लेखिका-Er. Asha Sharma
‘‘सुबहउठते ही सब से पहले हाथों में अपने करम की लकीरों के दर्शन करने चाहिए.’’ मां की यह बात मंजूड़ी के दिमाग में ऐसी फिट बैठी हुई है कि हर सुबह नींद खुलने के साथ ही उस के दोनों हाथ मसल कर अपनेआप ही आंखों के सामने आ जाते हैं. यह अलग बात है कि मंजूड़ी को इन में आज तक किसी देव के दर्शन नहीं हुए. अपने करम की लकीरों से सदा ही शिकायत रही है उसे. और हो भी क्यों नहीं… दिन उगने के साथ ही उसे रोजमर्रा की छोटीछोटी जरूरतों के लिए भी जूझना पड़ता है… समस्या एक हो तो गिनाए भी… यहां तो अंबार लगा है…
उठते ही सब से पहले समस्या आती है फारिग होने की… बस्ती की बाकी लड़कियों के साथ उसे भी किसी की पी कर खाली की गई ठंडे की बोतल ले कर मुंह अंधेरे ही निकलना पड़ता है… अगर किसी दिन जरा भी आलस कर गई तो दिन भर की छुट्टी… अंधेरा होने तक पेट दबाते ही रहो…
इस के बाद बारी आती है नहानेधोने की… तो रोज न सही लेकिन कभीकभी तो नहानाधोना भी पड़ता ही है… यूं तो सड़क के किनारे बिछी मोटी पाइपलाइन से जगहजगह रिसता पानी इस काम को आसान बना देता है. जब वह छोटी थी तो मां के कमठाणे पर जाने के बाद कितनी ही
देर तक इस पानी से खेलती रहती थी. लेकिन एक दिन… जब वह नहा रही थी तब मुकेसिया उसे घूरने लगा था… पहली बार मां ने बांह
पकड़ के उसे कहा था ‘‘ओट में नहाया कर…’’ उस दिन के बाद वह ओट में ही नहाती है. जी हां! ओट…
मां ने लकड़ी की चार डंडियां रोप कर… पुराने टाट और अपनी धोती बांध कर नहाने के लिए ओट तो बना रखी थी लेकिन वहां नहाना भी कहां आसान था… एक बड़ी परात में छोटा सा पाटा रख कर उस पर किसी तरह बैठ कर नहाओ अखरता तो बहुत है लेकिन क्या करें…
मां कहती है, ‘‘विधाता के लिखे करम तो भोगने ही पड़ेंगे.’’
पीने के लिए पानी का जुगाड़ करना भी एक बड़ी समस्या है. मैल से चिक्कट हुए कुछ प्लास्टिक के खाली कनस्तर झुग्गी के बाहर पड़े हैं. टूटी हुई पाइपलाइन से लोटालोटा भर के इन में दिन भर के लिए पीने का पानी भरना है… मां ने तो यह काम उसी के जिम्मे डाल रखा है… खुद तो बापड़ी दिन उगे उठने के साथ ही चूल्हे में सिर दे देती है… न दे तो करे भी क्या… 5 औलादें और 2 खुद… 7 मिनखों के लिए टिक्कड़ सेकतेसेकते ही सूरज सिर पर आ जाता है…
8 बजतेबजते तो दोनों धणीलुगाई अपने टिफिन ले कर काम पर चले जाते हैं… जो दिन ढले आते हैं तो थक के एकदम चूर… बाप तो एकआध पौव्वा चढ़ा कर अपनी थकान उतारने का झूठा बिलम करता है लेकिन मां बेचारी क्या करे… सूखे होंठों की पापड़ी को गीली जीभ फिरा कर नरम करती है और फिर से चूल्हे में सिर दे देती है… ईटों की तगारी सिर पर ढोतेढोते खोपड़ी के बाल घिस गए बेचारी के…
‘‘अरे मंजूड़ी, सूरज सिर पर नाचण लाग रियो है… इब तो उठ जा मरजाणी… बेगी सी मैडमजी को काम सलटा के आज्या… मैं और तेरो बापू जा रिया हां… और सुण, मुकेसिया नै ज्यादा मुंह मत लगाया कर… छुट्टा सांड हो रखा है आजकल…’’ मां ने जूट सिली पानी की बोतल प्लास्टिक की थैली में रखते हुए कहा तो मंजूड़ी ने अपनी खाट छोड़ी और अंगड़ाई लेने लगी. झुग्गी में पड़ेपड़े ही बाहर देखा. रामूड़ा अपनी खाट पर नहीं दिखा. उस का प्लाटिक का थैला भी अपनी ठौर नहीं था.
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‘बेचारा रामूड़ा, मुंह अंधेरे ही कांच प्लास्टिक की खाली बोतलें चुगने निकल जाता है… न जाए तो क्या करे… यहां भी तो चुगने वालों में होड़ लगी रहती है… जो सोए… सो खोए… कुछ कचरा बीन लाएगा तो 10-20 रुपल्ली हाथ में आ जाएगी… रुपए मुट्ठी में दबा के कैसा धन्ना सेठ समझने लगता है खुद को…’ सोच कर मंजूड़ी मुसकरा दी.
16 साल की मंजूड़ी भले ही झुग्गी में रहती है… बेशक उस की जिंदगी में सौ अभाव हैं… लेकिन आंखों में सपने तो आम लड़कियों की तरह ही हैं न… बारबार खुद को दर्पण में देखना… तरहतरह से बाल काढ़ना… सस्ती ही सही लेकिन नाखूनों पर पालिश की परत चढ़ाना… लिपस्टिक न सही… 2-5 रुपए की संतरे वाली कुल्फी से ही अपने होंठों को रंग कर खुद पर इतराना… ये सब भला किसी विशेष सामाजिक स्तर की लड़कियों के लिए आरक्षित थोड़े ही हैं… मंजूड़ी को भी सपने देखने का उतना ही अधिकार है जितना किसी भी सामान्य किशोरी को… उस का मन भी बारिश में भीगभीग कर गीत गाने को होता है… जैसे फिल्मों में हीरोइन गाती है… सफेद झीनी साड़ी पहने के… उसे भी सर्दी में चाय के साथ गरमगरम समोसे और गरमी में ठंडीठंडी कुल्फी आइसक्रीम खाने को दिल करता है…
अरे हां, चाय और आइसक्रीम से याद आया. अभी पिछले सप्ताह की ही तो बात है. ननिहाल से बिरजू मामा आए थे. मां ने छोटी बहन नानकी को 10 का नोट दे कर दूध लाने भेजा था. दूध वाली थड़ी पर एक बच्चा अपनी मां के साथ आइसक्रीम ले कर खा रहा था. नानकी का भी दिल मचल गया. उस ने उस 10 रुपए की कुल्फी खरीद ली और मजे से चुस्की मारने लगी. उधर चाय का पानी दूध के इंतजार में उबल रहा था और उधर ननकी का कोई अतापता ही नहीं… मां ने बापू को देखने भेजा तो पीछेपीछे मंजूड़ी भी आ गई. बापू ने नानकी को कुल्फी चूसते देखा तो ताव खौल गया… रोज कुआं खोद कर पानी पीने वाले के लिए 10 के नोट की कीमत क्या होती है यह सिर्फ वही समझ सकता है…
तमतमाए बापू ने मां की गाली के साथ एक जोरदार डूक नानकी की पीठ पर धर दिया. कुल्फी छूट कर मिट्टी में गिर गई. नानकी ने पलट कर देखा तो डर का एक साया उस की आंखों में उतर आया लेकिन अगले ही पल उसे कुल्फी का ध्यान आया. उस ने कुल्फी को उठाया… अपनी फ्रौक से पोंछी और फिर से उसे चूसनेचाटने लगी.. ‘‘बेचारी नानकी…’’ मंजूड़ी को उस पर दया आ गई. उस ने बहन के बालों में हाथ फेरा और झुग्गी से बाहर आ गई.
बस्ती में कुछ चूल्हे अभी भी सुलग रहे हैं. दीनू काका कीकर की छांव में बैठे बीड़ी फूंक रहे हैं… सरबती ताई खाट पर पड़ी खांस रही है… बिमली का छोरा झुग्गी के बाहर रखी 2 ईंटों पर अपना सुबह का पहला काम निपटा रहा है… 2 पिल्ले उस के निबटने के इंतजार में आसपास मंडरा रहे हैं… एक तरफ 3-4 बच्चे धींगामस्ती कर रहे हैं. मुकेस अपनी औटो साफ कर रहा है… उस के एफएम पर तेज गाने बज रहे हैं. मुकेस ने उस की तरफ देखा और मुसकरा कर अपनी बाईं आंख दबा दी. मंजूड़ी सकपका कर झुग्गी के भीतर आ गई.
‘‘छुट्टा सांड कहीं का, मां कहती है मुकेसिये को मुंह मत लगाना… ससुरा ये तो अंगअंग लग चुका…’’ मंजूड़ी बुदबुदाई और फिर से खाट पर पसर गई. हाथ छाती पर चला गया. 10-10 के कुछ नोट अभी भी चोली में दबे पड़े हैं.
3 साल पहले की ही बात है. मंजूड़ी मैडमजी के घर साफसफाई कर के आई ही थी. तावड़े ने भी आज धार ही रखी थी लाय बरसाने की. मंजूड़ी अपनी लूगड़ी को पानी में निचोड़ कर लाई और गीली को ही ओढ़ कर खाट पर पसर गई थी. थोड़ी देर में लूगड़ी का पानी सूख गया. वह फिर से बाहर निकली उसे भिगोने के लिए. तभी मुकेस सामने आ गया.
