Story in hindi
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‘‘खैर, खुशी तो हमें तुम्हारी हर सफलता पर होती रही है और यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) द्वारा तुम्हारे चुने जाने पर अब हमें गर्व भी हो रहा है मगर एक बात रहरह कर खटक रही है,’’ उदयशंकर अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए बीच में थोड़ा रुक गए, ‘‘तुम्हारे इतने दूर जाने के बाद तुम्हारी मम्मी एकदम अकेली रह जाएंगी.’’
‘‘छोडि़ए भी, उदय भैया, अकेली रह जाऊंगी? आप सब जो हैं यहां,’’ मनीषा जल्दी से बोली. अपने मन की बात उदयशंकर की जबान पर आती देख कर वह विह्वल हो उठी थी.
‘‘हम तो खैर मरते दम तक यहीं रहेंगे. लेकिन हम में और जितेन में बहुत फर्क है.’’
‘‘वह फर्क तो आप की नजरों में होगा, चाचाजी. पापा के गुजरने के बाद मैं ने आप को ही उन की जगह समझा है. आप को अपना बुजुर्ग और मम्मी का संरक्षक समझता हूं,’’ जितेन बोला.
‘‘लीजिए, उदय भैया. अब आप केवल राजन के मित्र ही नहीं, जितेन द्वारा बनाए गए मेरे संरक्षक भी हो गए हैं,’’ मनीषा हंसी.
‘‘उस में मुझे कोई एतराज नहीं है, मनीषा. मुझ से जो भी हो सकेगा तुम्हारे लिए करूंगा. मगर, मनीषा, मैं या मेरे बच्चे हमेशा गैर रहेंगे. सोचता हूं अगर जितेन यूनेस्को की नौकरी का विचार छोड़ दे तो कैसा रहे?’’
‘‘क्या बात कर रहे हैं, चाचाजी? लोग तो ऐसी नौकरी का सपना देखते रहते हैं, इस के लिए नाक रगड़ने को तैयार रहते हैं और मुझे तो फिर इस नौकरी के लिए खास बुलाया गया है और आप कहते हैं कि मैं न जाऊं. कमाल है,’’ जितेन चिढ़ कर बोला.
‘‘लेकिन, तुम्हारी यह नौकरी भी क्या बुरी है? यहां भी तुम्हें खास बुलाया गया था और आगे तरक्की के मौके भी बहुत हैं. भविष्य तो तुम्हारा यहां भी उज्ज्वल है.’’
‘‘चाचाजी, आप ने अपने क्लब का स्विमिंग पूल भी देखा है और समुद्र भी. सो, दोनों का फर्क भी आप समझते ही होंगे,’’ जितेन मुसकराया.
‘‘मैं तो समझता हूं, बरखुरदार, लेकिन लगता है तुम नहीं समझते. क्लब के स्विमिंग पूल का पानी अकसर बदला जाता है, सो साफसुथरा रहता है. मगर समुद्र में तो दुनियाजहान का कचरा बह कर जाता है. फिर उस में तूफान भी हैं, चट्टानें भी और खतरनाक समुद्री जीव भी. यूनेस्को की नौकरी का मतलब है पिछड़े देशों में जा कर अविकसित चीजों का विकास करना, पिछड़ी जातियों का आधुनिकीकरण करना. काफी टेढ़ा काम होगा.’’
‘‘जिंदगी में तरक्की करने के लिए टेढ़े और मुश्किल काम तो करने ही पड़ते हैं, चाचाजी. और फिर जिन्हें समुद्र में तैरने का शौक पड़ जाए वे स्विमिंग पूल में नहीं तैर पाते.’’
‘‘यही सोच कर तो कह रहा हूं, बेटे, कि तुम समुद्र के शौक में मत पड़ो. उस में फंस कर तुम मनीषा से बहुत दूर हो जाओगे. माना कि अब संपर्क साधनों की कमी नहीं, लगता है मानो आमनेसामने बैठ कर बातें कर रहे हैं. फिर भी, दूरी तो दूरी ही है. राजन के गुजरने के बाद मनीषा सिर्फ तुम्हारे लिए ही जी रही है. तुम्हारा क्या खयाल है? सिर्फ आपसी बातचीत के सहारे वह जी सकेगी, टूट नहीं जाएगी?’’
‘‘जानता हूं, चाचाजी. तभी तो मम्मी को आप के सुपुर्द कर के जा रहा हूं. मैं कोशिश करूंगा कि जल्दी ही इन्हें वहां बुला लूं.’’
‘‘और भी ज्यादा परेशान होने को. यहां की इतने साल की प्रभुत्व की नौकरी, पुराने दोस्त और रिश्ते छोड़ कर नए माहौल को अपनाना मनीषा के लिए आसान होगा? अगर कोई अच्छी जगह होती तो भी ठीक था, लेकिन तुम तो अफ्रीकी या अरब इलाकों में ही जाओगे. वहां खुश रहना मनीषा के लिए मुमकिन न होगा.’’
‘‘फिर भी हालात से समझौता तो करना ही पड़ेगा, चाचाजी. महज इस वजह से कि मेरे जाने से मम्मी अकेली रह जाएंगी, इत्तफाक से मिला यह सुनहरा अवसर मैं छोड़ने वाला नहीं हूं.’’
‘‘बहुत अच्छा हुआ, यह बात तू ने मम्मी के जाने के बाद कही,’’ उदयशंकर ने एक गहरी सांस खींच कर कहा.
‘‘क्यों? मम्मी तो स्वयं ही यह नहीं चाहेंगी कि उन की वजह से मेरा कैरियर खराब हो या मैं जिंदगी में आगे न बढ़ सकूं.’’
‘‘बेशक, लेकिन जो बात तुम ने अभी कही थी न, वही तुम्हारे पापा ने उन्हें आज से 25 वर्षों पहले बताई थी.’’
उसे सुन कर उन्हें राजन की याद आ जाना स्वाभाविक ही था. दरवाजे के पीछे खड़ी मनीषा का दिल धक्क से हो गया.
‘‘क्या बताया था पापा ने मम्मी को?’’ जितेन आश्चर्य से पूछ रहा था.
मनीषा ने चाहा कि वह जा कर उदयशंकर को रोक दे. उस ने जो बात उदयशंकर को अपना घनिष्ठ मित्र समझ कर बताई थी उसे जितेन को बताने का उदय को कोई हक नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि यह बात सुन कर जितेन उदारता अथवा एहसान के बोझ से दब जाए और मनीषा के प्रति उतना कृतज्ञ न हो पाने की वजह से उस के दिल में अपराधभावना आ जाए, मगर मनीषा के पैर जैसे जमीन से चिपक कर रह गए.
उदयशंकर बता रहे थे, ‘‘तुम्हारी मम्मी कितनी मेधावी थीं, शायद इस का तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा. उन जैसी प्रतिभाशाली लड़की को इतनी जल्दी प्यार और शादी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए था और अगर शादी कर भी ली थी तो कम से कम घर और बच्चों के मोह से तो बचे ही रहना चाहिए था. पर मनीषा ने घर और बच्चों के चक्कर में अपनी प्रतिभा आम घरेलू औरतों की तरह नष्ट कर दी.’’
‘‘खैर, यह तो आप ज्यादती कर रहे हैं, चाचाजी. मम्मी आम घरेलू औरत एकदम नहीं हैं,’’ जितेन ने प्रतिवाद किया, ‘‘मगर पापा ने क्या कहा था, वह बताइए न?’’
‘‘वही बता रहा हूं. तुम्हारी मम्मी ने कभी तुम से जिक्र भी नहीं किया होगा कि उन्हें एक बार हाइडलबर्ग के इंस्टिट्यूट औफ एडवांस्ड साइंसैज ऐंड टैक्नोलौजी में पीएचडी के लिए चुना गया था. तुम्हारी दादी और राजन ने तुम्हारी पूरी देखभाल करने का आश्वासन दिया था. फिर भी मनीषा जाने को तैयार नहीं हुईं, महज तुम्हारी वजह से.’’
‘‘मैं उस समय कितना बड़ा था?’’
‘‘यही कोई 5-6 महीने के यानी जिस उम्र में मां ही होती है जो दूध पिला दे. और दूध तुम बोतल से पीते थे. सो, तुम्हारी दादी और पापा तुम्हारी देखभाल मजे से कर सकते थे. लेकिन तुम्हारी मम्मी को तसल्ली नहीं हो रही थी. उन के अपने शब्दों में कहूं तो ‘इतने छोटे बच्चे को छोड़ने को मन नहीं मानता. वह मुझे पहचानने लग गया है. मेरे जाने के बाद वह मुझे जरूर ढूंढ़ेगा. बोल तो सकता नहीं कि कुछ पूछ सके या बताए जाने पर समझ सके. उस के दिल पर न जाने इस का क्या असर पड़ेगा? हो सकता है इस से उस के दिल में कोई हीनभावना उत्पन्न हो जाए और मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा किसी हीनभावना के साथ बड़ा हो. मैं, डा. मनीषा, एक जानीमानी औयल टैक्नोलौजिस्ट की जगह एक स्वस्थ, होनहार बच्चे की मां कहलाना ज्यादा पसंद करूंगी.’’’
मनीषा और ज्यादा नहीं सुन सकी. उसे उस शाम की अपनी और राजन की बातचीत याद हो आई.
‘तुम्हारा बच्चा अभी तुम्हें ढूंढ़ने, कुछ सोचने और ग्रंथि बनाने की उम्र में नहीं है. पर जब वह कुछ सोचनेसमझने की उम्र में पहुंचेगा तब वह अपनी ही जिंदगी जीना चाहेगा और तुम्हारी खुशी के लिए अपनी किसी भी खुशी का गला नहीं घोंटेगा. यह समझ लो, मनीषा,’ राजन ने उसे समझाना चाहा था.
‘उस की नौबत ही नहीं आएगी, राजन. मेरी और मेरे बेटे की खुशियां अलगअलग नहीं होंगी. बेटे की खुशी ही मेरी खुशी होगी,’ उस ने बड़े दर्द से कहा था.
‘यानी तुम अपना अस्तित्व अपने बेटे के लिए ऐसे ही लुप्त कर दोगी. याद रखो, मनीषा, चंद सालों के बाद तुम पाओगी कि न तुम्हारे पास बेटा है और न अपना अस्तित्व, और फिर तुम अस्तित्वविहीन हो कर शून्य में भटकती फिरोगी, खुद को और अपने बेटे को कोसती जिस के लिए तुम ने स्वयं को नष्ट कर दिया.’
‘नहीं, मैं बेटे की ख्याति, सुख और समृद्धि के सागर में तैरूंगी. जब मेरा बेटा गर्व से यह कहेगा कि आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी मम्मी की वजह से हूं तो उस समय मेरे गौरव की सीमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती.’
‘यह सब तुम्हारी खुशफहमी है, मनीषा. जब तक तुम्हारा बेटा बड़ा होगा उस समय तक अपनी सफलता का श्रेय दूसरों को देने का चलन ही नहीं रहेगा. तुम्हारा बेटा कहेगा कि मैं जो कुछ भी हूं अपनी मेहनत और अपनी बुद्धि के बल पर हूं. यदि मांबाप ने बुद्धि के विकास के लिए कुछ सुविधाएं जुटा दी थीं तो यह उन की जिम्मेदारी थी. उन्होंने अपनी मरजी से हमें पैदा किया है, हमारे कहने से नहीं.’
‘चलिए, आप की यह बात भी मान ली. लेकिन दूर से चुप रह कर भी तो अपने बेटे की सुखसमृद्धि का आनंद उठाया जा सकता है.’
‘हां, अगर दूर और तटस्थ रह कर उस की खुशी में खुश रह सकती हो, तो बात अलग है. लेकिन अगर तुम चाहो कि तुम ने उस के लिए जो त्याग किया है उस के प्रतिदानस्वरूप वह भी तुम्हारे लिए कुछ त्याग कर के दे, तो नामुमकिन है. जहां तक मेरा खयाल है, वह अधिक समय तक तुम्हारे पास भी नहीं रहेगा. आजकल पढ़ाई काफी विस्तृत हो रही है.’
‘चलिए, बेटा रहे न रहे, बेटे के पापा तो मेरे पास ही रहेंगे न?’ मनीषा ने कहा था और सफाई से बात बदल दी थी. ‘वैसे मूर्खताओं में साथ देने के पक्ष में मैं नहीं हूं लेकिन तुम्हारा साथ तो देना ही पड़ेगा,’ राजन हंस कर बोले थे.
लेकिन, कहां दे पाए थे राजन साथ. जितेन अभी कालेज के प्रथम वर्ष में ही था कि एक दिन सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो कर वे उस का साथ छोड़ गए थे.
‘‘मम्मी, कहां हो तुम?’’ जितेन के उत्तेजित स्वर से मनीषा चौंक पड़ी. कर दिया न उदयशंकर ने सर्वनाश. जितेन को बता दिया और अब वह कहने आ रहा है कि यूनेस्को की नौकरी से इनकार कर देगा. मनीषा ने मन ही मन फैसला किया कि वह उसे क्या कह कर और क्याक्या कसमें दे कर जाने को मजबूर करेगी.
‘‘हां, बेटे, क्या बात है?’’
‘‘उदय चाचा कह रहे थे कि तुम ने मेरे लिए जीवन में आया एक सुनहरा मौका खो दिया?’’
‘‘हां, मगर वह मैं ने तुम्हारे लिए नहीं, अपनी ममता के लिए किया था. उस का तुम पर कोई एहसान नहीं है.’’
