Story In Hindi: लकवा

Story In Hindi: इस समय सुबह के साढ़े 7 बज रहे थे. मौसम ठीकठाक था. ज्यादा चुभती धूप नहीं थी. बच्चे स्कूल जा रहे थे. सफाई मुलाजिम सड़क साफ कर रहे थे. दूध वाले अपने ग्राहक के घर पर दस्तक दे कर ‘दूध ले लो, दूध आ गया’ की आवाज लगा कर उन को बाहर बुला रहे थे. कुलमिला कर सभी बिजी थे.

इधर मनु का ठेला भी तकरीबन तैयार था. अमरूद, केला, नाशपाती, पपीता, संतरा और सेब अच्छी तरह से लगा दिए गए थे.

मनु ने अपनी बहन बाली को चूम कर उस का धन्यवाद किया कि उस ने कितने करीने से सारा ठेला दुलहन के जैसे सजा दिया था.

दाएं हाथ से धीरेधीरे ठेलते हुआ मनु चल दिया. अपनी गली से आगे बढ़ कर दूसरी गली पर आया ही था कि ‘ओ हीरो, एक गुच्छा रख दे…’ उमा की आवाज आ गई.

उमा की बहन रमा को पीलिया था. सुबह उमा मनु से केले का गुच्छा रखवा लेती थी. रमा को केला, गन्ने का रस और छिलके वाली मूंग की दाल का आहार देना तय था.

उमा ने 10-10 के 3 नोट रख दिए मनु के हाथ में. मनु ने रुपए लिए, माथे से लगा कर जेब में रख लिए और हंस कर उसे धन्यवाद भी कहा और 24 घंटे के अंतराल में दोनों का आंखों ही आंखों में संवाद भी हो गया.

दोनों ने पलकें झपका कर एकदूसरे को अपनी कुशल दे दी थी.

उमा मनु की बचपन की साथी थी. उम्र में उस से 4 साल बड़ी थी, पर उस से कुछ नहीं होता. मनु और उस की खूब गहरी छनती थी. दोनों त्योहार पर रंगोली बनाते थे. गरबा रास में 9 दिन साथसाथ जाया करते थे.

कितना मजा था तब. जब मनु 16 का था और उमा 20 की थी.

मनु एक हाथ से ठेला खिसका रहा था. उस के बाएं हाथ में लकवे का असर था. 3 साल पहले उस के पूरे बाएं अंग में लकवा हुआ था. अब चेहरा तो ठीक हो गया है, पैर भी काफी दुरुस्त हैं, मगर हाथ अभी भी कमजोर है. बस, दायां हाथ ठीक चलता है.

उमा केले ले कर भीतर आ गई. हाथोंहाथ एक केला छील कर उस ने रमा को खिला दिया. उमा को 2 घंटे में काफी जल्दी से सब काम करने थे, उस के बाद उस को भी काम पर जाना था.

उमा की मां भी कहने को घर पर हैं, मगर वे अपने किसी विश्वास के चलते सुबह 6 बजे से 10 बजे तक मंदिर में जाप करती हैं, शायद रमा ठीक हो जाए. उन की नजर में यह पीलिया एक दैवीय प्रकोप है.

उमा ने लाख समझाया है कि यह दवा और आहार से ठीक होगा, मगर वे न तो डाक्टर हैं और न ही नौकरी करती हैं. वे शायद अपना होना और अपनी अहमियत को साबित करने के लिए मंदिर चली जाती हैं.

मां कहती रहती हैं, ‘‘मैं इतना नियमधर्म करती हूं तब जा कर यह घर सकुशल है.’’

घर पर भी उठतेबैठते मां कुछ न कुछ नाम जपती ही रहती हैं. उमा अपने घर पर, मां के इन धार्मिक ढोंग और पोंगापंडितों की चरणपूजा से नफरत करती थी.

उमा घर पर कहती भी थी कि शुद्ध घी का हलवा भगवान को भोग लगाने की जगह लावारिस लोग, जो फुटपाथ पर हैं, को सादा खिचड़ी ही खिला दो. भगवान के 4 समय पोशाक और परिधान बदलते हो, उस जूता मरम्मत करने वाले अंकल को बैठने के लिए एक आसन दे दो. मगर उस की कौन सुनता है. मां अगर उस की सुन लेंगी, तो उन को अपने बेरोजगार होने का डर है.

उमा अपना फर्ज पूरा करती है. वह अपना काम करती है और पूरे समर्पण से करती है.

रमा को अब पीलिया हुए 2 हफ्ते हो गए हैं. वह धीरेधीरे ठीक हो रही है, मगर मां का कहना है कि यह उन के तप और पूजापाठ का ही फल है.

अब डाक्टर के कहने पर उमा ने बूंद भर घी में बघारी हुई मूंग की दाल और पतलीपतली चपाती बना कर रमा को खिलाईं. इतना अच्छा खाना खा कर रमा तन और मन दोनों से चुस्तदुरुस्त होती जा रही है.

‘‘अब हफ्ते बाद सुबह तुम को आलू के परांठे बना कर मैं खिलाने वाली हूं,’’ कह कर उमा ने रमा को बगैर दूध की चाय बना कर भी पिलाई.

रमा के उमा का हाथ चूम लिया. रमा का हर राज जानती है उमा. रमा के प्रेम संबंध, उस का ब्रेकअप और ब्रेकअप के बाद का डिप्रैशन, सब उमा ने सुनसुन कर बांट लिया.

खुद रमा की उमा दीदी ने भी तो कैसा जीवन देखा है और झेला है. बस, वही तो जानती है. एक दिन तो वह अपने से छोटे मनु को मन ही मन पति मान बैठी थी. तब सारे महल्ले ने उस को कैसा बदनाम किया था.

उमा घबरा कर अपनी बूआ के पास दिल्ली चली गई थी, मगर वहां भी 10 दिन से ज्यादा न टिक सकी थी. बूआ का देवर खुलेआम छेड़ा करता था उस को. बूआ तो देख कर भी अनदेखा कर देती थीं.

उमा ने बूआ को एकाध बार उस ने संकेत भी किया, मगर वे तो खुद अपने देवर की आधी पत्नी बनी हुई थीं.

बूआ के पति सैकड़ों मील दूर झारखंड में कोयला खान में काम करते थे. वे महीनों तक घर नहीं आते थे. रखवाली के लिए अपना भाई अपनी पत्नी को सौंप गए थे. अब देवरभाभी एकदूसरे की काफी अच्छी देखभाल कर रहे थे.

इतनी बेहूदगी उमा से सहन नहीं हो रही थी, इसलिए उमा ने वहां से चले जाना ही ठीक समझा और लौट कर घर आ गई. तब तक मनु पर लकवे की मार असर कर चुकी थी.

रमा से यह खबर सुन कर उमा का तो कलेजा ही धक से रह गया था. उसे रातों को नींद नहीं आती थी. कितनी बार वह सोचती थी कि उसी की वजह से मनु को यह लकवा हुआ, मगर मनु की बहन बाली से तो उस का खूब प्यार का नाता था. बाली ने सब खुलासा किया. उस ने बताया कि गलत खानपान और बीड़ी पीने से यह समस्या हुई थी.

‘‘ओह, मनु…’’ इतना कह कर और अपना डूबता हुआ दिल संभालती हुई मनमसोस कर रह गई उमा.
मनु ने कालेज की पढ़ाई भी बीच में छोड़ दी थी. उसे किसी ने निजी बस में टिकट काटने का काम दिया था. हर रोज 100 मील चलती थी बस. उस को सुबह 9 से शाम 7 बजे की ड्यूटी करनी होती थी.

मनु को यह काम ठीक लगा था. उसी दौरान वह बस चालक की संगत में बीड़ी पीने लगा. खैर, अपनी कमाई थी. जो मरजी करो, कौन देखने और रोकने आ रहा था, इसलिए बिंदास पी रहा था वह. कभीकभार महंगी सिगरेट भी पी लेता था.

मगर एक दिन बस में कुछ मनचले छोकरों को टोकने पर मनु के साथ भयंकर हाथापाई हो गई थी और उस ने नौकरी छोड़ कर घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम ले लिया था. दूसरी से 5वीं तक के बच्चों को मनु गणित पढ़ाता था और बस इसी दौरान उस को लकवा मार गया.

मनु की एक छोटी बहन थी. वह भी 10वीं में पढ़ती थी. उस के वश में इतना ही था कि मजबूर और मजदूर मांबाप की खरीखोटी सुन कर उसे वैसा का वैसा मनु को सुना दे. मनु का सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा था. उस की इस गली से केवल 200 कदम दूर सरकारी अस्पताल था. उसी के करीब एक निजी अस्पताल भी था.

इलाज कराना बिलकुल भी मुश्किल नहीं था, बस यह बायां शरीर काम करने लगे, अब मनु के लिए दिनरात सोतेजागते का एक यही सपना रह गया था.

वहीं 10 रुपए में एक थाली भोजन भी मिल जाता था. मनु घर आता और अपने आंसू पी कर बस चुपचाप बिस्तर पर पड़ा रहता था. डाक्टर उस से खूब बात करते थे.

दरअसल, मनु का पढ़ालिखा होना डाक्टर को अच्छा लगा. वे खुश थे कि अनपढ़ मजदूर मातापिता की संतान मनु की सोच अच्छी है. मनु में धीरज कूटकूट कर भरा था.

धीरेधीरे मनु अच्छा हो रहा था. डाक्टर ने ही उस को अपने किसी जानकार से कह कर 10,000 का बिना ब्याज का लोन दिलाया था. 8,000 का ठेला और 2,000 के फल खरीद कर मनु ने बहुत ही मन से ठेला लगाना शुरू कर दिया था. उस निजी अस्पताल के बाहर सेब खरीदने वाले आते ही थे, केले भी बिक जाते थे.

पहले ही दिन मनु की जेब में 3,000 रुपए थे, जबकि शाम ढलने तक सारे फल बिके नहीं थे. आज भी उस ने 10 रुपए का एक थाली भोजन खा लिया था. शाम को वह डाक्टर के पास रुपए ले कर गया.

डाक्टर ने मनु के हाथ में नोट देख लिए थे. वे हंस कर बोले, ‘‘कम से कम 3 महीने बाद लौटाना.’’

‘‘अरे, आज ही…’’ मनु बोला.

‘‘नहींनहीं, अभी बिलकुल नहीं चाहिए. अभी तुम खुश रहो. दवा लो और अपना खयाल रखो. हफ्ते बाद चैकअप करा लेना,’’ कह कर डाक्टर अपने राउंड पर चले गए. मनु अपने नोट दबाए वैसा ही बुत बना रहा.

इस तरह ठेला खींचते हुए और फल बेचते हुए मनु को 2 महीने हो रहे थे. अब उमा भी कुछ बेशर्म हो गई थी. वह न महल्ले की चिंता करती थी, न कहनेसुनने वालों की. अपना काम बनना चाहिए, बस यही उस का मूल मंत्र हो गया था, इसलिए सुबह की मनु की पहली ग्राहक वही थी.

अब रमा ने एक अंगड़ाई ली और बारबार भुवन के बारे में सोचने लगी. रमा को एक पार्टी में बुलाया था उस ने. फोन पर संदेश था उस का. एक हफ्ते बाद 3 दिन तक जश्न है होटल हैवन में. किसी भी शाम को आना, बस बता देना. शाम 7 से रात 11 बजे तक पार्टी चलती रहेगी.

उमा अब तैयार हो गई थी. वह एक वृद्धाश्रम में नौकरी करती थी. उस का काम था 30 लोगों के इस वृद्धाश्रम में सुबह साढ़े 10 से शाम 5 बजे तक की दिनचर्या का पूरा रजिस्टर भरना. यहां आनेजाने वाले डाक्टर और दूसरे विजिटर्स का भी एक अलग रजिस्टर था. हर हफ्ते की पिकनिक और सिनेमा ले जाने का भी जिम्मा उमा का ही था.

उमा को यहां काम करते हुए 7-8 महीने होने आए थे. यहां रहने वाले बुजुर्ग लोग कितने अमीर थे, मगर कितने अकेले थे. उमा यह करीब से जानती और महसूस करती थी. उमा चली गई और मां अभी लौट कर आई नहीं थीं.

रमा ने आज कोशिश कर के स्नान कर लिया था. बुखार नापा. आज बुखार नहीं था. कुछ देर बाद एक कप दूध पी कर देखा. न तो उलटी आई और न ही जी मिचलाया यानी पीलिया जड़ से मिट रहा था. उस ने फोन पर एक गीत चलाया और नाचने लग गई.

नाचते हुए रमा आईने के करीब आ गई. आई ब्रो रेजर लिया और अपनी भवें तराश लीं. वाह, क्या चेहरा निखर गया था उस का. उस ने खुद को ही चूम लिया.

रमा शायद मूड में थी. उस ने मां को खींच कर अपने पास बिठा लिया. मां की गोदी में लेट कर पूछने लगी, ‘‘आज कुछ देर बाहर चली जाऊं मां?’’

‘‘मैं कुछ कहूं उस से पहले खुद से पूछ, ताकत है भी कि नहीं?’’ कह कर मां उस को थपकी देने लगीं.

रमा अपनी मां को कुछ दलीलें देने लगीं. मां उस की दलील सुन कर मन ही मन खिलखिलाहट से भर गईं. वे खुद भी तो ऐसी ही थीं आजादखयाल. मौजमस्ती की शौकीन. पिता और चाचा की लाड़ली. स्कूल में दर्जा 2 से मोहन के प्यार में पागल थीं वे. छठी जमात में आईं, तो उन दोनों ने मंदिर में शादी ही कर ली थी. दोनों दोपहर 2 बजे मंदिर गए. मंदिर बंद था, मगर मोहन ने बंद मंदिर को ही साक्षी बना कर उस की मांग भर दी.

फिर वे दोनों एकदूजे को गले लगा कर यों ही बैठे रहे थे. शायद ऐसे ही रहते और शाम से रात हो जाती, मगर ऐसा हुआ नहीं. कुछ आवाजों ने उन को झकझोर कर जगाया.

वह तो मोहन के दोस्त आ गए थे. ताजा खबर यह थी कि मोहन और मीना दोनों ने शादी कर ली.

यह सुनते ही मीना ने मोहन की मदद से मंदिर के अहाते में नल का पानी चला कर ताजा भरी हुई मांग को धोया और दोनों सरपट भागे अपनेअपने घर. दोनों के घर पर मुखबिर पहुंच गए थे. काफी नमकमिर्च लगा कर कहानी बना कर सुना दी गई थी.

अब 10 दिन मीना स्कूल नहीं गई. फिर टीचर और प्रिंसिपल के सम?ाने पर दोनों स्कूल जाने लगे थे. मीना के घर पर संयुक्त परिवार था. मोहन के घर पर उस का बड़ा भाई और मां ही थे. मीना अकसर ही मोहन के घर चली जाती थी. 10वीं तक तो पूरा कसबा ही उन दोनों को पतिपत्नी कह कर मजे लेने लगा था.

बस, अब सहन करना मुश्किल था. मीना और मोहन घर से भाग गए. भाग कर जाते किधर और कहां. कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कुछ दिन बाद बनारस की बस ले कर घाट पर भीख मांगने लगे. महीनेभर बाद धर लिए गए.

मीना को घर पर ला कर नजरबंद कर दिया गया.

मोहन की जिंदगी तो 3-4 दिन बाद सामान्य हो गई थी. 2 साल किसी जेल खाने वाली जिंदगी जी कर काटी मीना ने. इस बार वे दोनों ज्यादा तैयारी के साथ भागे, मगर कुछ मुखबिर उन से भी ज्यादा होशियार निकले.

एक हफ्ते बाद वे दोनों हरिद्वार में भीख मांगते हुए पकड़े गए और घर वापस लाए गए. मोहन की पिटाई हुई. फिर उस की अकेली मां को याद कर उसे धमकी देकर छोड़ दिया गया.

अब मीना 18 साल की थी. एक महीने में उस की सगाई कर दी गई. सूरत में कपड़े के कारोबारी की दुलहन बन कर वह ससुराल आ गई.

ससुराल में पति से ज्यादा जवान उस के ससुरजी थे. मीना कितनी ही बार ससुर के गलत स्पर्श से बची. अब वह पुरानी वाली मीना नहीं थी. मोहन को फोन कर उस ने सब बताया. एक दिन मोबाइल पर ससुरजी की वीडियो बनाई और अपने पीहर भेज दी.

इधर मीना के पीहर वाले उसे वापस ले गए और उधर मोहन से लगाव फिर शुरू हो गया था. थकहार कर परिवार ने उन दोनों को सात फेरों की इजाजत दे दी. मीना और मोहन अब पतिपत्नी बन गए. 10 महीने बाद उमा का जन्म हुआ. जीवन सरल था, मगर ठीक ही था मगर समय को कुछ और ही मंजूर था. उमा के जन्म के एक महीने के अंदर ही मोहन की सड़क हादसे में याददाश्त चली गई. वह अगर घर से बाहर जाता, तो घर का पता भूल जाता.

मीना ने मजदूरी शुरू कर दी. उस के पीहर से महीने का पूरा राशन और उमा का बेबी फूड समय पर आ जाता था, मगर अभी मोहन का छोटा भाई भी बेरोजगार था. मीना के पीहर की मदद से उस को भी काम मिल गया.

अब जैसा भी था, खाने पीने की कोई फिक्र नहीं थी. जीवन चल रहा था.

4 साल बाद रमा का जन्म हुआ और मोहन नींद में चल बसा.

मीना के पीहर ने उस की मदद की. रमा के लालनपालन की भी जिम्मेदारी ली. अब तो सास भी चली गई थी. देवर ने शादी कर के अलग घर बसा लिया था.

मीना का अजीबोगरीब जीवन अपनी गति से चल रहा था. अब वह इस कांटों भरे जीवन को अपनी ही हरकतों का नतीजा मानती थी. उसे लगता था कि आज उमा इतनी मेहनत कर रही है, काश, मीना सही रहती. परिवार का मान रखती. शायद आज उस के दिन कुछ और ही होते… काश.

‘‘मैं जा सकती हूं न?’’ रमा ने उस को झकझोर कर पूछा, ‘‘बताओ न?’’

‘‘जरूरजरूर, क्यों नहीं. अपने जीवन का जोखिम खुद ही उठाना सीखो. जाओ, और अपना खयाल रखो,’’ कह कर मीना चाय बनाने चली गईं.

शाम को घर आते ही उमा को भी खबर मिल गई कि तैयार हो कर रमा हैवन होटल जा रही है.

‘‘भुवन के चक्कर में है न?’’ उमा ने पूछा.

‘‘अरे, सब सेफ है दीदी, कोई खतरा नहीं. आप मुझ पर भरोसा रखो,’’ कह कर रमा ने उसे गले लगा कर चूम लिया. गुलाब के चालू किस्म के इत्र की महक उमा की नाक में भर गई.

‘‘रमा, कुछ भी तेल और मसाले का मत खा लेना. अभी सावधान रहना.’’

‘‘अरे, अभी तो देर है. अभी नहीं जा रही.’’

‘‘तब तो, इधर देख, सुन, रसोई में मूंग दाल है. उसे पी ले. पेट भर ले यहीं,’’ उमा ने उसे समझाया, तो रमा एकदम मान गई और दाल पीने लगी. आधापौना घंटा खुद को और संवार कर निखार कर वह चली गई.

भुवन रमा को सही जगह पर मिल गया. उस होटल में विदेशी मेहमान थे. रमा इस से पहले भी ऐसी पार्टी
में गई थी. अभी 3 लोग भाषणबाजी करेंगे. सब को गिफ्ट मिलेंगे और फिर खाना और पीना गपशप… फिर सब अपनेअपने घर.

