शायद यहीं आ कर नई पीढ़ी आगे निकल गई है. आज किसी कनिका और किसी अभिषेक को किसी से डरने की जरूरत नहीं है. अपना फैसला वे खुद करते हैं. मांबाप को सूचित कर दिया यही काफी है. यह तो कनिका और अभिषेक के भले संस्कारों का असर है जो इंडिया आ कर शादी कर रहे हैं. यों अगर वे अमेरिका में ही कोर्टमैरिज कर लेते तो भला कोई क्या कर लेता.
प्रेरणा की शादी अनिकेत से तय हो गई थी. न कोई शिकवा न गिला यों हुआ उन की प्रेमकथा का एक मूक अंत.
विदाई के समय प्रेरणा की नजरें घर की छत पर जा टिकीं, जहां कपिल को खडे़ देख कर उस के दिल में एक हूक सी उठी थी लेकिन चाहते हुए भी प्रेरणा की नजरें कुछ क्षण से ज्यादा कपिल पर टिकी न रह सकीं.
हर जख्म समय के साथ भर जाए यह जरूरी नहीं.
प्रेरणा को याद है. जब शादी के कुछ समय बाद कपिल से उस की मुलाकात मायके में हुई थी, वह कैसा बुझाबुझा सा लग रहा था.
‘कैसे हो कपिल?’ प्रेरणा ने कपिल के करीब आ कर पूछा.
न जाने कपिल को क्या हुआ कि वह प्रेरणा के सीने से चिपक कर रोने लगा. ‘काश, प्रेरणा हम समय पर बोल पाते. क्यों मैं ने हिम्मत नहीं दिखाई? पे्ररणा, इतनी कायरता भी अच्छी नहीं. तुम से बिछड़ कर जाना कि मैं ने क्या खो दिया.’
‘ओह कपिल…’ प्रेरणा भी रोने लगी.
चाहीअनचाही इच्छाओं के साथ प्रेरणा और कपिल का रिश्ता एक बार फिर से जुड़ गया. प्रेरणा के मायके के चक्कर ज्यादा ही लगने लगे थे.
अब प्रेरणा की दिलचस्पी फिर से कपिल में बढ़ती जा रही थी और अनिकेत में कम होती जा रही थी. पर अकसर टूर पर रहने वाले अनिकेत को प्रेरणा के बारबार मायके जाने का कारण अपनी व्यस्तता और उस को समय न देना ही लगता.
प्रेरणा और कपिल का यह रिश्ता उन्हें कहां ले जाएगा यह दोनों ही नहीं सोचना चाहते थे. बस, एक लहर के साथ वे बहते चले जा रहे थे.
शादी के पहले तो सब के अफेयर होते हैं, जो नाजायज तो नहीं पर जायज भी नहीं होते हैं. पर शादी के बाद के रिश्ते नाजायज ही कहलाएंगे. यह बात प्रेरणा को अच्छी तरह समझ में आ गई थी. कनिका के जन्म के बाद से ही प्रेरणा ने कपिल से संबंध खत्म करने का निर्णय ले लिया था. कनिका के जन्म के बाद पहली बार प्रेरणा अपने मायके आई थी. कमरे में प्रेरणा अपने और कनिका के कपड़े अलमारी में लगा रही थी कि अचानक कपिल ने पीछे से आ कर प्रेरणा को अपनी बांहों में भर लिया.
‘ओह, प्रेरणा कितने दिनों बाद तुम आई हो. उफ, ऐसा लगता है मानो बरसों बाद तुम्हें छू रहा हूं. प्रेरणा, तुम कितनी खूबसूरत लग रही हो. तुम्हारा यह भरा हुआ बदन…सच में मां बनने के बाद तुम्हारी खूबसूरती और भी निखर गई है.’ और हर शब्दों के साथ कपिल की बांहों का कसाव बढ़ता जा रहा था.
इस वक्त घर में कोई नहीं है यह बात कपिल को पता थी, इस वजह से वह बिना डरे बोले जा रहा था.
प्रेरणा के इकरार का इंतजार किए बिना ही कपिल उस की साड़ी उतारने लगा. कंधे से पल्ला गिरते ही लाल रंग के ब्लाउज में प्रेरणा का बदन बहुत उत्तेजित लगने लगा जिसे देख कर कपिल मदहोश हुआ जा रहा था.
इस से पहले कि कपिल के हाथ प्रेरणा के ब्लाउज के हुक खोलते, एक झन्नाटेदार चांटा कपिल के गाल पर पड़ा. ‘यह क्या कर रहे हो कपिल, तुम्हें शर्म नहीं आती कि मेरी बेटी यहां पर लेटी है. अब मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता है.’ न जाने प्रेरणा में इतना परिवर्तन कैसे आ गया था, जो अपने ही प्यार का अपमान इस तरह से कर रही थी.
कपिल एक क्षण के लिए चौंक गया फिर बिना कुछ बोले, बिना कुछ पूछे वह तुरंत कमरे से बाहर निकल गया. शायद इतनी बेइज्जती के बाद उस ने वहां रुकना उचित न समझा. कपिल के जाते ही प्रेरणा फूटफूट कर रोने लगी. कपिल से रिश्ता खत्म करने का शायद उसे यही एक रास्ता दिखा था. कपिल से रिश्ता तोड़ना प्रेरणा के लिए आसान नहीं था पर आज प्रेरणा एक औरत बन कर नहीं बल्कि एक मां बन कर सोच रही थी. कल को उस के नाजायज संबंधों का खमियाजा उस की बेटी को न भोगना पड़े.
बच्चों को आदर्श की बातें बड़े तभी सिखा पाते हैं जब वे खुद उन के लिए एक आदर्श हों. जिन भावनाओं को प्रेरणा शादी के बाद भी नहीं छोड़ पाई, उन्हीं भावनाओं को अपनी औलाद के लिए त्यागना कितना आसान हो गया था.
उस के बाद प्रेरणा और कपिल की कोई मुलाकात नहीं हुई.
पर आज भी कपिल प्रेरणा के खयालों में रहता है और अनिकेत के साथ अंतरंग क्षणों में प्रेरणा को कपिल की यादों का एहसास होता है. वक्तबेवक्त कपिल की यादें प्रेरणा की आंखों को नम कर देती थीं.
कुछ रिश्ते यादों की धुंध में ही अच्छे लगते हैं. यह बात प्रेरणा अच्छी तरह जानती थी पर आज वही रिश्ते यादों की धुंध से निकल कर प्रेरणा को विचलित कर रहे थे.
जिस इनसान से प्रेरणा कभी प्रेम करती थी अब उसी का बेटा उस की बेटी के जीवन में आ गया था.
कैसे प्रेरणा कपिल का सामना कर पाएगी? कपिल के लिए जो भावनाएं आज भी उस के दिल में जीवित हैं उन भावनाओं को हटा कर एक नया रिश्ता कायम करना क्या उस के लिए संभव हो सकेगा? कैसे वह इन नए संबंधों को संभाल पाएगी? बरसों बाद अपने पहले प्यार की मिलनबेला का स्वागत करे या…
कैसे वह अपनी ही जाई बेटी की खुशियों का गला घोट डाले? कैसे अपने और कपिल के रिश्ते को सब के सामने खोले? क्या कनिका यह सहन कर पाएगी?
वैसे भी नई पीढ़ी जातिपांति को नहीं मानती. उस के लिए तो प्यार में सब चलता है. नई पीढ़ी तो इन बंधनों के सख्त खिलाफ है. जातपांति के मिटने में ही सब का भला है. आज की पीढ़ी यही समझ रही है, तब किस आधार पर अभिषेक और कनिका का रिश्ता ठुकराया जाए?