‘‘क्या बात है! बहुत गरमी चढ़ी है क्या?’’ मुकेस बोला.
‘‘गरमी कहां? मैं तो ठंड से कांप रही हूं.’’ मंजूड़ी ने तमक कर कहा.
‘‘अरे ठंड तो तुझे मैं बताता हूं… मेरे साथ आ…’’ मुकेस उस का हाथ पकड़ कर अपनी झुग्गी में ले गया. झुग्गी सचमुच ठंडी टीप हो रही थी. कूलर जो लगा था… मगर बिजली? मंजूड़ी ने देखा कि उस ने बिजली के खंभे पर अंकुड़ा डाल रखा है. मुकेस ने मंजूड़ी को खाट पर लिटा दिया और खुद भी बगल में सो गया. मुकेस उस पर छाने की कोशिश करने लगा. मंजूड़ी ने विरोध किया लेकिन उस का विरोध थोथा साबित हुआ और मुकेस ने उसे परोट ही लिया. जैसे कभीकभी बापू उस की मां को परोट लेता है… अब एक झुग्गी में इतने मिनख साथ सोएंगे तो फिर परदा कहां रहेगा.
मंजूड़ी की आंखें मूंदने लगी थी. जब आंख खुली तो मुकेस पैंट पहन रहा था. उस ने भी अपने कपड़े ठीक किए और खाट से नीचे उतर गई.
‘‘जब कभी गरमी ज्यादा लगे तो कूलर की हवा खाने आ आना…’’ कहते हुए मुकेस ने
10-10 के 3-4 नोट उस की मुट्ठी में ठूंस दिए थे. वही नोट आज भी उस की चोली में कड़कड़ा रहे हैं.
‘‘आज तुम सब को कुल्फी खिलाऊंगी.’’ नोट सहेजती मंजूड़ी भाईबहनों को जगाने लगी.
मंजूड़ी को आज मैडमजी के घर जाने में देर हो गई. वह फटाफट उन के काम निपटाने लगी. तभी मैडमजी कालेज के लिए तैयार हो कर कमरे से बाहर निकली. और दिन तो वह उन को रात के बासी गाउन में ही देखती है. लेकिन आज…
काली सलवार और लाल कुरता… मैचिंग चप्पल… कंधे पर झूलता पर्स और हाथ में पकड़ा मोबाइल… कानों में लटके झुमके अलग से लकदक कर रहे थे… मंजूड़ी देखती ही रह गई. आंखों में ‘‘काश’’ वाली एक चमक सी उभरी और फिर धीरेधीरे मंद पड़ती गई.
‘‘आज बहुत देर कर दी मंजू. मैं तो निकल रही हूं… तू भी फटाफट काम निबटा दे… साहब को भी जाना है…’’ कहती हुई मैडमजी ने कार की चाबी उठाई और बाहर निकल गई. मंजूड़ी अपने काम में लग गई लेकिन आंखों के सामने अभी भी हीरोइन सी सजीधजी मैडमजी ही घूम रही थीं.
3-4 दिन बाद जब मंजूड़ी सफाई करने मैडमजी के कमरे में गई तो देखा कि ड्रैसिंग टेबल पर उन के वही झुमके रखे थे. उस ने उन्हें उठाया और अपने कानों से लगा कर देखा… फिर गरदन इधरउधर घुमाई… खुद ही खुद पर मुग्ध हो गई… कुछ देर यों ही खुद को निहारती रही… तभी शीशे में साहबजी की छवि देख कर वह अचकचा गई और झुमके वापस रख दिए.
‘‘तुझे पसंद है क्या?’’ साहब ने प्रेम से पूछा. मंजूड़ी ने कोई जवाब नहीं दिया.
‘‘ये ले, पहन ले… विनी के पास तो ऐसे बहुत से हैं.’’ साहबजी उस के बहुत पास आ गए थे. इतने पास कि पंखे की हवा से उन के शरीर पर छिड़का हुआ पाउडर उड़ कर मंजूड़ी की कुर्ती पर बिखरने लगा. साहबजी ने वे झुमके जबरदस्ती उस के हाथों में थमा दिए. इसी बहाने उस के हाथों को ऊपर तक और फिर कुछ नीचे भी… गले और छाती तक… मसल दिया था साहब ने… एक बार तो मंजूड़ी अचकचा गई लेकिन फिर उस ने झुमके ले लिए. झुमकों की ये कीमत ज्यादा नहीं लगी उसे.
एक मूक समझौता हो गया… साहबजी… मुकेस… और मंजूड़ी… सब एकदूसरे की जरूरतें पूरी करने लगे. आजकल मंजूड़ी काफी खुश नजर आती है. दिन भर गुनगुनाती रहती है. और तो और विनी मैडम के घर भी जानबूझ कर देरी से जाने लगी है. बस, उस का घर में घुसना और विनी का निकलना… लगभग साथसाथ ही होता है… कभीकभी मुकेस की झुग्गी में ठंडी हवा खाने भी चली जाती है.
‘‘आज ये कुल्फी किस ने खाई रे?’’ मां ने झुग्गी के बाहर से चूसी हुई कुल्फी की डंडियां उठाते हुए पूछा.
‘‘मंजूड़ी लाई थी…’’ नानकी ने पोल खोल दी तो मां ने मंजूड़ी को सवालिया निगाहों से घूरा.
‘‘आज रास्ते में 20 का नोट पड़ा मिला था… उसी से खरीद…’’ मंजूड़ी साफ झूठ बोल गई लेकिन मन ही मन डर भी गई थी कि कहीं मां यह झूठ पकड़ न ले… मंजूड़ी अतिरिक्त सतर्क हो गई.
‘‘मंजूड़ी यह नई फैसन की लाल चोली कहां से आई तेरे पास? एक दिन मां ने कड़कते हुए पूछा था.’’
‘‘इन मांओं के पास भी जाने कैसी चील की सी नजर होती है… कुछ भी नहीं छिपता इन से…’’ मंजूड़ी अपनी लूगड़ी में ब्रा को छिपाने की कोशिश करने लगी.
‘‘अरे बता तो… किस ने दी है?’’ मां ने उस की लूगड़ी परे फेंक दी. मंजूड़ी चुप.
‘‘मां हूं तेरी… बरस खाए हैं मैं ने… तेरी वाली उमर भोग चुकी हूं… देख छोरी, सहीसही बता… किस रास्ते जा रही है तू…’’ मां ने उस के कंधे झिंझोड़ दिए. मंजूड़ी पूरी हिल गई… नहीं हिली तो सिर्फ उस की जुबान.
‘‘देख मंजूड़ी, हम ठहरी लुगाई जात… मरद का मैल भी हमें ही ढोना पड़ता है… मुकेसिए और तेरे साहबजी जैसे लोगों के चक्कर में मत आ जाना… और ये प्रेमप्यार का तो सोचना भी मत… यह सब हमारे भाग में नहीं लिखा होता…’’ मां थोड़ी नरम पड़ी तो मंजूड़ी का भी हौंसला बढ़ा.
‘‘तू तो मेरी वाली उमर भोग चुकी है न मां, जानती ही होगी कि अच्छा खानेपीने, पहननेओढ़ने और सैरसपाटे की कितनी हूंस उठती है मन में… अब न तो मेरा बाप कोई धन्ना सेठ है जो मेरी सारी इच्छाएं पूरी कर देगा और न ही हमारी इतनी औकात है कि हम पढ़लिख कर विनी मैडम जैसे कमाएं और उड़ाएं… ज्यादा क्या होगा… 2-4 घर और पकड़ लूंगी… लेकिन उतने भर से क्या हो जाएगा… तो ञ्चया मार लें अपने मन को? यों ही रोतेबिसूरते निकाल में अपनी उमर? तूने तो बरस खाए हैं न… तू ही कोई इज्जत वाला रास्ता बता जिस से मेरे सपने पूरे हो सकें.’’ मंजूड़ी जैसेजैसे बोल रही थी वैसेवैसे मां के माथे पर लकीरें बढ़ती जा रही थी.
‘‘अरे करमजली, किस रास्ते पर चल पड़ी है तू… ये मरद जात बड़ी काइयां होती हैं… तू इन के लिए बिस्तर की चादर सी है… नई बिछाते ही पुरानी को उतार फेंकेंगे… कल को कहीं कोई रोगमरज लग गया तो दवादारू तो छोड़… देखने तक भी नहीं आएंगे ये… अरे हमारे पास चरित्तर के अलावा और है ही क्या…’’ मां उस के सिर में ठोला दे कर फुंफकारी. मंजूड़ी सर झुकाए खड़ी रही. मां उसे इसी हालत में छोड़ कर काम पर निकल गई.
4 दिन हो गए. मंजूड़ी काम पर नहीं गई. मुकेस भी कई बार उस के आसपास मंडराया लेकिन
उस ने उस की तरफ देखा तक नहीं… नानकी 2 दिन से कुल्फी के लिए रिरिया रही है. रामूड़े की जांघ उस के नेकर में से झांकने लगी है… खुद उस की आंखों के सामने विनी मैडमजी जैसे झुमके… बिंदी और क्रीम पाउडर घूम रहे हैं. मंजूड़ी चरित्र और इज्जत की परिभाषा में उलझती ही जा रही है.