रमा ने इधरउधर देखा. कुछ लड़कियां उस की देखीभाली सी लगीं. कुछ महीने पहले उस ने शालीमार होटल में इन को देखा था.

तकरीबन 3 घंटे बाद सब हंस कर विदा हुए. भुवन ने उसे घर तक छोड़ा. 500 का लिफाफा दिया. यही तो मेहनताना था. रौनक बढ़ाओ, खाना खाओ और 500 रुपए अलग से.

रमा के लिए यह क्या बुरा था. वैसे, वह बीए पास करने के बाद कुछ अच्छी नौकरी भी करने की सोच रही थी.

इसी तरह 3-4 हफ्ते और निकल गए. रमा एक बार और भुवन की बताई पार्टी मे सजसंवर कर शोभा बढ़ा आई थी. इस बार 700 रुपए मिले थे.

उधर मनु का फल का ठेला आमदनी देने लगा था. मनु को डाक्टर का भक्त बन गया था.

एक दिन डाक्टर ने उस को जिंदगी की सचाई पर एक प्रेरक भाषण दिया. डाक्टर ने बताया कि अगर बीमारी लाइलाज हो जाए तो इलाज में पैसा लगता है, इसलिए 2-4 लाख रुपए पास होने चाहिए. इस के लिए दुनियादार होना चाहिए. समझदार होना चाहिए.

21 साल के मनु को डाक्टर की हर बात बहुत अच्छी लग रही थी. वह गरदन हिला कर सुन रहा था.
अब डाक्टर की हर बात मनु के लिए माननीय होती. एक हफ्ते बाद डाक्टर उस को अपने साथ अपने फार्महाउस ले कर गए. तकरीबन आधा घंटा वहां रह कर मनु ने काफीकुछ देखा और सीखा.

वहां एक लड़की से परिचय कराते हुए डाक्टर ने कहा, ‘‘यह मेरी बहन की बेटी है. दिव्यांग है. उम्र 25 है मगर इस का दिमाग 14 साल का है. इस से शादी करो तो यह फार्महाउस मैं तुम को उपहार में देना चाहता हूं.’’

यह सुन कर मनु के सिर पर बिजली सी गिर गई. उस की आवाज कांपने लगी. उसे अचानक महसूस हुआ कि वह कितना अमीर है. वह कितना दौलतमंद है. कुछ बहाना बना कर उस ने टाल दिया डाक्टर ने उस की बात का बुरा नहीं माना. वे दोनों वापस लौट आए.

इस घटना के 2 दिन बाद मनु के मामा उस के घर आए. उस की मामी को अस्पताल लाए थे. मामी अभी 30-35 साल की थीं. उन के दिमाग में ट्यूमर हो गया था. मामी का सरकारी इलाज हुआ. दिमाग की सर्जरी हुई. कुल 4 लाख का खर्च आया. 3 लाख सरकार ने दिए.

एक लाख का मामा ने किसी तरह इंतजाम किया.

मामी को घर लाया गया. वह जिंदा थीं मगर अब उन का दिमाग मरा हुआ सा था. अब मामा को जिंदगीभर नौकरी भी करनी थी, मामी की सेवाटहल भी.

मामा की माली हालत ठीकठाक थी. अब तो यह सब देख कर मनु के पैरों से जमीन खिसक गई. वैसे तो वह भी लकवे के चलते दिमाग से हाथ धोने वाला था. वह तो उसे सही दवादारू मिल गई.

मनु ने अगले दिन डाक्टर से मुलाकात की. डाक्टर ने उस की एकएक बात गौर से सुनी. इस तरह सब ठीक हो गया.

अब एक साल बाद हालात एकदम अलग हैं. मनु अपने फार्महाउस पर रहता है. उस के दोनों हाथ सामान्य से लगने लगे हैं यानी लकवे का असर तकरीबन 10 फीसदी ही बचा है.

फार्महाउस में फल और फूल उग रहे हैं. कुछ कमरे किराए पर उठा रखे हैं. मनु की पत्नी अपने बचपने के साथ उस को कभी भी किसी भी समय गले लगा लेती है.

मनु की बहन बाली एक महंगे कालेज में पढ़ाई रही है. मनु के मातापिता एक किराने की दुकान पर ठाट से गल्ले पर बैठते हैं. दुकान संभालने के लिए असिस्टैंट है.

उमा की नौकरी जस की तस है. रमा ने एक होटल में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली है.

महल्ले वाले मनु के घर की तरफ संकेत कर के कहते हैं कि ‘देखोजी, कौन मानेगा कि इस जगह जो कबाड़ी अपनी दुकान लगाता है, यहां मनु का परिवार रहता था’. Story In Hindi

Hindi News Story: क्रीमी लेयर पर सियासी जंग

Hindi News Story: एक तरफ अयोध्या के राम मंदिर में ध्वजारोहण हो रहा था, दूसरी तरफ दिल्ली और एनसीआर मास्क लगा कर जहरीली हवा से जूझ रहा था. दिसंबर का महीना आने वाला था और यह साल भी अपना वजूद खोने जा रहा था.

इस बीच अनामिका ने एक दिन विजय को फोन किया, ‘‘यार, कल सुबह तुम मेरे साथ बैंक चलना. एक छोटा सा काम है, फिर हम दोनों ट्रेड फेयर देखने चलेंगे. ज्यादा दिन नहीं बचे हैं.’’

‘‘बैंक तो मैं चल लूंगा, पर ट्रेड फेयर जाने के नाम पर मेरी टांगें कांपने लगती हैं. बहुत भीड़ होती है और खर्च होता है, सो अलग,’’ विजय बोला.

‘‘तुम न बड़े बोरिंग इनसान हो. अभी बोल दूं कि किसी होटल में एक रात बिताते हैं, तो तुम्हारी बांछें खिल जाएंगी. पर अगर मुझे कहीं घूमने जाना हो, तो तुम बहाने बनाने लगते हो. यह गलत बात है,’’ अनामिका ने रूठते हुए कहा.

‘‘अच्छा ठीक है, पहले बैंक का काम निबटाएंगे, फिर देखते हैं कि ट्रेड फेयर जाने का समय बचता भी है या नहीं,’’ विजय बोला.

अगले दिन विजय और अनामिका सुबह 10 बजे ही बैंक चले गए थे. बैंक सरकारी था. अनामिका को अपना केवाईसी अपडेट कराना था. चूंकि बैंक की वैबसाइट में दिक्कत थी, तो उन्हें थोड़ा समय लग रहा था.

वैसे, केवाईसी अपडेट के लिए आप को पहचान और पते के प्रमाण के लिए जिन दस्तावेज की जरूरत होती है, उन में पैनकार्ड और आधारकार्ड सब से खास हैं, साथ ही पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड, या ड्राइविंग लाइसैंस जैसे दस्तावेज की जरूरत हो सकती है.

इस के अलावा, आप को एक हालिया पासपोर्ट साइज की तसवीर और हाल का उपयोगिता बिल (जैसे बिजली या गैस बिल) या बैंक स्टेटमैंट जैसे पते के प्रमाण की भी जरूरत हो सकती है.

बैंक में एक चपरासी और गार्ड के बीच किसी बात को ले कर बहस हो रही थी. वे दोनों कौन्ट्रैक्ट पर वहां लगे थे. चपरासी ऊंची जाति का था, जबकि गार्ड एससी तबके से था.

गार्ड ने चपरासी को कोई काम करने को कहा था, जबकि चपरासी उसे भाव नहीं दे रहा था. मुद्दा बस इतना था कि चपरासी को एक कागज पर मैनेजर के दस्तखत और मुहर लगवानी थी. चूंकि बैंक में भीड़ ज्यादा थी तो गार्ड अपनी सीट नहीं छोड़ सकता था.

इसी बात पर चौकीदार चिढ़ गया था. वह बोला, ‘‘अब इन्हें भी सीट पर ही काम चाहिए. रिजर्वेशन से सब हड़प रहे हैं और अब काम भी हम से ही कराना चाहते हैं. जिस दिन रिजर्वेशन हट गया न, तब देखना.

मुफ्त की मलाई नहीं मिलेगी, तो आटेदाल का भाव पता चल जाएगा.’’

‘‘तो इस में क्या गलत है. तुम लोगों ने सदियों से हमें दबाया है. हमें हमारा हक मिलना चाहिए,’’ गार्ड ने भी ऊंची आवाज में कहा.

‘‘चिंता मत करो. नई सरकार क्रीमी लेयर वाले मामले पर कुछ धमाका करने वाली है. बहुत फायदा उठा लिया तुम लोगों ने रिजर्वेशन का. थोड़े दिनों के बाद सब बराबर हो जाएंगे,’’ चपरासी ने भड़ास निकालते हुए कहा.

‘‘क्यों अफवाह फैला रहे हो. बात का बतंगड़ बनाना तो कोई तुम से सीखे. मैं लंच टाइम में अपना काम करा लूंगा,’’ इतना कह कर वह गार्ड मेन गेट के बाहर जा कर अपनी सीट पर बैठ गया.

तब तक अनामिका का काम हो चुका था. अभी 12 बज रहे थे. वह और विजय ट्रेड फेयर की तरफ चल दिए.

चूंकि 1-2 दिन में मेला खत्म होने वाला था, तो भीड़ ज्यादा थी. वे दोनों अंदर जा कर सब से पहले एक रैस्टोरैंट में गए. उन्हें चाय पीने की तलब थी.

इसी बीच अनामिका बोली, ‘‘उस चपरासी ने कितनी आसानी से कह दिया कि अब देश से रिजर्वेशन खत्म हो जाएगा. उसे क्या पता कि क्रीमी लेयर क्या होता है.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि क्रीमी लेयर बला क्या है?’’ विजय ने अनामिका को कुरेदते हुए पूछा.

यह सुन कर अनामिका बोली, ‘‘मैं ने बीबीसी के एक लेख में पढ़ा था और वहां इसे अच्छे से समझाया गया था कि ‘क्रीमी लेयर’ की सोच इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पेश की गई थी, जिसे मंडल आयोग मामले के रूप में भी जाना जाता है.

‘‘अदालत ने फैसला सुनाया कि ओबीसी में उन्नत वर्गों को आरक्षण के लाभ का दावा नहीं करना चाहिए, लेकिन इस वर्ग के वास्तव में जरूरतमंद लोगों को यह लाभ मिलना चाहिए.

‘‘इस के मुताबिक, 8 लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले परिवारों को क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. यह आमदनी सीमा सरकार की ओर से समयसमय पर बदली जाती है. इस के अलावा, ग्रुप ए और ग्रुप बी सेवाओं में ऊंचे पद के अफसरों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में शामिल हैं.

‘‘डाक्टर, इंजीनियर और वकील जैसे अमीर पेशेवरों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. इस के अलावा बड़े पैमाने पर खेतीबारी की जमीन के मालिक परिवारों को भी क्रीमी लेयर में शामिल किया गया है.

‘‘क्रीमी लेयर के सदस्य सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों समेत ओबीसी के लिए आरक्षित लाभों के लिए पात्र नहीं हैं.

‘‘वर्तमान में क्रीमी लेयर की सोच एससी और एसटी पर लागू नहीं होती है. एससी और एसटी के तकरीबन सभी लोगों को आरक्षण का लाभ मिलता है. लेकिन अब कोर्ट की इस ऐतिहासिक सिफारिश के बाद इस में बदलाव की संभावना है.’’

‘‘तो फिर अब इसे क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मैं तुम्हें हाल की एक खबर बताती हूं. रिटायरमैंट से ठीक पहले चीफ जस्टिस बीआर गवई ने क्रीमी लेयर नौकरियों के कोटे को ले कर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि यह चिंताजनक है कि एससीएसटी समुदायों में सामाजिक और मालीतौर पर अमीर लोग जाति को हथियार बना कर नौकरियों में आरक्षण का बड़ा हिस्सा हथिया रहे हैं.

‘‘एक बड़े अखबार से बातचीत में चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि केंद्र और राज्यों को एससीएसटी समुदायों को उपवर्गीकृत करने का समय आ गया है, ताकि इन समुदायों में वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े बने हुए हैं, सरकारी नौकरियों में कोटे के लाभ उठा सकें.

‘‘चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बैंच ने राज्यों को एससी समुदायों के भीतर जातियों को सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन व सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व के आधार पर उपवर्गीकृत करने की इजाजत दी, यह पक्का करते हुए कि कोटे का बड़ा हिस्सा सब से पिछड़े लोगों को जाए.

‘‘इस बारे में चीफ जस्टिस ने कहा कि अपने ही समुदाय से आलोचना के बावजूद, वे दृढ़ता से महसूस करते हैं कि एससीएसटी समुदायों में क्रीमी लेयर को इन समुदायों में वंचितों के लिए जगह देनी चाहिए.’’

‘‘इस में गलत क्या है? जब क्रीमी लेयर वालों ने पहले ही आरक्षण का फायदा ले लिया है, तो उन की अगली पीढ़ी को खुद ही इस सब का फायदा नहीं लेना चाहिए, तभी तो गरीब एससीएसटी को आरक्षण का असली हक मिल पाएगा,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मामले की गहराई नहीं समझ रहे हो. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त, 2024 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण बारे में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार इन समुदायों के आरक्षण सीमा के भीतर अलग से वर्गीकरण कर सकती है.

‘‘तब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की 7 जजों की बैंच के 6 जस्टिस ने एससीएसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण के पक्ष में फैसला सुनाया, जबकि एक जस्टिस ने इस का विरोध किया.

‘‘फैसला सुनाते समय यह सिफारिश भी की गई कि एससी और एसटी के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए और यह ओबीसी वर्ग पर लागू क्रीमी लेयर के प्रावधान से अलग होना चाहिए.

‘‘इस फैसले को ले कर कई पहलुओं की तरफ लोगों का ध्यान गया है कि क्या एससी और एसटी के आरक्षण में क्रीमी लेयर देने की जरूरत है?’’

‘‘पर मैं इस फैसले को ऐतिहासिक मानता हूं. तुम इस तरह से यह बात समझो. अगर एक छात्र दिल्ली के किसी बड़े और नामचीन या किसी और बड़े शहर के बढि़या कालेज में पढ़ रहा है और एक छात्र गांवदेहात के किसी साधारण स्कूल या कालेज में पढ़ रहा है, तो इन दोनों छात्रों को एकसमान नहीं माना जा सकता है. अगर एक पीढ़ी आरक्षण का लाभ ले कर आगे बढ़ी है, तो अगली पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए,’’ विजय ने अपना पक्ष रखा.

‘‘ओह, तो यह बात है. पर तुम इस मुद्दे को बड़ा हलके में ले रहे हो. ‘वंचित बहुजन अघाड़ी’ के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने इस फैसले का विरोध किया है. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला एससी के तहत पिछड़ेपन को मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानदंडों पर चुप है.

‘‘प्रकाश अंबेडकर ने आगे कहा कि आरक्षण से न केवल एससी, एसटी और ओबीसी को लाभ होता है, बल्कि सामान्य श्रेणियों को भी लाभ होता है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

‘‘और तो और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सुनाए फैसले के बारे में बौम्बे हाईकोर्ट के वकील संघराज रूपवते ने कहा कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने एक बार फिर अदालत की आड़ में वही किया है, जो वे चाहते थे. यह एक ऐसा फैसला है जो हमें जातिविहीन समाज से दूर ले जाता है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उपवर्गीकरण की अनुमति देना 6 जस्टिस की एक बड़ी गलती है.

‘‘वैसे भी एससी और ओबीसी के क्रीमी लेयर अलग होते हैं. इस बारे में ‘नैशनल कौन्फेडरेशन औफ दलित और्गनाइजेशन’ के अध्यक्ष अशोक कुमार भारती इस बारे में कहते हैं कि एससीएसटी सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, इन्हें समाज से बाहर रहने के लिए मजबूर किया गया था. इन के खिलाफ अन्याय का भाव अब भी समाज में बरकरार है, जबकि ओबीसी के बारे में ऐसा नहीं है. उन के पास भूमि है, साधन हैं. हालांकि, शिक्षा के मामले में वे भी वंचित हैं.’’

‘‘तो तुम यह मानती हो कि यह सरकार की साजिश है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘एक तरह से कह सकते हैं. जनरल कैटेगरी में जज का बच्चा जज बन सकता है, डाक्टर का बच्चा डाक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बच्चा इंजीनियर बन सकता है, पर वंचितों में क्रीमी लेयर की फांस लगा कर उन्हें ऐसा करने से रोक दो कि आप की एक पीढ़ी ने आरक्षण का फायदा ले लिया है, अब अगली पीढ़ी को अपने दम पर यह मुकाम हासिल करना होगा.

‘‘यहां पर एक सामाजिक पहलू भी है. जिस एससीएसटी और ओबीसी के बच्चे अपने मांबाप की बड़ी सरकारी नौकरी की वजह से अब पढ़ाईलिखाई में बेहतर रिजल्ट दे रहे हैं, यह उन्हें मानसिक रूप से दबाने की भी कोशिश है.

‘‘लेकिन टीना डाबी जैसे होनहार जनरल कैटेगरी को टक्कर दे रहे हैं. वे आईएएस टौपर तो थीं ही, उन्हें कथिततौर पर 12वीं जमात के बोर्ड इम्तिहान में 93 फीसदी अंक मिले थे, जिस में राजनीति विज्ञान और इतिहास दोनों में 100 अंक शामिल हैं. सोशल मीडिया पर उन की मार्कशीट वायरल हुई थी,’’ अनामिका बोली.

‘‘मान ली तुम्हारी बात, पर सोशल मीडिया पर कही बात जरूरी नहीं कि सही हो,’’ विजय ने शक जाहिर किया.

‘‘उत्तर प्रदेश में सर्वोदय विद्यालय, मिर्जापुर की 25 छात्राओं में से 12 ने इस साल देश की सब से मुश्किल मैडिकल प्रवेश परीक्षा यानी नीट पास की थी. ये सभी छात्राएं एससी, एसटी और ओबीसी परिवारों से आती हैं.

‘‘तो हम यह नहीं कह सकते हैं कि इन तबकों के बच्चे होनहार नहीं हैं. वे अब पढ़ाईलिखाई की कीमत समझ रहे हैं. अगर उन्हें सही सीख मिले तो वे खुद को साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं,’’ अनामिका बोले जा रही थी.

‘‘ठीक है, ठीक है, पहले तुम पानी पी लो. मान ली तुम्हारी बात. सरकार को एकदम से कोई कड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी बात रखी है और उस पर बहस की जा सकती है.

‘‘देश में अभी जाति के नाम की समानता बनाने में समय लगेगा. यह कोई ऐसा फैसला नहीं है कि आज लागू हुआ और कल से देश में बदलाव की बयार बहने लगेगी. यहां बात किसी वंचित समुदाय के मालीतौर पर मजबूत होने की नहीं है, बल्कि उन्हें साथ खड़ा रहने की हिम्मत भी देनी होगी.

‘‘जिन बच्चों के मांबाप ने आरक्षण से खुद को ऊंचा उठाया है, उन बच्चों में थोड़ा आत्मविश्वास आया है, पर अभी दूर तक जाना है और सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले हर पहलू पर गौर करना होगा,’’

विजय ने अनामिका की बात को बैलेंस देते हुए कहा.

‘‘यही आज की जरूरत है. राजनीति और जातिवाद दोनों अलगअलग बातें हैं. अगर कोई सरकार ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा देने की पहल करती है, तो उसे वाकई सब को साथ ले कर चलना होगा, तभी देश में तरक्की दिखाई देगी,’’ अनामिका ने अपनी बात खत्म की.

