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Hindi Romantic Story: कौन तुम्हें यों प्यार करेगा…

Hindi Romantic Story ‘‘दादी, मैं बाहर खेलने जाऊं?’’ सुरभि ने सोफिया से इजाजत मांगी.

‘‘हां, लेकिन ज्यादा दूर मत जाना. यहीं अहाते में खेलना. और हां, शोर बिलकुल भी नहीं करना. दोपहर का वक्त है. सब लोग अपनेअपने घरों में सो रहे होंगे.’’

‘‘ठीक है दादी,’’ कहते हुए सुरभि दौड़ कर नीचे खेलने चली गई.

सोफिया टीवी के चैनल बदलने लगीं. सुरभि उन के बेटे कमलेश और बहू निम्मी की बेटी है. कमलेश एक सरकारी बैंक में काम करता है. बारबार तबादले से परेशान हो कर उस ने कठुआ में ही अपनी बेटी का दाखिला करा दिया था.

दोनों पतिपत्नी कामकाजी लोग हैं और बैंक में ही कभी अंबाला तो कभी चंडीगढ़ में काम करते हैं. उन का बेटा सुनील और सुरभि यहां कठुआ में अपनी दादी के साथ रहते हैं.

सोफिया अब विधवा हो चुकी हैं. उन के पति देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे.

इस साल सोफिया 97 साल की हो गई थीं. अब तो उन से हिला भी नहीं जाता था. घर में मेड आती थी, जो सुबहशाम खाना बनाती, कपड़े धो देती, बच्चों को खाना खिला देती.

बुढि़या सोफिया के पास अब कोई काम नहीं था. वे बच्चों से अखबार पढ़वाती थीं. जासूसी उपन्यासों का उन को शुरू से शौक था. वे अपने पोते सुनील को जबतब बिठा लेती थीं. कभी अखबार पढ़ने को कहती थीं, तो कभी जासूसी कहानियों को पढ़ कर सुनाने की इच्छा जाहिर करती थीं.

यह सब काम इतवार को या सरकारी छुट्टी या फिर किसी पर्वत्योहार पर ज्यादा होता था. जब थोड़ाबहुत पढ़ कर बच्चे इधरउधर भागने लगते या खेलने जाने की जिद करने लगते, तो सोफिया का एक ही सहारा होता था, टैलीविजन पर न्यूज चैनल देखना.

आज एक न्यूज चैनल बदलते हुए सोफिया के हाथ एकाएक रुक गए. आज फिर एक फौजी की लाश तिरंगे में लिपटी हुई आई थी. उस फौजी की उम्र 25 साल के आसपास रही होगी. सीमा पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुए वह जवान शहीद हो गया था. उस शहीद जवान को हवा में बंदूक की गोलियां चला कर सलामी दी जा रही थी. सब लोग सावधान की स्थिति में खड़े थे.

सोफिया के पति की विदाई भी ऐसे ही हुई थी. उन को भी ऐसे ही गोलियों की सलामी दी गई थी. गोलियों की आवाज के बीच सोफिया अपने अतीत की खोह में गुम होती चली गईं.

‘‘माफ कीजिए, क्या मैं यहां थोड़ी देर के लिए बैठ जाऊं? मैं आप को बहुत देर तक तकलीफ नहीं देने वाला हूं. बस, मुझे कठुआ तक जाना है. अगले किसी स्टेशन पर उतर कर मैं जनरल डब्बे में चला जाऊंगा. अगर आप को एतराज न हो तो…’’ उस नौजवान ने बहुत सधे हुए शब्दों में कहा था.

लेकिन पता नहीं क्यों सोफिया को गुस्सा आ गया था. बिना सौरभ की तरफ देखे ही वह बोली, ‘‘आप को पता नहीं है कि यह रिजर्वेशन वाला कंपार्टमैंट है… आप को इस कंपार्टमैंट में नहीं आना चाहिए था. अगर चढ़ना ही था, तो किसी जनरल कंपार्टमैंट में चढ़ जाते.

‘‘हम लोग जनरल कंपार्टमैंट की परेशानियों से बचने के लिए ही रिजर्वेशन कराते हैं, ताकि आराम से सफर कर सकें.’’

सोफिया पहले से ही बहुत परेशान थी. धनबाद से उस की ट्रेन थी. उसे जम्मू जाना था. घर पर उस के मांबाप अकेले थे. उधर जम्मूकठुआसांभा बौर्डर पर लगातार सीजफायर का उल्लंघन हो रहा था. मोर्टार और गोलियों की बरसात हो रही थी.

सोफिया अपने मांबाप को ले कर बहुत चिंतित थी. उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी तरह जल्द से जल्द जम्मू पहुंच जाए.

सोफिया दिल्ली में काम करती थी. धनबाद अपने किसी काम से आई थी. तब तक पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी शुरू हो गई थी. वह अभी अपना काम निबटा भी नहीं पाई थी, तब तक युद्ध जैसे हालात शुरू हो गए थे. लोगों में एक तरह का डर पैदा हो गया था. चारों तरफ अफरातफरी का माहौल बन गया था.

सोफिया को अपने मांबाप की चिंता सताने लगी थी. पहले तो उसे ट्रेन की टिकट ही नहीं मिल रही थी, पर किसी तरह इधरउधर से जुगाड़ बिठा कर उस ने टिकट का बंदोबस्त किया था.

उस नौजवान ने एक बार फिर कोशिश की, ‘‘प्लीज, केवल अगले स्टेशन तक मुझे यहां बैठने दीजिए. मुझे मालूम है कि आप बहुत नेकदिल हैं. आप का दिल मोम की तरह कोमल है और खूबसूरत लोग किसी का दिल नहीं दुखाते, बल्कि दूसरों की हमेशा मदद ही करते हैं. ऐसा पता नहीं मुझे क्यों आप को देख कर लगता है. वैसे, मेरा नाम सौरभ है.’’

इस बार सोफिया को मुड़ कर सौरभ को देखना बड़ा जरूरी हो गया. वह बोली, ‘‘अच्छा तो मैं खूबसूरत और रहमदिल भी हूं. यह तो मुझे पता ही नहीं था. आप की मेहरबानी से आज मुझे पता चल गया… शुक्रिया. आप पीछे से भी लोगों का चेहरा देख लेते हैं क्या या आप ने झूठ बोलने में पीएचडी कर रखी है?’’

सौरभ झेंप गया. उस ने सचमुच सोफिया को सामने से नहीं देखा था. वह तो हड़बड़ी में ट्रेन में चढ़ गया था. खिड़की से उस ने बस सोफिया का आधा चेहरा ही देखा था.

सौरभ झेंपते हुए बोला, ‘‘नहीं, मैं ने खिड़की से आप को देख लिया था.’’

‘‘अच्छा जी, आप कहीं इसलिए तो इस कंपार्टमैंट में नहीं चढ़ गए कि आप को एक खूबसूरत लड़की दिख गई थी और आप उस के पीछेपीछे हो लिए? आप को कहीं जाना भी है या बस यों ही ट्रेन में चढ़ गए? मैं खूब जानती हूं आप जैसे लोगों को. लड़की देखी नहीं और लगे हाथ साफ करने.’’

सौरभ बस इतना ही कह सका, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. मुझे ड्यूटी जौइन करनी है.’’

सोफिया को अब अफसोस हुआ. उस ने सौरभ को बहुत भलाबुरा कह दिया था. वह बोली, ‘‘अच्छा, बैठ जाइए.’’

सौरभ ने कहा, ‘‘जी, मैं ठीक हूं. मुझे तो खड़े रहने की आदत है.’’

‘‘फिर भी बैठ जाइए. अगला स्टेशन अभी घंटेभर बाद आएगा.’’

सौरभ पर सोफिया ने सरसरी नजर दौड़ाई. चौड़ी छाती, तांबई रंग, कद साढ़े 6 फुट. मजबूत कंधे. गोरा उम्र कोई 30-32 साल. जींसटीशर्ट में वह बेहद खूबसूरत लग रहा था. हाथ में एक बैग. बंधा हुआ एक कंबल. कुल इतना ही सामान था.