‘‘तुम एहसान की बात कर रही हो, मम्मी, और मैं समझता हूं कि इस से बड़ा मेरा कोई और उपकार नहीं कर सकती थीं,’’ जितेन तड़प कर बोला, ‘‘मैं आप को काफी समझदार औरत समझता था, लेकिन आप भी बस प्यार में ही बच्चे का भला समझने वाली औरत निकलीं. उस समय आप ने शायद यह नहीं सोचा कि आप की ज्यादा लियाकत का असर आप के बेटे के भविष्य पर क्या पड़ेगा?’’
जितेन की बात सुन कर मनीषा चुप रही, तो वह फिर बोला, ‘‘आज अगर आप के पास डौक्टरेट की डिगरी होती तो शायद पापा के गुजरने के बाद आप की पुरानी यूनिवर्सिटी आप को बुला लेती. हम लोग वहीं जा कर रहने लगते और मैं बजाय अफ्रीकीएशियाई देशों में जा कर, एक पश्चिमी औद्योगिक देश में काम करने का मौका पाता. यही नहीं, मेरी पढ़ाई पर इस का काफी असर पड़ता. निश्चित ही आप की आय तब ज्यादा होती. घर में ही एक प्रयोगशाला बनाने की जो मेरी तमन्ना थी, वह अगर हमारे पास ज्यादा पैसा होता तो पूरी हो जाती और उस का असर मेरे रिजल्ट पर भी पड़ता.’’ जितेन के स्वर में भर्त्सना थी.
‘‘हमेशा ही विश्वविद्यालय में फर्स्ट आता है. अरे छोड़ भी. उस से ज्यादा अच्छा रिजल्ट और क्या लाता?’’ मनीषा ने हंस कर बात टालनी चाही.
‘‘वही तो आप समझने की कोशिश नहीं करतीं. 85 प्रतिशत अंकों की जगह 95 प्रतिशत अंक पाना क्या बेहतर नहीं है? खैर, आप जो भी कहिए, आप ने वह फैलोशिप अस्वीकार कर के मेरा जो अहित किया है उस के लिए मैं आप को कभी माफ नहीं कर सकता,’’ कह कर जितेन तेजी से बाहर चला गया.
मनीषा जैसे टूट कर कुरसी पर गिर पड़ी. जितेन की कृतघ्नता या उदासीनता के लिए वह अपने को बरसों से तैयार करती आ रही थी, पर उस के इस आरोप के धक्के को सह सकना जरा मुश्किल था.
आज नौकरी का पहला दिन था. रिया ने सुबह उठ कर तैयारी की और औफिस के लिए निकल पड़ी. पिताजी के गुजरने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी उस पर ही थी. इंजीनियरिंग कालेज में अकसर अव्वल रहने वाली रिया के बड़ेबड़े सपने थे. लेकिन परिस्थितिवश उसे इस राह पर चलना पड़ा था. इस के पहले छोटी नौकरी में घर की जिम्मेदारियां पूरी न हो पाती थीं. ऐसे में एक दिन औनलाइन इंटरव्यू के इश्तिहार पर उस का ध्यान गया. उस ने फौर्म भर दिया और उस कंपनी में उसे चुन लिया गया.
रिया जब औफिस में पहुंची तो औफिस के कुछ कर्मी थोड़े समय से थोड़ा पहले ही आ गए थे. वहीं, रिसैप्शन पर बैठी अंजली ने रिया से पूछा, ‘‘गुडमौर्निंग मैडम, आप को किस से मिलना है?’’
‘‘मैं इस कंपनी में औनलाइन इंटरव्यू से चुनी गईर् हूं. आज से मु झे औफिस जौइन करने लिए कहा गया था, यह लैटर…’’
‘‘ओके, कौंग्रेट्स. आप का इस कंपनी में स्वागत है. थोड़ी देर बैठिए. मैं मैनेजर साहब से पूछ कर आप को बताती हूं.’’
रिया वहीं बैठ कर कंपनी का निरीक्षण करने लगी. उसी वक्त कंपनी में काफी जगह लगा हुआ आर जे का लोगो उस का बारबार ध्यान खींच रहा था. उतने में अंजली आई, ‘‘आप को मैनेजर साहब ने बुलाया है. वे आप को आगे का प्रोसीजर बताएंगे.’’
‘‘अंजली मैडम, एक सवाल पूछूं? कंपनी में जगहजगह आर जे लोगो क्यों लगाया गया है?’’
‘‘आर जे लोगो कंपनी के सर्वेसर्वा मजूमदार साहब के एकलौते सुपुत्र के नाम के अक्षर हैं. औनलाइन इंटरव्यू उन का ही आइडिया था. आज उन का भी कंपनी में पहला दिन है. चलो, अब हम अपने काम की ओर ध्यान दें.’’
‘‘हां, बिलकुल, चलो.’’
कंपनी के मैनेजर, सुलझे हुए इंसान थे. उन की बातों से और काम सम झाने के तरीके से रिया के मन का तनाव काफी कम हुआ. उस ने सबकुछ समझ लिया और काम शुरू कर लिया. शुरू के कुछ दिनों में ही रिया ने अपने हंसमुख स्वभाव से और काम के प्रति ईमानदारी से सब को अपना बना लिया. लेकिन अभी तक उस की कंपनी के मालिक आर जे सर से मुलाकात नहीं हुई थी. कंपनी की मीटिंग हो या और कोई अवसर, जहां पर उस की आर जे सर के साथ मुलाकात होने की गुंजाइश थी, वहां उसे जानबू झ कर इग्नोर किया जा रहा था. ऐसा क्यों, यह बात उस के लिए पहेली थी.
एक दिन रोज की फाइल्स देखते समय चपरासी ने संदेश दिया, ‘‘मैनेजर साहब, आप को बुला रहे हैं.’’
‘‘आइए, रिया मैडम, आप से काम के बारे में बात करनी थी. आज आप को इस कंपनी में आए कितने दिन हुए?’’
‘‘क्यों, क्या हुआ सर? मैं ने कुछ गलत किया क्या?’’
‘‘गलत हुआ, ऐसा मैं नहीं कह सकता, मगर अपने काम की गति बढ़ाइए और हां, इस जगह हम काम करने की तनख्वाह देते हैं, गपशप की नहीं. यह ध्यान में रखिए. जाइए आप.’’
रिया के मन को यह बात बहुत बुरी लगी. वैसे तो मैनेजर साहब ने कभी भी उस के साथ इस तरीके से बात नहीं की थी लेकिन वह कुछ नहीं बोल सकी. अपनी जगह पर वापस आ गई.
थोड़ी देर में चपरासी ने उस के विभाग की सारी फाइलें उस की टेबल पर रख दीं. ‘‘इस में जो सुधार करने के लिए कहे हैं वे आज ही पूरे करने हैं, ऐसा साहब ने कहा है.’’
‘‘लेकिन यह काम एक दिन में कैसे पूरा होगा?’’
‘‘बड़े साहब ने यही कहा है.’’
‘‘बड़े साहब…?’’
‘‘हां मैडम, बड़े साहब यानी अपने आर जे साहब, आप को नहीं मालूम?’’
अब रिया को सारी बातें ध्यान में आईं. उस के किए हुए काम में आर जे सर ने गलतियां निकाली थीं, हालांकि वह अब तक उन से मिली भी नहीं थी. फिर वे ऐसा बरताव क्यों कर रहे थे, यह सवाल रिया को परेशान कर रहा था.
उस ने मन के सारे विचारों को झटक दिया और काम शुरू किया. औफिस का वक्त खत्म होने को था, फिर भी रिया का काम खत्म नहीं हुआ था. उस ने एक बार मैनेजर साहब से पूछा, मगर उन्होंने आज ही काम पूरा करने की कड़ी चेतावनी दी. बाकी सारा स्टाफ चला गया. अब औफिस में रिया, चपरासी और आर जे सर के केबिन की लाइट जल रही थी यानी वे भी औफिस में ही थे. काम पूरा करतेकरते रिया को काफी वक्त लगा.
उस दिन के बाद रिया को तकरीबन हर दिन ज्यादा काम करना पड़ता था. उस की बरदाश्त करने की ताकत अब खत्म हो रही थी. एक दिन उस ने तय किया कि आज अगर उसे हमेशा की तरह ज्यादा काम मिला तो सीधे जा कर आर जे सर से मिलेगी. हुआ भी वैसा ही. उसे आज भी काम के लिए रुकना था. उस ने काम बंद किया और आर जे सर के केबिन की ओर जाने लगी. चपरासी ने उसे रोका, मगर वह सीधे केबिन में घुस गई.
‘‘सौरी सर, मैं बिना पूछे आप से मिलने चली आई. क्या आप मु झे बता सकेंगे कि निश्चितरूप से मेरा कौन सा काम आप को गलत लगता है? मैं कहां गलत कर रही हूं? एक बार बता दीजिए. मैं उस के मुताबिक काम करूंगी, मगर बारबार ऐसा…’’
रिया के आगे के लफ्ज मुंह में ही रह गए क्योंकि रिया केबिन में आई थी तब आर जे सर कुरसी पर उस की ओर पीठ कर के बैठे थे. उन्होंने रिया के शुरुआती लफ्ज सुन लिए थे. बाद में उन की कुरसी रिया की ओर मुड़ी ‘‘सर…आप…तुम…राज…कैसे मुमकिन है? तुम यहां कैसे?’’ रिया हैरान रह गई. उस का अतीत अचानक उस के सामने आएगा, ऐसी कल्पना भी उस ने नहीं की थी. उसे लगने लगा कि वह चक्कर खा कर वहीं गिर जाएगी.
‘‘हां, बोलिए रिया मैडम, क्या तकलीफ है आप को?’’
राज के इस सवाल से वह अतीत से बाहर आई और चुपचाप केबिन के बाहर चली गई. उस का अतीत ऐसे अचानक उस के सामने आएगा, यह उस ने सोचा भी नहीं था.
आर जे सर कोई और नहीं उस का नजदीकी दोस्त राज था. उस दोस्ती में प्यार के धागे कब बुन गए, यह दोनों सम झे नहीं थे. रिया को वह कालेज का पहला दिन याद आया. कालेज के गेट के पास ही सीनियर लड़कों के एक गैंग ने उसे रोका था.
‘आइए मैडम, कहां जा रही हो? कालेज के नए छात्र को अपनी पहचान देनी होती है. उस के बाद आगे बढि़ए.’
रिया पहली बार गांव से पढ़ाई के लिए शहर आई थी और आते ही इस सामने आए संकट से वह घबरा गई.
‘अरे हीरो, तू कहां जा रहा है? तु झे दिख नहीं रहा यहां पहचान परेड चल रही है. चल, ऐसा कर ये मैडम जरा ज्यादा ही घबरा गई हैं. तू इन्हें प्रपोज कर. उन का डर भी चला जाएगा.’
अभीअभी आया राज जरा भी घबराया नहीं. उस ने तुरंत रिया की ओर देखा. एक स्माइल दे कर बोला. ‘हाय, मैं राज. घबराओ मत. बड़ेबड़े शहरों में ऐसी छोटीछोटी बातें होती रहती हैं.’
रिया उसे देखती ही रह गई.
‘आज हमारे कालेज का पहला दिन है. इस वर्षा ऋतु के साक्षी से मेरी दोस्ती को स्वीकार करोगी.’ रिया के मुंह से अनजाने में कब ‘हां’ निकल गई यह वह सम झ ही नहीं पाई. उस के हामी भरने से सीनियर गैंग झूम उठा.
‘वाह, क्या बात है. यह है रियल हीरो. तुम से मोहब्बत के लैसंस लेने पड़ेंगे.’
‘बिलकुल… कभी भी…’
रिया की ओर एक नजर डाल कर राज कालेज की भीड़ में कब गुम हुआ, यह उसे मालूम ही नहीं हुआ. एक ही कालेज में, एक ही कक्षा में होने की वजह से वे बारबार मिलते थे. राज अपने स्वभाव के कारण सब को अच्छा लगता था. कालेज की हर लड़की उस से बात करने के लिए बेताब रहती थी. मगर राज किसी दूसरे ही रिश्ते में उल झ रहा था.
यह रिश्ता रिया के साथ जुड़ा था. एक अव्यक्त रिश्ता. उस का शांत स्वभाव, उस का मनमोहता रूप जिसे शहर की हवा छू भी नहीं पाई थी. उस का यही निरालापन राज को उस की ओर खींचता था.
एक दिन दोनों कालेज कैंटीन में बैठे थे. तब राज ने कहा, ‘रिया, तुम कितनी अलग हो. हमारा कालेज का तीसरा साल शुरू है. लेकिन तुम्हें यहां के लटके झटके अभी भी नहीं आते…’
‘मैं ऐसी ही ठीक हूं. वैसे भी मैं कालेज में पढ़ने आई हूं. पढ़ाई पूरी करने के बाद मु झे नौकरी कर के अपने पिताजी का सपना पूरा करना है. उन्होंने मेरे लिए काफी कष्ट उठाए हैं.’
रिया की बातें सुन कर राज को रिया के प्रति प्रेम के साथ आदर भी महसूस हुआ. तीसरे साल के आखिरी पेपर के समय राज ने रिया को बताया, ‘मु झे तुम्हें कुछ बताना है. शाम को मिलते हैं.’ हालांकि उस की आंखें ही सब बोल रही थीं. रिया भी इसी पल का बेसब्री से इंतजार कर रही थी. इसी खुशी में वह होस्टल आई. मगर तभी मैट्रन ने बताया, ‘तुम्हारे घर से फोन था. तुम्हें तुरंत घर बुलाया है.’