‘‘इज्जत… इज्जत… इज्जत, चाटूं क्या इस थोथे चरित्तर को… क्या हो जाता है इज्जत को जब मुंह अंधेरे मोट्यारों के सामने नाड़ा खोल कर बैठना पड़ता है… कहां छिप जाता है चरित्तर जब खुले में आंख मींच के नहाना पड़ता है… कहां चली जाती है लाजशरम जब रात में मांबापू के बीच में सांस दबा के सोने का नाटक करना पड़ता है…’’ मंजूड़ी खुद को मथने लगी. विचारों के दही में से निष्कर्ष का मक्खन अलग होने लगा.
‘‘अगर कभी साहबजी ने मेरे साथ जबरदस्ती की होती तो? तो क्या होता… मैं अपनी इज्जत की खातिर दूसरा घर देखती… लेकिन एक बार तो लुट ही गई होती न… तो फिर? क्या हर बार लुटने के बाद घर बदलती? लेकिन कब तक? और तब न इज्जत बचती और न ही हाथ में दो रुपल्ली आती… तो फिर अब जब यह सब मेरी मर्जी से हो रहा है तो इस में क्या गलत है? क्या चरित्तर की ठेकेदारी सिर्फ हम लुगाइयों की है… साहबजी या मुकेसिये पर तो कोई उंगली नहीं उठाएगा… जब वो मेरे जरिए अपना मलब साध रहे हैं तो फिर मैं ही क्यों इज्जत की टोकरी ढोती फिरूं… मैं भी क्यों नहीं उन के जरिए अपना मतलब साधूं… कोई न कोई बीच का रास्ता जरूर होगा…’’ रात भर विचारती मंजूड़ी के मन की गुत्थी सुबह होने तक लगभग सुलझ ही आई थी.
आज मां के जागने से पहले ही मंजूड़ी उठ गई… सुबह का काम निबटाया… हाथमुंह धोया… अपने कपड़े ठीक किए… काम पर निकल पड़ी… रास्ते में दवाई की दुकान पर ठिठकी… आसपास देखा… घोड़े की फोटो वाला पैकेट खरीद कर चोली में ठूंस लिया… सधे हुए कदमों से चल दी मंजूड़ी… अनजान मंजिल के नए रास्तों पर…
शकुंतला शर्मा
‘तो तू आ रही है न. रोमा घूमफिर कर वहीं आ गई. कम से कम मेरे लिए.‘ ‘मम्मी के सवालों की बौछारों का सामना तो कर लूं फिर तुझे फोन करूंगी,‘ सुजाता ने चतुराई से बात टाल दी थी.
‘कहां गई थी सुजी, इतनी देर हो गई,‘ घर पहुंचते ही उस की मम्मी मीना ने उस की खबर ली. ‘आप को बता कर तो गई थी,‘ सुजाता हंसी थी. ‘कल रोमा और उस के दोस्त पिकनिक पर जा रहे हैं. रोमा चाहती है कि मैं भी उन के साथ जाऊं.‘ ‘दोस्त या सहेलियां?‘
‘सब लड़कियां हैं मां. लड़के जा भी रहे हों, तो क्या फर्क पड़ता है.‘ ‘फर्क पड़ता है. जब तक तू घर से बाहर रहती है, मन घबराता रहता है. जमाना बहुत खराब आ गया है.‘
‘मम्मी, आप की बेटी कराटे में ब्लैक बैल्ट है, इसलिए डरना छोड़ दो. फिर आप ही तो कहती हैं कि व्यक्तित्व को सजानेसंवारने के लिए घर से बाहर निकलना और नए दोस्त बनाना बहुत आवश्यक है.‘ ‘क्या सचमुच वह इतनी बदसूरत है,‘ वह देर तक सोचती रही. ‘कौन कहता है वह तो स्वयं को संसार की सब से सुंदर लड़की समझती है‘, सोचते हुए वह उदासी में भी मुसकरा दी.
‘ठीक है सुजाता, बहस में तो मैं तुम से कभी जीत ही नहीं सकती. मैं सारी तैयारी कर दूंगी. चली जाओ पिकनिक पर, पर सावधान रहना,‘ मीना ने हथियार डाल दिए. पर सुजाता देर तक स्वयं को दर्पण में निहारती रही. पिकनिक में सुजाता का व्यवहार देख कर सब से अधिक आश्चर्य रोमा को ही हुआ. सब कुछ जानते हुए भी वह सब से सामान्य व्यवहार कैसे कर पा रही थी.
एक लोकप्रिय गीत की धुन पर सुजाता को थिरकते देख कर तो सभी हैरान रह गए. उस का रंगरूप देख कर तो वे सोच भी नहीं सकते थे कि सुजाता इतना अच्छा नृत्य करती है, लगता था मानो वह हवा की लहरों पर तैर रही हो. सुजाता के प्रति अन्य छात्राओं का व्यवहार धीरेधीरे बदलने लगा. कुछ छात्राएं तो जैसे उस की दीवानी हो गई थीं. अन्य सभी का ध्यान भी अब रूपरंग से अधिक सुजाता के गुणों पर था. पर सुजाता के पीठपीछे उस की आलोचना अब भी चल रही थी. ‘क्या नाचती है, तुम्हारी सहेली?‘ आभा रोमा से बोली.
‘मेरी ही क्यों, तुम्हारी भी तो सहेली है वह,‘ रोमा हंसते हुई बोली.
‘नो, थैंक्स. पिकनिक के लिए साथ आने से कोईर् किसी का दोस्त नहीं हो जाता. मैं अपने दोस्त और सहेलियां बहुत ध्यान से चुनती हूं और मेरे दोस्त देखनेसुनने में अच्छे हों यह बेहद जरूरी है. तुम्हें एक राज की बात बताऊं, मुझे बदसूरती बिलकुल पसंद नहीं है. मैं तो अपने आसपास केवल वृक्ष, फूल और सौंदर्य देखना चहती हूं,‘ आभा अपने मन की बात बताते हुए नृत्य की मुद्रा में लहराने लगी और रोमा मुसकरा कर रह गई. पिकनिक तो समाप्त हो गई पर सुजाता की त्रासदी चलती रही. पहले तो सुजाता ने सोचा कि रैगिंग की इस प्रक्रिया से हर छात्र या छात्रा को गुजरना पड़ता है पर शीघ्र ही वह समझ गई कि सारा उलाहना केवल उस के लिए ही था. बाहर से वह दिखाने का प्रयत्न करती, मानो इन सब बातों का उस पर कोई असर नहीं पड़ता पर एक दिन जब स्वयं को रोक नहीं पाई, तो रोमा के कंधे पर सिर रख कर सिसकने लगी थी.
‘बहुत हो गया, अब मैं तुझे और नहीं सहने दूंगी. हम दोनों कल ही प्राचार्या के पास चलेंगे. इन लोगों की अक्ल तभी ठिकाने आएगी, जब हमारी शिकायत पर इन के विरुद्ध कार्यवाही होगी,‘ रोमा क्रोधित स्वर में बोली. ‘रहने दे रोमा. उन्हें सजा मिल भी गई तो क्या फर्क पड़ जाएगा, उन की नजर में तो मैं वही कुरूप, भद्दी सी लड़की रहूंगी न, जिस का केवल मजाक बनाया जा सकता है,‘ सुजाता सिसकियों के बीच बोली.
‘क्या हो गया है तुझे?‘ कैसे तेरे मुंह से ऐसी बातें निकल सकती हैं. उन्होंने कह दिया कि तू बदसूरत है और तू ने मान लिया. इस से अधिक विडंबना और क्या होगी. क्या हो गया है, तेरे आत्मविश्वास को? हम में से किसी को ऐसे सिरफिरे लोगों से प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है. इन के अहंकार की तो कोई सीमा ही नहीं है. पर तुम उन की बातों से इस तरह आहत हो जाओगी तो कैसे चलेगा. यही तो वे चाहती हैं कि तुम उन की बातों से आहत हो कर स्वयं पर ही तरस खाने लगो. यदि ऐसा हुआ तो सब से अधिक निराशा मुझे ही होगी. इसलिए नहीं कि तुम्हारी मित्रता ने मेरी आंखों पर परदा डाल दिया है बल्कि इसलिए कि तुम्हारे गुण ही हमारी मित्रता की आधारशिला हैं.‘ रोमा भीगे स्वर में बोली. सुजाता कुछ क्षणों तक रोमा को अपलक निहारती रही, फिर मुसकरा दी.
‘अब क्या हुआ?‘ रोमा ने प्रश्न किया. ‘कुछ नहीं, मैं तो बस सोच रही थी कि मैं भी कितनी बड़ी मूर्ख हूं, तेरी जैसी सहेली मेरा साथ दे तो मैं तो सारी दुनिया से भिड़ सकती हूं.‘
‘यह हुई न बात. तो वादा कर कि इन की बातों पर न ही ध्यान देगी और न ही इन्हें स्वयं पर हावी होने देगी.‘ ‘ठीक है, मैं वादा करती हूं कि मैं ईंट का जवाब पत्थर से दूंगी.‘
सत्या, आभा और उन के दल की अन्य छात्राओं का व्यवहार तो नहीं बदला पर सुजाता बदल गई. उस ने हर ओर से स्वयं को समेट कर खुद को पढ़ाई में झोंक दिया. सुजाता प्रथम आई तो सौंदर्य की पुजारिनों को कोई अंतर नहीं पड़ा बल्कि उन्होंने अपने अमूल्य विचार प्रकट करने में देरी नहीं की. ‘हम यहां किताबी कीड़े बनने नहीं आए हैं. हम तो यहां जीवन का आनंद उठाने आए हैं. डिग्री मिल जाए, वही बहुत है,‘ सत्या बोली.