‘‘क्या करते हैं वहां जम्मू में?’’ सोफिया ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस घोड़ों के अस्तबल में काम करता हूं और मुसाफिरों को ऊपर पहाड़ पर ले जाता हूं.’’

‘‘मुझे बना रहे हैं. आप की कदकाठी और आप की पर्सनैलिटी देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि आप कोई अस्तबल या घोड़े के सईस हो. सचसच बताइए कि कौन हैं आप?’’

सौरभ का दिल इस बार तेजी से धड़का था. वह नहीं चाहता था कि अपनी असलियत सोफिया को बताए.

दरअसल, उस को कठुआ जाना था. सीमा पर हालात बहुत खराब चल रहे थे. वह अपनी बहन की शादी में यहां धनबाद आया था. शादी अभी 2 दिन पहले ही निबटी थी. तब तक देश में युद्ध जैसे हालात बन गए थे.

सौरभ अपनी पहचान किसी को बताना नहीं चाहता था कि वह एक फौजी है. इस तरह से सब को अपनी असलियत बताना उसे ठीक नहीं लगता था. वह बहुत ही शांत स्वभाव का था. ज्यादा बात करना उस के स्वभाव में नहीं था.

सौरभ बोला, ‘‘नहीं, मैं घोड़ों की देखभाल ही करता हूं. पहाड़ की चोटी पर मुसाफिर सीधे नहीं चढ़ पाते, इसलिए घोड़ों की मदद से ऊपर पहाड़ पर जाते हैं. मैं छोटामोटा काम करने वाला ही आदमी हूं. पता नहीं आप को क्यों ऐसा लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूं.’’

सौरभ की बातों में पता नहीं ऐसा क्या था कि न चाहते हुए भी सोफिया को यकीन करना पड़ गया कि सौरभ जोकुछ कह रहा है, वह सच है. शाम कब की हो चुकी थी. ट्रेन अपनी रफ्तार में दौड़ती जा रही थी.

अगला स्टेशन आने ही वाला था. उस स्टेशन से सोफिया का मुंहबोला भाई मुरारी आ कर ट्रेन में चढ़ने वाला था. उस को भी सोफिया के साथ जम्मू जाना था.

सोफिया बहुत बेचैन हो कर पहलू बदल रही थी. दरअसल, मुरारी आईटीआई का इम्तिहान दे कर सीधे स्टेशन आ कर उस के साथ ही जम्मू तक जाने वाला था.

सोफिया के पास वाली अपर बर्थ मुरारी के नाम से बुक थी. स्टेशन आया, लेकिन उस का भाई नहीं दिखा.
सोफिया ने मुरारी को फोन लगाया, ‘‘हां, मुरारी तुम कहां हो? आ जाओ स्टेशन, गाड़ी स्टेशन पर खड़ी है.’’

‘दीदी, मैं ट्रैफिक में फंस गया हूं. मुझे स्टेशन आने में करीब एकसवा घंटे से कम नहीं लगेगा,’ मुरारी ने बताया.

‘‘ट्रेन तो केवल 10 मिनट ही रुकती है इस स्टेशन पर. किसी तरह कोशिश करो जल्दी पहुंचने की,’’ सोफिया बोली.

‘दीदी, नहीं हो पाएगा. आप चली जाओ. मैं एकदो दिन बाद आ जाऊंगा,’ मुरारी ने कहा.

‘‘लेकिन मैं अकेले कैसे इतनी दूर तक का सफर करूंगी. मेरे साथ सामान भी तो है.’’

‘अरे दीदी, मैं कठुआ में अपने किसी दोस्त को फोन कर दूंगा. वह सामान उतरवा देगा. घबराने की कोई जरूरत नहीं है. सब ठीक होगा. अच्छा, रखता हूं. ट्रैफिक खुल गया है. अब स्टेशन न जा कर सीधा घर चला जाऊंगा. चलो, ठीक है. हैप्पी जर्नी दीदी.’

‘‘ठीक है, रखो फोन,’’ सोफिया ने बेमन से कहा.

सौरभ और मुरारी की कदकाठी और चेहरा एक सा था. वह सोचने लगी कि जगहजगह युद्ध जैसे हालात चल रहे हैं. पता नहीं पड़ोसी दुश्मन देश कब हमला कर दे. क्यों न वह सौरभ को ही अपने साथ ले चले? स्टेशन पर मुरारी का दोस्त तो आ ही जाएगा उस का सामान लेने.

सौरभ उतरने ही वाला था कि तभी सोफिया को परेशान देख कर बोला, ‘‘आप कुछ परेशान सी लग रही हैं.’’

‘‘हां, मेरा मुंहबोला भाई मुरारी अभी स्टेशन पर आने ही वाला था, लेकिन ट्रैफिक में फंस गया. अब मुझे अकेले ही सफर करना पड़ेगा.’’

‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. खैर, मैं चलता हूं,’’ सौरभ ने कहा.

सौरभ जब सोफिया के पास से गुजरा, तब सोफिया ने टोका, ‘‘सुनिए, आप चाहें तो मेरे भाई की सीट पर बैठ सकते हैं. अकेली लड़की के साथ में किसी विश्वासी आदमी का होना बेहद जरूरी है. अगर आप को कोई दिक्कत न हो तो.’’

‘‘लेकिन जब टीटी आएगा तब?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘अरे, टीटी से मैं बात कर लूंगी. बस आप यहीं रहिए,’’ सोफिया बोली.

सौरभ मान गया. थोड़ी देर के बाद सोफिया ने सौरभ से पूछा, ‘‘आप चाय लेंगे?’’

‘‘आप किसी ऐरेगैरे को चाय पिलाएंगी?’’ सौरभ ने चुटकी ली.

‘‘अरे, मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. आप उस बात को अब भी पकड़े हुए हैं. आदमी को पहचानने में कभीकभी गलती हो जाती है,’’ सोफिया बोली.

‘‘यानी कि आप के हिसाब से मैं गलत आदमी हूं?’’

‘‘ऐसा मैं उस समय तक ही सोचती थी, लेकिन अब नहीं. आदमीआदमी में फर्क होता है. इतनी तो परख है मुझ में,’’ सोफिया ने कहा.

‘‘तो क्या परखा आप ने? कैसा आदमी हूं मैं?’’

‘‘आप भले आदमी हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘आप भले आदमी न होते, तो मैं आप को अपने साथ सफर करने की इजाजत नहीं देती.’’

‘‘अच्छा, तो यह बात है.’’

‘‘हां, और क्या…’’

‘‘यह तो आप की जरूरत है कि आप के साथ कोई मर्द सफर करने के लिए नहीं है, नहीं तो आप मुझे अपने साथ इस कंपार्टमैंट में रुकने को न कहतीं. खैर, ऐसा होना लाजिमी भी है,’’ सौरभ ने जैसे सफाई देनी चाही.

सोफिया ने चाय की प्याली बनाई और सौरभ की तरफ बढ़ा दी. इस बार सौरभ के हाथ से सोफिया का हाथ छू गया.

ठंड के मौसम में सोफिया का हाथ बिलकुल ठंडा हो गया था. सौरभ ने चाय की प्याली थाम ली और धीरेधीरे चाय पीने लगा.

सौरभ ने गौर से सोफिया के चेहरे को निहारा. गोरा रंग, हरी आंखें. भरीभरी छातियां. जींसटौप में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

सोफिया ने पूछा, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हैं?’’

‘‘आप का खूबसूरत चेहरा.’’

‘‘मैं कहां खूबसूरत हूं. मेरी तो उम्र भी अब ढलने लगी है. मेरी उम्र के लोगों के तो बड़ेबड़े बच्चे होते हैं.’’

‘‘नहीं, मैं सच कह रहा हूं. आप बहुत खूबसूरत हैं. आप के जिस्म के हर हिस्से को कुदरत ने बहुत फुरसत से बनाया है.’’

फिर सौरभ को लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गया है. वह अब चुप हो गया था. वह खिड़की से बाहर देखने लगा था.

‘‘उधर क्या देख रहे हो? अभी मेरी खूबसूरती की बात कर रहे थे और अभी बाहर क्या निहारने लगे?’’