अपने ही खयालों के भंवर में प्रेरणा फंसती जा रही थी. सच में दुनिया गोल है. कोई सिरा अगर छूट जाए तो आगेपीछे मिल ही जाता है. पर ऐसे सिरे से क्या फायदा जो सुलझाने के बजाय और उलझा दे.
अभिषेक के मातापिता को देख कर कनिका का दिल शायद न धड़के पर कपिल का सामना करने के केवल खयाल से ही प्रेरणा का दिल आज पहले की तरह तेजी से धड़क रहा था. धड़कते दिल को संभालने के लिए अनायास ही उस के मुंह से निकल गया.
‘रखा था खयालों में अपने
जिसे संभाल कर,
ताउम्र उस को निहारा, सब से छिपा कर,
पर आज,
वक्त के थपेड़ों से सब बिखरता नजर आता है,
छिप कर आज कहां जाऊं,
वही चेहरा हर तरफ नजर आता है.’?
‘तो क्या जिस तरह यादों के तीर मेरे सीने के आरपार होते रहे उसी तरह के तीरों का शिकार अपनी बेटी को भी होने दूं?’ खुद से पूछे गए इस एक सवाल ने प्रेरणा को ठीक फैसला ले सकने की प्रेरणा दे दी. ‘कनिका को वैसा कुछ न सहना पड़े जो मैं ने सहा, चाहे इस के लिए अब मुझे कुछ भी सहना पड़े’ यह सोच कर प्रेरणा के मन की सारी उलझन गायब हो गई.
‘‘मम्मी, आप को फोटो कैसी लगी?’’ कनिका ने पूछा, ‘‘अभिषेक कैसा लगा, अच्छा लगा न, बताओ न मम्मी… अभिषेक अच्छा है न…’’
कनिका लगातार फोन पर पूछे जा रही थी पर प्रेरणा के मुंह में मानो दही जम गया हो. एक भी शब्द मुंह से नहीं निकल रहा था.
‘‘आप तो कुछ बोल ही नहीं रही हो मम्मी, फोन पापा को दो,’’ कनिका ने तुरंत कहा.
प्रेरणा की चुप्पी कनिका को इस वक्त बिलकुल भी नहीं भा रही थी. उसे तो बस अपनी बात का जवाब तुरंत चाहिए था.
‘‘पापा, अभिषेक कैसा लगा?’’ कनिका ने कहा, ‘‘मैं ने उस के पापा व मम्मी की फोटो ईमेल की थी…आप ने देखी, पापा…’’ कनिका की खुशी उस की बातों से साफ झलक रही थी.
‘‘हां, बेटे, अभिषेक अच्छा लगा है अब तुम वापस इंडिया आ जाओ, बाकी बातें तब करेंगे,’’ अनिकेत ने कनिका से कहा.
कनिका एम. टैक करने अमेरिका गई थी. वहीं पर उस की मुलाकात अभिषेक से हुई थी. दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला. 2 साल के बाद दोनों इंडिया वापस आ रहे थे. आने से पहले कनिका सब को अभिषेक के बारे में बताना चाह रही थी.
सच में नया जमाना है. लड़का हो या लड़की, अपना जीवनसाथी खुद चुनना शर्म की बात नहीं रही. सचमुच नई पीढ़ी है.
कनिका जिद किए जा रही थी, ‘‘पापा, बताइए न प्लीज, अभिषेक कैसा लगा…मम्मी तो कुछ बोल ही नहीं रही हैं, आप ही बता दो न…’’
‘‘कनिका, जिद नहीं करते बेटा, यहां आ कर ही बात होगी,’’ अनिकेत ने कहा.
पापा की आवाज तेज होती देख कनिका ने चुप रहना ही ठीक समझा.
‘‘तुम्हें अभिषेक कैसा लगा? लड़का देखने में तो ठीक लग रहा है. परिवार भी ठीकठाक है. इस बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ अनिकेत ने फोन रखते हुए प्रेरणा से पूछा.
‘‘मुझे नहीं पता,’’ कह कर प्रेरणा रसोई में चली गई.
‘‘अरे, पता नहीं का क्या मतलब? परसों कनिका और अभिषेक इंडिया आ रहे हैं. हमें कुछ सोचना तो पड़ेगा न,’’ अनिकेत बोले जा रहे थे.
पर अनिकेत को क्या पता था कि जिस अभिषेक के परिवार के बारे में वे प्रेरणा से पूछ रहे हैं उस के बारे में वह कल रात से ही सोचे जा रही थी.
कल इंटरनैट पर प्रेरणा ने कनिका द्वारा भेजी गई अभिषेक और उस के परिवार की फोटो देखी तो एकदम हैरान हो गई. खासकर यह जान कर कि अभिषेक, कपिल का बेटा है. वह मन ही मन खीझ पड़ी कि कनिका को भी पूरी दुनिया में यही लड़का मिला था. उफ, अब मैं क्या करूं?
अभिषेक के साथ कपिल को देख कर प्रेरणा परेशान हो उठी थी.
‘‘अरे, प्रेरणा, देखो दूध उबल कर गिर रहा है, जाने किधर खोई हुई हो…’’ अनिकेत यह कहते हुए रसोई में आ गए और पत्नी को इस तरह खयालों में डूबा हुआ देख कर उन को भी चिंता हो रही थी.
‘‘प्रेरणा, तुम शायद कनिका की बात से परेशान हो. डोंट वरी, सब ठीक हो जाएगा,’’ कनिका के इस समाचार से अनिकेत भी परेशान थे पर आज के जमाने को देख कर शायद वे कुछ हद तक पहले से ही तैयार थे, फिर पिता होने के नाते कुछ हद तक परेशान होना भी वाजिब था.
अनिकेत को क्या पता कि प्रेरणा परेशान ही नहीं हैरान भी है. आज प्रेरणा अपनी बेटी से नाराज नहीं बल्कि एक मां को अपनी बेटी से ईर्ष्या हो रही थी. पर क्यों? इस का जवाब प्रेरणा के ही पास था.
किचन से निकल कर प्रेरणा कमरे में पलंग पर जा आंखें बंद कर लेटी तो कपिल की यादें किसी छायाचित्र की तरह एक के बाद एक कर उभरने लगीं. प्रेरणा उस दौर में पहुंच गई जब उस के जीवन में बस कपिल का प्यार ही प्यार था.
कपिल और प्रेरणा दोनों पड़ोसी थे. घर की दीवारों की ही तरह उन के दिल भी मिले हुए थे.
छत पर घंटों खड़े रहना. दूर से एकदूसरे का दीदार करना. जबान से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होती थी. आंखें ही हाले दिल बयां करती थीं.
निश्चित समय पर आना और अनिश्चित समय पर जाना. न कुछ कहना न कुछ सुनना. अजब प्रेम कहानी थी प्रेरणा और कपिल की. बरसाती बूंदें भी दोनों की पलकें नहीं झपका पाती थीं. एक दिन भी एकदूसरे को देखे बिना वे नहीं रह सकते थे.
यद्यपि कपिल ने कई बार प्रेरणा से बात करने की कोशिश की पर संकोच ने हर बार प्रेरणा को आगे बढ़ने से रोक दिया. कभी रास्ते में आतेजाते अगर कपिल पे्ररणा के करीब आता भी तो प्रेरणा का दिल तेजी से धड़कने लगता और तुरंत वह वहां से चली जाती. जोरजबरदस्ती कपिल को भी पसंद नहीं थी.
