Humour : एक शाम थाने के नाम

Humour. एक लंबी सांस लेने के बाद प्रभु दयाल अपने घर की ओर जा रहा था कि उस ने देखा कि लालबत्ती के पास कुछ लोग जमा हो रहे हैं.

माजरा क्या है, यह जानने के लिए जब वह उन लोगों के पास पहुंचा तो पता चला कि जेब काटने के दौरान मिले माल के बंटवारे को ले कर 2 जेबकतरे आपस में झगड़ रहे थे.

तभी गश्त पर निकले 2 पुलिस वाले मोटरसाइकिल पर वहां आ धमके. होशियार लोग तो वहां से खिसक गए, लेकिन प्रभु दयाल पुलिस वालों के हत्थे चढ़ गया.

एक पुलिस वाला प्रभु दयाल की कलाई जोर से पकड़ कर बोला, ‘‘चल, थाने चल. चौकचौराहे पर झगड़ाफसाद करता है, दंगा करता है…’’

घबराया हुआ प्रभु दयाल घिघियाते हुए बोला, ‘‘अरे भाई साहब, मैं शरीफ आदमी हूं. मैं ने कुछ नहीं किया है. मुझे क्यों पकड़ रहे हैं? दंगा करने वाले बदमाश तो भाग गए.’’

दूसरा पुलिस वाला थोड़ा अकड़ कर बोला, ‘‘थाने चल, वहीं तुझे सब बताएंगे.’’

चौकचौराहे पर पुलिस के डंडे खाने के बजाय प्रभु दयाल ने थाने चलने में ही भलाई समझी.

थाने में प्रभु दयाल को जिस सबइंस्पैक्टर के सामने पेश किया गया, वह पहले से ही थाने लाए गए कुछ लोगों से निबटने में लगा था.

सबइंस्पैक्टर एक नौजवान को डांट रहा था, ‘‘देखो, तुम ने सरकारी जमीन को घेर कर रेहड़ी लगा रखी है. तुम्हारी अच्छी आमदनी होती है, तो फिर बीट कांस्टेबल से झगड़ा क्यों करते हो?

‘‘आपसी तालमेल से सब ठीकठाक चलता रहेगा. बीट कांस्टेबल जो कहता है मान लो, अकेले सब हजम करना तो ठीक नहीं है.’’

वह नौजवान घिघियाता हुआ बोला, ‘‘साहबजी, कोई नौकरी न मिलने पर ही यह काम शुरू किया था.

‘‘देखने से ही ऐसा लगता है कि हमें खूब कमाई हो रही है, पर हकीकत में ऐसा नहीं है. पुलिस वाले हर महीने पैसे बढ़ा कर लेना चाहते हैं. बताइए, उन को हम कैसे खुश रखें? आप मालिक हैं, हमें इंसाफ दीजिए.’’

सबइंस्पैक्टर पानी के साथ दवा की गोली गटकते हुए बोला, ‘‘हम फुजूल में किसी को तंग नहीं करना चाहते. तुम थोड़े कहे को ही ज्यादा समझो. बीट अफसर को खुश रखो. अब भाग लो यहां से. आगे से कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए. पानी में रह कर मगर से बैर न पालो.’’

अब अगला नंबर एक एसटीडी बूथ चलाने वाले का था. सबइंस्पैक्टर उस आदमी से बोला, ‘‘लालाजी, तय रेट से ज्यादा पैसा वसूल रहे हो. बहुत बड़ा जुर्म है यह. जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी. तुम्हारे खिलाफ जो शिकायतें आई हैं, उन का निबटारा कर लो, नहीं तो तुम्हारे साथ बुरा हो सकता है. समझ गए न?’’

अब अगला नंबर प्रभु दयाल का था. सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल को घूरते हुए बोला, ‘‘आंखों पर चश्मा, जेब में पैन. तुम तो काफी पढ़ेलिखे लगते हो, फिर भी चौकचौराहे पर दंगा क्यों कर रहे थे? सबकुछ खुद ही बता दो. मेरा गुस्सा बहुत बुरा है. तुम मुझे गुस्सा मत दिलाना, नहीं तो बड़ी मार खाओगे.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘गुस्सा आप की सेहत के लिए अच्छा नहीं है साहब. हाई ब्लड प्रैशर के मरीज को तो गुस्से से हमेशा दूर ही रहना चाहिए.’’

सबइंस्पैक्टर हैरान हो कर बोला, ‘‘तुम्हें कैसे पता है कि मैं हाई ब्लड प्रैशर का मरीज हूं? यह तो कमाल है.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘साहबजी, यह तो छोटी सी बात है. मुझे तो यह भी मालूम है कि कुछ देर पहले आप कोर्ट में पेश होने वाले बदमाशों की फाइल की लिखापढ़ी में लगे थे. मैं ठीक कह रहा हूं न?’’

सबइंस्पैक्टर को लगा जैसे उस के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा है, जो दीवारों के आरपार देख सकता है.

लोहा गरम देख प्रभु दयाल ने एक और चोट की, ‘‘साहबजी, मुझे तो यह भी पता?है कि आज आप ने चावल और रोटी के साथ कौन सी सब्जी खाई है. आज आप ने लंच में कद्दू की सब्जी खाई है. ठीक कहा न?’’

सबइंस्पैक्टर को ऐसा लग रहा था, जैसे उस की कुरसी के नीचे से जमीन खिसक रही है. ऐसे सच्चे भविष्य बताने वाले से तो उस का जिंदगी में कभी सामना ही नहीं हुआ था.

सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आप तो सबकुछ जानते हैं. मैं और मेरे बीवीबच्चों के बारे में भी कुछ बताइए. मैं खुशकिस्मत हूं कि आप जैसे बड़े लोगों के दर्शन हो गए.

‘‘यहां पास ही में मेरा फ्लैट है. क्या आप मेरे घर चल कर कुछ चायनाश्ता करेंगे? इसी बहाने ही सही, आप के साथ मिलनेबैठने का मौका मिल जाएगा.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘फिर किसी दिन सही. आज बस इतना ही.’’

सबइंस्पैक्टर जैसे ही प्रभु दयाल के पैर छूने को आगे बढ़ा, प्रभु दयाल दूर हटते हुए बोला, ‘‘अजी साहब, ऐसा गजब मत कीजिए. अभी तो मैं अपने घर लौटना चाहूंगा, फिर किसी दिन फुरसत से आऊंगा.’’

सबइंस्पैक्टर गरजा, ‘‘मुबारक सिंह, भाई साहब को थाने की जीप में घर छोड़ कर आओ.

‘‘और हां, रास्ते में भोलू हलवाई की दुकान से साहब के बच्चों के लिए 5 किलो देशी घी के गुलाब जामुन दिलवा देना.’’

उधर महल्ले वाले प्रभु दयाल को थाने की जीप से उतरते व पुलिस द्वारा अदब से सलाम मारते देख हैरान थे. कुछ नौजवान भी वहां खड़े थे. उन में से एक ने कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘हमें तो पहले से ही शक था कि अपने में मस्त रहने वाला हमारा यह पड़ोसी प्रभु दयाल बड़ी ऊंची चीज है. थाने की जीप में आया है.’’

इधर, सारी बातें जानने के बाद प्रभु दयाल की बीवी हैरान हो कर पूछ रही थी, ‘‘शेर के मुंह में जाने के बाद भी आप सहीसलामत वापस कैसे आ गए? और साथ में देशी घी के गुलाब जामुन भी ले आए. कैसे हुआ यह चमत्कार? आप को तो ज्योतिष के बारे में कुछ भी नहीं आता, फिर वहां आप भविष्य बताने वाले कैसे बन गए?’’

प्रभु दयाल थोड़ा मुसकरा कर बोला, ‘‘अगर ज्योतिष के द्वारा कुछ बताया जा सकता, तो वाजपेयीजी समय से पहले चुनाव करा कर गद्दी नहीं खोते. ओसामा बिन लादेन कहां छिपा है, यह कब का पता लग गया होता. ज्योतिष के नाम पर जो बातें मैं ने सबइंस्पैक्टर को बताई थीं, वे तो कोई भी बता सकता था…’’

प्रभु दयाल ने राज खोला, ‘‘मैं ने देखा था कि पानी मंगा कर सबइंस्पैक्टर ने एनवास-10 की गोली गटकी थी. इस का मतलब यही था कि वह हाई ब्लड प्रैशर का मरीज है.

‘‘लिखते हुए शायद रिफिल लीक कर गई थी, जिस से उस की उंगली में स्याही लगी थी. इस से साफ जाहिर था कि उस ने थोड़ी देर पहले लिखाई का काम किया है.

‘‘उस की मूंछों में कद्दू की सब्जी का एक छोटा टुकड़ा फंसा हुआ था यानी दोपहर को उस ने कद्दू की सब्जी खाई थी.

‘‘मैं बेकुसूर था और बेमतलब ही फंसाया जा रहा था, सो बचने के लिए ही सबइंस्पैक्टर के सामने मैं ने कुछ बातें हवा में उछाल दी थीं. मेरे बुरे समय पर हाजिरजवाब होने की नीति काम कर गई थी.

‘‘मैं ने उन से एक बार भी नहीं कहा कि मैं कोई पहुंचा हुआ पीरपंडित या भविष्य बताने वाला हूं. अब वह अपनी समझ से खुद ही यह मानने लगा था कि मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी हूं, तो उस हालत में मैं क्या कर सकता था? अंधविश्वासी लोग अकसर अपने जाल में खुद ही फंस जाते हैं.’’

प्रभु दयाल की बीवी बोली, ‘‘आप ने तो कहीं भी कोई गलतबयानी नहीं की. दूसरों की मेहनत की कमाई और हक पर हिस्सापत्ती चाहने वाले ऐसे लोगों को तो सेर का कोई सवा सेर मिलते ही रहना चाहिए.’’

फिर पत्नी अपने बड़े बेटे को बुला कर बोली, ‘‘बेटा, गुलाब जामुन की यह हांड़ी गरीबों में दे आ. कहीं इस धौंसपट्टी की कमाई को खाने से हमारे बच्चों पर भी बुरा असर न पड़ जाए.’’ Humour

Humour :ठोको ताली- शिल्पा ने कैसे सिखाया अनूप और सीमा को सबक?

Humour :

“शिल्पा आज अनूप का फोन आया था.”

“ओफ्फो!! फिर से…”

“अरे! परेशान होने की बात नहीं मैंने कह दिया हम दो दिन के लिए बाहर जा रहे हैं.”

“हम इस तरह कब तक मुंह चुराएंगे, कुछ ऐसा करना पड़ेगा कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.”
अनूप शिल्पा के छोटे भाई का दोस्त है. इसीलिए शिल्पा से पहले से परिचित भी है. नई शादी और उसके ही शहर में रहने के कारण शिल्पा जब भी कुछ नया बनाती उन दोनों को बुला लेती. वह नहीं जानती थी कि वह आ बैल मुझे मार वाला काम कर रही है.

वैसे भी शिल्पा को खाना बनाना और खिलाना दोनों में ही मजा आता था. पर अब तो अनूप और उसकी पत्नी सीमा कभी भी किसी समय आ धमकते और खाने की फरमाइश कर देते.

शिल्पा ने तो उन्हें अंगुली पकड़वाई थी पर वह तो पौंचा ही पकड़ बैठे. उस दिन शिल्पा खाने से फुरसत ही हुई थी कि ये दोनों आ गये.

“शिल्पा दी आज तो आपके हाथ की कढ़ी चावल खाने का बहुत मन हो रहा है.”
“दी, कढ़ी बनाती भी तो इतनी अच्छी है.” मस्का लगाते हुए सीमा बोली.
“दी, वो पकौड़े वाली कढ़ी बनाना और थोड़े पकौड़े ज्यादा बना लेना सूखे खाने के लिए.”

शिल्पा के तो तन बदन में आग सी लग गयी थी फिर भी बनावटी मुस्कान ओढ़कर खाना बनाया. शिल्पा ने अब इन्हें सबक सिखाने का मनसूबा बना लिया था.

शर्मा जी के बेटे की बर्थडे पार्टी से लौटने के बाद शिल्पा काफी थकावट महसूस कर रही थी और बर्तन वाली न आने से बर्तन भी पड़े थे. थोड़ी देर आराम करने की सोच कर लेट गई. तभी उसे अनूप की आवाज सुनाई दी “जीजा जी आज हमारा मन आलू के पराठें खाने का हो रहा था और दीदी के हाथ के पराठों का तो जवाब ही नहीं. बाजार में भी इतने अच्छे नहीं मिलते.”

शिल्पा ने एक चुन्नी सिर पर बांधी और बाहर आकर बोली “मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है अच्छा हुआ सीमा तुम आ गयीं पहले तो सबके लिए चाय बना लाओ.”

पति को चुप रहने का इशारा करती हुई “और हां कुकर धोकर आलू उबलने रख देना, बाई नहीं आई न. आज मैं तुम्हें आलू के पराठें बनाना सिखाऊंगी. आखिर तुम्हें भी तो अनूप की पसंद सीखना होगी.”

प्यार से “तुम तो अपनी हो, तो तुमसे कहने में क्या संकोच मेरी तो तबीयत ठीक नहीं है तो तुम्हें ही चारों के लिए पराठें बनाना होगें.”

चाय से ज्यादा तो सीमा का मन उबल रहा था.”क्या मैं नौकरानी हूं? जो बर्तन भी साफ करूं और सबके लिए पराठें भी बनाऊं.” अनूप से भी बात नहीं कर पा रही थी.

उसने अनूप को व्हाट्सएप पर सारी परेशानी बताई. और साथ ही उपाय भी.

चाय पीने के बाद कप रखने के बहाने अंदर जाकर सीमा ने अनूप को फोन लगाया .

फोन उठाते ही अनूप बोला. जी सर अभी घर पहुंच रहा हूं

“किसका फोन था?” शिल्पा ने पूछा.