‘और नहीं तो क्या हमें इस छोटी सी उम्र में मोटा चश्मा चढ़वाने का कोई शौक नहीं है,‘ आभा ने उस की हां में हां मिलाई. सुजाता ने उन की बात सुन कर भी अनसुनी कर दी.
‘तुम लोगों ने शायद अंगूर खट्टे हैं वाली कहावत नहीं सुनी,‘ रोमा मुसकरा दी. ‘सुनी है पर हमें अंगूर पसंद ही नहीं हैं न खट्टे और न ही मीठे,‘ आभा तीखे स्वर में बोली.
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शकुंतला शर्मा
पर जैसे ही यह सूचना मिली कि वार्षिकोत्सव में विभिन्न प्रतियोगिताओं के आधार पर ‘कालेज रत्न‘ छात्रा का चुनाव होगा और उसी छात्रा को अदलाबदली कार्यक्रम के अंतर्गत जरमनी और फ्रांस के कुछ कालेजों में रहने और वहां के छात्रछात्राओं से अपने विचारों के आदानप्रदान के साथ ही उन के तौरतरीकों को जाननेसमझने का अवसर भी प्राप्त होगा, कालेज में भूचाल सा आ गया. छात्राओं में इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने
और ‘कालेज रत्न‘ बनने की होड़ लग गई. हलचल तो तब मची जब सुजाता ने भी सभी प्रतियोगिताओं में भाग ले कर ‘कालेज रत्न‘ बनने की दौड़ में कूदने की घोषणा कर दी. ‘लोग कैसेकैसे भ्रम पाल लेते हैं,‘ कक्षा में स्वयं को स्मार्ट समझने वाली छात्राएं ताने देतीं. रोमा तुम अपनी दोस्त को समझाती क्यों नहीं. ‘कालेज रत्न‘ बनने का सपना देखना अच्छा है पर वास्तविकता के धरातल से कोसों दूर है. सुजाता से कहो कि अपनी किताबों में खोई रहे और ‘कालेज रत्न‘ जैसी पदवी हमारे लिए छोड़ दे. सत्या की समवेत हंसी से पूरी कक्षा गूंज उठी. रोमा मूर्ति बनी बैठी रह गई.
‘हाथियों को देख कर जब कुत्ते भौंकते हैं, तो हाथी उन की अवहेलना कर आगे बढ़ जाते हैं,‘ रोमा ने सुजाता को समझाते हुए कहा. ‘कुत्ता किसे कहा तू ने, समझ क्या रखा है. हम इस अपमान को चुपचाप सह लेंगे? हम प्राचार्या महोदया से तुम दोनों की शिकायत करेंगे,‘ आभा भड़क उठी.
‘चलो न यहां कौन डरता है. उन्हें भी तो पता चले कि कौन किस का अपमान कर रहा है,‘ रोमा भी उठ खड़ी हुई. पहली बार सुजाता सब के सामने फूटफूट कर रो पड़ी थी. पर इस से पहले कि कोई कहीं जा पाता अंगरेजी की व्याख्याता ऋचा मैडम कक्षा में आ पहुंचीं. ‘क्या बात है, कहां जा रही हो तुम लोग और सुजाता तुम क्यों रो रही हो?‘ व्याख्याता ऋचा मैडम ने प्रश्न किया था. उत्तर में रोमा ने सारी बात कह सुनाई. सुन कर ऋचा मैडम के आश्चर्य की सीमा न रही. उन्होंने दोनों पक्षों को समझाबुझा कर शांत किया. सुजाता को चुप कराया और बात आईगई हो गई.
पर आज ‘कालेज रत्न‘ पुरस्कार की घोषणा होते ही दोनों पक्षों में तलवारें खिंच गईं. आभा, नीरू, मुक्ता अपनी अन्य सहेलियों के साथ सत्या के घर पर मिलीं और आगे की रणनीति तैयार की. सब ने अपनी शिकायत ले कर प्राचार्या महोदया के पास जाने का निर्णय लिया.
प्राचार्या महोदया ने अगले दिन केवल 2 छात्राओं को मिलने का समय दिया तो सत्या व आभा एक शिकायती पत्र ले कर उन के पास जा पहुंचीं. प्राचार्याजी ने उन की बातें ध्यान से सुनीं, शिकायती पत्र पढ़ा और आंखें मूंद कर सोचनेविचारने की मुद्रा में आ गईं. सत्या और आभा उन के नेत्र खुलने की प्रतीक्षा करती रहीं. धीरेधीरे उन्होंने नेत्र खोले.
‘तो तुम दोनों को शिकायत है कि सुजाता को ‘कालेज रत्न‘ की उपाधि दे कर न केवल अन्य छात्राओं के साथ अन्याय हुआ है बल्कि कालेज का नाम भी मिट्टी में मिल गया है. ‘जी देखिए, न तो सुजाता का व्यक्तित्व प्रभावशाली है, न ही रूपरंग,’ आभा डरते हुए बोली.‘आज पहली बार स्वयं पर शर्म आ रही है मुझे. तुम्हें सही संस्कार तक नहीं दे सके हम. दूसरों के रूपरंग पर छींटाकशी करने का अधिकार किस ने दिया तुम्हें? शिक्षा मनुष्य को संस्कार देती है, उसे अहंकारी नहीं बनाती. शिक्षा की सार्थकता केवल डिग्री प्राप्त करना ही नहीं है बल्कि सहीगलत का ज्ञान होना भी है. हो सके तो सच्चा इंसान बनने का प्रयत्न करो, तभी तुम्हारी शिक्षा सार्थक होगी.‘‘हमारे मन में सुजाता के लिए कोई दुर्भावना नहीं है, मैम. पर उसे यह पुरस्कार दिए जाने से सभी को निराशा हुई है,” आभा ने फिर अपना पक्ष रखा.
‘इस प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल के सभी सदस्य कालेज के बाहर के हैं और वे सभी समाज के सम्मानित सदस्य हैं. उन के निर्णय पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता. मेरी मानो तो सुजाता का विरोध करने के स्थान पर तुम सब भी उस के जैसी बनने का प्रयत्न करो.‘ ‘निर्णायक मंडल ने हर क्षेत्र में सुजाता को जितने अंक दिए हैं कोई दूसरी छात्रा उस के आसपास भी नहीं ठहरती और हां मैं तो यह कहूंगी कि बाहर जा कर सुजाता को मुबारकबाद देना मत भूलना, हम सब को अच्छा लगेगा,‘ प्राचार्या ने समझाया.
‘जी मैम,‘ दोनों किसी प्रकार बोलीं और प्राचार्याजी के कक्ष से बाहर निकल आईं. बाहर तो सारा दृश्य ही बदला हुआ था, सभी छात्राएं सुजाता को घेर कर खड़ी उसे बधाई दे रही थीं. उस के चेहरे पर अनोखी चमक थी. पहली बार उन्हें सुजाता बहुत सुंदर लगी.
‘‘रोमा ठीक कहती थी, सौंदर्य तो देखने वाले की आंखों में होता है,” आभा बोली और सत्या के साथ उसे बधाई देने चल पड़ी.
शकुंतला शर्मा
रौयल मिशन स्कूल के वार्षिकोत्सव काआज अंतिम दिन था. छात्राओं का उत्साह अपनी चरम सीमा पर था, क्योंकि पुरस्कार समारोह की सब को बेचैनी से प्रतीक्षा थी. खेलकूद, वादविवाद, सामान्य ज्ञान के अतिरिक्त गायन, वादन, नृत्य, अभिनय जैसी अनेक प्रतियोगिताएं थीं. पर सब से अधिक उत्सुकता ‘कालेज रत्न‘ पुरस्कार को ले कर थी, क्योंकि जिस छात्रा को यह पुरस्कार मिलता, उसे अदलाबदली कार्यक्रम के अंतर्गत विदेश जाने का अवसर मिलने वाला था. कालेज में कई मेधावी छात्राएं थीं और सभी स्वयं को इस पुरस्कार के योग्य समझती थीं पर जब कालेज रत्न के लिए सुजाता के नाम की घोषणा हुईर् तो तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही एक ओर से आक्रोश के स्वर भी गूंज उठे. सब को धन्यवाद दे कर सुजाता स्टेज से नीचे उतरी तो उस की परम मित्र रोमा उसे मुबारकबाद देती हुई, उस के गले से लिपटती हुई बोली, ‘‘आज मैं तेरे लिए बहुत खुश हूं. तू ने असंभव को भी संभव कर दिखाया.‘‘
‘‘इस में तेरा योगदान भी कम नहीं है. तेरा सहयोग न होता तो यह कभी संभव न होता,‘‘ सुजाता कृतज्ञ स्वर में बोली. तभी सुजाता को उस के अन्य प्रशंसकों ने घेर लिया. उस के मातापिता भी व्याकुलता से उस की प्रतीक्षा कर रहे थे पर रोमा के मनमस्तिष्क पर तो पिछले कुछ दिनों की यादें दस्तक दे रही थीं. ‘सुजाता नहीं आई अभी तक?‘ रोमा ने उस दिन सत्या के घर पहुंचते ही पूछा.
‘नहीं, तुम्हारी प्रिय सखी नहीं आई अभी तक,‘ सत्या बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोली और वहां उपस्थित सभी युवतियों ने जोरदार ठहाका लगाया. ‘सौरी, तेरी हंसी उड़ाने का हमारा कोई इरादा नहीं था,‘ सत्या क्षमा मांगती हुई बोली.
