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Social Story: सोनपुर मेला-दिन पशुओं का रात लड़कियों की

Social Story: रात के तकरीबन 10 बज चुके हैं. गंगा और गंडक के संगम पर बहती हवा में ठंडक है, पर इस ठंडक के भीतर एक अजीब सी बेचैनी तैर रही है. चांद आसमान में अपने पूरे शबाब के साथ मौजूद है, लेकिन लगता है कि उसे भी अंदाजा है कि उस के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसे उजाला भी छूने से डरता है.

सोनपुर मेले का मैदान दूरदूर तक फैला हुआ है. दिन में जहां यही जगह पशुओं की आवाजों से भरी रहती है, वहीं रात का रंग कुछ और ही होता है. आवाजें बदल जाती हैं, ताल बदल जाती है और लोगों की भीड़ किसी और ही चाह में इकट्ठा होने लगती है. ऐसा लगता है जैसे 2 मेलों की 2 दुनिया एक ही धरती पर उगती हैं… एक दिन में और दूसरी रात में. दिन का मेला पशुओं का है, रात का मेला लड़कियों का और इन दोनों दुनिया के बीच कहीं, एक रोशनी से भरा थिएटर खड़ा है, जिस के भीतर कलाकार हैं और बाहर दर्शक. पर जिस दुनिया में वे रहते हैं, वहां कलाकार होना ‘सुख’ नहीं, बल्कि ‘जद्दोजेहद’ का दूसरा नाम है.
सोनपुर, जहां दिन में व्यापार होता है, बूढ़े हाथी बिकते हैं, किसान अपनी जरूरतें खरीदते हैं, व्यापारी अपनी दुकानें सजाते हैं, वहीं रात होते ही एक दूसरी दुनिया उभर आती है. भीड़ के बीच से छनती तेज रोशनियां, लाउडस्पीकरों पर बजते मिक्स गीत, और हर मंच की ओर बढ़ती हजारों आंखें पर इन में से किसी को भी अंदाजा नहीं है कि इस चकाचौंध के पीछे क्या कीमत चुकानी पड़ती है.

आंखों में बसती थकान, मेकअप छिपा नहीं सकता स्टेज पर खड़ी हर लड़की के चेहरे पर मेकअप की कई परतें होती हैं, पर जिंदगी की दरारें इन परतों से नहीं छिपतीं. एक लड़की ने बात ही बात में कहा, ‘‘कपड़ा जितना छोटा, उतना नोट ज्यादा. पूरा शरीर तोड़ डालते हैं पर कहते हैं कि ‘आखिरी तक मुसकराना’. हम भी मुसकराते हैं, क्योंकि रोना किसी को पसंद नहीं आता. ‘‘कपड़े जितने छोटे होते हैं, लोग उतना पैसा लुटाते हैं. हमारी आंखों का रंग भी असली नहीं रहता. स्टेज पर जाने से पहले नीला लैंस लगाती हूं. पीरियड में भी नाचना पड़ता है. लोग कहते हैं कि हम नाचते हैं, क्योंकि हमें यही आता है पर किसी ने यह नहीं पूछा कि हम ने क्या खो कर यह सीखा?’’ मेकअप कर रही 17 साल की एक लड़की बोली, ‘‘हम तो गांव के मेले में नाचते थे. यहां आ गए तो पता चला कि यहां नाच नहीं, तन दिखाना ज्यादा जरूरी है. पहली बार बहुत रोई थी पर घर में खाने को कुछ नहीं था.’’

उस लड़की की आवाज में कोई ड्रामा नहीं, कोई शिकायत नहीं. बस, एक लंबा जमा हुआ सच है. ऐसा सच, जिसे मेले की भीड़ देखने नहीं आती, पर उस की बदौलत ताली जरूर बजाती है. जहां जानवरों का मेला लगता है, वहां लड़कियों का नाच भी दिखाया जाता है. सोनपुर मेला दुनिया का सब से बड़ा पशु मेला है. यह बात हर गाइड, हर पंपलैट, हर इतिहासकार लिखता है और यह सच भी है. दिन में तंबुओं में बंधे हाथी, रस्सी से बंधे घोड़े, चमकदार काठी वाले ऊंट और अनगिनत पालतू जानवरों को देखने हजारों लोग आते हैं. किसान उन का दांत देखते हैं, चाल देखते हैं, वजन देखते हैं, बरताव देखते हैं, लेकिन जैसे ही शाम ढलती है, वही मैदान, वही तंबू किसी और रंग में रंग जाते हैं.

दिन में जहां जानवर बिकते हैं, रात में वहां लड़कियों के नाच बिकते हैं. मजबूरी और जिंदगी की कीमत सोनपुर मेले या किसी दूसरे मेले में नाचने वाली लड़कियों की माली हालत आमतौर पर बेहद कमजोर होती है. ज्यादातर लड़कियां गरीबी, अनाथालय या टूटे परिवार से आती हैं. उन के पास औप्शन बहुत सीमित होते हैं, जैसे स्कूल छोड़ना, घर चलाना या परिवार का पालनपोषण करना. यही वजह है कि वे थिएटर में काम करने को मजबूर होती हैं. हालांकि स्टेज पर उन के नाच के बदले उन्हें पैसे मिलते हैं, लेकिन वह रकम उन की मेहनत, थकान और जोखिम के मुताबिक नहीं होती.

कभीकभी उन्हें सिर्फ खानेपीने, सफर और छोटेछोटे खर्चों के लिए ही भुगतान मिलता है. उन के लिए स्टेज एक ऐसा व्यवसाय है, जो आज जीविका दे सकता है, पर अच्छा भविष्य नहीं. थिएटर मालिकों का रवैया थिएटर मालिक आमतौर पर इन लड़कियों को एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखते हैं न कि इनसान के रूप में. स्टेज पर उन की चमक, थिरकन और आकर्षण ही उन की कीमत तय करती है. कुछ मालिक कलाकारों की सिक्योरिटी, भोजन और सेहत का ध्यान रखते हैं, पर ज्यादातर केवल कमाई और दर्शकों की तादाद पर फोकस करते हैं. लड़कियों के दर्द, सेहत और मानसिक हालात को नजरअंदाज किया जाता है. अगर कोई प्रदर्शन में नाकाम होती है या कमजोर पड़ती है, तो उसे धमकाया जाता है, काम से हटा दिया जाता है या अगले शो में जगह नहीं दी जाती है.

इज्जत की हिफाजत, सब से कमजोर कड़ी थिएटर की लड़कियों के लिए सब से बड़ा खतरा उन की इज्जत का होता है. स्टेज पर उन के शरीर को नजरों के सामने लाया जाता है और कई बार दर्शक की छेड़छाड़, गालीगलौज, वीडियो बनाना या स्टेज के पीछे दबाव डालना आम बात हो जाती है. सिक्योरिटी का उपाय तकरीबन नाममात्र होता है और लड़कियां अपनी हिफाजत के लिए अकेली रहती हैं. अकसर वे अपनी इज्जत के लिए चुप रहने को मजबूर होती हैं, क्योंकि विरोध करने पर नौकरी या आमदनी छिन सकती है.
समाज में नजरअंदाज होना समाज में इन लड़कियों की हालत बहुत बुरी है. लोग उन की जद्दोजेहद और मेहनत को नहीं देखते, बस उन्हें ‘नाचने वाली’ के रूप में देखते हैं.

यह पेशा उन्हें इज्जत देने के बजाय बदनाम कर देता है. उन के पास शादी, स्थायी संबंध या सामाजिक सुरक्षा के मौके भी अकसर सीमित हो जाते हैं. समाज उन की मजबूरी को नजरअंदाज करता है और

Social Story: एक क्लिक पर खत्म कमाई

Social Story: कोई कहता है, ‘‘बैंक खाता बंद हो जाएगा.’’
कोई कहता है, ‘‘लोन की वसूली होगी.’’
कोई कहता है, ‘‘पुलिस केस हो गया है.’’
कोई कहता है, ‘‘गिरफ्तार कर लेंगे.’’


और इस डर में अच्छेअच्छों की सम?ा काम नहीं करती. बदलती दुनिया में मोबाइल फोन अब केवल एक गैजेट नहीं रहा, बल्कि यह हमारी जेब में रखा एक पूरा बैंक, पहचानपत्र, दफ्तर, फोटो अलबम, पर्स और संचार का साधन बन चुका है, लेकिन इसी बदलाव ने अपराधियों के लिए भी एक नया दरवाजा खोल दिया है.


आज मोबाइल पर एक गलत क्लिक से आप अपनी पूरी जमापूंजी खो बैठते हैं. नौजवान, जो डिजिटल दुनिया को सब से ज्यादा सम?ाते हैं, वे भी अपराधियों की तकनीक देख कर भरम में पड़ जाते हैं और मिडिल क्लास लोग, जिन के लिए हर पाई की अहमियत बहुत ज्यादा होती है, उन के लिए डिजिटल ठगी सिर्फ माली नुकसान नहीं है, बल्कि यह इज्जत, आत्मविश्वास और मानसिक शांति की दुश्मन बन जाती है.
भारत में रोजाना हजारों लोग डिजिटल ठगी के शिकार होते हैं. हम अखबार में पढ़ते हैं :


महिला के खाते से 85,000 की ठगी. बुजुर्ग से केवाईसी अपडेट के नाम पर पैसा उड़ाया. फर्जी पुलिस अफसर बन कर नौजवान से 3 लाख की ठगी. ये खबरें तो हम पढ़ लेते हैं, पर इन में हमें पीडि़तों का दर्द नहीं दिखता. बिहार के सहरसा जिले की 40 साल की शशि देवी को सुबहसुबह मोबाइल फोन पर मैसेज आया कि आप का बैंक खाता केवाईसी अपडेट न होने के चलते बंद किया जा रहा है. मैसेज के साथ एक लिंक भी था. शशि देवी ने उस लिंक पर क्लिक किया. मोबाइल पर एक परिचित जैसा फार्म खुला… नाम, खाता संख्या, पता.


उन्हें लगा कि यह सामान्य प्रक्रिया है. उन्होंने फार्म भर दिया. इस के 2 घंटे बाद बैंक से फोन आया कि आप के खाते से 97,500 रुपए निकाले गए हैं. शशि देवी का पहला वाक्य था कि हम तो खाते में इतने पैसे होना भी नहीं जानते थे. इतना पैसा हम ने 10-10 रुपए बचा कर जमा किया था. डिजिटल दुनिया का
असली सच लोग तकनीक नहीं, डर से हारते हैं. हर डिजिटल अपराध में एक बात कौमन होती है कि अपराधी डर पैदा करता है. छपरा, बिहार के शिवनंदन प्रसाद, जो पूरी जिंदगी पोस्ट औफिस में लोगों के पैसे संभालते रहे, एक दिन खुद ठगी का शिकार हो गए. उन्हें फोन आया कि आप का पैंशन कार्ड ब्लौक हो गया है. वैरिफिकेशन कराइए, नहीं तो अगले महीने पैंशन नहीं आएगी.


शिवनंदन ने कहा कि बाबू, मैं बूढ़ा आदमी हूं, बताओ क्या करना है? उन्होंने ठग के कहने पर एक ऐप डाउनलोड किया और कुछ ही मिनट में उन के खाते से डेढ़ लाख से ज्यादा रुपए गायब हो गए.
शिवनंदन का दुखद वाक्य यह था कि मैं तो जिंदगीभर लोगों को सम?ाता रहा कि कागज सही रखो, अब मु?ो कौन सम?ाएगा कि डर क्या होता है? पहचान का गलत इस्तेमाल अपराधी अब सिर्फ पैसे नहीं, चेहरा और आवाज भी चुराते हैं. डिजिटल अपराध का सब से डरावना पक्ष है पहचान की चोरी. आज अपराधियों के हाथों में ऐसे उपकरण हैं, जिन से आप की फोटो एडिट की जा सकती है. आप की आवाज क्लोन की जा सकती है. आप की डीपफेक वीडियो बनाई जा सकती है. किसी भी पहचान को मिनटों में बदला जा सकता है. यह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मानसिक आतंक है.