“वो दीदी बौस का फोन है घर पर आ रहे हैं तो हमें निकलना पड़ेगा.”

“कोई बात नहीं फिर कभी, जब भी आओगे हम सीमा के हाथ के पराठें खा लेगें.”

अब तो अनूप और सीमा ऐसे नौ दो ग्यारह हुए कि शिल्पा के घर का रास्ता ही भूल गये.

लेखिका- मधु जैन 

Hindi Crime Story : पिंजरे का पंछी – झूठी ख्वाहिशों का दलदल

Hindi Crime Story. कामिनी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. खूब सजधज कर. सामने उसे एक अधेड़ उम्र का आदमी आता दिखाई दिया. उसे लगा कि वह उस की ओर चला आ रहा है. पर यह क्या? वह उस के बगल में खड़ी लड़की के पास चला गया और उस से बातें करने लगा. कामिनी सोचने लगी, ‘अब मेरी जवानी ढलने लगी है, शायद इसीलिए लड़के तो दूर अधेड़ भी मेरे पास आने से कतराने लगे हैं. आज भी मैं कुछ कमा नहीं पाई. अब मैं दीदी को क्या जवाब दूंगी? यही हाल रहा तो एक दिन वे मुझे यहां से निकाल बाहर करेंगी.’

इस के बाद कामिनी पुरानी यादों में खो गई. कामिनी के मातापिता गरीब थे. उस की मां लोगों के बरतन साफ कर के घर का खर्चा चलाती थी.

मातापिता ने कामिनी को अपना पेट काट कर पढ़ाना चाहा और उसे शहर के एक स्कूल में भरती किया. उन का सपना था कि कामिनी भी पढ़लिख कर समाज में नाम कमाए.

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने के बाद कामिनी घर आने के लिए आटोरिकशा का इंतजार करने लगी. तभी उस के सामने एक कार आ कर रुकी. उस कार से एक अधेड़ आदमी बाहर आया. वह कामिनी से बोला, ‘बेटी, यहां क्यों खड़ी हो?’

‘मुझे घर जाना है. मैं आटोरिकशा का इंतजार कर रही हूं.’  ‘बेटी, तुम्हारा घर कहां है?’ वह आदमी बोला. ‘देवनगर,’ कामिनी बोली. ‘मुझे भी देवनगर जाना है. हमारे साथ कार में बैठ जाओ.’

उस आदमी की बात सुन कर कामिनी उस की कार में बैठ गई. कार में 2 आदमी और भी बैठे थे.

कार को दूसरी तरफ अनजानी जगह पर जाते देख कामिनी हैरानी से बोली, ‘अंकल, आप कह रहे थे कि आप को देवनगर जाना है, पर आप तो…’

‘बेटी, मुझे जरूरी काम याद आ गया. मैं किसी दोस्त से मिलने जा रहा हूं. तुम्हें ये लोग तुम्हारे घर छोड़ देंगे,’ कामिनी की बात पूरी होने से पहले ही वह आदमी बोला.

कार आगे दौड़ने लगी. कार को दूसरी दिशा में जाते देख कामिनी बोली, ‘अंकल, यह तो देवनगर जाने का रास्ता नहीं है. आप मुझे कहां ले जा रहे हैं?’

‘बेटी, हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे. उस से पहले हम तुम से एक बात करना चाहते हैं. हम कोई गैर नहीं हैं. हम तुम्हें और तुम्हारे मातापिता को अच्छी तरह से जानते हैं.

‘एक दिन हम ने तुम्हें अपनी सहेली से कहते सुना था कि तुम हीरोइन बनना चाहती हो. तुम चाहो तो हम तुम्हें किसी फिल्म में हीरोइन का रोल दिला देंगे. तब दुनियाभर में तुम्हारा नाम होगा. तुम्हारे पास इतनी दौलत हो जाएगी कि तुम अपने मांबाप के सारे सपने पूरे कर सकोगी.

‘हीरोइन बनने के बाद तुम अपने मातापिता से मिलने जाओगी, तो सोचो कि वे कितने खुश होंगे? कुछ दिनों के बाद तुम्हें फिल्म में रोल मिल जाएगा, तब तक तुम्हें अपने मातापिता से दूर रहना होगा.’

कामिनी की आंखों में हीरोइन बनने का सपना तैरने लगा. वह ख्वाब देखने लगी कि उसे बड़े बैनर की फिल्म मिल गई है. पत्रपत्रिकाओं और टैलीविजन के खबरिया चैनलों में उस के नाम की चर्चा हो रही है. समाज में उस के मातापिता की इज्जत बढ़ गई है. उस के पुराने मकान की जगह पर अब आलीशान कोठी है. सब उसी में रह रहे हैं.

‘बेटी, क्या सोच रही हो?’ उस आदमी के सवाल ने कामिनी का ध्यान भंग किया. ‘अंकल, मैं फिल्म में हीरोइन बनने को तैयार हूं,’ कामिनी ने कहा.

2-3 घंटे के सफर के बाद वह कार शहर से दूर एक इलाके में पहुंच गई. कामिनी को इस जगह के बारे में पता नहीं था. कार से उतर कर वे दोनों आदमी कामिनी को ले कर एक मकान में गए.

दरवाजे पर खटखट करने पर एक मोटी औरत बाहर आई. वहां आसपास खड़ी लड़कियां उसे ‘दीदी’ कह कर पुकार रही थीं.

उन आदमियों को देख कर वह औरत बोली, ‘ले आए तुम नई को?’

‘बेटी, तुम्हें कुछ दिन यहीं रहना है. उस के बाद हम तुम्हें फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे,’ एक आदमीने कहा और वे दोनों वहां से चले गए.

दीदी ने कामिनी के रहने का इंतजाम एक अलग कमरे में कर दिया. वहां सुखसुविधाएं तो सभी थीं, पर कामिनी को वहां का माहौल घुटन भरा लगा.

3 दिन के बाद दीदी कामिनी से बोली, ‘आज हम तुम्हें एक फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे. वे जो भी कहें, सबकुछ करने को तैयार रहना.’

कुछ देर बाद एक कार आई. उस में 2 आदमी बैठे थे. दीदी के कहने पर कामिनी उस कार में बैठ गई. एक घंटे के सफर के बाद वह एक आलीशान कोठी में पहुंच गई. वहां वे आदमी उसे एक कमरे में ले गए.

उस कमरे में एक आदमी बैठा था. उसे वहां के लोग सेठजी कह रहे थे. कामिनी को उस कमरे में छोड़ वे दोनों आदमी बाहर निकले. जाते समय उन में से एक ने कामिनी से कहा, ‘ये सेठजी ही तुम्हारे लिए फिल्म बनाने वाले हैं.’

सेठजी ने कामिनी को कुरसी पर बिठाया. इंटरव्यू लेने का दिखावा करते हुए वे कामिनी से कुछ सवालपूछने लगे. इसी बीच एक आदमी शरबत के 2 गिलास ले कर वहां आया. एक गिलास सेठजी ने पीया और दूसरा गिलास कामिनी को पीने को दिया.

शरबत पीने के बाद कामिनी पर बेहोशी छा गई. उसे जब होश आया, तो उस ने अपने सामने सेठजी को मुसकराते हुए देखा. वह दर्द से कराह रही थी. ‘मेरे साथ धोखा हुआ है. मैं तुम सब को देख लूंगी. मैं तुम्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दूंगी,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तुम्हारे साथ कोई धोखा नहीं हुआ है. तुम फिल्म में हीरोइन बनना चाहती थीं. लो, देख लो अपनी फिल्म,’ कह कर सेठजी ने कंप्यूटर में सीडी डाल कर उसे दिखा दी.

सीडी को देख कर कामिनी सन्न रह गई. उस फिल्म में सेठजी उस की इज्जत के साथ खेलते दिखाई दिए. ‘वैसे तो यह फिल्म हम किसी को नहीं दिखाएंगे. अगर तुम ने हमारी शिकायत पुलिस से की, तो हम इसे सारी दुनिया में पहुंचा देंगे,’ कंप्यूटर बंद करते हुए सेठजी बोले.

कमिनी को इस घटना से सदमा पहुंच गया. वह बेहोश हो गई. कुछ देर बाद वे दोनों आदमी कामिनी को कार में बैठा कर दीदी के पास ले गए. कामिनी गुमसुम रहने लगी. वह न कुछ खाती थी, न किसी से बातें करती थी.

एक दिन दीदी कामिनी के कमरे में आ कर बोली, ‘देखो, यहां जो भी लड़की आती है, वह अपनी इच्छा से नहीं आती. वह कुछ दिनों तक तेरी तरह गुमसुम रहती है, बाद में खुद को संभाल लेती है. इस दलदल में जो एक बार पहुंच गई, वह चाह कर भी वापस नहीं जा सकती.

‘अगर तुम यहां से चली भी गई, तो तुम्हारा समाज तुम्हें फिर से नहीं अपनाएगा, इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम अब यहीं के समाज में रहने का मन बनाओ. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’

दूसरे दिन दीदी ने कामिनी को कार में बिठा कर दूसरे आदमी के पास भेजा. अब वह इसी तरह कामिनी को इधरउधर भेजने लगी. एक दिन दीदी ने कामिनी से कहा, ‘तुझे इधरउधर जाते हुए काफी समय हो गया है. अब मैं तुझे एक नया काम सिखाऊंगी.’

‘नया काम… मतलब?’ कामिनी चौंकते हुए बोली. ‘मतलब यह है कि अब तुझे किसी सेठ के पास नहीं जाना है. तुझे यहीं दुकान में रह कर ग्राहकों को अपनी ओर खींचना है.’ ‘किस दुकान में?’ ‘यहीं.’ ‘लेकिन यह तो मकान है, दुकान कहां है?’

‘यही मकान तुम्हारे धंधे की दुकान है. जैसे शोरूम में अलगअलग डिजाइन के कपड़े सजा कर रखे रहते हैं, वैसे ही तुम्हें यहां सजधज कर आधे कपड़ों में रहना है. तुम्हें कुछ नहीं करना है. बस, यहां से गुजरने वाले मर्दों को ललचाई नजरों से देखना है.’

दीदी के समझाने पर कामिनी सोचने लगी, ‘यहां रहने वाली सभी लड़कियां इस शोरूम की चीजें हैं. शोरूम में रखी चीजों को ग्राहक देख कर पसंद करता है. खरीदने के बाद वे चीजें उसी की हो जाती हैं. ग्राहक उस चीज की इज्जत करता है. हम जिस्म के सौदे की वे चीजें हैं, जिन्हें ग्राहक कुछ देर के लिए खरीद कर मजा ले कर चला जाता है

‘वासना के भूखे दरिंदे हमारे पास आ कर अपनी भूख मिटाते हैं. हम भी चाहते हैं कि हमारा दिल किसी के लिए धड़के. वह एक हो. वह हम पर मरमिटने को तैयार हो. हम भी समाज के रिश्तों की डोर से बंधें.’

पिंजरे में बंद पंछी की तरह कामिनी का मन फड़फड़ा रहा था.

एक दिन कामिनी ने सोच लिया कि वह इस दुनिया से बाहर आ कर रहेगी. ज्यादा से ज्यादा इस कोशिश में उस की जान चली जाएगी. जिस्म के शोरूम की चीज बने रहने से अच्छा है कि वह मौत को गले लगा ले. अगर वह बच गई, तो समाज का हिस्सा बन जाएगी.

कामिनी ने दीदी को भरोसे में ले लिया. अपने बरताव और काम से उस ने दीदी पर असर जमा लिया. दीदी को यकीन हो गया था कि कामिनी ने खुद को यहां की दुनिया में ढाल लिया है.

एक दिन मौका देख कर कामिनी वहां से भाग गई और ट्रेन में बैठ कर अपने घर चली गई. इतने सालों के बाद कामिनी को देख कर उस के भाई खुश हो गए. उन्होंने कामिनी को बताया कि मातापिता की मौत हो चुकी है. वह अपने भाई विनोद और सोहन के साथ रहने लगी.

भाइयों को दुख न पहुंचे, यह सोच कर उस ने अपने बीते दिनों के बारे में कुछ नहीं बताया. कामिनी का भाई विनोद एक कंपनी में काम करता था. उस कंपनी का मालिक रवींद्र नौजवान था. एक दिन वह विनोद के जन्मदिन की पार्टी में उस के घर आया. विनोद ने उस से कामिनी का परिचय कराया. उसे कामिनी पसंद आ गई. धीरेधीरे रवींद्र और कामिनी के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

एक दिन दोनों ने प्रेमविवाह कर लिया. रवींद्र और कामिनी एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. शादी के बाद कामिनी रवींद्र के साथ शहर में किराए के मकान में रहने लगी. एक दिन रवींद्र की कंपनी में बैठक चल रही थी. रवींद्र को याद आया कि उस की जरूरी फाइल तो घर पर ही रह गई है. रवींद्र ने सुपरवाइजर प्रदीप को वह फाइल लेने अपने घर भेज दिया.

रवींद्र के घर पहुंच कर प्रदीप ने दरवाजे पर खटखट की. थोड़ी देर बाद कामिनी बाहर आ गई. ‘कामिनी, तू यहां? तू ने मुझे पहचाना?’ कामिनी को देख कर प्रदीप बोला. ‘नहीं तो,’ कामिनी बोली. ‘वहां मैं तुम्हारे पास कई बार आया करता था. क्या तुझे यहां साहब किराए पर लाए हैं?’