‘तो किस की हंसी उड़ाने का इरादा था, सुजाता की?‘ ‘तू तो जानती है. हमें सुजाता का नाम सुनते ही हंसी आ जाती है. एक तो उस का रूपरंग ही ऐसा है. काला रंग, स्थूल शरीर, चेहरा ऐसा कि कोई दूसरी नजर डालना भी पसंद न करे. ऊपर से सिर में ढेर सारा तेल डाल कर 2 चोटियां बना लेती है. उस पर आंखों पर मोटा चश्मा. क्या हाल बना रखा है उस ने,‘ सत्या ने आंखें मटकाते हुए कहा.
‘मुझे तो वह बहुत सुंदर लगती है, उस की आंखों में अनोखी चमक है. तुम्हें तो उस की 2 चोटियों से भी शिकायत है. पर हम में से कितनों के उस के जैसे घने, लंबे बाल हैं. मोटा चश्मा तो बेचारी की मजबूरी है. आंखें कमजोर हैं उस की, तो चश्मा तो पहनेगी ही.‘ ‘कौंटैक्ट लैंस भी तो लगा सकती है. अपने रखरखाव पर थोड़ा ध्यान दे सकती है,‘ सत्या ने सुझाव दिया था.
‘हम होते कौन हैं, यह सुझाव देने वाले. वह जैसी है, अच्छी है. मुझे तो उस में कोई बुराई नजर नहीं आती.‘ ‘बुराई तो कोईर् नहीं है पर इस हाल में शायद ही उस का कोई मित्र बने. हम सब के बौयफ्रैंड हैं पर उस की तो तुझे छोड़ कर किसी लड़की से भी मित्रता नहीं है.‘
‘वह इसलिए कि वह हमारी तरह नहीं है. कितनी व्यस्त रहती है वह. खेलकूद, पढ़ाईलिखाई और हर तरह की प्रतियोगिता में क्या हम में से कोई उस की बराबरी कर सकता है. मेरी बचपन की सहेली है वह और मैं उस के गुणों के लिए उस का बहुत सम्मान करती हूं. बस एक विनती है कि उस के सामने ऐसा कुछ मत करना या कहना कि उसे दुख पहुंचे. ऐसा कुछ हुआ तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा.‘ ‘तुम्हारी इतनी घनिष्ठ मित्र है, तो कुछ समझाओ उसे,‘ सत्या ने सलाह दी.
‘हम होते कौन हैं, उसे समझाने वाले. सुजाता बुद्धिमान और समझदार लड़की है. अपना भलाबुरा खूब समझती है,‘ रोमा ने समझाना चाहा. ‘अपनीअपनी सोच है. मेरी मम्मी तो कहती हैं कि लड़कियों को सब से अधिक ध्यान अपने रूपरंग पर देना चाहिए, पता है क्यों?‘ आभा भेद भरे स्वर में बोली.
‘क्यों?‘ सब ने समवेत स्वर में प्रश्न किया, मानो वह कोई राज की बात बताने जा रही हो. ‘क्योंकि लड़कों की बुद्धि से अधिक उन की आंखें तेज होती हैं,‘ आभा की भावभंगिमा और बात पर समवेत स्वर में जोरदार ठहाका लगा.
‘ऐसी बुद्धि वाले युवकों से दूर रहने में ही भलाई है, यह नहीं बताया तेरी मम्मी ने, रोमा ने आभा के उपहास का उत्तर उसी स्वर में दिया. ‘पता है, हमें सब पता है. अब छोड़ो यह सब और कल की पिकनिक की तैयारी करो,‘ सत्या ने मानो आदेश देते हुए कहा.
सभी सखियां अपने विचार प्रकट करने को उत्सुक थीं कि तभी द्वार पर दस्तक हुई. सुजाता को सामने खड़े देख कर सत्या सकपका गई. लगा, जैसे सुजाता दरवाजे के बाहर ही खड़ी उन की बातें सुन रही थी. पर दूसरे ही क्षण उस ने वह विचार झटक दिया. सुजाता ने उन की बातें सुनी होतीं,
तो क्या उस के चेहरे पर इतनी प्यारी मुसकान हो सकती थी. रोमा तो उसे देखते ही खिल उठी. ‘मिलो मेरे बचपन की सहेली सुजाता से. कुछ दिनों पहले ही हमारे कालेज में दाखिला लिया है,‘ रोमा ने सब से सुजाता का औपचारिक परिचय कराया.
‘हमें पता है,‘ वे बोलीं. हैलो, हाय और गर्मजोशी से हाथ मिला कर सब ने उस का स्वागत किया और पुन: पिकनिक की बातों में खो गईं. किस को क्या लाना है. यह निर्णय लिया गया. सुबह 5 बजे सब को मंदिर वाले चौराहे पर एकत्रित होना था. ‘सुजाता, तुम क्या लाओगी?‘ तभी सत्या ने प्रश्न किया.
‘पता नहीं, मैं आऊंगी भी या नहीं. मेरी मम्मी ने अभी अनुमति नहीं दी है. यदि आई तो तुम लोग जो कहोगी मैं ले आऊंगी.‘ सुजाता ने अपनी बात स्पष्ट की. ‘लो तुम आओगी ही नहीं तो लाओगी कैसे,‘ आभा ने प्रश्न किया.
‘उस की चिंता मत करो. सुजाता नहीं आई तो मैं ले आऊंगी,‘ रोमा ने आश्वासन दिया. ‘ठीक है, तुम दोनों मिल कर पूरियां ले आओ. सुजाता नहीं आ रही हो, तो थोड़ी अधिक ले आना. पर तुम्हारी मम्मी ने अभी तक अनुमति क्यों नहीं दी.‘
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धीरेधीरे 6 माह गुजर गए. इस खूबसूरत जोड़े की असलियत जगजाहिर हो चुकी थी, इसलिए सब से कर्ज मिलना बंद हो गया था. अब मकानमालिक भी इन्हें रोज आ कर धमकाने लगा था. 6 माह से उस का किराया जो बाकी था. एक दिन क्रोधित हो कर मकानमालिक ने माला के घर का सामान सड़क पर फेंक दिया और कोर्ट में घसीटने की धमकी देने लगा. पड़ोसियों के बीचबचाव से वह बड़ी मुश्किल से शांत हुआ.
रोज की अशांति और फसाद से शलभ त्रस्त हो गया. उस का मेरठ से और नौकरी से मन उचाट हो गया. न तो वह मेरठ में रहना चाहता था, न ही दिल्ली वापस जाना चाहता था. इन 2 शहरों को छोड़ कर उस की कंपनी की किस अन्य शहर में कोई शाखा नहीं थी. आखिर नौकरी बदलने की इच्छा से शलभ ने मुंबई की एक फर्म में आवेदनपत्र भेज दिया.
एक शाम शलभ दफ्तर से अपने घर लौटा तो अपने गेट के बाहर पुलिया पर अकेली माला को उदास बैठा पाया. रमा अपनी परिचित के यहां लेडीज संगीत में गई हुई थी. देर रात तक चलने वाले कार्यक्रम के कारण वह शीघ्र लौटने वाली नहीं थी. पूछने पर माला ने बताया कि 6 माह से किराया नहीं देने के कारण मकानमालिक ने उस की व महेश की अनुपस्थिति में मकान पर अपना ताला लगा दिया है. महेश उसे यहां बैठा कर मकानमालिक को मनाने गया था.
शुलभ कुछ देर तो दुविधा की स्थिति में खड़ा रहा फिर उस ने माला को अपने घर के अंदर बैठने के लिए कहा. घर के अंदर आते ही माला शलभ के गले लग कर बिलखने लगी. हालांकि शलभ बुरी तरह चिढ़ा हुआ था मालामहेश की हरकतों से पर खूबसूरत माला को रोती देख उस का हृदय पसीज उठा.
माला का गदराया यौवन और आंसू से भीगा अद्वितीय रूप शलभ को पिघलाने लगा. माला के बदन के मादक स्पर्श से शलभ के तनबदन में अद्भुत उत्तेजना की लहर दौड़ गई. माला के बदन की महक व उस के नर्म खूबसूरत केशों की खुशबू उसे रोमांचित करने लगी.
शलभ के कान लाल हो गए, आंखों में गुलाबी चाहत उतर आई और हृदय धौंकनी के समान धड़कने लगा. तीव्र उत्तेजना की झुरझुरी ने उस के बदन को कंपकंपा दिया. पल भर में वह माला के रूप लावण्य के वशीभूत हो चुका था.
अपने को संयमित कर के शलभ ने माला को अपने सीने से अलग किया और धीरे से सोफे पर अपने सामने बैठा कर सांत्वना दी, ‘‘शांत हो जाओ. सब ठीक हो जाएगा…’’
माला ने अश्रुपूरित आंखों से शलभ की आंखों में झांकते हुए पूछा, ‘‘पैसा नहीं है हमारे पास… कैसे ठीक होगा ’’
‘‘मैं कुछ करता हूं…’’ अस्फुट भर्राया सा स्वर निकला शलभ के गले से.
‘‘आता हूं मैं बस अभी, तब तक तुम यहीं बैठो…’’ कह कर शलभ ने एटीएम कार्ड उठाया और गाड़ी से निकल पड़ा.
लौट कर शलभ ने माला के हाथ में 6 माह के किराए के 9 हजार जैसे ही थमाए उस ने खुशी से किलकारी मारी. शलभ सोफे पर बैठ कर जूते उतारने लगा तो वह अपने स्थान से उठी, खूबसूरत अदा से अपना पल्लू नीचे ढलका दिया और शलभ के एकदम करीब जा कर उस के कान में मादक स्वर में फुसफुसाई, ‘‘थैंक्यू जीजू, थैंक्यू.’’