पटना, बिहार में 22 साल की रीता को एक दिन व्हाट्सऐप पर फोन आया. लोन ऐप के गुंडे कह रहे थे कि आप ने लोन लिया है, वापस कीजिए. नहीं तो आप की अश्लील फोटो बना कर सब को भेज देंगे.
रीता सदमे में आ गई. उस ने कहा कि मैं ने कोई लोन नहीं लिया. लेकिन अपराधियों ने 10 मिनट में उस की फोटो को विकृत कर के आधे से ज्यादा दोस्तरिश्तेदारों को भेज दिया. रीता ने रोते हुए कहा कि पैसा तो नहीं गया, लेकिन मेरी इज्जत, मेरा आत्मविश्वास सब चला गया. औनलाइन कस्टमर केयर,
बड़ा धोखा लोग गूगल पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं और सब से ऊपर दिखाई देता है फर्जी नंबर, जिसे अपराधियों ने विज्ञापन दे कर ऊपर चढ़ाया होता है. नवादा के एक टीचर राजेश कुमार एक छोटा सामान लौटाने के लिए फ्लिपकार्ट कस्टमर केयर खोजते हैं. पहले नंबर पर फोन किया. सामने से आवाज आई कि आप का रिफंड शुरू कर रहे हैं, स्क्रीन शेयरिंग औन कीजिए.


राजेश ने सोचा कि कस्टमर केयर वाला ही तो है. उन्होंने स्क्रीन शेयर किया और 2 लाख, 70,000 रुपए गायब. राजेश बोले कि गलती मेरी नहीं है. गूगल मु?ो सही नंबर क्यों नहीं दिखाता? ठग बन बैठे हैं नए ‘जमींदार’ बक्सर के रामचरण को कोई बिजली महकमे का आदमी बन कर ठग काल करता है कि हम कनैक्शन काट देंगे, तुरंत अपडेट कराइए. फिर ठग एक ऐप डाउनलोड कराता है. रामचरण कहता है कि हम पढ़ेलिखे नहीं है. हमें क्या करना है? ठग कहता है कि बस उंगली स्क्रीन पर रखें और ऐसा करते ही 68,000 रुपए गायब.


रामचरण की पत्नी रोते हुए कहती है कि हमारे घर में तो कभी 68,000 रुपए एकसाथ नहीं रहे. जो भी था, उसी ठग ने ले लिया. फर्जी पुलिस, सब से बड़ा डर आजकल अपराधी खुद को पुलिस अफसर, साइबर सैल प्रमुख, एनआईए अफसर, सीबीआई अफसर, इनकम टैक्स अफसर, कोर्ट का क्लर्क बता कर फोन करते हैं. वे वरदी में वीडियो काल भी कर देते हैं. दिल्ली के करनदीप को वीडियो काल पर 2 आदमी वरदी में दिखे. उन्होंने कहा कि आप के नाम पर ड्रग्स वाला पार्सल पकड़ा गया है. तुरंत जुर्माना भरिए.
करनदीप डर के मारे कांपने लगा. उस ने 4 लाख रुपए भेज दिए. बाद में पता चला कि वह वीडियो डीपफेक थी.


लोग क्यों फंसते हैं अपराधी साधारण नहीं होते. उन के पास पूरी टीम होती है जैसे मनोविज्ञान सम?ाने वाले, स्क्रिप्ट लेखक, टैक्निकल एक्सपर्ट, काल सैंटर चलाने वाले, डाटा बेचने वाले. वे लोगों की कमजोरी जानते हैं. डर, लालच, शर्म, अनजान तकनीक, भरोसा जीतना, तेजी से बात करना, घबराहट पैदा करना… ठग यही खेल खेलते हैं. सिस्टम है कमजोर साइबर ठगी के ज्यादातर मामलों को पुलिस वाले गंभीरता से लेते हैं, पर समस्या यह है कि अपराधी दूसरे राज्यों में होते हैं. फर्जी बैंक खाते, फर्जी सिम, वीपीएन लोकेशन… और मिनटों में पैसा विदेश भेजना. केस करोड़ों में दर्ज, लेकिन रिकवरी 5 से 10 फीसदी.
एक साइबर अफसर ने कहा कि अपराधी हर महीने तकनीक बदल देता है. पुलिस के पास उतने संसाधन नहीं हैं.


अपराधियों का इकोनौमिक मौडल डिजिटल ठगी का खेल एक उद्योग की तरह चलता है. कमाई का तरीका. एक काल सैंटर, 15-20 मुलाजिम. रोज तकरीबन 1000 काल. 40-50 लोग फंसते हैं. रोजाना कमाई 10 लाख से 50 लाख. महीने में करोड़ों रुपए. पैसे नेपाल, बंगालदेश, दुबई, चीन तक भेजे जाते हैं.
राजस्थान की एक बुजुर्ग औरत 2 घंटे तक रोती रहीं. उन्हें किसी का बैंक मैनेजर बन कर फोन आया. ठग बोला कि आप का खाता ब्लौक हो गया, जल्दी करें. बुजुर्ग औरत ने 3 बार कहा कि बेटा, मैं बूढ़ी हूं. ठग बोलता गया और खाते से एक लाख से ज्यादा रुपए निकल गए.बुजुर्ग औरत ने रोते हुए कहा कि बेटा, हम को लगा तू ही बैंक वाला है.

हमारी आवाज सुन कर भी तू ने दया नहीं दिखाई? जनता को डिजिटल भाषा सिखानी होगी सुरक्षा सब से पहले जनता को ही सम?ानी होगी. ध्यान रखना होगा ओटीपी किसी को नहीं बताना होगा. बैंक कभी फोन नहीं करता. स्क्रीन शेयरिंग भूल कर भी न करें. पुलिस वीडियो काल नहीं करती. डिजिटल अरैस्टिंग नहीं होता. केवाईसी लिंक के नाम पर 100 फीसदी धोखा. कस्टमर केयर नंबर गूगल से न खोजें. अनजान ऐप डाउनलोड न करें. बिजली, गैस, बैंक मैसेज नकली भी हो सकता है. कोई डरा रहा है, तो इस का मतलब साइबर अपराधी है. 1930 नंबर पर तुरंत शिकायत करें.


डिजिटल अपराध सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या भी है. डिजिटल ठगी ने भारत के हर घर को प्रभावित किया है. यह सिर्फ मोबाइल और ऐप की समस्या नहीं, यह भरोसे, सम?ा, डर, सिस्टम और समाज की समस्या है. हम अगर जागरूक नहीं हुए, तो आने वाले समय में डिजिटल ठगी किसी महामारी की तरह फैल जाएगी. अपराधी तकनीक से तेज हैं और हमें भी अपनी सम?ाबू?ा से तेज होना पड़ेगा.  Social Story

Political Story: 2025 धुरंधर साल की मजाकिया पड़ताल

Political Story: साल 2025 को भारतीय इतिहास में उस ब्लौकबस्टर फिल्म की तरह दर्ज किया जाएगा, जिस में डायरैक्टर बदलते रहे, पटकथा रोज लिखी गई, कलाकार खुद ही डायलौग बोलते रहे और दर्शक बेचारे टिकट ले कर भी सिनेमाघरों से बाहर नहीं निकल पाए.
इस में कहानी थी, सस्पैंस था, रोमांस था, वादविवाद था, संवाद था, एक्शन था, थ्रिलर था, बस नहीं था तो इंटरवल और न ही चैनल बदलने का औप्शन, क्योंकि पूरा देश ही सिनेमाघर और देशवासी दर्शक बने हुए थे.


भक्ति, भीड़ और व्यूअरशिप का त्रिवेणी संगम फिल्म की ओपनिंग भव्य रही. प्रयागराज महाकुंभ में तकरीबन 65 करोड़ श्रद्धालुओं ने पाप धोने के लिए आस्था की डुबकी लगाई. कुछ श्रद्धालु ऐसे भी थे, जिन्होंने मनका विक्रेता मोनालिसा की आंखों में डुबकी लगा कर वैतरणी पार करने का शौर्टकट रास्ता खोज लिया. भक्ति, भावुकता और व्यूअरशिप, तीनों का त्रिवेणी संगम हुआ. कैमरे भी श्रद्धा में लीन थे, बस लाइक और शेयर बाकी रह गया था.


एक्शन सीन : भगदड़ से ब्लास्ट तक
जैसे फिल्म में हर मसाला होता है, वैसे ही शांत भक्ति के बाद भारतीय पटल पर एक्शन सीन भी देखने को मिले. महाकुंभ, दिल्ली रेलवे स्टेशन और रथ यात्रा की भगदड़. एयर इंडिया का प्लेन क्रैश, पहलगाम आतंकी हमला, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल की हिंसा, दिल्ली ब्लास्ट, गोवा नाइट क्लब आगजनी और रोहित शेट्टी की फिल्म की तरह कोहरे में यमुना एक्सप्रैसवे पर गाडि़यों की टक्कर, इन सब ने साल को पूरी तरह ‘धमाकेदार’ बना दिया.

इन घटनाओं से देश कुछ देर के लिए जरूर थमा, लेकिन इन हालात में भी माननीयों के चुनावी दौरे और विदेशी यात्राएं बदस्तूर जारी रहीं. दर्शक कन्फ्यूज हो गए कि यह ब्रेकिंग न्यूज है या अगली वैब सीरीज का ट्रेलर या फिर अविराम जीवन का परम सत्य. गौसिप, गलतफहमियां और टीआरपी की दुलहन
पिछले साल के ‘बंटोगे तो कटोगे’ के बाद इस साल ‘आई लव मोहम्मद’ और ‘आई लव महादेव’ जैसे नारे राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज हुए. एसआईआर, शरबत जिहाद, बीएलओ, टैरिफ, जीएसटी और जेनजी जैसे शब्द चर्चा में रहे. बाबाओं और नेताओं का बड़बोलापन, अक्षय का ठुमकना, माननीय द्वारा हिजाब हटाने की घटना, सब ने सुर्खियां बटोरीं.


इधर मोस्ट बैचलर राहुल गांधी और सलमान खान को इस साल भी दुलहन नहीं मिली, उधर वक्फ संशोधन विधेयक और एसआईआर प्रक्रिया, सब ने मिल कर गौसिप चैनलों की टीआरपी को दुलहन बना दिया.
इंटरनैशनल कूटनीति का मल्टीस्टारर सीन इंटरनैशनल फ्रेम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ‘ग्लोबल फूफा’ का रोल निभाते हुए नोबेल अवार्ड की तलाश में भटकते रहे, लेकिन भारतीय कूटनीति और नार्वेजियन नोबेल कमेटी ने मोगेंबो को ‘खुश’ होने का मौका ही नहीं दिया. टैरिफ की आड़ में ट्रंप भारत के पीछे ऐसे पड़े रहे, जैसे कुत्तों के पीछे दिल्ली कोर्ट.


आपरेशन सिंदूर और एशिया कप के दौरान पाकिस्तान को कूटा गया. कूटनीति का यह मल्टीस्टारर सीन था, जिस में संवाद कम और संदेश ज्यादा था. रोमांस, क्राइम और नीला ड्रम रोमांस और थ्रिलर ने भी दर्शकों को निराश नहीं किया. समधीसमधन, चाचीभतीजा और सासदामाद की भागमभाग प्रेमकथाएं ट्रैंड में रहीं. शादीशुदा मर्दों की जिंदगी में राहुकेतु साथसाथ गोचर करते दिखे. ‘वो’ के चक्कर में नीला ड्रम, हौरर हनीमून और हसीन दिलरुबा टाइप घटनाओं ने सस्पैंस को हद पर पहुंचा दिया. मीडिया और सोशल मीडिया सनसनी तैमूर के घर उस के अब्बाजान छोटे नवाब पर चाकू से हमला किया गया. मीडिया ने ‘सब से तेज’ बनने की होड़ में वीरू पाजी को असली देहांत से पहले ही श्रद्धांजलि दे दी.