रिया ने सामान बांधा और गांव की ओर निकल पड़ी. घर में क्या हुआ होगा, इस सोच में वह परेशान थी. इन सब बातों में वह राज को भूल गई. घर पहुंची तो सामने पिताजी का शव, उस सदमे से बेहोश पड़ी मां और रोता हुआ छोटा भाई. अब किसे संभाले, खुद की भावनाओं पर कैसे काबू पाए, यह उस की सम झ में नहीं आ रहा था. एक ऐक्सिडैंट में उस के पिताजी का देहांत हो गया था. घर में सब से बड़ी होने की वजह से उस ने अपनी भावनाओं पर बहुत ही मुश्किल से काबू पाया.
इस घटना के बाद उस ने पढ़ाई आधी ही छोड़ दी और एक छोटी नौकरी कर घर की जिम्मेदारी संभाली.
इधर राज बेचैन हो गया. सारी रात रिया का इंतजार करता रहा. मगर वह आई नहीं. उस ने कालेज, होस्टल सब जगह ढूंढ़ा मगर उस का कुछ पता नहीं चला. रिया ने ही ऐसी व्यवस्था कर रखी थी. वह राज पर बो झ नहीं बनना चाहती थी. पर राज इस सब से अनजान था. उस के दिल को ठेस पहुंची थी. इसलिए उस ने भी कालेज छोड़ दिया और आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चला गया.
‘‘मैडम, आप का काम हो गया क्या? मु झे औफिस बंद करना है. बड़े साहब कब के चले गए.’’
चपरासी की आवाज से रिया यादों की दुनिया से बाहर आई. उस ने सब सामान इकट्ठा किया और घर के लिए निकल पड़ी. उस के मन में एक ही खयाल था कि राज की गलतफहमी कैसे दूर करे. उसे उस का कहना रास आएगा या नहीं? वह नौकरी भी छोड़ नहीं सकती. क्या करे. इन खयालों में वह पूरी रात जागती रही.
दूसरे दिन औफिस में अंजली ने रिसैप्शन पर ही रिया से पूछा, ‘‘अरे रिया, क्या हुआ? तुम्हारी आंखें ऐसी क्यों लग रही हैं? खैरियत तो है न?’’
‘‘अरे कुछ नहीं, थोड़ी थकान महसूस कर रही हूं, बस. आज का शैड्यूल क्या है?’’
‘‘आज अपनी कंपनी को एक बड़ा प्रोजैक्ट मिला है. इसलिए कल पूरे स्टाफ के लिए आर जे सर ने पार्टी रखी है. हरेक को पार्टी में आना ही है.’’
‘‘हां, आऊंगी.’’
दू सरे दिन शाम को पार्टी शुरू हुई. रिया बस केवल हाजिरी लगा कर निकलने की सोच रही थी. राज का पूरा ध्यान उसी पर था. अचानक उसे एक परिचित आवाज आई.
‘‘हाय राज, तुम यहां कैसे? कितने दिनों बाद मिल रहे हो. मगर तुम्हारी हमेशा की मुसकराहट किधर गई?’’
‘‘ओ मेरी मां, हांहां, कितने सवाल पूछोगी. स्नेहल तुम तो बिलकुल नहीं बदलीं. कालेज में जैसी थीं वैसी ही हो, सवालों की खदान. अच्छा, तुम यहां कैसे…?’’
‘‘अरे, मैं अपने पति के साथ आई हूं. आज उन के आर जे सर ने पूरे स्टाफ को परिवार सहित बुलाया है. इसलिए मैं आई. तुम किस के साथ आए हो?’’
‘‘मैं अकेला ही आया हूं. मैं ही तुम्हारे पति का आर जे सर हूं.’’
‘‘सच, क्या कह रहे हो. तुम ने तो मु झे हैरान कर दिया. अरे हां, रिया भी इसी कंपनी में है न. तुम लोगों की सब गलतफहमियां दूर हो गईं न.’’
‘‘गलतफहमी? कौन सी गलतफहमी?’’
‘‘अरे, रिया अचानक कालेज छोड़ कर क्यों गई, उस के पिताजी का ऐक्सिडैंट में देहांत हो गया था, ये सब…’’
‘‘क्या, मैं तो ये सब जानता ही नहीं.’’
स्नेहल रिया और राज की कालेज की सहेली थी. उन दोनों की दोस्ती, प्यार, दूरी इन सब घटनाओं की साक्षी थी. उसे रिया के बारे में सब मालूम हुआ था. उस ने ये सब राज को बताया.
राज को यह सब सुन कर बहुत दुख हुआ. उस ने रिया के बारे में कितना गलत सोचा था. हालांकि, उस की इस में कुछ भी गलती नहीं थी. अब उस की नजर पार्टी में रिया को ढूंढ़ने लगी. मगर तब तक रिया वहां से निकल चुकी थी.
वह उसे ढूंढ़ने बसस्टौप की ओर भागा.
बारिश के दिन थे. रिया एक पेड़ के नीचे खड़ी थी. उस ने दूर से ही रिया को आवाज लगाई.
‘‘रिया…रिया…’’
‘‘क्या हुआ सर? आप यहां क्यों आए? आप को कुछ काम था क्या?’’
‘‘नहीं, सर मत पुकारो, मैं तुम्हारा पहले का राज ही हूं. अभीअभी मु झे स्नेहल ने सबकुछ बताया. मु झे माफ कर दो, रिया.’’
‘‘नहीं राज, इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं है. उस समय हालात ही ऐसे थे.’’
‘‘रिया, आज मैं तुम से पूछता हूं, क्या मेरे प्यार को स्वीकार करोगी?’’
रिया की आंसूभरी आंखों से राज को जवाब मिल गया.
राज ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. उन के इस मिलन में बारिश भी उन का साथ दे रही थी. इस बारिश की झड़ी में उन के बीच की दूरियां, गलतफहमियां पूरी तरह बह गई थीं.
झारखंड राज्य का एक शहर है हजारीबाग. यह कुदरत की गोद में बसा छोटा सा, पर बहुत खूबसूरत शहर है. पहाडि़यों से घिरा, हरेभरे घने जंगल, झाल, कोयले की खानें इस की खासीयत हैं.
हजारीबाग के पास ही में डैम और नैशनल पार्क भी हैं. यह शहर अभी हाल में ही रेल मार्ग से जुड़ा है, पर अभी भी नाम के लिए 1-2 ट्रेनें ही इस लाइन पर चलती हैं. शायद इसी वजह से इस शहर ने अपने कुदरती खूबसूरती बरकरार रखी है.
सोमेन हजारीबाग में फौरैस्ट अफसर थे. उन दिनों हजारीबाग में उतनी सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए उन की बीवी संध्या अपने मायके कोलकाता में ही रहती थी.
दरअसल, शादी के बाद कुछ महीनों तक वे दोनों फौरैस्ट अफसर के शानदार बंगले में रहते थे. जब संध्या मां बनने वाली थी, सोमेन ने उसे कोलकाता भेज दिया था. उन्हें एक बेटी हुई थी. वह बहुत खूबसूरत थी, रिया नाम था उस का. सोमेन हजारीबाग में अकेले रहते थे. बीचबीच में वे कोलकाता जाते रहते थे.
हजारीबाग के बंगले के आउट हाउस में एक आदिवासी जोड़ा रहता था. लक्ष्मी सोमेन के घर का सारा काम करती थी. उन का खाना भी वही बनाती थी. उस का मर्द फूलन निकम्मा था. वह बंगले की बागबानी करता था और सारा दिन हंडि़या पी कर नशे में पड़ा रहता था.
एक दिन दोपहर बाद लक्ष्मी काम करने आई थी. वह रोज शाम तक सारा काम खत्म कर के रात को खाना टेबल पर सजा कर चली जाती थी.
उस दिन मौसम बहुत खराब था. घने बादल छाए हुए थे. मूसलाधार बारिश हो रही थी. दिन में ही रात जैसा अंधेरा हो गया था.
अपने आउट हाउस में बंगले तक दौड़ कर आने में ही लक्ष्मी भीग गई थी. सोमेन ने दरवाजा खोला. उस की गीली साड़ी और ब्लाउज के अंदर से उस के सुडौल उभार साफ दिख रहे थे.
सोमेन ने लक्ष्मी को एक पुराना तौलिया दे कर बदन सुखाने को कहा, फिर उसे बैडरूम में ही चाय लाने को कहा. बिजली तो गुल थी. उन्होंने लैंप जला रखा था.
थोड़ी देर में लक्ष्मी चाय ले कर आई. चाय टेबल पर रखने के लिए जब वह झांकी, तो उस का पल्लू सरक कर नीचे जा गिरा और उस के उभार और उजागर हो गए.
सोमेन की सांसें तेज हो गईं और उन्हें लगा कि कनपटी गरम हो रही है. लक्ष्मी अपना पल्लू संभाल चुकी थी. फिर भी सोमेन उसे लगातार देखे जा रहे थे.
यों देखे जाने से लक्ष्मी को लगा कि जैसे उस के कपड़े उतारे जा रहे हैं. इतने में सोमेन की ताकतवर बाजुओं ने उस की कमर को अपनी गिरफ्त में लेते हुए अपनी ओर खींचा.
लक्ष्मी भी रोमांचित हो उठी. उसे मरियल पियक्कड़ पति से ऐसा मजा नहीं मिला था. उस ने कोई विरोध नहीं किया और दोनों एकदूसरे में खो गए.
इस घटना के कुछ महीने बाद सोमेन ने अपनी पत्नी और बेटी रिया को रांची बुला लिया. हजारीबाग से रांची अपनी गाड़ी से 2 ढाई घंटे में पहुंच जाते हैं.
सोमेन ने उन के लिए रांची में एक फ्लैट ले रखा था. उन के प्रमोशन की बात चल रही थी. प्रमोशन के बाद उन का ट्रांसफर रांची भी हो सकता है, ऐसा संकेत उन्हें डिपार्टमैंट से मिल चुका था.
इधर लक्ष्मी भी पेट से हो गई थी. इस के पहले उसे कोई औलाद न थी.
लक्ष्मी के एक बेटा हुआ. नाकनक्श से तो साधारण ही था, पर रंग उस का गोरा था. आमतौर पर आदिवासियों के बच्चे ऐसे नहीं होते हैं.
अभी तक सोमेन हजारीबाग में ही थे. वे मन ही मन यह सोचते थे कि कहीं यह बेटा उन्हीं का तो नहीं है. उन्हें पता था कि लक्ष्मी की शादी हुए 6 साल हो चुके थे, पर वह पहली बार मां बनी थी.
सोमेन को तकरीबन डेढ़ साल बाद प्रमोशन और ट्रांसफर और्डर मिला. तब तक लक्ष्मी का बेटा गोपाल भी डेढ़ साल का हो चुका था.
हजारीबाग से जाने के पहले लक्ष्मी ने सोमेन से अकेले में कहा, ‘‘बाबूजी, आप से एक बात कहना चाहती हूं.’’
‘‘हां, कहो,’’ सोमेन ने कहा.
‘‘गोपाल आप का ही खून है.’’
सोमेन बोले, ‘‘यह तो मैं यकीनी तौर पर नहीं मान सकता हूं. जो भी हो, पर तुम मुझ से चाहती क्या हो?’’
‘‘बाबूजी, मैं बेटे की कसम खा कर कहती हूं, गोपाल आप का ही खून है.’’
‘‘ठीक है. बोलो, तुम कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘ज्यादा कुछ नहीं. बस, यह भी पढ़लिख कर अच्छा इनसान बने. मैं किसी से कुछ नहीं बोलूंगी. आप इतना भरोसा तो मुझ पर कर सकते हैं,’’ लक्ष्मी बोली.
‘‘ठीक है. तुम लोगों के बच्चों का तो हर जगह आसानी से रिजर्वेशन कोटे में दाखिला हो ही जाता है. फिर भी मुझ से कोई मदद चाहिए तो बोलना.’’
इस के बाद सोमेन रांची चले गए. समय बीतता गया. सोमेन की बेटी रिया 10वीं पास कर आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चली गई थी.
बीचबीच में इंस्पैक्शन के लिए सोमेन को हजारीबाग जाना पड़ता था. वे वहीं आ कर बंगले में ठहरते थे. लक्ष्मी भी उन से मिला करती थी. उस ने सोमेन से कहा था कि गोपाल भी 10वीं क्लास के बाद दिल्ली के अच्छे स्कूल और कालेज में पढ़ना चाहता है. उसे कुछ माली मदद की जरूरत पड़ सकती है.
सोमेन ने उसे मदद करने का भरोसा दिलाया था. गोपाल अब बड़ा हो गया था. वे उसे देख कर खुश हुए. शक्ल तो मां की थी, पर रंग गोरा था. छरहरे बदन का साधारण, पर आकर्षक लड़का था. उस के नंबर भी अच्छे आते थे.
रिया के दिल्ली जाने के एक साल बाद गोपाल ने भी दिल्ली के उसी स्कूल में दाखिला ले लिया. सोमेन ने गोपाल की 12वीं जमात तक की पढ़ाई के लिए रुपए उस के बैंक में जमा करवा दिए थे.
रिया गोपाल से एक साल सीनियर थी. पर एक राज्य का होने के चलते दोनों में परिचय हो गया. छुट्टियों में ट्रेन में अकसर आनाजाना साथ ही होता था. गोपाल और रिया दोनों का इरादा डाक्टर बनने का था.
रिया ने 12वीं के बाद कुछ मैडिकल कालेज के लिए अलगअलग टैस्ट दिए, पर वह कहीं भी पास नहीं कर सकी थी. तब उस ने एक साल कोचिंग ले कर अगले साल मैडिकल टैस्ट देने की सोची. वहीं दिल्ली के अच्छे कोचिंग इंस्टीट्यूट में कोचिंग शुरू की.