इस के बाद विजय ने लंच का बिल दिया और वे दोनों उस रैस्टोरैंट से बाहर निकल गए. अभी मेला देखना जो बाकी था. Hindi News Story

Hindi Funny Story: गर्व से कहो हम भ्रष्ट हैं

Hindi Funny Story, लेखक – जे. शर्मा

बस कंडक्टर की रोचक बातों ने मेरा दिल जीत लिया था. मैं जब भी अपना 500 रुपए का कड़क नोट उस की तरफ बढ़ाता, वह बारबार मेरी अनदेखी करते हुए आगे निकल जाता और दूसरी सवारियों की टिकटें काटने लगता.

मेरा माथा ठनका कि आज कुछ न कुछ गलत हो कर रहेगा. यह 500 का नोट कई बार बहुत बड़ी मुसीबत में डाल देता है.

खैर, सब की टिकटें काटने के बाद वह बस कंडक्टर मुसकराता हुआ मेरे पास आ कर बैठते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, मैं ने आप को पहले भी इस रूट पर देखा है. आप फूड सप्लाई महकमे में काम करते हैं न?’’

मैं ने सोचा कि शायद इस गलतफहमी में मैं टिकट लेने से बच जाऊंगा. लिहाजा, मैं ने हामी भर दी.

कंडक्टर ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘बाबूजी, हमारे चाचा के साले का लड़का भी आप के महकमे में है.

संपत दलाल… नाम सुना होगा आप ने… बहुत ऊंची पोस्ट पर है. राजधानी में एक बड़ी सी कोठी है उस की.

‘‘वैसे, एक बात है बाबूजी कि आप के महकमे में पैसा बहुत है. राइस मिल या फ्लोर मिल वालों को जरा सा इशारा कर दो, बोरी भर कर नोट आप के आंगन में फेंक जाएंगे. आप रातभर बैठे गिनते रहो, सुबह हो जाएगी…’’

वह थोड़ी सांस ले कर आगे बोला, ‘‘मेरा तो यही मानना है कि मुझे अगले जनम में फूड सप्लाई की नौकरी मिले, चाहे चपरासी ही क्यों न बनना पड़े…

‘‘और एक बात सुनो… हमारे पड़ोस में मोहनलाल की कोठी है. वह कस्टम महकमे में चपरासी है. क्या शान है उस की. गाड़ी है, घर में एयरकंडीशनर लगा है. वह हर समय मोबाइल फोन पर बातें करता रहता है और उस के घर के लोग काजूकिशमिश ऐसे चबाते हैं, जैसे मूंगफली के दाने चबा रहे हों. यह सब देख कर मेरे मन में लड्डू फूटने लगते हैं…’’

लेकिन कुछ देर बाद वह थोड़े उदास लहजे में बोला, ‘‘और एक हम सरकारी बसों के कंडक्टर हैं कि सारी उम्र रुपए 10 रुपए का टांका लगालगा कर ही बूढ़े हो जाते हैं. पता नहीं, हमारा अच्छा समय कब आएगा.

‘‘मैं ने 2 लाख रुपए की रिश्वत दे कर अपने छोटे बेटे को म्यूनिसिपल के दफ्तर में चपरासी लगवा दिया है, लेकिन वह ससुरा तो मुफ्त में लोगों के काम करवाता फिरता है. मैं उस से कहता हूं कि 2 लाख रुपए जमा करने में मेरी कमर टेढ़ी हो गई है, वे तो वसूल कर के ला.

‘‘मैं ने भी उसे बोल दिया है कि बेटा, जल्दी ही तेरी शादी कर के तुझे अलग कर दूंगा. जब तेरे बच्चे होंगे और खर्च बढ़ेगा, तब तू खुद ही हाथपैर मारेगा. सारे उसूल धरे के धरे रह जाएंगे.

‘‘अच्छा बाबूजी, आप से हुई बातें बहुत मजे की रहीं. रास्ता कट गया. आप वह 500 रुपए का नोट दिखा रहे थे न… लाओ, मैं आप का टिकट बना देता हूं.

‘‘आजकल टिकट चैकर भी बहुत दुखी करते हैं. महीना तो बंधा है, मगर फिर भी उन की नीयत खराब रहती है. सोचते हैं कि पता नहीं कंडक्टर कितनी लूट मचाते हैं.’’

मीठीमीठी बातें करता हुआ वह कंडक्टर 35 रुपए अपनी जेब में रख लेता है और टिकट नहीं बनाता.

बाकी रुपए वापस करते हुए वह कहता है कि आप जहां कहोगे, हम वहीं उतार देंगे.

मैं भी सोचता हूं कि चलो इसी बहाने मेरे ईरिकशा के 20 रुपए बच जाएंगे. Hindi Funny Story

Best Family Story: फर्ज

Best Family Story: उस ने बाइक एक ओर खड़ी की और सामने महाराज के होटल पर जा कर कोने में पड़ी बैंच पर बैठ गया. सुनील ने उस से नमस्ते की, लेकिन वह खामोश ही रहा.

‘‘सब अपने बाप का नौकर ही समझते हैं,’’ थोड़ी देर के बाद वह बड़बड़ाया. अनायास ही उस का स्वर कुछ तेज हो गया था.

‘‘क्या हुआ दीवानजी, क्या किसी से झगड़ा हो गया?’’ सुनील ने उस से पूछा.

‘‘झगड़ा क्या होगा. इस नए थाना प्रभारी की घरवाली तो ऐसा और्डर मारती है, जैसे मैं सिपाही नहीं इस के बाप का नौकर हूं.

‘‘अगर कुछ कहो तो बस… जिसे देखो वही हम जैसे छोटे लोगों पर ही रोब दिखाता है,’’ अंदर घुमड़ रहा गुस्सा अनायास ही उस के शब्दों को गंदा कर रहा था.

‘‘आज काफी गुस्से में लग रहे हैं दीवान चाचा,’’ उस ने देखा कि मुकेश उस की बैंच पर आ कर बैठ गया था वहीं और उस से पूछ रहा था.

मुकेश उसे ‘चाचा’ ही कहता है. मुकेश वैसे तो फलों का ठेला लगाता है, लेकिन असलियत में पहले वह एक चोर था, जो अकसर छोटीमोटी चोरियां किया करता था. उस पर चोरी के 1-2 मुकदमे भी दर्ज थे. लेकिन जब से उस ने मुकेश को समझाया था, तब से मुकेश चोरी का धंधा छोड़ कर फलों का ठेला लगाने लगा था.

मुकेश की एक बहन रजनी उसे ‘बाबूजी’ कहती है. वह अकसर गश्त करतेकरते मुकेश के घर चला जाता. मुकेश की बहन अकसर कह देती कि उन के होने से उन्हें लगता ही नहीं है कि वे लोग अनाथ हैं. उसे भी न जाने क्यों उन दोनों से लगाव सा हो गया था.

वह शहर के बहुत से लोगों को जानता है, जो कोतवाली में खर्चापानी देते रहते हैं. वैसे गैरकानूनी काम करने वाले सभी पुलिस को हफ्ता देते हैं.

उसे भी कई लोगों ने खर्चा देना चाहा, लेकिन उस ने साफतौर पर लेने से मना कर दिया. पहले चोरउचक्के, गिरहकट उस के नाम से कांपते थे, लेकिन इस के बावजूद उस ने कभी वरदी का रोब डाल कर कुछ ऐंठने की कोशिश नहीं की, बल्कि वह ऐसे लोगों को गिरफ्तार करता, लेकिन साहब लोगों की मेहरबानी से वे शाम तक ही बाहर आ जाते.

और तो और उस को जम कर फटकार भी लगाई गई कि उस ने उन को गिरफ्तार ही क्यों किया. तब से उस ने फर्ज को भूल कर ऐसी भूल दोबारा नहीं की. वह जानता था कि सोने का अंडा देने वाली मुरगी को कौन हलाल करना चाहेगा.

तभी सचिन उस के आगे 2 कप चाय और प्लेट में नमकीन रख गया. वह समझ गया कि अंदर आते समय मुकेश ने चाय के लिए बोल दिया होगा.

पहले तो उस का मन नहीं हुआ कि वह चाय पिए. अभी वह एक पैग लगा आया था. नाइट ड्यूटी थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी वरना वह अकसर रात में दारू पीता है, लेकिन फिर भी वह बिना कुछ बोले चाय का गिलास उठा कर चाय पीने लगा, जिस से उसे कुछ राहत महसूस हुई.

‘‘क्या हुआ दीवान चाचा, आज काफी गुस्से में लग रहे हैं?’’ मुकेश ने दोबारा उस से पूछा.

‘‘रिटायरमैंट के 2 साल रह गए हैं. सोचता हूं कि सुकून से कट जाएं, लेकिन ये सब… सुबह विवेक साहब की बीवी ने कुछ सामान लाने को कहा था और दारोगा ने एक आदमी को लाने के लिए भेज दिया था, जिस से सामान ला कर देने में कुछ देर हो गई, बस वह बिगड़ पड़ी जैसे मैं सिपाही नहीं, बल्कि उस का घरेलू नौकर हूं,’’ वह बोला.

‘‘आजकल संजय सिपाही तो बहुत लूट रहा है,’’ मुकेश बोला.

‘‘आजकल लूट कौन नहीं रहा है. मैं तो समझता था कि नए लड़केडिपार्टमैंट के मुंह पर लगी कालिख को साफ कर कुछ नया करेंगे, लेकिन ये तो और ज्यादा खाऊ निकले.

‘‘पहले तो कभीकभी कोई फंस जाता था, उसे ही हलाल किया जाता था, लेकिन ये नए लड़के तो शिकार की तलाश में ही घूमते रहते हैं,’’ वह गहरी सांस लेते हुए बोला.

चाय का गिलास खाली हो गया था. उस ने गिलास मेज पर रख दिया. तभी बाहर कुछ शोर सुनाई दिया.

शोर सुन कर उस का ध्यान होटल से बाहर गया. उस ने देखा कि सामने 2 लड़कों में किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था, जो गालीगलौज के बाद हाथापाई पर उतर आये थे, जिस से वहां काफी भीड़ जमा हो गई थी.

तभी वहां बाइक से सिपाही सुधीर और संजय आ गए. वह सम?ा गया कि किसी ने उन को फोन कर दिया है. बाइक से उतरते ही वे उन दोनों लड़कों को डांटडपट कर बाइक पर बिठा कर चौकी की ओर ले गए.

यह देख कर वह समझ गया कि अब दोनों से अच्छीखासी रकम वसूल कर सुलह करवा दी जाएगी.

‘‘दीवान चाचा, आज तो दोनों की मोटी कमाई हो जाएगी. दोनों पार्टी मोटी हैं,’’ मुसकराते हुए मुकेश ने उस से कहा.

मुकेश की बात सुन कर वह कुछ नहीं बोला.

आज इतने साल ड्यूटी के बीत गए थे, लेकिन उस ने वरदी पर रिश्वत जैसा दाग लगने नहीं दिया था और न ही वह कभी अपने फर्ज से पीछे हटा, जिस का उसे इनाम भी मिला था.

एसपी साहब ने उस की बेहतर कार्यशैली के चलते उसे स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सिपाही से दीवान बना दिया था, जिस से उस को लगा था कि चलो ईमानदारी से ड्यूटी करने का उसे कुछ तो फायदा मिला.

लेकिन यह खुशी भी उस के लिए कुछ दिन की ही थी.

उस दिन वह नाइट ड्यूटी कर के घर लौट रहा था, तभी रास्ते में उस ने अनुज को देखा जो नशीले पदार्थों की तस्करी किया करता था. वह काफी दिनों से उस की रडार पर था.

आज उस ने स्मैक बेचते रंगे हाथ अनुज को गिरफ्तार कर लिया. इस दौरान 2-4 हाथ भी उस ने उसे मार दिए और उसे थाने ले आया. उस ने यह भी नहीं सोचा कि वह साहब का खास आदमी है और फिर विवेक साहब ने उस को मिली पट्टियां उतरवा दीं और वह फिर दीवान से सिपाही बन गया था.

‘‘आराम नहीं है आप की नौकरी में,’’ मुकेश बोला.

‘‘आराम और वह भी इस नौकरी में… सत्तर खसम होते हैं इस नौकरी में, एसपी साहब आए या फिर आईजी डीआईजी सब की बस जेबें गरम होनी चाहिए… कहीं से ला कर दो इन को, पर इन का पेट पहले भरो, फिर कहा जाता है कि ईमानदारी से नौकरी करो, ड्यूटी पर फर्ज निभाओ…

‘‘कर तो रहा हूं ईमानदारी से… आधी तनख्वाह तो साहब लोगों को मुरगाबकरा खिलाने में चली जाती है और आधी से घर चलाओ.

‘‘2 बार सिपाही से दीवान बना, लेकिन इस विवेक सिंह ने वह भी छीन लिया, लेकिन फिर भी दीवान भानु प्रताप ही रहूंगा… देखता हूं कौन रोकेगा मुझे,’’ वह कुछ तेज स्वर में बोला.

‘‘दीवान चाचा, आप ने लगाई हुई है शायद. आप को चढ़ गई है. ऐसा कीजिए कि आप अब घर चले जाइए. मैं भी अपने ठेले पर जाता हूं. कहीं किसी ने आप की वीडियो वगैरह बना ली तो…’’ मुकेश घबरा कर इधरउधर देखते हुए बोला और तुरंत उठ कर होटल से बाहर चला गया.

उसे भी अपनी गलती का एहसास हो गया. वह भी जानता है कि आजकल वैसे भी लोग पुलिस को अपना दुश्मन ही समझते हैं.

पता नहीं कौन मौके का फायदा उठा ले और उस की इस तरह की बेवजह की बातें मोबाइल में रिकौर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दे और वह सफाई देता घूमता रहे.

आज कितने बरस हो गए पुलिस की नौकरी करते हुए, लेकिन आज भी हालात उस के जस के तस हैं. जितनी तनख्वाह मिलती है, उस से वह ढंग से परिवार भी नहीं चल पाता.

2 बेटियां हैं. एक की तो जैसेतैसे कर्ज ले कर शादी कर दी, लेकिन दूसरी कुंआरी घर में बैठी है. अभी तक उस के हाथ पीले नहीं कर पाया.

एक बेटा है वह भी ग्रेजुएशन करने के बाद बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो गया है. लड़की की शादी के बाद उस पर कर्ज भी काफी हो गया है. सभी सम?ाते हैं कि पुलिस में है, तो उस के पास बहुतकुछ होगा, लेकिन लोग यह नहीं समझते कि उस जैसे सिपाही कमाई नहीं कर पाते और हराम का पैसा लेना उस की फितरत में नहीं.

वैसे भी सभी को पता है कि हराम का पैसा जैसे आता है, वैसे ही चला जाता है. कभीकभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि कुछ खानेपीने की इच्छा होती है, लेकिन मन मारना पड़ जाता है.

‘‘अरे भानु, तुम यहां बैठे हो और मैं तुम्हें कब से ढूंढ़ रहा हूं. तुम्हारा नंबर भी बंद बता रहा है,’’ तभी उस की तंद्रा भंग हुई. उस ने देखा कि सामने दीपक खड़ा हुआ था. वही उस से पूछ रहा था.

‘‘कहीं नहीं, नाइट ड्यूटी है बस इसीलिए चाय पीने चला आया था. शायद मोबाइल चार्ज नहीं किया था, इसीलिए स्विचऔफ हो गया होगा,’’ उस ने दीपक से कहा.

दीपक भी सिपाही की पोस्ट पर था, लेकिन उस का रहनसहन किसी अफसर से कम नहीं था. दीपक अलग से कमाता भी खूब था और साहब लोगों पर खर्च भी करता था, इसलिए साहब लोग उस से खुश भी रहते थे.

दीपक ने कई बार उसे समझाया था कि अलग से कुछ कमा लिया करो. कम से कम तनख्वाह तो बच जाएगी और घरपरिवार तो सही से चला सकोगे.

दीपक ने उसे कमाने के मौके भी दिए. एक बार वह दीपक के साथ चौकी पर बैठा हुआ था, तभी जमीनी विवाद का मामला आ गया.

दीपक ने 25,000 रुपए में मामला सैट कर दिया. उस ने मामले को निबटाने के लिए कहा और खुद एक बड़े मामले को निबटाने चला गया.

उस ने विवाद को बहुत ही सूझबूझ से निबटा दिया, लेकिन वह रुपए लेने की हिम्मत न कर सका. जब यह बात दीपक को पता चली, तो उस ने उसे बहुत सुना दिया था.

वह भी क्या करे, उस का जमीर यह कभी गवारा नहीं कर पाया कि वह किसी से हराम का पैसा ले.

‘‘कहां खो गए जनाब…’’ तभी एक बार फिर दीपक ने उस से कहा.

‘‘बस, ऐसे ही. और बताओ कैसे आना हुआ?’’ यादों के भंवर से वापस आ कर उस ने दीपक से पूछा.

‘‘मैं यह कह रहा था कि भतीजे को पुलिस में भरती क्यों नहीं करवा देते… फार्म वगैरह भरवा दो, भरती निकली है. मैं ने ऊपर साहब लोगों से 2 लाख में बात भी तय कर ली है. बस, यही तुम को बताना था,’’ दीपक ने उसे धीरे से बताया.

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ उस ने दीपक से कहा.

‘‘अच्छा, चलता हूं. ड्यूटी का टाइम है,’’ दीपक बोला और वहां से चला गया. वह भी उठ कर होटल से बाहर आ गया और कमरे की ओर चल दिया. सामने से निकल रहे आटोरिकशा को रोक कर उस में बैठ गया.

उसे पता बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि वह अकसर आटोरिकशा या फिर रिकशा से ही आताजाता है.

पता नहीं क्यों आज उसे एहसास हो रहा था कि अगर उस ने भी और लोगों की तरह रिश्वत ली होती तो वह
अपनी जिंदगी ऐशोआराम से जीता. वह जानता है कि उस ने जिंदगी जी नहीं बल्कि ढोई है.

ग्रेजुएशन पूरी होने के बाद रोहन ने नौकरी के लिए बहुत हाथपैर मारे, इंटरव्यू भी दिए, लेकिन बिना रिश्वत के वह नौकरी न पा सका.

उस की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह लाख 2 लाख का इंतजाम कर सके. छोटीमोटी नौकरी वह करना नहीं चाहता, जिस के चलते रोहन आवारागर्दी करने लगा और उस के नाम पर लोगों से वसूली करने लगा, जिस की वजह भी वह खुद को समझता है.

अब तो उसे घर से मतलब ही नहीं रह गया था. उसे फिक्र थी कि रिटायरमैंट करीब है और उस के बाद मामूली सी पैंशन मिलनी है, तब कैसे गुजारा हो पाएगा.

‘‘साहब, आप का घर आ गया,’’ तभी आटोरिकशा वाले की आवाज सुन कर वह यादों के भंवर से निकल कर धरातल पर आ गया.

उस ने 10 रुपए निकाल कर आटो रिकशा वाले को दे दिए. वह जानता है कि अगर वह रुपए नहीं देगा तो भी वह रुपए नहीं मांगेगा, लेकिन वह कभी किसी गरीब का हक नहीं मारता.

कमरे पर पहुंच कर उस ने मोबाइल निकाल कर चार्जिंग पर लगा दिया और उस का स्विच औन कर दिया. फिर वह सामने रखी कुरसी पर बैठ गया. उस ने अपनी आंखें बद कर लीं.

तभी किसी ने दरवाजे को खटखटाया. उस ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने होमगार्ड विनोद था.

