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गहरी पैठ: यूक्रेन राष्ट्रपति ने दी दुनिया को सीख

सोवियत संघ का कभी हिस्से रहे यूक्रेन ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का हुक्म मानने से इनकार कर के अपने देश की जमीन को बरबाद तो करवा दिया पर बदले में जो इज्जत उन के नेता वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कमाई है उस की कीमत बहुत ज्यादा है. अब दुनियाभर का हर छोटा देश ही नहीं, हर छोटा वर्ग, जाति, रंग का समूह इस भरोसे में रह सकता है कि यदि कोई सही हो और दिखने में कितना कम, छोटा और कमजोर लगे, अपनी पर आ जाए तो बड़ों को हिला सकता है.

हमारे देश पर यह बात पूरी तरह लागू होती है. थोड़े से मुट्ठीभर पढ़ेलिखे, जन्म से अपने को ऊंचा सम?ाने वाले, धर्म के रखवाले पूरे देश को गुलाम बना कर सदियों से रखते आए हैं क्योंकि यहां की दबीकुचली जनता को कोई वोलोदिमीर जेलेंस्की नहीं मिला और न ही यूक्रेनी जनता सा जज्बा पनपा. नतीजा यह रहा है कि यहां हमेशा आम जनता अपने ही तानाशाहों के जुल्म सहती रही है और आज भी सह रही है.

पुतिन जिस ?ाठ के सहारे यूक्रेन पर कब्जा कर के वहां मनमरजी के शासक को बैठाना चाहता था, उसी तरह के ?ाठ का सहारा गीता के उपदेशों, रामायण की कथाओं, महाभारत के किस्सों और पुराणों की कहानियों से यहां के अछूतों और शूद्रों के हलक में उड़ेला गया है. फुले या भीमराव अंबेडकर जैसे सैकड़ों ने ?ाठ का परदाफाश किया पर उन की बात इस तरह हर घर में नहीं पहुंची जैसे यूके्रन में पहुंच गई.

यूक्रेन में हर घर अब एक लड़ाई का मैदान बन गया है, हर सड़क पर रूसी सेना को लड़ना पड़ रहा है. यूक्रेन के घर वैसे ही जलाए जा रहे हैं जैसे गरीबों की बस्तियों को बुलडोजरों से इस देश में नष्ट किया जा रहा है पर इन टूटे मकानों से विरोध की गोलियों की बौछार हो रही है.

यूक्रेन की हिम्मत देख कर पूरी दुनिया उस के साथ हो गई है. एटम बमों से लैस विशाल, दुनिया का सब से बड़ा देश रूस अब दुनिया का सब से ज्यादा नफरत का निशाना बन गया है. रूसी जनता का खुद उस पर भरोसा है यह पता नहीं क्योंकि रूसी हमले में साथ देने के लिए भरती होने के लिए रूस में कतारें नहीं लग रहीं. हमारे यहां हिंदू राष्ट्र, मंदिरों, देवीदेवताओं, गायों के नाम ?ाठ पर ?ाठ बोल कर जो जुल्म आज 21वीं सदी में भी गरीबों, दलितों और पिछड़ों पर किए जा रहे हैं और उन के बुलेट नहीं तो बैलेट के हथियार को भी बेमतलब का बनाया जा रहा है, वह रूसी हमले की तरह ही है.

अगर आम जनता में बल हो जो यूक्रेन की जनता में दिख रहा है तो एक नहीं कईकई वोलोदिमीर जेलेंस्की पैदा हो जाएंगे जो दलित और पिछड़ों के नेताओं की तरह अपनी जमात को लूटने वालों के सामने नाक रगड़ने की जगह सिर उठा कर खड़े होंगे. रूस एटम बमों की धमकी दे कर अपने छोटे पड़ोसी को धमका रहा है, हमारे देश में छोटा सा वर्ग धर्म के बमों, कानून के हथियारों और पढ़ाई से आई चतुराई का फायदा उठा कर अपने कब्जे को लगातार सदियों से बनाए रख रहा है. क्या हमारे यहां वोलोदिमीर जेलेंस्की खड़े होंगे?

गहरी पैठ: भारतीय जनता पार्टी और जातिवाद

भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में चुनावों में बारबार जातिवादी पार्टियों को कोस रही है कि वे कभी किसी का भला नहीं कर सकतीं. असल में अगर देश में आज सब से बड़ी जातिवादी पार्टी है तो वह भारतीय जनता पार्टी है, जिस ने पूरे देश में पौराणिक जातिवाद को हर पायदान पर बिना साफ किए लागू कर दिया है.

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यह जातिवादी तौरतरीकों का नतीजा है कि आज देश में भूखा ब्राह्मण सुदामा सरीखा कहीं नहीं मिलेगा, क्योंकि हर गांव में 5-6 मंदिर और हर शहर की हर गली में 5-6 मंदिर खुलवा दिए गए हैं जिन में ऋषिमुनियों की संतानें ठाठ से ‘हमारे पास तो कुछ नहीं है’, ‘सब भगवान का है’ कह कर रेशमी कपड़ों में, एयरकंडीशंड हालों में, हलवापूरी रोज चार बार खा रहे हैं.

सरकार को संविधान के हिसाब से 50 फीसदी नौकरियां पिछड़ों और दलितों को दे देनी थीं, पर किसी भी सरकारी दफ्तर में घुस जाएं, वहां इक्केदुक्के ही सपाबसपा वाले नाम दिखेंगे. वहां काम कर रहे लोग ज्यादातर ठेकों पर काम कर रहे हैं और ठेकदार को जाति के हिसाब से रखने का कोई कानून नहीं है. ठेकेदार ऊंची जातियों का है और उस ने जिन्हें रखा होगा वे भी ऊंची जातियों के ही होंगे.