‘‘कुछ नहीं, कुदरत की बनाई हुई चीजें ही देख रहा था. नदी, तालाब, पहाड़, चांद की चांदनी…’’

‘‘क्या ये मुझ से भी खूबसूरत हैं?’’

सौरभ केवल हंस कर रह गया.

‘‘शादी हो गई तुम्हारी?’’ सोफिया ने सौरभ के चेहरे को निहारते हुए पूछा.

‘‘नहीं,’’ सौरभ बाहर के नजारे में कहीं खोता हुआ बोला.

‘‘शादी लायक तो तुम्हारी उम्र हो ही गई है. अब तक क्यों नहीं की?’’

‘‘यह सवाल तो मैं तुम से भी पूछ सकता हूं.’’

‘‘जिम्मेदारियां… और क्या वजह हो सकती है. मैं अपने मांबाप की अकेली बेटी हूं. मेरे मांबाप बूढ़े हैं. उन की उम्र हो गई है. आखिर किन के भरोसे उन को छोड़ूं? मेरे चले जाने के बाद उन को कौन देखेगा?

लेकिन तुम ने शादी क्यों नहीं की? तुम्हारी भी तो शादी लायक उम्र हो गई है?’’ सोफिया बोली.

‘‘वही जिम्मेदारी की बात आ जाती है. तुम्हारी वाली हालत. घर में बहन थी. उस की शादी करनी थी. उस के बाद ही तो अपनी शादी के बारे में सोचता,’’ सौरभ बोला.

दोनों अपनी हालत पर मुसकराने लगे.

‘‘अरे, मैं ने अपना फोन कहां रख दिया,’’ सौरभ को अचानक अपना फोन याद आया.

‘‘ठीक से देखो, यहींकहीं होगा.’’

सुनो, तुम अपने मोबाइल से जरा मेरे नंबर पर रिंग कर दो. हो सकता है, यहींकहीं गिरा हो. मिल जाए.’’

सोफिया ने नंबर पूछ कर मिलाया और मोबाइल की घंटी पर एक प्यारी सी रिंगटोन बजने लगी, ‘सुनो न संगेमरमर… कुछ भी नहीं है…’

मोबाइल सौरभ की सीट के बगल में ही गिरा था. रिंग मारने पर आसानी से मिल गया.

‘‘रिंगटोन तो तुम ने बहुत अच्छी लगा रखी है.’’

‘‘हां, मुझे यह गाना बेहद पसंद है.’’

‘‘तुम ने मेरी कौलर ट्यून सुनी है?’’

‘‘नहीं,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘फिर मेरा मोबाइल नंबर डायल करो.’’

सौरभ ने स्पीकर औन कर दिया. आवाज आई, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा, जैसे मैं करती हूं…’

सोफिया का चेहरा खुशी के मारे चमकने लगा.

सौरभ बोला, ‘‘ये दोनों मेरे फेवरेट गाने हैं.’’

‘‘तुम बहुत स्मार्ट हो.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम ने बहाना बना कर मेरा मोबाइल नंबर ले लिया,’’ सोफिया बोली.

‘‘नहीं, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. तुम कहो तो डिलीट कर दूं?’’

‘‘नहीं, लेकिन तुम्हें पता है कि लड़कियां अपना नंबर किस को देती हैं?’’

‘‘किस को?’’

‘‘किसी खास को.’’

‘‘अच्छा, तो क्या चलोगी मेरे साथ डेट पर?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘लेकिन तुम उम्र में मुझ से बहुत छोटे हो. कहां तुम 30 के और कहां मैं 40 की. एक दशक का अंतर है हमारी और तुम्हारी उम्र में,’’ सोफिया बोली.

‘‘प्यार में उम्र, ऊंचनीच, जातपांत, अमीरगरीब कुछ माने नहीं रखता, बस दिल मिलना चाहिए,’’ सौरभ ने बताया.

‘‘10 साल बीतने के बाद तुम ही किसी नईनवेली को खोजने लगोगे. तब मैं तुम्हारे लिए बूढ़ी हो जाऊंगी,’’ सोफिया बोली.

‘‘ऐसा नहीं होगा. मैं तुम्हें रूह की गहराइयों से चाहता हूं. तुम्हारा प्यार मेरे लिए पल दो पल का नहीं है,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘सच में?’’ सोफिया ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अच्छा, इस नंबर का क्या करना है? हो सकता है, हम फिर कभी मिलें ही न. यह हमारी आखिरी मुलाकात हो,’’ सौरभ ने कहा.

सोफिया चुप रही. ट्रेन रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. आगे का सफर बहुत अच्छा रहा. ट्रेन कठुआ स्टेशन पर पहुंची. मुरारी का दोस्त मयंक सोफिया को लेने आया था. आखिरी बार सौरभ और सोफिया मिल रहे थे.

सौरभ ने सोफिया को इशारे से कहा कि फोन करना. थोड़ी देर में गाड़ी जम्मू के लिए आगे बढ़ गई.

घर पहुंचने के बाद सोफिया का दिल किसी काम में नहीं लगता था. उस को बारबार सौरभ की याद आती थी.

एक तय समय तक लड़के वाले सोफिया को देखने और रिश्ते की बात करने के लिए आते थे, लेकिन सोफिया जिम्मेदारियों के बो?ा तले खुद को दबाती चली गई. उस ने शादी के इरादे को ही एक सिरे से खारिज कर दिया था. लेकिन सौरभ से मिल कर उस में उमंगें जागने लगी थीं.

एक दिन सोफिया ने सौरभ को फोन लगाया और शिकायत करती हुई बोली, ‘‘तुम्हें तो मेरी याद भी नहीं आती होगी न?’’

‘ऐसा नहीं है मेरी जान. तुम्हें तो मैं एक पल भी भूल नहीं सका, लेकिन केवल बात करने से काम नहीं चलता. काम भी तो करना पड़ता है. अगर घोड़े की सेवाटहल न करूं, तो मालिक मेरी जान खा जाएगा.

मेरा ज्यादातर समय टूरिस्टों के साथ ही बीतता है. पेट के लिए सब करना पड़ता है,’ सौरभ बोला.

‘‘तुम यहीं आ जाओ. चार घोड़े तुम्हारे लिए खरीद देती हूं. तुम उन की सेवा करना और मुझे उन घोड़ों पर घुमाना. जो मजदूरी तुम वहां पाते हो, यहां आ कर मुझ से ले लेना,’’ सोफिया बोली.

सौरभ ने कहा, ‘सो तो ठीक है, लेकिन मेरी नौकरी का सवाल है, नहीं तो मैं जरूर आता. एक बार नौकरी चली गई, तो फिर न मिलेगी. और तुम्हें तो पता है कि नौकरी मिलना आज के समय में कितना मुश्किल है.’
सोफिया बोली, ‘‘और तुम ने मु?ो डेट पर ले जाने को कहा था. उस का क्या हुआ?’’

‘डेट पर भी चलेंगे. अभी इधर सीजन चल रहा है. दो पैसे कमाने के दिन हैं, इसलिए मालिक से छुट्टी की बात भी नहीं कर सकता. मैं आऊंगा तुम से मिलने, लेकिन अभी तुम थोड़ा समय दो.’

‘‘सौरभ, मैं तुम्हें जीजान से चाहती और प्यार करती हूं. मैं तुम से मिलना चाहती हूं. तुम को छूना चाहती हूं. तुम में समाना चाहती हूं,’’ सोफिया ने अपना दिल खोल कर रख दिया.

‘मैं भी तुम से सच्चा प्यार करता हूं. तुम को तो भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता,’ सौरभ ने कहा.

‘‘ओह सौरभ, तुम कितने अच्छे हो,’’ सोफिया खुश हो गई.

किसी तरह 2 महीने बीते. बर्फ पिघलने के बाद पाकिस्तानी सेना ने भारत में घुसपैठ कर दी. पहलगाम, कठुआ और कारगिल के अलावा श्रीनगर, अखनूर, बारामूला में बेकुसूर नागरिक मारे जा रहे थे. अब युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था.