सोशल मीडिया पर भारतीय ‘धुरंधर’ से ज्यादा पाकिस्तानी डकैत ने लोकप्रियता हासिल की. अपने सैयारा के लिए नौजवान सिनेमाघरों में सिसकियां लेते दिखे. कपिल शर्मा के शो में हंसी की बौछार कम और उस के कैफे पर गोलियों की बौछार ज्यादा चर्चा में रही. खेल, चुनाव और क्षेत्रीय संगीत आईपीएल में बैंगलुरु की जीत के जश्न में फैंस ने कुरबानी तक दे डाली. एसआईआर के बाद बिहार चुनाव में प्लसमाइनस का खेला देखने को मिला. पुराने उम्मीदवारों का टिकट और पुराने अवैध वोटर का नाम कटा, तो नए उम्मीदवार को टिकट और वोटर लिस्ट में नए वोटर का नाम जुड़ा.


फाइनली सुशासन की रीलौंचिंग हुई, हालांकि इस दौरान मछलीपालन नौटंकी, टिकटकटवा ड्रामा, जूतमपैजार और गालीगलौज के चुनावी मैटेरियल ने वोटरों का भरपूर मनोरंजन किया. आखिरी सीन : गो इंडिया से इंड ‘गो’ क्राइसिस हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा का सपना भले ही पूरा न हुआ हो, लेकिन इंडिगो क्राइसिस ने टाई पहनने वालों को भी हलकान कर दिया. इस साल के आखिर में इंडिगो ने यात्रियों के ‘गो’ पर ‘इंड’ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. साल 2025 में भी नाम बदलो, भाग्य बदलो अभियान जारी रहा. राजभवन से लोक भवन, पीएमओ से सेवा तीर्थ, मनरेगा से ‘जी राम जी’… नाम बदलते रहे. डौलर के मुकाबले रुपया भी नेताओं के चारित्रिक असर का अनुसरण करता दिखा और गिरने में मौद्रिक महारत हासिल की.


बाढ़, चुनाव और अपराध का सीजन समय पर आया. दिवालिया साल में दीवाली को यूनैस्को की विश्व धरोहर में जगह मिली. भारत में पाकिस्तानी ‘रहमान डकैत’ का डांस और हिजाब मामले के चलते पाकिस्तान में भारतीय ‘सुशासन बाबू’ सुर्खियों में बने रहे. कुलमिला कर, साल 2025 ने साबित कर दिया कि भारत में मनोरंजन के लिए सिनेमाघर की जरूरत नहीं, बल्कि खबरें ही काफी हैं. धुरंधर साल 2025 के इस मजाकिया पोस्टमार्टम का यहीं द एंड किया जाता है, क्योंकि नए साल 2026 का लाइव टैलीकास्ट शुरू हो चुका है.      Political Story   

Hindi Story: दांव

Hindi Story: औफिस के नए मैनेजर मिस्टर आलोक बहुत ज्यादा हैंडसम थे, पर उन की पत्नी रीता एकदम साधरण सी औरत. लोगों को लगा कि मिस्टर आलोक ने दहेज के चक्कर में रीता मैडम से शादी की है, पर मामला एकदम उलट था. क्या था इस बेमेल शादी का राज?

कं पनी के नए मैनेजर के आने की खबर सुन कर सभी मुलाजिम अपनेअपने काम में जुट गए थे. असिस्टैंट मैनेजर नितिन की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. उन के ऊपर दोहरा दबाव था, एक घर का और दूसरा औफिस का. मैनेजर और असिस्टैंट मैनेजर दोनों के सरकारी मकान अगलबगल थे. इसी वजह से पारिवारिक संबंधों को निभाने की जिम्मेदारी भी नितिन पर आ पड़ी थी. पुराने मैनेजर मिस्टर कपिल से नितिन के परिवार जैसे संबंध थे. उन के जाने के बाद से नितिन का पड़ोस एकदम सूना हो गया था. अब महीनेभर बाद कल मिस्टर आलोक यह जिम्मेदारी संभालने वाले थे.


मिस्टर आलोक फिलहाल अकेले आ रहे थे. उन की पत्नी रीता के साथ न आने के चलते नितिन का तनाव थोड़ा कम हो गया था. नितिन ने मिस्टर आलोक के आने से पहले ही घर और औफिस दोनों जगह का इंतजाम ठीक करवा दिया था. औपचारिक मुलाकात के लिए शाम की चाय पर उन्हें घर बुलाने की बात भी अपनी पत्नी रेखा से कह दी थी. मिस्टर आलोक दोपहर में घर पहुंच गए. औफिस वालों ने उन के घर को ठीक तरह से सजासंवार दिया था. मिस्टर आलोक इस समय बहुत कम सामान साथ ले कर आए थे. उन्होंने मातादीन के अलावा वहां पर तैनात दूसरे मुलाजिमों को वापस भेज दिया था.


औफिस से आ कर नितिन को मिस्टर आलोक को घर पर मुलाकात कर उन्हें चाय पर आने का न्योता भी देना था. नितिन ठीक 5 बजे घर पहुंचे. मिस्टर आलोक ने उन्हें आते हुए देख लिया. जरा देर में वे खुद ही नितिन के घर पहुंच गए. उन्होंने डोर बैल बजाई. रेखा ने दरवाजा खोला. उस के कुछ पूछने से पहले ही मिस्टर आलोक ने अपना परिचय भी दे दिया. तभी नितिन की आवाज सुनाई दी, ‘‘कौन है रेखा?’’
रेखा के मुंह से अभी आवाज तक नहीं निकल रही थी. इतनी देर में नितिन वहां आ गए और बोले, ‘‘सर, आप…’’
‘‘शुक्र है, तुम मु?ो देख कर
चौंके नहीं.’’
‘‘मैं आप से मिलने आने वाला ही
था सर.’’
‘‘उस से पहले मैं ही चला आया. कायदे से नए पड़ोसी को पुराने
पड़ोसी के घर जाना चाहिए. तुम औपचारिकता निभाने के लिए ही मेरे घर आने वाले थे.’’
‘‘नहीं सर, यह बात नहीं है. आप मेरे बौस हैं. मेरा फर्ज बनता है कि मैं पहले घर पर आप से मिलूं और आप को अपने घर आने का न्योता दूं.’’
‘‘मैं औफिस में तुम्हारा बौस हूं.
घर में हम सिर्फ पड़ोसी हैं,’’ मिस्टर आलोक बोले.
रेखा को मिस्टर आलोक का खुलापन बड़ा भला लग रहा था. लंबेचौड़े, स्मार्ट
और सुडौल देह के स्वामी मिस्टर आलोक बहुत दिख रहे थे. उन का गोरा रंग उन के कालेसफेद खिचड़ी बालों के साथ बहुत मेल खा रहा था.
‘‘बैठिए सर,’’ नितिन ने कहा.
तभी रेखा ने शांताबाई के हाथ पानी भिजवा दिया और खुद भी आ कर औपचारिकतावश हाथ जोड़ दिए.
‘‘यह मेरी पत्नी रेखा है और ये हमारे कंपनी के नए मैनेजर मिस्टर आलोक हैं,’’ नितिन ने उन दोनों का परिचय भी कराया.