‘‘साहब ने आप को तुंरत बुलाया है. आप का मोबाइल बंद था, इसलिए साहब ने आप को लेने के लिए भेजा है,’’ विनोद ने उस से कहा.

किसी अनहोनी के डर से उस का दिल घबराने लगा. वह सम?ा गया कि मैडम ने ही साहब को बताया होगा.

सुबह उस ने मैडम से गुस्से में आ कर कह दिया था, ‘‘मेमसाहब, आप अपना सामान किसी और से मंगा लिया करें, मैं आप का कोई नौकर नहीं हूं.’’

वह जानता है कि विवेक साहब उसे किसी लफड़े में डाल कर लाइन हाजिर भी करवा सकते हैं. वह पछता रहा था कि बेकार में ही वह ताव खा गया. इतने साल कट गए थे, ये 2 साल भी काट लेता. घर के हालात, कुंआरी बेटी का बोझ और बेरोजगार बेटा सब उसे भयानक सपने की तरह डराने लगे थे. उस का दिल अनायास ही धड़कने लगा था.

वह कोतवाली पहुंचा. सामने ही विवेक साहब कुरसी पर बैठे हुए थे. उन्हें देख कर उस के माथे पर पसीना आ गया था. वह सोच रहा था कि वह साहब और मेमसाहब से माफी मांग लेगा कि गलती हो गई, ज्यादा होगा तो पैरों पर गिड़गिड़ा कर माफी मांग लेगा. कम से कम नौकरी तो बच जाएगी. अनायास ही वह सोच गया.

आज उसे ऐसा लग रहा था कि वह बेवजह ही दावा करता था कि अपराधी उस से डरते हैं, जबकि आज उस में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह गलत का विरोध कर सके.

‘‘जय हिंद सर,’’ उस ने साहब को देख कर एक जोरदार सैल्यूट किया.

‘‘क्यों भानु प्रताप, आजकल यह मुकेश कुछ नहीं दे रहा है?’’ उसे देख कर विवेक साहब बोले.

वह समझ गया कि यह सारा मामला पैसों का है.

‘‘साहब, वह मुकेश अब फलों का ठेला लगा रहा है. उस ने चोरी करनी छोड़ दी है,’’ उस ने बताया.

‘‘यह नौटंकी तो ये सब करते हैं.’’

‘‘नहीं सर, मुकेश ने सचममुच गलत धंधा छोड़ दिया है.’’

‘‘इसीलिए इस को 5 लाख रुपयों की लूट में धर दिया. कल सुबह खुलासा करना है. 2 को पकड़ लिया है, एक फरार है. अब इस को भी उठवाया है.

‘‘एक घंटे में मुठभेड़ भी दिखानी है और तुम भी साथ में रहोगे,’’ विवेक साहब उसे घूरते हुए बोले.

‘‘लेकिन सर…’’ वह बोला.

‘‘मुझे मालूम है कि आजकल तुम्हारी तुम्हारी मुकेश से कुछ ज्यादा ही छन रही है. क्यों रिटायरमैंट पर अपनी फजीहत कराने पर तुले हुए हो…’’ साहब कुछ तीखे स्वर में बोले.

डकैती और मुठभेड़ का नाम सुन कर वह समझ गया कि मुकेश के साथ नाइंसाफी हो रही है. न वह उस से चोरी छुड़वाता और न वह उस से इतना लगाव रखता, तो शायद आज मुकेश को यह दिन नहीं देखने पड़ते. वह भी क्या करे, ड्यूटी तो करनी ही थी.

‘‘जय हिंद साहब,’’ तभी किसी की आवाज पर वह चौंक गया. सामने सुधीर खड़ा था, जो साहब को ‘नमस्ते’ कह कर बता रहा था.

बाहर आ कर उस ने देखा कि मुकेश के हाथों में हथकड़ी थी और उसे जेल में बंद कर दिया गया था. अंदर 2 लोग और थे जो असलियत में लुटेरे थे.

कुछ ही देर में तीनों को गाड़ी में बिठा दिया गया. साहब आगे गाड़ी में बैठ गए और वह भी 3 सिपाहियों के साथ गाड़ी में बैठ गया.

मुकेश उसे देख रहा था, लेकिन उस की मुकेश से नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

कुछ समय बाद गाड़ी रुकी. उस ने देखा कि वे लोग जंगल के किनारे आ गए थे. विवेक साहब ने मुकेश को गाड़ी से बाहर निकलवाया और एक पिस्टल उसे पकड़ा दी.

मुकेश बुरी तरह से डर कर कांप रहा था. वह डर कर भागा. साहब ने उसे इशारा किया और उस ने मुकेश के पैर पर निशाना साध कर फायर कर दिया.

एक धमाका हुआ और मुकेश वहीं गिर गया और वह भी ‘धम’ से वहीं बैठ गया. Best Family Story

Best Hindi Story: लालच

Best Hindi Story: रामपुर की फिजाओं में सरसों की बसंती महक घुली हुई थी. खेतों का पीला आवरण मानो धरती का सिंगार कर रहा था. गांव की चौपाल पर ठहाकों और बहसों का दौर हमेशा की तरह जारी था.

लेकिन इन सब के बीच पारुल एक अलग ही दुनिया में जी रही थी. रूप ऐसा कि जैसे कुदरत ने फुरसत में तराशा हो. गोरा रंग, अल्हड़ स्वभाव और आंखों में सुनहरे भविष्य की चमक. वह सपने बुनती थी कि एक छोटा सा घर हो, जीवनसाथी का अटूट साथ हो और खुशियों से भरी गृहस्थी हो.

जब पारुल की शादी विनोद से हुई, तब वह बहुत खुश थी. लाल जोड़े में लिपटी, हीरे सी दमकती पारुल उस दिन किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. विनोद का प्यार और उपहारों की बौछार ने पारुल को यह विश्वास दिला दिया कि बस यही असली जिंदगी है.

लेकिन, समय ने करवट ली और सुनहरे सपने कालिख में बदलने लगे. विनोद के बरताव में आया बदलाव धीमे जहर की तरह था. शराब का नशा, देर रात की वापसी, और फिर वह भयावह दौर जहां प्यार की जगह गालियों ने और इज्जत की जगह मारपीट ने ले ली.

पारुल का कोमल मन अब कांच की तरह दरक चुका था. उस की वह कुदरती मुसकान, जो कभी गांव की पहचान थी, अब दहशत में बदल गई थी.

फिर आई वह काली रात, जिस ने सबकुछ बदल दिया. पतिपत्नी के बीच हुआ झगड़ा. सुबह एक सन्नाटे में तबदील हो गया. ड्राइंगरूम के बीचोंबीच विनोद की लाश पड़ी थी. छाती में गोली थी और पास पड़ी पिस्तौल पर पारुल की उंगलियों के निशान थे. उस ने अपना जुर्म कबूल तो किया, लेकिन उस की पथराई आंखों में कैद ‘क्यों’ का जवाब कोई पढ़ नहीं सका.

अदालत, जमानत और गांव वालों की कानाफूसियों के बीच पारुल एक जीतीजागती लाश बन चुकी थी. इसी अंधकार में एक जुगनू की तरह आया करण. वह अदालत जाने वाली उस की कार का ड्राइवर था. सादगी की मूरत करण ने बिना किसी सवाल के पारुल को वह सहारा दिया, जिस की उसे सख्त दरकार थी.

पारुल को लगा कि जिंदगी उसे दूसरा मौका दे रही है. दोनों ने शादी कर ली. लेकिन शायद पारुल की किस्मत में सुख का यह अध्याय भी लिखा ही नहीं था. एक सड़क हादसे में करण की मौत ने उसे फिर उसी अकेलेपन में धकेल दिया.

इस बार पारुल टूटी नहीं, बल्कि पत्थर जैसी कठोर हो गई. उस का दुख अब एक ठंडी आग बन चुका था. करण के बड़े भाई संदीप के साथ उस के संबंध हमदर्दी से शुरू हो कर एक अलग मोड़ पर पहुंच गए थे.

समाज ने थूथू की, लेकिन पारुल को अब समाज की परवाह नहीं रह गई थी. उस के दिमाग में अब केवल एक ही जुनून सवार था… हक. करण के हिस्से की वह 9 बीघा जमीन, जिसे वह अपना हक मानती थी.

सास सुशीला का यह कहना कि ‘जब बेटा ही नहीं रहा, तो बहू का हक कैसा?’ पारुल के भीतर दबे ज्वालामुखी को भड़काने के लिए काफी था. बेइज्जती का यह घूंट उस ने पी तो लिया, लेकिन उस के जेहन में एक खौफनाक साजिश ने जन्म ले लिया.

लालच और बदले की आग में पारुल ने अपनी बहन कविता और उस के प्रेमी अनिकेत को मोहरा बनाया. एक प्लान की हुई डकैती की आड़ में सास सुशीला की हत्या करवा दी गई.

शुरुआत में पुलिस भ्रमित रही, लेकिन अपराध कभी छिपता नहीं. पारुल का अचानक गायब होना ही उस के गले का फंदा बन गया. जब वह पकड़ी गई, तो उस का बयान किसी भी संवेदनशील इनसान को झकझोरने के लिए काफी था, ‘‘जो चीजें मांगने से नहीं मिलतीं, उन्हें छीनना पड़ता है.’’

अदालत का वह सीन रोंगटे खड़े करने वाला था. संदीप, जो अब अपने परिवार और अपनी प्रेमिका दोनों को खो चुका था, सिर झुकाए बैठा था. बूढ़े ससुर हरिराम की आंखों में निराशा थी.

पारुल ने आखिर तक दांवपेंच लड़ाए, खुद को बेकुसूर साबित करने की कोशिश की, पर अनिकेत के साथ हुई उस की एक फोन रिकौर्डिंग ने उस की सारी दलीलों को ढहा दिया. कानून ने भावनाओं को दरकिनार कर सुबूतों पर मुहर लगाई. पारुल को उम्रकैद की सजा मिली.

सालों बाद, काल कोठरी के अंधेरे से पारुल की एक चिट्ठी बाहर आई. संदीप के नाम लिखे उस खत में सिर्फ 4 लाइनें थीं, जिस ने उस की जिंदगी के पूरे सार को निचोड़ कर रख दिया :

‘‘काश, विनोद वाली गोली उस रात मुझे ही लगी होती, तो शायद आज कोई न मरता… न प्यार, न विश्वास और न ही इनसान.’’

संदीप ने वह चिट्ठी दीए की लौ के हवाले कर दी. कागज जल कर राख हो गया और हवा में बिखर गया.

ठीक वैसे ही जैसे पारुल के सपने उस 9 बीघा जमीन की धूल में मिल गए थे.

सूरज ढलते ही बूढ़े हरिराम की उस हवेली में ऐसी मनहूसियत उतर आती है कि कोई परिंदा भी अब पर नहीं मारता. लोग उस ‘शापित’ हवेली के साए से खौफ खाते हैं.

अब यही चर्चा है कि जिस 9 बीघा खेत के लिए पारुल ने हंसताखेलता परिवार को दांव पर लगा दिया था, आज वह बंजर पड़ी है. दौलत तो मिल गई, पर उसे भोगने वाला अब कोई नहीं बचा. वहां अब केवल सन्नाटा है. एक ऐसा सन्नाटा जो चीखचीख कर लालच के अंत की गवाही देता है. Best Hindi Story

Hindi Family Story: मकसद

Hindi Family Story, लेखिका – डा. के. रानी

वन संरक्षक के पद पर काम करते हुए अविनाश को 5 साल हो गए थे. नौकरी के दौरान उन का ज्यादातर समय बहुत अच्छा बीता था. उन की पत्नी रूही ने अपने परिवार की खातिर कभी जौब करने के बारे में सोचा ही नहीं. वे घर पर रह कर बच्चों को पूरा समय देतीं और विभागीय कार्यक्रम के साथ समाजसेवा में बढ़चढ़ कर भाग लेतीं.

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा था. अविनाश की दोनों बेटियां नताशा और न्यासा पढ़ने में बहुत अच्छी थीं. नताशा अभी ग्रेजुएशन कर रही थी. पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद न्यासा का रु?ान सिविल सेवा की ओर था. वह उस के लिए तैयारी भी कर रही थी, लेकिन उस की मेहनत कामयाब नहीं हो पा रही थी.

रूही ने बेटियों को बहुत अच्छे संस्कार दिए थे. खुद भी वे संस्कारवान थीं, लेकिन अविनाश का स्वभाव थोड़ा उग्र था. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन शांति की कमी थी.

रूही को अविनाश की ऊपरी कमाई से एतराज था. वे दबे स्वर में इस का कई बार विरोध भी कर चुकी थीं, लेकिन अविनाश कुछ सुनने को तैयार नहीं थे.

‘‘घर में ये जितने ठाटबाट हैं न, ये केवल तनख्वाह से नहीं आते. इस के लिए और कुछ भी करना पड़ता है,’’ अविनाश बोले.

‘‘हमारे पास सबकुछ अविनाश. हमें इस की जरूरत क्या है?’’ रूही बोलीं.

‘‘यह तुम नहीं समझोगी. अच्छा होगा कि तुम इस मामले में दखल न दिया करो और चैन की जिंदगी बसर करो. मौज करो और बेटियों को भी कुछ सिखाओ. हर समय घर के अंदर किताबों में घुसी रहती हैं. न कामयाबी हासिल कर पा रही हैं और न ही अपने लिए कोई अच्छा वर,’’ अविनाश गुस्से से बोले.

अविनाश को अपने पद का अभिमान था. अपने से छोटे कर्मचारियों को वे कुछ न समझते थे और सब के सामने कई बार उन की बेइज्जती भी कर देते थे.

औफिस में घुसते ही अविनाश सब से पहले औफिस असिस्टैंट रामदीन पर बरसते… रोज कोई न कोई नया बहाना ले कर. कभी तुम ने औफिस की सफाई ठीक से नहीं की तो कभी सामान ठीक से नहीं रखा. उन के हर काम का समय बंधा हुआ था. वे उसी के हिसाब से दूसरों से भी काम की उम्मीद रखते थे.

रामदीन को यहां काम करते हुए पूरे 30 बरस हो गए थे. 2 साल बाद उन्हें रिटायर होना था. वे बहुत मेहनती थे और दिल लगा कर काम करते थे.

पर अविनाश को तो जैसे औफिस के हर कर्मचारी से शिकायत थी. आज भी औफिस आते ही उन्होंने सब से पहले घंटी बजा कर रामदीन को बुलाया और कहा, ‘‘बड़े बाबू को बुला कर लाओ.’’

रामदीन ने बड़े बाबू को सूचना दी और अपने काम पर लग गए. बड़े बाबू जरा देर में उठ कर बौस के कमरे की ओर बढ़ गए. उन से कुछ पूछने की बजाय उन्होंने फिर घंटी बजाई और बोले, ‘‘क्या तुम ने बड़े बाबू को सही समय पर सूचना नहीं दी थी रामदीन?’’

‘‘दे दी थी साहब,’’ रामदीन ने कहा.

‘‘तो फिर वर इतनी देर से क्यों आए? तुम से अब नौकरी नहीं हो पाती तो काम छोड़ दो. बहुत सारे बेरोजगार हैं, जो यह काम करने के लिए तैयार हैं,’’ अविनाश चिल्लाए.

बात को आगे न बढ़ाते हुए रामदीन बोले, ‘‘गलती हो गई. माफ कर दीजिए.’’

लेकिन अविनाश का गुस्सा अभी उतरा नहीं था. वे इसी बात को ले कर बड़ी देर तक नसीहतें देते रहे.

बड़े बाबू सबकुछ सुन रहे थे, लेकिन उन की हिम्मत कुछ कहने की न हो सकी.

‘‘सर, आप ने मुझे बुलाया था…’’ बड़े बाबू ने पूछा.

‘‘आप यहां से जाइए. इस समय मेरा मूड ठीक नहीं है,’’ कह कर अविनाश ने बड़े बाबू को वापस भेज दिया.

अविनाश को अपने सामने हर कोई बहुत तुच्छ नजर आता था. बड़ेछोटे के बीच की खाई उन्होंने कभी पाटनी नहीं चाही थी. रामदीन बौस की बात से बहुत आहत थे. सारा दिन वे अनमने ही रहे. घर आ कर भी वे उदास थे. वे सोच रहे थे, ‘अपना बेटा पलाश कुछ बन जाए, फिर आराम करूंगा. बहुत नौकरी कर ली है.’

रूही और अविनाश न्यासा के भविष्य को ले कर चिंतित थे. न्यासा मास्टर्स करने के बाद एक कोचिंग इंस्टिट्यूट से कोचिंग ले रही थी. उम्र बढ़ रही थी और अभी भी वह कंपीटिशन में कामयाबी हासिल नहीं कर सकी थी. अविनाश चाहते थे कि वह शादी कर ले.

अविनाश ने न्यासा को कई बार समझाया, ‘‘न्यासा, कंपीटिशन के साथसाथ और जगह भी ट्राई करती रहो. कभी किस्मत साथ दे जाती है और सबकुछ देखते ही देखते बदल जाता है.’’

‘‘पापा, आप भी कंपीटिशन से यहां पहुंचे हैं. मुझे भी छोटी नौकरी नहीं करनी. आप की तरह बड़ी नौकरी से काम की शुरुआत करनी है.’’

न्यासा की बात सुन कर अविनाश को अच्छा न लगा. वे जानते थे कि उन की बात पर न्यासा हमेशा तीखा जवाब देती है. उसे पापा का बरताव जरा भी अच्छा नहीं लगता था. पढ़ाई तो वह शादी के बाद भी जारी रख सकती थी.

अच्छी पोजीशन वाला लड़का देख कर अगर पहले उस की शादी कर दी जाए, तो ज्यादा ठीक रहता. अभी अविनाश बड़े पद पर थे. न्यासा के लिए रिश्ते भी बहुत आ रहे थे, लेकिन वह सब को मना कर रही थी.

अविनाश बोले, ‘‘रूही, तुम ही न्यासा को सम?ा दो. उस की उम्र बढ़ रही है. उसे कोई लड़का पसंद हो तो बता दे. उस की खुशी की खातिर हम सबकुछ करने को तैयार हैं. शादी भी समय की अच्छी होती है.’’

‘‘यह बात तुम मुझे नहीं न्यासा को कहो. वह पहले कुछ बन कर दिखाना चाहती है. शादी का क्या है, वह तो बाद में भी हो जाएगी,’’ रूही ने अपनी बात कही.

‘‘तुम्हारी इन बातों से उसे बढ़ावा मिल रहा है. आजकल शादी के बाद भी लड़कियां पढ़लिख कर बहुतकुछ बन रही हैं. वह बाद में भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकती है.’’

‘‘तुम उसे ले कर परेशान मत हो. जल्दी ही उसे कामयाबी मिलेगी और उस का घर भी बस जाएगा,’’ रूही ने कहा.

सबकुछ जानते हुए भी रूही ने न्यासा का ही पक्ष लिया. नौकरी पर रहते हुए बेटियों की शादी करने का मजा ही कुछ और था. पदप्रतिष्ठा के साथ अच्छे रिश्तों की कमी नहीं थी. न्यासा ने अपनी ओर से किसी लड़के में कभी उत्सुकता नहीं दिखाई थी. अभी उस का सारा ध्यान पढ़ाई पर था. इसी वजह से वह शादी को तवज्जुह नहीं दे रही थी.