प्रदीप की बात सुन कर कामिनी चुप रही. प्रदीप कामिनी को बांहों में भरने लगा. वह उसे चूमने की कोशिश करने लगा. ‘परे हट जाओ मेरे सामने से,’ कामिनी चिल्लाई. ‘जानम, मैं ने तुम्हें कई बार प्यार किया है. आज यहां तू और मैं ही तो हैं. मेरी इच्छा पूरी नहीं करोगी?’ ‘नहीं, तुम्हें मुझ से तमीज से बात करनी चाहिए. मैं तुम्हारे साहब की बीवी हूं,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तमीज से?’ प्रदीप हंस कर बोला. ‘मैं साहब को तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दूंगा,’ प्रदीप बोला. ‘नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे. मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी.’

‘ठीक है. अगर तुम अपनी जिंदगी बरबाद होने से बचाना चाहती हो, तो मैं जब चाहूं तुम्हें मेरी इच्छा पूरी करनी होगी. तुम्हें यह काम आज और अभी से करना होगा. जिस दिन तुम ने मेरा कहा नहीं माना, मैं तुम्हारी पूरी कहानी साहब को बता दूंगा,’ जातेजाते प्रदीप कामिनी से बोला.

अब प्रदीप रवींद्र की गैरहाजिरी में समयसमय पर कामिनी से मिलने आने लगा.

एक दिन किसी काम से रवींद्र अपने घर समय से पहले आ गया. उस ने प्रदीप और कामिनी को एकसाथ देख लिया. उस ने प्रदीप और कामिनी को बुरी तरह डांटा. उस ने प्रदीप को नौकरी से हटाने की धमकी दी. प्रदीप ने रवींद्र को कामिनी के बारे में सबकुछ बता दिया. रवींद्र ने कामिनी का साथ छोड़ दिया. कामिनी के बारे में जब उस के भाइयों को पता चला, तो उन्होंने भी उसे अपने साथ रखने से मना कर दिया.

कामिनी के पास फिर उसी दुनिया में लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह गया था. ‘‘कामिनी, आज भी कुछ कमाया या नहीं?’’ दीदी की बात सुन कर कामिनी यादों से बाहर आ गई. Hindi Crime Story

Humorous Family Story : सिगरेट की लत

Humorous Family Story. उन की इस आदत से मैं वाकिफ हूं फिर भी पतिदेव की हुक्मउदूली नहीं कर सकती. खाना मेज पर रखेरखे ठंडा हो गया. अपनी आदत के अनुसार वह घंटे भर बाद वापस आए. चाहे कितना कुछ कहूं पर चिकने घड़े की तरह उन पर कुछ असर ही नहीं होता है. मेरा दिल तो शादी के बाद से ही पतिदेव को सिगरेट पीता देख कर सुलगना शुरू हो गया था. मैं जब भी उन के होंठों पर सौतन की तरह सिगरेट को चिपके देखती कसमसा कर रह जाती.

अब तो सिगरेट पीने की लत, शौक से जनून की हद तक बढ़ गई है और घर की तमाम कीमती चीजें फुंकनी शुरू हो गई हैं. कभी सोफे के कवर पर सिगरेट का जला निशान दिखाई देता है तो कभी कारपेट पर. सिगरेट पीने की कोई एक जगह तो बन नहीं सकती, इसलिए तकिए के कवर भी सिगरेट के वार से बच नहीं पाते. अखबार या पत्रिका पढ़तेपढ़ते हाथ में सिगरेट दबाए कब पतिदेव नींद में खर्राटे लेने लगते हैं, उन्हें खुद पता नहीं चलता है.

वह तो जब मैं काम खत्म कर सोने के लिए कमरे में आती हूं तो रजाई व गद्दे से उठते धुएं का रहस्य समझ में आता है. दुखी हो कर एक बार तो मैं ने पतिदेव को धमकी भी दे डाली थी, ‘‘या तो तुम सिगरेट पीना बंद कर दो, वरना मैं तुम से दोगुनी सिगरेट पीना शुरू कर दूंगी.’’ पतिदेव ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘‘यह शुभ काम तुम जितनी जल्दी चाहो शुरू कर लो.’’

पति को खुश देख कर सोचा कोई और चाल चलनी होगी, सो मैं ने ऐलान कर दिया, ‘‘आज से आप घर के अंदर सिगरेट नहीं पिएंगे.’’ ‘अंधा क्या चाहे दो आंखें.’ यह कहावत यहां बिलकुल सटीक बैठी. अब तो पान की दुकान पर देर रात तक मित्रमंडली में जमे रहने का उन्हें एक बहाना मिल गया. अब मैं पति के इंतजार में कुढ़ती रहती हूं. कुछ कह भी नहीं पाती.

मसूरी में हिमपात हुआ तो पति ने मुझे खुश करने के लिए स्नोफाल देखने का प्रोग्राम बना डाला. वहां पहुंचे तो स्नोफाल नहीं देख सके, क्योंकि दिल्ली की बरसात की तरह स्नोफाल रूपी बादल बरस चुके थे. हां, वहां पहुंच कर बर्फ पर पैर फिसलने का खतरा मुझे जरूर लग रहा था. नीचे से आते हुए लोगों पर वहां पहले पहुंचे लोग बर्फ का गोला बना कर फेंक रहे थे.

मेरी कनपटी पर ऐसे ही एक बर्फ का गोला लगने से मैं स्वयं को संभाल नहीं पाई और फिसल गई. आखिर वही हुआ जिस के लिए मैं डर रही थी. हिम्मत कर के उठी तब तक दूसरा गोला सिर पर पड़ा और दोबारा गिर पड़ी. अब दर्द से कराहती हुई मैं वापस उतरने लगी. दूर से अपनी गाड़ी के पास भीड़ लगी देख कर मन में एकसाथ शंका के कई बुलबुले बनने व फूटने लगे.

आखिर में मेरी सोच सिगरेट पर जा कर अटक गई. मुझे लगा कि शायद गाड़ी चलाते समय पति के हाथ में सिगरेट जलती ही होगी और नींद का झोंका आया होगा और हाथ की जलती सिगरेट छूट कर नीचे गिर गई होगी. जब फर्श का कारपेट जल कर गाड़ी में धुआं भर गया होगा तो उसे देख कर लोगों ने शीशा तोड़ कर आग बुझाई होगी. पता नहीं क्या सोच कर मैं दुखी नहीं थी.

शायद मैं सोच रही थी कि आज के बाद पति हमेशा के लिए ही सिगरेट छोड़ देंगे, क्योंकि बहुत बड़ा नुकसान होतेहोते बच गया. रात को खाना खाने से पहले मैं ने पति को बाहर जाते देख कर पूछा, ‘‘कहां जा रहे हैं?’’ ‘‘सिगरेट खत्म हो गई है. बाहर पीने जा रहा हूं.’’ ‘‘क्या…आप ने अब भी सिगरेट छोड़ने का फैसला नहीं किया?’’ ‘‘तुम क्या समझती हो कि मेरी सिगरेट से गाड़ी जलने लगी थी?’’ ‘‘और क्या.

इस में कोई शक है क्या?’’ ‘‘मैडम, तुम्हारी पूजापाठ की वजह से आज गाड़ी में आग लग जाती. घर से कहीं जाओगी तो गाड़ी में अगरबत्ती जलाना नहीं भूलती हो. आगे से यह सब नहीं चलेगा, समझीं.’’ मैं आंखें फाड़े आश्चर्य से पति को देख रही थी. Humorous Family Story

लेखक- मंजरी सक्सेना

 

Romantic story in Hindi : नहले पर दहला

Romantic story in Hindi. बड़े शहरों में ऐसा बहुत कम होता है कि कोई आसपास रह रहे लोगों पर अपनी निगाहें जमाए रखे और कोई क्या कर रहा है, कहां जा रहा है, किस से मिल रहा है, यह सब एक खुफिया जासूस की तरह अपनी पैनी नजरों से देखता रहे.

21वीं सदी की ऐसी दौड़धूप से भरी जिंदगी में भला किसे ऐसा वक्त मिलता होगा? फिर ऐसी हरकत करने से कोई फायदा भी तो नहीं है. ख्वाहमख्वाह समय की बरबादी और दिमाग को परेशान करना. बड़े शहरों के बुद्धिमान लोग ऐसा कभी नहीं करेंगे, लेकिन वहां सभी बुद्धिमान ही रहते हों, ऐसा तो कभी नहीं होगा. वहां कुछ अक्ल के कच्चे और सनकी लोग आज भी मौजूद हैं.

इस कहानी का हीरो भी कुछ ऐसी ही सनक से भरा हुआ था. उस का बिहारी दास नाम था. फिर उसे काम भी अपनी पसंद का ही मिला था. उसे एक कुरियर कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी मिल गई थी, जिस वजह से उसे इधरउधर भटकने का मौका मिलता था. यह काम वह बड़े जोश से करता था. फिर रोजाना 100-150 लिफाफे 2-3 घंटे में ही उन के पते पर पहुंचा कर वह अपना काम पूरा कर डालता था. इस के बाद सारा दिन उसे कुछ नहीं करना होता था.

तब वह भला क्या करता? बारीबारी से एक पान की दुकान और ट्रैवल एजेंसी की दुकान पर बैठ कर अपना टाइमपास करता रहता था. उस का घर दसमंजिला बिल्डिंग के एक फ्लैट में तीसरी मंजिल पर था. उस बिल्डिंग में रह रहे सभी लोगों को वह करीबकरीब जानता था. हां, यह बात अलग थी कि सभी से वह गहरी पहचान नहीं बना पाया था.

उसी बिल्डिंग में एक अधेड़ उम्र के शख्स तिवारीजी रहते थे, जो किसी बैंक में काम करते थे और अकेले रहते थे. बिहारी दास ने अपनी कुछ घंटों की मुलाकात में यह जान लिया था कि उन की पत्नी की उन से बनती नहीं थी और दोनों अलग रह रहे थे.

वैसे तो वे अकेले ही रहते थे, मगर उन के घर पर एक खूबसूरत लड़की को बिहारी दास ने कई बार आतेजाते देखा था. फिर जब उन से पूछा गया कि वह कौन है, तब उन्होंने कुछ अनमने भाव से कह दिया था कि वह उन की भतीजी है.

मगर, बिहारी दास की पैनी नजर ने उन के झूठ को पहचान लिया था. बाद में तिवारीजी ने बिहारी दास से बात करना छोड़ दिया था, लेकिन बिहारी दास ने ठान लिया था कि वह तिवारीजी का भांड़ा जरूर फोड़ कर रहेगा.

जैसा कि बड़े शहरों में होना लाजिमी है, बिहारी दास की बिल्डिंग में हलकेफुलके गैरकानूनी काम भी होते थे, जिन के बारे में उसे सब पता था. 10वीं मंजिल पर एक मसाज पार्लर चल रहा था, जहां लड़केलड़कियों की भीड़ लगी रहती थी. वहां मसाज के बहाने कुछ और ही चल रहा था.

हालांकि कुछ महीने पहले बिहारी दास ने फोन कर के वहां पुलिस भी बुला ली थी, जिस ने अचानक छापा मार कर मसाज पार्लर के मालिक सज्जन सिंह के साथ पैसों का गुपचुप लेनदेन किया और वहां से चल दी थी.

सज्जन सिंह को कतई पता नहीं चला कि आखिर पुलिस को सूचना किस ने दी थी. बिहारी दास मन ही मन खुश हो रहा था.

जैसा कि बिहारी दास का स्वभाव था, वह हमेशा ध्यान रखता कि बिल्डिंग के फ्लैट में कौन आजा रहा है, कौन सा फ्लैट खाली हुआ और किस ने खरीदा या कौन नया किराएदार आया है या आई है और किराएदार क्या करते हैं. यह सब वह अपनेआप चालाकी से जान लेता था.

अपनी इस हरकत के चलते बिहारी दास अकसर घर से बाहर रहता था और किसी अमीर कारोबारी की तरह देरी से घर लौटता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका ने उस से एतराज भी जताया था, ‘‘आखिर क्या करते रहते हो सारा दिन? रात को जल्दी क्यों नहीं लौटते?’’

‘‘शहर में अगर टिकना हो तो हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है,’’ बिहारी दास फख्र से बताता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका खूबसूरत थी, मगर उसे शायद इस का एहसास न था. उस की नजर हमेशा बाहर आजा रही लड़कियों पर टिकी रहती. कई बार तो सड़क के किनारे चलतेचलते अपने मोबाइल फोन पर बात कर रही किसी लड़की की बातों को वह पास से गुजरते हुए सुनने की कोशिश करता. वह प्यार से बात कर रही है या नाराज हो कर, यह पकड़ने की कोशिश करता.

कई बार तो बिहारी दास लड़की से कुछ ही दूरी पर खड़ा रह जाता और जब तक वह बातें पूरी न कर लेती, वह वहीं खड़ा रहता. फिर अगर लड़की गुस्से में अपना मोबाइल फोन बंद कर लेती तो वह मन ही मन हंस पड़ता, ‘बेचारी… अपने यार से खफा है.’

तिवारीजी पर अब बिहारी दास अपनी पैनी आंखें गड़ाए हुए था. बिल्डिंग में जैसे ही वह उस लड़की को देखता, उस के पीछे चल देता और देखता कि वह तिवारीजी के घर ही गई है या नहीं. फिर वह बिल्डिंग के सामने पान की दुकान पर बैठ कर उस लड़की के बाहर निकलने का इंतजार करता रहता. जब वह चली जाती, तब वह तिवारीजी के घर किसी बहाने पहुंच जाता.

‘‘आप के पास क्या 2,000 रुपए के खुले हैं?’’

जब तिवारीजी उसे खुले पैसे दे देते, तो वह बातचीत शुरू कर देता था.

‘‘वह मिस जो आप के यहां आई थी, उस की स्कूटी स्टार्ट नहीं हो रही थी. तुरंत सुखबीर गैराज वाले को बुला लिया और उस ने ठीक करा दी. क्या वह बहुत दूर रहती है?’’

‘‘हां, रहती तो दूर है, मगर शहर में दूर क्या और नजदीक क्या? स्कूटी तो हर किसी के लिए जरूरी है,’’ तिवारीजी ने कुछ नाराजगी से बोला. इस पर बिहारी दास खिसिया कर रह गया.

