानसभा चुनाव जिताने वाले शिवराज सिंह चौहान की जगह पर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया.

अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर के छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय और राजस्थान में भजन लाल शर्मा को इसी तरह से मुख्यमंत्री बनाया गया. असल में अब मुख्यमंत्री बनाने में काबिलीयत नहीं देखी जाती है.

पहले कांग्रेस इसी तरह से मुख्यमंत्री बदलती थी, अब भाजपा उसी राह पर है. विधायक अब पार्टी के गुलाम बन गए हैं. उन से जिन के नाम का प्रस्ताव कराना हो, कर देते हैं.

पार्टी अध्यक्ष से ले कर जिला अध्यक्षों तक के सारे फैसले हाईकमान करता है. हर दल में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया है. संगठन में चुनाव नहीं, नियुक्तियां होने लगी हैं.

जनता के नहीं, पार्टी के प्रतिनिधि

चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले ऐक्टिविस्ट प्रताप चंद्रा कहते हैं, ‘‘असल में जब संविधान ने चुनाव की व्यवस्था बनाई, तो लोकसभा सदस्य और विधानसभा सदस्य चुने जाने का विधान था. ये सदन में अपना नेता चुनते थे. साल 1967 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तो इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) बनाई, जिस का निशान हाथ का पंजा था.

‘‘इंदिरा गांधी ने चुनाव आयोग से इसी निशान को अपने लिए रिजर्व करने के लिए कहा. इस के बाद पार्टी तंत्र विकसित होने लगा.

‘‘साल 1985 में राजीव गांधी ने जब दलबदल कानून बनाया, तब से विधायक और सांसद पार्टी व्हिप के दबाव में आने लगे. साल 1989 के बाद राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ. धारा

29 ए में पार्टी रजिस्टर्ड होने लगी. 29बी चुनाव चिह्न और 29सी दलों की आय के बारे में नियम बन गया.

‘‘इस के बाद विधायक और सांसद जनता के नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि बन गए. वे जनता के हित के बजाय पार्टी के हित में काम करने लगे. पार्टी व्हिप को न मानने से सदस्यता जाने का खतरा बढ़ गया था.’’

पौराणिक कथाओं का असर

हमारे समाज की मूल भावना में काबिलीयत की जगह परिपाटी को अहमियत दी जाती है. इस के तमाम उदाहरण हैं. संयुक्त हिंदू परिवारों में यह चलन था कि घर का बड़ा बेटा ही घर चलाएगा. वह काबिल न हो तो भी घर चलाने का हक उस का होता था. छोटा भाई असहमति भी जाहिर नहीं कर सकता था. हमारे समाज में असहमति को विरोध सम?ा लिया जाता है.

‘महाभारत’ को भी देखिए. धृतराष्ट्र बड़े थे, लेकिन अंधे होने की वजह से उन को राजा नहीं बनाया गया. इस के बाद भी वे खुद को राजा मानते रहे. उन के छोटे भाई पांडु की मौत के बाद जब धृतराष्ट्र ने राजपाट संभाला, तब उन्होंने तय कर लिया कि भले ही युधिष्ठिर बड़े हों, पर राजा उन का बेटा दुर्योधन ही बनेगा.

पांडवों में भी यही भावना थी. पांचों भाइयों में युधिष्ठिर सब से बड़े थे. इस वजह से उन के ही आदेशों को माना जाता था. दुर्योधन के साथ जुआ खेलने के लिए युधिष्ठिर ही आगे आए. जब महाभारत का युद्ध हुआ तो काबिलीयत के हिसाब से सब से बड़ी जिम्मेदारी अर्जुन के कंधों पर आई, क्योंकि वे

सब से काबिल थे. उन को ही कृष्ण ने गीता सुनाई. अगर परिवार में बड़े होने के चलते युधिष्ठिर ही युद्ध का संचालन करते, तो महाभारत के युद्ध का नतीजा अलग हो जाता. काबिलीयत के मुताबिक अगर जिम्मेदारी न दी जाए, तो हार तय होती है.

इतिहास में बहुत से ऐसे उदाहरण हैं, जहां बड़े बेटे को नाकाबिल होने के बाद भी राजा बना दिया गया, पर बाद में वह राज्य बरबाद हो गया.

इस को आज के दौर में घरपरिवार के उदाहरण से समझे तो कई कारोबारी घराने, सामान्य परिवार इसी वजह से खत्म हो गए, क्योंकि उन्होंने बड़े बेटे को जिम्मेदारी सौंप दी. पुरानी लीक और रूढि़वादी सोच के चलते अगर नाकाबिल होने के बाद भी बड़े बेटे को ही हक सौंप दिए जाएंगे, तो परिवार का बरबाद होना तय है.