एक दिन सौरभ का फोन आया. उस समय सोफिया बाजार में सामान खरीदने गई थी. घर आ कर मोबाइल देखा तो कई मिस्ड काल थे.

सोफिया ने फोन मिलाया, ‘‘बोलो मेरे चरवाहे, मेरी जान ने कैसे याद किया मुझे?’’

‘मैं अब तुम्हें देखे बगैर नहीं रह सकता. तुम्हारी बहुत याद आती है. तुम्हारी आवाज सुनते ही मेरे शरीर में अजीब सी हरकत होने लगती है,’ सौरभ ने कहा.

सोफिया बोली, ‘‘आ जाओ न फिर मुझ से मिलने, तुम को किस ने रोक रखा है.’’

सौरभ बोला, ‘आ जाता, लेकिन मेरा काम मुझे रोक लेता है. तुम समझ रही हो न…’

सोफिया नाराज हो कर बोली, ‘‘ये सब कहने की बातें हैं क्या…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘सुनो सोफिया, मैं तुम से एक बेहद जरूरी बात करना चाहता हूं. मेरा काम अब ज्यादा बढ़ गया है. मैं ज्यादातर ऊंचाई पर ही रहूंगा और उतनी ऊंचाई पर कोई नैटवर्क भी नहीं आता, इसलिए फोन से बहुत मुमकिन है बात न हो पाए. पर जब भी मौका मिलेगा मैं तुम्हें फोन कर लूंगा. फोन न कर सका, तो मैं तुम्हें हर हफ्ते खत लिखा करूंगा.

‘अपना खयाल रखना. खत का भी ज्यादा इंतजार मत करना. देश में अभी इमर्जैंसी जैसे हालात हैं.

बारामूला में मेरा पूरा परिवार दादादादी, चाचाचाची सब लोग रहते हैं.

‘इधर जम्मू में हालात बिगड़े तो मेरा एक और मकान धनबाद में है. मेरे दादादादी, अपने मांपिताजी को ले कर वहीं चली जाना. रुपएपैसों की बिलकुल चिंता मत करना. एक एटीएम कार्ड तुम्हें कुरियर से भेज रहा हूं. पिन की जानकारी ह्वाट्सएप कर दी है. ये सब मोटीमोटी बातें हैं, जिन की तुम को आने वाले समय में जरूरत पड़ेगी.’

‘तुम जा कहां रहे हो? मुझे बताओगे भी या मुझे इसी तरह अपना आदेश सुनाते रहोगे फोन पर?’
‘यह जान कर तुम क्या करोगी कि मैं कहां जा रहा हूं. सेफ्टी रीजन से तुम को ये बातें बताई हैं. बस, तुम इन बातों को मानना और एक बात यह कि सेना हैडक्वार्टर के पास ही एक डाकखाना है, जिस में एक डाक बाबू ‘नील चाचा’ काम करते हैं. कोई खास जानकारी चाहिए हो, तो उन से ले लेना.’

‘‘फिर भी तुम कहां जा रहे हो, मुझे कुछ तो पता होना चाहिए.’’

सौरभ ने कहा, ‘सोफिया, मुझे भी कुछ पता नहीं है कि मुझे कहां भेजा जा रहा है. बस, मुझे भेजा रहा है और मैं जा रहा हूं और मुझे जाना भी चाहिए.

‘देश में हालात बेहद खराब हैं. लोगों की छुट्टियां रद्द हो रही हैं. सब लोग काम पर लौट रहे हैं. होमगार्ड के सिपाही, पुलिस, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, आर्मी, एयरफोर्स. सब लोग. बीएसएफ तो मोरचे पर पहले से ही डटी हुई है.’

सोफिया बोली, ‘‘लेकिन इन का तुम से क्या संबंध है? तुम तो आम नागरिक हो. आम नागरिक को युद्ध से भला क्या मतलब है और खासकर एक सईस को?’’

‘मैं इस देश का एक नागरिक हूं और मुझे लगता है कि जब देश को युद्ध जैसी इमर्जैंसी का सामना करना पड़े, तो हर आदमी को युद्ध लड़ने के लिए तैयार होना चाहिए.’

अब सोफिया का माथा ठनका. सौरभ का डीलडौल और साढ़े 6 फुट लंबा कद देख कर उस को पहले ही इस बात का शक था कि वह फौज में काम करने वाला कोई आदमी है.

सोफिया ने कहा, ‘‘अच्छा तुम ठीकठीक बताओ कि तुम कौन हो? तुम सेना में काम करते हो? गुप्तचर विभाग में हो या कौन हो? तुम को मैं जितना समझाने की कोशिश करती जा रही हूं, तुम उतना ही उलझते जा रहे हो. प्लीज, मुझे सही जानकारी दो…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘मेरा एक फोन आ रहा है. रुको, मैं तुम से बाद में बात करता हूं.’’

सौरभ का फोन कट गया था, लेकिन भीतर में कहीं गहरा था सौरभ और उस की बातें भी. कुछ भी साफसाफ नहीं बताता सौरभ. जितना सोफिया सौरभ को सम?ाना चाहती थी, कहीं गहरे में उलझती जाती थी. उस को ट्रेन में ही चेत जाना चाहिए था कि ऐसे लोगों पर जल्दी यकीन नहीं करना चाहिए था.

तभी मोबाइल पर टिंग से एक मैसेज गिरा. सोफिया ने गौर से देखा. वह एटीएम कार्ड का पिन था. 0169.
तकरीबन 15 दिनों के बाद सोफिया को डाक से एटीएम कार्ड भी मिल गया. उस में एक लिहाफा था, जिस में एक बैंक खाता था. एचडीबीसी नाम का कोई बैंक था. उस की शाखा सोफिया के घर के बहुत पास में ही थी यानी सौरभ यहां आया था और उस ने लोकेशन भी देखी थी.

अजीब बात है. सौरभ को मेरे घर और मेरे घर के पास इस बैंक के बारे में अच्छे से पता था. मेरे घर तक आ कर वह मुझ से मिले बगैर चला गया और कहता है कि मुझ से बहुत प्यार करता है. खाक प्यार करता है. जरूर कोई मायावी किस्म का आदमी है सौरभ.

लेकिन लोकलाज का भी तो डर है सौरभ को. शादी से पहले अगर कोई लड़का मिलने आता है, तो लड़की को लोग गलत नजरों से देखते हैं, लेकिन केवल मायावी कह देने भर से काम नहीं चलेगा. वह जिम्मेदार भी तो है. वह भी शादी से पहले. लोग शादी के बाद जिम्मेदारी नहीं स्वीकारते, यह तो शादी से पहले ही जिम्मेदारी स्वीकार रहा है.

पड़ोसी देश के लिए अब नाक बचाने की बात आ गई थी. हमारी फौज ने पड़ोसी मुल्क को नाकों चने चबवा दिए थे, लेकिन हमारी तरफ भी कैजुअल्टी हुई थी. चीन और नेपाल भी इन खराब हालात में पाकिस्तान का साथ दे रहे थे. पूरे देश में ब्लैकआउट चल रहा था. हर जगह अंधेरा. हर जगह डर का माहौल. दिन में ही सोता पड़ जाता था.

सब जगह लोग महफूज ठिकानों में छिप गए थे. देश के किसी भी हिस्से से कभी भी भयानक खबरें आ जाती थीं. सड़कों पर लोगों के कहीं हाथ के टुकड़े तो कहीं पैर के टुकड़े जहांतहां दिखाई देते थे. दिनरात अस्पतालों में भीड़ लगी रहती थी.

मिलिटरी अस्पतालों में कैजुअल्टी ज्यादा हुई थी. वहां एंबुलैंस में भरभर कर लोग आते थे. लोगों का हुजूम अस्पतालों के बाहर अपनों की शिनाख्त कर रहा था. सायरन बजता और लोग बंकरों की तरफ भाग जाते.

अरुणाचल प्रदेश और सियाचिन से डरावनी और भयावह खबरें आ रही थीं. रूस और इजराइल हमारे देश के साथ खड़े थे. रूस ने हमारे लिए 2 दर्जन लड़ाकू बमवर्षक हवाईजहाज भेजे थे. इजराइल भी प्रचुर मात्रा में हमें हथियार मुहैया करा रहा था, लेकिन दोनों तरफ कैजुअल्टी बढ़ रही थीं.