अगले साल गोपाल और रिया दोनों ने मैडिकल कालेज में दाखिले के लिए टैस्ट दिए. इस बार दोनों को कामयाबी मिली थी. गोपाल के नंबर कुछ कम थे, पर रिजर्वेशन कोटे में तो उस का दाखिला होना तय था.
गोपाल और रिया दोनों ने बीएचयू मैडिकल कालेज में दाखिला लिया. सोमेन गोपाल की पढ़ाई का भी खर्च उठा रहे थे. अब दोनों की क्लास भी साथ होती थी. आपस में मिलनाजुलना भी ज्यादा हो गया था. छुट्टियों में भी साथ ही घर आते थे.
वहां से शेयर टैक्सी से हजारीबाग जाना आसान था. हजारीबाग के लिए कोई अलग ट्रेन नहीं थी. जब कभी सोमेन रिया को लेने रांची स्टेशन जाते थे, तो वे गोपाल को भी बिठा लेते थे और अगर सोमेन को औफिशियल टूर में हजारीबाग जाना पड़ता था, तो गोपाल को वे साथ ले जाते थे. इस तरह समय बीतता गया और गोपाल व रिया अब काफी नजदीक आ गए थे. वे एकदूसरे से प्यार करने लगे थे.
गोपाल और रिया दोनों असलियत से अनजान थे. दोनों के मातापिता भी उन की प्रेम कहानी से वाकिफ नहीं थे. उन्होंने पढ़ाई के बाद अपना घर बसाने का सपना देख रखा था. साढ़े 4 साल बाद दोनों ने अपनी एमबीबीएस पूरी कर ली. आगे उसी कालेज में दोनों ने एक साल की इंटर्नशिप भी पूरी की.
रिया काफी समझदार थी. उस की शादी के लिए रिश्ते आने लगे, पर उस ने मना कर दिया और कहा कि अभी वह डाक्टरी में पोस्ट ग्रेजुएशन करेगी.
लक्ष्मी कुछ दिनों से बीमार चल रही थी. इसी बीच सोमेन भी हजारीबाग में थे. उस ने सोमेन से कहा, ‘‘बाबूजी, मेरा अब कोई ठिकाना नहीं है. आप गोपाल का खयाल रखेंगे?’’
सोमेन ने समझते हुए कहा, ‘‘अब गोपाल समझदार डाक्टर बन चुका है. वह अपने पैरों पर खड़ा है. फिर भी उसे मेरी जरूरत हुई, तो मैं जरूर मदद करूंगा. ’’ कुछ दिनों बाद ही लक्ष्मी की मौत हो गई.
गोपाल और रिया दोनों ने मैडिकल में पोस्ट ग्रैजुएशन का इम्तिहान दिया था. वे तो बीएचयू में पीजी करना चाहते थे, पर वहां उन्हें सीट नहीं मिली. दोनों को रांची मैडिकल कालेज आना पड़ा.
उन में प्रेम तो जरूर था, पर दोनों में से किसी ने भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया था. दोनों ने तय किया कि जब तक उन की शादी नहीं होती, इस प्यार को प्यार ही रहने दिया जाए.
रिया की मां संध्या ने एक दिन उस से कहा, ‘‘तुम्हारे लिए अच्छेअच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं. तुम पोस्ट ग्रेजुएशन करते हुए भी शादी कर सकती हो. बहुत से लड़केलड़कियां ऐसा करते हैं.’’
रिया बोली, ‘‘करते होंगे, पर मैं नहीं करूंगी. मुझ से बिना पूछे शादी की बात भी मत चलाना.’’
‘‘क्यों? तुझे कोई लड़का पसंद है, तो बोल न?’’
‘‘हां, ऐसा ही समझे. पर अभी हम दोनों पढ़ाई पर पूरा ध्यान दे रहे हैं. शादी की जल्दी किसी को भी नहीं है. पापा को भी बता देना.’’
संध्या ने कोई जवाब नहीं दिया. इसी बीच एक बार सोमेन के दोस्त ने उन्हें खबर दी कि उस ने रिया और गोपाल को एकसाथ सिनेमाघर से निकलते देखा है.
इस के कुछ ही दिनों बाद संध्या के रिश्ते के एक भाई ने बताया कि उस ने गोपाल और रिया को रैस्टौरैंट में लंच करते देखा है.
सोमेन ने अपनी पत्नी संध्या से कहा, ‘‘रिया और गोपाल दोनों को कई बार सिनेमाघर या होटल में साथ देखा गया है. उसे समझाओ कि उस के लिए अच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं. सिर्फ उस के हां कहने की देरी है.’’
संध्या बोली, ‘‘रिया ने मुझे बताया था कि वह गोपाल से प्यार करती है.’’
सोमेन चौंक पड़े और बोले, ‘‘क्या? रिया और गोपाल? यह तो बिलकुल भी नहीं हो सकता.’’
अगले दिन सोमेन ने रिया से कहा, ‘‘बेटी, तेरे रिश्ते के लिए काफी अच्छे औफर हैं. तू जिस से बोलेगी, हम आगे बात करेंगे’’
रिया ने कहा, ‘‘पापा, मैं बहुत दिनों से सोच रही थी कि आप को बताऊं कि मैं और गोपाल एकदूसरे को चाहते हैं. मैं ने मम्मी को बताया भी था कि पीजी पूरा कर के मैं शादी करूंगी.’’
‘‘बेटी, कहां गोपाल और कहां तुम? उस से तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, उसे भूल जाओ. अपनी जाति के अच्छे रिश्ते तुम्हारे सामने हैं.’’
‘‘पापा, हम दोनों पिछले 5 सालों से एकदूसरे को चाहते हैं. आखिर उस में क्या कमी है?’’
‘‘वह एक आदिवासी है और हम ऊंची जाति के शहरी लोग हैं.’’
‘‘पापा, आजकल यह जातपांत, ऊंचनीच नहीं देखते. गोपाल भी एक अच्छा डाक्टर है और उस से भी पहले बहुत नेक इनसान है.’’
सोमेन ने गरज कर कहा, ‘‘मैं बारबार तुम्हें मना कर रहा हूं… तुम समझाती क्यों नहीं हो?’’
‘‘पापा, मैं ने भी गोपाल को वचन दिया है कि मैं शादी उसी से करूंगी.’’
उसी समय संध्या भी वहां आ गई और बोली, ‘‘अगर रिया गोपाल को इतना ही चाहती है, तो उस से शादी करने में क्या दिक्कत है? मुझे तो गोपाल में कोई कमी नहीं दिखती है.’’
सोमेन चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे जीतेजी यह शादी नहीं हो सकती. मैं तो कहूंगा कि मेरे मरने के बाद भी ऐसा नहीं करना. तुम लोगों को मेरी कसम.’’
रिया बोली, ‘‘ठीक है, मैं शादी ही नहीं करूंगी. तब तो आप खुश हो जाएंगे.’’
सोमेन बोले, ‘‘नहीं बेटी, तुझे शादीशुदा देख कर मुझे बेहद खुशी होगी. पर तू गोपाल से शादी करने की जिद छोड़ दे.’’
‘‘पापा, मैं ने आप की एक बात मान ली. मैं गोपाल को भूल जाऊंगी. परंतु आप भी मेरी एक बात मान लें, मुझे किसी और से शादी करने के लिए मजबूर नहीं करेंगे.’’
ये बातें फिलहाल यहीं रुक गईं. रात में संध्या ने पति सोमेन से पूछा, ‘‘क्या आप बेटी को खुश नहीं देखना चाहते हैं? आखिर गोपाल में क्या कमी है?’’
सोमेन ने कहा, ‘‘गोपाल में कोई कमी नहीं है. उस के आदिवासी होने पर भी मुझे कोई एतराज नहीं है. वह सभी तरह से अच्छा लड़का है, फिर भी…’’
रिया को नींद नहीं आ रही थी. वह भी बगल के कमरे में उन की बातें सुन रही थी. वह अपने कमरे से बाहर आई और पापा से बोली, ‘‘फिर भी क्या…? जब गोपाल में कोई कमी नहीं है, फिर आप की यह जिद बेमानी है.’’
सोमेन बोले, ‘‘मैं नहीं चाहता कि तेरी शादी गोपाल से हो.’’
‘‘नहीं पापा, आखिर आप के न चाहने की कोई तो ठोस वजह होनी चाहिए. आप प्लीज मुझे बताएं, आप को मेरी कसम. अगर कोई ऐसी वजह है, तो मैं खुद ही पीछे हट जाऊंगी. प्लीज, मुझे बताएं.’’
सोमेन बहुत घबरा उठे. उन को पसीना छूटने लगा. पसीना पोंछ कर अपनेआप को संभालते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह शादी इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि…’’
वे बोल नहीं पा रहे थे, तो संध्या ने उन की पीठ सहलाते हुए उन को हिम्मत दी और कहा, ‘‘हां बोलिए आप, क्योंकि… क्या?’’
सोमेन बोले, ‘‘तो लो सुनो. यह शादी नहीं हो सकती है, क्योंकि गोपाल रिया का छोटा भाई है.
‘‘जब मैं हजारीबाग में अकेला रहता था, तब मुझ से यह भूल हो गई थी.’’
रिया और संध्या को काटो तो खून नहीं. दोनों हैरानी से सोमेन को देख रही थीं. रिया की आंखों से आंसू गिरने लगे. कुछ देर बाद वह सहज हुई और अपने कमरे में चली गई.
रात में ही उस ने गोपाल को फोन कर के कहा, ‘‘गोपाल, क्या तुम मुझ से सच्चा प्यार करते हो?’’
गोपाल बोला, ‘क्या इतनी रात गए यही पूछने के लिए फोन किया है?’
‘‘तुम ने सुना होगा कि प्यार सिर्फ पाने का नाम नहीं है, इस में कभी खोना भी पड़ता है.’’
गोपाल ने कहा, ‘हां, सुना तो है.’’
‘‘अगर यह सही है, तो तुम्हें मेरी एक बात माननी होगी. बोलो मानोगे?’’ रिया बोली.
गोपाल बोला, ‘यह कैसी बात कर रही हो आज? तुम्हारी हर जायज बात मैं मानूंगा.’
‘‘तो सुनो. बात बिलकुल जायज
है, पर मैं इस की कोई वजह नहीं
बता सकती हूं और न ही तुम पूछोगे. ठीक है?’’
‘ठीक है, नहीं पूछूंगा. अब बताओ तो सही.’
रिया बोली, ‘‘हम दोनों की शादी नहीं हो सकती. यह बिलकुल भी मुमकिन नहीं है. वजह जायज है और जैसा कि मैं ने पहले ही कहा है कि वजह न मैं बता सकती हूं, न तुम पूछना कभी.’’
गोपाल ने पूछा, ‘तो क्या हमारा प्यार झूठा था?’
रिया बोली, ‘‘प्यार सच्चा है, पर याद करो, हम ने तय किया था कि शादी नहीं होने तक हमारा प्यार ‘अधूरा प्यार’ रहेगा. बस, यही समझा लो.
‘‘अब तुम कहीं भी शादी कर लो, पर मेरा तुम्हारा साथ बना रहेगा और तुम चाहोगे भी तो भी मैं कभी भी तुम्हारे घर आ धमकूंगी,’’ इतना कह कर रिया ने फोन रख दिया.
Romantic Story in Hindi: आयुषी सब काम खत्म कर के लैपटौप खोल कर बैठ गई थी. आयुषी ने देखा घड़ी में 1 बज रहे थे. अभी सायशा के आने में 1 घंटा शेष था. उस ने बहुत दिनों बाद फेसबुक पर लौगइन किया था. स्क्रौल करतेकरते अचानक से एक फ्रैंड रिक्वैस्ट को देख कर आयुषी का दिल धक से रह गया. तरंग की फ्रैंड रिक्वैस्ट आई हुई थी. उस नाम पर हाथ रखते हुए भी उस की उंगलियां कांप रही थीं. 10 साल बीत गए थे. एक तरह से वह इस नाम को भूल चुकी थी. पर जब कभी भी उस की अपने पति से अनबन होती थी तो रहरह कर उसे तरंग की याद आती थी. आयुषी को लगता था कि यह तरंग का संताप है जिस की वजह से इतने सालों बाद भी उसे अपने घर में सुकून नहीं मिलता है.
बहुत देर तक वह तरंग की प्रोफाइल पिक्चर को देखती रही थी. गुलाब का फूल था और कोई जानकारी नहीं थी. इतने साल तो बीत गए हैं, अब कहां तरंग को उस की याद होगी. फिर एक मीठी सी शरारत भरी मुसकान उस के चेहरे पर आ गई. कितने अच्छे दिन थे वे. आयुषी को पता था कि तरंग उस का दीवाना था पर न जाने क्यों आयुषी कभी हिम्मत ही न जुटा पाई कि वह अपने परिवार के खिलाफ जा कर तरंग के प्यार को स्वीकार कर पाए.
न जाने क्या सोचते हुए उस ने तरंग नामक प्रोफाइल की फेसबुक रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर ली. फिर आयुषी
खो गई साल 2000 में…
आयुषी उन दिनों कालेज के फाइनल ईयर में थी. वह और उस की दोस्त अनुपम प्रैक्टिकल क्लास के बाद वापस घर की ओर जा रहे थे. तभी उस ने ध्यान दिया कि एक लंबा, सांवला और पतला लड़का बारबार मोटरसाइकिल से उस के इर्दगिर्द घूम रहा है. आयुषी का उस के परिवार में कहीं भी सुंदरता में नंबर न लगता था, इसलिए उस ने विचार को झटक दिया और तेजी से घर की तरफ कदम बढ़ा दिए.