राजनीति से ले कर घरपरिवार तक में यही कहा जाता है कि जो बड़ा है, उसे ही असल हक है. राजनीतिक दलों में इसी बड़े को हाईकमान कहा जाता है. जब हाईकमान काबिलीयत के आधार पर फैसले नहीं करता है, तो वह पार्टी डूब जाती है. कांग्रेस इस का उदाहरण है.

एक ही रंग में रंगे

कांग्रेस की तरह से भाजपा में भी हाईकमान कल्चर बढ़ गया है. हिंदुत्व के पुट को अगर किनारे कर दिया जाए, तो इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी का काम करने का तरीका एकजैसा है. प्रधानमंत्री रहते दोनों ही पार्टी और देश दोनों चला रहे हैं.

चुनाव में टिकट बंटवारे का मसला हो या मुख्यमंत्री बदलने का मसला हो, प्रधानमंत्री का ही आदेश चलता है. दूसरे प्रधानमंत्रियों के जमाने में मंत्रिमंडल का फैसला होता था. अब मसला वित्त का हो तो फैसला प्रधानमंत्री लेते हैं, विदेश का हो, तो फैसला प्रधानमंत्री लेते हैं, रक्षा का हो तो फैसला प्रधानमंत्री लेते हैं. ऐसे में वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री को रखा ही क्यों गया है?

देश के सारे फैसले पीएमओ लेने लगा है. ऐसे में जनता के प्रतिनिधि होने का मतलब ही क्या रह गया है? जब वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री जैसे दूसरे विभागों के फैसले पीएमओ को ही करने हैं, तो इतने मंत्री रखने की जरूरत क्या है?

प्रदेश को चलाने के लिए मुख्यमंत्री की काबिलीयत को देखने की जरूरत नहीं है, तो मुख्यमंत्री के ताम?ाम पर पैसा खर्च करने की जरूरत क्या है? पीएमओ और अफसर प्रदेश भी चला सकते हैं. राम की खड़ाऊं रख कर राज चलाया जा सकता है, तो पीएमओ देश को क्यों नहीं चला सकता?

राजा में दिखते हैं भगवान

संविधान ने एमपी, एमएलए को जनता का प्रतिनिधि माना है. वे जनता के वोट से चुन कर जाते हैं. सदन में वे वही बात करेंगे, जो उन की पार्टी यानी मुखिया का आदेश होगा. उन की असहमति को विरोध सम?ा जाएगा. इस के चलते उन की सदस्यता जा सकती है. एमपी, एमएलए जनता के प्रतिनिधि नहीं, पार्टी के प्रतिनिधि हो गए हैं. पार्टी के मुखिया यानी हाईकमान का आदेश ही राजा का आदेश हो गया है.

जैसे घरपरिवार में पिता का राज होता है, बेटे का हक नहीं होता कि वह अपनी मरजी से शादी कर सके. बात न मानने पर पिता अपनी जायदाद से बेटे को बेदखल कर सकता है. परिवार और राजनीति दोनों ही एकदूसरे के उदाहरण दे कर अपनी बात को सही साबित करते रहते हैं.

पिता भी राजा की तरह होता है. राजा को भी पिता कहा जाता है. दोनों ही भगवान जैसे होते हैं. भगवान का आदेश कौन टाल सकता है?

मनोहर लाल कितने भी काबिल क्यों न हों, राजा के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकते. हाईकमान के रूप में नरेंद्र मोदी को लोग भगवान का अवतार बताते हैं. चुनावी टिकट से ले कर मुख्यमंत्री बदलने तक के उन के सारे फैसले कबूल कर लिए जाते हैं.

लोकतंत्र में बढ़ती तानाशाही

लोकतंत्र का मतलब यह माना जाता है कि जो भी काम होंगे, वे जनता के हित में उन के चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे. जिस देश में जितने ज्यादा नागरिकों को वोट देने का हक रहता है, उस देश को उतना ही ज्यादा लोकतांत्रिक समझ जाता है. इस तरह भारत दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में सब से बड़ा है. यहां वोट देने वाले नागरिकों की तादाद दुनियाभर में सब से बड़ी है.

भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 326 के तहत बालिगों को वोट डालने का हक दिया है. वोटर के लिए जरूरी है कि वह 18 साल या उस से ज्यादा उम्र का हो, साथ ही भारत का निवासी भी हो.

भारत में 1935 के ‘गवर्नमैंट औफ इंडिया ऐक्ट’ के मुताबिक, तब केवल 13 फीसदी जनता को वोट का हक हासिल था. वोटर का हक हासिल करने की बड़ीबड़ी शर्तें थीं. केवल अच्छी सामाजिक और माली हालत वाले नागरिकों को यह हक दिया जाता था. इस में खासतौर पर वे लोग ही थे, जिन के कंधों पर विदेशी शासन टिका हुआ था. पर आजाद भारत में वोट का हक सभी को दिया गया.