माला के उघड़े वक्षस्थल की संगमरमरी गोलाइयों पर नजर पड़ते ही शलभ का चेहरा तमतमा गया और उस के मुख से कोई आवाज नहीं निकली. वह मुग्ध हो उसे देखने लगा. घर में माला महेश के विरुद्ध शलभ के स्वर एकाएक बंद हो गए. पति के रुख में अचानक बदलाव पा कर रमा को आश्चर्य तो हुआ पर वास्तविकता से अनभिज्ञ उस ने राहत की सांस ली. रोजरोज की तकरार से उसे मुक्ति जो मिल गई थी. नहीं चाहते हुए भी शलभ ने पत्नी से माला को 9 हजार रुपए देने की बात गुप्त रखी.
माला को भी इस बात का एहसास हो गया था कि उसे देख कर सदैव भृकुटि तानने वाला शलभ उस के रूप के चुंबकीय आकर्षण में बंध कर मेमना बन गया था. वह उसे अपने मोहपाश में बांधे रखने के लिए उस पर और अधिक डोरे डालने लगी. जब भी रमा किसी काम से बाहर जाती, सहजसरल भाव से वह माला के ऊपर घर की देखरेख का जिम्मा सौंप देती. इस का भरपूर फायदा उठाती माला.
उस के दोनों हाथों में लड्डू थे. रमा के सामने आंसू बहा कर माला पैसे मांग लेती और शलभ उस पर आसक्त हो कर अब स्वयं ही धन लुटा रहा था. अपने सहज, सरल स्वभाव वाले निष्कपट अनुरागी पति को अपने प्रति दिनप्रतिदिन उदासीन व ऊष्मारहित होते देख कर रमा का माथा ठनका पर बहुत सोचनेविचारने के बाद भी वह सत्य का पता नहीं लगा पाई.
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शुचि शाम को मेरा हालचाल जानने मेरे घर आई. मैं ने उसे अपने पास बिठाया और एक चेक उसे दिखाते हुए बोला, ‘‘यह 5 लाख रुपए का चेक मैं ने तुम्हारे नाम से आज ही भर दिया है. अब मुझ से पूछो कि इस रकम की हकदार बनने के लिए तुम्हें क्या करना पड़ेगा.
’’‘‘क…क्या करना पड़ेगा, सर?’’ वह एकदम से टेंशन का शिकार तो बन गई पर डरी हुई बिलकुल नजर नहीं आ रही थी.
‘‘क्या तुम मेरी सारी बातें खुशी- खुशी मानोगी?’’
‘‘सर, आप के इस एहसान का बदला मैं कैसे भी चुकाने को तैयार हूं.’’
सीमा की अपनी बेटी के प्रति चिंता जायज थी. मैं चाहता तो भावुकता की शिकार बनी शुचि को गलत राह पर कदम रखने को आसानी से राजी कर सकता था.
‘‘मैं ने कुछ दिन पहले कहा था न कि दोस्तों के बीच एहसान शब्द का प्रयोग ठीक नहीं है. अब तो मैं तुम्हारे परिवार से भी जुड़ गया हूं. इसलिए यह शब्द मैं फिर कभी नहीं सुनना चाहूंगा.’’
‘‘ठीक है, सर.’’
‘‘अब इस ‘सर’ को भी विदा कह कर मुझे ‘नरेश अंकल’ बुलाओ. इस संबोधन में ज्यादा अपनापन है.’’
‘‘ओ के, नरेश अंकल…’’ वह मेरे चेहरे को बड़े ध्यान से पढ़ने की कोशिश कर रही थी.
‘‘यह मेरी दिली इच्छा है कि एम.बी.ए. के लिए तुम्हें अच्छे कालिज में प्रवेश मिले. इस लक्ष्य को पाने के लिए तुम्हें बहुत मेहनत करने का वचन मुझे देना होगा, शुचि.’’
‘‘मैं बहुत मेहनत करूंगी,’’ उस की आंखों में दृढ़ निश्चय के भाव उभरे.
‘‘आज से ही?’’
‘‘हां, मैं आज से ही दिल लगा कर मेहनत करूंगी, नरेश अंकल,’’ वह जोश भरी आवाज में चिल्लाई और फिर हम दोनों ही खुल कर हंस पड़े थे.
‘‘गुड,’’ मैं ने उस के सिर पर हाथ रख कर दिल की गहराइयों से उसे आशीर्वाद दिया तो वह एक आदर्श बेटी की तरह मेरे पैर छू कर सीने से लग गई.
उस के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मैं जिस जोश और उत्साह को अपने भीतर महसूस कर रहा था, उस ने मेरे अकेलेपन के एहसास की जड़ें पूरी तरह नष्ट कर दी थीं.
Writer- पूनम पाठक
‘‘आरती, प्लीज मेरी बात सुनो. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. प्लीज, मुझे माफ कर दो,’’ रंजन बहुत देर तक दरवाजा पीटता रहा, मगर आरती ने कोई जवाब नहीं दिया और न ही दरवाजा खोला. थकहार कर रंजन हाल में आ कर दीवान पर अपना सिर पकड़ कर बैठ गया.
कानपुर, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कसबे झींझक से नौकरी की तलाश में आए रंजन को बरलाई शुगर मिल में सिक्योरिटी इंचार्ज की पोस्ट उस की अच्छी बौडी की वजह से मिल गई थी. वहीं फैक्टरी के एरिया में उसे 2 कमरों का क्वार्टर भी मिला था.
अच्छे से सर्विस में जमने के बाद रंजन अपनी पत्नी आरती को भी यहीं ले आया था. शादी हुए तकरीबन 2 साल हो चुके थे, पर अभी तक उन के कोई औलाद नहीं थी.
शुगर फैक्टरी में अक्तूबर से फरवरीमार्च महीने तक का समय सीजन कहलाता है यानी इस समय फैक्टरी में चीनी बनने का प्रोसैस चालू रहता है. यह समय सभी मुलाजिमों के लिए बहुत अहम रहता है. यहां तक कि सभी अफसरों के लिए भी.
उस दिन रंजन की छुट्टी थी. पास ही देवास से उस के कुछ दोस्त फैक्टरी देखने आए हुए थे. चलती फैक्टरी में चीनी बनाने का प्रोसैस देखना बहुत दिलचस्प होता है. सभी बड़े ध्यान से गन्ने को क्रेन द्वारा उठा कर क्रेन कैरियर में डाला जाना देख रहे थे.
जिस ट्रक से गन्ना उठाया जा रहा था, खाली होने के बाद वह वापस मुड़ने लगा कि अचानक ही रंजन की नजर एक नन्हीं सी बच्ची पर पड़ी, जो अपनी ही धुन में हाथ में एक छोटा सा गन्ना लिए उस ट्रक के ठीक पीछे खेल रही थी.
रंजन बिना एक भी पल गंवाए चिल्लाता हुआ उस ओर फुरती से दौड़ पड़ा. ट्रक उस बच्ची से हाथ भर की दूरी पर ही था कि रंजन ने बच्ची को खींच कर अपनी गोद में उठा लिया.
लोगों के शोरगुल से सारा माजरा समझ कर ट्रक वाले ने तुरंत ब्रेक लगाया. आननफानन वहां भीड़ जमा हो गई. ट्रक वाले ने उतर कर हाथ जोड़ते हुए सभी से माफी मांगी और रंजन का शुक्रिया अदा किया.
इस घटना से घबराई बच्ची रंजन से कस कर लिपट गई, तभी पीछे से किसी ने रंजन की बांह पकड़ कर उसे खींचा और एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को हाथ लगाने की?’’
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बच्ची अब रंजन को छोड़ कर ‘मांमां’ कहते हुए उस औरत के गले
जा लगी.
‘‘अरे मैडम, आप बिना सोचेसमझे जिस इनसान को मार रही हैं, उसी ने आप की बेटी को ट्रक की चपेट में आने से बचाया है. कैसी मां हैं आप? खुद बच्ची का खयाल नहीं रखतीं और दूसरों पर तोहमत लगाती हैं?’’ रंजन के दोस्त ने थोड़ा तैश में आ कर कहा.
पूरी बात समझने के बाद वह औरत नेहा बहुत ही शर्मिंदा हुई. उस ने तत्काल रंजन से माफी मांगी और उसे ‘थैंक्यू’ कहा.
रात को बिस्तर पर लेटे हुए रंजन को उस बच्ची की याद हो आई. फिर उसे उस की मां का वह थप्पड़ भी याद आया. कितनी घबराई हुई थी उस बच्ची की मां.
2-3 दिन बाद रंजन केबिन में बैठा था कि सामने से उसे वही औरत आती दिखी. वह उसी की तरफ बढ़ी चली आ रही थी.
‘‘मैं सच में उस दिन के लिए बहुत शर्मिंदा हूं. कई बार सोचा कि तुम से मिल कर माफी मांग लूं, पर हिम्मत नहीं हो रही थी. अगर उस दिन तुम मेरी परी को न बचाते, तो मेरी पूरी दुनिया ही उजड़ जाती. समझ नहीं आ रहा कि कैसे तुम्हारा शुक्रिया अदा करूं रंजन,’’ कह कर नेहा ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.
‘‘प्लीज, ऐसी बातें न करें. मैं ने उस दिन जो किया, वह मेरा फर्ज था. क्या आप यहीं फैक्टरी में रहती हैं?’’ बात बदलने के मकसद से रंजन ने पूछा.