पर अब यह रोज की बात हो गई थी. आयुषी के साथ उस लड़के ने कभी कोई बदतमीजी नहीं की थी. इसलिए आयुषी को समझ नहीं आ रहा था कि वह शिकायत करे भी तो क्या करे? न जाने कैसे उस लड़के को आयुषी के टाइमटेबल का पता था. जैसे ही आयुषी घर से निकलती चौराहे पर वह लड़का इंतजार करता हुआ मिल जाता था. फिर जब वह कालेज से निकलती तो वह कालेज के गेट पर भी मिलता था. यह सिलसिला चलते हुए लगभग 1 माह हो गए थे.आयुषी को भी अब उस लड़के का इंतजार रहने लगा था. फिर आयुषी की सहेली चारू ने ही बताया कि उस का नाम तरंग है और वह इंजीनियरिंग के बाद प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहा है.
पर तरंग की काफी कोशिशों के बाद भी आयुषी की उस से बात करने की कभी हिम्मत नहीं हुई थी. अपने घर के माहौल का उसे अच्छे से ज्ञान था. पर सबकुछ जानने के बाद भी आयुषी का मन तरंग की ओर खींचने लगा था. धीरेधीरे आयुषी की खास सहेलियों और तरंग के दोस्तों को भी यह बात पता चल गई थी. पर बड़ा अजीब सा रिश्ता था दोनों के बीच, न कभी बातचीत हुई थी और न ही मिले थे पर फिर भी एकदूसरे को देख कर उन्हें चैन आ जाता था.
समय गुजरता गया और लगभग 1 साल के बाद 14 फरवरी, 2001 को तरंग ने बहुत मुश्किल से आयुषी को मिलने के लिए तैयार किया था. आयुषी ने बड़ी मुश्किल से अपनी बड़ी बहन का फिरोजी सूट मांगा, साथ में मोतियों की माला. उन दिनों मोबाइल का चलन आमतौर पर नहीं था, न ही कोई पिज्जा या बर्गर सैंटर होते थे. आयुषी को उस की सहेली चारू लजीज तक छोड़ कर चली गई. बाहर ही तरंग खड़ा था. दोनों अंदर बैठ गए. तरंग बारबार आयुषी का पलकें झपकाना देख रहा था. दोनों इतने डरे हुए थे कि 5 मिनट में 4 गिलास पानी पी गए थे.
तरंग ने झिझकते हुए आयुषी को एक छोटा सा ताजमहल दिया और साथ मे एक छोटा सा पर्स. फिर डोसा खाते हुए तरंग बोला,”आयुषी, मुझे पता है तुम शायद पहली बार किसी लड़के से मिलने आई हो…”
आयुषी कुछ नहीं बोल पाई थी. पर फिर धीरेधीरे दोनों मिलने लगे थे. तरंग और लड़कों की तरह कोई भी
अनुचित मांग नहीं करता था. बेहद ही सुलझा हुआ और जहीन लड़का था. हमेशा आयुषी को छोटेछोटे सरप्राइज देता रहता था. आयुषी के घर वालों को इस बात की भनक भी नहीं थी. तरंग के साथ आयुषी को यह अरैंजमैंट बहुत अच्छा लगने लगा था.
1 वर्ष बीत गया था. तरंग ने एक प्रवेश परीक्षा भी पास कर ली थी. तब तरंग ने आयुषी से कहा,”अगर तुम्हें ठीक लगे तो मैं मम्मीपापा को तुम्हारे यहां रिश्ते के लिए भेज दूं?”
आयुषी ने शरमा कर पलकें झुका ली थीं. 1 हफ्ते आयुषी के सपनों की दुनिया में बीत गए. तरंग का परिवार आया और बेइज्जत हो कर चला गया. तरंग के परिवार के जाते ही पापामम्मी ने उसे आड़े हाथों ले लिया,”तुझे शर्म नहीं आई, ठाकुर की बेटी हो और शूद्रों की बहू बनना चाहती हो?”
आयुषी बोली,”पापा, तरंग ब्राह्मण है…”
पापा बोले,”अरे बेवकूफ लड़की, इन छोटी जातियों वालों का तो यही काम रहता है कि कैसे हमारी लड़कियों को उल्लू बनाए. खबरदार अगर आगे से उस से मिली तो. हम अपने खानदान में नीच जात का खून किसी भी कीमत पर मिलने नहीं देंगे. ”
आयुषी का तो सुबकना बंद ही नहीं हो रहा था. क्या सोचा था और क्या हो गया है. उसे तरंग पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों तरंग ने उस से यह बात छिपाई थी?
22 फरवरी, 2002 में उस की तरंग से आखिरी मुलाकात थी. आयुषी पत्थर की तरह कठोर थी तो तरंग की आंखे गीली थीं. तरंग का परिवार पढ़ालिखा था और उसे सपने में भी भान नही था कि आज भी पढ़ाईलिखाई और काबिलियत से अधिक जातपात को महत्त्व देते हैं. आयुषी गुस्से में बोली,”तुम ने मुझ से झूठ बोला था. अगर मुझे पता होता कि तुम शूद्र तो मैं तुम से कभी न मिलती. ”
तरंग एकदम से हतप्रभ रह गया,”आयुषी, मेरे प्यार का अपमान तो मत करो मैं और मेरा परिवार तुम्हें पलकों पर बैठा कर रखेंगे. ”
आयुषी को तरंग पसंद था पर उस के प्यार में इतनी गहराई नहीं थी कि वह अपने घर वालों के खिलाफ खड़ी हो पाती. उसे लगा अगर कुछ गलत हो गया तो वह क्या करेगी? अब तक तो यह अरैंजमैंट सही चल रहा था पर अब जब स्टैंड लेने का समय आया तो वह पीछे हट गई.
उस के बाद तरंग ने कुछ नहीं कहा पर उस की आंखों में एक दर्द था जो रहरह कर आयुषी को आज भी याद आ जाता है. बस, उसे इतना पता था कि उस के बाद तरंग दिल्ली चला गया. वे दिन और आज का दिन, आयुषी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.
डोरबेल से आयुषी की तंद्रा टूटी. रात में फिर से आयुषी फेसबुक पर तरंग का प्रोफइल चैक कर रही थी. अचानक से मैसेंजर पर मैसेज दिखा,”कैसी हो और खुश तो हो न?”
आयुषी ने लिख दिया,”ठीक हूं…”
आयुषी का पति रोहित बेहद ही रूखा इंसान था. उस के साथ आयुषी का मन कभी भीग नहीं पाया था. रोहित के साथ आयुषी एक पत्नी थी पर कभी आयुषी नहीं बन पाई. जरूरतें पूरी हो रही थीं और जिंदगी कट रही थी.
न जाने कैसे और कब आयुषी और तरंग रोज चैट करने लगे थे. अगर तरंग पिंग नहीं करता तो आयुषी बेचैन हो उठती थी. करीब 1 माह बाद आयुषी ने तरंग को अपना नंबर दे दिया था. धीरेधीरे रोज बातें होने लगीं. तरंग को लगा जैसे उसे सब मिल गया हो.
एक दिन तो तरंग की पत्नी शुभांगी ने बोल भी दिया,”तरंग, कहां खोएखोए रहते हो?”
तरंग एकदम से सकपका गया,”नहीं तो, ऐसा क्यों कह रही हो…?
शुभांगी से तरंग बहुत प्यार करता था. जब तरंग टूटे हुए दिल और हौसले के साथ दिल्ली आया था तो शुभांगी ने ही उसे संभाला था. पर कहते हैं न पहला प्यार भूलना बहुत मुश्किल होता है.
22 दिसंबर की वह सर्द शाम थी जब तरंग और आयुषी कनाट प्लेस में मिले थे. आयुषी कैब से पहुंच गई थी. ब्लू जींस, ग्रे लौंग कोट में वह आज भी ऐसी ही लग रही थी जैसे पहले लगती थी. आयुषी जैसे ही कार में बैठी उस का दिल धकधक कर रहा था. तरंग ने कार में गुलाब की पंखुड़ियां बिछा रखी थीं. तरंग आयुषी से उस के घरपरिवार के बारे में पूछता रहा और आयुषी जवाब देती रही. तरंग यह सोच कर मन ही मन हंस रहा था कि आज भी आयुषी उतना ही डर रही है जितना पहले डरती थी.
धीरेधीरे आयुषी को महसूस होने लगा कि तरंग के साथ विवाह न कर के उस ने बहुत बड़ी गलती करी है.
तरंग के आने के बाद आयुषी को अब अपनी लाइफ परफैक्ट लगने लगी थी. अब रोहित की किचकिच पर वह ध्यान नहीं देती थी. ऐसा लगने लगा था कि दोबारा से उस के जीवन मे बहार आ गई है. आयुषी को जिंदगी का यह अरैंजमैंट अच्छा लगने लगा था. रोमांटिक बातों के लिए तरंग आयुषी को स्पैशल फील कराने के लिए था, तो सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के लिए रोहित था.
तरंग के साथ आयुषी आउटस्टैशन ट्रिप भी कर आई थी. तरंग ने आयुषी से प्यार किया था इसलिए वह
समझता था कि यह सफर अगर इतनी रफ्तार से चलता रहा तो दोनों परिवार जल जाएंगे. वह आयुषी की
बहुत इज्जत करता था इसलिए इस रिश्ते पर अब मित्रता का ब्रेक लगाना चाहता था. पर आयुषी थी कि कुछ समझने को तैयार नहीं थी. वह इन रूमानी पलों को अपनी रुकी हुई जिंदगी की सचाई मानने लगी थी. उसे तरंग के परिवार से कोई सरोकार नहीं था. जब भी उस का मन करता वह तरंग के साथ घूमने निकल जाती. बहुत बार तरंग ने आयुषी की जिद के कारण अपने परिवार को नाराज कर दिया था.
जब तरंग आयुषी को यह कहता तो वस मुसकरा कर कहती,”जब प्यार किया तो डरना क्या. ”
उस दिन सुबह से आयुषी का मूड खराब था. उस ने फटाफट तरंग को मैसेज किया,’लेट्स मीट फौर कौफी…’
तरंग ने कोई जवाब नहीं दिया. आयुषी ने कुछ देर सब्र किया और कुछ जवाब न आने पर फोन घुमा
दिया. जब तरंग ने फोन काट दिया तो आयुषी का खराब मूड और खराब हो गया. वह तबतक फोन मिलाती रही जब तक तरंग ने उठा नहीं लिया. तरंग के फोन उठाते ही आयुषी गुस्से में बोली,”सुबह से कोशिश कर रही हूं. कैसे प्रेमी हो?”
तरंग ठंडे स्वर में बोला,”आयुषी, मैं पति और पिता भी हूं. शुभांगी ठीक नहीं है. ”
आयुषी को लगा कि तरंग उस के सामने अपनी पत्नी को अधिक अहमियत दे रहा है. इसलिए गुस्से में चिल्ला कर बोली,”क्यों? तुम तो बड़ेबड़े प्यार के दावे करते थे. तुम ने ही मुझे ऐप्रोच किया था, मैं ने नहीं. ”
तरंग को भी गुस्सा आ गया. बोला, “हां, गलती हो गई थी. मैं तुम से शादी करना चाहता था, पर तब तो तुम्हें मेरी जाति से समस्या थी,” यह सुन कर आयुषी फट पड़ी,”तुम ने क्या मुझे तब बताया था कि तुम ब्राह्मण नहीं हो? बताओ मैं क्या करती तब? अब जब मिले हैं तो तुम्हें तो अपनी पत्नी से फुरसत नहीं है…”
तरंग समझाते हुए बोला,”आयुषी, जब समय था तुम हिम्मत न कर पाई और अब तुम्हें लगता है यह सब ठीक है? इस में शुभांगी या रक्षित का क्या कुसूर है बोलो?”
आयुषी की ईगो बहुत अधिक हर्ट हो गई थी. तरंग की इतनी हिम्मत कि अपनी पत्नी को प्रेमिका से अधिक
अहमियत दे रहा है. बहुत रुखाई से बोली,”तरंग, ब्लौक कर दो मुझे. ”
तरंग को आयुषी का व्यवहार बेहद बचकाना लग रहा था. उसे लगा पहले आयुषी में हिम्मत नहीं थी और अब वह जबरदस्ती बिना किसी बात के धौस जमा रही है. तरंग ने बिना कोई जवाब दिए मोबाइल बंद कर दिया था.
शाम को तरंग ने आयुषी को कौल लगाया तो आयुषी ने मोबाइल उठा कर रूखी सी आवाज में कहा,”क्या
बात है?”