फिर वे दोनों आपस में बातें करने लगे. रेखा किचन की तरह बढ़ गई.
‘‘आप के साथ परिवार के बाकी सदस्य आते तो बहुत अच्छा लगता सर.’’
‘‘मेरी पत्नी रीता, बेटी रोशनी और बेटा राहुल भी जल्दी आ जाएंगे. अभी जरा वे काम में बिजी थे. वैसे, आप के बच्चे दिखाई नहीं दे रहे…’’ मिस्टर आलोक ने पूछा.
‘‘खेलने गए हैं. वे अभी छोटे हैं सर,’’ नितिन बोले.
कुछ ही देर में शांताबाई चायनाश्ते के साथ हाजिर हो गई.
‘‘इस सब की क्या जरूरत थी? सिर्फ चाय ही काफी थी,’’ मिस्टर आलोक बोले.
तीनों साथ बैठ कर चाय पीने लगे. कुछ देर बाद मिस्टर आलोक ने उन से विदा ली.
‘‘सर स्वभाव से बहुत सरल हैं. उन में बौस जैसी अकड़ नहीं है,’’ मिस्टर आलोक के जाने के बाद नितिन बोले.
अगले दिन मिस्टर आलोक ने औफिस जौइन किया था. उन के स्वभाव से सभी खुश थे. वे बहुत जल्दी सब के साथ घुलमिल गए. अकसर वे शाम को नितिन के पास आ जाते और खेल से ले कर राजनीति तक की चर्चा करते.
‘‘आप का परिवार कब आ रहा है?’’ एक दिन नितिन ने पूछा.
‘‘हफ्तेभर के अंदर आ जाएंगे वे लोग,’’ मिस्टर आलोक बोले.
‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है.’’
तकरीबन एक महीने बाद रीता मैडम के बच्चों के साथ आने की तारीख तय हो गई थी और मिस्टर आलोक ने इस की खबर नितिन को दे दी थी. उन के निर्देश पर मैडम के वैलकम की तैयारी होने लगी. रेखा भी उन के मकान का इंतजाम देख रही थी.
आखिर वह दिन आ गया और रीता मैम अपने जवान बच्चों के साथ आ गईं. औफिस के सब लोग सपरिवार मैडम के स्वागत के लिए आए हुए थे.
उम्मीद के उलट रीता मैम को देख कर औफिस के सभी लोग हैरान रह गए और उन की कल्पना एक ?ाटके में बिखर गई.
कंप्यूटर औपरेटर मिनी बोली, ‘‘कहां सर और कहां रीता मैडम… दोनों में जमीनआसमान का अंतर है.’’
‘‘ऐसी जोड़ी की तो मैं सपने में
भी कल्पना नहीं कर सकती थी,’’ रिया ने कहा.
रीता मैडम को देख कर सब खुसुरफुसुर कर रहे थे, लेकिन ऊपर से चेहरे पर मुसकान ओढ़े हुए थे.
रेखा ने रीता मैडम को बुके थमा कर कहा, ‘‘वैलकम मैडम.’’
रीता ने एक गहरी नजर रेखा पर डाली लेकिन बोली कुछ नहीं. वह चारों तरफ नजर घुमा कर सब को देख रही थी. उसे पूरा विश्वास था कि इस समय सब उसे देख कर क्या महसूस कर रहे हैं, लेकिन उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी. वजह, वह ऐसी ही प्रतिक्रिया पहले भी कई वैलकम पार्टी में देख चुकी थी. उसे अपने बारे में कोई गलतफहमी
नहीं थी.
रीता मोटी, नाटी और सांवली थी. कहीं से भी उन दोनों का कोई मेल नहीं था. न उसे बात करने का सलीका था और न ही उठनेबैठने और खानेपीने का. वह एक साधारण औरत की तरह सब
से पेश आ रही थी, जो मिस्टर आलोक के ओहदे से कहीं भी मेल नहीं खा रहा था. उस से मिल कर सभी को निराशा हुई थी.
जब रीता किसी समारोह में जाती, तो बातें पहले धीमी होतीं, फिर उस के कानों तक पहुंच ही जातीं.
‘‘देखो, वही है…’’
‘‘हां, वही सर की पत्नी…
‘‘सम?ा नहीं आता, सर ने इस में क्या देखा…’’
एक बार किसी औरत ने सीधे पूछ ही लिया, ‘‘रीताजी, आप पहले क्या करती थीं?’’
रीता ने बिना किसी ?ि?ाक के कहा, ‘‘जीना…’’
पूछने वाली औरत थोड़ी असहज हो गई, ‘‘मतलब कोई काम?’’
‘‘काम तो अब भी करती हूं.’’
‘‘कौन सा?’’
‘‘अपने बच्चों का भविष्य संवारने का…’’ रीता ने जवाब दिया.
लोग अकसर रीता मैडम को तौलते थे. तराजू में रखते थे एक पल में.
‘‘न पढ़ीलिखी, न सलीकेदार, न ही खूबसूरत…’’
रीता को यह अजीब नहीं लगता था. वह जानती थी कि समाज कीमत दिखने वाली चीजों से लगाता है. जिस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि लोग उस की मौजूदगी से असहज हैं, उसी दिन उस ने तय कर लिया था कि वह खुद को हलका साबित नहीं करेगी.
एक सामाजिक कार्यक्रम में किसी सज्जन ने आलोक से हंसते हुए कहा, ‘‘आप की पत्नी बड़ी अलग हैं.’’
आलोक कुछ कहने ही वाले थे,
तभी रीता ने खुद जवाब दे दिया, ‘‘हां, क्योंकि मैं सही समय पर जीना सीख
गई थी.’’
वहां सन्नाटा छा गया. समाज को यही खलता था कि रीता शर्मिंदा नहीं थी. अगर वह सिर ?ाका लेती तो शायद ‘बेचारी’ कहलाती. अगर रोती तो ‘दया’ मिल जाती. पर वह न रोती थी, न ?ाकती थी. वह जानती थी कि समाज के लिए उस की कीमत सिर्फ इतनी थी कि वह किस की पत्नी है, उस से ज्यादा नहीं और कम भी नहीं. उसे यह भी पता था अगर वह खूबसूरत होती तो यही समाज उसे ‘भाग्यशाली’ से ज्यादा कुछ न कहता.
रीता ने कभी सफाई नहीं दी, क्योंकि सफाई वही देता है जो अपराधी हो. रीता ने सिर्फ एक बात पकड़े रखी,
उस की जगह. आज भी जब लोग उसे देखते हैं, तो सोचते हैं कि यह यहां तक कैसे पहुंची?
समाज की नजर में रीता की कीमत कभी ऊंची नहीं रही, पर उसे अब यह फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि जिस औरत ने अपनी कीमत खुद चुकाई हो, उसे समाज के लेबल की जरूरत नहीं होती.
रेखा सोच रही थी कि एक मैनेजर की पत्नी में जिन गुणों की उम्मीद की जाती है उन में से एक भी रीता में नहीं था. इस से पहले भी 2 मैनेजर उन के बगल के बंगले में रह कर जा चुके थे. उन की पत्नियां बड़ी सुघड़ और सलीकेदार थीं. वह सोचने पर मजबूर हो गई कि हो न हो मिस्टर आलोक ने रुपयों की खातिर लालच में पड़ कर रीता मैम जैसी औरत से शादी की हामी भरी होगी.
आज दिनभर चर्चा का विषय रीता मैडम ही थीं.
‘‘मैडम तुम्हें बड़ी तिरछी नजर से देख रही थीं. तुम ने उन की तारीफ नहीं की रेखा.’’
‘‘किस बात की तारीफ करूं नितिन? न उन में रूप है और न ही कोई खास गुण दिखाई दे रहा था.’’
‘‘बारीकी से देखोगी तो तुम्हें उन में भी कोई खास गुण दिखाई दे जाएगा,’’ नितिन बोले, तो रेखा हंस दी.
मिनी और रिया तो अकसर आलोक सर को देखते ही मैडम की बातें ले कर बैठ जातीं. उन दोनों को बात करने के लिए एक अच्छाखासा टौपिक मिल
गया था.
‘‘तुम्हारा क्या खयाल है कि सर की लव मैरिज है या अरेंज?’’
‘‘जरूर दहेज के लिए घर वालों की मरजी से शादी की होगी, वरना…’’
‘‘यह भी हो सकता है रिया कि उन में कोई ऐसा गुण हो जिस पर सर मोहित हो गए हों. कहते हैं प्यार अंधा होता है.’’
‘‘मु?ो तो उस की उम्मीद नहीं है,’’ इतना कह कर दिया फाइल ले कर सर के केबिन में चली गई.
रीता से मुलाकात करने के बाद औफिस में अभी उसे ले कर बातों का बाजार गरम था. उसे अपने बारे में
किसी भी तरह का कोई शिकवा नहीं होता था. वह जैसी थी उस से कोई शिकायत नहीं थी और अपनी उपलब्धि पर खुश भी थी.
रीता को लोगों पर हंसी आती जो हरेक का बाहरी रूप देख कर बिना जाने जज करना शुरू कर देते थे. वह जानती थी कि मर्दों को खूबसूरती लुभाती है लेकिन वक्त पड़ने पर इस से उन का कोई लेनादेना नहीं होता. वे तो बस औरत की देह के मोह जाल में फंस
जाते हैं.
मिस्टर आलोक की पसंद हर मामले में अच्छी मानी जाती थी. कारोबार हो या रिश्ते लोग उन की सम?ा की मिसाल देते थे, लेकिन रीता को ले कर उन से चूक हो गई थी. सब उसे भाग्यशाली कहते, पर रीता भाग्यवादी नहीं थी. उस का मानना था कि भाग्य अपनेआप नहीं बनता, उसे बनाना पड़ता है और उसे बनाने में बहुतकुछ दांव पर भी लगाना पड़ता है.
अपने भविष्य के लिए रीता ने भी बड़ा दांव खेला था और वह दांव उस के हिसाब से सीधा पड़ा था.
लोगों ने रीता को देख कर अपनीअपनी राय बना ली थी. किसी को यकीन था कि वह किसी बड़े बिजनैसमैन परिवार से होगी, तो कोई कहता कि मिस्टर आलोक ने दहेज के लालच में शादी की है.
कोई नहीं जानता था कि यह शादी अरेंज नहीं थी. यह माना जाता है कि प्यार तन से ज्यादा मन की खूबसूरती देखता है. यह आम सोच थी, पर रीता की सोच इस से मेल नहीं खाती थी
उस का अनुभव कुछ और कहता था. वह खुद से कहती, ‘‘एक मर्द पहले तन देखता है, मन और उस की खूबसूरती के बारे में बाद में सोचता है.’’
शायद यही वजह थी कि जब एक साधारण सी औरत ने तन के बल पर सबकुछ हासिल कर लिया, तो उस के मन में यह विश्वास बैठ गया कि
एक खूबसूरत औरत के लिए इस
दुनिया में कुछ भी पाना नामुमकिन
नहीं है.
?ांपड़े में रहते हुए रीता ने बहुतकुछ देखा था. मर्दों की निगाह, उन की कमजोरी, उन का डर. उसे जल्दी सम?ा आ गया था कि गरीबी और देह दोनों का सौदा चलता है, फर्क सिर्फ कीमत का होता है. उस ने आलोक को चुना था… इसलिए नहीं कि वह सब से अच्छा आदमी था, बल्कि इसलिए कि वह
सब से असुरक्षित अमीर आदमी था.
रीता एक बहुत गरीब परिवार से थी. उस के पिताजी एक फैक्टरी में मजदूरी करते थे. अब वे नहीं रहे. आलोक खानदानी रईस थे और पढ़ाई करने के लिए परिवार से दूर दिल्ली आए थे. उन्होंने अपने लिए अलग घर ले रखा था. उस के ठीक सामने रीता का ?ांपड़ा था. उस की मां बरसों पहले गुजर गई थी.
4 भाईबहनों में रीता सब से बड़ी थी, जिन की परवरिश की खातिर उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. सब दिन में स्कूल चले जाते और रीता घर पर अकेली रहती. अब उन सब की शादी हो गई और उन के घर बस गए. सब अपने परिवार में खुश थे.
आलोक अकसर अपने घर से रीता के ?ांपड़े की ओर ?ांकते रहते. एक दिन वे रीता को देख कर मुसकराए. बदले में वह भी हंस दी. इशारा मिलते ही अगले दिन आलोक दोपहर में उस के घर आ गए और मुसकरा कर बोले, ‘‘मेरे घर पर काम करोगी?’’
रीता ने तुरंत हां कह दी. अब तो रोज आनेजाने और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया.
एक दिन आलोक ने जैसे ही रीता का हाथ पकड़ा, तो वह सारी लाजशर्म छोड़ कर उन से लिपट गई. उस ने आलोक को कस कर पकड़ लिया.
आलोक आखिर मर्द ही तो थे. जरा सी देर में पिघल गए और उन के बीच की सारी दीवारें टूट गईं.
रीता जानती थी कि वह जो कर रही है उस में बहुत ज्यादा रिस्क है, लेकिन उस के सामने कोई दूसरा उपाय नहीं था. वह गरीबी से परेशान थी और आलोक एक अमीर परिवार के बेटे थे. अगर उस का दांव सीधा पड़ गया, तो जिंदगीभर का आराम था, पर वह गलत भी पड़ता तो उन जैसों पर उस का ज्यादा असर न पड़ता.
आलोक पर रीता का नशा चढ़ चुका था. रोज ही वह काम के बहाने आलोक के घर आती और उन के सामने समर्पित हो जाती. 6 महीने तक सबकुछ ठीक चला और फिर एक दिन रीता ने तब जबरदस्त धमाका कर दिया, जब उस ने आलोक को बताया कि वह पेट से है, तो उन के पैरों की नीचे से जमीन खिसक गई.
आलोक एकदम से बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो?’’
‘‘मैं सच कह रही हूं. जितनी जल्दी हो सके मु?ा से शादी कर लो.’’
‘‘शादी और तुम से…’’
‘‘क्या कमी है मु?ा में?’’
‘‘यह पूछो कि क्या है तुम में?’’
‘‘तो फिर क्यों रोज मेरे सामने गिड़गिड़ाते थे,’’ रीता चीखी तो आलोक नरम पड़ गए.
‘‘इस बच्चे से छुटकारा पा लो. जो मांगोगी मैं तुम्हें देने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘यह नहीं हो सकता. बच्चा तो मेरे साथ ही मरेगा यह जान लो और मैं तुम सब को फंसा कर मरूंगी,’’ रीता ने कहा.
मजबूर हो कर आलोक को यह बात अपने घर वालों को बतानी पड़ी. वह किसी के दबाव के आगे नहीं ?ाकी. आलोक लाचार हो गए थे. घर वालों ने फैसला आलोक पर छोड़ दिया. इन्हें अपनाने के लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार थी, पर लाखों रुपयों के लालच में करोड़ का भविष्य छोड़ने को राजी न थी.
मजबूर हो कर आलोक को रीता से शादी करनी पड़ी. घर वालों का दबाव अभी भी बना हुआ था. वे अभी भी हर कीमत पर रीता से छुटकारा पाना चाहते थे, पर वह कानून की दुहाई दे कर इन पर अपना दबाव बनाए हुए थी.
तनाव भरे माहौल में पहली बेटी रोशनी का जन्म हुआ. घर वाले अभी भी यही कह रहे थे कि इसे छोड़ दो, लेकिन आलोक जानते थे कि यह इतना आसान नहीं था.
शादी और बेटी के हो जाने पर भी वे नहीं पिघले. रीता भी हार मानने वालों में न थी. परिवार और दुनिया दोनों ही जगह उस का जीना मुश्किल हो रहा था और वह सुनहरे भविष्य के खातिर आलोक को छोड़ने को राजी न थी.
उस ने अपनी जिंदगी को ले कर बहुत बड़ा दांव खेला था.
रीता की जिद के चलते परिवार की इज्जत खराब हो रही थी. उसी की खातिर उन्होंने रीता को घर में जगह दे दी थी, पर दिल में नहीं. वह खुश थी कि उस की जद्दोजेहद कामयाब हो रही थी. जवान मर्द आखिर क्या करता?


कोई उपाय न पा कर आलोक ने हार मान ली और उन दोनों के संबंध सामान्य होने लगे. फिर रीता की गोद में राहुल आ गया. बेटे के खातिर आलोक ने रीता को माफ कर दिया और इस तरह उसे मिस्टर आलोक के घर और जिंदगी में जगह मिल गई.


राहुल के जन्म के बाद आलोक बदले. पहली बार उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगता था?’’
‘‘हर दिन लगता था, पर डर के साथ भूख भी थी,’’ रीता ने कहा. आलोक कुछ नहीं बोले. आज लोग उसे देख कर कहते हैं कि न सलीका है, न सम?ा. रीता जानती है कि सलीका उस ने सीखा ही नहीं और सम?ा उस ने जरूरत से ज्यादा पाली है. वह कोई आदर्श औरत नहीं है और न ही कहानी की हीरोइन. वह बस एक औरत है, जिस ने यह तय किया है कि वह हार कर नहीं जिएगी. उस का दांव गलत भी हो सकता था, पर उस ने दांव इसलिए नहीं खेला था कि वह सही साबित हो, उस ने इसलिए खेला था कि पीछे लौटने का रास्ता बंद हो जाए. और जब रास्ता बंद हो जाए तो आदमी चलना सीख ही जाता है.