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भारतीय जनता पार्टी बारबार माफिया को नीची जातियों से जोड़ रही है. यह पुरानी तरकीब है. पुराणों में हर कहानी में दस्युओं को, जो कहर ढाते थे, नीची जाति का दिखाया गया है. रामायण में मारीच, शूर्पणखा, रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद सब को माफिया की तरह दिखाया गया है और पिछले 200 सालों से हर शहर में रामलीला के दौरान उन्हें काला भुजंग बता कर दिखाया जाता है. जब अमित शाह कहते हैं कि कमल पर वोट नहीं दिया तो जातिवादी माफिया आ जाएगा, उन का इशारा इन्हीं की ओर होता है. उन के लिए ये जातियां पौराणिक युग के दस्युओं, शूद्रों और अछूतों की संतानें हैं. शंबूक या एकलव्य जैसों के लिए भारतीय जनता पार्टी में कोई जगह नहीं है.
सरकार के 500 सब से ऊंचे अफसरों में से मुश्किल से 60 अफसर उन जातियों के हैं जिन्हें रिजर्वेशन मिला हुआ है.

भारतीय जनता पार्टी चुनचुन कर ऊंची जातियों के लोगों को ताकत दे रही है. वैसे भी हर पार्टी में चाहे वह समाजवादी हो या बहुजन समाज या तृणमूल कांग्रेस, ऊंची जातियों के ही लोग ऊंचे पदों पर हैं पर फिर भी कम से कम वे बात तो उन जातियों की करते हैं जिन के बच्चे आज पढ़ कर आगे आ गए हैं और हर बाधा पार करने को तैयार हैं.

यह न भूलें कि देश चलता उन मजदूरों और किसानों के बल है जिन्हें भारतीय जनता पार्टी माफिया कहती है. यहां तक कि पुलिस और ठंडी हड्डियां जमाने वाली पहाड़ी सीमाओं पर यही लोग हैं. इन्हें माफिया के साथ होने की गाली दे कर भारतीय जनता पार्टी जाति के नाम पर देश को बांट रही है.

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देश का बंटवारा हिंदूमुसलिम के नाम पर तो 1947 में भी नहीं हुआ था, क्योंकि जो लोग पिछले 500-600 सालों में मुसलमान बने थे, उन में ज्यादातर उन जातियों के थे जिन्हें माफिया की गाली दी जा रही है. इसी गाली को एकलव्य को सुनना पड़ा था, घटोत्कच को सुनना पड़ा था, हिरण्यकश्यप को सुनना पड़ा था, बाली को सुनना पड़ा था. आज नए दौर में नए नेता सुन रहे हैं.

गहरी पैठ: मजदूर और वोटबैंक

पंजाब ने आज से नहीं, जब से कृषि क्रांति हुई है बिहार और उत्तर प्रदेश के बेरोजगारों को अपने यहां भरपूर काम दिया है. इस बार इन मजदूरों का नाम ले कर मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के एक बयान को ले कर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और पूरी भाजपा उत्तर प्रदेश व बिहार के पंजाब में बसे मजदूरों को बहकाने में जुट गई. इन्हीं मजदूरों के वोटों पर अरविंद केजरीवाल की नजर है और चरणजीत सिंह चन्नी ने भैय्यों को पंजाब न आने दें का जो तंज कसा था वह केजरीवाल और योगी जैसों को पंजाब पर राज करने की कोशिश से रोकने का था.
बड़ा सवाल तो यह है कि पंजाब, दिल्ली या देश के दूसरे हिस्सों में उत्तर प्रदेश व बिहार के लोग भरभर कर जाते क्यों हैं? इसलिए रामचरित मानस से प्रभावित इन इलाकों की पिछड़ी जातियों की जनता को धर्म के नाम पर जम कर लूटा है. यहां आज भी एक तरह की छिपी हुई जमींदारी चल रही है जिस में हर ओहदेदार अपने को छोटामोटा राजा या महापुरोहित मानता है जिस का आदेश पिछड़ी जातियों के लोगों को मानना ही होगा चाहे वे पढ़लिख भी गए हों.
इस इलाके में, जिसे गौपट्टी कहा जाता है, मंदिर बनाए जा रहे हैं, कारखाने नहीं. यहां से गुजर कर चले जाने लायक सड़कें बनी हैं, यहां के रहने वालों की बस्तियों में नहीं. यहां स्कूल खुले हैं पर हर जाति, उपजाति के लिए अलग. यहां मंदिर बेशुमार हैं पर हर जाति के लिए अलग. पिछड़ों को ऊंचों के देवीदेवता छूने तक नहीं दिए जाते. इन पिछड़ी जातियों को तो ऊंचों के धर्म के नाम पर दूसरों का सिर फोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया है.
अब भी इस सवाल का जवाब नहीं दिया जा रहा कि आखिर उत्तर प्रदेश, बिहार के भैय्ये पंजाब आ क्यों रहे हैं? महान भगवाधारी या तिलकधारी पूजापाठ से बिहार व उत्तर प्रदेश में चमत्कार करा कर पंजाब जैसी खुशहाली क्यों नहीं पैदा कर पा रहे? इस पूजापाठ का लाभ क्या जब लाखों बेकार हों. जहां 36,000 नौकरियों के लिए सवा करोड़ आवेदन आखिर हुए क्यों?
इस की बड़ी वजह है कि इन पिछड़ों को आज भी ढंग से पढ़ाया नहीं जा रहा. गांवगांव में स्कूल खोले गए हैं पर इन पर तिलकधारी शिक्षकों का कब्जा है जो मानते हैं कि पौराणिक आदेश है कि पिछड़े और दलित पढ़ नहीं पाएं चाहे वह वेद हो, महाभारत हो या इतिहास और विज्ञान. यहां जो हिंदी पढ़ाई जाती है उस में संस्कृत शब्द ठूंस दिए गए हैं. ऊंचों के लिए इंगलिश मीडियम कहे जाने वाले स्कूल खोल दिए गए हैं जहां तिलकधारियों के बच्चे पढ़ने जाते हैं, ताकि पिछड़े बस उतना पढ़ें कि कमाने दिल्ली, मुंबई और पंजाब जा कर छोटामोटा हुनर का काम कर सकें और जानवरों की तरह गंदी बस्तियों में रह सकें.
चुनावी दिन हैं इसलिए भैय्यों की बात भी हो गई वरना देश के आकाओं, यहां तक कि उसी जमात से आने वाले नीतीश कुमार तक के पास पिछड़ों का सामाजिक, शैक्षिक, पारिवारिक स्तर उठाने की फुरसत नहीं है.