लोकतंत्र के बाद भी हमारे देश में लोक यानी जनता की जगह पर तंत्र यानी अफसर और नेताओं का राज चलता है. इस में जनता घरेलू मामलों से ले कर अदालतों तक के बीच चक्की में गेहूं की तरह पिसती है. आखिर में उस का आटा ही बन जाता है. अब शायद कोई ही ऐसा हो, जो इस चक्की में पिस न रहा हो. घर के अंदर तक कानून घुस गया है. पतिपत्नी के बीच से ले कर घर के बाहर सीढ़ी और छत आप की अपनी नहीं है. जो जमीन आप अपनी समझ कर रखते हैं, असल में वह आप की नहीं होती है.

लोकतंत्र में जो तंत्र का हिस्सा है, वह लोक को अपनी जायदाद समझाता है. कानून लोक के लिए तंत्र के हिसाब से चलता है. अगर हम इस को घर के अंदर से देखें तो आप अपनी सुविधा के मुताबिक न तो छत पर कोई कमरा बनवा सकते हैं और न ही घर से बाहर निकलने के लिए सीढ़ियां. तंत्र को देख रहे अफसर अपने हिसाब से नियम बनाते हैं. हाउस टैक्स, प्रौपर्टी टैक्स जैसे नियम अफसर बनाते हैं. जनता से कभी पूछा नहीं जाता है. यही अफसर जनता के हित में अलग तरह से काम करते हैं, जबकि अफसरों, नेताओं के हित में अलग तरह से काम होता है.

लोकतंत्र में तानाशाही बढ़ती जा रही है. वोट पाने के लिए वोटर को लुभाया जा रहा है और विपक्ष को डराया जा रहा है. यह उसी तरह से है, जैसे घर के मालिक को तमाम तरह के टैक्स से परेशान किया जा रहा है. रोजगार पाने के लिए भटक रहे छात्रों को परेशान किया जा रहा है.

नौकरी के लिए इम्तिहान होता है, तो पेपर आउट करा दिया जाता है. बेरोजगारी का आलम यह है कि चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी वाले छात्र लाइन लगा कर खड़े होते हैं. नेताओं के पास इतना पैसा है कि वे वोट को मैनेज करते हैं.

सत्ता को बनाए रखने के लिए यह कोशिश होती है कि विपक्षी को चुनाव न लड़ने दिया जाए. बाहुबली नेता धनंजय सिंह के मसले में उन का कहना है कि ‘चुनाव लड़ने से रोकने के लिए यह किया जा रहा है’. ऐसे उदाहरण कई हैं, जहां लोकतंत्र में तानाशाही दिखती है.

आम आदमी पार्टी का मसला हो, सांसद महुआ मोइत्रा का मामला हो, तमाम उदाहरण सामने हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ले कर भी उन की ऐसी ही घेराबंदी की गई थी.

असल में लोकतंत्र की बात करने वाला या लोकतंत्र के जरीए ही सत्ता संभालने वाला कब तानाशाह बन जाता है, इस का पता नहीं चलता.

दुनियाभर में इस के तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं. नैपोलियन, हिटलर और पुतिन जैसे शासकों ने अपनी शुरुआत लोकतंत्र से की, बाद में तानाशाह बन गए. भारत में जिस तरह से विरोधी नेताओें को चुनाव लड़ने से रोका जा रहा है, उस से तानाशाही बढ़ने का खतरा साफतौर पर दिख रहा है.

क्या जेल से चलेगी दिल्ली सरकार या लगेगा राष्ट्रपति शासन? जानिए, क्या हैं नियम

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पद से हटाने की मांग को ले कर दायर जनहित याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. साथ ही कहा है कि अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के मामले में न्यायिक दखल की जरूरत नहीं है. कोर्ट ने कहा, ‘हमें राजनीतिक दायरे में नहीं घुसना चाहिए और इस में न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है.’

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद से ही दिल्ली की सरकार चलाने को ले कर कई सवाल खड़े होने लगे हैं, जिस में कई तरह के कयासों के साथसाथ कई महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आ रहे हैं. सब से मुख्य सवाल यह है कि क्या अरविंद केजरीवाल जेल से ही सरकार चलाएंगे? और अगर हां, तो क्या जेल से सरकार चलाना संभव है? हालांकि, गिरफ्तारी के बाद से अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाए जाने की खबरें भी लगातार सामने आ रही हैं. लेकिन ये बातें कितनी सही हैं, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा.

क्या जेल से सरकार चलाएंगे केजरीवाल?