यह सब किसी फिल्मी कहानी से कम न था. क्याकुछ नहीं ?ोला था रीता ने अपनी जिंदगी में. भले ही घर वालों की नजर में इस का ज्यादा मोल न था, पर रीता की आपबीती बयां कर रही थी कि आज जोकुछ भी उस के पास है, उस का रास्ता उस ने अपने तन से बनाया था. पति आलोक का खुला बरताव देख कर रीता अकसर सोचती, ‘इनसान का शरीर बूढ़ा होता है, पर मन नहीं. उस की खुशी के लिए वह रोजाना नए उपाय ढूंढ़ता रहता है.’ जिंदगी में रीता ने बड़ी जद्दोजेहद देखी थी. इसी ने उसे नए सिरे से सोचने का एक मौका दे दिया. उसे लगता कि दुनिया में बेकार कुछ भी नहीं है. सब की अपनी उपयोगिता है. बस, सही समय पर उस का इस्तेमाल करना आना चाहिए, लेकिन उस के साथ बहुत ज्यादा जोखिम भी जुड़ा होता है. हरेक के बस का यह ?ोलना नहीं होता, जिस ने जिंदगी में कभी भी बड़ा जोखिम नहीं उठाया था. उस के लिए यह रास्ता जायज नहीं ठहराया जा सकता था.          Hindi Story             

लेखक डा. के. रानी

Social Story: गहरी पैठ

Social Story: भीड़ का इस्तेमाल हर जबरदस्ती के खिलाफ करना नकेवल कानूनी है, यह आसान भी है. भीड़ चाहे सही काम की मांग कर रही हो या गलत की, यह अपनी बात सुनाने का एक तरीका है. 1973-74 में जयप्रकाश नारायण ने ‘कुरसी खाली करो कि जनता आती है’ का नारा दे कर 1971 की चुनावी और बंगलादेशी लड़ाई की जीत के बावजूद भीड़ के बल पर इंदिरा गांधी का सिंहासन हिला दिया था.


आज भीड़ को कुचलने की पूरी तैयारी हो गई है. वे लोग जिन्होंने भीड़ के बल पर बाबरी मसजिद गिराई थी, जिस ने भीड़ के बल पर भागलपुर में दंगे कराए थे, जिन्होंने गुजरात में 2002 के दंगे कराए थे, आज भीड़ को कुचल रहे हैं. राजनीतिक मामलों को तो छोडि़ए, अब दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ मोरचा निकालने वालों की भीड़ को कानून के हाथों बुरी तरह कुचला जा रहा है. आजकल भीड़ को कंट्रोल करने का आसान तरीका बन गया है अगर भीड़ सरकार के खिलाफ कुछ मांग कर रही हो. 1-2 लोगों से पाकिस्तानी नारे लगवा दो. फिर क्या पुलिस सब को बंद ही नहीं कर देगी, वर्षों जेलों में बंद रखेगी. सुप्रीम कोर्ट ने भी हरी ?ांडी दे दी है कि पुलिस भीड़ को, ‘देश के खिलाफ’ काम करने वाली भीड़ को, बुलवाने वालों को बरसों बिना सजा दिए बंद कर सकती है.


यह आम जनता के हक को मारना है. आज वैसे ही आम जनता को अपने मोबाइल से फुरसत नहीं
कि वह दूसरों के फायदे के लिए किसी भीड़ में जाए. आजकल तो भीड़ भाड़े की होती है या भक्ति की. दोनों से चूंकि भीड़ जमा करने वाले को जम कर फायदा होने की उम्मीद होती है, लोग मोबाइल जेब में रखने लगे हैं. पर नारों का खतरा इन में भी है. 2-4 लोगों को फालतू के नारे लगाने के लिए तैयार किया जा सकता है जो चुपके से गायब हो जाएं. यह भीड़ तोड़ने का हथकंडा अब काम का है. सरकार आज भीड़ से नहीं डर रही. किसानों ने हरियाणा की सीमा पर भीड़ जमा कर 3 साल पहले खेती कानून वापस करा लिए थे, पर उस भीड़ पर तरहतरह के सच्चे?ाठे आरोप लगा कर उसे जबरदस्त बदनाम किया गया था. आज
किसान आंदोलन के नेता राकेश टिकैत व दूसरे लोग घरों में दुबके हैं, क्योंकि लोग भीड़ में शामिल हो कर जेलों में नहीं सड़ना चाहते.


गांवों में जहां न अखबार है, न रेडियो स्टेशन, न टीवी, लोगों को अपनी बात कहने का अब मौका ही नहीं मिलता, क्योंकि भीड़ जमा करना मुश्किल हो गया है. यह सरकार को हर मामले में मनमानी करने का मौका दे रहा है. जनता की बात सिर्फ ट्रोलिंग तब सीमित है और भीड़ की शक्ल नहीं लेती. ट्रोलर्स को कंट्रोल करने के लिए भी सरकार पूरी तरह जुट गई है.  अब गांवों के लिए सब से बुरे दिन आ गए हैं. सरकारें उन्हें जैसे मरजी हांक सकती हैं.



पहले प्राइवेट दलाल लोगों की तस्करी और चोरी करते थे ताकि उन्हें किसी और देश या राज्य में गुलामी करवाने के लिए ले जाया जाए, अब यह काम भारत सरकार ने करना शुरू कर दिया है. शुरू में जब कांग्रेस सरकार के जमाने में लोगों ने दलालों के हत्थे चढ़ कर विदेश जाना शुरू किया था तो सरकार ने इस की देखभाल के लिए एक विभाग बनाया था जिस की इजाजत के बिना किसी को हवाईजहाज या पानी के  जहाज पर नहीं चढ़ने दिया जाता था.


अब दलाली का यह काम सरकार खुद कर रही है. 200 साल पहले से भारत से एग्रीमैंट करा के गरीब मजदूरों को अंगरेज और दूसरे यूरोपीय दलाल भारत के लोगों को अफ्रीका, फिजी, मौरीशस, सूरीनाम ले जाते रहे हैं. यहां काम गुलामी का ही होता था पर वह गुलामी भारत में जाति की गुलामी से ज्यादा बेहतर थी. जो थोड़े से लोग कभीकभार जुगत भिड़ा कर वापस अपने गांव आ भी जाते थे, वे बढ़ाचढ़ा कर कसीदे पढ़ते थे.


यही काम आजादी के बाद हुआ जब तेल उगलने वाले देशों को पैसा मिलने लगा. उन के यहां आबादी तो थी नहीं. उन्होंने भरभर कर भारत से लोगों को बुलाना शुरू किया. काम गुलामी जैसा ही था पर भारत के गांवों में ईंट के भट्ठों या छोटी फैक्टरियों में जो गुलामी होती है, उस से कहीं कम मुश्किल था और पैसा ज्यादा मिलता था. आज भारत अगर फलताफूलता नजर आ रहा है तो इस की वजह राम मंदिर से निकलने वाला आशीर्वाद नहीं है, इन मजदूरों की मेहनत का पैसा है जो ये भारत में अपने घर वालों को भेजते हैं. अब घर वाले भी भारत से गए लोगों को नोट छापने की मशीन सम?ाते हैं और चाहे घर का आदमी अपनी हड्डियां गलाए, वे खुश ही रहते हैं.


सरकार तो बहुत खुश है. उसे बैठेबिठाए लगभग 14,00,000 करोड़ (14 लाख करोड़) की भारी रकम मिल रही है, इसीलिए जब इजरायल और गाजा की लड़ाई शुरू हुई और गाजा के मजदूरों ने इजरायल में जाना बंद कर दिया तो भारत सरकार ने बिना फिक्र किए कि यह लड़ाई का इलाका है. कई हजार मजदूरों को इजरायल भेजने की दलाली का काम अपने हाथों में ले लिया. सरकार की एक कंपनी नैशनल स्किल डवलपमैंट कौर्पोरेशन ने दलाली शुरू की और रामजी के प्रदेश से हिंदू मजदूर भक्तों को यहूदियों के देश में बढ़ईगीरी, नलसाजी, लुहारी, मजदूरी के काम के लिए भेजना शुरू कर दिया. अब चूंकि  मंदिरों की हिंदी बैल्ट में गरीबी बेतहाशा है लोगों ने अपनी जमीन, जायदाद, जेवर बेच कर नौजवानों और भगोड़ों को भी भेजने के लिए लाइनों में खड़ा कर दिया. दलाल पैसे नहीं देते थे, लेते थे. प्राइवेट दलाल घर वालों को पैसे दे कर गुलामी के लिए खरीदते हैं पर ये तो सरकारी दलाल हैं, ये लेते हैं.


अब कुछ लोग इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे हैं कि इस दलाली में गुलामों से भेदभाव किया जा रहा है, जो बात कोर्ट की एप्लीकेशन में नहीं है वह यह है कि दलाल कंपनी के अफसरों ने घूस भी ली होगी. जहां घूस का मौका न हो, वहां सरकार हाथ नहीं डालती. अब सरकार अपना निकम्मापन दिखाने के लिए ढोल बजा रही है कि देखो हम ने विधर्मी के यहां गुलामी के लिए मजदूर भेजे. चढ़ावे की बात वैसे ही छिपा दी जाती है जैसी सभी मंदिरों में छिपाई जाती है.    Social Story                      

Film Story: परदे की दुनिया – फटा पोस्टर निकली मोनालिसा

Film Story: आप को प्रयागराज महाकुंभ मेला याद है जहां नीली आंखों वाली एक लड़की के माला बेचने की वीडियो इतनी ज्यादा वायरल हो गई थी कि वह सोशल मीडिया पर छा गई थी. वही मोनालिसा जो बाद में हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए मुंबई चली गई थी और अब उस की फिल्म ‘द डायरी औफ मणिपुर’ का पोस्टर भी रिलीज हो गया है, जिस में वह गांव की छोरी के किरदार में नजर आएगी. सनोज मिश्रा की यह फिल्म मोनालिसा की जिंदगी को क्या नया मोड़ देती है, यह तो आने वाला समय बताएगा, पर फिलहाल मोनालिसा के सोशल मीडिया के फैंस बड़े खुश नजर आ रहे हैं कि एक बेहद गरीब घर की आम लड़की सच में फिल्म हीरोइन बन रही है.  

विक्की कौशल बनेंगे ‘धुरंधर’
हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’ का दूसरा पार्ट 19 मार्च को रिलीज होने की उम्मीद है. पार्ट 1 में रहमान डकैत बने अक्षय खन्ना ने अपनी जालिम अदाकारी से दर्शकों का दिल जीत लिया था और अब सुनने में आया है कि पार्ट 2 में विक्की कौशल इस का हिस्सा बनते दिखेंगे. वे कई साल पहले आई फिल्म ‘उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ के मेजर विहान के रूप में इस फिल्म में कैमियो करेंगे.
विक्की कौशल के कैमियो में कुछ एक्शन सीन भी शामिल हैं और उन्होंने पिछले साल 2025 में ही ‘धुरंधर’ के पहले पार्ट की रिलीज से पहले ही अपने हिस्से की शूटिंग पूरी कर ली थी.


राशा ने गाया गाना
रवीना टंडन की बेटी राशा थडानी ने अजय देवगन की बनाई फिल्म ‘आजाद’ से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रहा था, जो बुरी तरह से पिट गई थी, पर अब वे अपनी नई फिल्म ‘लाइका लाइकी’ से सुर्खियां बटोर रही हैं, जिस में उन्होंने गाना भी गाया है. इस गाने
‘मैं तो छाप तिलक…’
का वीडियो सामने आ चुका है.
फिल्म ‘लाइका लाइकी’ में राशा थडानी के साथ अभय वर्मा बतौर हीरो दिखाई देंगे. भावना तलवार और राघव गुप्ता इस फिल्म को प्रोड्यूस कर रहे हैं.