प्रेरणा की अल्हड़ जवानी के हसीन खयालों में कपिल ही कपिल समाया था. सारीसारी रात वह कपिल के बारे में सोचती और उस की बांहों में झूलने की तमन्ना अकसर उस के दिल में रहती थी पर कपिल के करीब जाने का साहस प्रेरणा में न था. स्वभाव से संकोची प्रेरणा बस सपनों में ही कपिल को छू पाती थी.
वह होली की सुबह थी. चारोें तरफ गुलाल ही गुलाल बिखर रहा था. लाल, पीला, नीला, हरा…रंग अपनेआप में चमक रहे थे. सभी अपनेअपने दोस्तों को रंग में नहलाने में जुटे हुए थे. इस कालोनी की सब से अच्छी बात यह थी कि सारे त्योहार सब लोग मिलजुल कर मनाते थे. होली के त्योहार की तो बात ही अलग है. जिस ने ज्यादा नानुकर की वह टोली का शिकार बन जाता और रंगों से भरे ड्रम में डुबो दिया जाता.
प्रेरणा अपनी टोली के साथ होली खेलने में मशगूल थी तभी प्रेरणा की मां ने उसे आवाज दे कर कहा था :
‘प्रेरणा, ऊपर छत पर कपड़े सूख रहे हैं, जा और उतार कर नीचे ले आ, नहीं तो कोई भी पड़ोस का बच्चा रंग फेंक कर कपड़े खराब कर देगा.’
प्रेरणा फौरन छत की ओर भागी. जैसे ही उस ने मां की साड़ी को तार से उतारना शुरू किया कि किसी ने पीछे से आ कर उस के चेहरे को लाल गुलाल से रंग दिया.
प्रेरणा ने घबरा कर पीछे मुड़ कर देखा तो कपिल को रंग से भरे हाथों के साथ पाया. एक क्षण को प्रेरणा घबरा गई. कपिल का पहला स्पर्श…वह भी इस तरह.
‘‘यह क्या किया तुम ने? मेरा सारा चेहरा…’’ पे्ररणा कुछ और बोलती इस से पहले कपिल ने गुनगुनाना शुरू कर दिया…
‘‘होली क्या है, रंगों का त्योहार…बुरा न मानो…’’
कपिल की आंखों को देख कर लग रहा था कि आज वह प्रेरणा को नहीं छोड़ेगा.
‘‘क्या हो गया है तुम्हें? भांगवांग खा कर आए हो…’’ घबराई हुई प्रेरणा बोली.
‘‘नहीं, प्रेरणा, ऐसा कुछ नहीं है. मैं तो बस…’’ प्रेरणा का इस तरह का रिऐक्शन देख कर एक बार तो कपिल घबरा गया था.
पर आज कपिल पर होली का रंग खूब चढ़ा हुआ था. तार पर सूखती साड़ी का एक कोना पकड़ेपकड़े कब वह प्रेरणा के पीछे आ गया इस का एहसास प्रेरणा को अपने होंठों पर पड़ती कपिल की गरम सांसों से हुआ.
इतने नजदीक आए कपिल से दूर जाना आज प्रेरणा को भी गवारा नहीं था. साड़ी लपेटतेलपेटते कपिल और प्रेरणा एकदूसरे के अंदर समाए जा रहे थे.
कपिल के हाथ प्रेरणा के कंधे से उतर कर उस की कमर तक आ रहे थे…इस का एहसास उस को हो रहा था. लेकिन उन्हें रोकने की चेष्टा वह नहीं कर रही थी.
कपिल के बदन पर लगे होली के रंग धीरेधीरे प्रेरणा के बदन पर चढ़ते जा रहे थे. साड़ी में लिपटेलिपटे दोनों के बदन का रंग अब एक हो चला था.
शारीरिक संबंध चाहे पहली बार हो या बारबार, प्रेमीप्रेमिका के लिए रसपूर्ण ही होता है. जब तक प्रेरणा कपिल से बचती थी तभी तक बचती भी रही थी पर अब तो दोनों ही एक होने का मौका ढूंढ़ते थे और मौका उन्हें मिल भी जाता था. सच ही है जहां चाह होती है वहां राह भी मिल जाती है.
पर इस प्रेमकथा का अंत इस तरह होगा, यह दोनों ने नहीं सोचा था.
कपिल और प्रेरणा की लाख दुहाई देने पर भी कपिल की रूढि़वादी दादी उन के विवाह के लिए न मानीं और दोनों प्रेमी जुदा हो गए. घर वालों के खिलाफ जाना दोनों के बस की बात नहीं थी. 2 घर की छतों से शुरू हुई सालों पुरानी इस प्रेम कहानी का अंत भी दोनों छतों के किनारों पर हो गया था.
दोस्ती क्या है? दोस्ती किसी कहानी के उन खयालों की तरह है, जिस के एकएक पैराग्राफ एकदूसरे से जुड़े रहते हैं. एक भी पैराग्राफ छूटा, तो आगे की कहानी समझना बहुत मुश्किल है. उस दोस्ती में से कुछ दोस्त पैराग्राफ के उन मुश्किल पर्यायवाची शब्दों की तरह होते हैं, जिन्हें याद रखने की कोशिश करतेकरते हम भूलते चले जाते हैं. जिंदगी हमें इतना परेशान करती है कि उन की यादें धुंधली हो जाती हैं. फिर कभी कहीं किसी रोज उन का जिक्र आ जाने से या किसी के द्वारा उन की बात छेड़ देने से उन की यादें उन पर्यायवाची शब्दों की तरह ताजा हो जाती हैं.
ऐसा ही एक दोस्त था. कहां से शुरू करूं उस के बारे में… धुंधलीधुंधली सी यादें हैं उस की… एक साधारण सा दुबलापतला हाफ पैंट में लड़का, जिस के लंबे घने बाल, जिन में सरसों का तेल लगा रहता था और पूरे चिपकू के जैसे अपने बालों को चिपका कर रखता था. उस के घर वाले कहते थे कि पढ़ने में बहुत ही होशियार है, इसलिए गांव से शहर ले आए हैं. यहां अच्छी पढ़ाई मिलेगी, तो शायद कुछ कर ले. एकदम गुमसुम और खामोश… शायद कुछ छूट गया हो या खो गया हो.
गांव से शहर आने की वजह से उसे बगैर किसी काम के घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी, पर धीरेधीरे उस का बाहर निकलना शुरू हुआ. कभी मसजिद में नमाज पढ़ने जाने, तो कभी कुछ राशन लाने या फिर दुकान पर बीड़ी पहुंचाने के बहाने से. कुछ दिनों के बाद वह हाफ पैंट छोड़ लुंगी पहनने लगा, जिसे देख कर महल्ले के सारे हमउम्र लड़के उस का मजाक उड़ाने लगे. इतनी कम उम्र में लुंगी पहनने की वजह से पूरे महल्ले के लोग उसे पहचानने लगे थे.
उस की उम्र का कोई भी लड़का लुंगी नहीं पहनता था. इस लुंगी की वजह से मसजिद में उस के हमउम्र बच्चे उसे परेशान भी करने लगे थे. सब उसे ‘देहाती’ कह कर चिढ़ाते थे. मसजिदों में बच्चों की शफ में नमाज कम शैतानियां ज्यादा होती हैं और इसी वजह से एक दिन मामला मारपीट तक आ पहुंचा, तब से वह नमाज के लिए बड़ों की शफ में खड़ा होने लगा. इन्हीं सब वजहों से महल्ले में उस की न किसी से कोई बातचीत होती थी और न ही किसी से दोस्ती हो पाई थी सिवा मेरे. मैं उसे अपना दोस्त मानता तो था, पर शायद वह नहीं. वजह आज तक मेरी समझ से परे है.