एक दिन शाम को दीपक की पान की दुकान पर बैठे बिहारी दास ने उसी लड़की को किसी लड़के के साथ बिल्डिंग से निकलते हुए देखा.

‘‘अरे, इस के साथ यह लड़का कौन हैं…’’ बिहारी दास के मुंह से अचानक ही यह सवाल निकल पड़ा.

‘‘ये तो रोज ही साथसाथ निकलते हैं…’’ पान वाले दीपक ने उन की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं इन्हें हरदम इसी वक्त देखता हूं.’’

‘‘यह तो तिवारीजी की भतीजी है,’’ बिहारी दास ने उन्हीं दोनों पर नजर जमाए हुए शक जाहिर किया, ‘‘कहीं तिवारीजी कोई खेल तो नहीं खेल रहे?’’

बिहारी दास ने मन में ठान लिया कि वह तिवारीजी की भतीजी की सचाई का पता लगा कर ही रहेगा.

‘‘देख दीपक…’’ बिहारी दास ने गंभीरता से कहा, ‘‘आइंदा तू जब भी इन दोनों को यहां आते या निकलते देखे, तो फौरन मुझे बता देना. मेरा फोन नंबर है न तेरे पास?’’

दीपक ने सहयोग देने के लिए हामी भरी.

अगले ही दिन रात को अपने दोस्तों के साथ जब बिहारी दास एक रैस्टोरैंट में खाना खा रहा था कि तभी दीपक का फोन आ गया.

‘दासजी, जल्दी आइए. वह लड़की किसी के साथ अभीअभी बिल्डिंग के अंदर गई है.’

चूंकि बिहारी दास खाना अधूरा छोड़ कर नहीं निकल सकता था, इसलिए उसे अपने घर वापस आतेआते एकाध घंटा बीत गया. वह जल्दी ही लिफ्ट से सीधा 5वीं मंजिल पहुंच गया, जहां तिवारीजी का फ्लैट था. वह किसी बहाने तिवारीजी के फ्लैट में घुस कर उस की भतीजी और उस लड़के को रंगे हाथ पकड़ना चाहता था.

बिहारी दास जल्दीजल्दी फर्लांग भरते हुए फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचा और उस ने सीधे ही डोरबैल बजाई.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला और वह लड़की, जिसे तिवारीजी अपनी भतीजी कह रहे थे, बिहारी दास के सामने खड़ी थी.

‘‘जी, आप को किस से मिलना है?’’

बिहारी दास को देख कर वह लड़की हैरान थी.

‘‘जी, मैं… तिवारीजी का पड़ोसी हूं. उन से मिलना था,’’ बिहारी दास कुछ सहम कर बोला, फिर उस ने अंदर झांक कर देख लिया. वह लड़का सोफे पर लेटे हुए टीवी देख रहा था.

‘‘आप… आप दास बाबू तो नहीं?’’ वह लड़की घूर कर बिहारी दास के चेहरे को देख रही थी, ‘‘तिवारी अंकल आप का जिक्र करते रहते हैं. आप तीसरी मंजिल पर रहते हैं न?’’

‘‘जी, बिलकुल,’’ बिहारी दास को एक झटका सा लगा, ‘क्या तिवारी ने इसे सबकुछ बता दिया है?’ वह सोचने लगा.

‘‘आप की बीवी का नाम राधिका है न?’’ कह कर वह लड़की मुसकरा दी, ‘‘अंकल आप के यहां ही गए हैं. कहते हैं, राधिका चाय अच्छी बनाती हैं. मैं पी कर आता हूं.

‘‘मैं रोजाना शाम को उन के लिए खाना बनाने अपने मंगेतर के साथ आती हूं. वे अभी आप ही के यहां गए होंगे. आप अंदर आइए न,’’ वह लड़की बड़ी मीठी आवाज में बोल कर उसे अंदर आने की गुजारिश करने लगी.

लेकिन, बिहारी दास को बिजली सा झटका लगा, ‘तिवारीजी और मेरे घर… वह भी मेरी गैरहाजिरी में…’

एक ही पल में बिहारी दास पर मानो पहाड़ सा टूट पड़ा. वह उलटे पैर वहां से निकल कर सीधा लिफ्ट से उतर कर अपने फ्लैट की तरफ दौड़ा. उस के दिमाग को अनेकानेक शक ने घेर लिया. उसे लगा कि अपना खेल खत्म होने जा रहा है. उस का पड़ोसी तिवारी उस से कहीं गुना ज्यादा चालाक निकला.

वह हरगिज भरोसे के लायक शख्स नहीं था, फिर बिहारी दास की बीवी राधिका तो बेचारी भोली थी. कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई.

बिहारी दास के पैर रास्ते में ही भारीपन महसूस करने लगे. अब वह धीरेधीरे सहम कर अपने फ्लैट के दरवाजे तक पहुंचा ही था कि तुरंत दरवाजा खुला और तिवारीजी हंसते हुए बाहर निकले.

‘‘अरे, दासजी आप… आप तो हमेशा रात को देरी से लौटते हैं. आज जल्दी लौट आए,’’ फिर तीर सा पैना व्यंग्य कसते हुए तिवारीजी बोले, ‘‘राधिका भाभीजी चाय बढि़या बनाती हैं. अब तो हमें उस की आदत सी हो गई है.’’

तिवारीजी चल पड़े, मगर बिहारी दास को लगा मानो उस के पैर तले जमीन सरकने लगी थी. अपने घर में घुसते ही वह बैठक में रखे सोफे पर ढेर हो गया.

लेखक- रामचरन हर्षाना

Short Story : बीवी या बौस

Short Story. मैंने अपनी जिद पर लव मैरिज की थी, इसीलिए विदाई के वक्त ससुरजी ने कहा था, ‘‘जमाई बाबू, अभी तो मैं अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन आप के प्यार के आगे मुझे झुकना पड़ा. खैर, बेटी को मैं ने अच्छे संस्कार दिए हैं, इसलिए आप की जिंदगी की बगिया हमेशा गुलजार रहेगी.’’

मैं ने ससुरजी के चरण छू कर कहा था, ‘‘जब तक मेरी इन बाजुओं में दम है, आप की बेटी राज करेगी.’’

और इस तरह बिना एक फूटी कौड़ी दिए ससुर साहब ने अपनी सुपुत्री मुझे सौंप दी और मैं अपनी बीवी को ले कर दिल्ली की एक बस्ती में आ गया.

जब मेरी मासूम सी बीवी ने मेरे घर में पहला कदम रखा था, तो मैं बहुत खुश हुआ था. सोचा था कि अब मुझे कष्ट नहीं होगा. समय पर नाश्ताखाना मिलेगा. जब दफ्तर से लौट कर आऊंगा तो बीवी मुझे प्यार करेगी. लेकिन मेरे सपने धरे के धरे रह गए.

एक दिन मैं ने दफ्तर से लौटते समय अपनी बीवी को फोन किया, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘कुछ नहीं, लेकिन आप कब आ रहे हैं?’ उधर से आवाज आई.

मुझे बहुत भूख लगी थी. मैं ने सोचा कि वह खाना बना कर रखेगी, इसीलिए मेरे आने के बारे में पूछ रही है. मैं ने कहा, ‘‘प्रिये, कुछ लजीज खाना बनाओ. मैं दफ्तर से निकल रहा हूं. एक घंटे में पहुंच जाऊंगा.’’

‘ठीक है,’ वह बोली.

मैं रास्तेभर गाना गुनगुनाते हुए घर पहुंचा. मैं खुश था कि घर पहुंचते ही गरमागरम लजीज खाना मिलेगा. मैं ने घंटी बजा दी लेकिन दरवाजा नहीं खुला. फिर 1-2 बार बजा कर इंतजार किया. फिर भी दरवाजा नहीं खुला तो कई बार घंटी बजाई. तब जा कर दरवाजा खुला.

‘‘क्यों, क्या हो गया? देर क्यों हुई दरवाजा खोलने में,’’ मैं ने पूछा.

वह अपने चेहरे पर लटक रहे बालों को समटते हुए बोली, ‘‘कुछ नहीं, जरा आंख लग गई थी.’’

घर का सामान सुबह जिस हालत में था वैसे ही अभी भी पड़ा था. सुबह जिस प्लेट में मैं ने नाश्ता किया था वह वैसे ही जूठी डाइनिंग टेबल पर पड़ी थी. धोने के लिए गंदे कपड़ों का ढेर एक कोने में मुंह चिढ़ा रहा था. फर्श पर धूल की परत थी. रसोईघर में जूठे बरतनों का ढेर लगा था.

लजीज खाना खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया था. वह मासूमियत से हुस्न के हथियार के साथ अनमने ढंग से मुझे देख रही थी. मैं खून का घूंट पी कर रह गया.

कुछ दिनों के बाद एक सुबह मैं दफ्तर के लिए निकल रहा था, तो वह बोली, ‘‘सुनिएजी, मेरे मोबाइल फोन में बैलेंस खत्म हो गया है. बैलेंस डलवा दीजिएगा.’’

मैं ने चौंक कर कहा, ‘‘बैलेंस कैसे खत्म हो गया… कल ही तो 2 सौ रुपए का रीचार्ज कराया था?’’

‘‘कल मैं ने मम्मीपापा से बात की थी और बूआ से भी बात की थी…

2-3 सहेलियों से भी बात की थी…’’ वह थोड़ा अटकते हुए बोली.

‘‘तो इतनी ज्यादा बात करने की क्या जरूरत थी? सिर्फ हालचाल पूछ लेती और बात खत्म कर देती,’’ मैं ने कहा.

‘‘हालचाल ही तो पूछा था,’’ वह बोली.

मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘अच्छा, ठीक है, बैलेंस डलवा दूंगा,’’ कह कर मैं घर से निकल गया. मेरे सपनों का महल टूटता जा रहा था.

इसी बीच उसे एक नया शौक सूझा. अब वह टैलीविजन का रिमोट हाथ में लिए सीरियल देखती रहती थी. कुछ कहता तो भी सीरियल में ही खोई रहती. जोर से बोलने पर वह मेरी तरफ देख कर पूछती, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘दफ्तर से थकाहारा आया हूं. पानी और नाश्ते के लिए भी नहीं पूछती और कहती हो कि क्या हुआ…’’

‘‘अच्छा, अभी 5 मिनट में लाती हूं. सीरियल अब खत्म होने ही वाला है,’’ टैलीविजन पर से आंखें हटाए बिना वह जवाब देती.

उस के वे 5 मिनट कभी खत्म नहीं होते. मजबूरन मैं खुद ही रसोईघर में जा कर कुछ खाने को ले आता. खुद भी खाता और अपनी बीवी को भी खिलाता.

महीनों सीरियल प्रेम दिखाने के बाद मेरी बीवी का पासपड़ोस की औरतों के घरों में आनेजाने और गपबाजी का दौर शुरू हुआ.

मैं दफ्तर से आ कर दरवाजे की घंटी बजाता रहता लेकिन दरवाजा नहीं खुलता. जब फोन करता तो पता चलता कि वह किसी पड़ोसन के घर बैठी है.

जल्द ही मेरी बीवी का पड़ोसन के घरों में जाने का साइड इफैक्ट भी शुरू हो गया. दूसरों के घरों में कुछ नई और अच्छी चीजें देख कर आती और मुझे भी वे चीजें लाने को कहती. कुछ तो अपनी जरूरत और पैसे की सीमा को देखते हुए मैं ले भी आया लेकिन अकसर ऐसी डिमांड होने लगी.

कुछ मेरी चादर से बाहर होता तो मैं मना कर देता. वह मुंह फुला कर बैठ जाती. खाना जैसेतैसे बना कर लाती, जो खाया न जाता.

एक दिन मैं ने उसे समझाया, ‘‘प्रिये, सब की जरूरत और औकात अलग होती है और उसी के मुताबिक सब काम करते हैं. दूसरों को देख कर हमें परेशान नहीं होना चाहिए.’’

‘‘हां, मेरी किस्मत ही खराब है, तभी तो सारी अच्छी चीजें दूसरों के घर देखती हूं. अपने घर में नसीब कहां?’’ वह बुझी आवाज में बोली.

‘‘निराश क्यों होती हो? समय आने पर हमारे यहां भी सबकुछ हो जाएगा. सब एक दिन में तो अमीर नहीं हो जाते. इस में समय लगता है,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं बोझ हो गई थी, इसीलिए मेरे मम्मीपापा ने जल्दी मेरी शादी करा दी,’’ यह कहते ही उस की आंखों से आंसू टपकने लगे.

‘‘लेकिन यह शादी तो हम दोनों के बीच प्यार होने के चलते हुई थी.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं नादान थी, लेकिन मेरे मम्मीपापा को तो अक्ल थी. मुझे बोझ समझ कर उन्होंने मेरा निबटारा कर दिया.’’

‘‘खैर, देर से शादी होती तो क्या कोई टाटा, बिरला या मुकेश अंबानी का बेटा आ जाता रिश्ता ले कर?’’ गुस्से में मेरे मुंह से निकला.

‘‘कोई भी आता लेकिन आप से अच्छा आता,’’ उस ने जवाब दिया.

मैं ने चुप रह जाना ही ठीक समझा.

रविवार का दिन था. मैं ने सोचा कि आज आराम करूंगा. रोज अपने दफ्तर में बौस की और्डरबाजी से परेशान रहता हूं. कम से कम आज तो आराम कर लूं.

मैं ने बीवी से कहा, ‘‘जानेमन, आज कुछ अच्छा खाना बनाओ ताकि खा कर मजा आ जाए. मैं आज टैलीविजन पर फिल्म देखूंगा और आराम करूंगा.’’