अविनाश की नौकरी का एक साल बाकी रह गया था. इस दौरान अगर न्यासा को कहीं कामयाबी मिल जाती, तो वे तुरंत उस के हाथ पीले कर देते. पर न्यासा को इस बात की चिंता नहीं थी. वह जानती थी कि अच्छे पद पर कामयाबी हासिल करने के बाद उसे जीवनसाथी ढूंढ़ने में कोई परेशानी नहीं होगी. वह अपने लैवल का लड़का देख कर उससे शादी कर सकती है. उस की कई लड़कों से अच्छी दोस्ती थी, लेकिन शादी को ले कर वह अभी सीरियस नहीं थी. दोनों ही अपनी जगह पर सही थे.

पीढ़ी का अंतर साफ दिखाई दे रहा है. इसी वजह से सोच में भी फर्क आया था, लेकिन मम्मीपापा की चिंता अपनी जगह पर वाजिब थी.

न्यासा ने इस बार सिविल सर्विसेज के लिए बहुत तैयारी की थी. उसे उम्मीद थी कि उस का सिलैक्शन हो जाएगा. वह बड़ी बेसब्री से रिजल्ट का इंतजार कर रही थी, लेकिन इस बार भी उसे नाकामी का मुंह देखना पड़ा. रिजल्ट देख कर उसे बहुत तगड़ा झटका लगा था.

अविनाश के लिए भी यह बड़ी परेशानी वाली बात थी. वे बोले, ‘‘रूही, अब बहुत हो गया. कब तक कंपीटिशन के चक्कर में न्यासा अपनी जवानी इस तरह बरबाद करती रहेगी.’’

‘‘यह समय ऐसी बातों का नहीं है. तुम्हें उसे दिलासा देनी चाहिए. ऊपर से तुम उसे ताना मार रहे हो,’’ रूही ने कहा.

‘‘मैं उसे सुना नहीं रहा हूं. तुम्हारे सामने हकीकत बयां कर रहा हूं. कंपीटिशन की तैयारी जिंदगी का मजा लेते हुए भी की जा सकती है. इस बार तो उस ने घर से बाहर निकलना तक छोड़ दिया था. उस की सारी उम्मीद है इसी पर टिकी थी, लेकिन हासिल क्या हुआ?’’

‘‘कोई बात नहीं है. कभीकभी ऐसा हो जाता है. तुम्हें इस समय उसे हिम्मत बंधानी चाहिए,’’ रूही बोलीं.

‘‘अब मेरा भी सब्र टूटा जा रहा है. यह बात तुम नहीं समझोगी,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘तुम बड़ी पोस्ट पर हो. कोई अच्छा सा लड़का देख कर न्यासा की जिंदगी संवार दो,’’ रूही ने अपनी राय दी.

‘‘कोशिश करूंगा. इस ने तो आज तक कभी किसी लड़के का जिक्र तक नहीं किया. घर से बाहर निकले तब तो अपने लिए कोई जीवनसाथी ढूंढ़ेगी. पढ़ाई के पीछे उस ने अपने सारे सपने एक तरफ रख दिए. बस, एक ही धुन ले कर चल रही है,’’ अविनाश बोले तो रूही चुप हो गईं.

एक पिता होने के चलते अविनाश की चिंता वाजिब थी, लेकिन क्या करें? रूही न्यासा को ऐसे हालात में अकेला भी तो नहीं छोड़ सकती थीं. न्यासा का भी एक सपना है. अगर वह कुछ बनना चाहती है तो मम्मीपापा का फर्ज बनता है कि उसे हर तरीके से सपोर्ट करें.

थके मन से अविनाश औफिस पहुंचे थे, लेकिन वहां पर खुशी का माहौल देख कर वे चौंक गए. उन से कुछ पूछते न बना. सब रामदीन को बधाई दे रहे थे. उन की खुशी देखते ही बनती थी. उन्हें समझ नहीं आया कि ऐसी क्या बात हो गई है, जो औफिस असिस्टैंट रामदीन औफिस का हीरो बना हुआ है. उन्होंने घंटी बजाई. रामदीन तुरंत हाजिर हो गए.

‘‘बड़े बाबू को बुलाओ,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘जी साहब,’’ कह कर रामदीन तुरंत कमरे से बाहर निकल गए. थोड़ी देर में बड़े बाबू अविनाश के सामने हाजिर थे.

तभी रामदीन मिठाई ले कर आ गए.

‘‘यह किस खुशी में है?’’ अविनाश ने पूछा.

‘‘सर, रामदीन का बेटा सिविल सर्विस में बहुत अच्छी पोजीशन ले कर कामयाब हो गया,’’ बड़े बाबू ने खुश हो कर कहा.

यह सुनते ही अविनाश का मुंह खुला का खुला रह गया. वे कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि एक औफिस असिस्टैंट का बेटा इतनी ऊंची जगह तक पहुंच सकता है.

उन्होंने मिठाई का एक टुकड़ा तोड़ा और ‘बधाई हो रामदीन’ कह कर अपनी बात खत्म कर दी. इस से आगे उन्होंने रामदीन से कुछ नहीं पूछा.

बड़े बाबू को काम समझा कर अविनाश ने उन्हें भी कमरे से विदा कर दिया था.

यह खबर अविनाश के लिए किसी धमाके से कम नहीं थी. आज तक उन्होंने रामदीन के बारे में कुछ भी जानना नहीं चाहा था. इस समय उन की दिलचस्पी रामदीन के बारे में जानने की थी, लेकिन कोई बताने वाला नहीं था. उन्हें समझ नहीं आ रहा था आखिर पूछें तो किस से?

अविनाश ने तुरंत आज का अखबार मंगवाया और उसे पलट कर देखने लगे. एक पेज पर रामदीन की परिवार के साथ तसवीर छपी थी. वे उसे ध्यान से देखने लगे. ‘कार्यालय सहायक का बेटा बनेगा डीएम’ हैडिंग देख कर वे एकसाथ सारी खबर पढ़ गए. तब जा कर उन्हें पता चला की रामदीन के परिवार में एक
बेटा और एक बेटी है. दोनों ही पढ़ने में होशियार हैं. उस के बेटे को दूसरी बार में यह कामयाबी हासिल हुई थी. हालांकि, वह रिजर्व्ड कैटेगरी का था लेकिन उस ने मैरिट में यह जगह अनरिजर्व्ड सूची में बनाई थी.

अविनाश का आज काम में मन नहीं लग रहा था. रहरह कर उन के सामने कभी रामदीन का तो कभी न्यासा का चेहरा घूम रहा था. उन्हें सम?ा नहीं आ रहा था कहां कमी रह गई जो छोटे पद पर काम करने वाले रिजर्व्ड कैटेगरी के रामदीन का बेटा पलाश इतनी बड़ी कामयाबी हासिल कर गया और सुविधाओं में पलीबढ़ी न्यासा चूक गई.

आज अविनाश औफिस से जल्दी घर चले आए थे. घर पर भी मायूसी छाई हुई थी. रूही चाय पीते हुए उन के सामने बैठी हुई थीं.

अविनाश बोले, ‘‘यही हाल रहा तो न्यासा डिप्रैशन में चली जाएगी. तुम उसे सम?ा कर शादी के लिए राजी कर लो. इस से उस की जिंदगी में खुशी लौट आएगी.’’

‘‘यह काम तुम भी तो कर सकते हो,’’ रूही बोलीं.

‘‘वह मेरी बात नहीं सुनती. हो सकता है तुम्हारी बात मान जाए. तुम्हें वह बहुत मानती है,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘कोशिश कर के देखती हूं. मैं भी उस की खुशी चाहती हूं. कामयाबी हासिल करने के लिए हम ने उसे साधन दिए बाकी काम तो उसे ही करना है,’’ रूही बोलीं.

‘‘वह पढ़ने में अच्छी है और उसे ले कर गंभीर भी है. फिर भी पता नहीं क्यों यह नौबत आ गई,’’ अविनाश बोले.

‘‘मैं उसे शादी के लिए मना भी लूं, लेकिन उस के लिए कोई काबिल लड़का भी तो चाहिए,’’ रूही ने कहा.

‘‘जहां तक वह खुद नहीं पहुंच सकी उस पोजीशन पर उस का जीवनसाथी होगा, तो शायद वह अपनी इस कसक को भूल जाए,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘तुम्हारे लिंक बहुत अच्छे हैं. कोशिश करोगे तो कोई अच्छा लड़का भी मिल जाएगा. अब हमें इस काम में देरी नहीं करनी चाहिए,’’ रूही बोलीं तो अविनाश चुप हो गए.

रात को डाइनिंग टेबल पर अविनाश की न्यासा से मुलाकात हो गई. वह अनमने मन से खाना खा रही थी. रूही उस की हालत को समझ रही थी. इस समय अविनाश कुछ कह कर उसे और दुखी कर सकते थे. रूही ने इशारे से उन्हें चुप रहने का संकेत किया.

अगले दिन औफिस में रामदीन का दमकता चेहरा देख कर अविनाश उन के सामने अपने को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे. कल तक जिस आदमी की हैसियत उन के सामने कुछ नहीं थी, आज वह औफिस में सब का हीरो बना हुआ था.

कुछ देर बाद रामदीन अविनाश के सामने हाजिर हो गए. अपनी आवाज में मिठास घोलते हुए अविनाश बोले, ‘‘रामदीन, मैं तुम्हारी बेटे की कामयाबी पर बहुत खुश हूं. मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं उसे अपने घर डिनर पर बुलाऊं. साथ बैठ कर खाना खाएंगे तो ढेर सारी बातें ही हो जाएंगी.’’

‘‘अभी तो वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में बिजी है साहब. मैं पूछ कर बताता हूं,’’ रामदीन हाथ जोड़ कर बोले, तो अविनाश के चेहरे पर तनाव दिखाई देने लगा.

रामदीन की इस हरकत पर उन्हें बड़ा गुस्सा आ रहा था. हिम्मत तो देखो अपने बौस को डिनर के लिए टाल रहा था.

रामदीन ने अभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया. घर आ कर वे अपनी पत्नी रूपमती से बोले, ‘‘साहब ने हम सब को डिनर पर बुलाया है बेटे की खुशी के लिए.’’

‘‘यह इज्जत तुम्हें नहीं, बल्कि बेटे की उस कामयाबी को मिल रही है, जो उस ने अपनी मेहनत से हासिल की है. इस बारे में उस से बात कर लेना. वही आपको ठीक से समझ सकेगा,’’ रूपमती बोली.

अविनाश भी दिनभर बेटी के भविष्य को ले कर मंथन कर रहे थे. उन्हें लगा कि न्यासा न सही रामदीन का बेटा आज उस पोजीशन पर पहुंच गया था, जिसे वह हासिल करना चाहती थी. अगर वह उसे शादी के लिए मना लें तो उस की जिंदगी संवर जाएगी.

तसवीर में देखने पर पलाश लंबाचौड़ा और खूबसूरत जवान लग रहा था. रामदीन के मुकाबले उस की पर्सनैलिटी बहुत अच्छी थी.

घर आ कर अविनाश ने यह बात रूही से कह दी, ‘‘जानती हो मेरा मेरे औफिस असिस्टैंट रामदीन का बेटा सिविल सर्विसेज में अच्छी पोजीशन लाया है.’’

‘‘यह तो बड़ी खुशी की बात है,’’ रूही ने कहा.

‘‘मैं ने उसे घर पर डिनर का न्योता दिया है,’’ अविनाश बोले.

‘‘तुम यह आयोजन किसी होटल में भी कर सकते हो. अगर तुम्हें उस के बेटे की कामयाबी की इतनी खुशी हुई है तो,’’ रूही तमक कर बोलीं.

‘‘बात समझा करो. होटल और घर के माहौल में फर्क होता है. मैं चाहता हूं कि न्यासा उस से एक बार मिल ले,’’ अविनाश ने अपने मन की बात कही.

‘‘कहां तुम और कहां रामदीन? हमारे स्टेटस में कुछ तो मेल होना चाहिए.’’

‘‘ये सब बाद की बातें हैं रूही. एक बार न्यासा उसे पसंद कर ले, बस उस के बाद समझ लड़का हमारा हुआ. कौन सा हमें रामदीन को बारबार घर पर बुलाना है?’’ अविनाश बोले.

उन्होंने रूही से उस की जाति भी छिपा दी थी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह न्यासा का रिश्ता सिविल सर्विस पास करने वाले लड़के से हो जाए. इतने बड़े सरकारी अफसर की जाति कहां पूछी जाती है.
‘‘कब आ रहे हैं वे डिनर के लिए?’’ रूही ने पूछा.

‘‘अभी वह लड़का पलाश अपने दोस्तों के साथ जश्न मनाने में लगा हुआ है. तुम तो ऐसे लोगों को जानती ही हो. कई दिन तक उन के पैर धरती पर नहीं पड़ेंगे,’’ अविनाश बोले.

अविनाश को पूरी उम्मीद थी कि उन के कहने पर न्यासा रामदीन के बेटे पलाश से मिलने को तैयार हो जाएगी.

एक हफ्ता बीत गया था. रामदीन ने कोई जवाब नहीं दिया था. अविनाश का सब्र चूकने लगा था. वे बोले, ‘‘रामदीन, तुम ने घर पर बात की थी डिनर के लिए?’’

‘‘जी, कहा तो था, लेकिन बेटे को यह सब अच्छा नहीं लग रहा. कह रहा था कि सोच कर बताता हूं,’’ रामदीन बोले.

अविनाश को उस से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. कोई और समय होता तो वे उसे उस की औकात दिखा देते, लेकिन इस समय उन्होंने चुप रहना ही ठीक सम?ा. तेवर दिखा कर बात बिगड़ भी सकती थी.

पलाश को यह समझते देर नहीं लगी थी कि क्यों अचानक अविनाश सर का उस के पापा के प्रति इतना अच्छा बरताव हो गया था.

रामदीन के बारबार कहने पर वह बोला, ‘‘पापा, उन के घर डिनर करने से पहले मैं एक बार कल ही उन से औफिस में मिल लेता हूं. अगर मुझे ठीक लगेगा तो मैं उन के घर आप सब के साथ डिनर पर चला जाऊंगा, लेकिन यह बात उन्हें पहले मत बताइएगा.’’

इस दौरान पलाश ने अविनाश के बारे में सारी जानकारी जुटा ली थी. उन का चरित्र और मकसद सब उस की समझ में आ गया था. अगर वे इतने ही बड़े दिल के होते तो उन के घर आ कर भी बधाई दे सकते थे. रामदीन इन सब बातों से अनजान थे.

अगले दिन पलाश अपने पापा के साथ ही औफिस के लिए चल पड़ा. उसे अपने बीच देख कर औफिस के बाकी लोग बहुत खुश थे. ज्यादातर तो उस के घर जा कर पहले ही बधाई दे आए थे.

‘‘आज कैसे आना हुआ पलाश?’’ बड़े बाबू ने पूछा.

‘‘पापा की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी. उन्हें छोड़ने चला आया,’’ बात बदल कर पलाश बोला.

यह बात अविनाश तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने खुद ही तुरंत पलाश को अपने केबिन में बुला लिया.

हैंडसम पलाश को अविनाश अपलक देखते ही रह गए. पलाश ने आगे बढ़ कर उन के पैर छुए तो उन्होंने उसे ढेर सारे आशीर्वाद के साथ गले लगा लिया और बोले, ‘‘तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम्हारी इस कामयाबी पर मुझे कितनी खुशी हुई है.’’

‘‘यह मेरा सौभाग्य है सर.’’

‘‘कुछ दिन में तुम्हें ट्रेनिंग पर जाना होगा?’’

‘‘जी सर, अभी लैटर नहीं आया.’’

‘‘सिविल सर्विस का ठप्पा लगना अपनेआप में बहुत बड़ी बात होती है बेटा. लाखों अभ्यर्थियों में से लगभग हजार स्टूडैंट का ही सपना हर साल पूरा होता है.’’

‘‘आप इतने सीनियर औफिसर हैं. आप को इन सब बातों की पूरी जानकारी है. मेरा अनुभव आप के सामने कुछ भी नहीं है.’’

‘‘समय के साथ सबकुछ सीख जाओगे. मुझे पूरी उम्मीद है तुम एक बहुत काबिल अफसर बनोगे.’’

‘‘मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा सर.’’

‘‘मुझे सर मत कहो, अंकल कह सकते हो. मैं तुम्हारे पापा की ही उम्र का हूं और अगले साल रिटायर होने वाला हूं. मैं चाहता हूं तुम एक दिन मेरे परिवार के साथ डिनर करो, जिस से हमारा आपसी मेलजोल बढ़ सके.’’

‘‘अंकल, मेरे पापा आप के सामने बैठ कर खाना खाने की जुर्रत नहीं कर सकते. मैं नहीं चाहता कि वे हीनभावना से ग्रस्त हो जाएं.’’

‘‘तुम्हारी सोच बहुत अच्छी है. अगर रामदीन नहीं आ सकते तो तुम ही आ जाओ मेरे घर डिनर पर.’’

‘‘यह नहीं हो सकता. आप का और मेरा संबंध पापा की वजह से है. मैं उन्हें दरकिनार कर शौर्टकट नहीं अपना सकता. एक साल बाद जब आप रिटायर हो जाएंगे, तब आप के और पापा के बीच में औफिस का यह रिश्ता खत्म हो जाएगा. तब मैं खुशीखुशी आप के घर डिनर के लिए आ जाऊंगा. मुझे उम्मीद है आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे.’’

‘‘मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा जब तुम अपनी ओर से हमारे घर आने के लिए उत्सुकता दिखाओगे.’’
‘‘इस के लिए थोड़ा सब्र करना होगा. तब तक मेरी ट्रेनिंग भी खत्म हो जाएगी और मुझे अच्छी पोस्टिंग भी मिल जाएगी. इस दौरान मुझे अपने साथ के प्रशिक्षुओं से मिलनेजुलने का अवसर मिलेगा. मैं ने सोच लिया है कि मैं उन में से किसी को अपना जीवनसाथी चुन लूंगा. हम साथ ही आप के घर डिनर पर आएंगे अंकल. बस, मुझे थोड़ा समय दे दीजिए,’’ पलाश बड़ी बेबाकी से मुसकरा कर बोला.

अविनाश को पलाश से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. वे बोले, ‘‘तुम अपने जैसी पोजीशन वाली जीवनसाथी चुनने में उत्सुक हो?’’

‘‘जी अंकल, इस से विचारों का लैवल बराबर रहता है. वह भी अपने काम में बिजी रहेगी और मैं भी,’’

एक झटके में पलाश की बातों ने अविनाश की सारी उम्मीद पर पानी फेर दिया था.

कुछ देर और इधरउधर की बात कर पलाश वापस घर चला गया था. रामदीन के कुछ कहने से पहले ही पलाश बोला, ‘‘आप निश्चिंत रहें पापा. अब इस बात को वे कभी नहीं उठाएंगे.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया?’’

‘‘कुछ नहीं. मैं चाहता हूं पापा कि अब आप यह नौकरी छोड़ दें.’’

‘‘मैं ने सालों ईमानदारी से काम किया है और तुम्हारी कामयाबी में उस का भी बड़ा हाथ है. अब समय बचा ही कितना है? मैं अपना कार्यकाल पूरा कर इज्जत के साथ रिटायर होना चाहता हूं,’’ रामदीन बोले.

‘‘जैसी आप की मरजी,’’ कह कर पलाश ने बात खत्म कर दी.

अगले दिन सुबह पलाश ने रामदीन को कुछ समझाया और सावधान के रहने की चेतावनी भी दी. अविनाश का बरताव रामदीन के साथ वैसा नहीं रह गया था, जैसा वे कुछ दिनों से दिखाने की कोशिश कर रहे थे.

पलाश की बातों ने अविनाश को बहुत आहत किया था. उन्होंने सोच लिया था कि वे बापबेटे को अच्छा खासा सबक सिखा कर रहेंगे. जरा सी कामयाबी मिलते ही इन के पर निकल आए हैं.