शायद उस का स्वभाव ही ऐसा था कि वह जल्दी किसी से घुलतामिलता नहीं था. मुझ से दोस्ती होना या तो इत्तिफाक था या सिर्फ मेरी जरूरत. इत्तिफाक इसलिए कि उस का दाखिला मेरे ही स्कूल में करवा दिया गया था और मुझे जिम्मेदारी दी गई उसे साथ में स्कूल ले जाने और लाने की. शहर में नया होने की वजह से खो जाने का डर था और जरूरत इसलिए कि मेरा उस के घर आनाजाना था. उस के भैया से मैं गणित के सवाल हल करवाने जाता था. उस के भैया और मेरे भैया दोस्त थे और साथ में ही पढ़ते थे. उसी स्कूल में, जिस में हम दोनों पढ़ रहे थे.
मेरे भैया पढ़ाई की वजह से इस शहर से दूसरे शहर चले गए और उस के भैया तो गांव से शहर आए थे, फिर वे और कौन से शहर जाते, इसलिए वे इसी शहर में पढ़ाई के साथसाथ अपनी दुकान भी संभालने लगे थे. मेरे भैया के दूसरे शहर चले जाने के बाद मेरे अब्बू ने मुझे सख्त हिदायत दी थी उस के यहां न जाने की, पर गणित की वजह से मुझे वहां जाने का बहाना मिल ही जाया करता था. मैं उस से बातें करना चाहता था. मैं ने कभी गांव नहीं देखा था, इसलिए मैं उस की नजरों से गांव घूमना चाहता था, गांव के दोस्तों के बारे में जानना चाहता था, पर वह कभी मुझ से खुल कर बात ही नहीं करता था. मेरे अब्बू को उस के घर का माहौल बिलकुल पसंद नहीं था. उस के यहां तकरीबन 20 लोग हमेशा ऐसे रहते थे, जैसे कारखानों में रहते हैं. उसी तरह खानाबदोश जिंदगी.
10-15 लोग तो बीड़ी के कारीगर हुआ करते थे, जो उस की दुकान के लिए बीड़ी बनाया करते थे. वहां दिनभर गानाबजाना चलता था, उलटीसीधी बातें होती रहती थीं, कोई बीड़ी पी रहा होता था, तो कोई खैनी खा रहा होता था. इन्हीं सब वजहों से मेरे अब्बू खफा होते थे. उन्हें लगता था कि मेरी आदत भी खराब हो जाएगी. हालांकि मेरे अब्बू खुद सिगरेट पीते थे, जो कि उसी की दुकान से आती थी. महल्ले में सिर्फ उस के घर में ही चापाकल था. अगर कभी किसी दिन नगरनिगम की सप्लाई वाला पानी नहीं आता था, तो लोग उस के ही घर से पानी लाते थे. वह मुझे अब भी इसलिए याद है, क्योंकि हम दोनों की जिंदगी एकजैसी थी. मेरे अब्बू मुझे महल्ले वाले बच्चों से अलग रखना चाहते थे, क्योंकि उन की नजर में महल्ले में कोई भी हम लोगों के लायक नहीं था. सब अनपढ़, जाहिल या कम पढ़ेलिखे थे और उस की जिंदगी ऐसी हो गई थी कि महल्ले के बच्चे उस से दोस्ती नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वह बीड़ी वाले का लड़का और देहाती था. जब भी हम स्कूल के लिए निकलते,
तो उस के साथ स्कूल बैग के अलावा दुकान पर देने के लिए बीड़ी या राशन लाने के लिए थैला जरूर रहता था, क्योंकि रास्ते में ही उस की दुकान पड़ती थी. हम लोग बीड़ी देते हुए स्कूल चले जाते थे. इसी बहाने उस के साथसाथ मुझे भी कुछ चौकलेट मिल जाती थीं. रास्तेभर वह कोई न कोई कविता गुनगुनाता रहता था. उस के इतने काम करने और कविता गुनगुनाने की वजह से मैं ने उस का नाम ‘कामधारी सिंह दिनकर’ रख दिया था. समय के साथ हमारी 10वीं जमात हो गई और फिर वहां से आगे का सफर. जैसे वह गांव से पढ़ने शहर आया था, वैसे ही मुझे आगे की अच्छी पढ़ाई करने के लिए इस शहर से किसी बड़े शहर या तो मेरे भैया के पास या फिर कहीं और, पर जाना तो तय था. 10वीं जमात के आखिरी इम्तिहान के बाद वह बहुत खुश था. जिस गांव से वह खुशीखुशी शहर आया था, इम्तिहान के बाद वह उसी शहर से अपने गांव रौकेट की रफ्तार से लौट जाना चाहता था.
जब तक इम्तिहान के नतीजे नहीं आ जाते, तब तक वह वहीं रहेगा या किसी बहाने से आएगा ही नहीं. मैं ने पूछा भी था, ‘‘क्यों…?’’ उस ने हमेशा की तरह छोटा सा जवाब दिया था, ‘‘ऐसे ही?’’ उस के 2 लफ्ज ‘ऐसे ही’ बोलने के अंदाज में लाखों राज छिपे थे. नतीजे आ गए, पर वह नहीं आया और मुझे मेरे भैया के पास भेजने की तैयारी जोरों पर थी. जाने से पहले मैं उस से एक बार मिलना चाहता था, जो बिलकुल भी मुमकिन नहीं था. यह उस जमाने की बात है, जब मोबाइल फोन या इंटरनैट नहीं हुआ करते थे. तब लोगों से जुड़ाव कायम करने का एक ही जरीया था खत. मैं ने उस के भैया से पूछा था, ‘‘कब आएगा वह?’’ जवाब में उन्होंने न जाने कितनी लानतें भेजी थीं उस पर… ‘बेवकूफ’, ‘बदकिस्मत’ और न जाने क्याक्या कहा था उसे. वे अपनी मिसाल देने लगे थे कि वे तो आगे पढ़ना चाहते थे, पर अब्बा की ख्वाहिश की वजह से दुकान को संभालना पड़ा और एक वह है, जिसे सब यहां शहर में पढ़ाना चाहते हैं, पर उसे गांव में ही रह कर पढ़ना है. उस के भैया के जवाब के बाद मैं ‘बदकिस्मत’ की परिभाषा ढूंढ़ने लगा कि आखिर ‘बदकिस्मत’ कहते किस को हैं? मेरा मानना था कि अगर किसी की कोई दिली तमन्ना, ख्वाहिश पूरी न हो, तो वह ‘बदकिस्मत’ हुआ,
पर उस की दिली ख्वाहिश जो कि यह थी कि वह वापस शहर नहीं आएगा, पूरी हो गई थी. मेरी नजर में तो वह ‘खुशकिस्मत’ था. इस की एक वजह यह भी थी कि उस ने 10वीं जमात में ही खुद से एक फैसला लिया था और चाहे वजहें जो भी हों, सब ने वह फैसला मान भी लिया. फिर मैं खुद की किस्मत को कोसने लगा… शायद ‘बदकिस्मत’ तो मैं था. मैं भी दूसरे शहर जा कर पढ़ाई नहीं करना चाहता था, पर यह बात मैं अपने घर में फुसफुसाहट में भी नहीं कह सकता था, क्योंकि अब्बू तक यह खबर पहुंच गई, तो वे मेरा कीमा बना देते. यहीं पर मुझे लगा कि हम दोनों की जिंदगी एक सी नहीं है, क्योंकि मैं खुद से फैसला नहीं ले सकता था. वह शहर क्यों नहीं आना चाहता था? यह सिर्फ मैं जानता था. वह भी उस ने इम्तिहान के आखिरी दिन एक शर्त पर बताया था कि मैं किसी को नहीं बताऊं. उस दिन उस ने दिल खोल कर मुझ से बातें की थीं. घर वालों के फैसले पर जब वह शहर पढ़ने आया था, तो उस की खुद की एक खामोश वजह थी और वह वजह थी बिजली और टैलीविजन.