गहरी पैठ: बजट और आम जनता

केंद्र सरकार के हर साल के बजट का आम लोगों को न पता होता है, न उस से उन्हेंकोई फर्क पड़ता है क्योंकि जो चीज महंगी होनी होती है वह तो होगी ही चाहे बजट की वजह से हो या सालभर में कभी हो. बजट तो सरकारी वादा होता है जो पढ़ेलिखों को बताने के लिए होता है कि इस साल आम गरीब किसान, मजदूर, बस आपरेटर, मेकैनिक, इलैक्ट्रिशियन, ब्यूटीशियन, नर्सों, बेलदारों से कितना कैसे वसूलना है. अब हाकिम ने जो लेना है तो लेना है, आम आदमी को तो कहा गया है कि उस के दुख तो उस के पिछले जन्मों के पापों के फल हैं, भोगते रहो.

शुद्ध ब्राह्मण परिवार को निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री और उन के ऊंची जातियों के सलाहकारों ने पूरी तैयारी से गरीबों को लूटने वाला 35 लाख करोड़ रुपए (ये कितने होते हैं, पता करने की कोशिश भी न करें) का सरकारी हिसाब बना दिया है, भारतीय जनता पार्टी के सांसद हाथ खड़ा कर इसे पास कर देंगे और छुट्टी.

आम मजदूर को पानी मिलेगा, ठेकेदारों से नौकरियां मिलेंगी, किसानों की जमीनों पर सड़कें कटेंगी, कच्चे रास्तों पर केबल बिछाने के लिए और पक्के गहरे गड्ढे खोदे जाएंगे, आईटी पंडों की भरमार होगी, इस का इंतजाम कर दिया गया है. सरकार ठेकों पर चलेगी जो कम तनख्वाह पर लोग रखेंगे और रिश्वत में बाबुओं, अफसरों और भगवा नेताओं की जेबें भरेंगे, यह इंतजाम कर लिया गया है.

किसान मजदूर का तो नाम भी नहीं लिया है. अमीरों की चोंचलेबाजी के लिए और्गेनिक खेती गंगा के किनारे की बात जरूर की गई है जिस का आम किसान से कोई लेनादेना नहीं है.

और हां, एक नए तरीके की नोटबंदी की शुरुआत भीकर दी गई है. अब तक बैंक अकाउंट में नोट रहते थे, चाहे सिर्फ कागज पर, अब डिजिटल करैंसी रहेगी जिस का मतलब पढ़ेलिखे भी वर्षों बाद सम?ा सकेंगे. इस दौरान इस के सपने दिखा कर सरकारी लुटेरे अरबों रुपए आम आदमी के ले कर चंपत हो जाएंगे जैसे नोटबंदी में बैंक मैनेजरों ने किया था.

सरकार बारबार यह कहना नहीं भूलती कि कांग्रेस सरकार के दौरान क्याक्या हुआ था, 7 साल बाद भी. यह वैसा ही है जैसा हर साल रामलीला कर के बता दिया जाता है कि पंडों की सेवा करो, राम की पूजा करो वरना रावण आएगा और सीता को ले जाएगा. उस में जोर रावण पर होता है, दशरथ पर नहीं जिस ने राम और सीता को घर छोड़ने को कहा. बारबार कांग्रेस का राज रावण राज कहा जाता है जबकि दशरथ राज में तो राम, लक्ष्मण और सीता तीनों घर से निकले थे. अब तो भाजपा सरकार अपने 7 सालों के काम गिना दे पर किए हों तो गिनाए न.

बजट को ध्यान से पढ़ें तो यही पता चलता है कि सरकार का कौन सा विभाग किस तरह जनता से वसूले पैसे पर मौज कर रहा है. पर जनता क्या कर सकती है. वह तो सदियों से पिसती रही है. एक तरफ पंडेपुजारी, मौलवीपादरी उसे लूटते हैं, दूसरी ओर हाकिम के पुलिस, पटवारी, जज, प्रशासक. उस बेचारी को वोट का हक मिला है, पर उसे जल्लादों में से एक को चुनना होता है, फंदा तो गले में हर कोई डालेगा.