हफ्तेभर बाद एक दिन अविनाश ने बड़े बाबू से एक फाइल मंगाई और बोले, ‘‘तुम जानते हो यह फाइल कितनी जरूरी है. कल इस पर फैसला होना है. तुम ने इसे पढ़ लिया न?’’

‘‘जी सर, पढ़ लिया.’’

‘‘इसे यहीं रख दो. मैं फिर पढ़ूंगा.’’

बड़े बाबू फाइल छोड़ कर चले गए. सारा दिन सामान्य बीता. अगली सुबह जब रामदीन औफिस पहुंचे तो वहां पुलिस खड़ी थी.

‘‘क्या हुआ?’’ रामदीन ने घबरा कर पूछा.

‘‘औफिस से एक जरूरी फाइल चोरी हो गई है. सर का शक तुम पर है. तुम्हीं उस कमरे में आतेजाते हो, बाकी तो कोई नहीं जाता,’’ औफिस का एक मुलाजिम रूपेश बोला.

‘‘मेरा फाइल से क्या लेनादेना?’’ रामदीन बोले.

‘‘यह तो साहब ही जानें. उन्होंने ही पुलिस बुलाई है. तुम से पूछताछ होगी.’’

पुलिस के नाम से रामदीन डर गए. उन्होंने तुरंत पलाश को फोन कर सारी बात बता दी.

पुलिस अभी रामदीन से पूछताछ कर ही रही थी की पलाश आ गया. उस ने अपना परिचय दिया, तो पुलिस वालों ने भी उसे सलाम ठोंक दिया.

‘‘पापा से पूछने से पहले मैं आप को कुछ दिखाना चाहता हूं,’’ पलाश बोला.

पलाश ने अपना लैपटौप खोला और कल की रिकौर्डिंग उन्हें दिखा दी. बड़े बाबू भी बड़े ध्यान से यह सब देख रहे थे. लैपटौप पर सामने दिखाई दे रहा था कि अविनाश ने वह फाइल आलमारी से निकाल कर अपने ब्रीफकेस में रखी और कमरे से बाहर चले गए. अविनाश को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि उन की यह कोशिश नाकाम हो जाएगी.

‘‘थैंक यू मिस्टर पलाश,’’ पुलिस इंस्पैक्टर बोला.

‘‘हो सकता है गलती से फाइल घर चली गई हो. मुझे ध्यान नहीं रहा,’’ अविनाश अपनी खीज मिटाते हुए बोले.

‘‘लेकिन आप को यह रिकौर्डिंग कहां मिली?’’

‘‘यह बात मुझ से अच्छी तरह आप जानते होंगे इंस्पैक्टर,’’ कह कर पलाश हंस दिया.

रामदीन को संतोष था कि बेटे की वजह से आज उन की इज्जत रह गई थी. अब उन्हें समझ आ गया कि उस दिन क्यों पलाश ने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए कहा था? उन्हें अविनाश का मकसद पहले ही दिखाई देने लगा था, तभी वे रोज उन्हें औफिस आते हुए एक डिबिया थमा देते थे.

रामदीन के सामने आज एक बार फिर अविनाश को मुंह की खानी पड़ी. उन का चरित्र सब के सामने उजागर हो गया था.

Story In Hindi: रास्ते का कांटा

Story In Hindi: विकास पांडेय यानी भैयाजी सत्ताधारी पार्टी का नेता था, इसलिए वह अकसर सफेद रंग का कुरतापाजामा ही पहनता था. वह लंबी कदकाठी और मजबूत शरीर का मालिक था. उस का रंग गोरा था और उस पर काला चश्मा बहुत फबता था.

35 साल का विकास पांडेय अपने लुक्स पर बहुत ध्यान देता था. उस के पास तमाम तरह के परफ्यूम्स का अच्छाखासा कलैक्शन था.

लखनऊ शहर से 400 किलोमीटर दूर नगलानगर नामक कसबे में विकास पांडेय की नेतागीरी खूब फलफूल रही थी और उस का वहां के लोगों पर अच्छाखासा रोबदाब भी था.

विकास पांडेय अपनी निजी जिंदगी में थोड़ा सा परेशान था, क्योंकि उस की शादी को 5 साल हो गए थे, पर उस की पत्नी रीमा उसे औलाद का सुख नहीं दे पाई थी और हर मर्द की तरह विकास पांडेय अपनी पत्नी को ही इस के लिए जिम्मेदार मानता था और अकसर रीमा को खरीखोटी सुनाता रहता था. कई बार तो उस ने रीमा के साथ मारपीट भी की थी.

‘‘तुम मेरी राह का वह कांटा बन चुकी हो जो सिर्फ चुभने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता,’’ विकास पांडेय रीमा को तमाम बुरे से बुरे ताने देता था. वैसे, विकास पांडेय ने रीमा को कई डाक्टरों को भी दिखाया था. डाक्टरों ने तमाम चैकअप और टैस्ट भी किए थे, पर रीमा की सभी रिपोर्ट्स नौर्मल निकली थीं. डाक्टरों ने कुछ हार्मोन बढ़ाने वाली दवाएं दीं और औलाद के लिए कोशिश करते रहने को कहा.

विकास पांडेय का एक 28 साल का कुंआरा भाई राहुल भी था, जिसे वह दिखावटी प्यार करता था.

सभी सफेदपोश नेताओं की तरह विकास पांडेय के साथ बहुत सारे चाटुकार लोग थे, जो किसी भी सभा से पहले मंच पर उस की जम कर तारीफ करते और अपने नेता के आने से पहले उस के लिए एक माहौल सा तैयार कर देते थे.

विकास पांडेय के इन चाटुकारों में फागुन नाम की एक कवयित्री भी थी, जिस की उम्र महज 25 साल थी. फागुन का शानदार फिगर और आवाज बहुत मनमोहक थी.

जब वह मंच पर अपनी मधुर आवाज में कविता पढ़ती, तो लोग वाहवाह कर उठते थे और जब वह विकास पांडेय की शान में कसीदे पढ़ती, तो भी लोग तालियां पीटने पर मजबूर हो जाते थे.

इन तालियों के बीच फागुन अपना भविष्य तलाश रही थी.उस के मन में यह विचार था कि विकास पांडेय अपनी नेतागीरी का इस्तेमाल कर के उसे कविता के बड़े मंचों तक पहुंचा देगा, पर विकास के मन में तो फागुन के लिए कुछ और ही योजना थी.

विकास पांडेय खूबसूरती का पारखी था और वह फागुन के रूप का रस चख लेना चाहता था. इस बात का इशारा उस ने फागुन को कई बार बातबात में किया भी था.

‘‘अब इस दुनिया में आगे बढ़ने के लिए हर किसी को कुछ न कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है फागुनजी,’’ एक दिन कुटिलता भरे अंदाज में विकास पांडेय ने कहा, तो फागुन हर एक शब्द का मतलब समझ गई थी.

वैसे भी विकास पांडेय दोनों हाथों से फागुन पर पैसा लुटाता था. वह उसे उस की जरूरत का हर सामान दिलाता था. फाइवस्टार होटलों में खाना खिलाने ले जाता था और हफ्ते के आखिर में अपने फार्महाउस पर भी फागुन को साथ में ले जाता था. फागुन भी विकास पांडेय की ऐशोआराम भरी जिंदगी और रुतबा देख कर दंग रह जाती थी.

फागुन विकास पांडेय के प्रति मन से तो समर्पण कर ही चुकी थी, पर उस दिन जब बारिश हो रही थी और विकास पांडेय और फागुन दोनों फार्महाउस पर थे, तब फागुन ने तन से भी समर्पण कर दिया और उस मस्त शाम में उन दोनों के बीच जिस्मानी संबंध बन गए थे.

उन दोनों के बीच की शर्म की दीवार गिर गई थी. उस दिन के बाद तो जब भी उन दोनों को मौका मिलता, तब वे जवानी का जीभर कर मजा लूटते थे.

फागुन के घर में उस के मांबाप नहीं थे, सिर्फ एक 20 साल का छोटा भाई था, जो फागुन से ज्यादा सवालजवाब नहीं करता था.

उस दिन जब फागुन और विकास पांडेय लखनऊ के ऐतिहासिक बेगम हजरत महल पार्क में होने वाली रैली के लिए जा रहे थे, तो फागुन ने अपने उभारों के तीखेपन को विकास के शरीर से टकराते हुए कहा, ‘‘अब तो लोग हमारे संबंध पर सवाल उठाने लगे हैं. मैं ज्यादा दिन आप के साथ नहीं रह सकती. मुझे अपना कोई दूसरा रास्ता अपनाना होगा और आप से दूर जाना होगा,’’ फागुन के स्वर में निराशा भरी हुई थी.

विकास पांडेय ने फागुन के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा, ‘‘तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. मुझे क्या करना है, यह मैं ने अच्छी तरह सोच लिया है.’’

इस के बाद विकास पांडेय ने फागुन को अपना पूरा प्लान बताया कि वह फागुन की शादी अपने छोटे भाई राहुल के साथ करा देगा, जिस से फागुन हमेशा के लिए विकास के पास रहेगी और वे दोनों जीभर कर बिना डरे मजे भी कर सकेंगे और दुनिया वाले उन के रिश्ते पर आवाज भी नहीं उठा पाएंगे.

फागुन यह प्लान सुन कर बिना मुसकराए न रह सकी.

‘‘पर फिर तो आप का छोटा भाई मेरे साथ रोज ही सुहागरात मनाएगा,’’

फागुन ने एक भद्दा सा इशारा करते हुए मजाकिया लहजे में कहा, तो विकास ने फागुन को निश्चिंत रहने को कहा और यह ताकीद की कि फागुन इस बात का ध्यान रखे कि राहुल किसी भी सूरत में उस के शरीर को हाथ भी न लगा पाए.

फागुन ने कुछ सोचते हुए अपनी सहमति दे दी.

विकास पांडेय ने राहुल से फागुन से शादी करने की बात कही और फागुन की तारीफ की, तो वह अपने बड़े भाई की बात नहीं टाल सका और शादी के लिए हां कर दी.

हालांकि, रीमा को यह सब बहुत अजीब सा लग रहा था, पर भला उस की सुनने वाला ही कौन था.

नगलानगर नामक कसबे में एक विशाल समारोह हुआ, जिस में फागुन और राहुल की शादी हो गई. कई बड़े नेताओं ने इस में शिरकत की. मीडिया में भी यह शादी चर्चा की बात बनी हुई थी.

फागुन अपने घर से विदा हो कर विकास पांडेय के घर चली आई थी और फागुन के भाई को होस्टल में जाना पड़ा था.

आज राहुल और फागुन की सुहागरात थी, पर राहुल अपनी पत्नी के शरीर को न छू सके, इस के लिए विकास पांडेय ने पूरा जुगाड़ कर लिया था. उस ने एक कमरे में कबाब और महंगी शराब की 2-3 बोतलें मंगवाईं और राहुल को अपने सामने बिठा कर उसे इतनी शराब पिलाई कि वह नशे में चूर हो कर वहीं सो गया.

सुहाग की सेज पर फागुन बैठी हुई थी. आधी रात में सफेद कुरतेपाजामे में विकास पांडेय कमरे में दाखिल हुआ और दुलहन बनी फागुन को अपनी बांहों में कस लिया.

फागुन ने भी जीभर कर विकास का साथ दिया. वैसे, फागुन तो राहुल की दुलहन बन कर आई थी, मगर उस ने सुहागरात विकास के साथ ही मनाई.

अगली सुबह जब राहुल का नशा उतरा, तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह अपनी नईनवेली दुलहन से उस के पास जा कर सुहागरात पर न आ पाने के चलते माफी मांगने लगा.

‘‘अरे, आप ऐसे क्यों कह रहे हैं… बड़े आयोजनों और शादीब्याह में तो यह सब होता ही है,’’ मधुर स्वर में फागुन ने कहा, तो राहुल अपराधबोध से मुक्त हो गया और दूसरे कामों में लग गया.

पर अगली रात को जब राहुल ने फागुन के जिस्म को छूना चाहा, तो फागुन ने तबीयत न ठीक होने का बहाना बना दिया. राहुल अपना सा मुंह ले कर रह गया, पर कुछ कह न सका विकास पांडेय ने अब अगले दिन से ही फागुन को अपने साथ राजनीतिक सभाओं में और दूसरी जगहों पर घूमनेफिरने के लिए ले जाना शुरू कर दिया था.

चूंकि राहुल यह जानता था कि फागुन उस के भाई विकास के साथ मंच पर कविता पाठ करने के लिए जाती है और भैया के राजनीतिक कामों में भी उन की मदद करती है, इसलिए वह कुछ विरोध भी नहीं कर सका.

राहुल ने तो अपने मन को समझा लिया था, पर रीमा को यह बात लगातार खटक रही थी कि उस के पति विकास ने उस के साथ काम करने वाली एक साधारण लड़की के साथ राहुल की शादी क्यों करा दी, जबकि राहुल के लिए तो अच्छे घरों के रिश्ते आ रहे थे?

घर में भी विकास और फागुन के बीच काफीकुछ ऐसा था, जिस में कोई सीमा और मर्यादा नहीं थी. मसलन, अपने जेठ विकास के सामने फागुन सिर पर पल्ला नहीं करती थी और उसे विकास के पास बैठने में भी कोई गुरेज नहीं था.

कई दिन तक फागुन और विकास के चालचलन को देखने के बाद रीमा को यकीन हो गया था कि उन दोनों के बीच कुछ गलत संबंध जरूर है और रीमा ने उस शाम को जब यह बात राहुल से शेयर की, तो वह भी बोला, ‘‘मेरे एक दोस्त ने भी मुझ से फागुन और भैया को ले कर कुछ कहा है और जरूर भैया और फागुन के बीच गड़बड़ है, तभी तो शादी के 2 महीने बाद भी फागुन ने मुझे अपने शरीर को हाथ तक नहीं लगाने दिया है.’’

राहुल का दुख उस की आंखों से उमड़ रहा था. उस का मन अब यहां रहने का नहीं हो रहा था और यह बात भी उस ने रीमा से बता दी थी.

दुखी राहुल और रीमा दोनों प्लान बनाने लगे कि अब आगे क्या किया जाए? काफी सोचविचार कर के वे एक नतीजे पर पहुंच गए थे.

शाम को जब फागुन और विकास वापस आए, तो राहुल ने अपने भैया को खुशीखुशी बताया कि अगले महीने की 15 तारीख को वह फागुन को ले कर पड़ोसी देश नेपाल के काठमांडू शहर जा रहा है, जहां पर वह एक प्लास्टिक फैक्टरी लगाएगा. उस ने यह भी बताया कि बाकी के शेयर होल्डरों से भी बात कर ली गई है और वे सब भी पैसा लगाने को तैयार हैं.

राहुल की बात सुन कर फागुन और विकास सन्न रह गए. अब वे दोनों रंगरेलियां कैसे मना पाएंगे? फागुन ने हैरतभरी नजरों से विकास की ओर देखा तो विकास ने उसे चुप रहने का इशारा कर दिया, मानो कुछ हुआ ही न हो.

राहुल ने फागुन को भी अपने साथ काठमांडू चलने को कहा. फागुन ने थोड़ी नानुकर की, तो बदले में राहुल नाराज हो गया, ‘‘बिना अपने पति के यहां पर तुम क्या करोगी भला? माना कि विकास भैया के साथ जाना और उन के कामों में हाथ बंटाना तुम्हारी जिम्मेदारी है और तुम्हारे काम का भी हिस्सा है, पर आखिर कब तक तुम उन के साए में रहोगी… तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा.’’

राहुल के सख्त स्वर के आगे शांत हो गई थी फागुन, पर उस ने यह बात एक मैसेज के द्वारा विकास से बता दी.

अगली सुबह जब राहुल अपनी बाइक से पास के शहर में किसी काम से जा रहा था तो उस की बाइक का एक्सीडैंट करवा दिया गया. इस हादसे में उस की जान तो बच गई, पर वह पूरी तरह से अपाहिज हो कर बिस्तर पर पड़ गया था. राहुल की कमर से ले कर निचले हिस्से में कोई भी हलचल नहीं थी. उस के मुंह से साफ आवाज भी नहीं निकल रही थी.

विकास और फागुन अब बहुत खुश थे, क्योंकि अब तो उन्हें रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

‘‘तुम घबराओ मत… इस बार तो एक्सीडैंट ही करवाया है, अगली बार सीधा गोली चलवा दूंगा. वैसे, अब उस की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी,’’ विकास ने फागुन की पीठ सहलाते हुए कहा.

यह बात कहते हुए वह भूल गया कि रीमा ने चुपके से उन दोनों के बीच होने वाली बातों को न केवल सुन लिया है, बल्कि अपने मोबाइल में उन का यह वीडियो कैद भी कर लिया है.

रीमा इस वीडियो को ले कर सीधा पुलिस के पास जा सकती थी और विकास को अपने छोटे भाई की हत्या करवाने की साजिश के आरोप में गिरफ्तार करवा सकती थी, पर उस ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह जानती थी कि विकास एक रसूखदार नेता है और राजनीतिक गलियारे में उस की अच्छी पहुंच है, इसलिए इतना सुबूत नाकाफी होगा.

लिहाजा, रीमा ने शांत रहने का फैसला किया और विकास और फागुन की हरकतों को छिप कर देखती रही.

रात में जब रीमा की आंख लग जाती तब विकास धीरे से उठता और फागुन के पास उस के कमरे में चला जाता, जहां पर दोनों जवानी के मजे लेते, जबकि रीमा अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रहती.

एक रात को जब उस से नहीं रहा गया तब रीमा ने अपनेआप से सवाल पूछा कि आखिर तेरा पति तुझे छोड़ कर दूसरी औरत के पास क्यों जाता है? आखिर तू भी तो खूबसूरत है और तेरे पास भी वह सब है जो उस के पास है? जवाब रीमा के अंदर से ही आया कि एक मर्द के अंदर दस जगह मुंह मारने की आदत होती है और उसी आदत को तेरा पति भी जी रहा है.

जिस तरह से मूल से ज्यादा प्यारा सूद होता है उसी तरह से लुच्चे लोगों के लिए घरवाली से ज्यादा आकर्षण दूसरी बाहर वाली में होता है, बाहर वाली यानी फागुन में विकास को ज्यादा मजा नजर आ रहा है.

राहुल को बिस्तर से लगे हुए 5 महीने हो गए थे और उस की तबीयत में कोई सुधार नहीं नजर आ रहा था. खुद रीमा अपने देवर का ध्यान रखती थी, पर फिलहाल तो राहुल लाचारी ओढ़े हुए बिस्तर पर ही पड़ा रहता था.

उस रात बहुत तेज बारिश हो रही थी. राहुल दवा खा कर नींद के आगोश में था, जबकि फागुन और विकास एकदूसरे से तकरीबन चिपके हुए बैठे थे और दोनों में बातें हो रही थीं.

‘‘अब आप को मेरा और ज्यादा खयाल रखना चाहिए, क्योंकि मैं आपके बच्चे की मां बनने वाली हूं,’’ फागुन ने कहा तो विकास पांडेय की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने फागुन को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा.

‘‘हमारी तरफ से भी बधाई स्वीकार करो तुम दोनों,’’ रीमा ताली बजाते हुए कमरे में आ रही थी. उसे देख कर वे दोनों बुरी तरह चौंक गए थे.

उन की चोरी पकड़ी गई थी. वे दोनों एकदूसरे से दूर छिटक गए थे, पर रीमा ने मुसकराते हुए फागुन के सिर पर हाथ फेरा और कमरे से बाहर चली गई.