यहां शहर की रात की बिजली की चकाचौंध उसे बहुत भाती थी और किसी न किसी के घर में टैलीविजन देखने को तो मिल ही जाता था, जहां वह फिल्में और ‘शक्तिमान’ देख पाता था. गांव की लालटेन की धीमी रोशनी कुछ हद तक ही रोशन कर पाती थी. उस हद के बाद आसपास अंधेरा ही रहता था और अंधेरे उसे बहुत डराते थे. रात में उसे बाथरूम भी जाना होता था, तो वह अपनी अम्मी को साथ ले कर जाता था. गांव में वह अपनी अम्मी के साथ रात के 2 बजे ही जग जाया करता था, पर सूरज की रोशनी होने तक बिस्तर में ही दुबका रहता था. मैं ने पूछा था, ‘‘2 बजे ही क्यों?’’ वह बताना नहीं चाहता था, पर मेरे जोर देने पर उस ने बड़े फख्र से बताया था,
‘‘मेरी अम्मी 2 बजे उठ कर लालटेन को रोशनी में चश्मा लगा कर बीड़ी बनाने के लिए पत्ते काटती हैं और पत्ते काटतेकाटते फज्र की नमाज का समय हो जाता है. फिर वह पत्ते काट कर उसे जमने के लिए सुतली वाले बोरे में बांध कर नमाज पढ़ने चली जाती है.’’ मैं ने फिर पूछा था, ‘‘यह जमना क्या होता है?’’ ‘‘जमना मतलब मुलायम होना, ताकि पत्तों को बीड़ी के जैसे लपेटने में आसानी हो,’’ उस ने बताया था. मैं उस की बात नहीं समझ पाया था, यह उस ने मेरे चेहरे से जान लिया तो फिर उस ने मुझे ठीक वैसे ही समझाया जैसे उस के भैया मुझे गणित समझाते थे. ‘‘इसे ऐसे समझो कि पत्ते काटने के बाद उसे और भी मुलायम होने के लिए मतलब एक बीड़ी वाले की जबान में इसे पत्ते का जमना कहते हैं. सुतली वाले बोरे को एक खास तरीके से बस्ता बना कर उसे पानी से हलका भिगो कर बांधा जाता है. पानी भी एक जरूरत के हिसाब से ही देना होता है.
कम पानी देने से पत्ते रूखे रह जाते हैं और ज्यादा पानी देने से पत्ते में चित्ती लग जाती है मतलब फफूंद लग जाती है.’’ उस के इस तरह बताने से पता चल रहा था कि बीड़ी का कारोबार उस के खून में है. मैं ने फिर पूछा था, ‘‘इतनी सवेरे जाग कर तुम क्या करते थे?’’ ‘‘मैं वहीं पर लेट कर कहानियों की किताबें पढ़ कर अपनी अम्मी को सुनाया करता था,’’ यह कहतेकहते वह उदास हो गया था, मानो जैसे अब रो ही देगा. ‘‘तुम तो वापस उसी अंधेरे वाली दुनिया में जा रहे हो और अब आओगे भी नहीं,’’ मैं आज बस उसे ही सुनना चाहता था. ‘‘हां दोस्त…’’ पहली बार उस ने मुझे दोस्त कह कर बुलाया था. फिर एक गहरी सांस ले कर वह कहने लगा था, ‘‘जिस वजह से मैं यहां आया था, वह तकरीबन पूरी तो हो गई है, पर…’’ ‘‘पर क्या…?’’ उस ने फिर बात अधूरी छोड़ दी तो मैं ने पूछा था.
‘‘पर, अम्मी छूट गई यार, मेरी कहानियां सुनने वाला यहां कोई नहीं है,’’ वह अपने आंसू छिपाने की कोशिश करते हुए बोला था, ‘‘पता है, मेरी नींद अब भी 2 बजे खुल जाती है, पर कमरे के बाहर नहीं निकलता, क्योंकि इस चकाचौंध रोशनी के रहते हुए भी मुझे डर लगता है. तब मुझे समझ में आया कि डर तो मेरे अंदर अब भी है, पर यहां मैं बाथरूम जाने के लिए किसी को गहरी नींद से जगा नहीं सकता, साथ नहीं ले जा सकता. ‘‘भला कोई मेरे लिए अपनी नींद क्यों खराब करेगा और किसी को साथ चलने के लिए जगाने में मुझे खुद भी शर्म आती है, क्योंकि उन की नजर में मैं बहुत बड़ा हो गया हूं, पर अपनी अम्मी की नजर में…’’ कहतेकहते वह खामोश हो गया था. ‘‘पर, यहां टैलीविजन देखने को तो मिलता है न…?’’ मैं चाहता था कि किसी बहाने से वह गांव से वापस आ जाए. ‘‘वह तो तुम्हारे यहां ही देखता हूं…’’ इस से ज्यादा उस ने कुछ नहीं कहा था, क्योंकि बाकी बातें मैं खुद समझ गया था. मेरे अब्बू को उस का मेरे यहां आना बिलकुल भी पसंद नहीं था. ‘‘तुम्हें पता है कि मुझे यहां हर चीज पूछ कर करनी पड़ती है. तुम्हारे यहां टैलीविजन देखने जाने के लिए भी कितनी डांट सुननी पड़ती है, तब जा कर इजाजत मिलती है और फिर तुम्हें वहां मेरे लिए दरवाजा खोलने की वजह से डांट सुननी पड़ती है.’’ उस की इस बात से मैं चौंक पड़ा था कि इसे तो सबकुछ पता है.