तरंग ने प्यार से कहा,”आयुषी, तुम्हारी जगह मेरी जिंदगी में कोई नहीं ले सकता है. मैं बस तुम से यह कहना चाहता हूं कि एक मित्र और हितैषी की तरह मैं तुम्हारी जिंदगी का हिस्सा बनना चाहता हूं. पर अगर तुम यह सोच रही हो कि मैं अपने परिवार या पत्नी को ननजरअंदाज कर के तुम्हें तरजीह दूंगा तो तुम गलत हो. जैसे रोहित और तुम्हारी बेटी को तुम्हारी जरूरत है, वैसे ही शुभांगी और मेरे बेटे को मेरी जरूरत है. ”
आयुषी बिना कुछ सोचे बोली,”अरे, कितना अच्छा अरैंजमैंट चल रहा है. हमलोग माह में एकाध बार मिल लेते थे, घूमफिर लेते थे और तुम यह अपनी बीबी का रोना ले कर बैठे हो. अब देखो, मैं औरत हूं, मैं तो 24 घंटे उपलब्ध नहीं रह सकती हूं पर तुम तो थोड़ा कोशिश कर सकते हो न…”तरंग को समझ आ गया था कि आयुषी के लिए वह बस एक ऐंटरटेनर, उस की फीमेल ईगो को सहलाने का एक जरीया है. तरंग बोला,”तुम्हारे लिए मैं टाइमपास और अरैंजमैंट हूं पर मुझे अब यह अरैंजमैंट सूट नहीं कर रहा है,” यह कह कर तरंग ने फोन काट दिया. उसे गुस्सा आ रहा था. पहले भी वह आयुषी के लिए टाइमपास और अरैंजमैंट था और आज भी उस की यही स्थिति थी. पर अब उसे यह अरैंजमैंट पसंद नहीं है.
‘‘क्यों शर्मिंदा कर रही हो… इतना महंगा गिफ्ट मेरी हैसियत से बाहर की बात है.’’
जुबेदा बोली, ‘‘ऐसा कुछ भी नहीं है. यह तो पर्सनली तुम्हारे लिए है. मां ने कहा है कि जाने से पहले तुम्हारे भाई और बहन के लिए भी कुछ देना है…तुम्हें गिफ्ट पसंद आया या नहीं?’’
मैं ने कहा, ‘‘पसंद न आने का सवाल ही नहीं है. इतने सुंदर और कौस्टली गिफ्ट की तो मैं सपने में भी कल्पना नहीं कर सकता हूं.’’
‘‘खैर, बातें न बनाओ. मां ने कल दुबई मौल में मिलने को कहा है. मैं भी रहूंगी. गाड़ी भेज दूंगी, आ जाना.’’
अगले दिन शनिवार को जुबेदा ने गाड़ी भेज दी. मैं दुबई मौल में जुबेदा और उस की मां के साथ बैठा था. उस की मां ने मेरे पूरे परिवार के बारे में पूछा. फिर मौल से ही मेरे भाईबहन के लिए गिफ्ट खरीद कर देते हुए कहा, ‘‘तुम बहुत अच्छे लड़के हो. जुबेदा भी तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती है. अभी तो तुम्हारी शादी नहीं हुई है. अगर तुम्हें दुबई में अच्छी नौकरी मिले तो क्या यहां सैटल होना चाहोगे?’’
उन का अंतिम वाक्य मुझे कुछ अजीब सा लगा. मैं ने कहा, ‘‘दुबई बेशक बहुत अच्छी
जगह है, पर मेरे अपने लोग तो इंडिया में ही हैं. फिर भी वहां लौट कर सोचूंगा.’’
जुबेदा मेरी ओर प्रश्नभरी आंखों से देख रही थी. मानो कुछ कहना चाहती हो पर बोल नहीं पा रही थी. मौल से निकलने से पहले एक मिनट के लिए मुझ से अकेले में कहा कि उसे मेरे दुबई में सैटल होने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए. खैर अगले दिन रविवार को मैं इंडिया लौट गया.
मेरे इंडिया पहुंचने के कुछ घंटों के अंदर ही जुबेदा ने मेरे कुशल पहुंचने की जानकारी ली. कुछ दिनों के अंदर ही फिर जुबेदा का फोन आया, बोली, ‘‘अशोक, तुम ने क्या फैसला लिया दुबई में सैटल होने के बारे में?’’
मैं ने कहा, ‘‘अभी तक कुछ नहीं सोचा… इतनी जल्दी यह सोचना आसान नहीं है.’’
‘‘अशोक, यह बात तो अब तक तुम भी समझ गए हो कि मैं तुम्हें चाहने लगी हूं. यहां तक कि मेरे मातापिता भी यह समझ रहे हैं. अच्छा, तुम साफसाफ बताओ कि क्या तुम मुझे नहीं चाहते?’’ जुबेदा बोली.
मैं ने कहा, ‘‘हां, मैं भी तुम्हें चाहता हूं. पर हर वह चीज जिसे हम चाहते हैं, मिल ही जाए जरूरी तो नहीं?’’
‘‘पर प्रयास तो करना चाहिए अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए,’’ जुबेदा बोली.
‘‘मुझे क्या करना होगा तुम्हारे मुताबिक?’’ मैं ने पूछा.
‘‘तुम्हें मुझ से निकाह करना होगा. इस के लिए तुम्हें सिर्फ एक काम करना होगा. यानी इसलाम कबूल करना होगा. बाकी सब यहां हम लोग संभाल लेंगे. और हां, चाहो तो अपने भाई को भी यहां बुला लेना. बाद में उसे भी अच्छी नौकरी दिला देंगे.’’
‘‘इस्लाम कबूल करना जरूरी है क्या? बिना इस के नहीं हो सकता है निकाह?’’
‘‘नहीं बिना इसलाम धर्म अपनाए यहां तुम मुझ से शादी नहीं कर सकते हो. तुम ने देखा है न कि मां के लिए मेरे पिता को भी हमारा धर्म स्वीकार करना पड़ा था. उन को यहां आ कर काफी फायदा भी हुआ. प्यार में कंप्रोमाइज करना बुरा नहीं.’’
‘‘सिर्फ फायदे के लिए ही सब काम नहीं किया जाता है और प्यार में कंप्रोमाइज से बेहतर सैक्रिफाइस होता है. मैं दुबई आ सकता हूं, तुम से शादी भी कर सकता हूं, पर मैं भी मजबूर हूं, अपना धर्म नहीं बदल सकता हूं… मैं एक विकल्प दे सकता हूं… तुम इंडिया आ सकती हो… यहां शादी कर सैटल हो सकती हो. मैं तुम्हें धर्म बदलने को मजबूर नहीं करूंगा. धर्म की दीवार हमारे बीच नहीं होगी.’’
‘‘नहीं, मेरे मातापिता इस की इजाजत नहीं देंगे. मेरी मां भी और मैं भी अपने मातापिता की एकलौती संतान हैं. हमारे यहां बड़ा बिजनैस और प्रौपर्टी है. फिर वैसे भी मुझे दूसरे धर्म के लड़के से शादी करने की न तो इजाजत मिलेगी और न ही इस की हिम्मत है मुझ में,’’ जुबेदा बोली.
मैं ने कहा, ‘‘मेरे औफर में किसी को धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं होगी. मैं तुम्हें इंडिया में सारी खुशियां दूंगा. मेरा देश बहुत उदार है. यहां सभी धर्मों के लोग अमनचैन से रह सकते हैं, कुछ सैक्रिफाइस तुम करो, कुछ मैं करता हूं पर मैं अपना धर्म नहीं बदल सकता हूं.’’
‘‘तो यह तुम्हारा अंतिम फैसला है?’’
‘‘सौरी. मैं अपना धर्म नहीं बदल सकता हूं. मैं सोच रहा हूं कि जब अगली बार दुबई आऊंगा तुम्हारी हीरे की अंगूठी वापस कर दूंगा. इतनी कीमती चीज मुझ पर कर्ज है.’’
‘‘अशोक, प्लीज बुरा न मानो. इस अंगूठी को बीच में न लाओ. हमारी शादी का इस से कोई लेनादेना नहीं है. डायमंड आर फौर एवर, यू हैव टु कीप इट फौरएवर. इसे हमारे अधूरे प्यार की निशानी समझ कर हमेशा अपने साथ रखना. बाय टेक केयर औफ योरसैल्फ.’’
‘‘तुम भी सदा खुश रहो… यू टू टेक केयर औफ योरसैल्फ.’’
‘‘थैंक्स,’’ इतना कह कर जुबेदा ने फोन काट दिया. यह जुबेदा से मेरी आखिरी बात थी. उस की दी हुई हीरे की अंगूठी अभी तक मेरे पास है. यह हमारे अधूरे प्यार की अनमोल निशानी है.
कमरे में जा कर उस ने 2 कप कौफी और्डर की. थोड़ी देर में कौफी भी आ गई. कौफी पीते हुए कहा ‘‘यू नो, मैं तो 4 सालों से आयरलैंड में पढ़ रही थी. कभी लंदन ठीक से घूम नहीं सकी थी. अब दुबई लौट रही हूं तो सोचा जाने से पहले लंदन देख लूं.’’
मैं ने कहा, ‘‘आयरलैंड कैसे पहुंच गई तुम?’’
उस ने बताया कि उस के पिता मैक एक आयरिश हैं. जुबेदा के नाना का एक तेल का कुआं हैं, जिस में वे काम करते थे. उस कुएं से बहुत कम तेल निकल रहा था, नानाजी ने खास कर जुबेदा के पिताजी को इस का कारण जानने के लिए बुलवाया था. उन्होंने जांच की तो पता चला कि नानाजी के कुएं से जमीन के नीचे से एक दूसरा शेख तेल को अपने कुएं में पंप कर लेता है.
मैक ने इस तेल की चोरी को रोका. ऊपर से जुबेदा के नाना को मुआवजे में भारीभरकम रकम भी मिली थी. तब खुश हो कर उन्होंने मैक को दुबई से ही अच्छी सैलरी दे कर रख लिया. इतना ही नहीं, उन्हें लाभ का 10 प्रतिशत बोनस भी मिलता था.
जुबेदा के नानाजी और मैक में अच्छी दोस्ती हो गई थी. अकसर घर पर आनाजाना होता था. धीरेधीरे जुबेदा की मां से मैक को प्यार हो गया. पर शादी के लिए उन्हें इसलाम धर्म कबूल करना पड़ा था. इस के बाद से मैक दुबई में ही रह गया. पर मैक की मां आयरलैंड में ही थीं. अत: जुबेदा वहीं दादी के साथ रह कर पढ़ी थी.
अपने बारे में इतना बताने के बाद जुबेदा ने कहा, ‘‘मैं तो कल शाम ऐमिरेट्स की फ्लाइट से दुबई जा रही हूं…तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’
मैं ने कहा ‘‘मैं भी ऐमिरेट्स की फ्लाइट से हैदराबाद जाऊंगा, पर कल नहीं, परसों. इस के पहले तक तो इत्तफाक से हम मिलते रहे थे, पर अब इत्तफाक से बिछड़ रहे हैं. फिर भी जितनी देर का साथ रहा बड़ा ही सुखद रहा.’’
जुबेदा बोली, ‘‘नैवर माइंड. इत्तफाक हुआ तो हम फिर मिलेंगे. वैसे तुम कभी दुबई आए हो?’’
मैं ने कहा, ‘‘हां, एक बार औफिस के काम से 2 दिनों के लिए गया था. मेरी कंपनी के लोग दुबई आतेजाते रहते हैं. हो सकता है मुझे फिर वहां जाने का मौका मिले.’’
‘‘यह तो अच्छा रहेगा. जब कभी आओ मुझ से जरूर मिलना,’’ जुबेदा ने कहा और फिर अपना एक कार्ड मेरे हाथ पर रखते हुए मेरे हाथ को चूमते हुए कहा, ‘‘तुम काफी अच्छे लड़के हो.’’
‘‘बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’’
‘‘बिना संकोच पूछो. मुझे पूरी उम्मीद हैं कि तुम कोई ऐसीवैसी बात नहीं करोगे जिस से मुझे तकलीफ हो.’’
‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं करूंगा. बस मैं सोच रहा था कि तुम लोग तो काफी परदे में रहते हो, पर तुम्हें देख कर ऐसा कुछ नहीं लगता.’’
वह हंस पड़ी. बोली, ‘‘तुम ठीक सोचते हो दुबई पहुंच कर मुझे वहां के अनुसार परदे में ही रहना होगा. फिर भी मेरा परिवार थोड़ा मौडरेट सोच रखता है. ओके, गुड नाइट. कल सुबह ब्रेकफास्ट पर मिलते हैं.’’
अगली सुबह हम दोनों ने साथ ब्रेकफास्ट किया. उस के बाद जुबेदा मेरे ही रूम में आ गई. हम लोगों ने एकदूसरे की पसंदनापसंद, रुचि और परिवार के बारे में बाते कीं. फिर शाम को मैं उसे विदा करने हीथ्रो ऐयरपोर्ट तक गया. जातेजाते उस ने मुझ से हाथ मिलाया. मेरा हाथ चूमा और कहा, ‘‘दुबई जरूर आना और मुझ से मिलना.’’
मैं ने भी उसे अपना एक कार्ड दे दिया. फिर वह ‘बाय’ बोली और हाथ हिलाते हुए ऐयरपोर्ट के अंदर चली गई. मैं भी अगले दिन अपने देश लौट आया. जुबेदा से मेरा संपर्क फेसबुक या स्काइप पर कभीकभी हो जाता था.
एक बार तो उस ने अपने मातापिता से भी स्काइप पर वीडियो चैटिंग कराई. उन्होंने कहा कि जुबेदा ने मेरी काफी तारीफ की थी उन से. मुझे तो वह बहुत अच्छी लगती थी. देखने में अति सुंदर. मगर मेरे एकतरफा चाहने से कोई फायदा नहीं था.
1 साल से कुछ ज्यादा समय बीत चुका था. तब जा कर मुझे दुबई जाने का मौका मिला. मेरी कंपनी को एक प्रोडक्ट अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लौंच करना था. इसी सिलसिले में मुझे 5 दिन रविवार से गुरुवार तक दुबई में रहना था.