खुशी कपूर का ब्रेकअप
जाह्नवी कपूर की छोटी बहन खुशी कपूर ने भी हिंदी फिल्मों में बतौर हीरोइन हाथ आजमाया है, पर वे अभी तक तो फ्लौप ही रही हैं. वैसे, वे निजी जिंदगी में सुर्खियों में बनी रहती हैं. नई खबर उन के ब्रेकअप की है. सुनने में आया है कि बोनी कपूर और श्रीदेवी की छोटी बेटी खुशी कपूर का अपने बौयफ्रैंड वेदांग रैना से ब्रेकअप हो गया है. एक पत्रकार विक्की लालवानी ने सोशल मीडिया पर खुशी कपूर और वेदांग रैना के ब्रेकअप को लेकर दावा करते हुए कहा कि खुशी और वेदांग अब साथ नहीं हैं, लेकिन ब्रेकअप की असली वजह अभी पता नहीं चली है. हालांकि, खुशी और वेदांग की तरफ से इस ब्रेकअप को ले कर कोई रिएक्शन नहीं आया है.        Film Story

 

Hindi Story: नौजवान इंजीनियर और मौत का गड्ढा

Hindi Story: रविवार की सुबह थी. विजय घर पर अकेला था. उस के मातापिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे. आज विजय ने ठान लिया था कि घर के पीछे के आंगन में वह गड्ढा खोद कर ही दम लेगा. दरअसल, उसे एक पूरा का पूरा पेड़ शिफ्ट करना था. चूंकि पेड़ बड़ा था, तो उस ने अंदाजे से 8 फुट गहरा गड्ढा खोद डाला था.


आप सोच रहे होंगे कि पेड़ को कैसे शिफ्ट करते हैं? अमूमन तो पौधा ही लगाया जाता है, पर पूरा का पूरा पेड़ कैसे जड़ समेत मिट्टी में बोया जाता है? इस तकनीक में किसी पेड़ को उस की वर्तमान जगह से उठाने के लिए खास तरह के उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है या पेशेवरों को बुलाया जाता है. शाखाओं या जड़ों (रूट बौल) को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए पेड़ को सावधानी से संभालें. पेड़ को एक मजबूत गाड़ी पर रखें, यह पक्का करते हुए कि पेड़ पूरी यात्रा के दौरान हिलेडुले न, उसे किसी तरह का नुकसान न हो.


विजय यह एक्सपैरिमैंट कर रहा था. वह गड्ढा खोदने में इतना मशगूल था कि मिट्टी को गीला करने के लिए जो नल उस ने चलाया था, उस में लगा पाइप धीरेधीरे उस गड्ढे को भर रहा था. चूंकि विजय शारीरिक काम कर रहा था, तो उसे गरमी लग रही थी. धूप भी खिली थी. इसी बीच कब वहां अनामिका आई, उसे पता ही नहीं चला. विजय को मिट्टी में सना देख कर अनामिका को एक खुराफात सू?ा. उसे पता नहीं था कि गड्ढा कितना गहरा है. उसे लगा कि आज मड बाथ लिया जाए. वैसे भी घर पर कोई नहीं है.


अनामिका चुपके से विजय के पीछे गई उसे धक्का दे कर गड्ढे में धकेल दिया. अचानक हुए इस हमले से विजय हैरान रह गया. पर चूंकि अभी गड्ढा सिर्फ 5 फुट तक भरा था, तो उसे ज्यादा महसूस नहीं हुआ.
विजय ने अनामिका को देखा, तो हंस कर बोला, ‘‘इस गड्ढे में मैं अकेला क्या करूंगा… तुम भी आ जाओ.’’
अनामिका भी गड्ढे में कूद गई. वे दोनों अब वहां मस्ती करने लगे. अनामिका का मिट्टी से सराबोर बदन विजय को ललचा रहा था. उस ने अनामिका को बांहों में भर लिया और चूमने लगा.


अनामिका भी उस का साथ देने लगी. इसी बीच गड्ढे में पानी अभी भी भर रहा था. जब अनामिका की गरदन से पानी ऊपर हुआ, तो वह थोड़ा सतर्क हो गई और बोली, ‘‘चलो, अब हम बाहर निकलते हैं.’’
पर जैसे ही विजय ने उचक कर बाहर निकलने की कोशिश की, वह फिसल गया. इस के बाद उस ने कई बार कोशिश की, पर नाकाम रहा. अनामिका ने कहा, ‘‘लगता है, ऐसे बाहर नहीं निकला जाएगा. तुम मु?ो उठाओ. पहले मैं बाहर निकलती हूं.’’


विजय ने ऐसा ही किया. अनामिका तो बाहर चली गई, पर वह जैसे ही विजय को खींचने लगी, तो मिट्टी लगी होने की वजह से दोनों के हाथ बारबार फिसल रहे थे. इस बीच पानी और ज्यादा बढ़ गया था. अनामिका को चिंता हुई. विजय भी थोड़ा घबरा गया था. उस ने कहा, ‘‘दीवार की साइड पर एक सीढ़ी है, जल्दी लाओ.’’ अनामिका ने ऐसा ही किया. जल्दी से गड्ढे में सीढ़ी लगाई और बड़ी मुश्किल से विजय बाहर निकला. विजय की सांसें फूल रही थीं. वह बोला, ‘‘आज तो बालबाल बचे. अगर सीढ़ी न होती तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाता.’’


फिर वे दोनों बाथरूम में गए और एकसाथ नहाए. विजय ने अनामिका को अपनी बहन के कपड़े दे दिए.
अनामिका अभी भी किसी गहरी सोच में थी. विजय ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’ ‘‘ग्रेटर नोएडा वाला कांड तो तुम ने सुना ही होगा?’’ अनामिका ने अपने बाल सुखाते हुए कहा. ‘‘यार, बस सरसरी तौर पर पढ़ा था. क्या हुआ था?’’ विजय ने पूछा. ‘‘27 साल के एक सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की 16 जनवरी, 2026 की आधी रात के बाद उस समय मौत हो गई थी, जब घने कोहरे में उस की कार फिसल कर एक नाले के पास बन रहे शौपिंग कौंप्लैक्स के लिए खोदे गए गड्ढे में गिर गई थी.


‘‘युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि उन का बेटा ‘मेरी मदद करो… मेरी मदद करो…’ चीख रहा था. लोग वीडियो बना रहे थे, पर कोई उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहा था. मैं ने उन्हें डांटा, फिर भी कोई कोशिश नहीं की गई. मेरे बेटे की मौत बेवजह हुई. ‘‘लोग राजकुमार मेहता का दर्द कभी नहीं सम?ा पाएंगे, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने बेटे युवराज को कार में डूबते हुए देखा. राजकुमार मेहता का कहना था कि हादसे वाली जगह पर 80 कर्मचारी मौजूद थे, पर कोई भी पानी में नहीं उतरा.’’


‘‘यह तो दर्दनाक मौत थी. प्रशासन और सरकार ने क्या किया?’’ विजय ने अफसोस जताते हुए पूछा.
‘‘पुलिस ने युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता की शिकायत पर 2 रियल एस्टेट डेवलपर्स एमजेड विजटाउन प्लानर्स और लोटस ग्रीन्स के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, जिस में उस ने लोकल अफसरों पर लापरवाही का आरोप लगाया और जवाबदेही की मांग की. विजटाउन प्लानर्स के बड़े अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया.’’


‘‘यह तो बहुत बड़ा सियासी मुद्दा भी बन गया. क्या विपक्ष ने सरकार को नहीं घेरा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘बिलकुल घेरा. देखने पर यह एक साधारण सी मौत लगती है और सरकार इसे बिल्डरों की लापरवाही मान रही है या इसे भ्रष्टाचार के एंगल से खंगाल रही है, पर इस मामले पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं समाज में जड़ें फैलाती लालच की वह लत भी है, जो भारतीय शासन की जवाबदेही निगल गई है.


‘‘दूसरी ओर राजकुमार मेहता ने कहा कि वे मुख्यमंत्री योगी से एक बार मिलना चाहेंगे. इस से उन्हें मन की शांति मिलेगी. वैसे, सरकार की ओर से उन्हें भरोसा दिया गया है कि उन्हें सही दिशा में उचित सहयोग मिलेगा. ‘‘इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी योगी सरकार को घेरा. उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के लिए सीधेतौर पर सरकार जिम्मेदार है.


‘‘उन्होंने आगे कहा कि हादसे वाली जगह पर पहुंचने के बाद भी सरकार और उस के तमाम महकमे इंजीनियर युवराज को बचा नहीं पाए. पानी ठंडा होने की वजह से कोई उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया. अखिलेश यादव ने मीडिया को भी नसीहत दी कि मौत के बाद किसी की इमेज खराब करने वाले वीडियो न चलाए जाएं. ‘‘ज्यादा दबाव पड़ने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी लोकेश एम. को उन के पद से हटा दिया. हादसे की जांच के लिए 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन किया गया. मेरठ जोन के एडीजी एसआईटी के अध्यक्ष बनाए गए.


‘‘इधर, पुलिस कमिश्नर (कानून व्यवस्था) डाक्टर राजीव नारायणी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद है. सूचना मिलते ही दमकल टीम सभी उपकरणों के साथ मौके पर पहुंची और बचाव का काम शुरू किया गया. एसडीआरएफ की मदद से अंतिम बचाव अभियान चलाया गया. उस समय विजिबिलिटी जीरो थी, लेकिन युवराज को बचाया नहीं जा सका.’’ ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बिल्डरों के खिलाफ किन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘धारा 105 (अनजाने में हत्या), धारा 106 (1) (किसी व्यक्ति की लापरवाही या असावधानी के कारण हुई मृत्यु) और धारा 125 (मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना) एफआईआर दर्ज की गई है,’’ अनामिका ने बताया. ‘‘यार, यह सुन कर तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. बड़ा ही दिल दहलाने वाला कांड है,’’ विजय बोला. ‘‘इस पूरे मामले को राजकुमार मेहता ने कुछ इस तरह बताया था… ‘शुक्रवार की आधी रात को 12 बज कर,


20 मिनट पर मेरे पास युवराज का फोन आया. वह घर आने ही वाला था, इसलिए सम?ा नहीं आया कि वह मु?ो क्यों फोन कर रहा है. ‘‘‘मैं ने फोन उठाया. दूसरी तरफ से एक डरी हुई आवाज सुनाई दी. उस ने कहा कि ‘पापा… पापा… मैं नाले में गिर गया हूं, मैं मरना नहीं चाहता… प्लीज, मु?ो बचा लीजिए’.
‘‘‘यह सुन कर मैं उन्हीं कपड़ों में बाहर भागा. सोसाइटी से निकलने से पहले मैं ने एक मैसेज टाइप किया और उसे सोसाइटी के ग्रुप में पोस्ट कर दिया, ताकि मदद मिल सके.


‘‘‘मेरे बेटे ने जिस नाले का जिक्र किया था, वह हमारी सोसाइटी से 200 मीटर दूर था. मैं दौड़ कर उस नाले के पास गया. वहां, मैं घने कोहरे और अंधेरे में 30 मिनट तक अपने बेटे को ढूंढ़ता रहा, आवाज लगाने की कोशिश करता रहा, ताकि कोई जवाब मिले. फिर मु?ो लगा कि मैं गलत जगह ढूंढ़ रहा हूं.
‘‘‘रात के साढ़े 12 के आसपास वहां वीडियो बना रहे लोगों से मैं ने कहा कि प्लीज, मेरे बेटे को बचा लीजिए. इस के बाद मैं सड़क के किनारे पहुंचा, जहां एक इमारत का निर्माण अधूरा था.
यहां बेसमैंट के लिए एक गड्ढा खोदा गया था.