गहरी पैठ: चुनाव और जाति के नाम पर बंटवारा

चुनावों के टिकटों के बंटवारे में जाति को कितना भाव दिया गया है, यह किसी से छिपा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट हर माह एकदो फैसले अवश्य ऐसे देती है जिन में जाति का सवाल उठाया जाता है पर जब दुनियाभर में लिंग, रंग, धर्म या क्षेत्र पर भेदभाव की बात होती है तो भारत सरकार बारबार कहती है कि जाति तो कोई भेदभाव वाली बात ही नहीं है.

अब अमेरिका की कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी की सीनेट ने फैसला किया है कि जाति के सवाल को लिंग, धर्म, भाषा वगैरह के मामलों की तरह लिया जाएगा और किसी की जाति को ले कर किसी को कुछ कहने, कोई चीज या सेवा देने में आनाकानी करने, उन्हें ज्यादा सुविधाएं देने पर सवाल उठाने का हक न होगा.

मजेदार बात यह है कि स्टेट यानी सरकार के फंड से चलती इस यूनिवर्सिटी के 80 भारतीय रंग वाले शिक्षकों ने इस की जम कर खिलाफत की. अमेरिका की 4,85,000 छात्रों वाली इस यूनिवर्सिटी में 55,000 पढ़ाने वाले हैं जिन में काफी भारतीय भी हैं. ये भारतीय ज्यादातर ऊंची जातियों के हैं जो बारबार दोहराते हैं कि भारत तो एक है, भारतीयों में जाति को ले कर कोई भेदभाव नहीं है.

जाति के सवाल को नकारने का मतलब यही होता है कि कहीं पिछड़े और दलित यूनिवर्सिटी में कोटों का फायदा न उठा लें और वहां पढ़ाने का काम न मिलने लगे. अगर वे साथ उठनेबैठने लगेंगे तो उन में आपस में लेनदेन भी होगा और एकदूसरे के घर जाना पड़ेगा. आज भी विदेशों में दशकों नहीं पीढि़यों तक हिंदुस्तान से बाहर रहने के बावजूद घर में भारतीय जाति देख कर ही एकदूसरे को बुलाते हैं. गोरा आ रहा हो तो कोई बात नहीं, चीनीजापानी चलेगा पर मुसलिम, पिछड़ा या दलित नहीं होना चाहिए.

अगर ऊंची जाति के घरों के बच्चों ने कहीं दलितपिछड़ों में प्रेम का बीज बो लिया तो आफत आ जाएगी, इसलिए भारतीय मूल के मातापिता अपने बच्चों के भारतीय मूल के दोस्तों के नाम के साथ जाति पर सवाल करने में देर नहीं लगाते. अमेरिका में बराबरी की मांग करने वाले अकसर इस सवाल को खड़ाकरते रहते हैं. भारत सरकार और वहां की कट्टर हिंदू संस्थाएं इस की जम कर खिलाफत करती हैं, क्योंकि हमेशा की तरह यहां जाति, जो पूरी तरह रगरग में फैली है, नकारा जाता है. एक देश, एक लोग का नारा लगाने वाले जाति के सवाल पर एकदम कान खड़े कर लेते हैं. बैकवर्ड और दलित सेवाकरते रहे हैं, एक हो कर और ऊंचों को वोट देते रहें, बस यही गुंजाइश छोड़ना चाहते हैं.

अमेरिका ही नहीं यूरोप में भी जाति के नाम पर अत्याचारों के सवाल उठाए जाते रहते हैं पर हर कहीं मौजूद ऊंची जातियों के भारतीय मूल के लोग इस पर अपना गुस्सा दिखाते हैं और अपनी बोलने की कला का फायदा उठा कर मुंह बंद कर देते हैं.

दलित और पिछड़ों के साथ दिक्कत है कि स्कूलकालेजों में पढ़ने के बाद भी वे न बोलना सीख रहे हैं, न पढ़ना. वे पढ़ते तो वही हैं जो ऊंची जातियों वाले पढ़ाते हैं, सुनते हैं तो वही जो ऊंची जातियों के सुनाते हैं, देखते हैं तो वही जो ऊंची जातियों वाले दिखाते हैं और आखिर में करते हैं तो वही जो ऊंची जातियों वाले कराते हैं. कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी की बीमारी दूसरे विश्वविद्यालयों में न फैल जाए यह फिक्र होनी चाहिए वहां की हिंदू संस्थाओं को जहां ज्यादातर ब्राह्मण और बनिया का गठजोड़ चलता है.

गहरी पैठ: औरतों की बदलती सामाजिक स्थिति

औरतों के बारे में हमदर्दी रखने वाले कानूनों और लगातार अदालतों का औरतों की शिकायतों पर आदमियों को जेल में भेज देने से जहां आदमियों के लिए औरतों को खिलवाड़ की चीज सम?ाने पर खतरा पैदा कर दिया है, वहीं औरतों का अपनी जवानी और बदन का इस्तेमाल अपने सुखों को पाने का रास्ता भी बंद कर दिया है. पिछले 10-20 सालों में जिस तरह से औरतों ने सामाजिक बेइज्जती से डरे बिना शिकायतें करना शुरू किया है उस से सैकड़ों लोग देशभर में जेलों में बंद हैं और छूटते हैं तो तब जब शिकायती औरतें अपना रवैया बदलती हैं.