दिल्ली के मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के पहले से ही आम आदमी पार्टी नेता दावा करते रहे हैं कि अगर केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई तो दिल्ली की सरकार जेल से चलेगी. दिल्ली सरकार की मंत्री आतिशी ने कहा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल हैं और आगे भी बने रहेंगे, चाहे जेल से सरकार चलानी पड़ी तो चलाएंगे.

आतिशी की मानें तो देश के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिलेगा कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री जेल से सरकार चलाएंगे और अब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद भी उन का पद से इस्तीफा न देना काफी हद तक इस बात को सही साबित करता है.

क्या केजरीवाल इस्तीफा देंगे?

अगर कानून के जानकारों की मानें तो दोषी ठहराए जाने तक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य नहीं हैं. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, अयोग्यता प्रावधानों की रूपरेखा देता है, लेकिन पद से हटाने के लिए दोषसिद्धि आवश्यक है यानी यह साबित करना होगा कि वे दोषी हैं.

आज तक के इतिहास में अब तक ऐसा नहीं हुआ कि कोई मौजूदा मुख्यमंत्री ऐसा रहा हो, जिस ने जेल से सरकार चलाई हो. कानून के जानकारों के मुताबिक, जेल से सरकार नहीं चला करती. संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि सरकार का मुखिया जेल में चला जाए और वहीं से सरकार चलती रहे, क्योंकि मुख्यमंत्री पद के तौर पर ऐसे कई काम होते हैं, जिन के लिए मुख्यमंत्री की उपस्थिति अनिवार्य होती है.

साथ ही जेल की बात करें, तो अगर कोई शख्स जेल में है तो उस के लिए जेल का मैन्युअल फौलो करना अनिवार्य है, क्योंकि पद के अनुसार जेल में कोई अलग नियम नहीं हैं. ऐसे में विधायकों, मंत्रियों से मिलना या बैठक करने पर रोक लग सकती है. इसे ले कर आम आदमी पार्टी के मंत्री सौरभ भारद्वाज का कहना है कि अगर मुख्यमंत्री जेल में हैं तो बैठक और और्डर भी वहीं से दिए जाएंगे.

हाल ही में आई खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री जेल से ही कई आदेश भी जारी कर रहे हैं. हालांकि ये सभी बातें राजनीतिक भाषण के लिए तो बिलकुल सही हैं, लेकिन प्रैक्टिल तौर पर फिट नहीं बैठती हैं. इस बात पर आम आदमी पार्टी के नेता कहते हैं कि इसे ले कर वे कोर्ट में याचिका दायर करेंगे. अगर कोर्ट इस मामले पर विचार करता है तो भी इस में वक्त लगेगा.

क्या लागू होगा राष्ट्रपति शासन?

आप नेताओं का कहना है कि हमारे पास पूर्ण बहुमत है. ऐसे में मुख्यमंत्री इस्तीफा क्यों दें? इस के बाद सिर्फ एक ही रास्ता बनता है, जिस में मुख्यमंत्री को बरखास्त कर दिया जाए. कानून में अनुच्छेद 239एए में ऐसा प्रावधान है, जिस में दिल्ली के उपराज्यपाल राष्ट्रपति को पत्र लिख कर मुख्यमंत्री के पद छोड़ने की बात कहें. ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति उन्हें पद से हटा सकते हैं.

इस के अलावा संविधान का अनुच्छेद 356 कहता है कि किसी भी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने या इस में किसी तरह का व्यवधान पैदा होने पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है. 2 बातों को इसमें आधार बनाया जा सकता है. पहली, जब सरकार संविधान के मुताबिक, सरकार चलाने में सक्षम न हो. दूसरी, जब राज्य सरकार केंद्र सरकार के निर्देशों को लागू करने में विफल रहती है.

राष्ट्रपति शासन लगने पर कैबिनेट भंग कर दी जाती है. राज्य की पावर राष्ट्रपति के पास आ जाती है. इन के आदेश पर ही राज्यपाल, मुख्य सचिव और दूसरे प्रशासकों या सलाहकारों की नियुक्ति की जाती है.

क्या केजरीवाल को पद से हटाने का जोखिम लेगा केंद्र?

अब राजनीति तौर पर बात करें, जो राजनीति जानकारों का मानना है, कि केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाना लोकसभा चुनाव में उलटा पर सकता है, क्योंकि अगर अरविंद केजरीवाल पद से हटाए जाएंगे, तो जनता का इमोशनल सपोर्ट उन्हें मिलेगा. ऐसे में केंद्र सरकार कभी भी इस बात का जोखिम नहीं उठाएगी. इस के पीछे राजनीति के अतीत में हुए लालू यादव और जयललिता का केस है, जिस में उन के जेल जाने के बाद उन्हें जनता की सहानुभूति मिली थी.

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