‘‘‘वहां पहुंच कर मैं चिल्लाने लगा. मेरी आवाज सुन कर मेरा बेटा भी चीख उठा… ‘बचाओ… बचाओ… मेरी मदद करो…’ की आवाज सुन कर मैं सम?ा गई कि मेरा बेटा यहां गिर गया है. ‘‘‘मैं थोड़ा आगे बढ़ा और कोहरे में से देखा कि कार पानी में थी और मेरा बेटा उस की छत पर लेटा हुआ था. वह सड़क से तकरीबन 50 से 60 फुट दूर था. वह धीरेधीरे डूब रहा था. किनारे पर खड़े लोगों को यह बताने के लिए कि वह जिंदा है, अपने मोबाइल फोन की लाइट बारबार जलाबु?ा रहा था.


‘‘‘मैं ने डायल 112 पर फोन किया. मैं उसे अपनी आंखों के सामने डूबते हुए देख रहा था. वहां और भी लोग थे, लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था. कुछ लोग वीडियो बना रहे थे, मैं ने उन से कहा कि प्लीज, वीडियो बनाना बंद करें, मेरे बेटे की मदद करें.’’’ इतना बता कर अनामिका चुप हो गई. थोड़ी देर के बाद विजय ने पूछा, ‘‘बचाव अभियान कब शुरू हुआ?’’ ‘‘खबरों के मुताबिक, रात के तकरीबन पौने 1 बजे पुलिस और फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी डायल 112 के साथ मौके पर पहुंची. तब तक घना कोहरा छा चुका था. सब से पहले, पुलिस और फायर ब्रिगेड ने रस्सी फेंक कर बचाव का काम शुरू किया.


‘‘पर वह रस्सी युवराज तक नहीं पहुंच रही थी. कुछ पुलिस अफसर कह रहे थे कि पानी बहुत ठंडा है और उस में उतरना मुश्किल है. कुछ का कहना था कि हादसे वाली जगह के नीचे लोहे की छड़ें हो सकती हैं.
‘‘इस के बाद क्रेन बुलाई गई, लेकिन क्रेन भी युवराज तक नहीं पहुंच पाई. वह सिर्फ 30-40 फुट तक ही जा पा रही थी. वहां मौजूद कोई भी आदमी पानी में उतरने की कोशिश नहीं कर रहा था. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि गड्ढा शायद 15 से 20 फुट गहरा था, इसलिए अगर गोताखोर वहां होते तो उन के बेटे की जान बच सकती थी.


‘‘एसडीआरएफ की टीम रात के तकरीबन सवा 1 बजे पहुंची. उन लोगों के पास भी पर्याप्त संसाधन नहीं थे. इसी बीच युवराज की कार पूरी तरह पानी में डूब गई. कार के ऊपर लेटे हुए युवराज भी पानी में समा गए. सब लोग बस यह सब देखते रह गए. ‘‘सर्चलाइट, क्रेन और सीढ़ी की मदद से टीम पानी में उतरी. 2 घंटे की मशक्कत के बाद युवराज की लाश तकरीबन सवा 4 बजे बरामद की गई. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने कहा कि इस घटनास्थल को ले कर पहले भी शिकायतें की गई थीं, पर सब लोग सोते रहे. उन्होंने अपने बेटे की मौत के लिए नोएडा प्रशासन को दोषी ठहराया.’’


‘‘वे बिलकुल ठीक कह रहे हैं. सरकारें घर उजाड़ने के लिए बुलडोजर तो चला रही हैं, पर इस तरह के मौत के गड्ढे भरने के लिए कुछ नहीं कर रही है. बिल्डरों पर गाज गिराने से कुछ नहीं होगा. कौन सा बिल्डर चाहेगा कि उस का प्रोजैक्ट समय पर पूरा न हो. पर प्रशासन के नियमकानून इतने पेचीदा बना दिए जाते हैं कि लोग कानून के शिकंजे में फंस कर रह जाते हैं. ‘‘यह हादसा तो एक इंजीनियर के साथ हुआ है और इस कांड के वीडियो भी बन गए, तभी प्रशासन इतना जल्दी कार्रवाई करता दिख रहा है. दूरदराज के इलाकों में न जाने कितने युवराज अपनी जिंदगी से खेल रहे हैं, किसे इस बात की चिंता है.’’


‘‘विजय, सवाल यह नहीं है कि कौन गुनाहगार है और उसे सजा मिलेगी या नहीं, पर मुद्दा यह भी है कि क्या एक जवान लड़के की ऐसी मौत देखने के बाद उस के पिता कभी सब्र का घूंट पी सकेंगे…’’ अनामिका बोली. ‘‘कभी नहीं. इस तरह की मौत देश की तरक्की की भी पोल खोलती है, क्योंकि तरक्की का मतलब यह नहीं है कि ऊंचीऊंची इमारतें बना देना, जबकि असली तरक्की का मतलब है लोगों के मन से असुरक्षा का भाव खत्म होना.


‘‘दिल्ली के इतना पास एक पढ़ालिखा नौजवान सिर्फ इसलिए मर गया कि वह रात के अंधेरे में पानी से लबालब ऐसे गड्ढे में जा गिरा, जो वहां होना ही नहीं चाहिए था. यह देश के रहनुमाओं पर एक तरह की लानत है कि वे अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में नाकाम हो रहे हैं,’’ विजय ने अपने दिल की भड़ास निकाली. अनामिका चुप थी. वह बाहर आंगन में खोदे गए गड्ढे को देख रही थी, जिस में अब भी गंदला पानी जमा था.  Hindi Story
   

Misa Bharati: आखिर क्या करते हैं बिहार की राजनीति के सबसे रसूखदार परिवार के दामाद

Misa Bharati: लालू प्रसाद यादव की सबसे बड़ी बेटी मीसा भारती की शादी 1999 में शैलेश कुमार से हुई थी. आपको बता दें कि शैलेश पेशे से इंजीनियर हैं. वे उस समय इंफोसिस में काम करते थे. शैलेश ने बड़ौदा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. शैलेश ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ICICI बैंक और फिर इंफोसिस जैसी प्रतिष्ठित कंपनी में काम किया. शैलेश ने मीसा भारती के साथ शादी के बाद नौकरी छोड़ दी थी. शैलेश कुमार पटना के बिहटा के रहने वाले हैं. उनके पिता रामबाबू पथिक एक बैंक कर्मी थे जो अब नौकरी से रिटायर्ड हो चुके हैं.

शैलेश कुमार ने पार्टी के चुनावी कैंपेन में भी काम किया है. खबरें थीं कि उन्हें विधानपरिषद भेजा जाएगा और वे लालू परिवार से राजनिति में आने वाले छठवें सदस्य होते, फिलहाल वे अपना खुद का व्यवसाय संभालते हैं.

समरेश सिंह से रोहिणी आचार्य की शादी 24 मई, 2002 को हुई थी, जो बिहार की एक चर्चित शादी थी. उस समय बिहार में लालू की पत्नी राबड़ी देवी की सरकार थी. राबड़ी के दोनों भाइयों (साधु और सुभाष यादव) ने शादी के दौरान मेहमाननवाजी के लिए पटना में कई शोरूमों से गाड़ी और अन्य सामान बिना पैसा दिए गुंडई करते हुए उठा लिए थे.

समरेश सिंह एक प्रसिद्ध इन्वेस्टमेंट बैंकर हैं. 2002 में शादी के बाद से वे सिंगापुर में बस गए हैं. उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की है और वर्तमान में सिंगापुर की ‘एवरकोर’ में इन्वेस्टमेंट बैंकिंग और मर्जर एंड एक्विजिशन के मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे हैं. समरेश सिंह, पूर्व इनकम टैक्स कमिश्नर-रैंक अधिकारी राव रणविजय सिंह के बेटे हैं. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से मास्टर डिग्री और प्रतिष्ठित INSEAD बिजनेस स्कूल से एमबीए की पढ़ाई की है. उन्होंने स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में वरिष्ठ पदों पर काम किया है और विलय तथा अधिग्रहण (M&A) विशेषज्ञ भी माने जाते हैं.

लालू प्रसाद यादव की तीसरी बेटी चंदा कानून की पढ़ाई कर चुकी हैं. चंदा यादव की शादी 2006 में विक्रम सिंह से हुई जो पेशे से पायलट हैं. विक्रम लंबे समय तक इंडियन एयरलाइंस/एयर इंडिया से जुड़े रहे. लालू परिवार में चंदा यादव और विक्रम सिंह राजनीतिक हलकों में सबसे कम चर्चा में रहने वाला जोड़ा है.

लालू प्रसाद यादव की चौथी बेटी रागिनी यादव हैं. रागिनी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन उसे पूरा नहीं कर सकीं. रागिनी लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करती हैं. उनकी शादी राहुल यादव ही हुई, जिन्होंने स्विट्जरलैंड से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की है. वे एक व्यवसायी हैं. उनके पिता जितेंद्र यादव उत्तर प्रदेश के बड़े नेता रहे हैं. राहुल खुद भी राजनीति में सक्रिय हैं और समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए हैं.

लालू प्रसाद यादव की 5वीं बेटी हेमा यादव ने बीआईटी (BIT) मेसरा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. वे परिवारिक जीवन पर ज्यादा ध्यान देती हैं. उनकी शादी विनीत यादव से हुई है, जिनकी पढ़ाई दिल्ली और बेंगलुरु से हुई है. विनीत दिल्ली के एक बड़े व्यवसायी हैं. वे रियल एस्टेट सेक्टर में सक्रिय हैं. उनका परिवार भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में रसूख रखता है.

अनुष्का ‘धन्नू’ राव. अनुष्का पेशेवर तौर पर इंटीरियर डिजाइनर हैं, जो लालू प्रसाद यादव की छठी बेटी हैं. अनुष्का राव की शादी चिरंजीव राव से हुई है, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है. चिरंजीव राव पूरी तरह से राजनीति में सक्रिय हैं. वे हरियाणा की रेवाड़ी सीट से कांग्रेस के विधायक रह चुके हैं. वे हरियाणा युवा कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं. उनके पिता कैप्टन अजय सिंह यादव हरियाणा सरकार में मंत्री रहे हैं.

तेज प्रताप सिंह यादव राजलक्ष्मी यादव के पति और लालू यादव के सबसे छोटे दामाद हैं. उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा देहरादून और दिल्ली से की. इसके बाद इन्होंने ब्रिटेन की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की डिग्री ली. ये मुलायम सिंह यादव के पोते हैं और नेता हैं. ये उत्तर प्रदेश के मैनपुरी से सांसद रह चुके हैं और वर्तमान में समाजवादी पार्टी के प्रमुख युवा चेहरों में गिने जाते हैं.Feature Story

News Story: ‘जी राम जी’ का बवाल

News Story: शनिवार का दिन था. शाम के 6 बज रहे थे. विजय घर पर अकेला था. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. विजय ने दरवाजा खोला. बाहर अनामिका खड़ी थी. वह दनदनाती हुई भीतर आई. उस का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था.‘‘क्या हुआ? घायल शेरनी क्यों बनी हुई हो? सब ठीक है न? तुम तो अपनी सहेली के घर गई थी,’’ विजय ने पूछा. ‘‘सत्यानाश हो गया. और तुम तो अपना मुंह खोलो ही मत. सब तुम्हारा ही कियाधरा है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘मैं ने क्या किया? सुबह तो तुम्हारा मूड एकदम ठीक था,’’ विजय बोला.
इतने में अनामिका ने अपने बैग से एक प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप निकाली और विजय के सामने रख दी. ‘‘यह क्या है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम्हारी करतूत…’’ अनामिका बोली, ‘‘मैं प्रैग्नेंट हूं. कहा था कि प्रोटैक्शन लगा लेना, पर तुम्हें तो अपने मजे से मतलब है.’’ वह स्ट्रिप देख कर विजय के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने कांपते हाथ से वह स्ट्रिप उठाई और अपना माथा पकड़ लिया. ‘‘अब मुंह से कुछ बोलोगे या ऐसेही माथा पकड़े इसे घूरते रहोगे?’’ अनामिका बोली तुम  ही क्यों कोस रही हो? सारी गलती क्या मेरी है? तुम्हें भी तो ध्यान रखना चाहिए था. सब तुम्हारी लापरवाही का नतीजा है,’’ विजय बोला. ‘तुम सही कह रहे हो. यहां मैं तुम्हारी जीहुजूरी करती रहूं और वहां केंद्र सरकार चाहती है कि दुनिया ‘जय राम जी’ बोलती रहे,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब यहां केंद्र सरकार कहां से आ गई?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम और केंद्र सरकार एकजैसे हो. सारी गलती सामने वाले की. अब बताओ कि मनरेगा का नाम बदल कर ‘जी राम जी’ करने की क्या तुक थी?’’ ‘‘तुम किस बारे में कह रही हो?’’ विजय ने कहा. अनामिका ने कहा, ‘‘मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के बारे में, जो भारत की गांवदेहात से जुड़ी सब से बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना रही है. यह साल 2005 में कांग्रेस सरकार के समय में लागू हुई थी. यह योजना गांवदेहात में 100 दिनों का गारंटेड रोजगार देती थी, जिस से गरीबों, किसानों और मजदूरों को पैसे के तौर पर ताकत मिलती थी. ‘‘पर अब केंद्र की मोदी सरकार ने चूंकि इस योजना से जुड़ा नया बिल पास किया है और इस का ‘विकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘वीबी–जी राम जी’ नाम दिया है, तो इस पर विपक्ष ने बवाल मचाया है.’’