एक तरह से तो यह सामाजिक बदलाव अच्छा है और आदमी औरतों को कमजोर नहीं सम?ा सकते पर दूसरी ओर औरतों के हाथ से अपने बदन का इस्तेमाल कर के अपना काम निकलवाने का मौका मारा गया है. चाहे यह मौका औरतों की अपनी कमजोरियों को पूरा करने में काम आता था पर फिर भी राजनीति, दफ्तरों, छोटीबड़ी नौकरियों में जहां औरतों के पास बदन के अलावा कोई और हुनर नहीं होता वहां कुछ दे देता था. इन कानूनों की वजह से अब औरतों को अपने बदन और अपनी अदाओं से नहीं, अपने काम और गुणों से आदमियों से डील करने की आदत डालनी पड़ेगी.

जिन लड़कियों को किशोरपन में आदत डाल दी जाती थी कि एक मुसकान से वे कुछ पा सकती हैं उन्हें अब सारी मेहनत अपने हुनर को ठीक करने पर लगानी होगी. आदमियों को भी एहसास हो गया है कि औरत कोई कबूतरी नहीं कि कुछ दाने फेंक कर उसे पिंजरे में बंद किया जा सकता है. जिन औरतों में योग्यता होगी, हुनर होगा, सिर्फ बदन का इस्तेमाल कर बच्चे पैदा करना आता होगा, वे पीछे रह जाएंगी. मांबाप को अब अपनी सुंदर बेटियों पर नहीं अपनी हुनरमंद लड़कियों पर सिर ऊंचा करना होगा और लड़की सांवली है या नाटी है या सुंदर नहीं है, अब बेमतलब का हो गया है.

यह बदलाव उन धर्मग्रंथों के बावजूद हो रहा है जिन में बारबार औरतों को पाप की खान बताया गया है और बेटी के जन्म होते ही घर वालों के मुंह लटक जाते थे. अब बेटियां घरों की शान बनने लगी हैं, क्योंकि वे लड़कों से ज्यादा मेहनत कर रही हैं. उन्हें मालूम है कि सिर्फ अच्छे बदन और सुंदर चेहरे के बल पर वे अपनी जिंदगी नहीं गुजार सकतीं. आदमी अब कानूनों की वजह से भयभीत हैं और कभी भी कौन सी लड़की जो आज छूट दे रही है, कल बिफर जाए, पता नहीं.

अभी दिल्ली में एक बौडी बिल्डर को जेल भेज दिया गया क्योंकि 38 साल की एक बच्चे की विवाहित मां ने आरोप लगा दिया कि उस के साथ न सिर्फ शादी का वादा कर के सैक्स किया गया, उस की वीडियो क्लिप बना कर उसे ब्लैकमेल किया गया और इस वजह से वह न पति की रह गई है, न प्रेमी ने उसे अपनाया. प्रेमी बौडी बिल्डर जो शायद सोच रहा होगा कि औरत भी उस के शरीर को चाहती है अब जेलों में रहेगा और वकीलों पर अपनी जमापूंजी खर्च करेगा. आधीअधूरी शिकायत के बावजूद प्रेमी की अदालत ने नहीं सुनी.

आदमियों के लिए तो यह चेतावनी है ही पर औरतों के लिए भी सबक है कि आज के युग में चाहे वे अच्छी प्रेमिका बनना चाहें या अच्छी बीवी, उन्हें बहुत तरीके के हुनर आने चाहिए. अपनी पढ़ाई पूरी करनी होगी, शादी हो गई तो सबकुछ मिल गया जैसी बातें नहीं चलेंगी. गांवकसबों में भी यह सम?ा फैल गईर् है और लड़कियों ने अब पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया है और वे लड़कों से ज्यादा आगे निकल रही हैं.

औरतों के बदन की खरीदारी जितनी जल्दी खत्म हो, उतना अच्छा है क्योंकि पाखंड और अंधविश्वास तभी दूर होंगे जब औरतें अपने को भगवान की पाप की गिनती में नहीं गिनेंगी.

गहरी पैठ

उत्तर प्रदेश के चुनाव अब सही पटरी पर आते दिख रहे हैं. जो पिछड़े और दलित नेता पिछले 7 सालों में पाखंड और छुआछूत की दैवीय ताकतों में भरोसा करने वाले संघ की राजनीतिक ब्रांच भारतीय जनता पार्टी में थोक में अपने सताए हुए, गरीब, बेचारे, फटेहाल, आधे भूखों को पाखंड के खेल में ?ोंक रहे थे, वे अब समाजवादी पार्टी में लौट रहे हैं.

यह कहना गलत होगा कि यह पलायन अजय बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ की काम करने की पौलिसी के खिलाफ है. यह फेरबदल इस अहसास का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी तो सिर्फ और सिर्फ मंदिर और पाखंडों के इर्दगिर्द घूमने वाली है जो दानदक्षिणा, पूजापाठ, स्नानों, तीर्थयात्राओं में भरोसा करती है, आम मजदूर, किसान, कारीगर, छोटे दुकानदारों के लिए नहीं.

ऊपर से कांग्रेस का नारा कि लड़की हूं, लड़ सकती हूं, काफी जोर का है क्योंकि पाखंड के ठेकेदारों के हिसाब से लड़की सिर्फ भोग की चीज है जिसे पिता, पति या बेटे के इशारों पर चलना चाहिए और जिस का काम बच्चे पैदा करना, पालना, घर चलाना, पंडों की तनधन से सेवा करना और फिर भी यातना सहना है. लड़ सकती हूं का नारा कांग्रेस को सीटें चाहे न दिलाए वह भारतीय जनता पार्टी के अंधभक्तों की औरतों को सिर उठाने की ताकत दे सकता है. भारतीय जनता पार्टी अब बलात्कार का राजनीतिक फायदा नहीं उठा सकती.