लेकिन मेरी बीवी का खयाल कुछ और ही था. वह बोली, ‘‘चलिए न आज कहीं बाहर घूमने चलते हैं और होटल में खाना खाते हैं.’’

मैं ने घबरा कर कहा, ‘‘कहां घूमने चलेंगे? कोई अच्छी जगह नहीं है. भीड़भाड़ और गाडि़यों के जाम में ही फंसे रहे जाते हैं और होटल का खाना तो ऐसा होता है कि खाने के बाद पछतावा होने लगता है कि क्यों खाया.

‘‘खाने का कोई स्वाद नहीं होता. सिर्फ ज्यादा पैसे और टिप दो. शाम को हैरानपरेशान हो कर घर लौटो.’’

‘‘आप तो हमेशा ऐसे ही बोलते हैं. शादी के बाद हनीमून पर भी बाहर नहीं ले गए,’’ वह बिस्तर पर लेट कर आंसू बहाने लगी.

छुट्टी का मजा खराब हो चुका था. मैं खुद रसोईघर में जा कर कुछ स्वादिष्ठ खाना बनाने की कोशिश करने लगा.

एक बार पड़ोस में शादी थी. मुझे भी सपरिवार न्योता मिला था. दफ्तर से आ कर मैं ने अपनी बीवी से कहा, ‘‘जल्दी तैयार हो जाओ. सब इंतजार कर रहे होंगे.’’

लेकिन बहुत देर बाद भी वह अपने कमरे से बाहर न निकली. मैं कमरे में गया तो देखा कि वह तकिए में मुंह छिपा कर रो रही थी.

‘‘अरे, क्या बात हो गई… रो क्यों रही हो?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

वह कुछ न बोली. मैं ने जबरदस्ती उसे खींच कर बैठाया और फिर वजह पूछी.

‘‘न्योते में जाने लायक मेरे पास कपड़े नहीं हैं. मैं क्या पहन कर जाऊंगी?’’ वह सुबकते हुए बोली.

मैं हैरान रह गया. मैं रोज दफ्तर आताजाता हूं. लेकिन मेरे पास सिर्फ 2 जोड़ी ढंग के कपड़े थे, जबकि मेरी बीवी के पास कई जोड़ी कपड़े थे. 2 महीने पहले भी उस ने एक सूट खरीदा था, फिर भी वह रो रही थी.

मैं ने अलमारी में से उस के कई कपड़े निकाले और उस के आगे फैलाते हुए कहा, ‘‘ये सारे तो नए सूट हैं, फिर क्यों रो रही हो?’’

‘‘ये सब तो मैं पहले पहन चुकी हूं,’’ वह मुंह फेर कर बोली.

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो? जो कपड़ा एक बार पहन लिया, वह पुराना हो गया क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘ये कपड़े पहने हुए मुझे सब औरतें देख चुकी हैं.’’

‘‘मतलब, हर मौके लिए तुम्हें नए कपड़े चाहिए?’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘कोई कपड़े से बड़ा या छोटा नहीं होता. देखो तो, यह सूट कितना अच्छा है. तुम पहन कर तो देखो. जो इस सूट में तुम्हें देखेगा, तारीफ करेगा,’’ मैं ने पुचकारते हुए कहा.

उस दिन मैं बड़ी मुश्किल से अपनी बीवी को मना पाया था.

लेकिन अब मेरी सीधीशांत दिखने वाली बीवी बातबात पर गुस्सा करने लगी थी. सीरियल देखने से मना करता तो रिमोट पटक देती. पासपड़ोस में ज्यादा जाने से मना करता तो गुस्से में अपने को कमरे बंद कर लेती.

फोन पर ज्यादा बात करने से मना करता तो कई दिन तक मोबाइल फोन नहीं छूती. इतना ही नहीं, अगर मैं उस के बने खाने की शिकायत करता तो मुझे पर ही चीखने लगती और खाना बनाना छोड़ देती.

मैं तंग आ गया था. सोचता कि शादी से पहले कितनी सीधी और प्यारी थी मेरी बीवी, पर अब तो ज्वालामुखी बन गई है और गुस्सा तो जैसे इस की नाक पर बैठा रहता है.

दफ्तर में मेरा बौस काम में कमी निकाल कर मुझ पर बातबात पर गुस्सा करता था. लेकिन नौकरी तो करनी ही थी, उसी से घर का गुजारा चलता था, इसीलिए बौस का गुस्सा सहना पड़ता था.

घर आता तो बीवी भी मुझ पर ही बातबात पर गुस्सा करती. समझ में नहीं आता कि वह मेरी बीवी है या बौस.

मेरी बीवी और मेरे बौस ने मेरी जिंदगी दूभर कर दी थी. पता नहीं, इन दोनों के चक्रव्यूह से मैं कभी निकल पाऊंगा भी या नहीं.

Family Story : समय के साथ

Family Story : रामलाल की सचिवालय में चपरासी की ड्यूटी थी. वह अपने परिवार के साथ मंत्रीजी के बंगले पर ही रहता था. जब वह सरकारी नौकरी में लगा था, तब गांव में उस की 2 बीघा जमीन थी और एक छोटा सा टूटाफूटा घर था, मगर आज 50 बीघा जमीन और 2-2 आलीशान मकान हैं. तीजत्योहार के अलावा शादीब्याह में जब रामलाल अपनी शानदार कार से बीवीबच्चों के साथ गांव में आता है, तब उसे देख कर कोई यह कह नहीं सकता कि वह चपरासी है. उस के बीवीबच्चों के कीमती कपड़ों को देख कर लोग यही समझते हैं कि वे सब किसी बड़े सरकारी अफसर के परिवार वाले हैं.

एक बार रामलाल गांव में अपने फार्महाउस पर था, तभी वहां पर किसी गांव के बड़े सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी करने वाला उस के गांव का भोलाराम आया.

भोलाराम बोला, ‘‘रामलालजी, हम लोग एक ही समय पर सरकारी नौकरी में लगे थे, मगर तुम आज कहां से कहां पहुंच गए और मैं गरीब चपरासी ही रह गया हूं. तुम्हारी इस तरक्की के बारे में मुझे भी कुछ बताओ भाई.’’

‘‘मेरी तरक्की का राज यही है कि मैं सचिवालय में नौकरी करते हुए समय के साथ चलने लगा था और तुम गांव में ही रह कर अपनी पुरानी दकियानूसी बातों के कारण यह फटेहाल जिंदगी बिता रहे हो…

‘‘मैं ने अपनी दोनों बेटियों को शहर में खूब पढ़ायालिखाया और तुम ने अपनी बेटियों को घर में ही बिठा रखा है. अगर वे शहर में पढ़तीं, तो आज अच्छी नौकरियां कर रही होतीं. मेरी एक बेटी अब तहसीलदार होने वाली है और दूसरी बेटी कलक्टर,’’ रामलाल ने उसे अपनी तरक्की का राज बताया, तो भोलाराम उस से बोला, ‘‘तो मुझे भी अब अपनी दोनों बेटियों के लिए क्या करना चाहिए ’’

‘‘तुम अपनी दोनों बेटियों को हमारे साथ शहर भेज दो. मेरी दोनों बेटियां उन्हें कुछ ऐसा सिखा देंगी कि उन की और तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी. कुछ ही दिनों में वे उन्हें ऐसा बदल देंगी कि उन्हें देख कर तुम यह कह ही नहीं पाओगे कि वे दोनों तुम्हारी ही बेटियां हैं…’’

रामलाल की इन बातों को सुन कर भोलाराम ने अपनी दोनों बेटियों को उन के साथ भेजने की हां कर दी.

भोलाराम ने अपने घर जा कर ये सभी बातें अपनी बीवी सावित्री को बताईं, तो वह उस से बोली, ‘‘शहर में जा कर हमारी दोनों बेटियां कहीं शहर की लड़कियों की तरह मौजमस्ती करने न लग जाएं ’’

‘‘मौजमस्ती तो हमारी ये दोनों बेटियां अपने गांव में रहते हुए भी कर रही हैं. कहने को उन की उम्र 16 और 18 साल है, लेकिन अभी से उन में आवारा लड़कों के साथ मजे लेने की आदत पड़ चुकी है.’’

सावित्री बोली, ‘‘तुम अपनी बेटियों के बारे में यह सब क्यों कह रहे हो ’’

‘‘कुछ दिन पहले जब मैं दोपहर में अपने खेतों पर गया था, तब बाजरे के खेतों में हमारी ये दोनों बेटियां उषा और शर्मिला बिलकुल नंगधड़ंग हो कर गांव के 2 लड़कों के साथ वही सब कर रही थीं, जो पति अपनी पत्नी के साथ करता है. मैं ने ये सब बातें तुम्हें इसलिए नहीं बताईं कि सुन कर तुम्हें दुख होगा.’’

सावित्री यह सुन कर दंग रह गई.

भोलाराम उस से बोला, ‘‘हमारी दोनों बेटियों को लड़कों के साथ सोने का चसका लग गया है. अगर वे किसी के साथ घर से भाग गईं, तो इस से हमारी गांव में इतनी बदनामी होगी कि हम लोग किसी को मुंह दिखाने नहीं रहेंगे, इसलिए उन्हें रामलाल के साथ शहर भेज देते हैं.’’

सावित्री बोली, ‘‘लेकिन, रामलाल के बारे में हमारी पड़ोसन माला कह रही थी कि वह अपनी लड़कियों को मंत्रीअफसरों के अलावा ठेकेदारों के साथ सुलाता है, तभी तो आज वह उन की कमाई से इतना पैसे वाला बना है. जब उस की दोनों बेटियां छोटी थीं, तब वह अपनी बीवी रीना को उन के साथ सुलाता था.’’

‘‘अपनी बीवी और बेटियों को पराए मर्दों के साथ सुला कर रामलाल ने आज अपनी हैसियत बना ली है. वे सभी लोग आज ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं और हम लोग अपनी दकियानूसी बातों के चलते गांव में ऐसी फटेहाल जिंदगी बिता रहे हैं…’’ भोलाराम थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘हमें भी अब रामलाल की तरह समय के साथ चलना चाहिए. हमारी दोनों बेटियां गांव के लड़कों को मुफ्त में ही अपनी जवानी के मजे दे रही हैं.

‘‘अगर ये दोनों शहर में मंत्रीअफसरों व ठेकेदारों को मजे देंगी, तो हम लोग भी रामलाल की तरह पैसे वाले हो जाएंगे और फिर उन दोनों की अच्छे घरों में शादियां कर देंगे. आजकल लोग आदमी का किरदार नहीं, बल्कि उस की हैसियत देखते हैं.’’

सावित्री ने अपनी दोनों बेटियों को रामलाल के साथ शहर भेजने का मन बना लिया.

शहर भेजने की ये बातें जब उन की दोनों बेटियों ने सुनी, तो वे खुशी से झूम उठीं.

सावित्री ने उन दोनों को खुल कर कह दिया, ‘‘यहां पर तुम दोनों बहनें बाजरे के खेतों में चोरीछिपे लड़कों के साथ सोती हो, लेकिन शहर में पैसे कमाओगी. लेकिन जरूरी उपाय करना मत भूलना.’’

दोनों बहनें मन ही मन सोच रही थीं कि बाजरे के खेत में तो किसी के आने के डर से वे पूरे मजे नहीं ले पाती थीं. उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कभी कोई वहां पर आ कर उन्हें देख न ले. शहर में तो एसी लगे कमरे होते हैं, वहां पर किसी के आने का उन्हें डर भी नहीं रहेगा.

जब वे दोनों बहनें रामलाल और उस के परिवार के साथ उन की एसी कार में बैठीं, तो एसी की ठंडीठंडी हवा खाते हुए उन्हें कब नींद आ गई, पता नहीं लगा.

रामलाल की बेटियों में से एक ने ही उन्हें जगा कर कहा, ‘‘अब शहर आने वाला है. वहां के एक मौल से तुम्हारे लिए कुछ ढंग के कपड़े लेने हैं, जिन्हें पहन कर तुम दोनों बहनें खूबसूरत लगोगी.’’

जब वे लोग शहर पहुंचे, तो एक बड़े से मौल में उन दोनों के लिए ढंग के कपड़े खरीदे गए. वहीं पर उन के बाल सैट करा कर उन्हें वे कपड़े पहनाए गए. आईने में खुद को देख कर वे दोनों बहनें बड़ी इतरा रही थीं.

जब वे दोनों रामलाल के घर आईं, तो मंत्रीजी भी उन्हें देख कर चौंक गए. उन दोनों को नहला कर मैकअप करा कर जब रामलाल की बेटी उन्हें मंत्रीजी के कमरे में छोड़ने गई, तो मंत्रीजी भूखे भेडि़ए की तरह उन पर झपट पड़े थे.

कुछ ही देर में मंत्री के साथ भी वही हुआ, जो बाजरे के खेत में उन लड़कों से होता था. मंत्री की तो खुशी की कोई सीमा ही नहीं थी. उन्होंने कुछ दिन बाद दोनों बहनों को एक ठेकेदार से एक लाख रुपए दिलवा दिए.

अपनी दोनों बेटियों की एक लाख रुपए की कमाई देख कर भोलाराम तो खुशी से पागल ही हो गया था. भोलाराम ने भी अब समय के साथ चलना सीख लिया था, पर उसे यह नहीं मालूम था कि यह मौज कितने दिन चलेगी. जैसे ही लड़कियों में कुछ बीमारी हुई नहीं या और दूसरी जवान लड़कियां दिखी नहीं कि वे वापस गांव में नजर आएंगी.

Romantic story in Hindi: लौट आई सुनीता -अपहरण की शिकार एक लड़की

Romantic story in Hindi. कमिल बहुत देर तक उसे देखता रहा. अस्पताल के बिस्तर नंबर 8 पर पड़ी लड़की सुनीता ही थी. वह भूल भी कैसे सकता था उसे.