सोफिया का दिल हलकान हो रहा था. वह बारबार सौरभ के बारे में ही सोच रही थी कि इस युद्ध में सौरभ की क्या हालत होगी? वह क्या कर रहा होगा? वह ठीक तो होगा या नहीं? महीनाभर हो चुका था, उस से बात किए. अब तक उस का कोई फोन नहीं आया था.

फोन आता भी तो कैसे… ज्यादातर टावर पहले ही बमबारी में बरबाद हो चुके थे. कुछ थोड़ेबहुत टावर जो थे, सिक्योरिटी की वजह से वहां इंटरनैट बंद कर दिया गया था.

अब लेदे कर सेना हैडक्वार्टर और उस के डाकघर का सहारा था. सेना हैडक्वार्टर और डाकघर सोफिया के
घर के करीब था, लेकिन वह वहां सिक्योरिटी की वजह से नहीं जाना चाहती थी.

पर एक दिन अलसुबह ही सोफिया निकल पड़ी. सेना का हैडक्वार्टर और डाकघर ऊंचाई पर थे.

चलतेचलते उस की सांसें फूलने लगीं. पूछतीपाछती वह किसी तरह काउंटर पर पहुंची. वहां के पोस्टमास्टर का नाम नीलमणि था, जिन्हें सब ‘नील चाचा’ कहते थे.

सोफिया ने पूछा, ‘‘आप में से ‘नील चाचा’ कौन हैं?’’

एक दुबलापतला आदमी वहां डाक छांट रहा था. उस ने पतली ऐनक से खिड़की की तरफ देखा और कहा, ‘‘कौन?’’

सोफिया को लगा जैसे उस का आना कामयाब रहा. वह बोली, ‘‘आप ही ‘नील चाचा’ हैड पोस्टमास्टर हैं?’’
बूढ़े ने ‘हां’ में गरदन हिलाई और कहा, ‘‘डाकिया परसों डाक बांटते समय मोर्टार के छर्रे से जख्मी हो गया है. अभी वह अस्पताल में है. उस की जगह मैं उस का काम कर रहा हूं.’’

‘‘अगर आप को कोई तकलीफ न हो, तो आप मेरी डाक देख देंगे… मेरी कोई चिट्ठी आई हो तो… आप समझ रहे हैं मैं जो कह रही हूं…’’

‘नील चाचा’ ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है बेटी?’’

‘‘मेरा नाम सोफिया है.’’

सोफिया नाम सुनते ही ‘नील चाचा’ जबरदस्ती मुसकराते हुए वे बोले, ‘‘अच्छा, तो तुम सौरभ की मंगेतर हो… नहीं बेटी, तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई है. सौरभ तुम्हारे बारे में मु?ा से अकसर बातें करता था.’’

‘‘आप सौरभ को जानते हैं ‘नील चाचा’?’’

‘‘अरे, सौरभ को कौन नहीं जानता… वह बहुत ही प्यारा लड़का है.’’

‘‘वैसे क्या करते हैं वे सेना में?’’

इस बार ‘नील चाचा’ ने बहुत जोर से सोफिया को घूरा और कुछ देर तक वे उस के चेहरे को देखते रहे, फिर बोले, ‘‘तुम सोफिया ही हो न… सौरभ की मंगेतर?’’

‘‘हां,’’ सोफिया ने ‘नील चाचा’ को बहुत हैरत से देखा.

‘‘हां, तो तुम्हें सचमुच नहीं पता कि सौरभ सेना का जवान है. वह भारतीय सेना में अफसर है.’’

‘‘देखो, उस ने बताया था मुझे, लेकिन मैं भूल गई,’’ सोफिया को झिझक हुई. उसे अपने बरताव पर कोफ्त हो रही थी. नाहक ही उस ने ‘नील चाचा’ से सौरभ के बारे में पूछ लिया. आखिर क्या सोचेंगे वे…
‘‘मेरी कोई डाक आए तो बताइएगा,’’ सोफिया बोली.

‘‘जरूर,’’ ‘नील चाचा’ बोले.

सोफिया घर पहुंची तो वह सौरभ के बारे में ही सोचती रही. सेना में अफसर… और अपने आप को घोड़े की सेवा करने वाला एक मामूली सेवक बता रहा था. इंडियन आर्मी में अफसर और अपने आप को मामूली गाइड बता रहा था.

आने दो इस बार, फिर खबर लेती हूं. महीनों बात नहीं करूंगी. सम?ाता क्या है अपने आप को. बहुत स्मार्ट बनते हो, बच्चू. अब खत लिखेंगे तो जवाब भी नहीं दूंगी. इस बार मजा चखा कर दम लूंगी.

जब हम किसी से मिल नहीं पाते और उस से प्यार भी करते हैं, तो हालात बहुत मुश्किल हो जाते हैं. प्यार में पड़ी सोफिया का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वह सौरभ से मिल तो नहीं सकती थी, लेकिन मिलने की जो भी उम्मीद होती उस पर विचार करती. उस की गैरमौजूदगी में उस से लड़तीझगड़ती और फिर खुद अपनी बेबसी पर रोने भी लगती.

सोफिया का जो था, सौरभ ही था और वह तो बस यह चाहती थी कि किसी तरह उस से बात हो जाए. कहीं से उस का खत आ जाए. कहीं से उस की सलामती की खबर मिल जाए या कम से कम वह सौरभ को एक नजर भर देख ले.

इतने भर से ही सोफिया को संतोष हो जाता, लेकिन इस युद्ध ने सब मटियामेट कर दिया था. जो युद्ध में गए, वे वापस नहीं लौटे, लेकिन सोफिया का दिल कहता था कि उस का सौरभ एक दिन जरूर लौटेगा.

उस का सौरभ उस को जरूर मिलेगा.

सोफिया अपने सौरभ के प्यार में दिनोंदिन मानो गलती जा रही थी. उस का खिलाखिला रहने वाला चेहरा मुरझाने लगा था.

वह जाड़े की एक दोपहर थी, जिस दिन वह खत सोफिया को डाकिया थमा गया था. खत का मजमून देख कर वह वहीं ‘धम्म’ से आंगन में रखी कुरसी पर गिर पड़ी थी. पुरानी टूटी हुई कुरसी पर से संतुलन गड़बड़ाया और बेहोश हो कर वह गिरी तो टाइल्स से चोट लग गई.

2 महीने अस्पताल में बिताए. ठीक हुई तो सोफिया घर लौटी. सौरभ दुश्मनों से बहादुरी से लड़ता हुआ सियाचीन में शहीद हो गया था.

सोफिया की उम्र भी हो रही थी. मांपिताजी के बहुत जोर देने पर वह पहले तो 3-4 साल तक शादी के लिए तैयार ही नहीं हुई, लेकिन मांबाप की जिद के आगे उस की एक न चली और उस ने सेना के एक अफसर मेजर राजीव से शादी कर ली. अभी 4 साल पहले मेजर साहब भी नहीं रहे थे.

‘‘दादी, आप टीवी देख रही हैं या आराम करेंगी?’’ सुनील ने टोका तो सोफिया का ध्यान टूटा. घड़ी शाम के
5 बजा रही थी.

सुनील ने गलती से चैनल बदल दिया. टीवी पर एक धुन तैर रही थी, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा जैसे मैं करती हूं…’ Hindi Romantic Story

Story In Hindi: एक म्यान दो तलवार

Story In Hindi: ‘‘बिटिया नीलू, आज काम पर तू ही चली जाना. मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है,’’ बूढ़े थपरू ने अपनी बेटी से कहा.

‘‘ठीक है बाबा, मैं ही चली जाऊंगी,’’ नीलू ने खुश हो कर कहा.

थपरू चौधरी सुखराम के खेतों पर काम करता था. अगर किसी वजह से वह काम पर नहीं जा पाता था, तो अपनी बेटी नीलू को काम पर भेज देता था. इस से उस की मजदूरी नहीं कटती थी.