राम मंदिर और काशी कौरीडोर पिछड़ों को सम्मान न दिए जाने और औरतों को पैर की जूती सम?ाने की आदत में बेमतलब के हो गए हैं. उत्तर प्रदेश जो देश की राजनीतिक जान है, अगर कहीं हाथ से फिसल गया तो 100 साल से पौराणिक राज के सपने देख रहे लोगों को बड़ा धक्का लगेगा.

वैसे चंद नेताओं के इधर से उधर हो जाने पर कुछ ज्यादा नहीं होता. पश्चिम बंगाल चुनाव में अमित शाह ने थोक में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को भारतीय जनता पार्टी में शामिल करा लिया था और नरेंद्र मोदी खुले मंचों पर ‘दीदी ओ दीदी…’, ‘2 मई दीदी गई’ का नारा लगाते रहे पर चुनाव परिणाम कुछ और थे. उत्तर प्रदेश में नेता अपने मतलबों से भाजपा से नहीं छिटक रहे हैं, उन्हें जमीनी हकीकत का अहसास है. उत्तर प्रदेश हो या देश का कोईर् भी हिस्सा, देश का विकास सिर्फ मंदिरों तक है. और इन मंदिरों में भी जातिगत भेदभाव है. जहां पिछड़ों को उन के अपने छोटे देवता या गणेश और हनुमान पकड़ाए गए हैं, दलितों को भैरव जैसे. विष्णु, राम और महाभारत वाले कृष्ण ऊंची जातियों के लिए रिजर्व कर दिए गए हैं. ये मंदिर ही हैं जो आरक्षण की जरूरत को मजबूत करते हैं, उस आरक्षण की जिसे खत्म करने के लिए सरकारें जीजान से लगी हैं. उन्होंने सरकार में साराकाम ठेके पर कराना शुरू कर दिया है और सरकारी कारखाने निजी कंपनियों को बेच डाले जहां आरक्षण का कानून नहीं चलता.

भारतीय जनता पार्टी छोड़ने वाले नेताओं ने अपनी जान और राजनीतिक कल पर बड़ा दांव खेला है. वे जानते हैं कि उन के खिलाफ जांचें शुरू हो सकती हैं और उन्हें लालू प्रसाद यादव की तरह जेल में ठूंसा जा सकता है. पर जैसे लालू प्रसाद यादव ने अपनी जनता के हित के लिए सम?ौता नहीं किया, उम्मीद करें कि जो आज पाखंड की राजनीति छोड़ रहे हैं, जिस भी पार्टी में जाएं, कुछ बनाने की राजनीति करें. देश को तरक्की की राह पर ले जाने में बड़ी मेहनत करनी है. सब को बराबरी का स्तर देना आसान नहीं है. एक पीढ़ी में तो कुछ न होगा क्योंकि 800 साल तक का बौद्ध धर्म का, जो पौराणिक धर्म से ज्यादा खुला था, आज नामोनिशान नहीं है.

जातिवाद के चेहरे को उजागर करता सीसीटीवी कैमरा

सीसीटीवी कैमरा आज आम आदमी को बौना बना रहे हैं और उन को ज्यादा फर्क पड़ने लगा है जिन के पास अगर कुछ है तो थोड़ी सी इज्जत है. देश के गरीब किसानों, मजदूरों, कारीगरों के पास आज बस थोड़ी सी इज्जत होती है, रुपयापैसा नहीं. उन की इस इज्जत की खुली नीलामी होने लगे तो इस से बुरा कुछ न होगा.
मद्रास हाईकोर्ट के एक सिंगल जज ने कहा कि राज्य के हर ब्यूटी पार्लर और मसाज स्पा में सीसीटीवी होना चाहिए ताकि वहां कोई अनैतिक काम न हो. यह हुक्म असल में उस हुक्म की तरह है कि दलित औरतें अपनी छातियों को न ढकें जो कभी केरल में जबरन लागू किया जाता था और बाकी जगह अपनेआप लागू हो जाता था क्योंकि गरीब औरतों के पास 2 जोड़ी तक कपड़े होते ही नहीं थे और नहाते या कपड़े धोते समय उन्हें अपना बदन सब की आंखों के सामने खोलना पड़ता. अंगरेजी में बनी फिल्म ‘गांधी’ में एक सीन यह बड़ी अच्छी तरह दिखाया गया है जब नदी में नहाती एक बिना कपड़ों के गरीब लड़की को गांधी अपनी धोती दे देते हैं.
हाईकोर्ट के फैसले का मतलब है कि इन ब्यूटी पार्लरों और मसाज स्पाओं में काम करने वाली लड़कियां असल में देह बेचती हैं और ऊंची जातियों के लोग खरीदते हैं. वे न ब्यूटी ट्रीटमैंट कराते हैं, न मालिश. यह पूरी जमात को बदनाम करने वाला फैसला है. ब्यूटी पार्लरों व मसाज स्पाओं में काम करने वाली ज्यादातर लड़कियां निचली जातियों की होती हैं. फाइवस्टार होटलों को भी धर्म के हिसाब से ऊंची कही जाने वाली लड़कियां इन कामों के लिए कम मिलती हैं.
ये लड़कियां अगर देह व्यापार में हैं तो भी क्या? यह उन का हक है. वे मेहनत की कमाई करती हैं. ऊंचे हाईकोर्ट में बैठे जज कमाऊ लड़की की आमदनी को रोकने या उस की इज्जत को खराब करने का हक नहीं रखते. देह व्यापार से जुड़ा सारा कानून असल में देश की दलित व ओबीसी लड़कियों के खिलाफ साजिश है जिस में ग्राहकों को तो बरी कर दिया जाता है पर लड़कियों, उन को घर में रखने वालियों, दलालों, सहायकों पर मुकदमे चलाए जाते हैं जो सब निचली जातियों के होते हैं. हां, ऊंची जातियों के पुलिस वाले, फाइनैंसर, नेता, मकान मालिक, म्यूनिसिपल कमेटी के इंस्पैक्टर वगैरह इन से अच्छी कमाई करते हैं.
गनीमत है कि सिंगल जज के फैसले को 2 जजों की बैंच ने जल्दी ही उलट दिया. 2 जजों ने जाति का मसला तो नहीं लिया, पर उन की चिंता थी ऊंची जातियों के ग्राहकों की, जिन की सीसीटीवी फुटेज ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं और जो निजता के हक का हनन करती हैं. उन्हें भी उन लड़कियों की चिंता नहीं थी जो ब्यूटी ट्रीटमैंट दे रही थीं या मसाज कर रही थीं और सीसीटीवी में आ जातीं.
चाहे ये लड़कियां ज्यादातर दलित और पिछड़ी क्यों न हों, इन को इज्जत से रहने का हक है, पूरा हक है. इन की फोटो ब्यूटी पार्लर या स्पा मालिक या पुलिस वालों के पास नहीं हो सकती. तमिलनाडु सरकार का आदेश कि ब्यूटी पार्लर या मसाज स्पा में घुसने के रास्ते पर सीसीटीवी लगा हो जजों ने बहाल किया है पर वह भी गलत है क्योंकि वह फुटेज वहां काम कर रही लड़कियों की इज्जत को तारतार करती है.    