‘‘ऐसा नहीं है कि मेरे गांव में टैलीविजन नहीं है. वहां भी है, पर वहां इतनी बंदिशें नहीं हैं. अगर किसी ने अपना दरवाजा बंद भी कर लिया तो हम सब बस दीवार फांद कर उस के घर में घुस जाते हैं, कोई कुछ नहीं कहता है, सब को देखने दिया जाता है. ‘‘हमारे यहां बिजली नहीं है, तो हम लोग बैटरी पर देखते हैं… या तो खुद की बैटरी को पास के बाजार से चार्ज करा कर या भाड़े पर ला कर.’’ उस की बातों को सुन कर मैं अंदर से शर्मिंदा हो रहा था. कुछ चीजें ऐसी थीं, जो मेरे बस में नहीं थीं. उन में से एक थी, उसे देख कर मेरे अब्बू का दरवाजा बंद कर लेना. थोड़ी देर सन्नाटा पसरा रहा, फिर उस ने आगे कहना शुरू किया था, ‘‘वहां तो हंसनेरोने के लिए भी कभी सोचना नहीं पड़ता है. झूठमूठ रो कर अपनी जिद मनवा लेता हूं और फिर जिद पूरी होने पर हंस देता हूं. यहां तो हर चीज के लिए वजह ढूंढ़नी पड़ती है. तुम्हें पता है, तुम्हारे साथ जा कर मैं जितनी बार भी दवाएं लाया था, वे मैं ने कभी खाई ही नहीं थीं.’’ मैं फिर हैरान था और झट से पूछ लिया था, ‘‘क्यों?’’ ‘‘क्योंकि मुझे कभी पेट या सिरदर्द हुआ ही नहीं. घर या अम्मी की याद आ जाती थी और रो पड़ता था. आंसू की वजह बताने के लिए यही 2 दर्द ऐसे थे, जिन के लिए किसी सुबूत की जरूरत नहीं पड़ती है. गांव में तो अम्मी बुखार भी छू कर जान जाती थी, यहां तो बस थर्मामीटर…’’ मैं खामोश था. शायद मैं भी अब रो पड़ता. एक 10वीं के लड़के के अंदर कितना कुछ भरा था. ऐसा लगा कि उस के अंदर का बच्चा यहां आ कर मर रहा था. ‘‘मैं ने तो अब सोच लिया है कि बीड़ी की दुनिया से मुझे बाहर निकलना है खासकर अम्मी को तो बिलकुल भी नहीं बनाने दूंगा,’’ उस ने कहा था. ‘‘क्यों?’’ ‘‘बहुत सी बातें हैं, तुम्हें कैसे बताऊं…’’ ‘‘बता भी दो, आज पहली बार तुम ने मुझे दोस्त कहा है.’’ ‘‘इतनी मेहनत है इस काम में, पर उस के एवज में मिलता कुछ भी नहीं है.
बीड़ी, जिसे तुम देशी सिगरेट भी कह सकते हो, उस को बनाने से पहले उस के बहुत से पड़ाव हैं. आसान नहीं है बीड़ी बनाना और उसे आम लोगों तक पहुंचाना. हस्तकला की हर कदम पर जरूरत पड़ती है मानो हम जैसे कोई दुलहन सजा रहे हों. ‘‘इतनी मेहनत करने के बाद अगर पूरे दिन में एक हजार बीड़ी बन गईं, वह भी अगर आप की बनाने की स्पीड ज्यादा है तो मुश्किल से 40 से 50 रुपए मजदूरी मिलेगी. लेडीज हाथ की बीड़ी के लिए तो और भी कम मजदूरी है,’’ उस ने बीड़ी बनाने के तरीके को पूरी तफसील में समझाया था मानो उस ने बीड़ी बनाने की कला में पीएचडी कर रखी हो. ‘‘लेडीज हाथ की बीड़ी की मजदूरी कम क्यों?’’ मैं ने फिर पूछा था और बस मेरे इसी एक सवाल का जवाब उस के पास नहीं था और इस का जवाब शायद आज भी किसी के पास नहीं है, पर इस भेदभाव की वजह से उस के अंदर गुस्सा बहुत था. ‘‘पता नहीं यार, और सब से ताज्जुब वाली बात तो यह है कि दुकानदार यानी मेरे अब्बा दोनों बीड़ी को एक ही दाम पर बेचते हैं. ग्राहक से लेडीज हाथ की बीड़ी बता कर कम पैसे नहीं लिए जाते हैं. पता नहीं यह भेदभाव क्यों है? ‘‘मेरी अम्मी या कोई औरत अलग या किसी आसान तरीके से बीड़ी थोड़े न बनाती हैं. मेहनत तो दोनों की बराबर ही लगती है. ‘‘घर को संभालना औरतों के हाथ में है, बच्चे पैदा कर उन की अच्छी परवरिश करना भी उन्हीं के हाथों में है, उन के हाथ का खाना अच्छा होता है, पर यहां… बस यहां उन के हाथ का कोई मोल नहीं, तभी तो लेडीज के हाथ की बीड़ी बोल कर उन्हें कम मजदूरी दी जाती है…’’ कितनी सचाई थी उस की बातों में. कुछ देर के लिए तो मुझे ऐसा लगा कि हमारे स्कूल के गुप्ता सर महिला सशक्तीकरण पर भाषण दे रहे हैं. ‘‘अब हमें घर चलना चाहिए,’’ मैं ने कहा. हालांकि मैं चाहता तो था कि हमारी बातें यों ही चलती रहें, पर…
‘‘हां, वरना तुम्हें अब्बू से फिर डांट पड़ेगी.’’ वह बचपन की दोस्ती की आखिरी शाम मेरी जिंदगी की सब से हसीन शाम थी, पर मैं ने यह नहीं सोचा था कि इस के बाद मैं उस से कभी मिल नहीं पाऊंगा. समय के साथ उस का चेहरा मेरे जेहन में धुंधला तो हो गया, पर उस की बातें हमेशा रोशन रहीं. उस की वे आखिरी एक दिन की बातें मुझे अपनी जिंदगी में हर दिन दिखाई देती थीं. उस ने कहा था, ‘‘अपना घर छोड़ते ही आप की पहचान में फर्क आ जाता है. अपनी पहचान खो जाती है. अच्छाखासा नाम रहते हुए भी तुम्हें उस नाम से कोई नहीं बुलाएगा.’’ कितनी हकीकत थी उस की इस बात में और यह तब समझ में आया, जब मैं ने घर छोड़ा. घर छोड़ने के बाद मेरी पहचान ‘बंटी का भाई’, ‘जूनियर’, ‘सीनियर’, ‘फ्रैशर’, ‘ऐक्सपीरियंस्ड’, ‘दैट इंडियन गाय’… कुछ ऐसा ही होता चला गया, ठीक उसी तरह जिस तरह उस का भी एक नाम था, पर यहां इस शहर में उस का एक ही नाम था ‘बीड़ी वाले का लड़का’.
‘‘अच्छा… मोबाइल स्विच औफ है? मैं ने देखा नहीं… शायद चार्ज करना भूल गई,’’ विनीता साफ झूठ बोल गई.
‘‘सुनो, मुझे दोपहर बाद टूअर पर निकलना है. ड्राइवर को भेज रहा हूं, मेरा बैग पैक कर के दे देना. घर नहीं आ पाऊंगा, जरूरी मीटिंग है,’’ जतिन ने जल्दबाजी में कहा.
जतिन के टूअर अकसर ऐसे ही बनते. मगर हर बार की तरह इस बार विनीता परेशान नहीं हुई, बल्कि उस ने राहत की सांस ली, क्योंकि वह इस समय सचमुच एकांत चाहती थी ताकि शालिनी से आने से बनी इस परिस्थिति पर कुछ सोचविचार कर सके.
‘क्या होगा अगर उस ने घर आने और मेरे पति से मिलने की जिद की तो? क्या कहूंगी मैं शालू से? क्या जतिन से शादी कर के मैं ने कोई अपराध किया है?’ इन्हीं सवालों के जवाब वह एकांत में अपनेआप से पाना चाहती थी. पूरा दिन वह मंथन करती रही. उस की आशंका के अनुरूप अगले ही दिन दोपहर में शालिनी का फोन आ गया. अब तक विनीता अपनेआप को इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार कर चुकी थी.
‘‘यार विन्नी, तुम तो बड़ी छिपी रुस्तम निकली… मेरी ही थाली पर हाथ साफ कर लिया… मेरे आशिक को अपना पति बना लिया… मैं ने कल ही जतिन की फेसबुक आईडी देखी तो पता चला… क्या तुम्हारी पहले से ही प्लानिंग थी?’’ शालू का व्यंग्य सुन कर विन्नी गुस्से और अपमान से तिलमिला उठी.