‘‘मैं कल पूरी तरह तैयार हो कर कोर्ट पहुंच जाऊंगी. आप भी जल्दी से आ जाना कमिल… इंतजार मत कराना. कुछ हो न जाए…’’ सुनीता ने थोड़ा उतावलेपन में कहा था.

जाने से पहले सुनीता अपने कमिल के सीने से लग गई थी. उस ने तो कोर्ट मैरिज के लिए पहले ही रजिस्ट्रेशन करा रखा था, जब सुनीता ने उस से बोला था, ‘‘कमिल, मैं तुम से जल्द से जल्द शादी करना चाहती हूं.’’

कमिल को इस जल्दी के बारे में तो पता नहीं था, पर इतना वह समझ गया था कि सुनीता अब उस की होने वाली है. रजिस्ट्रेशन के बाद उस ने सुनीता को बता दिया था कि कल कोर्ट में उन्हें शादी के लिए बुलाया गया है. यह सुन कर सुनीता खुश हो गई थी.

कमिल समय से पहले ही कोर्ट पहुंच गया था. उस ने नया कुरतापाजामा पहना था और सुनीता के लिए भी वह एक नई साड़ी लाया था. चमचमाते गुलाब की फूलमाला का पैकेट भी उस के हाथों में था.

सारी तैयारी कर के सुनीता का इंतजार करता रहा कमिल. वकील साहब ने भी बता दिया था कि जज साहब ने जो समय दिया है, उस समय तक दोनों को कोर्ट में दाखिल हो जाना होगा.

कमिल ने बड़े यकीन के साथ वकील साहब से कहा था, ‘‘जी जरूर. आप निश्चिंत रहें. मुझ से ज्यादा जल्दी तो उसे है. आप तैयारी पूरी रखें.’’

समय निकलता जा रहा था. कमिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह बारबार घड़ी देख रहा था.

वह कई बार घड़ी को हिला कर देख चुका था कि कहीं वह बंद तो नहीं हो गई, पर उस के कांटे तो बराबर खिसक रहे थे. वकील साहब भी परेशान थे. वे भी बारबार अपनी घड़ी देख रहे थे.

‘‘देखो भाई, कोर्ट का समय निकला जा रहा है. बाद में मजिस्ट्रेट साहब शादी नहीं कराएंगे. या तो वे इस अर्जी को खारिज कर देंगे या दूसरी तारीख देंगे, जो कम से कम एक महीने के बाद की होगी,’’ यह कहते हुए वकील साहब के चेहरे पर भी तनाव फैलता जा रहा था.

कोर्ट का समय निकले भी 2 घंटे से ज्यादा हो चुका था. कोर्ट बंद हो चुका था, पर कमिल बैठा अपनी सुनीता का इंतजार कर रहा था. उसे भरोसा था कि सुनीता जरूर आएगी, पर वह नहीं आई. रात का अंधेरा फैलने के बाद वह उदास कदमों से घर लौट आया था.

अब से कई साल पहले ट्रेन में सफर करने के दौरान कमिल की सुनीता से मुलाकात हुई थी. दोनों आमनेसामने की सीट पर बैठे थे.

‘‘क्या आप आलूबड़ा खाएंगी? यहां के आलूबड़े बहुत मशहूर हैं…’’ कहतेकहते कमिल ने एक आलूबड़ा सुनीता की ओर बढ़ा दिया था.

सुनीता ने हिकारत से कमिल को घूरा और बोली, ‘‘जी नहीं. मैं बाहर की चीज नहीं खाती,’’ और उस ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था.

कमिल को भी अपनी गलती का अंदाजा हो चुका था. जब वे एकदूसरे को जानतेपहचानते ही नहीं हैं, तो उसे उस लड़की के सामने आलूबड़ा खाने का प्रस्ताव रखना ही नहीं चाहिए था.

‘सौरी’ कह कर कमिल चुपचाप आलूबड़ा खाने लगा. आलूबड़ा बहुत तीखा था. वह पूरा आलूबड़ा खाता, इस के पहले ही होंठों से ‘सी… सी…’ की आवाज निकलनी शुरू हो गई थी. उसे पानी की सख्त जरूरत थी, जो उस के पास नहीं था.

सुनीता के पास पानी की बोतल नजर आ रही थी, पर कमिल की हिम्मत नहीं हो रही थी उस से मांगने की. वह पानी को यहांवहां तलाशता रहा. सुनीता ने शायद उस की ‘सी… सी…’ की आवाज सुन ली थी.

‘‘यह लीजिए… पानी पी लीजिए… इसी वजह से मैं बाहर की चीज नहीं खाती,’’ कहते हुए सुनीता ने पानी की बोतल कमिल की ओर बढ़ा दी.

पहले तो कमिल का मन हुआ कि वह भी कह दे कि मैं किसी अजनबी के हाथ का पानी नहीं पीता, पर इस समय उसे पानी की बहुत जरूरत थी, सो उस के हाथ से पानी की बोतल ले कर वह गटागट पी गया.

‘‘थैंक्स. आज तो मेरे प्राण ही निकल जाते,’’ कमिल ने कहा.

सुनीता मुसकरा दी थी. स्टेशन आने पर दोनों साथसाथ ही प्लेटफार्म पर उतरे थे.

‘‘अच्छा… आप भी यहीं रहती हैं या पहली बार आना हुआ है?’’ कमिल ने सुनीता से पूछा.

‘‘जी, मैं यहीं रहती हूं,’’ सुनीता ने छोटा सा जवाब दिया था.

‘‘वाह… अब अगर मैं पूछ लूंगा कि आप यहां कहां रहती हैं, तो आप को बुरा लगेगा,’’ यह कहते हुए कमिल के चेहरे पर सवालिया निशान उभर आया था.

‘‘जगदीश वार्ड में… वह पुरानी गल्ला मंडी है न, उस के पीछे है,’’ सुनीता बोली.

‘‘अच्छा, वह जगह तो मैं जानता हूं. मैं भी इसी शहर का रहने वाला हूं. सारी उम्र यहीं गुजर गई है.’’

‘‘ओह… वैसे, आप की उम्र 100 के आसपास होगी…’’ सुनीता ने कमिल को छेड़ा था. फिर वे दोनों अपनेअपने घर चले गए थे.

कमिल और सुनीता की बहुत दिन बाद शादी की एक रिसैप्शन में दोबारा मुलाकात हुई थी. वैसे तो कमिल का इरादा सुनीता को घूरने का बिलकुल भी नहीं था, पर वह इतनी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी कि वह अपनी पलकें तक भी नहीं झपका पा रहा था.

सुनीता गोरे रंग की पतली लड़की थी. लेकिन इस के बावजूद उस की देह में गजब की कसावट थी. सांचे में ढला बदन किसी को भी अपना दीवाना बना सकता था.

रिसैप्शन में सुनीता ने पीले रंग का सलवारसूट पहना था. चेहरे पर लाल रंगत थे. उस ने खुले बालों में पीले रंग का बड़ा क्लिप लगा रखा था.

‘‘ओ जनाब, लड़कियों को ऐसे नहीं घूरते,’’ कह कर सुनीता हंस पड़ी. उस की हंसी गूंज गई थी सारे वातावरण में. कुछ चेहरे घूम गए उन दोनों की ओर. कमिल झोंप सा गया.

‘सौरी’ कहते हुए कमिल ने न चाहते हुए भी अपनी नजरें हटा लीं.

‘‘वैसे, अगर आप का कोई नाम हो बता ही दें, क्योंकि आप मुझे यों ही बारबार मिलते रहेंगे, तो मुझे भी तो आप के बारे में पता होना चाहिए न.’’

‘‘जी, कमिल शर्मा,’’ अब कमिल सुनीता की ओर नजर भी नहीं डाल पा रहा था. इस वजह से वह दूसरी ओर देखते हुए बोला.

‘‘मुझे सुनीता कहते हैं. मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी है. नौकरी की तलाश कर रही हूं… वैसे, आप ने खाना खाया?’’

‘‘नहीं. मैं ऐसे कार्यक्रमों में खाना नहीं खाता.’’

‘‘तभी तो इतनी हैंडसम पर्सनैलिटी हैं,’’ कहते हुए सुनीता ने कमिल को ऊपर से नीचे तक देखा.

‘‘अच्छा, चलती हूं. फिर मिलूंगी कमिल…’’ कहते हुए सुनीता के चेहरे पर मुसकान बिखरी नजर आ रही थी.

एक दिन सुनीता अपनी मां के साथ बाजार में कमिल से मिली. उस ने कमिल का परिचय अपनी मां से कराया.

बातोंबातों में सुनीता ने कहा, ‘‘10 तारीख को मुझे भोपाल जाना है… एक  इंटरव्यू है…’’

‘‘अच्छा… बधाई…’’

‘‘अगर ज्यादा बिजी न हो तो चलो तुम भी… शाम को लौट आएंगे…’’ सुनीता ने कहा.

कमिल को अच्छा लगा था. इस बहाने सुनीता से और मेलजोल बढ़ जाएगा और अकेली लड़की को सहारा मिल जाएगा. कमिल ने हामी भर दी.

भोपाल से लौटने के बाद सुनीता और कमिल काफी नजदीक आ चुके थे. आनेजाने के समय बहुत सारी बातें हुईं, एकदूसरे की पसंद को समझ और पहचाना.

लेकिन पिछले कुछ दिनों से सुनीता कुछ अनमनी सी लग रही थी. एक दिन उस ने बोला था, ‘‘कमिल, मैं तुम से शादी करना चाहती हूं… बहुत जल्दी…’’ उस के चेहरे पर तनाव दिखाई दे रहा था.

‘‘देखो, ऐसे फैसले जल्दी में नहीं लिए जाते…’’

‘‘वह मैं नहीं जानती. कमिल, हम जल्दी ही शादी करेंगे. मंदिर में… नहीं… कोर्ट में… तुम अर्जी दे दो, मैं दस्तखत कर देती हूं… तुम न मत कहना प्लीज…’’

कमिल हालात की गंभीरता को जानते हुए भी सहमत हो गया था और उस ने कोर्ट में अर्जी दे दी थी. कोर्ट ने आज की ही तारीख दी थी, पर सुनीता आई ही नहीं.

सुनीता से अचानक बिछड़ने के बाद कमिल का सैलेक्शन सबइंस्पैक्टर के पद पर हो गया था. ट्रेनिंग के बाद वह दूसरे शहर में चला गया था.

उस दिन की घटना से कमिल बहुत मुश्किलों के बाद उबर पाया था. एक ही बात उस के दिमाग में बारबार घूम जाती थी कि सुनीता आखिर आई क्यों नहीं? उस ने खुद ही शादी के लिए जिद की थी, तो उस ने धोखा क्यों दिया? नहीं आ पा रही थी, तो खबर भी दे सकती थी… इस तरह की बातें सोचतेसोचते कमिल की नाराजगी हद से ज्यादा बढ़ जाती थी.

आज सुबह ही कमिल को सूचना मिली थी कि एक लड़की बेहोशी की हालत में रेलवे प्लेटफार्म से कुछ ही दूरी पर पड़ी हुई है. वह दलबल के साथ घटनास्थल पर पहुंचा था. सुनीता को पहचानने में उसे जरा भी मुश्किल नहीं हुई थी.

कमिल ने जल्दीजल्दी कागजी खानापूरी कर के सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया था. वह खुद उस की देखभाल कर रहा था.

जब सुनीता को होश आया, तो उस ने अपने सामने कमिल को खड़ा पाया. वह चौंक गई. उस की आंखों में आंसू आ गए थे. कमिल ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया था.

‘‘अपनेआप को संभालो सुनीता…’’

पर सुनीता रोती रही. जब वह सामान्य हुई, तो उस ने अपनी आपबीती बतानी शुरू कर दी. यह सच है कि सुनीता को नौकरी के लिए इतनी जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं थी, पर जोशजोश में वह एक कंपनी की सेल्सगर्ल बन गई थी. वह सामान की डिलीवरी करती थी, बदले में उसे मोटी तनख्वाह दिए जाने की बात की गई थी. डिलीवरी किस चीज की हो रही है, यह सुनीता ने जानने की कोशिश की, पर उसे नहीं बताया गया.

पर एक दिन सुनीता जान ही गई थी कि वह नशीली दवाओं की डिलीवरी करने के लिए रखी गई है. जब उसे हकीकत का पता चला तो उस ने काम करने से साफ इनकार कर दिया, इस के बाद ही उसे धमकियां मिलने लगी थीं.

सुनीता ने शादी के लिए जो जल्दबाजी दिखाई थी, उस के पीछे भी यही वजह थी. उस दिन वह कोर्ट के लिए समय से पहले ही निकल गई थी. पर कोर्ट पहुंचने से पहले ही उस का अपहरण कर लिया गया था.

चूंकि सुनीता ने घर में एक खत छोड़ दिया था कि वह अपनी मरजी से शादी कर रही है, उसे खोजने की कोशिश न करें, इस नाराजगी में घर के लोगों ने भी उसे खोजने की कोशिश नहीं की.

सुनीता के साथ बहुत जुल्म किए गए थे. कई जगहों पर बंदी बना कर रखा गया था और अब अपहरण करने वाले उसे इस शहर में ले आए थे. पर जब कमिल ने अपने इलाके के अपराधियों पर अंकुश लगाना शुरू किया, तो वे लोग डर के मारे सुनीता को बेहोशी की हालत में छोड़ कर भाग गए.

सुनीता की मदद से कमिल को आरोपियों को खोजने में ज्यादा परेशानी भी नहीं हुई थी. अस्पताल से वह सुनीता को अपने घर ले कर आ गया था.

‘‘आप ने अभी तक शादी नहीं की है शायद…’’ सुनीता ने सवालिया निगाहों से कमिल की ओर देखा.

‘‘उस दिन जब तुम कोर्ट में नहीं आई, तभी मैं ने तय कर लिया था कि अब मैं कभी शादी नहीं करूंगा…’’ कमिल ने बताया. सुनीता खामोश रही.