हिंदू धर्म के ठेकेदारों ने जो नफरत फैलाई है उसमें पिसेंगे हम सभी

नफरत का जो माहौल देश में 20-25 सालों में बनाया जा रहा है .इस का मतलब असल में इतिहास के काले धब्बों को धोना नहीं है, अपनी दुकान चमकाना मात्र है. हिंदू धर्म के दुकानदारों को राजाओं की छत्रछाया भारत के काफी बड़े हिस्से में पिछले 1000 साल तक नहीं मिली. हालांकि समाज पर उन का कंट्रोल पूरा रहा और दलितों (अछूतों), पिछड़ों (शूद्रों) और दूसरों जैसे बनियों, किसानों, कारीगरों पर वे धर्म का नाम ले कर अपना दबदबा बनाए रख सके.

अब हिंदूमुसलिम या हिंदूईसाई को ले कर जो नफरत कभी राममंदिर, कभी गौपूजा, कभी आरक्षण, कभी पाकिस्तान से बदला, कभी कश्मीर को ले कर फैलाई जाती है उस में मतलब एक ही रहता है कि धर्म के ठेकेदार बिना काम किए पैसा भी पाते रहें और पावर में भी रहें. इस में कहना पड़ेगा कि वे पूरी तरह सफल रहे हैं और न सिर्फ पिछड़ों, दलितों, दूसरे धर्म वालों, ऊंचों को भी लूटने और उन की औरतों को पूरी तरह गुलाम सा बनाए रख पाए हैं.

हरिद्वार की हिंदू संसद सभा में कालीचरण, बैंगलुरु के सांसद एलएस तेजस्वी सूर्या और बुल्ली बाई वाले विशाल झा और श्वेता सिंह की बातों से असली चोट अगर किसी को लगती है तो वे पिछड़े और दलित हैं, हिंदूमुसलिम का नाम ले कर, वोट पा कर, धर्म के ठेकेदार मंदिरों को बनवा रहे हैं, तीर्थों को ठीक कर रहे हैं, नएनए तीर्थस्थान बनवा रहे हैं, मुफ्त में खानेपीने के अपनी जाति वालों के लिए होटलों का इंतजाम कर रहे हैं, पढ़ाई पर कब्जा कर रहे हैं, नौकरियों और धंधों को पहले की तरह अपनी मुट्ठी में कर रहे हैं.

नफरत का धुआं जब फैलता है तो चारों ओर फैलता है. नफरत के उपले जलाएंगे तो धुआं जलाने वालों के घरों में भी घुसेगा. नफरत की आंधी में दूसरों के घरों को उड़वाने की साजिश में धर्म के दुकानदार भूल गए कि उन के अपने मकान, उन के अपने ऐशगाह के स्थान बनाने तो ये ही आएंगे जो नफरत के शिकार हैं. यह नफरत का कीड़ा केवल मुसलिमों और ईसाइयों को ही नहीं काटेगा, यह खुद ऊंची जातियों में घुस जाएगा.

आज देशभर के घरों में नफरत करना सिखाना पहला काम हो गया है. लोगों को साथ काम करने से पहले सभी से नफरत करना सिखाया जा रहा है. बच्चों को मिड डे मील खाने में दलित औरत का पकाया खाना न खाने का पाठ पढ़ाया जा रहा है. भेदभाव पहले भी था, पर तब सब अपनेअपने दायरे में रहते थे जो खुद गलत था पर तब नफरत न थी, उसे रास्ते के पत्थर व गड्ढे मान कर कुदरत की देन माना जाता था जिसे पिछले जन्मों के कर्मों का फल बता कर समझाया जाता था.