‘‘नहीं शालू… थाली पर हाथ साफ नहीं किया, बल्कि जिस पौध को तुम कुचल कर खत्म होने के लिए फेंक गई थी मैं ने उसे सहेज कर फिर से गमले में लगा दिया… अब उस के फूल या फल, जो भी हों, वे मेरी ही झोली में आएंगे न… चल छोड़ ये बातें… तू बता क्या चल रहा है तेरी लाइफ में? कितने दिन के लिए इंडिया आई हो? अकेली आई हो या नितेश भी साथ है?’’ विन्नी ने संयत स्वर में पूछा.
‘‘अकेली आई हूं, हमेशा के लिए… हमारा तलाक हो गया.’’
‘‘क्यों? कैसे? वह तो तुम्हारे हिसाब से बिलकुल परफैक्ट मैच था न?’’
‘‘अरे यार, दूर के ढोल सुहावने होते हैं… नितेश भी बाहर से तो इतना मौडर्न… और भीतर से वही… टिपिकल इंडियन हस्बैंड… यहां मत जाओ… इस से मत मिलो… उस से दूर रहो… परेशान हो गई थी मैं उस से… खुद तो चाहे जिस से लिपट कर डांस करे… और कोई मेरी कमर में हाथ डाल दे तो जनाब को आग लग जाती थी… रोज हमारा झगड़ा होने लगा… बस, फिर हम आपसी सहमति से अलग हो गए. अब मैं हमेशा के लिए इंडिया आ गई हूं,’’ शालू ने बड़ी ही सहजता से अपनी कहानी बता दी जैसे यह कोई खास बात नहीं थी, मगर विनीता के मन में एक अनजाने डर ने कुंडली मार ली.
‘‘अगर यह हमेशा के लिए इंडिया आ गई है, तो जतिन से मिलने की कोशिश भी जरूर करेगी… कहीं इन दोनों का पुराना प्यार फिर से जाग उठा तो? कहते हैं कि व्यक्ति अपना पहला प्यार कभी नहीं भूलता… फिर? उस का क्या होगा?’’ विनीता ने डर के मारे फोन काट दिया.
विनीता के दिल में शक के बादलों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया. उस का शक विश्वास में बदलने लगा जब एक दिन उस ने फेसबुक पर नोटिफिकेशन देखा, ‘‘जतिन बिकम्स फ्रैंड विद शालिनी.’’
‘‘जतिन ने मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा? हो सकता है शालिनी इन से मिली भी हो…’’ विनीता के दिल में शक के नाग ने फुफकार भरी. विनीता अपने दिल की बात किसी से भी शेयर नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे उस की मनोस्थिति उस पर हावी होने लगी. नतीजतन उस के व्यवहार में एक अजीब सा रूखापन आ गया. जतिन जब भी उसे हंसाने की कोशिश करता वह बिफर उठती.
‘‘तुम्हें पता है शालिनी वापस लौट आई है?’’ एक दिन औफिस से आते ही जतिन ने विस्फोट किया.
‘‘हां, उस ने एक दिन मुझे फोन किया था. मगर तुम्हें किस ने बताया?’’ विनीता ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा. जतिन की आंखों में उसे जरा भी चोरी नजर नहीं आई, बल्कि उन में तो विश्वास भरी चमक थी.
‘‘अरे, उसी ने आज मुझे भी फोन किया था. उसे टाइम पास करने के लिए कोई जौब चाहिए. मुझ से मदद मांग रही थी.’’
‘‘फिर तुम ने क्या कहा?’’
‘‘1-2 लोगों से कहा है… देखो, कहां बात बनती है.’’
‘‘मगर तुम्हें क्या जरूरत है किसी पचड़े में पड़ने की?’’
‘‘अरे यार, इंसानियत नाम की भी कोई चीज होती है या नहीं… चलो छोड़ो, तुम बढि़या सी चाय पिलाओ,’’ कहते हुए जतिन ने बात खत्म कर दी.
मगर यह बात इतनी आसानी से कहां खत्म होने वाली थी. विनीता के कानों में रहरह कर शालिनी की चैलेंज देती आवाज गूंज रही थी. अब उस के पास शालिनी के फोन आने बंद हो गए थे. इस बात ने भी विनीता की रातों की नींद उड़ा दी थी.
‘‘अब तो सीधे जतिन को ही कौल करती होगी… मैं तो शायद कबाब में हड्डी हो चुकी हूं,’’ विनीता अपनेआप से ही बातें करती परेशान होती रहती. इन सब के फलस्वरूप वह कुछ बीमार भी रहने लगी थी.
‘‘मेरे कहने पर एक होटल में शालिनी को एचआर की जौब मिल गई. इस खुशी में वह आज मुझे इसी होटल में ट्रीट देना चाहती है… तुम चलोगी?’’ एक शाम जतिन ने घर आते ही कहा.
‘‘पूछ रहे हो या चलने को कह रहे हो?’’ विनीता भीतर ही भीतर सुलग रही थी.
‘‘आजकल तुम्हें बाहर का खाना सूट नहीं करता न, इसलिए पूछ रहा हूं,’’ जतिन ने सहजता से कहा.
विनीता कुछ नहीं बोली. चुपचाप हारे हुए खिलाड़ी की तरह जतिन को अपने से दूर जाते देखती रही.
धीरेधीरे उस ने चुप्पी ही साथ ली. उस ने जतिन से दूरी बढ़ानी शुरू करदी. उन के रिश्ते में ठंडापन आने लगा. वह मन ही मन अपनेआप को जतिन से तलाक के लिए तैयार करने लगी. वहीं जतिन इसे उस की बीमारी के लक्षण समझ कर बहुत ही सामान्य रूप से ले रहा था. हमेशा की तरह वह उसे घर आते ही औफिस से जुड़ी मजेदार बातें बताता था. इन दिनों उस की बातों में शालिनी का जिक्र भी होने लगा था. हालांकि शालू कभी उन के घर नहीं आई, मगर जतिन के अनुसार वह कभीकभार उस से मिलने औफिस आ जाती. वह भी 1-2 बार उस के बुलावे पर होटल गया था.
मैं अवाक् रह गई. अनजाने में वह कितना बड़ा सत्य कह गई थी, वह नहीं जानती थी. सचमुच इन के कोई दोस्त नहीं वरन दफ्तर के साथी रमाशंकर की बहन और बहनोई आ रहे थे रश्मि को देखने.
लेकिन बेटे वालों के जितने नाजनखरे होते हैं, उस के हिसाब से कितनी बार यह नाटक दोहराना पड़ेगा, कौन जानता है. और लाड़दुलार में पली, पढ़ीलिखी लड़कियों का मन हर इनकार के साथ विद्रोह की जिस आग से भड़क उठता है, मैं नहीं चाहती थी, मेरी सीधीसादी सांवली सी बिटिया उस आग में झुलस कर अभी से किसी हीनभावना से ग्रस्त हो जाए.
इसी वजह से वह जितनी सहज थी, मैं उतनी ही घबरा रही थी. कहीं उसे संदेह हो गया तो…
भारतीय परंपरा के अनुरूप हमारे माननीय अतिथि पूरे डेढ़ घंटे देर से आए. प्रतीक्षा से ऊबे रश्मि और आशु अपने पिता पर अपनी खीज निकाल रहे थे, ‘‘रमाशंकर चाचाजी ने जरूर आप का अप्रैल फूल बनाया है. आप हैं भी तो भोले बाबा, कोई भी आप को आसानी से बुद्धू बना लेता है.’’