अगले हफ्ते शनिवार शाम को मैं दुबई पहुंचा. वहां ऐेयरपोर्ट पर जुबेदा भी आई थी. पर शुरू में मैं उसे पहचान नहीं सका, क्योंकि वह बुरके में थी. उसी ने मुझे पहचाना. उस ने बताया कि उस के नाना का एक होटल भी है. उसी में मुझे उन का मेहमान बन कर रहना है. फिर उस ने एक टैक्सी बुला कर मुझे होटल छोड़ने को कहा. हालांकि वह स्वयं अपनी कार से आई थी.
जुबेदा पहले से ही होटल पहुंच कर मेरा इंतजार कर रही थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘मैं तुम्हारी कार में भी तो आ सकता था?’’
वह बोली, ‘‘नहीं, अगर तुम्हारे साथ कोई औरत होती तब मैं तुम्हें अपने साथ ला सकती थी. औनली जैंट्स, नौट पौसिबल हियर. अच्छा जिस होटल में तुम्हारे औफिस का प्रोग्राम है. वह यहां से 5 मिनट की वाक पर है. तुम कहो तो मैं ड्राइवर को कार ले कर भेज दूंगी.’’
‘‘नो थैंक्स. पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है,’’ मैं ने कहा.
जुबेदा अपने घर लौट गई थी और मैं अपने रूम में आ गया था. अगली सुबह रविवार से गुरुवार तक मुझे कंपनी का काम करना था. जुबेदा बीचबीच में फोन पर बात कर लेती थी. गुरुवार शाम तक मेरा काम पूरा हो गया था. जुबेदा ने शुक्रवार को खाने पर बुलाया था. मुझे इस की उम्मीद भी थी.
मैं इंडिया से उस के पूरे परिवार के लिए उपहार ले आया था- संगमरमर का बड़ा सा ताजमहल, अजमेर शरीफ के फोटो, कपड़े, इंडियन स्वीट्स और हैदराबाद की मशहूर कराची बेकरी के बिस्कुट व स्नैक्स आदि.
सब ने बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया और स्वादिष्ठ शाकाहारी भोजन कराया. लगभग शाम को जब चलने लगा तो उस की मां ने मुझे एक छोटा सा सुंदर पैकेट दिया. मैं उसे यों ही हाथ में लिए अपने होटल लौट आया. जुबेदा का ड्राइवर छोड़ गया था.
अभी मैं होटल पहुंचा ही था कि जुबेदा का फोन आया, ‘‘गिफ्ट कैसा लगा?’’
मैं ने कहा, ‘‘अभी तो खोल कर देखा
भी नहीं.’’
जुबेदा, ‘‘यह तो हमारे तोहफे की तौहीन होगी.’’
‘‘सौरी, अभी तुम लाइन पर रहो. 1 मिनट में पैकेट खोल कर बताता हूं,’’ कह मैं ने जब पैकेट खोला तो उस में बेहद खूबसूरत और बेशकीमती हीरे की अंगूठी थी. मैं तो कुछ पल आश्चर्य से आंखें फाड़े उसे देखता रहा.
तब तक फिर जुबेदा ने ही पूछा, ‘‘क्या हुआ, कुछ बोलते क्यों नहीं?’’
‘‘यह क्या किया तुम ने? मुझ से कुछ कहते नहीं बन रहा है.’’
‘‘पसंद नहीं आया?’’ जुबेदा ने पूछा.
मां ने कभी समझौता करना नहीं सीखा था. विरासत में मुझे यही मिला. मैं खामोश हो गई. जब वह मेरी कोई बात ही नहीं मानता तो मैं क्यों झुकूं. आना तो उसे ही पड़ेगा.
2 दिन बाद ही संदीप आ गया तो मुझे लगा मां ठीक ही कह रही थीं. मां की छाती फूल कर 2 इंच और चौड़ी हो गई.
दीवाली से 4 दिन पहले संदीप के मम्मीपापा आ गए. सीधे तो उन्होंने कुछ कहा नहीं पर उन के हावभाव से ऐसा लगा कि मेरा नौकरी करना उन्हें पसंद नहीं आया.
संदीप ने एक दिन कहा भी कि मैं घर पर ही रहूं और मम्मीपापा की देखभाल करूं लेकिन इसे मैं ने यह कह कर टाल दिया था, ‘मैं भी यही चाहती हूं कि मम्मीपापा की सेवा करूं पर इन दिनों लंबी छुट्टी लेना ठीक नहीं है. मेरी स्थायी नियुक्ति होने वाली है और इस छुट्टी का सीधा असर उस पर पड़ेगा.’
‘देखो, मैं तो चाहता ही नहीं था कि तुम नौकरी करो पर तुम्हारी जिद के कारण मैं कुछ नहीं बोला. अब यह बात उन को पता चली है तो उन्हें अच्छा नहीं लगा.’
‘मैं ने विवाह तुम्हारे मम्मीपापा के सुख के लिए नहीं किया. वे दोनों तो कुछ दिनों के मेहमान हैं. चले जाएंगे तो मैं फिर अकेली रह जाऊंगी. मेरा इतने पढ़ने का क्या लाभ?’
बात वहीं खत्म नहीं हुई थी. कोई बात कहीं पर भी खत्म नहीं होती जब तक कि उस के कारणों को जड़ से न निकाला जाए.
मम्मी ने एक दिन मेरे अच्छे मूड को देख कर कहा, ‘बेटी, मुझे यह घर सूनासूना सा लगता है. अगली दीवाली तक इस घर में रौनक हो जानी चाहिए. तुम समझ गईं न मेरी बात को. इस घर में अब मेरे पोतेपोती भी होने चाहिए.’
मैं नहीं चाहती थी कि वे किसी भ्रम में रहें, इसलिए सीधेसीधे कह दिया, ‘मैं अभी किसी बंधन में नहीं पड़ना चाहती, क्योंकि अभी तो यह हमारे हंसनेखेलने के दिन हैं. किसी भी खुशखबरी के लिए आप को 4-5 वर्ष तो इंतजार करना ही पड़ेगा.’
संदीप ने उन्हें सांत्वना दी. वैसे हमारे संबंधों की कड़वाहट उन के कानों तक पहुंच चुकी थी.
समय यों ही खिसकता रहा. हमारे संबंध बद से बदतर होते गए. मुझे संदीप की हर बात बरछी सी सीने में चुभती.
एक दिन मैं ने सुबह ही संदीप से कहा कि स्थायी नियुक्ति की खुशी में मुझे अपने सहयोगियों को पार्टी देनी है. संभव है, शाम को आने में थोड़ी देर हो जाए. पर वह पार्टी टल गई. मैं घर आ गई. घर पहुंची तो संदीप किसी महिला के साथ हंसहंस कर बातें कर रहा था. मेरे पहुंचते ही दोनों चुप हो गए.
‘अरे, तुम कब आईं, आज पार्टी नहीं हुई क्या?’
मेरा चेहरा तमतमा गया. मैं ने अपना बैग सोफे पर पटका और फ्रेश होने चली गई. मन के भीतर बहुत कुछ उमड़ रहा था. अत: गुस्से में मैं अपना नियंत्रण खो बैठी. इस से पहले कि वह कुछ कहता, मैं ने खड़ेखड़े पूछा, ‘कौन है यह लड़की और आप इस समय यहां क्या कर रहे हैं?’
संदीप मुझे घूरते हुए बोला, ‘तुम बैठोगी तभी तो बताऊंगा.’
‘अब बताने के लिए रह ही क्या गया है?’ संदीप के घूरने से घायल मैं दहाड़ी, ‘बहाना तो तैयार कर ही लिया होगा?’
‘संगीता, थोड़ा तो सोचसमझ कर बात करो. आरोप लगाने से पहले हकीकत भी जान लिया करो.’
‘मुझे कुछ भी समझने की जरूरत नहीं है. मैं सब समझ चुकी हूं,’ कह कर मैं तेज कदमों से भीतर आ गई.
थोड़ी ही देर बाद संदीप मेरे पास आया और कहने लगा, ‘तुम ने तो हद ही कर दी. जानती हो कौन है यह?’
‘मुझे कुछ भी जानने की जरूरत नहीं है. मेरे आते ही तुम्हारा हंसीमजाक एकदम बंद हो जाना, यह जानते हुए कि मैं शाम को देर से आऊंगी, अपनी चहेती के साथ यहां आना ही मेरे जानने के लिए बहुत है. मुझे क्या पता कि मेरे कालिज जाने के बाद कितनों को यहां ले कर आए हो, मैं एकाएक उत्तेजित और असंयत हो उठी.
‘संगीता,’ वह एकदम दहाड़ पड़ा, ‘बहुत हो चुका अब. आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि मेरे चरित्र पर लांछन लगा सके. तुम ने शुरू से ही मुझे शक के दायरे में देखा और प्रभुत्व जमाने की कोशिश की है.’
‘यह सब बेकार की बातें हैं. सच तो यह है कि तुम ने शासन जमाने की कोशिश की है और जब मैं भारी पड़ने लगी तो तुम अपनी मनमानी करने लगे हो. मेरी मां ठीक ही कहती थीं…’
‘भाड़ में जाएं तुम्हारी मां. उन्हीं के कारण तो यह घर बरबाद हो रहा है.’
‘तुम ने मेरी मां को बुराभला कहा, अब मैं यहां एक पल भी नहीं रह सकती. मैं यह घर और तुम्हें छोड़ कर जा रही हूं.’
‘जरूर जाओ, जरूर जाओ, ताकि मुझे भी शांति मिल सके. आज तुम्हारी हरकतों ने तो मुझे कहीं का नहीं छोड़ा है.’
संदीप के चेहरे पर क्रोध और वितृष्णा के भाव उभर आए थे. वह ऐसे हांफ रहा था जैसे मीलों सफर तय कर के आया हो.
मैं अपना सारा सामान समेट कर मायके चली आई और मां को झूठीसच्ची कहानी सुना कर उन की सहानुभूति बटोर ली.
मां को जब इन सब बातों का पता चला तो उन्होंने संदीप को जम कर फटकारा और उधर मैं अपनी सफलता पर आत्मविभोर हो रही थी. भैया ने तो यहां तक कह डाला कि यदि उस ने दोबारा कभी फोन करने की कोशिश की तो वह दहेज उत्पीड़न के मामले में उलझा कर सीधे जेल भिजवा देंगे. इस तरह मैं ने संदीप के लिए जमीन का ऐसा कोई कोना नहीं छोड़ा जहां वह सांस ले सके.
एक दिन रसोई में काम करते हुए भाभी ने कहा, ‘संगीता, तुम्हारा झगड़ा अहं का है. मेरी मानो तो कुछ सामंजस्य बिठा कर वहीं चली जाओ. सच्चे अर्थों में वही तुम्हारा घर है. संदीप जैसा घरवर तुम्हें फिर नहीं मिलेगा.’
‘तुम कौन होती हो मुझे शिक्षा देने वाली. मैं तुम पर तो बोझ नहीं हूं. यह मेरी मां का घर है. जब तक चाहूंगी यहीं रहूंगी.’ उस दिन के बाद भाभी ने कभी कुछ नहीं कहा.
वक्त गुजरता गया और उसी के साथ मेरा गुस्सा भी ठंडा पड़ने लगा. मेरी मां का वरदहस्त मुझ पर था. मैं ने इसी शहर में अपना तबादला करा लिया.
Romantic Story in Hindi: मैं हैदराबाद में रहता था, पर उन दिनों लंदन घूमने गया था. वहां विश्वविख्यात मैडम तुसाद म्यूजियम देखने भी गया. यहां दुनिया भर की नामीगिरामी हस्तियों की मोम की मूर्तियां बनी हैं. हमारे देश के महात्मा गांधी, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन की भी मोम की मूर्तियां थीं. मैं ने गांधीजी की मूर्ति को प्रणाम किया. फिर मैं दूसरी ओर बनी बच्चन और उन्हीं की बगल में बनी ऐश्वर्या की मूर्ति की ओर गया. उस समय तक वे उन की बहू नहीं बनी थीं. मैं उन दोनों की मूर्तियों से हाथ मिलाते हुए फोटो लेना चाहता था. मैं ने देखा कि एक खूबसूरत लड़की भी लगभग मेरे साथसाथ चल रही है. वह भारतीय मूल की नहीं थी, पर एशियाईर् जरूर लग रही थी. मैं ने साहस कर उस से अंगरेजी में कहा, ‘‘क्या आप इन 2 मूर्तियों के साथ मेरा फोटो खींच देंगी?’’
उस ने कहा, ‘‘श्योर, क्यों नहीं? पर इस के बाद आप को भी इन दोनों के साथ मेरा फोटो खींचना होगा.’’
‘‘श्योर. पर आप तो भारतीय नहीं लगतीं?’’
‘‘तो क्या हुआ. मेरा नाम जुबेदा है और मैं दुबई से हूं,’’ उस ने कहा.
‘‘और मेरा नाम अशोक है. मैं हैदराबाद से हूं,’’ कह मैं ने अपना सैल फोन उसे फोटो खींचने दे दिया.
मेरा फोटो खींचने के बाद उस ने भी अपना सैल फोन मुझे दे दिया. मैं ने भी उस का फोटो बिग बी और ऐश्वर्या राय के साथ खींच कर फोन उसे दे दिया.
जुबेदा ने कहा, ‘‘व्हाट ए सरप्राइज. मेरा जन्म भी हैदराबाद में ही हुआ था. उन दिनों दुबई में उतने अच्छे अस्पताल नहीं थे. अत: पिताजी ने मां की डिलीवरी वहीं कराई थी. इतना ही नहीं, एक बार बचपन में मैं बीमार पड़ी थी तो करीब 2 हफ्ते उसी अस्पताल में ऐडमिट रही थी जहां मेरा जन्म हुआ था.’’