जटपुर के चौधरी दलितों पर अपना हक ऐसे ही सम?ाते थे, जैसे अंगरेज हिंदुस्तानियों पर. चौधरी जमीनों के मालिक थे. उन के पास धनदौलत की कमी न थी. जो दलित अपनी मेहनत, हुनर या फिर सरकार की रिजर्वेशन पौलिसी की मदद से नौकरी पा गए थे, वे शहरों में जा बसे थे. रहेसहे दलित आज भी चौधरियों के खेतों पर मजदूरी करने के लिए मजबूर थे.

चौधरी सुखराम 60 बीघे का अमीर काश्तकार था. किसी चीज की कोई कमी न थी. सबकुछ बढि़या चल रहा था. उस ने अपनी दोनों बेटियों का समय से ब्याह कर उन को ससुराल भेज दिया था. दोनों बेटों खगेंद्र और जोगेंद्र की भी अच्छे घरों में शादी कर दी थी. खगेंद्र की 2 बेटियां थीं, जो स्कूल जाने लायक हो गई थीं.

धनदौलत किसे नहीं रिझती है? खगेंद्र ने नीलू को पटा लिया. वह उस के चंगुल में फंस गई. धीरेधीरे उन के संबंधों की चर्चा पूरे गांव में फैल गई.

बूढ़े थपरू ने नीलू को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन इश्क का भूत जिस पर सवार हो जाए, तो फिर आसानी से नहीं उतरता. उस के जवाब को सुन कर बूढ़ा थपरू भी अवाक रह गया.

नीलू ने भयावह हकीकत उगलते हुए कहा, ‘‘बाबा, मुझे क्यों रोकते हो? गांव में हमारी जात की कितनी ही लोंडियां और औरतें हैं, जो चौधरियों के लड़कों से नैन मटक्का करती हैं और उन के पैसों पर मौज करती हैं. उन से संबंध बना कर नाक ऊंची कर के चलती हैं.’’

‘‘करमजली, धीरे बोल. कमबख्त, वे ऐसा करती हैं तो नाशपिटी तू भी ऐसा ही करेगी. बुढ़ापे में कुलच्छिनी मेरी नाक कटाएगी…’’ थपरू ने कहा.

इस पर नीलू खूब हंसी. उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘बाबा, दिखाओ तुम्हारी नाक कहां है? हमारी जात के लोग तो बिना नाक के पैदा होते हैं. नाक तो उन की कटती है जिन के नाक हो. नाक होती है चौधरियों की. उन की लड़की और औरत को हमारी जात का कोई लोंडा छू कर तो दिखाए…’’

‘‘चुप कर बेहया,’’ थपरू बोला.

‘‘मैं कोई तेरी गुलाम न हूं. कमा के लाती हूं और तब तेरा और अपना पेट भरती हूं. तेरे तो दोनों मुस्टंडे बेटे ब्याह कर के तुझ से अलग हो गए और तुझे मेरी छाती पर मरने के लिए छोड़ गए. अब मैं चाहे जो करूं, मुझे रोकने वाला कौन होता है. ले रोटी खा,’’ नीलू ने खाट पर थाली पटकते हुए कहा.

बूढ़ा थपरू नीलू की बात सुन कर सिहर गया. वह चुपचाप दाल के पानी में रोटी भिगो कर खाने लगा. नीलू गाय का दूध निकालने चली गई.

बूढ़ा थपरू सोच रहा था, ‘काश, मैं ने नीलू की शादी बेटों से पहले कर दी होती, तो आज यह दिन न देखना पड़ता.’

उधर नीलू को ले कर खगेंद्र के घर में भी कोहराम मचा हुआ था. खगेंद्र की पत्नी अनीता को यह बरदाश्त नहीं था कि उस का पति नीलू से किसी तरह का कोई संबंध रखे, लेकिन खगेंद्र के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

शादी के 12 साल बाद भी अनीता खगेंद्र को बेटे का सुख नहीं दे पाई थी. और बच्चे जनने से उस ने मना कर दिया था. वह पढ़ीलिखी सम?ादार औरत थी. उस का कहना था कि बेटाबेटी एकसमान होते हैं. छोटा परिवार, सुखी परिवार.

लेकिन खगेंद्र के अंदर की जमींदारों वाली पुरानी सोच जोर मार रही थी, जहां वंश चलाने के लिए बेटा होना जरूरी था. वह नीलू को रखैल बना कर उस से बेटे का सुख चाहता था.

उस का बाप सुखराम और उस की मां नंदो भी उस के साथ थी. वे भी चाहते थे कि खगेंद्र अपनी इच्छा पूरी करे, लेकिन उस का भाई जोगेंद्र इस के सख्त खिलाफ था.

जब बखेड़ा बढ़ गया तो इस मामले को ले कर एक दिन गांव में पंचायत हुई. खगेंद्र की पत्नी अनीता ने साफसाफ कह दिया, ‘‘पंचो, कान खोल कर सुन लो… एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती हैं. अगर इन्हें उस नीलू के साथ रहना तो खुशी से रहें, मेरे हिस्से की जमीनजायदाद मुझे दे दी जाए. मैं उसी से अपनी बेटियों और अपना पेट पाल लूंगी.’’

खगेंद्र और सुखराम को इस में कोई एतराज नहीं था. वे इस के लिए राजी हो गए. पंचायत में हुए समझौते के मुताबिक पहले जमीन 3 हिस्सों में बंटी. 25-25 बीघा जमीन खगेंद्र और जोगेंद्र के हिस्से में आई और 10 बीघा जमीन सुखराम को मिली.

खगेंद्र की जमीन के 2 हिस्से हुए. आधी जमीन यानी साढ़े 12 बीघा जमीन अनीता के हिस्से में आई. बाकायदा पंचायत के समझौते के मुताबिक सारी जमीनों के बैनामे लिखे गए, जिस से आने वाले समय में कोई झगड़ा न हो. अनीता और खगेंद्र का तलाक हो गया.

खगेंद्र ने नीलू से कोर्ट मैरिज कर ली और वह उस के साथ शहर में रहने लगा. उस के मांबाप भी उस के साथ आ गए.

गांव में रहने और शहर में रहने में जमीनआसमान का फर्क होता है. शहर में रह कर गांव में जा कर खेती करना खगेंद्र के बस की बात न थी, इसलिए उस ने और सुखराम ने अपनी जमीन बंटाई पर उठा दी.

बंटाईदार सालभर में पैसा पहुंचाता तो कुछ दिन तो मौसम बासंती रहता. खगेंद्र और नीलू खूब मौज उड़ाते. सुखराम भी चौधरी बना घूमता. अंगरेजी शराब की दुकान के चक्कर लगाता.

खगेंद्र भी खाली था. वह दोस्तों के साथ खूब पार्टी करता और फिर पैसा खत्म होते ही कर्जा लेने की शुरुआत होती.

लेकिन ऐसा कब तक चलता और कर्जा पहाड़ सा होता गया. जमीन का एक टुकड़ा बेचने के सिवा कोई रास्ता न था. जमीन बेचने का रोग एक बार लग जाए, तो फिर छूटता नहीं. पहले सुखराम की जमीन बिकी, फिर धीरेधीरे खगेंद्र के खूड़ बिकने लगे.

उधर सब से बड़ी चिंता की बात यह थी कि नीलू के बेटा छोड़ बेटी भी पैदा नहीं हो रही थी. खगेंद्र ने नीलू का बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. बेटे से वंशबेल चलाने की बात तो बहुत दूर जमीन, जायदाद, जमींदारा सब जाता रहा.

सुखराम की चौधराहट की चूल हिल गई. वह एक आरा मशीन पर चौकीदार हुआ. उसे बहुत पछतावा हुआ कि उस के गलत फैसले से सबकुछ बिखर गया. उसे खगेंद्र को रोकना चाहिए था, लेकिन पुरानी जमींदारी सोच उसे ले डूबी.

खगेंद्र कोई छोटा काम करने से हिचकता था. अभी तक वह शान से जमींदारों वाली जिंदगी जीता आ रहा था, अब पेट पालने के लिए क्या करे, सबकुछ तो वह गंवा बैठा था.