‘‘नहीं, बेटा, रमाशंकरजी अकेले होते तो ऐसा संभव था, क्योंकि वह अकसर ऐसी हरकतें किया करते हैं. पर उन के साथ जो मेहमान आ रहे हैं न, वे ऐसा नहीं करेंगे. नए शहर में पहली बार आए हैं इसलिए घूमनेघामने में देर हो गई होगी. पर वे आएंगे जरूर…’’
‘‘मान लीजिए, पिताजी, वे लोग न आए तो इतनी सारी खानेपीने की चीजों का क्या होगा?’’ रश्मि को मिठाई और मेहनत से बनाई कचौरियों की चिंता सता रही थी.
‘‘अरे बेटा, होना क्या है. इसी बहाने हमतुम बैठ कर खाएंगे और रमाशंकरजी और अपने दोस्त को दुआ देंगे.’’
बच्चों को आश्वस्त कर इन्होंने खिड़की का परदा सरका कर बाहर झांका तो एकदम हड़बड़ा गए.
‘‘अरे, रमाशंकरजी की गाड़ी तो खड़ी है बाहर. लगता है, आ गए हैं वे लोग.’’
‘‘माफ कीजिए, राजकिशोरजी, आप लोगों को इतनी देर प्रतीक्षा करनी पड़ी, जिस के लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं,’’ क्षमायाचना के साथसाथ रमाशंकरजी ने घर में प्रवेश किया, ‘‘पर यह औरतों का मामला जहां होता है, आप तो जानते ही हैं, हमें इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर उतरना पड़ता है.’’
वह अपनी बहन की ओर कनखियों से देख मुसकरा रहे थे, ‘‘हां, तो मिलिए मेरी बहन नलिनीजी और इन के पति नरेशजी से, और यह इन के सुपुत्र अनुपम तथा अनुराग. और नलिनी बहन, यह हैं राजकिशोरजी और इन का हम 2, हमारे 2 वाला छोटा सा परिवार, रश्मि बिटिया और इन के युवराज आशीष.’’
‘‘रमाशंकरजी, हमारे बच्चों को यह गलतफहमी होने लगी थी कि कहीं आप भूल तो नहीं गए आज का कार्यक्रम,’’ सब को बिठा कर यह बैठते हुए बोले.
रमाशंकरजी ने गोलगोल आंख मटकाते हुए आशु की तरफ देखा, ‘‘वाह, मेरे प्यारे बच्चो, ऐसी शानदार पार्टी भी कोई भूलने की चीज होती है भला? अरे, आशु बेटा, दरवाजा बंद कर लो. कहीं ऐसा न हो कि इतनी अच्छी महक से बहक कर कोई राह चलता अपना घर भूल इधर ही घुस आए,’’ अपने चिरपरिचित हास्यमिश्रित अभिनय के साथ जिस नाटकीय अदा से रमाशंकरजी ने ये शब्द कहे उस से पूरा कमरा ठहाकों से गूंज गया.
प्रतीक्षा से बोझिल वातावरण एकाएक हलका हो गया था. बातचीत आरंभ हुई तो इतनी सहज और अनौपचारिक ढंग से कि देखतेदेखते अपरिचय और दूरियों की दीवारें ढह गईं. रमाशंकरजी का परिवार जितना सभ्य और सुशिक्षित था, उन के बहनबहनोई का परिवार उतना ही सुसंस्कृत और शालीन लगा.
चाय पी कर नलिनीजी ने पास रखी अटैची खोल कर सामान मेज पर सजा दिया. मिठाई के डब्बे, साड़ी का पैकेट, सिंदूर रखने की छोटी सी चांदी की डिबिया. फिर रश्मि को बुला कर अपने पास बिठा कर उस के हाथों में चमचमाती लाल चूडि़यां पहनाते हुए बोलीं, ‘‘यही सब खरीदने में देर हो गई. हमारे नरेशजी का क्या है, यह तो सिर्फ बातें बनाना जानते हैं. पर हम लोगों को तो सब सोचसमझ कर चलना पड़ता है न? पहलीपहली बार अपनी बहू को देखने आ रही थी तो क्या खाली हाथ झुलाती हुई चली आती?’’
‘‘बहू,’’ मैं ने सहसा चौंक कर खाने के कमरे से झांका तो देखती ही रह गई. रश्मि के गले में सोने की चेन पहनाते हुए वह कह रही थीं, ‘‘लो, बेटी, यह साड़ी पहन कर आओ तो देखें, तुम पर कैसी लगती है. तुम्हारे ससुरजी की पसंद है.’’
रश्मि के हाथों में झिलमिलाती हुई चूडि़यां, माथे पर लाल बिंदी, गले में सोने की चेन…यह सब क्या हो रहा है? हम स्वप्न देख रहे हैं अथवा सिनेमा का कोई अवास्तविक दृश्य. घोर अचरज में डूबी रश्मि भी अलग परेशान लग रही थी. उसे तो यह भी नहीं मालूम था कि उसे कोई देखने आ रहा है.
हाथ की प्लेटें जहां की तहां धर मैं सामने आ कर खड़ी हो गई, ‘‘क्षमा कीजिए, नलिनीजी, हमें भाईसाहब ने इतना ही कहा था कि आप लोग रश्मि को देखने आएंगे, पर आप का निर्णय क्या होगा, उस का तो जरा सा भी आभास नहीं था, सो हम ने कोई तैयारी भी नहीं की.’’
‘‘तो इस में इतना परेशान होने की क्या बात है, सरला बहन? बेटी तो आप की है ही, अब हम ने बेटा भी आप को दे दिया. जी भर के खातिर कर लीजिएगा शादी के मौके पर,’’ उन का चेहरा खुशी के मारे दमक रहा था, ‘‘अरे, आ गई रश्मि बिटिया. लो, रमाशंकर, देख लो साड़ी पहन कर कैसी लगती है तुम्हारी बहूरानी.’’
‘‘हम क्या बताएंगे, दीदी, आप और जीजाजी बताइए, हमारी पसंद कैसी लगी आप को? हम ने हीरा छांट कर रख दिया है आप के सामने. अरे भई, अनुपम, ऐसे गुमसुम से क्यों बैठे हो तुम? वह जेब में अंगूठी क्या वापस ले जाने के इरादे से लाए हो?’’ रमाशंकरजी चहके तो अनुपम झेंप गया.
‘‘हमारी अंगूठी के अनुपात से काफी दुबलीपतली है यह. खैर, कोई बात नहीं. अपने घर आएगी तो अपने जैसा बना लेंगे हम इसे भी,’’ नलिनीजी हंस दीं.
पर मैं अपना आश्चर्य और अविश्वास अब भी नियंत्रित नहीं कर पा रही थी, ‘‘वो…वो…नलिनीजी, ऐसा है कि आजकल लड़के वाले बीसियों लड़कियां देखते हैं…और इनकार कर देते हैं…और आप…?
‘‘हां, सरला बहन, बड़े दुख की बात है कि संसार में सब से महान संस्कृति और सभ्यता का दंभ भरने वाला हमारा देश आज बहुत नीचे गिर गया है. लोग बातें बहुत बड़ीबड़ी करते हैं, आदर्श ऊंचेऊंचे बघारते हैं, पर आचरण ठीक उस के विपरीत करते हैं.