‘‘मुझ अब समझ आ गया कि तुम ने मुझे धोखा नहीं दिया था.’’

सुनीता ने केवल नजरें उठा कर कमिल की ओर देखा.

‘‘क्या तुम मुझ से शादी करोगी… उस दिन वाले वादे के मुताबिक?’’ कमिल ने पूछा.

सुनीता के चेहरे पर मुसकान खिल गई और वह कमिल के गले से लग गई.

Social Story: अनोखा संबंध- क्या विधवा औरत दूसरी शादी नहीं कर सकती?

Social Story : ‘‘इस औरत को देख रही हो… जिस की गोद में बच्चा है?’’

‘‘हांहां, देख रही हूं… कौन है यह?’’

‘‘अरे, इस को नहीं जानती तू?’’ पहली वाली औरत बोली.

‘‘हांहां, नहीं जानती,’’ दूसरी वाली औरत इनकार करते हुए बोली.

‘‘यह पवन सेठ की दूसरी औरत है. पहली औरत गुजर गई, तब उस ने इस औरत से शादी कर ली.’’

‘‘हाय, कहां पवन सेठ और कहां यह औरत…’’ हैरानी से दूसरी औरत बोली, ‘‘इस की गोद में जो लड़का है, वह पवन सेठ का नहीं है.’’

‘‘तब, फिर किस का है?’’

‘‘पवन सेठ के नौकर रामलाल का,’’ पहली वाली औरत ने जवाब दिया.

‘‘अरे, पवन सेठ की उम्र देखो, मुंह में दांत नहीं और पेट में आंत नहीं…’’ दूसरी वाली औरत ने ताना मारते हुए कहा, ‘‘दोनों में उम्र का कितना फर्क है. इस औरत ने कैसे कर ली शादी?’’

‘‘सुना है, यह औरत विधवा थी,’’ पहली वाली औरत ने कहा.

‘‘विधवा थी तो क्या हुआ? अरे, उम्र देख कर तो शादी करती.’’

‘‘अरे, इस ने पवन सेठ को देख कर शादी नहीं की.’’

‘‘फिर क्या देख कर शादी की?’’ उस औरत ने पूछा.

‘‘उस की ढेर सारी दौलत देख कर.’’

आगे की बात निर्मला न सुन सकी. जिस दुकान पर जाने के लिए वह सीढि़यां चढ़ रही थी, तभी ये दोनों औरतें सीढि़यां उतर रही थीं. उसे देख कर यह बात कही, तब वह रुक गई. उन दोनों औरतों की बातें सुनने के बाद दुकान के भीतर न जाते हुए वह उलटे पैर लौट कर फिर कार में बैठ गई.

ड्राइवर ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘मेम साहब, आप दुकान के भीतर क्यों नहीं गईं?’’

‘‘जल्दी चलो बंगले पर,’’ निर्मला ने अनसुना करते हुए आदेश दिया.

आगे ड्राइवर कुछ न बोल सका. उस ने चुपचाप गाड़ी स्टार्ट कर दी.

निर्मला की गोद में एक साल का बच्चा नींद में बेसुध था. मगर कार में बैठने के बाद भी उस का मन उन दोनों औरतों के तानों पर लगा रहा. उन औरतों ने जोकुछ कहा था, सच ही कहा था. निर्मला उदास हो गई.

निर्मला पवन सेठ की दूसरी ब्याहता है. पहली पत्नी आज से 3 साल पहले गुजर गई थी. यह भी सही है कि उस की गोद में जो लड़का है, वह रामलाल का है. रामलाल जवान और खूबसूरत है.

जब निर्मला ब्याह कर के पवन सेठ के घर में आई थी, तब पहली बार उस की नजर रामलाल पर पड़ी थी. तभी से उस का आकर्षण रामलाल के प्रति हो गया था. मगर वह तो पवन सेठ की ब्याहता थी, इसलिए उस के खूंटे से बंध गई थी.

यह भी सही है कि निर्मला विधवा है. अभी उस की उम्र का 34वां पड़ाव चल रहा है. जब वह 20 साल की थी, तब उस की शादी राजेश से कर दी गई थी. वह बेरोजगार था. नौकरी की तलाश जारी थी. मगर वह इधरउधर ट्यूशन कर के अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहा था.

निर्मला की सास झगड़ालू थी. हरदम वह उस पर अपना सासपना जताने की कोशिश करती, छोटीछोटी गलतियों पर बेवजह चिल्लाना उस का स्वभाव बना हुआ था. मगर वह दिन काल बन कर उस पर टूट पड़ा, जब एक कार वाला राजेश को रौंद कर चला गया. अभी उन की शादी हुए 7 महीने भी नहीं बीते थे और वह विधवा हो गई. समाज की जरूरी रस्मों के बाद निर्मला की सास ने उसे डायन बता दिया. यह कह कर उसे घर से निकाल दिया कि आते ही मेरे बेटे को खा गई.

ससुराल से जब विधवा निकाली जाती है, तब वह अपने मायके में आती है. निर्मला भी अपने मायके में चली आई और मांबाबूजी और भाई के लिए बो झ बन गई. बाद में एक प्राइवेट स्कूल में टीचर बन गई. तब उसे विधवा जिंदगी जीते हुए 14 साल से ऊपर हो गए.

समाज के पोंगापंथ के मुताबिक, विधवा की दोबारा शादी भी नहीं हो सकती है. उसे तो अब जिंदगीभर विधवा की जिंदगी जीनी है. ऐसे में वह कई बार सोचती है कि अभी मांबाप जिंदा हैं लेकिन कल वे नहीं रहेंगे, तब भाई कैसे रख पाएगा? यही दर्द उसे हरदम कचोटता रहता था.

निर्मला कई बार यह सोचती थी कि वह मांबाप से अलग रहे, मगर एक विधवा का अकेले रहना बड़ा मुश्किल होगा. मर्दों के दबदबे वाले समाज में कई भेडि़ए उसे नोचने को तैयार बैठे हैं. कई वहशी मर्दों की निगाहें अब भी उस पर गड़ी रहती हैं. मां और बाबूजी भी उसे देख कर चिंतित हैं. ऐसी कोई बात नहीं है कि सिर्फ  वही अपने बारे में सोचती है.

मां और बाबूजी भी सोचते हैं कि निर्मला की जिंदगी कैसे कटेगी? वे खुद भी चाहते थे कि निर्मला की दोबारा शादी हो जाए, मगर समाज की बेडि़यों से वे भी बंधे हुए थे.

इसी कशमकश में समाज के कुछ ठेकेदार पवन सेठ का रिश्ता ले कर निर्मला के बाबूजी के पास आ गए.

बाबूजी को मालूम था कि पवन सेठ बहुत पैसे वाला है. उस का बड़ा भाई मनोहर सेठ के नाम से मशहूर है. मगर दोनों भाइयों के बीच 30 साल पहले ही घर की जायदाद को ले कर रिश्ता खत्म हो गया था. आज तक दोनों के बीच बोलचाल बंद है.

बाबूजी यह भी जानते थे कि पवन सेठ 64 साल के ऊपर है. यह बेमेल गठबंधन कैसे होगा? तब समाज के ठेकेदारों ने एक ही बात बाबूजी को सम झाने की कोशिश की थी कि यह निर्मला की जिंदगी का सवाल है. पवन सेठ के साथ वह खुश रहेगी.

तब बाबूजी ने सवाल उठाया था कि पवन सेठ नदी किनारे खड़ा वह ठूंठ है कि कब बहाव में बह जाए. फिर निर्मला विधवा की विधवा रह जाएगी. तब समाज के ठेकेदारों ने बाबूजी को सम झाया कि देखो, वह विधवा जरूर हो जाएगी, मगर सेठ की जायदाद की मालकिन बन कर रहेगी.

तब बाबूजी ने निर्मला से पूछा था, ‘निर्मला तुम्हारे लिए रिश्ता आया है.’

वह सम झते हुए भी अनजान बनते हुए बोली, ‘रिश्ता और मेरे लिए?’

‘हां निर्मला, तुम्हारे लिए रिश्ता.’

‘मगर बाबूजी, मैं एक विधवा हूं और विधवा की दोबारा शादी नहीं हो सकती,’ अपने पिता को सम झाते हुए निर्मला बोली थी.

‘हां, नहीं हो सकती है, मैं जानता हूं. मगर जब सोचता हूं कि तुम यह लंबी उम्र कैसे काटोगी, तो डर जाता हूं.’

‘जैसे, कोई दूसरी विधवा काटती है, वैसे ही काटूंगी बाबूजी,’ निर्मला ने जब यह बात कही, तब बाबूजी सोचविचार में पड़ गए थे.

तब निर्मला खुद ही बोली थी, ‘मगर बाबूजी, मैं आप की भावनाओं को भी अच्छी तरह सम झती हूं. आप बूढ़े पवन सेठ के साथ मेरा ब्याह करना चाहते हैं.’

‘हां बेटी, वहां तेरी जिंदगी अच्छी तरह कट जाएगी और विधवा की जिंदगी से छुटकारा भी मिल जाएगा,’ बोल कर बाबूजी ने अपने मन की सारी बात कह डाली थी. तब वह भी सहमति देते हुए बोली थी, ‘बाबूजी, आप किसी तरह की चिंता मत करें. मैं यह शादी करने के लिए तैयार हूं.’

यह सुन कर बाबूजी का चेहरा खिल गया था. फिर पवन सेठ के साथ निर्मला की बेमेल शादी हो गई.

निर्मला पवन सेठ के बंगले में आ गई थी. दुकान के नौकर अलग, घर के नौकर अलग थे. घर का नौकर रामलाल 20 साल का गबरू जवान था. बाकी तो वहां अधेड़ औरतें थीं.

जब पवन सेठ के साथ निर्मला हमबिस्तर होती थी, वह बहुत जल्दी ठंडा पड़ जाता था. राजेश के साथ जो रातें गुजारी थीं, पवन सेठ के साथ वैसा मजा नहीं मिलता था.

पवन सेठ ने कई बार उस से कहा था, ‘निर्मला, तुम मेरी दूसरी पत्नी हो. उम्र में बेटी के बराबर हो. अगर मेरी पहली पत्नी से कोई औलाद होती, तब वह तुम्हारी उम्र के बराबर होती. मैं तु झ से औलाद की आस रखता हूं. तुम मु झे एक औलाद दे दो.’

‘औलाद देना मेरे अकेले के हाथ में नहीं है,’ निर्मला अपनी बात रखते हुए बोली, ‘मगर, मैं देख रही हूं…’

‘क्या देख रही हो?’ उसे रुकते देख पवन सेठ ने पूछा.

‘हमारी शादी के 6 महीने हो गए हैं, मगर जितना जोश पैदा होता, वह पलभर में खत्म हो जाता है.’

‘अब मैं उम्र की ढलान पर हूं, फिर भी औलाद चाहता हूं,’ पवन सेठ की आंखों का इशारा वह सम झ गई. तब उस ने नौकर रामलाल से बातचीत करना शुरू किया.

निर्मला उसे बारबार किसी बहाने अपने कमरे में बुलाती, आंखों में हवस लाती. कभी वह अपना आंचल गिराती, कभी ब्लाउज का ऊपरी बटन खोल देती, तो कभी पेटीकोट जांघों तक चढ़ा लेती. मर्द कैसा भी पत्थरदिल हो, आखिर एक दिन पिघल ही जाता है.

रामलाल ने कहा, ‘मेम साहब, आप का मु झे देख कर बारबार आंचल गिराना मु झे अच्छा नहीं लगता. आप क्यों ऐसा करती हैं?’

‘अरे बुद्धू, इतना भी नहीं समझता है,’ निर्मला मुसकरा कर बोली और उस के गाल को चूम लिया.

‘सम झता तो मैं सबकुछ हूं, मगर मालिक…’

‘मालिक कुछ भी नहीं कहेंगे,’ बीच में ही उस की बात काट कर निर्मला बोली, ‘मालिक से क्यों घबराता है?’

यह सुन कर रामलाल पहले तो हैरान हुआ, फिर धीरे से मुसकरा दिया. उस ने आव न देखा न ताव निर्मला को दबोच लिया और उस के होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

निर्मला ने कुछ नहीं कहा. फिर क्या था, निर्मला की शह पा कर जब भी मौका मिलता, वे दोनों हमबिस्तर हो जाते. इस का फायदा यह हुआ कि निर्मला का जोश शांत होने लगा था और एक दिन वह पेट से हो गई.

पवन सेठ बहुत खुश हुआ और जब पहला ही लड़का पैदा हुआ, तब पवन सेठ की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा.

निर्मला और बच्चे की देखरेख के लिए एक आया रख ली गई. जब भी बाजार या कहीं दूसरी जगह जाना होता, निर्मला अपने बच्चे को आया के पास छोड़ जाती है. मगर आज उस की ममता जाग गई थी, इसलिए साथ ले गई थी.

‘‘मेम साहब, बंगला आ गया,’’ जब ड्राइवर ने यह कहा, तब निर्मला पुरानी यादों से लौटी. जब वह कार से उतरने लगी, तब ड्राइवर ने पूछा, ‘‘मेम साहब, जिस दुकान पर आप खरीदारी करने पहुंची थीं, वहां से बिना खरीदारी किए क्यों लौट आईं?’’

‘‘मेरा मूड बदल गया,’’ निर्मला ने जवाब दिया.

‘‘मूड तो नहीं बदला मेम साहब, मगर मैं सब समझ गया,’’ कह कर ड्राइवर मुसकराया.

‘‘क्या सम झे मानमल?’’ गुस्से से निर्मला बोली.

‘‘इस बच्चे को ले कर उन औरतों ने…’’

‘‘देखो मानमल, तुम अपनी औकात में रहो,’’ बीच में ही बात काट कर निर्मला बोली.