आज भी भेदभाव नफरत की शक्ल में बदल गया है. आज हर पिछड़े व दलित से नफरत हो गई है. किसानों को ले कर न जाने क्याक्या कहा गया है क्योंकि वे गैरजरूरी कानूनों का विरोध कर रहे थे, पर वे नीची जातियों के, वे ऊंची जातियों की नफरत पर सवाल उठाएं, ऐसा कैसे हो सकता है. हर दूसरे धर्म वाले से नफरत सिखाई जा रही है पर इस का मतलब यह भी है कि अपने खुद के सगों के साथ भी नफरती रवैया अपनाने की आदत पड़ना. अब मंदिरों में चढ़ावे के लिए मारपीट आम हो गई है. अब मंदिरों की सी पढ़ाई पढ़ाने वाले स्कूलों में जबरदस्त गुटबाजी शुरू हो गई है. स्वामियों में आपसी ईर्ष्या पैदा हो गई है.

नफरत का मतलब है कि आप पड़ोसी को दुश्मन मानें, दोस्त नहीं. साथ देने वाले को हमलावर मानें, बचाने वाला नहीं. शहरों, गांवों में जो आज अकेलापन दिखता है, वह इसी नफरत का नतीजा है जो हिंदू धर्म के ठेकेदारों ने फैलाई है पर पिसेंगे सब इस में.

भारतीय जनता पार्टी की कमजोरी हैं नरेन्द्र मोदी!

यह बात थोड़ी अजीब नहीं है कि क्या चुनाव चाहे पश्चिम बंगाल में हों, उत्तर प्रदेश में हों, गोवा में हों, उत्तराखंड में हों या कहीं और किसी विधानसभा के हों, भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदीको ही मोरचों पर खड़ा करना होता है. चुनावी भाषण मोदी को देने खूब आते थे पर धीरेधीरे उन का नयापन खत्म हो रहा है और किराए की भीड़ भी सुनने को कोई खास बेचैन नहीं होती पर फिर भी पार्टी को उन्हीं को बुलाना पड़ता है.

जो पार्टी नेताओं से भरी हो, जिस के मैंबर गलीगली में हों, जो हर दंगे में हजारों की भीड़ जमा कर लेती हो, उसे विधानसभाओं के छोटे चुनावों में भी प्रधानमंत्री को एक बार नहीं दसियों बार बुलाना पड़े, यह तो बहुत परेशानी की बात है. प्रधानमंत्री का काम चुनाव लड़ना नहीं होता देश चलाना होता है. ऐसे समय जब देश में महंगाई का नासूर बढ़ रहा है, बेरोजगारी का कोई उपाय नहीं दिख रहा हो, टैक्स बढ़ रहे हों, हिंदूमुसलिम दंगे भड़क रहे हों, पढ़ाई बिखर रही हो, किसान रोना रो रहे हों, विदेशों में देश की इज्जत को खतरा हो, प्रधानमंत्री छोटेछोटे कसबोंशहरों में जा कर भाषण दे कर कांग्रेस या दूसरी पार्टियों को कोसने का काम करें, यह शर्म की बात है.

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गलती नरेंद्र मोदी की नहीं है. गलती तो पूरी पार्टी की है कि उस का कोई मुख्यमंत्री ऐसा नहीं है जो अपने बलबूते पर चुनाव जीत कर आ सके. ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल का चुनाव अपने बलबूते पर जीता था. तमिलनाडु का चुनाव स्टालिन ने अपने बलबूते पर जीता था. कांग्रेस सरकारों में भी पहले अशोक गहलोत ने राजस्थान का चुनाव अपने बलबूते पर जीता था और पंजाब का चुनाव कैप्टन अमरिंदर सिंह, जो अब भाजपा से मिल रहे हैं, ने अपने बलबूते पर जीता. इन के साथ दूसरी पार्टियां या कांग्रेस पार्टी थीं पर इन्हें किसी प्रधानमंत्री की तो जरूरत नहीं पड़ी.

भारतीय जनता पार्टी में ऐसी क्या कमजोरी है कि उस के पास नरेंद्र मोदी के अलावा कोई और चेहरा नहीं है जिस पर लोग भरोसा कर सकें? पहले कनार्टक में बीएस येदियुरप्पा हुआ करते थे जो अपने बलबूते पर विधानसभा का चुनाव कई बार जीत चुके हैं पर उन के अलावा भारतीय जनता पार्टी में और कोई नेता क्यों नहीं है?

भारतीय जनता पार्टी तो सब के विकास की बात करती है तो उस के पास नेताओं की खान होनी चाहिए. भारतीय जनता पार्टी हर सांस में परिवारवाद को कोसती है पर उस के पास परिवार तो क्या अकेला नरेंद्र मोदी बचा है तो क्यों? क्यों नहीं भारतीय जनता पार्टी में सम?ादार, तेज, होशियार, पढ़ेलिखे, जनता की सेवा करने वाले जमा हो रहे जो भरोसे के हों और कल को नरेंद्र मोदी की जगह ले सकें?

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वैसे हमारा पौराणिक इतिहास भी यही सा कुछ कहता है. पांडवों के बाद कुरुक्षेत्र समाप्त सा हो गया, राम के बाद उन का राज समाप्त सा हो गया. कम से कम महाभारत और रामायण अगर वे ऐतिहासिक दस्तावेज हैं तो यही कहते हैं. तो क्या भारतीय जनता पार्टी भी पौराणिक किस्सों को दोहराने की तैयारी में है? आज उस के हजारों सांसद, विधायक, पार्षद, जिलाध्यक्ष कल को प्रधानमंत्री का पद नहीं पाएंगे? अगर ऐसा हुआ तो देश को चाहे नुकसान न हो, भाजपाई भक्तों को बहुत नुकसान होगा.

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