तब एक दिन नीलू ने उसे खरीखोटी सुना दी, ‘‘बड़ा शौक पाल रखा था दूसरी औरत रखने का. अब कुछ करने के नाम पर मां मरी जाती है.’’

ऐसा कब तक चलता. एक दिन खगेंद्र की लाश नहर में तैरती मिली. किसी ने इसे खुदकुशी का मामला बताया, तो किसी ने नीलू की करतूत. गरीब आदमी का मुकदमा कौन लड़ता है. जोगेंद्र ने खगेंद्र का अंतिम संस्कार कर पल्ला झाड़ लिया.

सुखराम पहले ही अपने बेटे खगेंद्र से अलग रहने लगा था. नीलू दूसरों के घरों में झाड़ूपोंछा कर गुजरबसर करने लगी. फिर एक बूढ़े सेठ ने उसे अपनी सेवा में रख लिया. उस के बेटे विदेश में रहते थे और उस की कोई परवाह नहीं करते थे.

बूढ़े सेठ ने बेटों से चिढ़ कर और नीलू की सेवा से खुश हो कर अपनी बहुत सी जायदाद उस के नाम कर दी.

एक दिन बूढ़ा चल बसा. नीलू के दिन सुखचैन से कटने लगे. लोग उसे अब ‘सेठानी’ कह कर पुकारते हैं. Story In Hindi

Hindi Family Story: अपना सा घर

Hindi Family Story: ‘कुछ सुना तुम ने?’

‘क्या हुआ है?’

‘कामिनी ने अपने किराएदार विवेक से शादी कर ली.’

‘यह तो एक दिन होना ही था.’

‘यह सब उस की मां की सोचीसमझी चाल है.’

‘अरे, किराएदार होने के नाते उस ने इतनी छूट दे रखी थी.’

‘यों कहो कि दहेज बचा लिया.’

‘हां, दहेज तो बचा लिया, सो बचा लिया. मगर एक मां को इतनी खुली छूट नहीं देनी चाहिए थी.’

‘अरे, जवान बेटी के होते उस ने किसी कुंआरे को मकान किराए पर दिया ही क्यों?’

‘फिर उस ने किराए की कीमत ब्याज समेत वसूल कर ली.’

पूरे महल्ले में यही सब चर्चा चल रही थी.

रमा देवी विधवा थीं. उन के पति ज्वालाप्रसाद सेल्स टैक्स अफसर थे. जब वे जिंदा थे, तभी से उन्होंने रहने के लिए बड़ा मकान बना लिया था. रिटायरमैंट के एक साल के बाद उन की मौत हो गई. उन के 2 बेटे प्रदीप और नवीन सरकारी नौकरी में अच्छे पदों पर थे.

बड़ा बेटा प्रदीप जबलपुर में असिस्टैंट इंजीनियर था, तो छोटा बेटा नवीन सैंट्रल बैंक औफ इंडिया गुना में मैनेजर था. दोनों की शादी कर उन की गृहस्थी बसा दी गई. वे अपने बीवीबच्चों के साथ मजे में थे. बड़ी बेटी करुणा की शादी कर के वे निश्चिंत हो गए थे.

कामिनी सब से छोटी बेटी थी. वह अभी तक कुंआरी थी, जो कालेज में पढ़ रही थी. मकान का कुछ हिस्सा रमा देवी ने किराए पर दे रखा था. एक कमरा ऊपर वाला अभी 2 महीने पहले ही खाली हुआ था, इसलिए उस के लिए कोई किराएदार चाहिए था, जिस की खोजबीन जारी थी. आखिरकार किराएदार की खोज पूरी हुई.

उस दिन भरी दोपहर में ऐसे ही कामिनी ने दरवाजा खोला, तो सामने एक नौजवान को खड़ा पाया. दोनों की नजरें मिलीं. नौजवान कामिनी को एकटक देखता जा रहा था.

तब कामिनी संकोच से शरमा गई. वह बोली, ‘‘कहिए?’’

वह नौजवान बोला, ‘‘सुना है, आप के यहां कोई कमरा खाली है और उसे किराए पर देना है?’’

‘‘आप ने सही सुना है. क्या आप किराएदार बन कर आए हैं?’’

‘‘हां,’’ उस नौजवान ने कहा.

‘‘भीतर आइए,’’ कामिनी ने जब यह कहा, तब उस ने नौजवान के चेहरे को गौर से देखा, तो पाया कि वे तो उसी के कालेज के नए असिस्टैंट प्रोफैसर विवेक शर्मा हैं.

कामिनी उन्हें सोफे पर बैठा कर अंदर चली गई. थोड़ी देर बाद रमा देवी आ कर बोलीं, ‘‘कहिए मिस्टर, कमरा देखने आए हो?’’

‘‘जी हां अम्मांजी,’’ उस नौजवान ने हाथ जोड़ कर उठते हुए कहा.

‘‘फिलहाल तो एक कमरा खाली है, उसे किराए पर देना है. मगर किराए पर देने से पहले मैं आप की जानकारी लेना चाहती हूं,’’ रमा देवी ने कहा.

‘‘ले लीजिए अम्मांजी, मैं देने को तैयार हूं.’’

‘‘नाम क्या है? करते क्या हो? कहां के रहने वाले हो?’’ जब रमा देवी ने एकसाथ कई सवाल पूछ लिए, तब वह नौजवान बोला, ‘‘अम्माजी, मेरा नाम विवेक शर्मा है. मैं कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर हूं और उज्जैन का रहने वाला हूं.

‘‘जाति से ब्राह्मण हो. मगर यह बताओ, तुम शादीशुदा हो या कुंआरे?’’ रमादेवी का अगला सवाल सुन कर विवेक शर्मा कुछ पल तक नहीं बोला.

तब रमा देवी ने फिर पूछा, ‘‘तुम ने बताया नहीं.’’

‘‘जी अम्मांजी, अभी कुंआरा हूं.’’

‘‘तब तो कमरा नहीं मिलेगा,’’ रमा देवी इनकार करते हुए बोलीं.

‘‘मेरे साथ मेरी अम्मां भी रहेंगी.’’

‘‘ठीक है, तब तो चलेगा. आइए, चल कर कमरा देख लीजिए,’’ कह कर रमा देवी विवेक को कमरा दिखाने ऊपर ले गईं.

थोड़ी देर बाद वे दोनों लौटे, तब तक कामिनी चाय ला चुकी थी.

चाय पीते हुए विवेक ने कहा, ‘‘मुझे कमरा पसंद है. किराया बता दीजिए.’’

‘‘मगर मैं अनजान पर कैसे भरोसा कर लूं. किसी की गवाही चाहिए,’’ रमा देवी की यह बात सुन कर विवेक कोई जवाब नहीं दे पाया. अभी 2 महीने पहले ही वह ट्रांसफर हो कर यहां आया है. गवाही किस से दिलवाए, यह समस्या थी.

तभी रमा देवी उसे चुप देख कर बोलीं, ‘‘जवाब नहीं दिया.’’

‘‘अभी मैं इस शहर में नयानया आया हूं…’’ विवेक ने कहा, ‘‘मगर आप मुझ पर विश्वास रखिए, मैं आप को किराया हर महीने दूंगा. आप किराया बता दीजिए.’’

‘‘किराया 1,500 रुपए लगेगा,’’ रमा देवी बोलीं, ‘‘लाइट और पानी का खर्च अलग से देना होगा. मंजूर हो तो आ कर रह सकते हो.’’

‘‘आप एक छोटे से कमरे का किराया ज्यादा बता रही हैं,’’ विवेक बोला.

‘‘किराया तो यही लगेगा. इस से एक पैसा भी कम नहीं होगा…’’ रमा देवी अपना फैसला सुनाते हुए बोलीं, ‘‘रहना है तो रहो. हां, एक महीने का किराया एडवांस देना होगा.’’

‘‘ठीक है, मुझे मंजूर है,’’ कह कर विवेक ने कामिनी की तरफ देख कर अपने हथियार डाल दिए. फिर रमा देवी के हाथों में एडवांस थमाते हुए वह बोला, ‘‘लीजिए यह एडवांस किराया. मकान में सब तरह की सुविधाएं हैं, इसलिए महंगा किराया भी चलेगा.’’