‘‘व्हाट ए प्लीजैंट सरप्राइज,’’ मैं ने कहा.
अब तक हम दोनों थोड़ा सहज हो चुके थे. इस के बाद हम दोनों मर्लिन मुनरो की मूर्ति के पास गए. मैं ने जुबेदा को एक फोटो मर्लिन के साथ लेने को कहा तो वह बोली, ‘‘यह लड़की तो इंडियन नहीं है? फिर तुम क्यों इस के साथ फोटो लेना चाहते हो?’’
इस पर हम दोनों हंस पड़े. फिर उस ने कहा, ‘‘क्यों न इस के सामने हम दोनों एक सैल्फी ले लें?’’
उस ने अपने ही फोन से सैल्फी ले कर मेरे फोन पर भेज दी.
मैडम तुसाद म्यूजियम से निकल कर मैं ने पूछा, ‘‘अब आगे का क्या प्रोग्राम है?’’
‘‘क्यों न हम लंदन व्हील पर बैठ कर लंदन का नजारा देखें?’’ वह बोली.
मैं भी उस की बात से सहमत था. इस पर बैठ कर पूरे लंदन शहर की खूबसूरती का मजा लेंगे. दरअसल, यह थेम्स नदी के ऊपर बना एक बड़ा सा व्हील है. यह इतना धीरेधीरे घूमता है कि इस पर बैठने पर यह एहसास ही नहीं होता कि घूम रहा है. नीचे थेम्स नदी पर दर्जनों क्रूज चलते रहते हैं. फिर हम दोनों ने टिकट से कर व्हील पर बैठ कर पूरे लंदन शहर को देखा. व्हील की सैर पूरी कर जब हम नीचे उतरे तब जुबेदा ने कहा, ‘‘अब जोर से भूख लगी है…पहले पेट पूजा करनी होगी.’’
मैं ने उस से पूछा कि उसे कौन सा खाना चाहिए तो उस ने कहा, ‘‘बेशक इंडियन,’’ और फिर हंस पड़ी.
मैं ने फोन पर इंटरनैट से सब से नजदीक के इंडियन होटल का पता लगाया. फिर टैक्सी कर सीधे वहां जा पहुंचे और दोनों ने पेट भर कर खाना खाया. अब तक शाम के 5 बज गए थे. दोनों ही काफी थक चुके थे. और घूमना आज संभव नहीं था तो दोनों ने तय किया कि अपनेअपने होटल लौट जाएं.
मैं ने जुबेदा से जब पूछा कि वह कहां रुकी है तो वह बोली, ‘‘मैं तो हाइड पार्क के पास वेस्मिंस्टर होटल में रुकी हूं. और तुम?’’
मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘जुबेदा, आज तो तुम एक के बाद एक सरप्राइज दिए जा रही हो.’’
‘‘वह कैसे?’’ ‘‘मैं भी वहीं रुका हूं,’’ मैं ने कहा.
जुबेदा बोली ‘‘अशोक, इतना सब महज इत्तफाक ही है… और क्या कहा जा सकता इसे?’’
‘‘इत्तफाक भी हो सकता है या कुछ और भी.’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘नहीं. बस ऐसे ही. कोई खास मतलब नहीं… चलो टैक्सी ले कर होटल ही चलते हैं,’’ मैं बोला. इस से आगे चाह कर भी नहीं बोल सका था, क्योंकि मैं जानता था कि यह जिस देश की है वहां के लोग कंजर्वेटिव होते हैं.
हम दोनों होटल लौट आए थे. थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं ने स्नान किया. कुछ देर टीवी देख कर फिर मैं नीचे होटल के डिनर रूम में गया. मैं ने देखा कि जुबेदा एक कोने में टेबल पर अकेले ही बैठी है. मुझे देख कर उस ने मुझे अपनी टेबल पर ही आने का इशारा किया. मुझे भी अच्छा लगा कि उस का साथ एक बार फिर मिल गया. डिनर के बाद चलने लगे तो उस ने अपने ही कमरे में चलने को कहा. भला मुझे क्यों आपत्ति होती.
दर्पण के सामने बैठी मैं असमय ही सफेद होते अपने केशों को बड़ी सफाई से बिखरे बालों की तहों में छिपाने की कोशिश कर रही थी. इस काया ने अभी 40 साल भी पूरे नहीं किए पर दूसरों को लगता कि मैं 50 पार कर चुकी हूं. बड़ी कोशिश करती कि 40 की लगूं और इस प्रयास में चेहरे को छिपाना तो आसान था मगर मन में छिपे घावों को कैसे छिपाती.
दरवाजे की घंटी बजने के साथ ही मैं ने घड़ी की ओर देखा तो 11 बजने में अभी 10 मिनट बाकी थे. मैं ने सोचा कि शायद मेरी कुलीग संध्या आज समय से पहले आ गई हों. फिर भी मैं ने सिर पर चुन्नी ढांपी और दरवाजा खोला तो सामने पोस्टमैन था. मुझे चूंकि कालिज जाने के लिए देर हो रही थी इसलिए झटपट अपनी डाक देखी. एक लिफाफा देख कर मेरा मन कसैला हो गया. मुझे जिस बात का डर था वही हुआ. मैं कटे वृक्ष की तरह सोफे पर ढह गई. संदीप को भेजा मेरा बैरंग पत्र वापस आ चुका था. पत्र के पीछे लिखा था, ‘इस नाम का व्यक्ति यहां नहीं रहता.’
कालिज जाने के बजाय मैं चुपचाप आंखें मूंद कर सोफे पर पड़ी रही. फिर जाने मन में कैसा कुछ हुआ कि मैं फफक कर रो पड़ी, लेकिन आज मुझे सांत्वना देने वाले हाथ मेरे साथ नहीं थे.
अतीत मेरी आंखों में चलचित्र की भांति घूमने लगा जिस में समूचे जीवन के खुशनुमा लमहे कहीं खो गए थे. मैं कभी भी किसी दायरे में कैद नहीं होना चाहती थी किंतु यादों के सैलाब को रोक पाना अब मेरे बस में नहीं था.
एक संभ्रांत और सुसंस्कृत परिवार में मेरा जन्म हुआ था. स्कूलकालिज की चुहलबाजी करतेकरते मैं बड़ी हो गई. बाहर मैं जितनी चुलबुली और चंचल थी घर में आतेआते उतनी ही गंभीर हो जाती. परिवार पर मां का प्रभाव था और वह परिस्थितियां कैसी भी हों सदा गंभीर ही बनी रहतीं. मुझे याद नहीं कि हम 3 भाईबहनों ने कभी मां के पास बैठ कर खाना खाया हो. पिताजी से सुबहशाम अभिवादन के अलावा कभी कोई बात नहीं होती. घर में सारे अधिकार मां के हाथों में थे. इसलिए मां के हमारे कमरे में आते ही खामोशी सी छा जाती. हमारे घर में यह रिवाज भी नहीं था कि किसी के रूठने पर उसे मनाया जाए. नीरस जिंदगी जीने की अभ्यस्त हो चुकी मैं सोचती जब अपना घर होगा तो यह सब नहीं करूंगी.
एम.ए., बी.एड. की शिक्षा के बाद मेरी नियुक्ति एक स्थानीय कालिज में हो गई. मुझे लगा जैसे मैं अपनी मंजिल के करीब पहुंच रही हूं. समय गुजरता गया और इसी के साथ मेरे जीने का अंदाज भी. कालिज के बहाने खुद को बनासंवार कर रखना और इठला कर चलना मेरे जीवन का एक सुखद मोड़ था. यही नहीं अपने हंसमुख स्वभाव के लिए मैं सारे कालिज में चर्चित थी.
इस बात का पता मुझे तब चला जब मेरे ही एक साथी प्राध्यापक ने मुझे बताया. उस का सुंदर और सलौना रूप मेरी आंखों में बस गया. वह जब भी मेरे करीब से गुजरता मैं मुसकरा पड़ती और वह भी मुसकरा देता. धीरेधीरे मुझे लगने लगा कि मेरे पास भी दूसरों को आकर्षित करने का पर्याप्त सौंदर्य है.
एक दिन कौमन रूम में हम दोनों अकेले बैठे थे. बातोंबातों में उस ने बताया कि वह पीएच.डी. कर रहा है. मैं तो पहले से ही उस पर मोहित थी और यह जानने के बाद तो मैं उस के व्यक्तित्व से और भी प्रभावित हो गई. मेरे मन में उस के प्रति और भी प्यार उमड़ आया. आंखों ही आंखों में हम ने सबकुछ कह डाला. मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई जिस की आवाज शायद उधर भी पहुंच चुकी थी. मेरे मन में कई बार आया कि ऐसे व्यक्ति का उम्र भर का साथ मिल जाए तो मेरी दुनिया ही संवर जाए. उस की पत्नी बन कर मैं उसे पलकों पर बिठा कर रखूंगी. मेरी आंखों में एक सपना आकार लेने लगा.
उस दिन मैं ने संकोच छोड़ कर मां को इस बात का हमराज बनाया. उम्मीद थी कि मां मान जाएंगी किंतु मां ने मुझे बेहद कोसा और मेरे चरित्र को ले कर मुझे जलील भी किया. कहने लगीं, इस घर में यह संभव नहीं है कि लड़की अपना वर खुद ढूंढ़े. इस तरह मेरा प्रेम परवान चढ़ने से पहले ही टूट गया. मुझे ही अपनी कामनाओं के पंख समेटने पड़े, क्योंकि मुझ में मां की आज्ञा का विरोध करने का साहस नहीं था.
मेरी इस बात से मां इतनी नाराज हुईं कि आननफानन में मेरे लिए एक वर ढूंढ़ निकाला. मुझे सोचने का समय भी नहीं दिया और मैं विरोध करती भी तो किस से. मेरी शादी संदीप से हो गई. मेरी नौकरी भी छूट गई.
शादी के बाद सपनों की दुनिया से लौटी तो पाया जिंदगी वैसी नहीं है जैसा मैं ने चाहा था. संदीप पास ही के एक महानगर में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी था. कंपनी ने सभी सुखसुविधाओं से युक्त घर उसे दिया था.
संदीप के आफिस जाने के बाद मैं घर पर बोर होने लगी तो एक दिन आफिस से आने के बाद मैं ने संदीप से कहा, ‘मैं घर पर बोर हो जाती हूं. मैं भी चाहती हूं कि कोई नौकरी कर लूं.’
वह हौले से मुसकरा कर बोला, ‘मुझे तुम्हारे नौकरी करने पर कोई एतराज नहीं है किंतु जब कभी मम्मीपापा रहने के लिए आएंगे, उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगेगा. अब यह तुम्हारा घर है. इसे बनासंवार कर रखने में ही स्त्री की शोभा होती है.’
‘तो फिर मैं क्या करूं?’ मैं ने बेमन से पूछा.
उस ने जब कोई उत्तर नहीं दिया तो थोड़ी देर बाद मैं ने फिर कहा, ‘अच्छा, यदि किसी किंडर गार्टन में जाऊं तो 2 बजे तक घर वापस आ जाऊंगी.’
‘देखो, बेहतर यही है कि तुम इस घर की गरिमा बनाए रखो. तुम फिर भी जाना चाहती हो तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा. तुम कोई किटी पार्टी क्यों नहीं ज्वाइन कर लेतीं.’
‘मुझे किटी पार्टियों में जाना अच्छा नहीं लगता. मां कहती थीं कि कालोनी वालों से जितना दूर रहो वही अच्छा. बेकार समय बरबाद करने से क्या फायदा.’
‘यह जरूरी नहीं कि मैं तुम्हारी मां के सभी विचारों से सहमत हो जाऊं.’
उस दिन मैं ने यह जान लिया कि संदीप मेरी खुशी के लिए भी झुकने को तैयार नहीं है. यह मेरे स्वाभिमान को चुनौती थी. मैं भी अड़ गई. अपने हावभाव से मैं ने जता दिया कि नाराज होना मुझे भी आता है. अब अंतरंग पलों में वह जब भी मेरे पास आना चाहता तो मैं छिटक कर दूर हो जाती और मुंह फेर कर सो जाती. जीत मेरी हुई. संदीप ने नौकरी की इजाजत दे दी.
अगली बार मैं जब मां से मिलने गई तो उन्हें वह सब बताती रही जो नहीं बताना चाहिए था. मां की दबंग आवाज ने मेरे जख्मों पर मरहम का काम किया. वह मरहम था या नमक मैं इस बात को कभी न जान पाई.
मां ने मुझे समझाया कि पति को अभी से मुट्ठी में नहीं रखोगी तो उम्र भर पछताओगी. दबाया और सताया तो कमजोरों को जाता है और तुम न तो कमजोर हो और न ही अबला. मैं ने इस मूलमंत्र को शिरोेधार्य कर लिया.
मैं संदीप से बोल कर 3 दिन के लिए मायके आई थी और अब 7 दिन हो चले थे. वह जब भी आने के लिए कहता तो फोन मां ले लेतीं और साफ शब्दों में कहतीं कि वह बेटी को अकेले नहीं भेजेंगी, जब भी समय हो आ कर ले जाना. मां का इस तरह से संदीप से बोलना मुझे अच्छा नहीं लगा तो मैं ने कहा, ‘मां, हो सकता है वह अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रमों में व्यस्त हों. मैं ऐसा करती हूं कि…’
‘तुम नहीं जाओगी,’ मां ने बीच में ही बात काट कर सख्ती से कहा, ‘हम ने बेटी ब्याही है कोई जुर्म नहीं किया. शादी कर के उस ने हम पर कोई एहसान नहीं किया है. जैसा हम चाहेंगे वैसा होगा, बस.’