विकास अवाक रह गया था कि अपने पति को अपनी देवरानी के साथ इस हालत में देख कर रीमा ने कोई चीखपुकार क्यों नहीं मचाई, बल्कि सिर्फ मुसकरा कर चली गई… ऐसा क्यों? यह बात उसे बुरी तरह से परेशान कर रही थी.

विकास अगले दिन रीमा से नजरें नहीं मिला पा रहा था, जबकि रीमा के चेहरे पर ऐसी चमक थी जो आज से पहले विकास ने कभी नहीं देखी थी. वह मुसकराए जा रही थी, गीत गुनगुनाए जा रही थी और हर बात पर इठला भी रही थी.

‘‘मुझे माफ कर दो रीमा,’’ विकास ने कहा तो रीमा अनजान सी बन गई

‘‘पर किस बात के लिए?’’ रीमा ने बनावटी ढंग से कहा.

‘‘यही कि फागुन मेरे बच्चे की मां बनने वाली है,’’ विकास ने हकलाते हुए कहा तो रीमा खिलखिला कर हंस पड़ी.

विकास के चेहरे पर कई सवालिया निशान थे. वह जल्दी से रीमा की हंसी की वजह जान लेना चाहता था.
रीमा ने जो बताया वह सुन कर विकास पांडेय की सारी नेतागीरी धरी की धरी रह गई. रीमा ने उसे बताया कि जब फागुन के पति का शरीर पूरी तरह से लकवाग्रस्त है और वह इतने महीनों से बिस्तर पर हिलडुल भी नहीं सकता, तो उस की पत्नी फागुन भला मां कैसे बन सकती है? और जब यह बात और लोगों को पता चलेगी, तब भला वे सब क्या कहेंगे?

यह सुन कर विकास सन्न रह गया था. यह बात तो उस ने सपने में भी नहीं सोची थी. यह तो भला हो रीमा जैसी अच्छी पत्नी का जो यह बात उस ने इतने आराम से उसे बता दी, नहीं तो बहुत जगहंसाई हो जाती और विपक्षी पार्टी को भी मौका मिल जाता. विकास के मन में एकसाथ कई विचार चल रहे थे.

अगले दिन विकास पांडेय फागुन को अपने साथ ले कर अपने फार्महाउस पर गया.

‘‘आज हम अपने फार्महाउस पर अपने आने वाले बच्चे का सैलिब्रेशन करेंगे,’’ विकास पांडेय ने यह कह कर फागुन को साथ चलने के लिए राजी कर लिया था.

फार्महाउस पर थोड़ाबहुत चायनाश्ता करने के बाद विकास फागुन पर बरस पड़ा कि उस ने एक अनचाहे बच्चे को बीच में क्यों आने दिया?

‘‘तुम ने गर्भनिरोधक गोलियां क्यों नहीं खाईं? अब जबकि राहुल बिस्तर पर है और हिलडुल भी नहीं सकता, ऐसे में तुम मां कैसे बन सकती हो? कभी सोचा है तुम ने,’’ विकास चीख रहा था और अब सकते में आने की बारी फागुन की थी. उस का भी ध्यान तो इस तरफ नहीं गया था. अब भला क्या होगा? अब तो इतना ज्यादा समय हो गया है कि वह चाह कर भी बच्चे को गिरा नही सकती.

फागुन ने अपने चेहरे से तनाव हटाते हुए विकास से कहा, ‘‘पर यह सब तुम्हें मेरे जिस्म को रगड़ने से पहले सोच लेना चाहिए था. अब मैं अपने बच्चे को क्यों हटाऊं?’’ सख्त लहजा था फागुन का, पर विकास यह सुन कर झुंझला गया और बाहर निकल गया.

फागुन ने महसूस किया कि विकास की गाड़ी स्टार्ट हो चुकी है और वह उसे फार्महाउस में छोड़ कर कहीं जा रहा है. फागुन ने बाहर की ओर जाना चाहा, पर दरवाजा बाहर से बंद था.

उस ने विकास के मोबाइल पर फोन मिलाया, पर विकास ने उस का फोन रिसीव नहीं किया.

इतने दिनों से फागुन विकास के साथ रह रही थी और उस की हर चाल को वह अच्छी तरह समझती थी, इसलिए फागुन यह जान चुकी थी कि हो न हो अब विकास पांडेय से उसे अपनी जान का खतरा है.

विकास पांडेय अपने घर नगलानगर पहुंच चुका था और रीमा को गले लगाते हुए वह बोला, ‘‘अब तुम मेरी हो और हमें कोई अलग नहीं कर सकता. मैं ने हमारे बीच के सारे कांटे दूर कर दिए हैं.’’

विकास की आवाज में चहक थी, पर उस की इस बात पर रीमा एक बार फिर से मुसकरा उठी, ‘‘पर अब भला क्या फायदा? इन सब बातों के लिए बहुत देर हो गई है,’’ और यह कहते हुए रीमा ने दीवार पर लगी टीवी स्क्रीन की ओर नजरें घुमा दीं, जहां पर एक लोकल न्यूज चैनल पर फागुन की लाइव तसवीरें चल रही थीं.

रीमा जोरजोर से नेता विकास पांडेय पर आरोप पर आरोप लगाए जा रही थी, ‘‘विकास पांडेय, जो रिश्ते में मेरा जेठ है, ने हमेशा से मुझ पर गलत नजर रखी और मेरा फायदा उठाने के लिए अपने छोटे भाई से मेरी शादी करा दी.

‘‘वह मुझे आगे बढ़ाने के नाम पर मेरा यौन शोषण करता रहा और आज जब मैं उस के बच्चे की मां बनने वाली हूं, तब उस ने मुझे यहां ला कर बंद कर दिया है, ताकि वह मेरा और मेरे आने वाले बच्चे का मर्डर करा सके…’’

फागुन ने सारी बातें मीडिया में कह दी थीं और अब चारों तरफ विकास पांडेय की थूथू होने लगी थी, उस का सारा रसूख धड़ाम हो चुका था.

मीडिया को तो रीमा पहले ही फार्महाउस भेज चुकी थी और अब पुलिस को भी रीमा ने ही फोन कर के बुलाया और विकास पांडेय को गिरफ्तार करने पुलिस आ चुकी थी.

विकास पांडेय लगातार इनकार करता जा रहा था, ‘‘फागुन झूठ बोल रही है. यह बच्चा मेरा नहीं है.’’

‘‘घबराइए नहीं, आजकल हर चीज मैडिकल जांच से पता चल जाती है. अगर आप बेकुसूर होंगे, तो डीएनए टैस्ट आप को बेकुसूर साबित करने में मदद करेगा,’’ इंस्पैक्टर ने विकास से कहा, पर विकास पांडेय जानता था कि वह झूठा है और अब पुलिस के शिकंजे से नहीं बच सकता है.

रीमा एक ओर चुपचाप खड़ी थी. उस ने अपने पति और देवरानी दोनों से धोखा तो खाया, पर वह सही समय पर सचेत हो गई थी. उसे अपनी राह का कांटा समझने वाला उस का पति विकास आज जेल में था.
रीमा ने एक कांटे की मदद से दूसरा कांटा निकाल दिया था.

Hindi Funny Story: क्या हाल है लतखोरीलाल

Hindi Funny Story, लेखक – राजेंद्र कुमार सिंह

आज की राजनीति में लतखोरों और चोरों की कमी नहीं है. जो जहां पर है, जिस को जहां मौका मिला, चौकाछक्का मार कर विकास का चक्का जाम कर हराम के माल पर कमाल करते हुए नमकहराम खुद आराम कर रहा है. जो भविष्य में बनता यही जी का जंजाल है. जनता देख रही जो नेता भलाई करने का संकल्प ले कर मैदान में उतरा, वही विकास के पर कतर मलाई चांप रहा है, मजे से नोट छाप रहा है. इस आड़ में कामयाबी का झठा झंडा गाड़ कर कहता है कि जनता जाए भाड़ में. विकास की चादर समेट बढि़या कमीशन लपेट कर अपना पेट भर निडर हो कर चल रहा है.

सार्वजनिक संपत्ति पर अपने अधिकार से कटौती कर बपौती समझ कर यूज कर रहा है. आज जनता को सजग होते ही इन की करतूतों को देख कहर बन कर टूट रही है. जो सार्वजनिक संपत्ति को अपना समझने की भूल कर रहे थे, उन की कलई खुल रही है. जनता के गुस्से से उन का जोश बेहोश हो कर धराशायी हो गया.

वह कितना बेकल, बेहाल व लाचार है. चल रहा कभी पातपात, तो कभी भाग रहा इस डाल तो उस डाल है. इसी तरह के सांपसीढ़ी के खेल में देश का खस्ताहाल है. पूरे देश में एक अलग स्लोगन चल रहा है. जनता जो सोई थी, अपनी हसरतें जो डुबोई थी, अब वह मचल रही है, रोड पर निकल उछल रही है.

आज लोकतंत्र बिलकुल तंगतंग हो गया है. दूसरे शब्दों में लोकतंग या प्रजातंग कह सकते हैं. सुकून और शांति सत्ता की होड़ में जो पहले से आसन पर बैठ झठा आश्वासन परोस रहा है. सूचना तंत्र इन की साजिश के झंसे में आ गया है. वह भी खापी कर दंड मार रहा है. बोझ से दबा बैठा है. कुछ अजीब तरह की हरकत करते हुए कुंठित हो कर बीचबीच में ऐसा कानून या विधेयक लाता है, मुंह की खाता है. जनता जाग गई लेते हुई अंगड़ाई. अगले अंजाम को तमाम करने के लिए क्वालिफाई कर रही है.

और इसी तरह के जुनून में हमारे महल्ले के उभरते नेता सुखीराम ने भी इस जंग में कूद कर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. मौका देख कर चौका मारने में कमाल का महारत हासिल है. जब जान गया कि ऐसेऐसे मौके पर कुछ भेटने वाला है, तो समेटने के लिए निकल पड़ता है. उन के साथ में एक टोली होती है जो अगले की बोली पर ताला लगा देने के लिए जानी जाती है.

यही वजह है कि वे समयसमय पर लतियाए जाते हैं. कभी खूब पिटाते हैं. उस में सब से ज्यादा प्रसाद सुखीराम ही पाते हैं. लोगबाग अब असली नाम के जगह नेता लतखोरीलाल कहते हैं. ये जब जब पिटा कर आए, पड़ोसी होने के नाते पूछ लिया, ‘‘क्या हाल है लतखोरीलाल भाई?’’

क्योंकि ये पक्ष हो या विपक्ष तहसनहस कराने, मामला को बिगाड़ने के लिए मशहूर हैं. हालांकि, हवा का रुख देख कर चलते हैं, इसलिए जबजब सत्ता बदलती है, ये भी बदल जाते हैं. खरीदफरोख्त में मोलतोल करने में इन का जवाब नहीं, महारत हासिल है. सामान तो इनसान भी खरीदते हैं, नेता खरीदने में इन का क्या कहना.

देश की संपत्ति को ये बपौती समझकर आमजन की सुविधाओं में कटौती कर पनौती लगाने के लिए भी जाने जाते हैं, इसलिए जनमानस जैसे ही सड़कों पर उतरा, शायद इन पर मंडराना शुरू हो गया खतरा. अभी जंग जारी है. नया मुद्दा अभी कुछ ज्यादा उछल रहा है किसी आयोग को ले कर. जनता भी पड़ गई है इन के पीछे हाथ धो कर. Hindi Funny Story

Hindi Kahani: बदमाश हिरनी

Hindi Kahani: लाला जनार्दन मोटरसाइकिल से उधार देने और वसूली करने गांवगांव जाया करता था. एक दिन की बात है. दोपहर की उमस भरी गरमी से छुटकारा पाने के लिए जनार्दन ने अपनी मोटरसाइकिल एक खेत के किनारे खड़ी कर दी और वह कुछ गुनगुनाते हुए गन्ने के झुरमुट के बीच से चला जा रहा था.

अचानक जनार्दन ने देखा कि कुएं के पास एक लड़की बैलों की जोड़ी को हांक रही थी.

जनार्दन कुछ पल के लिए सांस रोके उस लड़की को देखता रहा. सिर पर पल्लू डाले हुए वह नईनई ब्याही लड़की जवान और खूबसूरत लग रही थी.

उसे इस तरह अपनी ओर निहारता देख वह लड़की एकाएक हंस पड़ी और बोली, ‘‘प्यास लगी है, तो पानी पी लो.’’

जनार्दन ने चुल्लू में पानी भर कर होंठों से लगाया, जिस से उस का गला तो तर हो गया, पर मन प्यासा रह गया.

लड़की ने दोबारा कुएं से पानी निकाल कर उस की ओर बढ़ा कर कहा, ‘‘और पी लो.’’

जनार्दन बोल उठा, ‘‘पिला दो.’’

उस लड़की ने लोटे से पानी पिलाना शुरू किया. पानी की फुहार से जनार्दन का तनमन जैसे भीग गया था.

वह ठिठका सा खड़ा था कि लड़की बोली, ‘‘रोटी खा लो.’’

जनार्दन के पास रोटी नहीं थी. उस की बीवी तो शहर में परिवार के साथ रहती थी. भरी दोपहर में जैसे उस की बरसों की सोई प्यास जाग उठी. इस के बावजूद वह चुपचाप वहां से लौटने को हुआ.

उस लड़की से रहा न गया. वह बोली, ‘‘यहीं रोटी खा लो…’’

जनार्दन पलभर के लिए रुका. उस ने गौर से देखा कि उस लड़की का टीका चमक रहा था. सूरज की सुनहरी किरणें उस के चंपा जैसे चेहरे को चूम रही थीं.

जनार्दन को झिझकते देख कर वह लड़की फिर बोली, ‘‘गरमी की वजह से मैं ने रोटी खाई नहीं है, तुम खा लो.’’

जनार्दन ने देखा कि वह लड़की महुआ की गंध की तरह मस्त नजर आ रही थी, मानो उस से मनुहार कर रही हो.

जनार्दन ने अपनी कमर में बंधी थैली को टटोला कि कहीं गिर तो नहीं गई है. आज ही तो उसे गिरवी में 2 कंगन मिले थे. उन्हें संभाल कर वह वहीं बैठ गया.

तभी जनार्दन को लड़की के बदन से दूध की सोंधी गंध महसूस हुई. लड़की का पसीने से भीगा आंचल उस के बदन से चिपका था. जनार्दन से दो कौर रोटी भी नहीं तोड़ी जा रही थी.

लड़की जान गई कि झिझक का मारा जनार्दन रोटी नहीं खा पा रहा है, इसलिए उस ने एक लोटा गन्ने का रस उसे पीने को दिया. इसी बीच सूरज डूब गया.

वह भारी मन से उठा. उस का हाथ कमर में बंधी पोटली पर गया. 2 कंगन अभी भी सहीसलामत थे.

जनार्दन की तिजोरी में न जाने कितने गहने पड़े सड़ रहे थे. वह कुछ पल सोच कर बोला, ‘‘इधर आ.’’

वह लड़की जनार्दन के सामने आ कर खड़ी हो गई.

जनार्दन ने कंगन निकाल कर उस की कलाइयों में पहना दिए.

वह लड़की नानुकर करती रही, पर जनार्दन ने उसे मना ही लिया.

जब जनार्दन जाने लगा, तो वह मतवाली लड़की कंगन पहने हाथों को हिला कर उसे विदा कर रही थी. जनार्दन ने उस पर भरपूर नजर डाली और बोला, ‘‘बदमाश हिरनी…’’ Hindi Kahani

Story In Hindi: सतरंगी आसमान

Story In Hindi: अपनी सुहागरात पर साकेत काया के उभारों के बीच उगे बाल देख कर हैरान रह गया और उस का मूड खराब हो गया. इस के बाद साकेत और काया के बीच दूरियां बढ़ गईं. फिर काया की जिंदगी में सुशांतो आया जो उम्र में उस से कम था. आगे क्या हुआ?

सुबह के 7 बज गए थे. साकेत और काया की सुहागरात बीत चुकी थी. साकेत की आंखें खुलीं, तो उस के मन में एक उदासी थी. आमतौर पर लोग सुहागरात बीतने के अगले दिन बहुत खुश नजर आते हैं, पर साकेत का मूड पूरी तरह से उखड़ा हुआ था.

साकेत ने अनमने मन से बिस्तर छोड़ा और बाथरूम में घुस गया. फ्रैश हो कर बाहर आया तो देखा कि उस की पत्नी काया सकुचाई सी ड्रैसिंग टेबल के सामने खड़ी हो कर अपनी बिंदी सही कर रही थी.

साकेत ने काया पर एक उचटी हुई सी नजर डाली और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गया, जहां पर साकेत की मां नाश्ता लगा कर उस का इंतजार कर रही थीं.

साकेत ने जल्दीजल्दी नाश्ता किया और बाहर की ओर जाने लगा. मां के पूछने पर साकेत ने बताया कि उसे थोड़ा काम है, इसलिए बाहर जाना पड़ेगा.

साकेत तेजी से गाड़ी ड्राइव कर रहा था. पिछली रात को साकेत और काया की सुहागरात पर साकेत को कुछ ऐसा अनुभव हुआ था, जिस की कल्पना उस ने कभी नहीं की थी.

शादी के बाद पतिपत्नी एकदूसरे में पूरी तरह डूब जाना चाहते हैं, हर अंग को देख और जान लेना चाहते हैं और साकेत भी ऐसे मर्दों में से ही था. उस की आंखें काया की खूबसूरती को पूरी तरह से देख लेना चाहती थीं, पर काया अपने अंगों को बारबार सिकोड़ लेती थी और कमरे की लाइट बंद करने को कह रही थी.

पर साकेत तो टूट कर प्यार करना चाहता था और काया के सभी अंगों को चूम कर अपना प्यार जाहिर करना चाहता था, पर काया लगातार असहज हो रही थी और अपने दोनों हाथों से अपने उभारों को ढक ले रही थी, पर साकेत कुदरत की बनाई हुई इस खूबसूरत चीज के बीच डूब जाना चाहता था.

इसी सब में साकेत ने काया के दोनों हाथों को अपने हाथों के जोर से फैला दिया और काया के उभारों के बीच अपना चेहरा सटा दिया.

साकेत ने अपनी आंखों में काया के रूप को कैद करना शुरू कर दिया था और यही वह समय था, जब साकेत ने देखा कि काया के दोनों उभारों के बीच कुछ रोएं हैं और कुछ कालापन सा है, जो आमतौर पर सभी औरतों में नहीं होता.

पर चूंकि साकेत उस समय जिस्मानी रिश्ता बनाने के लिए उतावला हुआ जा रहा था, इसलिए उस ने कुछ नहीं पूछा, पर जब वह शांत हुआ, तब साकेत का सब से पहला सवाल यही था, ‘‘तुम्हारे उभारों के बीच रोएं और कालेपन का अजीब सा निशान कैसा है? ऐसा जो लगातार शेव करने के बाद आता है…’’

कुछ देर तक तो काया अनसुना कर के लेटी रही, पर जब साकेत बारबार वही सवाल दोहराता रहा, तो काया ने शरमाते हुए साकेत को बताया कि उस के उभारों के बीचोंबीच बाल हैं. उस ने काफी समय पहले यह समस्या अपनी मां से भी शेयर की थी, पर मां ने उसे चुप कराते हुए छोटे गले वाले सूट पहनने को कहा और सम झाया कि धीरेधीरे ये बाल अपनेआप गायब हो जाएंगे.