इतना कह कर विवेक हाथ जोड़ कर बाहर निकल गया. एक बार उस ने कामिनी की ओर देखा, फिर कामिनी अपनी मां से बोली, ‘‘मम्मी, ये तो वही सर हैं, जो हमारे कालेज में आए हैं.’’

‘‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’ रमा देवी जरा डांटते हुए बोलीं, ‘‘मगर है बड़ा समझदार. मैं ने उसे ब्राह्मण समझ कर किराए पर रखा है.’’

विवेक पहली तारीख को रमा देवी के मकान में किराएदार बन कर आ गया और थोड़े दिनों में ही उस ने रमा देवी का विश्वास जीत लिया. अब उस का ज्यादातर समय रमा देवी के यहां बीतने लगा. वह खुल कर बातें करने लगा. अगर कोई बाहरी आ जाए तो विवेक को किराएदार नहीं, बल्कि परिवार का एक जिम्मेदार सदस्य ही समझता था.

जब उन के बीच पारिवारिक संबंध बन गए, तब विवेक और कामिनी के बीच संकोच की दीवार भी टूट गई. दोनों के बीच खुल कर बातें होने लगीं. विवेक से पढ़ने के बहाने कामिनी बिना किसी रोकटोक के उस के कमरे में घंटों बैठी रहती थी.

कभीकभार विवेक कामिनी को घुमाने ले जाने लगा, जबकि रमा देवी ने कभी इस का विरोध नहीं किया. मगर धीरेधीरे यह बात महल्ले और रिश्तेदारों में फैलने लगी. विवेक किराएदार बन कर जरूर आया है, मगर अपने घर जमाई बनने का देख रहा है. अगर कोई अपरिचित उन्हें साथसाथ देख लेते थे, तब वे विवेक को कामिनी का पति समझते थे.

‘रमा देवी ने इन दोनों को इतनी छूट दे रखी है कि दोनों बेशर्मी से घूमते है.’

‘कामिनी तो पढ़ने के बहाने प्रोफैसर के कमरे में बैठ कर प्रेम गीत लिख रही है.’

‘देखो, रमा देवी इतनी अंधी हैं कि उसी के घर में प्रोफैसर रंगरेलियां मना रहा है. देखना एक दिन कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा. तब रमा देवी की आंखें खुलेंगी.’

ये सारी बातें रमा देवी के कानों में जरूर पड़ती थीं, मगर उन्होंने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया.

जब चर्चा ज्यादा होने लगी तब रमा देवी की खास सहेली कमला देवी आ कर बोलीं, ‘‘ऐ रमा, मैं क्या सुन रही हूं…’’

‘‘क्या सुन रही है कमला?’’ रमा देवी नाराजगी से बोलीं.

‘‘अरे वह प्रोफैसर, कामिनी के साथ ज्यादा ही दिख रहा है और तू अंधी बनी हुई है.’’

‘‘कमला, यह तू महल्ले वालों की भाषा बोल रही है.’’

‘‘क्या मतलब है तेरा?’’

‘‘मेरा मतलब यह है कि तू भी वही कह रही है, जो पूरा महल्ला कह रहा है.’’

‘‘अरे, महल्ले ने जो देखा है, वही मैं ने भी देखा है.’’

‘‘और तू महल्ले वालों की हां में हां मिला रही है.’’

‘‘महल्ले वालों की हां में हां नहीं मिला रही हूं, बल्कि इन आंखों से देखा है, इसलिए कह रही हूं…’’ कमला देवी बोलीं, ‘‘मेरा कहना मान, उस प्रोफैसर को निकाल दे. एक दिन वह कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा.’’

‘‘मगर तुम लोगों में से किसी ने भी प्रोफैसर को नहीं समझा,’’ रमा देवी बचाव करते हुए बोलीं.

‘‘अच्छा तो तू उसे पूरी तरह समझ चुकी है. बता क्या समझी तू? जवाब दे? चुप क्यों है? इस प्रोफैसर पर तू घमंड कर रही है, देखना एक दिन कामिनी को ले कर भाग जाएगा. तब तेरी यह अंधी आंखें खुलेंगी… इसलिए कहती हूं कि तू प्रोफैसर से कमरा खाली करा कर निकाल दे.’’

‘‘मगर कमला, कामिनी मेरी बेटी है और उस की मुझे भी चिंता है.’’

‘‘क्या खाक चिंता है तुझे. चिंता होती तो जवान बेटी के होते उस प्रोफैसर को कमरा नहीं देती.’’

‘‘अरे, मैं ने कमरा दे दिया तब तेरे पेट में क्या मरोड़ उठ रही है?’’

‘‘मैं तेरी सहेली हूं, इस नाते कह रही हूं…’’ एक बार फिर कमला देवी समझाते हुए बोलीं, ‘‘अगर तेरी समझ में नहीं आता है. तो तू जान तेरा काम जाने. अब मैं कभी नहीं कहूंगी. और दे अपनी बेटी को मनचाही छूट.

‘‘अभी मेरी बात तेरी समझ में नहीं आ रही है. जब पानी सिर से गुजर जाएगा, तब मेरी बात तेरे समझ में आएगी. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. अच्छा चलती हूं,’’ इतना कह कर कमला देवी नाराज हो कर वहां से चली गईं.

कामिनी और विवेक का प्यार अब तक पूरी तरह परवान चढ़ चुका था, मगर रमा देवी की तब भी आंखें नहीं खुलीं. लोगों में अब चर्चा बहुत गरम चलने लगी कि रमा देवी ने खुली छूट दे रखी है, तभी तो वे दोनों साथसाथ दिखाई देते हैं. कालेज में गुरुशिष्य का नाता घर आ कर बदल जाता है.

कामिनी विवेक के स्कूटर पर ही बैठ कर कालेज आती जाती है. महल्ले वाले अपनी निगाह से देख रहे थे और तरहतरह की बातें कर रहे थे.

यह बात रिश्तेदारों में भी पहुंच गई. वे भी मौका आने पर टिप्पणी करने से नहीं छूटते थे, सारा कुसूर रमा देवी को दे रहे थे. मगर रमा देवी की हालत यह थी कि जब भी वे अपने बेटों से कामिनी के लिए लड़का देखने की बातें करतीं, तब वे उन्हें उलटा कहते कि अम्मां तुम ही ढूंढ़ लो. हमें नौकरी के चलते फुरसत नहीं है.

इस तरह दोनों बेटे हाथ झटक लेते थे. विधवा रमा देवी ने कई जगह बात चलाई, मगर कुछ जगह दहेज ज्यादा मांगने के चलते बात टूट जाती, और कुछ को रमा देवी ने इसलिए खारिज कर दिया कि वे कोई नौकरी व कामधंधा नहीं करते थे. कामिनी को वे ऐसे घराने में ब्याहना चाहती थीं कि वह सुख से रह सके.

ऐसे में विधवा रमा देवी ने कहांकहां दौड़ नहीं लगाई. आगेपीछे उस की शादी तो करना ही है, इसी वजह से कामिनी और विवेक को उस ने ज्यादा छूट दे रखी थी.

आखिर वही हुआ, जिस की उम्मीद थी. कामिनी और विवेक ने गुपचुप तरीके से कोर्टमैरिज कर ली. शादी कर वे उज्जैन चले गए. तब यह बात सारे महल्ले के साथ रिश्तेदारों में भी फैल गई. रमा देवी जो चाहती
थीं, वह हो गया. मगर अब रिश्तेदारों व महल्ले वालों के ताने भी वे सुन रही थीं.

जब रमा देवी ने इस बात की खबर अपने दोनों बेटों को दी, उन्होंने भी यही राय दी कि हमें भी यह रिश्ता मंजूर है. कामिनी ने जिस से भी शादी की, वह कमाऊ है. तुम भी तो कमाऊ दामाद चाहती थीं. रहा रिश्तेदारों और महल्ले वालों का तो थोड़े दिनों तक कह कर वे भी चुप हो जाएंगे. Hindi Family Story

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