‘‘हां मेम साहब, मैं भूल गया था कि मैं आप का ड्राइवर हूं,’’ माफी मांगते हुए मानमल बोला, ‘‘मगर, सच बात तो होंठों पर आ ही जाती है.’’

‘‘क्या सच बात होंठों पर आ जाती है?’’ निर्मला ने पूछा.

‘‘यही मेम साहब कि उन दोनों औरतों ने बच्चे को देख कर कहा होगा कि यह बच्चा सेठजी का खून नहीं है, बल्कि उन के नौकर रामलाल का है,’’ मानमल ने साफसाफ कह दिया.

तब निर्मला गुस्से से बोली, ‘‘देखो मानमल, तुम हमारे नौकर हो और अपनी हद में रहो. औरों की तरह हमारे संबंधों को ले कर बात करने की जरूरत नहीं है,’’ कह कर निर्मला कार से उतर गई.

अभी निर्मला दालान पार कर रही थी कि आया ने आ कर बच्चे को उस से ले लिया. मानमल फिर मुसकरा दिया.

Story in hindi: भ्रम -आखिर क्या थी इनकार की वजह

Story in hindi: ‘हां, मैं तुम से प्यार करता हूं, सुकेशी, इसीलिए तुम से विवाह नहीं कर सकता.’ मैं अपने बंगले की वाटिका में एकांत में बैठी डा. प्रभाकर की इस बात के मर्म को समझने का प्रयास कर रही थी, ‘वे मुझ से प्यार भी करते हैं और विवाह के प्रस्ताव को इनकार भी करते हैं.’

उन्होंने जिस दृढ़ता से ये शब्द कहे थे, उस के बाद उन के कमरे में बैठे रहने का मेरा साहस समाप्त हो चुका था. मैं कितनी मूर्ख हूं, उन के सामने भावना में बह कर इतना बड़ा प्रस्ताव रख दिया. हालांकि, वे मेरे इतने निकट आ चुके थे कि यह प्रस्ताव बड़ा होते हुए भी उतना बड़ा नहीं रह गया था. गत वर्ष के सत्र में मैं उन की कक्षाओं में कई महीने तक सामान्य छात्रा की भांति ही रही थी, किंतु जब उन्होंने मेरी रुचियों को जाना तो…

कालेज के उद्यान में पहुंच कर जब वे विभिन्न फूलों को बीच से चीर कर उस की कायिक प्रक्रिया को बताते तो हम सब विस्मय से नर और मादा फूलों के अंतर को समझने का प्रयास करते. वह शायद मेरी धृष्टता थी कि एक दिन प्रभाकरजी से उद्यान में ही प्रश्न कर दिया था कि क्या गोभी के फूल में भी नर व मादा का अंतर आंका जा सकता है?

उन्होंने उस बात को उस समय अनसुना कर दिया था, किंतु उसी दिन जब कृषि विद्यालय बंद हुआ तो उन्होंने मुझे गेट पर रोक लिया. मैं उन के पीछेपीछे अध्यापक कक्ष में चली गई थी. उन्होंने मुझे कुरसी पर बिठाते हुए प्रश्न किया था, ‘क्या तुम्हारे यहां गोभी के फूल उगाए जाते हैं?’ ‘हां, हमारे बंगले के चारों ओर लंबीचौड़ी जमीन है. मेरे पिता उस के एक भाग में सब्जियां उगाते हैं. कुछ भाग में गोभी भी लगी है.’

‘तुम्हारे पिता क्या करते हैं?’ ‘अधिवक्ता हैं, एडवोकेट.’

‘क्या उन्हें फूल, पौधे लगाने का शौक है?’ ‘हमारे यहां फूलों के बहुत गमले हैं. एक माली है, जो सप्ताह में 2 दिन हमारी फुलवारी को देखने आता है.’

‘कहां है तुम्हारा बंगला?’ ‘जौर्ज टाउन में, पीली कोठी हमारी ही है.’

‘मैं तुम्हारी बगिया देखने कभी आऊंगा.’ ‘अवश्य आइए.’

उन्होंने स्वयं से मुझे रोका था. उन्होंने स्वयं ही मेरे घर आने की बात कही थी और दूसरे ही दिन आ भी गए थे. उन के आगमन के बाद ही तो मैं उन की विशिष्ट छात्रा बन गई थी. मैं गत दिनों के संपूर्ण घटनाक्रम के बारे में सोचती चली जा रही थी. गतवर्ष गरमी की छुट्टियों में जब वे अपने गांव जाने लगे थे तो बातबात में बताया था कि उन के घर में खेती होती है. बड़े भाई खेती का काम देखते हैं.

उस के बाद तो वे बिना बुलाए मेरे घर आने लगे. क्या यह मेरे प्रति उन का आकर्षण नहीं था? मैं ने अपनी दृष्टि वाटिका के चारों ओर फेरी तो हर फूल और पौधे के विन्यास के पीछे डा. प्रभाकर के योगदान की झलक नजर आई. लौन में जो मखमली घास उगाई गई थी, वह प्रभाकरजी की मंत्रणा का ही फल था. उन्होंने जंगली घास को उखाड़ कर, नए बीज और उर्वरक के प्रयोग से बेरमूडा लगवाई. उन्होंने ही बैडमिंटन कोर्ट के चारों ओर कंबरलैंड टर्फ लगवाई.

प्रभाकरजी ने जब से रुचि लेनी शुरू की थी, हमारी बगिया में गंधराज गमक उठा, हरसिंगार झरने लगा, रजनीगंधा महकने लगी. यह सब उन के प्यार को दर्शाने के लिए क्या पर्याप्त नहीं था? हम अंगरेजी फूलों के बारे में अधिक नहीं जानते थे, स्वीट पी और एलाईसम की गंध से परिचय उन के द्वारा ही हुआ. केवल 8 महीने में प्रभाकरजी ने हमारे इस रूखेसूखे मैदान का हुलिया बदल कर रख दिया था. मैं अपनी वाटिका के सौंदर्य के परिप्रेक्ष्य में डा. प्रभाकर को याद करते हुए उन के साथ बीते हुए उन क्षणों को भी याद करने लगी, जिन्होंने मेरे अंदर यह भाव जगा दिया था कि डा. प्रभाकर भी शायद अपने जीवन में मेरे साहचर्य की आकांक्षा रखते हैं. इधर, मैं तो उन के संपूर्ण व्यक्तित्व से प्रभावित हो गई थी.

मेरी टूटीफूटी कविताओं की प्रशंसा और कभीकभार रेखाचित्रों की अनुशंसा अथवा जलरंगों से निर्मित लैंडस्केप के प्रयास क्या सचमुच उन के हृदय को नहीं छू रहे थे. उन्होंने ही तो कहा था, ‘सुकेशी, तुम्हारी बहुआयामी प्रतिभा किसी न किसी रूप में यश के सोपानों को चढ़ते हुए शिखर पर पहुंचेगी.’

एक दिन बातोंबातों में मैं ने उन से यह भी बता दिया था कि मैं इस संपूर्ण बंगले की अकेली उत्तराधिकारी हूं, फिर भी मेरे प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया? क्या मैं कुरूप हूं? लेकिन ऐसा तो कुछ नहीं. उन के एक कमरे के फ्लैट में मैं कई बार गई थी. उन्होंने अनेक फूलों की एक मिश्रित वाटिका की पेंटिंग अपने प्रवेशद्वार पर ही लगा रखी थी, जो कि उन्हीं की बनाई हुई थी. यह बात उन्होंने जानबूझ कर मुझे बताई थी. आखिर इस बात का क्या अभिप्राय था? मेरी वाहवाह पर मुसकराए थे और मेरी परख की प्रशंसा में उन्होंने मेरे मस्तक पर एक चुंबन दिया था. और मैं बाहर से अंदर तक झंकृत हो उठी थी.

उस दिन एकांत के क्षणों में जो प्रस्ताव मैं ने उन के सामने रख दिया था, शायद उस चुंबन द्वारा ही प्रेरित था. उन्हें मेरा प्रस्ताव अस्वीकृत नहीं करना चाहिए था. किंतु उन्होंने तो मुझ से आंखें बचा कर कहा, ‘मैं तुम से प्यार करता हूं, इसीलिए तुम से विवाह नहीं कर सकता.’ मुझे प्रभाकरजी की बात से एक झटका सा लगा था. मैं ने कृषि विद्यालय जाना छोड़ दिया था और अंदर ही अंदर मुरझाने लगी थी.

सप्ताह में एक बार अवश्य ही आने वाले प्रभाकरजी जब 16 दिनों तक नहीं आए तो मैं बीते दिनों की संपूर्ण घटनाओं का निरूपण करने के बाद सोचने लगी, ‘मुझ से कौन सी भूल हुई? प्रभाकरजी नाराज हो गए क्या… लेकिन क्यों?’

आज ठीक 16 दिनों बाद अचानक संध्या समय प्रभाकरजी पधारे. मैं बाहर के कमरे में अकेले ही बैठी थी. मैं ने तिरछी दृष्टि से उन्हें देखा और एक मुसकान बिखेर कर स्वागत किया. ‘‘क्या बिलकुल अकेली हो?’’ उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा.

‘‘हां.’’ ‘‘बाबूजी?’’

‘‘वे अभी कोर्ट से नहीं आए, शायद किसी के यहां रुक गए हैं.’’ ‘‘और अम्माजी?’’

‘‘वे पड़ोस में गई हैं. आप कहां रहे इतने दिन?’’ ‘‘मैं तो मात्र एक सप्ताह के लिए अपने गांव गया था. तुम ने विद्यालय जाना क्यों छोड़ दिया? पिछले सोमवार से तुम मुझे अपनी क्लास में दिखाई नहीं दीं. तुम्हारी सहेली सुरभि से पूछने पर ज्ञात हुआ कि तुम कई दिनों से विद्यालय नहीं जा रही हो, शायद जब से मैं छुट्टी पर गया?’’

लेकिन मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. ‘‘बोलो, चुप क्यों हो?’’ वे हौले से बोले.

‘‘सच बताऊं? मैं तो अंदर से मुरझा गई हूं. कोई उल्लास ही नहीं रह गया. आप ने उस दिन इतना रूखा उत्तर दिया कि…’’ ‘‘रूखा उत्तर नहीं, गुरु और शिष्य के बीच जो संबंध होने चाहिए, वही यदि रहें तो…’’

‘‘आप इतने दकियानूसी हैं. आज के युग में…’’ ‘‘दुनिया में जाने क्याक्या होता है, किंतु मैं जिसे जीवन की सफलता की ऊंचाइयों पर देखना चाहता हूं, उसे धोखा नहीं दे सकता.’’

‘‘धोखा, कैसा धोखा?’’ ‘‘तुम शायद अभी तक भ्रम में थीं कि मैं कुंआरा हूं, लेकिन मैं विवाहित हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. अभी दूसरे बच्चे के जन्म पर ही गांव गया था.’’

यह बात सुन कर मेरी गरदन झुक गई. किंतु साहस बटोर कर प्रश्न कर बैठी, ‘‘यह कोई गढ़ी हुई कहानी तो नहीं? आप इतना अच्छा वेतन पाते हैं. यदि विवाहित हैं तो परिवार को अपने साथ क्यों नहीं रखते?’’ प्रभाकरजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘मैं अपने गांव से उखड़ कर शहर में रहना नहीं चाहता. यहां छोटा सा फ्लैट है, जो मेरे लिए पर्याप्त है. पौधों के शौक मैं जिस विपुलता से अपने गांव में पूरा कर लेता हूं, यहां 5 हजार रुपए मासिक पर भी वैसी जमीन नहीं मिल सकती.’’

उन के इस उत्तर के बाद कुछ देर को सन्नाटा छा गया. मैं समझ ही न सकी कि अब क्या बोलूं. प्रभाकरजी कुछ समय तक मेरी मुखमुद्रा को पढ़ते रहे, फिर बोले, ‘‘मेरे गांव का विकास हो गया है-नहर आ गई है, अस्पताल है, समाज कल्याण कार्यालय है, बच्चों को इंटर तक पढ़ाने के लिए कालेज है. एक पक्की सड़क है. मैं अपने घरपरिवार को गांव से उखाड़ कर शहर में रोपना नहीं चाहता.’’

यह सब सुन कर मैं थोड़ी देर को चुप हो गई, किंतु फिर धीरे से बोली, ‘‘आप ने जिस अनौपचारिक रूप से मेरे घर आना शुरू कर दिया था, मैं ने उसे आप का आकर्षण मान लिया था.’’

मेरी बात सुन कर प्रभाकरजी ने कहा, ‘‘हां, मैं यह भूल गया था कि तुम ऐसा भी सोच सकती हो. दरअसल, तुम्हारे यहां निरंतर आने का कारण तो तुम्हारे बंगले से जुड़ा हुआ यह मैदान है, जो अब एक सुंदर वाटिका में बदल गया है. यहां मैं अपनी योजनाओं का प्रैक्टिकल प्रयोग कर सकता था. मैं ने तो सोचा भी नहीं था कि एक दिन तुम विवाह का प्रस्ताव भी…’’ मैं एक बार फिर चुप हो गई. पूर्व इस के कि मैं फिर कोई प्रश्न करती, प्रभाकरजी वहां से अचानक लौट पड़े.

प्रभाकर के मस्तिष्क में सुकेशी के प्रस्ताव की बात घुमड़ती रही और उन्हें अपने उस चुंबन की बात याद आई, जो उन्होंने सुकेशी के मस्तक पर दिया था. शायद उस चुंबन ने ही प्रेरित कर दिया था कि वह ऐसा प्रस्ताव रख गई थी. उसे पता नहीं, मस्तक के चुंबनों में और कपोलों अथवा होंठों के चुंबन में क्या अंतर होता है. काश, वह भारतीय परंपराओं से अवगत होती.

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