‘‘हां, शाम को पार्क में मिलो न, वहीं बात करते हैं. परी भी तुम्हें देख कर खुश हो जाएगी. अभी मेरे औफिस का समय हो रहा है,’’ कहते हुए नेहा तेजी से जनरल औफिस की तरफ चल दी.
शाम को रंजन पार्क में पहुंचा, तभी परी चिल्लाई, ‘‘मम्मी, मुझे बचाने वाले अंकल…’’
नेहा ने मुड़ कर पीछे देखा, तो रंजन को अपनी ओर अपलक ताकते देख वह हौले से मुसकरा उठी. रंजन थोड़ा अचकचा गया, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो.
‘‘अरे तुम… आओ न, वहां क्यों खड़े हो?’’ नेहा हंसते हुए बोली.
‘‘जी,’’ कहते हुए रंजन ने परी को गोद में उठा लिया.
रंजन और नेहा देर तक बतियाते रहे. नेहा ने अपने बारे में रंजन को बताया कि तकरीबन सालभर पहले उस के पति एक सड़क हादसे में चल बसे है. बहुत टूट गई थी वह, लेकिन परी का मुंह देख कर उस ने जिंदगी जीने की ठान ली. मिल की नीतियों के तहत पति की नौकरी उसे मिल गई थी. तब से वह यहीं है.
नेहा के खुले बरताव ने रंजन पर बहुत असर डाला. आरती घर पर थी नहीं, रंजन के कोई ज्यादा यारदोस्त भी नहीं थे. उस के पास अभी समय ही समय था. इधर जिंदगी के अकेलेपन से ऊबी हुई नेहा भी रंजन में काफी दिलचस्पी दिखा रही थी. नतीजतन, वे काफी समय साथ बिताने लगे. परी भी रंजन से काफी घुलमिल चुकी थी.
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‘‘कल परी का बर्थडे है और तुम्हें घर आना है,’’ एक शाम नेहा ने रंजन
से कहा.
‘‘अरे वाह, बिलकुल आऊंगा, वैसे और कौनकौन आ रहा है?’’ रंजन ने हंस कर पूछा.
‘‘तुम, मैं और हमारी परी बस,’’ परी के गालों पर एक प्यारी सी चुम्मी लेते हुए नेहा ने कहा.
रंजन को कुछ अजीब सा लग रहा था. दरअसल, उसे इस तरह अकेले नेहा के घर जाने में सकुचाहट महसूस हो रही थी, लेकिन नेहा और परी से हो चुके जुड़ाव के चलते आखिरकार उस ने उन के घर जाने का फैसला कर लिया.
दूसरे दिन शाम साढ़े 6 बजे रंजन नेहा के घर जा पहुंचा. परी ने दरवाजा खोला, तो उस ने उसे बर्थडे विश करते हुए एक खूबसूरत गिफ्ट उस के हाथों में रख दिया.
‘‘अंकल, आप क्या लाए हो मेरे लिए?’’ पूछते हुए परी गिफ्ट को खोलने में लग गई.
‘‘खुद ही खोल कर देख लो,’’ हंस कर कहते हुए रंजन ने बैठक में चारों तरफ नजर दौड़ाई. कमरे में सामने की दीवार पर एक फोटो में नेहा के साथ उस के पति व परी को देख कर रंजन हैरानी से भर गया.
‘‘क्या देख रहे हो रंजन, ये परी के पापा हैं,’’ नेहा की आवाज सुन रंजन पीछे मुड़ा. उस की नजरें एकटक नेहा पर जा टिकीं. शानदार इवनिंग गाउन में नेहा बला की खूबसूरत नजर आ रही थी.
तीनों ने मिल कर केक काटा. फिर खाना खा कर ढेर सारी मस्ती और डांस किया. 8 बजने को थे. परी थक कर सो चुकी थी. नेहा के कहने पर रंजन ने उसे बैडरूम में ले जा कर सुला दिया.
‘‘काफी देर हो चुकी है. अब मुझे चलना चाहिए,’’ रंजन ने नेहा से चलने की इजाजत लेनी चाही.
‘‘मुझे छोड़ कर जा सकोगे तुम?’’ नेहा की मदभरी आवाज ने उस के बढ़ते कदमों को जैसे रोक दिया. उस ने आगे बढ़ कर रंजन का हाथ थाम उसे खींच कर सोफे पर बिठा दिया.
‘‘नेहाजी, यह सही नहीं है,’’ रंजन के हिलते होंठों की आवाज गले में ही घुट कर रह गई. नेहा ने उस के मुंह पर उंगली रखी और उस पर झुकती चली गई.
नेहा का संगमरमरी बदन और उस से आती खुशबू ने रंजन को दीवाना कर दिया. नेहा की सांसें और ऊपरनीचे होते उभार रंजन को मदहोश करने के लिए काफी थे. वह पहले झिझकता, पर बाद में नेहा की इस रसीली दावत को नकार न सका और उस के बदन से खेलने लगा.
पर, घर आ कर रंजन को बहुत पछतावा होने लगा. वह एक शादीशुदा खुशहाल इनसान था, लेकिन वक्ती नजाकत में उसे भी होश नहीं रह गया था. नेहा की खूबसूरती ने उस से वह करवा लिया था, जिसे सोच कर भी उसे शर्म आ रही थी. वह नेहा से दूर रहने लगा.
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ऐसे ही एक दिन शाम को औफिस से आने के बाद रंजन चाय पीते हुए टैलीविजन देख रहा था कि डोरबैल बजी. दरवाजा खोलते ही रंजन चौंक पड़ा. दरवाजे पर नेहा परी को लिए खड़ी थी.
‘‘अंकल देखो, मम्मी ने मुझे कितनी अच्छी घड़ी दिलाई है. यह अंधेरे में भी टाइम बताती है.’’
‘‘अरे वाह, यह तो सच्ची में बहुत सुंदर है,’’ रंजन ने उसे प्यार से दुलारते हुए कहा.
‘‘आप थोड़ी देर टीवी देखो, मम्मी को अंकल से कुछ जरूरी बात करनी है,’’ नेहा ने परी से कहा.
‘‘ओके मम्मी,’’ परी रिमोट ले कर चैनल बदलने लगी.
‘‘इधर आओ,’’ नेहा ने रंजन का हाथ पकड़ कर उसे उसी के बैडरूम में खींच लिया.
‘‘यह क्या कर रही हैं आप?’’ रंजन ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा.
‘‘मेरा फोन क्यों नहीं उठा रहे थे तुम?’’ नेहा ने गुस्से से पूछा.
‘‘देखिए, उस दिन जो भी हुआ, सही नहीं था.’’
‘‘तुम कहना चाहते हो, जो भी हुआ उस में तुम्हारी मरजी नहीं थी?’’
‘‘अगर आप मुझे न उकसाती, तो यह न होता.’’
‘‘अच्छा तो मेरी आंखों में देख कर कहो कि तुम मुझे नहीं चाहते?’’
‘‘देखिए, मैं आप को पसंद करता हूं, परी को भी बहुत प्यार करता हूं, पर…’’
मैं सुबह की सैर पर था. अचानक मोबाइल की घंटी बजी. इस समय कौन हो सकता है, मैं ने खुद से ही प्रश्न किया. देखा, यह तो अमृतसर से कौल आई है.
‘‘हैलो.’’
‘‘हैलो फूफाजी, प्रणाम, मैं सुरेश बोल रहा हूं?’’
‘‘जीते रहो बेटा. आज कैसे याद किया?’’
‘‘पिछली बार आप आए थे न. आप ने सेना में जाने की प्रेरणा दी थी. कहा था, जिंदगी बन जाएगी. सेना को अपना कैरियर बना लो. तो फूफाजी, मैं ने अपना मन बना लिया है.’’
‘‘वैरी गुड’’
‘‘यूपीएससी ने सेना के लिए इन्वैंट्री कंट्रोल अफसरों की वेकैंसी निकाली है. कौमर्स ग्रैजुएट मांगे हैं, 50 प्रतिशत अंकों वाले भी आवेदन कर सकते हैं.’’
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है.’’
‘‘फूफाजी, पापा तो मान गए हैं पर मम्मी नहीं मानतीं.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘कहती हैं, फौज से डर लगता है. मैं ने उन को समझाया भी कि सिविल में पहले तो कम नंबर वाले अप्लाई ही नहीं कर सकते. अगर किसी के ज्यादा नंबर हैं भी और वह अप्लाई करता भी है तो बड़ीबड़ी डिगरी वाले भी सिलैक्ट नहीं हो पाते. आरक्षण वाले आड़े आते हैं. कम पढ़ेलिखे और अयोग्य होने पर भी सारी सरकारी नौकरियां आरक्षण वाले पा जाते हैं. जो देश की असली क्रीम है, वे विदेशी कंपनियां मोटे पैसों का लालच दे कर कैंपस से ही उठा लेती हैं. बाकियों को आरक्षण मार जाता है.’’
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‘‘तुम अपनी मम्मी से मेरी बात करवाओ.’’
थोड़ी देर बाद शकुन लाइन पर आई, ‘‘पैरी पैनाजी.’’
‘‘जीती रहो,’’ वह हमेशा फोन पर मुझे पैरी पैना ही कहती है.
‘‘क्या है शकुन, जाने दो न इसे फौज में.’’
‘‘मुझे डर लगता है.’’
‘‘किस बात से?’’
‘‘लड़ाई में मारे जाने का.’’