पर साकेत यह सब सुनना नहीं चाहता था. वह तो काया पर ही धोखाधड़ी का इलजाम लगाने लगा, ‘‘तो मु झे यह बात शादी से पहले क्यों नहीं बताई? मेरे साथ धोखा हुआ है.’’

काया और साकेत के बीच बातचीत में भी अब कड़वाहट घुलने लगी थी, पर काया, जो किशोरावस्था से ही उभारों के बीच बाल होने की समस्या से जूझती आ रही थी, अपने पति के ऐसे रिऐक्शन के लिए मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थी.

28 साल की काया पेशे से एक एमबीबीएस डाक्टर थी. उस ने शांत स्वर में साकेत को सम झाया कि शरीर में कई जगह अनचाहे बाल होते हैं. कुछ लोगों में सीने के बीच रोएं होते हैं, तो कुछ में ये बड़े हो कर बाल का रूप धारण कर लेते हैं, जिन से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता, लेकिन आजकल हेयर रिमूवर, वैक्सिंग और लेजर तकनीक द्वारा शरीर के किसी भी हिस्से के अनचाहे बाल हटाए जा सकते हैं और वह भी ऐसा ही कोई साधन अपना लेगी.

साकेत ने काया की बात सुनी तो जरूर थी, पर छाती के बीच बाल वाली काया अब उस की आदर्श पत्नी नहीं रह गई थी.

साकेत और काया को 2 दिन बाद हनीमून के लिए मौरीशस जाना था, पर साकेत ने प्लान कैंसिल कर दिया था. मां ने वजह पूछी, तो साकेत ने काम ज्यादा होने और तबीयत सही न होने का बहाना बना दिया था.

काया ने बहुत सोचा और अपनी छुट्टियां रद्द कर दीं और अगले दिन से ही वह अस्पताल जाने लगी.

काया लखनऊ शहर के दीनदयाल उपाध्याय मैमोरियल अस्पताल में डाक्टर थी और वहां उस की इमेज बहुत अच्छी थी.

आज काया अस्पताल काम पर आई, तो उस ने दिनभर खूब मन से काम किया और रोज से ज्यादा समय दिया. शाम को 7 बजे वह घर चली गई.

रात को बिस्तर पर साकेत मुंह घुमा कर लेटा रहा. काया ने माहौल को नौर्मल करने के लिए उस से बात करना चाहा, पर साकेत शांत ही रहा.

काया ने धीरेधीरे साकेत के शरीर को सहलाना और चूमना शुरू किया. साकेत ने भी काया के शरीर को चूमा, पर ठीक तभी उस की नजर काया के उभारों के बीच के बालों पर पड़ गई और उस का मूड औफ हो गया.

काया के लिए छाती के बीच बालों का होना अब तक एक नौर्मल बात हो चुकी थी, पर साकेत के लिए तो यह एक बदसूरती की निशानी थी और इसीलिए उस ने काया से तलाक ले लेने की बात तक कह दी.

साकेत की यह बात सुन कर काया सन्न रह गई. वह कुछ न बोल सकी. अलबत्ता उस की आंखें जरूर डबडबा आई थीं.

काया के पिता तो उस के बचपन में ही गुजर गए थे. उन की जगह उस की मां ने नौकरी की और काया को पालपोस कर डाक्टर बनाया और उस के बाद कितने अरमानों से उस की शादी कराई थी और आज शादी के कुछ ही दिनों के बाद काया का पति उसे तलाक देने को कह रहा है. क्या गुजरेगी उस की मां पर…

अगली सुबह जब काया अस्पताल जाने के रास्ते में थी कि तभी उस के साथी डाक्टर वासुदेव आनंद का फोन आया, जो काया को जल्दी से अस्पताल आने के लिए कह रहे थे, क्योंकि 2 डाक्टर छुट्टी पर थे और अस्पताल में एक इमर्जैंसी केस आ गया था.

काया जल्दी से अस्पताल पहुंची तो उसे बताया गया कि 24 साल के एक नौजवान की नाक से बहुत खून निकल रहा है. फिलहाल डाक्टर वासुदेव आनंद ने प्राथमिक उपचार दे दिया है, बाकी की जांच और ट्रीटमैंट काया को करना होगा.

वह 24 साल का नौजवान बिस्तर पर लेटा हुआ था और उस के बगल में तकरीबन 50 साल का कोई शख्स खड़ा हुआ था.

काया ने नर्स को मरीज के कुछ जरूरी सैंपल लेने को कहा और मरीज से बातचीत करने लगी. इस बीच डाक्टर वासुदेव आनंद अपने राउंड पर चले गए थे.

काया ने नोटिस किया था कि उस नौजवान का शरीर देखने में काफी मजबूत लग रहा था.

‘‘आप इन के पिता हैं? जरूर इन की किसी से कोई लड़ाई हुई होगी,’’ काया ने उस पास खड़े आदमी की ओर देखते हुए पूछा, तो ट्रैक सूट पहने हुए उस आदमी ने बताया कि वह इस नौजवान का बौक्सिंग कोच है और सुशांतो नाम के इस लड़के को चोट भी मैच प्रैक्टिस के दौरान लगी थी.

इस बीच नर्स खून का सैंपल लेने आ गई थी. उस के सूई इंजैक्ट करते ही सुशांतो ने बड़ी जोर से मुंह बनाया मानो उसे बहुत दर्द हो रहा हो. उस की इस नाटकीयता पर काया मुसकराए बिना न रह सकी.

‘‘बौक्सिंग करते हो और एक छोटी सी सूई से डरते हो,’’ काया ने कहा.

‘‘अरे मैडम, पंच झेलना आसान है. पंच से डर भी नहीं लगता, मगर यह सूई उस से ज्यादा डराती है,’’ पहली बार सुशांतो कुछ बोला था.

सुशांतो की आवाज काफी भारी और रोबदार थी. काया ने एक बार फिर से सुशांतो के चेहरे की ओर देखा. कितना शांत चेहरा था सुशांतो का, मगर इस चोट ने फिलहाल किस तरह उस के चेहरे को बिगाड़ कर रख दिया था. बातचीत रोक कर काया बाकी की जांच करने लगी थी.

काया ने सुशांतो के कोच को बताया कि उसे सुशांतो को तकरीबन 48 घंटे के लिए अस्पताल में छोड़ना होगा और इस के बाद ही वह पूरी तरह से ठीक हो पाएगा. सुशांतो के कोच पूरी तरह आश्वस्त हो गए थे.

शाम को काया घर वापस आई तो उसे कमरे में बैठे साकेत के उतरे और खिसियाहट भरे चेहरे का सामना करना पड़ा. घर आते ही वही सब परेशानियां और शिकायतें.

अस्पताल में तो इतनी समस्याएं, बीमारियों से लड़ते मरीज और परेशानी झेलते उन के परिजन फिर भी सभी के मन में एक उम्मीद होती है कि एक दिन वे अपने मरीज को ठीक होता देखेंगे और उसे अपने घर ले जा सकेंगे, पर काया की जिंदगी में तो कुछ ऐसी समस्या आ चुकी थी, जिस का इलाज तो फिलहाल काया को भी समझ नहीं आ रहा था.

काया ने 1-2 बार साकेत से बोलने की कोशिश की, पर वह काया से बात नहीं करना चाहता था.

बिस्तर पर भी साकेत करवट ले कर ही लेटा रहा. ने काया के उभारों के बीच बालों की बात को उस के साथ हुआ धोखा सम झ लिया था और उभारों के बीच बालों की मौजूदगी उसे प्यार के समंदर में उतरने से पहले ही पस्त कर दे रही थी.

अगले दिन जब काया अस्पताल में सुशांतो के पास पहुची तो सुशांतो बिस्तर पर लेटा हुआ मोबाइल चला रहा था.

‘‘तुम लोग मोबाइल में कितना लगे रहते हो न…’’ काया ने मुसकराते हुए कहा, तो सुशांतो ने बड़े स्टाइल से झट से मोबाइल को तकिए के नीचे छिपा लिया.

काया और सुशांतो के बीच बातचीत बढ़ने लगी थी. सुशांतो उत्तर प्रदेश के तराई इलाके का रहने वाला था. उस के पिता एक प्राइवेट जौब करते थे. उस के घर में एक छोटी बहन भी थी.

पिता चाहते थे कि सुशांतो कोई नौकरी कर ले जिस से घर का खर्चा चले, पर सुशांतो तो फिटनैस फ्रीक था. उस की लगन देखते हुए उस के कालेज के स्पोर्ट्स टीचर ने उसे लखनऊ जा कर बौक्सिंग में कैरियर बनाने को कहा और तभी से वह लखनऊ में केडी सिंह बाबू स्टेडियम में बौक्सिग सीख रहा था.

‘‘आप के आते ही यह कमरा फूलों की खुशबू से भर जाता है डाक्टर मैडम. यह किस परफ्यूम की खुशबू है?’’ बड़े ही अलग अंदाज में सुशांतो ने यह सवाल पूछा, तो काया को थोड़ा अजीब लगा.

काया ने सुशांतो के चेहरे को देखा तो उस के चेहरे पर एक मासूम भोलापन था.

‘‘मेरा मतलब है कि आप का आना मु झे बहुत अच्छा लगता है और सच कहूं, तो आप भी मु झे बहुत अच्छी लगती हैं,’’ एक सांस में कह गया था सुशांतो.

काया बोली, ‘‘एक शादीशुदा डाक्टर से ऐसी बातें करना अच्छी बात नहीं,’’ कहते हुए वह कमरे से बाहर निकल गई और लौबी में रखे एक्वेरियम के पास आ कर खड़ी हो गई. वह रंगबिरंगी मछलियों को देखने लगी.

सभी मछलियां पानी में तैरती हुईं बिना किसी तनाव के औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां कर रही थीं. काया ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपने केबिन की ओर बढ़ गई.

सुशांतो को आज डिस्चार्ज होना था. उस के कोच उसे लेने आ गए थे.

‘‘अब तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी. चोट पूरी तरह से ठीक है और अगर समस्या हो तो डायरैक्ट मु झ से बात कर सकते हो,’’ काया ने अपना मोबाइल नंबर देते हुए हुए कहा था.

काया घर आई तो उस की सास ने उसे बताया कि साकत को औफिस के काम से 3-4 दिन के लिए बैंगलुरु जाना पड़ गया.

‘‘अचानक… साकेत कम से कम एक मैसेज तो कर सकता था…’’ काया बुदबुदा उठी.

फिर काया बिस्तर पर लेट गई. उस के जेहन में एक्वेरियम वाली मछलियां घूम रही थीं. तैरती हुईं, आजाद, औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां करती हुईं.

अगले दिन ‘डाक्टर्स डे’ था. काया के मोबाइल पर कुछ मैसेज आए थे. काया ने देखा कि ये मैसेज उसे सुशांतो ने किए थे, जिन में उस ने ‘डाक्टर्स डे’ विश करते हुए डाक्टरों की तारीफ के बारे में बहुतकुछ लिखा था… ‘और एक औरत का डाक्टर होना और भी माने रखता है, क्योंकि वह घर और बाहर दोनों जगह के मरीजों को अच्छी तरह से डील करना जानती है…’

काया प्रशांतो का मैसेज पढ़े जा रही थी, जिस में आगे लिखा हुआ था, ‘मेरे बौक्सिंग स्किल से खुश हो कर मेरे कोच आज मु झे नई बाइक दिला रहे हैं. अगर आज आप इस मरीज के लिए थोड़ा समय निकाल सको, तो इस मरीज की तबीयत और भी अच्छी हो जाएगी…’

काया ने मैसेज पढ़ कर खुशी महसूस की और उस का रिप्लाई कर दिया, ‘ओके, आज शाम को 5 बजे मिलते हैं.’

शाम को पौने 5 बजे ही सुशांतो का फोन आ गया. वह बाहर काया का इंतजार कर रहा था.

लाल और काले रंग की स्पोर्ट्स बाइक की सीट पर शान से बैठा हुआ प्रशांतो बहुत हैंडसम दिख रहा था. काया बाइक की सीट पर बैठ गई.

प्रशांतो ने बाइक को थोड़ा आगे बढ़ाया और फिर बाइक की रफ्तार बढ़ा दी. काया के रेशमी बाल हवा में लहराने लगे थे और सड़क पर प्रशांतो सब को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ता जा रहा था.

अचानक से जब भी प्रशांतो को ब्रेक लेना पड़ता, तो काया के उभार प्रशांतो की पीठ से टकरा जा रहे थे. प्रशांतो को भी इस बात का अहसास हो रहा था और शायद इसीलिए अब वह बारबार ब्रेक लगाने लगा था.

कुछ देर बाद प्रशांतो ने ‘विबग्योर म्यूजिकल फाउंटेन’ के पास बाइक रोक दी, जहां रंगबिंरगा पानी संगीत की लय के साथ झूम रहा था. गीत के बोल थे, ‘तेरे हाथ में मेरा हाथ हो, सारी जन्नतें मेरे साथ हों…’

गीत ने रोमांटिक माहौल बना दिया था. प्रशांतो ने काया के नरम हाथों को अपने हाथों में ले लिया और
सहलाने लगा.

काया ने भी कोई विरोध नहीं किया. उस के अंदर की डाक्टर इस समय दरकिनार हो गई थी और उस के अंदर की औरत की इच्छाएं बलवती हो रही थीं. दोनों कुछ देर हाथ में हाथ डाले बैठे रहे, पर अचानक आए फोन ने दोनों की इस प्रेम तंद्रा को भंग किया.

काया झट से खड़ी हो गई. उधर से साकेत की आवाज थी, ‘तुम ने अपने शरीर की इस बीमारी को मु झ से छिपाया और मु झ से शादी कर के मु झे धोखा दिया. मैं तुम्हारे साथ और नहीं रह सकता. मुझे तुम से तलाक चाहिए,’ इस के बाद साकेत ने फोन काट दिया था.

साकेत की कड़वी बातें सुन कर काया काफी दुखी हो गई. उसे इस समय किसी साथी की तलाश महसूस हो रही थी. उसे न जाने क्या महसूस हुआ कि वह अपनी उम्र से छोटे प्रशांतो के सीने से लग गई.

एक डाक्टर और मरीज का रिश्ता अचानक सतरंगी हो चला था. आसपास के लोग अजीब नजरों से प्रशांतो और काया को देख रहे थे, पर उन दोनों को अब किसी की परवाह नहीं थी.

काया को घर जा कर नींद नहीं आई. वह एक दोराहे पर खड़ी थी. एक तरफ उस का पति था जो उस से नफरत करता था, दूसरी तरफ प्यार से लबरेज प्रशांतो था… पर क्या उस से कम उम्र का प्रशांतो अल्हड़ या फिर मौकापरस्त तो नहीं था? काया रातभर सोचती रही थी और सुबह होतेहोते वह किसी नतीजे पर भी पहुंच गई थी.

अगली सुबह अस्पताल से ही काया ने प्रशांतो को मैसेज किया, ‘आज मेरा बर्थडे है. मु झे विश नहीं करोगे?’

यह मैसेज पढ़ते ही प्रशांतो खुशी से झूम उठा और ताबड़तोड़ बधाई संदेश और शेरोशायरी भेजने लगा.
‘इन सब की जरूरत नहीं है, शाम को मिल कर केक काटते हैं,’ काया ने मैसेज किया.

प्रशांतो ने ‘थम्सअप’ का इमोजी देते हुए ‘ओके’ का मैसेज भेज दिया.

शाम को प्रशांतो बाइक ले कर पहले से ही खड़ा था. बाइक पर बैठते ही काया ने प्रशांतो को बाइक होटल ‘गोमती राइम्स’ की तरफ मोड़ने को कहा.

गूगल मैप पर लोकेशन देखने के बाद प्रशांतो ने बाइक को उसी दिशा में मोड़ दिया.

तकरीबन 20 मिनट के बाद वे दोनों होटल ‘गोमती राइम्स’ के अंदर थे, जहां पर काया ने खुद ही केक वगैरह का इंतजाम पहले से करा रखा था. यह एक खूबसूरत सा कमरा था, जो हनीमून कपल्स के लिए रिजर्व रखा जाता है.

उन दोनों ने केक काटा और प्रशांतो ने कुछ लाइनें भी बोलीं, जिन्हें वह पहले से लिख कर लाया था, ‘‘काया, तुम से मिलने के बाद तन्हाइयां मु झे भाती हैं, हर तरफ तुम्हारी परछाइयां नजर आती हैं. तुम दुनिया में सब से खूबसूरत हो, तुम्हारे आगे परियां भी कमतर नजर आती हैं.’’

कविता की लाइनें खत्म होते ही काया रोमांचित हो गई थी और प्रशांतो के गले लग गई और उस के मजबूत बदन को सहलाने लगी.

प्रशांतो की नसों में बहता खून लावा बनने लगा था और उस की सांसें भी तेज चलने लगी थीं. प्रशांतो के होंठ आगे बढ़े और काया के होंठों से टकरा गए. वे दोनों एकदूसरे की सांसों की खुशबू महसूस करने लगे थे.

काया ने पूरी तरह से खुद को प्रशांतो के हवाले कर दिया था. काया के बदन से कपड़े अलग हो चुके थे. प्रशांतो के हाथ कभी काया के उभारों को सहलाते तो कभी उन के बीच उगे रेशमी बालों को. कभीकभार प्रशांतो उन बालों को चूम भी लेता था.

काया ने अधखुली मदहोश आंखों से देखा कि प्रशांतो की नजरें उस के उभारों के बालों पर बारबार जा रही थीं, पर उन नजरों उदासी नहीं थी, बल्कि प्यार झलक रहा था.

कमरा दहक चला था. दोनों ने अपनीअपनी मंजिल पा ली थी.

‘‘मेरे इन बालों से तुम्हे नफरत नहीं हुई?’’ धीरे से काया ने पूछा.

‘‘जहां असली प्यार होता है, वहां नफरत के लिए कोई जगह नही होती. और फिर ये बाल तो तुम्हारे रूप की रेशमी परछाइयां हैं. इन्हें तो और प्यार करने की जरूरत है. इन्हें कभी मत हटाना,’’ प्रशांतो ने बालों को सहलाते हुए कहा.

‘‘शादी करोगे एक तलाकशुदा से?’’ काया ने पूछा.

‘‘मेरे जैसे आदमी को एक डाक्टर से अच्छी पत्नी कहां मिलेगी…’’ प्रशांतो ने कहा.

उस दिन के बाद होटल ‘गोमती राइम्स’ का यह कमरा कई बार उन दोनों के प्यार का गवाह बना.

काया ने अपने उभारों के बालों को किसी भी तरीके से रिमूव करना छोड़ दिया था, क्योंकि प्रशांतो को वह सब पसंद थी. किसी भी हार्मोनल गड़बड़ी के चलते आए जिस्मानी बदलाव को वह कमी नहीं मानता था.

उस दिन काया घर पर थोड़ी देर से पहुंची, तो साकेत घर पर नहीं था. काया ने अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया था और मैसेज कर के साकेत को बता दिया कि अब वह उस की नफरत और नही सहेगी, क्योंकि वह उसे तलाक देने के लिए तैयार है.

काया ने अपने मैसेज में लिखा, ‘मैं किसी और रूप में किसी और के साथ अपनी नई जिंदगी की तरफ कदम बढ़ाने जा रही हूं. किसी ऐसे के साथ जो मेरे इन बालों की रेशमी परछाइयों को प्यार करेगा, नफरत नहीं.’

इस के बाद काया ने मैसेज भेज दिया था. काया बाहर खड़े प्रशांतो की बाइक पर आ कर बैठ गई. वे दोनों
अपने अरमानों एक नए आसमान की तरफ बढ़े चले जा रहे थे, एक सतरंगी आसमान की तरफ. Story In Hindi

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