‘‘इस बारे में किस ने क्या कहा है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस पर गहरा एतराज जताया है. ‘द हिंदू’ अखबार में एक लेख के जरीए मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि मनरेगा को बुल्डोज कर दिया गया है. ‘‘सोनिया गांधी ने आगे कहा कि सरकार ने पिछले 11 सालों में इसे कमजोर किया और अब ‘वीबी–जी राम जी’ बिल से इसे पूरी तरह बदल दिया है, जो एक काला कानून है. वजह, केंद्र सरकार द्वारा यह बिल बिना बहस, राज्यों से सलाह या विपक्ष की सहमति के बिना पास किया गया. नया कानून केंद्र सरकार को रोजगार तय करने का हक देता है, जो जमीनी हकीकत से दूर है.


‘‘सोनिया गांधी ने इसे करोड़ों किसानों, मजदूरों और गरीबों के हितों पर हमला बताया और कांग्रेस द्वारा इस का विरोध करने का वादा किया. उन्होंने मनरेगा को महात्मा गांधी के सर्वोदय (सभी का कल्याण) का प्रतीक बताया और इस के ध्वस्त होने को नैतिक नाकामी कहा, जो सालों तक माली और इनसानी नुकसान पहुंचाएगा,’’ अनामिका ने कहा. यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘लेकिन क्या तुम जानती हो कि मनरेगा से पहले इस योजना का नाम नरेगा था. मई, 2004 में तब की संप्रग सरकार ने गांवदेहात के इलाकों के लिए एक रोजगार योजना को अपने न्यूनतम सा?ा कार्यक्रम में शामिल किया था. ‘‘भारत में 11वीं पंचवर्षीय योजना (साल 2007-12) पर काम शुरू होने से पहले ही इस पर काम करने वाले वर्किंग ग्रुप ने उस समय देश में मौजूद करीब 36 फीसदी गरीब आबादी पर खास चिंता जताई थी. उसी समय से गांवदेहात के इलाकों के लिए एक योजना बनाने पर काम शुरू हो गया था.


‘‘हालांकि, इस से पहले ही वीपी सिंह वाली केंद्र सरकार ने ऐसी योजना पर विचार किया था, लेकिन वह योजना कामयाब नहीं हो पाई थी. दिसंबर, 2004 में नैशनल रूरल गारंटी स्कीम (नरेगा) का विधेयक पेश किया गया था. ‘‘यह योजना मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य में चल रही एक रोजगार योजना से प्रेरित थी. उस के बाद यह विधेयक उस समय ग्रामीण विकास मंत्रालयकी संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था. जून, 2005 में समिति के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने इसे आजादी के बाद का सब से खास बिल बताया था.
‘‘अब केंद्र सरकार ने नए अधिनियम को ‘विकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘वीबी–जी राम जी’ नाम दिया है. केंद्र सरकार के इस नए अधिनियम में नाम के अलावा भी कई बदलाव किए गए हैं, जैसे नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोजगार देने का प्रस्ताव है.


‘‘मजदूरों को उन की मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या अधिकतम 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा. इस योजना के तहत होने वाले कामों को 4 मुख्य क्षेत्रों में बांटा गया है, जैसे जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, बाजार और भंडारण जैसे आजीविका इन्फ्रास्ट्रक्चर और जलवायु में बदलाव से निबटने वाले काम. ‘‘इन सभी का रिकौर्ड ‘विकसित भारत नैशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैक’ नाम के नैशनल डाटाबेस में रखा जाएगा. भ्रष्टाचार रोकने के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी, जियोटैगिंग और जीपीएस आधारित रियलटाइम मौनिटरिंग को अनिवार्य बनाया गया है. ‘‘सब से बड़ा रणनीतिक बदलाव योजना की फंडिंग में हुआ है. अब तक मनरेगा पूरी तरह केंद्र प्रायोजित थी, लेकिन अब यह 60:40 के अनुपात (केंद्र:राज्य) पर आधारित होगी, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 होगा. इस के अलावा, यह अब पूरी तरह ‘डिमांड ड्रिवन’ नहीं रहेगी.


‘‘केंद्र सरकार हर साल राज्यों के लिए एक निश्चित बजट तय करेगी. अगर राज्य उस बजट से ज्यादा खर्च करते हैं, तो अतिरिक्त बो?ा उन्हें खुद उठाना होगा. इस पूरी योजना का सालाना बजट तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपए आंका गया है.’’ ‘‘दूर के ढोल सुहावने. तुम तो इस बिल का कागजी करतब बता रहे हो, जमीनी हकीकत से इस का दूरदूर तक कोई नाता नहीं है,’’ अनामिका बोली. ‘ तुम कहना क्या चाहती हो?’’ विजय ने कहा. ‘‘यही कि किसी बिल में अगर सुधार करना भी है, तो उस के लिए योजना का नाम बदलने की क्या जरूरत है? पहले यह योजना महात्मा गांधी के नाम पर थी, तो अब इसे ‘जी राम जी’ क्यों बना दिया गया है?’’ अनामिका बोली.


‘‘अरे, ‘जी राम जी’ बोलने में क्या हर्ज है? अब सनातनी भारत में ‘जी राम जी’ ही बोला जाएगा न?’’ विजय ने कहा. ‘‘बस, यहीं पर मु?ो सरकार की नीयत में खोट नजर आता है. भारत जैसे सैकुलर देश में जहां कई धर्मों के लोग रहते हैं, वहां धर्म विशेष और उस में भी ‘राम’ का नाम जोड़ने की क्या वजह थी? ‘‘फिर प्रियंका गांधी की कही बात भी तो सच ही लगती है. उन्होंने कहा, ‘मु?ो नाम बदलने की यह सनक सम?ा नहीं आती. इस में खर्चा बहुत होता है, इसलिए मु?ो सम?ा नहीं आता कि वे बेवजह ऐसा क्यों कर रहे हैं. मनरेगा ने गरीब लोगों को 100 दिन के रोजगार का अधिकार दिया था. यह बिल उस अधिकार को कमजोर करेगा…’


‘‘इस के आगे प्रियंका गांधी बोलीं, ‘उन्होंने दिनों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ाई है. पहले ग्राम पंचायत तय करती थी कि मनरेगा का काम कहां और किस तरह का होगा, लेकिन यह बिल कहता है कि केंद्र सरकार तय करेगी कि फंड कहां और कब देना है, इसलिए ग्राम पंचायत का अधिकार छीना जा रहा है. हमें यह बिल हर तरह से गलत लगता है.’ ‘‘जहां तक सैकुलर होने की बात है तो ‘जी राम जी’ जैसे नाम वाली सरकारी योजनाओं से हर केंद्र सरकार को परहेज करना चाहिए. हमारे देश में 75 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो गरीब हैं और उन में से ऐसे हैं जो सालभर दिहाड़ी मजदूरी नहीं कर पाते हैं. वे सभी ‘राम भक्त’ तो नहीं हैं. इस तरह की योजना से देश के गैरहिंदुओं को लगेगा कि सरकार जानबू?ा कर चाहती है कि धर्म विशेष के लोग सिर्फ योजना के नाम से ही इस का फायदा न लें पाएं.


‘‘गैरहिंदू ही क्यों, एससी और एसटी तबके के बहुत से लोग हिंदू देवीदेवताओं की पूजा नहीं करते हैं खासकर अंबेडकरवादी सोच के लोग भी इस योजना से कन्नी काट सकते हैं या फिर उन्हें उकसाया जा सकता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार सिर्फ रामभक्तों के लिए यह योजना लाई है? ‘‘मेरा ऐसा कहने की एक वजह यह है कि हिंदुओं के भी हजारों देवीदेवता हैं. शैव भक्त क्या राम भक्त हो सकते हैं, क्योंकि उन का पूजा करने का अपनाअपना तरीका है.’’ ‘‘तुम मामले को बेवजह धार्मिक रंग दे रही हो. सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है,’’ विजय ने कहा. ‘‘मेरी मंशा सही है, पर सरकार के इन सांसद की भी सुन लो. जब इस बिल पर चर्चा हो रही थी, तब उस में भाग लेते हुए भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था कि प्रभु राम चाहते थे तो मंदिर बन गया और अब वे चाहते हैं कि विकसित गांव बनें.

यह विधेयक रामराज्य लाने के लिए लाया गया है, गांधीजी के सपनों को पूरा करने के लिए लाया गया है.
‘‘बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था कि ‘जी राम जी’ से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांवों का चौतरफा विकास होगा व भ्रष्टाचार रुकेगा. इस विधेयक से हिंदुत्व और सनातन की भावना उभर कर सामने आई है.’’ ‘‘तो तुम्हारा यह मानना है कि इस से देश को रफ्तार नहीं मिलेगी?’’ विजय ने कहा. ‘‘रफ्तार तो मनरेगा से ही मिल रही थी. अगर बिल में कुछ अच्छे बदलाव होते तो बात सम?ा में आती, पर यहां तो ‘जी राम जी’ का खेल चल रहा है. कहीं ऐसा न हो कि इस योजना का ही ‘राम नाम सत्य’ हो जाए और साथ ही ऐसे करोड़ों लोगों के सपने बिखर जाएं जो साल के 365 दिनों में इज्जत से 100 दिन की मजदूरी पा कर अपने घरों में चूल्हा जलाते हैं,’’ अनामिका ने कहा.


‘‘तुम्हें तो हर बात में कमी निकालनी है और कुसूर मोदी सरकार पर मढ़ना है. कभी तारीफ भी तो कर दिया करो,’’ विजय ने कहा. ‘‘जैसे तुम ने सारा कुसूर मु?ा पर मढ़ दिया कि मेरी गलती से मैं प्रैग्नेंट हुई
हूं. क्यों सही कहा न?’’ अनामिका ने ताना कसा. ‘और नहीं तो क्या… जब तुम्हें पता है कि अभी हम शादी नहीं कर सकते हैं, तो क्यों यह बवाल खड़ा किया. अब कहीं इसे साफ कराओ,’’ विजय बोला. ‘‘यार, तुम तो बड़े दब्बू निकले. जैसे ही जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो मु?ा पर भड़ास निकाल दी,’’ अनामिका ने कहा, ‘‘तुम सत्ता पक्ष के हिमायती लोगों को यही बीमारी है कि जब मामला हाथ से निकल जाए, तो सामने वाले को ही कोस दो. ‘‘पर डरो मत. यह प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप मेरी नहीं है. यह तो मेरी सहेली की बड़ी बहन की है, जिस की शादी को 2 साल हो गए हैं और अब उस के घर यह खुशखबरी आई है. ‘मैं खुद अभी जल्दबाजी में शादी नहीं करना चाहती. अभी तो हमें और ज्यादा एकदूसरे को सम?ाना है,’’ कह कर अनामिका ने अपनी बात खत्म की. यह सुन कर विजय की सांस में सांस आई और उस ने अनामिका को गले से लगा लिया. News Story: 
          

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