‘‘क्या सिविल में लोग नहीं मरते? कीड़ेमकोड़ों की तरह मर जाते हैं. लड़ाई में तो शहीद होते हैं, तिरंगे में लिपट कर आते हैं. उन को मर जाना कह कर अपमानित मत करो, शकुन. फौज में तो मैं भी था. मैं तो अभी तक जिंदा हूं. 35 वर्ष सेना में नौकरी कर के आया हूं. जिस को मरना होता है, वह मरता है. अभी परसों की बात है, हिमाचल में एक स्कूल बस खाई में गिर गई. 35 बच्चों की मौत हो गई. क्या वे फौज में थे? वे तो स्कूल से घर जा रहे थे. मौत कहीं भी किसी को भी आ सकती है. दूसरे, तुम पढ़ीलिखी हो. तुम्हें पता है, पिछली लड़ाई कब हुई थी?’’
‘‘जी, कारगिल की लड़ाई.’’
‘‘वह 1999 में हुई थी. आज 2018 है. तब से अभी तक कोई लड़ाई नहीं हुई है.’’
‘‘जी, पर जम्मूकश्मीर में हर रोज जो जवान शहीद हो रहे हैं, उन का क्या?’’
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‘‘बौर्डर पर तो छिटपुट घटनाएं होती ही रहती हैं. इस डर से कोईर् फौज में ही नहीं जाएगा. यह सोच गलत है. अगर सेना और सुरक्षाबल न हों तो रातोंरात चीन और पाकिस्तान हमारे देश को खा जाएंगे. हम सब जो आराम से चैन की नींद सोते हैं या सो रहे हैं वह सेना और सुरक्षाबलों की वजह से है, वे दिनरात अपनी ड्यूटी पर डटे रहते हैं.’’
मैं थोड़ी देर के लिए रुका. ‘‘दूसरे, सुरेश इन्वैंट्री कंट्रोल अफसर के रूप में जाएगा. इन्वैंट्री का मतलब है, स्टोर यानी ऐसे अधिकारी जो स्टोर को कंट्रोल करेंगे. वह सेना की किसी सप्लाई कोर में जाएगा. ये विभाग सेना के मजबूत अंग होते हैं, जो लड़ने वाले जवानों के लिए हर तरह का सामान उपलब्ध करवाते हैं. लड़ाई में भी ये पीछे रह कर काम करते हैं. और फिर तुम जानती हो, जन्म के साथ ही हमारी मृत्यु तक का रास्ता तय हो जाता है. जीवन उसी के अनुसार चलता है.
‘‘तो कोई डर नहीं है?
‘‘मौत से सब को डर लगता है, लेकिन इस डर से कोईर् फौज में न जाए यह एकदम गलत है. दूसरे, सुरेश के इतने नंबर नहीं हैं कि वह हर जगह अप्लाई कर सके. कंपीटिशन इतना है कि अगर किसी को एमबीए मिल रहे हैं तो एमए पास को कोई नहीं पूछेगा. एकएक नंबर के चलते नौकरियां नहीं मिलती हैं. बीकौम 54 प्रतिशत नंबर वाले को तो बिलकुल नहीं. सुरेश अच्छी जगहों के लिए अप्लाई कर ही नहीं सकता. तुम्हें अब तक इस का अनुभव हो गया होगा शकुन, इसलिए उसे जाने दो.’’
रामबन, कश्मीर घाटी का एक संवेदनशील जिला. ऊंचे पहाड़, दुर्गम रास्ते और गहरी खाइयों के बीच स्थित है यह छोटा सा इलाका. भोलेभाले ग्रामीण जो मौसम की मार सहने के तो आदी थे मगर हाल ही में हुईं आतंकी वारदातों की मार के उतने आदी नहीं थे. मन मार कर इस को भी झेलने के अलावा उन के पास कोई चारा न था. सभी अच्छे दिनों की कल्पना को मन ही मन संजो रहे थे इस यकीन के साथ कि दुखों की रात की कभी तो खुशियोंभरी सुबह होगी.
पूरे इलाके में रामबन में ही एक सरकारी स्कूल, छोटा सा डाकखाना और एक अस्पताल था. राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े होने के चलते कभीकभी इन सेवाओं की अहमियत बढ़ जाती थी. हालांकि स्कूल था मगर शिक्षक नदारद थे, अस्पताल था मगर सुविधाएं ना के बराबर थीं, डाकखाना था जो डाकबाबू के रहमोकरम पर चल रहा था. मगर फिर भी उन की इमारतें उन के होने का सुबूत दे रही थीं.
उस दिन रामबन और आसपास के जिलों में मंत्रीजी का दौरा था. पूरा प्रशासन उन के स्वागत में एकपैर पर खड़ा था. सुरक्षाकर्मियों की नींद उड़ी हुई थी. आएदिन आतंकी घटनाओं ने वैसे भी सुरक्षा एजेंसियों की नाक में दम किया हुआ था, उस पर मंत्रीजी को अपने लावलशकर के साथ इलाके का दौरा करना उन के लिए किसी आपदा से कम न था. अस्पताल वालों को भी मुस्तैद रहने की हिदायत थी और सुरक्षाकर्मियों का वहां भी जमावड़ा था.
मैडिकल डाइरैक्टर अस्पताल के अफसर डाक्टर सारांश को समझा रहे थे कि मंत्रीजी का किस तरह से स्वागत करना है. डाइरैक्टर साहब कहे जा रहे थे और डा. सारांश हैरानी से उन्हें ताकते जा रहे थे.
‘‘सर, यह काम हमारा नहीं है, हमारा काम है मरीजों की तीमारदारी करना, उन का इलाज करना न कि आनेजाने वाले मंत्रियों की सेवा करना,’’ डा. सारांश ने अपनी बात कही तो मैडिकल डाइरैक्टर ने उन्हें समझाइश दी, ‘‘मैं जानता हूं डा. सारांश, मगर करना पड़ता है. यह हमारे सिस्टम का ही हिस्सा है.’’
‘‘तो बदल क्यों नहीं देते यह सिस्टम, सालों से चल रहे ऐसे सिस्टम को तिलांजलि क्यों नहीं दे देते हम,’’ डा. सारांश यह कहते हुए अपने कक्ष की तरफ बढ़ गए.
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इधर जहां सारा प्र्रशासन मंत्रीजी की फिक्र में घबराया हुआ सा था, वहीं महज कुछ ही मील दूर सेना की एक टुकड़ी औपरेशन विनाश की तैयारी में थी. फोनलाइन पर सीमापार से हो रही आतंकियों की बातचीत को सुना गया था. सूचना थी कि पाकिस्तान ने आतंकवादियों की एक टोली भारत की सीमा में ढकेल दी थी और आतंकियों ने रामबन के जंगलों में अपना आशियाना बनाया हुआ था. आतंकी पूरे असलहों और साजोसामान से लैस थे. वे एक बड़ी घटना को अंजाम देने की फिराक में थे.
खबर पक्की थी. सो, कमांडिंग अफसर ने कोई जोखिम नहीं लिया और अलगअलग टोलियां बना कर बीहड़ की अलगअलग दिशाओं में भेज दीं. उन्हीं में से एक टोली का नेतृत्व कर रहे थे मेजर बलदेव राज. मेजर बलदेव एक अच्छे खानदान से थे. उन के सारे भाईबहन विदेशों में अच्छी नौकरियों और बिजनैस से जुड़े थे. वतनपरस्ती के जज्बे ने उन्हें विदेशी शानोशौकत के बजाय फौज में पहुंचा दिया था जहां उन की गिनती जांबाज अफसरों में होती थी. लिहाजा, पाकिस्तान से आए 4 आतंकवादियों को पकड़ने के लिए उन्हें खास जिम्मेदारी दी गई थी.
पीठ पर वजनी साजोसामान, हाथ में बंदूक और सिर पर भारीभरकम हैलमेट पहने मेजर बलदेव के नेतृत्व में उन की टोली जंगल के चप्पेचप्पे की छानबीन कर रही थी. खबर पक्की थी कि आतंकवादी उन्हीं जंगलों में छिपे थे, इसलिए मेजर बलदेव गुप्त भाषा में अपने सिपाहियों को बारबार आगाह कर रहे थे. शाम का साया धीरेधीरे बादलों पर छा रहा था. तभी पत्तों की सरसराहट हुई और जवानों को आभास हो गया कि आतंकवादी आसपास ही थे.
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धीरेधीरे जवान उस ओर बढ़ने लगे जहां से सरसराहट हो रही थी. तभी अचानक दूसरी दिशा से अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई. मेजर बलदेव को ऐसे ही किसी हमले की आशंका थी, लिहाजा, उन की टोली के कुछ सिपाहियों का रुख दूसरी ओर था.
अगले चंद मिनट आग के गोले, धुएं और शोर के बीच बीत गए. दूसरी ओर से फायरिंग बंद हो गई तो मेजर बलदेव समझ गए कि दुश्मन का खात्मा हो गया है. अगले ही पल धुआं छटा और अपने साथियों को करीब पा कर उन्होंने राहत की सांस ली. ‘‘सर, चारों आतंकवादी मारे गए हैं, आइए उन की लाशें देखिए और हैडक्वार्टर को इत्तला कर दीजिए.’’
मेजर बलदेव ने उठने की कोशिश की मगर उठ नहीं पाए. उन की दायीं टांग लहूलुहान थी, होंठों पर दर्द था मगर आंखों में विजय की मुसकान थी. उन्होंने बड़ी मुश्किल से हैडक्वार्टर को मैसेज भिजवाया और एक बार फिर ब्रिगेडियर साहब से भूरिभूरि प्रशंसा पाई.